मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
पञ्चमोऽङ्कः २८७
करने वाले कुमार मलयकेतु को भी धोखा देना है—यह कठिन एवम् आश्चर्यजनक (विषय) है। अथवा—
क्षणिक धन की प्राप्ति के कारण लज्जा, सम्मान, अपने यश और कुल से भी विमुख होकर धनवान् के हाथ शरीर को बेचकर विवेक का अतिक्रमण करके पराधीन होकर इस समय उस (धनवान्) की आज्ञा का अनुसरण करता हुआ (मेरे जैसा व्यक्ति) यह हितकारी है और यह अहितकारी है, ऐसा क्यो सोचता है? ॥४॥
टिप्पणी—आस्थानमण्डपे—सभामण्डपे। आ√स्था + ल्युट् भावे = आस्थानम्। तस्य मण्डपः, तस्मिन्। 'मण्डपोऽस्त्री जनाश्रयः' इत्यमरः। अतिसन्धातव्यः—प्रतारणीयः। विचारातिक्रान्त—परित्यक्तसदसद्विवेकः। इस पद्य मे पदार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार है, प्रसाद गुण है, वैदर्भी रीति है और शिखरिणी छन्द है ॥४॥
[ ततः प्रविशति प्रतीहार्यनुगतो मलयकेतुः । ]
मलयकेतुः—[ स्वगतम् ] अहो ! राक्षसं प्रति मे विकल्पबाहुल्या-दाकुला बुद्धिर्न निश्चयमधिगच्छति । कुतः—
भक्त्या नन्दकुलानुरागदृढया नन्दान्वयालम्बिना किं चाणक्यनिराकृतेन कृतिना मौर्येण सन्धास्यते । स्थैर्यं भक्तिगुणस्य वा विगणयन् किं सत्यसन्धो भवे- दित्यारूढकुलालचक्रमिव मे चेतश्चिरं भ्राम्यति ॥५॥
अन्वयः—कृतिना चाणक्यनिराकृतेन नन्दान्वयालम्बिना मौर्य्येण नन्द-कुलानुरागदृढया भक्त्या सन्धास्यते किम्, वा भक्तिगुणस्य स्थैर्यम् विगणयन् सत्यसन्धो भवेत् किम् इति मे चेतः आरूढकुलालचक्रम् इव चिरं भ्राम्यति ॥५॥
व्याख्या—कृतिना—कुशलेन, चाणक्यनिराकृतेन—चाणक्येन कौटिल्येन निराकृतः परित्यक्तः तथाभूतेन, नन्दान्वयालम्बिना—नन्दान्वयं नन्दवंशम् अवलम्बते आश्रयते यः तादृशेन, मौर्येण—वृषलेन, नन्दकुलानुरागदृढया—नन्दकुले यः अनुरागः स्नेहः तेन दृढा स्थिरा तथाभूतया, भक्त्या—सेवया हेतुना,
२८८ मुद्राराक्षसम्
सन्धास्यते किम्—सन्धिं करिष्यति किम्, वा—अथवा, भक्तिगुणस्य—भक्ति अनुराग एव गुण तस्य, स्थैर्यं—स्थिरता, विगणयन्—विचारयन्, सत्यसन्धः—सत्या यथार्था सन्धा प्रतिज्ञा यस्य तथाभूत, भवेत् किम्—स्यात् किम्, इति अनेन प्रकारेण, मे—मम, चेत—चित्तम्, आरूढकुलालचक्रम्—आरूढम् अधिष्ठितम् कुलालचक्रम् कुम्भकारचक्रम् येन तादृशम्, इव—तद्वत, चिर—बहुकाल, भ्राम्यति—सन्देहास्पद भवतीत्यर्थः ॥५॥
हिन्दी अनुवाद—[ तदनन्तर मलयकेतु और साथ-साथ प्रतीहारी का प्रवेश ]
मलयकेतु—[मन में] ओह ! राक्षस के प्रति संदेहों की बहुलता से व्याकुल मेरी बुद्धि निश्चय नहीं कर पा रही है । क्योकि—
कुशल, चाणक्य से परित्यक्त और नन्दवंश का अवलम्बन करने वाले चन्द्रगुप्त के साथ ( वह राक्षस ) नन्द-वश म अनुराग होने से दृढ भक्ति के कारण क्या संधि कर लेगा । अथवा मया (मेरी) भक्ति रूपी गुण की दृढता का विचार करत हुए सत्यप्रतिज्ञ होगा, इस प्रकार मेरा चित्त कुम्हार के चक्र पर चढ़े हुए के समान चिरकाल से घूम रहा है ॥५॥
टिप्पणी—विकल्पबाहुल्यात्—सन्देहाधिक्यात् । विशेषेण कल्प्यते इति विकल्प कर्मणि घञ् । तस्य बाहुल्यम् । तस्मात् । हेतो पञ्चमी । कृतिना—कुशलेन या कृतार्थ । इस श्लोक में उत्प्रेक्षा अलंकार से संसृष्ट परिकर अलंकार का विकल्प नामक अलंकार के साथ साङ्कर्य है । इसमे शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण २, १२ में देखिए ॥५॥
[ प्रकाशम् ] विजये ! क्व भागुरायण !
प्रतीहारी—कुमार ! एसा खु कडआदो णिक्कमिदुकामाण मुुद्दा-प्पदाणं अणु चिट्ठदि । ( कुमार ! एष खलु कटकान्निष्क्रमितुकामानां मुद्राम्प्रदानमधितिष्ठति । )
मलयकेतु—विजये ! मुहूर्त्तं निभृतपदसञ्चारा भव, यावदस्य पराङ्मुखस्यैव पाणिभ्यां नयने पिदधामि ।
प्रतीहारी—जं कुमारो आणवेदि । ( यत् कुमार आज्ञापयति ! )
भासुरक—[ प्रविश्य ] अज्ज ! एसो क्खु क्खवणओ मुुद्दाणिमित्त
पञ्चमोऽङ्कः २८६
अज्जं पेक्खिदुमिच्छदि । ( आर्य ! एष खलु क्षपणको मुद्रानिमित्तमार्यं प्रेक्षितुमिच्छति । )
**भागुरायणः—**प्रवेशय ।
**भासुरकः—**जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )
[ इति निष्क्रान्तः । ]
क्षपणकः—[ प्रविश्य ] साबकाणं धम्मविद्धी होदु । ( उपासकानां धर्मवृद्धिर्भवतु । )
भागुरायणः—[ नाट्येनावलोक्य स्वगतम् ] अये ! राक्षसस्य मित्रं जीवसिद्धिः । [ प्रकाशम् ] भदन्त ! न खलु राक्षसस्य प्रयोजनमेव किञ्चिदुद्दिश्य गम्यते ?
हिन्दी अनुवाद—[ प्रकट ] विजये ! भागुरायण कहाँ है ?
**प्रतीहारी—**कुमार ! ये शिविर से बाहर जाने की इच्छा करने वालों को मुद्रा दे रहे हैं ।
**मलयकेतु—**विजये ! क्षण भर के लिए पैरों की गति को रोक दो, जबतक कि मैं दूसरी ओर मुंह किये हुए ही इसकी आंखो को ( अपने ) हाथों से बंद कर दूं ।
**प्रतीहारी—**जो कुमार की आज्ञा ।
भासुरक—[ प्रवेश करके ] आर्य ! ये क्षपणक मुद्रा के लिए आर्य से मिलना चाहते हैं ।
**भागुरायण—**प्रवेश कराओ ।
**भासुरक—**जो आर्य की आज्ञा ।
[ बाहर चला जाता है । ]
क्षपणक—[ प्रवेश करके ] उपासकों का धर्म बढ़े ।
भागुरायण—[ अभिनय के साथ देखकर मन में ] अरे ! राक्षस का मित्र जीवसिद्धि है । [ प्रकट ] भदन्त ! राक्षस के ही किसी प्रयोजन को लक्ष्य करके तो नहीं जा रहे हैं ?
मु० रा०—१९
| २६० | मुद्राराक्षसम् |
|---|
टिप्पणी—निष्क्रमितुकामानाम्—बाहर जाने के इच्छुको को । निष्क्रमितुम् इत्यत्र भावे तुमुन् 'अव्ययकृतो भावे' इति नियमात् । अतएव निष्क्रमितुम् अर्थात् निष्क्रमणे कामः एषाम् इति निष्क्रमितुकामा व्यधिकरणबहुव्रीहि स०, 'तुङ्काममनसोरपि' इति कारिकया मलोप । तेषाम् । मुद्रासम्प्रदानम्—गमनागमनादेशपत्रमित्यर्थः, पारपत्र ( पासपोर्ट ) । निभृतपदसञ्चारा—त्यक्तचरणक्षेपता निवृत्तगमनेति यावत् । पिदधामि—अत्र 'वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयो । आपञ्चापि हलन्ताना यथा वाचा निशा दिशा ॥' इति कारिकया अप्युपसर्गाकारस्य लोप । राक्षसस्य मित्रम् भागुरायण को यह नही मालूम है कि जीवसिद्धि चाणक्य का मित्र एव गुप्तचर है, इसीलिए उसने ऐसा स्वगत कहा है ।
क्षपणक —[ कर्णौ विधाय ] सन्त, पाव, सन्त पाव । सावका ! र्तार्ह ज्जेव गमिस्स जहिं रक्खसस्स पिसाचस्स वा णाम पि ण सुणीअदि । ( शान्तं पाप शान्त पापम् । उपासक ! तत्रैव गमिष्यामि, यत्र राक्षसस्य पिशाचस्य वा नामापि न श्रूयते । )
भागुरायण —भदन्त ! बलीयास्ते सुहृदि प्रणयकोप । तत् किमपराद्धं राक्षसेन भदन्तस्य ?
क्षपणक —सावका ! ण मम किं पि रक्खसेण अवलद्ध, सअ ज्जेव्व मन्दभाओ अत्तणो कम्मसु लज्जामि । ( उपासक ! न मे किमपि राक्षसेनापराद्ध, स्वयमेव मन्दभाग्य आत्मनः कर्मसु लज्जे । )
भागुरायण —भदन्त ! वर्धयसि मे कुतूहलम् ।
मलयकेतु —[ स्वगतम् ] मम च ।
भागुरायण —श्रोतुमिच्छामि ।
मलयकेतु —[ स्वगतम् ] अहमपि ।
क्षपणक —सावका ! कि एदिणा असुणिदव्वेण सुदेण ? (उपासक ! किमेतेनाश्रोतव्येन श्रुतेन ? )
भागुरायण—भदन्त ! यदि रहस्य, तदा तिष्ठतु ।
क्षपणक —सावका ! ण हि रहस्स । (उपासक ! न हि रहस्यम् ।)
भागुरायण —तर्हि कथ्यताम् ।
पञ्चमोऽङ्कः २६१
क्षपणकः—साबकां ! णत्थि एदं, तथावि ण कधइस्सं अदिणिसंसं ।
( उपासक ! नास्तीदं, तथापि न कथयिष्याम्यतिनृशंसम् । )
भागुरायणः—भदन्त ! अहमपि मुद्रां न दास्यामि ।
क्षपणकः—[ स्वगतम् ] युक्तमिदानीमर्थिने कथयितुम् । [प्रकाशम्] का गदी ? एसे णिवेदेमि, सुणादु साबको । अत्थि दाव हगे अधण्णो पढ़मं पाड़लिउत्ते णिब्समाणो रक्खसस्स मित्तत्तणं उबगदे । तहिं अबसले रक्खसेण गूढं बिकसण्णाप्पओअं समुप्पादिअ घादिदे देव पब्बदीसले । ( का गतिः ? एष निवेदयामि, शृणोतु उपासकः । अस्ति तावदहमधन्यः प्रथम पाटलिपुत्रे निवसन् राक्षसस्य मित्रत्वमुपागतः । तस्मिन्नवसरे राक्षसेन गूढ विषकन्याप्रयोगं समुत्पाद्य घातितो देव पर्वतेश्वरः । )
हिन्दी अनुवाद—क्षपणक—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो, पाप शान्त हो । उपासक ! मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ राक्षस या पिशाच का नाम भी नही सुना जाता है ।
भागुरायण—भदन्त ! मित्र पर आपका बड़ा भारी प्रेम-कोप है । सो राक्षस ने भदन्त का क्या अपराध किया ?
क्षपणक—उपासक ! राक्षस ने मेरा कुछ भी अपराध नहीं किया, मैं अभागा स्वयं ही अपने कर्मों से लज्जित हूँ ।
भागुरायण—भदन्त ! आप मेरे कुतूहल को बढ़ा रहे हैं ।
मलयकेतु—[ मन में ] मेरे भी ।
भागुरायण—मैं सुनना चाहता हूँ !
मलयकेतु—[ मन में ] मै भी ।
क्षपणक—उपासक ! इस न सुनने योग्य ( विषय ) के सुनने से क्या ( लाभ ) ?
भागुरायण—भदन्त ! यदि गोपनीय हो तो रहने दीजिये ।
क्षपणक—उपासक ! गोपनीय नही है ।
भागुरायण—तब कहिए ।
२६२ मुद्राराक्षसम्
क्षपणक—उपासक ! यह (गोपनीय) नही है, तो भी अत्यन्त कठोर बात मैं नही कहूँगा।
भागुरायण—भदन्त ! मैं भी मुद्रा नहीं दूंगा।
क्षपणक—[ मन मे ] इस समय ( सुनाने के ) प्रार्थी को कहना उचित है। [ प्रकट ] क्या उपाय है ? अभी बताता हूँ, उपासक सुने । यह सत्य है कि पहले पाटलिपुत्र मे रहता हुआ भाग्यहीन मैं राक्षस का मित्र बन गया । उसी समय राक्षस ने गुप्त रूप से विषकन्या का प्रयोग करके महाराज पर्वतेश्वर को मरवा दिया ।
टिप्पणी—प्रणयकोप—प्रणयकृत कोप प्रणयकोपः मध्यमपदलोपी स०। अपराद्धम्—अप्√राध् ( दिवादि )+क्त भावे अथवा अप√राध्+क्त कर्मणि अपराद्धम् । प्रथम व्युत्पत्ति किम् को प्रश्नवाची मानकर की गई है और दूसरी व्युत्पत्ति किम् को ‘अपराद्धम्’ का विशेषण मानकर दिखाई गई है । भदन्तस्य—यहाँ ‘राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्न’ सूत्र से चतुर्थी होनी चाहिए थी, किन्तु शेष की विवक्षा मे षष्ठी हो गई । अतिनृशंसम्—अतिशयक्रूरम् । घातित पर्वतेश्वर—राक्षस ने पर्वतेश्वर का वध कराया है, यह अफवाह चाणक्य ने फैला दी थी, जो राक्षस को मालूम थी । किन्तु मलयकेतु के कानो तक नही पहुँची थी । अब जीवसिद्धि भागुरायण के द्वारा मलयकेतु को इससे अवगत करा देना चाहता है ।
मलयकेतु—[ सबाष्पमात्मगतम् ] कथं राक्षसेन घातितस्तातो न चाणक्येन ?
भागुरायण—भदन्त ! ततस्ततः ?
क्षपणक—तदो हगे रक्खसस्स मित्तं कदुअ चाणक्कहदएण सणि-काल णअरादो णिव्वासिदो । दाणीं पि रक्खसेण अणेअकज्जकुसलेण किंपि तादिस आलहीअदि, जेण हगे जीअलोआदो णिष्कासिज्जेमि ।
( ततोऽहं राक्षसस्य मित्रं कृत्वा चाणक्यहतकेन मणिकार नगराद्निर्वा-सित । इदानीमपि राक्षसेनानेकाकार्यकुशलेन किमपि तादृशमारभ्यते, येनाहं जीवलोकान्निष्कासिष्ये ।)
पञ्चमोऽङ्कः २६३
भागुरायणः—भदन्त ! प्रतिश्रुतराज्यार्धमयच्छता चाणक्यहतकेनेदमकार्यमनुष्ठितं न राक्षसेनेति श्रुतमस्माभिः ।
क्षपणकः—[ कर्णौ विधाय ] सन्तं पावं । सावका ! चाणक्को बिसकण्णाए णामपि णं जाणादि । तेण ज्जेब दुट्ठबुद्धिणा रक्खसेण एसा अकज्जसिद्धी किना ( शान्तं पापम् ! उपासक ! चाणक्यो विषकन्याया नामापि न जानाति । तेनैव दुष्टबुद्धिना राक्षसेनैषाऽकार्यसिद्धिः कृता ।)
भागुरायणः—भदन्त ! कष्टमिदमियं मुद्रा दीयते, एहि कुमारं संश्रावयावः ।
हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—[ आँसू के साथ मन में ] कैसे राक्षस ने पिता जी को मरवाया चाणक्य ने नहीं ?
भागुरायण—भदन्त ! तब क्या हुआ ?
क्षपणक—तब मैं राक्षस का मित्र हूँ, ऐसा करके दुष्ट चाणक्य के द्वारा अपमानपूर्वक नगर से निकाल दिया गया । अभी भी अनेक प्रकार के कुकर्मों में निपुण राक्षस ने कुछ वैसा ( काम ) प्रारंभ किया है, जिससे मैं संसार से निकाल दिया जाऊँगा ।
भागुरायण—भदन्त ! प्रतिज्ञा किये हुए राज्य का आधा ( भाग ) न देते हुए दुष्ट चाणक्य ने यह कुकर्म किया राक्षस ने नहीं, ऐसा हमने सुना था ।
क्षपणक—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो । उपासक ! चाणक्य विषकन्या का नाम भी नहीं जानता है । उसी दुष्टबुद्धि राक्षस ने यह कुकर्म का अनुष्ठान किया है ।
भागुरायण—भदन्त ! यह कष्ट की बात है । यह मुद्रा दे रहा हूँ । आइए, कुमार को हम दोनों सुनावें ।
टिप्पणी—राक्षसस्य मित्रमिति कृत्वा—पहले अंक में यह संकेत आ चुका है कि जीवसिद्धि को चाणक्य ने राक्षस का मित्र बनकर कार्य सिद्ध करने का आदेश दिया । अतएव जीवसिद्धि ने राक्षस का इतना विश्वास प्राप्त कर लिया कि विषकन्या के द्वारा चन्द्रगुप्त को मरवाने के कार्य में राक्षस ने जीवसिद्धि को ही नियुक्त किया । किन्तु जीवसिद्धि ने विषकन्या का प्रयोग चन्द्रगुप्त के प्रति
| २६४ | मुद्राराक्षसम् |
|---|
न करके पर्वतेश्वर के प्रति कर दिया । राक्षस ने इस रहस्य को नहीं समझा । अतएव उसने भाग्य को इसके लिए दोषी ठहराया । सनिकारम्—सापमानम् । निर्वासित —निष्कासित । तादृशम्—पर्वतेश्वरघातनसदृशम् । गूढार्थस्तु मलयकेतुनिग्रहरूपं कार्यम् । जीवलोकात्—संसारात् । प्रतिश्रुतराज्यार्धम्—प्रतिश्रुतं च तद्राज्यार्धम् प्रतिश्रुतराज्यार्धम् = प्रतिज्ञा-तराज्यार्धभागम् । अयच्छता—अददता । अकार्यम्—पर्वतेश्वरघातनात्मकं निन्दितं कर्म ।
मलयकेतुः—
श्रुतं सखे ! श्रवणविदारणं वच सुहृन्मुखाद्रिपुमधिकृत्य भाषितम् । पितुर्वधव्यसनमिदं हि येन मे चिरादपि द्विगुणमिवाद्य वर्धते ॥ ६ ॥
अन्वय — सखे ! रिपुमधिकृत्य भाषितं श्रवणविदारणं वचः सुहृन्मुखात् श्रुतम् येन इदं मे पितुर्वधव्यसनं चिरादपि अद्य द्विगुणमिव वर्धते हि ॥ ३ ॥
व्याख्या— सखे !— मित्र !, रिपुम्—शत्रुम्, अधिकृत्य—उद्दिश्य, भाषित—कथित, श्रवणविदारण—श्रवणयोः कर्णयोः विदारणं भेदकमिव, वच —वचनं सुहृन्मुखात्—सुहृद मित्रस्य शत्रोरेव राक्षसस्य सुहृद जीवसिद्धेः मुखात् आननात्, श्रुतम्—आकर्णितम्, येन—श्रवणेन, इदम्—अनुभूयमान, मे—मम, पितुर्वधव्यसन—तातविनाशजन्यदुःख, चिरादपि चिरकालजातमपि, अद्य—अस्मिन् दिने, द्विगुणमिव—अधिकमिव, वर्धते हि—वृद्धते एव ॥६॥
हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु— मित्र ! शत्रु को लक्ष्य करके कहा हुआ कर्णभेदी वचन (राक्षस के) मित्र के मुख से सुन लिया, जिससे यह मेरा पितृ-वध से उत्पन्न दुःख बहुत दिन हो जाने से भी आज मानो दूना बढ़ रहा है ॥६॥
टिप्पणी—श्रवणविदारणम्— कानों को विदीर्ण करने वाला । विदारयति इति वि√दृ + णिच् + ल्युट् कर्तरि बाहुलकात् = विदारणम् । श्रवणयोः विदारणम् षष्ठीतत्० । सुहृन्मुखात्—(राक्षस के) मित्र के मुख से । चूंकि राक्षस
पञ्चमोऽङ्कः २६५
का मित्र ही ऐसा कह रहा है, इसलिए इस समाचार पर सन्देह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। सुहृद् और मित्र आदि में अन्तर—'अत्यागसहनो बन्धुः सदैवानुमतः सुहृद् । एकक्रियं भवेन्मित्रं समप्राणः सखा मतः ।' इस पद्य में उत्प्रेक्षा अलंकार है और रुचिरा छंद है। रुचिरा का लक्षण २, ३ में देखिए ।। ६ ।।
क्षपणकः—[स्वगतम्] अये श्रुतं मलयकेतुहतकेन !! कृतार्थोऽस्मि ।
[ इति निष्क्रान्तः । ]
मलयकेतुः—[ प्रत्यक्षवदाकाशे लक्ष्यं बद्ध्वा ] राक्षस ! युक्तमिदम् ।
मित्रं ममायमिति निर्वृतचित्तवृत्तिं विश्रम्भतस्त्वयि निवेशितसर्वकार्यम् । तातं निपात्य सह बन्धुजनाक्षितोयै- रन्वर्थतोऽपि ननु राक्षस ! राक्षसोऽसि ॥ ७ ॥
**अन्वयः—**ननु राक्षस ! अयं मम मित्रम् इति विश्रम्भतः त्वयि निवेशितसर्वकार्यम् निर्वृतचित्तवृत्तिं तातं बन्धुजनाक्षितोयैः सह निपात्य अन्वर्थतोऽपि राक्षसोऽसि ।। ७ ।।
**व्याख्या—**ननु राक्षस—भो राक्षस ! अयं—राक्षसः, मम—मे, मित्रम्—सुहृद, इति—एवम्, विश्रम्भतः—विश्वासात्, त्वयि—राक्षसे, निवेशितसर्वकार्यम्—निवेशितं समर्पितं सर्वकार्य निखिलं राज्यं तादृशम्, निर्वृतचित्तवृत्ति—निर्वृता स्वस्था चित्तवृत्तिः मनोव्यापारः यस्य तादृशम्, तातं—पितरं, बन्धुजनाक्षितोयैः—आत्मीयजनाश्रुभिः, सह—साकम्, निपात्य—धराशायिनं कृत्वा, अन्वर्थतोऽपि—योगार्थादपि, राक्षसोऽसि—असुरोऽसि ॥७॥
हिन्दी अनुवाद—क्षपणक—[ मन में ] अरे ! दुष्ट मलयकेतु ने सुन लिया !! मै कृतार्थ ( हो गया ) हूँ ।
[ बाहर चला जाता है । ]
मलयकेतु—[ आकाश में प्रत्यक्ष की भाँति दृष्टि बाँधकर ] राक्षस ! यह ठीक है ।
राक्षस ! यह मेरा मित्र है—इस प्रकार विश्वास के कारण तुम्हें सम्पूर्ण
२६६ मुद्राराक्षसम्
( राज्य ) कार्य सौंप देने वाले और ( अतएव ) स्वस्थ चित्तवृत्ति वाले पिता ( पर्वतेश्वर ) को बन्धुजनों के आँसुओं के साथ धराशायी करके तुम अर्थ की दृष्टि से भी राक्षस हो ( अर्थात् केवल नाम्ना ही राक्षस नहीं हो अपितु कर्मणा भी राक्षस हो ) ॥७॥
टिप्पणी—अये श्रुतम् क्षपणक को यह नहीं मालूम था कि मलयकेतु उसकी बात सुन रहा है। इसलिए जब मलयकेतु ने कहा कि मैंने सब कुछ सुन लिया तब वह बहुत प्रसन्न हुआ और यह कह उठा कि मैं कृतकृत्य हो गया । क्योंकि वह इसी कार्य के लिए नियुक्त था कि मलयकेतु के मन में पर्वतेश्वर की हत्या राक्षस ने करवाई है चाणक्य ने नहीं—इस बात को जमा दे । सो वह इस कार्य में सफल हो गया । बन्धुजनाक्षितोयै —बन्धुजनानाम् अक्षितोयैः = नेत्रजलै । निपात्य—प्राणैर्वियोज्य इत्यर्थ । अन्वर्थत —अर्थ का अनुसरण करते हुए, यथार्थ मे । अनुगतं अर्थम् अन्वर्थ , तेन । 'तृतीयायास्तसि' इत्यनेन तसिप्रत्यय । इस पद्य में अतिशयोक्तिमूलक सहोक्ति अलंकार है । इसमे वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥७॥
भागुरायण —[ स्वगतम् ] रक्षणीया राक्षसस्य प्राणा इत्यार्यादेश । भवत्वेवं तावत् ! [ प्रकाशम् ] कुमार ! अलमावेगेन । आसनस्थं कुमारं किञ्चिद्विज्ञापयितुमिच्छामि ।
मलयकेतु —[ उपविश्य ] सखे ! किमसि वक्तुकाम ?
भागुरायण —कुमार ! खल्वर्थशास्त्रव्यवहारिणामर्थवशादरिमित्रोदासीनव्यवस्था न लौकिकानामिव स्वेच्छावशात् । यतस्तस्मिन् काले सर्वार्थसिद्धिं राजनमिच्छतो राक्षसस्य चन्द्रगुप्तादपि बलीयस्तया सुगृहीतनामा देव पर्वतेश्वर एवार्थपरिपन्थी महानरातिरासीत् । तस्मिंश्च काले राक्षसेनेदमनुष्ठितमिति नातिदोषमत्र पश्यामि । पश्यतु कुमार —
मित्राणि शत्रुत्वमिवानयन्ती मित्रत्वमर्थस्य वशाच्च शत्रून् । नीतिर्नयत्यस्मृतपूर्ववृत्तं जन्मान्तरं जीवत एव पुंसः ॥८॥
पंचमोऽङ्कः २६७
अन्वयः—अर्थस्य वशात् नीतिः अस्मृतपूर्ववृत्तं मित्राणि शत्रुत्वं शत्रून् च मित्रत्वम् इव आनयन्ती जीवत एव पुंसः जन्मान्तरं नयति ॥८॥
व्याख्या—अर्थस्य—प्रयोजनस्य, वशात्—अनुरोधात्, नीतिः—नय-व्यवहारः, अस्मृतपूर्ववृत्तम्—अस्मृतं स्मृतिपथमना रूढं पूर्ववृत्तं प्राग्व्यवहारः यस्मिन् तत् यथा तथा, मित्राणि—सुहृदः, शत्रुत्वं, शत्रून् च—अरींश्च, मित्रत्वम्—सुहृत्त्वम्, इव—तद्वत्, आनयन्ती—प्रापयन्ती, जीवत एव—अमृतानेव, पुंसः—पुरुषान्, जन्मान्तरम्—अन्यज्जन्म, नयति—प्रापयति ॥८॥
हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—[ मन में ] राक्षस के प्राण बचाने चाहिए, यह आर्य (चाणक्य) की आज्ञा है। तब तक ऐसा हो। [ प्रकट रूप से ] कुमार ! क्रोध में न आवें। आसनासीन हुए कुमार से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।
मलयकेतु—[ बैठकर ] मित्र ! क्या कहना चाहते हो ?
भागुरायण—कुमार ! नीतिशास्त्र के अनुसरण करने वालों की शत्रु, मित्र और तटस्थ की व्यवस्था प्रयोजनवश हुआ करती है, साधारण व्यक्तियों की तरह स्वेच्छानुसार नही। क्योकि उस समय सर्वार्थसिद्धि को राजा बनाने की इच्छा करते हुए राक्षस के लिये चन्द्रगुप्त से भी बलवान् प्रातः स्मरणीय महाराज पर्वतेश्वर ही स्वार्थ में बाधक महान् शत्रु थे। (अतएव) उस समय राक्षस ने यह किया, इसलिए इसमें (उसका) बहुत दोष नही देखता हूँ। कुमार देखें—
प्रयोजनवश नीति पहले के व्यवहार को बिना स्मरणपथ में लाये मित्रों को शत्रु और शत्रुओं को मित्र के समान बनाती हुई जीवित ही पुरुषों को दूसरे जन्म मे पहुँचा देती है ॥८॥
टिप्पणी—अर्थशास्त्रव्यवहारिणाम्—नीतिशास्त्रानुसरणशीलानाम् । अर्थशास्त्रेण व्यवहर्तुं शीलमेषाम् इति अर्थशास्त्र—वि—अव √हृ + णिनि कर्तरि तच्छील्ये, तेषाम् । अर्थवशात्—अर्थस्य प्रयोजनस्य वशम् आयत्तता, तस्मात् । अरिमित्रोदासीनव्यवस्था—वि-अव √स्था + अङ् भावे = व्यवस्था । अरयश्च मित्राणि च उदासीनाश्च इति द्वन्द्व स०, तेषाम् व्यवस्था । लौकिकानाम्—लोकानुसरणशीलानाम् साधारणजनानामित्यर्थः । लोके भवाः
२६८ मुद्राराक्षसम्
लौकिकाः लोक + ठञ् अध्यात्मादित्वात् । अर्थपरिपन्थी—कार्यप्रतिद्वन्द्वी । परिपन्थ शब्द अव्युत्पन्न है । व्युत्पन्न शब्द है परिपथ । परितः पन्था इति परिपथः । 'परिपथशब्दपर्यायः परिपथशब्दः अस्ति' इति काशिका । परिपन्थः अस्ति अस्य इति परिपथ + इनि मत्वर्थे = परिपन्थी । 'रिपौ वैरिसपत्नारि'— इत्युपक्रम्य 'प्रत्यर्थिपथीन' इत्यमर । भानुजी के अनुसार 'परि दोषारव्यान पन्थयितु शीलमस्य इति परि√पन्थ ( गतौ चुरादि ) + णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = परिपन्थी । अर्थस्य परिपन्थी । अराति —शत्रुः । अस्मृतपूर्ववृत्तम्— पूर्व वृत्तान्त का स्मरण किये बिना अर्थात् जैसे जन्मान्तर में पूर्वजन्म का वृत्तान्त नहीं किया जाता या दूसरे शब्दो मे स्मरण नही होता उसी तरह राजनीति में पहले के किये हुए अपकार आदि स्मरण नही किये जाते या दूसरे शब्दों में स्मरण होने पर भी भुला दिये जाते हैं । इस पद्य में उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अलंकारों की संसृष्टि है । इसमे इन्द्रवज्रा छन्द है । इस छन्द का लक्षण यह है—'स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ ग' ॥८॥
तदत्र वस्तुनि नोपालभ्यो राक्षस, आ नन्दराज्यलाभादनुग्राह्यश्च । परतस्तस्य परिग्रहे परित्यागे वा कुमार प्रमाणम् ।
मलयकेतु —एव भवतु । सखे ! सम्यक् दृष्टवानसि । अमात्यस्य वधे प्रकृतिक्षोभ स्यात् एवञ्च सन्दिग्धो विजय स्यात् ।
पुरुष — [ प्रविश्य ] जेदु कुमारो । अअ अज्जस्स गुम्मट्ठाणाधिकिदो दोहचक्खू अज्ज विण्णवेदि—एसो खु अह्मेहि कडआदो णिक्कमन्तो अग्गहीदमुद्दो मलेहो पुरिसो गहीदो, ता पच्चक्खीकरेदु ण अज्जो त्ति । ( जयतु कुमार । अयमार्यस्य गुप्तस्थानाधिकृतो दीर्घचक्षुरार्य विज्ञापयति—एष खल्वस्माभि कटकान्निष्क्रामन्नगृहीतमुद्र सलेखः पुरुषो गृहीतस्तत् प्रत्यक्षीकरोत्वेनमार्य इति । )
भागुरायण —भद्र ! प्रवेशय ।
पुरुषः—ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति ) [ इति निष्क्रान्त । ]
[ ततः प्रविशति पुरुषेणानुगम्यमान सयत सिद्धार्थक । ]
पञ्चमोऽङ्कः २६६
सिद्धार्थकः— [ स्वगतम् ]
तिप्पन्तीए गुणेसुं दोसेसुं परंमुहं करन्तीए ।
अह्मारिसजणणीए प्पणमामो सामिभत्तीए ॥६॥
(तृप्यन्त्यै गुणेषु दोषेषु पराङ्मुखं कुर्वन्त्यै ।
अस्मादृशजनन्यै प्रणमामः स्वामिभक्त्यै ॥६॥)
अन्वयः— गुणेषु तृप्यन्त्यै दोषेषु पराङ्मुखं कुर्वन्त्यै अस्मादृशजनन्यै स्वामिभक्त्यै प्रणमामः ॥६॥
व्याख्या— गुणेषु—उत्कर्षेषु, तृप्यन्त्यै—सन्तुष्टायै, दोषेषु—अपराधेषु, पराङ्मुखं—विमुखं, कुर्वन्त्यै—विदधत्यै, अस्मादृशजनन्यै—अस्मादृशानां मद्विधानां जनन्यै ( अन्नदानादिपोषणकर्मभिः ) मातृरूपायै, स्वामिभक्त्यै—प्रभुसेवायै, प्रणमामः—नमस्कुर्मः ॥६॥
हिन्दी अनुवाद— इसलिए इस ( पर्वतेश्वर के वध के ) विषय में राक्षस को उलाहना नही देना चाहिए, प्रत्युत नन्द-राज्य के मिलने तक ( उस पर ) अनुग्रह करना चाहिए। बाद में स्वीकार करने में या परित्याग करने में कुमार प्रमाण हैं ( अर्थात् आपकी इच्छा है।)
मलयकेतु— ऐसा ही रहे। मित्र ! तुमने अच्छा सोचा है। अमात्य के वध करने पर प्रजा में विद्रोह उठ खड़ा होगा और इस प्रकार विजय संदिग्ध हो जाएगी।
पुरुष— [ प्रवेश करके ] कुमार की जय हो। ये आर्य के प्रधान शिविरपाल दीर्घचक्षु आर्य से निवेदन करते हैं—'बिना मुद्रा लिये एक लेख-पत्र के साथ शिविर से निकलते हुए इस पुरुष को हमने पकड़ा है, इसलिए आर्य इसको देखें।
भागुरायण— भद्र ! प्रवेश कराओ।
पुरुष— आर्य की जैसी आज्ञा। [ बाहर चला जाता है। ]
[ तदनन्तर बँधे हुए सिद्धार्थक और पीछे-पीछे एक पुरुष का प्रवेश ]
सिद्धार्थक— [ मन में ]
गुणों से संतुष्ट और दोषो से विमुख करने वाली हम लोगों की मातृतुल्य स्वामि-भक्ति को प्रणाम है ॥६॥
३०० मुद्राराक्षसम्
टिप्पणी—अत्र वस्तुनि—अस्मिन् पर्वतेश्वरवधे इत्यर्थः । अनुग्राह्य—अनु√ग्रह्+ण्यत् कर्मणि । प्रमाणम्—निदर्शनम् । नन्दराज्यप्राप्त्युत्तरकाले यथा भवत रोचते तथा करिष्यतीत्यर्थः । सन्दिग्ध—सन्देहयुक्तः । सम्√दिह्+क्त अधिकरणे 'तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः' इत्यनेन । गुल्मस्थानाधिकृत—शिविरप्रधानद्वारपालकः । गुल्मस्थाने अधिकृतः । गुणेषु—अत्र विषयाधिकरणे सप्तमी । तृप्यन्त्यै—तृपेरन्तर्भावितण्यन्तत्वात् तृप्तिप्रदायिन्यै इत्यर्थः । स्वामिभक्त्यै—यह प्रणामम्' का कर्म है । इसलिए 'स्वामिभक्तिम्' प्रयोग होना चाहिए था । किन्तु 'स्वामिभक्तिमनुकूलयितु प्रणामम्' इस विवक्षा में 'क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिन' इस सूत्र से चतुर्थी होने पर 'स्वामिभक्त्यै' प्रयोग हो सकता है । इस पद्य मे निरङ्गरूपक अनकार है और आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण १, ५ में देखिए ॥ ६ ॥
पुरुष—[ उपसृत्य ] अज्ज ! अअ सो पुरिसो । ( आर्य ! अय स पुरुष । )
भागुरायण—[ नाट्येनावलोक्य ] भद्र ! किमयमभागन्तुक, आहो स्विदिहैव कस्यचित्परिग्रहः ?
सिद्धार्थक—अज्ज ! अह क्खु अमच्चरक्खसस्स सेवओ । ( आर्य ! अह खल्वमात्यराक्षसस्य सेवक । )
भागुरायण—भद्र ! तत् किमर्थमनुगृहीतमुद्र कटकान्निष्क्रामसि ?
सिद्धार्थक—अज्ज ! कज्जगोरवेण तुवराविदोह्मि । (आर्य ! कार्य-गौरवेण त्वरायितोऽस्मि । )
भागुरायण—कीदृश तत्कार्यगौरव, यद्राजशासनमुल्लङ्घयसि ?
मलयकेतु—सखे भागुरायण ! लेखमुपानय ।
सिद्धार्थक—[ भागुरायणाय ' लेखमर्पयति । ]
भागुरायण—[ सिद्धार्थकहस्ताल्लेख गृहीत्वा मुद्रा दृष्ट्वा ] कुमार ! अय लेख, राक्षसनामाङ्कितेय मुद्रा ।
मलयकेतु—मुद्रा परिपालयन्नुद्घाटय दर्शय ।
भागुरायण—[ तथा कृत्वा दर्शयति । ]
पञ्चमोऽङ्कः ३०१
मलयकेतुः—[ गृहीत्वा वाचयति । ] 'स्वस्ति, यथास्थानं कुतोपि, कोपि, कमपि, पुरुषविशेषमवगमयति । अस्मद्विपक्षं निराकृत्य दर्शिता कापि सत्यता सत्यवादिना । साम्प्रतमेषामपि प्रथममुपन्यस्तसन्धीनामस्मत्सुहृदां, पूर्वप्रतिज्ञातसन्धिपरिपणवस्तुप्रतिपादनप्रोत्साहनेन सत्यसन्धः, प्रीतिमुत्पादयितुमर्हति । एते ह्येवमनुगृहीताः सन्तः स्वाश्रयविनाशेनैवोपकारिणमाराधयिष्यन्ति । अविस्मृतमप्येतत्—सत्यवतः स्मारयामः । एतेषां मध्ये केचिदरेः कोषदन्तिभ्यामर्थिनः, केचिद् विषयेणेति अस्मान् प्रत्यलङ्कारत्रयञ्च, यत् सत्यवताऽनुप्रेषितं तदुपगतम् । अस्माभिरपि लेखस्याशून्यार्थं किञ्चिदनुप्रेषितं तदुपगमनीयं, वाचिकञ्चाप्ततमात् सिद्धार्थकाच्छ्रोतव्यम्' इति ।
व्याख्या—स्वस्ति—मङ्गलार्थकमव्ययमेतत्, यथास्थानं—स्थानमनतिक्रम्य कुतोऽपि—कस्मादपि स्थानादिति शेषः, कमपि, पुरुषविशेषम्—जनम्, अवगमयति—विज्ञापयति । अस्मद्विपक्षं—मम शत्रुं, निराकृत्य—निष्काश्य अमात्यपदात् पृथक्कृत्येत्यर्थः, सत्यवादिना—तथ्यभाषिणा, (भवता) कापि—लोकोत्तरा, सत्यता—सत्यपालनकर्तृता, दर्शिता—प्रकटिता । साम्प्रतम्—इदानीम्, प्रथमम्—प्राक्, उपन्यस्तसन्धीनाम्—उपन्यस्तः कृतः सन्धिः भवता सह सम्मेलनं यैः तथाविधानाम्, एषाम्, अस्मत्सुहृदाम्—अस्मन्मित्राणां, पूर्वप्रतिज्ञातसन्धिपरिपणवस्तुप्रतिपादनप्रोत्साहनेन—पूर्वं प्राक् प्रतिज्ञातस्य प्रतिश्रुतस्य सन्धेः सम्मेलनस्य परिपणः मूल्यभूतं यद् वस्तु तस्य प्रतिपादनं समर्पणं तेन प्रोत्साहनम् आश्वासनम् तेन, सत्यसन्धः—सत्यप्रतिज्ञः, प्रीतिम्—मुदम्, उत्पादयितुम् जनयितुम्, अर्हति—योग्यो भवति । एते—कौलूतप्रभृतयः, एवम्—इत्थम्, अनुगृहीताः—अनुकम्पिताः, सन्तः—भवन्तः, स्वाश्रयविनाशेनैव—स्वकीयावलम्बविघातेनैव हेतुना, उपकारिणम्—हितकारकं भवन्तमिति शेषः, आराधयिष्यन्ति । एतत्—पूर्वोक्तम्, अविस्मृतमपि—स्मृतमपीत्यर्थः, सत्यवतः—सत्यवादिनः भवत इत्यर्थः, स्मारयामः—स्मृतिपथं प्रापयामः । एतेषां—कौलूतप्रभृतीनां मध्ये, केचित्—कियन्तो जना इति शेषः, अरेः—रिपोः, कोषदन्तिभ्याम्—अर्थराशिगजाभ्याम्, अर्थिनः—धनवन्तः, केचित्—कियन्तो जनाः, विषयेण—राज्येन इति । अस्मान् प्रति अस्माकं पार्श्वे, अलङ्कारत्रयम्—त्रीणि भूषणानि, यत्, सत्यवता—सत्यभाषिणा भवतेति शेषः, अनुप्रेषितम्—प्रहितम्, तत्, उपगतम्—प्राप्तम्
३०४ मुद्राराक्षसम्
सिद्धार्थक — [भय नाटयन् ] तुम्हहिं । ( युष्माभि । )
भागुरायण.—किमस्माभि ?
सिद्धार्थक —मिस्सेहिं गहीदो, ण आणामि, किं भणामि त्ति । ( मिश्रेगृहीतो न जानामि किं भणामीति । )
भागुरायण —[ सक्रोधम् ] एष ज्ञास्यसि। भद्र भासुरक ! वहिर्नीत्वा ताड्यता तावत्, यावत् सवमनन कथित भवेत् ।
भासुरक —ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )
[ इति सिद्धार्थकेन सह निष्क्रान्त ]
[ पुन प्रविश्य ] अज्ज ! इअ तस्म ताडीअमाणस्स कक्खादो णाममुद्दालच्छिदा जाहरणपेटिआ णिवडिड्डा । ( आर्य ! इय तस्य ताड्यमानस्य कक्षत नाममुद्रालाञ्छिताऽऽभरणपेटिका निपतिता । )
हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु — भागुरायण ! कैसा लेख है ?
भागुरायण—भद्र सिद्धार्थक ! यह किसका लेख है ?
सिद्धार्थक—आर्य ! नहीं जानता हूँ ।
भागुरायण—रे धूर्त ! पत्र ले जा रहा है और नहीं जानता है कि यह किसका है ! अच्छा, रहे सब कुछ । तुझसे मौखिक संदेश किसे सुनना है ?
सिद्धार्थक—[ भय का अभिनय करते हुए ] आप को ।
भागुरायण—क्या मुझको ?
सिद्धार्थक—आपके द्वारा पकड़ा हुआ मैं नहीं जानता हूँ कि क्या कह रहा हूँ ।
भागुरायण—[ क्रोध के साथ ] अभी जान जाओगे । भद्र भासुरक ! बाहर ले जाकर ( इसे ) तबतक पीटो, जबतक यह सब कुछ ( न ) बता दे ।
भासुरक—आर्य की जैसी आज्ञा ।
[ सिद्धार्थक के साथ चला जाता है । ]
[ पुनः प्रवेश करके ] आर्य ! पीटे जाते हुए इसकी काँख से यह नाम की छाप से चिह्नित गहनों की पेटी गिर पड़ी ।
पञ्चमोऽङ्कः ३०५
टिप्पणी—भद्र !—भद्रम् अस्य अस्ति इति भद्रः भद्र+अच् अर्श आदित्वात् । तत्सम्बुद्धौ हे भद्र इति । सर्वं तावत्तिष्ठतु—अच्छा रहने दो । मैं तुमसे इन सब बातो के विषय में नहीं पूछता हूँ । मैं केवल मौखिक सन्देश के बारे में जानना चाहता हूँ । युष्माभिः—श्रोतव्यमिति शेषः । यहाँ गूढ़ तात्पर्य यह है कि आप लोगों के सुनने के लिए ही यह सब कुछ आयोजन किया गया है, अतएव आप लोग इसे सुनें । मिश्रैः—पूज्यैः भवद्भिरिति शेषः । ताड्यताम्—आहन्यताम् । कक्षतः—भुजमूलात् ।
भागुरायणः—[ विलोक्य ] कुमार ! इयमपि राक्षसमुद्राङ्कितैव ।
मलयकेतुः—अयं लेखस्याशून्यार्थो भविष्यति । इमामपि मुद्रां परिपालयन्नुद्घाट्य दर्शय ।
भागुरायणः—[ तथा कृत्वा दर्शयति । ]
मलयकेतुः—[ विलोक्य ] अये ! तदिदमाभरणं, यन्मया स्वशरीरादवतार्य राक्षसाय प्रेषितम् । व्यक्तं चन्द्रगुप्तस्यायं लेखः ।
भागुरायणः—कुमार ! एष निर्णीयते संशयः । भद्र ! पुनरपि ताड्यताम् ।
पुरुषः—जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । ) [ इति निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य च ] अज्ज ! एसो क्खु ताड़ीअमाणो विण्णवेदि—कुमारस्स स्सअं ज्जेब णिवेदेमि त्ति । ( आर्य एष खलु ताड्यमानो विज्ञापयति—कुमारस्य स्वयमेव निवेदयामीति । )
मलयकेतुः—प्रवेशय ।
पुरुषः—जं कुमालो आणवेदि । ( यत् कुमार आज्ञापयति । )
[ इति निष्क्रम्य सिद्धार्थकेन सह पुनः प्रविशति । ]
सिद्धार्थकः—[ पादयोर्निपत्य ]—अभएण मे कुमालो प्पसादं करेदु । ( अभयेन मे कुमारः प्रसादं करोतु । )
मलयकेतुः—भद्र ! भद्र !! अभयमेव परायत्तजनस्य, तन्निवेद्यतां यथाऽवस्थितम् ।
मु० रा०—२०
| ३०६ | मुद्राराक्षसम् |
|---|
सिद्धार्थक—णिसामेदु कुमालो, अह क्खु अमच्चरक्खसेण इम लेह देइअ, चन्दउत्तसआस प्पेसिदोम्हि । ( निशामयतु कुमार, अह खल्वमात्यराक्षसेनेम लेख दत्त्वा चन्द्रगुप्तसकाश प्रेषितोऽस्मि । )
मलयकेतु—भद्र वाचिकमिदानी श्रोतुमिच्छामि ।
हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—[ देखकर ] कुमार ! यह भी राक्षस की मुद्रा से अंकित ही है ।
मलयकेतु—यह पत्र का रिक्ततापूरक ( उपहार ) होगा । इस मुद्रा को भी बचाते हुए खोलकर दिखाओ ।
भागुरायण—[ वैसा करके दिखाता है । ]
मलयकेतु—[ देखकर ] अरे ! यह तो वह आभूषण है, जिसे मैंने अपने शरीर से उतार कर राक्षस के लिए भेजा था । स्पष्टतः, यह चन्द्रगुप्त के लिए पत्र है ।
भागुरायण—कुमार ! अभी संदेह का निर्णय कर लिया जाता है । भद्र ! फिर पीटो ( इसे ) ।
पुरुष—आर्य की जैसी आज्ञा । [ निकलकर और पुनः प्रवेश करके ] आर्य ! पीटने पर इसने कहा—कुमार को स्वयं ही बताऊँगा ।
मलयकेतु—प्रवेश कराओ ।
पुरुष—कुमार की जैसी आज्ञा ।
[ निकलकर सिद्धार्थक के साथ पुनः प्रवेश करता है । ]
सिद्धार्थक—[ पैरों पर गिरकर ] कुमार मुझे अभयदान देने की कृपा करे ।
मलयकेतु—भद्र ! भद्र !! पराधीन मनुष्य के लिए अभय ही है, इसलिए जैसा है, वैसा बताओ ।
सिद्धार्थक—कुमार सुने, अमात्य राक्षस ने मुझे यह लेख देकर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है ।
मलयकेतु—भद्र ! अब मौखिक संदेश सुनना चाहता हूँ !
पञ्चमोऽङ्कः
३०७
टिप्पणी—व्यक्तं चन्द्रगुप्तस्यायं लेखः— चन्द्रगुप्त के लिए यह पत्र लिखा गया है। इसका प्रमाण यह है कि राजा के धारण करने योग्य जो आभूषण मैंने राक्षस के लिए भिजवाया था, वही आभूषण उसने चन्द्रगुप्त के लिए भेजा है। संशयः— संशय्यते असौ इति संशयः सम् √शी + अच् कर्मणि 'एरच्' इत्यनेन । निवेदयामि— अत्र भविष्यत्सामीप्ये लट् । अभयेन— भयस्य अभावः अभयम् अव्ययीभाव स०, तेन । यथावस्थितम्— अवस्थितमनतिक्रम्य यथावस्थितम् अव्ययीभाव स० । याथातथ्येन सर्वं वृत्तमित्यर्थः । निवेद्यताम्— कथ्यताम् ।
सिद्धार्थकः— कुमाल ! संदिट्ठोम्हि अमच्चरक्खसेण, जहा—'एदे मम प्पिअबअस्सा पञ्च राआणो तुए सह पढमसमुप्पण्णसन्धाणा । जहा— कुलूदाहिबो चित्तवम्मा, मलअजणबदाहिबो सिहणादो, कस्सीरदेसणाहो पुक्खरक्खो, सिन्धुराओ सिन्धुसेणो, पारसीआधिबदी मेहक्खो त्ति । एत्थ ज्जेब पढमभणिदा तिणि राआणो मलअकेदुणो बिसअं अहिलसन्ति, इदरे दुवे कोसं हत्थिबलं अ त्ति । ता जहा चाणक्कं णिराकरिअ महाराएण, मम प्पीदी उप्पादिआ, तदा एदाणं पि पढमभणिदो अत्थो संपादइदव्वो' त्ति एत्तिओ बाआसन्देसो त्ति । (कुमार ! सन्दिष्टोऽस्म्यमात्यराक्षसेन, यथा—'एते मम प्रियवयस्याः पञ्च राजानस्त्वया सह प्रथमसमुत्पन्नसन्धानाः । यथा—कुलूताधिपश्चित्रवर्मा, मलयजनपदाधिपः सिंहनाद , काश्मीरदेशाधिपः पुष्कराक्षः, सिन्धुराजः सिन्धुषेनः, पारसीकाधिपतिर्मेघाक्ष इति । अत्रैव प्रथमभणितास्त्रयो राजानः मलयकेतोर्विषयमभिलमषन्ति, इतरौ द्वौ कोषं हस्तिबलञ्चेति । तद्यथा चाणक्यं निराकृत्य महाराजेन मम प्रीतिरुत्पादिता, तथैतेषामपि प्रथमभणितोऽर्थः संपादयितव्यः' इत्येतावान् वाक्सन्देश इति ।)
मलयकेतुः— (स्वगतम्) कथं चित्रवर्मादयोऽपि मामभिद्रुह्यन्ति, अत एवैतेषा राक्षसे निरतिशया प्रीतिः । [प्रकाशम्] विजये ! अमात्यराक्षसं द्रष्टुमिच्छामि ।
प्रतिहारी— जं कुमालो आणवेदि । ( यत् कुमार आज्ञापयति । )
[ इति निष्क्रान्ता । ]
३०८ | मुद्राराक्षसम्
[ तत प्रविशत्यासनस्थ स्वभवनगतः पुरुषेणानुगम्यमान सञ्चितो राक्षसः ]
राक्षसः—[स्वगतम्] सम्पूर्णमस्मद्वल चन्द्रगुप्तबलैरिति यत् सत्य न मे मनस' शुद्धिरस्ति । कुत ?—
**हिन्दी अनुवाद—सिद्धार्थक—**कुमार ! अमात्य राक्षस ने मुझसे सन्देश ( पहुँचाने के लिए ) कहा है । जैसे—'ये मेरे प्रिय मित्र पांच राजा तुम्हारे साथ पहले से (ही) मधि कर चुके हैं। जैसे—कुलूत ( कुल्लू प्रदेश ) का स्वामी चित्रवर्मा, मलय जनपद का अधिपति सिंहनाद, काश्मीर देश का स्वामी पुष्कराक्ष, सिन्धु देश का राजा सिन्धुषेन और पारसीक (फारस) का अधिपति मेघाक्ष । इन्हीं मे से पहले कहे गये तीन राजा मलयकेतु का राज्य चाहते हैं और दूसरे दो खजाना तथा हाथियों की सेना । तो जिस प्रकार चाणक्य को हटाकर महाराज ने मेरी प्रीति को उत्पन्न किया है, उसी प्रकार इनका भी उपर्युक्त प्रयोजन पूग कर देना चाहिये ।' बस, इतना ही मौखिक सन्देश है ।
मलयकेतु—[ मन में ] वैसे चित्रवर्मा आदि भी मुझसे द्रोह करते हैं । इसीलिये राक्षस मे इनकी अत्यन्त प्रीति है । [प्रकट] विजये ! अमात्य राक्षस को देखना चाहता हूँ ।
**प्रतीहारी—**जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर चली जाती है । ]
[ तदनन्तर अपने भवन में आसन पर विराजमान चिन्तामग्न राक्षस एक पुरुष के साथ प्रवेश करता है । ]
राक्षस—[ मन में ] हमारी सम्पूर्ण सेना चन्द्रगुप्त की सेनाओ से भर चुकी है, यह जो सत्य बात है—इस कारण मेरे मन मे शान्ति नहीं है । क्योकि—
**टिप्पणी—प्रियवयस्या —**वयसा तुल्या इति वयस्या वयस्+यत् । प्रिया' वयस्या' इति प्रियवयस्या कर्मधारय म० । **मामभिद्रुह्यन्ति—**अत्र 'क्रुधद्रुहोरूपसृष्टयो कर्म' इत्यनेन कर्मसज्ञा—द्वितीया । **निरतिशया—**अत्य धिक । निर्धूढः निश्चित या अतिशयः अस्ति अस्या इति निरतिशया ।