महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो पुरुष राजाके टुकड़े खाकर पलता हुआ भी मोहवश उसके शत्रुओंकी सेवा करता है, वह मरनेके बाद वानर होता है ।। ६४ ।।
वानरो दश वर्षाणि पञ्च वर्षाणि मूषिकः ।
श्वाथ भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ।। ६५ ।।
दस वर्षोंतक वानर, पाँच वर्षोंतक चूहा और छः महीनोंतक कुत्ता होकर वह मनुष्यका जन्म पाता है ।।
न्यासापहर्ता तु नरो यमस्य विषयं गतः ।
संसाराणां शतं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ।। ६६ ।।
दूसरोंकी धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य यमलोकमें जाता और क्रमशः सौ योनियोंमें भ्रमण करके अन्तमें कीड़ा होता है ।। ६६ ।।
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ।। ६७ ।।
भारत! कीड़ेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है और अपने पापोंका क्षय करके अन्तमें मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ।। ६७ ।।
असूयको नरश्चापि मृतो जायति शार्ङ्गकः ।
विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मतिः ।। ६८ ।।
दूसरोंके दोष ढूँढ़नेवाला मनुष्य हरिणकी योनिमें जन्म लेता है तथा जो अपनी खोटी बुद्धिके कारण किसीके साथ विश्वासघात करता है, वह मनुष्य मछली होता है ।। ६८ ।।
भूत्वा मीनोऽष्ट वर्षाणि मृतो जायति भारत ।
मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छागः प्रजायते ।। ६९ ।।
भारत! आठ वर्षोंतक मछली रहकर मरनेके बाद वह चार मासतक मृग होता है। उसके बाद बकरेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ६९ ।।
छागस्तु निधनं प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः ।
कीटः संजायते जन्तुस्ततो जायति मानुषः ।। ७० ।।
बकरा पूरे एक वर्षपर मृत्युको प्राप्त होनेके पश्चात् कीड़ा होता है। उसके बाद उस जीवको मनुष्यका जन्म मिलता है ।। ७० ।।
धान्यान् यवांस्तिलान् माषान् कुलत्थान् सर्षपांश्चणान् ।
कलापानथ मुद्गांश्च गोधूमानतसींस्तथा ।। ७१ ।।
सस्यस्यान्यस्य हर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतनः ।
स जायते महाराज मूषिको निरपत्रपः ।। ७२ ।।
महाराज! जो पुरुष लज्जाका परित्याग करके अज्ञान और मोहके वशीभूत होकर धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह मरनेके बाद पहले चूहा होता है ।। ७१-७२ ।।
ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकरः । सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ॥ ७३ ॥ राजन्! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात् सूअर होता है। नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है ।। ७३ ।। श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव । भूत्वा श्वा पञ्च वर्षाणि ततो जायति मानवः ॥ ७४ ॥ पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है ।। ७४ ।। परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जायति वै वृकः । श्वा शृगालस्ततो गृध्रो व्यालः कङ्को बकस्तथा ॥ ७५ ॥ परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है ।। ७५ ।। भ्रातृभार्यां तु पापात्मा यो धर्षयति मोहितः । पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोऽपि संवत्सरं नृप ॥ ७६ ॥ नरेश्वर! जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है ।। ७६ ।। सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च । प्रधर्षयित्वा कामाय मृतो जायति सूकरः ॥ ७७ ॥ जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है ।। ७७ ।। सूकरः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविधः । बिडालः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुटः ॥ ७८ ॥ पिपीलिकस्तु मासांस्त्रीन् कीटः स्यान्मासमेव तु । एतानासाद्य संसारान् कृमियोनौ प्रजायते ॥ ७९ ॥ पाँच वर्षतक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीड़ेकी योनिमें रहता है। इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ७८-७९ ।। तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश । ततोऽधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानवः ॥ ८० ॥ उस कीट-योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ।। ८० ।। उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेऽपि वा विभो । मोहात् करोति यो विघ्नं स मृतो जायते कृमिः ॥ ८१ ॥
प्रभो! जो विवाह, यज्ञ अथवा दानका अवसर आनेपर मोहवश उसमें विघ्न डालता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ा ही होता है ॥ ८१ ॥
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानवः ॥ ८२ ॥
भारत! वह कीट पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर पापोंका क्षय करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है ॥ ८२ ॥
पूर्वं दत्त्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति ।
सोऽपि राजन् मृतो जन्तुः कृमियोनौ प्रजायते ॥ ८३ ॥
राजन्! जो पहले एक व्यक्तिको कन्यादान करके फिर दूसरेको उसी कन्याका दान करना चाहता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ८३ ॥
तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर ।
अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानवः ॥ ८४ ॥
युधिष्ठिर! उस योनिमें वह तेरह वर्षोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षयके पश्चात् वह पुनः मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ॥ ८४ ॥
देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा ।
अनिर्वाप्य समश्नन् वै मृतो जायति वायसः ॥ ८५ ॥
जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके बलि-वैश्वदेव किये बिना ही अन्न ग्रहण करता है, वह मरनेके बाद कौएकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ८५ ॥
वायसः शतवर्षाणि ततो जायति कुक्कुटः ।
जायते व्यालकश्चापि मासं तस्मात् तु मानुषः ॥ ८६ ॥
सौ वर्षोंतक कौएके शरीरमें रहकर वह मुर्गा होता है। उसके बाद एक मासतक सर्प रहता है। तत्पश्चात् मनुष्यका जन्म पाता है ॥ ८६ ॥
ज्येष्ठं पितृसमं चापि भ्रातरं योऽवमन्यते ।
सोऽपि मृत्युमुपागम्य क्रौञ्चयोनौ प्रजायते ॥ ८७ ॥
बड़ा भाई पिताके समान आदरणीय है, जो उसका अपमान करता है, उसे मृत्युके बाद क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ ८७ ॥
क्रौञ्चो जीवति वर्षं तु ततो जायति चीरकः ।
ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्नुते ॥ ८८ ॥
क्रौंच होकर वह एक वर्षतक जीवित रहता है। उसके बाद चीरक जातिका पक्षी होता है और फिर मरनेके बाद मनुष्य-योनिमें जन्म पाता है ॥ ८८ ॥
वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ।
ततः सम्प्राप्य निधनं जायते सूकरः पुनः ॥ ८९ ॥
शूद्र-जातिका पुरुष ब्राह्मणजातिकी स्त्रीके साथ समागम करके देहत्यागके पश्चात् पहले कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। फिर मरनेके बाद सूअर होता है॥ ८९॥
सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ।
श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव ॥ ९० ॥
नरेश्वर! सूअरकी योनिमें जन्म लेते ही वह रोगसे मर जाता है। पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् वह मूढ़ जीव उसी पाप-कर्मके कारण कुत्ता होता है॥ ९०॥
श्वा भूत्वा कृतकर्मासौ जायते मानुषस्ततः ।
तत्रापत्यं समुत्पाद्य मृतो जायति मूषिकः ॥ ९१ ॥
कुत्ता होनेपर पापकर्मका भोग समाप्त करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है। मनुष्ययोनिमें भी वह एक ही संतान पैदा करके मर जाता है और शेष पापका फल भोगनेके लिये चूहा होता है॥ ९१॥
कृतघ्नस्तु मृतो राजन् यमस्य विषयं गतः ।
यमस्य पुरुषैः क्रुद्धैर्वधं प्राप्नोति दारुणम् ॥ ९२ ॥
राजन्! कृतघ्न मनुष्य मरनेके बाद यमराजके लोकमें जाता है। वहाँ क्रोधमें भरे हुए यमदूत उसके ऊपर बड़ी निर्दयताके साथ प्रहार करते हैं॥ ९२॥
दण्डं मुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम् ।
असिपत्रवनं घोरवालुकं कूटशाल्मलीम् ॥ ९३ ॥
एताश्चान्याश्च बह्वीश्च यमस्य विषयं गतः ।
यातनाः प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत ॥ ९४ ॥
भारत! वह दण्ड, मुद्गर और शूलकी चोट खाकर दारुण अग्निकुम्भ (कुम्भीपाक), असिपत्रवन, तपी हुई भयंकर बालू, काँटोंसे भरी हुई शाल्मली आदि नरकोंमें कष्ट भोगता है। यमलोकमें पहुँचकर इन ऊपर बताये हुए तथा और भी बहुत-से नरकोंकी भयंकर यातनाएँ भोगकर वह वहाँ यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है॥
ततो हतः कृतघ्नः स तत्रोग्रैर्भरतर्षभ ।
संसारचक्रमासाद्य कृमियोनौ प्रजायते ॥ ९५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार निर्दयी यमदूतोंसे पीड़ित हुआ कृतघ्न पुरुष पुनः संसारचक्रमें आता और कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है॥ ९५॥
कृमिर्भवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
ततो गर्भं समासाद्य तत्रैव म्रियते शिशुः ॥ ९६ ॥
भारत! पंद्रह वर्षोंतक वह कीड़ेकी योनिमें रहता है। फिर गर्भमें आकर वहीं गर्भस्थ शिशुकी दशामें ही मर जाता है॥ ९६॥
ततो गर्भशतैर्जन्तुर्बहुभिः सम्प्रपद्यते ।
संसारांश्च बहून् गत्वा ततस्तिर्यक्षु जायते ॥ ९७ ॥
इस तरह कई सौ बार वह जीव गर्भकी यन्त्रणा भोगता है। तदनन्तर बहुत बार जन्म लेनेके पश्चात् वह तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होता है ॥ ९७ ॥
ततो दुःखमनुप्राप्य बहु वर्षगणानिह । अपुनर्भवसंयुक्तस्ततः कूर्मः प्रजायते ॥ ९८ ॥ इन योनियोंमें बहुत वर्षोंतक दुःख भोगनेके पश्चात् वह फिर मनुष्ययोनिमें न आकर दीर्घकालके लिये कछुआ हो जाता है ॥ ९८ ॥
दधि हृत्वा बकश्चापि प्लवो मत्स्यान्संसकृतान् । चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधु दंशः प्रजायते ॥ ९९ ॥ दुर्बुद्धि मनुष्य दहीकी चोरी करके बगला होता है, कच्ची मछलियोंकी चोरी करके वह कारण्डव नामक जलपक्षी होता है और मधुका अपहरण करके वह डाँस (मच्छर) की योनिमें जन्म लेता है ॥ ९९ ॥
फलं वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिकाः । चोरयित्वा च निष्पावं जायते हलगोलकः ॥ १०० ॥ फल, मूल अथवा पूएकी चोरी करनेपर मनुष्यको चींटीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। निष्पाव (मटर या उड़द) की चोरी करनेवाला हलगोलक नामवाला कीड़ा होता है ॥ १०० ॥
पायसं चोरयित्वा तु तित्तिरित्त्वमवाप्नुते । हृत्वा पिष्टमयं पूपं कुम्भोलोकः प्रजायते ॥ १०१ ॥ खीरकी चोरी करनेवाला तीतरकी योनिमें जन्म लेता है। आटेका पूआ चुराकर मनुष्य मरनेके बाद उल्लू होता है ॥ १०१ ॥
अयो हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्वायसो जायते नरः । कांस्यं हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्हारितो जायते नरः ॥ १०२ ॥ लोहेकी चोरी करनेवाला मूर्ख मानव कौवा होता है। काँसकी चोरी करके खोटी बुद्धिवाला मनुष्य हारीत नामक पक्षी होता है ॥ १०२ ॥
रजतं भाजनं हृत्वा कपोतः सम्प्रजायते । हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते ॥ १०३ ॥ चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय भाण्डकी चोरी करके मनुष्यको कीड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १०३ ॥
पत्रोर्णं चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति । कौशिकं तु ततो हृत्वा नरो जयति वर्तकः ॥ १०४ ॥ ऊनी वस्त्र चुरानेवाला कृकल (गिरगिट) की योनिमें जन्म लेता है। कौशेय (रेशमी) वस्त्रकी चोरी करनेपर मनुष्य बत्तक होता है ॥ १०४ ॥
अंशुकं चोरयित्वा तु शुको जायति मानवः ।
चोरयित्वा दुकूलं तु मृतो हंसः प्रजायते ।। १०५ ।। अंशुक (महीन कपड़े) की चोरी करके मनुष्य तोतेका जन्म पाता है तथा दुकूल (उत्तरीय वस्त्र) की चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ मानव हंसकी योनिमें जन्म लेता है ।। १०५ ।। क्रौञ्चः कार्पासिकं हृत्वा मृतो जायति मानवः । चोरयित्वा नरः पट्टं त्वाविकं चैव भारत ।। १०६ ।। क्षौमं च वस्त्रमादाय शशो जन्तुः प्रजायते । सूती वस्त्रकी चोरी करके मरा हुआ मनुष्य क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। भारत! पाटम्बर, भेड़के ऊनका बना हुआ तथा क्षौम (रेशमी) वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश नामक जन्तु होता है ।। १०६ १/२ ।। वर्णान् हृत्वा तु पुरुषो मृतो जायति बर्हिणः ।। १०७ ।। हृत्वा रक्तानि वस्त्राणि जायते जीवजीवकः । अनेक प्रकारके रंगोंकी चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मोर होता है। लाल कपड़े चुरानेवाला मनुष्य चकोरकी योनिमें जन्म लेता है ।। १०७ १/२ ।। वर्णकादींस्तथा गन्धांश्चोरयित्वेह मानवः ।। १०८ ।। छुच्छुन्दरित्वमाप्नोति राजँल्लोभपरायणः । तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पञ्च च ।। १०९ ।। राजन्! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक (अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूँदर होता है। उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है ।। १०८-१०९ ।। अधर्मस्य क्षयं गत्वा ततो जायति मानुषः । चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते ।। ११० ।। फिर अधर्मका क्षय हो जानेपर वह मनुष्यका जन्म पाता है। दूध चुरानेवाली स्त्री बगुली होती है ।। ११० ।। यस्तु चोरयते तैलं नरो मोहसमन्वितः । सोऽपि राजन् मृतो जन्तुस्तैलपायी प्रजायते ।। १११ ।। राजन्! जो मनुष्य मोहयुक्त होकर तेल चुराता है, वह मरनेपर तेलपायी नामक कीड़ा होता है ।। १११ ।। अशस्त्रं पुरुषं हत्वा सशस्त्रः पुरुषाधमः । अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जायते खरः ।। ११२ ।। जो नीच मनुष्य धनके लोभसे अथवा शत्रुताके कारण हथियार लेकर निहत्थे पुरुषको मार डालता है, वह अपनी मृत्युके बाद गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।। खरो जीवति वर्षे द्वे ततः शस्त्रेण वध्यते ।
स मृतो मृगयोनौ तु नित्योद्विग्नोऽभिजायते ॥ ११३ ॥ गदहा होकर वह दो वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर शस्त्रसे उसका वध होता है। इस प्रकार मरकर वह मृगकी योनिमें जन्म लेता और हिंसकोंके भयसे सदा उद्विग्न रहता है ॥ ११३ ॥
मृगो वध्यति शस्त्रेण गते संवत्सरे तु सः । हतो मृगस्ततो मीनः सोऽपि जालेन बध्यते ॥ ११४ ॥ मृग होकर वह सालभरमें ही शस्त्रद्वारा मारा जाता है। मरनेपर मत्स्य होता है, फिर वह भी जालसे बँधता है ॥ ११४ ॥
मासे चतुर्थे सम्प्राप्ते श्वापदः सम्प्रजायते । श्वापदो दश वर्षाणि द्वीपी वर्षाणि पञ्च च ॥ ११५ ॥ वह किसी प्रकार जालसे छूटा हुआ भी चौथे महीनेमें मृत्युको प्राप्त हो हिंसक जन्तु भेड़िया आदि होता है। उस योनिमें दस वर्षोंतक रहकर वह पाँच वर्षोंतक व्याघ्र या चीतेकी योनिमें पड़ा रहता है ॥ ११५ ॥
ततस्तु निधनं प्राप्तः कालपर्यायचोदितः । अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ॥ ११६ ॥ तदनन्तर पापका क्षय होनेपर कालकी प्रेरणासे मृत्युको प्राप्त हो वह पुनः मनुष्य होता है ॥ ११६ ॥
स्त्रियं हत्वा तु दुर्बुद्धिर्यमस्य विषयं गतः । बहून् क्लेशान् समासाद्य संसारांश्चैव विंशतिम् ॥ ११७ ॥ जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष स्त्रीकी हत्या कर डालता है, वह यमराजके लोकमें जाकर नाना प्रकारके क्लेश भोगनेके पश्चात् बीस बार दुःखद योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ११७ ॥
ततः पश्चान्महाराज कृमियोनौ प्रजायते । कृमिर्विंशतिवर्षाणि भूत्वा जायति मानुषः ॥ ११८ ॥ महाराज! तदनन्तर वह कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और बीस वर्षोंतक कीट-योनिमें रहकर अन्तमें मनुष्य होता है ॥ ११८ ॥
भोजनं चोरयित्वा तु मक्षिका जायते नरः । मक्षिकासंघवशगो बहून् मासान् भवत्युत ॥ ११९ ॥ ततः पापक्षयं कृत्वा मानुषत्वमवाप्नुते । भोजनकी चोरी करके मनुष्य मक्खी होता है और कई महीनोंतक मक्खियोंके समुदायके अधीन रहता है। तत्पश्चात् पापोंका भोग समाप्त करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ॥ ११९½ ॥
धान्यं हृत्वा तु पुरुषो लोमशः सम्प्रजायते ॥ १२० ॥ तथा पिण्याकसम्मिश्रमशनं चोरयेन्नरः ।
स जायते बभ्रुसमो दारुणो मूषिको नरः ॥ १२१ ॥
दशन् वै मानुषान्नित्यं पापात्मा स विशाम्पते ।
धान्यकी चोरी करनेवाले मनुष्यके शरीरमें दूसरे जन्ममें बहुत-से रोएँ पैदा होते हैं। प्रजानाथ! जो मानव तिलके चूर्णसे मिश्रित भोजनकी चोरी करता है, वह नेवलेके समान आकारवाला भयानक चूहा होता है तथा वह पापी सदा मनुष्योंको काटा करता है ॥
घृतं हृत्वा तु दुर्बुद्धिः काकमद्गुः प्रजायते ॥ १२२ ॥
मत्स्यमांसमथो हृत्वा काको जायति दुर्मतिः ।
लवणं चोरयित्वा तु चिरिकाकः प्रजायते ॥ १२३ ॥
जो दुर्बुद्धि मनुष्य घी चुराता है, वह काकमद्गु (सींगवाला जल-पक्षी) होता है। जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य मत्स्य और मांसकी चोरी करता है, वह कौवा होता है। नमककी चोरी करनेसे मनुष्यको चिरिकाक-योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १२२-१२३ ॥
विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो विनिह्नोति मानवः ।
स गतायुर्नरस्तात मत्स्ययोनौ प्रजायते ॥ १२४ ॥
तात! जो मानव विश्वासपूर्वक रखी हुई दूसरेकी धरोहरको हड़प लेता है, वह गतायु होनेपर मत्स्यकी योनिमें जन्म लेता है ॥ १२४ ॥
मत्स्ययोनिमनुप्राप्य मृतो जायति मानुषः ।
मानुषत्वमनुप्राप्य क्षीणायुरुपपद्यते ॥ १२५ ॥
मत्स्ययोनिमें जन्म लेनेके बाद जब मरता है, तब पुनः मनुष्यका जन्म पाता है। मानव-योनिमें आकर उसकी आयु बहुत कम होती है ॥ १२५ ॥
पापानि तु नराः कृत्वा तिर्यग् जायन्ति भारत ।
न चात्मनः प्रमाणं ते धर्मं जानन्ति किंचन ॥ १२६ ॥
भारत! पाप करके मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेते हैं। वहाँ उन्हें अपने उद्धार करनेवाले धर्मका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता ॥ १२६ ॥
ये पापानि नराः कृत्वा निरस्यन्ति व्रतैः सदा ।
सुखदुःखसमायुक्ता व्यथितास्ते भवन्त्युत ॥ १२७ ॥
असंवासाः प्रजायन्ते म्लेच्छाश्चापि न संशयः ।
नराः पापसमाचारा लोभमोहसमन्विताः ॥ १२८ ॥
जो पापाचारी पुरुष लोभ और मोहके वशीभूत हो पाप करके उसे व्रत आदिके द्वारा दूर करनेका प्रयत्न करते हैं, वे सदा सुख-दुःख भोगते हुए व्यथित रहते हैं। उन्हें कहीं रहनेको ठौर नहीं मिलता तथा वे म्लेच्छ होकर सदा मारे-मारे फिरते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ १२७-१२८ ॥
वर्जयन्ति च पापानि जन्मप्रभृति ये नराः ।
अरोगा रूपवन्तस्ते धनिनश्च भवन्त्युत ॥ १२९ ॥
जो मनुष्य जन्मसे ही पापका परित्याग कर देते हैं, वे नीरोग, रूपवान् और धनी होते हैं॥ १२९॥
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन कृत्वा पापमवाप्नुयुः।
एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः॥ १३०॥
स्त्रियाँ भी यदि पूर्वोक्त पापकर्म करती हैं तो पापकी भागिनी होती हैं और वे उन पापभोगी प्राणियोंकी ही पत्नी होती हैं॥ १३०॥
परस्वहरणे दोषाः सर्व एव प्रकीर्तिताः।
एतद्धि लेशमात्रेण कथितं ते मयानघ॥ १३१॥
निष्पाप नरेश! पराये धनका अपहरण करनेसे जो दोष होते हैं, वे सब बताये गये। यहाँ मेरे द्वारा संक्षेपसे ही इस विषयका दिग्दर्शन कराया गया है॥ १३१॥
अपरस्मिन् कथायोगे भूयः श्रोष्यसि भारत।
एतन्मया महाराज ब्रह्मणो वदतः पुरा॥ १३२॥
सुरर्षीणां श्रुतं मध्ये पृष्टश्चापि यथातथम्।
मयापि तच्च कात्स्न्येन यथावदनुवर्णितम्।
एतच्छ्रुत्वा महाराज धर्मे कुरु मनः सदा॥ १३३॥
भरतनन्दन! अब दूसरी बार बातचीतके प्रसंगमें फिर कभी इस विषयको सुनना। महाराज! पूर्वकालमें ब्रह्माजी देवर्षियोंके बीच यह प्रसंग सुना रहे थे। वहाँ उन्हींके मुँहसे मैंने ये सारी बातें सुनी थीं और तुम्हारे पूछनेपर उन्हीं सब बातोंका मैंने भी यथार्थरूपसे वर्णन किया है। राजन्! यह सुनकर तुम सदा धर्ममें मन लगाओ॥ १३२-१३३॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रं नाम एकादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ १११॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्र नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥
अधर्मस्य गतिर्ब्रह्मन् कथिता मे त्वयानघ ।
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा
युधिष्ठिर उवाच
अधर्मस्य गतिर्ब्रह्मन् कथिता मे त्वयानघ ।
धर्मस्य तु गतिं श्रोतुमिच्छामि वदतां वर ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**ब्रह्मन्! आपने अधर्मकी गति बतायी। पापरहित वक्ताओंमें श्रेष्ठ! अब मैं धर्मकी गति सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
कृत्वा कर्माणि पापानि कथं यान्ति शुभां गतिम् ।
कर्मणा च कृतेनेह केन यान्ति शुभां गतिम् ॥ २ ॥
मनुष्य पाप कर्म करके कैसे शुभगतिको प्राप्त होते हैं तथा किस कर्मके अनुष्ठानसे उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है? ॥ २ ॥
बृहस्पतिरुवाच
कृत्वा पापानि कर्माणि अधर्मवशमागतः ।
मनसा विपरीतेन निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! जो मनुष्य पापकर्म करके अधर्मके वशीभूत हो जाता है, उसका मन धर्मके विपरीत मार्गमें जाने लगता है; इसलिये वह नरकमें गिरता है ॥ ३ ॥
मोहादधर्मं यः कृत्वा पुनः समनुतप्यते ।
मनःसमाधिसंयुक्तो न स सेवेत दुष्कृतम् ॥ ४ ॥
परंतु जो अज्ञानवश अधर्म बन जानेपर पुनः उसके लिये पश्चात्ताप करता है, उसे चाहिये कि मनको वशमें रखकर वह फिर कभी पापका सेवन न करे ॥
यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हते ।
तथा तथा शरीरं तु तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ ५ ॥
मनुष्यका मन ज्यों-ज्यों पापकर्मकी निन्दा करता है त्यों-त्यों उसका शरीर उस अधर्मके बन्धनसे मुक्त होता जाता है ॥ ५ ॥
यदि व्याहरते राजन् विप्राणां धर्मवादिनाम् ।
ततोऽधर्मकृतात् क्षिप्रमपवादात् प्रमुच्यते ॥ ६ ॥
राजन्! यदि पापी पुरुष धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे अपना पाप बता दे तो वह उस पापके कारण होनेवाली निन्दासे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ॥ ६ ॥
यथा यथा नरः सम्यगधर्ममनुभाषते ।
समाहितेन मनसा विमुच्येत तथा तथा ।
भुजंग इव निर्मोकात् पूर्वमुक्ताज्जरान्वितात् ॥ ७ ॥
मनुष्य अपने मनको स्थिर करके जैसे-जैसे अपना पाप प्रकट करता है, वैसे-ही-वैसे वह मुक्त होता जाता है। ठीक उसी तरह जैसे सर्प पूर्वमुक्त, जराजीर्ण केंचलसे छूट जाता है ॥ ७ ॥
दत्त्वा विप्रस्य दानानि विविधानि समाहितः ।
मनःसमाधिसंयुक्तः सुगतिं प्रतिपद्यते ॥ ८ ॥
मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सावधान हो ब्राह्मणको यदि नाना प्रकारके दान करे तो वह उत्तम गतिको पाता है ॥ ८ ॥
प्रदानानि तु वक्ष्यामि यानि दत्त्वा युधिष्ठिर ।
नरः कृत्वाप्यकार्याणि ततो धर्मेण युज्यते ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! अब मैं उन उत्कृष्ट दानोंका वर्णन करूँगा, जिन्हें देकर मनुष्य यदि उससे न करने योग्य कर्म बन जायँ तो भी धर्मके फलसे संयुक्त होता है ॥ ९ ॥
सर्वेषामेव दानानामन्नं श्रेष्ठमुदाहृतम् ।
पूर्वमन्नं प्रदातव्यमृजुना धर्ममिच्छता ॥ १० ॥
सब प्रकारके दानोंमें अन्नका दान श्रेष्ठ बताया गया है। अतः धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको सरलभावसे पहले अन्नका ही दान करना चाहिये ॥ १० ॥
प्राणा ह्यन्नं मनुष्याणां तस्माज्जन्तुश्च जायते ।
अन्ने प्रतिष्ठितो लोकस्तस्मादन्नं प्रशस्यते ॥ ११ ॥
अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्नसे ही प्राणीका जन्म होता है, अन्नके ही आधारपर सारा संसार टिका हुआ है। इसलिये अन्न सबसे उत्तम माना गया है ॥ ११ ॥
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवर्षिपितृमानवाः ।
अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ॥ १२ ॥
देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्नके ही दानसे राजा रन्तिदेव स्वर्गको प्राप्त हुए हैं ॥ १२ ॥
न्यायलब्धं प्रदातव्यं द्विजातिभ्योऽन्नमुत्तमम् ।
स्वाध्यायं समुपेतेभ्यः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ १३ ॥
अतः स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणोंके लिये प्रसन्न चित्तसे न्यायोपार्जित उत्तम अन्नका दान करना चाहिये ॥ १३ ॥
यस्य ह्यन्नमुपाश्नन्ति ब्राह्मणानां शतं दश ।
हृष्टेन मनसा दत्तं न स तिर्यग्गतिर्भवेत् ॥ १४ ॥
जिस पुरुषके प्रसन्न चित्तसे दिये हुए अन्नको एक हजार ब्राह्मण खा लेते हैं, वह पशु-पक्षीकी योनिमें नहीं जन्म लेता ॥ १४ ॥
ब्राह्मणानां सहस्राणि दश भोज्य नरर्षभ ।
नरोऽधर्मात् प्रमुच्येत योगेष्वभिरतः सदा ॥ १५ ॥ नरश्रेष्ठ! जो मनुष्य सदा योग-साधनमें संलग्न रहकर दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन करा देता है, वह पापके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥
भैक्ष्येणान्नं समाहृत्य विप्रो वेदपुरस्कृतः । स्वाध्यायनिरते विप्रे दत्त्वेह सुखमेधते ॥ १६ ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण भिक्षासे अन्न लाकर यदि स्वाध्याय-परायण विप्रको दान देता है तो इस लोकमें सुखी होता है ॥ १६ ॥
(भैक्ष्येणापि समाहृत्य दद्यादन्नं द्विजेषु वै । सुवर्णदानात् पापानि नश्यन्ति सुबहून्यपि ॥ जो भिक्षासे भी अन्न लाकर ब्राह्मणोंको देता है और सुवर्णका दान करता है, उसके बहुत-से पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥
दत्त्वा वृत्तिकरीं भूमिं पातकेनापि मुच्यते । पारायणैः पुराणानां मुच्यते पातकैर्द्विजः ॥ जीविका चलानेवाली भूमिका दान करके भी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पुराणोंके पाठसे भी ब्राह्मण पातकोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
गायत्र्याश्चैव लक्षेण गोसहस्रस्य तर्पणात् । वेदार्थं ज्ञापयित्वा तु शुद्धान् विप्रान् यथार्थतः ॥ सर्वत्यागादिभिश्चापि मुच्यते पातकैर्द्विजः । सर्वातिथ्यं परं ह्येषां तस्मादन्नं परं स्मृतम् ॥) एक लाख गायत्री जपनेसे, एक हजार गौओंको तृप्त करनेसे, विशुद्ध ब्राह्मणोंको यथार्थरूपसे वेदार्थका ज्ञान करानेसे तथा सर्वस्वके त्याग आदिसे भी द्विज पापमुक्त हो जाता है। इन सबमें सबका अन्नके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करना ही सबसे श्रेष्ठ कर्म है। इसलिये अन्नको सबसे उत्तम माना गया है ॥
अहिंसन् ब्राह्मणस्वानि न्यायेन परिपाल्य च । क्षत्रियस्तरसा प्राप्तमन्नं यो वै प्रयच्छति ॥ १७ ॥ द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यः प्रयतः सुसमाहितः । तेनापोहति धर्मात्मन् दुष्कृतं कर्म पाण्डव ॥ १८ ॥ धर्मात्मा पाण्डुनन्दन! जो क्षत्रिय ब्राह्मणके धनका अपहरण न करके न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए अपने बाहुबलसे प्राप्त किया हुआ अन्न वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भलीभाँति शुद्ध एवं समाहित चित्तसे दान करता है, वह उस अन्न-दानके प्रभावसे अपने पूर्वकृत पापोंका नाश कर डालता है ॥ १७-१८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 997)
बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको उपदेश
षड्भागपरिशुद्धं च कृषेर्भागमुपार्जितम् । वैश्यो ददद् द्विजातिभ्यः पापेभ्यः परिमुच्यते ॥ १९ ॥ जो वैश्य खेतीसे अन्न पैदा करके उसका छठा भाग राजाको देकर बचे हुएमेंसे शुद्ध अन्नका ब्राह्मणको दान करता है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥
अवाप्य प्राणसंदेहं कार्कश्येन समार्जितम् । अन्नं दत्त्वा द्विजातिभ्यः शूद्रः पापात् प्रमुच्यते ॥ २० ॥ शूद्र भी यदि प्राणोंकी परवा न करके कठोर परिश्रमसे कमाया हुआ अन्न ब्राह्मणोंको दान करता है तो पापसे छुटकारा पा जाता है ॥ २० ॥
औरसेन बलेनान्नमर्जयित्वाविहिंसकः । यः प्रयच्छति विप्रेभ्यो न स दुर्गाणि पश्यति ॥ २१ ॥ जो किसी प्राणीकी हिंसा न करके अपनी छातीके बलसे पैदा किया हुआ अन्न विप्रोंको दान करता है, वह कभी संकटका अनुभव नहीं करता ॥ २१ ॥
न्यायेनैवाप्तमन्नं तु नरो हर्षसमन्वितः । द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यो दत्त्वा पापात् प्रमुच्यते ॥ २२ ॥ न्यायके अनुसार अन्न प्राप्त करके उसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको हर्षपूर्वक दान देनेवाला मनुष्य अपने पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥
अन्नमूर्जस्करं लोके दत्त्वोर्जस्वी भवेन्नरः । सतां पन्थानमावृत्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २३ ॥ संसारमें अन्न ही बलकी वृद्धि करनेवाला है, अतः अन्नका दान करके मनुष्य बलवान् होता है और सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय लेकर समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥ २३ ॥
दानवद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः । ते हि प्राणस्य दातारस्तेभ्यो धर्मः सनातनः ॥ २४ ॥ दाता पुरुषोंने जिस मार्गको चालू किया है, उसीसे मनीषी पुरुष चलते हैं। अन्नदान करनेवाले मनुष्य वास्तवमें प्राणदान करनेवाले हैं। उन्हीं लोगोंसे सनातन धर्मकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥
सर्वावस्थं मनुष्येण न्यायेनान्नमुपार्जितम् । कार्यं पात्रागतं नित्यमन्नं हि परमा गतिः ॥ २५ ॥ मनुष्यको प्रत्येक अवस्थामें न्यायतः उपार्जित किया हुआ अन्न सत्पात्रके लिये अर्पित करना चाहिये; क्योंकि अन्न ही सब प्राणियोंका परम आधार है ॥ २५ ॥
अन्नस्य हि प्रदानेन नरो रौद्रं न सेवते । तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्यायपरिवर्जितम् ॥ २६ ॥ अन्न-दान करनेसे मनुष्यको कभी नरककी भयंकर यातना नहीं भोगनी पड़ती; अतः न्यायोपार्जित अन्नका ही सदा दान करना चाहिये ॥ २६ ॥
यतेद् ब्राह्मणपूर्वं हि भोक्तुमन्नं गृही सदा ।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यादन्नदानेन मानवः ॥ २७ ॥
प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि वह पहले ब्राह्मणको भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करनेका प्रयत्न करे तथा अन्न-दानके द्वारा प्रत्येक दिनको सफल बनावे ॥ २७ ॥
भोजयित्वा दशशतं नरो वेदविदां नृप ।
न्यायविद्धर्मविदुषामितिहासविदां तथा ॥ २८ ॥
न याति नरकं घोरं संसारांश्च न सेवते ।
सर्वकामसमायुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते सुखम् ॥ २९ ॥
नरेश्वर! जो मनुष्य वेद, न्याय, धर्म और इतिहासके जाननेवाले एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह घोर नरक और संसारचक्रमें नहीं पड़ता। इहलोकमें उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और मरनेके बाद वह परलोकमें सुख भोगता है ॥ २८-२९ ॥
एवं खलु समायुक्तो रमते विगतज्वरः ।
रूपवान् कीर्तिमांश्चैव धनवांश्चोपपद्यते ॥ ३० ॥
इस प्रकार अन्न-दानमें संलग्न हुआ पुरुष निश्चिन्त हो सुखका अनुभव करता है और रूपवान्, कीर्तिमान् तथा धनवान् होता है ॥ ३० ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातमन्नदानफलं महत् ।
मूलमेतत् तु धर्माणां प्रदानानां च भारत ॥ ३१ ॥
भारत! अन्न-दान सब प्रकारके धर्मों और दानोंका मूल है। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अन्नदानका सारा महान् फल बताया है ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रे
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं)
बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान
युधिष्ठिर उवाच
अहिंसा वैदिकं कर्म ध्यानमिन्द्रियसंयमः ।
तपोऽथ गुरुशुश्रूषा किं श्रेयः पुरुषं प्रति ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! अहिंसा, वेदोक्त कर्म, ध्यान, इन्द्रिय-संयम, तपस्या और गुरु-शुश्रूषा—इनमेंसे कौन-सा कर्म मनुष्यका (विशेष) कल्याण कर सकता है ॥
बृहस्पतिरुवाच
सर्वाण्येतानि धर्म्याणि पृथग्द्वाराणि सर्वशः ।
शृणु संकीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ ॥ २ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**भरतश्रेष्ठ! ये छः प्रकारके कर्म ही धर्मजनक हैं तथा सब-के-सब भिन्न-भिन्न कारणोंसे प्रकट हुए हैं। मैं इन छहोंका वर्णन करता हूँ; तुम सुनो ॥
हन्त निःश्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ।
अहिंसापाश्रयं धर्मं यः साधयति वै नरः ॥ ३ ॥
त्रीन् दोषान् सर्वभूतेषु निधाय पुरुषः सदा ।
कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते ॥ ४ ॥
अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमें स्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ ३-४ ॥
अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः ।
आत्मनः सुखमन्विच्छन् स प्रेत्य न सुखी भवेत् ॥ ५ ॥
जो मनुष्य अपने सुखकी इच्छा रखकर अहिंसक प्राणियोंको डंडेसे मारता है, वह परलोकमें सुखी नहीं होता है ॥ ५ ॥
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः ।
न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥ ६ ॥
जो मनुष्य सब भूतोंको अपने समान समझता, किसीपर प्रहार नहीं करता (दण्डको हमेशाके लिये त्याग देता है) और क्रोधको अपने काबूमें रखता है, वह मृत्युके पश्चात् सुख भोगता है ॥ ६ ॥
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः ।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः ॥ ७ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, अर्थात् सबकी आत्माको अपनी ही आत्मा समझता है तथा जो सब भूतोंको समान भावसे देखता है, उस गमनागमनसे रहित ज्ञानीकी गतिका पता लगाते समय देवता भी मोहमें पड़ जाते हैं ॥ ७ ॥
न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः ।
एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥ ८ ॥
जो बात अपनेको अच्छी न लगे, वह दूसरोंके प्रति भी नहीं करनी चाहिये। यही धर्मका संक्षिप्त लक्षण है। इससे भिन्न जो बर्ताव होता है, वह कामनामूलक है ॥ ८ ॥
प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये ।
आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ ९ ॥
माँगनेपर देने और इनकार करनेसे, सुख और दुःख पहुँचानेसे तथा प्रिय और अप्रिय करनेसे पुरुषको स्वयं जैसे हर्ष-शोकका अनुभव होता है, उसी प्रकार दूसरोंके लिये भी समझे ॥ ९ ॥
यथा परः प्रक्रमते परेषु
तथापरे प्रक्रमन्ते परस्मिन् ।
तथैव तेऽस्तूपमा जीवलोके
यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः ॥ १० ॥
जैसे एक मनुष्य दूसरोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अवसर आनेपर दूसरे भी उसके ऊपर आक्रमण करते हैं। इसीको तुम जगत्में अपने लिये भी दृष्टान्त समझो। अतः किसीपर आक्रमण नहीं करना चाहिये। इस प्रकार यहाँ कौशलपूर्वक धर्मका उपदेश किया है ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं सुरगुरुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
दिवमाचक्रमे धीमान् पश्यतामेव नस्तदा ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहकर परम बुद्धिमान् देवगुरु बृहस्पतिजी उस समय हमलोगोंके देखते-देखते स्वर्ग-लोकको चले गये ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रसमाप्तौ
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री नहीं है / केवल शीर्ष पर एक सजावटी प्रतीक अंकित है)
११४-
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा शरतल्पे पितामहम् ।
पुनरेव महातेजाः पप्रच्छ वदतां वरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर महातेजस्वी और वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने बाणशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्मसे पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ऋषयो ब्राह्मणा देवाः प्रशंसन्ति महामते ।
अहिंसालक्षणं धर्मं वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ २ ॥
कर्मणा मनुजः कुर्वन् हिंसां पार्थिवसत्तम ।
वाचा च मनसा चैव कथं दुःखात् प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महामते! देवता, ऋषि और ब्राह्मण वैदिक प्रमाणके अनुसार सदा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा किया करते हैं। अतः नृपश्रेष्ठ! मैं पूछता हूँ कि मन, वाणी और क्रियासे भी हिंसाका ही आचरण करनेवाला मनुष्य किस प्रकार उसके दुःखसे छुटकारा पा सकता है? ॥ २-३ ॥
भीष्म उवाच
चतुर्विधेयं निर्दिष्टा ह्यहिंसा ब्रह्मवादिभिः ।
एकैकतोऽपि विभ्रष्टा न भवत्यरिसूदन ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**शत्रुसूदन! ब्रह्मवादी पुरुषोंने (मनसे, वाणीसे तथा कर्मसे हिंसा न करना एवं मांस न खाना—इन) चार उपायोंसे अहिंसाधर्मका पालन बतलाया है। इनमेंसे किसी एक अंशकी भी कमी रह गयी तो अहिंसा-धर्मका पूर्णतः पालन नहीं होता ॥ ४ ॥
यथा सर्वश्चतुष्पाद् वै त्रिभिः पादैर्न तिष्ठति ।
तथैवेयं महीपाल कारणैः प्रोच्यते त्रिभिः ॥ ५ ॥
महीपाल! जैसे चार पैरोंवाला पशु तीन पैरोंसे नहीं खड़ा रह सकता, उसी प्रकार केवल तीन ही कारणोंसे पालित हुई अहिंसा पूर्णतः अहिंसा नहीं कही जा सकती ॥ ५ ॥
यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् ।
सर्वाण्येवापिधीयन्ते पदजातानि कौञ्जरे ॥ ६ ॥
एवं लोकेष्वहिंसा तु निर्दिष्टा धर्मतः पुरा ।
जैसे हाथीके पैरके चिह्नमें सभी पदगामी प्राणियोंके पदचिह्न समा जाते हैं, उसी प्रकार पूर्वकालमें इस जगत्के भीतर धर्मतः अहिंसाका निर्देश किया गया है अर्थात् अहिंसाधर्ममें सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है। ऐसा माना गया है।। ६ १/२ ।।
कर्मणा लिप्यते जन्तुर्वाचा च मनसापि च ।। ७ ।।
पूर्वं तु मनसा त्यक्त्वा तथा वाचाथ कर्मणा ।
न भक्षयति यो मांसं त्रिविधं स विमुच्यते ।। ८ ।।
जीव मन, वाणी और क्रियाके द्वारा हिंसाके दोषसे लिप्त होता है, किंतु जो क्रमशः पहले मनसे, फिर वाणीसे और फिर क्रियाद्वारा हिंसाका त्याग करके कभी मांस नहीं खाता, वह पूर्वोक्त तीनों प्रकारकी हिंसाके दोषसे भी मुक्त हो जाता है ।। ७-८ ।।
त्रिकारणं तु निर्दिष्टं श्रूयते ब्रह्मवादिभिः ।
मनो वाचि तथाऽऽस्वादे दोषा ह्येषु प्रतिष्ठिताः ।। ९ ।।
ब्रह्मवादी महात्माओंने हिंसादोषके प्रधान तीन कारण बतलाये हैं—मन (मांस खानेकी इच्छा), वाणी (मांस खानेका उपदेश) और आस्वाद (प्रत्यक्षरूपमें मांसका स्वाद लेना)। ये तीनों ही हिंसा-दोषके आधार हैं ।। ९ ।।
न भक्षयन्त्यतो मांसं तपोयुक्ता मनीषिणः ।
दोषांस्तु भक्षणे राजन् मांसस्येह निबोध मे ।। १० ।।
इसलिये तपस्यामें लगे हुए मनीषी पुरुष कभी मांस नहीं खाते हैं। राजन्! अब मैं मांसभक्षणमें जो दोष है, उनको यहाँ बता रहा हूँ, सुनो ।। १० ।।
पुत्रमांसोपमं जानन् खादते योऽविचक्षणः ।
मांसं मोहसमायुक्तः पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ।। ११ ।।
जो मूर्ख यह जानते हुए भी कि पुत्रके मांसमें और दूसरे साधारण मांसोंमें कोई अन्तर नहीं है, मोहवश मांस खाता है, वह नराधम है ।। ११ ।।
पितृमातृसमायोगे पुत्रत्वं जायते यथा ।
हिंसां कृत्वावशः पापो भूयिष्ठं जायते तथा ।। १२ ।।
जैसे पिता और माताके संयोगसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार हिंसा करनेसे पापी पुरुषको विवश होकर बारंबार पापयोनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १२ ।।
रसं च प्रतिजिह्वाया ज्ञानं प्रज्ञायते यथा ।
तथा शास्त्रेषु नियतं रागो ह्यास्वादिताद् भवेत् ।। १३ ।।
जैसे जीभसे जब रसका ज्ञान होता है, तब उसके प्रति वह आकृष्ट होने लगती है, उसी प्रकार मांसका आस्वादन करनेपर उसके प्रति आसक्ति बढ़ती है। शास्त्रोंमें भी कहा है कि विषयोंके आस्वादनसे उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है ।। १३ ।।
संस्कृतासंस्कृताः पक्वा लवणालवणास्तथा ।
प्रजायन्ते यथा भावास्तथा चित्तं निरुध्यते ।। १४ ।।