मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
समर्पण द्योतक पद १५३ इन राणा से मीराँ का क्या सम्बन्ध था, यह सर्वथा अनिश्चित है । बहुत सम्भव हो कि ये राणा जेठ ही रह हो । सम्भव है कि मीराँ अपने ही प्रति 'जेठ बहू' (प्रथम पाठ मे) की अभिव्यक्ति करती हैं अर्थात् सब मे बडी बहू । “यूँ कहै मीराँ बाईं” जैसी टेक भी विचारणीय है । सतमत का प्रभाव इस पद से भी स्पष्ट हो उठता है । “जिग मारग म्है जास्या” जैसी अभिव्यक्ति ‘गुरु’ और उनके प्रदर्शित मार्ग के प्रति मीराँ के विशेष अनुराग को ही सिद्ध करती है । २ चाला वाही देस, चाला वाही देस । कहो कुसम्भी सारी रगावा, कहो तो भगवा भेस । कहो तो मोतियन मांग भरावा, कहो तो छिटकावा केस । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सुणज्यो बिडद नरेस । ।।२३९।। यह पद विशेष महत्वपूर्ण है । “जिन जिन भेखा म्हारो साहिब रीझै, सोई सोई भेख धारणा”के लिये उतावली मीराँ स्वय ही यह निश्चित नही कर पा रही हैं कि आराध्य को कौन रूप स्वीकृत होगा । “कहो तो मोतियन भगवा भेस ।” सम्भव है कि वैष्णव और नाथ पथ की विभिन्न परम्पराओ के कारण ही ऐसी अभिव्यक्ति हुई हो ।
१५४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह मिश्रित भाषा में प्राप्त पद १ म्हाने चाकर राखो जी गिरधारी लाला, चाकर राखोजी। चाकर रहसूँ बाग लगासूँ, नित उठि दरसन पासू। वृन्दावन की कुंज गलिन मे गोविन्द लीला गासूं। चाकरी मे दरसनं पाऊ, सुमिरन पाऊं खरची। भाव भगत जागिरी पाऊं, तीनो बाता सरसी। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, गल वैजन्ती माला। वृन्दावन मे धेनु चरावै, मोहन मुरली वाला। ऊचे ऊचे महल बनाऊं, बिच बिच राखू बारी। सावरिया के दरसन पाऊ, पहिर कुसुम्मी सारी। जोगी आया जोग करन कूँ, तप करने सन्यासी। हरी भजन को साधू आए, वृन्दावन के वासी। मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा, हृदे रहो जी धीरा। आधी रात प्रभु दरसन दीन्हो, प्रेम नदी के तीरा ॥२४०॥ इस पद की टेक “मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा” सर्वथा नूतन है। २ मैं तो थारे दामन लागी जी गोपाल। किरपा कीजो दरसन दीजो, सुध लीजो तत्काल। गल बैजन्ती माल बिराजै, दर्शन भई है निहाल। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भक्तन के रखपाल। ॥२४१॥ पद की तृतीय और चतुर्थ पंक्तियों के द्वितीयार्द्ध विरोधात्मक भावना के द्योतक हैं।
समर्पण द्योतक पद १५५ ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ मेरे मन राम नाम बसी । तेरे कारण स्याम सुन्दर, सकल जोगा हांसी । कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहे कुलनासी । कोई कहै मीराँ दीप आगरी, नाम पिया सूं रासी । खाड धार भक्ति की न्यांरी, काटी है जम फासी ॥२४२॥ पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। कठिन सघर्ष के साथ ही साथ मीराँ को गहरा समर्थन भी प्राप्त हुआ। 'कुलनासी' और 'दीप आगरी' जैसे विशेषण साथ ही साथ मिले। वृन्दावन पहुँचने पर भी ये दोनों विरोधी धाराये अक्षुण्ण रही, यही ऐसे पदो से सुस्पष्ट होता है। २ हमारे मन राधा स्याम बसी। कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनासी। खोल के घूँघट प्यार के गाती, हरि ढिग नाचत गासी। वृन्दावन की कुजगलिन मे, भाल तिलक उर लसी। विष को प्याला राणा जी ने भेज्या, पीवत मीराँ हासी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति मार्ग मे फंसी ॥२४३॥ दोनो पदों की अन्तर्भावना एक ही है,तथापि प्रथम पद का भाव- गाम्भीर्य दूसरे पद मे नही। दूसरे पद की भाषा पर खडी बोली का भी प्रभाव भी विचारणीय है। पूर्वापर संगति, विचार-गाम्भीर्य और भाषा की शुद्धता के दृष्टिकोण से भी प्रथम पद प्रामाणिकता के अधिक निकट पडता सिद्ध होता है।
१५६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह ३ माई मै तो गोविन्द सो अटकी । चकित भए है दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी । शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला तट की । मोर मुकुट कटि किकिन राजै, दुति दामिनी पटकी । रमित भई हां सावरे के सग लोग कहै भटकी । छुटि लाज कुल कानि लोग डर, रह्यो न घर हटकी । मीराँ प्रभु के संग फिरैगी, कुजा कुजा लटकी । बिनु गोपाल लाल के सजवनी, को जानै घटकी ।।२४४।।† उपर्युक्त पद को प्रामाणिक मान लेने पर अभिव्यक्ति विचारणीय हो जाती है। पद मे परम्परानुगत टेक नही है। केवल 'मीराँ' नाम मात्र का प्रयोग किसी अन्य पद मे नही मिलता। टेक के बाद और एक पक्ति अन्य कुछ पदो मे भी मिलती है, परन्तु ऐसे पदो की प्रामाणिकता संदिग्ध ही है। ४ पग घूँघरू बाध मीराँ नाची रे । मै तो मेरे नारायण की, आपही हो गई दासी रे । लोग कहै मीराँ भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे । विष का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ दासी रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी रे ।।२४५।। उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली की छाप विशेष स्पष्ट दिखती है। “सहज मिले अविनासी' जैसी अभिव्यक्ति विचारणीय है। सम्भवत इसको संतमत का ही प्रभाव कहा जा सकता है। संतमत से प्रभावित पदो “साँवरे रग राची” जैसे पद से इस पद का बहुत साम्य है। विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से एक स्वतन्त्र पद का बन जाना असम्भव नही प्रतीत होता तथापि यह कहना असम्भव हे कि कौन पद किस रूप मे प्रामाणिक है।
समर्पण द्योतक पद १५७ ५ चितनन्दन आगे नाचूँगी। नाच नाच पिय रसिक रिझाऊ, प्रेमी जन को जाचूँगी। प्रेम प्रीति का बाध घूघरा, ‘सुरत की कछनी काढूँगी। लोक लाज कुल की मरजादा,या मै एक न राखूँगी। पिया के पलगा जा पोढूँगी, मीराँ हरि रग राचूँगी ॥२४६॥ पूर्व पद का पाठान्तर से प्रतीत होते इस पद पर सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण स्पष्ट हो जाता है। भाषा पर खड़ी बोली का प्रभाव भी विचारणीय है। प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त ‘चितनन्दन’ के बदले ‘रघुनन्दन’ और द्वितीय पंक्ति मे ‘पिय’ के बदले ‘यदुनाथ जी’ शब्द का भी व्यवहार मिलता है। पाठान्तर १, घूघरू बाध मीराँ नाची रे, पग घूघरूं। लोग कहै मीराँ हो गई बावरी, सास कहै कुलनासी रे। जहर का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ हासी रे। मै तो अपने नारायण की आपही हो गई दासी रे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बेग मिलो अविनासी रे। ६ मै गिरिधर के घर जाऊ। गिरिधर म्हारो साचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं। रैन पडे तब हि उठि धाऊ, भोर भये उठि आऊ। रैन दिना वाके सग खेलूँ, ज्यो त्यो ताहि लुभाऊ। जो पहिरावै सोई पहिरू, जो दे सोई खाऊं। मेरी उन की प्रीत पुरानी, उन बिन पल न रहाऊ। जहा बैठावै तित ही बैठूं, बेचै तो बिक जाऊ। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊ ॥२४७॥
१५८ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह उपर्युक्त पद मे 'म्हारो' (मेरा) और 'धारो', (आपका या तुम्हारा) ये दो शब्द शुद्ध राजस्थानी के है, जब कि शेष पद की भाषा ब्रजभाषा है। परशुराम जी द्वारा सग्रहीत 'पदावली' मे 'उन की', 'पुरानी' आदि के बदले 'उण की' 'पुराणी' आदि का प्रयोग मिलता है, जिससे पद की भाषा पर राजस्थानी प्रभाव और भी स्पष्ट हो उठता है। ७ हरि मेरे जीवन प्राण अधार। और आसिरो नाहि न तुम बिनु, तीनूं लोक मझार। आप बिना मोहि न सुहावं, निरख्यौ सब ससार। मीराँ कहे मै दासी बावरी, दीज्यो मति बिसार ॥२४८॥ ८ निपट बक्ट छबि अटकै मेरे नैना, निपट बक्ट छबि अटके। देखत रूप मदन मोहन को, पियत मयूखन अटके। वारिज भवा अलका टेढी, मनो अति सुगध रस वटके। टेढी कटि टेढी कर मुरली, टेढी पाग लर लटके। मीराँ प्रभु के रुप लुभानी, गिरिधर नागर नटके ॥२४९॥ ९ सखी मेरो कानूड़ो कलेजे कोर। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की झकझोर। बिन्द्रावन की कुज गलिन मे, नाचत नन्दकिशोर। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चितचोर। ॥२५०॥
समर्पण द्योतक पद १५९ विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद १ हमरे रौरे लागिल कैसे छूटे। जैसे हीरा हनत निहाई, तैसे हमरे रौरे बनि जाई। जैसे सोना मिलत सोहागा, तैसे हम रौरे दिल लागा। जैसे कमल नाल बिच पानी, तैसे हम् रौरे मन मानी। जैसे चन्दा मिलत चकोरा, तैसे हम रौरे दिल जोरा। जैसे मीराँ पति गिरधारी, तैसे मिलि रहू कुज बिहारी ॥२५१॥ पद की भाषा स्पष्ट रूपेण अवधी है। २ जो तुम तोडो पिया, मै नही तोडे्। तोरी प्रीत तोडी, कृष्ण कौन सग जोडे्। तुम भये तरुवर, मै भई पखिया। तुम भये सरवर, मै भई मछिया। तुम भये गिरिवर, मै भई चारा। तुम भये चदा, मै भई चकोरा। तुम भये मोती प्रभुजी, हम भये धागा। तुम भये सोना, हम भये सुहागा। बाई मीराँ के प्रभु, ब्रज के बासी। तुम मेरे ठाकुर, मै तेरी दासी ॥२५२॥† भाव, भाषा दोनो के ही आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है। भाषा खडी बोली है और भाव मे वह गाम्भीर्य नही है जो तथाकथित मीराँ के पदो मे प्राय प्राप्त है। उपर्युक्त पद की तुलना कीर्तन-मंडली के चालू पदो से की जा सकती है।
१६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह गुजराती में प्राप्त पद १ मुखडानी माया लागी रे मोहन प्यारा। मुखडु मे जोयुँ¹ तारुँ² सर्वजग थार्युँ³ खारु। सब मारु रहूदूँ न्यारु रेयु ससारीडु सुख एवु झाझ बाना नीर जोवुँ⁴, तेरे तुच्छ करी करीए रे। मीराँ बाई बलिहारी, आशा मने तकतारी, हवेँ⁵ हुँ तो बड भागी रे† ।।२५३।।† २ लेह लागी मने तारी, आल्याजी लेह लागी मने तारी। काम काज मुक्युँ⁶ ने धाम ज मुक्युँ, मनमा चाहु छुँ मुरारी। खमे छै काबली हाथ मा छे बासरी, गोकुल मा गायो चारी। सोल सहस्त्र गोपियो ने तमे वरिया, तोय तमे बाल ब्रह्मचारी। मीराँ कहे प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।।२५४।।† पद की तीसरी पंक्ति की अभिव्यक्ति शेष पद से सर्वथा भिन्न पड़ती है, “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर” का प्रयोग भी गुजराती पदो की परम्परा के अनुसार नही है। ३ नागर नन्दा रे बाल मुकुन्दा, छोडी छोने जनना धधा रे, मारी नजरे रहे जो रे नागर नन्दा। ─────── १ देखा, २ तुम्हारा, ३ हो गया, ४ जैसा, ५ अब, ६ छोड दिया।
समरंग द्योतक पद १६१ काम ने काज मने कांई नव सूझे, भूलि गई हूँ मारा घर धंधा रे। आडु अवलुं मे तो कांई नव जोयुं, जोया जोया छे पुनम केरा चंद रे। बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, लागी छे मोहनी मने फदा रे ॥॥२५५॥† ४ राम रमकडू १ जडियो रे रानाजी, मने राम रमकडो जडियो। रुमझुम कर तो मारे मन्दिरे पधारियो, नही कोई याते घडियों रे। मोटा मोटा मुनीजन मथी मथी थाक्या, कोई एक बिरला ने हाथे चुड़ियो रे। सुनु सिखर ना रे घाटती, ऊपर अगम अगोचर नाम पडचुं रे। बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मारु नाम सामलियां सूं जडियो रे। ॥२५६॥† ५ राम सीता पती थारी नेह लागी हो। हो तम्ने भजी थी म्हांरी मीड भागी। घरनो तो धन्ध रे मने नथी गमतौ। साधु सधा ते मारी प्रीत बाधी। काम काज छोड़िया मै तो लोक लाज मेली। प्रेम मगन मा हू राजी। अज्ञान मी कोठड़ी मा ऊध घनी आवै। प्रेम प्रकाश मा हू जागी। दुरजन लोग मारे निन्दा करे छे। वा'ला लागे छै मानो वैरागी। नाची कूदी मे तो भक्ति न कीधीं। लोक नी लाज मै बहू राखी। १ खिलौना। ११
१६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ध्रुव जी ने लागी, प्रल्हाद जी ने लागी। द्रोपदी ने सभा मा भीड भागी। बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर। जन्मो जनम नी हू त्यगी। ॥२५७॥† पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास और पूर्वापर संगति का अभाव है। कही कही अर्थ संगति भी नही बैठती। अन्तिम दो पक्तियो की गर्वोक्ति के आधार पर पद का मीराँ विरचित होने मे सदेह होता है। ६ सुन्दरि स्याम सरीरं म्हार दिल, सुन्दरि स्याम सरीर। कोई ने भाव भवानी ऊपर, कोई ने वाला पीर। गगा रे कोई ने जमुना रे कोई ने, कोई ने अडसड तीर। कोई नी रे हस्ती कोई नी रे घोडा, कोई नी रे म्हैल मन्दीर। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, हरी हलधर केरा बीर ॥२५८॥† ७ नही रे बिसरु हरि अन्तर मां थी नही रे। जल जमुना ना पाणी रे जाता शिर पर मटकी धरी। आवतां न जाता मारग बचे अमूलख वस्तु जडी। आवता न जाता रे वृन्दा रे बन मा चरण तमारी पड़ी रे। पीला पीताम्बर जरकस जामा, केसर आड करी। मोर मुकुट ने काने रे कुडल, मुख पर मुरली धरी। बाई मीराँ कहे प्रभु गिरिधर ना गुण, विट्ठल बर ने बरी ॥२५९॥† पदार्भिव्यक्ति मे पूर्वापर सबंध और अर्थ संगति का अभाव है। पद की अन्तिम पंक्ति विचारणीय है। गुजराती मे प्राप्त अधिकाश
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद राजस्थानी में प्राप्त पद १ तुमर कारण सब सुख छाड़्या, अब मोहिं क्यूं तरसावौ हो । बिरह बिथा लागी उर अन्तर, सो तुम आप बुझावौ हो । अब छोड़त नाहि बणै प्रभु जी, हँसि करि तुरत बुलावौ हो । मीराँ दासी जनम जनम की, अग से अग लगावौ हो ॥२६०॥ इस पाठ की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। पद की अभि- व्यक्ति के आधार पर ही ऐसा प्रतीत होता है कि सम्भवत पद की कुछ पूर्व पंक्तियाँ लुप्त हो गई है। “अब छोड़त नाहिं बणै प्रभु जी” अभि- व्यक्ति विचारणीय है। २ थांरी हूँ रमैया मोसूं नेह निभावौ । थारे कारण सब सुख छोड्या, हमकूं क्यू तरसावौ । बिरह बिथा लागी उर अन्दर, सो तुम आय बुझावौ । अब छोड़या नाहि बनै प्रभु जी, हँस कर तुरत बुलावौ । मीराँ दासी जनम जनम की, अंग सूं अग लगावौ ॥२६१॥ उपर्युक्त दोनों पदों मे गहरा साम्य विचारणीय है।- द्वितीय पद की भाषा राजस्थानी प्रधान है, जब कि पहले पद पर आधुनिक प्रभाव स्पष्ट है। यह पद पूर्व पद से अधिक पूर्ण भी प्रतीत होता है।
१६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ३ पपइया रे पिव की बाणी न बोलं। सुणि पावेली बिरहणी रे, थांरी राखेली पाख मरोड। चोच कटाऊ पपइया, ऊपरि कालर लूण। पिव मेरा मै पिव की रे, तू पिव कहैस¹ कूण। थारा सबद सुहावणा रे, जो पिव मेल्या² आज। चोच मढाऊ थांरी सोवनी³ रे, तू मेरे सिरताज। प्रीतम को पतिया लिखूँ, कऊवा तू ले जाइ। प्रीतम जू सूं यो कहै रे, थारी बिरहणी धान न खाइ। मीराँ दासी ब्याकुली रे, पिव पिव करत बिहाई⁴। बेगि मिलो प्रभु अन्तरजामी, तुम बिन रह्योइ न जाइ॥२६२॥ उपर्युक्त पद की कुछ पंक्तिया "प्रीतम कूँ ...... रह्योइ न जाय" स्वतन्त्र पद के रूप मे भी प्राप्त है। ४ साजन घर आवो जी मिठबोला। कब की ठाढ़ी पथ निहारू, था ही आया होसी भला। आवो निसक सक मत मानो, आयौ ही सुख रहला। तन मन वार करू न्योछावर, दीजो स्याम मोहेला। आतुर बहुत बिलम नही करना, आया ही रग रहेला। तेरे कारण सब रग त्यागा, काजल तिलक तमोला। तुम देख्या बिन कल न परत है, कर धर रही कपोला। मीराँ दासी जनम जनम की, दिल की घुन्डी खोला। ॥२६३॥ १ कहने वाला "कहै" शब्द मे 'स' लय बैठाने के लिये जोड दिया गया है। राजस्थानी गीत-परम्परा मे प्राय ऐसा होता है। २ मिले, ३ सुन्दर, ४ बेहाल।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६७ पाठान्तर १; सजन घर आवो जी मीठां बोला¹। बिन देखे मोहे कल न पडत है, कर धर रही कपोला। आवो निसक सक नहि कीजे, हिलमिल के रग घोला। तेरे कारण सब सब रग तजिया, काजल तिलक तमोला। मीराँ दासी जनम जनम की, दिल की घुंडी खोला। पाठान्तर २, साजन घर आवो जी मीठां बोला। कब की ठाढी पथ निहारू, कर धर रही कपोला। तन मन बार हिलमिल के रग घोला। आतुर बिरहनी बिलब नही करना, आयां ही रग रहेला। मीराँ तो गिरधर बिन देख्यां, छिन मासा छिन तोला। ५ राणा जी म्हारी प्रीत पुरबली, मै काई करू। राम नाम बिन घड़ी न सुहावै, राम मिले म्हारा हियरा ठर्याय²। भोजनिया नहि भावै, म्हाने नीदड़ली नही आय। विष को प्यालो भेजियो जी, जावो मीराँ पास। कर चरणामृत पी गई रे, म्हांरे राम जी को विस्वास। विष का प्याला पी गई रे, भजन करै उस ठौर। थारी मारी ना मरू, राखणहार और। छापा तिलक बनाविया जी, मन में निश्चय धार। राम जी काज संवारिया, म्हांने भावे गरदन मार। पेट्या बासक भेजिया जी, यो छै मोतिडारो हार। १ मधुर भाषी, २ ठढा होय
१६८ मीरां-बृहद्-पद-संग्रह नाग गले पहरिया, म्हांरे महलां भयो उजार। राठौड़ा री धीहडी जी, सिसोद्यां रे साथ। ले जाती बैकुठ कूँ, म्हांरी नेक न मानी बात। मीराँ दासी राम की जी, राम गरीब निवाज। जन मीराँ को राखज्यो, कोई बांह गहे की लाज। ॥२६४॥ उपर्युक्त पद की कुछ पंक्तिया "विष को प्यालो भेजियो जी म्हांरी नेक न मानी बात" और एक अन्य पद "मीराँ बैठी महल में उठत बैठत राम" की पंक्तियां हूबहू है। इन पंक्तियो की अभिव्यक्ति भी प्रथम तीन पक्तियो की अभिव्यक्ति से सर्वथा भिन्न पड़ती है। इस पद की कुछ पंक्तियो मे निम्नांकित पाठान्तर भी मिलता है। "राम नाम बिन नही भावै, हिवडो झोला खाय" पद की पाचवी पंक्ति मे "राम जी" के बदले "गोविन्द" शब्द का प्रयोग मिलता है। इसी तरह अन्तिम दो पंक्तियो मे भी "राम" के बदले "श्याम" का प्रयोग मिलता है। "मीराँ दासी" और "जन मीराँ" का एक ही साथ प्रयोग इस पद की विशेषता है, जो विचारणीय है। ६ म्हांरा ओलगिया १ घर आज्यो जी। सुख दुख खोलि कहूं अतर की, बेगा २ बदन ३ बताज्यो जी। च्यार पहर च्यारू जुग बीत्या, नैणा नीद न आवै जी। पूरण ब्रह्म अखंड अविनासी, तुम बिन बिरह सतावै जी। नैणा नीर आम ज्यूँ झरण, ज्यूँ मेघ झरण लाया जी। रतवती इत राम कत बिन, फिरत बदन बिलखाया जी। साधू सजन मिलै सिर साटै, तन मन करूं बधाई जी। जन मीराँ नै मिलौ कृपा करि, जनमि जनमि मितराई जी। ॥२६५॥ १ परदेशवासी प्रीयतम, २ शीघ्र, ३ मुख।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६९ ७ जोगिया म्हांने दरस दियां सुख होइ। नातरि दुखी जग माहि जीवडो, निसि दिन झूरै¹ तोइ। दरस दिवानी भई बावरी, डोली सब ही देस। मीराँ दासी भई है पडर,² पलट्ट्या काला केस। ॥२६६॥ ८ तुम आवो जी प्रीतम मेरे, नित बिरहणी मारग हेरे। दुख मेटण सुख दाइक³ तुम हौ, किरपा करिल्यौ नेरे⁴। बहुत दिना की जोऊ मारग, अब क्यूँ कुरो रे अबेरे⁵। आतर⁶ अधिक कहू किस आगे, आज्यौ मित⁷ सबेरे। मीराँ दासी चरनन की, हम तेरे तुम मेरे। ॥२६७॥ ९ प्यारे दरसन दीज्यौ रे, आइ रे आइ। तुम बिन रह्यौ न जाइ रे जाइ। जल बिन कंवल, चन्द बिन रजनी। ऐसे तुम देख्या बिन सजनी। किरपा करि कै बेग पधारो। बिरह करेजा खाइ रे खाइ। दिवस न भूख नीद नही नैना। मुख सूँ कहत न आवै बैना। १ किसी की विरह स्मृति मे शनै. शनै क्षीण होते जाना, २-सफ़ेद, ३ देने वाले, ४ निकट, ५ देर, ६ आतुरता, ७ मित्र, राजस्थानी मे 'मीत' प्रणय जनित मित्रता को ही कहते हैं।
४. राणा प्रबोध एवं विष-पान प्रसंग
१७० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह आकुल ब्याकुल फिरूं रैन दिन। मिलि करि ताप बुझाइ रे बुझाइ। क्यूं तरसावो अतरजामी। आण मिलो किरपा करि स्वामी। मीराँ दासी जनम जनम की। पडूँगी तुम्हारे पांइ रे पाइ ॥२६८॥† इस पद की शैली “आइं रे आइ” आदि प्रयोग अन्य पदो से सर्वथा विभिन्न पड़ती है। पद की चतुर्थ पंक्ति मे “सजनी” शब्द का प्रयोग भी विचारणीय है। हिन्दू दर्शन के आधार पर कही भी आराध्य को “सजनी” के रूप मे नही देखा गया है। पद मे व्यक्त भावना भी प्रायः इन्ही शब्दो मे अन्य पदो मे मिल जाती है। मेरे विचार से ऐसे पदो को विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से बना हुआ लोकगीत ही समझना अधिक उपर्युक्त प्रतीत होता है। डा० श्री कृष्ण लाल के मतानुसार यह पद सम्भवत रैदास का हो सकता है। १० माई म्हारी हरी हू न बूझी¹ बात। पिंड मा² सूं³ प्राण पापी, निकसी क्यूं नहि जात। पाट न खोल्या मुखां न बोल्या, साझ भई परभात। अबोलणाँ⁴ जुग बीतण लागे, हो काहे की कुसलात। सावण आवण कह गया रे, हरि आवन की आस। रैण अधेरी, बीज चमकै, तारा गिणत निरास। लेइ कटारी कठ सारू, मरूंगी विष खाइ। मीराँ दासी राम राती, लालच ही ललचाइ। ॥२६९॥ १ पूछी, हरि ने मेरी परवाह नही की, २ मे, ३ से, ४ अनबोले, बिना बोले हुए।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७१ पाठान्तर १, माई म्हांरी हरि न बूझी बात। पिंडं मे से प्राण पापी, निकस क्यूं नही जात। रैण अधेरी, बिरह घेरी, तांरा गिणत निसी जात। ले कटारी कठ चीरू, करूगी अपघात¹। पाट² न खोल्या, मुखा न बोल्या, साझि लग परभात। अबोलना मे अवधि बीती, काहे की कुसलात। सुपन मे हरि दरस दीन्हो, मै न जाण्यो हरि जात। नैना म्हारा उघडि आया, रही मन पछतात। आवण आवण होय रह्यो री, नही आवण की बात। मीराँ व्याकुल बिरहणी रे बाल ज्यो बिललात। पद विशेष महत्वपूर्ण है। अभिव्यक्ति के आधार पर पद को दो अंशो मे बाटा जा सकता है। “माई ... कुसलात” अर्द्धांश से आराध्य की निकटता और अप्रसन्नता ही सिद्ध होती है। परन्तु “सावण आवण तारा गिणत निरास” से वियोग की ही स्थिति स्पष्ट हो उठती है। प्रथम पाठ की अन्तिम दोनो पक्तियो को उपर्युक्त दोनो ही अभिव्यक्तियो के साथ घटाया जा सकता है। द्वितीय पद की आठवी पंक्ति की भावना विशेष विचारणीय है। पश्चात्ताप की अभिव्यक्ति दो एक अन्य पदो मे भी मिलती है। पद की प्रमुख भावना के अनुसार आराध्य की निकटता और अप्रसन्नता ही व्यक्त होती है। इस अप्रसन्नता से ऊबकर मीराँ आत्महत्या का भी निश्चय कर लेती है, परन्तु आराध्य दर्शन के लोभ मे वह भी नही कर पाती । ऐसी अभिव्यक्ति किसी भी अन्य पद मे नही प्राप्त होती। अत उपर्युक्त पद विशेष रूप से विचारणीय है। १ आत्महत्या, २ दरवाजा या पर्दा, ।
१७२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ११ कुण१ बांचे पाती , प्रभु बिन कुण बांचे पाती । कागद लै ऊधौ जी आए, कहा रहै साथी । आवत जावत पांव घिसा रे, (वा'ला) अखियां भई राती । कागद लै राधा बांचण बैठी, भर आई छाती । नैन नीरज अब बहै, (वा'ला) गंगा बहि जाती । पानां ज्यूं पीली पड़ी रे, (वा'ला) अन्न नही खाती । हरि बिन जिवड़ो यूँ जलै रे, (वा'ला) ज्यू दीपक संग बाती । साचां कुछ चकोर चंद, धोलै बहि जाती । ब्रज नारी की बिनती रे, (वा'ला) राम मिले मिलजाती । मनै भरोसा राम को रे, (वा'ला) डूबत नार्यै हाथी । दास मीरां लाल गिरधर, सांकड़ारो२ साथी । ॥२७०॥† इस पद मे जगह जगह 'हरि' शब्द का प्रयोग हुआ है। 'हरि' शब्द के बदले कही 'राम' और कही 'कृष्ण' प्रयोगयुक्त पाठान्तर भी मिलते है। 'रे', 'वा'ला', 'जी' आदि शब्दो का प्रयोग अधिकांश राजस्थानी लोक-गीतो मे होता है। लय की पूर्ति ही इनका एकमात्र उदेश्य है। पद के प्रारम्भ मे ऊधव के पत्र लेकर आने का वर्णन है, परन्तु शेष पद मे ऊधव की कोई चर्चा नही है। पद विचारणीय है। १२ रावलौ बिडद मोहि रूड़ो३ लागे, पीड़ित पराये प्राण । सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान । ग्राह गह्यो गजराज उबार्यो, बूड न दियो छै जान४ । मीराँ दासी अरज करत है, नाही जी सहारो आन । ॥२७१॥ 'बैरी सकल जहान" जैसी अभिव्यक्ति विचारणीय है। तयाकथित मीराँ के पदों मे यही एक पद ऐसा है जिसमें 'हारे को हरिनाम' जैसी भावना व्यक्त होती है। १ कौन, २ बुरे दिन, ३ अच्छा, ४ ब़ारात ।
“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७३ १३ तुम जीमों गिरधर लाल जी। मीराँ दासी अरज करै छे, सुनिए परम दयाल जी। छप्पन भोग छतीसो विजन,¹ पावो जन प्रतिपाल जी। राज भोग आरोगो² गिरधर, सनमुख राखो थाल जी। मीराँ दासी चरण उदासी, कीजै बेग निहाल जी। ॥२७२॥ पद के प्रारम्भ और अन्त मे मीराँ दासी का प्रयोग हुआ है। एक ही पद मे ऐसी पुनरुक्ति युक्त पद यह एक ही है। अन्तिम चरण मे “चरण उदासी” प्रयोग सम्भवत उदासी सम्प्रदाय के प्रभाव का द्योतक है। १४ तुम जीमो गिरधर लाल जू। मीराँ दासी अरज करै छै, मोकूँ करों निहाल जू। या बिरियां² है बालबोग की, लीज्यो चित मे धार जू। केसर अतर पुष्प के हरवा, इण विध करो सिणगार जू। छप्पन भोग छतीसो विंजन, लाई भर भर थाल जू। पान गिलोरी सुगध मिलाकर, कीनी है सब त्यार जू। मीराँ दासी परिक्रमा की, मौकूँ करौ निहाल जू। ॥२७३॥† उपर्युक्त दोनो पदो का गहरा साम्य विचारणीय है। सम्भवत दोनों ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर हो। १५ पिया तेरे नाम लुभाणी हो। नाम लेत तिरता सुण्या, जैसे पाहण पाणी हो। सुगिरत कोइ न कियो, बहु करम कुमाणी हो। १ भोजन करो, २ समय।
१७४ मीरॉँ-बृहद्-पद-संग्रह गणिका कीर पढांवता, बैकुठ बसाणी१ हो। अरध नाम कुजर लियो, बाकी अवध घटाणी हो। गरुड़ छाडि हरि धाइया, पसु जून२ मिटाणी हो। नाम महातम गुरु दियो, परतीत३ पिछाणी हो। मीराँ दासी रावली, अपणी कर जाणी हो। ॥२७४॥ इस पद मे गुरु की चर्चा और पौराणिक गाथाओ का वर्णन मिलता है जिससे सत और वैष्णव , दोनो ही मतो का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है। १६ कहो तो गुण गाऊ रे, भजै राम राम सुवा, कहो तो गुण गांऊ रे। सार की सलियाँ४ को सूवा, पींजरो बणाऊ रे। पींजरा मे आव सूवा, हाथ सूं हलाऊं रे। घीव कर घबिर सूवा, मो लापसी५ रधाऊं६ रे। आम ही को रस सूवा, घोल घोल पाऊ रे। कचन कोटि महल मन्दिर, मालिया झुकाऊ रे। मालिया मे आव सूवा, मोतिडा बधाऊ रे। बैठक करो तो सूवा, चादणी बिछाऊं रे। प्रेम ही प्रताप सूवा, झाझरी बजाऊं रे। जाई जाबूं केतकी सूवा, फूलडा सुंघावूं रे। केसर भरियो बाटको सूवा, अक चरचाऊ रे। मीराँ दासी सूवा राम की राती, चरणा ही चित लगाऊ रे। ॥२७५॥† १ बसा दिया, २ योनि, ३ विश्वास, ४ सीक, ५ गेहूँ से बनाया गया मीठा दलिया, ६ बना पाऊँ।