संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि-संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १९९
कौन हूँ—इसे भी जानना चाहिये। इस 'मैं' को ही जान लेनेपर तुम्हें सबका ज्ञान हो जायगा। अनात्मामें आत्मबुद्धिका होना और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना—यही अज्ञान है। भूपाल! वह मैं सर्वत्र व्यापक आत्मा हूँ, तथापि तुम्हारे पूछनेपर लोकव्यवहारकी दृष्टिसे मैंने ये सब बातें बता दी हैं। अब मैं जाता हूँ।
सुमति कहते हैं— काशीनरेशसे यों कहकर परम बुद्धिमान् सुबाहु चले गये। काशिराजने भी अलर्कका सत्कार करके अपने नगरकी राह ली। अलर्कने अपने ज्येष्ठ पुत्रको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके वे आत्मसिद्धिके लिये वनमें चले गये। वहाँ बहुत समयतक वे निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर रहे और अनुपम योगसम्पत्तिको पाकर परम निर्वाणपदको प्राप्त हुए।
पिताजी! आप भी अपनी मुक्तिके लिये इस उत्तम योगका साधन कीजिये। इससे आप उस ब्रह्मको प्राप्त होंगे, जहाँ जानेपर आपको शोक नहीं होगा। अब मैं भी जाऊँगा। यज्ञ और जपसे मुझे क्या लेना है। कृतकृत्य पुरुषका प्रत्येक कार्य ब्रह्मभावकी प्राप्तिके लिये ही होता है, अतः आपकी आज्ञा लेकर मैं जाता हूँ। अब निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर मुक्तिके लिये ऐसा यत्न करूँगा, जिससे मुझे परम सन्तोषकी प्राप्ति हो।
पक्षी कहते हैं— जैमिनिजी! अपने पितासे यों कहकर और उनकी आज्ञा ले परम बुद्धिमान् सुमति सब प्रकारके संग्रहको छोड़कर चले गये। उनके महाबुद्धिमान् पिता भी उसी प्रकार क्रमशः वानप्रस्थ आश्रममें जाकर चौथे आश्रममें प्रविष्ट हुए। वहाँ पुत्रसे पुनः उनकी भेंट हुई और उन्होंने गुण आदि बन्धनोंका त्याग करके तत्काल प्राप्त हुई उत्तम बुद्धिसे युक्त हो परम सिद्धि प्राप्त की।
ब्रह्मन्! आपने हमलोगोंसे जो प्रश्न किया था, उसका विस्तारपूर्वक हमने यथावत् वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?
मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन
जैमिनि बोले— श्रेष्ठ पक्षिगण! आपने प्रवृत्ति और निवृत्ति—दो प्रकारके वैदिक कर्म बतलाते हुए मुझे बहुत सुन्दर उपदेश दिया है। अहो! पिताकी कृपासे आपलोगोंका ज्ञान ऐसा है, जिससे तिर्यग्योनिको प्राप्त होकर भी आपने मोहका त्याग कर दिया। आपलोग धन्य हैं; क्योंकि उत्तम सिद्धिकी प्राप्तिके लिये आपलोगोंका मन आज भी पूर्वावस्थामें ही स्थित है। विषयजनित मोह उसे विचलित नहीं कर पाते। मेरा बड़ा भाग्य है कि महर्षि मार्कण्डेयजीने मुझे आपलोगोंका परिचय दिया। आप सब प्रकारके संदेहोंका निराकरण करनेमें सबसे श्रेष्ठ हैं। इस अत्यन्त सङ्कटपूर्ण संसारमें भटकते हुए मनुष्योंको बिना तपस्या किये आप-जैसे सन्तोंका सङ्ग प्राप्त होना दुर्लभ है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि प्रवृत्ति, निवृत्ति एवं ज्ञानके विषयमें आपलोगोंकी बुद्धि जैसी निर्मल है, वैसी दूसरे किसीकी नहीं है। यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो मेरे लिये आगे बतायी जानेवाली बातोंका पूर्णरूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।
यह स्थावर-जङ्गम जगत् कैसे उत्पन्न हुआ? कल्पान्तमें पुनः किस प्रकार यह लयको प्राप्त होगा? देवता, ऋषि, पितर और भूत आदिके वंश कैसे हुए? मन्वन्तर किस प्रकार होते हैं? उनके वंशमें उत्पन्न महापुरुषोंके जीवन चरित्र कैसे हैं? जितनी सृष्टि, जितने प्रलय, जैसे जैसे कल्पोंके विभाग, जो जो मन्वन्तरकी स्थिति, जैसी पृथ्वीकी स्थिति, जितना बड़ा पृथ्वीका विस्तार तथा समुद्र,
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पर्वत, नदी, वन, भूलोक आदि, खलोकसमुदाय और पातालकी जिस प्रकारकी स्थिति है, वह सब मुझे बताइये। सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र और तारोंकी गति तथा प्रलयकालतककी सारी बातें मैं सुनना चाहता हूँ। जब इस जगत्का संहार हो जायगा, तब उसके बाद क्या शेष रहेगा? इस प्रश्नपर भी प्रकाश डालिये।
पक्षियोंने कहा—मुनिश्रेष्ठ! आपने हमलोगोंपर प्रश्नोंका ऐसा भार रख दिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। अब हम आपके पूछे हुए विषयोंका वर्णन करते हैं, सुनिये। पूर्वकालमें मार्कण्डेयजीने ब्राह्मणकुमार क्रौष्टुकिसे, जो परम बुद्धिमान्, व्रतस्नात तथा शान्त स्वभाववाले थे, जो कुछ कहा था, वही हम आपसे कहते हैं। एक समय महात्मा मार्कण्डेय मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे घिरे बैठे थे। वहीं क्रौष्टुकिने यही बात पूछी थी, जिसे आपने हमसे पूछा है। भृगुनन्दन मार्कण्डेयजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ क्रौष्टुकि के प्रश्नोंका उत्तर दिया। उसीका हम आपसे वर्णन करते हैं। आप ध्यान देकर सुनें। जो सृष्टिके समय ब्रह्मा, पालन-कालमें विष्णु तथा संहारके समय जगत्का अन्त करनेवाले अनन्त भयङ्कर रुद्र हैं, उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पद्मयोनि पितामह ब्रह्माजीको मैं प्रणाम करता हूँ।
मार्कण्डेयजीने कहा—पूर्वकालमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके प्रकट होते ही उनके मुखोंसे क्रमशः पुराण और वेद प्रकट हुए, फिर महर्षियोंने पुराणकी बहुत-सी संहिताएँ रचीं और वेदोंके भी सैकड़ों विभाग किये। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—ये चारों महात्मा ब्रह्माजीके उपदेश बिना नहीं सिद्ध हो सकते थे। ब्रह्माजीके मानस पुत्र सप्तर्षियोंने उनसे वेदोंको ग्रहण किया और ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए भृगु आदि ऋषियोंने पुराणको अपनाया। भृगुसे च्यवनने और च्यवनसे ब्रह्मर्षियोंने उसे प्राप्त किया। फिर उन्होंने दक्षको उपदेश दिया और दक्षने मुझे इस पुराणको सुनाया था। वही आज मैं तुमसे कहता हूँ। यह पुराण कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
जो सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिका स्थान, अजन्मा, अविनाशी, आश्रयस्वरूप, चराचर जगत्को धारण करनेवाले तथा परमपदस्वरूप हैं, जिन्हें आदिपुरुष ब्रह्मा कहा जाता है, जो उत्पत्ति, पालन और संहारके कारण हैं, किसीके औरस पुत्र न होकर स्वयम्भू हैं, जिनमें सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, जो हिरण्यगर्भ, लोकसृष्टिमें लगे रहनेवाले और परम बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् ब्रह्माजीको नमस्कार करके मैं परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन आरम्भ करता हूँ! यह भूतसमुदाय^१ पाँचोंकी संख्यामें जाननेके योग्य तथा त्रिविध^२ स्रोतोंसे युक्त है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त उसकी स्थिति है। उसमें किसका कैसा लक्षण है और किसके रूपमें कितनी विभिन्नता है, इन सब बातोंका ज्ञान कराते हुए भूतसमुदायका वर्णन करता हूँ। इस भौतिक जगत्का जो कारण है, उसे 'प्रधान' कहते हैं। उसीको महर्षियोंने अव्यक्त कहा है और वही सूक्ष्म, नित्य एवं सदसत्स्वरूप प्रकृति है। सृष्टिके आदिकालमें केवल ब्रह्म था, जो नित्य, अविनाशी, अजर और अप्रमेय है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है। वह गन्ध, रूप, रस, शब्द और स्पर्शसे रहित है। उसका आदि और अन्त नहीं है। वह सम्पूर्ण जगत्की योनि, तीनों गुणोंका कारण एवं अविनाशी है। उसे आधुनिक नहीं, पुरातन एवं सनातन कहा गया है। वह ज्ञान-विज्ञानका विषय नहीं है। प्रलयके पश्चात् उस ब्रह्मसे ही यह सब कुछ व्याप्त था।
१. पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं।
२. पशु-पक्षी आदिकी सृष्टिको 'तिर्यक्स्रोत', मानवसर्गको 'अर्वाक्स्रोत' और देवसर्गको 'ऊर्ध्वस्रोत' कहते हैं।
- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १२१
मुने! फिर सृष्टिकाल आनेपर गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृति जब ब्रह्मके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुई, तब उससे महत्तत्त्वका आविर्भाव हुआ। उत्पन्न हुए उस महत्तत्त्वको प्रधान (प्रकृति) ने आवृत्त कर रखा है। जैसे बीज त्वचासे घिरा हुआ होता है, उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आच्छादित है। वह सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। तत्पश्चात् उस महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) तथा भूतादिरूप तामस—इन तीन भेदोंवाला अहङ्कार उत्पन्न हुआ। जैसे अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आवृत्त है, उसी प्रकार अहङ्कार भी महत्तत्त्वसे आवृत्त है। भूतादि नामक तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस शब्द-तन्मात्रासे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ; फिर भूतादि तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्रारूप आकाशको आच्छादित किया। इससे स्पर्श-तन्मात्राकी सृष्टि हुई, जिससे बलवान् वायुका प्राकट्य हुआ। वायुका गुण स्पर्श माना गया है। शब्द-तन्मात्रारूप आकाशने जब स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया, तब वायुने भी विकृत होकर रूप-तन्मात्राकी रचना की। इस प्रकार वायुसे अग्नितत्त्व प्रकट हुआ, जिसका गुण रूप बतलाया जाता है। तदनन्तर स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुने रूप-तन्मात्रावाले तेजको आवृत्त किया, जिससे विकृत होकर उस तेजने रस-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस रस-तन्मात्रासे जल प्रकट हुआ, जो रस नामक गुणसे युक्त है। फिर रूप-तन्मात्रावाले अग्नितत्त्वने रस-तन्मात्रायुक्त जलको आवृत्त किया। इससे जलमें भी विकार आया और उसमें गन्ध-तन्मात्राकी सृष्टि हुई। उसीसे यह स्थूलरूपा पृथ्वी उत्पन्न हुई, जिसका गुण गन्ध है। उन-उन भूतोंमें कारणरूपसे तन्मात्राएँ हैं, इसलिये वे भूततन्मात्रारूप माने गये हैं। तन्मात्राएँ किसी विशेष भावका बोध नहीं करातीं। इसलिये वे अविशेष हैं। इस प्रकार तामस अहङ्कारसे यह भूततन्मात्रारूप सर्ग प्रकट हुआ।
वैकारिक अहङ्कारमें सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे वह सात्त्विक भी कहलाता है। उससे एक ही साथ वैकारिक सर्गकी उत्पत्ति होती है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ तैजस (राजस) अहङ्कारसे उत्पन्न बतलायी जाती हैं और उनके अधिष्ठाता दस देवता वैकारिक (सात्त्विक) अहङ्कारसे प्रकट हुए हैं। ग्यारहवें मनको भी वैकारिक सर्गमें ही जानना चाहिये। इस प्रकार मन तथा इन्द्रियाधिष्ठाता देवता वैकारिक माने गये हैं। श्रवण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं, इसलिये इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। दोनों पैर, गुदा, उपस्थ, दोनों हाथ और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। क्रमशः चलना, मलत्याग, रतिके आनन्दका अनुभव, शिल्परचना और बोलना—ये पाँच इनके कर्म हैं। शब्द-तन्मात्रायुक्त आकाश स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुमें प्रविष्ट है, इसलिये वायु दो गुणोंसे युक्त होता है। उसका अपना गुण स्पर्श है। उसके साथ आकाशका शब्द भी रहता है। इसी प्रकार शब्द और स्पर्श—ये दो गुण रूपमें प्रवेश करते हैं; इसलिये अग्नि शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीन गुणोंसे युक्त होता है। फिर शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीनोंका रसमें प्रवेश होता है। इसलिये रसात्मक जलको चार गुणोंसे युक्त समझना चाहिये। इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चारों गन्धमें प्रवेश करते हैं और उससे मिलकर सब ओरसे पृथ्वीको आवृत्त कर लेते हैं। इसलिये पृथ्वी पाँच गुणोंसे युक्त है और सब भूतोंमें स्थूल दिखायी देती है। ये पाँचों भूत शान्त, घोर और मूढ़ हैं। अर्थात् सुख, दुःख एवं मोहसे युक्त हैं। इसलिये ये विशेष कहलाते हैं।* परस्पर
* परस्पर मिलनेसे सभी भूत शान्त, घोर और मूढ़ प्रतीत होते हैं; किन्तु पृथक्-पृथक् विचार करनेपर पृथ्वी और जल शान्त हैं, तेज और वायु घोर हैं तथा आकाश मूढ़ है।
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प्रवेश करनेपर वे एक-दूसरेको धारण करते हैं।
ये महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी भूत एक दूसरेसे मिलकर और परस्पर आश्रित हो एक संघातको ही अपना लक्ष्य बना जब पूर्णरूपसे एक हो जाते हैं, तब पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण प्रधान तत्त्वके सम्बन्धसे अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह महान् अण्ड जलके बुलबुलेके समान क्रमशः बढ़ता है और जलपर स्थित रहता है। उस प्राकृत अण्डमें ब्रह्मा नामसे प्रसिद्ध क्षेत्रज्ञ पुरुष भी वृद्धिको प्राप्त होता है। वे ब्रह्मा ही सबसे प्रथम शरीरधारी होनेके कारण पुरुष कहलाते हैं। भूतोंके आदिकर्ता ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए; उन्होंने चर-अचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। अण्डके गर्भमें स्थित उन महात्मा ब्रह्माजीके लिये मेरु पर्वत ही गर्भको ढकनेवाली झिल्ली हुआ। अन्य पर्वत जरायु (जेर) हुए तथा समुद्र ही उस गर्भाशयका जल था। उस अण्डमें ही देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ तथा पर्वत, द्वीप, समुद्र और नक्षत्र मण्डलके साथ त्रिभुवनका आविर्भाव हुआ। वह अण्ड क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा तामस अहङ्कारके द्वारा बाहरसे आवृत्त है। ये आवरण एककी अपेक्षा दूसरे दसगुने बड़े हैं। तामस-अहंकार उससे दसगुने बड़े महत्तत्त्वके द्वारा आवृत है और महत्तत्त्व भी उन सबके साथ अव्यक्त प्रकृतिके द्वारा घिरा हुआ है। इस प्रकार इन सात प्राकृत आवरणोंसे यह अण्ड आवृत्त है। इस तरह ये आठ प्रकृतियाँ एक-दूसरेको आवृत्त करके स्थित हैं। वह प्रकृति नित्य है और उसके भीतर वे ही पुरुष हैं, जो तुम्हें ब्रह्माके नामसे बताये गये हैं। अब संक्षेपसे पुनः इस विषयका वर्णन सुनो—जैसे कोई पुरुष जलमें डूबकर फिर निकलते समय जलको फेंकता है, उसी प्रकार भगवान् ब्रह्माजी भी प्रकृतिको हटाते हुए उससे प्रकट होते हैं। अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र बताया गया है और ब्रह्माजी क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञरूप ही है—ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार यह प्राकृत सर्गका वर्णन हुआ। इसके भीतर अधिष्ठातारूपसे क्षेत्रज्ञ विराजमान रहता है। प्राकृत सर्ग ही प्रथम सृष्टि है।
एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन
क्रौष्टुकिने कहा— भगवन्! आपने ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन किया तथा महात्मा ब्रह्माजीके प्रादुर्भावकी बात भी बतलायी। भृगुकुलनन्दन! अब मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि प्रलयके अन्तमें, जब कि सबका उपसंहार हो जाता है और प्राणियोंकी सृष्टि नहीं हुई होती, क्या शेष रहता है? अथवा कुछ रहता ही नहीं?
मार्कण्डेयजी बोले— मुने! जब यह सम्पूर्ण जगत् प्रकृतिमें लीन होता है, उस समयकी स्थितिको विद्वान् पुरुष प्राकृत प्रलय कहते हैं। जब अव्यक्त प्रकृति अपने स्वरूप (गुणोंकी साम्यावस्था)-में स्थित होती है तथा महत्तत्त्वादि सम्पूर्ण विकारोंका उपसंहार हो जाता है, उस समय प्रकृति और पुरुष समानधर्मा (निष्क्रिय, निर्विकार) होकर रहते हैं। उस समय सत्त्व और तम समानरूपमें और परस्पर ओत-प्रोत रहते हैं तथा जैसे तिलमें तेल और दूधमें घी रहता है, उसी प्रकार तमोगुण और सत्त्वगुणमें रजोगुण घुला-मिला होता है। जब परमेश्वरकी योगदृष्टिसे प्रकृतिमें क्षोभ होता है, तब महान् अण्डके
- एक ही परमात्माके विभिन्न रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन * १२३
भीतरसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं—यह बात तुम्हें बतलायी जा चुकी है। यद्यपि ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थान और निर्गुण हैं, तथापि रजोगुणका उपभोग करते हुए सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं और ब्रह्माके कर्तव्यका पालन करते हैं। फिर परमेश्वर सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त हो श्रीविष्णुका स्वरूप धारणकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हैं। फिर तमोगुणकी अधिकतासे युक्त हो रुद्ररूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्का संहार करते और निश्चिन्त सोते हैं। इस प्रकार सृष्टि, पालन और संहार—इन तीनों कालोंमें तीन गुणोंसे युक्त होकर भी वे परमेश्वर वास्तवमें निर्गुण ही हैं। जैसे खेतिहर पहले बीजको बोता, फिर पौधेकी रक्षा करता और अन्तमें खेती पक जानेपर उसे काटता है तथा इन कार्योंके अनुसार बोनेवाला, रक्षा करनेवाला और काटनेवाला—ये तीन नाम धारण करता है, उसी प्रकार एक ही परमेश्वर भिन्न-भिन्न कार्योंके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र नाम धारण करते हैं। ब्रह्मा होकर संसारकी सृष्टि करते और रुद्र होकर उसका संहार करते हैं तथा विष्णुरूपमें इन दोनों कार्योंसे उदासीन रहकर सबका पालन करते हैं। इस तरह स्वयम्भू परमात्माकी तीन अवस्थाएँ होती हैं। रजोगुणप्रधान ब्रह्मा, तमोगुणप्रधान रुद्र और सत्त्वप्रधान विश्वपालक विष्णु हैं। ये ही तीन देवता हैं और ये ही तीन गुण हैं। ये परस्पर एक-दूसरेके आश्रित और एक-दूसरेसे मिले रहते हैं। इनमें एक क्षणका भी वियोग नहीं होता। ये एक-दूसरेका कभी त्याग नहीं करते।
इस प्रकार जगत्के आदिकारण देवाधिदेव चतुर्मुख ब्रह्माजी रजोगुणका आश्रय लेकर सृष्टिके कार्यमें संलग्न रहते हैं। उनकी आयु अपने ही मानसे सौ वर्षोंकी होती है। उसका परिमाण बतलाता हूँ, सुनो। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका एक मुहूर्त तथा तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात होता है। यह मनुष्योंके दिन-रातका मान है। तीस दिन-रात व्यतीत होनेपर दो पक्ष अथवा एक मास पूर्ण होता है। छह मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। दो अयनोंका नाम क्रमशः दक्षिणायन और उत्तरायण है। इस प्रकार मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंका एक दिन-रात है। उसमें दिन तो उत्तरायण और रात दक्षिणायन है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगी होती है, जिसे सत्ययुग, त्रेता आदि कहते हैं। अब इनका विभाग सुनो। चार हजार दिव्य वर्षोंका सत्ययुग होता है, चार सौ दिव्य वर्षोंकी उसकी सन्ध्या और उतने ही वर्षोंका सन्ध्यांश होता है। तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग है। उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांशका समय तीन-तीन सौ दिव्य वर्षोंका है। दो हजार दिव्य वर्षोंका द्वापरयुग होता है और दो-दो सौ दिव्य वर्ष उसकी सन्ध्या तथा सन्ध्यांशके होते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! एक हजार दिव्य वर्षोंका कलियुग होता है तथा सौ-सौ दिव्य वर्ष उसकी सन्ध्या एवं सन्ध्यांशके बताये गये हैं। इस प्रकार विद्वानोंने बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी है। एक हजार चतुर्युगी बीतनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। ब्रह्मन् ! ब्रह्माजीके एक दिनमें बारी-बारीसे चौदह मनु होते हैं। देवता, सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनुपुत्र—ये सब लोग एक ही साथ उत्पन्न होते हैं और एक ही साथ इनका संहार भी होता है। इस प्रकार इकहत्तर चतुर्युगोंसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है।* अब मनुष्य-
* इकहत्तर चतुर्युगोंके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९४ चतुर्युगी होते हैं और ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे। छः चतुर्युगोंका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है; इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं।
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका मान सुनो। पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख और बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर माना गया है। देवताओंके वर्षसे एक मन्वन्तरमें आठ लाख, बावन हजार वर्ष होते हैं। इस कालका चौदह गुणा करनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। इसके अन्तमें विद्वानोंने नैमित्तिक प्रलयका होना बतलाया है। उसमें भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक जलकर नष्ट हो जाते हैं। महर्लोक बच जाता है; किन्तु नीचेके लोकोंके जलनेसे वहाँ इतना ताप पहुँचता है कि उस लोकके निवासी जनलोकमें चले जाते हैं। फिर तीनों लोक एक महासमुद्रके गर्भमें छिप जाते हैं। ब्रह्माकी रात आ जाती है, इसलिये वे उसमें शयन करते हैं। ब्रह्माके दिनके बराबर ही उनकी रात भी होती है। उनके बीतनेपर फिर सृष्टिका क्रम चालू होता है। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्माका एक वर्ष बीतता है और पूरे सौ वर्षतक उनका जीवन रहता है। उनके सौ वर्षको एक 'पर' कहते हैं। उसमेंसे पचास वर्षोंकी 'परार्द्ध' संज्ञा है। इस तरह ब्रह्माका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था। ब्रह्मन्! अब उनका दूसरा परार्द्ध चल रहा है। इसमें यह वाराह कल्प प्रथम कल्प है।
**क्रौष्टुकि बोले—**सृष्टिके आदिकर्ता तथा प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाको उत्पन्न किया, उसका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
**मार्कण्डेयजीने कहा—**ब्रह्मन्! पाद्म कल्पके अन्तमें जो प्रलय हुआ था, उसके बाद रात्रि बीतनेपर जब सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त श्रीविष्णुरूप ब्रह्माजी सोकर उठे, उस समय उन्होंने संसारको शून्य देखा। जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले ब्रह्मस्वरूप भगवान् नारायणके विषयमें विद्वान् पुरुष यह श्लोक कहा करते हैं—
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः॥
'जल नरसे प्रकट हुआ है, इसलिये वह नार कहलाता है। भगवान् उसमें सोते हैं—भगवान्का वह अयन है, इसलिये वे नारायण कहे गये हैं।'
जागनेके बाद उन्होंने पृथ्वीको जलके भीतर डूबी हुई जानकर उसे निकालनेकी इच्छासे वाराहरूप धारण किया। उनका वह स्वरूप वेदमय, यज्ञमय एवं दिव्य था। उन सर्वव्यापी भगवान्ने वाराहरूपसे ही जलमें प्रवेश किया और पातालसे पृथ्वीको निकालकर जलके ऊपर रखा। उस समय जनलोकनिवासी सिद्धगण उन जगदीश्वरका चिन्तन एवं स्तवन कर रहे थे। पृथ्वी उस जल-राशिके ऊपर बहुत बड़ी नौकाकी भाँति स्थित हुई। पृथ्वीका आकार बहुत विशाल और विस्तृत है, इसलिये यह जलमें डूब नहीं पाती। तदनन्तर पृथ्वीको बराबर करके भगवान्ने उसपर पर्वतोंकी सृष्टि की। पूर्वकल्पकी सृष्टि जब प्रलयाग्निसे दग्ध होने लगी थी, उस समय सब पर्वत पृथ्वीपर खण्ड-खण्ड होकर बिखर गये और एकार्णवके जलमें डूब गये। फिर वायुके द्वारा वहाँ बहुत-सा जल एकत्रित हुआ। उस जलसे भीगकर और प्रवाहमें बहकर जो पर्वत जहाँ लग गये, वे वहाँ अचलरूपसे स्थित हो गये।
**क्रौष्टुकिने कहा—**ब्रह्मन्! आपने थोड़ेमें ही सृष्टिका भलीभाँति वर्णन किया, अब मुझे देवता आदिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तारके साथ बतलाइये।
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्मन्! ब्रह्माजीने जब सृष्टि रचनेका विचार किया, तब पहले उनसे मानस पुत्र ही उत्पन्न हुए। तदनन्तर देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंको उत्पन्न
- एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन * १२५
करनेकी इच्छासे उन्होंने जलमें अपनेको योगयुक्त किया। योगस्थ होनेपर ब्रह्माजीके कटिप्रदेशसे पहले असुरोंकी उत्पत्ति हुई। तब उन्होंने अपने उस तमोगुणी शरीरको त्याग दिया। त्यागनेपर वह शरीर रात्रिके रूपमें परिणत हो गया। फिर दूसरा शरीर धारण करके जब प्रजापतिने सृष्टिका विचार किया, तब उन्हें प्रसन्नता हुई। उस अवस्थामें उनके मुखसे सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त देवता उत्पन्न हुए। फिर भगवान् ब्रह्माने उस शरीरको भी त्याग दिया। त्यागनेपर वह सत्त्वप्राय दिनके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर पुनः उन्होंने सत्त्वगुणी शरीरको ही धारण किया। उस समय उन्होंने अपनेको सबका पिता माना, इसलिये उनसे पितरोंकी उत्पत्ति हुई। पितरोंकी सृष्टिके बाद ब्रह्माजीने वह शरीर भी छोड़ दिया। वह छोड़ा हुआ शरीर सन्ध्याकालके रूपमें परिणत हुआ, जो दिन और रातके मध्यमें स्थित होता है। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने रजोगुणकी अधिकतासे युक्त दूसरा शरीर धारण किया। उससे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई। मनुष्योंकी सृष्टिके बाद उस शरीरको भी उन्होंने त्याग दिया। वह शरीर ज्योत्स्नाकालके रूपमें परिणत हुआ, जो रातके अन्त और दिनके प्रारम्भमें हुआ करता है। इस प्रकार ये रात दिन, सन्ध्या और ज्योत्स्नाकाल देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माके शरीर हैं।
ब्रह्माजीने अपने प्रथम मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्, रथन्तर साम तथा अग्निष्टोम यज्ञको उत्पन्न किया। दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पञ्चदश स्तोम तथा बृहत्सामकी सृष्टि की। पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, पञ्चदश स्तोम, वैरूप साम तथा अतिरात्र यज्ञका निर्माण किया और उत्तर मुखसे इक्कीसवाँ अथर्व, आप्तोर्याम यज्ञ, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज सामको प्रकट किया। उन्होंने कल्पके आदिमें बिजली, वज्र, मेघ, लाल इन्द्रधनुष और पक्षियोंकी सृष्टि की। तथा उनके शरीरसे छोटे-बड़े अनेक प्राणी उत्पन्न हुए। पूर्वकालमें देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंकी सृष्टि करनेके पश्चात् उन्होंने अन्य स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको उत्पन्न किया। यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, नर, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग, सर्प आदि जङ्गम तथा स्थावर भूतोंकी सृष्टि की। उनमेंसे जिनके पूर्वकल्पमें जैसे कर्म थे, वैसे ही कर्म वे पुनः-पुनः नूतन सृष्टिमें प्राप्त करते हैं। हिंसा-अहिंसा, मृदुता क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा सत्य असत्यको वे पूर्वजन्मकी भावनाके अनुसार ही प्राप्त करते हैं और उस भावनाके अनुकूल वस्तु ही उन्हें रुचिकर जान पड़ती है। इन्द्रियोंके विषयों, भूतों तथा शरीरोंमें स्वयं ब्रह्माजीने ही नानात्वका विधान किया है—उन्हें अनेक रूपोंमें उत्पन्न किया है। देवता आदि भूतोंके नाम और रूपका तथा कार्योंके विस्तारका उन्होंने वेदके शब्दोंसे ही प्रतिपादन किया है। ऋषियोंके नाम भी वेदोंसे ही निश्चित किये हैं। ब्रह्माजीकी रात्रिका अन्त होनेपर उन्होंने देवता आदि जिन-जिन भूतोंकी सृष्टि की है, उन सबके नाम-रूप और कर्तव्यका ज्ञान भी वे वेदोंसे ही प्रदान करते हैं। जिस ऋतुमें जिस प्रकारके अनेकों चिह्न देखे जाते हैं, युगादिमें सृष्टि होनेपर वे सभी वैसे ही दृष्टिगोचर होते हैं। रात्रिके अन्तमें जगे हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी सृष्टि प्रत्येक कल्पमें ऐसी ही होती है।
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प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य
क्रौष्टुकिने कहा—ब्रह्मन्! आपने अवाक्स्रोत नामक सर्गका, जो मानवसर्ग ही है, वर्णन किया; अब विस्तारपूर्वक यह बतलानेकी कृपा करें कि ब्रह्माजीने सृष्टिका विस्तार कैसे किया। महामते! उन्होंने वर्णोंकी सृष्टि कैसे की? उनके गुण क्या हैं तथा ब्राह्मण आदि वर्णोंका कर्म कौन-सा माना गया है?
मार्कण्डेयजी बोले—मुने! सत्यका चिन्तन करनेवाले ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जब सृष्टि-रचना आरम्भ की, तब उनके मुखसे एक हजार स्त्री-पुरुष उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब सात्त्विक तथा सहृदय थे। तदनन्तर ब्रह्माजीने अपने वक्षःस्थलसे एक सहस्र अन्य स्त्री-पुरुषोंको उत्पन्न किया। वे सभी रजोगुणकी अधिकतासे युक्त, शूरवीर और क्रोधी थे। उसके बाद उन्होंने अपनी दोनों जाँघोंसे दूसरे एक सहस्र स्त्री-पुरुषोंको प्रकट किया। वे सब तमोगुणी, श्रीहीन तथा मन्दबुद्धि थे। वे सब जोड़ेके रूपमें उत्पन्न हुए जीव अत्यन्त प्रसन्न होकर एक दूसरेके साथ मैथुनकी क्रियामें प्रवृत्त हो गये। तभीसे इस कल्पमें मैथुनका प्रसार हुआ। फिर ब्रह्माजीने पिशाच, सर्प, राक्षस, द्रोह करनेवाले मनुष्य, पशु-पक्षी, मगर, मछली, बिच्छू तथा अण्डज आदिको उत्पन्न किया।
पहलेकी प्रजा सात्त्विक और धर्मपरायण थी, अतः यहाँ सब ओर सुख-शान्ति थी। इसके बाद कालान्तरमें उनके भीतर लोभका उदय हुआ। फिर तो शीत, उष्ण, क्षुधा आदि द्वन्द्व प्रकट हुए। प्रजाओंने उस द्वन्द्वको दूर करनेके लिये पहले पुरोंका निर्माण किया। कुछ लोग मरुभूमि अथवा धन्वदेशको शत्रुओंके लिये दुर्गम समझकर उसमें रहने लगे। कुछ लोगोंने पर्वतों और गुफाओंका आश्रय लिया। कुछ मनुष्योंने वृक्षों, पर्वतों और जलके दुर्गोंको अपना निवास-स्थान बनाया। कुछ लोग कृत्रिम दुर्ग बनाकर उसमें रहने लगे। उन्होंने वस्तुओंकी लंबाई-चौड़ाई नापनेके लिये अँगुलियोंसे नाप-नापकर पहले कुछ माप तैयार किये। उनका पैमाना इस प्रकार बना। सबसे सूक्ष्म वस्तु है परमाणु। उससे बड़ा त्रसरेणु होता है, जो पृथ्वीकी धूलिका एक कण है। उससे उत्तरोत्तर बड़े प्रमाण हैं—बालाग्र, लिक्षा, यूका और यवोदर। ये एक-दूसरेकी अपेक्षा आठ-आठ गुने बड़े हैं। आठ यवका एक अङ्गुल, छः अङ्गुलका एक पद, दो पदका एक बित्ता और दो बित्तेका एक हाथ होता है। चार हाथका एक धनुर्दण्ड होता है। इसीको नाड़िकायुग भी कहते हैं। दो हजार धनुषको एक गव्यूति और चार गव्यूतिका एक योजन होता है।
तदनन्तर प्रजावर्गने अपने रहनेके लिये पुर, खेट, द्रोणीमुख, शाखा-नगर, खर्वट, द्रमी आदिका निर्माण किया। उन सबमें ग्राम, गोशाला आदिकी व्यवस्था करके वहाँ पृथक्-पृथक् निवास-स्थान बनाये। जिसके चारों ओर ऊँची चहारदीवारी हो, जो खाइयोंसे घिरा हो, जिसकी लंबाई दो कोस और चौड़ाई उसका आठवाँ भाग हो, वह पुर कहलाता है। उसके पूर्व और उत्तरमें जलप्रवाहका होना उत्तम माना गया है। वहाँसे बाहर निकलनेके लिये शुद्ध बाँसका पुल बना होना चाहिये। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरकी अपेक्षा आधी हो, वह खेट कहलाता है और जो पुरके चौथाई हिस्सेके बराबर हो, उसे खर्वट कहते हैं। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरके आठवें हिस्सेके बराबर हो, वह द्रोणीमुख कहलाता है। जहाँ चहारदीवारी और खाई नहीं है, उस पुरको खर्वट कहते हैं। जहाँ मन्त्री, सामन्त तथा भोगके बहुत-से सामान हों, वह शाखानगर कहलाता है। जहाँ अधिकांश शूद्र
- प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य * १२७
हों, अपनी समृद्धिसे युक्त किसान रहते हों, जो खेतों और उपभोगयोग्य भूमि (बाग-बगीचों) के बीचमें बसा हो, उसका नाम गाँव है। जहाँ किसी कार्यके लिये मनुष्य अन्य नगर आदिसे आकर बसते हों, उसको बस्ती कहते हैं। जहाँ अधिकांश दुष्टोंका निवास हो, जहाँके रहनेवाले अपने पास खेत न होनेपर भी दूसरेकी भूमिपर अधिकार जमाते और भोगते हैं, वह गाँव द्रमीके नामसे पुकारा जाता है। जहाँ प्रायः वे ही लोग निवास करते हैं, जो राजाके प्रिय हों। जहाँ ग्वाले अपने बर्तन-भाँड़े गाड़ियोंपर लादकर रखते हों, बिना बाजारके ही गोरस मिलता हो, गायोंका समूह रहता हो, जहाँ इच्छानुसार भूमि रहनेके लिये सुलभ हो, उस स्थानका नाम घोष है।
इस प्रकार नगर आदिका निर्माण करके प्रजाने अपने रहनेके लिये घर बनाये। वे घर इस उद्देश्यसे बनाये गये थे कि वहाँ शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रक्षा हो सके। जैसे पहले उनके घरके आकारके वृक्ष होते थे और वहाँ उन्हें जैसी सुविधाएँ प्राप्त होती थीं, उन सबका स्मरण करके उन्होंने घर बनाये। जैसे वृक्षकी शाखाएँ एकके बाद दूसरी तथा छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची होती हैं, उसी प्रकार उन्होंने अनेक प्रकारकी शालाएँ बनायीं। द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकालमें जो कल्पवृक्षकी शाखाएँ थीं, वे ही उस समय प्रजावर्गके घरोंमें शाला बनानेके काममें आयीं। इस प्रकार गृह-निर्माणके द्वारा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंको दूर करके सब लोग जीविकाका उपाय सोचने लगे; क्योंकि उस समय समस्त कल्पवृक्ष मधुसहित नष्ट हो चुके थे। जब प्रजा भूख और प्याससे व्याकुल एवं शोकसे आतुर हो उठी तब त्रेताके आरम्भमें उनके अभीष्टकी सिद्धि हुई। उनकी इच्छाके अनुसार वर्षा हुई और वह वर्षाका जल नीची भूमिमें बहकर एकत्र होने लगा। उससे स्रोत, पोखरे और नदियाँ बन गयीं। उस जलका पृथ्वीके साथ संयोग होनेसे बिना जोते-बोये ही ग्राम्य और आरण्य—सब मिलकर चौदह प्रकारके अन्न पैदा हुए। वृक्षों और लताओंमें ऋतुके अनुसार फल और फूल लगने लगे। त्रेतायुगमें पहले-पहल अन्नका प्रादुर्भाव हुआ। उसीसे उस युगमें सब प्रजाका जीवन-निर्वाह होने लगा।
फिर अकस्मात् सब लोगोंके मनमें राग और लोभका प्राकट्य हुआ। इससे वे एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्या रखने लगे और अपनी शक्तिके अनुसार नदी, खेत, पर्वत, वृक्ष और झाड़ियोंपर अधिकार जमाने लगे। उनके इस दोषसे सबके देखते-देखते सब अनाज नष्ट हो गये। पृथ्वीने एक साथ ही सब ओषधियोंको अपना ग्रास बना लिया। अनाजके नष्ट होनेसे प्रजा भूखसे व्याकुल होकर फिर इधर-उधर भटकने लगी और अन्तमें ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। ब्रह्माजीने भी प्रजाका सारा समाचार ठीक-ठीक जानकर पृथ्वीको गायके रूपमें बाँधा और मेरु पर्वतको बछड़ा बनाकर उसका दूध दुहा। ब्रह्माजीने दूधके रूपमें सब प्रकारके अन्न दुह लिये थे, वे ही बीजरूपमें प्रकट हुए और उनसे ग्राम्य तथा आरण्य—सब प्रकारके अन्न पैदा हुए, जो फलके पक जानेपर काट लिये जाते हैं। धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, ज्वार, कोदो, चीना, उड़द, मूँग, मसूर, मटर, कुलथी, अरहर, चना और सण—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। यज्ञके काममें आनेवाली केवल चौदह ओषधियाँ हैं, जिनमें सात ग्राम्य और सात आरण्य हैं। उनके नाम ये हैं—धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, कुलथी, माथी, साँवा, वनतिल, गवेधुक, कुरूविन्द, मर्कट और वेणुयव।
जब बोनेपर भी वे ओषधियाँ फिर न जम सकीं, तब भगवान् ब्रह्माजीने अन्नकी वृद्धिके लिये हाथसे काम करनेकी प्रणालीको ही जीविकाका उपाय बनाया; तबसे जोतने-बोनेपर अन्नकी उपज होने लगी। इस प्रकार जीविकाका प्रबन्ध हो
१२८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
जानेपर ब्रह्माजीने न्याय और गुणके अनुसार वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादा स्थापित की। अपने कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मणोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। युद्धमें पीठ न दिखानेवाले क्षत्रियोंको इन्द्रका पद प्राप्त होता है। स्वधर्मपरायण वैश्योंको मरुद्गणोंका लोक मिलता है। सेवामें संलग्न रहनेवाले शूद्र गन्धर्वलोकमें जाते हैं। जो लोग गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक वेदाध्ययन करते हैं, उन्हें अठासी हजार ऊर्ध्वरेता महर्षियोंको प्राप्त होनेवाला स्थान मिलता है। वानप्रस्थधर्मका पालन करनेवाले लोग सप्तर्षियोंके लोकमें जाते हैं। गृहस्थधर्मका विधिवत् पालन करनेवालोंको प्राजापत्य लोककी प्राप्ति होती है। संन्यासियोंको ब्रह्मपद और योगियोंको अमृतत्वकी उपलब्धि होती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्णधर्म और आश्रम धर्मोंका पालन करनेवाले लोगोंके लिये पृथक्-पृथक् लोकोंकी कल्पना की गयी है।
स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसहके स्थान आदिका वर्णन
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**मुने! तदनन्तर ब्रह्माजी जब ध्यान कर रहे थे, उस समय उनके मनसे मानसी प्रजा उत्पन्न हुई; साथ ही उनके शरीरसे कारण और कार्यका भी प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जीव त्रिगुणात्मक माने गये हैं। इसी प्रकार समस्त चराचर भूतोंकी सृष्टि हुई। जब प्रयत्न करनेपर भी ब्रह्माजीकी प्रजा बढ़ न सकी, तब उन्होंने अपने ही सदृश सामर्थ्यसे युक्त नौ मानस-पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम ये हैं—भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं।* इसके बाद ब्रह्माजीने अपने क्रोधसे रुद्रको प्रकट किया; फिर संकल्प और धर्मको उत्पन्न किया, जो पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने जिन्हें सबसे पहले उत्पन्न किया, वे सनन्दन आदि चार भाई लोकमें आसक्त नहीं हुए। वे सब-के-सब निरपेक्ष, एकाग्रचित्त, भविष्यको जाननेवाले, वीतराग और मत्सररहित थे।
तत्पश्चात् प्रजापतिने अनेक प्रकारके स्त्री-पुरुष उत्पन्न किये, जिनमें कोमल, क्रूर, शान्त, श्यामवर्ण तथा गौरवर्ण—सभी तरहके लोग थे। इसके बाद उन्होंने अपने ही समान प्रभावशाली एक पुत्ररत्न उत्पन्न किया, जिनका नाम स्वायम्भुव मनु हुआ। उन्हें ब्रह्माजीने प्रजाजनोंका रक्षक बनाया। फिर स्वायम्भुव मनुने शतरूपाको अपनी पत्नी बनाया, जो तपस्याके प्रभावसे सर्वथा निष्पाप थी। शतरूपाने स्वायम्भुव मनुके सम्पर्कसे दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे प्रियव्रत और उत्तानपादके नामसे विख्यात हुए। उन दोनोंकी अपने कर्मोंसे प्रसिद्धि हुई। शतरूपाके गर्भसे दो कन्याओंका भी जन्म हुआ। उनमेंसे एकका नाम ऋद्धि (आकूति) और दूसरीका प्रसूति था। स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिको विवाह दक्षसे और ऋद्धि (आकूति)-का रुचि प्रजापतिसे किया। प्रजापति रुचि और आकूतिसे जुड़वीं सन्तान उत्पन्न हुई, जिनमें एक पुत्र था और दूसरी कन्या। पुत्रका नाम यज्ञ और कन्याका दक्षिणा था। यज्ञके 'याम' नामसे विख्यात बारह पुत्र हुए। वे ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें बारह देवता कहलाये। ये बड़े तेजस्वी थे।
दक्षने प्रसूतिके गर्भसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न
* भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा। मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसम्।
नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ (५०। ५-६)
- स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसहके स्थान आदिका वर्णन * १२९
कीं; उनके नाम ये हैं, सुनो—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कीर्ति। इन सबको धर्मने अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण किया। इनसे शेष जो ग्यारह छोटी कन्याएँ थीं, उनके नाम इस प्रकार हैं—ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, ऊर्जा, अनसूया, स्वाहा और स्वधा। इन सबको क्रमशः भृगु, महादेवजी, मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अत्रि, अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया। श्रद्धाने कामको, लक्ष्मीने दर्पको, धृतिने नियमको, तुष्टिने संतोष और पुष्टिने लोभको उत्पन्न किया। मेधासे श्रुतका, क्रियासे दण्ड, नय और विनयका, बुद्धिसे बोधका, लज्जासे विनयका, वपुसे व्यवसायका, शान्तिसे क्षेमका, सिद्धिसे सुखका और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हैं।
कामसे उसकी पत्नी रतिने हर्ष नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो धर्मका पौत्र कहलाया। अधर्मकी स्त्री हिंसा थी। उसके गर्भसे अनृत नामक पुत्र और निरृति नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। फिर इन दोनोंसे दो पुत्रों तथा दो कन्याओंका जन्म हुआ। पुत्रोंके नाम थे नरक और भय तथा कन्याओंके नाम थे माया और वेदना। वे उनकी पत्नयाँ हुईं। इनमें भयकी स्त्री मायाने सब प्राणियोंका संहार करनेवाले 'मृत्यु' नामक पुत्रको उत्पन्न किया और वेदनाने नरकके संसर्गसे दुःख नामक पुत्रको जन्म दिया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध उत्पन्न हुए। ये सब अधर्मरूप हैं और दुःखके हेतु बतलाये जाते हैं। इनके स्त्री और पुत्र नहीं हैं। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं।
अलक्ष्मीके चौदह पुत्र हैं, जिनमें तेरह तो क्रमशः दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहङ्कारमें पृथक्-पृथक् रहते हैं। चौदहवेंका नाम दुःसह है, वह मनुष्योंके गृहोंमें निवास करता है। वह भूखसे दुर्बल, नीचा मुख किये, नंग-धड़ंग और चिथड़ा लपेटे रहता है; उसकी आवाज कौएके समान है। जब ब्रह्माजीने उसे उत्पन्न किया, तब वह सबको खा जानेके लिये उद्यत हुआ। वह तमोगुणका भंडार था और बड़ी-बड़ी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल जान पड़ता था। उसका मुँह फैला हुआ था, इससे वह और भी भयंकर जान पड़ता था। उसको आहारके लिये उत्सुक देख लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा—'दुःसह ! तुझे इस संसारका भक्षण नहीं करना चाहिये। तू अपना क्रोध शान्त कर। रजोगुणकी कला त्याग और इस तामसी वृत्तिको भी छोड़ दे।'
दुःसहने कहा—जगदीश्वर ! मैं भूखसे दुर्बल हो रहा हूँ और प्यास भी मुझे जोरसे सता रही है। नाथ ! बताइये—मुझे कैसे तृप्ति हो, मैं किस तरह बलवान् बनूँ? तथा मेरा निवास-स्थान कौन है, जहाँ मैं सुखसे रह सकूँ?
ब्रह्माजीने कहा—बेटा ! मनुष्योंका घर तुम्हारा निवास-स्थान है, अधर्मपरायण पुरुष तुम्हारे बल हैं तथा नित्यकर्मके त्यागसे ही तुम्हारी पुष्टि होगी। मर्म-व्रण और फोड़े तुम्हारे वस्त्र होंगे। अब तुम्हारे लिये आहारकी व्यवस्था करता हूँ। जिसमें किसी प्रकारकी क्षति पहुँची हो, कीड़े पड़ गये हों, कुत्तेने दृष्टि डाली हो, जो फूटे बर्तनमें रखा हो, जिसे मुँहसे फूँक-फूँककर ठंडा किया गया हो, जो जूठा और अपक्व हो, जिसमेंसे पानी छूटता हो, जिसको किसीने चख लिया हो, जो शुद्धतापूर्वक तैयार न किया गया हो, जिसे फटे आसनोंपर बैठकर भोजन किया गया हो, जो अपने समीपवर्तीको नहीं दिया गया हो, विपरीत दिशा अथवा कोणकी ओर मुँह करके खाया गया हो, दोनों सन्ध्याओंके समय और नाच, बाजा एवं स्वर-तालके साथ जिसको खाया गया हो, जिसे रजस्वला स्त्रीके द्वारा लाया, खाया अथवा देखा गया हो तथा जो और किसी दोषसे युक्त हो—ऐसा कोई भी खाने-पीनेका सामान तुम्हारी पुष्टिके लिये मैं तुम्हें देता हूँ।
१३० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
यक्ष्मन्! बिना श्रद्धाका हवन, बिना नहाये, बिना जलके, अवहेलनापूर्वक दिया हुआ दान, जो व्यर्थ पड़ो हो अथवा फेंक दी जानेवाली हो, ऐसी वस्तुका दान और अत्यन्त अभिमानसे, दोषसे, क्रोधसे तथा कष्ट मानकर किया हुआ दान—इन सबका फल तुम्हें ही मिलेगा! कन्याका मूल्य चुकानेके लिये जो धनोपार्जनकी क्रिया की जाती है तथा जो असत् शास्त्रोंद्वारा सम्पादित होनेवाली क्रियाएँ हैं, उन सबका फल तुम्हारी पुष्टिके लिये तुम्हें देता हूँ। जो कार्य केवल धन कमानेके लिये किया जाता है, धर्मकी दृष्टिसे नहीं तथा जो सत्यकी अवहेलनापूर्वक अध्ययन किया जाता है, वह सब तुम्हारी इच्छा-पूर्तिके लिये तुम्हें दे रहा हूँ। जो मनुष्य गर्भिणी स्त्रीके साथ समागम करते, सन्ध्या और नित्यकर्मका उल्लङ्घन करते तथा असत्-शास्त्रोंके अनुसार कार्य या उनकी चर्चा करके दूषित होते हैं, ऐसे मनुष्योंको दबानेकी तुममें पूरी शक्ति होगी।
दुःसह! जहाँ एक ही पङ्क्तिमें दो तरहका भोजन परोसा जाता हो, अतिथि-सत्कार और बलिवैश्वदेवका उद्देश्य न रखकर केवल अपने लिये भोजन बनाया जाता हो, भोजनमें भेद रखा जाता हो अर्थात् किसीके लिये अच्छा और किसीके लिये खराब बनता हो और जहाँ घरमें रोज-रोज कलह होता हो, वहीं तुम्हारा निवास है। जहाँ गाय-घोड़े आदि वाहन बिना खिलाये-पिलाये बाँध दिये जाते हों और संध्याके पहले ही जिस घरको धो-बुहारकर साफ नहीं किया जाता हो, वहाँ रहनेवाले मनुष्योंको तुमसे भय प्राप्त होगा। जो मनुष्य बिना व्रतके ही उपवास करते, जूए और स्त्रियोंमें आसक्त रहते, दुःसह वचन बोलते और विडालव्रती होते—बिल्लियोंकी तरह ऊपरसे साधु बनकर छिपे-छिपे अपना उल्लू सीधा करते हैं, वे सब तुम्हारे उपकारी हैं। जो ब्रह्मचर्यपालनके बिना ही अध्ययन और विद्वान् हुए बिना ही यज्ञ करते हैं, तपोवनमें रहकर भी ग्राम्य विषय भोगोंका सेवन करते और अपने मनको जीतनेका यत्न नहीं करते तथा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र अपने-अपने कर्मसे भ्रष्ट होते हैं, ऐसे लोग परलोककी इच्छासे जो भी चेष्टा करते हैं, उसका सारा फल तुम्हींको मिलेगा।
यक्ष्मन्! तुम्हारी पुष्टिके लिये और भी उपाय बताता हूँ, सुनो। जो लोग बलिवैश्वदेवके अन्तमें तुम्हारे नामके उच्चारणपूर्वक तुम्हें बलि अर्पण करते हैं और 'यक्ष्मँस्तत्ते निर्णेजनं नमः' कहकर उसे त्यागते हैं, जो शुद्धतापूर्वक बना हुआ अन्न विधिपूर्वक भोजन करते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते, लोलुपता नहीं रखते और स्त्रियोंके वशीभूत नहीं होते, ऐसे मनुष्योंके घरोंको तुम त्याग देना। जहाँ हविष्यसे देवताओंकी और श्राद्धान्नसे पितरोंकी पूजा होती हो तथा कुलकी स्त्रियों, बहनों और अतिथियोंका स्वागत सत्कार होता हो, उस घरको भी छोड़ देना। जहाँ बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष तथा स्वजनवर्गमें प्रेम हो, जहाँकी स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक रहती हों, बाहर जानेके लिये उत्सुक नहीं होतीं तथा लज्जाकी रक्षा करती हैं, उस घरपर भी दृष्टि न डालना। जहाँ अवस्था और सम्बन्धके अनुसार शयन, आसन और भोजनकी व्यवस्था हो, जहाँके निवासी दयालु, सत्कर्मपरायण और साधारण सामग्रीसे युक्त हों तथा जिस घरके लोग गुरु, वृद्ध एवं ब्राह्मणोंके खड़े रहनेपर स्वयं भी आसनपर नहीं बैठते, वह घर भी तुम्हें छोड़ देना चाहिये। देवता, पितर, मनुष्य और अतिथियोंके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही जिसका भोजन है, उस पुरुषके घरमें भी तुम पैर न रखना।
जो सत्यवादी, क्षमाशील, अहिंसक, दूसरोंको पीड़ा न देनेवाले तथा दोषदृष्टिसे रहित हों, ऐसे पुरुषोंको तुम छोड़ देना। जो अपने पतिकी सेवामें संलग्न रहती, दुष्टा स्त्रियोंका साथ नहीं करती तथा कुटुम्बके लोगों एवं पतिके भोजन करनेसे बचे हुए अन्नको ही खाकर अपने शरीरका पोषण करती है, ऐसी स्त्रीको भी तुम हाथ न लगाना।
दुःसहकी सन्तानोंद्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्तिके उपाय १३१
जो सदा यज्ञ, अध्ययन, वेदाभ्यास और दानमें मन लगाता है, यज्ञ कराने, शास्त्र पढ़ाने तथा उत्तम दान ग्रहण करनेसे ही जिसकी जीविका चलती हो, ऐसे ब्राह्मणको भी तुम त्याग देना। दुःसह! जो सदा दान, अध्ययन और यज्ञके लिये उद्यत रहता और अपने लिये उत्तम एवं विशुद्ध शस्त्रग्रहणकी वृत्तिसे जीविका चलाता हो, उस क्षत्रियके पास भी तुम न जाना। जो दान, अध्ययन और यज्ञ—इन तीन पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त हो और पशु-पालन, व्यापार एवं कृषिसे जीविका चलाता हो, ऐसे पापरहित वैश्यको भी त्याग देना। यक्ष्मन्! जो दान, यज्ञ और द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहता और ब्राह्मण आदिकी सेवासे ही जीवन निर्वाह करता हो—ऐसे शूद्रका भी त्याग कर देना।
जहाँ गृहस्थ पुरुष श्रुति-स्मृतिके अनुकूल उपायसे जीविका चलाता हो, उसकी पत्नी उसीकी अनुगामिनी हो, पुत्र गुरु, देवता और पिताका पूजन करता हो तथा पत्नी भी पतिकी पूजामें संलग्न रहती हो, वहाँ अलक्ष्मीका भय कैसे हो सकता है। यक्ष्मन्! जो प्रतिदिन संध्याके समय पानीसे धोया जाता और स्थान-स्थानपर फूलोंसे पूजित होता है, उस घरकी ओर तुम आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। जिस घरमें बिछी हुई शय्याको सूर्य न देखते हों अर्थात् जहाँ लोग सूर्योदयसे पहले ही सोकर उठ जाते हों, जहाँ प्रतिदिन अग्नि और जल प्रस्तुत रहता हो, सूर्योदय होनेतक दीप जलता एवं सूर्यका पूर्ण प्रकाश पहुँचता हो, वह घर लक्ष्मीका निवास-स्थान है। जहाँ साँड़, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घृत, ब्राह्मण तथा ताँबेके पात्र हों, उस घरमें तुम्हारे लिये स्थान नहीं है।
दुःसह! जहाँ पके या कच्चे अन्नोंका अनादर और शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन होता हो, उस घरमें तुम इच्छानुसार विचरण करो। जिस घरमें मनुष्यकी हड्डी हो और एक दिन तथा एक रात मुर्दा पड़ा रहा हो, उसमें तुम्हारा तथा अन्य राक्षसोंका भी निवास रहे। जो अपने भाई-बन्धुको तथा सपिण्ड एवं समानोदक मनुष्योंको अन्न और जल दिये बिना ही भोजन करते हैं, उस समय उन लोगोंपर तुम आक्रमण करो। जहाँ पुरवासी पहलेसे ही बड़े-बड़े उत्सव मनानेमें प्रसिद्ध हो चुके हों और पहलेकी ही भाँति अब अपने घरपर उत्सव मनाते हों, ऐसे घरोंमें न जाना। जो सूपकी हवासे, भीगे कपड़ेके जलकी बूँदोंसे तथा नखके अग्रभागके जलसे स्नान करते हों, उन कुलक्षणी पुरुषोंके पास अवश्य जाओ। जो पुरुष देशाचार, प्रतिज्ञा, कुलधर्म, जप, होम, मङ्गल, देवयज्ञ, उत्तम शौच तथा लोक-प्रचलित धर्मोंका भलीभाँति पालन करता हो, उसके संसर्गमें तुम्हें नहीं जाना चाहिये।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**दुःसहसे ऐसी बात कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर उसने भी ब्रह्माजीकी आज्ञाका उसी प्रकार पालन किया।
दुःसहकी सन्तानोंद्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्तिके उपाय
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**दुःसहकी पत्नी निर्माष्टि हुई। यह कलिकी कन्या थी। कलिकी पत्नीने रजस्वला होनेपर चाण्डालका दर्शन किया था, उसीसे इस कन्याका जन्म हुआ था। दुःसह और निर्माष्टिकी सोलह सन्तानें हुईं जो समस्त संसारमें व्याप्त हैं। इनमें आठ पुत्र थे और आठ कन्याएँ। ये सब-के-सब अत्यन्त भयंकर थे। दन्ताकृष्टि, तथोक्ति, परिवर्त्त, अङ्गधुक्, शकुनि, गण्डप्रान्तरति, गर्भहा तथा सस्यहा—ये आठ पुत्र थे। नियोजिका, विरोधिनी, स्वयंहारिका, भ्रामणी, ऋतुहारिका, स्मृतिहरा, बीजहरा तथा विद्वेषिणी—ये आठ कन्याएँ थीं, जो सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली हुईं। अब मैं इनके कर्म तथा इनसे होनेवाले दोषोंकी शान्तिके उपाय बतलाऊँगा। पहले आठ
१३२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
पुत्रोंके विषयमें सुनो। दन्ताकृष्ट छोटे बच्चोंके दाँतोंमें स्थित होकर उनमें रगड़ पैदा करता है। इस प्रकार वह दुःसह नामक अलक्ष्मी-पुत्रको वहाँ बुलाना चाहता है। उसकी शान्तिके लिये सोये हुए बालककी शय्या और दाँतोंपर सफेद सरसों छींटना चाहिये तथा सुवर्चला (ब्राह्मी) नामक ओषधिसे स्नान कराने और उत्तम शास्त्रोंका पाठ करानेसे भी यह दोष दूर होता है। दुःसहका दूसरा पुत्र तथोक्ति जब आता है, तब वह बारंबार 'यही हो, यही हो' ऐसा कहता हुआ मनुष्योंको शुभाशुभमें लगा देता है। यदि अकस्मात् शुभाशुभकी प्रवृत्ति हो तो उसे तथोक्तिकी ही प्रेरणा समझनी चाहिये। यदि शुभका कथन या श्रवण हो तो विद्वान् पुरुष उसे मङ्गलमय बतावे और यदि अशुभका श्रवण या कथन हो तो उसकी शान्तिके लिये भगवान् विष्णु, चराचरगुरु ब्रह्मा तथा अपने-अपने कुलदेवताके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। जो अन्यके गर्भमें दूसरे गर्भोंको रखने और बदलनेमें प्रसन्नताका अनुभव करता है तथा कोई बात कहनेके लिये उत्सुक मनुष्यके मुखसे किसी और ही बातको कहला देता है, वह दुःसहका तीसरा पुत्र परिवर्त है। उसकी शान्तिके लिये भी तत्त्ववेत्ता पुरुष पीली सरसों छिड़के और रक्षोघ्न-मन्त्रोंका पाठ करे।
अङ्गध्रुक् नामक चौथा कुमार वायुके समान मनुष्योंके अङ्गोंमें प्रवेश करके स्फुरण (फड़कने) आदिके द्वारा शुभाशुभ फलकी सूचना देता है। उसकी शान्तिके लिये कुशोंसे शरीरको झाड़े। दुःसहका पाँचवाँ कुमार शकुनि कौवे आदि पक्षियोंके अथवा कुत्ते-सियार आदि पशुओंके शरीरमें स्थित होकर अपनी बोलीसे शुभाशुभ फलको सूचित करता है। उसमें भी अशुभसूचक शब्द होनेपर कार्यारम्भका परित्याग करना चाहिये और शुभसूचक शब्द होनेपर अत्यन्त शीघ्रताके साथ कार्यारम्भ कर देना चाहिये। ऐसा प्रजापतिका कथन है। द्विजश्रेष्ठ! गण्डप्रान्तरति नामक छठा कुमार गण्डप्रान्तोंमें आधे मुहूर्ततक स्थित हो सब प्रकारके कार्यारम्भका नाश और माङ्गलिक कर्म तथा अनिन्दनीयता (प्रतिष्ठा)-का अपहरण करता है। ब्राह्मणोंके आशीर्वाद, देवताओंकी स्तुति, मूलशान्ति, गोमूत्र और सरसों मिले हुए जलसे स्नान, जन्मकालिक नक्षत्र और ग्रहोंके पूजन, धर्ममय उपनिषदोंके पाठ, शास्त्रोंके दर्शन तथा गण्डान्तमें पैदा हुए बालककी अवज्ञा (कुछ कालतक उसका मुँह न देखने)-से उसके दोषकी शान्ति होती है। सातवाँ कुमार 'गर्भहा' बड़ा भयंकर है, जो स्त्रियोंके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ पिण्डको अपना ग्रास बना लेता है। प्रतिदिन पवित्रतापूर्वक रहने, प्रसिद्ध मन्त्र (कवच आदि) लिखकर बाँधने, उत्तम फूलों आदिकी माला धारण करने, पवित्र गृहमें रहने तथा अधिक परिश्रम न करनेसे गर्भवती स्त्रीकी उसके भयसे रक्षा होती है। अतः इसके लिये सदा चेष्टा करनी चाहिये। इसी प्रकार आठवाँ कुमार सस्यहा है, वह खेतीकी उपजको नष्ट करता है। उसकी भी शान्ति करनी चाहिये; इसके लिये उपाय है—खेतमें पुराना जूता रखना, अपसव्य होकर वहाँ जाना, चाण्डालका उसमें प्रवेश कराना, खेतके बाहर पूजा चढ़ाना और चन्द्रमा एवं जल (वरुण)-के नामों या मन्त्रोंका कीर्तन करना।
दुःसहकी पहली कन्या नियोजिका है। वह मनुष्योंको परायी स्त्री और पराये धनके अपहरण आदिमें लगा देती है। पवित्र ग्रन्थों, मन्त्रों अथवा स्तुतियोंके पाठसे तथा क्रोध-लोभ आदि दुर्गुणोंका त्याग करनेसे उसकी शान्ति होती है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि 'नियोजिका मुझे इन दुष्कर्मोंमें लगा रही है' यों विचारकर उसका विरोध करते हुए उन कर्मोंका त्याग करे। जब कोई अपनेको गाली दे या मार बैठे तो भी यही सोचकर कि नियोजिकाने ही इसे इस बुराईमें लगाया है, क्रोध आदिके वशीभूत न हो। इसी प्रकार विद्वान् पुरुष सदा इस बातका स्मरण करता रहे कि नियोजिका
- दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन * १३३
ही मुझको और मेरे चित्तको परस्त्री-संसर्गमें लगाती है। दूसरी कन्याका नाम विरोधिनी है। वह परस्पर प्रेम रखनेवाले स्त्री-पुरुषोंमें, भाई-बन्धुओंमें, मित्रोंमें, पिता-मातामें, पिता-पुत्रमें तथा सजातीय पुरुषोंमें विरोध डाला करती है। अतः बलिकर्म (पूजोपहारसमर्पण) करने, कठोर बातोंको सहने तथा शास्त्रीय आचार-विचारका पालन करनेके द्वारा उसके भयसे अपनी रक्षा करे। तीसरी कन्याका नाम स्वयंहारिका है। वह खलिहानसे अनाज, घर और गोशालैसे दूध-घी तथा बढ़नेवाले द्रव्यसे उसकी वृद्धि नष्ट कर देती है और सदा अन्तर्धान रहती है। इतना ही नहीं, रसोईघरसे अधपका अन्न तथा अन्नभंडारसे अनाज चुरा लेती है और परोसी हुई रसोईको भोजन करनेवाले मनुष्यके साथ स्वयं भी भोजन करती है। मनुष्योंके जूठे अन्नतक चुरा लेती है। जोते हुए खेत, घर और शालासे ऋद्धि-सिद्धिको हड़प लेती है। गायों और स्त्रियोंके थनोंसे दूध गायब कर देती है। दहीसे घी, तिलसे तेल, कुसुम्भ आदिका रंग तथा रूईसे सूत हर लेती है। इस प्रकार स्वयंहारिका निरन्तर अपहरणमें ही लगी रहती है। उससे रक्षा होनेके लिये अपने घरमें मोरके जोड़े रखे। स्त्रीकी कृत्रिम मूर्ति बनाकर स्थापित करे, घरकी दीवारपर रक्षाके मन्त्र और वाक्य लिखे, घरके भीतर जूठन न रहने दे, हवनकी अग्निसे तथा देवताको धूप देनेसे जो भस्म हो, उसे लेकर दूध आदिके बर्तनोंमें लगा दे [गाय और स्त्रीके स्तनोंमें तथा अन्नभंडार आदिमें भी उस भस्मका स्पर्श करा दे]। इससे रक्षा होती है। जो एक स्थानपर निवास करनेवाले पुरुषके मनमें उद्वेग पैदा करती है, वह भ्रामणी नामकी कन्या है। उसकी शान्तिके लिये आसन, शय्या तथा उस भूमिपर, जहाँ मनुष्य रहता हो, पीली सरसों छींट दे। साथ ही एकाग्रचित्त होकर पृथ्वी-सूक्तका जप करे।
दुःसहकी पाँचवीं कन्या स्त्रियोंके मासिक धर्म नष्ट करती है। इसलिये उसे ऋतुहारिका जानना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये स्त्रीको तीर्थोंमें, देवालयके समीप, चैत्य वृक्षके नीचे, पर्वतके शिखरपर तथा नदीके संगम एवं सरोवरोंमें नहलाना चाहिये। साथ ही चिकित्साशास्त्रके ज्ञाता अच्छे वैद्यको बुलाकर उसकी दी हुई उत्तम ओषधियोंका सेवन भी कराना चाहिये। छठी कन्याका नाम स्मृतिहरा है। यह स्त्रियोंकी स्मरणशक्तिको हर लेती है। पवित्र एवं एकान्त स्थानमें रहनेसे उसकी शान्ति होती है। सातवीं कन्या बीजहरा कहलाती है। यह अत्यन्त भयानक है। स्त्री-पुरुषोंके रज-वीर्यका अपहरण किया करती है। पवित्र अन्नके भोजन तथा नित्य स्नान करनेसे उसकी शान्ति होती है। आठवीं कन्या विद्वेषिणी है, जो सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली है। यह स्त्री अथवा पुरुषको लोगोंका द्वेषपात्र बना देती है। उसकी शान्तिके लिये मधु, घृत, क्षीरमिश्रित तिलोंका हवन एवं मित्रविन्दा नामक यज्ञ करे।
दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भृगुसे उनकी पत्नी ख्यातिने धाता और विधाता नामक दो देवताओंको उत्पन्न किया। देवाधिदेव भगवान् नारायणकी धर्मपत्नी श्रीलक्ष्मीदेवी भी ख्यातिके ही गर्भसे प्रकट हुईं। महात्मा मेरुकी दो कन्याएँ थीं—आयति और नियति। ये ही धाता और विधाताकी पत्नियाँ हुईं। इन दोनोंसे दो पुत्र हुए—प्राण तथा मेरे महायशस्वी पिता मृकण्डु। श्रीमृकण्डुसे मेरा जन्म हुआ, मेरी माता मनस्विनी देवी थीं। मेरी पत्नी धूम्रवतीके गर्भसे मेरे पुत्र वेदशिराका जन्म हुआ। अब प्राणकी सन्तानका वर्णन सुनो। प्राणका पुत्र द्युतिमान् और द्युतिमान्का अजरा हुआ। उन
१३४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
दोनोंके बहुत-से पुत्र-पौत्र हुए।
मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमासको उत्पन्न किया। महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए—विरजा और पर्वत। अङ्गिराकी पत्नी स्मृतिने चार कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम ये हैं—सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति। इसी प्रकार महर्षि अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा तथा योगी दत्तात्रेय—इन तीन पापरहित पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुलस्त्यकी पत्नी प्रीतिसे दत्तोत्ति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अपने पूर्वजन्ममें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'अगस्त्य' के नामसे प्रसिद्ध था। क्षमा प्रजापति पुलहकी पत्नी थी। उसने कर्दम, अर्वर्रीवत् और सहिष्णु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये। क्रतुकी पत्नी सन्नतिने साठ हजार बालखिल्य नामक ऊर्ध्वरेता महर्षियोंको उत्पन्न किया। वसिष्ठकी पत्नी ऊर्जाके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए—रज, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनघ, सुतपा और शुक्र। ये सभी सप्तर्षि हुए।
ब्रह्मन्! अग्नितत्त्वके अभिमानी देवता अग्नि ब्रह्माजीके प्रथम पुत्र थे। उनकी पत्नी स्वाहाने तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो बड़े ही उदार और तेजस्वी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—पावक, पवमान और शुचि। इनमें शुचि जलको सोखनेवाला है। इन तीनोंके वंशमें प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे पैंतालीस पुत्र हुए। इनके साथ पिता अग्नि और उनके तीन पुत्रोंकी संख्या जोड़नेसे कुल उनचास अग्नि होते हैं। ये सब-के-सब दुर्जय माने जाते हैं। ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, अनग्निक और साग्निक पितर बतलाये गये हैं, उनसे स्वधाने दो कन्याओंको जन्म दिया, जिनके नाम थे—मेना और धारिणी। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न तथा सभी गुणोंसे सुशोभित, ब्रह्मवादिनी एवं योगिनी थीं। इस प्रकार यह दक्ष कन्याओंकी वंश-परम्पराका वर्णन हुआ। जो श्रद्धापूर्वक इसका चिन्तन करता है, वह निःसन्तान नहीं रहता।
क्रौष्टुकि बोले—भगवन्! आपने जो अभी स्वायम्भुव मन्वन्तरकी चर्चा की है, उसका वर्णन मैं अच्छी तरह सुनना चाहता हूँ। मन्वन्तरके कालमान, देवता, देवर्षि, राजा और इन्द्र—इन सबका वर्णन कीजिये।
मार्कण्डेयजीने कहा—ब्रह्मन्! मन्वन्तरकी अवधि इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालकी होती है, यह बात बतायी जा चुकी है। अब मानव-वर्षसे मन्वन्तरका कालमान सुनो। तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर होता है। देवताओंके मानसे आठ लाख बावन हजार वर्षोंका यह काल है। सबसे पहले मनु स्वायम्भुव हैं। इसके बाद स्वारोचिष, औत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष हैं। ये छः मनु बीत चुके हैं। इस समय वैवस्वत मनुका राज्य है। भविष्यमें सावर्णि नामवाले पाँच मनु, रौच्य मनु तथा भौम मनु—ये सात और होनेवाले हैं। इनका विस्तृत वर्णन मन्वन्तरोंके प्रकरणमें करेंगे। ब्रह्मन्! इस समय मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र और पितरोंका परिचय देता हूँ तथा उनकी उत्पत्ति, संग्रह एवं संतानोंका भी वर्णन करता हूँ। साथ ही यह भी बतलाता हूँ कि मनु और उनके पुत्रोंके राज्यका क्षेत्र कितना था।
पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रथम त्रेतायुगमें प्रियव्रतके पुत्रों अर्थात् स्वायम्भुव मनुके पौत्रोंने पृथ्वीके वर्ष-विभाग किये थे। प्रजापति कर्दमजीकी पुत्री प्रजावती राजा प्रियव्रतको ब्याही गयी थी, उसके गर्भसे दो कन्याएँ और दस पुत्र हुए। कन्याओंके नाम थे—सम्राट् और कुक्षि। उन दोनोंके दसों भाई प्रजापतिके समान तेजस्वी और बड़े शूरवीर थे। उनमें सातके नाम इस प्रकार हैं—आग्नीध्र, मेधातिथि, वपुष्मान्, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, भव्य और सवन। इनके सिवा मेधा, अग्निबाहु और मित्र—ये तीन और थे, जो तपस्या और योगमें तत्पर रहते थे। इन्हें अपने पूर्वजन्मके
- दक्ष प्रजापतिकी संतान तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन * १३५
वृत्तान्तोंका स्मरण था। अतएव इन महाभाग्यशाली पुरुषोंने राज्य-भोगमें मन नहीं लगाया। राजा प्रियव्रतने शेष सातों पुत्रोंको सातों द्वीपोंके राजपदपर धर्मपूर्वक अभिषिक्त कर दिया। अब द्वीपोंका वर्णन सुनो।
प्रियव्रतने जम्बूद्वीपमें आग्नीध्रको राजा बनाया। प्लक्षद्वीपका राज्य मेधातिथिको सौंपा। शाल्मलद्वीपमें वपुष्मान्को और कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्को राजा बनाया। द्युतिमान् क्रौञ्चद्वीपके, भव्य शाकद्वीपके तथा सवन पुष्करद्वीपके स्वामी बनाये गये। पुष्करराज सवनके दो पुत्र हुए—महावीर और धातकि। उन्होंने पुष्करद्वीपको दो भागोंमें बाँटकर बसाया। भव्यके सात पुत्र थे, उनके नाम ये हैं—जलद, कुमार, सुकुमार, वनीयक, कुशोत्तर, मेधावी और महाद्रुम। उन्होंने अपने-अपने नामसे शाकद्वीपके सात खण्ड किये। द्युतिमान्के भी कुशल, मनुग, उष्ण, प्राकार, अंधकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात ही पुत्र थे। उनके नामसे क्रौञ्चद्वीपके सात खण्ड हुए। राजा ज्योतिष्मान्के कुशद्वीपमें भी उनके पुत्रोंके नामपर सात खण्ड बने, उनके नाम इस प्रकार हैं—उद्भिद, वेष्णव, सुरथ, लम्बन, धृतिमान्, प्रभाकर तथा कपिल। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्के भी सात पुत्र हुए—श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और केतुमान्। इनके नामपर भी पूर्ववत् उक्त द्वीपके सात खण्ड बनाये गये। प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके भी सात ही पुत्र हुए और उनके नामसे प्लक्षद्वीपके भी सात खण्ड बन गये। उन खण्डोंके नाम इस प्रकार हैं—शाकभव, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव। प्लक्षद्वीपसे लेकर शाकद्वीपतकके पाँच द्वीपोंमें वर्णाश्रम-धर्म विभागपूर्वक स्थित है। वहाँ धर्मका सदा स्वाभाविक रूपसे पालन होता है। कभी किसी जीवकी हिंसा नहीं की जाती। उन पाँचों द्वीपों और उनके वर्षोंमें सब धर्म सामान्य रूपसे सर्वत्र प्रचलित हैं।
ब्रह्मन्! राजा प्रियव्रतने आग्नीध्रको जम्बूद्वीपका राज्य दिया था। उनके नौ पुत्र हुए, जो प्रजापतिके समान शक्तिशाली थे। उनमें सबसे बड़ेका नाम नाभि था, उससे छोटा किम्पुरुष था। तीसरेका नाम हरि, चौथेका इलावृत, पाँचवेंका रम्य, छठेका हिरण्वक, सातवेंका कुरु, आठवेंका भद्राश्व और नवेंका केतुमाल था। इन पुत्रोंके नामपर ही जम्बूद्वीपके नौ खण्ड हुए। हिमवर्षको छोड़कर शेष जो किम्पुरुष आदि वर्ष हैं, उनमें सुखकी अधिकता है और बिना यत्न किये स्वभावसे ही वहाँ सब कामनाओंकी सिद्धि होती है। उनमें किसी प्रकारके विपर्यय (असुख, अकाल मृत्यु आदि) तथा जरा-मृत्युका कोई भय नहीं है और न वहाँ धर्म-अधर्म अथवा उत्तम, मध्यम, अधम आदिका ही कोई भेद है। उन आठ वर्षोंमें न चार युगोंकी व्यवस्था है, न छः ऋतुओंकी। वहाँ किसी विशेष ऋतुके कोई चिह्न नहीं दीख पड़ते। आग्नीध्रकुमार नाभिके पुत्र ऋषभ और ऋषभके भरत हुए, जो अपने सौ भाइयोंमें सबसे बड़े थे। ऋषभ अपने पुत्रको राज्य दे महाप्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करके तपस्या करने लगे। वे महर्षि पुलहके आश्रममें ही रहते थे। उन्होंने हिम नामक वर्षको, जो सबसे दक्षिण है, अपने पुत्र भरतको दिया था; इसलिये महात्मा भरतके नामपर इसका नाम भारतवर्ष हो गया।
भरतके पुत्र सुमति हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। भरतने उनको राज्य देकर वनका आश्रय लिया। राजा प्रियव्रतके पुत्रों तथा उनके भी पुत्र-पौत्रोंने स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका उपभोग किया। द्विजश्रेष्ठ! यह मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि बतलायी अब और क्या सुनाऊँ?
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जम्बूद्वीप और उसके पर्वतोंका वर्णन
क्रौष्टुकिने पूछा— ब्रह्मन्! द्वीप, समुद्र, पर्वत और वर्ष कितने हैं तथा उनमें कौन-कौन-सी नदियाँ हैं? महाभूत (पृथ्वी) और लोकालोकका प्रमाण क्या है? चन्द्रमा और सूर्यका व्यास, परिमाण तथा गति कितनी है? महामुने! ये सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये।
मार्कण्डेयजी बोले— ब्रह्मन्! समूची पृथ्वीका विस्तार पचास करोड़ योजन है। अब उसके सब स्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। महाभाग! जम्बूद्वीपसे लेकर पुष्करद्वीपतक जितने द्वीपोंकी मैंने चर्चा की है, उन सबका विस्तार इस प्रकार है। क्रमशः एक द्वीपसे दूसरा द्वीप दुगुना बड़ा है; इसी क्रमसे जम्बूद्वीप, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्करद्वीप स्थित हैं। ये क्रमशः लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दही, दूध और जलके समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। ये समुद्र भी एककी अपेक्षा दूसरे दुगुने बड़े हैं।
अब मैं जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन करता हूँ। इसकी लंबाई-चौड़ाई एक लाख योजनकी है। इसमें हिमवान्, हेमकूट, निषध, मेरु, नील, श्वेत तथा शृङ्गी—ये सात वर्षपर्वत हैं। इनमें मेरु तो सबके बीचमें है, उसके सिवा जो नील और निषध नामक दो और मध्यवर्ती पर्वत हैं, वे एक-एक लाख योजनतक फैले हुए हैं। निषधसे दक्षिणमें तथा नीलसे उत्तरमें जो दो-दो पर्वत हैं, उनका विस्तार क्रमशः दस-दस हजार योजन कम है। अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे-नब्बे हजार योजनतक तथा हिमवान् और शृङ्गी अस्सी-अस्सी हजार योजनतक फैले हुए हैं। वे सभी दो-दो हजार योजन ऊँचे और उतने ही चौड़े हैं। इस जम्बूद्वीपके छह वर्षपर्वत समुद्रके भीतरतक प्रवेश किये हुए हैं। वह पृथ्वी दक्षिण और उत्तरमें नीची और बीचमें ऊँची तथा चौड़ी है। जम्बूद्वीपके तीन खण्ड दक्षिणमें हैं और तीन खण्ड उत्तरमें। इनके मध्यभागमें इलावृत वर्ष है, जो आधे चन्द्रमाके आकारमें स्थित है। उसके पूर्वमें भद्राश्व और पश्चिममें केतुमाल वर्ष है। इलावृत वर्षके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जिसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। वह सोलह हजार योजन नीचेतक पृथ्वीमें समाया हुआ है तथा उसकी चौड़ाई भी सोलह हजार योजन ही है। वह शराव (पुरवे)-की आकृतिका होनेके कारण चोटीकी ओर बत्तीस हजार योजन चौड़ा है। मेरुपर्वतका रंग पूर्वकी ओर सफेद, दक्षिणकी ओर पीला, पश्चिमकी ओर काला और उत्तरकी ओर लाल है। यह रंग क्रमशः ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र तथा क्षत्रियका है। मेरुपर्वतके ऊपर क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्रादि आठ लोकपालोंके निवासस्थान हैं। इनके बीचमें ब्रह्माजीकी सभा है। वह सभामण्डप चौदह हजार योजन ऊँचा है। उसके नीचे विष्कम्भ (आधार) रूपसे चार पर्वत हैं, जो दस-दस हजार योजन ऊँचे हैं। वे क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व। इन चारों पर्वतोंके ऊपर चार बड़े-बड़े वृक्ष हैं, जो ध्वजाकी भाँति उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्दराचलपर कदम्ब, गन्धमादन पर्वतपर जम्बू, विपुलपर पीपल तथा सुपार्श्वके ऊपर बरगदका महान् वृक्ष है। इन पर्वतोंका विस्तार ग्यारह-ग्यारह सौ योजनका है। मेरुके पूर्वभागमें जठर और देवकूट पर्वत हैं, जो नील और निषध पर्वततक फैले हुए हैं। निषध और पारियात्र—ये दो पर्वत मेरुके पश्चिम भागमें स्थित हैं। पूर्ववाले पर्वतोंकी भाँति ये भी नीलगिरितक फैले हुए हैं। हिमवान् और कैलासपर्वत मेरुके दक्षिण भागमें स्थित हैं। ये पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैलते हुए समुद्रके भीतरतक चले गये हैं। इसी प्रकार उसके उत्तर भागमें शृङ्गवान् और जारुधि
- जम्बूद्वीप और उसके पर्वतोंका वर्णन * १३७
नापक पर्वत हैं। ये भी दक्षिण भागवाले पर्वतोंकी भाँति समुद्रके भीतरतक फैले हुए हैं। द्विजश्रेष्ठ! ये मर्यादा-पर्वत कहलाते हैं।
हिमवान् और हेमकूट आदि पर्वतोंका पारस्परिक अन्तर नौ-नौ हजार योजन है। ये इलावृतवर्षके मध्यभागमें मेरुकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो जामुनके फल गिरते हैं, वे हाथीके शरीरके बराबर होते हैं। उनमेंसे जो रस निकलता है, उससे जम्बू नामकी नदी प्रकट होती है, जहाँसे जाम्बूनद नामक सुवर्ण उत्पन्न होता है। वह नदी जम्बूवृक्षके मूलभूत मेरुपर्वतकी परिक्रमा करती हुई बहती है और वहाँके निवासी उसका जल पीते हैं। भद्राश्ववर्षमें भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे, भारतवर्षमें कच्छपरूपसे, केतुमालवर्षमें वाराहरूपसे तथा उत्तरकुरुमें मत्स्यरूपसे विराजते हैं।
द्विजश्रेष्ठ! मन्दर आदि चार पर्वतोंपर जो चार वन और सरोवर हैं, उनके नाम सुनो। मेरुसे पूर्वके पर्वतपर चैत्ररथ नामक वन है, दक्षिण शैलपर नन्दन वन है, पश्चिमके पर्वतपर वैभ्राज वन है और उत्तरवाले पर्वतपर सावित्र नामक वन है। पूर्वमें अरुणोद, दक्षिणमें मानस, पश्चिममें शीतोद और उत्तरमें महाभद्रनामक सरोवर है। शीतार्त्त, चक्रमुञ्ज, कुलीर, सुकङ्कवान्, मणिशैल, वृषवान्, महानील, भवाचल, सुबिन्दु, मन्दर, वेणु, तामस, निषध तथा देवशैल—ये महान् पर्वत मन्दराचलसे पूर्व दिशामें स्थित हैं। त्रिकूट, शिखराद्रि, कलिङ्ग, पतङ्गक, रुचक, सानुमान्, ताम्रक, विशाखवान्, श्वेतोदर, समूल, वसुधार, रत्नवान्, एकशृङ्ग, महाशैल, राजशैल, पिपाठक, पञ्चशैल, कैलास और हिमालय—ये मेरुके दक्षिणभागमें स्थित हैं। सुरक्ष, शिशिराक्ष, वैदूर्य, पिङ्गल, पिञ्जर, महाभद्र, सुरस, कपिल, मधु, अञ्जन, कुक्कुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, पारियात्र और शृङ्गवान्—ये मेरुके पश्चिम विष्कम्भ विपुल गिरिसे पश्चिममें स्थित हैं। शङ्खकूट, वृषभ, हंसनाभ, कपिलेन्द्र, सानुमान्, नील, स्वर्णशृङ्ग, शतशृङ्ग, पुष्पक, मेघ, विरजाक्ष, वराहाद्रि, मयूर तथा जारुधि—ये सभी पर्वत मेरुके उत्तरभागमें स्थित हैं। इन पर्वतोंकी कन्दराएँ बड़ी मनोहर हैं। हरे-भरे वन और स्वच्छ जलवाले सरोवर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ पुण्यात्मा मनुष्योंका जन्म होता है। द्विजश्रेष्ठ! वे स्थान इस पृथ्वीके स्वर्ग हैं। इनमें स्वर्गसे भी अधिक गुण हैं। यहाँ नूतन पाप-पुण्यका उपार्जन नहीं होता। ये देवताओंके लिये भी पुण्यभोगके ही स्थान हैं। इन पर्वतोंपर विद्याधर, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता तथा गन्धर्वोंके सुन्दर एवं विशाल वासस्थान हैं। वे परम पवित्र तथा देवताओंके मनोहर उपवनोंसे सुशोभित हैं। वहाँके सरोवर भी बड़े सुन्दर हैं। वहाँ सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली वायु चलती है। इन पर्वतोंपर मनुष्योंमें कहीं वैमनस्य नहीं होता।
इस प्रकार मैंने चार पत्रोंसे सुशोभित पार्थिव कमलका वर्णन किया है। भद्राश्व और भारत आदि वर्ष चारों दिशाओंमें इस कमलके पत्र हैं। मेरुके दक्षिणभागमें जिस भारत नामक वर्षकी चर्चा की गयी है, वही कर्मभूमि है। अन्य स्थानोंमें पाप-पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती। अतः भारतवर्षको ही सबसे प्रधान समझना चाहिये। क्योंकि वहाँ सब कुछ प्रतिष्ठित है। भारतवर्षसे मनुष्य स्वर्गलोक, मोक्ष, मनुष्यलोक, नरक, तिर्यग्योनि अथवा और कोई गति—जो चाहे प्राप्त कर सकता है।
१३८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, किम्पुरुष आदि वर्षोंकी विशेषता तथा भारतवर्षके विभाग, नदी, पर्वत और जनपदोंका वर्णन
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**द्विजश्रेष्ठ! विश्वयोनि भगवान् नारायणका जो ध्रुवाधार* नामक पद है, उसीसे त्रिपथगामिनी भगवती गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। वहाँसे चलकर वे सुधाकी उत्पत्तिके स्थान और जलके आधारभूत चन्द्रमण्डलमें प्रविष्ट हुईं और सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे अत्यन्त पवित्र हो मेरुपर्वतके शिखरपर गिरीं। वहाँ उनकी चार धाराएँ हो गयीं। मेरुके शिखरों और तटोंसे नीचे गिरती-बहती गङ्गाका जल चारों ओर बिखर गया और आधार न होनेके कारण नीचे गिरने लगा। इस प्रकार वह जल मन्दर आदि चारों पर्वतोंपर बराबर-बराबर बँट गया। अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वतोंको विदीर्ण करती हुई गङ्गाकी जो धारा पूर्व दिशाकी ओर गयी, वह सीताके नामसे विख्यात हुई। सीता नैत्ररथ नामक वनको जलसे आप्लावित करती हुई अरुणोद सरोवरमें गयी और वहाँसे शीतान्त पर्वत तथा अन्य पहाड़ोंको लाँघती हुई पृथ्वीपर पहुँची। वहाँसे भद्राश्ववर्षमें होती हुई समुद्रमें मिल गयी। इसी प्रकार मेरुके दक्षिण गन्धमादनपर्वतपर जो गङ्गाकी दूसरी धारा गिरी, वह अलकनन्दाके नामसे विख्यात हुई। अलकनन्दा मेरुकी घाटियोंपर फैले हुए नन्दन वनमें, जो देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला है, बहती हुई बड़े वेगसे चलकर मानसरोवरमें पहुँची। उस सरोवरको अपने जलसे परिपूर्ण करके गङ्गा शैलराजके रमणीय शिखरपर आयी। वहाँसे क्रमशः दक्षिणमें स्थित समस्त पर्वतोंको अपने जलसे आप्लावित करती हुई महागिरि हिमवान्पर जा पहुँची। वहीं भगवान् शङ्करने गङ्गाजीको अपने शीशपर धारण कर लिया और फिर नहीं छोड़ा। तब राजा भगीरथने आकर उपवास और स्तुतिके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की। उससे प्रसन्न होकर महादेवजीने गङ्गाको छोड़ दिया। फिर वे सात धाराओंमें विभक्त होकर दक्षिण समुद्रमें जा मिलीं। उनकी तीन धाराएँ तो पूर्व दिशाकी ओर गयीं। एक धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर बहने लगी।
मेरुगिरिके पश्चिममें जो विपुल नामक पर्वत है, उसपर गिरी हुई महानदी गङ्गाकी धारा स्वचक्षुके नामसे विख्यात हुई। वहाँसे वैराज पर्वतपर होती हुई स्वचक्षु शीतोद सरोवरमें गयी और उसे आप्लावित करके त्रिशिख पर्वतपर पहुँच गयी। फिर वहाँसे अन्य पर्वतोंके शिखरोंपर होती हुई केतुमालवर्षमें पहुँचकर खारे पानीके समुद्रमें मिल गयी। मेरुके उत्तरीय पाद सुपार्श्वपर्वतपर
* इसको शिशुमार चक्र भी कहते हैं