मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय १२३ * | ४२७ ---|---:
| परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम्।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्॥ ५४ | परस्पर एक-दूसरेसे अधिक तथा एक-दूसरेमें घुसे हुए भी हैं। इसी प्रकार ये परस्पर उत्पन्न होते हैं और परस्पर एक-दूसरेको धारण भी करते हैं*॥ ४२—५४॥ |
| यस्मात् प्रविष्टास्तेऽन्योन्यं तस्मात् ते स्थिरतां गताः।<br>आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात्॥ ५५<br><br>पृथ्व्यादयस्तु वाय्वन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते।<br>भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो ह्यालोकः सर्वतः स्मृतः॥ ५६<br><br>तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः।<br>पात्रे महति पात्राणि यथा ह्यन्तर्गतानि च॥ ५७<br><br>भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात्।<br>तथा ह्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गतागताः॥ ५८<br><br>कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि च।<br>यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते॥ ५९<br><br>जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै।<br>प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर्न विद्यते॥ ६०<br><br>तस्मात् परिमिता भेदाः स्मृताः कार्यात्मकास्तु वै।<br>ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः॥ ६१<br><br>इत्येवं संनिवेशोऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः।<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया॥ ६२<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि।<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः॥ ६३<br><br>एतावत् संनिवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशितः।<br>एतावदेव श्रोतव्यं संनिवेशस्य पार्थिव॥ ६४ | चूँकि ये सभी परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट-से हैं, इसीलिये स्थिरताको प्राप्त हुए हैं। पहले इनमें कोई विशेषता नहीं थी, परंतु एक-दूसरेमें प्रविष्ट हो जानेसे ये विशिष्ट हो गये हैं। पृथ्वीसे लेकर वायुतकके सभी तत्त्व परस्पर विभक्त हैं। इन तत्त्वोंसे परे सारा जगत् निर्जन है। (अन्य सभी तत्त्व) प्रकाशमान आकाशमें सर्वत्र व्याप्त हैं। जिस प्रकार छोटे-छोटे पात्र बड़े पात्रके अन्तर्गत समा जाते हैं और परस्पर समाश्रयण होनेके कारण एक-दूसरेसे छोटे होते जाते हैं, उसी प्रकार ये सारे भेद प्रकाशमान आकाशके अन्तर्गत विलीन हो जाते हैं। ये तत्त्व परस्पर एक-दूसरेसे अधिक परिमाणवाले बनाये गये हैं। जबतक ये तत्त्व वर्तमान रहते हैं, तभीतक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इस जगत्में इन्हीं तत्त्वोंके अन्तर्गत प्राणियोंकी व्यवस्थिति होती है। इन तत्त्वोंका प्रत्याख्यान कर देनेपर किसी प्रकार कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसीलिये वे परिमित (पृथ्वीसे वायुतक) तत्त्व कार्यात्मक कहे जाते हैं तथा महत्तत्त्व आदि भेद कारणात्मक हैं। इस प्रकार विभागपूर्वक पृथ्वीसे आच्छादित मण्डल, सातों द्वीपों और सातों समुद्रोंका यथार्थरूपसे गणनासहित विस्तार एवं मण्डल तथा परिमाणमें एकदेशी प्रधान तत्त्वका इसे विश्वरूप जानना चाहिये। राजन्! मैंने इस मण्डलका यहाँतक सम्यक् प्रकारसे वर्णन कर दिया; क्योंकि मण्डलके वृत्तान्तको यहाँतक ही सुनना चाहिये॥ ५५—६४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सप्त द्वीपनिवेशनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सप्तद्वीपनिवेशन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२३॥
* यह वर्णन अन्य पुराणमें भी है। पर इन सबोंका आचार्य यामुनने 'स्तोत्ररत्नम्'में परमात्मसम्बन्धसहित—
'यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च। गुणाः प्रधानं पुरुषाः परं पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः॥'
इस एक ही श्लोकमें बड़े संक्षेपमें, पर सुन्दर शब्दों तथा भावोंमें चित्रण कर दिया है।
१२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
४२८ * मत्स्यपुराण *
मत्स्यावतार-कथा-प्रसंग
श्रुतिनि हित हरि मच्छ रूप धार्यौ। सदा ही भक्त-संकट निवार्यौ॥
चतुरमुख कह्यौ, सँख असुर श्रुति लै गयो, सत्यब्रत कह्यौ परलय दिखायौ।
भक्त-बत्सल, कृपाकरन, असरन-सरन, मत्स्यकौ रूप तब धारि आयौ॥
स्नान करि अंजली जल जबै नृप लियौ, मत्स्य जौ देखि कह्यो डारि दीजै।
मत्स्य कह्यौ, मैं गही आइ तुम्हरी सरन, करि कृपा मोहिं अब राखि लीजै॥
नृप सुनत बचन, चकित प्रथम है रह्यौ, कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ।
पुनि कमंडल धर्यौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ, कुंभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यौ॥
पुनि धर्यौ खाड़, तालाब मैं पुनि धर्यौ, नदी मैं बहुरि पुनि डारि दीन्हौ।
बहुरि जब बढ़ि गयौ, सिंधु तब लै गयौ, तहाँ हरि-रूप नृप चीन्हि लीन्हौ॥
कह्यौ करि बिनय तुम ब्रह्म जो अनंत हौ, मत्स्यकौ रूप किहिं काज कीन्हौ!
बेद-बिधि चहत, तुम प्रलय देखन कहत, तुम दुहुँनि हेत अवतार लीन्हौ॥
कबहुँ बाराह, नरसिंह कबहुँ भयौ, कबहुँ मैं कच्छकौ रूप लीन्हौ।
कबहुँ भयौ राम, बसुदेव-सुत कबहुँ भयौ, और बहु रूप हित-भक्त कीन्हौ॥
सातवें दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं सप्त-रिषि नाव मैं बैठि आवैं।
तोहिं बैठारिहौं नावमैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावैं॥
सर्प इक आइहै बहुरि तुम्हरे निकट, ताहि सों नाव मम सृंग बाँधौ।
यहै कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ॥
सातवैं दिवस आयौ निकट जलधि जब, नृप कह्यौ अब कहाँ नाव पावैं।
आइ गइ नाव, तब रिषिन तासों कह्यौ, आउ हम नृपति तुमकौं बचावैं॥
पुनि कह्यौ, मत्स्य हरि अब कहाँ पाइय, रिषिन कह्यौ, ध्यान चित माहिं धारौ।
मत्स्य अरु सर्पु तिहिं ठौर परगट भए, बाँधि नृप नाव यौं कहि उचारौ॥
ज्यौं महाराज या जलधितैं पार कियौ, भव-जलधि पार त्यों करो स्वामी।
अहं-ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी॥
कर्म सुख-हित करत, होत तहँ दुःख नित, तऊ नर मूढ नाहीं सँभारत।
करन-कारन महराज हैं आप हो, ध्यान प्रभुकौ न मन माहिं धारत॥
बिन तुम्हारी कृपा गति नहीं नरनिकी, जानि मोहिं आपनौ कृपा कीजै।
जनम अरु मरनमैं सदा दुःखित देहु मोहिं ज्ञान जिहिं सदा जीजै॥
मत्स्य भगवान कह्यौ ज्ञान पुनि नृपति सों, भयो सो पुरान सब जगत जान्यौ।
लह्यो नृप ज्ञान, कह्यौ आँखि अब मीचि तू, मत्स्य कह्यौ सो नृपति मान्यौ॥
आँखिकौं खोलि जब नृपति देख्यौ बहुरि, कह्यौ, हरि प्रलय-माया दिखाई।
कह्यौ जो ज्ञान भगवान, सो आनि उर, नृपति निज आपु इहिं बिधि बिताई॥
बहुरि सँखासुरहि मारि, बेद आनि दिए, चतुरमुख बिबिध अस्तुति सुनाई।
सूरके प्रभूकी नित्य लीला नई, सकै कहि कौन, यह कछुक गाई॥
('सूरदास' १६। ४४३)
* अध्याय १२४ * | ४२९
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय
सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन कर रहा हूँ। ये सूर्य और चन्द्रमा सातों द्वीपों एवं सातों समुद्रोंके विस्तारको तथा समग्र भूतलके अर्धभागको और उसके बाहरके अन्य प्रदेशोंको ये अपने प्रकाशसे उद्भासित करते हैं। ये विश्वकी अन्तिम सीमातक प्रकाश फैलाते हैं। तुलना परिभ्रमणके प्रमाणको लेकर ही विद्वान् लोग आकाशकी करते हैं। सूर्य सामान्यतः तीनों लोकोंमें शीघ्रतापूर्वक भ्रमण करते हैं। 'अव' धातु रक्षण और प्रकाशार्थक है। प्रकाश फैलाने तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके कारण सूर्यको 'रवि' कहा जाता है। पुनः सूर्य और चन्द्रमाका प्रमाण बतला रहा हूँ। महनीय होनेके कारण पृथ्वीके लिये 'मही' शब्दका प्रयोग किया जाता है। अब भारतवर्षका तथा सूर्य-मण्डलके व्यासका परिमाण योजनोंमें बतला रहा हूँ, उसे सुनिये। सूर्य-मण्डलका परिमाण नौ हजार योजन है। इस मण्डलमें परिणाह (घेरा) विस्तारसे तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। व्यास और मण्डलकी दृष्टिसे भी सूर्यसे चन्द्रमा बहुत छोटे हैं। पुनः सातों द्वीपों और समुद्रोंसहित पृथ्वीमण्डलके विस्तारका प्रमाण, जिन्हें विद्वानोंने पुराणोंमें बतलाया है, (योजनोंकी संख्यामें) बतला रहा हूँ॥१—९॥ <br><br> पूर्वकालमें जो पुराणोंके ज्ञाता हो चुके हैं, वे भी आजकलके पुराणोंके तुल्य ही थे। पूर्वकालके विद्वान् एवं आधुनिक विद्वान्—दोनोंके मत इस विषयमें समान हैं। अतः वर्तमानकालिक विद्वानोंके अनुसार भूतलका परिमाण बतला रहा हूँ। आधुनिक विद्वानोंने दिव्यलोककी स्थितिको भी पृथ्वीमण्डलके बराबर ही माना है। समूची पृथिवी पचास करोड़ योजनोंमें विस्तृत मानी गयी है। | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्रमन्तौ यावदेव तु॥१¹<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भाति विस्तरः।<br>विस्तरार्थं पृथिव्यास्तु भवेदन्ध्रत्र बाह्यतः॥२<br>पर्याप्तपरिमाणं च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः।<br>पर्याप्तपारिमाण्यात्तु भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्॥३<br>भवति त्रीणि माँल्लोकान् सूर्यो यस्मात् परिभ्रमन्।<br>अव धातुः प्रकाशाख्यो अवनात्तु रविः स्मृतः॥४<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्ययोः।<br>महित्वान्महीशब्दो ह्यस्मिन्नर्थे निगद्यते॥५<br>अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भं तु सुविस्तरम्।<br>मण्डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत॥६<br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले॥७<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी।<br>अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनैः पुनः॥८<br>सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु।<br>इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः॥९<br>तद्वक्ष्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतं चाभिमानिभिः।<br>अभिमानिनो ह्यतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतैस्त्विह॥१०<br>देवा ये वै ह्यतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च।<br>तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामि² वसुधातलम्॥११<br>दिव्यस्य संनिवेशो वै साम्प्रतैरेव कृत्स्नशः।<br>शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्नशः स्मृता॥१२ | |
१. इस अध्यायके सभी श्लोक वायुपु० ५०।५६—१६९ (किसी प्रतिमें ५१।१—११३) तथा ब्रह्माण्डपुराणसे सर्वांशमें मिल जाते हैं। उनके श्लोक विशेष शुद्ध हैं।
२. यहाँ 'विद्वांसो ह वै देवाः' के अनुसार विद्वान् ही देवता हैं।
४३० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्याश्चार्धप्रमाणं च मेरोर्वै चतुरन्तरम्।<br>मेरोर्मध्यात् प्रतिदिशं कोटिरेका तु सा स्मृता॥ १३<br>तथा शतसहस्राणामेकोननवतिं पुनः।<br>पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्याः स तु विस्तरः॥ १४<br>पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनैस्तन्निबोधत।<br>तिस्रः कोट्यस्तु विस्तारात्संख्यातास्तु चतुर्दिशम्॥ १५<br>विस्तारं त्रिगुणं चैव पृथिव्यन्तरमण्डलम्।<br>गणितं योजनानां तु कोट्यस्त्वेकादश स्मृताः॥ १६<br>तथा शतसहस्राणां सप्तत्रिंशाधिकास्तु ताः।<br>इत्येतद्वै प्रसंख्यातं पृथिव्यन्तरमण्डलम्॥ १७<br>तारकासंनिवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम्।<br>पर्यांसः संनिवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम्॥ १८<br>पर्यांसपरिमाणं च भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।<br>समानापि लोकानामेतन्मानं प्रकीर्तितम्॥ १९<br>ज्योतिर्गणप्रचारस्य प्रमाणं परिवक्ष्यते।<br>मेरोः प्राच्यां दिशायां तु मानसोत्तरमूर्धनि॥ २०<br>वस्वौकसारा माहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता।<br>दक्षिणेन पुनर्मेरोर्मानसस्य तु पृष्ठतः॥ २१<br>वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे।<br>प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्मानसस्य तु मूर्धनि॥ २२<br>सुखा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमतः।<br>दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्धनि॥ २३<br>तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी।<br>मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम्॥ २४<br>स्थिता धर्मव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च।<br>लोकपालोपरिष्टात् तु सर्वतो दक्षिणायने॥ २५<br>काष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र निबोधत।<br>दक्षिणोपक्रमे सूर्यः क्षिप्तेषुरिव सर्पति॥ २६ | उसका आधा भाग मेरु पर्वतके उत्तरोत्तर फैला हुआ है और मेरु पर्वतके मध्यभागमें वह चारों ओर एक करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। इसी तरह पृथ्वीके अर्धभागका विस्तार नवासी लाख, पचास हजार योजन बतलाया जाता है। अब योजनके परिमाणसे पृथ्वीके समूचे विस्तारको सुनिये। इसका विस्तार चारों दिशाओंमें तीन करोड़ योजन माना गया है। यही सातों द्वीपों और समुद्रोंसे घिरी हुई पृथ्वीका विस्तार है। पृथ्वीका आन्तरिक मण्डल बाह्य मण्डलसे तिगुना अधिक है। इस प्रकार उसका परिमाण ग्यारह करोड़ सैंतीस लाख योजन माना गया है। यही पृथ्वीके आन्तरिक मण्डलकी गणना की गयी है। आकाश-मण्डलमें जितने तारागणोंकी स्थिति है, उतना ही समग्र पृथ्वीमण्डलका विस्तार माना गया है। इस प्रकार पृथ्वीमण्डलके परिमाणके बराबर आकाशमण्डल भी है। अब ज्योतिर्गणके प्रचारकी बात सुनिये। मेरु पर्वतकी पूर्व दिशामें मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर वस्वौकसारा नामकी महेन्द्रकी पुण्यमयी नगरी है, जो सुवर्णसे सुसज्जित है। पुनः मेरुकी दक्षिण दिशामें मानसपर्वतके पृष्ठभागपर संयमनी पुरी है, जिसमें सूर्यके पुत्र यमराज निवास करते हैं। पुनः मेरुकी पश्चिम दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर बुद्धिमान् वरुणकी सुखा नामकी रमणीय पुरी है। मेरुकी उत्तर दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर महेन्द्रपुरीके समान चन्द्रदेवकी विभावरी पुरी है। उसी मानसोत्तर पर्वतके पृष्ठभागकी चारों दिशाओंमें लोकपालगण धर्मकी व्यवस्था और लोकोंकी रक्षा करनेके लिये स्थित हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य उन लोकपालोंसे ऊपर होकर भ्रमण करते हैं॥ १०—२५॥<br><br>दक्षिण दिशाका आश्रय लेनेपर सूर्यकी जैसी गति होती है, उसे सुनिये। दक्षिणायनकालमें सूर्य छोड़े गये बाणकी तरह शीघ्रगतिसे चलते हैं। वे ज्योतिष्चक्रको सदा साथ लिये रहते हैं। (इस प्रकार भ्रमण करते हुए) |
| ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति।<br>मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः॥ २७ | जिस समय सूर्य अमरावती पुरीमें पहुँचते हैं, उस समय वे गगनमण्डलके मध्यभागमें रहते हैं अर्थात् मध्याह्न होता है। उसी समय वे यमराजकी संयमनीपुरीमें |
| वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्यः प्रदृश्यते।<br>सुखायामर्धरात्रस्तु विभावर्यास्तमेति च॥ २८ | उदित होते हुए और विभावरी नगरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा सुखा नगरीमें आधी रात होती है। |
| * अध्याय १२४ * | ४३१ |
|---|---|
| वैवस्वते संयमने मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते॥ २९<br>विभावर्यामर्धरात्रं माहेन्द्रयामस्तमेव च।<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा॥ ३०<br>विभावर्यां सोमपुर्यामुत्तिष्ठति विभावसुः।<br>महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः॥ ३१<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत्॥ ३२ | इसी प्रकार जब सूर्य मध्याह्नकालमें यमराजकी संयमनी-पुरीमें पहुँचते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें उगते हुए और महेन्द्रकी वस्वौकसारा (अमरावती) पुरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा विभावरी पुरीमें आधी रात होती है। जब दोपहरके समय सूर्य वरुणकी सुखानगरीमें पहुँचते हैं, तब चन्द्रदेवकी पुरी विभावरीमें उदय होते हैं। जब सूर्य महेन्द्रकी अमरावतीपुरीमें उदय होते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें अस्त होते (दीखते) हैं और संयमनीपुरीमें आधी रात होती है। इस प्रकार सूर्य अलातचक्र (जलती बनेठी)-की भाँति बड़ी शीघ्रतासे चक्कर लगाते हैं॥ २६-३२॥ |
| भ्रमन् वै भ्रममाणानि ऋक्षाणि चरते रविः।<br>एवं चतुर्षु पार्श्वेषु दक्षिणान्तेषु सर्पति॥ ३३<br>उदयास्तमये वासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः।<br>पूर्वाह्ने चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः॥ ३४<br>पतत्येकं तु मध्याह्ने भाभिरेव च रश्मिभिः।<br>उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ने तपसे रविः॥ ३५<br>अतः परं ह्सन्तीभिर्गोभिरस्तं स गच्छति।<br>उदयास्तमयाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे तु वै॥ ३६<br>यादृक्पुरस्तात्तपति तादृक्पृष्ठे तु पार्श्वयोः।<br>यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषां स उदयः स्मृतः॥ ३७<br>प्रणाशं गच्छते यत्र तेषामस्तः स उच्यते।<br>सर्वेषामुत्तरे मेरुर्लोकालोकस्तु दक्षिणे॥ ३८<br>विदूरभावादर्कस्य भूमेर्लेखावृतस्य च।<br>ह्रियन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते॥ ३९<br>ऊर्ध्वं शतसहस्त्रांशुः स्थितस्तत्र प्रदृश्यते।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः॥ ४०<br>त्रिंशद्भागं च मेदिन्या मुहूर्तेन स गच्छति।<br>योजनानां सहस्त्रस्य इमां संख्यां निबोधत॥ ४१<br>पूर्णं शतसहस्त्राणामेकत्रिंशच्च सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च सहस्त्राणि तथान्यान्यधिकानि च॥ ४२<br>मौहूर्तिकी गतिर्ह्यैषा सूर्यस्य तु विधीयते। | इस प्रकार स्वयं भ्रमण करते हुए सूर्य नक्षत्रोंको भी भ्रमण कराते हैं। वे चारों दक्षिणान्त पार्श्व भागोंमें चलते रहते हैं। उदय और अस्तके समय वे पुनः-पुनः उदय और अस्त होते रहते हैं और पूर्वाह्न एवं अपराह्नमें दो-दो देवपुरियोंमें तथा मध्याह्नके समय एक पुरीमें पहुँचते हैं। इस प्रकार सूर्य उदय होकर अपनी बढ़ती हुई तेजस्विनी किरणोंसे दोपहरके समय तपते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे ह्रासको प्राप्त होती हुई उन्हीं किरणोंके साथ अस्त हो जाते हैं। सूर्यके इसी उदय और अस्तसे पूर्व और पश्चिम दिशाका ज्ञान होता है। यों तो सूर्य जैसे पूर्व दिशामें तपते हैं, उसी तरह पश्चिम तथा पार्श्वभाग (उत्तर और दक्षिण)-में भी प्रकाश फैलाते हैं, परंतु उन दिशाओंमें जहाँ सूर्यका उदय दीखता है, वही उदय-स्थान कहलाता है तथा जिस दिशामें सूर्य अदृश्य हो जाते हैं, उसे अस्त-स्थान कहते हैं। मेरुपर्वत सभी पर्वतोंसे उत्तर तथा लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशामें स्थित है, इसलिये सूर्यके बहुत दूर हो जाने तथा पृथिवीकी छायासे आवृत होनेके कारण उनकी किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं, इसी कारण सूर्य रातमें नहीं दीख पड़ते। इस प्रकार एक लाख किरणोंसे सुशोभित सूर्य जब पुष्करद्वीपके मध्यभागमें पहुँचते हैं, तब वहाँ ऊँचाईपर स्थित होनेके कारण दीख पड़ते हैं। सूर्य एक मुहूर्त (दो घड़ी)-में पृथिवीके तीसवें भागतक पहुँच जाते हैं। उनकी गतिका प्रमाण योजनोंके हजारोंकी गणनामें सुनिये। सूर्यकी एक मुहूर्तकी गतिका परिमाण इकतीस लाख पचास हजार योजनसे भी अधिक बतलाया जाता है॥ ३३-४२ १/२॥ |
| एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ ४३<br>परिगच्छति सूर्योऽसौ मासं काष्ठामुदग्दिनात्।<br>मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ ४४ | इसी क्रमसे जब सूर्य दक्षिण दिशामें जाते हैं, तब (वहाँ छह महीनेतक भ्रमण करनेके पश्चात् पुनः) सातवें मासमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमें भ्रमण करते हैं। |
१२६- सूर्य-रथपर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति
| ४३२ | * मत्स्यपुराण * |
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| मानसोत्तरमेरोस्तु अन्तरं त्रिगुणं स्मृतम्।<br>सर्वतो दक्षिणस्यां तु काष्ठायां तन्निबोधत ॥ ४५<br>नव कोट्यः प्रसंख्याता योजनैः परिमण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ४६<br>अहोरात्रात् पतङ्गस्य गतिरेषा विधीयते।<br>दक्षिणादिङ्निवृत्तोऽसौ विषुवस्थो यदा रविः ॥ ४७<br>क्षीरोदस्य समुद्रस्योत्तरतोऽपि दिशं चरन्।<br>मण्डलं विषुवच्चापि योजनैस्तन्निबोधत ॥ ४८<br>तिस्रः कोट्यस्तु सम्पूर्णा विषुवस्यापि मण्डलम्।<br>तथा शतसहस्राणि विंशत्येकाधिकानि तु ॥ ४९<br>श्रवणे चोत्तरां काष्ठां चित्रभानुर्यदा भवेत्।<br>गोमेदस्य परे द्वीपे उत्तरां च दिशं चरन् ॥ ५०<br>उत्तरायाः प्रमाणं तु काष्ठाया मण्डलस्य तु।<br>दक्षिणोत्तरमध्यानि तानि विद्याद् यथाक्रमम् ॥ ५१<br>स्थानं जरद्गवं मध्ये तथैरावतमुत्तरम्।<br>वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वतः ॥ ५२<br>नागवीथ्युत्तरा वीथी ह्याजवीथिस्तु दक्षिणा। | मानसोत्तर और मेरु पर्वतके बीचमें पुष्करद्वीपसे तिगुना अन्तर है। अब दक्षिण दिशामें सूर्यकी गतिका परिमाण सुनिये। यह (दक्षिणायन-) मण्डल नौ करोड़ पैंतालीस लाख योजन विस्तृत बतलाया गया है। यह सूर्यकी एक दिन-रातकी गति है। दक्षिणायनसे निवृत्त होकर जब सूर्य विषुव (खगोलीय विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्तका कटान-बिन्दु) स्थानपर स्थित होते हैं, तब वे क्षीरसागरकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब विषुवन्मण्डलका परिमाण योजनोंमें सुनिये। वह विषुवन्मण्डल तीन करोड़ इक्कीस लाख योजनके परिमाणवाला है। श्रवणनक्षत्रमें जब सूर्य उत्तर दिशामें चले जाते हैं, तब वे गोमेदद्वीपके बादवाले द्वीपकी उत्तर दिशामें भ्रमण करते हैं। अब उत्तर दिशाके मण्डलका तथा दक्षिण और उत्तरके मध्यभागका प्रमाण क्रमशः सुनिये। इनके मध्यमें जरद्गव, उत्तरमें ऐरावत और दक्षिणमें वैश्वानर नामक स्थान सिद्धान्ततः निर्दिष्ट किये गये हैं। उत्तर दिशामें सूर्यके मार्गको नागवीथी तथा दक्षिणदिशाके मार्गको अजवीथी कहते हैं॥ ४३—५२ १/२ ॥ | | उभे आषाढमूलं तु अजवीथ्युदयास्त्रयः ॥ ५३<br>अभिजित्पूर्वतः स्वातिं नागवीथ्युदयास्त्रयः।<br>अश्विनी कृत्तिका याम्या नागवीथ्यस्त्रयः स्मृताः ॥ ५४<br>रोहिण्यार्द्रा मृगशिरो नागवीथिरिति स्मृता।<br>पुष्यश्लेषापुनर्वस्वां वीथी चैरावती स्मृता ॥ ५५<br>तिस्रस्तु वीथयो ह्येता उत्तरो मार्ग उच्यते।<br>पूर्वोत्तरफाल्गुन्यौ मघा चैवार्षभी भवेत् ॥ ५६<br>पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ गोवीथी रेवती स्मृता।<br>श्रवणं च धनिष्ठा च वारुणं च जरद्गवम् ॥ ५७<br>एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते।<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती ह्याजवीथिरिति स्मृता ॥ ५८<br>ज्येष्ठा विशाखा मैत्रं च मृगवीथी तथोच्यते।<br>मूलं पूर्वोत्तराषाढे वीथी वैश्वानरी भवेत् ॥ ५९<br>स्मृतास्तिस्रस्तु वीथ्यस्ता मार्गे वै दक्षिणे पुनः।<br>काष्ठयोरन्तरं चैतद् वक्ष्यते योजनैः पुनः ॥ ६०<br>एतच्छतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु वै स्मृतम्।<br>शतानि त्रीणि चान्यानि त्रयस्त्रिंशत्तथैव च ॥ ६१<br>काष्ठयोरन्तरं ह्येतद् योजनानां प्रकीर्तितम्।<br>काष्ठयोर्लेखयोश्चैव अयने दक्षिणोत्तरे ॥ ६२ | दोनों आषाढ़ अर्थात् पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और मूल—ये तीनों अजवीथी हैं। अभिजित्, श्रवण और स्वाती—ये तीनों नागवीथी हैं। अश्विनी, भरणी और कृत्तिका—ये तीनों नागवीथी नामसे प्रसिद्ध हैं। रोहिणी, आर्द्रा और मृगशिरा भी नागवीथी कहलाते हैं। पुष्य, श्लेषा और पुनर्वसु—ये तीनों ऐरावती वीथी कहे जाते हैं। ये तीनों वीथियाँ उत्तर दिशाका मार्ग कहलाती हैं। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी और मघा—ये तीनों 'आर्षभी' वीथी हैं। पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद और रेवती—ये तीनों 'गोवीथी' नामसे पुकारे जाते हैं। श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा—ये तीनों 'जरद्गववीथी' हैं। ये तीनों वीथियाँ मध्यम मार्ग कहलाती हैं। हस्त, चित्रा और स्वाती—ये तीनों 'अजवीथी' कहलाते हैं। ज्येष्ठा, विशाखा और अनुराधा—ये 'मृगवीथी' कहलाते हैं। मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़—ये 'वैश्वानर'-वीथी हैं। ये तीनों वीथियाँ दक्षिण-मार्गमें बतलायी गयी हैं। अब उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंका अन्तर योजनोंमें बतला रहा हूँ। इन दोनों दिशाओंका अन्तर इकतीस लाख तीन हजार छः सौ योजन बतलाया जाता है। अब उत्तरायण और दक्षिणायन-कालमें दोनों दिशाओं और दोनों रेखाओंका |
| * अध्याय १२४ * | ४३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| ते वक्ष्यामि प्रसंख्याय योजनैस्तु निबोधत।<br>एकैकमन्तरं तस्या नियुतान्येकसप्ततिः॥ ६३<br>सहस्राण्यतिरिक्ता च ततोऽन्या पञ्चविंशतिः।<br>लेखयोः काष्ठयोश्चैव बाह्याभ्यन्तरयोश्चरन्॥ ६४<br>अभ्यन्तरं स पर्यति मण्डलान्युत्तरायणे।<br>बाह्यतो दक्षिणेनैव सततं सूर्यमण्डलम्॥ ६५<br>चरन्नसावुदीच्यां च ह्यशीत्या मण्डलाच्छतम्।<br>अभ्यन्तरं स पर्यति क्रमते मण्डलानि तु॥ ६६ | अन्तर योजनोंमें परिगणित करके बतला रहा हूँ, सुनिये। उनमें एकसे दूसरीका अन्तर एकहत्तर लाख पचीस हजार योजन है। सूर्य दोनों दिशाओं और रेखाओंके बाहरी और भीतरी भागमें चक्कर लगाते हैं। यह सूर्यमण्डल सदा उत्तरायणमें मण्डलोंके भीतर और दक्षिणायनमें बाहरसे चक्कर लगाता है। उत्तर दिशामें विचरते हुए सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलोंके भीतरसे गुजरते हुए उन्हें पार करते हैं॥ ६३-६६॥ |
| प्रमाणं मण्डलस्यापि योजनानां निबोधत।<br>योजनानां सहस्राणि दश चाष्टौ तथा स्मृतम्॥ ६७<br>अधिकान्यष्टपञ्चाशद्योजनानि तु वै पुनः।<br>विष्कम्भो मण्डलस्यैव तिर्यक् स तु विधीयते॥ ६८<br>अहस्तु चरते नाभेः सूर्यो वै मण्डलं क्रमात्।<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा चन्द्रो रविस्तथा॥ ६९<br>दक्षिणे चक्रवत्सूर्यस्तथा शीघ्रं निवर्तते।<br>तस्मात् प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति॥ ७०<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणां मध्ये चरति मण्डलम्॥ ७१<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्।<br>कुलालचक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति॥ ७२<br>उदग्याने तथा सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः।<br>तस्माद् दीर्घेण कालेन भूमिं सोऽल्पां प्रसर्पति॥ ७३<br>सूर्योऽष्टादशभिरहो मुहूर्तैरुदगायने।<br>त्रयोदशानां मध्ये तु ऋक्षाणां चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि रात्रौ द्वादशभिश्चरन्॥ ७४<br>ततो मन्दतरं ताभ्यां चक्रं तु भ्रमते पुनः।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो भ्रमतेऽसौ ध्रुवस्तथा॥ ७५<br>मुहूर्तैस्त्रिंशता तावदहोरात्रं ध्रुवो भ्रमन्।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमते मण्डलानि तु॥ ७६ | अब मण्डलका प्रमाण योजनोंकी गणनामें सुनिये। इसका परिमाण अठारह हजार अट्ठावन योजन बतलाया जाता है। इस मण्डलका व्यास तिरछा जानना चाहिये। सूर्य दिनभर कुम्हारके चाककी तरह नाभिमण्डलपर चक्कर लगाते हैं। सूर्यकी भाँति चन्द्रमा भी वैसा ही भ्रमण करते हैं। उसी प्रकार दक्षिणायनमें भी सूर्य चाककी तरह शीघ्रतापूर्वक चलते हुए उसे पार करते हैं। इसी कारण वे इतनी विस्तृत भूमिको थोड़े ही समयमें पार कर जाते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य साढ़े तेरह नक्षत्रोंके मण्डलको शीघ्रतापूर्वक मध्यभागसे गुजरते हुए बारह मुहूर्तोंमें पार करते हैं, किंतु रातके समय उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें अठारह मुहूर्त लगता है। जैसे कुम्हारके चाकके मध्यभागमें स्थित वस्तुकी गति मन्द हो जाती है, वैसे ही उत्तरायणके समय सूर्य मन्दगतिसे चलते हैं। इसी कारण थोड़ी-सी भूमि पार करनेमें उन्हें अधिक समय लगाना पड़ता है। उत्तरायणके समय सूर्य दिनके अठारह मुहूर्तोंमें तेरह नक्षत्रोंके मध्यमें विचरते हैं, किंतु रातमें उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें बारह मुहूर्त लगते हैं। वह चक्र उन दोनों गतियोंसे मन्दतर गतिमें घूमता है। चाकके मध्यभागमें रखे हुए मृत्पिण्डकी तरह ध्रुव भी उस चक्रके मध्यमें स्थित होकर घूमते रहते हैं। ध्रुव तीस मुहूर्त अर्थात् दिन-रातभरमें दोनों दिशाओंके मध्यवर्ती मण्डलोंमें भ्रमण करते हैं॥ ६७-७६॥ |
| उत्तरक्रमणेऽर्कस्य दिवा मन्दगतिः स्मृता।<br>तस्यैव तु पुनर्नक्तं शीघ्रा सूर्यस्य वै गतिः॥ ७७<br>दक्षिणप्रक्रमे वापि दिवा शीघ्रं विधीयते।<br>गतिः सूर्यस्य वै नक्तं मन्दा चापि विधीयते॥ ७८ | उत्तरायणके समय दिनमें सूर्यकी गति मन्द और रात्रिके समय उन्हीं सूर्यकी गति तेज बतलायी गयी है। उसी तरह दक्षिणायन-कालमें सूर्यकी गति दिनमें तेज और रात्रिमें मन्द कही गयी है। |
| ४३४ | * मत्स्यपुराण * |
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| एवं गतिविशेषेण विभजन् रात्र्यहानि तु।<br>अजवीथ्यां दक्षिणायां लोकालोकस्य चोत्तरम्॥ ७९<br>लोकसंतानतो ह्येष वैश्वानरपथाद् बहिः।<br>व्युष्टिर्यावत्प्रभा सौरी पुष्करात् सम्प्रवर्तते॥ ८०<br>पार्श्वेभ्यो बाह्यतस्तावल्लोकालोकश्च पर्वतः।<br>योजनानां सहस्राणि दशोर्ध्वं चोच्छ्रितो गिरिः॥ ८१<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च पर्वतः परिमण्डलः।<br>नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह॥ ८२<br>अभ्यन्तरे प्रकाशन्ते लोकालोकस्य वै गिरेः।<br>एतावानेव लोकस्तु निरालोकस्ततः परम्॥ ८३<br>लोक आलोकने धातुर्निरालोकस्त्वलोकता।<br>लोकालोकौ तु संधत्ते तस्मात्सूर्यः परिभ्रमन्॥ ८४<br>तस्मात् संध्येति तामाहुरुषाव्युष्ट्यर्थथान्तरम्।<br>उषा रात्रिः स्मृता विप्रैर्व्युष्टिश्चापि अहःस्मृतम्॥ ८५<br><br>त्रिंशत्कलो मुहूर्तस्तु अहस्ते दश पञ्च च।<br>ह्रासो वृद्धिरहर्भागैर्दिवसानां यथा तु वै॥ ८६<br>संध्यामुहूर्तमात्रायां ह्रासवृद्धी तु ते स्मृते।<br>लेखाप्रभृत्यथादित्ये त्रिमुहूर्तगते तु वै॥ ८७<br>प्रातः स्मृतस्ततः कालो भागांश्चाहुश्च पञ्च च।<br>तस्मात् प्रातर्गतात् कालान्मुहूर्ताः सङ्गवस्त्रयः॥ ८८<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु तस्मात् कालादनन्तरम्।<br>तस्मान्मध्यंदिनात् कालादपराह्न इति स्मृतः॥ ८९<br>त्रय एव मुहूर्तास्तु काल एष स्मृतो बुधैः।<br>अपराह्नव्यतीताच्च कालः सायं स उच्यते॥ ९०<br>दश पञ्च मुहूर्ताह्नो मुहूर्तास्त्रय एव च।<br>दश पञ्चमुहूर्त्तं वै अहस्तु विषुवे स्मृतम्॥ ९१<br>वर्धयतो ह्रसत्येव अयने दक्षिणोत्तरे।<br>अहस्तु ग्रसते रात्रिं रात्रिस्तु ग्रसते अहः॥ ९२ | इस प्रकार अपनी विशेष गतिसे रात-दिनका विभाजन करते हुए सूर्य दक्षिण दिशामें अजवीथीसे गुजरते हुए लोकालोक पर्वतकी उत्तर दिशामें पहुँचते हैं। वहाँसे लोक-संतानक और वैश्वानर नामक पर्वतोंके बाहरी मार्गसे चलते हुए वे पुष्करद्वीपपर पहुँचते हैं। वहाँ सूर्यकी प्रभातकालिकी प्रभा होती है। इस मार्गके पार्श्वभागमें लोकालोक पर्वत पड़ता है, जो दस हजार योजन ऊँचा है। यह पर्वत मण्डलाकार है और इसका एक भाग प्रकाशयुक्त एवं दूसरा भाग तिमिराच्छन्न रहता है। इस लोकालोक पर्वतके भीतर सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और तारागणोंके साथ सभी ग्रह प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार जहाँतक प्रकाश होता है, उतनेको ही लोक माना गया है और शेष भाग निरालोक (तमसाच्छन्न) है। 'लोकृ' धातुका अर्थ दर्शन अर्थात् आलोकन है, इसलिये जो आलोक दृष्टिथसे दूर है, वह अनालोकता है। सूर्य परिभ्रमण करते हुए जिस समय लोकालोकपर्वत (प्रकाशित और अप्रकाशित प्रदेशकी संधि)-पर पहुँचते हैं, उस समयको संध्या कहते हैं। उषःकाल और व्युष्टिमें अन्तर है। ब्राह्मणोंने उषःकालको रात्रिमें और व्युष्टिको दिनमें परिगणित किया है॥ ७७-८५॥<br><br>तीस कलाका एक मुहूर्त होता है और एक दिनमें पंद्रह मुहूर्त होते हैं। जिस प्रकार अहर्गणके हिसाबसे दिनोंकी ह्रास-वृद्धि होती है, उसी तरह संध्याके मुहूर्तमें भी ह्रास-वृद्धि माने गये हैं। तीन-तीन मुहूर्तोंके हिसाबसे दिनके पाँच भाग माने गये हैं। सूर्योदय होनेके पश्चात् तीन मुहूर्ततकका काल प्रातःकाल कहा जाता है। उस प्रातःकालके व्यतीत होनेपर तीन मुहूर्ततकका समय संगवकाल कहलाता है। उस संगवकालके बाद तीन मुहूर्ततक मध्याह्न नामसे अभिहित होता है। उस मध्याह्नकालके बादका समय अपराह्न कहा जाता है। इसका भी समय विद्वानोंनें तीन मुहूर्त ही माना है। अपराह्नके बीत जानेके बादका काल सायं कहलाता है। इस प्रकार पंद्रह मुहूर्तोंका दिन तीन-तीन मुहूर्तोंके हिसाबसे पाँच भागोंमें विभक्त है। इसी प्रकार (रातमें भी १५ मुहूर्त होती है) दोनों विषुवोंमें (ठीक) पंद्रह मुहूर्तका दिन होता है—शरद् और वसन्त-ऋतुओंके मध्य (मेष-तुलासंक्रान्ति)-का समय विषुव कहलाता है, उत्तरायणमें दिन रात्रिको दक्षिणायनमें रात्रि दिनको |
| * अध्याय १२४ * | ४३५ |
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| शरद्वसन्तयोर्मध्यं विषुवं तु विधीयते।<br>आलोकान्तः स्मृतो लोको लोकाच्चालोक उच्यते॥ ९३<br>लोकपालाः स्थितास्तत्र लोकालोकस्य मध्यतः।<br>चत्वारस्ते महात्मानस्तिष्ठन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ ९४<br>सुधामा चैव वैराजः कर्दभश्च प्रजापतिः।<br>हिरण्यरोमा पर्जन्यः केतुमान् राजसश्च सः॥ ९५<br>निर्द्वन्द्वा निरभिमाना निस्तन्द्रा निष्परिग्रहाः।<br>लोकपालाः स्थितास्त्वेते लोकालोके चतुर्दिशम्॥ ९६ | ग्रसती है। जहाँतक सूर्यका प्रकाश पहुँचता है, उसे लोक कहते हैं और उस लोकके बाद जो तमसाच्छन्न प्रदेश है, उसे अलोक कहा जाता है। इसी लोक और अलोकके मध्यमें स्थित (लोकालोक) पर्वतपर चारों लोकपाल महाप्रलयपर्यन्त निवास करते हैं। उनके नाम हैं—वैराज सुधामा, प्रजापति कर्दम, पर्जन्य हिरण्यरोमा और राजस केतुमान्। ये सभी लोकपाल सुख-दुःख आदि द्वन्द्व, अभिमान, आलस्य और परिग्रहसे रहित होकर लोकालोकके चारों दिशाओंमें स्थित हैं॥ ८६—९६॥ | | उत्तरं यदगस्त्यस्य शृङ्गं देवर्षिसेवितम्।<br>पितृयाणः स्मृतः पन्था वैश्वानरपथाद् बहिः॥ ९७<br>तत्रासते प्रजाकामा ऋषयो येऽग्निहोत्रिणः।<br>लोकस्य संतानकराः पितृयाणे पथि स्थिताः॥ ९८<br>भूतारम्भकृतं कर्म आशिषश्च विशाम्पते।<br>प्रारभन्ते लोककामैस्तेषां पन्थाः स दक्षिणः॥ ९९<br>चलितं ते पुनर्धर्मं स्थापयन्ति युगे युगे।<br>संतततपसा चैव मर्यादाभिः श्रुतेन च॥ १००<br>जायमानास्तु पूर्वे वै पश्चिमानां गृहेषु ते।<br>पश्चिमाश्चैव पूर्वेषां जायन्ते निधनेष्विह॥ १०१<br>एवमावर्तमानास्ते वर्तन्त्याभूतसम्प्लवम्।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणां गृहमेधिनाम्॥ १०२<br>सवितुर्दक्षिणं मार्गमाश्रित्याभूतसम्प्लवम्।<br>क्रियावतां प्रसङ्ख्यैषा ये श्मशानानि भेजिरे॥ १०३<br>लोकसंव्यवहारार्थं भूतारम्भकृतेन च।<br>इच्छाद्वेषरताच्चैव मैथुनोपगमाच्च वै॥ १०४<br>तथा कामकृतेनेह सेवनाद् विषयस्य च।<br>इत्येतैः कारणैः सिद्धाः श्मशानानीह भेजिरे॥ १०५ | लोकालोक पर्वतका जो उत्तरी शिखर है, वह अगस्त्यशिखर कहलाता है। देवर्षिगण उसका सेवन करते हैं। वह वैश्वानर-मार्गसे बाहर है और पितृयाण-मार्गके नामसे प्रसिद्ध है। उस पितृयाण-मार्गपर प्रजाभिलाषी अग्निहोत्री तथा लोगोंको संतान प्रदान करनेवाले ऋषिगण निवास करते हैं। राजन्! लौकिक कामनाओंसे युक्त वे ऋषिगण अपने आशीर्वादके प्रयोगसे प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मको सफल बनाते हैं। उनका मार्ग दक्षिणायनमें है। वे प्रत्येक युगमें अपनी उग्र तपस्या तथा धर्मशास्त्रकी मर्यादाद्वारा मर्यादासे स्खलित हुए धर्मकी पुनः स्थापना करते हैं। इनमें जो पहले उत्पन्न हुए थे, वे अपनेसे पीछे उत्पन्न होनेवालोंके घरोंमें जन्म लेते हैं और पीछे उत्पन्न होनेवाले मृत्युके पश्चात् पूर्वजोंके गृहोंमें चले जाते हैं। इस प्रकार वे प्रलयपर्यन्त आवागमनके चक्करमें पड़े रहते हैं। इन क्रियानिष्ठ गृहस्थ ऋषियोंकी संख्या अठासी हजार है। ये सूर्यके दक्षिण मार्गका आश्रय लेकर प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। उन्हें श्मशानकी शरण लेनी पड़ती है अर्थात् ये मृत्युभागी होते हैं। लोक-व्यवहारकी रक्षाके लिये प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मोंकी पूर्ति, इच्छा, द्वेषपरता, स्त्री-सहवास तथा स्वेच्छापूर्वक सांसारिक विषयभोगोंका सेवन—इन्हीं कारणोंसे उन ऋषियोंको इस लोकमें सिद्ध होते हुए भी श्मशानमें जाना पड़ता है ॥ ९७—१०५ ॥ | | प्रजैषिणः सप्तर्षयो द्वापरेष्विह जज्ञिरे।<br>संततिं ते जुगुप्सन्ते तस्मान्मृत्युजितस्तु तैः॥ १०६<br>अष्टाशीतिसहस्राणि तेषामप्यूर्ध्वरेतसाम्।<br>उदक्पन्थानमाश्रित्य तिष्ठन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ १०७ | द्वापरयुगमें प्रजाभिलाषी सात ऋषि इस मृत्युलोकमें उत्पन्न हुए थे, किंतु आगे चलकर उन्हें संततिसे घृणा हो गयी, जिससे उन्होंने मृत्युको जीत लिया। इन ऊर्ध्वरेता ऋषियोंकी संख्या अठासी हजार है। ये सूर्यके उत्तर मार्गका आश्रय लेकर प्रलयपर्यन्त विद्यमान रहते हैं। |
४३६ * मत्स्यपुराण *
| ते सम्प्रयोगाल्लोकस्य मिथुनस्य च वर्जनात्।<br>ईर्ष्याद्वेषनिवृत्त्या च भूतारम्भविवर्जनात् ॥ १०८<br>ततोऽन्यकामसंयोगशब्दादेर्दोषदर्शनात् ।<br>इत्येतैः कारणैः शुद्धैस्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे ॥ १०९<br>आभूतसम्प्लवस्थानममृतत्वं विभाव्यते ।<br>त्रैलोक्यस्थितिकालो हि न पुनर्मार्गगामिनाम् ॥ ११०<br>ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां पुण्यपापकृतोऽपरम् ।<br>आभूतसम्प्लवान्ते तु क्षीयन्ते चोर्ध्वरेतसः ॥ १११<br>ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्रानुसंस्थितः ।<br>एतद् विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भास्वरम् ॥ ११२<br>यत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णोः परमं पदम् ।<br>धर्मे ध्रुवस्य तिष्ठन्ति ये तु लोकस्य काङ्क्षिणः ॥ ११३ | वे लोक-कल्याणकर्ता, स्त्री-पुरुष-सम्पर्करहित, ईर्ष्या, द्वेष आदिसे निवृत्त, प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मोंके त्यागी तथा अन्यान्य कामसम्बन्धी वासनामय शब्दोंमें दोषदर्शी होते हैं। इन शुद्ध कारणोंसे सम्पन्न होनेके कारण उन्हें अमरताकी प्राप्ति हुई। प्रलयपर्यन्त स्थित रहनेवाले नैष्ठिक ऋषियोंका त्रिलोकीकी स्थितितक वर्तमान रहना अमरत्व कहलाता है। यह कामासक्त व्यक्तियोंको नहीं प्राप्त होता। ब्रह्महत्याजन्य पाप और अश्वमेधजन्य पुण्यसे ही इनमें अन्तर आता है। (भाव यह कि जैसे घोर पाप और महान् पुण्य प्रलयपर्यन्त जीवात्माके साथ लगे रहते हैं, बीचमें नष्ट नहीं होते, वैसे ही ऊर्ध्वरेताका शरीर भी तबतक स्थित रहता है।) सप्तर्षिमण्डलके ऊपर उत्तर दिशामें जहाँ ध्रुवका निवास है, वहीं भगवान् विष्णुका तीसरा दिव्य पद स्थित हुआ था, जो (अब भी) आकाशमें उद्भासित होता रहता है। भगवान् विष्णुके उस परमपदको प्राप्त कर लेनेपर जीवोंको शोक नहीं करना पड़ता। इसलिये जिन्हें ध्रुवलोक प्राप्त करनेकी आकाङ्क्षा होती है, वे सदा धर्म-सम्पादनमें ही लगे रहते हैं॥ १०८-११३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे चन्द्रसूर्यभुवनविस्तारो नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें चन्द्र-सूर्य-भुवन-विस्तार नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२४॥
एक सौ पचीसवाँ अध्याय
सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
| एवं श्रुत्वा कथां दिव्याम्बुवाँल्लोमहर्षणिम्।<br>सूर्यचन्द्रमसोश्चारं ग्रहाणां चैव सर्वशः ॥ १ | इस प्रकार सूर्य और चन्द्रमाकी गति तथा सभी ग्रहोंके गतिचारकी सारी दिव्य कथाको सुनकर शौनकादि ऋषिगण लोमहर्षणके पुत्र सूतजीसे बोले ॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>भ्रमन्ति कथमेतानि ज्योतींषि रविमण्डले।<br>अव्यूहेनैव सर्वाणि तथा चासंकरेण वा ॥ २<br>कश्च भ्रामयते तानि भ्रमन्ति यदि वा स्वयम्।<br>एतद् वेदितुमिच्छामस्ततो निगद सत्तम ॥ ३ | ऋषियोंने पूछा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी ! ये ग्रह, नक्षत्र आदि ज्योतिर्गण तिर्यग्व्यूहमें निबद्ध हो सूर्यमण्डलमें किस प्रकार घूमते हैं? ये सभी परस्पर मिलकर घूमते हैं अथवा पृथक्-पृथक्? इन्हें कोई घुमाता है या ये स्वयं घूमते हैं? हमें इस रहस्यको जाननेकी विशेष उत्कण्ठा है, अतः आप इसका वर्णन कीजिये ॥२-३॥ |
| सूत उवाच<br>भूतसम्मोहनं ह्येतद् ब्रुवतो मे निबोधत।<br>प्रत्यक्षमपि दृश्यं तत् सम्मोहयति वै प्रजाः ॥ ४ | सूतजी कहते हैं — ऋषियो! यह विषय प्राणियोंको मोहमें डाल देनेवाला है; क्योंकि यह प्रत्यक्षरूपसे दृश्य होनेपर भी प्रजाओंको मोहित कर देता है। मैं इसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये! |
| * अध्याय १२५ * | ४३७ |
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| योऽसौ चतुर्दशर्क्षेषु शिशुमारो व्यवस्थितः।<br>उत्तानपादपुत्रोऽसौ मेढीभूतो ध्रुवो दिवि॥ ५<br>सैष भ्रमन् भ्रामयते चन्द्रादित्यौ ग्रहैः सह।<br>भ्रमन्तमनुसर्पन्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्॥ ६<br>ध्रुवस्य मनसा यो वै भ्रमते ज्योतिषां गणः।<br>वातानीकमयैर्बन्धैर्ध्रुवे बद्धः प्रसर्पति॥ ७<br>तेषां भेदाश्च योगश्च तथा कालस्य निश्चयः।<br>अस्तोदयास्तथोत्पाता अयने दक्षिणोत्तरे॥ ८<br>विषुवद्ग्रहवर्णश्च सर्वमेतद् ध्रुवेरितम्।<br>जीमूता नाम ते मेघा यदेभ्यो जीवसम्भवः॥ ९<br>द्वितीय आवहन् वायुर्मेघास्ते त्वभिसंश्रिताः।<br>इतो योजनमात्राच्च अध्यर्धविकृता अपि॥ १०<br>वृष्टिसर्गस्तथा तेषां धारासारः प्रकीर्तितः।<br>पुष्करावर्तका नाम ते मेघाः पक्षसम्भवाः॥ ११<br>शक्रेण पक्षाश्छिन्ना वै पर्वतानां महौजसा।<br>कामगानां समृद्धानां भूतानां नाशमिच्छताम्॥ १२<br>पुष्करा नाम ते पक्षा बृहन्तस्तोयधारिणः।<br>पुष्करावर्तका नाम कारणेनेह शब्दिताः॥ १३<br>नानारूपधराश्चैव महाघोरस्वराश्च ते।<br>कल्पान्तवृष्टिकर्तारः कल्पान्ताग्नेर्नियामकाः॥ १४<br>वाय्वाधारा वहन्ते वै सामृताः कल्पसाधकाः।<br>यान्यस्याण्डस्य भिन्नस्य प्राकृतान्यभवंस्तदा॥ १५<br>यस्मिन् ब्रह्मा समुत्पन्नश्चतुर्वक्त्रः स्वयं प्रभुः।<br>तान्येवाण्डकपालानि सर्वे मेघाः प्रकीर्तिताः॥ १६<br>तेषामाप्यायनं धूमः सर्वेषामविशेषतः।<br>तेषां श्रेष्ठश्च पर्जन्यश्चत्वारश्चैव दिग्गजाः॥ १७<br>गजानां पर्वतानां च मेघानां भोगिभिः सह।<br>कुलमेकं द्विधाभूतं योनिरेका जलं स्मृतम्॥ १८ | आकाशमण्डलमें जो यह (चौदह) नक्षत्रोंके मध्यमें स्थित शिशुमार¹ नामक चक्र है वही उत्तानपादका पुत्र ध्रुव है, जो (उस चक्रमें) मेंढीके² समान है। वह ध्रुव स्वयं भ्रमण करता हुआ ग्रहोंके साथ सूर्य और चन्द्रमाको भी घुमाता है। नक्षत्रगण भी चक्रकी भाँति घूमते हुए ध्रुवके पीछे-पीछे चलते हैं। जो ज्योतिर्गण वायुमय बन्धनोंद्वारा ध्रुवमें निबद्ध है, वह ध्रुवके मानसिक संकल्पसे ही घूमता है। उन ज्योतिर्गणोंके भेद, योग, कालका निश्चय, अस्त, उदय, उत्पात, उत्तरायण एवं दक्षिणायनमें गमन, विषुवत् रेखापर स्थिति और ग्रहोंके वर्ण आदि सभी कार्य ध्रुवकी प्रेरणासे होते हैं। (भगणके नीचे मेघ हैं।) जिनसे जीवोंकी उत्पत्ति होती है, उन मेघोंको जीमूत कहते हैं। वे मेघ यहाँसे एक योजन दूर आवह नामक दूसरी वायुके आश्रयपर टिके हुए हैं। उनमें कुछ विकार उत्पन्न हो जानेपर वे ही वृष्टि करते हैं, जो महावृष्टि कही जाती है। पूर्वकालमें महान् ओजस्वी इन्द्रने प्राणियोंके कल्याणकी भावनासे स्वच्छन्दचारी एवं समृद्धिशाली पर्वतोंके पंखोंको काट डाला था। उन पंखोंसे उत्पन्न हुए मेघोंको पुष्करावर्तक कहते हैं। पर्वतोंके पंखोंका नाम पुष्कर था, वे बहुत बड़े-बड़े और जलसे भी परिपूर्ण थे, इसी कारण वे मेघ भी पुष्करावर्तक नामसे कहे गये हैं। ये अनेकों प्रकारके रूप धारण करनेवाले, महान् भयंकर गर्जनासे युक्त, कल्पान्तके समय वृष्टि करनेवाले, कल्पान्तकी अग्निके प्रशामक, अमृतयुक्त और कल्प अर्थात् प्रलयके साधक हैं॥ ४-१४॥<br><br>वे वायुके आधारपर चलते-फिरते हैं। इस अण्डके विदीर्ण होनेपर उससे जो प्राकृतिक कपाल निकले थे और जिसमें सामर्थ्यशाली स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे, उन्हीं अण्डकपालोंको सभी मेघोंके रूपमें बतलाया जाता है। उन सभी मेघोंको समानरूपसे तृप्त करनेवाला धूम है। उनमें पर्जन्य नामक मेघ सबसे श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त ऐरावत, वामन, अञ्जन आदि चार दिग्गज हैं। हाथी, पर्वत, मेघ और सर्प—इन सबका कुल एक है जो दो भागोंमें विभक्त हो गया है; परंतु इनकी योनि (उत्पत्ति-स्थान) एक ही है, जो जल नामसे कही जाती |
१. शिशुमार (सूँस) एक जलीय जन्तु होता है, जो प्रायः सर्पवत् वृत्ताकार कुण्डल (गेंडुर) मारकर स्थित रहता है। उसके समान स्थितिको 'शिशुमार' चक्र कहते हैं। उसीके समान गोल होनेसे नक्षत्रमण्डलकी उससे उपमा दी गयी है।
२. दौरीके केन्द्रमें स्थित खम्भेको मेंढ़ी कहते हैं। उसके आश्रयपर कई बैल चलकर अन्नकणोंको रौंदते हैं। इस सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये श्रीमद्भागवत तथा विष्णुपुराण देखना चाहिये।
१२७- ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा
| ४३८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| पर्जन्यो दिग्गजाश्चैव हेमन्ते शीतसम्भवम्।<br>तुषारवर्षं वर्षन्ति वृद्धा ह्यन्नविवृद्धये॥ १९<br>षष्ठः परिवहो नाम वायुस्तेषां परायणः।<br>योऽसौ बिभर्ति भगवान् गङ्गामाकाशगोचराम्॥ २०<br>दिव्यामृतजलां पुण्यां त्रिपथामिति विश्रुताम्।<br>तस्या विस्पन्दितं तोयं दिग्गजाः पृथुभिः करैः॥ २१<br>शीकरान् सम्प्रमुञ्चन्ति नीहार इति स स्मृतः।<br>दक्षिणेन गिरेर्योऽसौ हेमकूट इति स्मृतः॥ २२<br>उदङ् हिमवतः शैलस्योत्तरे चैव दक्षिणे।<br>पुण्ड्रं नाम समाख्यातं नगरं तत्र वै स्मृतम्॥ २३<br>तस्मिन् प्रवर्तते वर्षं तत् तुषारसमुद्भवम्।<br>ततो हिमवतो वायुर्हिमं तत्र समुद्भवम्॥ २४<br>आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चमानो महागिरिम्।<br>हिमवन्तमतिक्रम्य वृष्टिशेषं ततः परम्॥ २५<br>इभास्ये च ततः पश्चादिदं भूतविवृद्धये।<br>वर्षद्वयं समाख्यातं सम्यग् वृष्टिविवृद्धये॥ २६<br>मेघाश्चाप्यायनं चैव सर्वमेतत् प्रकीर्तितम्।<br>सूर्य एव तु वृष्टीनां स्रष्टा समुपदिश्यते॥ २७<br>वर्षं घर्मं हिमं रात्रिं संध्ये चैव दिनं तथा।<br>शुभाशुभफलानीह ध्रुवात् सर्वं प्रवर्तते॥ २८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चापः सूर्यो संगृह्य तिष्ठति।<br>सर्वभूतशरीरेषु त्वापो ह्यानुश्रिताश्च याः॥ २९<br>दह्यमानेषु तेष्वेह जङ्गमस्थावरेषु च।<br>धूमभूतास्तु ता ह्यापो निष्क्रमन्तीह सर्वशः॥ ३०<br>तेन चाभ्राणि जायन्ते स्थानमभ्रमयं स्मृतम्।<br>तेजोभिः सर्वलोकेभ्य आदत्ते रश्मिभिर्जलम्॥ ३१<br>समुद्राद् वायुसंयोगाद् वहन्त्यापो गभस्तयः।<br>ततस्त्वृतुवशात्काले परिवर्तन् दिवाकरः॥ ३२<br>नियच्छत्यापो मेघेभ्यः शुक्लाः शुक्लैस्तु रश्मिभिः।<br>अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः॥ ३३<br>ततो वर्षति षण्मासान् सर्वभूतविवृद्धये।<br>वायुभिः स्तनितं चैव विद्युतस्त्वग्निजाः स्मृताः॥ ३४ | है। पर्जन्य मेघ और चारों वृद्ध दिग्गज हेमन्त-ऋतुमें अन्नकी वृद्धिके लिये शीतसे उत्पन्न हुए तुषारकी वर्षा करते हैं। परिवह नामक छठी वायु इनका आश्रय है। यह ऐश्वर्यशाली पवन आकाशगामिनी गङ्गाको, जो दिव्य अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण, पुण्यमयी तथा त्रिपथगा नामसे विख्यात हैं, धारण करता है, गङ्गासे निकले हुए जलको दिग्गज अपने मोटे-मोटे शुण्डोंसे फुहारेके रूपमें छोड़ते हैं। उसे नीहार (कुहासा) कहते हैं। दक्षिण पार्श्वमें जो पर्वत है, वह हेमकूट नामसे प्रसिद्ध है। वह हिमालय पर्वतके उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंमें फैला हुआ है। वहाँ पुण्ड्र नामक एक प्रसिद्ध नगर है। उसी नगरमें वह तुषारसे उत्पन्न हुई वर्षा होती है। तदनन्तर हिमवान् पर्वतसे उद्भूत हुई वायु वहाँ उत्पन्न हुए शीकरों को अपने साथ ले आती है और बड़े वेगसे उस महान् गिरिको सींचती हुई उसका अतिक्रमण करके इभास्य नामक वर्षमें निकल जाती है। तत्पश्चात् प्राणियोंकी वृद्धिके लिये वहाँ शेष वृष्टि होती है। पहले जिन दो वर्षोंका वर्णन किया गया है, उनमें अच्छी तरह वृष्टि होती है। इस प्रकार मैंने मेघों तथा उनसे उत्पन्न हुई सारी वृष्टिका वर्णन कर दिया॥ १५—२६ १/२॥<br><br>सूर्य ही सब प्रकारकी वृष्टियोंके मूल कारण कहे जाते हैं। इस लोकमें वर्षा, धूप, हिम, रात्रि, दिन, दोनों संध्याएँ और शुभ एवं अशुभ कर्मोंके फल ध्रुवसे प्रवर्तित होते हैं। ध्रुवद्वारा अधिष्ठित जलको सूर्य ग्रहण करते हैं। जल सभी प्राणियोंके शरीरोंमें परमाणुरूपसे स्थित है। इसी कारण स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके शरीरोंके जलाये जानेपर उनमेंसे वह जल धुएँके रूपमें बाहर निकलता है। उसी धूमसे बादल बनते हैं, इसलिये धूमको अभ्रमय स्थान कहा जाता है। सूर्य अपनी तेजोमयी किरणोंद्वारा सभी लोक (स्थानों)-से जल ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार वे ही किरणें वायुके संयोगसे समुद्रसे भी जल खींचती हैं। तदनन्तर सूर्य ऋतुओंके अनुसार समय-समयपर जलको परिवर्तित कर अपनी श्वेत किरणोंद्वारा वह शुद्ध जल मेघोंको देते हैं। तब वायुद्वारा प्रेरित हुआ वह मेघस्थित जल वर्षके रूपमें भूतलपर गिरता है। इस प्रकार सूर्य सभी प्राणियोंकी समृद्धिके निमित्त छः महीनेतक वर्षा करते हैं। उस समय वायुके आघातसे मेघ-निर्घोष भी होता है। (बिजली भी चमकती है।) ये बिजलियाँ अग्निसे प्रादुर्भूत बतलायी जाती हैं। |
* अध्याय १२५ * <span style="float: right;">४३९</span>
| मेहनाच्च मिहेर्धार्तोर्मेघत्वं व्यञ्जयन्ति च।<br>न भ्रश्यन्ते ततो ह्यापस्तस्मादब्भ्रस्य वै स्थितिः।<br>स्रष्टासौ वृष्टिसर्गस्य ध्रुवेणाधिष्ठितो रविः॥ ३५<br><br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः।<br>ग्रहात्रिवृत्त्या सूर्यात्तु चरते ऋक्षमण्डलम्॥ ३६<br><br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठितम्।<br>अतः सूर्यरथस्यापि सन्निवेशं प्रचक्षते।<br>स्थितेन त्वेकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणाभिना॥ ३७ | 'मिह सेचने' अर्थात् 'मिह' धातु सेचन अथवा मेहनके अर्थमें प्रयुक्त होती है, इसलिये 'मिह'—धातुसे मेघ शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'अपो विभ्रति' या 'न भ्रश्यन्ते आपो यस्मात्' जिससे जल नहीं गिरते, उसे अब्भ्र या अभ्र कहते हैं। इस तरह ध्रुवद्वारा अधिकृत सूर्य वृष्टिसर्गकी सृष्टि करते हैं। पुनः ध्रुवद्वारा नियुक्त वायु उस वृष्टिका संहार करती है। नक्षत्रमण्डल सूर्यमण्डलसे निवृत्त होकर विचरण करता है और जब विचरण समाप्त हो जाता है, तब ध्रुवद्वारा अधिष्ठित सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है॥ २७—३६ १/२॥ |
| हिरण्मयेनाणुना वै अष्टचक्रैकनेमिना।<br>चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसर्पिणा॥ ३८<br><br>शतयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।<br>द्विगुणश्च रथो पस्थादीषादण्डः प्रमाणतः॥ ३९<br><br>स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथो ह्यर्थवशेन तु।<br>असङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः पवनगैर्हयैः॥ ४०<br><br>छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यथाचक्रं समास्थितैः।<br>वारुणस्य रथस्येह लक्षणैः सदृशश्च सः॥ ४१<br><br>तेनासौ चरति व्योम्नि भास्वाननुदिनं दिवि।<br>अथाङ्गानि तु सूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य च।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम्॥ ४२<br><br>अहर्नाभिस्तु सूर्यस्य एकचक्रस्य वै स्मृतः।<br>अराः संवत्सरास्तस्य नेम्यः षडृतवः स्मृताः॥ ४३<br><br>रात्रिर्रवरूथो घर्मश्च ध्वज ऊर्ध्वं व्यवस्थितः।<br>अक्षकोट्योर्युगान्यस्य आर्तवाहाः कलाः स्मृताः॥ ४४<br><br>तस्य काष्ठा स्मृता घोणा दन्तपङ्क्तिः क्षणास्तु वै।<br>निमेषश्चानुकर्षोऽस्य ईषा चास्य कला स्मृता॥ ४५<br><br>युगाक्षकोटी ते तस्य अर्थकामावुभौ स्मृतौ।<br>सप्ताश्वरूपपाश्छन्दांसि वहन्ते वायुरांहसा॥ ४६ | इसके बाद अब सूर्यके रथकी रचना बतलायी जाती है। उसमें एक पहिया, पाँच अरे (अरगजे) और तीन नाभियाँ हैं। उस चक्रकी नेमि (घेरे)-में स्वर्णमयी आठ छोटी-छोटी पुट्ठियाँ लगी हैं। ऐसे उद्दीप्त एवं शीघ्रगामी रथपर बैठकर सूर्य विचरण करते हैं। उस रथकी लम्बाई एक लाख योजन बतलायी जाती है। उसका ईषादण्ड (हरसा) रथके उपस्थ (मध्यभाग)-से प्रमाणमें दुगुना है। ब्रह्माने किसी मुख्य प्रयोजनवश उस रथका निर्माण किया था। उसका असङ्ग (वह रस्सी, जिससे घोड़े रथमें बँधे रहते हैं) दिव्य एवं स्वर्णमय है। उसमें पवनके समान शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। चक्रके अनुकूल चलनेवाले छन्द ही उन घोड़ोंके रूपमें उपस्थित होते हैं। वह रथ वरुणके रथके लक्षणोंसे मिलता-जुलता-सा है। उसी रथसे सूर्य प्रतिदिन गगन-मण्डलमें विचरते हैं। सूर्यके अङ्गों तथा रथके अवयवोंकी समतामें क्रमशः कल्पना की गयी है। दिनको सूर्यके एक पहियेवाले रथकी नाभि कहा जाता है। वर्ष उसके अरे और छहों ऋतुएँ उसकी नेमि कहलाती हैं। रात्रि उसका वरूथ (कवच, बख्तर) और धूप ऊपर फहरानेवाला ध्वज है। चारों युग इसके धुरेके दोनों छोर हैं और कलाएँ आर्तवाह कही गयी हैं। काष्ठा उसकी नासिका तथा क्षण उसके दाँतोंकी पङ्क्तियाँ हैं। निमेषको इसका अनुकर्ष (रथका तला) और कलाको ईषा (हरसा) कहते हैं। उनके जुएके दोनों छोर अर्थ और काम कहलाते हैं॥ ३७—४५ १/२॥ |
| गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुप्तथैव च।<br>पङ्क्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव तु सप्तमः॥ ४७ | गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती और उष्णिक्—ये सातों छन्द सातों घोड़ोंके रूपमें हैं, जो वायु-वेगसे रथको वहन करते हैं। |
१२८- देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
४४० * मत्स्यपुराण *
| चक्रमक्षे निबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः।<br>सहचक्रो भ्रमत्यक्षः सहाक्षो भ्रमति ध्रुवः॥ ४८<br>अक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः।<br>एवमर्थवशात् तस्य सन्निवेशो रथस्य तु॥ ४९<br>तथा संयोगभागेन सिद्धो वै भास्करो रथः।<br>तेनाऽसौ तरणिर्देवो नभसः सर्पते दिवम्॥ ५०<br>युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य तु।<br>भ्रमतो भ्रमतो रश्मी तौ चक्रयुगयोस्तु वै॥ ५१<br>मण्डलानि भ्रमेतेऽस्य खेचरस्य रथस्य तु।<br>कुलालचक्रभ्रमवन्मण्डलं सर्वतोदिशम्॥ ५२<br>युगाक्षकोटी ते तस्य वातोर्मी स्यन्दनस्य तु।<br>संक्रमते ध्रुवमहो मण्डले सर्वतोदिशम्॥ ५३<br>भ्रमतस्तस्य रश्मी ते मण्डले तूत्तरायणे।<br>वर्धते दक्षिणेष्ष्वत्र भ्रमतो मण्डलानि तु॥ ५४<br>युगाक्षकोटी सम्बद्धौ द्वे रश्मी स्यन्दनस्य ते।<br>ध्रुवेण प्रगृहीतौ तौ रश्मी धारयता रविम्॥ ५५<br>आकृष्येते यदा ते तु ध्रुवेण समधिष्ठिते।<br>तदा सोऽभ्यन्तरे सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु॥ ५६<br>अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरुभयोश्चरन्।<br>ध्रुवेण मुच्यमानेन पुना रश्मियुगेन च॥ ५७<br>तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।<br>उद्वेष्टयन् वै वेगेन मण्डलानि तु गच्छति॥ ५८ | इस रथका चक्र अक्षमें बँधा हुआ है और वह अक्ष ध्रुवसे संलग्न है। इसलिये चक्रके साथ अक्ष और अक्षके साथ ध्रुव घूमता रहता है। इस प्रकार ध्रुवद्वारा प्रेरित अक्ष चक्रके साथ ही घूमता है। किसी मुख्य प्रयोजनवश ब्रह्माने इस रथका निर्माण किया है तथा इस प्रकारके अवयवोंके संयोगसे यह सूर्यका रथ सिद्ध हुआ है। इसी रथसे सूर्यदेव आकाशमण्डलमें भ्रमण करते हैं। उस रथके जुए और धुरेके छोर दाहिनी ओरसे घूमते हैं। जब वह रथ आकाशमें मण्डलाकार घूमता है, उस समय उसकी किरणें भी मण्डलाकार घूमती-सी दीख पड़ती हैं। यह मण्डल कुम्हारके चाककी भाँति चारों दिशाओंमें घूमता है। उस रथकी दोनों युगाक्षकोटि और वातोर्मिके चारों दिशाओंमें मण्डलाकार घूमते समय उस रथकी किरणें बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें घट जाती हैं। वे दोनों किरणें रथकी युगाक्षकोटिमें बँधी हुई हैं और वे ध्रुवमें निबद्ध हैं। ये सूर्यसे भी सम्बद्ध हैं। ध्रुव जब उन दोनों किरणोंको खींचते हैं, तब सूर्य मण्डलके अन्तर्गत ही भ्रमण करते हैं। उस समय सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंमें चक्कर लगाते हैं। पुनः जब ध्रुव दोनों किरणोंको छोड़ देते हैं, तब सूर्य मण्डलोंके बाह्य भागमें घूमने लगते हैं। उस समय वे मण्डलोंको उद्वेष्टित करते हुए बड़े वेगसे चलते हैं॥ ४६—५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोश सूर्याचन्द्रमसोश्चारो नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सूर्य-चन्द्रमाकी गति नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२५॥
एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
सूर्य-रथ* पर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति
| सूत उवाच<br>स रथोऽधिष्ठितो देवैर्मासि मासि यथाक्रमम्।<br>ततो वहत्यथादित्यं बहुभिर्ऋषिभिः सह॥ १<br>गन्धर्वरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासौ द्वौ द्वौ क्रमेण च॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! सूर्यका वह रथ प्रत्येक मासमें क्रमशः देवताओंद्वारा अधिष्ठित रहता है। इस प्रकार वह बहुत-से ऋषियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों और राक्षसोंके साथ सूर्यको वहन करता है। ये सभी देवगण दो-दो मासके क्रमसे सूर्यके निकट |
* यह विषय भी भागवत स्कन्ध १२, अ० ११, वायुपुराण अ० ५२ तथा अन्य विष्णु आदि सभी पुराणोंमें स्वल्पान्तरसे प्राप्त होता है।
- अध्याय १२६ * | ४४१ ---|---
| धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः।<br>उरगौ वासुकिश्चैव संकीर्णश्चैव तावुभौ॥ ३<br>तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ।<br>क्रतुस्थलाप्सराश्चैव तथा वै पुञ्जिकस्थला॥ ४<br>ग्रामण्यौ रथकृत्तस्य रथौजाश्चैव तावुभौ।<br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानावुभौ स्मृतौ॥ ५<br>मधुमाधवयोर्ह्येष गणो वसति भास्करे।<br>वसन् ग्रीष्मे तु द्वौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च वै॥ ६<br>ऋषिरत्रिर्वसिष्ठश्च नागौ तक्षकरम्भकौ।<br>मेनका सहजन्या च हाहा हूहूश्च गायकौ॥ ७<br>रथन्तरश्च ग्रामण्यौ रथकृच्चैव तावुभौ।<br>पुरुषादो वधश्चैव यातुधानौ तु तौ स्मृतौ॥ ८<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासयोः शुचिशुक्रयोः।<br>ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्ति स्म देवताः॥ ९<br>इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च।<br>एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च पन्नगः॥ १०<br>विश्वावसुसुषेणौ च प्रातश्चैव रथश्च हि।<br>प्रम्लोचेत्यप्सराश्चैव निम्लोचन्ती च ते उभे॥ ११<br>यातुधानस्तथा हेतिर्व्याघ्रश्चैव तु तावुभौ।<br>नभस्यनभसोरेतैर्वसन्तिश्च दिवाकरे॥ १२ | निवास करते हैं। धाता और अर्यमा दो देव, प्रजापति पुलस्त्य और प्रजापति पुलह दो ऋषि, वासुकि और संकीर्ण दो नाग, गायकोंमें श्रेष्ठ तुम्बुरु और नारद दो गन्धर्व, क्रतुस्थला और पुञ्जिकस्थला दो अप्सराएँ, रथकृत् और रथौजा दो ग्रामणी, हेति और प्रहेति दो राक्षस—इन सबका दल चैत्र और वैशाखमासमें सूर्यके रथपर निवास करता है। ग्रीष्म-ऋतुके ज्येष्ठ और आषाढ़मासमें मित्र और वरुण देवता, अत्रि और वसिष्ठ ऋषि, तक्षक और रम्भक नाग, मेनका और सहजन्या अप्सरा, हाहा और हूहू गन्धर्व, रथन्तर और रथकृत् ग्रामणी, पुरुषाद और वध राक्षस—ये सभी सूर्यके निकट रहते हैं। इसी प्रकार श्रावण और भाद्रपद-मासमें इन्द्र और विवस्वान् देवता, अङ्गिरा और भृगु ऋषि, एलापत्र और शंखपाल नामक नाग, विश्वावसु और सुषेण गन्धर्व, प्रात और रथ नामक ग्रामणी, प्रम्लोचा और निम्लोचन्ती अप्सरा तथा हेति और व्याघ्र राक्षस—ये सभी सूर्यके रथपर निवास करते हैं॥ १—१२॥ | | मासौ द्वौ देवताः सूर्ये वसन्ति च शरद्ऋतौ।<br>पर्जन्यश्चैव पूषा च भरद्वाजः सगौतमः॥ १३<br>चित्रसेनश्च गन्धर्वस्तथा वा सुरुचिश्च यः।<br>विश्वाची च घृताची च उभे ते पुण्यलक्षणे॥ १४<br>नागश्चैरावतश्चैव विश्रुतश्च धनञ्जयः।<br>सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीस्तथा॥ १५<br>आपो वातश्च द्वावेतौ यातुधानावुभौ स्मृतौ।<br>वसन्ते ते च वै सूर्ये मासयोश्च त्विषोर्जयोः॥ १६<br>हैमन्तिकौ च द्वौ मासौ निवसन्ति दिवाकरे।<br>अंशो भगश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुश्च तौ॥ १७<br>भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा।<br>चित्रसेनश्च गन्धर्वः पूर्णायुश्चैव गायनौ॥ १८<br>अप्सराः पूर्वचित्तिश्च तथैव ह्युर्वशी च या।<br>तक्षावारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ॥ १९ | शरद्-ऋतुमें भी दो मासतक देवगण सूर्यके निकट वास करते हैं। पर्जन्य और पूषा देवता, भरद्वाज और गौतम ऋषि, चित्रसेन और सुरुचि गन्धर्व, शुभ लक्षणोंवाली विश्वाची और घृताची अप्सराएँ, ऐरावत और सुप्रसिद्ध धनञ्जय नाग, सेनजित् और सेनानायक सुषेण ग्रामणी, आप और वात नामक दो राक्षस—ये सभी आश्विन और कार्तिकमासमें सूर्यके रथपर अधिरोहण करते हैं। हेमन्त-ऋतुके दो महीने मार्गशीर्ष और पौषमें अंश और भग देवता, कश्यप और क्रतु ऋषि, महापद्म और कर्कोटक नाग, गानविद्यामें निपुण चित्रसेन और पूर्णायु गन्धर्व, पूर्वचित्ति और उर्वशी अप्सरा, तक्षाव और अरिष्टनेमि नामक सेनापति एवं ग्रामणी, |
| ४४२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विद्युत्सूर्यश्च तावुग्रौ यातुधानौ तु तौ स्मृतौ।<br>सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे॥ २०<br><br>ततस्तु शिशिरे चापि मासयोर्निवसन्ति ते।<br>त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निर्विश्वामित्रस्तथैव च॥ २१<br><br>काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ।<br>गन्धर्वो धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च तावुभौ॥ २२<br><br>तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोरमा।<br>ग्रामणी ऋतजिच्चैव सत्यजिच्च महाबलः॥ २३<br><br>ब्रह्मोपेतश्च वै रक्षो यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>इत्येते निवसन्ति स्म द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ २४ | विद्युत् और सूर्य नामक दो उग्र राक्षस—ये सभी सूर्यके निकट वास करते हैं। तत्पश्चात् शिशिर-ऋतुके माघ और फाल्गुनमासोंमें त्वष्टा और विष्णु देवता, जमदग्नि और विश्वामित्र ऋषि, कद्रूके पुत्र कम्बल और अश्वतर नाग, धृतराष्ट्र और सूर्यवर्चा गन्धर्व, तिलोत्तमा और मनोहारिणी रम्भा देवी अप्सरा, महाबली ऋतजित् और सत्यजित् ग्रामणी, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत राक्षस—ये सभी सूर्यके रथपर अधिरूढ़ होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक दो मासके अन्तरसे ये सभी क्रमशः सूर्यके निकट निवास करते हैं॥ १३—२४॥ |
| स्थानाभिमानिनो ह्येते गणां द्वादश सप्तकाः।<br>सूर्यमापादयन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम्॥ २५<br><br>ग्रथितैस्तु वचोभिश्च स्तुवन्ति ऋषयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतनृत्यैरुपासते॥ २६<br><br>विद्याग्रामणिनो यक्षाः कुर्वन्त्याभीषुसंग्रहम्।<br>सर्पाः सर्पन्ति वै सूर्ये यातुधानानुयान्ति च॥ २७<br><br>वालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद् रविम्।<br>एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः॥ २८<br><br>यथायोगं यथाधर्मं यथातत्त्वं यथाबलम्।<br>तपत्यसौ यथा सूर्यस्तेषां सिद्धिश्च तेजसा॥ २९<br><br>भूतानामशुभं सर्वं व्यपोहति स्वतेजसा।<br>मानवानां शुभैर्होतैर्हियते दुरितं तु वै॥ ३०<br><br>दुरितं हि प्रचाराणां व्यपोहन्ति क्वचित् क्वचित्।<br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति सानुगा दिवि॥ ३१<br><br>तपन्तश्च जपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।<br>गोपायन्ति स्म भूतानि ईहन्ते ह्यनुकम्पया॥ ३२<br><br>स्थानाभिमानिनां ह्येतत्स्थानं मन्वन्तरेषु वै।<br>अतीतानां गतानां च वर्तन्ते साम्प्रतं च ये॥ ३३<br><br>एवं वसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश।<br>चतुर्दशेषु वर्तन्ते गणा मन्वन्तरेषु वै॥ ३४ | ये बारह सप्तक (देव, ऋषि, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, ग्रामणी और राक्षस) गण अपने-अपने स्थानके अभिमानी देवता हैं। ये अपने तेजसे सूर्यके तेजको उत्कृष्ट कर देते हैं। वहाँ ऋषिगण स्वरचित वचनों—स्तोत्रोंद्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं तथा गन्धर्व और अप्सराएँ नाच-गानके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं। सूत-विद्यामें निपुण यक्षगण (सूर्यके रथके अश्वोंकी) बागडोर सँभालते हैं। सर्प सूर्यमण्डलमें इधर-उधर दौड़ते तथा राक्षसगण सूर्यका अनुगमन करते हैं। बालखिल्य नामक ऋषि उदयकालसे ही सूर्यको घेरकर अस्ताचलको ले जाते हैं। इन देवताओंका जैसा पराक्रम, तपोबल, योगबल, धर्म, तत्त्व और शारीरिक बल होता है, उसीके अनुसार उनके तेजसे समृद्ध हुए सूर्य तपते हैं। वे अपने तेजसे प्राणियोंके सभी अमङ्गलको दूर कर देते हैं तथा इन्हीं मङ्गलमय उपादानोंद्वारा मनुष्योंके पापका अपहरण करते हैं। ये सहायकगण अपनी ओर अभिमुख होनेवालोंके पापको नष्ट कर देते हैं और अपने अनुचरोंसहित आकाशमण्डलमें सूर्यके साथ ही भ्रमण करते हैं। ये जप-तप करके सभी प्रजाओंको प्रसन्न रखते हुए उनकी रक्षा करते हैं और दयावश सभी प्राणियोंकी शुभ-कामना करते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानकालके इन स्थानाभिमानियोंका वह स्थान प्रत्येक मन्वन्तरमें वर्तमान रहता है। इस प्रकार दो-दोके हिसाबसे उन सातों गणोंके चौदह देवता सूर्यके रथपर निवास करते हैं और चौदहों मन्वन्तरोंतक वर्तमान रहते हैं। |
| * अध्याय १२६ * | ४४३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ग्रीष्मे हिमे च वर्षासु मुञ्चमानो<br>घर्मं हिमं च वर्षं च दिनं निशां च।<br>गच्छत्यसावनुदिनं परिवृत्य रश्मीन्<br>देवान् पितॄंश्च मनुजांश्च सुतर्पयन् वै॥ ३५<br><br>शुक्ले तु पूर्णो तदहःक्रमेण<br>तं कृष्णपक्षे विबुधाः पिबन्ति।<br>पीतं तु सोमं द्विकलावशिष्टं<br>सुवृष्टये रश्मिषु रक्षितं तु॥ ३६<br><br>स्वधामृतं तत्पितरः पिबन्ति<br>देवाश्च सौम्याश्च तथैव कव्यम्।<br>सूर्येण गोभिर्हि विवर्धिताभि-<br>रद्भिः पुनश्चैव समुच्छ्रिताभिः॥ ३७<br><br>वृष्ट्याभिवृष्टाभिरथौषधीभि-<br>र्मर्त्या अथान्नेन क्षुधं जयन्ति।<br>तृप्तिश्चाप्यमृतेनार्धमासं सुराणां<br>मासं स्वाहाभिः स्वधया पितॄणाम्॥ ३८ | इस प्रकार सूर्य ग्रीष्म, हेमन्त और वर्षा-ऋतुओंमें क्रमशः अपनी किरणोंको परिवर्तित कर धूप, हिम और जलकी वर्षा करके देवताओं, पितरों और मानवोंको भलीभाँति तृप्त करते हुए प्रतिदिन रात-दिन चलते रहते हैं। जो शुद्ध अमृत उत्तम वृष्टिके लिये सूर्यकी किरणोंमें सुरक्षित रहता है, उसे देवगण प्रत्येक मासमें चन्द्रमामें प्रविष्ट होनेपर शुक्ल एवं कृष्णपक्षमें दिनके क्रमसे काल-क्षयके अनुसार पीते हैं। सभी देवगण तथा पितर कव्यस्वरूप उस अमृत चन्द्रमाका पान करते हैं। मानवगण सूर्यकी किरणोंद्वारा पोषित, जलद्वारा परिवर्धित और वृष्टिद्वारा सिंचित ओषधियों और अन्नसे अपनी क्षुधा शान्त करते हैं। उस स्वाहारूप अमृतसे देवताओंकी तृप्ति पंद्रह दिनतक तथा उस स्वधारूप अमृतसे पितरोंकी तृप्ति एक महीनेतक होती है। मनुष्य अन्नरूप अमृतसे सर्वदा जीवन धारण करते हैं। वह अमृत सूर्यकी किरणोंमें स्थित है, अतः सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सबका पालन करते हैं॥ २५-३८॥ |
| अन्नेन जीवन्त्यनिशं मनुष्याः<br>सूर्यः श्रितं तद्धि बिभर्ति गोभिः।<br>इत्येष एकचक्रेण सूर्यस्तूर्णं प्रसर्पति।<br>तत्र तैरक्रमैश्चैः सर्पतेऽसौ दिनक्षये॥ ३९<br><br>हरिर्हरिद्भिर्वह्यते तुरङ्गमैः<br>पिबत्यथाऽपो हरिभिः सहस्रधा।<br>ततः प्रमुञ्चत्यथ ताश्च यो हरिः<br>संमुह्यमानो हरिभिस्तुरङ्गमौः॥ ४०<br><br>अहोरात्रं रथेनासावेकचक्रेण वै भ्रमन्।<br>सप्तद्वीपसमुद्रांश्च सप्तभिः सप्तभिर्द्रुतम्॥ ४१<br><br>छन्दोरूपैश्च तैरश्वैर्यत्रचक्रं ततः स्थितिः।<br>कामरूपः सकृद्युक्तैः कामगैस्तैर्मनोजवैः॥ ४२<br><br>हरितैरव्यथैः पिङ्गैरैश्चैर्ब्रह्मवादिभिः।<br>बाह्यतोऽनन्तरं चैव मण्डलं दिवसः क्रमात्॥ ४३<br><br>कल्पादौ सम्प्रयुक्ताश्च वहन्त्याभूतसम्प्लवम्।<br>आवृतो वालखिल्यैश्च भ्रमते रात्र्यहानि तु॥ ४४ | इस प्रकार सूर्य अपने एक पहियेवाले रथसे शीघ्रतापूर्वक गमन करते हैं। दिनके व्यतीत हो जानेपर भी वे उन सात अश्वोंद्वारा चलते ही रहते हैं। हरे रंगवाले घोड़े सूर्यको वहन करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा हजारों प्रकारसे जल खींचते हैं। पुनः हरे रंगवाले घोड़ोंद्वारा वहन किये जाते हुए वे ही सूर्य उस जलको बरसाते हैं। इस तरह सूर्य अपने एक पहियेवाले रथसे दिनके क्रमानुसार मण्डलके बाहर और भीतर होते हुए सात-सातके क्रमसे सातों समुद्रोंमें दिन-रात वेगपूर्वक घूमते रहते हैं। जहाँ वह चक्र पहुँचता है, वहीं उनकी स्थिति मानी जाती है। उनके रथके (समुद्रसे उत्पन्न श्यामकर्ण) अश्व छन्दःस्वरूप, स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, एक ही बार जुते हुए इच्छानुरूप गमन करनेवाले और मनके समान शीघ्रगामी हैं। उनके शरीरका रंग हरा और पीला है। उन्हें थकावट नहीं होती। वे शक्तिशाली और ब्रह्मवादी हैं। वे कल्पके आरम्भमें रथमें जोते जाते हैं और प्रलय-पर्यन्त उस रथको वहन करते हैं। इस प्रकार वालखिल्य ऋषियोंद्वारा समावृत सूर्य रात-दिन भ्रमण करते रहते हैं। |
४४४ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
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| ग्रथितैः स्ववचोभिश्च स्तूयमानो महर्षिभिः ।<br>सेव्यते गीतनृत्यैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः ॥ ४५<br>पतंगः पतगैरश्वैर्भ्राम्यमाणो दिवस्पतिः ।<br>वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि तथा शशी ॥ ४६<br>ह्रासवृद्धी तथैवास्य रश्मयः सूर्यवत् स्मृताः ।<br>त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च विज्ञेयः शशिनो रथः ॥ ४७<br>अपां गर्भसमुत्पन्नो रथः साश्वः ससारथिः ।<br>सहारैस्तैस्त्रिभिश्चक्रैर्युक्तः शुक्लैर्हयोत्तमैः ॥ ४८<br>दशभिस्तुरगैर्दिव्यैरसङ्गेस्तन्मनोजवैः ।<br>सकृद्युक्ते रथे तस्मिन् वहन्तस्त्वायुगक्षयम् ॥ ४९<br>संगृहीता रथे तस्मिञ्श्वेताश्वक्षुःश्रवाश्च वै ।<br>अश्वास्तमेकवर्णास्ते वहन्ते शङ्खवर्चसः ॥ ५०<br>अजश्च त्रिपथश्चैव वृषो वाजी नरो हयः ।<br>अंशुमान् समधातुश्च हंसो व्योममृगस्तथा ॥ ५१<br>इत्येते नामभिश्चैव दश चन्द्रमसो हयाः ।<br>एवं चन्द्रमसं देवं वहन्ति स्मायुगक्षयम् ॥ ५२ | उस समय महर्षिगण स्वरचित वचनोंद्वारा सूर्यकी स्तुति करते हैं। गन्धर्वों और अप्सराओंका समुदाय नाच-गानद्वारा सूर्यकी सेवा करता है। दिनके स्वामी सूर्य पक्षियोंके समान वेगशाली अश्वोंद्वारा सदा भ्रमण कराये जाते हुए नक्षत्रसम्बन्धिनी वीथियोंका आश्रय लेकर भ्रमण करते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा भी चक्कर लगाते हैं। इनकी भी ह्रास-वृद्धि और किरणें सूर्यके समान ही बतलायी गयी हैं। चन्द्रमाका रथ तीन पहियेका है और उसमें दोनों ओर घोड़े जुते रहते हैं। घोड़े-सारथि और हारसे सुशोभित तथा तीन पहियोंसे युक्त रथके साथ चन्द्रदेव (समुद्र मन्थनके समय) जलके मध्यसे प्रकट हुए थे। उसमें श्वेत रंगवाले तथा दस उत्तम घोड़े जुते हुए थे। वे अश्व दिव्य, अनुपम और मनके समान वेगशाली हैं। वे एक बार उस रथमें जोत दिये जानेपर युगप्रलयपर्यन्त उस रथको वहन करते हैं। उस रथमें जुते हुए चक्षुःश्रवानामक घोड़े चन्द्रमाको वहन करते हैं, उनके नेत्र और कान भी श्वेत रंगके हैं। वे सभी शङ्खके समान उज्ज्वल एक ही रंगके हैं। चन्द्रमाके उन दस अश्वोंका नाम अज, त्रिपथ, वृष, वाजी, नर, हय, अंशुमान्, सप्तधातु, हंस और व्योममृग है। इस प्रकार वे अश्व युगप्रलयपर्यन्त चन्द्रदेवको वहन करते हैं। चन्द्रमा पितरोंसहित देवताओंद्वारा घिरे हुए गमन करते हैं॥ ३९—५२ १/२ ॥ |
| देवैः परिवृतः सोमः पितृभिः सह गच्छति ।<br>सोमस्य शुक्लपक्षादौ भास्करे परतः स्थिते ॥ ५३<br>आपूर्यते परो भागः सोमस्य तु अहःक्रमात् ।<br>ततः पीतक्षयं सोमं युगपद्ध्यापयन् रविः ॥ ५४<br>पीतं पञ्चदशाहं च रश्मिनैकेन भास्करः ।<br>आपूरयन् प्रददौ तेन भागं भागमहःक्रमात् ॥ ५५<br>सुषुम्नाप्यायमानस्य शुक्ले वर्धन्ति वै कलाः ।<br>तस्माद्ध्वसन्ति वै कृष्णे शुक्ले ह्याप्याययन्ति च ॥ ५६<br>इत्येवं सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायते तनुः ।<br>पौर्णमास्यां प्रदृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः ॥ ५७<br>एवमाप्यायते सोमः शुक्लपक्षेष्वहःक्रमात् ।<br>ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशी ॥ ५८<br>अपां सारमयस्येन्दो रसमात्रामकस्य च ।<br>पिबन्त्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं तथामृतम् ॥ ५९<br>सम्भृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा ।<br>भक्षार्थमागताः सोमं पौर्णमास्यामुपासते ॥ ६० | शुक्लपक्षके प्रारम्भमें सूर्यके परभागमें स्थित होनेपर चन्द्रमाका परभाग दिनके क्रमसे पूर्ण होता है। उस समय (देवताओंद्वारा अमृत) पी लेनेसे क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य एक ही बारमें पूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार पंद्रह दिनोंतक देवताओंद्वारा चूसे गये चन्द्रमाके एक-एक भागको सूर्य अपनी एक ही किरणद्वारा दिनके क्रमसे परिपूर्ण करते रहते हैं। सूर्यकी सुषुम्ना नामक किरणद्वारा परिवर्धित चन्द्रमाकी कलाएं शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होती हैं तथा कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं। पुनः शुक्लपक्षमें वे बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके पराक्रमसे चन्द्रमाका शरीर वृद्धिंगत होता है और धीरे-धीरे पूर्णिमा तिथिको पूर्ण होकर सम्पूर्ण मण्डल श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। इस प्रकार शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे चन्द्रमा वृद्धिको प्राप्त होते हैं। तदनन्तर जलके सारभूत एवं रसमात्रात्मक चन्द्रमाके मधु-सदृश जलमय अमृतको देवगण कृष्णपक्षकी द्वितीयासे लेकर चतुर्दशी तिथितक पान करते हैं। पंद्रह दिनोंतक सूर्यके तेजसे सञ्चित किये हुए अमृतको खानेके लिये पूर्णिमा तिथिको चन्द्रमाके निकट आये हुए देवगण |
* अध्याय १२६ * | ४४५
| एकरात्रं सुराः सार्धं पितृभिर्ऋषिभिश्च वै।<br>सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य वै॥ ६१<br>प्रक्षीयते परो ह्यात्मा पीयमानकलाक्रमात्।<br>त्रयश्च त्रिंशता सार्धं त्रीणि चैव शतानि तु॥ ६२<br>त्रयस्त्रिंशत् सहस्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै।<br>इत्येवं पीयमानस्य कृष्णा वर्धन्ति ताः कलाः॥ ६३<br>क्षीयन्ते च ततः शुक्लाः कृष्णा ह्याप्याययन्ति च।<br>एवं दिनक्रमात् पीते देवैश्चापि निशाकरे॥ ६४<br>पीत्वार्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुराश्च ते।<br>पितरश्चोपतिष्ठन्ति ह्यमावास्यां निशाकरम्॥ ६५<br>ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छेषे निशाकरे।<br>ततोऽपराह्ने पितरो यदन्यदिवसे पुनः॥ ६६<br>पिबन्ति द्विकलां कालं शिष्टास्तस्य तु याः कलाः।<br>विनिःसृष्टं त्वमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्॥ ६७<br>अर्धमाससमाप्तौ तु पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम्।<br>सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ये स्मृताः॥ ६८<br>काव्याश्चैव तु ये प्रोक्ताः पितरः सर्व एव ते।<br>संवत्सरास्तु वै काव्याः पञ्चाब्दा ये द्विजैः स्मृताः॥ ६९<br>सौम्यास्तुऋतवो ज्ञेयाः मासा बर्हिषदस्तथा।<br>अग्निष्वात्तास्तथा पक्षाः पितृसर्गस्थिता द्विजाः॥ ७०<br>पितृभिः पीयमानायां पञ्चदश्यां तु वै कलाम्।<br>यावच्च क्षीयते तस्माद् भागःपञ्चदशस्तु सः॥ ७१<br>अमावास्यां तथा तस्य अन्तरा पूर्यते परः।<br>वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ।<br>एवं सूर्यनिमित्ते ते क्षयवृद्धी निशाकरे॥ ७२ | पितरों और ऋषियोंके साथ एक राततक चन्द्रमाकी उपासना करते हैं। कृष्णपक्षके प्रारम्भमें सूर्यके सम्मुख उपस्थित चन्द्रमाका मन पान की जाती हुई कलाओंके क्रमसे अत्यन्त क्षीण हो जाता है। उस समय तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस देवता चन्द्रमाकी अमृतकलाको पीते* हैं। इस प्रकार पान किये जाते हुए चन्द्रमाकी वे कृष्णपक्षीय कलाएँ (शुक्लपक्षमें) बढ़ती हैं और शुक्लपक्षीय कलाएँ (कृष्णपक्षमें) घटती हैं। पुनः कृष्णपक्षीय कलाएँ बढ़ती हैं। (यही शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें बढ़ने-घटनेका क्रम है।)॥ ५३—६३ ½ ॥<br><br>इस प्रकार दिनके क्रमसे देवगण पंद्रह दिनतक चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं और अमावास्या तिथिको वे वहाँसे चले जाते हैं। तब पितृगण अमावास्या तिथिमें चन्द्रमाके पास आते हैं। तदनन्तर चन्द्रमाके पंद्रहवें भागके कुछ शेष रहनेपर वे पितर दूसरे दिन अपराह्नके समय उन सभी अवशिष्ट कलाओंको केवल दो कला समयतक ही पान करते हैं। अमावास्यातक पंद्रह दिन पर्यन्त चन्द्रमाकी किरणोंसे निकलते हुए स्वधारूपी अमृतका पानकर पितृगण अमर हो जाते हैं। वे सभी पितर सौम्य, बर्हिषद, अग्निष्वात्त और काव्य नामसे कहे गये हैं। पाँच वर्षके कार्यकालवाले जो पितर हैं, जिन्हें द्विजगण काव्य कहते हैं, वर्ष हैं। सौम्य नामक पितरोंको पक्ष ऋतु जानना चाहिये। दो बर्हिषद् और अग्निष्वात्तको मास—ये तीनों पितृलोकमें निवास करनेवाले द्विज हैं। पूर्णिमा तिथिको पितरोंद्वारा पान की जाती हुई कलाका जितना अंश क्षीण होता है, वह पंद्रहवाँ भाग है। अमावास्याके बाद चन्द्रमाका रिक्त भाग पूर्ण होता है। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षय दोनों पक्षोंके प्रारम्भमें ही माना गया है, उसे सोलहवीं कला कहते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाकी क्षय-वृद्धि सूर्यके निमित्तसे ही होती है॥ ६४—७२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सूर्यादिगमनं नाम षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सूर्यादिगमन नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२६॥
* देवताओंद्वारा चन्द्रकला-पानका वर्णन—कालिदासादिके रघुवंश (५।१६) के—‘पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः’ आदिमें बड़े सरस ढंगसे किया गया है। हेमाद्रि आदि व्याख्याताओंने इसकी—‘प्रथमां पिबते वह्निर्द्वितीयां पिबते रविः’ आदिसे व्याख्या भी सुन्दर की है। पर वस्तुतः कालिदास तथा भर्तृहरि के ‘कत्वशेषश्चन्द्रः’ आदिका मूलाधार मत्स्यपुराणका यह प्रकरण ही दीखता है।
१२९- त्रिपुर-निर्माणका वर्णन
४४६ * मत्स्यपुराण *
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय
ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| ताराग्रहाणां वक्ष्यामि स्वर्भानोस्तु रथं पुनः।<br>अथ तेजोमयः शुभ्रः सोमपुत्रस्य वै रथः॥ १ | ऋषियो! अब मैं (ग्रहकक्षानुसार बुधादि) ग्रहों, नक्षत्रों और राहुके रथका वर्णन कर रहा हूँ। सोमपुत्र बुधका रथ उज्ज्वल एवं तेजोमय है। उसमें वायुके समान वेगशाली पीले रंगके दस घोड़े जोते जाते हैं। उनके नाम हैं—श्वेत, पिशङ्ग, सारङ्ग, नील, पीत, विलोहित, कृष्ण, हरित, पृषत और पृश्नि। इन्हीं महान् भाग्यशाली, अनुपम एवं वायुसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे वह रथ युक्त है। इसके बाद मङ्गलका रथ सुवर्णनिर्मित बतलाया जाता है। वह रथके सम्पूर्ण आठों अङ्गोंसे संयुक्त है तथा लाल रंगवाले आठ घोड़ोंसे युक्त है। उसपर अग्निसे प्रकट हुआ ध्वज फहराता रहता है। उसपर सवार होकर किशोरावस्थाके मङ्गल कभी सीधी एवं कभी वक्र गतिसे विचरण करते हैं। अङ्गिराके पुत्र देवाचार्य विद्वान् बृहस्पति पीले रंगके तथा वायुके-से वेगशाली आठ दिव्य अश्वोंसे जुते हुए सुवर्णमय रथपर चलते हैं। वे एक राशिपर एक वर्षतक रहते हैं, इसलिये इस रथके द्वारा स्वाधिष्ठित राशिकी दिशाकी ओर (दोनों गतियों)-से अपने वर्गसहित जाते हैं। शुक्र भी अपने वेगशाली रथपर आरूढ़ होकर भ्रमण करते हैं। उनके रथमें अग्निके समान रंगवाले आठ घोड़े जुते रहते हैं और वह ध्वजाओंसे सुशोभित रहता है। शनैश्चर अपने लोहनिर्मित रथपर सवार होकर चलते हैं। उसमें वायुतुल्य वेगशाली एवं बलवान् घोड़े जुते रहते हैं। राहुका रथ तमोमय है। उसे कवच आदिसे सुसज्जित वायुके समान वेगवाले काले रंगके आठ घोड़े खींचते हैं। सूर्यके भवनमें निवास करनेवाला वह राहु पूर्णिमा आदि पर्वोंमें चन्द्रमाके पास चला जाता है और अमावास्या आदि पर्वोंमें चन्द्रमाके पाससे सूर्यके निकट लौट आता है। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान शीघ्रगामी आठ घोड़े जोते जाते हैं। उनके शरीरकी कान्ति पुआलके धुँएके सदृश है। वे दुबले-पतले शरीरवाले और बड़े भयंकर हैं। ये सभी वायुरूपी रस्सीसे ध्रुवके साथ सम्बद्ध हैं। इस प्रकार मैंने ग्रहोंके रथोंके साथ-साथ घोड़ोंका वर्णन कर दिया॥ १—१२॥ |
| युक्तो हयैः पिशङ्गैस्तु दशभिर्वातरंहसैः।<br>श्वेतः पिशङ्गः सारङ्गो नीलः पीतो विलोहितः॥ २ | |
| कृष्णश्च हरितश्चैव पृषतः पृश्निरैव च।<br>दशभिस्तु महाभागैरुत्तमैर्वातसम्भवैः॥ ३ | |
| ततो भौमरथश्चापि ह्यष्टाङ्गः काञ्चनः स्मृतः।<br>अष्टभिर्लोहितैरश्वैः सध्वजैरग्निसम्भवैः।<br>सर्प तेऽसौ कुमारो वै ऋजुवक्रानुवक्रगः॥ ४ | |
| अतश्चाङ्गिरसो विद्वान् देवाचार्यो बृहस्पतिः।<br>शोणैरश्वैश्च रौक्मेण स्यन्दनेन विसर्पति॥ ५ | |
| युक्तेनावाजिभिर्दिव्यैरष्टाभिर्वातरंहसैः ।<br>अब्दं वसति यो राशौ सवर्णस्तेन गच्छति॥ ६ | |
| युक्तेनाष्टाभिरश्वैश्च सध्वजैरग्निसंनिभैः।<br>रथेन क्षिप्रवेगेन भार्गवस्तेन गच्छति॥ ७ | |
| ततः शनैश्चरोऽप्यश्वैः सबलैर्वातरंहसैः।<br>कार्ष्णायसं समारुह्य स्यन्दनं यात्यसौ शनिः॥ ८ | |
| स्वर्भानोस्तु यथान्वाश्वाः कृष्णा वै वातरंहसः।<br>रथं तमोमयं तस्य वहन्ति स्म सुदर्शिताः॥ ९ | |
| आदित्यनिलयो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु।<br>आदित्यमेति सोमाच्च तमसोऽन्तेषु पर्वसु॥ १० | |
| ततः केतुमतस्त्वश्वा अष्टौ ते वातरंहसः।<br>पलालधूमवर्णाभाः क्षामदेहाः सुदारुणाः॥ ११ | |
| एते वाहा ग्रहाणां वै मया प्रोक्ता रथैः सह।<br>सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते निबद्धा वातरश्मिभिः॥ १२ |