मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
फिर भी मनको निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये प्रथम वाक्, चक्षु आदि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको रोक लेना चाहिये, अर्थात् भाषण, दर्शन आदि इन्द्रियोंके व्यापारोंको रोककर केवल मनसे जप या ध्यान करते रहना चाहिये । जब कुछ कालके अभ्याससे दर्शनादि व्यापाररहित होकर मानस ध्यान, जपादि स्थिर हो जाय; तब मनको बुद्धिमें लय कर देना चाहिये । अर्थात् सङ्कल्प-विकल्पात्मक मनके व्यापारको निश्चयात्मिका बुद्धिमें लीन कर देना चाहिये । केवल ध्येय लक्ष्यके दृढ निश्चयमें संकल्प समाप्त कर देना चाहिये । पश्चात् व्यष्टि-बुद्धिको समष्टि-बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वमें लीन करना चाहिये और उसे फिर समष्टिबुद्धिके भी भासक शान्त आत्मामें लय करना चाहिये । अथवा वागादिव्यापारोंका मनमें लय करके मनको निश्चयात्मिका बुद्धिमें, फिर उसे समष्टि- बुद्धिमें और उसे शान्त आत्मामें नियन्त्रित या लीन करना चाहिये । बुद्धिके भासक शुद्ध भानका ही चिन्तन करना तद्भिन्न वस्तुका चिन्तन न करना ही उसका लय है । ‘यच्छे
द्वादश परिच्छेद मार्क्स और ईश्वर मार्क्सवादी विद्वान् धर्मके समान ही ईश्वरको भी अनावश्यक समझते हैं। उनकी दृष्टिमें 'भीरुता या भ्रान्तिके कारण कल्पनाप्रसूत भूत प्रेत ही सभ्यताके साबुनसे धुलते-धुलते देवता बन गया, और फिर वह कल्पित देवता ही विज्ञानकी चमत्कृतिसे चमत्कृत होकर ईश्वर या निर्गुण ब्रह्म बन गया। ईश्वर या ब्रह्म न तो कोई वास्तविक वस्तु है, न उसकी आवश्यकता ही है। ईश्वरकी कल्पनासे लाभके बदले हानि अधिक हो सकती है। कारण, ईश्वरीय शास्त्र या ईश्वरीय नियमका नाम लेकर अन्धविश्वासी लोग प्रगतिके मार्गमे बार-बार रोड़ा अटकाते रहते हैं।' एक कम्युनिस्टका कहना है कि 'जो ईश्वर या धर्मको मानते हुए भी मार्क्सकी अर्थनीति कार्यान्वित करनेकी बात करता है, या तो वह धूर्त मक्कार है अथवा महामूर्ख। ईश्वर दिखावटी हुंडी नहीं है। ईश्वर माना जायगा तो उसके नियम भी मानने पड़ेंगे। फिर व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीयकरण भी ईश्वरीय नियमके विरुद्ध ठहरेगा।' परंतु ईश्वर यदि सत्य वस्तु है तो किसीके चाहने या न चाहनेसे उसका कुछ भी बिगड़ नहीं सकता। भले ही चमगादड़ोंको सूर्यका प्रखर प्रकाश असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत होता हो, परंतु एतावता सूर्य असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक नहीं सिद्ध होते। वैसे किसीको ईश्वर भी भले ही असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत हो, फिर भी उसकी प्रचण्ड सत्ताका अपलाप होना असम्भव है। वस्तुतः सूर्यनारायणसे भी अधिक सूर्यचन्द्रका भी भासक ईश्वर एक स्वतःसिद्ध सर्वमान्य वस्तु है। यह बात आधुनिक अन्वेषण, न्याय-सांख्य-वेदान्त-दर्शन, आस्तिक सिद्धान्तो तथा आस्तिक वादोसे स्पष्ट सिद्ध है। धर्म एवं ईश्वर परम सत्य वस्तु है, इसीलिये सर्वकाल एवं सर्वदेशमें इसकी मान्यता रही है। कहा जाता है कि द्वितीय युद्धके प्रसङ्गमें अमेरिका एव अफ्रीकाके कई ऐसे प्रदेशोमें वैज्ञानिकोने अनुसंधान किया तो वहाँ यही पता चला कि वहाँके जंगली लोगोंमें धर्म एव ईश्वरके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी धारणा नही है। परंतु ठीक इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि जब उन प्रदेशोंमें जाकर कई आस्तिकोने वहाँके लोगोंसे बात की तो पता चला कि वे लोग आसमानी पिता एवं स्वर्गीय लोकपर विश्वास रखते हैं, परंतु विदेशी सभ्य कहे जानेवाले लोगोंकी पहले तो वे बात ही नहीं समझते और समझनेपर भी डरकर अपना भाव नहीं व्यक्त कर सकते। प्रोफेसर मैक्सम्यूलरके अनुसार पादरी
मार्क्स और ईश्वर [८०५]
डाक्टर कौल, जुलूजातिके मध्यमें बहुत दिनोंतक रहे। जब वे उनकी भाषा भली प्रकार बोलने और समझने लगे तो उन्हें मालूम पडा कि जुलूजातिमें भी धर्म है। उनके विश्वासानुसार प्रत्येक घरानेका एक पूर्वज था और फिर समस्त मानवजातिका भी एक पूर्वज था, जिसका नाम उन्होंने 'उनकुलंकुलू' (प्रपितामह) रखा है। जब उनसे पूछा गया कि उनकुलकुलूका पिता कौन है ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह बाँससे निकला था। जुलू-भाषामें बाँसको उथलङ्ग कहते हैं। बाप संतानका उथलङ्ग कहलाता है। जैसे बाँससे कल्ले फूटते हैं, उसी प्रकार बापसे संतानकी उत्पत्ति होती है। डाक्टर कौलसे एक जुलूने कहा कि 'यह ठीक नहीं कि स्वर्गीय राजाको हमने गोरे आदमियोंसे सुना है। गर्मियोंमें जब बादल गरजते हैं, तो हम कहते हैं - राजा (ईश्वर) खेल रहा है।' एक बुड्ढेने कहा कि 'हम बचपनमें यही सुना करते थे कि राजा ऊपर है, हम उसका नाम नहीं जानते। संसारको पैदा करनेवाला उम्दबूको (राजा) है, जो कि ऊपर है।' एक बुड्ढीने कहा कि जिसने सब संसार बनाया, उसीने अन्न भी बनाया। 'ईश्वर कहाँ है ?' यह पूछनेपर वृद्ध लोग कहते हैं कि वह स्वर्गमें है, राजाओंका भी राजा है। मैडम ब्लेवैट्स्कीका कहना है कि जिस प्रकार मछली पानीके बाहर नहीं रह सकती, उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी किसी प्रकारके धर्मके बाहर नहीं रह सकता।' संसारमें चेतन-अचेतन दो प्रकारके पदार्थ मिलते हैं, उनमें अचेतनसे चेतन प्रबल होता है। एक चींटी बड़े-बड़े मिट्टीके चट्टानोंको काट देती है। छोटे-छोटे कीड़े पहाड़ोंको तोड़ देते हैं। छोटा पक्षी बड़े-से-बड़े वृक्षोंको हिला देता है। वस्तुतः जहाँ चेतनता है, वहीं बल होता है। जड वस्तुएँ निर्बल होती हैं। घोड़ा गाड़ी खींचता है, गाड़ीकी अपेक्षा घोड़ा बलवान् है। जडशरीर भी चेतनके सहारे चलता है। मरे हुए हाथीसे जीवित चींटी भी बलवान् है। चेतनोंमें भी मनुष्यकी शक्ति बहुत ही प्रबल है। एक शिशु भी हाथीका नियन्त्रण करता है। सिंह-जैसा क्रूर जन्तु भी मनुष्यकी इच्छाका अनुसरण करता है। जल, वायु, बिजली आदि भूतोंपर मनुष्यका अधिकार है। रेल, तार, वायुयान आदि मनुष्य- शक्तिके ही परिचायक हैं। मनुष्य सृष्टिमें भी रद्दोबदल करता रहता है। वह समुद्रको पार कर, पहाड़-जंगलको काटकर शहर बसा देता है, नदियोंपर बड़े-बड़े पुल बाँध देता है, उनके प्रवाहको बदल देता है, स्थलोंमें जल एवं जलमें स्थल बना देता है। फिर भी विचित्र सृष्टिमें कितने ही प्राणी मनुष्यसे भी कहीं अधिक बलवान् होते हैं। गृध्रकी दृष्टि और हिरणोंके दौड़के सामने मनुष्यकी शक्ति कमजोर है। बड़े बड़े वैज्ञानिक, बलवान्, बुद्धिमान् भी महाशक्तिमान् सर्वज्ञके सामने कुछ नहीं हैं। बड़े-बड़े बलवान् अन्तमें अपने-आपको प्राकृतिक शक्तियोंके सामने नगण्य पाते हैं। वस्तुतः निश्चयके आधारपर आशा होती है और आशाके आधारपर ही प्राणीकी प्रवृत्ति होती है।
८०६ मार्क्सवाद और रामराज्य कहा जाता है, ज्यालोजी ( भूगर्भशास्त्र ) ने पता लगाया है कि अमुक चट्टाने किस प्रकार और कब बनीं ? हिमालय-जैसा महान् पर्वत भी कभी-न-कभी उत्पन्न हुआ है । एक-एक वस्तु दूसरेकी अपेक्षा नयी है । वृक्षका फूल पत्तेसे नया है । पत्ता भी जड़से नया और जड़ भी उस मिट्टीकी अपेक्षा नयी है, जिसपर जड़ उत्पन्न हुई । कहा जाता है 'पृथ्वी' एक आगका गोला थी । जैसे अङ्गारोंपर ठंडा होनेके समय सिकुडन पड जाती है, उसी प्रकार पृथ्वीका गोला जब ठंडा होने लगा तो उसमें सिकुड़न पड़ गयी । ऊँचे स्थान पहाड़ हो गये, नीचे समुद्र बन गये । बहुत पदार्थोंकी उत्पत्ति हम देखते हैं । बहुतोंका हम विश्लेषण कर सकते हैं। वे इन्द्रियाँ जिनसे ज्ञान प्राप्त किया जाता है और वे पदार्थ जिनका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, दोनो ही कार्य हैं । जिन-जिन वस्तुओंका विश्लेषण हो सकता है, वह कार्य समझा जाता है । जिनका विश्लेषण या विभाजन नहीं हो सकता वे ही परमाणु हैं । आजकल यद्यपि कहा जाता है कि परमाणुका विभाजन वैज्ञानिक कर लेते हैं । परंतु जब परमाणुकी यही परिभाषा है, तब तो जिसका विश्लेषण हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं । जो लोग परमाणु न मानकर केवल शक्ति ही मानते हैं, उन्हे भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि शक्ति कभी वर्तमान जगत्के रूपमें परिणत हुई है । चाहे परमाणुओंसे, चाहे शक्तिसे, चाहे प्रकृतिसे, चाहे ब्रह्मसे जगत्की सृष्टि हुई और उस सृष्टिमें क्रम भी मान्य होने चाहिये । यह नहीं कि पहले फल हुआ फिर फूल हुआ । मालीको यह नियम मालूम होता है कि पहले अङ्कुर, फिर नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फलका आविर्भाव होता है । इसी तरह निम्बके बीज एव आमकी गुठलीसे तथा अन्यान्य विभिन्न बीजोसे विभिन्न ढंगके अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं । निम्बका बीज बोनेसे आमका फल नहीं लगता, यह नियम भी लोगोंको ज्ञात है । इसी तरह गेहूँ बोनेसे चनेकी उत्पत्ति नहीं होती । मनुष्य तथा प्राणियोंकी भी वृद्धिका नियम है । शैशव, यौवन, वार्धक्य अवस्थाएँ क्रमेण आती हैं । चिकित्सक चिकित्सालयोंमें शारीरिक नियमोंके आधारपर ही चिकित्सा करते हैं । पहाड़ एवं पहाड़ी नदियोंका निर्माण कैसे होता है, इनका किस ओर क्यों प्रवाह है, आदिके सम्बन्धमें भूगर्भके विद्वानोंका भी भूगर्भ-सम्बन्धी नियम प्रसिद्ध है । मनोविज्ञानकी जटिलता और भी विलक्षण है । यद्यपि मनकी गति बड़ी विलक्षण होती है, फिर भी मनोविज्ञानके नियम हैं ही । इसी तरह सभी शास्त्रोंके नियम हैं। इस तरह सृष्टिकी नियमबद्धता दिखायी देती है । इन नियमोंका विधायक और पालक कोई मान्य होना चाहिये । नियमकी दृष्टिसे सृष्टिमें एकता है । हर एक नियमका प्रयोजन भी होता है । लड़कोंका प्रतिदिन एक साथ विद्यालयमें जानेका नियम व्यर्थ नहीं होता । प्रयोजन ही कार्यको सार्थक बनाता है । संसारकी सभी वस्तुओ एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती
मार्क्स और ईश्वर ८०७ है। भले ही प्रयोजन समझमें न आये, परंतु है अवश्य । एक मशीनमें हजारों पुर्जे होते हैं, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई गोला, कोई टेढ़ा—उनमें परस्पर पर्याप्त भिन्नता है, परंतु बनानेवालेका उद्देश्य कार्यसिद्धि ही है। कपड़ा बुनना, आटा पीसना, पुस्तक छापना आदि इसी प्रयोजनसे प्रेरित होकर वैज्ञानिकोंने भिन्न-भिन्न पुर्जोंको बनाकर फिर सबको इस प्रकार मिलाया कि जिससे कार्यकी सिद्धि हो । पुर्जे न तो सब बराबर हैं, न एक-से हैं, न सबके साथ एक-से जुड़े हुए हैं। सब असमान होते हुए भी एक उद्देश्यपूर्तिके लिये जुड़े हुए हैं। उनमें बहुत-से कल- पुर्जे छोटे एव भद्दे हैं। उनके स्थानपर अच्छे एव सुन्दर पुर्जे हो सकते हैं, परंतु कल चलानेमे जिसका उपयोग नहीं, वह कितना भी सुन्दर हो, व्यर्थ ही है। इसी तरह जगत् एक महाप्रयोजनके लिये निर्मित है। इसकी छोटी-से-छोटी वस्तुएँ एवं घटनाएँ भी निष्प्रयोजन नहीं हैं। राबर्ट क्रिप्सके अनुसार जिस मण्डलका हमारी पृथ्वी एक अवयवमात्र है, वह अति विशाल, विचित्र तथा नियमित है। जिन ग्रहों, उपग्रहोंसे इसका निर्माण है उनका भी परिमाण बहुत विस्तृत है। हमारी पृथ्वी ही सूर्य-चन्द्र आदिसे इस प्रकार सम्बन्धित है कि बीज बोने, खेत काटनेके समयोंमें बाधा नहीं पडती । समुद्रके ज्वारभाटे कभी हमें धोखा नहीं देते। करोड़ों मण्डलोंमेंसे सूर्यमण्डल एक है। बहुत-से तो इससे असंख्यगुने बड़े हैं। फिर ये करोड़ों, अरबों सूर्य एव तारागण जो आकाशमें बिखरे हैं, परस्पर एक-दूसरेसे ऐसे सम्बद्ध तथा गणितके गूढतम नियमोंके इतने अनुकूल हैं कि उनसे प्रत्येककी रक्षा होती है और प्रत्येक स्थानमे साम्य तथा सौन्दर्य दिखायी देता है। प्रत्येक ग्रह दूसरेके मार्गपर प्रभाव डालता है। प्रत्येक कोई-न-कोई ऐसा कार्य कर रहा है, जिसके बिना न केवल वही किंतु समस्त मण्डल नष्ट हो सकता था। यह समस्त मण्डल बड़ी विलक्षणतासे बना हुआ है। जो घटनाएँ देखनेमे भयानक और विघ्नरूप प्रतीत होती हैं, वे वस्तुतः उसे नष्ट होनेसे रोकती एव विश्वकी दृढताका साधक होती हैं। क्योकि वे परस्पर अपनी शक्तियोंका इस प्रकार व्यय करती हैं कि एक नियत समयमें उनमें सहयोग हो जाता है। यह सहयोग ही विशाल जगत्के विशाल प्रयोजनका परिचायक है। एक छोटा-सा पुष्प जहाँ मनुष्योंकी आँखोंको तृप्त करता है, उसका सुगन्ध घ्राणोंको आनन्द देता है, वैद्य लोग उसका औषधमें भी प्रयोग करते हैं, चित्रकार उससे चित्रकारी सीखते हैं, रँगरेज रंग निकालते हैं, कवि काव्यमें उससे सहायता लेते हैं। भ्रमर उसका रसास्वादन करता है, शहदकी मक्खियाँ उसमे शहद निकालती हैं, तितलियाँ उन फूलोपर बैठकर अलग आनन्द लेती हैं। उसके बहुत-से ऐसे भी प्रयोजन हैं, जिन्हें मनुष्य नहीं जानता। इतना प्रयोजन सिद्ध करके भी वृक्षकी संततिरक्षाके लिये वह बीज उगाता है। यह एक छोटे-से फूलका कार्य है।
इसी प्रकार संसारकी सभी वस्तुओंके अनेक विशाल प्रयोजन हैं । संसार कितना विशाल है ? समुद्र, पहाड़, पृथ्वी--पृथ्वीसे बहुत बड़ा सूर्य, और फिर करोड़ों सूर्य, अरबों तारे वेदान्तमतानुसार पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशादि—सब उत्तरोत्तर एक दूसरेसे दस-दस गुने बड़े हैं । फिर ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड मायाके एक अंशमें हैं’ । वह माया भगवान्के एक अशमें ऐसी प्रतीत होती है, जैसे महा- काशके एक प्रदेशमें बादलका छोटा-सा टुकड़ा । स्थूलताके साथ ही संसारमे सूक्ष्मताका भी अत्यन्त महत्त्व है । जो जल आज बर्फ या नीलमणिके रूपमें स्थूलरूपसे उपलब्ध हो रहा है, वही कभी बादल और उससे भी पहले सूर्यकी रश्मियोमे था । सूर्य-रश्मिका वह नगण्य कण जिसे परमाणु कहा जा सकता है, उसका एक पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा था । उसके अल्पाशमें वायु और वायुके अल्पाशमें प्राण, प्राणके अल्पांशमें मन और मनमे ब्रह्माण्ड था । फिर ब्रह्माण्डके भीतर अनन्तकोटि प्राणी और मन थे, उन मनोंमें फिर भी उसी तरह ब्रह्माण्डकी सत्ता थी । इस तरह एक सूक्ष्म वटबीज-कणिकामे महान् वटवृक्षका अस्तित्व और उस वटवृक्षमें अपरिगणित बीज-कणिका और उन कणिकाओमे अनन्त वटवृक्षका अस्तित्व एक साधारण सी बात जँचने लगती है । इसी तरह विश्वके छोटे-छोटे नियमोंको देखते हैं, तो नियमोका समूह उसी ढंगसे एक विशाल नियम बन जाते हैं, जैसे छोटे-छोटे कणोंका समूह एक पहाड़ । समुद्र भी जलकणोंका समुदाय ही है । यद्यपि मनुष्यकृत वस्तुओंमें भी बड़ी-बड़ी विलक्षणता दिखायी देती है । बड़े-बड़े विशालकाय पुल, दुर्ग, बाँध चकित कर देते हैं । विद्युत्के विचित्र चाकचिक्य चन्द्र-सूर्यसे होड करते हैं । वायुयानका चमत्कार भी कुछ ऐसा ही है । फिर भी यह सब स्वाभाविक ईश्वरीय वस्तुओंका एक छोटा-सा अनुकरणमात्र है । कितना भी बड़ा विशाल एवं नियमबद्ध संसार कार्य ही है, इसकी कभी-न-कभी सृष्टि हुई है, यह मानना पड़ता है । किसी भी कार्यके लिये उपादान, निमित्त एव साधारण कारण अवश्य होते हैं । जैसे एक घटका मिट्टी उपादान, कुलाल निमित्त एवं देशकाल आदि साधारण कारण होते हैं । साधारण भी क्रिया छोटी-छोटी अनेक क्रियाओका समुदाय ही होती है । एक घट-निर्माणरूप क्रियामें कितनी ही चेष्टाओंका समुदाय है । संसारके अनन्त क्रिया- जालोंमें बहुत-सी क्रियाएँ मनुष्यकृत होती हैं, जैसे घट, पट, मठ आदिका बनाना, रोना, हँसना, चलना आदि । जब घटका निर्माण मनुष्यद्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं, तो किसी भी घटको देखकर उसका निर्माता कोई मनुष्य होगा, यह अनुमान कर लिया जाता है । इसी तरह किसी भी कार्यको देखकर उसके कर्ताका अनुमान होना स्वाभाविक है । बहुत-से कार्य हैं जिनका मनुष्यद्वारा निर्माण सम्भव नहीं,
जैसे वृक्षका उगना, सूर्यका निकलना, भूकम्पका आना आदि। यह सभी क्रियाएँ है, इनका भी कोई कर्ता होना आवश्यक है। नास्तिक मेजका बनाने- वाला बढ़ई तो अवश्य मानता है, परंतु वृक्षो, पहाड़ोंको बनानेवाला कर्ता आवश्यक नही मानता। लोटेका बनानेवाला ठठेरा जरूरी है परतु नदी, समुद्रके लिये कर्ता आवश्यक नहीं। ससारकी सभी क्रियाएँ दो ही प्रकारकी है। एक प्राणिकृत, दूसरी अप्राणिकृत। सिद्धकोटिकी वस्तुएँ दृष्टान्तकोटिमे आती है, साध्यकोटिकी नहीं। दृष्टान्त वही होता है, जो दोनो पक्षोको मान्य होता है। सूर्य, चन्द्र, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि सावयव होनेसे कार्य हैं। आस्तिक कह सकता है कि जैसे मेज आदि कर्तासे निर्मित होते हैं, वैसे ही कार्य होनेसे सूर्य आदि भी किसी (ईश्वर) कर्तासे निर्मित हैं। यहाँ मेजका दृष्टान्त आस्तिक-नास्तिक दोनोको ही मान्य है। नास्तिक कहता है कि चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके कर्ता आवश्यक नहीं हैं, जैसे नदी बहनेके लिये कोई कर्ता आवश्यक नहीं होता। परतु नास्तिकका दृष्टान्त सिद्धकोटिमे नहीं है; किंतु साध्यकोटिमें है। आस्तिकके लिये नदीका बहना, सूर्यका निकलना — दोनों ही एक कोटिमें हैं। जैसे सूर्य, चन्द्र आदिका उगना ईश्वरप्रेरणापूर्वक होता है, उसी तरह नदीका बहना भी ईश्वरकृत ही है। चार्वाकमतानुयायी कहते हैं कि 'अविनाभावसम्बन्ध दुर्ज्ञेय होता है' अतः अनुमानादि प्रमाण मान्य नहीं हैं। धूमादि ज्ञानके अनन्तर जो अग्न्यादिमें प्रवृत्ति होती है, वह प्रत्यक्षमूलक है अथवा भ्रान्तिसे ही समझनी चाहिये। क्योंकि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है—यह जानना दुष्कर है, क्योकि सर्वदेश, सर्वकालके धूम-वह्निका जिसे ज्ञान हो, वही ऐसी बात कह सकता है। परतु किसी भी मनुष्यको सर्वदेश- कालके धूम और वह्निका ज्ञान होता ही नही। फिर वह कैसे कह सकता है कि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ वह्नि होता है। कतिपय स्थलमें तो यह देखा गया है कि जहाँ-जहाँ वह्नि है, वहाँ-वहाँ धूम होता है, पर अग्नितप्त लौहपिण्डमें व्यभिचार दीखनेसे व्यभिचार निश्चित हो जाता है।' परतु चार्वाकका यह कहना भी तभी सम्भव होता है जब कि अनुमानादि प्रमाण मान्य हो, क्योंकि प्रत्यक्षसे भिन्न अनुमानादि प्रमाण नहीं हैं, यह कहना भी अज्ञ, संदिग्ध, विपर्यस्त तथा जिज्ञासुके प्रति ही उचित है। जिस किसीके प्रति वचन प्रयोगको पागलपनका ही परिणाम समझा जाता है। दूसरोंका अज्ञान, संशय, भ्रान्ति या जिज्ञासा दूसरेको प्रत्यक्ष प्रमाणसे कभी भी विदित नहीं हो सकती। अतः उनके वचनों, मुखाकृति या व्यवहारसे अन्यके संशय अज्ञान आदिका अनुमानादिसे बोध होता है तथा अज्ञान-संशयादि मिटानेके लिये वचनप्रयोग सार्थक होता है। चार्वाक अङ्गनालिङ्गनजन्य सुखको पुरुषार्थ कहता है। इससे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सुख और स्त्रीगमनका अविनाभाव सम्बन्ध है। यदि स्त्रीगमन
८१० मार्क्सवाद और रामराज्य
और सुखका अविनाभाव सम्बन्ध न हो तो उस सुखको पुरुषार्थ कैसे कहा जा सकता है ? इसी प्रकार क्षुधा-निवृत्तिके लिये नियमतः भोजनमें प्रवृत्ति भी सिद्ध करती है कि प्राणी अनुमान-प्रमाण मानकर ही क्षुधा-निवृत्तिके लिये भोजन- निर्माणमें संलग्न होता है । उसी प्रकार कृषि, व्यापार आदि सभी कार्योंमें आनु- मानिक कार्यकारणभावका निश्चय करके ही प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है । बिना अनुमान-प्रमाण अङ्गीकार किये आस्तिक, नास्तिक, चार्वाक ही क्या—पशुतककी भी कोई प्रवृत्ति नहीं हो सकती । पूर्वकी प्रवृत्तियोंसे लाभ देखकर तादृश प्रवृत्तियोंसे लाभका अनुमान करके ही प्राणी प्रवृत्त होता है । अनुमान बिना माने प्रत्यक्ष भी व्यर्थ हो जाता है । अनुमानके आधारपर अप्राणिकृत कार्योंका भी कोई कर्ता अवश्य सिद्ध होता है । कारण, सिद्धकोटिके जितने भी दृष्टान्त हैं, सभी कर्तापूर्वक ही हैं । अतः जैसे प्राणिकृत क्रिया कर्तासे होती है, वैसे ही अप्राणिकृत क्रिया भी कर्तासे ही सिद्ध होती है । प्राणिकृत, अप्राणिकृत क्रियासे भिन्न कोई क्रिया है ही नहीं । यदि बिना घड़ीसाजके घड़ी नहीं बन सकती, बिना बढ़ईके मेज नहीं बन सकती तो यह भी मानना ही चाहिये कि बिना चेतनसत्ताके चन्द्र, सूर्य, पहाड़, नदियाँ आदि भी नहीं बन सकतीं । कई लोग 'क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्'--पृथ्वी, वृक्ष आदि सकर्तृक हैं, कार्य होनेसे घटादिके तुल्य—इस अनुमानमें शरीरजन्यत्वरूप उपाधि दोष बतलाते हैं । अर्थात् जहाँ-जहाँ शरीरजन्यता होती है, वहाँ-वहाँ सकर्तृकता होती है । घटादि शरीरजन्य हैं, अतः सकर्तृक हैं; परंतु कार्यत्व तो पृथ्वी-अङ्कुरादिमें भी होता है, पर वहाँ शरीरजन्यता नहीं है । साध्य-व्यापक, साधनाव्यापक धर्म- को ही उपाधि कहा जाता है । इस तरह उनके मतानुसार कार्यत्वहेतु सोपाधिक होनेसे साध्यसिद्धिमें समर्थ नहीं होगा । परंतु यह ठीक नहीं है; क्योकि उपाधिके द्वारा या तो व्याप्ति-व्यभिचारका अनुमान होता है या पक्षमें उपाध्यभावसे साध्याभावका अनुमान होता है । तभी प्रकृत अनुमान दूषित समझा जाता है । इस तरह यहाँपर शरीराजन्यत्वरूप उपाध्यभावसे सकर्तृकत्वाभावका अनुमान करना पड़ेगा । परंतु उसमें शरीर विशेषण व्यर्थ होगा । जब अजन्यत्वमात्रसे सकर्तृकत्वाभाव सिद्ध होता है तो शरीर विशेषण व्यर्थ ही है । पृथ्वी, वृक्ष आदिमें शरीराजन्यता होनेपर भी अजन्यता नहीं है । अतः अजन्यता न होनेसे सकर्तृकत्वा- भाव नहीं सिद्ध हो सकता । सुतरां कार्यत्वरूप हेतुसे पृथ्वी-वृक्षादिमें सकर्तृकत्व- सिद्धि निर्वाध है । कई लोग पौर्वापर्यको ही कार्य-कारणभावके स्थानपर बिठलाते हैं । उनके अनुसार सदा पूर्वमें रहनेवाला कारण और सदा पश्चात् होनेवाला कार्य है; परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि अन्धकार सदा सूर्योदयके पूर्व होता है, तो भी अन्धकार सूर्योदयका
कारण नहीं माना जाता, रविवारसे पूर्व सदा शनिवार रहता है, फिर भी वह रविवारका कारण नहीं होता । कार्य कारणसे पीछे होता है, इतना ही नहीं, किंतु कारणके द्वारा होता है । तर्कसंग्रहकारकी दृष्टिसे उपादानगोचरापरोक्ष ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिवाला चेतन ही कर्ता होता है, जैसे घटका निमित्तकारण कुलाल है, वही घटका कर्ता है । उसे घटके उपादानकारण मृत्तिकाका अपरोक्षनिकटतम ज्ञान है, उसकी चिकीर्षा है, घटनिर्माणकी इच्छा है और उसमे घट बनानेका प्रयत्न है । बिना ज्ञानके इच्छा और बिना इच्छाके कृति नहीं हो सकती । इस तरह 'जानाति इच्छति अथ करोति' किसी चीजको प्राणी पहले जानता है, फिर इच्छा करता है और फिर तद्विषयक प्रयत्न करता है । इस तरह ज्ञान, इच्छा और कृति जहाँ होती है, वही कर्ता होता है । अतः भले ही घटसे मिट्टी गिरती हो फिर भी वह मिट्टी गिरनेका कारण नहीं समझा जाता । प्रत्येक कार्यको कर्ताकी अपेक्षा होती है, ये नियम सभीके मस्तिष्कपर शासन करते हैं । अतः जहाँ किसी कार्यमें प्रत्यक्ष ज्ञान एवं इच्छाका सम्बन्ध नहीं दिखायी पड़ता वहाँ प्राणी अदृष्ट इच्छाशक्तिकी कल्पना करता है । किसी पुल या किलाको देखकर प्राणी यह अवश्य सोचता है कि किसीने अपनी ज्ञानेच्छा तथा कृतिसे इसे बनाया है । इसी तरह एक प्रफुल्लित कमलको भी देखकर बुद्धिमान् अवश्य सोचता है कि यह इतनी सुन्दर वस्तु बिना किसीकी इच्छा-कृतिके कैसे सम्पन्न हो सकती है ? बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता, इस दृष्टिका सृष्टिसे भी कारण होना अनिवार्य है । अतः सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ज्ञानेच्छा-कृतिसे ही सृष्टिकी रचना उचित है । कई लोग सृष्टिको आकस्मिक कहते हैं, परंतु वस्तुतः बिना हेतुके कोई भी घटना कभी हो ही नहीं सकती । यदि विभिन्न शक्तियोंद्वारा होनेवाले कार्योंके आकस्मिक सम्बन्धमात्रको आकस्मिक कहा जाय, जैसा कि काकतालीयन्याय कहलाता है ( काकका वृक्षपर बैठना-काकके प्रयत्नका फल है, तालफलका पतन अपने कारणोंसे सम्पन्न हुआ, परंतु दोनोंका मेल आकस्मिक हो गया ) तो इस पक्षमें निर्हेतुक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता, भले सृष्टिकी विभिन्न घटनाओका मेल कभी आकस्मिक भी हो तो भी सृष्टिका कोई कार्य निर्हेतुक नहीं सिद्ध होता । वस्तुतस्तु मनसे भी अचिन्त्य रचनारूप संसारका निर्माण सर्वज्ञ सर्व- शक्तिमान् चेतन कर्ताके बिना उपपन्न नहीं हो सकता और उस सर्वज्ञका कोई भी कार्य असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । कुछ लोग स्वयम्भू प्रकृति या उसके परमाणुओंमे ही विश्वका निर्माण मानते हैं, किंतु सर्वज्ञ ईश्वरकी शक्ति, इच्छा एवं कृतिके बिना प्रकृति या परमाणुसे ससारका निर्माण कैसे हो सकता है ? बिना बुद्धि- प्रबन्धके परमाणु अपने-आप इतने विलक्षण ससारको बना सकते हैं, इससे बढ़कर युक्तिशून्य कोई बात हो नहीं सकती । किसी नास्तिक पितासे जब आस्तिक पुत्रने
कहा कि जो ससारको बनानेवाला है, वही परमेश्वर है । तो पिताने कहा कि परमाणुओके अपने आप ही एकत्रित हो जानेसे संसार बन जाता है । इसके लिये कोई सर्वज्ञ ईश्वर क्यो माना जाय ? दूसरे दिन पुत्रने बहुत सुन्दर हस्ती, अश्व, शुक, पिक, मयूरोके चित्र बनाकर उसके सामने कुछ विभिन्न रङ्गकी पेन्सिले रख दी । जब पिताने चित्रोका निर्माता पूछा तो पुत्रने कहा कि इन्हीं पेन्सिलोके परमाणु उड-उडकर कागजपर एकत्रित हो गये, उन्हींसे ये चित्र बन गये । पर पिताने इसे स्वीकार नही किया । तब पितासे पुत्रने कहा कि यदि परमाणुओके उड़- उड़कर एकत्रित हो जानेपर ऐसे चित्र भीनही बन सकते तो चन्द्रमण्डल और सूर्य- मण्डल, भूधर, सागर, मनुष्य, पशु आदि विलक्षण वस्तुएँ बुद्धिके सहयोग बिना केवल परमाणुओसे कैसे बन सकती है ? अतएव ऐसे-ऐसे अनुमान ईश्वर-सिद्धिमें उपस्थित किये जा सकते हैं । ( १ ) ससारका व्यवस्थित रूप देखकर अनुमान किया जा सकता है कि जगत्की व्यवस्था प्रशास्तृपूर्विका है, व्यवस्था होनेके कारण, राज्य-व्यवस्थाके समान । ( २ ) लोकोपकारी सूर्य-चन्द्रादिका निर्माण किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा ही हो सकता है । यद्यपि आजकल लोग सूर्य-चन्द्रादिको ईश्वरनिर्मित न मानकर स्वतःसिद्ध या प्रकृतिनिर्मित मानते हैं; परंतु यह असङ्गत है, क्योंकि दीपकादि बुद्धिमान् चेतनद्वारा ही बनाये जाते हैं। यह दृष्टान्त वादी-प्रतिवादी उभय- सम्मत है, परतु कोई वस्तु स्वतःसिद्ध है—इसमें उभय-सम्मत कोई दृष्टान्त नही है, क्योकि ईश्वरवादी सभी पदार्थोंको ईश्वरकर्तृक मानता है । प्रकृति भी जड होनेसे स्वतन्त्रकर्त्री नही हो सकती । अतः सूर्य, चन्द्र किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा निर्मित हैं, प्रकाश होनेके कारण, प्रदीपके समान । जैसे व्यवहारके लिये दीपक होता है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादि भी व्यवहारोपयोगी हैं । ( ३ ) सूर्य-चन्द्रकी विशिष्ट चेष्टा देखकर भी इसी तरह उनके नियन्ताका अनुमान होता है—'सूर्य-चन्द्र नियन्तृपूर्वक हैं, विशिष्ट चेष्टावाले होनेके कारण, भृत्यादिके समान । जैसे भृत्यकी नियमित प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादिकी भी नियमित प्रवृत्ति होती है ।' उपर्युक्त अनुमानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरसे नियन्त्रित होनेके कारण ही सूर्य-चन्द्र स्वयं ईश्वर और स्वतन्त्र होते हुए भी उदयास्तमय एव वृद्धि-क्षयसे युक्त होकर प्रकाशादिकार्यमें संलग्न रहते है । ( ४ ) पृथिवीके विधारकके रूपमें भी प्रयत्नवान् ईश्वरकी सिद्धि होती है । विवादास्पद पृथिवी प्रयत्नवान्के द्वारा विधृत है, सावयव, गुरु, संयुक्त होनेपर भी अस्फुटित, अपतित, अवियुक्त होनेके कारण, हस्तन्यस्त पाषाणादिके समान ।
मार्क्स और ईश्वर ८६३ यदि किसी चेतनमे धारण न हो तो उसमें पतन स्फुटन होना अनिवार्य होता, बिना किसी धारकके कोई भी गुरु पदार्थ टिक नहीं सकता। परस्परकर्षणसे भी स्थिति असम्भव है, क्योंकि स्थिति और गति अन्योन्याश्रित नहीं होतीं। कहा जाता है, मानवी मस्तिष्ककी सहायता बिना भी यदि कोई अंग्रेजी भाषाके अक्षरोंको उछालता रहे तो कभी शेक्सपीयरका नाटक निर्मित हो सकता है। यदि थोड़ी देरके लिये यह मान भी लिया जाय तो भी संसारके विलक्षण प्रपञ्चका विधान बिना सर्वज्ञ बुद्धिके नहीं हो सकता। भले ही किन्हीं अक्षरोंको अनन्त बार उछालो, परंतु उनके द्वारा विचार व्यक्त हो सकना असम्भव ही है। विचार व्यक्त करनेकी बात तो दूर रही, सही-सही एक पंक्तिका भी निर्माण असम्भव है। फिर अक्षरोंको उछालनेवाला भी कोई चेतन ही होता है। फिर बिना चेतनके जड़-परमाणुओंसे विश्वका निर्माण कहाँतक सम्भव है? फिर क्या आजतक कोई अक्षरोंको उछाल-उछालकर किसी छोटे-से ग्रन्थका भी निर्माण कर सका? संसारमें रोटी बनानेसे लेकर मकान, पुल, दुर्ग आदिका निर्माण बिना बुद्धिके अपने-आप ही ईंट, चूना, पत्थर, लोहा-लकड़ आदि कर लेते हों, यह नहीं देखा जाता। फिर अकस्मात् ही परमाणुओंके द्वारा संसारका निर्माण और अकस्मात् ही परमाणुओंका निष्क्रिय हो जाना या संसारका नष्ट हो जाना आदि कैसे संगत होगा? फिर यदि परमाणुके बिना सर्वज्ञ चेतनके प्रयत्नसे अपने-आप ही सूर्य, समुद्र, नदी, पर्वत बन सकते हैं, तब अन्य उपयोगके दुर्ग, पुल, गृहादिका निर्माण भी उसी तरह क्यों नहीं होता? तदर्थ मनुष्योंको प्रयत्न क्यों करना पड़ता है? यदि पहाड़ अकस्मात् बन सकता है; तब कोई पुल या किला अपने-आप क्यों नहीं बन सकता? स्वभाववादी स्वभावसे ही सृष्टिका निर्माण मानता है, परंतु स्वभाव यदि शक्तिशाली कोई चेतन है तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ। यदि सृष्टि नियमसे ही संसार- का निर्माण माना जाय तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि नियमके निर्माता प्रयोक्ता बिना नियम अकिञ्चित्कर ही होता है। भूगर्भतत्त्ववेत्ता पुरानी वस्तुओंको देख- कर बुद्धिमानोंकी कारीगरीका अनुमान करते हैं। महेन्जोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईमें मिलनेवाली वस्तुओंके आधारपर सभ्यताकी कल्पना की जाती है। यदि सब वस्तुएँ स्वभावसे ही बनती हैं, तब उन कल्पनाओंका कोई स्थान ही नहीं रह जाता। वस्तुतः किसी प्रकारके नियम ही सिद्ध करते हैं कि कोई समझदार पूर्वा- परदर्शी बुद्धिमान् ही नियम बनाता है और वही नियामक भी है। नियामक बिना नियमोंका कुछ मूल्य भी नहीं होता। अतः नियमोंके रहते हुए भी ज्ञानयुक्त उपयुक्त चुनावसे ही सुप्रबन्ध होता है। मिट्टी जलादिसे घट बननेका नियम है सही पर जबतक कोई कुम्भकार नियमोंके अनुसार कार्य नहीं करेगा तबतक घट-निर्माण
८३४ मार्क्सवाद और रामराज्य
असम्भव ही है । धरणि, अनिल, जलके संयोगसे बीजोंके अङ्कुरित होनेका नियम है तथापि जबतक किसान उन नियमोंका प्रयोग करके काम नहीं करेगा तबतक गेहूँ-यवादिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । पृथिवीकी आकर्षणशक्ति भले ही प्रत्येक परमाणुपर शासन करती रहे तथापि सहयोग एवं सुदृढताके साथ प्रबन्ध बिना उसका कोई भी सदुपयोग नहीं हो सकता । आस्तिकोंका कहना है कि जिसने हंसके अङ्गमें शुक्लरंगका निर्माण किया, शुकके अङ्गका हरा रंग बनाया, मयूरोंको चित्रित किया और फूलोंपर बैठनेवाली तितलियो- को चमकीली साड़ी बनाकर पहनाया—वही ईश्वर है। वही सबको वृत्ति देता है— येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः । मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥ ( हितोपदेश १ । १७९ ) परन्तु स्वभाववादियोका कहना है कि— शिखिनश्चित्रयेत्को वा कोकिलान् कः प्रकूजयेत् । स्वभावव्यतिरेकेण विद्यते नात्र कारणम् ॥ ( चार्वाकदर्शन ) 'मयूरोंको कौन चित्रित करता है ? कोकिलोको कौन मधुरालाप सिखाता हे ? जैसे अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता, वायुमें वहनशीलता स्वभावसे ही होती है, उसी तरह स्वभावसे ही शुक, हंसादिके रंग तथा मयूरादिका चित्रण होता है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं कि यदि परमाणुओंका स्वभाव सृष्टिरचना है, तब कभी सृष्टि-विघटन नहीं होना चाहिये । यदि कहा जाय कि किन्हींका स्वभाव मिलनेका है, किन्हींका विघटनका है, तो भी जैसे परमाणुओंका बाहुल्य होगा, तदनुकूल ही काम भी होगा । परंतु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय भी यथा- समय होता है। यह सब बिना सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके नहीं हो सकता । स्वभाव यदि असत् है, तो उसमें कार्यकारणक्षमता नहीं हो सकती । यदि सत् है तो भी चेतन है या अचेतन । यदि चेतन है तो नामान्तरसे ईश्वर ही हुआ । यदि अचेतन है तो उसमें भी विलक्षण कार्यकारिता नहीं हो सकती । अचेतन वस्तु स्वतः कोई कार्य नहीं कर सकती । यदि चेतनके सहारे कोई कार्य कर सके तो भी एक ही प्रकारका कार्य कर सकेगी । चेतनमें ही यह स्वतन्त्रता होती है कि वह कार्य करे, न करे, अन्यथा करे । कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं जो समर्थ होता है वही कर्ता होता है। घड़ीकी सूई स्वयं नहीं चल सकती । जब चेतन घड़ीसाजके प्रयत्नसे सूई चलती है तो वैसे ही चलती रहती है। सूईयोंको यदि पीछे चलाना होता है तो फिर किसी मनुष्यकी अपेक्षा पड़ती है। घड़ी या सूई स्वयं आगे-पीछे चलने, न चलने, बंद होने और फिर चल पड़नेमे स्वतन्त्र नहीं। संसारमें भिन्न-भिन्न स्वभावकी भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं। परंतु वे सब अपने-आप स्वभावतः भिन्न
पदार्थोंका निर्माण नहीं करते । अग्नि, लकड़ी, पानी, चीनी, आटा, घी, मिर्च आदि भिन्न-भिन्न पदार्थ भिन्न स्वभावके हैं। सब मिलकर स्वयं पक्वान्न नहीं बन सकते । वहाँ किसी चेतनकी अपेक्षा होती है । उसी तरह बिना किसी सर्वज्ञ चेतनके नारंगी, संतरे तथा आम्रका फल, गुलाबका मनोरम पुष्प अवश्य पञ्च- भूतोंका ही परिणाम है । फिर भी अपने आप पृथ्वी, जल, तेज मिलकर रूठे पुष्प या फलके रूपमें स्वयं परिणत हो जाते हों, यह न देखा ही जाता है न सम्भव ही है। किंतु कोई कार्य प्राणियोंद्वारा सम्पन्न होते हैं तो कोई सर्वज्ञ चेतन ईश्वरके द्वारा । विज्ञानके अनुसार 'स्वाभाविक शक्तियोंके द्वारा प्रपञ्च-निर्माणका आरम्भ या द्रव द्रव्यका गाढ़ा होकर पृथ्वी बनना आदि बिना किसी चेतनकी इच्छा और कृतिके सम्भव नहीं हो सकता ।' मान लिया, अग्नि और जल इंजिनमे पहुँचकर अद्भुत काम करने लगते हैं, परंतु इंजिन बनाकर उनमें डालकर भापद्वारा विभिन्न कार्य करनेका प्रबन्ध बिना चेतनके सम्पन्न नहीं होता । डार्विन, हक्सले, हेकल, लैमार्क आदिके विकाससम्बन्धी विचारपर इसकी पहले पर्याप्त समालोचना हो चुकी है । आल्फ्रेड रसेलवालेस वैज्ञानिक डार्विनका एक मुख्य सहयोगी था । डार्विनके पश्चात् भी वह विकासवादका ही पोषक रहा । उसने अपने अर्ध शताब्दीके अन्वेषणके पश्चात् 'दि वर्ल्ड आफ लाइफ' पुस्तककी भूमिकामें लिखा है कि मैने उन मौलिक नियमोंकी सरल तथा गम्भीर परीक्षा की है, जिनको डार्विनने अपने अधिकारके बाहर समझकर जान बूझकर अपने ग्रन्थोंमें नहीं लिखा । जीवन क्या है, उसके कौन-कौन कारण हैं और विशेषकर जीवनमे वृद्धि और सतानोत्पत्तकी जो विचित्र शक्तियाँ हैं, उनका क्या कारण है ? मै यह परिणाम निकालता हूँ कि इन पक्षियों, कीडोंके रंग आदिसे पहले तो एक उत्पादक शक्तिका परिचय होता है, जिसने प्रकृतिको इस प्रकार बनाया कि जिससे आश्चर्यजनक घटनाएँ सम्भव होती हैं। दूसरे एक संचालक बुद्धि भी मालूम पड़ती है जो वृद्धिकी प्रत्येक अवस्थामें आवश्यक होती है । विकासवादी ग्रन्थोंसे भिन्न भिन्न पौधो और कीट पतंग आदिके शरीरोंकी बनावट उनके स्वभाव, उनकी रीतियो की जानकारी होती है । डार्विनके पुत्र प्रोफेसर जार्ज डार्विनने १६ अगस्त सन् १९०५ मे कहा था कि जीवनका रहस्य अब भी उतना ही निगूढ है जितना कि पहले था । प्रो० पैट्रिक गेडीसने कहा है कि हम नहीं जानते कि मनुष्य कहाँसे आया, कैसे आया ? यह मान लेना चाहिये कि मनुष्य-विकासके प्रमाण संदिग्ध है, साइंसमें उनके लिये कोई स्थान नहीं है। ९ जून १९०५ में विकासवादियोंके वाद विवादके सम्बन्धमे 'टाइम्स'ने लिखा था कि 'ऐसी गड़बड़ पहले कभी नहीं देखी गयी ।' तमाशा यह कि लोग अपनेको विज्ञानका प्रतिनिधि बताते हैं । यद्यपि कुछ
कुछ भी शेष नहीं रहा । केवल युद्धक्षेत्रमें कुछ टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मनुष्यकी बन्दरसे उत्पत्तिके सम्बन्धमें सर जे० डब्लयू० डौसन कहते हैं—'बन्दर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका विज्ञानको कुछ पता नहीं है। मनुष्यकी प्राचीन तम अस्थियाँ भी मनुष्यकी सी हैं। इनसे उस विकासका कुछ भी पता नहीं लगता, जो मनुष्यशरीरके पहले हुआ है। प्रोफेसर औवेनका कहना है कि मनुष्य अपने प्रकारकी एकमात्र जाति है और अपनी जातिका एकमात्र प्रतिनिधि है। सिडनी कौलेटने अपनी पुस्तकमें लिखा है कि मनुष्य उन्नतिके बदले अवनतिकी ओर जा रहा है। सर जे० डब्लयू० डौसनने लिखा है कि 'मनुष्यकी आदिम अवस्था सबसे उच्च थी'। कुछ भी हो, साइंसके आधारपर एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वरकी सत्ताका अपलाप नहीं हो सकता । संसारमें अनेक प्रकारके नियम उपलब्ध होते हैं। उन्हींका अनुसरण करके प्राणी अपना-अपना काम चलाते हैं। नियमोंका निर्माता एवं पालक ईश्वर है। अन्य प्राणी नियमोंके अनुचर हैं। जो वस्तुएँ बिना विज्ञानके ही नियमपराधीन हैं। परंतु चेतन उन नियमोंको चुनकर उनके अनुसार काम करता है। जैसे खेतीका नियम पालन करनेसे गेहूँ, जौ पैदा किया जा सकता है। वायु- यान बनानेका नियम पालन करनेसे वायुयान बनाया जा सकता है; परंतु काष्ठादि नियमोंका चुनाव नहीं कर सकते । नियमोंका सञ्चालन करनेवाली शक्ति ईश्वर ही है, उसका प्रभाव सृष्टिमें व्यापक है। नैयायिक, वैशेषिक आदि ईश्वरको निमित्तकारण मानते हैं। परंतु नैयायिक आदि तो जीवात्माओंको भी व्यापक ही मानते हैं। आधुनिक कुछ लोग शङ्का करते हैं कि निमित्तकारण या कर्ता किसी कार्यमें व्यापक नहीं रहता । घड़ीसाज घड़ीमें व्यापक नहीं होता, मकान बनानेवाला मकानमें और कोट-पतलून बनाने- वाला दर्जी कोट-पतलूनमें भी व्यापक नहीं होता; फिर यदि परमात्मा संसारका निमित्तकारण है तो वह सम्पूर्ण कार्यमें कैसे व्यापक हो सकता है ? उसका आधु- निक ढङ्गके लोग समाधान करते हैं कि लौकिक क्रियाओंका कुलाल आदि निमित्त कारण अवश्य हैं, परंतु वह एक हदतक ही हैं, जैसे घड़ीसाजने घडी अवश्य बनाया, परंतु लोहेके परमाणुओंको जोड़कर रखना घड़ीसाजके हाथकी बात नहीं है। उसका निमित्तकारण ईश्वर ही होता है। संसारमें व्यापक अणु-अणु, परमाणु-परमाणु- की जो क्रियाएँ हैं, वे बहुत सूक्ष्म हैं। वे व्यापक ईश्वरके बिना उत्पन्न नहीं हो सकती । अतः ईश्वरको व्यापक मानना उचित ही है, परंतु वेदान्ती तो ईश्वरको ही अभिन्ननिमित्तोपादानकारण मानते हैं। सचमुच निमित्तकारणका कार्यमें व्यापक होना तर्कसङ्गत नहीं है। यदि निमित्तत्व व्यापकताका प्रयोजक हो तो कुलालादिमें भी व्यापकता होनी ही चाहिये, परंतु यह दृष्टविरुद्ध है। भले ही परमाणु, संयोग आदिमें कुलाल, घड़ीसाज आदि निमित्तकारण न हों फिर भी जिस कार्यमें जितने
अंशमें जो निमित्तकारण हो उतने अंशमें तो उसे उस कार्यमें व्यापक होना ही चाहिये। इसके अतिरिक्त निरवयव एवं व्यापकमें क्या हलचल रूप क्रिया सम्भव हो सकती है ? यदि नहीं तो व्यापक ईश्वर किस तरह क्रियावान् हो सकेगा ? इस दृष्टिसे वेदान्तीका ही मत श्रेष्ठ है। मायाशक्तिद्वारा ही सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर माया, परिणाम-संकल्पके द्वारा ही विश्वका निर्माता होता है। वही तमःप्रधाना प्रकृतिसे विशिष्ट होकर उपादान कारण भी है, अतः व्यापक है। यह भी कहा जाता है कि यदि ईश्वर व्यापक न होता तो उसे सम्राट् आदिके समान अन्य सत्ताओसे काम लेना पड़ता और जैसे सम्राट्का कर्मचारियोंके मस्तिष्कपर जब नियन्त्रण नहीं होता तो वे कभी गड़बड भी करते हैं, इसी तरह ईश्वरके कर्मचारी भी ईश्वरकी इच्छाके विरुद्ध कार्य कर सकते हैं; किंतु ऐसा होता नहीं, अतः ईश्वर व्यापक है। सबपर उसका नियन्त्रण है। सब कार्य उसकी इच्छाके अनुसार ही होते हैं। परंतु यह ठीक नहीं हैं, क्योंकि ईश्वरकी सत्तासे भिन्न जीवोंद्वारा अनेक कार्य होते हैं। भले ही ईश्वर सर्वान्तर्यामी हैं; फिर भी जीवोंको अपनी इच्छानुसार शुभाशुभ कर्म करनेकी स्वतन्त्रता है। तभी उन्हें अपने किये कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यदि जीव किसी अन्यके परवश होकर ही कर्म करते होते तो उन्हें उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता। व्यापकताका मूल उपादानत्व ही है निमित्तत्व नहीं। जैसे मकड़ी जालका उपादान और निमित्त दोनों ही ही कारण है, उसी तरह ईश्वर ही प्रपञ्च-सृष्टिका उपादान और निमित्त दोनो ही कारण है। कुछ लोग कहते हैं कि 'वह ईश्वर निराकार ही हो सकता है, साकार नहीं। उनके अनुसार 'जिसे आँखसे देख सकते हैं, हाथसे छू सकते हैं, वह साकार है, जो ऐसा नहीं वह निराकार है।' वे कहते हैं कि 'सृष्टिमें दोनों प्रकारकी वस्तुएँ होती हैं, 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तञ्चैवामूर्तञ्च'—सृष्टिके दो रूप हैं—एक साकार, दूसरा निरा- कार।' परंतु यह ठीक नहीं, क्योंकि उपर्युक्त श्रुति यही कहती है कि ब्रह्मके दो रूप हैं। एक मूर्त अर्थात् साकार और दूसरा अमूर्त अर्थात् निराकार। कहा जाता है कि 'यदि ईश्वर आकाशकी तरह निराकार है, तब तो वह व्यापक हो सकता है, किंतु यदि वह साकार (स्थूल) है तो सूक्ष्ममें कैसे व्यापक होगा ? सर्वव्यापक न होनेसे सर्वकारण भी नहीं हो सकेगा। फिर ईश्वर ही नहीं सिद्ध हो सकेगा। ईश्वर साकार होता तो अवश्य दीखता। ईश्वरकी अति सूक्ष्म सत्ता हो तभी उसका नियन्त्रण सूक्ष्म नियमोंपर हो सकता है।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसे जीव सूक्ष्म होते हुए भी आकार ग्रहणकर साकार हो जाता है, इसी तरह ईश्वर सूक्ष्म निराकार होते हुए भी मायासे दिव्य गुणसम्पन्न ज्योतिर्मय आकार बनाकर साकार हो सकता है। सूक्ष्मरूपसे सर्वकारण सर्वव्यापक होनेपर भी साकार मा० रा० १२—
८१८ मार्क्सवाद और रामराज्य भक्तिसे ईश्वर साकार भी होता है । उसीका हिरण्मय, ज्योतिर्मय आदि रूप उपनिषदोंमें वर्णित है। ईश्वरका ज्योतिर्मय आकार होनेपर भी वह आकार दिव्य है । अतः सामान्य चर्मचक्षुको उसका दर्शन भले ही न हो, परंतु उपासना और तपस्या- के द्वारा दिव्य दृष्टिसम्पन्न लोगोंको उसका दर्शन आज भी होता है और हो सकता है। विष्णु, शिव आदि उसीके रूप हैं। जो ईश्वर अनन्त ब्रह्माण्डका निर्माण कर सकता है, अनन्त निराकार एवं सूक्ष्मजीवोंको अनन्त देह देकर साकार बना देता है, वह क्या अपने लिये दिव्य देहका निर्माण नहीं कर सकता ? और साकार नहीं बन सकता ? वस्तुतः जैसे निराकार अग्नि भी साकार हो सकती है, जैसे स्पर्शादिविहीन आकाश ही स्पर्शादियुक्त तेज-जलादि रूपमें प्रकट हो सकता है, वैसे ही निराकार परमेश्वर आकार ग्रहणकर साकार हो सकता है । सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी मायाकृत साकारता होनेपर भी उसकी निरा- कारता, सूक्ष्मता, व्यापकता एवं सर्वकारणतामें कोई अन्तर नहीं आता । कहा जाता है, संसारमें जितनी साकार वस्तुएँ हैं, वे सब परमाणुओंके संयोगसे ही बनती हैं; किंतु यह बात केवल आरम्भवादमें ही है, परिणामवादके लिये यह आवश्यक नहीं । परिणामवादमें जैसे दुग्धका ही दधिभाव होता है, मृत्तिकाका घटभाव होता है, वैसे ही प्रकृतिका ही अन्यथाभाव परिणाम होता है । वहाँ तो यही कहा जा सकता है कि सूक्ष्म एवं व्यापक वस्तु ही स्थूल एवं व्याप्य भिन्न-भिन्न पदार्थोंके रूपमें परिणत होती है। विवर्तवादमें सूक्ष्मतम ब्रह्मका ही अतात्त्विक अन्यथाभावरूप विवर्त सम्पूर्ण प्रपञ्च है । किंतु किसी भी पक्षमें ईश्वरके साकार होनेमें कोई आपत्ति नहीं होती । सर्वसम्मतिसे-जीवात्मा व्यापक हो या अणु, पर है निराकार ही । साकार रूप धारण करनेसे वह राकार होता है। यही बात ज्यों-की-त्यों ईश्वरके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । भेद इतना ही है कि जीव इन सब बातोंमें कर्मपरतन्त्र है, ईश्वर स्वतन्त्र है । साकार होनेका यह कदापि अर्थ नहीं कि कूटस्थ ईश्वर विकृत होकर अपनी निराकारता, सूक्ष्मता, व्यापकताको खोकर साकाररूपमें परिणत हो जाता है। इसीलिये भापका पर- माणु बादल बन जाय या बादलका परमाणु जल बन जाय इत्यादि दृष्टान्तोंके लिये यहाँ कोई स्थान नहीं है । संसारमें विभिन्न वस्तुएँ विभिन्न शक्तिवाली होती हैं । चींटी, सिंह, हाथी, विभिन्न प्राणी भिन्न-भिन्न शक्ति रखते हैं। जो सबपर नियन्त्रण रखता है तथा सर्वशक्तिवाला है, वही ईश्वर है । भिन्न कारणोंमें अपने-अपने कार्योंके उत्पादनानुकूल शक्तियाँ होती हैं । ईश्वर सर्वकारण है, अतः उसमें सर्व- कार्योत्पादनानुकूल शक्तियाँ हैं; इसीलिये वह सर्वशक्तिमान् है । बहुत लोग कुतर्क करते हैं कि यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है, तो क्या वह अपने आपको नष्ट कर सकता है ? दूसरा ईश्वर बना सकता है ? वेश्याको कुमारी बना सकता है ? परंतु
यह सर्वशक्तिमत्ताका अभिप्राय कदापि नहीं है। शक्ति शक्यमें ही होती है। स्वरूप- के अविरुद्ध ही शक्तियाँ होती हैं। वह्निमें दाहिका शक्ति होती है, परन्तु वह शक्ति काष्ठादि दाह्यका ही दहन करती है। अदाह्य आकाशादिका दहन नहीं कर सकती। इतनेपर भी अग्निके सर्वदाहकत्वमें कोई बाधा नहीं आती। इसी तरह यदि नित्यस्वरूपको नष्ट न कर सके तो इतनेसे ही ईश्वरके सर्वशक्तिमत्त्वमे बाधा नहीं पड़ सकती। इसी तरह नित्य अनाद्यनन्त सर्वशक्तिमान् अन्य ईश्वर- का निर्माण भी अशक्य है। वेश्याको उस जन्ममें नहीं तो जन्मान्तरमें कुमारी बना ही सकता है। अद्वैत वेदान्तकी दृष्टिसे परमेश्वर सर्वप्रपञ्चका उपादानकारण है, अत- एव वह सर्वशक्तिमान् है। उपादानकारणोंमें कार्यानुकूल शक्तियाँ होती हैं। मृत्तिकामें घटोत्पादनानुकूलशक्ति, तन्तुमें घटोत्पादनानुकूल शक्ति, दुग्धमें नवनीतो- त्पादनानुकूल शक्ति होती है—इस दृष्टिसे सर्वकारणमें सर्वोत्पादनानुकूल शक्ति होती है। जो वस्तु प्रमाणसिद्ध है, उसीके उत्पादनानुकूल शक्ति कारणमें हो सकती है। खपुष्प, शशशृङ्ग आदि अमत्पदार्थ प्रमाणसिद्ध ही नहीं हैं, अतः तदुत्पादनानुकूल शक्तिकी कल्पना ईश्वरमें नहीं की जा सकती। सर्वकारण एवं सर्वाधिष्ठान होनेके कारण चेतन ब्रह्म ईश्वर ही निरावरण होकर अपनेमें अध्यस्त सब प्रपञ्चका भासक होता है, इसीलिये वह सर्वज्ञ है। सर्वका चेतनके साथ आध्यासिक ही सम्बन्ध है। इसी सम्बन्धसे चेतनद्वारा सर्वप्रपञ्चका भान हो सकता है। इसीलिये सामान्य रूपसे, विशेषरूपसे सर्वप्रपञ्चको जाननेवाला ईश्वर सर्वज्ञ एव सर्ववित् है, अनन्त ब्रह्माण्ड एवं एक-एक ब्रह्माण्डके अनन्त जीव तथा एक-एक जीवके अनन्त जन्म, एक-एक जन्मके अनन्तानन्त कर्म एव अपरिगणित कर्मफलोंको जाननेवाला और विभिन्न ब्रह्माण्डोंके जीवोंके कर्मफलोंको दे सकनेकी क्षमता रखनेवाला ही ईश्वर है। इसीलिये ईश्वर सर्वज्ञ एव सर्वशक्तिमान् है। अनादि जीवोंके कल्याणके लिये ही उसकी सृष्टिनिर्माणमें प्रवृत्ति होती है। इसीलिये वह हितकारी भी कहा जाता है। समस्त प्राणियोंके लौकिक-पारलौकिक कल्याणके लिये उसके नि श्वासभूत वेदोंके द्वारा सबको उपदेश मिलता है— सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषम् कृणोमि वः । अन्यो अन्यमभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥ ( अथर्ववेद ३ । ३० । १ ) जैसे गौ उत्पन्न बछड़ोंमें प्रेम करती तथा उनका हित चाहती है, वैसे ही ईश्वर भी सबको समान हृदय एवं शोभन हृदय तथा विद्वेषरहित अन्योन्य उपकारक बनाना चाहता है।
मार्क्स और ईश्वर ईश्वरके सम्बन्धमें भारतीय दर्शनोंके आधारपर मार्क्सवादियोंके विचार मार्क्सवादी हिंदू-दर्शन एवं भौतिकवादकी तुलना करते हुए कहते हैं कि 'हिंदू दर्शन ग्रन्थादि किसी एक ही मतके परिपोषक नहीं हैं । भौतिकवादके उल्लेखमात्रसे चार्वाकका नाम याद आता है । लेकिन चार्वाकसे बहुत पहले इसका वर्णन उपनिषदोंमें मिलता है कि सृष्टिका मूल क्या है ? आकाश । सब सृष्ट पदार्थ आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं तथा इसीमे विलीन होते हैं—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' ( छान्दो० उप० १ । ९ । १ ) 'जिसको आकाश कहते हैं, वह सब नाम-रूपोंका द्योतक है ।'— आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता । (छान्दोग्य उपनिषद् ८ । १४ । १) इसी उपनिषद्मे ब्रह्मका भी उल्लेख है । इससे स्पष्ट है कि आकाश ब्रह्म नहीं है और यही सृष्टिका भौतिक कारण है । श्वेताश्वतर उपनिषद्की अग्नि वह स्वयम्भू है, जिससे भूतमात्रकी उत्पत्ति है । वह अग्नि भी ब्रह्म नहीं है । एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । (६ । १५-१६) कहना न होगा कि कई मार्क्सवादियोने भारतीय दर्शनोंका भौतिकवादसे मेल मिलाया है; किंतु अधूरे ज्ञानके कारण वे सदा ही अर्थका अनर्थ ही करते हैं । वस्तुतः उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका मूल आकाश कहा गया है वहाँ 'आकाश' शब्दका अर्थ है 'ब्रह्म' । 'आ समन्तात् काशते—प्रकाशते इत्याकाशः' प्रकाशमान अखण्ड बोधरूप परब्रह्म ही आकाश शब्दार्थ है । अतएव ब्रह्मसूत्रमे कहा गया है— 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' (वेदान्तद० १ । १ । २२) — आकाश पदार्थ परमात्मा है, क्योकि जगदुत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-कारणतारूप लक्षण उस ब्रह्ममें ही घटता है, भूताकाशमे नहीं । क्योकि उन्हीं उपनिषदोंमें आकाशादि भूतोकी उत्पत्ति ब्रह्मसे कही गयी है, 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( तै० उ० २ । १ ) उस अपरोक्ष आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति होती है । 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ॰ तद् ब्रह्म ।' ( तै० उ० ३ । १ ) जिस परमात्मासे सब भूत उत्पन्न होते हैं, वह ब्रह्म है । जो आकाश नाम-रूपका निर्वाहक है, वह आकाश भी वही ब्रह्म है । ( देखिये, छा० उ० ८ । १४ । १ शांकरभाष्य ) श्वेताश्वतरका
: 'है ।"-' or 'है ।'-'?
It has a double quote or single quote?
Wait, in L22: "बौद्धमत... (double quote opened).
In L25: 'केवल विचारका... (single quote opened).
In L27: है ।'- or है ।"-?
There is ' then -?
Look at L27: रह जाता है ।'- - wait, it is a single quote ' or double quote "?
It looks like '- or "-? It has one or two apostrophes?
Look closely at line 27: after है । there is '- or "-?
There is one stroke or two? There are two small strokes: " or one? It looks like '- (single quote).
Wait, look at the end of the paragraph (L34): does the double quote close there?
No double quote at the end of L34!
Wait, look at L31: 'बौद्ध- (single quote opened).
Wait, why does L31 have 'बौद्ध-?
Ah! Look at L31:
रह जाता है । 'बौद्ध-
Wait, let's look at the quotes in the whole passage:
L22: "बौद्धमत स्वयं भारतीय भौतिकवादियोंका वैदिकधर्मके विरुद्ध एक विद्रोह
L23: `है ।
८३२ || मार्क्सवाद और रामराज्य
“योगबल और अलौकिक शक्ति—यहाँ योगादिके विषयमें एक बात कहना असङ्गत न होगा। क्या तपस्या, योग, क्रिया आदिसे मनुष्य अलौकिक कार्य सम्पन्न कर सकता है ? जो कुछ पहले कहा जा चुका है, उससे उत्तर स्पष्ट है— कदापि नहीं। योगकी शास्त्रीय परिभाषाओसे भी उसके ऊपर प्रकाश पड़ता है। पातञ्जलसूत्रकी परिभाषा है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ( १ । २) पर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध -यह स्वयं ही एक असम्भव क्रिया है; इसलिये एक असम्भव क्रियासे असम्भव फल प्राप्त होता है या नहीं यह प्रश्न स्वयं ही अपना उत्तर है। गीताकी परिभाषा है— 'योगः कर्मसु कौशलम्' (२।५०)। तिलकने इसी परिभाषापर जोर दिया है। स्पष्ट ही यह परिभाषा योगको अलौकिक क्षेत्रसे उतारकर व्यवहार-क्षेत्रमें लानेका प्रयत्न है। व्यावहारिक अर्थमें ही एक मार्क्सवादी गीताके उस श्लोककी प्रशंसा कर सकता है—जिसमें मनुष्यको समदर्शी होनेका उपदेश दिया गया है। लाभ और हानि, जय और पराजय, दोनोंमें ही उसको अविचलित रहनेको कहा गया है, लेकिन मार्क्सवाद और गीताकी प्रेरणाएँ भिन्न हैं। गीताकी प्रेरणा है— कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।' (२।४७) लेकिन मार्क्सके दर्शनमें ईश्वरको फल सौंपनेकी बात नहीं आती, क्योंकि यह एक निरीश्वरवादी दर्शन है। ईश्वरमें विश्वाससे ही अलौकिक शक्तिकी कल्पना आती है। जन्मान्तर-रहस्य इसीका एक अङ्ग है। ऐसे प्रश्नोंका उत्तर 'Dialectics of nature' नामक पुस्तकके एक अध्यायमें एजिल्सने दिया है। प्रेतात्मा बुलानेवालोंकी कारस्तानियों अदालतोंमे कैसे खुलीं, उन घटनाओंका उल्लेख करते हुए एजिल्सने अलौकिक शक्तिकी असम्भावनाओंको प्रमाणित किया है।” मार्क्सवादी आदर्शवादके रूपमें अद्वैतवादको ही क्यो देखना चाहता है ? अनेक अध्यात्मवादी चेतनके समान ही अचेतनको भी वास्तव ही मानते हैं। अद्वैतवादी वृत्तिविशिष्ट चैतन्यरूप दृष्टिको व्यावहारिक सत्य मानते हैं और विषय- को भी उसी कोटिका मानते हैं। बिना चेतन-सत्ता स्वीकार किये क्रियाशीलता ही नहीं बन सकती, फिर क्रान्तिकारी क्रियाशीलताकी बात तो दूरकी है। क्रियात्मक सत्यता अवश्य प्रयोगसापेक्ष है; परंतु वस्तुसत्ता प्रयोगकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे अगर कूटस्थ सत्, परमार्थ आत्मा सत्य है, तो उसके लिये प्रयोग अपेक्षित नही वहाँ तो अज्ञान-निवृत्त्यर्थ ज्ञानमात्र अपेक्षित है। क्रिया पुरुषतन्त्र हो सकती है, परंतु ज्ञान तो पुरुषतन्त्र न होकर वस्तुतन्त्र ही होता है। जो विभाज्य एवं विपरीत होता है, वह परमार्थ सत्य होता ही नहीं। सत्यताकी मुख्य परीक्षा प्रमाणसे होती है। प्रयोग भी प्रमाणका अङ्ग होकर ही परीक्षामें उपयुक्त हो सकता है। विचार, क्रिया— दोनों ही एक कर्ता-प्रयोक्ताद्वारा सम्पन्न होते हैं—यह तो ठीक है, परंतु 'एक ही सत्यकी विपरीत दिशाएँ हैं', यह निरर्थक वागाडम्बरमात्र है।