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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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गंभीर-अमर्ष नामक भाव उतनी सशक्तता एवं गंभीरता के साथ प्रस्फुटित न हो सका होता कि जितना उपर्युक्त छन्द के प्रयोग द्वारा प्रस्फुटित हो सका है। इसी भाँति औचित्य की दृष्टि से अन्य छन्दों की भी परीक्षा की जा सकती है।

संक्षेप में यह कहा जाना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त की नाट्य-कला-कुशलता का आधार उनकी औचित्य-दृष्टि ही रही है—

“औचित्यं नाट्यजीवितम्”

ग्रन्थ का नाम मुद्राराक्षस क्यों पड़ा ?—विशाखदत्त ने अपने इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा है। यही उनकी सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है। उनकी नाट्य-प्रतिभा का पूर्ण विकसित स्वरूप इसी में देखने को मिलता है। इस नाटक में मन्त्री राक्षस ने यह प्रयत्न किया है कि किसी भाँति महाराज चन्द्रगुप्त को गद्दी से हटाया जाय। किन्तु कूटनीतिज्ञ अमात्य चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप राक्षस अपने अभीष्ट को पूरा न कर सका। वह चन्द्रगुप्त का शुभचिन्तक था। उसकी हार्दिक अभिलाषा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त का मुख्य-मन्त्री बनाऊँ। उसने गुप्तचरों द्वारा राक्षस की राजकीय मुद्रा (मोहर) प्राप्त कर ली तथा उस मोहर को लगा लगाकर राक्षस के समर्थकों के समीप जाली पत्र भेजे। परिणामस्वरूप राक्षस का सहायकों के साथ मतभेद हो गया। उसका एक प्रिय मित्र चन्दनदास उसी के परिवार को छिपाकर रखने के अभियोग में राजा चन्द्रगुप्त के आदेशानुसार फाँसी पर चढ़ाया जा रहा था। राक्षस उसके बचाने के निमित्त प्रयत्न करता है। चाणक्य ने कहा कि वह उसके मित्र को फाँसी से छुड़वा देगा यदि वह चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर ले। राक्षस के पास कोई अन्य चारा ही न था। अतः उसने चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर लिया।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि चाणक्य की इस सफलता का एकमात्र साधन, 'राक्षस की मुद्रा' ही थी। इसी आधार पर इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा गया है। संस्कृत में इसकी व्युत्पत्ति इस भाँति की जाती है :—

"मुद्रया = अङ्गुलिमुद्रया, परिगृहीतः = वशीकृतः, राक्षसः यत्रेति (मध्यमपदलोपि समासः) तदधिकृत्य कृतो ग्रन्थः, मुद्राराक्षसम्। यहाँ "अधिकृत्य कृते ग्रन्थे" सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ है और तत्पश्चात् अण् प्रत्यान्त-पद होने के

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कारण "यच्चद्वयग्गलणवुल्छृद्धाश्च" के अनुसार नपुंसक लिङ्ग होकर 'मुद्राराक्षसम्' पद बना है। अथवा—मुद्रया गृहीतः राक्षसः यस्मिन् तत् मुद्राराक्षसम्—व्युत्पत्ति भी की जा सकती है।

नाटककार को नाटक का उक्त नाम रखने की प्रेरणा सम्भवत महाकवि शूद्रक के 'मृच्छकटिक' अथवा महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तल' से प्राप्त हुई होगी। 'मृच्छकटिक' नाटक का नायक चारुदत्त है किन्तु इसके चरित-चित्रण मे मिट्टी की गाड़ी ( मृच्छकट ) की जो घटना है उसका अपना एक विशिष्ट महत्त्व है। इसी घटना के आधार पर नाटककार ने चारुदत्त का पूर्वा पर चरित परस्पर संश्लिष्ट रूप से चित्रित किया है। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' मे भी अभिज्ञान—अँगूठी की पहचान से शकुन्तला की पहचान की घटना अपना विशेष महत्त्व रखती है और यही वह घटना है जो कि नायक दुष्यन्त के पूर्वा-पर चरित का समन्वय करती है। इसी भाँति मुद्राराक्षस नाटक मे भी मुद्रा द्वारा राक्षस के पकड़े जाने की घटना एक ऐसी घटना है जिस पर इस नाटक के नायक (चाणक्य) की सम्पूर्ण कूटनीति आधारित है।

नाटककार इस नाटक का अन्य नाम भी रख सकता था किन्तु वे इतने अधिक आकर्षक नहीं हो सकते थे। अत पाठको एव दर्शकों के आकर्षण की दृष्टि से नाटककार ने 'मुद्राराक्षस' यह नाम उचित तथा सार्थक ही रखा है।

मुद्राराक्षस के कथानक का मूल अथवा मुद्राराक्षस के इतिवृत्त का आधार—

विष्णुपुराण, भागवत तथा अन्य पुराणों में भी कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा नन्दवंश के सर्वनाश तथा चन्द्रगुप्त मौर्य की साम्राज्य-प्रतिष्ठा का वर्णन स्पष्ट शब्दो मे उपलब्ध होता है। इतिहास-लेखको के अनुसार नन्द-वंश का अन्तकाल ईस्वी सन् से ३२६ वर्ष पूर्व माना गया है। उस समय से लेकर नाटककार के समय तक लगभग ८०० वर्षों के अन्दर चाणक्य एव चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित अनेक किंवदन्तिया चारों ओर फैल चुकी थी। नाटककार इन किंवदन्तियो से अवश्य परिचित रहा होगा किन्तु नाटकीय इतिवृत्त में किसी किंवदन्ती का कोई संकेत उपलब्ध नहीं होता। नन्द-विनाश के निमित्त एक स्थल (अंक ४।१२)

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पर चाणक्य द्वारा प्रयुक्त अभिचार-कर्म का संकेत अवश्य मिलता है किन्तु उसका मुद्राराक्षस के कथानक से कोई सम्बन्ध दृष्टिगोचर नहीं होता ।

दशम शताब्दी की रचना 'दशरूपक' के आधार पर यह सिद्ध होता है कि मुद्राराक्षस का कथानक 'बृहत्कथा' से लिया गया है। दशरूपक में आता है :—

“तत्र बृहत्कथामूलं मुद्राराक्षसम् ।
चाणक्य नाम्ना तेनाद्य शकटारगृहे रहः ॥
कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृपः ॥
योगानन्दे यशः शेषे पूर्वनन्द सुतस्ततः ।
चन्द्रगुप्तः कृतो राज्ये चाणक्येन महौजसा ॥”

'बृहत्कथा' पैशाची-प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है कि जो इस समय अप्राप्य भी है । 'कथासरित्सागर' को बृहत्कथा के तात्विक अंश का यथार्थ रूपान्तर माना जाता है । किन्तु 'कथासरित्सागर' में मुद्राराक्षस की कथावस्तु का विस्तृत विवरण उपलब्ध नही होता है । जो थोड़ा-बहुत मिलता भी है—उसमें नाटक के प्रतिनायक 'राक्षस' का नाम अथवा उसके कार्यों का उल्लेख तक नहीं प्राप्त होता है । अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि नाटकीय कथावस्तु का अधिकांश भाग नाटककार की अपनी कल्पना पर ही आधारित है ।

यह भी संभव हो सकता है कि लोक में प्रचलित तथा पुराणादिकों में बीज रूप मे उपलब्ध कथानक ही मुद्राराक्षस की सम्पूर्ण कथावस्तु का मूल आधार रहा हो तथा नाटककार ने अपनी कल्पनाओं के आधार पर उसे पल्लवित किया हो । इस आधार पर मुद्राराक्षस नाटक के मूलवृत्त को 'प्रख्यात' कहा जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित कथावस्तु तथा उससे सम्बन्धित पूर्वकथा—पूर्ण—तथा ऐतिहासिक है । अतः उसको 'प्रख्यात' श्रेणी में रखना उचित ही है ।

'मुद्राराक्षस' मे वर्णित कथावस्तु से पूर्व की कथा—

लोक-परम्परा की दृष्टि से यह पूर्वकथा दो रूपों में उपलब्ध होती है । इन दोनो का सूक्ष्म वर्णन क्रमशः नीचे दिया जा रहा है :—

(१) प्राचीन काल में मगध नाम का एक राज्य था । इसकी राजधानी कुसुमपुर (पुष्पपुर) अथवा (आधुनिक पटना) पाटलिपुत्र थी । पहले यहाँ

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जरामध इत्यादि पुरुवंशी राजा राज्य करते रहे थे। बाद में नन्दवंशीय राजाओ ने पुरुवंशी लोगों को निकालकर तथा विजय प्राप्त कर राज्य किया। धीरे-धीरे इनका प्रभाव सम्पूर्ण भारत में व्याप्त हो गया। इसी वंश में महानन्द नामक राजा का जन्म हुआ। यह अत्यन्त पराक्रमी तथा वीर था। इसके दो मन्त्री थे। मुख्य मन्त्री का नाम शकटार तथा दूसरे का राक्षस था। इनमे प्रथम शूद्र वर्ण का तथा दूसरा ब्राह्मण वर्ण का था। दोनो ही महान् प्रतिभाशाली थे। इनमे से शकटार उद्धत था। इसी कारण महानन्द उससे अप्रसन्न हो गये और उसे बन्दी बना दिया।

कुछ समय पश्चात् शकटार छूट गया किन्तु अपने अपमान के कारण उसका मन क्षुब्ध बना रहा। प्रतिहिंसा की भावना उसके हृदय में धधकती रही। एक दिन वह बाहर घूमता हुआ जा रहा था। मार्ग में उसने एक कृष्ण वर्ण के ब्राह्मण को देखा जो कि कुशों की जडो को खोद-खोदकर उसमे मट्ठा डाल रहा था। शकटार वहाँ खडा हो गया तथा उस ब्राह्मण से उसके द्वारा किये जाते हुये कार्य के बारे में पूछने लगा। उसने उत्तर दिया कि मैं विष्णुगुप्त चाणक्य नाम का एक ब्राह्मण हूँ। मैं एक आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था, मार्ग में ये कुश मेरे पैर में गड गये जिसके कारण मेरा कार्य न हो सका। अत' मैं इन कुशों को समूल नष्ट कर देने के लिये इनकी जडो मे मट्ठा डाल रहा हूँ।

शकटार अपने मन ही मन मे सोचने लगा कि यदि यह ब्राह्मण महानन्द से असन्तुष्ट हो जाय तो मेरे उद्देश्य की सिद्धि हो सकती है। अत वह ऐसे अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। महानन्द के यहाँ श्राद्ध होने वाला था। शकटार ने इस श्राद्ध के लिये उस ब्राह्मण को भी निमन्त्रित कर दिया। श्राद्ध के समय वह स्वय कही चला गया क्योकि वह जानता था कि महानन्द काले ब्राह्मण को देख-कर क्रोधित हो जायगा तथा उसे हटा देगा। हुआ भी ऐसा ही। श्राद्ध-भवन में जब राजा ने उस अनिमन्त्रित काले ब्राह्मण को देखा तो उसे अत्यधिक क्रोध आ गया। उसने उसे निकाल देने की आज्ञा दे दी। इस भयंकर अपमान से अपमानित चाणक्य ने वही खडे होकर नन्दवश के विनाश की प्रतिज्ञा की और तत्पश्चात् वहाँ से चला गया।

महानन्द के ८ पुत्र थे तथा एक चन्द्रगुप्त मौर्य नाम का दासी पुत्र भी था।

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महानन्द के आठों पुत्र शूद्र होने के कारण उसे घृणा की दृष्टि से देखते थे । वैसे वह अत्यन्त बुद्धिमान् तथा चतुर था । आयु में बड़ा होने के कारण वह अपने को राज्य का अधिकारी समझता था और इसी कारण राज-परिवार से उसका वैमनस्य था । चाणक्य तथा शकटार दोनो ने सलाह की कि राज्य का लोभ देकर उसे अपनी ओर मिला लिया जाय तथा नन्दों का नाश कर देने के पश्चात् उसी को राजा बनाया जाय ।

इसके अनन्तर चाणक्य अपनी कुटी में जाकर रहने लगा । उधर शकटार महानन्द की एक दासी विचक्षणा को तथा चन्द्रगुप्त को अपनी ओर फोड़ने लगा । चाणक्य ने एक ऐसा विषयुक्त पकवान् तैयार कराया कि जिसे खाते ही प्राणान्त हो जाय किन्तु परीक्षा करने पर उसका पता न लगाया जा सके । विचक्षणा ने यह पकवान आठो पुत्रों सहित महानन्द को खिला दिया जिससे सभी का प्राणान्त हो गया । इसके अनन्तर शकटार की मृत्यु हो गयी । चाणक्य चन्द्रगुप्त को राजा बनाने की बात सोचने लगा । उसने पर्वतक नामक राजा को आधा राज्य दे देने का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया । उसका पुत्र मलयकेतु तथा भाई वैरोधक था । पर्वतक के साथ पाँच म्लेच्छ राजा और थे ।

उधर राक्षस नामक मन्त्री राजा के मर जाने से अत्यन्त दुखी हुआ । उसने उसके सम्बन्धी सर्वार्थसिद्धि को राज-सिंहासन पर बिठालकर राज-कार्य चलाना शुरू किया । किन्तु कुछ समय के पश्चात् सर्वार्थसिद्धि वन को चला गया और वहाँ चाणक्य ने उसे मरवा डाला । ऐसी दशा में राक्षस ने राज्य का प्रलोभन देकर राजा पर्वतक को अपनी ओर मिला लिया तथा चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने की तैयारी की । चाणक्य को इस बात का पता लग गया । उसने एक विषकन्या पर्वतक के पास भेजी । कामी पर्वतक उसके चक्कर में फँस गया और उसके साथ संसर्ग करते ही उसका देहावसान हो गया । उसका पुत्र मलयकेतु भयभीत होकर भाग गया । इसके अनन्तर राक्षस चन्द्रगुप्त का अनिष्ट करने के लिये पूर्णरूप से उतारू हो गया । इसके पश्चात् मुद्राराक्षस का अपना कथानक प्रारम्भ हो जाता है ।

(२) नन्द नाम के कुछ राजा पूर्वकाल में हो चुके हैं । इनमें सबसे बड़ा राजा 'उग्रधन्वा' था । उसके वक्रनाम आदि चार मन्त्री थे । उनमें सबसे अधिक

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बुद्धिमान् एव चतुर राक्षस नाम का मन्त्री था जो कि राज्य का सञ्चालन करता था। उस राजा की 'सुनन्दा' नाम की पटरानी थी। उसके एक रूपवती दासी भी थी जिसका नाम 'मुरा' था—यह शूद्रा थी किन्तु राजा को अति प्रिय थी। एक बार एक तपस्वी राजा के समीप आये। राजा ने उनकी अच्छी आवभगत की। अभ्यर्थना के अनन्तर उनका चरणोदक रानी तथा मुरा की ओर छिड़क दिया गया। रानी के सिर पर नौ बूँदें तथा मुरा के सिर पर एक बूँद गिरी। बड़ी श्रद्धा एव भक्ति के साथ मुरा ने उसे स्वीकार किया। उसकी भक्ति से तपस्वी अति प्रसन्न हुये। उनके आशीर्वाद से मुरा को एक गुणी पुत्र उत्पन्न हुआ। सुनन्दा के एक साथ नौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनका पालन पोषण राक्षस द्वारा किया गया। वे सब बड़े वीर थे। राजा ने उन सभी का नाम 'नन्द' रखा तथा मुरा के पुत्र का नाम चन्द्रगुप्त रखा। नन्द के देहावसान के पश्चात् ये नवौ नन्द राज्याभिषिक्त हुये।

एक बार सिंहल देश के राजा ने एक मोम का सिंह बनवाया तथा उसे पिंजड़े में बन्द कर नन्दों के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि आपके यहाँ कोई बुद्धिमान् व्यक्ति हो तो पिंजड़े को बिना खोले ही इस सिंह को बाहर निकाल दे। इस सन्देश को श्रवणकर सभी नन्द मौन रह गये। किन्तु चन्द्रगुप्त ने पिंजड़े के चारो ओर आग जलाकर उस सिंह को पिघलाकर बाहर निकाल दिया। सभी आश्चर्य मे पड़ गये। नन्द उससे ईर्ष्या करने लगे तथा उसे देव एवं पितरों के कार्य का पथ्यक बना दिया। चन्द्रगुप्त समय की प्रतीक्षा करता रहा। नन्दों का अपकार करने हेतु वह विष्णुगुप्त नामक एक क्रोधी एव नीतिज्ञ ब्राह्मण के समीप पहुँचा तथा उससे मैत्री भी कर ली।

नन्दो के यहाँ श्राद्ध कर्म मे चन्द्रगुप्त ने उसे निमन्त्रित कर दिया। वह कुरूप था। नन्दों ने उसे देखकर उसे अग्रासन से उठा दिया। इस अपमान से अपमानित उस ब्राह्मण ने अपनी चोटी खोलकर प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं नन्दो का समूल नाश नही कर दूंगा तब तक चोटी नही बाधूँगा।

यह कहकर वह नगर से बाहर चला गया। उसके समुचित उपायो द्वारा नन्द का विनाश हो गया और उसकी कृपा से चन्द्रगुप्त मौर्य राजा बना दिया गया। यहीं से 'मुद्राराक्षस' की कथा का प्रारम्भ होता है।

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अंकानुसार 'मुद्राराक्षस' की संक्षिप्त कथावस्तु

प्रथम अङ्क—भगवान् शंकर की स्तुतिरूप नान्दी के अनन्तर नाटककार प्रस्तावना प्रस्तुत करता है जिसमें सूत्रधार द्वारा सूक्ष्म कवि-परिचय के साथ 'मुद्राराक्षस' के अभिनीत किये जाने की सूचना दर्शकों को दी जाती है। ऐसा कहकर वह अभिनय में भाग लेने हेतु अपनी पत्नी को बुलाने के लिये घर जाता है। वहाँ पहुँचकर वह अपनी पत्नी को चन्द्रग्रहण के उपलक्ष्य में ब्रह्म भोज का आयोजन करने में व्यस्त देखता है। वह अपनी पत्नी से कहता है कि तिथि आदि की दृष्टि से आज चन्द्रग्रहण का होना किसी भी दशा में संभव नहीं है। नेपथ्य से चाणक्य 'चन्द्रग्रहण' शब्द को सुनकर तथा 'चन्द्रगुप्त मौर्य का पकड़ा जाना' अर्थ लेकर कहता है :—

"आः, क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति।"

और तदनन्तर रंगमंच पर आकर घोषणा करता है कि "अरे ! वह कौन है कि जो अपनी मृत्यु को स्वयं ही बुला रहा है और कभी की बँध चुकने वाली मेरी चोटी को इस समय भी बँधते हुये नहीं देखना चाहता है।" फिर वह मन ही मन सोचता है—'तपोवन में तपस्या करने के लिये गये हुये सर्वार्थसिद्धि को मरवा दिया गया है। प्रजा में यह समाचार फैला दिया गया है कि राक्षस ने ही विषकन्या को भेजकर पर्वतक को मरवाया है। भागुरायण ने मलयकेतु को यह कहकर भगा दिया है कि तुम्हारे पिता को चाणक्य ने मरवाया है। मन्त्री राक्षस की गतिविधियों पर दृष्टि रखने के निमित्त गुप्तचरों की नियुक्ति की जा चुकी है। अपना सहपाठी विष्णुशर्मा जैन संन्यासी के रूप में कुसुमपुर ( पाटलिपुत्र ) भेजा जा चुका है जो कि राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसके सम्पूर्ण कार्यों का भेद ले रहा है।

नन्दों के प्रति अटूट एवं निश्चल राक्षस की श्रद्धा और भक्ति को देखकर चाणक्य उसे अपनी ओर मिलाकर चन्द्रगुप्त का प्रधान अमात्य बनाने का भी इच्छुक है।

तदनन्तर यम का चित्र हाथ में लिये हुए योगी वेषधारी चाणक्य का गुप्तचर निपुणक चाणक्य को सूचना देता है कि चन्द्रगुप्त के विरोधी तथा राक्षस

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के परम मित्र तीन व्यक्ति हैं—(१) जीवसिद्धि क्षपणक, (२) शकटदास और (३) सेठ चन्दनदास (जिसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने घर में शरण दे रखी है।) इतना कहकर वह चाणक्य को राक्षस के नाम से अङ्कित एक मुद्रा देकर चला जाता है ।

एकान्त में बैठकर चाणक्य एक पत्र लिखता है और शकटदास के लेख में उसकी प्रतिलिपि कराने के निमित्त सिद्धार्थक को देता है । सिद्धार्थक शकटदास से प्रतिलिपि कराके ले आता है । इस प्रतिलिपि-पत्र को राक्षस की मुद्रा से मुद्रित कर चाणक्य सिद्धार्थक को देते हुए बतलाता है कि तुम वध-स्थान पर जाकर क्रोधावेश में वधिकों को अपनी आंख का सङ्केत करना । उस संकेत के आधार पर जब वे भाग जायें तब तुम शकटदास को वहाँ से भगाकर राक्षस के समीप ले जाना तथा उसके प्राणों की रक्षा के फलस्वरूप राक्षस से पारितोषिक प्राप्तकर कुछ काल पर्यन्त उसी की सेवा में संलग्न रहना । इसके पश्चात् चाणक्य सिद्धार्थक के कान में कुछ कहकर उसे विदा कर देता है ।

इसके पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रतीहारी द्वारा यह सूचना प्राप्त कर कि महाराज चन्द्रगुप्त राजा पर्वतेश्वर का श्राद्ध करना चाहते हैं और उसमें उनके आभूषणों का दान भी करना चाहते हैं, चाणक्य इस कार्य के निमित्त विश्वावसु आदि तीन ब्राह्मणों की नियुक्ति कर देते हैं ।

इसके अनन्तर चाणक्य अपने शिष्य शाङ्गरव द्वारा कालपाशिक एवं दण्ड-पाशिक के समीप अपने निम्नलिखित दो आदेशों का प्रेषित करता है —

(१) क्षपणक-जीवसिद्धि पर यह आरोप लगाकर नगर से बाहर निकाल दिया जाय कि उसने राक्षस की प्रेरणा से विषकन्या द्वारा पर्वतक को मरवा डाला है ।

(२) शकटदास पर यह दोष लगाकर कि यह प्रतिदिन हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता है, शूली पर चढ़ा दिया जाय ।

इसके उपरान्त चाणक्य अपने शिष्य द्वारा सेठ चन्दनदास को बुलवाता है और उससे कहता है कि तुमने राक्षस के परिवार को अपने घर में छिपा रखा है । उसे हमको सौंप दो । इसके उत्तर में सेठ चन्दनदास कहता है—राक्षस का

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परिवार मेरे घर में नहीं है। यदि रहा होता तो भी मैं आपको नहीं सौंपता ? इसी बीच नेपथ्य में हुये कोलाहल से सूचना मिलती है कि क्षपणक जीवसिद्धि को देशनिकाला दे दिया गया है तथा शकटदास को सूली पर चढ़ाने के लिये ले जाया जा रहा है। चाणक्य चन्दनदास को डरवाते हुये कहता है कि सेठ जी ! आप देख नहीं रहे हैं कि राजा चन्द्रगुप्त राजद्रोहियों के प्रति कितना कठोर हे। अतः तुम राक्षस के परिवार को हमारे हवाले कर दो। जब चन्दनदास इस बात को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं करता है तब चाणक्य अपने शिष्य द्वारा विजयपाल से कहलाता है कि सेठ चन्दनदास की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाय और उसके परिवार को कारागार में डाल दिया जाय।

इसी समय नेपथ्य से यह सूचना मिलती है कि सिद्धार्थक वध-स्थान से शकटदास को भगाकर ले गया है। चाणक्य इसे सुनकर प्रसन्न होता है क्योंकि उसी के आदेश से ऐसा हुआ है। वह जानता है कि सिद्धार्थक जब शकटदास की रक्षा कर राक्षस के समीप उसे ले जायगा तो राक्षस उससे प्रसन्न हो जायेगा और वह राक्षस का विश्वासपात्र भी बन जायगा। ऐसी स्थिति में उसे राक्षस का सम्पूर्ण भेद मिलता रहेगा।

द्वितीय अङ्क—इस अङ्क के प्रारम्भ में जीर्णविष नामक सँपेरा सर्वप्रथम रङ्गमञ्च पर आता है। यह राक्षस का गुप्तचर विराधगुप्त ही है। वह राक्षस से मिलना चाहता है।

इसके पश्चात् अपने भवन में पलँग पर आसीन चिन्तानिमग्न राक्षस दृष्टिगोचर होता है। उसकी चिन्ता का विषय है—दिवंगत स्वामी नन्द को प्रसन्न करना। लक्ष्मी को बुरा-भला कहने के पश्चात् वह सोचता है कि चन्दनदास के घर में अपने परिवार को छोड़कर मैंने उचित ही किया है। चन्द्रगुप्त को मरवाने तथा शत्रुपक्ष के लोगों को फोड़ने के निमित्त मैंने शकटदास को नियुक्त किया है। शत्रु के समाचार जानने हेतु जीवसिद्धि को रख रखा है। इसी समय मलयकेतु द्वारा प्रेषित कंचुकी जाजलि राक्षस के समीप आता है तथा मलयकेतु के अपने शरीर से उतारकर दिये गये आभूषण को राक्षस को पहनाकर चला जाता है।

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इसके पश्चात् संपेरा आकर अपना परिचय देकर कुसुमपुर के सम्पूर्ण समाचारों से राक्षस को अवगत कराता हुआ कहता है —

पाटलिपुत्र के चारो ओर से घिर जाने पर सर्वार्थसिद्धि सुरंग के मार्ग से निकलकर भाग गये। आप भी नन्द-साम्राज्य की पुन स्थापना हेतु सुरंग के माग से ही बाहर आ गये। विषकन्या द्वारा पर्वतक की मृत्यु कर दी गयी और तदनन्तर कुमार मलयकेतु भी पाटलिपुत्र छोड कर चले गये। ऐसे निष्कण्टक समय के आ जाने पर चाणक्य न राजभवन मे चन्द्रगुप्त के प्रवेश करने की तिथि की घोषणा कर दी। शिल्पियो द्वारा सूचित किया गया कि चन्द्रगुप्त के राज-भवन मे प्रवेश के उपलक्ष्य मे दारुवर्मा ने पूर्वीय द्वार की साज सज्जा कर दी है। चाणक्य उसकी चाल को समझ गया। निश्चित समय पर अर्धरात्रि के समय पर्वतक के भाई वैरोचक को चन्द्रगुप्त के साथ एक ही आसन पर बिठाकर राज्या-भिषेक कर दिया। तदनन्तर चन्द्रगुप्त के राजभवन में प्रवेश करते समय चन्द्रगुप्त की हथिनी चन्द्रलेखा के ऊपर वैरोचक को बैठा दिया। इस स्थिति मे चन्द्रगुप्त की भ्रान्ति में वैरोचक पर ही यन्त्र-तोरण गिराने के लिये दारुवर्मा ने तैयारी की। दूसरी ओर आप द्वारा नियुक्त महावत बर्बरक वैरोचक को ही चन्द्रगुप्त जानकर अपनी सोने की छड़ी से कटार निकालने लगा। हथिनी न यह समझा कि अब यह छड़ी मेरे ऊपर पड़ने ही वाली है, अतः अपनी चाल तेज कर दी। परिणामस्वरूप यत्र तोरण के गिरने के समय न तो चन्द्रगुप्त ही मारा जा सका और न वैरोचक ही। बेचारा बर्बरक ही मार दिया गया। ऐसा होने पर दारुवर्मा ने अपनी मृत्यु को निश्चित समझकर यन्त्र की कील से चन्द्रगुप्त के भ्रम मे वैरोचक को मार दिया। वैरोचक के पीछे चलने वाले लोगो ने ढेलों को मार-मारकर दारुवर्मा को मार दिया। अभयदत्त नामक वैद्य को भी, जिसने चन्द्रगुप्त को मार देने के निमित्त विष-मिश्रित ओषधि तैयार की थी, उसी ओषधि को पिलाकर मार दिया गया। शयन-कक्ष का अधिकारी प्रमोदक भी असंगत उत्तर देने के उपलक्ष्य में मार दिया गया। बीभत्सकादि जो दीवाल की सुरंग में चन्द्रगुप्त को मार देने के निमित्त रह रहे थे, को भी उस सुरंग में आग लगवाकर मार दिया गया। क्षपणक जीवसिद्धि को विषकन्या द्वारा पर्वतेश्वर की हत्या कराये जाने के अपराध मे देश-निकाला दे दिया गया। शकटदास पर यह

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अपराध लगाकर कि उसी ने दारुवर्मा आदि शिल्पियों की नियुक्ति की थी, फांसी के दण्ड से दण्डित किया गया। इसी भांति चन्दनदास को आपके परिवार को छिपाकर अपने घर में रखने के आरोप में स्त्री-पुत्रादि सहित कारागार में डाल दिया गया।

इसी बीच शकटदास को लेकर सिद्धार्थक वहाँ आ जाता है। शकटदास बतलाता है कि प्रिय मित्र सिद्धार्थक की ही कृपा से मेरे प्राण बच सके। इस उपकार के बदले राक्षस मलयकेतु द्वारा प्रेषित आभूषण को अपने शरीर से उतारकर सिद्धार्थक को दे देता है। सिद्धार्थक राक्षस से प्रार्थना करता है कि मैं इस स्थान पर अपरिचित हूँ। अतएव अभी आप इसे अपने पास रख लें—जब मुझे आवश्यकता पड़ेगी, आपसे ले लूंगा। अब सिद्धार्थक राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसी के पास रहने लगता है।

इसके अनन्तर विराधगुप्त राक्षस को पुनः सूचना देता है कि मलयकेतु के भाग आने के पश्चात् चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट उत्पन्न हो गई है। इसी कारण अब चन्द्रगुप्त चाणक्य के आदेशों को पूर्ववत् नहीं मानता है।

तत्पश्चात् राक्षस उसी वेश में विराधगुप्त को 'स्तनकलश' से सन्देश कहने के लिये कुसुमपुर भेजता है। सन्देश यह है कि तुम अपनी स्तुतियों द्वारा चन्द्रगुप्त को चाणक्य के विरोध में भड़काने का प्रयत्न करना तथा यदि कोई गुप्त सूचना हो तो करभक द्वारा मेरे पास भेजना।

इसके पश्चात् तीन आभूषण खरीदे जाते हैं। तदनन्तर राक्षस करभक को कुछ आदेश देकर कुसुमपुर भेज देता है।

तृतीय अङ्क—पाटलिपुत्र में कंचुकी द्वारा घोषणा की जाती है कि महाराज चन्द्रगुप्त की आज्ञा है कि कौमुदी-महोत्सव के अवसर पर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) को भली भांति से सजाया जावे।

तदनन्तर वह सुगांग नामक महल की छत से नगर की शोभा का निरीक्षण करता है, किन्तु उसे नगर में कोई चहल-पहल दृष्टिगोचर नहीं होती है। कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का कोई चिह्न तक नहीं दिखलायी पड़ता है। कंचुकी द्वारा यह ज्ञात होने पर, कि आर्य चाणक्य ने कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का विरोध कर दिया है, वह आर्य चाणक्य को बुलवाता है।

चाणक्य के निवास स्थान पर पहुँचकर कंचुकी उसे चिन्तित अवस्था में पाता है। चाणक्य सोच रहा है कि राक्षस को किस भांति वश में किया जाय।

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वह सोचता है कि मेरे गुप्तचरो से मलयकेतु घिरा हुआ है । अब मैं चन्द्रगुप्त के साथ कृत्रिम-कलह उत्पन्न करक राक्षस को मलयकेतु से अलग कर दूँगा । इसी बीच कंचुकी चन्द्रगुप्त का सन्देश चाणक्य से कह देता है । चाणक्य कंचुकी से पूछता है कि क्या चन्द्रगुप्त को कौमुदी-महोत्सव के न मनाये जाने सम्बन्धी मेरे आदेश का पता लग गया है ? कंचुकी द्वारा 'हा' कह दिये जाने पर वह क्रोधा-वेश में चन्द्रगुप्त के समीप चल देता है ।

चाणक्य के आ जाने पर चन्द्रगुप्त उन्हे प्रणाम कर उचित आसन पर बैठाता है । चाणक्य उसे सार्वभौम सम्राट होने सम्बन्धी आशीर्वाद देता है । चन्द्रगुप्त द्वारा कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछे जाने पर चाणक्य उत्तर देता है—यह बात मन्त्री से सम्बद्ध है । तुम सचिवायत्त सिद्धि हो, अत तुमको कारण जानने से क्या प्रयोजन ? इसी मध्य दो वैतालिक राजा की स्तुति करते हुये श्लोक पाठ करते हैं । इनमे प्रथम राजा का अपना व्यक्ति है तथा दूसरा राक्षस का आदमी है—स्तनकलश । यह दूसरा वैतालिक स्तुति के बहाने से चन्द्रगुप्त को चाणक्य से फोड़ने की बात कहता है । चाणक्य इसे समझ लेता है । चन्द्रगुप्त दोनो को प्रभूत धनराशि पारितोषिक रूप में देने का आदेश दे देता है । चाणक्य इसका निषेध करता है । इस पर चन्द्रगुप्त कहता है "आप पग-पग पर मेरे कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं । अतएव यह राज्य मेरे लिये राज्य न होकर, एक प्रकार का बन्धन ही बन गया है ।" चाणक्य उत्तेजना के साथ कहता है—तो तुम अपना कार्य स्वय ही देखो, मैं भी अपने श्रोत्रिय सम्बन्धी कार्य मे सलग्न हो जाऊगा । राजा पुनः कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछता है । चाणक्य कहता है—हमारे भद्रभट आदि सेनाध्यक्ष मलयकेतु से जाकर मिल गये हैं तथा आक्रमण की तैयारी मे व्यस्त हैं । उक्त स्थिति मे हमारे लिये सैन्य-सज्जा करना उचित है अथवा कौमुदी-महोत्सव का मनाना ? चन्द्रगुप्त पुन प्रश्न करता है कि आपने मलयकेतु एव राक्षस को भाग जाने का अवसर क्यो दिया ? इसका भी चाणक्य द्वारा उत्तर दिया जाता है किन्तु उससे चन्द्रगुप्त को सन्तोष नही होता है और वह कहता है—मैं आपसे तर्क-वितर्क नही करना चाहता हूँ, मैं तो आपसे अधिक राक्षस को ही प्रशंसनीय समझता हूँ क्योकि उसने पाटलिपुत्र में रहते हुये हमारे व्यक्तियो को फोड लिया और हम कुछ न

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कर सके । इस पर चाणक्य अत्यधिक क्रुद्ध हो जाता है और कहता है कि यदि तुम राक्षस को मुझसे अधिक योग्य समझते हो तो यह शस्त्र मन्त्री राक्षस को ही दे दो। यह कहकर शस्त्र को पृथ्वी पर पटककर चला जाता है।

तदनन्तर चन्द्रगुप्त अपने कंचुकी वैहीनरि को आज्ञा देता है कि राज्य में घोषणा कर दो कि आज से चन्द्रगुप्त ने चाणक्य को मन्त्रि-पद से अलग कर दिया है। वह अपना राज-काज स्वयं देखेगा।

राक्षस का गुप्तचर 'स्तनकलश' इस कृत्रिम कलह को वास्तविक समझता है। कंचुकी भी इस कलह को वास्तविक ही समझता है।

चतुर्थ अङ्क—राक्षस का गुप्तचर करभक पाटलिपुत्र से आता है। वह द्वारपाल से राक्षस से मिलने के निमित्त कहता है। किन्तु रात्रि में देर तक जागने के कारण राक्षस शिरोवेदना से पीड़ित है। अतः द्वारपाल उसे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिये कहता है।

इधर शयनागार में पड़ा हुआ राक्षस सोच रहा है कि सम्पूर्ण रात्रियाँ जागते-जागते ही व्यतीत हो रही हैं। जिस काम को करने की सोचता हूँ वही चाणक्य की कुटिल नीति के कारण विफल हो जाता है। यह राजनीति भी एक विचित्र प्रकार का नाटक है। संभव है कि चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त में फूट उत्पन्न हो जाय। अवसर पाकर द्वारपाल करभक के आगमन की सूचना राक्षस को देता है। वह उसे अन्दर बुलवा लेता है। इसी बीच राक्षस की शिरोवेदना का समाचार पाकर मलयकेतु भी भागुरायण के साथ वहाँ जाता है। (यह भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर है और मलयकेतु का कपट मित्र। वह आते समय मार्ग में कुछ ऐसी बातें करता रहा था कि जिससे प्रभावित होकर मलयकेतु और राक्षस में फूट पड़ जाय। मार्ग में मलयकेतु ने भागुरायण से पूछा कि भद्रभट इत्यादि ने जो मुझसे यह कहा था कि हम लोग मन्त्री राक्षस द्वारा आपके आश्रय में नहीं आये हैं। हम लोग सेनापति शिखरसेन द्वारा आपके आश्रय में आये हैं—इसका क्या अभिप्राय है? इसके उत्तर में भागुरायण कहता है—राक्षस की शत्रुता चाणक्य से है न कि चन्द्रगुप्त से। यह हो सकता है कि चन्द्रगुप्त चाणक्य को अपने मन्त्री पद से पृथक् कर दे और राक्षस अपने मित्र चन्दनदास की रक्षा के निमित्त चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ले। यदि यह बातें

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सत्य हो जायँ तो आप हम लोगो पर अविश्वास न कर बैठे—इस कारण उनका कथन है कि शिखरसेन द्वारा ही आपके आश्रय मे आये हैं।) किन्तु वे दोनो करभक को राक्षस से पाटलिपुत्र का समाचार बतलाते हुये सुनकर छिप जाते हैं और दोनो का वार्तालाप सुनते हैं। करभक कौमुदी-महोत्सव से सम्बन्धित चाणक्य एव चन्द्रगुप्त की कलह का सम्पूर्ण वृतान्त राक्षस को बतलाता है। तत्कालीन अन्य घटनाओ का भी वर्णन करता है और अन्त मे कहता है कि इसी कलह के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त ने मन्त्री राक्षस के गुणो की प्रशसा कर चाणक्य को मन्त्रिपद से हटा दिया। चन्द्रगुप्त चाणक्य से इस कारण भी कुपित है कि उसने भागते हुये मलयकेतु और मन्त्री राक्षस की उपेक्षा की। चाणक्य अभी पाटलिपुत्र मे ही है, किन्तु यह शीघ्र ही तपोवन चला जायगा, ऐसा सुना जाता है।

उपर्युक्त समाचार पर राक्षस को विश्वास नही होता है। किन्तु शकटदास उसे समझाता है कि यह बात सम्भव हो सकती है क्योकि प्रतिज्ञा पूरी करने मे किन महान् कष्टो का सामना करना पडता है, यह चाणक्य जानता है। अत अब वह नगर म भी न रहेगा, तपोवन चला जायेगा।

इन सभी बातो का विपरीत अर्थ लगाकर भागुरायण मलयकेतु के मन मे राक्षस के प्रति सन्देह उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है और बतलाता है कि राक्षस चन्द्रगुप्त से प्रेम करता है। वह इसी प्रतीक्षा में है कि चाणक्य यदि चला जायगा तो चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनकर सारा कार्य करेगा।

इसके पश्चात् राक्षस के आदेश से शकटदास के साथ करभक विश्राम करने चला जाता है तथा मलयकेतु राक्षस के समक्ष उपस्थित होकर उसके सिर-दर्द का हाल पूछता है। राक्षस कहता है कि "जब तक आपको महाराज पद से सुशोभित नही देख लेता हूँ तब तक मेरा सिर-दर्द कैसे ठीक हो सकता है (अर्थात् तब तक मुझे चैन कहाँ ?)" यह सुनकर मलयकेतु पूछता है कि हमको अब कितने दिनों तक आक्रमण के अवसर की प्रतीक्षा करनी होगी ? राक्षस उत्तर देता है कि विलम्ब करने की कोई आवश्यकता नहीं है। शीघ्र ही शत्रु-विजय के निमित्त प्रस्थान किया जाय क्योकि चाणक्य चन्द्रगुप्त से पृथक् हो गया है तथा सचिवायत्तसिद्धि वाला होने के कारण चन्द्रगुप्त के लिये यह एक बडा भारी

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संकट है। अतः हमारी सफलता को निश्चित ही समझिये। यह सुनकर मलयकेतु अपनी सैन्य-शक्ति की प्रशंसा करता है और तदनन्तर चला जाता है।

तदनन्तर राक्षस आक्रमण के शुभ मुहूर्त्त को जानने के निमित्त ज्योतिषी को बुलवाना चाहता है। उसी समय क्षपणक जीवसिद्धि, जो एक ज्योतिषी भी है, वहाँ आ जाता है। वह मुहूर्त्त बतलाता है कि पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के पश्चात् पूर्ण चन्द्रोदय होने पर, 'बुध' नक्षत्र का योग होने पर तथा केतु के उदय होकर अस्त हो चुकने पर प्रस्थान करना उचित है। राक्षस अन्य ज्योतिषियो से भी परामर्श लेने के लिये क्षपणक से आग्रह करता है। इस पर क्षपणक रुष्ट होकर चला जाता है।

पंचम अङ्क— चाणक्य का गुप्तचर सिद्धार्थक, जो राक्षस की सेवा में रह रहा था, राक्षस से प्राप्त आभूषण के साथ कुसुमपुर के लिये जा रहा है। मार्ग मे उसकी भेंट क्षपणक जीवसिद्धि से हो जाती है। वह सिद्धार्थक को बतलाता है कि तुम भागुरायण से मुद्रा (पारपत्र) प्राप्त किये बिना कुसुमपुर नहीं जा सकते हो। मैं भी मुद्रा-प्राप्ति हेतु भागुरायण के समीप जा रहा हूँ। इस पर सिद्धार्थक कहता है कि मैं तो मन्त्री राक्षस का सेवक हूँ, इस कारण मुझे मुद्रा की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके पश्चात् सिद्धार्थक क्षपणक से कार्य-सिद्धि सम्बन्धी आशीर्वाद चाहता है। क्षपणक आशीर्वाद देता है। फिर दोनों अपने-अपने मार्ग की ओर चल देते हैं।

जिस समय क्षपणक-जीवसिद्धि भागुरायण के समीप पहुँचता है उसी समय मलयकेतु भी भागुरायण से मिलने वहाँ आता है। किन्तु वह भागुरायण के सामने होने से पूर्व भागुरायण एव जीवसिद्धि की परस्पर चल रही बातचीत को छिपकर सुनता है। जीवसिद्धि भागुरायण से कहता है कि मैं राक्षस से बहुत दूर चला जाना चाहता हूँ जिससे कि उसका नाम तक भी मुझे सुनने को प्राप्त न हो। इसका कारण यह है कि मैं कुसुमपुर में रहते समय दुर्भाग्य से राक्षस का मित्र बना और फिर उसके कथनानुसार विषकन्या का प्रयोग कर मैने पर्वतेश्वर की हत्या करवा दी। फलस्वरूप चाणक्य ने मुझे निर्वासित कर दिया। अब भी राक्षस कुछ ऐसा ......रे द्वारा करवाना चाहता है कि जिसके परिणाम स्वरूप मुझे कहीं ......च न कर जाना पड़े।

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उपर्युक्त बातो का श्रवणकर मलयकेतु को विश्वास हो जाता है कि मेरे पिता को राक्षस ने ही मरवाया है। भागुरायण जीवसिद्धि से कहता है कि आप मुद्रा ले लीजिये, किन्तु कुमार मलयकेतु के समीप चलकर यह सब बातें उससे कह दीजिये। इसी बीच मलयकेतु अपने को प्रकट कर देता है और कहता है कि मैने सब सुन लिया है। उसका पितृ-जन्य दुःख दूना हो गया। क्षपणक वहाँ से चला जाता है। अब भागुरायण चाणक्य के आदेश "राक्षस के प्राणो की सर्वथा रक्षा की जाय" का स्मरण करते हुये मलयकेतु को समझाने लगता है कि राजनीति में शत्रु और मित्र स्वार्थवश हुआ करते हैं। उस समय राक्षस सर्वार्थसिद्धि को राजा बनाना चाहता था। इस कारण वह पर्वतेश्वर को चन्द्रगुप्त से भी अधिक शत्रु मानता था। अब वह बात नहीं है। अतः आप नन्द-राज्य को वापिस लेने के समय तक शान्त रहिये।

इसी बीच बिना मुद्रा के बाहर जाता हुआ सिद्धार्थक पकड़ा जाता है और भागुरायण तथा मलयकेतु के समक्ष लाया जाता है। उसके हाथ में एक पत्र है जिस पर राक्षस की मोहर लगी हुई है। भागुरायण मलयकेतु को यह पत्र दिखलाता है तथा सिद्धार्थक के सही-सही उत्तर न देने पर उसे पिटवाता है। पिटते समय उसकी काँख से एक आभूषणो की पेटी गिर जाती है। उस पेटी से वही आभूषण निकलता है जिसे मलयकेतु ने राक्षस के पहनने के निमित्त भेजा था। अधिक पूछे जाने पर वह कहता है कि राक्षस ने वह पत्र तथा यह आभूषण देकर मुझे चन्द्रगुप्त के समीप भेजा है।

पत्र मे लिखित तथा सिद्धार्थक द्वारा मौखिक कहा गया संदेश था—(वस्तुत सिद्धार्थक चाणक्य का गुप्तचर है।) आप द्वारा प्रेषित तीन आभूषण प्राप्त हो गये हैं। मेरे पांच प्रिय मित्रो—चित्रवर्मा, पुष्कराक्ष, सिंहनाद, सिन्धुषेन और मेघनाद—में से प्रथम तीन तो मलयकेतु का राज्य चाहते हैं तथा शेष दो क्रमशः गजसेना और कोष को चाहते हैं। अतः इनकी इच्छा की पूर्ति कीजिये। पत्र की रिक्तता के निवारणार्थ यह आभूषण प्रेषित हैं।

इसके पश्चात् मलयकेतु राक्षस को बुलवाने के लिये प्रतीहारी को भेजता है। राक्षस युद्ध-यात्रा के लिये व्यूह-रचना के प्रकार के बारे में सोच रहा है। उसी समय प्रतीहारी सूचना देती है कि मलयकेतु आपसे मिलना चाहते हैं।

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राक्षस मलयकेतु के पास जाते समय उन आभूषणों में से एक को धारण कर लेता है कि जिनको उसने क्रय किया था । जब राक्षस मलयकेतु के समीप पहुँच जाता है तब आवश्यक शिष्टाचार के अनन्तर मलयकेतु राक्षस की आक्रमण सम्बन्धी योजना को जानना चाहता है । राक्षस योजना बतलाता है—सबसे आगे वह स्वयं रहेगा, उसके पीछे खश और मगध की सेनाये, मध्य में गान्धार, अन्त में चीन तथा हूणों से युक्त शक राजा लोग और शेष कौलूतादि पाँच राजा मलयकेतु की रक्षा करेंगे । इस योजना को सुनकर मलयकेतु सोचता है कि जो मेरे मारने के लिये नियुक्त हैं वही मेरे रक्षक बनाये जा रहे हैं ।

अब मलयकेतु राक्षस से पुनः पूछता है कि आपने सिद्धार्थक को कुसुमपुर क्यों भेजा है ? इसको भागुरायण और अधिक स्पष्ट करते हुये कहता है कि आपने पत्र, आभूषण तथा मौखिक संदेश देकर सिद्धार्थक को चन्द्रगुप्त के पास क्यो भेजा है ? साथ ही वह पत्र भी उसे पढने को देता है तथा आभूषण भी दिखलाता है और सिद्धार्थक को भी उसके समक्ष उपस्थित करता है । पत्र देखकर राक्षस कहता है कि यह पत्र उसका नहीं है, यह शत्रु का प्रयोग है । हाँ, यह आभूषण सिद्धार्थक को इनाम के रूप में मैंने अवश्य दिया था । इस पर अंकित मुद्रा भी कपट मुद्रा ही है । इतना सुनकर भागुरायण सिद्धार्थक से पूछता है कि यह पत्र किसका लिखा हुआ है ? सिद्धार्थक उत्तर देता है—शकटदास का । राक्षस बडा दुःखी हो जाता है और कहता है कि यदि शकटदास ने लिखा है तो मेरा ही लिखा समझिये । मलयकेतु शकटदास को बुलाना चाहता है किन्तु भागुरायण “कहीं वास्तविकता न खुल जाय—इस भय से” शकटदास को न बुलवाकर उसके लेख की प्रतिलिपि मँगवाता है । प्रतिलिपि उस पत्र से मिल जाती है । अब राक्षस के मन में शकटदास के बारे में सन्देह उत्पन्न हो जाता है । इस बीच मलयकेतु राक्षस के द्वारा धारित आभूषण को देखकर पूछता है कि यह आभूषण तो पिता जी का है ? राक्षस उत्तर देता है कि इसे मैने खरीदा है । अब मलयकेतु को विश्वास हो जाता है कि यह आभूषण चन्द्रगुप्त द्वारा भिजवाये गये तीन आभूषणो में से एक है ।

इसके अनन्तर मलयकेतु राक्षस पर अभियोग लगाता हुआ कहता है कि आपने ही विषकन्या भेजकर मेरे पिता को मरवाया था । इसका प्रमाण जीव-

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सिद्धि है। जीवसिद्धि का नाम सुनते ही राक्षस आश्चर्य में पड़ जाता है और सोचता है कि यह भी शत्रु का ही आदमी निकला।

तदनन्तर मलयकेतु शिखरसेन को (जो वस्तुत चाणक्य का ही गुप्तचर है।) आज्ञा देता है कि चित्रवर्मा, पुष्कराक्ष, सिंहनाद सुषेण और मेघनाद—इन पांचों राजाओ को मार डालो। ये पाँचो मार दिय जाते हैं। फिर मलयकेतु राक्षस से कहता है —

“गच्छ, समाश्रीयता सर्वात्मना चन्द्रगुप्त”

अर्थात् जाओ, पूर्णरूप से चन्द्रगुप्त का आश्रय लो। शोक-संतप्त राक्षस चित्रवर्मा आदि राजाओ का वध सुनकर दुःखी होता है तथा अपने परम मित्र चन्दनदास को छुड़ाने के निमित्त चला जाता है।

षष्ठ अङ्क—सिद्धार्थक मलयकेतु के शिविर से लौट आया है तथा उसने वहाँ की पूरी घटना से चाणक्य और चन्द्रगुप्त दोनो को ही अवगत करा दिया है। इसके पश्चात् वह अपने मित्र समिद्धार्थक के समीप गया। मित्र द्वारा पूछे जाने पर सिद्धार्थक कहता है कि चाणक्य के भद्रभट, पुरुषदत्त, हिङ्गरात आदि गुप्तचरों ने मलयकेतु को कैद कर लिया है तथा राक्षस मलयकेतु के शिविर से निकलकर पुनः पाटलिपुत्र में आ गया है। राक्षस के पीछे भी चाणक्य का गुप्तचर उदुम्बर लगा हुआ है। चाणक्य के आदेशानुसार हम दोनो को चन्दनदास को वध्यभूमि मे ले जाकर मार डालना है।

तत्पश्चात् एक पुरुष, जो चाणक्य का गुप्तचर है, राक्षस के समक्ष फांसी लगाने का अभिनय करता है। राक्षस अपने घनिष्ठ मित्र का पता लगाने हेतु पाटलिपुत्र के जीर्ण उद्यान मे आया हुआ है। वहाँ पर बैठा हुआ वह सोच रहा है कि भाग्य ने हमारे सभी प्रयत्नों को विफल कर दिया है। नन्द वंश के नष्ट हो जाने पर पर्वतेश्वर को आधार बनाकर महाराज नन्द के राज्य को वापिस ले लेने का मैंने प्रयत्न किया। किन्तु दुर्भाग्य से उनके भी दिवंगत हो जाने पर मैंने मलयकेतु को अपना आधार बनाया। किन्तु मुझे सदैव असफलता ही मिली। अब क्या किया जाय? इतने में अचानक ही उसकी दृष्टि उस कृत्रिम फांसी लगाने वाले पुरुष पर पडती है। वह उसके समीप जाकर पूछता है कि तुमको क्या कष्ट है कि जिसके कारण तुम फांसी लगा रहे हो?

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बड़े दुःख के साथ वह उत्तर देता है कि इस नगर में जिष्णुदास नामक एक सेठ है जो कि मेरा परम मित्र है। उसने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान में दे दी है और वह अग्नि में जल मरने के लिये नगर से बाहर चला गया है। अतः उसकी मृत्यु के समाचार को सुनने से पूर्व ही मैं अपना प्राणान्त कर देने के लिये फाँसी लगा रहा हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष के मित्र के मरने के कारण को जानना चाहता है। पुरुष बतलाता है—मेरे मित्र का एक अभिन्न मित्र चन्दनदास इसी नगर का निवासी है। उसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने यहाँ छिपा रखा है। चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त द्वारा बार-बार मांगे जाने पर भी वह राक्षस के परिवार को उनके संरक्षण में नहीं दे रहा है। अतः उसे फाँसी का दण्ड दिया गया है। इसी कारण उसका मित्र जिष्णुदास उसकी मृत्यु से पूर्व ही अपने को अग्नि मे भस्मसात् कर देना चाहता है। और मैं भी अपने मित्र जिष्णुदास के मरने से पूर्व ही मर जाना उचित समझता हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष से कहता है कि तुम जाकर जिष्णुदास को मरने से रोको। मैं भी चन्दनदास के प्राणों की रक्षा अपनी तलवार से करूँगा। बाद में जब वह पुरुष यह जान लेता है कि यही मन्त्री राक्षस हैं तो वह उनके पैरों पर गिर जाता है और कहता है—"आप तलवार द्वारा चन्दनदास को बचाने का उपाय न करें क्योकि शकटदास सम्बन्धी घटना के पश्चात् बधिक लोग अत्यधिक सतर्क हो गये हैं। यदि वे लोग वध्यस्थल पर सशस्त्र आते हुये किसो को देख लेते हैं तो वध्य व्यक्ति को तुरन्त ही मार डालते हैं।" इसके अनन्तर वह पुरुष चला जाता है।

तदनन्तर राक्षस सोचता है कि चाणक्य महान् कूटनीतिज्ञ है। यदि उसने अपनी योजना के अनुसार शकटदास को मेरे समीप भिजवाया था तो उसको मारने के लिये नियुक्त वधिको को क्यों प्राणदण्ड दिया ? और यदि शकटदास उसकी योजना का अंग नहीं है तो उसने मेरे विरुद्ध ऐसा कूट-पत्र क्यों लिखा ?

इस भाँति सोचता हुआ राक्षस निश्चय करता है कि यदि शस्त्र-बल से चन्दनदास को बचाना कठिन है तो मैं उसके छुटकारे के लिये आत्मसमर्पण ही कर देना उचित समझता हूँ।

सप्तम अङ्क—वधिको के साथ वध्यवेष को धारण किये हुये चन्दनदास

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चला जा रहा है। उसके साथ उसकी स्त्री और बच्चे भी चल रहे हैं। एक वधिक आगे-आगे यह घोषणा करता हुआ चल रहा है कि हट जाना लोगो, हट जाओ। यदि तुम लोगो को अपने प्राण, धन-सम्पत्ति तथा परिवार से मोह हो तो विष के सदृश राजद्रोह से अपने को बचाये रहो।

वध्यस्थान पर पहुँचकर चन्दनदास अपनी पत्नी को समझाता है कि मुझे यह दण्ड किसी अनुचित आचरण के कारण नही दिया गया है, मित्र के कार्य से ही मुझे यह दण्ड मिला है। अतः यह रोने का समय न होकर प्रसन्नता का है। अब तुम वापिस घर जाओ। रुदन करता हुआ उसका पुत्र उसे प्रणाम करते हुये अपने भावी कर्तव्य के बारे में उससे पूछता है। चन्दनदास कहता है— "बेटा ! वहाँ जाकर रहना, जहाँ चाणक्य न पहुँच सके।" इतने में वधिक चन्दनदास से कहता है "सेठ जी ! शूली गढ चुकी है, तैयार हो जाइये।" यह सुनते ही चन्दनदास की पत्नी चिल्लाने लगती है—"लोगो, बचाओ रे बचाओ !" इसी समय राक्षस आकर वहाँ उपस्थित हो जाता है और वधिको से कहता है—"चन्दनदास को मत मारो और दुष्ट चाणक्य से कह दो कि राक्षस आ गया है वह यहाँ वध्यशाला में स्थित है।"

यह समाचार पाकर चाणक्य आता है। वह राक्षस के चरणो का स्पर्श कर प्रणाम करता है। राक्षस कहता है कि मैं चाण्डालों द्वारा छुआ जा चुका हूँ अतः मुझे न छुइये। यह सुनकर चाणक्य उसे बतलाता है कि ये चाण्डाल नहीं हैं। इनमें से एक तो आपका सेवक सिद्धार्थक है और दूसरा राजपुरुष है जिसका नाम भुसिद्धार्थक है। इन्हीं दोनों के द्वारा विश्वास उत्पन्न कर शकटदास द्वारा, बिना उसके कुछ भी जाने-बूझे, मैंने ही वह कूट-पत्र लिखवाया था। भद्रभट, जीवसिद्धि आदि सभी मेरे ही गुप्तचर हैं। जीर्ण उद्यान में फाँसी लगाने वाला पुरुष भी मेरा ही गुप्तचर था। यह सब कार्य मैंने आपसे चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध स्थापित करने के निमित्त किया है।

इतने में चन्द्रगुप्त भी वहाँ आ जाता है और विनीत भाव से राक्षस को प्रणाम करता है। राक्षस उसे विजयी होने का आशीर्वाद देता है।

इसके पश्चात् चाणक्य राक्षस से कहता है कि यदि आप वस्तुतः चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो इस शस्त्र को ग्रहण कर चन्द्रगुप्त के मन्त्रि-पद को