भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय १३९ *४९७

एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय

दानवराज मयका दानवोंको समझा-बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
तारकाख्ये हते युद्धे उत्सार्य प्रमथान् मयः।<br>उवाच दानवान् भूयो भूयः स तु भयावृतान्॥ १<br>भोऽसुरेन्द्राधुना सर्वे निबोधध्वं प्रभाषितम्।<br>यत् कर्तव्यं मया चैव युष्माभिश्च महाबलैः॥ २<br>पुष्यं समेष्यते काले चन्द्रश्चन्द्रनिभाननाः।<br>यदैकं त्रिपुरं सर्वं क्षणमेकं भविष्यति॥ ३<br>कुरुध्वं निर्भयाः काले पिशुनांशंसितेन च।<br>स कालः पुष्ययोगस्य पुरस्य च मया कृतः॥ ४<br>काले तस्मिन् पुरे यस्तु सम्भावयति संहतिम्।<br>स एनं कारयेच्चूर्णं बलिनैकेषुणा सुरः॥ ५<br>यो वः प्राणो बलं यच्च या च वो वैरिताऽसुराः।<br>तत् कृत्वा हृदये चैव पालयध्वमिदं पुरम्॥ ६<br>महेश्वररथं ह्येकं सर्वप्राणेन भीषणम्।<br>विमुखीकुर्वतात्यर्थं यथा नोत्सृजते शरम्॥ ७<br>तत एवं कृतेऽस्माभिस्त्रिपुरस्यापि रक्षणे।<br>प्रतीक्षिष्यन्ति विवशाः पुष्ययोगं दिवौकसः॥ ८ऋषियो! इस प्रकार युद्धभूमिमें तारकासुरके मारे जानेपर दानवराज मय प्रमथोंको खदेड़कर भयभीत हुए दानवोंको सब तरहसे सान्त्वना देते हुए बोला—'अरे असुरेन्द्रो! इस समय तुम सभी महाबली दानवोंका जो कर्तव्य है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सब लोग ध्यान देकर सुनो। चन्द्रवदन दानवो! जिस समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रसे समन्वित होंगे, उस समय एक क्षणके लिये तीनों पुर एकमें मिल जायँगे। यह चन्द्रमाका पुष्य नक्षत्रसे सम्बन्ध होनेपर त्रिपुरके सम्मिलित होनेका काल मैंने ही निर्धारित कर रखा है, अतः उस समय तुमलोग निर्भय होकर नारदजीद्वारा बतलाये गये उपायोंका प्रयोग करो; क्योंकि उस समय जो कोई देवता त्रिपुरोंके सम्मिलित होनेका पता लगा लेगा, वह एक ही सुदृढ बाणसे इस त्रिपुरको चूर्ण कर डालेगा। इसलिये असुरो! तुमलोगोंमें जितनी प्राणशक्ति है, जितना बल है और देवताओंके साथ जितना वैर-विद्वेष है, वह सब हृदयमें विचारकर इस त्रिपुरकी रक्षामें जुट जाओ। तुमलोग एकमात्र महेश्वरके भीषण रथको पूरी शक्ति लगाकर ऐसा विमुख कर दो, जिससे वे बाण न छोड़ सकें। इस प्रकार हमलोगोंद्वारा त्रिपुरकी रक्षा सम्पन्न कर लेनेपर देवताओंको विवश होकर पुनः आनेवाले पुष्ययोगकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।'
निशम्य तन्मयस्यैकं दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>मुहुः सिंहरवं कृत्वा मयमूचुर्यमोपमाः॥ ९<br>प्रयत्नेन वयं सर्वे कुर्मस्तव प्रभाषितम्।<br>तथा कुर्मो यथा रुद्रो न मोक्ष्यति पुरे शरम्॥ १०<br>अद्य यास्यामः संग्रामे तद्रुद्रस्य जिघांसवः।<br>कथयन्ति दितेः पुत्रा हृष्टा भिन्नतनूरुहाः॥ ११<br>कल्पं स्थास्यति वा खस्थं त्रिपुरं शाश्वतं ध्रुवम्।<br>अदानवं वा भविता नारायणपदत्रयम्॥ १२<br>वयं न धर्मं हास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान्।<br>अदैवतमदैत्यं वा लोकं द्रक्ष्यन्ति मानवाः॥ १३मयका ऐसा कथन सुनकर यमराजके समान भीषण त्रिपुरनिवासी दानव बारम्बार सिंहनाद कर मयसे बोले—'राजन्! हम सब लोग प्रयत्नपूर्वक आपके कथनका पालन करेंगे और ऐसा कर्म कर दिखायेंगे, जिससे रुद्र त्रिपुरपर बाण नहीं छोड़ सकेंगे। हमलोग आज ही उस रुद्रका वध करनेके लिये संग्रामभूमिमें जा रहे हैं। या तो हमारा त्रिपुर कल्पपर्यन्त निश्चलरूपसे सर्वदाके लिये आकाशमें स्थिर रहेगा अथवा नारायणके तीन पदकी तरह यह दानवोंसे खाली हो जायगा। आप हमलोगोंको जिस कार्यमें नियुक्त कर देंगे, हमलोग उस कर्तव्यका कदापि त्याग नहीं करेंगे। आज मानव जगत्को देवता अथवा दैत्यसे रहित ही देखेंगे।'

४९८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृतहिन्दी
इति सम्मन्त्र्य हृष्टास्ते पुरान्तर्विबुधारयः।<br>प्रदोषे मुदिता भूत्वा चेरुर्मन्मथचारताम्॥ १४॥पुलकित शरीरवाले दैत्य हर्षपूर्वक इस प्रकार कह रहे थे। इस प्रकार वे देवशत्रु दानव त्रिपुरके भीतर मन्त्रणा करके सायंकाल होनेपर प्रसन्न होकर स्वच्छन्दाचारमें प्रसक्त हो गये॥ १—१४॥
मुहुर्मुक्त्तोदयो भ्रान्त उदयाग्रं महामणिः।<br>तमांस्युत्सार्य भगवांश्चन्द्रो जृम्भति सोऽम्बरम्॥ १५॥<br>कुमुदालङ्कृते हंसो यथा सरसि विस्तृते।<br>सिंहो यथा चोपविष्टो वैदूर्य्यशिखरे महान्॥ १६॥<br>विष्णोर्यथा च विस्तीर्णे हारश्चोरसि संस्थितः।<br>तथावगाढे नभसि चन्द्रोऽत्रिनयनोद्भवः।<br>भ्राजते भ्राजयंल्लोकात्सृजञ्ज्योत्स्नारसं बलात्॥ १७॥उसी समय बारम्बार मोतीके निकलनेका भ्रम उत्पन्न करनेवाले एवं महामणिके समान भगवान् चन्द्रमा उदयाचलके शिखरपर दीख पड़े। वे अन्धकारका विनाश करके आकाशमण्डलमें आगे बढ़ रहे थे।
शीतांशावुदिते चन्द्रे ज्योत्स्नापूर्णे पुरेऽसुराः।<br>प्रदोषे ललितं चक्रुर्गृहमात्मानमेव च॥ १८॥<br>रथ्यासु राजमार्गेषु प्रासादेषु गृहेषु च।<br>दीपांश्चम्पकपुष्पाभा नाल्यस्नेहप्रदीपिताः॥ १९॥<br>तदा मठेषु ते दीपाः स्नेहपूर्णाः प्रदीपिताः।<br>गृहाणि वसुमन्त्येषां सर्वरत्नमयानि च।<br>ज्वलतोऽदीपयन् दीपांचन्द्रोदय इव ग्रहाः॥ २०॥<br>चन्द्रांशुभिर्भसमानमन्तर्दीपैः सुदीपितम्।<br>उपद्रवैः कुलमिव पीयते त्रिपुरे तमः॥ २१॥उस समय जैसे कुमुदिनीसे सुशोभित विशाल सरोवरमें हंस, वैदूर्यके शिखरपर बैठा हुआ महान् सिंह और भगवान् विष्णुके विस्तीर्ण वक्षःस्थलपर लटकता हुआ हार शोभा पाता है, उसी तरह महर्षि अत्रिके नेत्रसे उत्पन्न हुए चन्द्रमा अथाह आकाशमें स्थित होकर
तस्मिन् पुरे वै तरुणप्रदोषे<br>चन्द्राट्टहासे तरुणप्रदोषे।<br>रत्यर्थिनो वै दनुजा गृहेषु<br>सहाङ्गनाभिः सुचिरं विरेमुः॥ २२॥<br>विनोदिता ये तु वृषध्वजस्य<br>पञ्चेष्ववस्ते मकरध्वजेन।<br>तत्रासुरेष्वासुरपुङ्गवेषु<br>स्वाङ्गाङ्गनाः स्वेदयुता बभूवुः॥ २३॥<br>कलप्रलापेषु च दानवीनां<br>वीणाप्रलापेषु च मूर्च्छितांस्तु।<br>मत्तप्रलापेषु च कोकिलानां<br>सचापबाणो मदनो ममन्थ॥ २४॥अपनी चाँदनीसे बलपूर्वक सारे लोकोंको सींचते
तमांसि नैशानि द्रुतं निहत्य<br>ज्योत्स्त्रावितानेन जगद्वितत्य।<br>खे रोहिणीं तां च प्रियां समेत्य<br>चन्द्रः प्रभाभिः कुरुतेऽधिराज्यम्॥ २५॥एवं प्रकाशित करते हुए सुशोभित हो रहे थे। इस
  • अध्याय १३९ * ४९९

| स्थित्वैव कान्तस्य तु पादमूले<br>काचिद् वरस्त्री स्वकपोलमूले।<br>विशेषकं चारुतरं करोति<br>तेनाननं स्वं समलङ्करोति॥ २६<br><br>दृष्ट्वाननं मण्डलदर्पणस्थं<br>महाप्रभा मे मुखजेति जप्त्वा।<br>स्मृत्वा वराङ्गी रमणैरितानि<br>तेनैव भावेन रतीमवाप॥ २७<br><br>रोमाञ्चितैर्गात्रवरैर्युवभ्यो<br>रतानुरागादरमणेन चान्याः।<br>स्वयं द्रुतं यान्ति मदाभिभूताः<br>क्षपा यथा सार्कदिनावसाने॥ २८<br><br>पेपीयते चातिरसानुविद्धा<br>विमार्गितान्या च प्रियं प्रसन्ना।<br>काचित् प्रियस्यातिचिरात् प्रसन्ना<br>आसीत् प्रलापेषु च सम्प्रसन्ना॥ २९<br><br>गोशीर्षयुक्तैर्हरिचन्दनैश्च<br>पङ्काङ्किताक्षीरधराऽऽसुरीणाम्।<br>मनोज्ञरूपा रुचिरा बभूवुः<br>पूर्णामृतस्येव सुवर्णकुम्भाः॥ ३०<br><br>क्षताधरोष्ठा द्रुतदोषरक्ता<br>ललन्ति दैत्या दयितासु रक्ताः।<br>तन्त्रीप्रलापास्त्रिपुरेषु रक्ताः<br>स्त्रीणां प्रलापेषु पुनर्विरक्ताः॥ ३१<br><br>क्वचित् प्रवृत्तं मधुराभिगानं<br>कामस्य बाणैः सुकृतं निधानम्।<br>आपानभूमीषु सुखप्रमेयं<br>गेयं प्रवृत्तं त्वथ साधयन्ति॥ ३२<br><br>गेयं प्रवृत्तं त्वथ शोधयन्ति<br>केचित् प्रियां तत्र च साधयन्ति।<br>केचित् प्रियां सम्प्रति बोधयन्ति<br>सम्बुध्य सम्बुध्य च रामयन्ति॥ ३३<br><br>चूतप्रसूनप्रभवः सुगन्धः<br>सूर्ये गते वै त्रिपुरे बभूव।<br>समर्मरो नूपुरमेखलानां<br>शब्दश्च सम्बाधति कोकिलानाम्॥ ३४ | प्रकार सायंकालमें शीतरश्मि चन्द्रमाके उदय होनेपर जब त्रिपुरमें चाँदनी फैल गयी, तब असुरगण अपने-अपने गृहोंको सजाने लगे। गलियों, सड़कों, महलों और गृहोंमें तेलसे भरे हुए दीपक जला दिये गये, जो चम्पाके पुष्पकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी प्रकार देवालयोंमें भी तेलसे परिपूर्ण दीपक जलाये गये। दानवोंके गृह धन-सम्पत्तिसे परिपूर्ण तो थे ही, उनमें अनेक प्रकारके रत्न भी जड़े हुए थे, जिससे वे जलते हुए दीपकोंको चन्द्रोदय होनेपर ग्रहोंकी तरह अधिक उद्दीप्त कर रहे थे॥ १५–३०॥<br><br>वे भवन बाहरसे तो चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित थे और भीतर जलते हुए दीपकोंसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे वे त्रिपुरके अन्धकारको उसी प्रकार पीकर नष्ट कर रहे थे, जैसे उपद्रवोंके प्रकोपसे कुल नष्ट हो जाता |

१४१- पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृ-तर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण

५०० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रियावगूढा दयितोपगूढा<br>काचित् प्ररूढाङ्कुरहापि नारी।<br>सुचारुवाष्पाङ्कुरपल्लवानां<br>नवाम्बुसिक्ता इव भूमिरासीत्॥ ३५<br><br>शशाङ्कपादैरुपशोभितेषु<br>प्रासादवर्येषु वराङ्गनानाम् ।<br>माधुर्यभूताभरणामहान्तः<br>स्वना बभूवुर्मदनेषु तुल्याः॥ ३६<br><br>पानेन खिन्ना दयितातिवेलं<br>कपोलमाघ्रासि च किं ममेदम्।<br>आरोह मे श्रोणिमिमां विशालां<br>पीनोन्नतां काञ्चनमेखलाख्याम्॥ ३७<br><br>रथ्यासु चन्द्रोदयभासितासु<br>सुरेन्द्रमार्गेषु च विस्तृतेषु।<br>दैत्याङ्गना यूथगता विभान्ति<br>तारा यथा चन्द्रमसो दिवान्ते॥ ३८<br><br>अट्टाट्टहासेषु च चामरेषु<br>प्रेङ्खासु चान्या मदलोलभावात्।<br>संदोलयन्ते कलसम्प्रहासाः<br>प्रोवाच काञ्चीगुणसूक्ष्मनादा॥ ३९<br><br>अम्लानमालान्वितसुन्दरीणां<br>पर्याय एषोऽस्ति च हर्षितानाम्।<br>श्रूयन्ति वाचः कलधौतकल्पा<br>वापीषु चान्ये कलहंसशब्दाः॥ ४०<br><br>काञ्चीकलापश्च सहाङ्गरागः<br>प्रेङ्खासु तद्रागकृताश्च भावाः।<br>छिन्दन्ति तासामसुराङ्गनानां<br>प्रियालयान् मन्मथमार्गणानाम्॥ ४१<br><br>चित्राम्बरश्रोद्धृतकेशपाशः<br>संदोल्यमानः शुशुभेऽसुरीणाम्।<br>सुचारुवेशाभरणैरुपेत-<br>स्तारागणैर्ज्योतिरिवास चन्द्रः॥ ४२<br><br>सन्दोलनादुच्छ्वसितैश्छिन्नसूत्रैः<br>काञ्चीभ्रष्टैर्मणिभिर्विप्रकीर्णैः ।<br>दोलाभूमिस्तैर्विचित्रा विभाति<br>चन्द्रस्य पार्श्वोपगतैर्विचित्रा॥ ४३<br><br>सचन्द्रिके सोपवने प्रदोषे<br>रुतेषु वृन्देषु च कोकिलानाम्।<br>शरव्यं प्राप्य पुरेऽसुराणां<br>प्रक्षीणबाणो मदनश्चचार॥ ४४है। रात्रिके समय जब चन्द्रमाकी उज्ज्वल छटा पूरे<br><br><br>त्रिपुरमें फैल गयी तब दानवगण रात बितानेके लिये<br><br><br>अपनी पत्नियोंके साथ अपने-अपने गृहोंमें चले गये।<br><br><br>इधर रात बीती और कोयलें कूजने लगीं॥ ३१–४४॥
* अध्याय १४० *५०१
इति तत्र पुरेऽमरद्विषाणां<br>सपदि हि पश्चिमकौमुदी तदासीत् ।<br>रणशिरसि पराभविष्यतां वै<br>भवतुरगैः कृतसंक्षया अरीणाम् ॥ ४५कुछ देर बाद त्रिपुरमें युद्धके मुहानेपर शङ्करजीके घोड़ोंद्वारा पराजित किये गये शत्रुओंकी क्षीण कीर्तिकी तरह उन देवशत्रुओंके नगरमें एकाएक चतुर्थ प्रहरकी क्षीण चाँदनी दीख पड़ने लगी।
चन्द्रोऽथ कुन्दकुसुमाकरहारवर्णो<br>ज्योत्स्नावितानरहितोऽभ्रसमानवर्णः।<br>विच्छा्यतां हि समुपेत्य न भाति तद्वद्<br>भाग्यक्षये धनपतिश्च नरो विवर्णः॥ ४६उस समय कुन्दके पुष्पसमूहोंसे निर्मित हारके समान उज्ज्वल वर्णवाले चन्द्रमा किरणजालके क्षीण हो जानेके कारण निर्जल बादलकी तरह दीखने लगे। चाँदनीके नष्ट हो जानेपर चन्द्रमाकी शोभा उसी प्रकार जाती रही, जैसे धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न मनुष्य भाग्यके नष्ट हो जानेपर शोभाहीन हो जाता है।
चन्द्रप्रभामरुणसारथिनाभिभूय<br>संतप्तकाञ्चनरथाङ्गसमानबिम्बः।<br>स्थित्वोदयाग्रमुकुटे बहुरेव सूर्यो<br>भात्यम्बरे तिमिरतोयवहां तरिष्यन् ॥ ४७उस समय तपाये हुए स्वर्णमय चक्रके समान बिम्बवाले सूर्य अपने सारथि अरुणकी प्रभासे चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर उदयाचलके अग्र शिखरपर स्थित हुए और आकाशमण्डलमें अन्धकाररूपी नदीको पार करते हुए शोभा पा रहे थे॥ ४५—४७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरकौमुदीनामैकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुरकौमुदी नामक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३९ ॥


एक सौ चालीसवाँ अध्याय

देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो!
उदिते तु सहस्रांशौ मेरौ भासाकरे रवौ।<br>नदद्देव बलं कृत्स्नं युगान्त इव सागराः॥ १प्रकाश बिखेरनेवाले सहस्रांशुमाली सूर्यके मेरुगिरिपर उदित होते ही सारी-की-सारी देवसेना प्रलयकालीन सागरकी तरह उच्च स्वरसे गर्जना करने लगी।
सहस्रनयनो देवस्ततः शक्रः पुरन्दरः।<br>सवित्तदः सवरुणस्त्रिपुरं प्रययौ हरः॥ २तब भगवान् शङ्कर सहस्रनेत्रधारी पुरन्दर इन्द्र, कुबेर और वरुणको साथ लेकर त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए।
ते नानाविधिरूपाश्च प्रमथातिप्रमाथिनः।<br>ययुः सिंहरवैर्घोरैर्वादित्रनिनदैरपि ॥ ३उनके पीछे विभिन्न रूपधारी शत्रुविनाशक प्रमथगण भीषण सिंहनाद करते और बाजा बजाते हुए चले।
ततो वादितवादित्रैश्चातपत्रैर्महाद्रुमैः।<br>बभूव तद्वलं दिव्यं वनं प्रचलितं यथा॥ ४उस समय बजते हुए बाजों, छत्रों और विशाल वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण वह देवसेना ऐसी लग रही थी, मानो चलता-फिरता वन हो।
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य रौद्रं रुद्रबलं महत्।<br>संक्षोभो दानवेन्द्राणां समुद्रप्रतिमो बभौ॥ ५तत्पश्चात् शङ्करजीकी उस विशाल भयंकर सेनाको आक्रमण करते देखकर दानवेन्द्रोंका समूह सागरकी तरह संक्षुब्ध हो उठा।

प्रवृत्तासु पुराणीषु धर्म्यासु ललितासु च।

५०२ * मत्स्यपुराण *


SanskritHindi
ते चासीन् पट्टिशान् शक्तीः शूलदण्डपरश्वधान् ।<br>शरासनानि वज्राणि गुरूणि मुसलानि च ॥ ६<br><br>प्रगृह्य कोपरक्ताक्षाः सपक्षा इव पर्वताः ।<br>निजघ्नुः पर्वतघ्नाय घना इव तपात्यये ॥ ७फिर तो पंखधारी पर्वतोंकी भाँति विशालकाय दानवोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे खड्ग, पट्टिश (पट्टे), शक्ति, शूल, दण्ड, कुठार, धनुष, वज्र तथा बड़े-बड़े मूसलोंको लेकर एक साथ ही इन्द्रपर इस प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके बीत जानेपर बादल जलकी वृष्टि करते हैं॥ १-७॥
सविद्युन्मालिनस्ते वै समया दितिनन्दनाः ।<br>मोदमानाः समासेदुर्देवदेवैः सुरारयः ॥ ८<br><br>मर्त्तव्यकृतबुद्धीनां जये चानिश्चितात्मनाम् ।<br>अबलानां चमूर्ह्यासीदबलावयवा इव ॥ ९<br><br>विगर्जन्त इवाम्भोदा अम्भोदसदृशत्विषः ।<br>प्रयुध्य युद्धकुशलाः परस्परकृतागसः ॥ १०<br><br>धूमायन्तो ज्वलद्भिश्च आयुधैश्चन्द्रवर्चसैः ।<br>कोपाद् वा युद्धलुब्धाश्च कुट्ट्यन्ते परस्परम् ॥ ११<br><br>वज्राहताः पतन्त्यन्ये बाणैरन्ये विदारिताः ।<br>अन्ये विदारिताश्चक्रैः पतन्ति हृदधेर्जले ॥ १२<br><br>छिन्नस्रग्दामहाराश्च प्रमृष्टाम्बरभूषणाः ।<br>तिमिनक्रगणे चैव पतन्ति प्रमथाः सुराः ॥ १३<br><br>गदानां मुसलानां च तोमराणां परश्वधाम् ।<br>वज्रशूलर्ष्टिपातानां पट्टिशानां च सर्वतः ॥ १४<br><br>गिरिशृङ्गोपलानां च प्रेरितानां प्रमन्युभिः ।<br>सजवानां दानवानां सधूमानां रवित्विषाम् ।<br>आयुधानां महानाघः सोऽग्रौघे पतत्यपि ॥ १५<br><br>प्रवृद्धवेगैस्तैस्तत्र सुरासुरकरेरितैः ।<br>आयुधैस्त्रस्तनक्षत्रः क्रियते संक्षयो महान् ॥ १६<br><br>क्षुद्राणां गजयोर्युद्धे यथा भवति सङ्क्षयः ।<br>देवासुरगणैस्तद्वत् तिमिनक्रक्षयोऽभवत् ॥ १७इस प्रकार मयसहित देवशत्रु दैत्यगण विद्युन्मालीके साथ होकर प्रसन्नतापूर्वक देवेश्वरोंसे टक्कर लेने लगे। उनके मनमें विजयकी आशा तो थी ही नहीं, अतः वे मरनेपर उतारू हो गये थे। उन बलहीनोंकी सेना स्त्रियोंके अवयवोंकी तरह दुर्बल थी। मेघकी-सी कान्तिवाले युद्धकुशल दैत्य परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए लड़ रहे थे और मेघके समान गरज रहे थे। युद्धलोभी सैनिक प्रज्वलित अग्नि एवं चन्द्रमाके समान तेजस्वी अस्त्रोंद्वारा क्रोधपूर्वक परस्पर एक-दूसरेको मार-पीट-कूट रहे थे। कुछ लोग वज्रसे घायल होकर, कुछ लोग बाणोंसे विदीर्ण होकर और कुछ लोग चक्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर समुद्रके जलमें गिर रहे थे। (दैत्योंकी मारसे) जिनकी मालाओंके सूत्र और हार टूट गये थे तथा जिनके वस्त्र और आभूषण नष्ट-भ्रष्ट हो गये थे, वे देवता और गणेश्वर समुद्रमें मगरमच्छों एवं नाकोंके मध्यमें गिर रहे थे। धूमयुक्त सूर्यकी-सी कान्तिवाले वेगशाली दानवोंद्वारा क्रोधपूर्वक चलाये गये गदा, मुसल, तोमर, कुठार, वज्र, शूल, ऋष्टि, पट्टिश, पर्वतशिखर और शिलाखण्ड आदि आयुधोंका महान् समूह सागरमें गिर रहा था। देवताओं और असुरोंके हाथोंसे वेगपूर्वक चलाये गये आयुधोंसे नक्षत्रगण (भी) त्रस्त हो रहे थे। और महान् संहार हो रहा था। जैसे दो हाथियोंके लड़ते समय क्षुद्र जीवोंका विनाश हो जाता है, उसी तरह देवताओं और असुरोंके संग्रामसे मगरमच्छ और नाकोंका संहार होने लगा ॥ ८-१७॥
विद्युन्माली च वेगेन विद्युन्माली इवाम्बुदः ।<br>विद्युन्मालं घनोन्नादो नन्दीश्वरमभिद्रुतः ॥ १८तत्पश्चात् विद्युत्समूहोंसे युक्त मेघकी तरह कान्तिमान् विद्युन्मालीने बिजलीसे युक्त बादलकी तरह गरजते हुए नन्दीश्वरपर वेगपूर्वक धावा किया।
स तं तमोऽरिवदनं प्रणदन् वदतां वरः ।<br>उवाच युधि शैलादिं दानवोऽम्बुधिनिःस्वनः ॥ १९उस समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ दानव विद्युन्माली बादलकी तरह गरजता हुआ युद्धस्थलमें सूर्यके समान तेजस्वी मुखवाले नन्दीश्वरसे बोला—
युद्धाकाङ्क्षी तु बलवान् विद्युन्माल्यहमागतः ।<br>यदि त्विदानीं मे जीवन्मुच्यसे नन्दिकेश्वर ।<br>न विद्युन्मालिहननं वचोभिर्युधि दानवम् ॥ २०'नन्दिकेश्वर! मैं बलवान् विद्युन्माली हूँ और युद्ध करनेकी इच्छासे तुम्हारे सम्मुख खड़ा हूँ। अब तुम्हार मेरे हाथोंसे जीवित बच पाना असम्भव है। युद्धस्थलमें वचनोंद्वारा दानव विद्युन्मालीका हनन नहीं किया जा सकता।'
  • अध्याय १४० * | ५०३ ---|---:

| तमेवंवादिनं दैत्यं नन्दीशस्तपतां वरः।<br>उवाच प्रहरंस्तत्र वाक्यालङ्कारकोविदः॥ २१<br>दानवाधम कामानां नैषोऽवसर इत्युत।<br>शक्तो हन्तुं किमात्मानं जातिदोषाद् विबृंहसि॥ २२<br>यदि तावन्मया पूर्वं हतोऽसि पशुवद् यथा।<br>इदानीं वा कथं नाम न हिंस्ये क्रतुदूषणम्॥ २३<br>सागरं तरते दोर्भ्यां पातयेद् यो दिवाकरम्।<br>सोऽपि मां शक्नुयान्नैव चक्षुर्भ्यां समवीक्षितुम्॥ २४<br>इत्येवंवादिनं तत्र नन्दिनं तन्निभो बले।<br>बिभेदैकेषुणा दैत्यः करेणार्क इवाम्बुदम्॥ २५<br>वक्षसः स शरस्तस्य पपौ रुधिरमुत्तमम्।<br>सूर्यस्स्वात्मप्रभावेण नद्यर्णवजलं यथा॥ २६<br>स तेन सुप्रहारेण प्रथमं च तिरोहितः।<br>हस्तेन वृक्षमूत्पाट्य चिक्षेप गजराडिव॥ २७<br>वायुनुन्नः स च तरुः शीर्णपुष्पो महारवः।<br>विद्युन्मालिशरैश्छिन्नः पपात पतगेशवत्॥ २८<br>वृक्षमालोक्य तं छिन्नं दानवेन वरेषुभिः।<br>रोषमाहारयत् तीव्रं नन्दीश्वरः सुविग्रहः॥ २९<br>सोद्यम्य करमारावे रविशक्रकरप्रभम्।<br>दुद्राव हन्तुं स क्रूरं महिषं गजराडिव॥ ३०<br>तमापतन्तं वेगेन वेगवान् प्रसभं बलात्।<br>विद्युन्माली शरशतैः पूरयामास नन्दिनम्॥ ३१<br>शरकण्टकिताङ्गो वै शैलादिः सोऽभवत् पुनः।<br>अरेर्गृह्य रथं तस्य महतः प्रययौ जवात्॥ ३२<br>विलम्बिताश्वो विशिरो भ्रमितश्च रणे रथः।<br>पपात मुनिशापेन सादित्योऽर्करथो यथा॥ ३३<br>अन्तरान्निर्गतश्चैव मायया स दितेः सुतः।<br>आजघान तदा शक्त्या शैलादिं समवस्थितम्॥ ३४ | तब वाक्यके अलंकारोंके ज्ञाता एवं श्रेष्ठ तेजस्वी नन्दीश्वरने ऐसा कहनेवाले दैत्य विद्युन्मालीपर प्रहार करते हुए कहा—'दानवाधम ! तुमलोग इस समय कामासक्त ही हो, जिसका यह अवसर नहीं है। तुम मुझे मारनेमें समर्थ हो तो उसे कर दिखाओ, किंतु जाति-दोषके कारण तुम अपने प्रति ऐसी डींग क्यों मार रहे हो। यदि इससे भी पहले मैंने तुम्हें पशुकी तरह बहुत मारा है तो इस समय तुझ यज्ञविध्वंसीका हनन कैसे नहीं करूँगा ? (तुम समझ लो) जो हाथोंसे सागरको तैरनेकी तथा सूर्यको आकाशसे गिरा देनेकी शक्ति रखता हो, वह भी मेरी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।' तब नन्दीश्वरके समान ही बलशाली विद्युन्मालीने इस प्रकार कहते हुए नन्दीश्वरको एक बाणसे वैसे ही बींध दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणसे बादलका भेदन करते हैं। वह बाण नन्दीश्वरके वक्षःस्थलपर जा लगा और उनका शुद्ध रक्त इस प्रकार पीने लगा जैसे सूर्य अपने प्रभावसे नदी और समुद्रके जलको पीते हैं। उस प्रथम प्रहारसे अत्यन्त क्रुद्ध हुए नन्दीश्वरने अपने हाथसे एक वृक्ष उखाड़कर गजराजकी भाँति विद्युन्मालीके ऊपर फेंका। वायुसे प्रेरित हुआ वह वृक्ष घोर शब्द करता और पुष्पोंको बिखेरता हुआ आगे बढ़ा, किंतु विद्युन्मालीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर एक बड़े पक्षीकी तरह भूतलपर बिखर गया॥ १८–२८॥<br><br>विद्युन्मालीद्वारा श्रेष्ठ बाणोंके प्रहारसे उस वृक्षको छिन्न-भिन्न हुआ देखकर महाबली नन्दीश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। फिर तो वे सूर्य और इन्द्रके हाथके समान प्रभावशाली अपने हाथको उठाकर सिंहनाद करते हुए उस क्रूर राक्षसका वध करनेके लिये इस प्रकार झपटे, जैसे गजराज भैंसेपर टूट पड़ता है। नन्दीश्वरको वेगपूर्वक आक्रमण करते देखकर वेगशाली विद्युन्मालीने बलपूर्वक नन्दीश्वरके शरीरको सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त कर दिया। उस समय नन्दीश्वरका शरीर बाणरूपी काँटोंसे भरा हुआ दिखायी पड़ने लगा; तब उन्होंने अपने शत्रु विद्युन्मालीके रथको पकड़कर बड़े वेगसे दूर फेंक दिया। उस समय उस रथके घोड़े उसमें लटके हुए थे और उसका अग्रभाग टूट गया था तथा वह चक्कर काटता हुआ रणभूमिमें उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे मुनिके शापसे सूर्यसहित सूर्यका रथ गिर पड़ा था। तब दितिपुत्र विद्युन्माली मायाके बलसे अपनेको सुरक्षित रखकर रथके भीतरसे निकल पड़ा और उसने सामने खड़े हुए नन्दीश्वरपर शक्तिसे प्रहार किया। |

५०४* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
तामेव तु विनिष्क्रम्य शक्तिं शोणितभूषिताम्।<br>विद्युन्मालिनमुद्दिश्य चिक्षेप प्रमथाग्रणीः॥ ३५<br>तया भिन्नतनुत्राणो विभिन्नहृदयस्त्वपि।<br>विद्युन्माल्यपतद् भूमौ वज्राहत इवाचलः॥ ३६प्रमथगणोंके नायक नन्दीश्वरने रक्तसे लथपथ हुई उस शक्तिको हाथमें लेकर विद्युन्मालीको लक्ष्य करके फेंक दिया। फिर तो उस शक्तिने विद्युन्मालीके कवचको फाड़कर उसके हृदयको भी विदीर्ण कर दिया, जिससे वह वज्रसे मारे गये पर्वतकी तरह धराशायी हो गया॥ २९—३६॥
विद्युन्मालिनि निहते सिद्धचारणकिन्नराः।<br>साधु साध्विति चोक्त्वा ते पूजयन्त उमापतिम्॥ ३७<br>नन्दिना सादिते दैत्ये विद्युन्मालौ हते मयः।<br>ददाह प्रमथानीकं वनमग्निरिवोद्धतः॥ ३८<br>शूलनिर्दारितोरस्का गदाचूर्णितमस्तकाः।<br>इषुभिर्गाढविद्धाश्च पतन्ति प्रमथार्णवे॥ ३९<br>अथ वज्रधरो यमोऽर्थदः स च नन्दी<br>स च षण्मुखो गुहः।<br>मयमसुरवीरसम्प्रवृत्तं विविघुः शस्त्रवरैर्हतारयः॥ ४०<br>नागं तु नागाधिपतेः शताक्षं<br>मयो विदार्येषु वरेण तूर्णम्।<br>यमं च वित्ताधिपतिं च विद्ध्वा<br>ररास मत्ताम्बुदवत् तदानीम्॥ ४१<br>ततः शरैः प्रमथगणैश्च दानवा<br>दृढाहताश्चोत्तमवेगविक्रमाः।<br>भृशानुविद्धास्त्रिपुरं प्रवेशिता<br>यथासुराश्चक्रधरेण संयुगे॥ ४२<br>ततस्तु शङ्खानकभेरीमर्दलाः<br>ससिंहनादा दनुपुत्रभङ्गदाः।<br>कपर्दिसैन्ये प्रबभुः समन्ततो<br>निपात्यमाना युधि वज्रसंनिभाः॥ ४३<br>अथ दैत्यपुराभावे पुष्ययोगो बभूव ह।<br>बभूव चापि संयुक्तं तद्योगेन पुरत्रयम्॥ ४४इस प्रकार विद्युन्मालीके मारे जानेपर सिद्ध, चारण और किन्नरोंके समूह 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए शंकरजीकी पूजा करने लगे। इधर नन्दीश्वरद्वारा दैत्य विद्युन्मालीके मारे जानेपर मयने प्रमथोंकी सेनाको उसी प्रकार जलाना आरम्भ किया, जैसे उद्दीप्त दावाग्नि वनको जला डालती है। उस समय शूलके आघातसे जिनके वक्षःस्थल फट गये थे एवं गदाके प्रहारसे मस्तक चूर्ण हो गये थे और जो बाणोंकी मारसे अत्यन्त घायल हो गये थे, ऐसे प्रमथगण समुद्रमें गिर रहे थे। तदनन्तर शत्रुओंके विनाशक वज्रधारी इन्द्र, यमराज, कुबेर, नन्दीश्वर तथा छः मुखवाले स्वामीकार्तिक—ये सभी असुर-वीरोंसे घिरे हुए मयको श्रेष्ठ अस्त्रोंद्वारा बाँधने लगे। उस समय मयने शीघ्र ही एक श्रेष्ठ बाणसे गजारूढ़ सौ नेत्रोंवाले इन्द्रको तथा ऐरावत नागको विदीर्ण कर यमराज और कुबेरको भी बाँध दिया। फिर वह घुमड़ते हुए बादलकी तरह गर्जना करने लगा। इधर प्रमथगणोंद्वारा छोड़े गये बाणोंसे उत्तम वेग एवं पराक्रमशाली दानव बुरी तरह घायल हो रहे थे। वे अत्यन्त घायल होनेके कारण भागकर त्रिपुरमें उसी प्रकार घुस रहे थे, जैसे युद्धस्थलमें चक्रपाणि विष्णुके प्रहारसे असुर। तत्पश्चात् रणभूमिमें शंकरजीकी सेनामें चारों ओर शङ्ख, ढोल, भेरी और मृदङ्ग बज उठे। वीरोंका सिंहनाद वज्रकी गड़गड़ाहटकी भाँति गूँज उठा, जो दानवोंकी पराजयको सूचित कर रहा था। इसी समय उस दैत्यपुरका विनाशक पुष्ययोग आ गया। उस योगके प्रभावसे तीनों पुर संयुक्त हो गये॥ ३७—४४॥
ततो बाणं त्रिधा देवस्त्रिदैवतमयं हरः।<br>मुमोच त्रिपुरे तूर्णं त्रिनेत्रस्त्रिपथाधिपः॥ ४५<br>तेन मुक्तेन बाणेन बाणपुष्पसमप्रभम्।<br>आकाशं स्वर्णसंकाशं कृतं सूर्येण रञ्जितम्॥ ४६<br>मुक्त्वा त्रिदैवतमयं त्रिपुरे त्रिदशः शरम्।<br>धिग्धिङ्मामेति चक्रन्द कष्टं कष्टमिति ब्रुवन्॥ ४७तब त्रैलोक्याधिपति त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने शीघ्र ही अपने त्रिदेवमय बाणको तीन भागोंमें विभक्त कर त्रिपुरपर छोड़ दिया। उस छूटे हुए बाणने (तीनों देवताओंके अंशसे तीन प्रकारकी प्रभासे युक्त होकर) बाण वृक्षके पुष्पके समान नीले आकाशको स्वर्ण-सदृश प्रभाशाली और सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त कर दिया। देवेश्वर शम्भु त्रिपुरपर त्रिदेवमय बाण छोड़कर—'मुझे धिक्कार
* अध्याय १४० *५०५
वैधुर्यं दैवतं दृष्ट्वा शैलादिर्गजवद्गतिः।<br>किमिदं त्विति पप्रच्छ शूलपाणिं महेश्वरम्॥ ४८<br><br>ततः शशाङ्कतिलकः कपर्दी परमार्तवत्।<br>उवाच नन्दिनं भक्तः स मयोऽद्य विनङ्क्ष्यति॥ ४९<br><br>अथ नन्दीश्वरस्तूर्णं मनोमारुतवद् बली।<br>शरे त्रिपुरमायाति त्रिपुरं प्रविवेश सः॥ ५०<br><br>स मयं प्रेक्ष्य गणपः प्राह काञ्चनसन्निभः।<br>विनाशस्त्रिपुरस्यास्य प्राप्तो मय सुदारुणः॥ ५१<br><br>अनेनैव गृहेण त्वमपक्राम ब्रवीम्यहम्।<br><br>श्रुत्वा तन्नन्दिवचनं दृढभक्तो महेश्वरे।<br>तेनैव गृहमुख्येन त्रिपुरादपसर्पितः॥ ५२<br><br>सोऽपीषुः पत्रपुटवद् दग्ध्वा तन्नगरत्रयम्।<br>त्रिधा इव हुताशश्च सोमो नारायणस्तथा॥ ५३<br><br>शरतेजःपरीतानि पुराणि द्विजपुङ्गवाः।<br>दुष्पुत्रदोषाद् दह्यन्ते कुलान्यूर्ध्वं यथा तथा॥ ५४है, धिक्कार है, हाय! बड़े कष्टकी बात हो गयी' यों कहते हुए चिल्ला उठे। इस प्रकार शंकरजीको व्याकुल देखकर गजराजकी चालसे चलनेवाले नन्दीश्वर शूलपाणि महेश्वरके निकट पहुँचे और पूछने लगे—'कहिये, क्या बात है?' तब चन्द्रशेखर जटाजूटधारी भगवान् शंकरने अत्यन्त दुःखी होकर नन्दीश्वरसे कहा—'आज मेरा वह भक्त मय भी नष्ट हो जायगा।' यह सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली महाबली नन्दीश्वर तुरंत उस बाणके त्रिपुरमें पहुँचनेके पूर्व ही वहाँ जा पहुँचे। वहाँ स्वर्ण-सरीखे कान्तिमान् गणेश्वर नन्दीने मयके निकट जाकर कहा—'मय! इस त्रिपुरका अत्यन्त भयंकर विनाश आ पहुँचा है, इसलिये मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। तुम अपने इस गृहके साथ इससे बाहर निकल जाओ।' तब महेश्वरके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाला मय नन्दीश्वरके उस वचनको सुनकर अपने उस मुख्य गृहके साथ त्रिपुरसे निकलकर भाग गया। तदनन्तर वह बाण अग्नि, सोम और नारायणके रूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर उन तीनों नगरोंको पत्तेके दोनेकी तरह जलाकर भस्म कर दिया। द्विजवरो! वे तीनों पुर बाणके तेजसे उसी प्रकार जलकर नष्ट हो रहे थे, जैसे कुपुत्रके दोषसे आगेकी पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं॥ ४५—५४॥
मेरुकैलासकल्पानि मन्दराग्रनिभानि च।<br>सकपाटगवाक्षाणि बलिभिः शोभितानि च॥ ५५<br><br>सप्रासादानि रम्याणि कूटागारोत्कटानि च।<br>सजलानि समाख्यानि सावलोकनकानि च॥ ५६<br><br>बद्धध्वजपताकानि स्वर्णरौप्यमयानि च।<br>गृहाणि तस्मिंस्त्रिपुरे दानवानामुपद्रवे।<br>दह्यन्ते दहनाभानि दहनेन सहस्रशः॥ ५७<br><br>प्रासादाग्रेषु रम्येषु वनेषूपवनेषु च।<br>वातायनगताश्चान्याश्चाकाशस्य तलेषु च॥ ५८<br><br>रमणैरुपगूढाश्च रमन्त्यो रमणैः सह।<br>दह्यन्ते दानवेन्द्राणामग्निना ह्यपि ताः स्त्रियः॥ ५९<br><br>काचित्प्रियं परित्यज्य अशक्ता गन्तुमन्यतः।<br>पुरः प्रियस्य पञ्चत्वं गताग्निवदने क्षयम्॥ ६०उस त्रिपुरमें ऐसे गृह बने थे जो सुमेरु, कैलास और मन्दराचलके अग्रभागकी तरह दीख रहे थे। जिनमें बड़े-बड़े किंवाड़ और झरोखे लगे हुए थे तथा छज्जाओंकी विचित्र छटा दीख रही थी। जो सुन्दर महलों, उत्कृष्ट कूटागारों (ऊपरी छतके कमरों), जल रखनेकी वेदिकाओं और खिड़कियोंसे सुशोभित थे। जिनके ऊपर सुवर्ण एवं चाँदीके बने हुए डंडोंमें बँधे हुए ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। ये सभी हजारोंकी संख्यामें दानवोंके उस उपद्रवके समय अग्निद्वारा जलाये जा रहे थे, जो आगकी तरह धधक रहे थे। दानवेन्द्रोंकी स्त्रियाँ, जिनमें कुछ महलोंके रमणीय शिखरोंपर बैठी थीं, कुछ वनों और उपवनोंमें घूम रही थीं, कुछ झरोखोंमें बैठकर दृश्य देख रही थीं कुछ मैदानमें घूम रही थीं—ये सभी अग्निद्वारा जलायी जा रही थीं। कोई अपने पतिको छोड़कर अन्यत्र जानेमें असमर्थ थी, अतः पतिके सम्मुख ही अग्निकी लपटोंमें आकर दग्ध हो

५०६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उवाच शतपत्राक्षी सास्त्राक्षीव कृताञ्जलिः।<br>हव्यवाहन भार्याहं परस्य परतापन।<br>धर्मसाक्षी त्रिलोकस्य न मां स्प्रष्टुमिहार्हसि॥ ६१<br><br>शायितं च मया देव शिवया च शिवप्रभ।<br>शरेण प्रेहि मुक्त्वेदं गृहं च दयितं हि मे॥ ६२<br><br>एका पुत्रमुपादाय बालकं दानवाङ्गना।<br>हुताशनसमीपस्था इत्युवाच हुताशनम्॥ ६३<br><br>बालोऽयं दुःखलब्धश्च मया पावक पुत्रकः।<br>नार्हस्येनमुपादातुं दयितं षण्मुखप्रिय॥ ६४<br><br>काश्चित् प्रियान् परित्यज्य पीडिता दानवाङ्गनाः।<br>निपतन्त्यर्णवजले शिञ्जानविभूषणाः॥ ६५<br><br>तात पुत्रेति मातेति मातुलेति च विह्वलम्।<br>चक्रन्दुस्त्रिपुरे नार्यः पावकज्वालवेपिताः॥ ६६<br><br>यथा दहति शैलाग्निः साम्बुजं जलजाकरम्।<br>तथा स्त्रीवक्त्रपद्मानि चादहत् पुरेऽनलः॥ ६७गयी। कोई कमलनयनी नारी आँखोंमें आँसू भरे हुए हाथ जोड़कर कह रही थी—'हव्यवाहन! मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। परतापन! आप त्रिलोकीके धर्मके साक्षी हैं, अतः यहाँ मेरा स्पर्श करना आपके लिये उचित नहीं है।' (कोई कह रही थी—) 'शिवके समान कान्तिमान् अग्निदेव! मुझ पतिव्रताने इस घरमें अपने पतिको सुला रखा है, अतः इसे छोड़कर आप दूसरी ओरसे चले जाइये; क्योंकि यह गृह मुझे परम प्रिय है।' एक दानवपत्नी अपने शिशु पुत्रको गोदमें लेकर अग्निके समीप गयी और अग्निसे कहने लगी—'स्वामीकार्तिकके प्रेमी पावक! मुझे यह शिशु पुत्र बड़े दुःखसे प्राप्त हुआ है, अतः इसे ले लेना आपके लिये उचित नहीं है। यह मुझे परम प्रिय है।' कुछ पीड़ित हुई दानव-पत्नियों अपने पतियोंको छोड़कर समुद्रके जलमें कूद रही थीं। उस समय उनके आभूषणोंसे शब्द हो रहा था। त्रिपुरमें आगकी लपटोंके भयसे काँपती हुई नारियाँ 'हा तात!, हा पुत्र!, हा माता!, हा मामा!' कहकर विह्वलतापूर्वक करुण-क्रन्दन कर रही थीं। जैसे पर्वताग्नि (दावाग्नि) कमलोंसहित सरोवरको जला देती है उसी प्रकार अग्निदेव त्रिपुरमें स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंको जला रहे थे॥ ५५-६७॥
तुषारराशिः कमलाकराणां<br>यथा दहत्यम्बुजकानि शीते।<br>तथैव सोऽग्निस्त्रिपुराङ्गनानां<br>ददाह वक्त्रेक्षणपङ्कजानि॥ ६८जिस प्रकार शीतकालमें तुषारराशि कमलोंसे भरे हुए सरोवरोंके कमलोंको नष्ट कर देती है उसी तरह अग्निदेव त्रिपुर-निवासिनी नारियोंके मुख और नेत्ररूप कमलोंको जला रहे थे।
शराग्निपातात् समभिद्रुतानां<br>तत्राङ्गनानामतिकोमलानाम् ।<br>बभूव काञ्चीगुणनूपुराणा-<br>माक्रन्दितानां च रवोऽति मिश्रः॥ ६९त्रिपुरमें बाणाग्निके गिरनेसे भयभीत होकर भागती हुई अत्यन्त कोमलाङ्गी सुन्दरियोंकी करधनीकी लड़ियों और पायजेबोंका शब्द आक्रन्दनके शब्दोंसे मिलकर अत्यन्त भयंकर लग रहा था।
दग्धार्धचन्द्राणि सवेदिकानि<br>विशीर्णहर्म्याणि सतोरणानि।<br>दग्धानि दग्धानि गृहाणि तत्र<br>पतन्ति रक्षार्थमिवार्णवौघे॥ ७०जिनमें अर्धचन्द्रसे सुशोभित वेदिकाएँ जल गयी थीं तथा तोरणसहित अट्टालिकाएँ जलकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। ऐसे गृह जलते-जलते समुद्रमें इस प्रकार गिर रहे थे मानो वे रक्षाके लिये उसमें कूद रहे हों।
गृहैः पतद्भिर्ज्वलनावलीढै-<br>रासीत् समुद्रे सलिलं प्रतप्तम्।<br>कुपुत्रदोषैः प्रहतानुविद्धं<br>यथा कुलं याति धनान्वितस्य॥ ७१अग्निकी लपटोंसे झुलसे हुए गृहोंके समुद्रमें गिरनेसे उसका जल ऐसा संतप्त हो उठा था, जैसे सम्पत्तिशाली व्यक्तिका कुल कुपुत्रके दोषसे नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।

१४२- युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन

* अध्याय १४० *५०७
गृहप्रतापैः क्वथितं समन्तात्<br>तदार्णवे तोयमुदीर्णवेगम्।<br>वित्रासयामास तिमीन् सनक्रां -<br>स्तिमिङ्गिलांस्तक्वथितांस्तथान्यान्॥ ७२<br>सगोपुरो मन्दरपादकल्पः<br>प्राकारवर्यस्त्रिपुरे च सोऽथ।<br>तैरैव सार्धं भवनैः पपात<br>शब्दं महान्तं जनयन् समुद्रे॥ ७३<br>सहस्रशृङ्गैर्भवनैर्यदासीत्<br>सहस्रशृङ्गः स इवाचलेशः।<br>नामावशेषं त्रिपुरं प्रजज्ञे<br>हुताशनाहारबलिप्रयुक्तम् ॥ ७४<br>प्रदह्यमानेन पुरेण तेन<br>जगत्सपातालदिवं प्रतप्तम्।<br>दुःखं महत्प्राप्य जलावमग्नं<br>हित्वा महान् सौधवरो मयस्य॥ ७५<br>तद् देवेशो वचः श्रुत्वा इन्द्रो वज्रधरस्तदा।<br>शशाप तद्गृहं चापि मयस्यादितिनन्दनः॥ ७६<br>असेव्यमप्रतिष्ठं च भयेन च समावृतम्।<br>भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथानलः॥ ७७<br>यस्य यस्य तु देशस्य भविष्यति पराभवः।<br>द्रक्ष्यन्ति त्रिपुरं खण्डं तत्रेदं नाशगा जनाः।<br>तदेतदद्यापि गृहं मयस्यामयवर्जितम्॥ ७८उस समय समुद्रमें चारों ओर गिरते हुए गृहोंकी उष्णतासे खौलते हुए जलमें तूफान आ गया, जिससे मगरमच्छ, नाक, तिमिंगिल तथा अन्यान्य जलजन्तु संतप्त होकर भयभीत हो उठे। उसी समय त्रिपुरमें लगा हुआ मन्दराचलके समान ऊँचा परकोटा फाटकसहित उन गिरते हुए भवनोंके साथ-ही-साथ महान् शब्द करता हुआ समुद्रमें जा गिरा। जो त्रिपुर थोड़ी देर पहले सहस्रों ऊँचे-ऊँचे भवनोंसे युक्त होनेके कारण सहस्र शिखरवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था वही अग्निके आहार और बलिके रूपमें प्रयुक्त होकर नाममात्र अवशेष रह गया। जलते हुए उस त्रिपुरके तापसे पाताल और स्वर्गलोकसहित सारा जगत् संतप्त हो उठा। इस प्रकार महान् कष्ट झेलता हुआ वह त्रिपुर समुद्रके जलमें निमग्न हो गया। इसमें एकमात्र मयका महान् भवन ही बच गया था। अदिति-नन्दन वज्रधारी देवराज इन्द्रने जब ऐसी बात सुनी तो मयके उस गृहको शाप देते हुए बोले—'मयका वह गृह किसीके सेवन करनेयोग्य नहीं होगा। उसकी संसारमें प्रतिष्ठा नहीं होगी। वह अग्निकी तरह सदा भयसे युक्त बना रहेगा। जिस-जिस देशकी पराजय होनेवाली होगी उस-उस देशके विनाशोन्मुख निवासी इस त्रिपुर-खण्डका दर्शन करेंगे।' मयका वह गृह आज भी आपत्तियोंसे रहित है॥ ६८–७८॥
ऋषय ऊचुः<br>भगवन् स मयो येन गृहेण प्रपलायितः।<br>तस्य नो गतिमाख्याहि मयस्य चमसोद्भव ॥ ७९ऋषियोंने पूछा— चमससे उत्पन्न होनेवाले ऐश्वर्यशाली सूतजी ! वह मय जिस गृहको साथ लेकर भाग गया था, उस मयकी आगे चलकर क्या गति हुई ? यह हमें बतलाइये ॥ ७९ ॥
सूत उवाच<br>दृश्यते दृश्यते यत्र ध्रुवस्तत्र मयास्पदम्।<br>देवद्विट् तु मयश्चातः स तदा खिन्नमानसः।<br>ततश्च युतोऽन्यलोकेऽस्मिंस्त्राणार्थं स चकार सः॥ ८०<br>तत्रापि देवताः सन्ति आप्तोर्यामाः सुरोत्तमाः।<br>तत्राशक्तं ततो गन्तुं तं चैकं पुरमुत्तमम् ॥ ८१सूतजी कहते हैं— ऋषियो ! जहाँ ध्रुव दिखलायी पड़ते हैं वहीं मयका भी स्थान दीख पड़ता था, किंतु कुछ समयके बाद देवशत्रु मयका मन खिन्न हो गया, तब वह अपनी रक्षाके निमित्त वहाँसे हटकर अन्य लोकमें चला गया। वहाँ भी आप्तोर्याम नामक श्रेष्ठ देवता निवास करते थे, परंतु अब मयमें वहाँसे अन्यत्र जानेकी शक्ति नहीं रह गयी थी।
५०८* मत्स्यपुराण *

| शिवः सृष्ट्वा गृहं प्रादान्मयायैव गृहार्थिने ।<br>विरराम सहस्राक्षः पूजयामास चेश्वरम् ।<br>पूज्यमानं च भूतेशं सर्वे तुष्टुवुरीश्वरम् ॥ ८२<br>सम्पूज्यमानं त्रिदशैः समीक्ष्य<br>गणैर्गणेशाधिपतिं तु मुख्यम् ।<br>हर्षाद्ववल्गुर्जहसुश्च देवा<br>जग्मुर्ननर्दुस्तु विषक्तहस्ताः ॥ ८३<br>पितामहं वन्द्य ततो महेशं<br>प्रगृह्य चापं प्रविसृज्य भूतान् ।<br>रथाच्च सम्पत्य हरेषुदग्धं<br>क्षिप्तं पुरं तन्मकरालये च ॥ ८४<br>य इमं रुद्रविजयं पठते विजयावहम् ।<br>विजयं तस्य कृत्येषु ददाति वृषभध्वजः ॥ ८५<br>पितॄणां वापि श्राद्धेषु य इमं श्रावयिष्यति ।<br>अनन्तं तस्य पुण्यं स्यात् सर्वयज्ञफलप्रदम् ॥ ८६<br>इदं स्वस्त्ययनं पुण्यमिदं पुंसवनं महत् ।<br>इदं श्रुत्वा पठित्वा च यान्ति रुद्रसलोकताम् ॥ ८७ | तब भक्तवत्सल शंकरजीने एक उत्तम पुर और गृहका निर्माण कर गृहार्थी मयको प्रदान कर दिया। यह देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र शान्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने महेश्वरकी पूजा की। उस समय सभी देवताओंने पूजित होते हुए भूतपति शंकरकी स्तुति की। तदनन्तर देवताओं और गणेश्वरोंद्वारा प्रधान गणेशाधिपति महेश्वरकी पूजा होते देखकर देवगण हाथ उठाकर हर्षपूर्वक जय-जयकार, अट्टहास और सिंहनाद करने लगे। इसके बाद रथसे निकलकर उन्होंने ब्रह्मा और शंकरजीकी वन्दना की। फिर हाथमें धनुष ग्रहणकर और भूतगणोंसे विदा होकर वे अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थित हुए; क्योंकि शंकरजीके बाणसे भस्म हुआ त्रिपुर महासागरमें निमग्न हो चुका था। जो मनुष्य विजय प्रदान करनेवाले इस रुद्रविजयका पाठ करता है, उसे भगवान् शंकर सभी कार्योंमें विजय प्रदान करते हैं। जो मनुष्य पितरोंके श्राद्धोंके अवसरपर इसे पढ़कर सुनाता है उसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाले अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। यह रुद्रविजय महान् मङ्गलकारक, पुण्यप्रद और संतानप्रदायक है। इसे पढ़ और सुनकर लोग रुद्रलोकमें चले जाते हैं ॥ ८०–८७ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिपुरदाहो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें त्रिपुरदाह नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥


एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय

पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृतर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—सूतजी! इलानन्दन महाराज पुरूरवा प्रति मासकी अमावस्याको किस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते हैं और वहाँ अपने पितरोंको कैसे तृप्त करते हैं? उन बुद्धिमान् नरेशके इस प्रभावको हमलोग सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
कथं गच्छत्यमावास्यां मासि मासि दिवं नृपः ।<br>ऐलः पुरूरवाः सूत तर्पयेत कथं पितॄन् ।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुं प्रभावं तस्य धीमतः ॥ १
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! पूर्वकालमें महाराज मनुने भगवान् मधुसूदनसे यही प्रश्न किया था। उस समय भगवान्ने उन सूर्यपुत्र मनुके प्रति जो कुछ कहा था, वही मैं बतला रहा हूँ, आपलोग ध्यान देकर सुनिये ॥ २ ॥
एतदेव तु पप्रच्छ मनुः स मधुसूदनम् ।<br>सूर्यपुत्राय चोवाच यथा तन्मे निबोधत ॥ २

* अध्याय १४१ * ५०९


मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा- राजन्! मैं इलापुत्र पुरूरवाका
तस्य चाहं प्रवक्ष्यामि प्रभावं विस्तरेण तु।<br>ऐलस्य दिवि संयोगं सोमेन सह धीमता॥ ३प्रभाव, स्वर्गलोकमें उसका बुद्धिमान् चन्द्रमाके साथ संयोग, उन चन्द्रमासे अमृतकी उपलब्धि तथा पितृतर्पणकी बात विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। सौम्य, बर्हिषद्, काव्य
सोमाच्चैवामृतप्राप्तिः पितॄणां तर्पणं तथा।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ ४तथा अग्निष्वात्तसंज्ञक पितरों तथा नक्षत्रोंपर विचरण करते हुए सूर्य और चन्द्रमा जिस समय अमावास्या
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च नक्षत्राणां समागतौ।<br>अमावास्यां निवसतः एकस्मिन्नथ मण्डले॥ ५तिथिको एक मण्डल अर्थात् एक राशिपर स्थित होते हैं, उस समय वह प्रत्येक अमावास्याको सूर्य और चन्द्रमाका
तदा स गच्छति द्रष्टुं दिवाकरनिशाकरौ।<br>अमावास्याममावास्यां मातामहपितामहौ॥ ६दर्शन करनेके लिये स्वर्गमें जाता है और वहाँ मातामह (नाना) और पितामह (बाबा)—दोनोंको अभिवादन कर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ कुछ दिनतक ठहरा
अभिवाद्य तु तौ तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति।<br>प्रचस्कन्द ततः सोममर्चयित्वा परिश्रमत्॥ ७रहता है। चन्द्रमासे अमृतके क्षरण होनेपर उससे परिश्रमपूर्वक पितरोंकी पूजा करके लौटता है। किसी महीनेमें श्राद्ध
ऐलः पुरूरवा विद्वान् मासि श्राद्धचिकीर्षया।<br>ततः स दिवि सोमं वै ह्युपतस्थे पितॄनपि॥ ८करनेकी इच्छासे इलानन्दन विद्वान् पुरूरवा स्वर्गलोकमें चन्द्रमा और पितरोंके निकट गया और दो लवमात्र कुहू
द्विलवं कुहुमात्रं च तावुभौ तु निधाय सः।<br>सिनीवालीप्रमाणाल्यकुहूमात्रव्रतोदये ॥ ९अमावास्यामें उसने दोनोंको स्थापित किया; क्योंकि पितृ-व्रतमें जब सिनीवालीका प्रमाण थोड़ा तथा कुहू (अमावास्या) प्रशस्त मानी गयी है। अतः कुहूका समय प्राप्त हुआ
कुहूमात्रं पितॄद्देशं ज्ञात्वा कुहूमुपासते।<br>तमुपास्य ततः सोमं कलापेक्षी प्रतीक्षते॥ १०जानकर वह पितरोंके उद्देश्यसे कुहूकी उपासना करता है। उसकी उपासना करनेके पश्चात् वह कालकी प्रतीक्षा
स्वधामृतं तु सोमाद् वै वसंस्तेषां च तृप्तये।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव स्वधामृतपरिस्त्रवैः।<br>कृष्णपक्षभुजां प्रीतिर्दुह्यते परमांशुभिः॥ ११करता हुआ चन्द्रमाकी भी प्रतीक्षा करता है। वहाँ रहते हुए उसे पितरोंकी तृप्तिके लिये चन्द्रमासे स्वधारूप अमृत प्राप्त होता है। चन्द्रमाकी पंद्रह किरणोंसे स्वधामृतका क्षरण होता है। कृष्णपक्षमें श्राद्धभोजी पितरोंका उन श्रेष्ठ
सद्योऽभिक्षरता तेन सौम्येन मधुना च सः।<br>निवापेष्वथ दत्तेषु पित्र्येण विधिना तु वै॥ १२किरणोंसे बड़ा प्रेम रहता है तथा अन्य पितर उनसे द्वेष करते हैं। पुरूरवा तुरंत अभिक्षरित हुए उस उत्तम मधुको पितृ-श्राद्धकी विधिके अनुसार श्राद्धके समय पितरोंको
स्वधामृतेन सौम्येन तर्पयामास वै पितॄन्।<br>सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्तास्तथैव च॥ १३प्रदान करता है। इस प्रकार वह उत्तम स्वधामृतसे सौम्य, बर्हिषद्, काव्य तथा अग्निष्वात्त पितरोंको तृप्त करता
ऋतुरग्निः स्मृतो विप्रैर्ऋतुं संवत्सरं विदुः।<br>जज्ञिरे ऋतवस्तस्मादृर्तुभ्यो ह्यार्तवाऽभवन्॥ १४रहता है। महर्षियोंने ऋतुको अग्नि बतलाया है और ऋतुको संवत्सर भी कहते हैं। उस संवत्सरसे ऋतुकी उत्पत्ति होती है और ऋतुओंसे उत्पन्न हुए पितर आर्तव
पितरोऽर्तवोऽर्धमासा विज्ञेया ऋतुसूनवः।<br>पितामहास्तु ऋतवो ह्यमावास्याब्दसूनवः।<br>प्रपितामहाः स्मृता देवाः पञ्चाब्दा ब्रह्मणः सुताः॥ १५कहलाते हैं। आर्तव और अर्धमास पितरोंको ऋतुका पुत्र तथा ऋतुस्वरूप पितामह और अमावास्याको संवत्सरका पुत्र जानना चाहिये। प्रपितामह और पञ्च संवत्सररूप देवगण ब्रह्माके पुत्र माने गये हैं॥३—१५॥

५१० * मत्स्यपुराण *

सौम्या बर्हिषदः काव्या अग्निष्वात्ता इति त्रिधा।<br>गृहस्था ये तु यज्वानो हविर्यज्ञार्तवाश्च ये।<br>स्मृता बर्हिषदस्ते वै पुराणे निश्चयं गताः॥ १६<br>गृहमेधिनश्च यज्वानो अग्निष्वात्तार्तवाः स्मृताः।<br>अष्टकापतयः काव्याः पञ्चाब्दांस्तु निबोधत॥ १७<br>तेषु संवत्सरो ह्यग्निः सूर्यस्तु परिवत्सरः।<br>सोमस्त्विड्वत्सरश्चैव वायुश्चैवानुवत्सरः॥ १८<br>रुद्रस्तु वत्सरस्तेषां पञ्चाब्दा ये युगात्मकाः।<br>कालेनाधिष्ठितस्तेषु चन्द्रमाः स्रवते सुधाम्॥ १९<br>एते स्मृता देवकृत्याः सोमपाश्चोष्मपाश्च ये।<br>तांस्तेन तर्पयामास यावदासीत् पुरूरवाः॥ २०<br>यस्मात्प्रसूयते सोमो मासि मासि विशेषतः।<br>ततः स्वधामृतं तद्वै पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत् तदमृतं सोममवाप मधु चैव हि॥ २१<br>ततः पीतसुधं सोमं सूर्योऽसावेकरश्मिना।<br>आप्यायते सुषुम्णेन सोमं तु सोमपायिनम्॥ २२<br>निःशेषं वै कलाः पूर्वा युगपद्ध्यापयन्पुरा।<br>सुषुम्णाऽऽप्यायमानस्य भागं भागमहःक्रमात्॥ २३<br>कलाः क्षीयन्ति कृष्णास्ताः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च।<br>एवं सा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः॥ २४<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः।<br>एवमाप्यायितः सोमः शुक्लपक्षेऽप्यहःक्रमात्।<br>देवैः पीतसुधं सोमं पुरा पश्चात्पिबेद् रविः॥ २५<br>पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः।<br>आप्यायत्सुषुम्णेन भागं भागमहःक्रमात्॥ २६<br>सुषुम्णाप्यायमानस्य शुक्ला वर्धयन्ति वै कलाः।<br>तस्माद्घ्रसन्ति वै कृष्णाः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च॥ २७<br>एवमाप्यायते सोमः क्षीयते च पुनः पुनः।<br>समृद्धिरेवं सोमस्य पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ २८<br>इत्येष पितृमान् सोमः स्मृतस्तद्वत्सुधात्मकः।<br>कान्तः पञ्चदशैः सार्धं सुधामृतपरिस्त्रवैः॥ २९सौम्य, बर्हिषद्, काव्य और अग्निष्वात्त—पितरोंके ये तीन भेद हैं। इनमें जो गृहस्थ, यज्ञकर्ता और हवन करनेवाले हैं, वे आर्तव पितर पुराणमें बर्हिषद् नामसे निश्चित किये गये हैं। गृहस्थाश्रमी और यज्ञकर्ता आर्तव पितर अग्निष्वात्त कहलाते हैं। अष्टकापति आर्तव पितरोंको काव्य कहा जाता है। अब पञ्चाब्दोंको सुनिये। इनमें, अग्नि संवत्सर, सूर्य परिवत्सर, सोम इड्वत्सर, वायु अनुवत्सर और रुद्र वत्सर हैं। ये पञ्चाब्द युगात्मक होते हैं। समयानुसार इनपर स्थित हुए चन्द्रमा अमृतका क्षरण करते हैं। ये देवकर्म कहे जाते हैं। जबतक पुरूरवा वहाँ रहता था तबतक वह जो सोमप और ऊष्मप पितर हैं, उनको भी उसी अमृतसे तृप्त करता था। चूँकि चन्द्रमा प्रत्येक मासमें विशेषरूपसे अमृतका क्षरण करते हैं और वह सोमपायी पितरोंको स्वधामृतरूपसे प्राप्त होता है। इसीलिये वह अमृतस्वरूप मधु सोमको प्राप्त होता है। इस प्रकार पितरोंद्वारा चन्द्रमाका अमृत पी लिये जानेपर सूर्यदेव अपनी एकमात्र सुषुम्णा नामकी किरणद्वारा उन सोमपायी चन्द्रमाको पुनः परिपूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार सूर्य सुषुम्णाद्वारा पूर्ण किये जाते हुए चन्द्रमाकी पहलेकी सम्पूर्ण कलाओंको दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा करके पूर्ण करते हैं। चन्द्रमाकी कलाएँ कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं और शुक्लपक्षमें वे पुनः पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे चन्द्रमाका शरीर पूर्ण होता रहता है। इसी कारण शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे परिपूर्ण किये गये चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल पूर्णिमा तिथिको श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। पहले देवगण चन्द्रमासे स्रवित हुए अमृतको पीते हैं, उसके बाद सूर्य भी सोमका पान करते हैं। सूर्य अपनी एक किरणसे पंद्रह दिनोंतक सोमको पीते हैं और पुनः दिनके क्रमसे थोड़ा-थोड़ा कर सुषुम्णा किरणद्वारा उसे पूर्ण कर देते हैं। इसी कारण शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्षमें वे क्षीण होती हैं, यही इनका क्रम है। इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह दिनोंतक बढ़ते हैं और पुनः पंद्रह दिनतक क्षीण होते रहते हैं। चन्द्रमाकी इस प्रकारकी समृद्धि और ह्रास शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्षके आश्रयसे होते हैं। इस प्रकार सुधामृतस्रावी पंद्रह किरणोंसे सुशोभित ये चन्द्रमा सुधात्मक एवं पितृमान् कहे जाते हैं॥ १६—२९॥
* अध्याय १४१ *५११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अतः परं प्रवक्ष्यामि पर्वाणां संधयश्च याः।<br>यथा ग्रथ्नन्ति पर्वाणि आवृत्तादिक्षुवेणुवत्॥ ३०<br>तथाब्दमासाः पक्षाश्च शुक्लाः कृष्णास्तु वै स्मृताः।<br>पौर्णमास्यास्तु यो भेदो ग्रन्थयः संधयस्तथा॥ ३१<br>अर्धमासस्य पर्वाणि द्वितीयाप्रभृतीनि च।<br>अग्न्याधानक्रिया यस्तान्नीयन्ते पर्वसंधिषु॥ ३२<br>तस्मात्तु पर्वणो ह्यादौ प्रतिपद्यादिसंधिषु।<br>सायाह्ने अनुमत्याश्च द्वौ लवौ काल उच्यते।<br>लवौ द्वावेव राकायाः कालो ज्ञेयोऽपराह्निकः॥ ३३<br>प्रकृतिः कृष्णपक्षस्य कालेऽतीतेऽपराह्रिके।<br>सायाह्ने प्रतिपद्येष स कालः पौर्णमासिकः॥ ३४<br>व्यतीपाते स्थिते सूर्ये लेखादूर्ध्वं युगान्तरम्।<br>युगान्तरोदिते चैव चन्द्रे लेखोपरि स्थिते॥ ३५<br>पूर्णमासव्यतीपातो यदा पश्येत्परस्परम्।<br>तौ तु वै प्रतिपद्यावत्तस्मिन्काले व्यवस्थितौ॥ ३६<br>तत्कालं सूर्यमुद्दिश्य दृष्ट्वा संख्यातुमर्हसि।<br>स चैव सत्क्रियाकालः षष्ठः कालोऽभिधीयते॥ ३७<br>पूर्णेन्दुः पूर्णपक्षे तु रात्रिसंधिषु पूर्णिमा।<br>तस्मादाप्यायते नक्तं पौर्णमास्यां निशाकरः॥ ३८<br>यदान्योन्यवतो पाते पूर्णिमा प्रेक्षते दिवा।<br>चन्द्रादित्यौऽपराह्ने तु पूर्णत्वात्पूर्णिमा स्मृता॥ ३९<br>यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह।<br>तस्मादनुमतिर्नाम पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता॥ ४०<br>अत्यर्थं राजते यस्मात्पौर्णमास्यां निशाकरः।<br>रञ्जनाच्चैव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदुः॥ ४१<br>अमा वसेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरौ।<br>एका पञ्चदशी रात्रिरमावास्या ततः स्मृता॥ ४२इसके बाद अब मैं पर्वोंकी जो संधियाँ हैं, उनका वर्णन कर रहा हूँ। जैसे गन्ने और बाँसमें गोलाकार गाँठें बनी रहती हैं वैसे ही वर्ष, मास, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, अमावास्या और पूर्णिमाके भेद—ये सभी पर्वकी ग्रन्थियाँ और संधियाँ हैं। (प्रत्येक पक्षमें) प्रतिपद्-द्वितीया आदि पंद्रह तिथियाँ होती हैं। चूँकि अग्न्याधान आदि क्रियाएँ पर्वसंधियोंमें सम्पन्न की जाती हैं, अतः उन्हें (अमा, पूर्णिमा) पर्वकी तथा प्रतिपदाकी संधियोंमें करना चाहिये। चतुर्दशी और पूर्णिमा आदिके दो लवको पर्वकाल कहा जाता है तथा राकाके दूसरे दिनमें आनेवाले दो लवको पर्वकाल जानना चाहिये। कृष्णपक्षके अपराह्निक कालके व्यतीत हो जानेपर सायंकालमें प्रतिपदाके योगमें जो काल आता है उसे पौर्णमासिक कहते हैं। सूर्यके लेखा (विषुव)-के ऊपर व्यतीपातमें स्थित होनेपर युगान्तर कहलाता है। उस समय चन्द्रमा लेखाके ऊपर स्थित युगान्तरमें उदित होते हैं। इस प्रकार जब चन्द्रमा और व्यतीपात परस्पर एक-दूसरेको देखें और प्रतिपदा तिथितक उसी अवस्थामें स्थित रहें तो उस समय सूर्यके उद्देश्यसे उस समयको देखकर गणना करनी चाहिये। उसे सत्क्रियाकाल नामक छठा काल कहते हैं। शुक्लपक्षके पूर्ण होनेपर रात्रिकी संधिमें जब पूर्णचन्द्र उदय होते हैं, तब उसे पूर्णिमा कहते हैं। इसीलिये चन्द्रमा पूर्णिमाकी रातमें अपनी सभी कलाओंसे पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमा तिथिकी ह्रास-वृद्धि होती रहती है, अतः यदि वृद्धिके समय दूसरे दिन सूर्य और चन्द्र दिनमें पूर्णिमामें दीखते हैं तो वह तिथि पूर्ण होनेके कारण पूर्णिमा कहलाती है। यदि दूसरे दिन प्रतिपदाका योग होनेमें चन्द्रमाकी एक कला हीन हो गयी तो उस पूर्णिमाको अनुमति कहते हैं। यह अनुमति देवताओंसहित पितरोंको परम प्रिय है। चूँकि पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमा अत्यन्त सुशोभित होते हैं, इसलिये चन्द्रमाको प्रिय होनेके कारण उस पूर्णिमाको विद्वानोंने राका नामसे अभिहित किया है। कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं रात्रिको जब सूर्य और चन्द्र एक साथ एक नक्षत्रपर स्थित होते हैं, तब उसे अमावास्या कहा जाता है॥ ३०-४२॥
उद्दिश्य ताममावास्यां यदा दर्श समागतौ।<br>अन्योन्यं चन्द्रसूर्यौ तु दर्शनाद् दर्श उच्यते॥ ४३उस अमावास्याको लक्ष्य कर जब सूर्य और चन्द्रमा दर्शपर आ जाते हैं और परस्पर एक-दूसरेको देखते हैं, तब उसे दर्श कहते हैं।

१४३- यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिको वर्णन

५१२ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
द्वौ द्वौ लवावमावास्यां स कालः पर्वसंधिषु ।<br>द्व्यक्षरः कुहुमात्रश्च पर्वकालस्तु स स्मृतः ॥ ४४<br>दृष्टचन्द्रा त्वमावास्या मध्याह्नप्रभृतीह वै ।<br>दिवा तदूर्ध्वं रात्र्यां तु सूर्ये प्राप्ते तु चन्द्रमाः ।<br>सूर्येण सहसोद्गच्छेत्ततः प्रातस्तनात्तु वै ॥ ४५<br>समागम्य लवौ द्वौ तु मध्याह्नान्निपतन् रविः ।<br>प्रतिपच्छुक्लपक्षस्य चन्द्रमाः सूर्यमण्डलात् ॥ ४६<br>निर्मुच्यमानयोर्मध्ये तयोर्मण्डलयोस्तु वै ।<br>स तदान्वाहुतेः कालो दर्शस्य च वषट्क्रियाः ।<br>एतदृतुमुखं ज्ञेयममावास्यां तु पार्वणम् ॥ ४७<br>दिवा पर्व त्वमावास्यां क्षीणेन्दौ धवले तु वै ।<br>तस्माद् दिवा त्वमावास्यां गृह्यते यो दिवाकरः ॥ ४८अमावास्यामें पर्वसंधिके अवसरपर दो-दो लव पर्वकाल कहलाते हैं। इनमें प्रतिपदाके योगवाला पर्वकाल कुहू कहलाता है। जिस दिन दोपहरतक अमावास्यामें चन्द्रमाका सम्पर्क बना रहे और उसके बाद रात्रिके प्राप्त होनेपर चन्द्रमा सहसा सूर्यके निकट पहुँच जायें, पुनः प्रातःकाल सूर्यमण्डलसे पृथक् हो जायँ तो शुक्लपक्षकी प्रतिपदामें प्रातःकाल दो लव पर्वकाल कहलाता है। इस प्रकार सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलके पृथक् होते समय अमावास्याके उस मध्यवर्ती कालको अन्वाहुति कहते हैं। इसमें पितरोंके निमित्त वषट् क्रियाएँ की जाती हैं। इसे ऋतुमुख और अमावास्याको पार्वण जानना चाहिये। दिनमें जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यके साथ मिलते हैं तब अमावास्याका वह काल पर्वकाल कहलाता है। इसीलिये दिनमें अमावास्याके उस पर्वकालमें सूर्यके पहुँचनेपर सूर्य गृहीत हो जाते हैं अर्थात् सूर्यग्रहण लगता है।
कुहेति कोकिलेनोक्तं यस्मात्कालात् समाप्यते ।<br>तत्कालसंज्ञिता ह्येषा अमावास्या कुहूः स्मृता ॥ ४९कोयलद्वारा उच्चरित ‘कुहू’ शब्द जितने समयमें समाप्त होता है, अमावास्याका उतना मुख्य काल ‘कुहू’ नामसे कहा जाता है।
सिनीवालीप्रमाणं तु क्षीणशेषो निशाकरः ।<br>अमावास्या विशत्यर्कं सिनीवाली तदा स्मृता ॥ ५०सिनीवालीका प्रमाण यह है कि जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यमें प्रवेश करते हैं तब वह अमावास्या सिनीवाली कही जाती है।
अनुमतिश्च राका च सिनीवाली कुहूस्तथा ।<br>एतासां द्विलवः कालः कुहूमात्रा कुहूः स्मृता ॥ ५१<br>इत्येष पर्वसन्धीनां कालो वै द्विलवः स्मृतः ।<br>पर्वणां तुल्यकालस्तु तुल्याहुतिवषट्क्रियाः ॥ ५२अनुमति, राका, सिनीवाली और कुहू—इनका दो लवकाल पर्वकाल होता है। कुहू शब्दके उच्चारणपर्यन्त कालको कुहू कहते हैं। इस प्रकार पर्वसंधियोंका यह काल दो लवका बतलाया जाता है और यह पर्वोंके समान फलदायक होता है। इसमें हवन और वषट् क्रियाएँ की जाती हैं।
चन्द्रसूर्यव्यतीपाते समे वै पूर्णिमे उभे ।<br>प्रतिपत्प्रतिपन्नस्तु पर्वकालो द्विमात्रकः ॥ ५३चन्द्रमा और सूर्यका व्यतिपातपर स्थित होना तथा दोनों (अमावास्या और पूर्णिमा) पूर्णिमाएँ—ये सभी एक-से पुण्यदायक हैं। प्रतिपदाके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला पर्वकाल दो लवका होता है।
कालः कुहूसिनीवाल्यो समृद्धो द्विलवः स्मृतः ।<br>अर्कनिर्मण्डले सोमे पर्वकालः कलाः स्मृताः ॥ ५४इसी प्रकार कुहू और सिनीवालीके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ पर्वकाल भी दो लवका ही माना जाता है। चन्द्रमा जब सूर्यमण्डलसे बाहर होते हैं, तब वह पर्वकाल एक कलाका बतलाया जाता है।
यस्मादापूर्यते सोमः पञ्चदश्यां तु पूर्णिमा ।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव कलाभिर्दिवसक्रमात् ॥ ५५चूँकि दिनके क्रमसे पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमा पंद्रह कलाओंद्वारा पूर्ण किये जाते हैं, इसलिये उस तिथिको पूर्णिमा कहते हैं।
तस्मात् पञ्चदशे सोमे कला वै नास्ति षोडशी ।<br>तस्मात् सोमस्य विप्रोक्तः पञ्चदश्यां मया क्षयः ॥ ५६इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह कलाओंवाले* ही हैं, उनमें सोलहवीं कला नहीं है। इसी कारण मैंने पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमाका

* इसका विस्तृत वर्णन सूर्यसिद्धान्त, बृहत्संहिता आदिमें है। १६ वीं बीजकलासहित १५ ह्रास-वृद्धियुक्त कलाओंका वर्णन शारदातिलक आदिमें इस प्रकार है—‘अमृता मानदा नन्दा पूषा तुष्टि रतिर्धृतिः। शाशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥ पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः।' (शारदातिलक २।१२-१३)

* अध्याय १४१ *५१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्येते पितरो देवाः सोमपाः सोमवर्धनाः।<br>आर्तवा ऋतवोऽथाब्दा देवास्तान्भावयन्ति हि ॥ ५७क्षय बतलाया है। इस प्रकार ये सोमपायी देव-पितर सोमकी वृद्धि करनेवाले हैं और ऋतु एवं अब्दसे सम्बन्धित आर्तवसंज्ञक देवगण उन्हींके परिपोषक हैं ॥४३—५७॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि पितॄञ्श्राद्धभुजस्तु ये।<br>तेषां गतिं च सत्तत्त्वं प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि ॥ ५८इसके बाद अब मैं जो श्राद्धभोजी पितर हैं, उनकी गति, उनका उत्तम तत्त्व तथा उनके निमित्त दिये गये श्राद्धकी प्राप्तिका वर्णन कर रहा हूँ।
न मृतानां गतिः शक्या ज्ञातुं वा पुनरागतिः।<br>तपसा हि प्रसिद्धेन किं पुनर्मांसचक्षुषा ॥ ५९मृतकोंके आवागमनका रहस्य तो उत्कृष्ट तपोबलसम्पन्न तपस्वी भी नहीं जान सकते, फिर चर्मचक्षुधारी साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है।
अत्र देवान्पितॄंश्चैते पितरो लौकिकाः स्मृताः।<br>तेषां ते धर्मसामर्थ्यात्स्मृताः सायुज्यगा द्विजैः ॥ ६०<br><br>यदि वाश्रमधर्मेण प्रज्ञानेषु व्यवस्थितान्।<br>अन्ये चात्र प्रसीदन्ति श्रद्धायुक्तेषु कर्मसु ॥ ६१इन श्राद्धभोजियोंमें देवता और पितर दोनों हैं। इनमें जो अपने धर्मके बलसे सायुज्य मुक्तिको प्राप्त कर चुके हैं अथवा आश्रमधर्मका पालन करते हुए ज्ञान-प्राप्तिमें लगे हुए हैं और श्रद्धायुक्त कर्मोंके सम्पन्न होनेपर प्रसन्न होते हैं, उन्हें महर्षिगण लौकिक पितर कहते हैं।
ब्रह्मचर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि।<br>श्राद्धेन विद्यया चैव चान्नदानेन सप्तधा ॥ ६२<br><br>कर्मस्वेवेषु ये सक्ता वर्तन्त्या देहपातनात्।<br>देवैस्ते पितृभिः सार्धमूमपैः सोमपैस्तथा।<br>स्वर्गता दिवि मोदन्ते पितृमन्त उपास्ते ॥ ६३ब्रह्मचर्य, तप, यज्ञ, संतान, श्राद्ध, विद्या और अन्नदान—ये भूतलपर प्रधान धर्म कहे गये हैं। जो लोग मृत्युपर्यन्त इन सातों धर्मोंका पालन करते हुए इनमें आसक्त रहते हैं, वे ऊष्मप तथा सोमप देवताओं और पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें जाकर आनन्दका उपभोग करते हुए पितरोंकी उपासना करते हैं।
प्रजावतां प्रसिद्ध्यैषा उक्ता श्राद्धकृतां च वै।<br>तेषां निवापे दत्तं हि तत्कुलीनैस्तु बान्धवैः ॥ ६४ऐसी प्रसिद्धि उन संतानयुक्त श्राद्धकर्ताओंके लिये कही गयी है, जिनके लिये उनके कुलीन भाई-बन्धुओंने दानके अवसरपर श्राद्ध आदि प्रदान किया है।
मासश्राद्धं हि भुञ्जानास्तेऽप्येते सोमलौकिकाः।<br>एते मनुष्याः पितरो मासश्राद्धभुजस्तु वै ॥ ६५मासिक श्राद्धमें भोजन करनेवाले पितर चन्द्रलोकवासी हैं। ये मासश्राद्धभोजी पितर मनुष्योंके पितर हैं।
तेभ्योऽपरे तु ये त्वन्ये सङ्कीर्णाः कर्मयोनिषु।<br>भ्रष्टाश्चाश्रमधर्मेषु स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥ ६६<br><br>भिन्ने देहे दुरापन्नाः प्रेतभूता यमक्षये।<br>स्वकर्मण्यनुशोचन्तो यातनास्थानमागताः ॥ ६७इनके अतिरिक्त जो अन्य लोग कर्मानुसार प्राप्त हुई योनियोंमें कष्ट झेल रहे हैं, आश्रमधर्मसे भ्रष्ट हो गये हैं, जिनके लिये स्वाहा-स्वधाका प्रयोग हुआ ही नहीं है, जो शरीरके नष्ट होनेपर यमलोकमें प्रेत होकर दुर्गति भोग रहे हैं, नरक-स्थानपर पहुँचकर अपने कर्मोंपर पश्चात्ताप करते हैं,
दीर्घाश्चैवातिशुष्काश्च श्मश्रुलाश्च विवाससः।<br>क्षुत्पिपासाभिभूतास्ते विद्रवन्ति त्वितस्ततः ॥ ६८<br><br>सरित्सरस्तडागानि पुष्करिण्यश्च सर्वशः।<br>परान्नान्यभिकाङ्क्षन्तः काल्यमाना इतस्ततः ॥ ६९लम्बे शरीरवाले, अत्यन्त कृशकाय, लम्बी दाढ़ियोंसे युक्त, वस्त्रहीन और भूख एवं प्याससे व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ते हैं, नदी, सरोवर, तडाग और जलाशयोंपर सब ओर दूसरोंके द्वारा दिये गये अन्नकी ताकमें इधर-उधर घूमते रहते हैं,
स्थानेषु पात्यमाना ये यातनास्थेषु तेषु वै।<br>शाल्मल्यां वैतरण्यां च कुम्भीपाकेऽद्धवालुके ॥ ७०<br><br>असिपत्रवने चैव पात्यमानाः स्वकर्मभिः।<br>तत्रस्थानां तु तेषां वै दुःखितानामशायिनाम् ॥ ७१शाल्मली, वैतरणी, कुम्भीपाक, तप्तवालुका और असिपत्रवन नामक भीषण नरकोंमें अपने कर्मानुसार गिराये जाते हैं तथा उन नरकोंमें पड़े हुए जो निद्रारहित हो दुःख भोग रहे हैं,

५१४ * मत्स्यपुराण *


| तेषां लोकान्तरस्थानां बान्धवैर्नामगोत्रतः।<br>भूमावसव्यं दर्भेषु दत्ताः पिण्डास्त्रयस्तु वै।<br>प्राप्तांस्तु तर्पयन्त्येव प्रेतस्थानेष्वधिष्ठितान्॥ ७२<br>अप्राप्ता यातनास्थानं प्रभ्रष्टा ये च पञ्चधा।<br>पश्चाद्ये स्थावरान्ते वै भूतानीके स्वकर्मभिः॥ ७३<br>नानारूपासु जातीनां तिर्यग्योनिषु मूर्तिषु।<br>यदाहारा भवन्त्येते तासु तास्विह योनिषु॥ ७४<br>तस्मिंस्तस्मिंस्तदाहारे श्राद्धे दत्तं तु प्रीणयेत्।<br>काले न्यायागतं पात्रे विधिना प्रतिपादितम्।<br>प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र यत्रावतिष्ठति॥ ७५<br>यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो बिन्दति मातरम्।<br>तथा श्राद्धेषु दृष्टान्तो मन्त्रः प्रापयते तु तम्॥ ७६<br>एवं ह्यविकलं श्राद्धं श्रद्धादत्तं मनुर्ब्रवीत्।<br>सनत्कुमारः प्रोवाच पश्यन् दिव्येन चक्षुषा॥ ७७<br>गतागतज्ञः प्रेतानां प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि।<br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ७८<br>इत्येते पितरो देवा देवाश्च पितरश्च वै।<br>अन्योन्यपितरो ह्येते देवाश्च पितरो दिवि॥ ७९<br>एते तु पितरो देवा मनुष्याः पितरश्च ये।<br>पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः॥ ८०<br>इत्येष विषयः प्रोक्तः पितॄणां सोमपायिनाम्।<br>एतत्पितृमहत्त्वं हि पुराणे निश्चयं गतम्॥ ८१<br>इत्येष सोमसूर्याभ्यामैलस्य च समागमः।<br>अवाप्तिं श्रद्धया चैव पितॄणां चैव तर्पणम्॥ ८२<br>पर्वणां चैव यः कालो यातनास्थानमेव च।<br>समासात्कीर्तितस्तुभ्यं सर्ग एष सनातनः॥ ८३<br>वैरूप्यं येन तत्सर्वं कथितं त्वेकदेशिकम्।<br>अशक्यं परिसंख्यातुं श्रद्धेयं भूतिमिच्छता॥ ८४<br>स्वायम्भुवस्य देवस्य एष सर्गो मयेरितः।<br>विस्तरेणानुपूर्वाच्च भूयः किं कथयामि वः॥ ८५ | उन लोकान्तरमें स्थित जीवोंके लिये उनके भाई-बन्धुओंद्वारा यहाँ भूतलपर जब उनका नाम-गोत्र उच्चारण कर अपसव्य होकर कुशोंपर तीन पिण्ड प्रदान किये जाते हैं तब प्रेतस्थानोंमें स्थित होनेपर भी वे पिण्ड उन्हें प्राप्त होकर तृप्त करते हैं॥ ५८—७२॥<br><br>जो नरकोंमें न जाकर पाँच प्रकारसे विभक्त होकर भ्रष्ट हो चुके हैं अर्थात् जो मृत्युके उपरान्त अपने कर्मोंके अनुसार स्थावर, भूत-प्रेत, अनेकों प्रकारकी जातियों, तिर्यग्योनियों एवं अन्य जन्तुओंमें जन्म ले चुके हैं, वहाँ उन-उन योनियोंमें वे जैसे आहारवाले होते हैं, उन्हीं-उन्हीं योनियोंमें उसी आहारके रूपमें परिणत होकर श्राद्धमें दिया गया पिण्ड उन्हें तृप्त करता है। यदि श्राद्धोपयुक्त कालमें न्यायोपार्जित अन्न (मृतकोंके निमित्त) विधिपूर्वक सत्पात्रको दान किया जाता है तो वह अन्न वे मृतक जहाँ-कहीं भी रहते हैं, उन्हें प्राप्त होता है। जैसे बछड़ा गौओंमें विलीन हुई अपनी माँको ढूँढ़ निकालता है उसी प्रकार श्राद्धोंमें प्रयुक्त हुआ मन्त्र (दानकी वस्तुओंको) उस जीवके पास पहुँचा देता है। इस प्रकार विधानपूर्वक श्रद्धासहित दिया गया श्राद्ध-दान उस जीवको प्राप्त होता है—ऐसा मनुने कहा है। साथ ही महर्षि सनत्कुमारने भी, जो प्रेतोंके गमनागमनके ज्ञाता हैं, दिव्य चक्षुसे देखकर श्राद्धकी प्राप्तिके विषयमें ऐसा ही बतलाया है। कृष्णपक्ष उन पितरोंका दिन है तथा शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये उनकी रात्रि है। इस प्रकार ये पितृदेव और देवपितर स्वर्गलोकमें परस्पर एक-दूसरेके देवता और पितर हैं। यह तो स्वर्गीय देवों और पितरोंकी बात हुई। मनुष्योंके पितर पिता, पितामह और प्रपितामह हैं। इस प्रकार मैंने सोमपायी पितरोंके विषयमें वर्णन कर दिया। पितरोंका यह महत्त्व पुराणोंमें निश्चित किया गया है। इस प्रकार मैंने इला-नन्दन पुरूरवाका चन्द्रमा और सूर्यके साथ समागम, पितरोंको श्रद्धापूर्वक दी गयी वस्तुकी प्राप्ति, पितरोंका तर्पण, पर्व-काल और यातनास्थान (नरक)-का संक्षिप्त वर्णन आपको सुना दिया, यही सनातन सर्ग है। इसका विस्तार बहुत बड़ा है। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया है; क्योंकि पूर्णरूपसे वर्णन करना तो असम्भव है। इसलिये कल्याणकामीको इसपर श्रद्धा रखनी चाहिये। मैंने स्वायम्भुव मनुके इस सर्गका विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर दिया। अब पुनः आपलोगोंको क्या बतलाऊँ ?॥ ७३—८५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तने श्राद्धानुकीर्तनं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकीर्तनके प्रसङ्गमें श्राद्धानुकीर्तन नामक एक सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४१॥

* अध्याय १४२ *५१५

एक सौ बयालीसवाँ अध्याय

युगोंकी काल-गणना तथा त्रेतायुगका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>चतुर्युगाणि यानि स्युः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एषां निसर्गं संख्यां च श्रोतुमिच्छामो विस्तरात्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें जिन चारों युगोंका प्रवर्तन हुआ है, उनकी सृष्टि और संख्याके विषयमें हमलोग विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं॥ १॥
सूत उवाच<br>पृथिवीद्युप्रसङ्गेन मया तु प्रागुदाहृतम्।<br>एतच्चतुर्युगं त्वेवं तद् वक्ष्यामि निबोधत।<br>तत्प्रमाणं प्रसंख्याय विस्तराच्चैव कृत्स्नशः॥ २<br>लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम्।<br>तेनापीह प्रसंख्याय वक्ष्यामि तु चतुर्युगम्॥ ३<br>काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव<br>त्रिंशच्च काष्ठां गणयेत् कलां तु।<br>त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन्मुहूर्त-<br>स्तंस्त्रिशता रात्र्यहनी समेते॥ ४<br>अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके।<br>रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः॥ ५<br>पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः।<br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी॥ ६<br>त्रिंशद् ये मानुषा मासाः पैत्रो मासः स उच्यते।<br>शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाभ्यधिकानि तु।<br>पैत्रः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते॥ ७<br>मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।<br>पितॄणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै।<br>दश च द्व्यधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिताः॥ ८<br>लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः।<br>एतद्दिव्यमहोरात्रमित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पृथ्वी और आकाशके प्रसङ्गसे मैंने पहले ही इन चारों युगोंका वर्णन कर दिया है, फिर भी (यदि आपलोगोंकी उनको सुननेकी अभिलाषा है तो) संख्यापूर्वक उनके प्रमाणको विस्तारके साथ समूचे रूपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। लौकिक प्रमाणके द्वारा मानवीय वर्षका आश्रय लेकर उसीके अनुसार गणना करके चारों युगोंका प्रमाण बतला रहा हूँ। पंद्रह निमेष (आँखके खोलने और मूँदनेका समय)-की एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला मानी जाती है। तीस कलाका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तके रात-दिन दोनों होते हैं। सूर्य मानवीय लोकमें दिन-रातका विभाजन करते हैं। उनमें रात्रि जीवोंके शयन करनेके लिये और दिन कर्ममें प्रवृत्त होनेके लिये है। पितरोंके रात-दिनका एक लौकिक मास होता है। उनमें रात-दिनका विभाग है। पितरोंके लिये कृष्णपक्ष दिन है और शुक्लपक्ष शयन करनेके लिये रात्रि है। मनुष्योंके तीस मासका पितरोंका एक मास कहा जाता है। इस प्रकार तीन सौ साठ मानव-मासोंका एक पितृवर्ष होता है। यह गणना मानवीय गणनाके अनुसार की जाती है। मानवीय गणनाके अनुसार एक सौ वर्ष पितरोंके तीन वर्षके बराबर माने गये हैं। इस प्रकार पितरोंके बारहौं महीनोंकी संख्या बतलायी जा चुकी है। लौकिक प्रमाणके अनुसार जिसे एक मानव-वर्ष कहते हैं, वही देवताओंका एक दिन-रात होता है—ऐसी वैदिकी श्रुति है॥ २—९॥
दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः।<br>अहस्तु यदुदक्चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम्।<br>एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते तयोः पुनः॥ १०मानवीय वर्षके अनुसार जो देवताओंके रात-दिन होते हैं, उनमें भी पुनः विभाग हैं। उनमें उत्तरायणको देवताओंका दिन और दक्षिणायनको रात्रि कहा जाता है। इस प्रकार दिव्य रात-दिनकी गणना बतलायी जा चुकी।

१४४- द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन

५१६* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
त्रिंशद् यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः।<br>मानुषाणां शतं यच्च दिव्या मासास्त्रयस्तु वै।<br>तथैव सह संख्यातो दिव्य एष विधिः स्मृतः॥ ११<br>त्रीणि वर्षशतान्येवं षष्टिवर्षांस्तथैव च।<br>दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः॥ १२<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः।<br>त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः॥ १३<br>नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।<br>वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसंवत्सरः स्मृतः॥ १४<br>षट्त्रिंशत् तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः॥ १५<br>इत्येतद् ऋषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः।<br>दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता॥ १६<br>चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैवं चतुर्युगम्॥ १७<br>पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेताभिधीयते।<br>द्वापरं च कलिश्चैव युगानि परिकल्पयेत्॥ १८<br>चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः॥ १९<br>इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु।<br>एकपादे निवर्तन्ते सहस्राणि शतानि च॥ २०<br>त्रेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदुः।<br>तस्यापि त्रिशती संध्या संध्यांशः संख्यया समः॥ २१<br>द्वे सहस्त्रे द्वापरं तु संध्यांशौ तु चतुःशतम्।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां कलिरेव प्रकीर्तितः।<br>द्वे शते च तथान्ये च संध्यासंध्यांशयोः स्मृते॥ २२<br>एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या तु संज्ञिता।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुष्टयम्॥ २३<br>तत्र संवत्सराः सृष्टा मानुषास्तान् निबोधत।<br>नियुतानि दश द्वे च पञ्च चैवात्र संख्यया।<br>अष्टाविंशत्सहस्राणि कृतं युगमथोच्यते॥ २४<br>प्रयुतं तु तथा पूर्णं द्वे चान्ये नियुते पुनः।<br>षण्णवतिसहस्राणि संख्यातानि च संख्यया।<br>त्रेतायुगस्य संख्येषा मानुषेण तु संज्ञिता॥ २५तीस मानवीय वर्षोंका एक दिव्य मास बतलाया जाता है। इसी प्रकार सौ मानवीय वर्षोंका तीन दिव्य मास माना गया है। यह दिव्य गणनाकी विधि कही जाती है। मानुषगणनाके अनुसार तीन सौ साठ वर्षोंका एक दिव्य (देव)-वर्ष कहा गया है। मानुषगणनाके अनुसार तीन हजार तीस वर्षोंका एक सप्तर्षि-वर्ष होता है। नौ हजार नब्बे मानुष-वर्षोंका एक 'ध्रुव-संवत्सर' कहलाता है। छियानबे हजार मानुषवर्षोंका एक हजार दिव्य वर्ष होता है—ऐसा गणितज्ञ लोग कहते हैं। द्विजवरो! इस प्रकार ऋषियोंद्वारा दिव्य गणनाके अनुसार यह गणना बतलायी गयी है। इसी दिव्य प्रमाणके अनुसार युग-संख्याकी भी कल्पना की गयी है। ऋषियोंने इस भारतवर्षमें चार युग बतलाये हैं। उन चारों युगोंके नाम हैं—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि। इनमें सर्वप्रथम कृतयुग, तत्पश्चात् त्रेता, तब द्वापर और 'कलियुग आनेकी परिकल्पना की गयी है। उनमें कृतयुग चार हजार (दिव्य) वर्षोंका बतलाया जाता है। इसी प्रकार चार सौ वर्षोंकी उसकी संध्या और चार सौ वर्षोंका संध्यांश होता है। इसके अतिरिक्त संध्या और संध्यांशसहित अन्य तीनों युगोंमें हजारों और सैकड़ोंकी संख्यामें एक चतुर्थांश कम हो जाता है॥ १०-२०॥<br><br>इस प्रकार युगसंख्या-ज्ञाता लोग त्रेताका प्रमाण तीन हजार वर्ष, उसकी संध्याका प्रमाण तीन सौ वर्ष और संध्याके बराबर ही संध्यांशका प्रमाण तीन सौ वर्ष बतलाते हैं। द्वापरका प्रमाण दो हजार वर्ष और उसकी संध्या तथा संध्यांशका प्रमाण दो-दो सौ अर्थात् चार सौ वर्षोंका होता है। कलियुग एक हजार वर्षोंका बतलाया गया है तथा उसकी संध्या और संध्यांश मिलकर दो सौ वर्षोंके होते हैं। इस प्रकार कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चार युग होते हैं और इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्षोंकी बतायी गयी है। अब मानुषवर्षके अनुसार इन युगोंमें कितने वर्ष होते हैं, उसे सुनिये। इनमें कृतयुग सत्रह लाख