मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५०४ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| तामेव तु विनिष्क्रम्य शक्तिं शोणितभूषिताम्।<br>विद्युन्मालिनमुद्दिश्य चिक्षेप प्रमथाग्रणीः॥ ३५<br>तया भिन्नतनुत्राणो विभिन्नहृदयस्त्वपि।<br>विद्युन्माल्यपतद् भूमौ वज्राहत इवाचलः॥ ३६ | प्रमथगणोंके नायक नन्दीश्वरने रक्तसे लथपथ हुई उस शक्तिको हाथमें लेकर विद्युन्मालीको लक्ष्य करके फेंक दिया। फिर तो उस शक्तिने विद्युन्मालीके कवचको फाड़कर उसके हृदयको भी विदीर्ण कर दिया, जिससे वह वज्रसे मारे गये पर्वतकी तरह धराशायी हो गया॥ २९—३६॥ |
| विद्युन्मालिनि निहते सिद्धचारणकिन्नराः।<br>साधु साध्विति चोक्त्वा ते पूजयन्त उमापतिम्॥ ३७<br>नन्दिना सादिते दैत्ये विद्युन्मालौ हते मयः।<br>ददाह प्रमथानीकं वनमग्निरिवोद्धतः॥ ३८<br>शूलनिर्दारितोरस्का गदाचूर्णितमस्तकाः।<br>इषुभिर्गाढविद्धाश्च पतन्ति प्रमथार्णवे॥ ३९<br>अथ वज्रधरो यमोऽर्थदः स च नन्दी<br>स च षण्मुखो गुहः।<br>मयमसुरवीरसम्प्रवृत्तं विविघुः शस्त्रवरैर्हतारयः॥ ४०<br>नागं तु नागाधिपतेः शताक्षं<br>मयो विदार्येषु वरेण तूर्णम्।<br>यमं च वित्ताधिपतिं च विद्ध्वा<br>ररास मत्ताम्बुदवत् तदानीम्॥ ४१<br>ततः शरैः प्रमथगणैश्च दानवा<br>दृढाहताश्चोत्तमवेगविक्रमाः।<br>भृशानुविद्धास्त्रिपुरं प्रवेशिता<br>यथासुराश्चक्रधरेण संयुगे॥ ४२<br>ततस्तु शङ्खानकभेरीमर्दलाः<br>ससिंहनादा दनुपुत्रभङ्गदाः।<br>कपर्दिसैन्ये प्रबभुः समन्ततो<br>निपात्यमाना युधि वज्रसंनिभाः॥ ४३<br>अथ दैत्यपुराभावे पुष्ययोगो बभूव ह।<br>बभूव चापि संयुक्तं तद्योगेन पुरत्रयम्॥ ४४ | इस प्रकार विद्युन्मालीके मारे जानेपर सिद्ध, चारण और किन्नरोंके समूह 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए शंकरजीकी पूजा करने लगे। इधर नन्दीश्वरद्वारा दैत्य विद्युन्मालीके मारे जानेपर मयने प्रमथोंकी सेनाको उसी प्रकार जलाना आरम्भ किया, जैसे उद्दीप्त दावाग्नि वनको जला डालती है। उस समय शूलके आघातसे जिनके वक्षःस्थल फट गये थे एवं गदाके प्रहारसे मस्तक चूर्ण हो गये थे और जो बाणोंकी मारसे अत्यन्त घायल हो गये थे, ऐसे प्रमथगण समुद्रमें गिर रहे थे। तदनन्तर शत्रुओंके विनाशक वज्रधारी इन्द्र, यमराज, कुबेर, नन्दीश्वर तथा छः मुखवाले स्वामीकार्तिक—ये सभी असुर-वीरोंसे घिरे हुए मयको श्रेष्ठ अस्त्रोंद्वारा बाँधने लगे। उस समय मयने शीघ्र ही एक श्रेष्ठ बाणसे गजारूढ़ सौ नेत्रोंवाले इन्द्रको तथा ऐरावत नागको विदीर्ण कर यमराज और कुबेरको भी बाँध दिया। फिर वह घुमड़ते हुए बादलकी तरह गर्जना करने लगा। इधर प्रमथगणोंद्वारा छोड़े गये बाणोंसे उत्तम वेग एवं पराक्रमशाली दानव बुरी तरह घायल हो रहे थे। वे अत्यन्त घायल होनेके कारण भागकर त्रिपुरमें उसी प्रकार घुस रहे थे, जैसे युद्धस्थलमें चक्रपाणि विष्णुके प्रहारसे असुर। तत्पश्चात् रणभूमिमें शंकरजीकी सेनामें चारों ओर शङ्ख, ढोल, भेरी और मृदङ्ग बज उठे। वीरोंका सिंहनाद वज्रकी गड़गड़ाहटकी भाँति गूँज उठा, जो दानवोंकी पराजयको सूचित कर रहा था। इसी समय उस दैत्यपुरका विनाशक पुष्ययोग आ गया। उस योगके प्रभावसे तीनों पुर संयुक्त हो गये॥ ३७—४४॥ |
| ततो बाणं त्रिधा देवस्त्रिदैवतमयं हरः।<br>मुमोच त्रिपुरे तूर्णं त्रिनेत्रस्त्रिपथाधिपः॥ ४५<br>तेन मुक्तेन बाणेन बाणपुष्पसमप्रभम्।<br>आकाशं स्वर्णसंकाशं कृतं सूर्येण रञ्जितम्॥ ४६<br>मुक्त्वा त्रिदैवतमयं त्रिपुरे त्रिदशः शरम्।<br>धिग्धिङ्मामेति चक्रन्द कष्टं कष्टमिति ब्रुवन्॥ ४७ | तब त्रैलोक्याधिपति त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने शीघ्र ही अपने त्रिदेवमय बाणको तीन भागोंमें विभक्त कर त्रिपुरपर छोड़ दिया। उस छूटे हुए बाणने (तीनों देवताओंके अंशसे तीन प्रकारकी प्रभासे युक्त होकर) बाण वृक्षके पुष्पके समान नीले आकाशको स्वर्ण-सदृश प्रभाशाली और सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त कर दिया। देवेश्वर शम्भु त्रिपुरपर त्रिदेवमय बाण छोड़कर—'मुझे धिक्कार |
| * अध्याय १४० * | ५०५ |
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| वैधुर्यं दैवतं दृष्ट्वा शैलादिर्गजवद्गतिः।<br>किमिदं त्विति पप्रच्छ शूलपाणिं महेश्वरम्॥ ४८<br><br>ततः शशाङ्कतिलकः कपर्दी परमार्तवत्।<br>उवाच नन्दिनं भक्तः स मयोऽद्य विनङ्क्ष्यति॥ ४९<br><br>अथ नन्दीश्वरस्तूर्णं मनोमारुतवद् बली।<br>शरे त्रिपुरमायाति त्रिपुरं प्रविवेश सः॥ ५०<br><br>स मयं प्रेक्ष्य गणपः प्राह काञ्चनसन्निभः।<br>विनाशस्त्रिपुरस्यास्य प्राप्तो मय सुदारुणः॥ ५१<br><br>अनेनैव गृहेण त्वमपक्राम ब्रवीम्यहम्।<br><br>श्रुत्वा तन्नन्दिवचनं दृढभक्तो महेश्वरे।<br>तेनैव गृहमुख्येन त्रिपुरादपसर्पितः॥ ५२<br><br>सोऽपीषुः पत्रपुटवद् दग्ध्वा तन्नगरत्रयम्।<br>त्रिधा इव हुताशश्च सोमो नारायणस्तथा॥ ५३<br><br>शरतेजःपरीतानि पुराणि द्विजपुङ्गवाः।<br>दुष्पुत्रदोषाद् दह्यन्ते कुलान्यूर्ध्वं यथा तथा॥ ५४ | है, धिक्कार है, हाय! बड़े कष्टकी बात हो गयी' यों कहते हुए चिल्ला उठे। इस प्रकार शंकरजीको व्याकुल देखकर गजराजकी चालसे चलनेवाले नन्दीश्वर शूलपाणि महेश्वरके निकट पहुँचे और पूछने लगे—'कहिये, क्या बात है?' तब चन्द्रशेखर जटाजूटधारी भगवान् शंकरने अत्यन्त दुःखी होकर नन्दीश्वरसे कहा—'आज मेरा वह भक्त मय भी नष्ट हो जायगा।' यह सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली महाबली नन्दीश्वर तुरंत उस बाणके त्रिपुरमें पहुँचनेके पूर्व ही वहाँ जा पहुँचे। वहाँ स्वर्ण-सरीखे कान्तिमान् गणेश्वर नन्दीने मयके निकट जाकर कहा—'मय! इस त्रिपुरका अत्यन्त भयंकर विनाश आ पहुँचा है, इसलिये मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। तुम अपने इस गृहके साथ इससे बाहर निकल जाओ।' तब महेश्वरके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाला मय नन्दीश्वरके उस वचनको सुनकर अपने उस मुख्य गृहके साथ त्रिपुरसे निकलकर भाग गया। तदनन्तर वह बाण अग्नि, सोम और नारायणके रूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर उन तीनों नगरोंको पत्तेके दोनेकी तरह जलाकर भस्म कर दिया। द्विजवरो! वे तीनों पुर बाणके तेजसे उसी प्रकार जलकर नष्ट हो रहे थे, जैसे कुपुत्रके दोषसे आगेकी पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं॥ ४५—५४॥ |
| मेरुकैलासकल्पानि मन्दराग्रनिभानि च।<br>सकपाटगवाक्षाणि बलिभिः शोभितानि च॥ ५५<br><br>सप्रासादानि रम्याणि कूटागारोत्कटानि च।<br>सजलानि समाख्यानि सावलोकनकानि च॥ ५६<br><br>बद्धध्वजपताकानि स्वर्णरौप्यमयानि च।<br>गृहाणि तस्मिंस्त्रिपुरे दानवानामुपद्रवे।<br>दह्यन्ते दहनाभानि दहनेन सहस्रशः॥ ५७<br><br>प्रासादाग्रेषु रम्येषु वनेषूपवनेषु च।<br>वातायनगताश्चान्याश्चाकाशस्य तलेषु च॥ ५८<br><br>रमणैरुपगूढाश्च रमन्त्यो रमणैः सह।<br>दह्यन्ते दानवेन्द्राणामग्निना ह्यपि ताः स्त्रियः॥ ५९<br><br>काचित्प्रियं परित्यज्य अशक्ता गन्तुमन्यतः।<br>पुरः प्रियस्य पञ्चत्वं गताग्निवदने क्षयम्॥ ६० | उस त्रिपुरमें ऐसे गृह बने थे जो सुमेरु, कैलास और मन्दराचलके अग्रभागकी तरह दीख रहे थे। जिनमें बड़े-बड़े किंवाड़ और झरोखे लगे हुए थे तथा छज्जाओंकी विचित्र छटा दीख रही थी। जो सुन्दर महलों, उत्कृष्ट कूटागारों (ऊपरी छतके कमरों), जल रखनेकी वेदिकाओं और खिड़कियोंसे सुशोभित थे। जिनके ऊपर सुवर्ण एवं चाँदीके बने हुए डंडोंमें बँधे हुए ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। ये सभी हजारोंकी संख्यामें दानवोंके उस उपद्रवके समय अग्निद्वारा जलाये जा रहे थे, जो आगकी तरह धधक रहे थे। दानवेन्द्रोंकी स्त्रियाँ, जिनमें कुछ महलोंके रमणीय शिखरोंपर बैठी थीं, कुछ वनों और उपवनोंमें घूम रही थीं, कुछ झरोखोंमें बैठकर दृश्य देख रही थीं कुछ मैदानमें घूम रही थीं—ये सभी अग्निद्वारा जलायी जा रही थीं। कोई अपने पतिको छोड़कर अन्यत्र जानेमें असमर्थ थी, अतः पतिके सम्मुख ही अग्निकी लपटोंमें आकर दग्ध हो |
५०६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उवाच शतपत्राक्षी सास्त्राक्षीव कृताञ्जलिः।<br>हव्यवाहन भार्याहं परस्य परतापन।<br>धर्मसाक्षी त्रिलोकस्य न मां स्प्रष्टुमिहार्हसि॥ ६१<br><br>शायितं च मया देव शिवया च शिवप्रभ।<br>शरेण प्रेहि मुक्त्वेदं गृहं च दयितं हि मे॥ ६२<br><br>एका पुत्रमुपादाय बालकं दानवाङ्गना।<br>हुताशनसमीपस्था इत्युवाच हुताशनम्॥ ६३<br><br>बालोऽयं दुःखलब्धश्च मया पावक पुत्रकः।<br>नार्हस्येनमुपादातुं दयितं षण्मुखप्रिय॥ ६४<br><br>काश्चित् प्रियान् परित्यज्य पीडिता दानवाङ्गनाः।<br>निपतन्त्यर्णवजले शिञ्जानविभूषणाः॥ ६५<br><br>तात पुत्रेति मातेति मातुलेति च विह्वलम्।<br>चक्रन्दुस्त्रिपुरे नार्यः पावकज्वालवेपिताः॥ ६६<br><br>यथा दहति शैलाग्निः साम्बुजं जलजाकरम्।<br>तथा स्त्रीवक्त्रपद्मानि चादहत् पुरेऽनलः॥ ६७ | गयी। कोई कमलनयनी नारी आँखोंमें आँसू भरे हुए हाथ जोड़कर कह रही थी—'हव्यवाहन! मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। परतापन! आप त्रिलोकीके धर्मके साक्षी हैं, अतः यहाँ मेरा स्पर्श करना आपके लिये उचित नहीं है।' (कोई कह रही थी—) 'शिवके समान कान्तिमान् अग्निदेव! मुझ पतिव्रताने इस घरमें अपने पतिको सुला रखा है, अतः इसे छोड़कर आप दूसरी ओरसे चले जाइये; क्योंकि यह गृह मुझे परम प्रिय है।' एक दानवपत्नी अपने शिशु पुत्रको गोदमें लेकर अग्निके समीप गयी और अग्निसे कहने लगी—'स्वामीकार्तिकके प्रेमी पावक! मुझे यह शिशु पुत्र बड़े दुःखसे प्राप्त हुआ है, अतः इसे ले लेना आपके लिये उचित नहीं है। यह मुझे परम प्रिय है।' कुछ पीड़ित हुई दानव-पत्नियों अपने पतियोंको छोड़कर समुद्रके जलमें कूद रही थीं। उस समय उनके आभूषणोंसे शब्द हो रहा था। त्रिपुरमें आगकी लपटोंके भयसे काँपती हुई नारियाँ 'हा तात!, हा पुत्र!, हा माता!, हा मामा!' कहकर विह्वलतापूर्वक करुण-क्रन्दन कर रही थीं। जैसे पर्वताग्नि (दावाग्नि) कमलोंसहित सरोवरको जला देती है उसी प्रकार अग्निदेव त्रिपुरमें स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंको जला रहे थे॥ ५५-६७॥ |
| तुषारराशिः कमलाकराणां<br>यथा दहत्यम्बुजकानि शीते।<br>तथैव सोऽग्निस्त्रिपुराङ्गनानां<br>ददाह वक्त्रेक्षणपङ्कजानि॥ ६८ | जिस प्रकार शीतकालमें तुषारराशि कमलोंसे भरे हुए सरोवरोंके कमलोंको नष्ट कर देती है उसी तरह अग्निदेव त्रिपुर-निवासिनी नारियोंके मुख और नेत्ररूप कमलोंको जला रहे थे। |
| शराग्निपातात् समभिद्रुतानां<br>तत्राङ्गनानामतिकोमलानाम् ।<br>बभूव काञ्चीगुणनूपुराणा-<br>माक्रन्दितानां च रवोऽति मिश्रः॥ ६९ | त्रिपुरमें बाणाग्निके गिरनेसे भयभीत होकर भागती हुई अत्यन्त कोमलाङ्गी सुन्दरियोंकी करधनीकी लड़ियों और पायजेबोंका शब्द आक्रन्दनके शब्दोंसे मिलकर अत्यन्त भयंकर लग रहा था। |
| दग्धार्धचन्द्राणि सवेदिकानि<br>विशीर्णहर्म्याणि सतोरणानि।<br>दग्धानि दग्धानि गृहाणि तत्र<br>पतन्ति रक्षार्थमिवार्णवौघे॥ ७० | जिनमें अर्धचन्द्रसे सुशोभित वेदिकाएँ जल गयी थीं तथा तोरणसहित अट्टालिकाएँ जलकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। ऐसे गृह जलते-जलते समुद्रमें इस प्रकार गिर रहे थे मानो वे रक्षाके लिये उसमें कूद रहे हों। |
| गृहैः पतद्भिर्ज्वलनावलीढै-<br>रासीत् समुद्रे सलिलं प्रतप्तम्।<br>कुपुत्रदोषैः प्रहतानुविद्धं<br>यथा कुलं याति धनान्वितस्य॥ ७१ | अग्निकी लपटोंसे झुलसे हुए गृहोंके समुद्रमें गिरनेसे उसका जल ऐसा संतप्त हो उठा था, जैसे सम्पत्तिशाली व्यक्तिका कुल कुपुत्रके दोषसे नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। |
१४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन
| * अध्याय १४० * | ५०७ |
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| गृहप्रतापैः क्वथितं समन्तात्<br>तदार्णवे तोयमुदीर्णवेगम्।<br>वित्रासयामास तिमीन् सनक्रां -<br>स्तिमिङ्गिलांस्तक्वथितांस्तथान्यान्॥ ७२<br>सगोपुरो मन्दरपादकल्पः<br>प्राकारवर्यस्त्रिपुरे च सोऽथ।<br>तैरैव सार्धं भवनैः पपात<br>शब्दं महान्तं जनयन् समुद्रे॥ ७३<br>सहस्रशृङ्गैर्भवनैर्यदासीत्<br>सहस्रशृङ्गः स इवाचलेशः।<br>नामावशेषं त्रिपुरं प्रजज्ञे<br>हुताशनाहारबलिप्रयुक्तम् ॥ ७४<br>प्रदह्यमानेन पुरेण तेन<br>जगत्सपातालदिवं प्रतप्तम्।<br>दुःखं महत्प्राप्य जलावमग्नं<br>हित्वा महान् सौधवरो मयस्य॥ ७५<br>तद् देवेशो वचः श्रुत्वा इन्द्रो वज्रधरस्तदा।<br>शशाप तद्गृहं चापि मयस्यादितिनन्दनः॥ ७६<br>असेव्यमप्रतिष्ठं च भयेन च समावृतम्।<br>भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथानलः॥ ७७<br>यस्य यस्य तु देशस्य भविष्यति पराभवः।<br>द्रक्ष्यन्ति त्रिपुरं खण्डं तत्रेदं नाशगा जनाः।<br>तदेतदद्यापि गृहं मयस्यामयवर्जितम्॥ ७८ | उस समय समुद्रमें चारों ओर गिरते हुए गृहोंकी उष्णतासे खौलते हुए जलमें तूफान आ गया, जिससे मगरमच्छ, नाक, तिमिंगिल तथा अन्यान्य जलजन्तु संतप्त होकर भयभीत हो उठे। उसी समय त्रिपुरमें लगा हुआ मन्दराचलके समान ऊँचा परकोटा फाटकसहित उन गिरते हुए भवनोंके साथ-ही-साथ महान् शब्द करता हुआ समुद्रमें जा गिरा। जो त्रिपुर थोड़ी देर पहले सहस्रों ऊँचे-ऊँचे भवनोंसे युक्त होनेके कारण सहस्र शिखरवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था वही अग्निके आहार और बलिके रूपमें प्रयुक्त होकर नाममात्र अवशेष रह गया। जलते हुए उस त्रिपुरके तापसे पाताल और स्वर्गलोकसहित सारा जगत् संतप्त हो उठा। इस प्रकार महान् कष्ट झेलता हुआ वह त्रिपुर समुद्रके जलमें निमग्न हो गया। इसमें एकमात्र मयका महान् भवन ही बच गया था। अदिति-नन्दन वज्रधारी देवराज इन्द्रने जब ऐसी बात सुनी तो मयके उस गृहको शाप देते हुए बोले—'मयका वह गृह किसीके सेवन करनेयोग्य नहीं होगा। उसकी संसारमें प्रतिष्ठा नहीं होगी। वह अग्निकी तरह सदा भयसे युक्त बना रहेगा। जिस-जिस देशकी पराजय होनेवाली होगी उस-उस देशके विनाशोन्मुख निवासी इस त्रिपुर-खण्डका दर्शन करेंगे।' मयका वह गृह आज भी आपत्तियोंसे रहित है॥ ६८–७८॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>भगवन् स मयो येन गृहेण प्रपलायितः।<br>तस्य नो गतिमाख्याहि मयस्य चमसोद्भव ॥ ७९ | ऋषियोंने पूछा— चमससे उत्पन्न होनेवाले ऐश्वर्यशाली सूतजी ! वह मय जिस गृहको साथ लेकर भाग गया था, उस मयकी आगे चलकर क्या गति हुई ? यह हमें बतलाइये ॥ ७९ ॥ |
| सूत उवाच<br>दृश्यते दृश्यते यत्र ध्रुवस्तत्र मयास्पदम्।<br>देवद्विट् तु मयश्चातः स तदा खिन्नमानसः।<br>ततश्च युतोऽन्यलोकेऽस्मिंस्त्राणार्थं स चकार सः॥ ८०<br>तत्रापि देवताः सन्ति आप्तोर्यामाः सुरोत्तमाः।<br>तत्राशक्तं ततो गन्तुं तं चैकं पुरमुत्तमम् ॥ ८१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो ! जहाँ ध्रुव दिखलायी पड़ते हैं वहीं मयका भी स्थान दीख पड़ता था, किंतु कुछ समयके बाद देवशत्रु मयका मन खिन्न हो गया, तब वह अपनी रक्षाके निमित्त वहाँसे हटकर अन्य लोकमें चला गया। वहाँ भी आप्तोर्याम नामक श्रेष्ठ देवता निवास करते थे, परंतु अब मयमें वहाँसे अन्यत्र जानेकी शक्ति नहीं रह गयी थी। |
| ५०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| शिवः सृष्ट्वा गृहं प्रादान्मयायैव गृहार्थिने ।<br>विरराम सहस्राक्षः पूजयामास चेश्वरम् ।<br>पूज्यमानं च भूतेशं सर्वे तुष्टुवुरीश्वरम् ॥ ८२<br>सम्पूज्यमानं त्रिदशैः समीक्ष्य<br>गणैर्गणेशाधिपतिं तु मुख्यम् ।<br>हर्षाद्ववल्गुर्जहसुश्च देवा<br>जग्मुर्ननर्दुस्तु विषक्तहस्ताः ॥ ८३<br>पितामहं वन्द्य ततो महेशं<br>प्रगृह्य चापं प्रविसृज्य भूतान् ।<br>रथाच्च सम्पत्य हरेषुदग्धं<br>क्षिप्तं पुरं तन्मकरालये च ॥ ८४<br>य इमं रुद्रविजयं पठते विजयावहम् ।<br>विजयं तस्य कृत्येषु ददाति वृषभध्वजः ॥ ८५<br>पितॄणां वापि श्राद्धेषु य इमं श्रावयिष्यति ।<br>अनन्तं तस्य पुण्यं स्यात् सर्वयज्ञफलप्रदम् ॥ ८६<br>इदं स्वस्त्ययनं पुण्यमिदं पुंसवनं महत् ।<br>इदं श्रुत्वा पठित्वा च यान्ति रुद्रसलोकताम् ॥ ८७ | तब भक्तवत्सल शंकरजीने एक उत्तम पुर और गृहका निर्माण कर गृहार्थी मयको प्रदान कर दिया। यह देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र शान्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने महेश्वरकी पूजा की। उस समय सभी देवताओंने पूजित होते हुए भूतपति शंकरकी स्तुति की। तदनन्तर देवताओं और गणेश्वरोंद्वारा प्रधान गणेशाधिपति महेश्वरकी पूजा होते देखकर देवगण हाथ उठाकर हर्षपूर्वक जय-जयकार, अट्टहास और सिंहनाद करने लगे। इसके बाद रथसे निकलकर उन्होंने ब्रह्मा और शंकरजीकी वन्दना की। फिर हाथमें धनुष ग्रहणकर और भूतगणोंसे विदा होकर वे अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थित हुए; क्योंकि शंकरजीके बाणसे भस्म हुआ त्रिपुर महासागरमें निमग्न हो चुका था। जो मनुष्य विजय प्रदान करनेवाले इस रुद्रविजयका पाठ करता है, उसे भगवान् शंकर सभी कार्योंमें विजय प्रदान करते हैं। जो मनुष्य पितरोंके श्राद्धोंके अवसरपर इसे पढ़कर सुनाता है उसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाले अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। यह रुद्रविजय महान् मङ्गलकारक, पुण्यप्रद और संतानप्रदायक है। इसे पढ़ और सुनकर लोग रुद्रलोकमें चले जाते हैं ॥ ८०–८७ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिपुरदाहो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें त्रिपुरदाह नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥
एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय
पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृतर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! इलानन्दन महाराज पुरूरवा प्रति मासकी अमावस्याको किस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते हैं और वहाँ अपने पितरोंको कैसे तृप्त करते हैं? उन बुद्धिमान् नरेशके इस प्रभावको हमलोग सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥ |
| कथं गच्छत्यमावास्यां मासि मासि दिवं नृपः ।<br>ऐलः पुरूरवाः सूत तर्पयेत कथं पितॄन् ।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुं प्रभावं तस्य धीमतः ॥ १ | |
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! पूर्वकालमें महाराज मनुने भगवान् मधुसूदनसे यही प्रश्न किया था। उस समय भगवान्ने उन सूर्यपुत्र मनुके प्रति जो कुछ कहा था, वही मैं बतला रहा हूँ, आपलोग ध्यान देकर सुनिये ॥ २ ॥ |
| एतदेव तु पप्रच्छ मनुः स मधुसूदनम् ।<br>सूर्यपुत्राय चोवाच यथा तन्मे निबोधत ॥ २ |
* अध्याय १४१ * ५०९
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा- राजन्! मैं इलापुत्र पुरूरवाका |
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| तस्य चाहं प्रवक्ष्यामि प्रभावं विस्तरेण तु।<br>ऐलस्य दिवि संयोगं सोमेन सह धीमता॥ ३ | प्रभाव, स्वर्गलोकमें उसका बुद्धिमान् चन्द्रमाके साथ संयोग, उन चन्द्रमासे अमृतकी उपलब्धि तथा पितृतर्पणकी बात विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। सौम्य, बर्हिषद्, काव्य |
| सोमाच्चैवामृतप्राप्तिः पितॄणां तर्पणं तथा।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ ४ | तथा अग्निष्वात्तसंज्ञक पितरों तथा नक्षत्रोंपर विचरण करते हुए सूर्य और चन्द्रमा जिस समय अमावास्या |
| यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च नक्षत्राणां समागतौ।<br>अमावास्यां निवसतः एकस्मिन्नथ मण्डले॥ ५ | तिथिको एक मण्डल अर्थात् एक राशिपर स्थित होते हैं, उस समय वह प्रत्येक अमावास्याको सूर्य और चन्द्रमाका |
| तदा स गच्छति द्रष्टुं दिवाकरनिशाकरौ।<br>अमावास्याममावास्यां मातामहपितामहौ॥ ६ | दर्शन करनेके लिये स्वर्गमें जाता है और वहाँ मातामह (नाना) और पितामह (बाबा)—दोनोंको अभिवादन कर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ कुछ दिनतक ठहरा |
| अभिवाद्य तु तौ तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति।<br>प्रचस्कन्द ततः सोममर्चयित्वा परिश्रमत्॥ ७ | रहता है। चन्द्रमासे अमृतके क्षरण होनेपर उससे परिश्रमपूर्वक पितरोंकी पूजा करके लौटता है। किसी महीनेमें श्राद्ध |
| ऐलः पुरूरवा विद्वान् मासि श्राद्धचिकीर्षया।<br>ततः स दिवि सोमं वै ह्युपतस्थे पितॄनपि॥ ८ | करनेकी इच्छासे इलानन्दन विद्वान् पुरूरवा स्वर्गलोकमें चन्द्रमा और पितरोंके निकट गया और दो लवमात्र कुहू |
| द्विलवं कुहुमात्रं च तावुभौ तु निधाय सः।<br>सिनीवालीप्रमाणाल्यकुहूमात्रव्रतोदये ॥ ९ | अमावास्यामें उसने दोनोंको स्थापित किया; क्योंकि पितृ-व्रतमें जब सिनीवालीका प्रमाण थोड़ा तथा कुहू (अमावास्या) प्रशस्त मानी गयी है। अतः कुहूका समय प्राप्त हुआ |
| कुहूमात्रं पितॄद्देशं ज्ञात्वा कुहूमुपासते।<br>तमुपास्य ततः सोमं कलापेक्षी प्रतीक्षते॥ १० | जानकर वह पितरोंके उद्देश्यसे कुहूकी उपासना करता है। उसकी उपासना करनेके पश्चात् वह कालकी प्रतीक्षा |
| स्वधामृतं तु सोमाद् वै वसंस्तेषां च तृप्तये।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव स्वधामृतपरिस्त्रवैः।<br>कृष्णपक्षभुजां प्रीतिर्दुह्यते परमांशुभिः॥ ११ | करता हुआ चन्द्रमाकी भी प्रतीक्षा करता है। वहाँ रहते हुए उसे पितरोंकी तृप्तिके लिये चन्द्रमासे स्वधारूप अमृत प्राप्त होता है। चन्द्रमाकी पंद्रह किरणोंसे स्वधामृतका क्षरण होता है। कृष्णपक्षमें श्राद्धभोजी पितरोंका उन श्रेष्ठ |
| सद्योऽभिक्षरता तेन सौम्येन मधुना च सः।<br>निवापेष्वथ दत्तेषु पित्र्येण विधिना तु वै॥ १२ | किरणोंसे बड़ा प्रेम रहता है तथा अन्य पितर उनसे द्वेष करते हैं। पुरूरवा तुरंत अभिक्षरित हुए उस उत्तम मधुको पितृ-श्राद्धकी विधिके अनुसार श्राद्धके समय पितरोंको |
| स्वधामृतेन सौम्येन तर्पयामास वै पितॄन्।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ १३ | प्रदान करता है। इस प्रकार वह उत्तम स्वधामृतसे सौम्य, बर्हिषद्, काव्य तथा अग्निष्वात्त पितरोंको तृप्त करता |
| ऋतुरग्निः स्मृतो विप्रैर्ऋतुं संवत्सरं विदुः।<br>जज्ञिरे ऋतवस्तस्मादृर्तुभ्यो ह्यार्तवाऽभवन्॥ १४ | रहता है। महर्षियोंने ऋतुको अग्नि बतलाया है और ऋतुको संवत्सर भी कहते हैं। उस संवत्सरसे ऋतुकी उत्पत्ति होती है और ऋतुओंसे उत्पन्न हुए पितर आर्तव |
| पितरोऽर्तवोऽर्धमासा विज्ञेया ऋतुसूनवः।<br>पितामहास्तु ऋतवो ह्यमावास्याब्दसूनवः।<br>प्रपितामहाः स्मृता देवाः पञ्चाब्दा ब्रह्मणः सुताः॥ १५ | कहलाते हैं। आर्तव और अर्धमास पितरोंको ऋतुका पुत्र तथा ऋतुस्वरूप पितामह और अमावास्याको संवत्सरका पुत्र जानना चाहिये। प्रपितामह और पञ्च संवत्सररूप देवगण ब्रह्माके पुत्र माने गये हैं॥३—१५॥ |
५१० * मत्स्यपुराण *
| सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्ता इति त्रिधा।<br>गृहस्था ये तु यज्वानो हविर्यज्ञार्तवाश्च ये।<br>स्मृता बर्हिषदस्ते वै पुराणे निश्चयं गताः॥ १६<br>गृहमेधिनश्च यज्वानो अग्निष्वात्तार्तवाः स्मृताः।<br>अष्टकापतयः काव्याः पञ्चाब्दांस्तु निबोधत॥ १७<br>तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः।<br>सोमस्त्विड्वत्सरश्चैव वायुश्चैवानुवत्सरः॥ १८<br>रुद्रस्तु वत्सरस्तेषां पञ्चाब्दा ये युगात्मकाः।<br>कालेनाधिष्ठितस्तेषु चन्द्रमाः स्रवते सुधाम्॥ १९<br>एते स्मृता देवकृत्याः सोमपाश्चोष्मपाश्च ये।<br>तांस्तेन तर्पयामास यावदासीत् पुरूरवाः॥ २०<br>यस्मात्प्रसूयते सोमो मासि मासि विशेषतः।<br>ततः स्वधामृतं तद्वै पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत् तदमृतं सोममवाप मधु चैव हि॥ २१<br>ततः पीतसुधं सोमं सूर्योऽसावेकरश्मिना।<br>आप्यायते सुषुम्णेन सोमं तु सोमपायिनम्॥ २२<br>निःशेषं वै कलाः पूर्वा युगपद्ध्यापयन्पुरा।<br>सुषुम्णाऽऽप्यायमानस्य भागं भागमहःक्रमात्॥ २३<br>कलाः क्षीयन्ति कृष्णास्ताः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च।<br>एवं सा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ २४<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः।<br>एवमाप्यायितः सोमः शुक्लपक्षेऽप्यहःक्रमात्।<br>देवैः पीतसुधं सोमं पुरा पश्चात्पिबेद् रविः॥ २५<br>पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः।<br>आप्यायत्सुषुम्णेन भागं भागमहःक्रमात्॥ २६<br>सुषुम्णाप्यायमानस्य शुक्ला वर्धयन्ति वै कलाः।<br>तस्माद्घ्रसन्ति वै कृष्णाः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च॥ २७<br>एवमाप्यायते सोमः क्षीयते च पुनः पुनः।<br>समृद्धिरेवं सोमस्य पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ २८<br>इत्येष पितृमान् सोमः स्मृतस्तद्वत्सुधात्मकः।<br>कान्तः पञ्चदशैः सार्धं सुधामृतपरिस्त्रवैः॥ २९ | सौम्य, बर्हिषद्, काव्य और अग्निष्वात्त—पितरोंके ये तीन भेद हैं। इनमें जो गृहस्थ, यज्ञकर्ता और हवन करनेवाले हैं, वे आर्तव पितर पुराणमें बर्हिषद् नामसे निश्चित किये गये हैं। गृहस्थाश्रमी और यज्ञकर्ता आर्तव पितर अग्निष्वात्त कहलाते हैं। अष्टकापति आर्तव पितरोंको काव्य कहा जाता है। अब पञ्चाब्दोंको सुनिये। इनमें, अग्नि संवत्सर, सूर्य परिवत्सर, सोम इड्वत्सर, वायु अनुवत्सर और रुद्र वत्सर हैं। ये पञ्चाब्द युगात्मक होते हैं। समयानुसार इनपर स्थित हुए चन्द्रमा अमृतका क्षरण करते हैं। ये देवकर्म कहे जाते हैं। जबतक पुरूरवा वहाँ रहता था तबतक वह जो सोमप और ऊष्मप पितर हैं, उनको भी उसी अमृतसे तृप्त करता था। चूँकि चन्द्रमा प्रत्येक मासमें विशेषरूपसे अमृतका क्षरण करते हैं और वह सोमपायी पितरोंको स्वधामृतरूपसे प्राप्त होता है। इसीलिये वह अमृतस्वरूप मधु सोमको प्राप्त होता है। इस प्रकार पितरोंद्वारा चन्द्रमाका अमृत पी लिये जानेपर सूर्यदेव अपनी एकमात्र सुषुम्णा नामकी किरणद्वारा उन सोमपायी चन्द्रमाको पुनः परिपूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार सूर्य सुषुम्णाद्वारा पूर्ण किये जाते हुए चन्द्रमाकी पहलेकी सम्पूर्ण कलाओंको दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा करके पूर्ण करते हैं। चन्द्रमाकी कलाएँ कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं और शुक्लपक्षमें वे पुनः पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे चन्द्रमाका शरीर पूर्ण होता रहता है। इसी कारण शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे परिपूर्ण किये गये चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल पूर्णिमा तिथिको श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। पहले देवगण चन्द्रमासे स्रवित हुए अमृतको पीते हैं, उसके बाद सूर्य भी सोमका पान करते हैं। सूर्य अपनी एक किरणसे पंद्रह दिनोंतक सोमको पीते हैं और पुनः दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा कर सुषुम्णा किरणद्वारा उसे पूर्ण कर देते हैं। इसी कारण शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्षमें वे क्षीण होती हैं, यही इनका क्रम है। इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह दिनोंतक बढ़ते हैं और पुनः पंद्रह दिनतक क्षीण होते रहते हैं। चन्द्रमाकी इस प्रकारकी समृद्धि और ह्रास शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्षके आश्रयसे होते हैं। इस प्रकार सुधामृतस्रावी पंद्रह किरणोंसे सुशोभित ये चन्द्रमा सुधात्मक एवं पितृमान् कहे जाते हैं॥ १६—२९॥ |
| * अध्याय १४१ * | ५११ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अतः परं प्रवक्ष्यामि पर्वाणां संधयश्च याः।<br>यथा ग्रथ्नन्ति पर्वाणि आवृत्तादिक्षुवेणुवत्॥ ३०<br>तथाब्दमासाः पक्षाश्च शुक्लाः कृष्णास्तु वै स्मृताः।<br>पौर्णमास्यास्तु यो भेदो ग्रन्थयः संधयस्तथा॥ ३१<br>अर्धमासस्य पर्वाणि द्वितीयाप्रभृतीनि च।<br>अग्न्याधानक्रिया यस्तान्नीयन्ते पर्वसंधिषु॥ ३२<br>तस्मात्तु पर्वणो ह्यादौ प्रतिपद्यादिसंधिषु।<br>सायाह्ने अनुमत्याश्च द्वौ लवौ काल उच्यते।<br>लवौ द्वावेव राकायाः कालो ज्ञेयोऽपराह्निकः॥ ३३<br>प्रकृतिः कृष्णपक्षस्य कालेऽतीतेऽपराह्रिके।<br>सायाह्ने प्रतिपद्येष स कालः पौर्णमासिकः॥ ३४<br>व्यतीपाते स्थिते सूर्ये लेखादूर्ध्वं युगान्तरम्।<br>युगान्तरोदिते चैव चन्द्रे लेखोपरि स्थिते॥ ३५<br>पूर्णमासव्यतीपातो यदा पश्येत्परस्परम्।<br>तौ तु वै प्रतिपद्यावत्तस्मिन्काले व्यवस्थितौ॥ ३६<br>तत्कालं सूर्यमुद्दिश्य दृष्ट्वा संख्यातुमर्हसि।<br>स चैव सत्क्रियाकालः षष्ठः कालोऽभिधीयते॥ ३७<br>पूर्णेन्दुः पूर्णपक्षे तु रात्रिसंधिषु पूर्णिमा।<br>तस्मादाप्यायते नक्तं पौर्णमास्यां निशाकरः॥ ३८<br>यदान्योन्यवतो पाते पूर्णिमा प्रेक्षते दिवा।<br>चन्द्रादित्यौऽपराह्ने तु पूर्णत्वात्पूर्णिमा स्मृता॥ ३९<br>यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।<br>तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता॥ ४०<br>अत्यर्थं राजते यस्मात्पौर्णमास्यां निशाकरः।<br>रञ्जनाच्चैव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदुः॥ ४१<br>अमा वसेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरौ।<br>एका पञ्चदशी रात्रिरमावास्या ततः स्मृता॥ ४२ | इसके बाद अब मैं पर्वोंकी जो संधियाँ हैं, उनका वर्णन कर रहा हूँ। जैसे गन्ने और बाँसमें गोलाकार गाँठें बनी रहती हैं वैसे ही वर्ष, मास, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, अमावास्या और पूर्णिमाके भेद—ये सभी पर्वकी ग्रन्थियाँ और संधियाँ हैं। (प्रत्येक पक्षमें) प्रतिपद्-द्वितीया आदि पंद्रह तिथियाँ होती हैं। चूँकि अग्न्याधान आदि क्रियाएँ पर्वसंधियोंमें सम्पन्न की जाती हैं, अतः उन्हें (अमा, पूर्णिमा) पर्वकी तथा प्रतिपदाकी संधियोंमें करना चाहिये। चतुर्दशी और पूर्णिमा आदिके दो लवको पर्वकाल कहा जाता है तथा राकाके दूसरे दिनमें आनेवाले दो लवको पर्वकाल जानना चाहिये। कृष्णपक्षके अपराह्निक कालके व्यतीत हो जानेपर सायंकालमें प्रतिपदाके योगमें जो काल आता है उसे पौर्णमासिक कहते हैं। सूर्यके लेखा (विषुव)-के ऊपर व्यतीपातमें स्थित होनेपर युगान्तर कहलाता है। उस समय चन्द्रमा लेखाके ऊपर स्थित युगान्तरमें उदित होते हैं। इस प्रकार जब चन्द्रमा और व्यतीपात परस्पर एक-दूसरेको देखें और प्रतिपदा तिथितक उसी अवस्थामें स्थित रहें तो उस समय सूर्यके उद्देश्यसे उस समयको देखकर गणना करनी चाहिये। उसे सत्क्रियाकाल नामक छठा काल कहते हैं। शुक्लपक्षके पूर्ण होनेपर रात्रिकी संधिमें जब पूर्णचन्द्र उदय होते हैं, तब उसे पूर्णिमा कहते हैं। इसीलिये चन्द्रमा पूर्णिमाकी रातमें अपनी सभी कलाओंसे पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमा तिथिकी ह्रास-वृद्धि होती रहती है, अतः यदि वृद्धिके समय दूसरे दिन सूर्य और चन्द्र दिनमें पूर्णिमामें दीखते हैं तो वह तिथि पूर्ण होनेके कारण पूर्णिमा कहलाती है। यदि दूसरे दिन प्रतिपदाका योग होनेमें चन्द्रमाकी एक कला हीन हो गयी तो उस पूर्णिमाको अनुमति कहते हैं। यह अनुमति देवताओंसहित पितरोंको परम प्रिय है। चूँकि पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमा अत्यन्त सुशोभित होते हैं, इसलिये चन्द्रमाको प्रिय होनेके कारण उस पूर्णिमाको विद्वानोंने राका नामसे अभिहित किया है। कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं रात्रिको जब सूर्य और चन्द्र एक साथ एक नक्षत्रपर स्थित होते हैं, तब उसे अमावास्या कहा जाता है॥ ३०-४२॥ |
| उद्दिश्य ताममावास्यां यदा दर्श समागतौ।<br>अन्योन्यं चन्द्रसूर्यौ तु दर्शनाद् दर्श उच्यते॥ ४३ | उस अमावास्याको लक्ष्य कर जब सूर्य और चन्द्रमा दर्शपर आ जाते हैं और परस्पर एक-दूसरेको देखते हैं, तब उसे दर्श कहते हैं। |
१४३- यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिको वर्णन
५१२ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| द्वौ द्वौ लवावमावास्यां स कालः पर्वसंधिषु ।<br>द्व्यक्षरः कुहुमात्रश्च पर्वकालस्तु स स्मृतः ॥ ४४<br>दृष्टचन्द्रा त्वमावास्या मध्याह्नप्रभृतीह वै ।<br>दिवा तदूर्ध्वं रात्र्यां तु सूर्ये प्राप्ते तु चन्द्रमाः ।<br>सूर्येण सहसोद्गच्छेत्ततः प्रातस्तनात्तु वै ॥ ४५<br>समागम्य लवौ द्वौ तु मध्याह्नान्निपतन् रविः ।<br>प्रतिपच्छुक्लपक्षस्य चन्द्रमाः सूर्यमण्डलात् ॥ ४६<br>निर्मुच्यमानयोर्मध्ये तयोर्मण्डलयोस्तु वै ।<br>स तदान्वाहुतेः कालो दर्शस्य च वषट्क्रियाः ।<br>एतदृतुमुखं ज्ञेयममावास्यां तु पार्वणम् ॥ ४७<br>दिवा पर्व त्वमावास्यां क्षीणेन्दौ धवले तु वै ।<br>तस्माद् दिवा त्वमावास्यां गृह्यते यो दिवाकरः ॥ ४८ | अमावास्यामें पर्वसंधिके अवसरपर दो-दो लव पर्वकाल कहलाते हैं। इनमें प्रतिपदाके योगवाला पर्वकाल कुहू कहलाता है। जिस दिन दोपहरतक अमावास्यामें चन्द्रमाका सम्पर्क बना रहे और उसके बाद रात्रिके प्राप्त होनेपर चन्द्रमा सहसा सूर्यके निकट पहुँच जायें, पुनः प्रातःकाल सूर्यमण्डलसे पृथक् हो जायँ तो शुक्लपक्षकी प्रतिपदामें प्रातःकाल दो लव पर्वकाल कहलाता है। इस प्रकार सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलके पृथक् होते समय अमावास्याके उस मध्यवर्ती कालको अन्वाहुति कहते हैं। इसमें पितरोंके निमित्त वषट् क्रियाएँ की जाती हैं। इसे ऋतुमुख और अमावास्याको पार्वण जानना चाहिये। दिनमें जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यके साथ मिलते हैं तब अमावास्याका वह काल पर्वकाल कहलाता है। इसीलिये दिनमें अमावास्याके उस पर्वकालमें सूर्यके पहुँचनेपर सूर्य गृहीत हो जाते हैं अर्थात् सूर्यग्रहण लगता है। |
| कुहेति कोकिलेनोक्तं यस्मात्कालात् समाप्यते ।<br>तत्कालसंज्ञिता ह्येषा अमावास्या कुहूः स्मृता ॥ ४९ | कोयलद्वारा उच्चरित ‘कुहू’ शब्द जितने समयमें समाप्त होता है, अमावास्याका उतना मुख्य काल ‘कुहू’ नामसे कहा जाता है। |
| सिनीवालीप्रमाणं तु क्षीणशेषो निशाकरः ।<br>अमावास्या विशत्यर्कं सिनीवाली तदा स्मृता ॥ ५० | सिनीवालीका प्रमाण यह है कि जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यमें प्रवेश करते हैं तब वह अमावास्या सिनीवाली कही जाती है। |
| अनुमतिश्च राका च सिनीवाली कुहूस्तथा ।<br>एतासां द्विलवः कालः कुहूमात्रा कुहूः स्मृता ॥ ५१<br>इत्येष पर्वसन्धीनां कालो वै द्विलवः स्मृतः ।<br>पर्वणां तुल्यकालस्तु तुल्याहुतिवषट्क्रियाः ॥ ५२ | अनुमति, राका, सिनीवाली और कुहू—इनका दो लवकाल पर्वकाल होता है। कुहू शब्दके उच्चारणपर्यन्त कालको कुहू कहते हैं। इस प्रकार पर्वसंधियोंका यह काल दो लवका बतलाया जाता है और यह पर्वोंके समान फलदायक होता है। इसमें हवन और वषट् क्रियाएँ की जाती हैं। |
| चन्द्रसूर्यव्यतीपाते समे वै पूर्णिमे उभे ।<br>प्रतिपत्प्रतिपन्नस्तु पर्वकालो द्विमात्रकः ॥ ५३ | चन्द्रमा और सूर्यका व्यतिपातपर स्थित होना तथा दोनों (अमावास्या और पूर्णिमा) पूर्णिमाएँ—ये सभी एक-से पुण्यदायक हैं। प्रतिपदाके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला पर्वकाल दो लवका होता है। |
| कालः कुहूसिनीवाल्यो समृद्धो द्विलवः स्मृतः ।<br>अर्कनिर्मण्डले सोमे पर्वकालः कलाः स्मृताः ॥ ५४ | इसी प्रकार कुहू और सिनीवालीके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ पर्वकाल भी दो लवका ही माना जाता है। चन्द्रमा जब सूर्यमण्डलसे बाहर होते हैं, तब वह पर्वकाल एक कलाका बतलाया जाता है। |
| यस्मादापूर्यते सोमः पञ्चदश्यां तु पूर्णिमा ।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव कलाभिर्दिवसक्रमात् ॥ ५५ | चूँकि दिनके क्रमसे पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमा पंद्रह कलाओंद्वारा पूर्ण किये जाते हैं, इसलिये उस तिथिको पूर्णिमा कहते हैं। |
| तस्मात् पञ्चदशे सोमे कला वै नास्ति षोडशी ।<br>तस्मात् सोमस्य विप्रोक्तः पञ्चदश्यां मया क्षयः ॥ ५६ | इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह कलाओंवाले* ही हैं, उनमें सोलहवीं कला नहीं है। इसी कारण मैंने पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमाका |
* इसका विस्तृत वर्णन सूर्यसिद्धान्त, बृहत्संहिता आदिमें है। १६ वीं बीजकलासहित १५ ह्रास-वृद्धियुक्त कलाओंका वर्णन शारदातिलक आदिमें इस प्रकार है—‘अमृता मानदा नन्दा पूषा तुष्टि रतिर्धृतिः। शाशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥ पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः।' (शारदातिलक २।१२-१३)
| * अध्याय १४१ * | ५१३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्येते पितरो देवाः सोमपाः सोमवर्धनाः।<br>आर्तवा ऋतवोऽथाब्दा देवास्तान्भावयन्ति हि ॥ ५७ | क्षय बतलाया है। इस प्रकार ये सोमपायी देव-पितर सोमकी वृद्धि करनेवाले हैं और ऋतु एवं अब्दसे सम्बन्धित आर्तवसंज्ञक देवगण उन्हींके परिपोषक हैं ॥४३—५७॥ |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि पितॄञ्श्राद्धभुजस्तु ये।<br>तेषां गतिं च सत्तत्त्वं प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि ॥ ५८ | इसके बाद अब मैं जो श्राद्धभोजी पितर हैं, उनकी गति, उनका उत्तम तत्त्व तथा उनके निमित्त दिये गये श्राद्धकी प्राप्तिका वर्णन कर रहा हूँ। |
| न मृतानां गतिः शक्या ज्ञातुं वा पुनरागतिः।<br>तपसा हि प्रसिद्धेन किं पुनर्मांसचक्षुषा ॥ ५९ | मृतकोंके आवागमनका रहस्य तो उत्कृष्ट तपोबलसम्पन्न तपस्वी भी नहीं जान सकते, फिर चर्मचक्षुधारी साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है। |
| अत्र देवान्पितॄंश्चैते पितरो लौकिकाः स्मृताः।<br>तेषां ते धर्मसामर्थ्यात्स्मृताः सायुज्यगा द्विजैः ॥ ६०<br><br>यदि वाश्रमधर्मेण प्रज्ञानेषु व्यवस्थितान्।<br>अन्ये चात्र प्रसीदन्ति श्रद्धायुक्तेषु कर्मसु ॥ ६१ | इन श्राद्धभोजियोंमें देवता और पितर दोनों हैं। इनमें जो अपने धर्मके बलसे सायुज्य मुक्तिको प्राप्त कर चुके हैं अथवा आश्रमधर्मका पालन करते हुए ज्ञान-प्राप्तिमें लगे हुए हैं और श्रद्धायुक्त कर्मोंके सम्पन्न होनेपर प्रसन्न होते हैं, उन्हें महर्षिगण लौकिक पितर कहते हैं। |
| ब्रह्मचर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि।<br>श्राद्धेन विद्यया चैव चान्नदानेन सप्तधा ॥ ६२<br><br>कर्मस्वेवेषु ये सक्ता वर्तन्त्या देहपातनात्।<br>देवैस्ते पितृभिः सार्धमूमपैः सोमपैस्तथा।<br>स्वर्गता दिवि मोदन्ते पितृमन्त उपास्ते ॥ ६३ | ब्रह्मचर्य, तप, यज्ञ, संतान, श्राद्ध, विद्या और अन्नदान—ये भूतलपर प्रधान धर्म कहे गये हैं। जो लोग मृत्युपर्यन्त इन सातों धर्मोंका पालन करते हुए इनमें आसक्त रहते हैं, वे ऊष्मप तथा सोमप देवताओं और पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें जाकर आनन्दका उपभोग करते हुए पितरोंकी उपासना करते हैं। |
| प्रजावतां प्रसिद्ध्यैषा उक्ता श्राद्धकृतां च वै।<br>तेषां निवापे दत्तं हि तत्कुलीनैस्तु बान्धवैः ॥ ६४ | ऐसी प्रसिद्धि उन संतानयुक्त श्राद्धकर्ताओंके लिये कही गयी है, जिनके लिये उनके कुलीन भाई-बन्धुओंने दानके अवसरपर श्राद्ध आदि प्रदान किया है। |
| मासश्राद्धं हि भुञ्जानास्तेऽप्येते सोमलौकिकाः।<br>एते मनुष्याः पितरो मासश्राद्धभुजस्तु वै ॥ ६५ | मासिक श्राद्धमें भोजन करनेवाले पितर चन्द्रलोकवासी हैं। ये मासश्राद्धभोजी पितर मनुष्योंके पितर हैं। |
| तेभ्योऽपरे तु ये त्वन्ये सङ्कीर्णाः कर्मयोनिषु।<br>भ्रष्टाश्चाश्रमधर्मेषु स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥ ६६<br><br>भिन्ने देहे दुरापन्नाः प्रेतभूता यमक्षये।<br>स्वकर्मण्यनुशोचन्तो यातनास्थानमागताः ॥ ६७ | इनके अतिरिक्त जो अन्य लोग कर्मानुसार प्राप्त हुई योनियोंमें कष्ट झेल रहे हैं, आश्रमधर्मसे भ्रष्ट हो गये हैं, जिनके लिये स्वाहा-स्वधाका प्रयोग हुआ ही नहीं है, जो शरीरके नष्ट होनेपर यमलोकमें प्रेत होकर दुर्गति भोग रहे हैं, नरक-स्थानपर पहुँचकर अपने कर्मोंपर पश्चात्ताप करते हैं, |
| दीर्घाश्चैवातिशुष्काश्च श्मश्रुलाश्च विवाससः।<br>क्षुत्पिपासाभिभूतास्ते विद्रवन्ति त्वितस्ततः ॥ ६८<br><br>सरित्सरस्तडागानि पुष्करिण्यश्च सर्वशः।<br>परान्नान्यभिकाङ्क्षन्तः काल्यमाना इतस्ततः ॥ ६९ | लम्बे शरीरवाले, अत्यन्त कृशकाय, लम्बी दाढ़ियोंसे युक्त, वस्त्रहीन और भूख एवं प्याससे व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ते हैं, नदी, सरोवर, तडाग और जलाशयोंपर सब ओर दूसरोंके द्वारा दिये गये अन्नकी ताकमें इधर-उधर घूमते रहते हैं, |
| स्थानेषु पात्यमाना ये यातनास्थेषु तेषु वै।<br>शाल्मल्यां वैतरण्यां च कुम्भीपाकेऽद्धवालुके ॥ ७०<br><br>असिपत्रवने चैव पात्यमानाः स्वकर्मभिः।<br>तत्रस्थानां तु तेषां वै दुःखितानामशायिनाम् ॥ ७१ | शाल्मली, वैतरणी, कुम्भीपाक, तप्तवालुका और असिपत्रवन नामक भीषण नरकोंमें अपने कर्मानुसार गिराये जाते हैं तथा उन नरकोंमें पड़े हुए जो निद्रारहित हो दुःख भोग रहे हैं, |
५१४ * मत्स्यपुराण *
| तेषां लोकान्तरस्थानां बान्धवैर्नामगोत्रतः।<br>भूमावसव्यं दर्भेषु दत्ताः पिण्डास्त्रयस्तु वै।<br>प्राप्तांस्तु तर्पयन्त्येव प्रेतस्थानेष्वधिष्ठितान्॥ ७२<br>अप्राप्ता यातनास्थानं प्रभ्रष्टा ये च पञ्चधा।<br>पश्चाद्ये स्थावरान्ते वै भूतानीके स्वकर्मभिः॥ ७३<br>नानारूपासु जातीनां तिर्यग्योनिषु मूर्तिषु।<br>यदाहारा भवन्त्येते तासु तास्विह योनिषु॥ ७४<br>तस्मिंस्तस्मिंस्तदाहारे श्राद्धे दत्तं तु प्रीणयेत्।<br>काले न्यायागतं पात्रे विधिना प्रतिपादितम्।<br>प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र यत्रावतिष्ठति॥ ७५<br>यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो बिन्दति मातरम्।<br>तथा श्राद्धेषु दृष्टान्तो मन्त्रः प्रापयते तु तम्॥ ७६<br>एवं ह्यविकलं श्राद्धं श्रद्धादत्तं मनुर्ब्रवीत्।<br>सनत्कुमारः प्रोवाच पश्यन् दिव्येन चक्षुषा॥ ७७<br>गतागतज्ञः प्रेतानां प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि।<br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ७८<br>इत्येते पितरो देवा देवाश्च पितरश्च वै।<br>अन्योन्यपितरो ह्येते देवाश्च पितरो दिवि॥ ७९<br>एते तु पितरो देवा मनुष्याः पितरश्च ये।<br>पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः॥ ८०<br>इत्येष विषयः प्रोक्तः पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत्पितृमहत्त्वं हि पुराणे निश्चयं गतम्॥ ८१<br>इत्येष सोमसूर्याभ्यामैलस्य च समागमः।<br>अवाप्तिं श्रद्धया चैव पितॄणां चैव तर्पणम्॥ ८२<br>पर्वणां चैव यः कालो यातनास्थानमेव च।<br>समासात्कीर्तितस्तुभ्यं सर्ग एष सनातनः॥ ८३<br>वैरूप्यं येन तत्सर्वं कथितं त्वेकदेशिकम्।<br>अशक्यं परिसंख्यातुं श्रद्धेयं भूतिमिच्छता॥ ८४<br>स्वायम्भुवस्य देवस्य एष सर्गो मयेरितः।<br>विस्तरेणानुपूर्वाच्च भूयः किं कथयामि वः॥ ८५ | उन लोकान्तरमें स्थित जीवोंके लिये उनके भाई-बन्धुओंद्वारा यहाँ भूतलपर जब उनका नाम-गोत्र उच्चारण कर अपसव्य होकर कुशोंपर तीन पिण्ड प्रदान किये जाते हैं तब प्रेतस्थानोंमें स्थित होनेपर भी वे पिण्ड उन्हें प्राप्त होकर तृप्त करते हैं॥ ५८—७२॥<br><br>जो नरकोंमें न जाकर पाँच प्रकारसे विभक्त होकर भ्रष्ट हो चुके हैं अर्थात् जो मृत्युके उपरान्त अपने कर्मोंके अनुसार स्थावर, भूत-प्रेत, अनेकों प्रकारकी जातियों, तिर्यग्योनियों एवं अन्य जन्तुओंमें जन्म ले चुके हैं, वहाँ उन-उन योनियोंमें वे जैसे आहारवाले होते हैं, उन्हीं-उन्हीं योनियोंमें उसी आहारके रूपमें परिणत होकर श्राद्धमें दिया गया पिण्ड उन्हें तृप्त करता है। यदि श्राद्धोपयुक्त कालमें न्यायोपार्जित अन्न (मृतकोंके निमित्त) विधिपूर्वक सत्पात्रको दान किया जाता है तो वह अन्न वे मृतक जहाँ-कहीं भी रहते हैं, उन्हें प्राप्त होता है। जैसे बछड़ा गौओंमें विलीन हुई अपनी माँको ढूँढ़ निकालता है उसी प्रकार श्राद्धोंमें प्रयुक्त हुआ मन्त्र (दानकी वस्तुओंको) उस जीवके पास पहुँचा देता है। इस प्रकार विधानपूर्वक श्रद्धासहित दिया गया श्राद्ध-दान उस जीवको प्राप्त होता है—ऐसा मनुने कहा है। साथ ही महर्षि सनत्कुमारने भी, जो प्रेतोंके गमनागमनके ज्ञाता हैं, दिव्य चक्षुसे देखकर श्राद्धकी प्राप्तिके विषयमें ऐसा ही बतलाया है। कृष्णपक्ष उन पितरोंका दिन है तथा शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये उनकी रात्रि है। इस प्रकार ये पितृदेव और देवपितर स्वर्गलोकमें परस्पर एक-दूसरेके देवता और पितर हैं। यह तो स्वर्गीय देवों और पितरोंकी बात हुई। मनुष्योंके पितर पिता, पितामह और प्रपितामह हैं। इस प्रकार मैंने सोमपायी पितरोंके विषयमें वर्णन कर दिया। पितरोंका यह महत्त्व पुराणोंमें निश्चित किया गया है। इस प्रकार मैंने इला-नन्दन पुरूरवाका चन्द्रमा और सूर्यके साथ समागम, पितरोंको श्रद्धापूर्वक दी गयी वस्तुकी प्राप्ति, पितरोंका तर्पण, पर्व-काल और यातनास्थान (नरक)-का संक्षिप्त वर्णन आपको सुना दिया, यही सनातन सर्ग है। इसका विस्तार बहुत बड़ा है। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया है; क्योंकि पूर्णरूपसे वर्णन करना तो असम्भव है। इसलिये कल्याणकामीको इसपर श्रद्धा रखनी चाहिये। मैंने स्वायम्भुव मनुके इस सर्गका विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर दिया। अब पुनः आपलोगोंको क्या बतलाऊँ ?॥ ७३—८५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तने श्राद्धानुकीर्तनं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकीर्तनके प्रसङ्गमें श्राद्धानुकीर्तन नामक एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४१॥
| * अध्याय १४२ * | ५१५ |
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एक सौ बयालीसवाँ अध्याय
युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>चतुर्युगाणि यानि स्युः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एषां निसर्गं संख्यां च श्रोतुमिच्छामो विस्तरात्॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें जिन चारों युगोंका प्रवर्तन हुआ है, उनकी सृष्टि और संख्याके विषयमें हमलोग विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>पृथिवीद्युप्रसङ्गेन मया तु प्रागुदाहृतम्।<br>एतच्चतुर्युगं त्वेवं तद् वक्ष्यामि निबोधत।<br>तत्प्रमाणं प्रसंख्याय विस्तराच्चैव कृत्स्नशः॥ २<br>लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम्।<br>तेनापीह प्रसंख्याय वक्ष्यामि तु चतुर्युगम्॥ ३<br>काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव<br>त्रिंशच्च काष्ठां गणयेत् कलां तु।<br>त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन्मुहूर्त-<br>स्तंस्त्रिशता रात्र्यहनी समेते॥ ४<br>अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके।<br>रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः॥ ५<br>पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः।<br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ६<br>त्रिंशद् ये मानुषा मासाः पैत्रो मासः स उच्यते।<br>शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाभ्यधिकानि तु।<br>पैत्रः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते॥ ७<br>मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।<br>पितॄणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै।<br>दश च द्व्यधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिताः॥ ८<br>लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः।<br>एतद्दिव्यमहोरात्रमित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पृथ्वी और आकाशके प्रसङ्गसे मैंने पहले ही इन चारों युगोंका वर्णन कर दिया है, फिर भी (यदि आपलोगोंकी उनको सुननेकी अभिलाषा है तो) संख्यापूर्वक उनके प्रमाणको विस्तारके साथ समूचे रूपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। लौकिक प्रमाणके द्वारा मानवीय वर्षका आश्रय लेकर उसीके अनुसार गणना करके चारों युगोंका प्रमाण बतला रहा हूँ। पंद्रह निमेष (आँखके खोलने और मूँदनेका समय)-की एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला मानी जाती है। तीस कलाका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तके रात-दिन दोनों होते हैं। सूर्य मानवीय लोकमें दिन-रातका विभाजन करते हैं। उनमें रात्रि जीवोंके शयन करनेके लिये और दिन कर्ममें प्रवृत्त होनेके लिये है। पितरोंके रात-दिनका एक लौकिक मास होता है। उनमें रात-दिनका विभाग है। पितरोंके लिये कृष्णपक्ष दिन है और शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये रात्रि है। मनुष्योंके तीस मासका पितरोंका एक मास कहा जाता है। इस प्रकार तीन सौ साठ मानव-मासोंका एक पितृवर्ष होता है। यह गणना मानवीय गणनाके अनुसार की जाती है। मानवीय गणनाके अनुसार एक सौ वर्ष पितरोंके तीन वर्षके बराबर माने गये हैं। इस प्रकार पितरोंके बारहौं महीनोंकी संख्या बतलायी जा चुकी है। लौकिक प्रमाणके अनुसार जिसे एक मानव-वर्ष कहते हैं, वही देवताओंका एक दिन-रात होता है—ऐसी वैदिकी श्रुति है॥ २—९॥ |
| दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः।<br>अहस्तु यदुदक्चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम्।<br>एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते तयोः पुनः॥ १० | मानवीय वर्षके अनुसार जो देवताओंके रात-दिन होते हैं, उनमें भी पुनः विभाग हैं। उनमें उत्तरायणको देवताओंका दिन और दक्षिणायनको रात्रि कहा जाता है। इस प्रकार दिव्य रात-दिनकी गणना बतलायी जा चुकी। |
१४४- द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन
| ५१६ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्रिंशद् यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः।<br>मानुषाणां शतं यच्च दिव्या मासास्त्रयस्तु वै।<br>तथैव सह संख्यातो दिव्य एष विधिः स्मृतः॥ ११<br>त्रीणि वर्षशतान्येवं षष्टिवर्षांस्तथैव च।<br>दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः॥ १२<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः।<br>त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः॥ १३<br>नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।<br>वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसंवत्सरः स्मृतः॥ १४<br>षट्त्रिंशत् तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः॥ १५<br>इत्येतद् ऋषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः।<br>दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता॥ १६<br>चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैवं चतुर्युगम्॥ १७<br>पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेताभिधीयते।<br>द्वापरं च कलिश्चैव युगानि परिकल्पयेत्॥ १८<br>चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः॥ १९<br>इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु।<br>एकपादे निवर्तन्ते सहस्राणि शतानि च॥ २०<br>त्रेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदुः।<br>तस्यापि त्रिशती संध्या संध्यांशः संख्यया समः॥ २१<br>द्वे सहस्त्रे द्वापरं तु संध्यांशौ तु चतुःशतम्।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां कलिरेव प्रकीर्तितः।<br>द्वे शते च तथान्ये च संध्यासंध्यांशयोः स्मृते॥ २२<br>एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या तु संज्ञिता।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुष्टयम्॥ २३<br>तत्र संवत्सराः सृष्टा मानुषास्तान् निबोधत।<br>नियुतानि दश द्वे च पञ्च चैवात्र संख्यया।<br>अष्टाविंशत्सहस्राणि कृतं युगमथोच्यते॥ २४<br>प्रयुतं तु तथा पूर्णं द्वे चान्ये नियुते पुनः।<br>षण्णवतिसहस्राणि संख्यातानि च संख्यया।<br>त्रेतायुगस्य संख्येषा मानुषेण तु संज्ञिता॥ २५ | तीस मानवीय वर्षोंका एक दिव्य मास बतलाया जाता है। इसी प्रकार सौ मानवीय वर्षोंका तीन दिव्य मास माना गया है। यह दिव्य गणनाकी विधि कही जाती है। मानुषगणनाके अनुसार तीन सौ साठ वर्षोंका एक दिव्य (देव)-वर्ष कहा गया है। मानुषगणनाके अनुसार तीन हजार तीस वर्षोंका एक सप्तर्षि-वर्ष होता है। नौ हजार नब्बे मानुष-वर्षोंका एक 'ध्रुव-संवत्सर' कहलाता है। छियानबे हजार मानुषवर्षोंका एक हजार दिव्य वर्ष होता है—ऐसा गणितज्ञ लोग कहते हैं। द्विजवरो! इस प्रकार ऋषियोंद्वारा दिव्य गणनाके अनुसार यह गणना बतलायी गयी है। इसी दिव्य प्रमाणके अनुसार युग-संख्याकी भी कल्पना की गयी है। ऋषियोंने इस भारतवर्षमें चार युग बतलाये हैं। उन चारों युगोंके नाम हैं—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि। इनमें सर्वप्रथम कृतयुग, तत्पश्चात् त्रेता, तब द्वापर और 'कलियुग आनेकी परिकल्पना की गयी है। उनमें कृतयुग चार हजार (दिव्य) वर्षोंका बतलाया जाता है। इसी प्रकार चार सौ वर्षोंकी उसकी संध्या और चार सौ वर्षोंका संध्यांश होता है। इसके अतिरिक्त संध्या और संध्यांशसहित अन्य तीनों युगोंमें हजारों और सैकड़ोंकी संख्यामें एक चतुर्थांश कम हो जाता है॥ १०-२०॥<br><br>इस प्रकार युगसंख्या-ज्ञाता लोग त्रेताका प्रमाण तीन हजार वर्ष, उसकी संध्याका प्रमाण तीन सौ वर्ष और संध्याके बराबर ही संध्यांशका प्रमाण तीन सौ वर्ष बतलाते हैं। द्वापरका प्रमाण दो हजार वर्ष और उसकी संध्या तथा संध्यांशका प्रमाण दो-दो सौ अर्थात् चार सौ वर्षोंका होता है। कलियुग एक हजार वर्षोंका बतलाया गया है तथा उसकी संध्या और संध्यांश मिलकर दो सौ वर्षोंके होते हैं। इस प्रकार कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चार युग होते हैं और इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्षोंकी बतायी गयी है। अब मानुषवर्षके अनुसार इन युगोंमें कितने वर्ष होते हैं, उसे सुनिये। इनमें कृतयुग सत्रह लाख |
| * अध्याय १४२ * | ५१७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टौ शतसहस्त्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु।<br>चतुःषष्टिसहस्त्राणि वर्षाणां द्वापरं युगम्॥ २६<br>चत्वारि नियुतानि स्युर्वर्षाणि तु कलियुगम्।<br>द्वात्रिंशच्च तथान्यानि सहस्राणि तु संख्यया।<br>एतत् कलियुगं प्रोक्तं मानुषेण प्रमाणतः॥ २७<br>एषा चतुर्युगावस्था मानुषेण प्रकीर्तिता।<br>चतुर्युगस्य संख्याता संध्या संध्यांशकैः सह॥ २८ | अट्ठाईस हजार वर्षोंका कहा जाता है। इसी मानुष-गणनाके अनुसार त्रेतायुगकी वर्ष-संख्या बारह लाख छानबे हजार बतलायी गयी है। द्वापरयुग आठ लाख चौंसठ हजार मानुष वर्षोंका होता है। मानुषगणनाके अनुसार कलियुगका मान चार लाख बत्तीस हजार वर्षोंका कहा गया है। चारों युगोंकी यह अवस्था मानव-गणनाके अनुसार बतलायी गयी है। इस प्रकार संध्या और संध्यांशसहित चारों युगोंकी संख्या बतलायी जा चुकी॥ २१—२८॥ |
| एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका त्वेकसप्ततिः।<br>कृतत्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरमुच्यते॥ २९<br>मन्वन्तरस्य संख्या तु मानुषेण निबोधत।<br>एकत्रिंशत् तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः॥ ३०<br>तथा शतसहस्राणि दश चान्यानि भागशः।<br>सहस्राणि तु द्वात्रिंशच्छतान्यष्टाधिकानि च॥ ३१<br>आशीतिश्चैव वर्षाणि मासांश्चैवाधिकास्तु षट्।<br>मन्वन्तरस्य संख्यैषा मानुषेण प्रकीर्तिता॥ ३२<br>दिव्येन च प्रमाणेन प्रवक्ष्याम्यन्तरं मनोः।<br>सहस्त्राणां शतान्याहुः स च वै परिसंख्यया॥ ३३<br>चत्वारिंशत् सहस्राणि मनोरन्तरमुच्यते।<br>मन्वन्तरस्य कालस्तु युगैः सह परिकीर्तितः॥ ३४<br>एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका ह्येकसप्ततिः।<br>क्रमेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते॥ ३५<br>एतच्चतुर्दशगुणं कल्पमाहुस्तु तद्विदः।<br>ततस्तु प्रलयः कृत्स्नः स तु सम्प्रलयो महान्॥ ३६<br>कल्पप्रमाणे द्विगुणो यथा भवति संख्यया।<br>चतुर्युगाख्या व्याख्याता कृतं त्रेतायुगं च वै॥ ३७<br>त्रेतासृष्टिं प्रवक्ष्यामि द्वापरं कलिमेव च।<br>युगपत्समवेतौ द्वौ द्विधा वक्तुं न शक्यते॥ ३८<br>क्रमागतं मयाप्येतत् तुभ्यं नोक्तं युगद्वयम्।<br>ऋषिवंशप्रसङ्गेन व्याकुलत्वात् तथा क्रमात्॥ ३९<br>नोक्तं त्रेतायुगे शेषं तद्वक्ष्यामि निबोधत। | (अब मन्वन्तरका वर्णन करते हैं।) इन कृतयुग, त्रेता आदि युगोंकी यह चौकड़ी जब एकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वन्तर कहते हैं। अब मन्वन्तरकी वर्षसंख्या मानुषगणनाके अनुसार सुनिये। मानव-वर्षके अनुसार एक मन्वन्तरकी वर्ष-संख्या इकतीस करोड़ दस लाख बत्तीस हजार आठ सौ अस्सी वर्ष छः महीनेकी बतलायी जाती है। अब मैं दिव्य गणनाके अनुसार मन्वन्तरका वर्णन कर रहा हूँ। एक मनुका कार्यकाल एक लाख चालीस हजार दिव्य वर्षोंका बतलाया जाता है। मन्वन्तरका समय युग-वर्णनके साथ ही कहा जा चुका है। चारों युगोंकी यह चौकड़ी जब क्रमशः एकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वन्तर कहते हैं। कालतत्त्वको जाननेवाले विद्वान् मन्वन्तरके चौदह गुने कालको एक कल्प बतलाते हैं। इसके बाद सारी सृष्टिका विनाश हो जाता है, जिसे महाप्रलय कहते हैं। महाप्रलयका समय कल्पके समयसे दुगुना होता है। इस प्रकार कृतयुग, त्रेता आदि चारों युगोंकी वर्ष-संख्या बतलायी जा चुकी। अब मैं त्रेता, द्वापर और कलियुगकी सृष्टिका वर्णन कर रहा हूँ। कृतयुग और त्रेता—ये दोनों परस्पर सम्बद्ध हैं, अतः इनका पृथक् रूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता। इसी कारण इन दोनों युगोंके वर्णनका अवसर क्रमशः प्राप्त होनेपर भी मैंने आपलोगोंसे नहीं कहा। साथ ही उस समय ऋषि-वंशका प्रसङ्ग छिड़ जानेपर चित्त व्याकुल हो उठा था। उस समय जो नहीं कहा था, वह शेषांश अब त्रेतायुगके वर्णन-प्रसङ्गमें कह रहा हूँ, सुनिये॥ २९—३९ १/२॥ |
| ५१८ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अथ त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ये।<br>श्रौतस्मार्तं ब्रुवन् धर्मं ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः ॥ ४०<br>दाराग्निहोत्रसम्बन्धमृग्यजुःसामसंहिताः ।<br>इत्यादिबहुलं श्रौतं धर्मं सप्तर्षयोऽब्रुवन् ॥ ४१<br>परम्परागतं धर्मं स्मार्तं त्वाचारलक्षणम्।<br>वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ४२<br>सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन तपसा तथा।<br>तेषां सुतप्ततपसामार्षेणानुक्रमेण ह ॥ ४३<br>सप्तर्षीणां मनोश्चैव आदौ त्रेतायुगे ततः।<br>अबुद्धिपूर्वकं तेन सकृत्पूर्वकमेव च ॥ ४४<br>अभिवृत्तास्तु ते मन्त्रा दर्शनैस्तारकादिभिः।<br>आदिकल्पे तु देवानां प्रादुर्भूतास्तु ते स्वयंम् ॥ ४५<br>प्रमाणेष्वथ सिद्धानामन्येषां च प्रवर्तते।<br>मन्त्रयोगो व्यतीतेषु कल्पेष्वथ सहस्रशः।<br>ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिमायामुपस्थिताः ॥ ४६<br>ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्राश्चाथर्वणास्तु ये।<br>सप्तर्षिभिश्च ये प्रोक्ताः स्मार्तं तु मनुरब्रवीत् ॥ ४७<br>त्रेतादौ संहता वेदाः केवलं धर्मसेतवः।<br>संरोधादायुषश्चैव व्यस्यन्ते द्वापरे च ते।<br>ऋषयस्तपसा वेदानहोरात्रमधीयत ॥ ४८<br>अनादिनिधना दिव्याः पूर्वं प्रोक्ताः स्वयम्भुवा।<br>स्वधर्मसंवृताः साङ्गा यथाधर्मं युगे युगे।<br>विक्रियन्ते स्वधर्मं तु वेदवादाद् यथायुगम् ॥ ४९<br>आरम्भयज्ञः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः।<br>परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः ॥ ५०<br>ततः समुदिता वर्णास्त्रेतायां धर्मशालिनः।<br>क्रियावन्तः प्रजावन्तः समृद्धाः सुखिनश्च वै ॥ ५१<br>ब्राह्मणाश्चैव विधीयन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियैर्विशः।<br>वैश्याश्शूद्रानुवर्तन्ते परस्परमनुग्रहात् ॥ ५२<br>शुभाः प्रकृतयस्तेषां धर्मा वर्णाश्रमाश्रयाः॥ | त्रेतायुगके आदिमें जो मनु और सप्तर्षिगण थे, उन लोगोंने ब्रह्माकी प्रेरणासे श्रौत और स्मार्त धर्मोंका वर्णन किया था। उस समय सप्तर्षियोंने दार-सम्बन्ध (विवाह), अग्निहोत्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी संहिता आदि अनेकविध श्रौत धर्मोंका विवेचन किया था। उसी प्रकार स्वायम्भुव मनुने वर्णों एवं आश्रमोंके धर्मोंसे युक्त परम्परागत आचार-लक्षणरूप स्मार्त-धर्मका वर्णन किया था। त्रेतायुगके आदिमें उत्कृष्ट तपस्यावाले उन सप्तर्षियों तथा मनुके हृदयमें वे मन्त्र सत्य, ब्रह्मचर्य, शास्त्र-ज्ञान, तपस्या तथा ऋषि-परम्पराके अनुक्रमसे बिना सोचे-विचारे ही दर्शनों एवं तारकादिद्वारा एक ही बारमें स्वयं प्रकट हो गये थे। वे ही मन्त्र आदि कल्पमें देवताओंके हृदयोंमें स्वयं उद्भूत हुए थे। वह मन्त्रयोग हजारों गत-कल्पोंमें सिद्धों तथा अन्यान्य लोगोंके लिये भी प्रमाणरूपमें प्रयुक्त होता था। वे मन्त्र पुनः उन देवताओंकी प्रतिमाओंमें भी उपस्थित हुए। इस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-सम्बन्धी जो मन्त्र हैं, वे सप्तर्षियोंद्वारा कहे गये हैं। स्मार्तधर्मका वर्णन तो मनुने किया है। त्रेतायुगके आदिमें ये सभी वेद धर्मके सेतु-स्वरूप थे, किंतु द्वापरयुगमें आयुके न्यून हो जानेके कारण उनका विभाग कर दिया गया है। ऋषि अपने धर्मसे परिपूर्ण हैं। वे तपमें निरत हो रात-दिन वेदाध्ययन करते थे। ब्रह्माने सर्वप्रथम प्रत्येक युगमें युगधर्मानुसार इनका साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया है। वे योगानुकूल वेदवादसे स्खलित होकर अपने धर्मसे विकृत हो जाते हैं। त्रेतायुगमें ब्राह्मणोंका धर्म जपयज्ञ, क्षत्रियोंका यज्ञारम्भ, वैश्योंका हविर्यज्ञ और शूद्रोंका सेवायज्ञ कहा जाता था। उस समय सभी वर्णके लोग उन्नत, धर्मात्मा, क्रियानिष्ठ, संतानयुक्त, समृद्ध और सुखी थे। परस्पर प्रेमपूर्वक ब्राह्मण क्षत्रियोंके लिये और क्षत्रिय वैश्योंके लिये सब प्रकारका विधान करते थे तथा शूद्र वैश्योंका अनुवर्तन करते थे। उनके स्वभाव सुन्दर थे तथा उनके धर्म वर्ण एवं आश्रमके अनुकूल होते थे॥४०-५२१/२॥ |
| संकल्पितेन मनसा वाचा वा हस्तकर्मणा।<br>त्रेतायुगे ह्यविकले कर्मारम्भः प्रसिद्ध्यति ॥ ५३<br>आयु रूपं बलं मेधा आरोग्यं धर्मशीलता।<br>सर्वसाधारणं ह्येतदासीत् त्रेतायुगे तु वै ॥ ५४ | समूचे त्रेतायुगके कार्यकालमें मानसिक संकल्प, वचन और हाथसे प्रारम्भ किये गये कर्म सिद्ध होते थे। त्रेतायुगमें आयु, रूप, बल, बुद्धि, नीरोगता और धर्मपरायणता—ये सभी गुण सर्वसाधारण लोगोंमें भी विद्यमान थे। |
* अध्याय १४२ * । ५९९
| वर्णाश्रमव्यवस्थानामेषां ब्रह्मा तथाकरोत्।<br>संहिताश्च तथा मन्त्रा आरोग्यं धर्मशीलता॥ ५५<br><br>संहिताश्च तथा मन्त्रा ऋषिभिर्ब्रह्मणः सुतैः।<br>यज्ञः प्रवर्तितश्चैव तदा ह्येव तु दैवतैः॥ ५६<br><br>यामैः शुक्लैर्जयैश्चैव सर्वसाधनसम्भृतैः।<br>विश्वसृग्भिस्तथा सार्धं देवेन्द्रेण महौजसा।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे देवैस्ते यज्ञाः प्राक् प्रवर्तिताः॥ ५७<br><br>सत्यं जपस्तपो दानं पूर्वधर्मो य उच्यते।<br>यदा धर्मस्य ह्रसते शाखाधर्मस्य वर्धते॥ ५८<br><br>जायन्ते च तदा शूरा आयुष्मन्तो महाबलाः।<br>न्यस्तदण्डा महायोगा यज्वानो ब्रह्मवादिनः॥ ५९<br><br>पद्मपत्रायताक्षाश्च पृथुवक्त्राः सुसंहताः।<br>सिंहोरस्का महासत्त्वा मत्तमातङ्गगामिनः॥ ६०<br><br>महाधनुर्धराश्चैव त्रेतायां चक्रवर्तिनः।<br>सर्वलक्षणपूर्णास्ते न्यग्रोधपरिमण्डलाः॥ ६१<br><br>न्यग्रोधौ तु स्मृतौ बाहू व्यामो न्यग्रोध उच्यते।<br>व्यामेनैवोच्छ्रयो यस्य सम ऊर्ध्वं तु देहिनः।<br>समुच्छ्रयपरिणाहो न्यग्रोधपरिमण्डलः॥ ६२<br><br>चक्रं रथो मणिर्भार्या निधिरश्वो गजस्तथा।<br>प्रोक्तानि सप्त रत्नानि सर्वेषां चक्रवर्तिनाम्॥ ६३<br><br>चक्रं रथो मणिः खड्गं धनू रत्नं च पञ्चमम्।<br>केतुर्निधिश्च पञ्चैते प्राणहीनाः प्रकीर्तिताः॥ ६४<br><br>विष्णोरंशेन जायन्ते पृथिव्यां चक्रवर्तिनः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ह्यतीतानागतेषु वै॥ ६५<br><br>भूतभव्यानि यानीह वर्तमानानि यानि च।<br>त्रेतायुगानि तेष्वत्र जायन्ते चक्रवर्तिनः॥ ६६<br><br>भद्राणीमानि तेषां च विभाव्यन्ते महीक्षिताम्।<br>अत्यद्भुतानि चत्वारि बलं धर्मं सुखं धनम्॥ ६७<br><br>अन्योन्यस्याविरोधेन प्राप्यन्ते नृपतेः समम्।<br>अर्थो धर्मश्च कामश्च यशो विजय एव च॥ ६८ | ब्रह्माने स्वयं इनके लिये वर्णाश्रमकी व्यवस्था की थी तथा ब्रह्माके मानसिक पुत्र ऋषियोंद्वारा संहिताओं, मन्त्रों, नीरोगता और धर्मपरायणताका विधान किया गया था। उसी समय देवताओंने यज्ञकी भी प्रथा प्रचलित की थी। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सम्पूर्ण यज्ञिय साधनोंसहित याम, शुक्ल, जय, विश्वसृज् तथा महान् तेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ देवताओंने सर्वप्रथम इन यज्ञोंका प्रचार किया था। उस समय सत्य, जप, तप और दान—ये ही प्रारम्भिक धर्म कहलाते थे। जब इन धर्मोंका ह्रास प्रारम्भ होता था और अधर्मकी शाखाएँ बढ़ने लगती थीं, तब त्रेतायुगमें ऐसे शूरवीर चक्रवर्ती सम्राट् उत्पन्न होते थे, जो दीर्घायुसम्पन्न, महाबली, दण्ड देनेवाले, महान् योगी, यज्ञपरायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, जिनके नेत्र कमलदलके समान विशाल और सुन्दर, मुख भरे-पूरे और शरीर सुसंगठित थे, जिनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी, जो महान् पराक्रमी और मतवाले गजराजकी भाँति चलनेवाले और महान् धनुर्धर थे, वे सभी राजलक्षणोंसे परिपूर्ण तथा न्यग्रोध (बरगद-) सदृश मण्डलवाले थे। यहाँ दोनों बाहुओंको ही न्यग्रोध कहा जाता है तथा व्योममें फैलायी हुई बाहुओंका मध्यभाग भी न्यग्रोध कहलाता है। उस व्योमकी ऊँचाई और विस्तारवाला 'न्यग्रोधपरिमण्डल' कहलाता है, अतः जिस प्राणीका शरीर व्योमके बराबर ऊँचा और विस्तृत हो, उसे न्यग्रोधपरिमण्डल* कहा जाता है। पूर्वकालके स्वायम्भुव मन्वन्तरमें चक्र (शासन, आज्ञाद भी), रथ, मणि, भार्या, निधि, अश्व और गज—ये सातों (चल-) रत्न कहे गये हैं। दूसरा चक्र (अचल) रथ, मणि, खड्ग, धनुष, रत्न, झंडा और खजाना—ये स्थिर (अचल) सप्तरत्न हैं। (सब मिलकर ये ही राजाओंके चौदह रत्न हैं।) बीते हुए एवं आनेवाले सभी मन्वन्तरोंमें भूतलपर चक्रवर्ती सम्राट् विष्णुके अंशसे उत्पन्न होते हैं॥ ५३—६५॥<br><br>इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानमें जितने त्रेतायुग हुए होंगे और हैं, उन सभीमें चक्रवर्ती सम्राट् उत्पन्न होते हैं। उन भूपालोंके बल, धर्म, सुख और धन—ये चतुर्भद्र चारों अत्यन्त अद्भुत और माङ्गलिक होते हैं। उन राजाओंको अर्थ, धर्म, काम, यश और विजय—ये सभी समानरूपसे परस्पर अविरोध भावसे प्राप्त होते हैं। |
* वाल्मीकीय रामायण ३। ३५ तथा भट्टिकाव्य ५ में सीताजीको 'न्यग्रोधपरिमण्डला' कहा गया है।
५२० * मत्स्यपुराण *
| ऐश्वर्येणाणिमाद्येन प्रभुशक्तिबलान्विताः।<br>श्रुतेन तपसा चैव ऋषींस्तेऽभिभवन्ति हि॥ ६९<br>बलेनाभिभवन्त्येते देवदानवमानवान्।<br>लक्षणैश्चैव जायन्ते शरीरस्थैर्मानुषैः॥ ७०<br>केशाः स्थिता ललाटोर्णा जिह्वा चास्य प्रमार्जनी।<br>ताम्रप्रभाश्चतुर्दंष्ट्राः सुवंशाश्चोर्ध्वरेतसः॥ ७१<br>आजानुबाहवश्चैव जालहस्ता वृषाङ्किताः।<br>परिणाहप्रमाणाभ्यां सिंहस्कन्धाश्च मेधिनः॥ ७२<br>पादयोश्चक्रमत्स्यौ तु शङ्खपद्मे च हस्तयोः।<br>पञ्चाशीतिसहस्राणि जीवन्ति ह्यजरामयाः॥ ७३<br>असङ्गा गतयस्तेषां चतस्रश्चक्रवर्तिनाम्।<br>अन्तरिक्षे समुद्रेषु पाताले पर्वतेषु च॥ ७४<br>इज्या दानं तपः सत्यं त्रेताधर्मास्तु वै स्मृताः।<br>तदा प्रवर्तते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः।<br>मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्तते॥ ७५<br>हृष्टपुष्टा जनाः सर्वे अरोगाः पूर्णमानसाः।<br>एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायां तु विधिः स्मृतः।<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि जीवन्ते तत्र ताः प्रजाः॥ ७६<br>पुत्रपौत्रसमीकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण ताः।<br>एष त्रेतायुगे भावस्त्रेतासंध्यां निबोधत॥ ७७<br>त्रेतायुगस्वभावेन संध्यापादेन वर्तते।<br>संध्यापादः स्वभावाच्च योंऽशः पादेन तिष्ठति॥ ७८। | प्रभुशक्ति और बलसे सम्पन्न वे नृपतिगण ऐश्वर्य, अणिमा आदि सिद्धि, शास्त्रज्ञान और तपस्यामें ऋषियोंसे भी बढ़-चढ़कर होते हैं। इसलिये वे सम्पूर्ण देव-दानवों और मानवोंको बलपूर्वक पराजित कर देते हैं। उनके शरीरमें स्थित सभी लक्षण दिये होते हैं। उनके सिरके बाल ललाटतक फैले रहते हैं। उनकी जीभ बड़ी स्वच्छ और स्निग्ध होती है। उनकी अङ्गकान्ति लाल होती है। उनके चार दाढ़ें होते हैं। वे उत्तम वंशमें उत्पन्न, ऊर्ध्वरेता, आजानुबाहु, जालहस्त हाथोंमें जालचिह्न तथा बैल आदि श्रेष्ठ चिह्नयुक्त परिणाहमात्र लम्बे होते हैं। उनके कंधे सिंहके समान मांसल और वे यज्ञपरायण होते हैं। उनके पैरोंमें चक्र और मत्स्यके तथा हाथोंमें शङ्ख और पद्मके चिह्न होते हैं। वे बुढ़ापा और व्याधिसे रहित होकर पचासी हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। वे चक्रवर्ती सम्राट् अन्तरिक्ष, समुद्र, पाताल और पर्वत—इन चारों स्थानोंमें एकाकी एवं स्वच्छन्दरूपसे विचरण करते हैं। यज्ञ, दान, तप और सत्यभाषण—ये त्रेतायुगके प्रधान धर्म कहे गये हैं। ये धर्म वर्ण एवं आश्रमके विभागपूर्वक प्रवृत्त होते हैं। इनमें मर्यादाकी स्थापनाके निमित्त दण्डनीतिका प्रयोग किया जाता है। त्रेतायुगमें एक वेद चार भागोंमें विभक्त होकर विधान करता है। उस समय सभी लोग हृष्ट-पुष्ट, नीरोग और सफल-मनोरथ होते हैं। वे प्रजाएँ तीन हजार वर्षोंतक जीवित रहती हैं और पुत्र-पौत्रसे युक्त होकर क्रमशः मृत्युको प्राप्त होती हैं। यही त्रेतायुगका स्वभाव है। अब उसकी संध्याके विषयमें सुनिये। इसकी संध्यामें युग-स्वभावका एक चरण रह जाता है। उसी प्रकार संध्यांशमें संध्याका चतुर्थांश शेष रहता है अर्थात् उत्तरोत्तर परिवर्तन होता जाता है॥ ६६-७८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकल्पो नाम द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकल्प नामक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४२ ॥
एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय
यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिक वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं त्रेतायुगमुखे यज्ञस्यासीत् प्रवर्तनम्।<br>पूर्वे स्वायम्भुवे सर्गे यथावत् प्रब्रवीहि नः॥ १॥ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें स्वायम्भुवमनुके कार्य-<br><br>कालमें त्रेतायुगके प्रारम्भमें किस प्रकार यज्ञकी प्रवृत्ति |
| * अध्याय १४३ * | ५२१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्तर्हितायां संध्यायां सार्धं कृतयुगेन हि।<br>कालाख्यायां प्रवृत्तायां प्राप्ते त्रेतायुगे तदा॥ २<br><br>ओषधीषु च जातासु प्रवृत्ते वृष्टिसर्जने।<br>प्रतिष्ठितायां वार्तायां ग्रामेषु च पुरेषु च॥ ३<br><br>वर्णाश्रमप्रतिष्ठानं कृत्वन्तश्च वैः पुनः।<br>संहितास्तु सुसंहत्य कथं यज्ञः प्रवर्तितः।<br>एतच्छ्रुत्वाब्रवीत् सूतः श्रूयतां तत्प्रचोदितम्॥ ४<br><br>सूत उवाच<br><br>मन्त्रान् वै योजयित्वा तु इहामुत्र च कर्मसु।<br>तथा विश्वभुगिन्द्रस्तु यज्ञं प्रावर्तयत् प्रभुः॥ ५<br><br>दैवतैः सह संहृत्य सर्वसाधनसंवृतः।<br>तस्याश्वमेधे वितते समाजग्मुर्महर्षयः॥ ६<br><br>यज्ञकर्मण्यवर्तन्त कर्मण्यग्रे तथर्त्विजः।<br>हूयमाने देवहोत्रे अग्नौ बहुविधं हविः॥ ७<br><br>सम्प्रीतितेषु देवेषु सामगेषु च सुस्वरम्।<br>परिक्रान्तेषु लघुषु अध्वर्युपुरुषेषु च॥ ८<br><br>आलब्धेषु च मध्ये तु तथा पशुगणेषु वै।<br>आहूतेषु च देवेषु यज्ञभुक्षु ततस्तदा॥ ९<br><br>य इन्द्रियात्मका देवा यज्ञभागभुजस्तु ते।<br>तान् यजन्ति तदा देवाः कल्पादिषु भवन्ति ये॥ १०<br><br>अध्वर्यवः प्रैषकाले व्युत्थिता ऋषयस्तथा।<br>महर्षयश्च तान् दृष्ट्वा दीनान् पशुगणांस्तदा।<br>विश्वभुजं ते त्वपृच्छन् कथं यज्ञविधिस्तव॥ ११<br><br>अधर्मो बलवानेष हिंसा धर्मेप्सया तव।<br>नव पशुविधिस्त्विष्टस्तव यज्ञे सुरोत्तम॥ १२<br><br>अधर्मो धर्मघाताय प्रारब्धः पशुभिस्त्वया।<br>नायं धर्मो ह्यधर्मोऽयं न हिंसा धर्म उच्यते।<br>आगमेन भवान् धर्मं प्रकरोतु यदीच्छति॥ १३<br><br>विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मेणाव्यसनेन तु।<br>यज्ञबीजैः सुरश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिमोषितैः॥ १४ | हुई थी? जब कृतयुगके साथ उसकी संध्या (तथा संध्यांश) दोनों अन्तर्हित हो गये, तब कालक्रमानुसार त्रेतायुगकी संधि प्राप्त हुई। उस समय वृष्टि होनेपर ओषधियाँ उत्पन्न हुईं तथा ग्रामों एवं नगरोंमें वार्ता-वृत्तिकी स्थापना हो गयी। उसके बाद वर्णाश्रमकी स्थापना करके परम्परागत आये हुए मन्त्रोंद्वारा पुनः संहिताओंको एकत्रकर यज्ञकी प्रथा किस प्रकार प्रचलित हुई? हमलोगोंके प्रति इसका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये। यह सुनकर सूतजीने कहा—'आपलोगोंके प्रश्नानुसार कह रहा हूँ, सुनिये'॥ १-४॥<br><br>सूतजी कहते हैं— ऋषियो! विश्वभोक्ता सामर्थ्यशाली इन्द्रने ऐहलौकिक तथा पारलौकिक कर्मोंमें मन्त्रोंको प्रयुक्तकर देवताओंके साथ सम्पूर्ण साधनोंसे सम्पन्न हो यज्ञ प्रारम्भ किया। उनके उस अश्वमेध-यज्ञके आरम्भ होनेपर उसमें महर्षिगण उपस्थित हुए। उस यज्ञकर्ममें ऋत्विग्वगण यज्ञक्रियाको आगे बढ़ा रहे थे। उस समय सर्वप्रथम अग्निमें अनेकों प्रकारके हवनीय पदार्थ डाले जा रहे थे, सामगान करनेवाले देवगण विश्वासपूर्वक ऊँचे स्वरसे सामगान कर रहे थे, अध्वर्युगण धीमे स्वरसे मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे। पशुओंका समूह मण्डपके मध्यभागमें लाया जा रहा था, यज्ञभोक्ता देवोंका आवाहन हो चुका था। जो इन्द्रियात्मक देवता तथा जो यज्ञभागके भोक्ता थे और जो प्रत्येक कल्पके आदिमें उत्पन्न होनेवाले आजानदेव थे, देवगण उनका यजन कर रहे थे। इसी बीच जब यजुर्वेदके अध्येता एवं हवनकर्ता ऋषिगण पशु-बलिका उपक्रम करने लगे, तब यूथ-के-यूथ ऋषि तथा महर्षि उन दीन पशुओंको देखकर उठ खड़े हुए और वे विश्वभुग् नामके विश्वभोक्ता इन्द्रसे पूछने लगे—'देवराज! आपके यज्ञकी यह कैसी विधि है? आप धर्म-प्राप्तिकी अभिलाषासे जो जीव-हिंसा करनेके लिये उद्यत हैं, यह महान् अधर्म है। सुरश्रेष्ठ! आपके यज्ञमें पशु-हिंसाकी यह नवीन विधि दीख रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप पशु-हिंसाके व्याजसे धर्मका विनाश करनेके लिये अधर्म करनेपर तुले हुए हैं। यह धर्म नहीं है। यह सरासर अधर्म है। जीव-हिंसा धर्म नहीं कही जाती। इसलिये यदि आप धर्म करना चाहते हैं तो वेदविहित धर्मका अनुष्ठान कीजिये। सुरश्रेष्ठ! वेदविहित विधिके अनुसार किये हुए यज्ञ और दुर्व्यसनरहित धर्मके पालनसे यज्ञके बीजभूत त्रिवर्ग (नित्य धर्म, अर्थ, काम)-की प्राप्ति होती है। |
५२२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष यज्ञो महानिन्द्र स्वयम्भुविहितः पुरा।<br>एवं विश्वभुगिन्द्रस्तु ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>उक्तो न प्रतिजग्राह मानमोहसमन्वितः॥ १५<br><br>तेषां विवादः सुमहान् जज्ञे इन्द्रमहर्षिणाम्।<br>जङ्गमौः स्थावरैः केन यष्टव्यमिति चोच्यते॥ १६<br><br>ते तु खिन्ना विवादेन शक्त्या युक्ता महर्षयः।<br>संधाय सममिन्द्रेण पप्रच्छुः खचरं वसुम्॥ १७ | इन्द्र! पूर्वकालमें ब्रह्माने इसीको महान् यज्ञ बतलाया है।' तत्त्वदर्शी ऋषियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भी विश्वभोक्ता इन्द्रने उनकी बातोंको अङ्गीकार नहीं किया; क्योंकि उस समय वे मान और मोहसे भरे हुए थे। फिर तो इन्द्र और उन महर्षियोंके बीच 'स्थावरों या जङ्गमोमेंसे किससे यज्ञानुष्ठान करना चाहिये'—इस बातको लेकर वह अत्यन्त महान् विवाद उठ खड़ा हुआ। यद्यपि वे महर्षि शक्तिसम्पन्न थे, तथापि उन्होंने उस विवादसे खिन्न होकर इन्द्रके साथ संधि करके (उसके निर्णयार्थ) उपरिचर (आकाशचारी राजर्षि) वसुसे प्रश्न किया॥ ५–१७॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>महाप्राज्ञ त्वया दृष्टः कथं यज्ञविधिर्नृप।<br>औत्तानपादे प्रब्रूहि संशयं छिन्धि नः प्रभो॥ १८ | **ऋषियोंने पूछा—**उत्तानपाद-नन्दन नरेश! आप तो सामर्थ्यशाली एवं महान् बुद्धिमान् हैं। आपने किस प्रकारकी यज्ञ-विधि देखी है, उसे बतलाइये और हम लोगोंका संशय दूर कीजिये॥ १८॥ |
| सूत उवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम्।<br>वेदशास्त्रमनुस्मृत्य यज्ञतत्त्वमुवाच ह॥ १९<br><br>यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति होवाच पार्थिवः।<br>यष्टव्यं पशुभिर्मेध्यैरथ मूलफलैरपि॥ २०<br><br>हिंसा स्वभावो यज्ञस्य इति मे दर्शनागमः।<br>तथैते भाविता मन्त्रा हिंसालिङ्गा महर्षिभिः॥ २१<br><br>दीर्घेण तपसा युक्तैस्तारकादिनिदर्शनैः।<br>तत्प्रमाणं मया चोक्तं तस्माच्छमितुमर्हथ॥ २२<br><br>यदि प्रमाणं स्तान्येव मन्त्रवाक्यानि वो द्विजाः।<br>तदा प्रवर्त्ततां यज्ञो ह्यन्यथा मानृतं वचः॥ २३<br><br>एवं कृतोत्तरास्ते तु युज्यात्मानं ततो धिया।<br>अवश्यम्भाविनं दृष्ट्वा तमधो ह्यशपंस्तदा॥ २४<br><br>इत्युक्तमात्रो नृपतिः प्रविवेश रसातलम्।<br>ऊर्ध्वचारी नृपो भूत्वा रसातलचरोऽभवत्॥ २५<br><br>वसुधातलचारी तु तेन वाक्येन सोऽभवत्।<br>धर्माणां संशयच्छेत्ता राजा वसुरधोगतः॥ २६ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उन ऋषियोंका प्रश्न सुनकर महाराज वसु उचित-अनुचितका कुछ भी विचार न कर वेद-शास्त्रोंका अनुसरण कर यज्ञतत्त्वका वर्णन करने लगे। उन्होंने कहा—'शक्ति एवं समयानुसार प्राप्त हुए पदार्थोंसे यज्ञ करना चाहिये। पवित्र पशुओं और मूल-फलोंसे भी यज्ञ किया जा सकता है। मेरे देखनेमें तो ऐसा लगता है कि हिंसा यज्ञका स्वभाव ही है। इसी प्रकार तारक आदि मन्त्रोंके ज्ञाता उग्रतपस्वी महर्षियोंने हिंसासूचक मन्त्रोंको उत्पन्न किया है। उसीको प्रमाण मानकर मैंने ऐसी बात कही है, अतः आपलोग मुझे क्षमा कीजियेगा। द्विजवरो! यदि आप लोगोंको वेदोंके मन्त्रवाक्य प्रमाणभूत प्रतीत होते हों तो यही कीजिये, अन्यथा यदि आप वेद-वचनको झूठा मानते हों तो मत कीजिये।' वसुद्वारा ऐसा उत्तर पाकर महर्षियोंने अपनी बुद्धिसे विचार किया और अवश्यम्भावी विषयको जानकर राजा वसुको विमानसे नीचे गिर जानेका तथा पातालमें प्रविष्ट होनेका शाप दे दिया। ऋषियोंके ऐसा कहते ही राजा वसु रसातलमें चले गये। इस प्रकार जो राजा वसु एक दिन आकाशचारी थे, वे रसातलगामी हो गये। ऋषियोंके शापसे उन्हें पातालचारी होना पड़ा। धर्मविषयक संशयोंका निवारण करनेवाले राजा वसु इस प्रकार अधोगतिको प्राप्त हुए॥ १९–२६॥ |
| तस्मान्न वाच्यो ह्येकेन बहुज्ञेनापि संशयः।<br>बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः॥ २७ | इसलिये बहुज्ञ (अत्यन्त विद्वान्) होते हुए भी अकेले किसी धार्मिक संशयका निर्णय नहीं करना चाहिये; क्योंकि अनेक द्वार (मार्ग-) वाले धर्मकी गति अत्यन्त सूक्ष्म |
* अध्याय १४३ * ५२३
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मान्न निश्चयाद्वक्तुं धर्मः शक्यो हि केनचित्।<br>देवानृषीनुपादाय स्वायम्भुवमृते मनुम्॥ २८<br>तस्मान्न हिंसा यज्ञे स्याद् यदुक्तमृषिभिः पुरा।<br>ऋषिकोटिसहस्राणि स्वैस्तपोभिर्दिवं गताः॥ २९<br>तस्मान्न हिंसायज्ञं च प्रशंसन्ति महर्षयः।<br>उञ्छो मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः॥ ३०<br>एतद् दत्त्वा विभवतः स्वर्गलोके प्रतिष्ठिताः।<br>अद्रोहश्चाप्यलोभश्च दमो भूतदया शमः॥ ३१<br>ब्रह्मचर्यं तपः शौचमनुक्रोशं क्षमा धृतिः।<br>सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतदुरासदम्॥ ३२<br>द्रव्यमन्त्रात्मको यज्ञस्तपश्च समतात्मकम्।<br>यज्ञैश्च देवानाप्नोति वैराजं तपसा पुनः॥ ३३<br>ब्रह्मणः कर्मसंन्यासाद्वैराग्यात् प्रकृतेर्लयम्।<br>ज्ञानात्प्राप्नोति कैवल्यं पञ्चैता गतयः स्मृताः॥ ३४ | और दुर्गम है। अतः देवताओं और ऋषियोंके साथ-साथ स्वायम्भुव मनुके अतिरिक्त अन्य कोई भी अकेला व्यक्ति धर्मके विषयमें निश्चयपूर्वक निर्णय नहीं दे सकता। इसलिये पूर्वकालमें जैसा ऋषियोंने कहा है, उसके अनुसार यज्ञमें जीव-हिंसा नहीं होनी चाहिये। हजारों करोड़ ऋषि अपने तपोबलसे स्वर्गलोकको गये हैं। इसी कारण महर्षिगण हिंसात्मक यज्ञकी प्रशंसा नहीं करते। वे तपस्वी अपनी सम्पत्तिके अनुसार उञ्छवृत्तिसे प्राप्त हुए अन्न, मूल, फल, शाक और कमण्डलु आदिका दान कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हुए हैं। ईर्ष्याहीनता, निर्लोभता, इन्द्रियनिग्रह, जीवोंपर दयाभाव, मानसिक स्थिरता, ब्रह्मचर्य, तप, पवित्रता, करुणा, क्षमा और धैर्य—ये सनातन धर्मके मूल ही हैं, जो बड़ी कठिनतासे प्राप्त किये जा सकते हैं। यज्ञ द्रव्य और मन्त्रद्वारा सम्पन्न किये जा सकते हैं और तपस्याकी सहायिका समता है। यज्ञोंसे देवताओंकी तथा तपस्यासे विराट् ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। कर्म (फल)-का त्याग कर देनेसे ब्रह्म-पदकी प्राप्ति होती है, वैराग्यसे प्रकृतिमें लय होता है और ज्ञानसे कैवल्य (मोक्ष) सुलभ हो जाता है। इस प्रकार ये पाँच गतियाँ बतलायी गयी हैं॥ २७-३४॥ |
| एवं विवादः सुमहान् यज्ञस्यासीत् प्रवर्त्तने।<br>ऋषीणां देवतानां च पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ३५<br>ततस्ते ऋषयो दृष्ट्वा हतं धर्मं बलेन तु।<br>वसोर्वाक्यमनादृत्य जग्मुस्ते वै यथागतम्॥ ३६<br>गतेषु ऋषिषङ्घेषु देवा यज्ञमवाप्नुयुः।<br>श्रूयन्ते हि तपःसिद्धा ब्रह्मक्षत्रादयो नृपाः॥ ३७<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ ध्रुवो मेधातिथिर्वसुः।<br>सुधामा विरजाश्चैव शंखपाद्राजसस्तथा॥ ३८<br>प्राचीनबर्हिः पर्जन्यो हविर्धानादयो नृपाः।<br>एते चान्ये च बहवस्ते तपोभिर्दिवं गताः॥ ३९<br>राजर्षयो महात्मानो येषां कीर्तिः प्रतिष्ठिता।<br>तस्माद्विशिष्यते यज्ञात्तपः सर्वैस्तु कारणैः॥ ४०<br>ब्रह्मणा तपसा सृष्टं जगद्विश्वमिदं पुरा।<br>तस्मान्नाप्नोति तद् यज्ञात्तपोमूलमिदं स्मृतम्॥ ४१ | पूर्वकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें यज्ञकी प्रथा प्रचलित होनेके अवसरपर देवताओं और ऋषियोंके बीच इस प्रकारका महान् विवाद हुआ था। तदनन्तर जब ऋषियोंने यह देखा कि यहाँ तो बलपूर्वक धर्मका विनाश किया जा रहा है, तब वसुके कथनकी उपेक्षा कर वे जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उन ऋषियोंके चले जानेपर देवताओंने यज्ञकी सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं। इसके अतिरिक्त इस विषयमें ऐसा भी सुना जाता है कि बहुतेरे ब्राह्मण तथा क्षत्रियनरेश तपस्याके प्रभावसे ही सिद्धि प्राप्त की थी। प्रियव्रत, उत्तानपाद, ध्रुव, मेधातिथि, वसु, सुधामा, विरजा, शङ्खपाद्, राजस, प्राचीनबर्हि, पर्जन्य और हविर्धान आदि नृपतिगण तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से नरेश तपोबलसे स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं, जिन महात्मा राजर्षियोंकी कीर्ति अबतक विद्यमान है। अतः तपस्या सभी कारणोंसे सभी प्रकार यज्ञसे बढ़कर है। पूर्वकालमें ब्रह्माने तपस्याके प्रभावसे ही इस सारे जगत्की सृष्टि की थी, अतः यज्ञद्वारा वह बल नहीं प्राप्त हो सकता। उसकी प्राप्तिका मूल कारण तप |