मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९४० * मत्स्यपुराण *
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्मा बोले— |
|---|---|
| जयाद्येश जयाजेय जय सर्वात्मकात्मक।<br>जय जन्मजरापेत जयानन्त जयाच्युत॥ ६७<br><br>जयाजित जयामेय जयाव्यक्तस्थिते जय।<br>परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयात्मनिःसृत॥ ६८<br><br>जयाशेषजगत्साक्षिञ्जगत्कर्तर्जगद्गुरो ।<br>जगतोऽप्यन्तकृद् देव स्थिति पालयितुं जय॥ ६९<br><br>जय शेष जयाशेष जयाखिलहृदिस्थित।<br>जयादिमध्यान्त जय सर्वज्ञाननिधे जय॥ ७०<br><br>मुमुक्षुभिरनिर्देश्य स्वयंदृष्ट जयेश्वर।<br>योगिनां मुक्तिफलद दमादिगुणभूषण॥ ७१<br><br>जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय।<br>जय स्थूलातिसूक्ष्म त्वं जयातीन्द्रिय सेन्द्रिय॥ ७२<br><br>जय स्वमायायोगस्थ शेषभोगशयाक्षर।<br>जयैकदंष्ट्राप्रान्ताग्रसमुद्धृतवसुंधर ॥ ७३ | आदि परमेश्वर! आपकी जय हो। अजेय! आपकी जय हो। सर्वात्मस्वरूप! आपकी जय हो। आप जन्म एवं वृद्धतासे विमुक्त, अन्तरहित तथा कभी च्युत होनेवाले नहीं हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप अजित, अमेय और अव्यक्त स्थितिवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप परमार्थके प्रयोजनस्वरूप, सर्वज्ञ, ज्ञानद्वारा जानने योग्य और अपनी महिमासे प्रकट होनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, जगत्के कर्ता और जगत्के गुरु हैं, आपकी जय हो। देव! आप जगत्की स्थिति, पालन और अन्त करनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप शेषरूप, अशेषरूप तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप जगत्के आदि, मध्य और अन्त हैं, आपकी जय हो। सर्वज्ञाननिधे! आपकी जय हो। आप मोक्षार्थीजनद्वारा अज्ञात, स्वयंदृष्ट, ईश्वर, योगियोंको मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले और दम आदि गुणोंसे विभूषित हैं, आपकी जय हो। आप अत्यन्त सूक्ष्म, दुर्ज्ञेय, स्थूल, जगन्मय, इन्द्रियवान् और अतीन्द्रिय हैं, आपकी बारंबार जय हो। आप अपनी योगमायामें स्थित रहनेवाले, शेषनागके फणपर शयन करनेवाले और अव्यय हैं, आपकी जय हो। आप एक दाँतके अग्रभागपर वसुंधराको उठाकर रख लेनेवाले (आदिवराह) हैं, आपकी जय हो॥ ६७—७३ ॥ |
| नृकेसरिन् जयारातिवक्षःस्थलविदारण।<br>साम्प्रतं जय विश्वात्मन् जय वामन केशव॥ ७४<br><br>निजमायापटच्छन्न जगन्मूर्ते जनार्दन।<br>जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो॥ ७५<br><br>वर्धस्व वर्धिताशेषविकारप्रकृते हरे।<br>त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः॥ ७६<br><br>न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे।<br>न ज्ञातुमीशा मुनयः सनकाद्या न योगिनः॥ ७७<br><br>त्वन्मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते।<br>कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः॥ ७८<br><br>त्वमेवाराधितो येन प्रसादसुमुख प्रभो।<br>स एव केवलो देव वेत्ति त्वां नेतरे जनाः॥ ७९<br><br>नन्दीश्वरेश्वरेशान प्रभो वर्धस्व वामन।<br>प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन॥ ८० | शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंह! आपकी जय हो। विश्वात्मन्! इस समय आप वामनरूपमें प्रकट हैं, आपकी जय हो। केशव! आपकी जय हो। जगन्मूर्ति जनार्दन! आप अपनी मायाके आवरणसे छिपे रहते हैं, आपकी जय हो। प्रभो! आप अचिन्त्य, अनेक स्वरूप धारण करनेवाले और एकरूप हैं, आपकी जय हो। हरे! आप सम्पूर्ण प्रकृतिके विकारोंसे युक्त हैं, आपकी वृद्धि हो। आप परमेश्वरमें जगत्की यह धर्ममर्यादा स्थित है। हरे! न मैं, न शंकर, न इन्द्रादि देवगण, न सनकादि मुनिगण और न योगीजन ही आपको जाननेमें समर्थ हैं। जगदीश्वर सर्वेश! इस जगत्में आपकी मायारूपी वस्त्रसे लिपटा हुआ कौन मनुष्य आपकी कृपाके बिना आपको जान सकता है। प्रसन्नतासे सुन्दर मुखवाले देव! जिसने आपकी आराधना की है, केवल वही आपको जानता है, अन्य लोग नहीं। विश्वात्मन्! आप बड़े-बड़े नेत्रोंसे सुशोभित एवं नन्दीश्वरके स्वामी शंकररूप हैं। सामर्थ्यशाली वामन! आप इस विश्वकी उन्नतिके लिये वृद्धिको प्राप्त हों॥ ७४—८०॥ |
* अध्याय २४५ * ९४१
| शौनक उवाच | शौनकजी बोले— |
|---|---|
| एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः।<br>प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचाब्जसमुद्भवम् ॥ ८१<br>स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च।<br>मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ८२<br>भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि प्रतिश्रुतम्।<br>यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ८३<br>सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः।<br>भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः॥ ८४<br>ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्।<br>यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्मै बृहस्पतिः॥ ८५<br>आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं वेदमथाङ्गिराः ॥ ८६<br>अक्षसूत्रं च पुलहः पुलस्त्यः सितवाससी।<br>उपत्तस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः ॥ ८७<br>शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः।<br>स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः ॥ ८८<br>सर्वदेवमयो भूप बलेरध्वरमभ्यगात्।<br>यत्र यत्र पदं भूयो भूभागे वामनो ददौ ॥ ८९<br>ददाति भूमिविवरं तत्र तत्रातिपीडिता।<br>स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्।<br>साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम् ॥ ९० | राजन्! ब्रह्माद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वामनस्वरूपधारी भगवान् हृषीकेशने उस समय हँसकर कमलजन्मा ब्रह्मासे भावोंसे युक्त गम्भीर वाणीमें कहा—'ब्रह्मन्! प्राचीनकालमें इन्द्रादि देवताओंके साथ कश्यपने तथा आपने मेरी स्तुति की थी, उस समय मैंने आपलोगोंसे इन्द्रको त्रिभुवन दिलानेकी प्रतिज्ञा की थी। पुनः अदितिने भी मेरी स्तुति की थी और मैंने उससे भी प्रतिज्ञा की थी कि इन्द्रको कण्टकरहित त्रिलोकीका राज्य समर्पित करूँगा। वही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सहस्राक्ष इन्द्र पुनः जगत्के अधिपति होंगे, यह मैं आपलोगोंसे सत्य कह रहा हूँ।' तदनन्तर ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्णमृगका चर्म दिया। भगवान् बृहस्पतिने उन्हें यज्ञोपवीत प्रदान किया। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने उन्हें पलाश-दण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु, अङ्गिराने कुशासन और वेद, पुलहने अक्षसूत्र तथा पुलस्त्यने दो श्वेत वस्त्र समर्पित किये। फिर प्रणवके स्वरोंसे विभूषित वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सांख्ययोगकी उक्तियाँ उनके निकट उपस्थित हुईं। राजन्! तत्पश्चात् सर्वदेवमय भगवान् वामन जटा, दण्ड, छत्र और कमण्डलु धारण करके बलिके यज्ञकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय भगवान् वामन पृथ्वीतलपर जहाँ-जहाँ अपने चरणोंको रखते थे वहाँ-वहाँ अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण पृथ्वीमें दरारें पड़ जाती थीं। इस प्रकार धीरे-धीरे मंद गतिसे चलते हुए भगवान् वामनने पर्वतों, समुद्रों और द्वीपोंसहित समूची पृथ्वीको चलायमान कर दिया ॥ ८१—९० ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावे वामनोत्पत्तिर्नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामन-प्रादुर्भाव-प्रसंगमें वामन-जन्म नामक दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४५ ॥
९४२ | मत्स्यपुराण
दो सौ छियालीसवाँ अध्याय
बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्वारा उन्हें तीन डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान
| शौनक उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वीं दृष्ट्वा संक्षोभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुद्धं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br>आचार्य क्षोभमायाता साब्धिभूमूर्द्धना मही।<br>कस्माच्चनासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३<br>अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः।<br>वामनेनेह रूपेण जगदात्मा सनातनः॥ ४<br>स एष यज्ञमायाति तव दानवपुङ्गव।<br>तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही।<br>कम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः॥ ५<br>नैनं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम्।<br>सदेवासुरगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनराः ॥ ६<br>अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः।<br>धारयत्यखिलान् देवो मन्वादींश्च महासुर॥ ७<br>इयमेव जगद्धेतोर्माया कृष्णस्य गह्बरी।<br>धार्यधारकभावेन यया सम्पीड़ितं जगत्॥ ८<br>तत्संनिधानादसुरा भागार्हा नासुरोत्तम।<br>भुञ्जते नासुरान् भागानमी तेनैव चाग्नयः॥ ९ | शौनकजीने कहा— पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वीको क्षुब्ध हुई देख बलिने शुद्धाचारी शुक्राचार्यको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे पूछा—‘आचार्य! किस कारण समुद्र, पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी संक्षुब्ध हो उठी है और यज्ञोंमें अग्नियाँ आसुरी भागोंको नहीं ग्रहण कर रही हैं?’ बलिद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् शुक्राचार्य कुछ देरतक ध्यान करके दैत्यराज बलिसे बोले—‘दानवश्रेष्ठ! जगत्के उत्पत्तिस्थान विश्वात्मा अविनाशी श्रीहरि वामनरूपसे कश्यपके गृहमें अवतीर्ण हुए हैं। वही इस समय तुम्हारे यज्ञमें पधार रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे संक्षुब्ध होकर यह पृथ्वी डगमगा रही है, ये पर्वत काँप रहे हैं और समुद्र क्षुब्ध हो उठा है। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरोंसे भरी हुई पृथ्वी समस्त जीवोंके स्वामी इन ईश्वरको वहन करनेमें समर्थ नहीं है। महासुर! इन्हीं परमात्माने पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशको धारण कर रखा है तथा ये ही देवेश्वर सम्पूर्ण मनु आदिको धारण करते हैं। जगत्के लिये भगवान् विष्णुकी यही दुर्गम माया है, जिसके द्वारा धार्य-धारकभावसे सारा जगत् पीड़ित हो रहा है। असुरोत्तम! उन्हीं भगवान्के समीपस्थ होनेसे असुरगण यज्ञमें अपने भागोंके अधिकारी नहीं रह गये। यही कारण है कि ये अग्नियाँ असुरोंके भागोंको ग्रहण नहीं कर रही हैं’॥ १–९॥ | | बलिरुवाच<br>धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्।<br>यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान्॥ १०<br>यं योगिनः सदा युक्ताः परमात्मानमव्ययम्।<br>द्रष्टुमिच्छन्ति देवेशं स मेऽध्वरमुपैष्यति॥ ११<br>होता भागप्रदोऽयं च यमुद्गाता च गायति।<br>तमध्वरेश्वरं विष्णुं मत्तः कोऽन्य उपैष्यति॥ १२<br>सर्वेश्वरेश्वरे कृष्णे मदध्वरमुपागते।<br>यन्मया काव्य कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि॥ १३ | बलिने कहा— ब्रह्मन्! मैं धन्य और पुण्यात्मा हूँ जो मेरे यज्ञमें साक्षात् भगवान् यज्ञपति उपस्थित हो रहे हैं। अब मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष है? योगाभ्यासमें लगे हुए योगी जिन अविनाशी देवाधिदेव परमात्माको देखनेकी लालसा करते हैं, वे ही भगवान् मेरे यज्ञमें आ रहे हैं। होता जिन्हें यज्ञभाग प्रदान करते हैं और उद्गाता जिनका गान करते हैं, उन यज्ञपति विष्णुके निकट मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन जा सकता है। शुक्राचार्यजी! सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुके मेरे यज्ञमें पधारनेपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसका मुझे आदेश दीजिये॥ १०–१३॥ |
| * अध्याय २४६ * | ९४३ |
|---|---|
| शुक्र उवाच<br>यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर ।<br>त्वया तु दानवा दैत्या मखभागभुजः कृताः ॥ १४<br>अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् ।<br>विसृष्टेरनु चान्नेन स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १५<br>त्वत्कृते भविता नूनं देवो विष्णुः स्थितौ स्थितः ।<br>विद्वित्वैतन्महाभाग कुरु यत्नमनागतम् ॥ १६<br>त्वया हि दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि ।<br>प्रतिज्ञा न हि वोढव्या वाच्यं साम वृथाफलम् ॥ १७<br>नालं दातुमहं देव दैत्य वाच्यं त्वया वचः ।<br>कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १८<br><br>बलिरुवाच<br>ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः ।<br>नास्तीति किमु देवेन संसाराघौघहारिणा ॥ १९<br>व्रतोपवासैर्विविधैः प्रतिसंग्राह्यते हरिः ।<br>स चेद् वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ २०<br>यदर्थमुपहाराढ्यास्तपःशौचगुणान्वितैः ।<br>यज्ञाः क्रियन्ते देवेशः स मां देहीति वक्ष्यति ॥ २१<br>तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं मम ।<br>यन्मया दत्तमिशेशः स्वयमादास्यते हरिः ॥ २२<br>नास्ति नास्तीत्यहं वक्ष्ये तमप्यागतमीश्वरम् ।<br>यदा वञ्चामि तं प्राप्तं वृथा तज्जन्मनः फलम् ॥ २३<br>यज्ञेऽस्मिन् यदि यज्ञेशो याचते मां जनार्दनः ।<br>निजमूर्द्धानमप्यत्र तद् दास्याम्यविचारितम् ॥ २४<br>नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् ।<br>वक्ष्यामि कथमायाते तदनभ्यस्तमच्युते ॥ २५<br>श्लाघ्य एव हि वीराणां दानादापत्समागमः ।<br>नाबाधकारि यद् दानं तदमङ्गलवत् स्मृतम् ॥ २६<br>मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः ।<br>नाभूषितो न चोद्विग्नो न स्त्रगादिविवर्जितः ॥ २७<br>हृष्टस्तुष्टः सुगन्धिश्च तृप्तः सर्वसुखान्वितः ।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २८ | शुक्रने कहा— असुर! वेदोंके प्रमाणानुसार देवगण ही यज्ञभागके अधिकारी हैं, किंतु तुमने तो दैत्यों और दानवोंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया है। ये सामर्थ्यशाली भगवान् सत्त्वगुणमें स्थित होकर सृष्टिकी उत्पत्ति और पालन करते हैं तथा प्रलयकालमें प्रजाओंको अपना ग्रास बना लेते हैं। महाभाग! वे भगवान् विष्णु तुम्हारे लिये ही भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं, अतः इसे जानकर भविष्यके लिये उपाय करो। दैत्याधिपते! तुम उन्हें थोड़ी-सी भी वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा न करना, झूठ-मूठ ही नम्रतापूर्वक कुछ वचन कहना। महासुर! देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रवृत्त हुए श्रीविष्णुसे तुम्हें ऐसा वचन कहना चाहिये कि 'देव! मैं आपको कुछ भी देनेमें समर्थ नहीं हूँ'॥ १४—१८॥<br><br>बलिने कहा— ब्रह्मन्! साधारण याचकोंके याचना करनेपर मैंने उन्हें कभी नकारात्मक उत्तर नहीं दिया, फिर संसारके पापसमूहोंको दूर करनेवाले परमात्माद्वारा याचना किये जानेपर मैं कैसे कहूँगा कि मेरे पास नहीं है। भला, जो श्रीहरि विविध व्रतों और उपवासोंद्वारा प्राप्त किये जाते हैं, वे गोविन्द यदि ऐसा कहेंगे कि 'दो' तो इससे बढ़कर और क्या बात होगी? जिनकी प्राप्तिके लिये तप और शौच आदि गुणोंसे युक्त याज्ञिक लोग उपहार-सामग्रियोंसे परिपूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे ही देवेश मुझसे 'दो' ऐसी याचना करेंगे। यदि देवाधिदेव श्रीहरि मेरे द्वारा दिये गये दानको स्वयं ग्रहण करेंगे, तब तो मेरे कर्म पुण्यमय हो गये और मेरी तपस्या सफल हो गयी। यदि मैं उन परमेश्वरके आनेपर भी 'नहीं है, नहीं है' ऐसा कहूँ और उन्हें ठगूँ, तब तो मेरे जन्म लेनेका फल ही व्यर्थ है। इसलिये इस यज्ञमें यदि यज्ञेश्वर जनार्दन मुझसे मेरा मस्तक भी माँगेंगे तो मैं उसे बिना हिचकिचाहटके दे डालूँगा। जब मैंने अन्य साधारण याचकोंको 'नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहा, तब भला भगवान् अच्युतके आनेपर वह अनभ्यस्त शब्द कैसे कहूँगा? दान देनेसे आनेवाली विपत्तियाँ वीर पुरुषोंके लिये प्रशंसनीय हैं। जो दान देनेके बाद बाधा नहीं पहुँचाता, वह अमङ्गलके समान कहा गया है। महाभाग! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी दुःखी, दरिद्र, आतुर, भूषारहित, उद्विग्न और माला आदिसे रहित नहीं है, प्रत्युत सभी लोग हृष्ट, संतुष्ट, सुगन्धित द्रव्योंसे विभूषित, तृप्त और सभी सुखोंसे सम्पन्न हैं। फिर मैं सदा सुखी हूँ, इसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ १९—२८॥ |
| ९४४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एतद्विशिष्टपात्रोऽयं दानबीजफलं मम।<br>विदितं भृगुशार्दूल मयैतत् त्वत्प्रसादतः॥ २९ | भृगुवंशसिंह! मेरे दानरूपी बीजका ही यह फल है, जो मुझे इस प्रकार दान देनेयोग्य विशिष्ट पात्र प्राप्त होगा। यह मुझे आपकी कृपासे ही ज्ञात हुआ है। अतः |
| एतद् विजानतो दानबीजं पतति चेद् गुरो।<br>जनार्दनमहापात्रे किं च प्राप्तं ततो मया॥ ३० | गुरो! यह सब जानते हुए यदि मेरा यह दानबीज जनार्दनरूपी महापात्रमें पड़ जाय तो फिर मुझे क्या नहीं मिला अर्थात् मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। यदि |
| मत्तो दानमवाप्येशो यदि पुष्णाति देवताः।<br>उपभोगाद् दशगुणं दानं श्लाघ्यतमं मम॥ ३१ | परमेश्वर मुझसे दान लेकर देवताओंका पालन-पोषण करते हैं तो उनके उपभोगसे मेरा दान दसगुना प्रशंसनीय हो जायगा। |
| मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३२ | इसमें सन्देह नहीं कि यज्ञद्वारा आराधित श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो गये हैं, इसी कारण दर्शन देकर उपकार करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं। यदि |
| अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधिनम्।<br>मां निहन्तुमनाश्रैव वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३३ | क्रुद्ध होकर देवभागको रोकनेवाले मुझको मार डालनेके विचारसे आ रहे हैं तो भगवान्के हाथोंसे मेरा वध भी प्रशंसनीय है! |
| तन्मयं सर्वमेवेदं नाप्राप्यं यस्य विद्यते।<br>स मां याचितुमभ्येति नानुग्रहमृते हरिः॥ ३४ | यह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। जिनके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है, वे ही श्रीहरि यदि मुझसे माँगनेके लिये आ रहे हैं तो यह उनके अनुग्रहके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। |
| यः सृजत्यात्मभूः सर्वं चेतसैव च संहरेत्।<br>स मां हन्तुं हृषीकेशः कथं यत्नं करिष्यति॥ ३५ | जो स्वयम्भू परमात्मा सबकी सृष्टि करते हैं और मनकी कल्पनासे ही उसका विनाश कर देते हैं, वे हृषीकेश भला मुझे मारनेके लिये क्यों यत्न करेंगे? |
| एतद् विदित्वा न गुरो दानविघ्नकरेण च।<br>त्वया भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते॥ ३६ | गुरो! ऐसा जानकर मेरे यज्ञमें जगन्नाथ गोविन्दके उपस्थित होनेपर आपको मेरे दानमें विघ्न नहीं करना चाहिये॥ २९–३६॥ |
| शौनक उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य सम्प्राप्तः स जगत्पतिः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक्॥ ३७ | शौनकजी बोले— बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य एवं मायासे वामनरूपधारी जगदीश्वर वहाँ आ पहुँचे। |
| तं दृष्ट्वा यज्ञवाटान्तःप्रविष्टमसुरैः प्रभुम्।<br>जग्मुः सभासदः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३८ | यज्ञशालाके भीतर प्रविष्ट हुए उन प्रभुको देखकर सभी सभासद असुरगण क्षुब्ध हो उठे; क्योंकि वामनके तेजसे वे तेजोहीन हो गये थे। |
| जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः॥ ३९ | उस महान् यज्ञमें आये हुए मुनिगण जप करने लगे। बलिने अपना समस्त जीवन सफल मान लिया। |
| ततः संक्षोभमापन्नो न कश्चित्किंचिदुक्तवान्।<br>प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास चेतसा॥ ४० | इसके बाद सभी संक्षुब्ध थे, अतः किसीने भी किसीसे कुछ भी नहीं कहा। सभीने हृदयसे देवदेवेशकी पूजा की। |
| अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान्।<br>देवदेवपतिः साक्षी विष्णुर्वामनरूपधृक्॥ ४१ | तत्पश्चात् देवाधिदेव वामनरूपधारी साक्षात् विष्णुने विनीत बलि और उन मुनिवरोंको देखकर |
| तुष्टाव यज्ञवह्निं च यजमानमथर्त्विजः।<br>यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदः॥ ४२ | यज्ञाग्नि, यज्ञकर्माधिकारी सदस्यों और यजमान, पुरोहित, कर्ममें प्रस्तुत द्रव्य-सम्पत्तियोंकी प्रशंसा की। |
| ततः प्रसन्नमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्।<br>यज्ञवाटस्थितं वीरः साधु साध्वित्युदीरयन्॥ ४३ | तदनन्तर यज्ञशालामें स्थित वामनभगवान्को अत्यन्त प्रसन्न देखकर उसी समय सदस्यगण ‘साधु-साधु’ की ध्वनि करने लगे। |
| * अध्याय २४६ * | ९४५ |
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| स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा ।<br>पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः ॥ ४४ | उसी समय रोमाञ्चित शरीरवाले महासुर बलिने अर्घ्य लेकर गोविन्दकी पूजा की और इस प्रकार कहा ॥ ३७-४४ ॥ | | बलिरुवाच<br>सुवर्णरत्नसंघातं गजाश्वममितं तथा ।<br>स्त्रियो वस्त्राण्यलङ्कारांस्तथा ग्रामांश्च पुष्कलान् ॥ ४५<br>सर्वस्वं सकलामुर्वी भवतो वा यदीप्सितम् ।<br>तद् ददामि वृणुष्व त्वं येनार्थी वामनः प्रियः ॥ ४६ | बलिने कहा— सुवर्ण एवं रत्नोंके समूह, असंख्य हाथी-घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, प्रचुर गाँव, सर्वस्व सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण पृथ्वी—इनमेंसे जो आपको अभीष्ट हो अथवा जिसके लिये आप वामनरूपसे आये हैं, उसे आप माँगिये। मैं आपको वह प्रदान करूँगा॥ ४५-४६॥ | | शौनक उवाच<br>इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः ।<br>प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४७ | शौनकजी बोले— दैत्यपति बलिके ऐसा कहनेपर गम्भीररूपसे मुसकराते हुए वामनरूपधारी भगवान् प्रेमभरी वाणीमें बोले ॥ ४७॥ | | वामन उवाच<br>ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम् ।<br>सुवर्णग्रामरत्नानि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४८ | वामनभगवान्ने कहा— राजन्! अग्निस्थापनके लिये मुझे तीन पग पृथ्वी दीजिये। सुवर्ण, ग्राम, रत्न आदि उनके याचकोंको प्रदान कीजिये ॥ ४८ ॥ | | बलिरुवाच<br>त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पादैः पदवतां वर ।<br>शतं शतसहस्त्राणां पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४९ | बलिने कहा— पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग पृथ्वीसे आपका क्या काम चलेगा? आप सौ अथवा लाख पदोंके लिये याचना कीजिये ॥ ४९॥ | | वामन उवाच<br>धर्मबुद्ध्या दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि तावता ।<br>अन्येषामर्थिनां वित्तमीहितं दास्यते भवान् ॥ ५० | वामनभगवान्ने कहा— दैत्यपते! मैं धर्मबुद्धिसे उतनेसे ही कृतार्थ हूँ। आप अन्य याचकोंको उनका अभीष्ट धन प्रदान कीजिये ॥ ५०॥ | | शौनक उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः ।<br>ददौ तस्मै महाबाहुर्वामनाय पदत्रयम् ॥ ५१<br>पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः ।<br>सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ५२<br>चन्द्रसूर्यौ च नयने द्यौर्मूर्धा चरणौ क्षितिः ।<br>पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ५३<br>विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः ।<br>यक्षा नखेषु सम्भूता रेखाश्चाप्सरसस्तथा ॥ ५४<br>दृष्टौ ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः ।<br>तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः ॥ ५५<br>बाहवो विदिशस्तस्य दिशः श्रोत्रे महात्मनः ।<br>अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥ ५६<br>प्रसादश्चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः ।<br>सत्यं तस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ५७<br>ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्गलयस्तथा ।<br>स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै भ्रुवौ ॥ ५८ | शौनकजी बोले— महात्मा वामनकी ऐसी बातें सुनकर महाबाहु बलिने उन वामनको तीन पग भूमि देनेका संकल्प कर लिया। हाथमें संकल्पका जल गिरते ही वामन अवामन हो गये और उन्होंने उसी क्षण अपना सर्वदेवमय रूप प्रकट कर दिया। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र, आकाश मस्तक, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाचगण पैरोंकी अंगुलियाँ, गुह्यक हाथोंकी अंगुलियाँ, विश्वेदेव घुटने, सुरश्रेष्ठ साध्यगण जंघे थे। नखोंमें यक्ष, रेखाओंमें अप्सराएँ, नेत्रज्योतिमें नक्षत्रगण थे। सूर्यकिरणें केश, ताराएँ रोमकूप, महर्षिगण रोमावलि थे। उन महात्माकी भुजाओंमें दिशाओंके कोण और श्रोत्रोंमें दिशाएँ थीं। श्रवणेन्द्रियमें अश्विनीकुमार और नासिकामें वायुका निवास था। प्रसन्नतामें चन्द्रदेव और मनमें धर्म स्थित थे। सत्य उनकी वाणी और सरस्वती देवी जिह्वा हुई। देवमाता अदिति ग्रीवा, विद्याएँ वलय, स्वर्गद्वार मैत्री, त्वष्टा और पूषा दोनों भौंह थे। |
९४६ * मत्स्यपुराण *
| मुखं वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः।<br>हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः॥ ५९<br>पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसंधिषु।<br>सर्वसूक्तानि दशना ज्योतींषि विमलप्रभाः॥ ६० | वैश्वानर उनके मुख, प्रजापति अण्डकोष, परब्रह्म हृदय और कश्यप मुनि पुंस्त्व थे। उनके पीठ-भागमें वसुगण और संधिभागोंमें मरुद्गण थे। सभी सूक्त दाँत और निर्मल कान्ति ज्योतिर्गण थे॥ ५९-६०॥ |
| वक्षःस्थले महादेवो धैर्ये चास्य महार्णवाः।<br>उदरे चास्य गन्धर्वाः सम्भूताश्च महाबलाः॥ ६१<br>लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः।<br>सर्वज्योतींषि जानीहि तस्य तत्परमं महः॥ ६२<br>तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमूत्तमम्।<br>स्तनौ कुक्षी च वेदाश्च उदरं च महामखाः॥ ६३<br>इष्टयः पशुबन्धाश्च द्विजानां चेष्टितानि च।<br>तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महाबलाः॥ ६४<br>उपासर्पन्त दैत्येन्द्राः पतङ्गा इव पावकम्।<br>प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः॥ ६५<br>कृत्वा रूपं महाकायं जहाराशु स मेदिनीम्।<br>तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे॥ ६६<br>नाभौ विक्रममाणस्य सक्थिदेशस्थितावुभौ।<br>परं विक्रमतस्तस्य जानुमूले प्रभाकरौ॥ ६७<br>विष्णोरास्तां महीपाल देवपालनकर्मणि।<br>जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान्॥ ६८<br>पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः।<br>सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात्॥ ६९<br>बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः॥ ७० | उनके वक्षःस्थलमें महादेव और धैर्यमें महासागर थे। उनके उदरमें महाबली गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सभी विद्याएँ उनके कटिप्रदेशमें थीं। सभी ज्योतियोंको उनका परम तेज जानना चाहिये। वहाँ उन देवाधिदेवका अनुपम तेज भासमान हो रहा था। उनके स्तनों और कुक्षियोंमें वेदोंका निवास था तथा उदरमें महायज्ञ, इष्टियाँ, पशुओंके बलिदान और ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ थीं। उन विष्णुके देवमय स्वरूपको देखकर महाबली दैत्यगण अग्निमें पतंगोंकी भाँति उनपर टूट पड़े। तब सर्वव्यापी परमात्माने उन सभी असुरोंको पैरों तथा हाथोंके चपेटसे मसल डाला और शीघ्र ही विशालकाय स्वरूप धारणकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया। भूलोकको नापते समय चन्द्रमा और सूर्य भगवान्के स्तनोंके मध्यभागमें थे, अन्तरिक्षलोक नापते समय वे दोनों नाभिप्रदेशमें और उससे ऊपर जाते समय सक्थि भागमें आ गये। उससे भी ऊपर जाते समय वे दोनों प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य भगवान् विष्णुके घुटनोंके मूलभागमें स्थित हो गये। महीपाल! इस प्रकार लम्बे डगवाले भगवान् विष्णुने देवहितके लिये समूची त्रिलोकीको जीतकर और असुरश्रेष्ठोंका संहार कर तीनों लोकोंका राज्य इन्द्रको सौंप दिया। साथ ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने भूमितलके नीचे सुतल नामक पाताललोकका राज्य बलिको दे दिया। उस समय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ६१-७०॥ |
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान् बोले— |
| यत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया।<br>कल्पप्रमाणं तस्मात् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम्॥ ७१<br>वैवस्वते तथातीते बले मन्वन्तरे ह्यथ।<br>सावर्णि के तु सम्प्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति॥ ७२<br>साम्प्रतं देवराजाय त्रैलोक्यं सकलं मया।<br>दत्तं चतुर्युगाणां च साधिका ह्येकसप्ततिः॥ ७३<br>नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्थिनः।<br>तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले॥ ७४ | दैत्यराज बलि! जो तुमने मुझे जलका दान दिया है और मैंने उसे हाथमें ग्रहण कर लिया है, उसके फलस्वरूप तुम एक कल्पतक दीर्घजीवन प्राप्त करोगे और इस वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर सावर्णि मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्र होओगे। इस समय मैंने एकहत्तर चतुर्युगीतकके लिये त्रिलोकीका सम्पूर्ण राज्य देवराज इन्द्रको दे दिया है। साथ ही इन्द्रके जितने शत्रु होंगे, उन सबका भी मुझे नियन्त्रण करना है; क्योंकि इन्द्रने पूर्वकालमें परम भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है। |
| * अध्याय २४६ * | ९४७ |
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| सुतलं नाम पातालं त्वमासाद्य मनोरमम्।<br>वसासुर ममादेशं यथावत् परिपालयन्॥ ७५<br>तत्र दिव्यवनोपेते प्रासादशतसंकुले।<br>प्रोत्फुल्लपद्मसरसि स्रवच्छुद्धसरिद्वरे॥ ७६<br>सुगन्धिधूपस्रग्वस्त्रवराभरणभूषितः ।<br>स्रक्चन्दनादिमुदितो गेयनृत्यमनोरमे॥ ७७<br>पानान्नभोगान् विविधानुपभुङ्क्ष्व महासुर।<br>ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः॥ ७८<br>यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं करिष्यसि।<br>तावदेतान् महाभोगानवाप्स्यसि महासुर॥ ७९<br>यदा च देवविप्राणां विरोधं त्वं करिष्यसि।<br>बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणास्त्वामसंशयम्॥ ८०<br>एतद् विदित्वा भवता मयाऽऽज्ञप्तमशेषतः।<br>न विरोधः सुरैः कार्यो विप्रैर्वा दैत्यसत्तम॥ ८१ | असुर! तुम सुतल नामक मनोहर पाताललोकमें जाकर मेरे आदेशका ठीक-ठीक पालन करते हुए निवास करो। महासुर! जो दिव्य वनोंसे युक्त एवं सैकड़ों महलोंसे समन्वित है, जिसके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं, जहाँ शुद्ध एवं श्रेष्ठ नदियाँ बह रही हैं, जो नाच-गानसे मनको लुभानेवाला है, उस सुतललोकमें तुम सुगन्धित धूप, माला, वस्त्र और उत्तम आभूषणोंसे विभूषित तथा माला और चन्दनादिसे हर्षित होकर विविध प्रकारके अन्न-पान आदिका उपभोग करो और मेरी आज्ञासे सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उतने समयतक निवास करो। महासुर! जबतक तुम देवताओं और ब्राह्मणोंसे विरोध नहीं करोगे, तबतक तुम इन सभी महाभोगोंको प्राप्त करते रहोगे। जब तुम देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करोगे, तब तुम्हें वरुणके पाश बाँध लेंगे—इसमें संदेह नहीं है। दैत्यश्रेष्ठ! ऐसा जानकर तुम मेरी आज्ञाओंका पूर्णरूपसे पालन करो! तुम्हें देवताओं अथवा ब्राह्मणोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये॥ ७५—८१॥ | | शौनक उवाच<br>इत्येवमुक्तो देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलिः प्राह महाराज प्रणिपत्य मुदा युतः॥ ८२ | शौनकजी बोले—महाराज! प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बलि प्रमुदित हो प्रणाम करके बोला॥ ८२॥ | | बलिरुवाच<br>तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया।<br>किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम्॥ ८३ | बलिने पूछा—भगवन्! आपके आदेशसे उस पाताललोकमें निवास करते समय मेरे लिये सुखभोगोंको प्राप्त करानेवाले कौन-से उपादान कारण होंगे?॥ ८३॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम्॥ ८४<br>अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृताः।<br>फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च॥ ८५ | श्रीभगवान्ने कहा—जो विधानसे रहित किये गये दान, बिना श्रोत्रिय ब्राह्मणके किये गये श्राद्ध और श्रद्धारहित किये हुए हवन हैं, ये सब तुम्हें अपना फल प्रदान करेंगे। दक्षिणाहीन यज्ञ, बिना विधिके की हुई क्रियाएँ और ब्रह्मचर्य-व्रतसे रहित अध्ययन—ये सभी तुम्हें अपना फल देंगे॥ ८४-८५॥ | | शौनक उवाच<br>बलेर्वरमिमं दत्त्वा शक्राय त्रिदिवं तथा।<br>व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः॥ ८६<br>प्रशशास यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यपूजितः।<br>सिषेवे च परान् कामान् बलिः पातालसंस्थितः॥ ८७<br>इहैव देवदेवेन बद्धोऽसौ दानवोत्तमः।<br>देवानां कार्यकारणे भूयोऽपि जगति स्थितः॥ ८८<br>सम्बन्धी ते महाभाग द्वारकायां व्यवस्थितः।<br>दानवानां विनाशाय भारावतरणाय च॥ ८९ | शौनकजीने कहा—बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्गका राज्य देकर भगवान् विष्णु अपने उस सर्वव्यापक रूपके साथ अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् इन्द्र तीनों लोकोंमें पूजित होकर पूर्ववत् शासन करने लगे तथा बलि पातालमें स्थित होकर उत्तम मनोरथोंका सेवन करने लगे। महाभाग! वह दानवराज बलि भगवान् विष्णुद्वारा यहीं बाँधा गया था। वे भगवान् देवताओंका कार्य करनेके लिये फिर इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं, जो दानवोंका विनाश तथा पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये |
९४८ * मत्स्यपुराण *
| यतो यदुकुले कृष्णो भवतः शत्रुनिग्रहे।<br>सहायभूतः सारथ्यं करिष्यति बलानुजः॥ ९०<br>एतत् सर्वं समाख्यातं वामनस्य च धीमतः।<br>अवतारं महावीर श्रोतुमिच्छोस्त्ववार्जुन ॥ ९१ | कृष्णरूपसे यदुकुलमें उत्पन्न होकर विराजमान हैं। वे तुम्हारे सम्बन्धी हैं। बलरामके छोटे भाई वे श्रीकृष्ण तुम्हारे शत्रुओंके निग्रहके समय सारथिरूपसे तुम्हारी सहायता करेंगे। महावीर अर्जुन ! बुद्धिमान् वामनके अवतारकी यह सारी कथा मैंने तुमसे वर्णन कर दी, जिसे तुम सुनना चाहते थे॥ ८६—९१॥ |
| अर्जुन उवाच<br>श्रुतवानिह ते पृष्टं माहात्म्यं केशवस्य च।<br>गङ्गाद्वारमितो यास्याम्यनुज्ञां देहि मे विभो॥ ९२ | अर्जुन बोले—विभो! भगवान् विष्णुके माहात्म्यको, जिसे मैंने पूछा था, उसे मैं आपके मुखसे सुन चुका। अब मैं यहाँसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार) जाना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये॥ ९२॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा ययौ पार्थो नैमिषं शौनको गतः।<br>इत्येतद् देवदेवस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>वामनस्य पठेद् यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९३<br>बलिप्रह्लादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः।<br>बलेर्विष्णोश्च कथितं यः स्मरिष्यति मानवः॥ ९४<br>नाधयो व्याधयस्तस्य न च मोहाकुलं मनः।<br>भविष्यति द्विजश्रेष्ठाः पुंसस्तस्य कदाचन॥ ९५<br>च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टाप्तिं च वियोगवान्।<br>अवाप्नोति महाभागो नरः श्रुत्वा कथामिमाम् ॥ ९६ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ऐसा कहकर अर्जुन गङ्गाद्वारको चले गये और महर्षि शौनक नैमिषारण्यकी ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार जो देवाधिदेव भगवान् वामनके इस उत्तम माहात्म्यका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो मनुष्य बलि और प्रह्लादके संवाद, बलि और शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि और विष्णुके कथनोपकथनका स्मरण करेगा, उस पुरुषको कभी भी न तो किसी प्रकारकी आधि-व्याधि प्राप्ति होगी और न उसका मन मोहसे व्याकुल होगा। जो महान् भाग्यशाली मनुष्य इस कथाको सुनता है, वह राज्यच्युत हो तो अपने राज्यको और वियोगी हो तो अपने इष्टको प्राप्त कर लेता है ॥ ९३—९६ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव नामक दो सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४६ ॥
दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
अर्जुनके वाराहावतारविषयक प्रश्न करनेपर शौनकजीद्वारा भगवत्स्वरूपका वर्णन
| अर्जुन उवाच<br>प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः।<br>सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतम् ॥ १<br>जाने न तस्य चरितं न विधिं न च विस्तरम्।<br>न कर्म गुणसंख्यानं न चाप्यन्तं मनीषिणः ॥ २<br>किमात्मको वराहोऽसौ किं मूर्तिः कस्य देवता ।<br>किं प्रमाणः किं प्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम् ॥ ३ | अर्जुनने पूछा—विप्रवर! पुराणोंमें संतोंद्वारा अपरिमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके अवतारोंके वर्णनमें हमने वाराह-अवतारकी बात सुनी है, किंतु मैं उन बुद्धिमान् भगवान्के चरित्र, विस्तार, कर्म, गुण और आराधनाविधिको नहीं जानता। वे वाराहभगवान् किस प्रकारके हैं? उनका स्वरूप कैसा है? उनकी देवशक्ति कैसी है? उनका क्या प्रमाण और कितना प्रभाव है? प्राचीनकालमें उन्होंने क्या कार्य किये हैं? |
| * अध्याय २४७ * | ९४९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| एतन्मे शंस तत्त्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम्।<br>यथाहं च समेतानां द्विजातीनां विशेषतः॥ ४<br>शौनक उवाच<br>एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।<br>महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः॥ ५<br>यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः।<br>दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिमर्दनः॥ ६<br>छन्दोगीर्भिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलङ्कृतः।<br>मनःप्रसन्नतां कृत्वा निबोध विजयाधुना॥ ७<br>इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।<br>नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत्॥ ८<br>पुराणं वेदमखिलं सांख्यं योगं च वेद यः।<br>कात्स्न्र्येन विधिना प्रोक्तं सौख्यार्थं वेदयिष्यति॥ ९<br>विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।<br>प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः॥ १०<br>मनःसंकल्पजाश्चैव पूर्वजा ऋषयस्तथा।<br>वसवो मरुतश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः॥ ११<br>दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छाश्च ये भुवि॥ १२<br>चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिशतानि च।<br>जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्॥ १३<br>पूर्णे युगसहस्रे तु ब्राह्मेऽहनि तथागते।<br>निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे॥ १४<br>हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः।<br>शिखाभिर्विधमँल्लोकानशोषयत वह्निना॥ १५ | इसलिये पुराणोंमें कही हुई वाराह-अवतारकी ये सारी बातें मुझे तथा विशेषकर यहाँ आये हुए इन ब्राह्मणोंको तत्त्वपूर्वक बतलाइये॥ १-४॥<br>**शौनकजी बोले—**अर्जुन! मैं तुमसे अद्भुतकर्मा भगवान् श्रीकृष्णके महावाराह-अवतारके चरित्रको, जो पुराणोंमें वर्णित तथा ब्रह्मसम्मित है, कह रहा हूँ। राजन्! जिस प्रकार शत्रुसंहारक भगवान् विष्णुने वराह-रूप धारणकर समुद्र-स्थित पृथ्वीका दाढ़ोंपर रखकर उद्धार किया था तथा जिस प्रकार उदार श्रुतियोंने वैदिक वाणीद्वारा उनका अभिनन्दन किया था, यह सब इस समय मनको प्रसन्न करके सुनो। अर्जुन! यह पुराण परम पुण्यमय, वेदोंद्वारा अनुमोदित तथा अनेकों श्रुतियोंसे सम्पन्न है, इसे नास्तिक व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये। जो सभी पुराणों, वेदों, सांख्य और योगको पूरी विधिके साथ जानता है, उसीसे इसकी कथा कहनी चाहिये; क्योंकि वही इसके अर्थको जान सकेगा। विश्वेदेवगण, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अश्विनीकुमार, प्रजापतिगण, सातों महर्षि, ब्रह्माके मानसिक संकल्पसे सर्वप्रथम उत्पन्न हुए सनकादि ब्रह्मर्षि, वसुगण, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, विविध प्रकारके जीव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ आदि जितनी जातियाँ पृथ्वीपर हैं, सभी चौपाये, सैकड़ों तिर्यग्योनियाँ, जङ्गम प्राणी तथा अन्य जो जीव नामधारी हैं—इन सभीको एक हजार युग बीतनेके पश्चात् ब्रह्माका दिन आनेपर जब सभी प्रकारके उत्पात होने लगते हैं और सभी प्राणियोंका विनाश हो जाता है, तब हिरण्यरेता भगवान् जो वृषाकपि नामसे विख्यात हैं, तीन अग्निशिखाओंसे युक्त होकर अपनी उग्र ज्वालाओंद्वारा सभी लोकोंका विनाश करते हुए अग्निके प्रभावसे दग्ध कर देते हैं॥ ५-१५॥ |
| दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरुद्गतैः।<br>विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः॥ १६<br>साङ्गोपनिषदो वेदा इतिहासपुरोगमाः।<br>सर्वविद्याः क्रियाश्चैव सर्वधर्मपरायणाः॥ १७<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा प्रभवं विश्वतोमुखम्।<br>सर्वदेवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशत् तु कोटयः॥ १८ | उस दिनके प्राप्त होनेपर निकलती हुई तेजोराशिसे जिनके शरीर जल गये थे तथा झुलसे हुए मुखोंसे जिनका रंग बदल गया था, वे छहों अङ्गोंसहित वेद, उपनिषद्, इतिहास, सभी विद्याएँ, सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाएँ और तैंतीस करोड़ सभी देवगण सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थानरूप ब्रह्माको आगे करके |
९५० * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
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| तस्मिन्नहनि सम्प्राप्ते तं हंसं महदक्षरम्।<br>प्रविशन्ति महात्मानं हरिं नारायणं प्रभुम्॥ १९<br>तेषां भूयः प्रवृत्तानां निधनेात्पत्तिरुच्यते।<br>यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमने इह॥ २०<br>पूर्णे युगसहस्रान्ते कल्पो निःशेष उच्यते।<br>यस्मिन् जीवकृतं सर्वं निःशेषं समतिष्ठत॥ २१<br>संहृत्य लोकानखिलान् सदेवासुरमानुषान्।<br>कृत्वा सुसंस्थां भगवानास्त एको जगद्गुरुः॥ २२<br>स स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।<br>अव्ययः शाश्वतो देवो यस्य सर्वमिदं जगत्॥ २३<br>नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्रग्रहविवर्जिते।<br>त्यक्तधूमाग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये॥ २४<br>अपक्षिगणसम्पाते सर्वप्राणिहरे पथि।<br>अमर्यादाऽऽकुले रौद्रे सर्वतस्तमसावृते॥ २५<br>अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम्।<br>प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे॥ २६<br>गते स्वभावसंस्थाने लोके नारायणात्मके।<br>परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे॥ २७<br>पीतवासा लोहिताक्षः कृष्णो जीमूतसन्निभः।<br>शिखासहस्रविकचजटाभारं समुद्वहन्॥ २८<br>श्रीवत्सलक्षणधरं रक्तचन्दनभूषितम्।<br>वक्षो बिभ्रन्महाबाहुः सविद्युदिव तोयदः॥ २९<br>पुण्डरीकसहस्रेण स्रगस्य शुशुभे शुभा।<br>पत्नी चास्य स्वयं लक्ष्मीर्देहमावृत्य तिष्ठति॥ ३०<br>ततः स्वपिति शान्तात्मा सर्वलोकशुभावहः।<br>किमप्यमितयोगात्मा निद्रायोगमुपागतः॥ ३१<br>ततो युगसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः।<br>स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः॥ ३२<br>ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत्।<br>नरान् देवगणांश्चैव पारमेष्ठ्येन कर्मणा॥ ३३ | हंसस्वरूप उन भगवान् विष्णुमें, जो सर्वोत्कृष्ट, अविनाशी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न और जलशायी हैं, प्रविष्ट हो जाते हैं। उनका पुनः प्रकट होना उसी प्रकार जन्म-मृत्यु कहा जाता है, जैसे इस लोकमें सूर्यका निरन्तर उदय और अस्त होता रहता है। एक हजार युग पूर्ण होनेपर कल्पकी समाप्ति कही जाती है, जिसमें सभी जीवोंके कार्य भी समाप्त हो जाते हैं। उस समय अकेले जगद्गुरु भगवान् विष्णु देवता, असुर और मानवसहित सभी लोकोंका संहारकर और उन्हें अपनेमें समाविष्ट कर विद्यमान रहते हैं। यह सारा जगत् जिनका अंशरूप है, वे सनातन अविनाशी भगवान् प्रत्येक कल्पकी समाप्तिपर बारंबार सभी जीवोंकी सृष्टि करते हैं। जब लोकमें सूर्यकी किरणें नष्ट हो जाती हैं, चन्द्रमा और ग्रह लुप्त हो जाते हैं, धूम, अग्नि और पवन दूर हो जाते हैं, यज्ञोंमें वषट्कारकी ध्वनि अस्त हो जाती है, पक्षिगणोंका उड़ना बंद हो जाता है, मार्गमें सभी प्राणियोंका अपहरण होने लगता है, भीषणता मर्यादाकी सीमाके बाहर पहुँच जाती है, चारों ओर निविड़ अन्धकार छा जाता है, सारा लोक अदृश्य हो जाता है, सभी कर्मोंका अभाव हो जाता है, सारी उत्पत्ति प्रशान्त हो जाती है, वैरभाव नष्ट हो जाता है और सब कुछ नारायणरूपी लोकमें विलीन हो जाता है, उस समय इन्द्रियोंके स्वामी परमेष्ठी शयनके लिये उद्यत होते हैं॥ १६—२७॥<br><br>उस समय महाबाहु भगवान् पीताम्बरधारी, लाल नेत्रोंसे युक्त, काले मेघकी-सी कान्तिसे सम्पन्न, हजारों शिखाओंसे युक्त जटाभारको वहन करनेवाले, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित एवं लाल चन्दनसे विभूषित वक्षःस्थलको धारण करते हुए बिजलीसहित मेघकी भाँति शोभायमान होते हैं। हजारों कमल-पुष्पोंकी बनी हुई सुन्दर माला उनकी शोभा बढ़ाती है। उनकी पत्नी स्वयं लक्ष्मी उनके शरीरको आच्छादित करके विद्यमान रहती हैं। तत्पश्चात् शान्तात्मा, सभी लोकोंके कल्याणकारी और परम योगी भगवान् कुछ योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं। फिर एक हजार युग व्यतीत होनेपर देवेश्वर भगवान् पुरुषोत्तम सर्वव्यापी होकर अपने-आप ही जागते हैं। तदनन्तर लोककर्ता भगवान् ब्रह्माके कर्मद्वारा मनुष्यों और देवताओंकी सृष्टिके विषयमें पुनः विचार करते हैं। |
- अध्याय २४७ * । १५१
| ततः संचिन्तयन् कार्यं देवेषु समितिञ्जयः।<br>सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति सतां गतिः॥ ३४<br><br>कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता वै प्रजापतिः।<br>नारायणः परं सत्यं नारायणः परं पदम्॥ ३५<br><br>नारायणः परो यज्ञो नारायणः परा गतिः।<br>स स्वयम्भूरिति ज्ञेयः स स्रष्टा भुवनाधिपः॥ ३६<br><br>स सर्वमिति विज्ञेयो ह्येष यज्ञः प्रजापतिः।<br>यद् वेदितव्यस्त्रिदशैस्तदेष परिकीर्त्यते॥ ३७<br><br>यत्तु वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे ऋषयश्च सहामरैः॥ ३८<br><br>नास्यान्तमधिगच्छन्ति विचिन्वन्त इति श्रुतिः।<br>यदस्य परमं रूपं न तत् पश्यन्ति देवताः॥ ३९<br><br>प्रादुर्भावे तु यद् रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः।<br>दर्शितं यदि तेनैव तदवेक्षन्ति देवताः॥ ४०<br><br>यन्न दर्शितवानेष कस्तदन्वेष्टुमीहते।<br>ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः॥ ४१<br><br>तेजसस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च।<br>चतुराश्रमधर्मेशश्चातुर्होत्रफलाशनः ॥ ४२<br><br>चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगनिर्वर्तकः ।<br>तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः।<br>मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रकम्॥ ४३<br><br>सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणै-<br>र्दुमौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः ।<br>प्रजापतिः श्रुतिभिरसंकुलं किल<br>तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः॥ ४४ | तत्पश्चात् सत्पुरुषोंके आश्रयरूप एवं रणविजयी भगवान् देवताओंके विषयमें कार्यकी चिन्तना करते हुए सारे लोककी सृष्टि करते हैं। वे ही परमात्मा इस समस्त सृष्टिके कर्ता, विकर्ता, संहर्ता और प्रजापति हैं। नारायण ही परम सत्य, नारायण ही परम पद, नारायण ही परम यज्ञ और नारायण ही परमगति हैं। उन्हें ही स्वयम्भू, सभी भुवनोंका अधीश्वर और स्रष्टा जानना चाहिये। उन्हींको सर्वरूप समझना चाहिये। ये यज्ञस्वरूप और प्रजापति हैं। देवताओंद्वारा जो जाननेयोग्य है, वह ये ही कहे जाते हैं॥ २८—३७॥<br><br>भगवान्का जो स्वरूप जाननेयोग्य है, उसे देवगण भी नहीं जानते। सभी प्रजापति, देवतागण और ऋषिगण खोजते रहते हैं, किंतु इनका अन्त नहीं पाते—ऐसी श्रुति है। इस परमात्माका जो परम स्वरूप है, उसे देवतालोग भी नहीं देख पाते। उनके प्रादुर्भावकालमें जिस स्वरूपके दर्शन होते हैं, देवगण उसीकी पूजा करते हैं। यदि उन्होंने स्वयं ही अपने रूपको दिखा दिया तो देवगण उसे देख पाते हैं। वे जिस रूपका दर्शन नहीं कराते, उसकी खोज करनेके लिये कौन तत्पर हो सकता है? जो सभी जीवोंके नायक, अग्नि और वायुकी गति, तेज, तपस्या और अमृतके निधान, चारों आश्रमधर्मोंके स्वामी, चातुर्होत्र यज्ञके फलका भक्षण करनेवाले, चारों समुद्रोंतक व्याप्त और चारों युगोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, वे ही महायोगी भगवान् इस जगत्का संहारकर अपने उदरमें रख लेते हैं और हजार वर्षोंतक धारण करनेके पश्चात् उस अण्डको उत्पन्न कर देते हैं। तत्पश्चात् प्रजापति भगवान् अपने शरीरसे सुर, असुर, द्विज, सर्प, अप्सराओंके समूह, समस्त वृक्ष, ओषधि, पर्वत, यक्ष, गुह्य और श्रुतियोंसे युक्त इस जगत्की सृष्टि करते हैं॥ ३८—४४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४७॥
| ९५२ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
वराहभगवान्का प्रादुर्भाव, हिरण्याक्षद्वारा रसातलमें ले जायी गयी पृथ्वीदेवीद्वारा यज्ञवराहका स्तवन और भगवान्द्वारा उनका उद्धार
| संस्कृत | हिन्दी |
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| शौनक उवाच<br>जगदण्डमिदं पूर्वमासीद् दिव्यं हिरण्मयम्।<br>प्रजापतेरियं मूर्तिरितियं वैदिकी श्रुतिः॥ १<br>तत्तु वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः।<br>लोकसर्जनहेतोस्तु बिभेदाधोमुखं पुनः॥ २<br>भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं विष्णुर्वै लोकजन्मकृत्।<br>चकार जगतश्चात्र विभागं स विभागकृत्॥ ३<br>यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं विवराकृतितां गतम्।<br>विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद्रसातलम्॥ ४<br>यदण्डमकरोत् पूर्वं देवो लोकचिकीर्षया।<br>तत्र यत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनो गिरिः॥ ५<br>शैलैः सहस्त्रैर्महती मेदिनी विषमाभवत्॥ ६<br>तैश्च पर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः।<br>पीडिता गुरुभिर्देवी व्यथिता मेदिनी तदा॥ ७<br>महामते भूरिबलं दिव्यं नारायणात्मकम्।<br>हिरण्मयं समुत्सृज्य तेजो वै जातरूपिणम्॥ ८<br>अशक्ता वै धारयितुमधस्तात् प्राविशत् तदा।<br>पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तस्य सा क्षितिः॥ ९<br>पृथ्वीं विशन्तीं दृष्ट्वा तु तामधो मधुसूदनः।<br>उद्धारार्थं मनश्चक्रे तस्या वै हितकाम्यया॥ १० | शौनकजीने कहा— अर्जुन! यह जगत् पहले दिव्य हिरण्मय अण्डके रूपमें था। यह प्रजापतिकी मूर्ति है—ऐसी वैदिकी श्रुति है। एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सर्वव्यापी एवं लोकोंके जन्मदाता विष्णुने उस अण्डके ऊर्ध्व मुखका भेदन किया और पुनः लोकसृष्टिके लिये उसके अधोमुखको भी फोड़ दिया। फिर उस अण्डको आठ भागोंमें विभक्त कर दिया। तत्पश्चात् विभागकर्ता विष्णुने जगत्का भी विभाजन किया। विश्वस्रष्टा भगवान्द्वारा किया गया जो ऊपरका छिद्र था, वह विवरके आकारवाला आकाश और जो नीचेका छिद्र था, वह रसातल हुआ। भगवान्ने पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी कामनासे जिस अण्डको उत्पन्न किया था, उससे जो जल टपका था, वह स्वर्णमय सुमेरु पर्वत हुआ और हजारों पर्वतोंके संयोगसे विशाल पृथ्वी विषमा अर्थात् ऊँची-नीची हो गयी। उस समय अनेकों योजन विस्तृत उन भारी पर्वतसमूहोंसे पीड़ित हुई पृथ्वी व्याकुल हो गयी। महामते! तब पृथ्वी जो स्वर्णमय तेजसे युक्त, महान् बलसे सम्पन्न और नारायणस्वरूप था, उस दिव्य हिरण्मय अण्डको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे त्यागकर नीचेकी ओर जाने लगीं; क्योंकि वह उन भगवान्के तेजसे पीड़ित हो रही थी। तब भगवान् मधुसूदनने पृथ्वीको नीचे प्रवेश करती हुई देखकर लोककल्याण-भावनासे उसके उद्धारका विचार किया॥ १—१०॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>मत्तेज एषा वसुधा समासाद्य तपस्विनी।<br>रसातलं प्रविशति पङ्के गौरिव दुर्बला॥ ११ | श्रीभगवान्ने कहा— यह तपस्विनी पृथ्वी मेरे तेजको प्राप्तकर (धारण करनेमें असमर्थ हो) कीचड़में फँसी हुई दुबली गौकी भाँति रसातलमें प्रवेश कर रही है॥ ११॥ |
| पृथिव्युवाच<br>त्रिविक्रमायामितविक्रमाय<br>महावराहाय सुरोत्तमाय।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥ १२ | पृथ्वीने कहा— जो तीन पगमें पृथ्वीको नाप लेनेवाले वामनरूप, अमित पराक्रमी महावराहरूप, सुरश्रेष्ठ तथा लक्ष्मी, धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवाले हैं, ऐसे आपको नमस्कार है। देवश्रेष्ठ! आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये। |
| * अध्याय २४८ * | ९५३ |
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| तव देहाज्जगज्जातं पुष्करद्वीपमुत्थितम्।<br>ब्रह्माणमिह लोकानां भूतानां शाश्वतं विदुः॥ १३<br>तव प्रसादाद् देवोऽयं दिवं भुङ्क्ते पुरन्दरः।<br>तव क्रोधाद्द्वि बलवान् जनार्दन जितो बलिः॥ १४<br>धाता विधाता संहर्ता त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>मनुः कृतान्तोऽधिपतिर्ज्वलनः पवनो घनः॥ १५<br>वर्णाश्चाश्रमधर्माश्च सागरास्तरवोऽचलाः।<br>नद्यो धर्मश्च कामश्च यज्ञा यज्ञस्य च क्रियाः॥ १६<br>विद्या वेद्यं च सत्त्वं च ह्रीः श्रीः कीर्तिर्धृतिः क्षमा।<br>पुराणं वेदवेदाङ्गं सांख्ययोगौ भवाभवौ॥ १७<br>जङ्गमं स्थावरं चैव भविष्यं च भवच्च यत्।<br>सर्वं तच्च त्रिलोकेषु प्रभावोपहितं तव॥ १८<br>त्रिदशोदारफलदः स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवः।<br>सर्वलोकमनःकान्तः सर्वसत्त्वमनोहरः॥ १९<br>विमानानेकविटपस्तोयदाम्बुमधुस्रवः ।<br>दिव्यलोकमहास्कन्धः सत्यलोकप्रशाखवान्॥ २०<br>सागराकारनिर्यासो रसातलजलाश्रयः।<br>नागेन्द्रपादपोपेतो जन्तुपक्षिनिषेवितः॥ २१ | प्रभो! आपके शरीरसे जगत् उत्पन्न हुआ है, पुष्कर द्वीपकी उत्पत्ति हुई है और ब्रह्मा प्रकट हुए हैं, आप सभी लोकों और प्राणियोंके सनातन पुरुष माने जाते हैं। आपकी कृपासे ये देवराज इन्द्र स्वर्गका उपभोग कर रहे हैं। जनार्दन! आपके क्रोधसे बलवान् बलि जीता गया है। आप धाता, विधाता और संहर्ता हैं। आपमें समस्त जगत् प्रतिष्ठित है। मनु, प्रजापति, यम, अग्नि, पवन, मेघ, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, समुद्र, वृक्ष, पर्वत, नदियाँ, धर्म, काम, यज्ञ; यज्ञकी क्रियाएँ, विद्या, जाननेयोग्य अन्य बातें, जीवगण, लज्जा, ह्री, श्री, कीर्ति, धैर्य, क्षमा, पुराण, वेद, वेदाङ्ग, सांख्य, योग, जन्म, मरण, जंगम, स्थावर, भूत और भविष्यत्—ये सभी तीनों लोकोंमें आपके प्रभावसे आच्छादित हैं। आप देवताओंको उत्तम फल देनेवाले, स्वर्गकी रमणियोंके लिये सुन्दर पल्लवरूप, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाले, सभी जीवोंके मनके हरणकर्ता, विमानरूपी अनेक वृक्षोंसे युक्त, मेघोंके जलरूप मधु टपकानेवाले, दिव्य लोकरूप महान् स्कन्धवाले, सत्यलोकरूप शाखाओंसे युक्त, सागररूप रस, रसातलकी तरह जलके आश्रयस्थान, ऐरावतरूप वृक्षसे युक्त तथा जन्तुओं और पक्षियोंसे सुसेवित हैं॥ १२—२१॥ | | शीलाचारार्यगन्धस्त्वं सर्वलोकमयोद्रुमः।<br>द्वादशार्कमयद्वीपो रुद्रैकादशपत्तनः॥ २२<br>वस्वष्टाचलसंयुक्तस्त्रैलोक्याम्भोमहोदधिः ।<br>सिद्धसाध्योर्मिकलिलः सुपर्णानिलसेवितः॥ २३<br>दैत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगझषाकुलः।<br>पितामहमहाधैर्यः स्वर्गस्त्रीरत्नभूषितः॥ २४<br>धीश्रीह्रीकान्तिभिर्नित्यं नदीभिरुपशोभितः।<br>कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् ॥ २५ | आप शील, सदाचार और श्रेष्ठ गन्धसे युक्त, सर्वलोकमय वृक्ष, बारह आदित्योंसे युक्त द्वीप, ग्यारह रुद्ररूप नगर, आठों वसुरूप पर्वत, त्रिलोकीरूप जलसे परिपूर्ण महासागर, सिद्ध और साध्यरूप लहरोंसे युक्त, गरुडरूप वायुसे सेवित, दैत्यसमूहरूप महान् ग्राह, राक्षस और नागरूपी मछलियोंसे व्याप्त, ब्रह्मारूप महान् धैर्यसम्पन्न, स्वर्गकी अप्सरारूप रत्नसे विभूषित हैं। आप बुद्धि, लक्ष्मी, लज्जा और कान्तिरूपी नदियोंसे नित्य सुशोभित तथा कालके योगसे उत्पन्न होनेवाले महापर्वके समय वेगपूर्वक प्रयागमें गमन करनेवाले हैं। | | त्वं स्वयोगमहावीर्यो नारायण महार्णवः।<br>कालो भूत्वा प्रसन्नाभिरद्भिर्ह्लादयसे पुनः॥ २६ | नारायण! आप अपने योगरूपी महापराक्रमसे सम्पन्न महासागर हैं और पुनः आप ही काल बनकर निर्मल जलसे जगत्को आह्लादित करते हैं। | | त्वया सृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयैव प्रतिसंहृताः।<br>विशन्ति योगिनः सर्वे त्वामेव प्रतियोगिताः॥ २७ | आपने तीनों लोकोंकी सृष्टि की है और आपसे ही उनका संहार होता है। आपके द्वारा नियुक्त किये गये सभी योगी आपमें ही प्रविष्ट होते हैं। | | युगे युगे युगान्ताग्निः कालमेघो युगे युगे।<br>मम भारावताराय देव त्वं हि युगे युगे॥ २८ | देव! आप प्रत्येक युगमें प्रलयाग्नि और प्रत्येक युगमें प्रलयकालीन मेघ हैं तथा मेरा भार उतारनेके लिये आप प्रत्येक युगमें अवतीर्ण होते हैं। |
| ९५४ | * मत्स्यपुराण * |
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| त्वं हि शुक्लः कृतयुगे त्रेतायां चम्पकप्रभः।<br>द्वापरे रक्तसंकाशः कृष्णः कलियुगे भवान्॥ २९<br>वैवर्ण्यमभिधत्से त्वं प्राप्तेषु युगसंधिषु।<br>वैवर्ण्यं सर्वधर्माणामुत्पादयसि वेदवित्॥ ३०<br>भासि वासि प्रतपसि त्वं च पासि विचेष्टसे।<br>क्रुद्ध्यसि क्षान्तिमायासि त्वं दीपयसि वर्षसि॥ ३१<br>त्वं हास्यसि न निर्यासि निर्वापयसि जाग्रसि।<br>निःशेषयसि भूतानि कालो भूत्वा युगक्षये॥ ३२<br>शेषमात्मानमालोक्य विशेषयसि त्वं पुनः।<br>युगान्ताग्न्यवलीढेषु सर्वभूतेषु किञ्चन॥ ३३<br>यातेषु शेषो भवसि तस्माच्छेषोऽसि कीर्तितः।<br>च्यवनोत्पत्तियुक्तेषु ब्रह्मेन्द्रवरुणादिषु॥ ३४<br>यस्मान्न च्यवसे स्थानात्तस्मात् संकीर्त्यसेऽच्युतः।<br>ब्रह्माणमिन्द्रं च यमं रुद्रं वरुणमेव च॥ ३५<br>निगृह्य हरसे यस्माद् तस्माद्धरिरिहोच्यसे।<br>संतानयसि भूतानि वपुषा यशसा श्रिया॥ ३६<br>परेण वपुषा देव तस्माच्चासि सनातनः।<br>यस्माद् ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चोग्रतेजसः॥ ३७<br>न तेऽन्तं त्वधिगच्छन्ति तेनानन्तस्त्वमुच्यसे।<br>न क्षीयसे न क्षरसे कल्पकोटिशतैरपि॥ ३८<br>तस्मात् त्वमक्षरत्वाच्च अक्षरश्च प्रकीर्तितः।<br>विष्टब्धं यत्त्वया सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३९<br>जगद्विष्टम्भनाच्चैव विष्णुरेवेति कीर्त्यसे।<br>विष्टभ्य तिष्ठसे नित्यं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४०<br>यक्षगन्धर्वनगरं सुमहद्भूतपन्नगम्।<br>व्याप्तं त्वयैव विशता त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४१<br>तस्माद् विष्णुरिति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा।<br>नारा इत्युच्यते ह्यापो हृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४२<br>अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।<br>युगे युगे प्रनष्टां गां विष्णो विन्दसि तत्त्वतः॥ ४३<br>गोविन्देति ततो नाम्ना प्रोच्यसे ऋषिभिस्तथा।<br>हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तत्त्वज्ञानविशारदाः॥ ४४<br>ईशिता च त्वमेतेषां हृषीकेशस्तथोच्यसे। | आप कृतयुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें चम्पक-पुष्प-सदृश पीतवर्ण, द्वापरमें रक्तवर्ण और कलियुगमें श्यामवर्ण हो जाते हैं। वेदज्ञ! युग-संधियोंके प्राप्त होनेपर आप विवर्णताको धारण करते हैं और सभी धर्मोंमें विपरीतता उत्पन्न कर देते हैं। आप प्रकाशित होते, प्रवाहित होते, तपते, रक्षा करते और चेष्टा करते हैं। आप क्रोध करते, शान्ति धारण करते, उद्दीप्त करते और वर्षा करते हैं। आप हँसते, स्थिर रहते, मारते और जागते रहते हैं तथा प्रलयकालमें काल बनकर सभी जीवोंको निःशेष कर देते हैं॥ २२—३२॥<br><br>फिर अपनेको शेष बचा हुआ देखकर पुनः आप उसकी वृद्धि करते हैं। युगान्तकी अग्निमें सभी भूतोंके दग्ध हो जानेपर एकमात्र आप शेष रहते हैं, इसलिये आप 'शेष' नामसे पुकारे जाते हैं। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण आदि देवता उत्पत्ति और पतनसे युक्त हैं, किंतु आप अपने स्थानसे च्युत नहीं होते, इसलिये 'अच्युत' कहलाते हैं। चूँकि आप ब्रह्मा, इन्द्र, यम, रुद्र और वरुणका निग्रहपूर्वक हरण करते हैं, इसलिये यहाँ 'हरि' कहे जाते हैं। देव! आप अपने शरीर, यश, श्री और विराट् शरीरद्वारा सभी जीवोंका विस्तार करते हैं, इसलिये 'सनातन' हैं। चूँकि ब्रह्मा आदि देवगण और उग्र तेजस्वी मुनिगण आपका अन्त नहीं जान पाते, इसीलिये आप 'अनन्त' कहे जाते हैं। सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी न तो आप क्षीण होते हैं और न नष्ट होते हैं, इसलिये विनाशरहित होनेके कारण आप 'अक्षर' कहे गये हैं। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्को स्तम्भित किये रहते हैं, इसीलिये जगत्का विष्टम्भन करनेके कारण 'विष्णु' कहे जाते हैं। आप सचराचर त्रिलोकीको नित्य अवरुद्ध करके स्थित रहते हैं तथा आप ही यक्षों एवं गन्धर्वोंके नगरोंसे सम्पन्न और महान् नागोंसे युक्त चराचरसहित त्रिलोकीमें प्रवेश करके उसे व्याप्त किये रहते हैं, इसीलिये स्वंय ब्रह्माने आपको 'विष्णु' नामसे अभिहित किया है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने जलका नाम 'नारा' कहा है और वह पूर्वकालमें आपका निवासस्थान था, इसीसे आप 'नारायण' कहे जाते हैं। विष्णो! प्रत्येक युगमें नष्ट हुई गोरूपिणी पृथ्वीको तत्त्वतः आप ही प्राप्त करते हैं, इसीलिये ऋषिगण आपको 'गोविन्द' नामसे पुकारते हैं। तत्त्वज्ञानमें निपुणजन इन्द्रियोंको हृषीक कहते हैं और आप उन इन्द्रियोंके शासक हैं, अतः 'हृषीकेश' कहे जाते हैं॥ ३३—४४ ½॥ |
| * अध्याय २४८ * | ९५५ |
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| वसन्ति त्वयि भूतानि ब्रह्मादीनि युगक्षये ॥ ४५<br>त्वं वा वससि भूतेषु वासुदेवस्तथोच्यसे ।<br>संकर्षयसि भूतानि कल्पे कल्पे पुनः पुनः ॥ ४६<br>ततः संकर्षणः प्रोक्तस्तत्त्वज्ञानविशारदैः ।<br>प्रतिव्यूहेन तिष्ठन्ति सदेवासुरराक्षसाः ॥ ४७<br>प्रविद्युः सर्वधर्माणां प्रद्युम्नस्तेन चोच्यसे ।<br>निरोद्धा विद्यते यस्मान्न ते भूतेषु कश्चन ॥ ४८<br>अनिरुद्धस्ततः प्रोक्तः पूर्वमेव महर्षिभिः ।<br>यत् त्वया धार्यते विश्वं त्वया संह्रियते जगत् ॥ ४९<br>त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ।<br>यत् त्वया धार्यते किंचित् तेजसा च बलेन च ॥ ५०<br>मया हि धार्यते पश्चान्नाधृतं धारये त्वया ।<br>न हि तद् विद्यते भूतं त्वया यन्नात्र धार्यते ॥ ५१<br>त्वमेव कुरुषे देव नारायण युगे युगे ।<br>मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ ५२<br>तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलतलं गताम् ।<br>त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम् ॥ ५३<br>दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः ।<br>त्वामेव शरणं नित्यमुपयामि सनातनम् ॥ ५४<br>तावन्मेऽस्ति भयं देव यावन्न त्वां ककुद्मिनम् ।<br>शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ॥ ५५<br>उपमानं न ते शक्ताः कर्तुं सेन्द्रा दिवौकसः ।<br>तत्त्वं त्वमेव तद् वेत्सि निरुत्तरमतः परम् ॥ ५६ | युगान्तके समय ब्रह्मा आदि सभी प्राणी आपमें निवास करते हैं और आप प्राणियोंमें निवास करते हैं, इसीलिये आप ‘वासुदेव’ कहलाते हैं। प्रत्येक कल्पमें आप पुनः-पुनः प्राणियोंको आकर्षित करते हैं, इसीलिये तत्त्वज्ञानविशारदोंने आपको ‘संकर्षण’ कहा है। आपके प्रभावसे देवता, असुर और राक्षस अपने-अपने व्यूहोंमें स्थित रहते हैं तथा आप सभी धर्मोंके विशेषज्ञ हैं, अतः ‘प्रद्युम्न’ नामसे कहे जाते हैं। चूँकि सभी प्राणियोंमें कोई भी आपका निरोध करनेवाला नहीं है, इसीलिये महर्षियोंने पहलेसे ही आपका ‘अनिरुद्ध’ नाम रख दिया है। आप विश्वको धारण करते हैं, आप ही जगत्का संहार भी करते हैं, आप ही प्राणियोंको धारण करते हैं और आप ही भुवनका पालन-पोषण करते हैं। आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको पीछे मैं भी धारण करती हूँ। आपके द्वारा धारण न की हुई वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जिसे आपने इस जगत्में धारण न किया हो। नारायण देव! आप ही प्रत्येक युगमें संसारकी कल्याण-भावनासे मेरे ऊपर पड़नेवाले असहनीय भारको दूर करते हैं। मैं आपके ही तेजसे आक्रान्त हो रसातलमें पहुँच गयी हूँ। सुरश्रेष्ठ! मैं आपकी शरणागत हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुरात्मा दानवों एवं राक्षसोंसे पीड़ित होकर नित्य आप सनातनकी ही शरणमें जाती हूँ। देव! मेरे लिये भय तभीतक रहता है, जबतक मैं मनसे आप ककुद्मीकी शरणमें नहीं आती हूँ। मैंने सैकड़ों बार ऐसा देखा है। इन्द्रसहित समस्त देवगण आपकी समानता करनेमें समर्थ नहीं हैं। आप ही उस परम तत्त्वके ज्ञाता हैं। इसके बाद अब मुझे कुछ नहीं कहना है॥ ४५–५६॥ | | शौनक उवाच<br>ततः प्रीतः स भगवान् पृथिव्यै शार्ङ्गचक्रधृक् ।<br>काममस्या यथाकाममभिपूरितवान् हरिः ॥ ५७<br>अब्रवीच्च महादेवि माधवीयं स्तवोत्तमम् ।<br>धारयिष्यति यो मर्त्यो नास्ति तस्य पराभवः ॥ ५८<br>लोकान् निष्कल्मषांश्चैव वैष्णवान् प्रतिपत्स्यते ।<br>एतदाश्चर्यसर्वस्वं माधवीयं स्तवोत्तमम् ॥ ५९<br>अधीतवेदः पुरुषो मुनिः प्रीतमना भवेत् ॥ ६०<br>मा भैर्धरणि कल्याणि शान्तिं व्रज ममाग्रतः ।<br>एष त्वामुचितं स्थानं प्रापयामि मनीषितम् ॥ ६१ | शौनकजीने कहा— तदनन्तर शार्ङ्गधनुष और चक्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने पृथ्वीपर प्रसन्न होकर उसके यथेष्ट मनोरथको पूर्ण कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने कहा—‘महादेवि! जो मनुष्य इस उत्तम माधवीय स्तोत्रको धारण करेगा, उसका कभी पराभव नहीं होगा। वह पापरहित वैष्णव-लोकोंको प्राप्त होगा। यह उत्तम माधवीय स्तोत्र सभी आश्चर्योंसे परिपूर्ण है। वेदाध्यायी पुरुष और मुनि इससे प्रसन्न हो जाते हैं। धरणि! तुम भय मत करो। कल्याणि! तुम मेरे सामने शान्ति धारण करो। मैं तुम्हें मनसेप्सित उचित स्थान प्राप्त कराऊँगा’॥ ५७–६१॥ |
| ९५६ | * मत्स्यपुराण * |
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| शौनक उवाच | **शौनकजीने कहा—**तदनन्तर भगवान् विष्णुने मनमें दिव्य स्वरूपका चिन्तन किया और सोचने लगे कि मैं कौन-सा रूप धारणकर इस पृथ्विका उद्धार करूँ। ऐसा सोचते हुए उन्हें जलक्रीडाकी रुचि उत्पन्न हो गयी, इसलिये उन्होंने शूकरका शरीर धारण किया। वह रूप सभी प्राणियोंके लिये अजेय, वाङ्मय, ब्रह्मस्वरूप, सौ योजनोंमें विस्तृत, उससे दुगुना ऊँचा, नील मेघके समान कान्तिमान्, मेघोंकी गड़गड़ाहटके सदृश शब्दसे युक्त, पर्वतके समान सुदृढ़, भयंकर, श्वेत एवं तीखे अग्रभागवाले दाढ़ोंसे युक्त, बिजली एवं अग्निकी भाँति कान्तिमान्, सूर्यके समान तेजस्वी, मोटे एवं चौड़े कंधेसे सुशोभित, गर्वीले सिंहकी-सी चालवाला, मोटे एवं ऊँचे कटिभागसे सम्पन्न और वृषभके लक्षणोंसे युक्त था। तब अजेय भगवान् विष्णुने ऐसा विशाल वराह स्वरूप धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन महातपस्वी भगवान् वराहके वेद चारों पैर थे, यज्ञ-स्तम्भ उनकी दाढ़ें थीं, यज्ञ उनके दाँत थे, यज्ञका कुण्ड उनका मुख था, अग्नि उनकी जीभ थी, कुश उनके रोएँ थे, ब्रह्म उनका मस्तक था, दिन और रात उनके नेत्र थे, वेदोंके छः अङ्ग कानके आभूषण थे, घृताहुति उनकी नासिका थी, स्रुवा उनका थूथुन था, सामवेदका उच्चस्वर शब्द था, वे सत्य और धर्मसे युक्त, श्रीसम्पन्न और कर्मरूप पराक्रमसे सत्कृत थे। प्रायश्चित्त उनके भीषण नख और पशुगण जानु भाग थे। यज्ञ उनकी आकृति थी। उद्गीथद्वारा किया गया हवन उनका लिङ्ग था, बीज और ओषधियाँ महान् फल थीं, वायु उनका अन्तरात्मा, यज्ञ अस्थिविकार, सोमरस रक्त, वेद कंधे और हवि गन्ध था। वे भगवान् हव्य तथा कव्यके विभाग करनेवाले थे। प्राग्वंश उनका शरीर था। वे कान्तिमान् और अनेकों दीक्षाओंसे दीक्षित थे। दक्षिणा उनका हृदय था, वे परम योगी और महान् यज्ञमय महापुरुष थे। उपाकर्म उनके होंठोंके फलक, प्रवर्ग्य सम्पूर्ण आभूषण, समस्त वेद गमन-मार्ग और गोपनीय उपनिषदें उनकी आसन थीं। छाया उनकी पत्नी थी, वे मणि-शृङ्गके समान ऊँचे थे। ऐसे वराहभगवान्ने रसातलमें जाकर डूबी हुई पृथ्वीका लोकहितकी कामनासे अपने दाढ़ोंके अग्रभागपर रखकर उद्धार किया॥ ६२—७४॥ | | ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत्।<br>किं नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं धरामिमाम्॥ ६२<br>जलक्रीडारुचिस्तस्माद्वाराहं वपुरास्थितः।<br>अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्म संस्थितम्॥ ६३<br>शतयोजनविस्तीर्णमुच्छ्रितं द्विगुणं ततः।<br>नीलजीमूतसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम्॥ ६४<br>गिरिसंहननं भीमं श्वेततीक्ष्णाग्रदंष्ट्रिणम्।<br>विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ।<br>पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्तशार्दूलगामिनम्॥ ६५<br>पीनोन्नतकटीदेशे वृषलक्षणपूजितम्।<br>रूपमास्थाय विपुलं वाराहमजितो हरिः॥ ६६<br>पृथिव्युद्धरणायैव प्रविवेश रसातलम्।<br>वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः॥ ६७<br>अग्निजिह्वो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः।<br>अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूषणः॥ ६८<br>आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान्।<br>सत्यधर्ममयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः॥ ६९<br>प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्मखाकृतिः।<br>उद्गीथहोमलिङ्गोऽथ बीजौषधिमहाफलः॥ ७०<br>वाय्वन्तरात्मा यज्ञास्थिविकृतिः सोमशोणितः।<br>वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान्॥ ७१<br>प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः।<br>दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान्॥ ७२<br>उपाकर्मौष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः।<br>नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः।<br>छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः॥ ७३<br>रसातलतले मग्नां रसातलतलं गताम्।<br>प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्राग्रेणोज्जहार ताम्॥ ७४ | |
* अध्याय २४९ * ९५७
| ततः स्वस्थानमानीय वराहः पृथिवीधरः।<br>मुमोच पूर्वं मनसा धारितां च वसुंधराम्॥ ७५<br>ततो जगाम निर्वाणं मेदिनी तस्य धारणात्।<br>चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे॥ ७६<br>एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना।<br>उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुगता पुरा॥ ७७<br>अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया।<br>पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः॥ ७८<br>रसां गतामेवमचिन्त्यविक्रमः<br>सुरोत्तमः प्रवरवराहरूपधृक्।<br>वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया<br>समुद्धरद्धरणिमतुल्यपौरुषः ॥ ७९ | इसके बाद पृथिवीको धारण करनेवाले वराहभगवान्ने पहले मनसे धारण की हुई वसुंधराको अपने स्थानपर लाकर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीने भी शान्ति-लाभ किया और उन कल्याणकारी भगवान्को नमस्कार किया। इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान्ने प्राणियोंके हित करनेकी इच्छासे यज्ञवराहरूप धारणकर सागरके जलमें निमग्न हुई पृथ्वीदेवीका उद्धार किया था। इस प्रकार पृथ्वीका उद्धार कर कमलनयन भगवान् विष्णुने जगत्की स्थापनाके लिये पृथ्वीको विभक्त करनेका विचार किया। इस प्रकार अचिन्त्य पराक्रमी, अनुपम पुरुषार्थी, सुरश्रेष्ठ, श्रेष्ठ वराहका रूप धारण करनेवाले भगवान् वृषाकपिने* रसातलमें गयी हुई पृथ्वीका बलपूर्वक अपनी एक दाढ़द्वारा उद्धार किया था॥ ७५-७९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावो नामाष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४८॥
दो सौ उनचासवाँ अध्याय
अमृत-प्राप्तिके लिये समुद्र-मन्थनका उपक्रम और वारुणी (मदिरा)-का प्रादुर्भाव
| ऋषय ऊचुः<br>नारायणस्य माहात्म्यं श्रुत्वा सूत यथाक्रमम्।<br>न तृप्तिर्जायतेऽस्माकमतः पुनरिहोच्यताम्॥ १<br>कथं देवा गताः पूर्वममरत्वं विचक्षणाः।<br>तपसा कर्मणा वापि प्रसादात् कस्य तेजसा॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! भगवान् नारायणके माहात्म्यको क्रमशः सुनकर हमलोगोंकी तृप्ति नहीं हो रही है, अतः उसे पुनः बतलाइये। प्राचीनकालमें चतुर देवतालोग तपस्या या कर्मसे अथवा किस देवताकी कृपासे किस प्रकार अमरत्वको प्राप्त हुए थे?॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>यत्र नारायणो देवो महादेवश्च शूलधृक्।<br>तत्रामरत्वे सर्वेषां सहायौ तत्र तौ स्मृतौ॥ ३<br>पुरा देवासुरे युद्धे हताश्च शतशः सुरैः।<br>पुनः संजीवनीं विद्यां प्रयोज्य भृगुनन्दनः॥ ४<br>जीवापयति दैत्येन्द्रान् यथा सुप्तोत्थितानिव।<br>तस्य तुष्टेन देवेन शंकरेण महात्मना॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! जहाँ भगवान् विष्णु और शूलधारी शंकरजी वर्तमान हैं, वहाँ वे ही दोनों सभी देवताओंकी अमरत्व-प्राप्तिमें सहायक माने गये हैं। प्राचीनकालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंद्वारा मारे गये सैकड़ों राक्षसोंको भृगुनन्दन शुक्राचार्य संजीवनी-विद्याका प्रयोग करके जीवित कर देते थे। तब वे दैत्येन्द्र फिर सोकर उठे हुएकी तरह उठकर लड़ने लगते थे। परम कान्तिमती मृत-संजीवनी विद्या शुक्राचार्यको उनपर प्रसन्न हुए भगवान् शंकरने दी थी। |
* निरुक्तादिके अनुसार वृषाकपिका अर्थ महादेव, वाराहावतार विष्णु तथा (हनुमान्) आदि हैं। निरुक्त एवं अन्य वैदिक तथा व्याकरणादि ग्रन्थोंके अनुसार इनकी पत्नी 'वृषाकपायी' कही गयी हैं।
९५८ * मत्स्यपुराण *
| मृतसंजीवनी नाम विद्या दत्ता महाप्रभा।<br>तां तु माहेश्वरीं विद्यां महेश्वरमुखोद्गताम् ॥ ६<br>भार्गवे संस्थितां दृष्ट्वा मुमुदुः सर्वदानवाः।<br>ततोऽमरत्वं दैत्यानां कृतं शुक्रेण धीमता ॥ ७<br>या नास्ति सर्वलोकानां देवानां यक्षरक्षसाम्।<br>न नागानामृषीणां च न च ब्रह्मेन्द्रविष्णुषु ॥ ८<br>तां लब्ध्वा शंकराच्छुक्रः परां निर्वृतिमागतः।<br>ततो देवासुरो घोरः समरः सुमहानभूत् ॥ ९<br>तत्र देवैर्हतान् दैत्याञ्छुक्रो विद्याबलेन च।<br>उत्थापयति दैत्येन्द्रॉल्लीलयैव विचक्षणः॥ १०<br>एवंविधेन शक्रस्तु बृहस्पतिरुदारधीः।<br>हन्यमानास्ततो देवाः शतशोऽथ सहस्रशः॥ ११<br>विषण्णवदनाः सर्वे बभूवुर्विकलेन्द्रियाः।<br>ततस्तेषु विषण्णेषु भगवान् कमलोद्भवः।<br>मेरुपृष्ठे सुरेन्द्राणामिदमाह जगत्पतिः॥ १२<br>ब्रह्मोवाच<br>देवाः शृणुत मद्वाक्यं तत्तथैव निरूप्यताम्।<br>क्रियतां दानवैः सार्धं सख्यमैत्राभिधीयताम् ॥ १३<br>क्रियताममृतोद्योगो मथ्यतां क्षीरवारिधिः।<br>सहायं वरुणं कृत्वा चक्रपाणिर्विबोध्यताम् ॥ १४<br>मन्थानं मन्दरं कृत्वा शेषनेत्रेण वेष्टितम्।<br>दानवेन्द्रो बलिः स्वामी स्तोककालं निवेश्यताम् ॥ १५<br>प्रार्थ्यतां कूर्मरूपश्च पाताले विष्णुरव्ययः।<br>प्रार्थ्यतां मन्दरः शैलो मन्थकार्यं प्रवर्त्यताम् ॥ १६<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देवा जग्मुर्दानवमन्दिरम्।<br>अलं विरोधेन वयं भृत्यास्तव बलेऽधुना ॥ १७<br>क्रियताममृतोद्योगो व्रियतां शेषनेत्रकम्।<br>त्वया चोत्पादिते दैत्य अमृतेऽमृतमन्थने ॥ १८<br>भविष्यामोऽमराः सर्वे त्वत्प्रसादान्न संशयः।<br>एवमुक्तस्तदा देवैः परितुष्टः स दानवः॥ १९<br>यथा वदत हे देवास्तथा कार्यं मयाधुना।<br>शक्तोऽहमेक एवात्र मथितुं क्षीरवारिधिम् ॥ २० | महेश्वरके मुखसे निकली हुई माहेश्वरी विद्याको शुक्राचार्यमें संस्थित देखकर दानवगण अतिशय प्रमुदित थे। इस विद्याके प्रभावसे बुद्धिमान् शुक्राचार्यने राक्षसोंको अमर कर दिया था। जो विद्या न तो सम्पूर्ण लोकों, देवों, यक्षों और राक्षसोंमें थी, न नागों और ऋषियोंमें तथा न ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णुमें थी, उसे शंकरजीसे प्राप्तकर शुक्र परम संतुष्ट थे। इसके बाद देवताओं और राक्षसोंमें महान् भीषण युद्ध छिड़ गया। उसमें देवताओंद्वारा मारे गये दैत्येन्द्रोंको परम निपुण आचार्य शुक्र अपनी विद्याके बलसे देखते-ही-देखते तुरंत जीवित कर देते थे। इस प्रकार सैकड़ों-हजारों देवताओंको मारा जाता हुआ देखकर इन्द्र, उदारहृदय बृहस्पति तथा सभी देवताओंके मुख सूख गये और उनकी इन्द्रियाँ विकल हो गयीं। इस प्रकार उनके चिन्तित होनेपर कमलोद्भव जगत्पति भगवान् ब्रह्माने सुमेरु पर्वतपर अवस्थित देवताओंसे इस प्रकार कहा॥ ३—१२॥<br><br>ब्रह्माजी बोले—देवगण! आपलोग मेरी बात सुनिये और उसके अनुसार काम कीजिये। इस कार्यमें आप लोग दानवोंके साथ मित्रता कर लें और अमृत-प्राप्तिके लिये उपाय करें। इसके लिये चक्रपाणि भगवान् विष्णुको उद्बोधित कीजिये और वरुणको सहायक तथा शेषनागरूपी रस्सीसे परिवेष्टित मन्दराचलको मथानी बनाकर क्षीरसमुद्रका मन्थन कीजिये। थोड़े समयके लिये दानवेन्द्र बलिको अध्यक्षरूपमें नियुक्त कर दीजिये। पातालमें स्थित कूर्मरूप अव्यय भगवान् विष्णुकी और मन्दराचलकी प्रार्थना कीजिये। तत्पश्चात् समुद्र-मन्थनका कार्य प्रारम्भ कीजिये। उस कथनको सुनकर देवगण दानवराजके महलमें पहुँचे और कहने लगे—'बले! अब विरोध बंद कीजिये, हमलोग तो आपके भृत्य हैं। आप अमृत-प्राप्तिके लिये उद्योग करें और शेषनागको रस्सीके रूपमें वरण करें। दैत्य! अमृतमन्थनरूप कार्यमें आपके द्वारा अमृतके उत्पन्न हो जानेपर आपकी कृपासे हम सभी लोग निःसंदेह अमर हो जायेंगे।' देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दानवराज बलि उस समय प्रसन्न हो गया और कहने लगा—'देवगण! जैसा आपलोग कह रहे हैं, मुझे इस समय वैसा ही करना चाहिये। मैं तो अकेला ही क्षीरसागरका |
- अध्याय २४९ * ९५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहरिष्येऽमृतं दिव्यममृतत्वाय वोऽधुना।<br>सुदूरादाश्रयं प्राप्तान् प्रणतानपि वैरिणः॥ २१<br>यो न पूजयते भक्त्या प्रेत्य चेह विनश्यति।<br>पालयिष्यामि वः सर्वानधुना स्नेहमास्थितः॥ २२<br>एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रो देवैः सह ययौ तदा।<br>मन्दरं प्रार्थयामास सहायत्वे धराधरम्॥ २३<br>मन्था भव त्वमस्माकमधुनामृतमन्थने।<br>सुरासुराणां सर्वेषां महत्कार्यमिदं यतः॥ २४<br>तथेति मन्दरः प्राह यद्याधारो भवेन्मम।<br>यत्र स्थित्वा भ्रमिष्यामि मथिष्ये वरुणालयम्॥ २५<br>कल्प्यतां नेत्रकार्ये यः शक्तः स्याद् भ्रमणे मम।<br>ततस्तु निर्गतौ देवौ कूर्मशेषौ महाबलौ॥ २६<br>विष्णोर्भागौ चतुर्थांशाद्धरण्या धारणे स्थितौ।<br>ऊचतुर्गर्वसंयुक्तं वचनं शेषकच्छपौ॥ २७ | मन्थन करनेमें समर्थ हूँ। इस समय मैं आपलोगोंकी अमरताके निमित्त दिव्य अमृत ले आऊँगा। जो सुदूरसे आश्रयके लिये आये हुए शरणागत वैरियोँको भक्तिपूर्वक सम्मानित नहीं करता, उसका यह लोक और परलोक—दोनों नष्ट हो जाते हैं। इस समय मैं आप सभी लोगोंकी स्नेहपूर्वक रक्षा करूँगा।' ऐसा कहकर दैत्येन्द्र बलि देवताओंके साथ तुरंत चल पड़ा और सहायताके लिये मन्दराचलसे प्रार्थना करते हुए बोला—'मन्दर! चूँकि इस समय हम सभी देवताओं और असुरोंका यह महान् कार्य उपस्थित हो गया है, अतः इस अमृत-मन्थनके कार्यमें तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचलने कहा—'यदि मुझे कोई आधार मिले तो मुझे स्वीकार है जिसपर स्थित होकर मैं भ्रमण करूँगा और वरुणालयको मथ डालूँगा। साथ ही मेरे भ्रमण करते समय जो समर्थ हो सके, ऐसा किसीको नेतीके कार्यके लिये चुनिये।' तदनन्तर महाबली कूर्म और शेषनाग—दोनों देवता पातालसे ऊपर आये। ये दोनों भगवान् विष्णुके चतुर्थांश भाग हैं और पृथ्वीको धारण करनेके लिये नियुक्त हैं। तब शेष और कच्छप गर्वपूर्ण वचन बोले॥ १३—२७॥ |
| कूर्म उवाच<br>त्रैलोक्यधारणेनापि न ग्लानिर्मम जायते।<br>किमु मन्दरकात् क्षुद्राद् गुटिकासंनिभादिह॥ २८ | कूर्मने कहा—मुझे तो इस त्रिलोकीको धारण करनेपर भी थकावट नहीं होती तो भला इस कार्यमें गुटिकाके समान क्षुद्र मन्दरको धारण करनेकी क्या बात है?॥ २८॥ |
| शेष उवाच<br>ब्रह्माण्डवेष्टनेनापि ब्रह्माण्डमथनेन वा।<br>न मे ग्लानिर्भवेद् देहे किमु मन्दरवर्तने॥ २९ | शेषनागने कहा—जब समस्त ब्रह्माण्डका वेष्टन बनने तथा उसका मन्थन करनेसे मेरे शरीरमें शिथिलता नहीं आती तो मन्दरके घुमानेसे कौन-सा कष्ट होगा? |
| तत उत्पाट्य तं शैलं तत्क्षणात् क्षीरसागरे।<br>चिक्षेप लीलया नागः कूर्मश्चाधःस्थितस्तदा॥ ३०<br>निराधारं यदा शैलं न शेकुर्देवदानवाः।<br>मन्दरभ्रामणं कर्तुं क्षीरोदमथने तथा॥ ३१<br>नारायणनिवासं ते जग्मुर्बलिसमन्विताः।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव जनार्दनः॥ ३२<br>तत्रापश्यन्त तं देवं सितपद्मप्रभं शुभम्।<br>योगनिद्रासुनिरतं पीतवाससमच्युतम्॥ ३३<br>हारकेयूरनद्धाङ्गमहिपर्यङ्कसंस्थितम् ।<br>पादपद्मेन पद्मायाः स्पृशन्तं नाभिमण्डलम्॥ ३४ | ऐसा कहकर नागने लीलापूर्वक उसी क्षण उस मन्दराचलको उखाड़कर क्षीरसागरमें डाल दिया। उस समय कूर्म उसके नीचे स्थित हुए। किंतु क्षीरसमुद्रका मन्थन आरम्भ होनेपर जब देवता और दानव उस आधारशून्य मन्दराचलको घुमानेमें समर्थ न हो सके, तब वे बलिको साथ लेकर भगवान् नारायणके निवासस्थानपर गये, जहाँ देवाधिदेव भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ उन्होंने श्वेत कमलके समान कान्तियुक्त एवं कल्याणकारी भगवान् अच्युतको देखा, जिनके शरीरपर पीताम्बर झलक रहा था, जो योगनिद्रामें निमग्न थे, जिनका शरीर हार और केयूरसे विभूषित था, जो शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे और अपने चरणकमलसे लक्ष्मीके नाभिमण्डलका स्पर्श |