माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का०
ऋजुवक्रादिकाभासमलातस्पन्दितं यथा ।
ग्रहणग्राहकाभासं विज्ञानस्पन्दितं तथा ॥ ४७ ॥
जिस प्रकार अलात (उल्का) का घूमना ही सीधे-टेढ़े आदि रूपोंमें भासित होता है उसी प्रकार विज्ञानका स्फुरण ही ग्रहण और ग्राहक आदि रूपोंमें भास रहा है ॥ ४७ ॥
| यथा हि लोके ऋजुवक्रादि-प्रकाराभासमलातस्पन्दितमुल्काचलनं तथा ग्रहणग्राहकाभासं विषयिविषयाभासमित्यर्थः । किं तद्विज्ञानस्पन्दितम् । स्पन्दितमिव स्पन्दितमविद्यया । न ह्यचलस्य विज्ञानस्य स्पन्दनमस्ति। अजाचलमिति ह्युक्तम् ॥ ४७ ॥ | जिस प्रकार लोकमें सीधे-टेढ़े आदि रूपोंमें भासमान होनेवाला अलातका स्पन्द अर्थात् उल्का (जलती हुई लकेटी) का घूमना ही है, उसी प्रकार ग्रहण और ग्राहकरूपसे भासनेवाला, अर्थात् इन्द्रिय और विषयरूपसे भासनेवाला भी है । वह कौन है ? विज्ञानका स्पन्द, जो अविद्याके कारण ही स्पन्दके समान स्पन्दसा प्रतीत होता है; वस्तुतः अविचल विज्ञानका स्पन्दन नहीं हो सकता; क्योंकि [उपर्युक्त श्लोक ४५ में ही] 'वह अज और अचल है' ऐसा कहा जा चुका है ॥ ४७ ॥ |
अस्पन्दमानमलातमनाभासमजं यथा ।
अस्पन्दमानं विज्ञानमनाभासमजं तथा ॥ ४८ ॥
जिस प्रकार स्पन्दनरहित अलात आभासशून्य और अज है उसी प्रकार स्पन्दनरहित विज्ञान भी आभासशून्य और अज है ॥ ४८ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २२७
| अस्पन्दमानं स्पन्दनवर्जितं तदेवालातमृज्वाद्याकारेणाजायमानमनाभासमजं यथा;तथाविद्यया स्पन्दमानमविद्योपरमेऽस्पन्दमानं जात्याद्याकारेणानाभासमजमचलं भविष्यतीत्यर्थः ॥ ४८ ॥ | जिस प्रकार वही अलात अस्पन्दमान—स्पन्दनसे रहित होनेपर ऋजु आदि आकारोंमें भासित न होनेके कारण अनाभास और अज रहता है उसी प्रकार अविद्यासे स्पन्दित होनेवाला विज्ञान अविद्याकी निवृत्ति होनेपर जाति आदि रूपसे स्पन्दित न होकर अनाभास, अज और अचल हो जायगा—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ४८ ॥ |
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| किं च— | इसके सिवा— |
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अलाते स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतोभुवः ।
न ततोऽन्यत्र निस्पन्दान्नालातं प्रविशन्ति ते ॥ ४९ ॥
अलातके स्पन्दित होनेपर भी वे आभास किसी अन्य कारणसे नहीं होते, तथा उसके स्पन्दरहित होनेपर भी कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न वे अलातमें ही प्रवेश करते हैं ॥ ४९ ॥
| तस्मिन्नेवालाते स्पन्दमान ऋजुवक्राद्याभासा अलातादन्यतः कुतश्चिदागत्यालाते नैव भवन्ति इति नान्यतोभुवः । न च तस्मान्निस्पन्दादलातादन्यत्र निर्गताः। न च निस्पन्दमलातमेव प्रविशन्ति ते ॥ ४९ ॥ | उस अलातके स्पन्दित होनेपर भी वे सीधे-टेढ़े आदि आभास अलातसे भिन्न कहीं अन्यत्रसे आकर अलातमें उपस्थित नहीं हो जाते; अतः वे किसी अन्यसे होनेवाले भी नहीं हैं । तथा निस्पन्द हुए उस अलातसे वे कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न उस निस्पन्द अलातमें ही प्रवेश कर जाते हैं ॥४९॥ |
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२२८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| किं च— | इसके अतिरिक्त— |
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न निर्गता अलातात्ते द्रव्यत्वाभावयोगतः ।
विज्ञानेऽपि तथैव स्युराभासस्याविशेषतः ॥ ५० ॥
उनमें द्रव्यत्वके अभावका योग होनेके कारण वे अलातसे भी नहीं निकले हैं। इसी प्रकार आभासत्वमें समानता होनेके कारण विज्ञानके विषयमें भी समझना चाहिये ॥ ५० ॥
| न निर्गता अलातात्त आभासा गृहादिवद्द्रव्यत्वाभावयोगतः— द्रव्यस्य भावो द्रव्यत्वम्, तदभावो द्रव्यत्वाभावः, द्रव्यत्वाभावयोगतो द्रव्यत्वाभावयुक्तर्वेस्तुत्वाभावादित्यर्थः; वस्तुनो हि प्रवेशादि सम्भवति नावस्तुनः । विज्ञानेऽपि जात्याद्याभासास्तथैव स्युराभासस्याविशेषतस्तुल्यत्वात् ॥ ५० ॥ | **द्रव्यत्वाभावयोगके कारण—**द्रव्यके भावका नाम द्रव्यत्व है उसके अभावको द्रव्यत्वाभाव कहते हैं उस द्रव्यत्वाभावयोग अर्थात् द्रव्यत्वाभावरूप युक्तिके कारण यानी वस्तुत्वका अभाव होनेसे वे आभास घर आदिसे निकलनेके समान अलातसे भी नहीं निकले; क्योंकि प्रवेशादि होने तो वस्तुके ही सम्भव हैं, अवस्तुके नहीं। विज्ञानमें [प्रतीत होनेवाले] जात्यादि आभास भी ऐसे ही समझने चाहिये, क्योंकि आभासकी सामन्यता होनेसे उनकी तुल्यता है ॥ ५० ॥ |
| कथं तुल्यत्वमित्याह— | उनकी तुल्यता किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं— |
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विज्ञाने स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतोभुवः ।
न ततोऽन्यत्र निस्पन्दान्न विज्ञानं विशन्ति ते ॥ ५१ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २२९
न निर्गतास्ते विज्ञानाद्द्रव्यत्वाभावयोगतः ।
कार्यकारणताभावाद्यतोऽचिन्त्याः सदैव ते ॥ ५२ ॥
विज्ञानके स्पन्दित होनेपर भी उसके आभास किसी अन्य कारणसे नहीं होते तथा उसके स्पन्दरहित होनेपर कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न विज्ञानमें ही प्रवेश कर जाते हैं ॥ ५१ ॥ द्रव्यत्वके अभावका योग होनेके कारण वे विज्ञानसे भी नहीं निकले, क्योंकि कार्य-कारणताका अभाव होनेके कारण वे सदा ही अचिन्तनीय ( अनिर्वचनीय ) हैं ॥५२॥
| अलातेन समानं सर्वं विज्ञानस्य । सदाचलत्वं तु विज्ञानस्य विशेषः । जात्याद्याभासा विज्ञानेऽचले किंकृता इत्याह । कार्यकारणताभावाज्जन्यजनकत्वानुपपत्तेरभावरूपत्वादचिन्त्यास्ते यतः सदैव । | विज्ञानके विषयमें भी सब कुछ अलातके ही समान है। नित्य अचल रहना—यही विज्ञानकी विशेषता है। अचल विज्ञानमें जाति आदि आभास किस कारणसे होते हैं ? इसपर कहते हैं—क्योंकि कार्यकारणताका अभाव अर्थात् अभावरूप होनेके कारण जन्य-जनकत्वकी अनुपपत्ति होनेसे वे सदा ही अचिन्तनीय हैं। |
| यथासत्स्वृज्वाद्याभासेषु ऋज्वादिबुद्धिर्दृष्टालातमात्रे तथासत्स्वेव जात्यादिषु विज्ञानमात्रे जात्यादिबुद्धिर्मृषैवेति समुदायार्थः ॥५१-५२॥ | [ इन दोनों श्लोकोंका ] सम्मिलित अर्थ यह है कि जिस प्रकार ऋजु (सरल) आदि आभासोंके न होनेपर भी अलातमात्रमें ही ऋजु आदि बुद्धि होती देखी जाती है उसी प्रकार जाति आदिके न होनेपर भी केवल विज्ञानमात्रमें जाति आदि बुद्धि होना मिथ्या ही है ॥ ५१-५२ ॥ |
२३० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
आत्मामें कार्य-कारणभाव क्यों असम्भव है ?
| अजमेकमात्मतत्त्वमिति स्थितं तत्र यैरपि कार्यकारणभावः कल्प्यते तेषाम्— | यह निश्चय हुआ कि एक अजन्मा आत्मतत्त्व है। उसमें जो लोग कार्य-कारणभावकी कल्पना करते हैं उनके मतमें भी— |
द्रव्यं द्रव्यस्य हेतुः स्यादन्यदन्यस्य चैव हि ।
द्रव्यत्वमन्यभावो वा धर्माणां नोपपद्यते ॥ ५३ ॥
द्रव्यका कारण द्रव्य ही हो सकता है और वह भी अन्य द्रव्यका अन्य ही द्रव्य कारण होना चाहिये; किन्तु आत्माओंमें द्रव्यत्व और अन्यत्व दोनों ही सम्भव नहीं हैं ॥ ५३ ॥
| द्रव्यं द्रव्यस्यान्यस्यान्यद्धेतुः कारणं स्यान्न तु तस्यैव तत् । नाप्यद्रव्यं कस्यचित्कारणं स्वतन्त्रं दृष्टं लोके। न च द्रव्यत्वं धर्माणामात्मनामुपपद्यतेऽन्यत्वं वा कुतश्चिद्येनान्यस्य कारणत्वं कार्यत्वं वा प्रतिपद्येत । अतोऽद्रव्यत्वादनन्यत्वाच्च न कस्यचित्कार्यं कारणं वात्मेत्यर्थः ॥५३॥ | अन्य द्रव्यका कारण अन्य द्रव्य ही हो सकता है, न कि उस द्रव्यका वही। और जो वस्तु द्रव्य नहीं है उसे लोकमें किसीका स्वतन्त्र कारण होता नहीं देखा। तथा आत्माओंका द्रव्यत्व अथवा अन्यत्व किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है, जिससे कि वे किसी अन्य द्रव्यके कारणत्व अथवा कार्यत्वको प्राप्त हो सकें। अतः तात्पर्य यह है कि अद्रव्यत्व और अनन्यत्वके कारण आत्मा किसीका भी कार्य अथवा कारण नहीं है ॥ ५३ ॥ |
एवं न चित्तजा धर्माश्चित्तं वापि न धर्मजम् ।
एवं हेतुफलाजातिं प्रविशन्ति मनीषिणः ॥ ५४ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २३१
इस प्रकार न तो बाह्य पदार्थ ही चित्तसे हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थोंसे उत्पन्न हुआ है। अतः मनीषि लोग कार्य-कारणकी अनुत्पत्ति ही निश्चित करते हैं ॥ ५४ ॥
| एवं यथोक्तेभ्यो हेतुभ्य आत्म-विज्ञानस्वरूपमेव चित्तमिति न चित्तजा बाह्यधर्मा नापि बाह्यधर्मजं चित्तम् । विज्ञानस्वरूपाभासमात्रत्वात्सर्वधर्माणाम् । एवं न हेतोः फलं जायते नापि फलाद्धेतुरिति हेतुफलयोरजातिं हेतुफलाजातिं प्रविशन्त्यध्यवस्यन्ति आत्मनि हेतुफलयोरभावमेव प्रतिपद्यन्ते ब्रह्मविद इत्यर्थः ॥ ५४॥ | इस प्रकार उपर्युक्त हेतुओंसे चित्त आत्मविज्ञानस्वरूप ही है; न तो बाह्य पदार्थ ही चित्तसे उत्पन्न हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थोंसे उत्पन्न हुआ है; क्योंकि सारे ही धर्म विज्ञानस्वरूपके आभासमात्र हैं। इस प्रकार न तो हेतुसे फलकी उत्पत्ति होती है और न फलसे हेतुकी। अतः मनीषी लोग हेतु और फलकी अनुत्पत्ति ही निश्चित करते हैं। तात्पर्य यह कि ब्रह्मवेत्ता लोग आत्मामें हेतु और फलका अभाव ही देखते हैं॥५४॥ |
हेतु-फलभावके अभिनिवेशका फल
| ये पुनर्हेतुफलयोरभिनिविष्टास्तेषां किं स्यादित्युच्यते—धर्माधर्माख्यस्य हेतोरहं कर्ता मम धर्माधर्मो तत्फलं कालान्तरे क्वचित्प्राणिनिकाये जातो भोक्ष्य इति— | किन्तु जिनका हेतु और फलमें अभिनिवेश है उनका क्या होगा ? इसपर कहा जाता है—धर्माधर्मसंज्ञक हेतुका मैं कर्ता हूँ, धर्म और अधर्म मेरे हैं, कालान्तरमें किसी प्राणीके शरीरमें उत्पन्न होकर उनका फल भोगूँगा—इस प्रकार |
यावद्धेतुफलावेशस्तावद्धेतुफलोद्भवः ।
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५५ ॥
| २३२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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जबतक हेतु और फलका आग्रह है तबतक ही हेतु और फलकी उत्पत्ति भी है। हेतु और फलका आवेश क्षीण हो जानेपर फिर हेतु और फलरूप संसारकी उत्पत्ति भी नहीं होती
| यावद्धेतुफलयोरावेशो हेतुफलाग्रह आत्मन्यध्यारोपणं तच्चित्ततेत्यर्थः, तावद्धेतुफलयोरुद्भवो धर्माधर्मयोस्तत्फलस्य चानुच्छेदेन प्रवृत्तिरित्यर्थः । यदा पुनर्मन्त्रौषधिवीर्येणेव ग्रहावेशो यथोक्ताद्वैतदर्शनेनाविद्योद्भूतहेतुफलावेशोऽपनीतो भवति तदा तस्मिन्क्षीणे नास्ति हेतुफलोद्भवः ॥ ५५ ॥ | जबतक हेतु और फलका आवेश—हेतुफलाग्रह अर्थात् उन्हें आत्मामें आरोपित करना यानी तच्चित्तता है, तबतक हेतु और फलकी उत्पत्ति भी है अर्थात् तबतक धर्माधर्म और उनके फलकी अविच्छिन्न प्रवृत्ति भी है। किन्तु जिस समय मन्त्र और ओषधिकी सामर्थ्यसे ग्रहके आवेशके समान उपर्युक्त अद्वैतबोधसे अविद्याजनित हेतु और फलका आवेश निवृत्त हो जाता है उस समय उसके क्षीण हो जानेपर हेतु और फलकी उत्पत्ति भी नहीं होती ॥ ५५ ॥ |
हेतु-फलके अभिनिवेशमें दोष
| यदि हेतुफलोद्भवस्तदा को दोष इत्युच्यते— | यदि हेतु और फलकी उत्पत्ति रहे तो इनमें दोष क्या है ? सो बतलाते हैं— |
यावद्धेतुफलावेशः संसारस्तावदायतः ।
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५६ ॥
जबतक हेतु और फलका आग्रह है तबतक संसार बढ़ा हुआ है। हेतु और फलका आवेश नष्ट होनेपर विद्वान् संसारको प्राप्त नहीं होता ॥ ५६ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २६३
| यावत्सम्यग्दर्शनेन हेतुफला- | जबतक सम्यग्ज्ञानसे हेतु और | | वेशो न निवर्ततेऽक्षीणः संसार- | फलका आग्रह निवृत्त नहीं होता | | स्तावदायतो दीर्घो भवतीत्यर्थः। | तबतक संसार क्षीण न होकर | | क्षीणे पुनर्हेतुफलावेशे संसारं न | विस्तृत होता जाता है। किन्तु | | प्रपद्यते कारणाभावात् ॥ ५६ ॥ | हेतुफलावेशके क्षीण होनेपर, कोई | | | कारण न रहनेसे, विद्वान् संसारको | | | प्राप्त नहीं होता ॥ ५६ ॥ |
| नन्वजादात्मनोऽन्यन्नास्त्येव | शंका—अजन्मा आत्मासे भिन्न | | तत्कथं हेतुफलयोः संसारस्य | तो और कोई है ही नहीं; फिर हेतु | | चोत्पत्तिविनाशावुच्येते त्वया ? | और फल तथा संसारके उत्पत्ति- | | शृणु— | विनाशका तुम कैसे वर्णन कर रहे हो ? | | | समाधान—अच्छा, सुनो— |
संवृत्या जायते सर्वं शाश्वतं नास्ति तेन वै ।
सद्भावेन ह्यजं सर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति वै ॥ ५७ ॥
सारे पदार्थ व्यावहारिक दृष्टिसे उत्पन्न होते हैं; इसलिये वे नित्य नहीं हैं । परमार्थदृष्टिसे तो सब कुछ अज ही है; इसलिये किसीका विनाश भी नहीं है ॥ ५७ ॥
| संवृत्या संवरणं संवृति- | 'संवृत्या'—संवरण अर्थात् | | रविद्याविषयो लौकिको व्यव- | अविद्याविषयक लौकिक व्यवहारका | | हारस्तया संवृत्या जायते सर्वम् । | नाम संवृति है; उस संवृतिसे ही | | तेनाविद्याविषये शाश्वतं नित्यं | सबकी उत्पत्ति होती है। अतः | | नास्ति वै । अत उत्पत्तिविनाश- | उस अविद्याके अधिकारमें कोई भी | | | वस्तु शाश्वत-नित्य नहीं है । | | | इसीलिये उत्पत्ति-विनाशशील संसार |
| २३४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| लक्षणः संसार आयत इत्युच्यते । परमार्थसद्भावेन त्वजं सर्वमात्मैव यस्मात् । अतो जात्यभावादुच्छेदस्तेन नास्ति वै कस्यचिद्धेतुफलादेरित्यर्थः ॥ ५७ ॥ | विस्तृत है—ऐसा कहा जाता है; क्योंकि परमार्थसत्तासे तो सब कुछ अजन्मा आत्मा ही है। अतः जन्मका अभाव होनेके कारण किसी भी हेतु या फल आदिका उच्छेद नहीं होता—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥५७॥ |
जीवोंका जन्म मायिक है
धर्मा य इति जायन्ते जायन्ते ते न तत्त्वतः ।
जन्म मायोपमं तेषां सा च माया न विद्यते ॥ ५८ ॥
धर्म (जीव) जो उत्पन्न होते कहे जाते हैं वे वस्तुतः उत्पन्न नहीं होते । उनका जन्म मायाके सदृश है और वह माया भी [वस्तुतः] है नहीं ॥ ५८ ॥
| येऽप्यात्मानोऽन्ये च धर्मा जायन्त इति कल्प्यन्ते त इत्येवं-प्रकारा यथोक्ता संवृतिर्निर्दिश्यत इति संवृत्येव धर्मा जायन्ते; न ते तत्त्वतः परमार्थतो जायन्ते । यत्पुनस्तत्संवृत्या जन्म तेषां धर्माणां यथोक्तानां यथा मायया जन्म तथा तन्मायोपमं प्रत्ये-तव्यम् । | जो भी आत्मा तथा दूसरे धर्म 'उत्पन्न होते हैं'—इस प्रकार कल्पना किये जाते हैं वे इस प्रकारके सभी धर्म संवृतिसे ही उत्पन्न होते हैं। यहाँ 'इति' शब्दसे इससे पहले श्लोकमें कही हुई संवृतिका निर्देश किया गया है। वे तत्त्वतः—परमार्थतः उत्पन्न नहीं होते । क्योंकि उन पूर्वोक्त धर्मोंका जो संवृतिसे होनेवाला जन्म है वह ऐसा है जैसे मायासे होनेवाला जन्म होता है, इसलिये उसे मायाके सदृश समझना चाहिये । |
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २३५ |
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| माया नाम वस्तु तर्हि? नैवम्;<br>सा च माया न विद्यते, मायेत्य-<br>विद्यमानस्याख्येत्यभिप्रायः॥५८॥ | तब तो माया एक सत्य वस्तु सिद्ध होती है? नहीं, ऐसी बात नहीं है। वह माया भी है नहीं। तात्पर्य यह है कि 'माया' यह अविद्यमान वस्तुका ही नाम है ॥५८॥ |
| कथं मायोपमं तेषां धर्माणां जन्मेत्याह— | उन धर्मोंका जन्म मायाके सदृश किस प्रकार है? सो बतलाते हैं— |
यथा मायामयाद्वीजाज्जायते तन्मयोऽङ्कुरः ।
नासौ नित्यो न चोच्छेदी तद्वद्धर्मेषु योजना ॥ ५६ ॥
जिस प्रकार मायामय बीजसे मायामय अङ्कुर उत्पन्न होता है, और वह न तो नित्य ही होता है और न नाशवान् ही, उसी प्रकार धर्मोंके विषयमें भी युक्ति समझनी चाहिये ॥ ५९ ॥
| यथा मायामयादाम्रादिवीजाज्जायते तन्मयो मायामयोऽङ्कुरो नासावङ्कुरो नित्यो न चोच्छेदी विनाशी वाभूतत्वात्तद्वदेव धर्मेषु जन्मनाशादियोजना युक्तिः । न तु परमार्थतो धर्माणां जन्म नाशो वा युज्यत इत्यर्थः ॥ ५९ ॥ | जिस प्रकार मायामय आम आदिके बीजसे तन्मय अर्थात् मायामय अङ्कुर उत्पन्न होता है और वह अङ्कुर न तो नित्य ही होता है और न नाशवान् ही, उसी प्रकार असत्य होनेके कारण धर्मोंमें भी जन्म-नाशादिकी योजना—युक्ति है। तात्पर्य यह है कि परमार्थतः धर्मोंका जन्म अथवा नाश होना सम्भव नहीं है ॥५९॥ |
| २३६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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आत्माकी अनिर्वचनीयता
नाजेषु सर्वधर्मेषु शाश्वताशाश्वताभिधा ।
यत्र वर्णा न वर्तन्ते विवेकस्तत्र नोच्यते ॥ ६० ॥
इन सम्पूर्ण अजन्मा धर्मोंमें नित्य-अनित्य नामोंकी प्रवृत्ति नहीं है जहाँ शब्द ही नहीं है उस आत्मतत्त्वमें [नित्य-अनित्य] विवेक भी नहीं कहा जा सकता ॥ ६० ॥
| परमार्थतस्त्वात्मस्वजेषुनित्यैकरसविज्ञप्तिमात्रसत्ताकेषु शाश्वतोऽशाश्वत इति वा नाभिधा नाभिधानं प्रवर्तत इत्यर्थः । यत्र येषु वर्ण्यन्ते यैरर्थास्ते वर्णाः शब्दा न प्रवर्तन्तेऽभिधातुं प्रकाशयितुं न प्रवर्तन्त इत्यर्थः । इदमेवमिति विवेको विविक्तता तत्र नित्योऽनित्य इति नोच्यते । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।४।१) इति श्रुतेः॥६०॥ | वास्तवमें तो नित्य एकरस विज्ञानमात्र सत्तास्वरूप अजन्मा आत्माओंमें नित्य-अनित्य-ऐसे अभिधान अर्थात् नामकी भी प्रवृत्ति नहीं है। जहाँ—जिन महात्माओंमें—जिनसे पदार्थोंका वर्णन किया जाता है वे वर्ण यानी शब्द भी नहीं हैं अर्थात् उसका वर्णन करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होते हैं, उसमें 'यह ऐसा है अर्थात् नित्य है अथवा अनित्य है' इस प्रकारका विवेक भी नहीं कहा जाता; जैसा कि "जहाँ-से वाणी लौट आती है" इस श्रुति-से सिद्ध होता है ॥६०॥ |
यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ॥ ६१ ॥
जिस प्रकार स्वप्नमें चित्त मायासे द्वैताभासरूपसे स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत्कालीन द्वैताभासरूपसे भी चित्त मायासे ही स्फुरित होता है ॥ ६१ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २३७
अद्वयं च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ६२ ॥
इसमें सन्देह नहीं, स्वप्नावस्थामें अद्वय चित्त ही द्वैतरूपसे भासनेवाला है; इसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी अद्वय मन ही द्वैतरूपसे भासनेवाला है—इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६२ ॥
| यत्पुनर्वाग्गोचरत्वं परमार्थतोऽद्वयस्य विज्ञानमात्रस्य तन्मनसः स्पन्दनमात्रं न परमार्थत इति। उक्तार्थौ श्लोकौ ॥६१-६२॥ | परमार्थतः अद्वय विज्ञानमात्रका जो वाणीका विषय होना है वह मनका स्फुरणमात्र ही है, वह परमार्थतः है नहीं—इस प्रकार इन श्लोकोंकी व्याख्या पहले (अद्वैत० २९-३० में) की जा चुकी है ॥६१-६२॥ |
द्वैताभावमें स्वप्नका दृष्टान्त
| इतश्च वाग्गोचरस्याभावो द्वैतस्य— | वाणीके विषयभूत द्वैतका इसलिये भी अभाव है— |
स्वप्नदृक्प्रचरन्स्वप्ने दिक्षु वै दशसु स्थितान् ।
अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥ ६३ ॥
स्वप्नद्रष्टा स्वप्नमें घूमते-घूमते दशों दिशाओंमें स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवोंको सर्वदा देखा करता है [ वे वस्तुतः उससे पृथक् नहीं होते ] ॥ ६३ ॥
| खमान्पश्यतीति खमदृक्प्रचरन्पर्यटन्स्वप्ने खमस्थाने दिक्षु वै दशसु स्थितान्वर्तमानाञ्जीवान्प्राणिनोऽण्डजान्स्वेदजान्वा यान्सदा पश्यति ॥६३॥ | जो खमोंको देखता है उसे खमद्रष्टा कहते हैं, वह खम अर्थात् खमस्थानोंमें घूमता हुआ दशों दिशाओंमें स्थित जिन स्वेदज अथवा अण्डज प्राणियोंको सर्वदा देखता है [ वे वस्तुतः उससे भिन्न नहीं होते ] ॥ ६३ ॥ |
| २३८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| यद्येवं ततः किम् ? उच्यते— | यदि ऐसा है तो इससे सिद्ध क्या हुआ ? सो बतलाते हैं— |
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स्वप्नदृक्चित्तदृश्यास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् ।
तथा तद्द्दश्यमेवेदं स्वप्नदृक्चित्तमिष्यते ॥ ६४ ॥
वे सब स्वप्नद्रष्टाके चित्तके दृश्य उससे पृथक् नहीं होते । इसी प्रकार उस स्वप्नद्रष्टाका यह चित्त भी उसीका दृश्य माना जाता है॥६४॥
| स्वप्नदृशश्चित्तं स्वप्नदृक्चित्तम्। तेन दृश्यास्ते जीवास्तत्तस्मात्स्वप्नदृक्चित्तात्पृथङ्न विद्यन्ते न सन्तीत्यर्थः। चित्तमेव ह्यनेकजीवादिभेदाकारेण विकल्प्यते । तथा तदपि स्वप्नदृक्चित्तमिदं तद्द्दश्यमेव, तेन स्वप्नदृशा दृश्यं तद्द्दश्यम् । अतः स्वप्नदृग्व्यतिरेकेण चित्तं नाम नास्तीत्यर्थः॥६४॥ | स्वप्नद्रष्टाका चित्त 'स्वप्नदृक्चित्त' कहलाता है, उससे देखे जानेवाले वे जीव उस स्वप्नद्रष्टाके चित्तसे पृथक् नहीं हैं—यह इसका तात्पर्य है । अनेक जीवादिभेदरूपसे चित्त ही कल्पना किया जाता है । इसी प्रकार उस स्वप्नद्रष्टाका यह चित्त भी उसका दृश्य ही है । उस स्वप्नद्रष्टासे देखा जाता है, इसलिये उसका दृश्य है। अतः तात्पर्य यह है कि स्वप्नद्रष्टासे भिन्न चित्त भी कुछ है नहीं ॥६४॥ |
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चरञ्जागरिते जाग्रद्दिक्षु वै दशसु स्थितान् ।
अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥ ६५ ॥
जाग्रच्चित्तेक्षणीयास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् ।
तथा तद्द्दश्यमेवेदं जाग्रतश्चित्तमिष्यते ॥ ६६ ॥
शां० भा० ] अशातशान्तिप्रकरण^[अलातशान्तिप्रकरण] २३९
जाग्रत्-अवस्थामें घूमते-घूमते जाग्रत्-अवस्थाका साक्षी दशों दिशाओंमें स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवोंको सर्वदा देखता है ॥ ६५ ॥ वे जाग्रच्चित्तके दृश्य उससे पृथक् नहीं हैं। इसी प्रकार वह जाग्रच्चित्त भी उसीका दृश्य माना जाता है ॥ ६६ ॥
| जाग्रतो दृश्या जीवास्तच्चित्ताव्यतिरिक्ताश्चित्तेक्षणीयत्वात्स्वप्नदृक्चित्तेक्षणीयजीववत् । तच्च जीवेक्षणात्मकं चित्तं द्रष्टुरव्यतिरिक्तं द्रष्टृदृश्यत्वात्स्वप्नचित्तवत्। उक्तार्थमन्यत् ॥ ६५-६६ ॥ | जाग्रत् पुरुषको दिखलायी देनेवाले जीव उसके चित्तसे अपृथक् हैं, क्योंकि स्वप्नद्रष्टाके चित्तसे देखे जानेवाले जीवोंके समान वे उसके चित्तसे ही देखे जाते हैं। तथा जीवोंको देखनेवाला वह चित्त भी द्रष्टासे अभिन्न है, क्योंकि स्वप्नचित्तके समान वह भी जाग्रद्दृष्टाका दृश्य है। शेष अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ ६५-६६ ॥ |
उभे ह्यन्योन्यदृश्ये ते किं तदस्तीति नोच्यते ।
लक्षणाशून्यमुभयं तन्मतेनैव गृह्यते ॥ ६७ ॥
वे [ जीव और चित्त ] दोनों एक दूसरेके दृश्य हैं; वे हैं क्या वस्तु—सो कहा नहीं जा सकता। वे दोनों ही प्रमाणशून्य हैं और केवल तच्चित्तताके कारण ही ग्रहण किये जाते हैं ॥ ६७ ॥
| जीवचित्ते उभे चित्तचैत्ये ते अन्योन्यदृश्ये इतरेतरगम्ये । जीवादिविषयापेक्षं हि चित्तं नाम भवति । चित्तापेक्षं हि जीवादि दृश्यम् । अतस्ते अन्योन्यदृश्ये । | जीव और चित्त अर्थात् चित्त और चित्तके विषय—ये दोनों ही अन्योन्यदृश्य अर्थात् एक-दूसरेके विषय हैं। जीवादि विषयकी अपेक्षासे चित्त है और चित्तकी अपेक्षासे जीवादि दृश्य । अतः वे एक-दूसरेके |
| २४० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तस्मान्न किंचिदस्तीति चोच्यते चित्तं वा चित्तेक्षणीयं वा किं तदस्तीति विवेकिनोच्यते । न हि स्वप्ने हस्ती हस्तिचित्तं वा विद्यते तथेहापि विवेकिनामित्यभिप्रायः । | दृश्य हैं । इसलिये ऐसा प्रश्न होनेपर कि वे हैं क्या ? विवेकी लोग यही कहते हैं कि चित्त अथवा चित्तका दृश्य-इनमेंसे कोई भी वस्तु है नहीं । इससे उन विवेकी पुरुषोंका यही अभिप्राय है कि जिस प्रकार स्वप्नमें हाथी और हाथीको ग्रहणकरनेवाला चित्त नहीं होता उसी प्रकार यहाँ (जाग्रत्-अवस्थामें) भी उनका अभाव है । |
| कथम् ? लक्षणाशून्यं लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणा प्रमाणं प्रमाणशून्यमुभयं चित्तं चैत्यं द्वयं यतस्तन्मतेनैव तच्चित्ततयैव तद्गृह्यते । न हि घटमतिं प्रत्याख्याय घटो गृह्यते नापि घटं प्रत्याख्याय घटमतिः । न हि तत्र प्रमाणप्रमेयभेदः शक्यते कल्पयितुमित्यभिप्रायः ॥६७॥ | किस प्रकार नहीं हैं ? क्योंकि वे चित्त और चैत्य दोनों ही लक्षणाशून्य-प्रमाणरहित हैं । जिससे कोई पदार्थ लक्षित होता है उसे 'लक्षणा' यानी 'प्रमाण' कहते हैं । और वे तन्मत-तच्चित्ततासे ही ग्रहण किये जाते हैं, क्योंकि न तो घटबुद्धिको त्यागकर घटका ही ग्रहण किया जाता है और न घटको त्यागकर घटबुद्धिका ही । तात्पर्य यह कि उनमें प्रमाण और प्रमेयके भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती ॥६७॥ |
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ६८ ॥
जिस प्रकार स्वप्नका जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥ ६८ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४१
यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ६९ ॥
जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥ ६९ ॥
यथा निर्मितको जीवो जायते म्रियतेऽपि वा ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ७० ॥
जिस प्रकार मन्त्रादिसे रचा हुआ जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥७०॥
| मायामयो मायाविना यः कृतो निर्मितको मन्त्रौषध्यादि-भिर्निष्पादितः । खममायानि-र्मितका अण्डजादयो जीवा यथा जायन्ते म्रियन्ते च तथा मनु-ष्यादिलक्षणा अविद्यमाना एव चित्तविकल्पनामात्रा इत्यर्थः ॥ ६८—७० ॥ | मायामय—जिसे मायावीने रचा हो, निर्मितक—मन्त्र और ओषधि आदिसे सम्पादन किया हुआ । खप्न, माया और मन्त्रादिसे निष्पन्न हुए अण्डज आदि जीव जिस प्रकार उत्पन्न होते और मरते भी हैं उसी प्रकार मनुष्यादिरूप जीव वर्तमान होते हुए भी चित्तके विकल्पमात्र ही हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ ६८-७० ॥ |
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अजाति ही उत्तम सत्य है
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥ ७१ ॥
३१—३२
| १४२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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[ वस्तुतः ] कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्मकी सम्भावना ही नहीं है। उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें किसी वस्तुकी उत्पत्ति ही नहीं होती ॥ ७१ ॥
| व्यवहारसत्यविषये जीवानां जन्ममरणादिः स्वप्नादिजीववदित्युक्तम् । उत्तमं तु परमार्थसत्यं न कश्चिज्जायते जीव इति । उक्तार्थमन्यत् ॥७१॥ | व्यावहारिक सत्तामें भी जीवोंके जो जन्म-मरणादि हैं वे स्वप्नादिके जीवोंके ही समान हैं—ऐसा पहले कहा जा चुका है; किन्तु उत्तम सत्य तो यही है कि कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता । शेष अंशकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥७१॥ |
चित्तकी असंगता
चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्द्वयम् ।
चित्तं निर्विषयं नित्यमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥ ७२ ॥
विषय और इन्द्रियोंके सहित यह सम्पूर्ण द्वैत चित्तका ही स्फुरण है; किन्तु चित्त निर्विषय है; इसीसे उसे नित्य असंग कहा गया है ॥७२॥
| सर्वं ग्राह्यग्राहकवच्चित्तस्पन्दितमेव द्वयं चित्तं परमार्थत आत्मैवेति निर्विषयं तेन निर्विषयत्वेन नित्यमसङ्गं कीर्तितम् । "असङ्गो ह्ययं पुरुषः" ( बृ० उ० ४ । ३ । १५, १६) इति श्रुतेः। सविषयस्य हि विषये सङ्गः। निर्विषयत्वाच्चित्तमसङ्गमित्यर्थः ॥ ७२ ॥ | विषय और इन्द्रियोंसे युक्त सम्पूर्ण द्वैत चित्तका ही स्फुरण है । किन्तु चित्त परमार्थतः आत्मा ही है, इसलिये वह निर्विषय है । उस निर्विषयताके कारण उसे सर्वदा असंग कहा गया है; जैसा कि "यह पुरुष असंग ही है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। जो सविषय होता है उसीका अपने विषयसे संग हो सकता है । अतः तात्पर्य यह है कि निर्विषय होनेके कारण चित्त असंग है ॥७२॥ |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण [ २४३
| ननु निर्विषयत्वेन चेदसङ्गत्वं चित्तस्य न निःसङ्गता भवति यस्माच्छास्ता शास्त्रं शिष्यश्चेत्येवमादेर्विषयस्य विद्यमानत्वात् ।<br><br>नैष दोषः; कस्मात्— | शंका— यदि निर्विषयताके कारण ही असंगता होती है तो चित्तकी असंगता तो नहीं हो सकती, क्योंकि शास्ता (गुरु), शास्त्र और शिष्य इत्यादि उसके विषय विद्यमान हैं।<br><br>समाधान— यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि— |
व्यावहारिक वस्तु परमार्थतः नहीं होती
योऽस्ति कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नास्त्यसौ ।
परतन्त्राभिसंवृत्या स्यान्नास्ति परमार्थतः ॥ ७३ ॥
जो पदार्थ कल्पित व्यवहारके कारण होता है वह परमार्थतः नहीं होता; और यदि अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रोंकी परिभाषाके अनुसार हो भी तो भी वह परमार्थतः नहीं हो सकता ॥७३॥
| यः पदार्थः शास्त्रादिर्विद्यते स कल्पितसंवृत्या; कल्पिता च सा परमार्थप्रतिपत्त्युपायत्वेन संवृतिश्च सा, तया योऽस्ति परमार्थेन नास्त्यसौ न विद्यते । ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम् ।<br><br>यश्च परतन्त्राभिसंवृत्या परशास्त्रव्यवहारेण स्यात्पदार्थः स | जो भी शास्त्रादि पदार्थ हैं वे कल्पित व्यवहारसे ही हैं; अर्थात् जिस व्यवहारकी परमार्थतत्त्वकी उपलब्धिके उपायरूपसे कल्पना की गयी है उसके कारण जिस पदार्थकी सत्ता है वह परमार्थसे नहीं है। “ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता” (आगम० श्लो० १८) ऐसा हम पहले कह ही चुके हैं।<br><br>इसके सिवा जो पदार्थ परतन्त्राभिसंवृतिसे—अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रव्यवहारसे सिद्ध है वह |
| २४४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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परमार्थतो निरूप्यमाणो नास्त्येव। तेन युक्तमुक्तमसङ्गं तेन कीर्तितमिति ॥ ७३ ॥ | परमार्थतः निरूपण किये जानेपर नहीं है। अतः 'इसीसे उसे असङ्ग कहा गया है'—यह कथन ठीक ही है ॥ ७३ ॥
आत्मा अज है—यह कल्पना भी व्यावहारिक है
ननु शास्त्रादीनां संवृतित्वेऽज इतीयमपि कल्पना संवृतिः स्यात् ? | शंका—शास्त्रादिको व्यावहारिक माननेपर तो 'अज है' ऐसी कल्पना भी व्यावहारिक ही सिद्ध होगी ? सत्यमेवम् । | समाधान—हाँ, बात तो ऐसी ही है!
अजः कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नाप्यजः ।
परतन्त्राभिनिष्पत्त्या संवृत्या जायते तु सः ॥ ७४ ॥
आत्मा 'अज' भी कल्पित व्यवहारके कारण ही कहा जाता है, परमार्थतः तो 'अज' भी नहीं है। अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रोंसे सिद्ध जो संवृति (भ्रमजनित व्यवहार) है उसके अनुसार उसका जन्म होता है । [ अतः उसका निषेध करनेके लिये ही उसे 'अज' कहा गया है ] ॥ ७४ ॥
शास्त्रादिकल्पितसंवृत्यैवाज इत्युच्यते । परमार्थेन नाप्यजः। यस्मात्परतन्त्राभिनिष्पत्त्या परशास्त्रसिद्धिमपेक्ष्य योऽज इत्युक्तः स संवृत्या जायते । अतोऽज इतीयमपि कल्पना परमार्थविषये नैव क्रमत इत्यर्थः ॥ ७४ ॥ | शास्त्रादिकल्पित व्यवहारके कारण ही उसे 'अज' ऐसा कहा जाता है। परमार्थतः तो वह अज भी नहीं है। क्योंकि यहाँ जिसे अन्य शास्त्रोंकी सिद्धिकी अपेक्षासे 'अज' ऐसा कहा है, वह संवृतिसे ही जन्म भी लेता है। अतः 'वह अज है' ऐसी कल्पनाका भी परमार्थराज्यमें प्रवेश नहीं हो सकता ॥७४॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४५
द्वैताभावसे जन्माभाव
यस्मादसद्विषयस्तस्मात्— । क्योंकि विषय असत् है, इसलिये—
अभूताभिनिवेशोऽस्ति द्वयं तत्र न विद्यते ।
द्वयाभावं स बुद्ध्वैव निर्निमित्तो न जायते ॥ ७५ ॥
लोगोंका असत्य [द्वैत] के विषयमें केवल आग्रह है । वहाँ [परमार्थतत्त्वमें] द्वैत है ही नहीं । जीव द्वैताभावका बोध प्राप्त करके ही, फिर कोई कारण न रहनेसे जन्म नहीं लेता ॥ ७५ ॥
| [मिथ्याभिनिवेश-निवृत्त्या जन्माभावः] असत्यभूते द्वैतेऽभिनिवेशोऽस्ति केवलम्। अभिनिवेश आग्रहमात्रम् । द्वयं तत्र न विद्यते । मिथ्याभिनिवेशमात्रं च जन्मनः कारणं यस्मात्तस्माद्द्वयाभावं बुद्ध्वा निर्निमित्तो निवृत्तमिथ्याद्वयाभिनिवेशो यः स न जायते ॥ ७५ ॥ | असत्यभूत द्वैतमें लोगोंका केवल अभिनिवेश है । आग्रहमात्रका नाम अभिनिवेश है । वहाँ [परमार्थवस्तुमें] द्वैत है ही नहीं । क्योंकि मिथ्या अभिनिवेशमात्र ही जीवके जन्मका कारण है। अतः द्वैताभावको जानकर जो निर्निमित्त हो गया है अर्थात् जिसका मिथ्या द्वैतविषयक आग्रह निवृत्त हो गया है उस [अधिकारी जीव] का फिर जन्म नहीं होता ॥ ७५ ॥ |
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यदा न लभते हेतूनुत्तमाधममध्यमान् ।
तदा न जायते चित्तं हेत्वभावे फलं कुतः ॥ ७६ ॥
जिस समय चित्त उत्तम, मध्यम और अधम हेतुओंको प्राप्त नहीं करता उस समय उसका जन्म भी नहीं होता; क्योंकि हेतुका अभाव होनेपर फिर फल कहाँ हो सकता है ? ॥ ७६ ॥