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मुकुन्दमाला स्तोत्रम् (कुलशेखर आलवार - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Mukundamala Stotram of Kulasekhara Alwar with Commentary

कुलशेखर आलवार (राजा कुलशेखर) द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

ముకుందమాల 73

యములందు మునిగితిని. విషయవాంఛ యుండరాదా యనిన భగవద్విషయములైన యెడల గట్టెక్కనగును. అనుభవించుటకు ఇంద్రియములు, అనుభవింపబడుటకు విషయములు మొదలగువానిని భగవంతుడు దయచేసి యున్నాడు. ప్రసాదే సర్వదుఃఖానాం హాని రస్యోపజాయతే, ప్రసన్నచేతసో హ్యాశు బుద్ధిః పర్యవతిష్ఠతే. -- గీత. 2.65 పైశ్లోకమునందువలె రాగద్వేషములను త్యజించి విషయముల ననుభ వింపవలయును. నే నట్టి విషయములందు మునుగలేదు. విషతుల్యములైన విషయములందు మునిగితిని. యతతో హ్యాపి కౌంతేయ పురుషస్య విపశ్చితః, ఇంద్రియాణి ప్రమాథీని హరంతి ప్రసభం మనః. -- గీత. 2.60 అనునట్లు ఇంద్రియములకు మంచివిషయమున ప్రవేశింపజేయు స్వభా వము లేదు. అవి దుర్మార్గముననే పోవును. ఈ సంసారజలధి యందు దిగునపుడు ఓడనేదియైనను సహాయము చేసికొని దిగితివా? అట్లును చేయలేదు. మనసా! ఈరీతి నల్లాడు నరులకు విష్ణువను నావయే శరణ మగును. నీవు మాత్రము భగవంతునొద్ద చేరుము. నాకు ఓడ దొరుకును. దాటించువానికేమియు నీయ పనిలేదు. మనసు నర్పించిన యెడల దానినే కూలిగ పుచ్చుకొని ఆయన దరిజేర్చును. దయచేత నతడే తెప్పయగును. సముద్రమునబడి యల్లాడుచున్నావే యని అడుగకుము. నిత్యపరిపూర్ణు డగుటచేత నతని కేమియును ఈయ పని లేదు. అట్టివాడైనను ఒక్కటి మాత్రము కోరును. శివానందలహరి యను గ్రంథమున భక్తు డొకడు పార్వతీశు నుద్దేశించి--

74 मुकुन्दमाल शिवा! नीकु कनकमु समर्पिंत मन्न नी वुंडुनदि कनकगिरि. धनमु नित्तमन्न धनपति यगु कुबेरुडु नी चरणदासुडु. नीवु कोरिनदि यित्तमन्न कल्पवृक्षमु, कामधेनुवु, चिंतामणि मीयिंटि वृक्षमु, मीयिंटियावु, मीयिंटि रायियै युन्नवि. शैत्योपचा- रमु चेयुदमन्न नेल्लवारिनि संतोषिंपजेयु चंद्रुडु नी तललो नुन्नाडु. सकलमु नॊसगुनदि नी चरणमु. इक नीकु कावलसिन देमुन्नदि? भक्तुल मनसु नायंदु चेरुना यनि कोरुचुंदुवु. नन्नु तलचुटके कदा मनसु निच्चिति ननि तलंचुचुंदुवु. अंदुचेत नीकु कावलसिनदि मन स्सोक्कटे अनि विन्नविंचेनु. आ श्लोक मिदि: करस्थे हेमाद्रौ गिरिश निकटस्थे धनपतौ गृहस्थे स्वर्भू जाम॑र सुरभि चिंतामणिगणे, शिरस्थे शीतांशौ चरणयुगलस्थेऽखिलशुभे कमर्थं दास्येऽहं भवतु भवदर्थं मम मनः. भगवद्गीत पंडरेंडव अध्यायमुलो-- ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः, अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते. तेषा महं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्, भवामि न चिरा त्पार्थ मय्यावेशित चेतसाम्. अनु 6,7 श्लोकमुलंदु तनकु मनसुनु समर्पिंचि तन्ने गतिग नम्मि युंडिन येडल अट्टिवारिनि मृत्युरूपमैन संसार सागर मुनुंडि दाटिंतु ननि भगवंतुडु चेप्पियुन्नाडु. तंड्रि व्रासि यिच्चिन पत्रमुलो वयसुवच्चिन पुत्रुडुनु चेव्राुल चेयुनट्लु भागवतमुन ब्रह्मदेवुडु “स्वामी! निन्नु नम्मिनवारु संसारसागरमुनु गोवत्सपदजलमट्लु अनगा दूड कालुंचगा पडिन

పల్లము నందలి జలమును దాటినట్లు, దాట నగునని చెప్పెను. ఇట్టి కారణములచేత మనసా! నీవు పోయి లయించుము. స్వామి గట్టెక్కించును. వానికి కావలసినది కూలి. ఆ కూలి నీవే. నిన్ను సమర్పించిన యెడల గట్టెక్కించును. ఆ స్వామియే యోడ యగును. అందుచే తనే 10, 11 శ్లోకములందు వానిని ధ్యానించవలయు నంటిని. నీవు వెనుకకు రాకుము. పాపినని భయపడకుము. 11శ్లోకమున జెప్పినట్లు అతడు స్వామిగ నున్నాడు. ప్రక్కను తల్లియున్నది. లోకముల వ్యసనము లను బోగొట్టువాడు నమ్మియుండు మనలను -- దైవీ హ్యేషా గుణమయీ మమ మాయాదురత్యయా, మామేవ యే ప్రపద్యంతే మాయా మేతాం తరంతి తే. -- గీత. 7.14 పైశ్లోకమునందు వలె కాపాడును. పైసంసారసాగరమునబడి దాని యందు గల బాధలను పొందియుండు నరులకు విష్ణువను ఓడయే శరణమగును. 13 భవజలధి మగాధం దుస్తరం నిస్తరేయం కథమహ మితి చేతో మా స్మ గాః కాతరత్వమ్, సరసిజదృశి దేవే తావకీ భక్తిరేకా నరకభిది నిషణ్ణా తారయిష్యత్యవశ్యమ్. చేతః=ఓమనసా!, అగాధం=లోతైనదిగనుకనే, దుస్తరం=దాటశక్యము గాని, భవజలధిం=సంసారమనెడు సముద్రమును, కథం=ఎట్లు, అహం=నేను, నిస్తరేయం=దాటగలను, ఇతి=అని, కాతరత్వం=పిరికితనమును, మా స్మ గాః=పొందవద్దు, సరసిజదృశి=కమలములవంటి నేత్రములుగల, దేవే=భగ వంతుడగు, నరకభిది=నరకాసురుని సంహరించిన శ్రీ కృష్ణునియందు,

76 ముకుందమాల నిష్ఠా=కూర్చుండిన, తావకీ=నీదైన, భక్తిః ఏకా=భక్తి యొక్కటే, అవశ్యం=ముఖ్యముగా (త్వామ్=నిన్ను), తారయిష్యతి=దరిజేర్చగలదు. ఓ మనసా! లోతైనదియును, దాటరానిదియు నగు సంసారసాగర మును నే నెట్లు దాటగలనని తల్లడిల్లకుము. తామరసాక్షుడును, నరకాం తకుడును అగు భగవంతునియందు (శ్రీకృష్ణదేవునియందు) నిలుపబడిన నీ భక్తి యొకటియే నిన్ను అవశ్యము ఈ సాగరమును దాటించును. మనస్సు : భగవంతునకు నన్ను సమర్పించిన పక్షమున నతడు కాపాడు నంటివి. ఆ విషయమున నాకు ధైర్యము కలుగలేదు. కులశేఖరులు: మనసా! తనయందు లయింపజేయవలయునను తలంపు తోనే భగవంతుడు నిన్ను దయచేసియున్నాడు. మనసును సాధనముగ జేసి కొనవలయుననియే భగవదభిప్రాయము. ఉద్ధరే దాత్మనాత్మానం నాత్మాన మవసాదయేత్, ఆత్మైవహ్యాత్మనో బంధు రాత్మైవ రిపురాత్మనః. -- గీత. 6.5 అనినట్లు మనసును బంధువుగ జేసికొని సుఖపడవలయునను తలంపు తోనే ని న్నతడు కరుణించెను. దయాపూర్వకముగ నిచ్చిన మనస్సుతో సుఖపడలేని నావలననే వీరు చెదిరిగదా యని స్వామి చింతించును. కాన నిన్ను సమర్పించు పక్షమున నతడు సంసారసాగరమును దాటించును. సంసారసముద్రమునబడి శ్రమపడు చుండు నేను కాపాడ బడుదును. మనస్సు : మీరు చెప్పిన దంతయు యుక్తముగనే యున్నది. మిగుల శ్రమపడు పక్షమున సముద్రమును దాటనగును. హనుమంతు డును దానిని దాటియున్నాడు. సంసారసాగరమును దాటుట మాత్రము కష్టము. నన్ను కూలిగ నిచ్చి సంసారస

मुकुन्दमाल 77 मुद्रमुनु दाटुट यनु संगति कडुविंतैनदिग उन्नदि. एंतचेप्पिननु नाकेमो नम्मकमु कलुगुकुन्नदि. कुल : मनसा! भयपडकमु. लोतैनदियुनु, दाटशक्यमु कानिदियुनु. नगु संसारसागरमु नेट्लु दातुदु ननि अधैर्यमु चेंदकुमु. मनस्सु : एट्लु भयपडकुंदुनु? एंत चेप्पिननु नाकु भयमु गने युन्नदि. कुल : भगवंतुनियंदु भक्तिमात्रमु सल्पुमु. अतनि यंदु लयंिपुमु. अतनिपादमुलनु विडिचिपेट्टि पाटिपोवलदु. अट्लु चेसितिवेनि या भक्ति संसारसागरमुनु दाटिचिये तीरुनु. मनस्सु : पदियव श्लोकमुलो चेप्पिनट्लु अतनि पादमुललो तप्पक नन्नु चेर्पवलयुननि यत्निंचुचुन्नावु. चलिंपव लदनु चुन्नावु. ना स्वभावमे चंचलमैनदि. आ भगवंतुनियं देमैन विशेषमुंदुना? कुल : तामरपुष्पमु रेकुलवलेनुंडु आ कन्नुलयोक्क अंद मुनु जूचिननु चालुने. मनस्सु : ओहो! वट्टि अंदगाडेना? अटुलैन सामान्यप्रभुवेना? कुल : कादु कादु. चराचर प्रपंचमुनकु ज्ञानाज्ञान मोक्षमु लनु लीलतो नीयगलवाडु. ब्रह्मादुलकु स्वामि. मनस्सु : अन्नियुनु सरिये. मन कतडु सहायमु चेयुना? कुल : अतडु नरकांतकुडु. अतनि शरणु पोंदिन पिम्मट पाप भीतिये युंडदु गदा! भक्ति योक्कटि बागुग नुंडिन चालुनु.

78 मुकुन्दमाल नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः, अज्ञाने नावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः. -- गीत. 5.15 अन्न श्लोकमुलो चेप्पबडिन अज्ञानमु वीडिपोवुनु. ओड समुद्र मुन बागुग निलिचियुण्डेनेनि दानि दाटगलुगुनु. अत्ले पुराण वैराग्यमु काक दृढमयिन भक्तियुण्डेनेनि आ भक्तिये अवश्यमु भवसागरमुनु दाटिञ्चुनु. 14 तृष्णातॊये मदनपवनोद्धूत मोहोर्मिमाले दारावर्ते तनय सहजग्राहसङ्घाकुले च, संसाराख्ये महति जलधौ मज्जतां नस्त्रिधामन् पादाम्भोजे वरद भवतो भक्तिनावं प्रयच्छ. तृष्णातॊये = आशयनेडुनीळ्ळुगलदियु, मदन = मन्मथुडनु, पवन = गालिचेतनु, उद्धूत = पैकिलेपबडिन, मोह = अज्ञानमनु, ऊर्मि = अललयॊक्क, माले = वरुसगलदियु, दारा = भार्ययनु, आवर्ते = सुडु लुगलदियु, तनय = बिड्डलनु, सहज = तोडबुट्टिनवारनु, ग्राह = मॊसळ्ल यॊक्क, सङ्घ = गुम्पुचेतनु, आकुले = कलत पॆट्टबडिनदियुनगु, संसार + आख्ये = संसारमनु पेरुगल, महति = गॊप्प, जलधौ = समु द्रमुनन्दु, मज्जतां = मुनुगुचुन्न, नः = माकु, त्रिधामन् = ओत्रि धामुडा, वरद = ओ वरमुल निच्चुवाडा, भवतः = नीयॊक्क, पाद + अम्भोजे = कमलमुलवंटि पादमुलन्दु, भक्तिनावं = भक्तियनॆडु ओडनु, प्रयच्छ = इम्मु. ओ त्रिधामुडा! वरदा! तृष्णयनु नुदकमुगलदियु, मन्मथु डनु गालिचेत नॆगुर गॊट्टबडिन मोहमुलनॆडि अललवरुसगलदियु,

मुकुन्दमाल 79 भार्ययनु सुडिगलदियु, पुत्रसहोदरुलनु मॊसळ्लगुम्पुचे आकु- लम्बगु संसारमनेडि महासमुद्रमुलों मुनिगियुण्डु माकु नी पादभक्ति यनु ओड नॊसङ्गुमा! मनस्सु : भगवन्तुनियन्दु भक्ति सल्पि, संसारसागरमुनु दाटुट बहुसुलभमैन कार्यमुग नुन्नदि. इपुडे नाकु कॊन्त धैर्यमु कलुगुचुन्नदि. कुल : मनसा! भक्तिनावचेत संसारसागरमुनु दाटवच्चुनु. अयननु आ नाव दॊरकुट कष्टमु. मनस्सु : मीरु चॆप्पिनट्लु भगवन्तुनियन्दु लयिंचेदनु. भक्ति कलुगुनु. आ भक्तिये योद यगुनु. कुल : नीवु दाट गल्गुदुवा? भगवन्तुडे यीयवलॆनु. अन्दु कॊऱकु मनम्मु भगवन्तुनि प्रार्थिम्प वलयुनु. अटुपिम्मट वाडे यॊसगवलॆनु. भक्ति मनसुचेत कलु- गवलॆनु. आ मनसु चंचलमैनदि. हृषीकेशु डगुटचेत स्वामिये यिन्द्रियमुलनु दिद्दवलयुनु. स्वामि! नाकु गत्यन्तरमु लेदु. इन्द्रियमुलु, मनसु नी कधीनमै युन्नवि. नीवेदिद्दि नी यॊद्दकुवच्चुनट्लु चेसिकॊन वलयुनु अनि यतनिनि प्रार्थिम्पवलयुनु. भगवद्गीत 15अध्यायमुन संसारवृक्षच्छेदनमुनकु असंगमु अनगा भगवन्तुनियन्दु संगमु, तदितरमुन असंगमु, अनु शस्त्रमु कावलयु ननियु, दानिनि भगवन्तुडे यीयवलयुननियु, शरणागतिचेयु पक्षमुन भगवन्तुडे दयचेयुननियु चॆप्पबडॆनु. न रूप मस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा, अश्वत्थ मेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा.

80 मुकुन्दमाल ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः, तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी. -- गीत. 15.3-4 भगवंतुडे दयचेयकुन्न जन्मसहस्रमुल कयिननु भक्तिकलु गुना? क्रिंदि श्लोकमुन नी भक्तियोक्कटे दाटिंचुनंटिवि, अदि नीकुनु नाकुनु कानि पनि. कान मनसा! वानिनि प्रार्थिंचि ओडनु संपादिंचुटकु यत्निंचेदनु. कुलशेखरुलु मनसुनकु ई रीतिग बोधिंचि भगवंतुनि प्रार्थिंचुचुन्नारु.

  • कुलशेखरुलु: स्वामी! नी पादारविंदमुलयंदलि भक्तिनि प्रसादिं पुमु. स्वामी : ना दर्शनमु कागाने पादभक्ति नडुगवच्चुना? कुल : स्वामी! नीवु वरदुडवु कदा! एव रेवरि केदेदि कावलयुनो दानि निच्चुवाडवु गदा! अंदुचेतने अट्लडिगितिनि. भक्ति निम्मु. स्वामी : ना पादभक्ति येल? कुल : समुद्रमुन मुनिगियुंडुटचेत. स्वामी : ए समुद्रमुन मुनिगितिवि? कुल : संसारसमुद्रमुन. स्वामी : आ समुद्र मेट्लुन्नदि? कुल : आशये आ समुद्रमुनकु जलमु. (आश जलमुग वर्णिंपबडुटचेत दानिवलन हानि कल्गुननि अर्थमगुचु न्नदि. भगवंतुनि दर्शिंप वलयु ननियुनु, वानि कथलु विनवलयुननियुनु आशयुंडरादा? अदि युनु तप्पे अगुना? अनगा अट्लु कादु.

मुकुन्दमाल 81 बलं बलवतां चाहं कामराग विवर्जितम्, धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ. -- गीत. 7.11 अन्नट्लु धर्मविरुद्धमुगानि याश उण्डवलसिनदे. धर्मशास्त्रमुनकु विरोधमैन आश युण्डरादु.) स्वामि : जलमुण्डिन भयमेमि? कुल : साधारणमुग जलमुण्डेनेनि भयमु लेदु. आ जलमु गालिचेत कोट्टबडुचुन्नदि. अन्दुचेत अललवरुसलु कलिगि युन्नदि. स्वामि : ए गालिचेत कोट्टबडुचुन्नदि? कुल : मन्मथुडनु गालिचेत. स्वामि : अल लेट्लुन्नवि? कुल : मोहमे अललुगा नुन्नवि (मोहमुचेत श्लाघ्यमु अश्ला- घ्यमुगनु, अश्लाघ्यमु श्लाघ्यमुगनु तोचुनु.) स्वामि : तिन्नग गट्टुचेररादा? कुल : अन्दुकु प्रयत्निञ्चि चूचिननु नडुम सुडिगुण्ड मोकटि युन्नदि. स्वामि : सुडिगुण्डमेट्लुन्नदि? कुल : भार्यारूपमुग नुन्नदि. दाटुटकु यत्निञ्चुनपुडु आ सुडिगुण्डमुलो पडिपोवलसिनदे. स्वामि : अट्लु सुडियन्दु पडिननु कोञ्चेमु दूरमुपोयि मरल मरल पैकिलेचि रारादा? कुल : आ स्थलमुन मोस ळ्ळुन्नवि. स्वामि : ए मोसळ्ळु? 7

82 मुकुन्दमाल कुल : तनयुलु, अनुजुलु अनु मोसळ्लगुम्पु चेत आकुलमै युन्नदि. (तनयुलु, अनुजुलु सौम्मु पञ्चि यिम्मनि बाधिन्तुरु). स्वामि : ई समुद्रमु पेरेमि? कुल : संसारमु. स्वामि : लोतुग नुन्नदा? कुल : मिगुल लोतुगनुन्नदि. कान ओ त्रिधामूडा=श्वेत दीपमु अनन्तासनमु, वैकुण्ठमुन नुण्डुवाडा, लेक मूडुवे दमुलन्दुनु सम्बन्धपडिनवाडा, त्रैलोक्यवासी, मूडव स्थलयन्दु नुण्डेडिवाडा! भक्ति नाव निम्मु. (जलमुण्डिन पैनि तेल्पबडिन यनर्थमुलु कलुगुनु. जलमुलेनिचोट नटुश्रम कलुगदु. ई रीतिगने आशयुण्डु पक्षमुन अदि मीदि यनर्थमुलकु मूलमगुनु. आशलेकुन्न बन्धुवुलेल? आशाजलमु वलन गालियललु कलिगेनु. स्वाधीनमुतप्पेनु. आशचेत विपरीत ज्ञानमु, मन्मथ विकारमु कलिगेनु. भार्य यणचेनु. दानिवलन कलिगिन बिड्डलयोक्क, सहजन्मुलयोक्क बाधकलिगेनु. आशवीडि नचो अन्नियुनु पोवुनु. ए बन्धुवुयोक्क पनियुनु जरुगजालदु. संसार समुद्रमुनकु आशयनु जलमे कारणमु). 15 माद्राक्षं क्षीणपुण्यान् क्षणमपि भवतो भक्तिहीनान् पदाब्जे माश्रौषं श्राव्यबन्धं तव चरित मपास्याऽन्य दाख्यानजातम्, मा स्मार्षं माधव त्वामपि भुवनपते चेतसापह्नुवाना न्मा भूवं त्वत्सपर्या व्यतिकररहितो जन्मजन्मान्तरेऽपि.

ముకుందమాల 83 మాధవ = ఓ లక్ష్మీపతి, క్షీణపుణ్యాన్ = పాపముచేసినవారిని, క్షణ మపి = ఇంచుక సేపైనను, భవతః = నీయొక్క, పద + అబ్జే = కమలముల వంటి పాదముల యందు, భక్తిహీనాన్ = భక్తి లేనివారిని, మాద్రాక్షం = చూడకుం దును గాక, శ్రావ్యబంధం = వినదగిన రచనగల, తవ = నీయొక్క, చరితం = కథను; అపాస్య = విడిచి, అన్యత్ = ఇతరమయిన, ఆఖ్యానజాతం = చరిత్రముల సమూ హమును, మాశ్రౌషమ్ = వినకుందునుగాక, భువనపతే = లోకనాయకుడవగు శ్రీకృష్ణమూర్తీ, త్వాం = నిన్ను, చేతసాఽపి = మనస్సుతోనయినను, అపహ్నువా నాన్ = తిరస్కరించువారిని, మాస్మార్షం = తలంచకుందునుగాక, జన్మజన్మాం తరేఽపి = ప్రతిజన్మములోను, త్వత్ = నీయొక్క, సపర్యా = సేవయొక్క, వ్యతి కరరహితః = సంబంధము లేనివాడుగా, మా భూవం = కాకుందునుగాక! ఓ లోకనాథా! నీయొక్క పాదకమలములయందు క్షణకాలమైనను భక్తిలేని పాపులను నేను చూడజాలను. చెవి కింపైన మీయొక్క చరిత్ర మును విడిచి యితరమయిన ప్రబంధములను చెవులార వినను. ఓ శ్రియఃపతీ! నిన్ను తిరస్కరించువారిని మనస్సుచేత నయిన తలం చను. జన్మజన్మాంతరములయందును నీ కైంకర్యము కల్గియుందును గాక! మనస్సు : బుద్ధీంద్రియాదులను వశపఱచుకొనవచ్చును కాని అయో గ్యులు చేరినయెడల అన్ని ప్రయత్నములును వ్యర్థము లగును. దీనికి మార్గ మేదో తెలియుకున్నది. కుల : మనసా! దుర్మార్గుల సహవాసము కలుగకుండుటకై స్వామిని ప్రార్థించెదను. (కులశేఖరులు మనసునకు ఈ రీతిగ తెల్పి భగవంతుని ప్రార్థించిరి). కుల : స్వామీ! అనేక ప్రయత్నములు చేసి మంచిస్థితికి వచ్చి యుండువాడైనను దుర్మార్గుని వలలో పడినప్పుడు హీనస్థితికి వచ్చును. అట్టివాని సహవాసమున నెట్టి భక్తికలవాడైనను

చెడిపోవును. అయోగ్య సహవాసము వలన యోగ్యుడు చెడు నుగాను మంచివాని సహవాసమున దుష్టుడు సన్మార్గవర్తను డగుట కష్టము. పతివ్రతయగు స్త్రీ వ్యభిచారిణి తోడ జేరిన నెట్లో అట్లుచెడును. ధర్మక్షేత్రమైన కురుక్షేత్రముయొక్క స్పర్శచేత తన పుత్రులమనసు యుద్ధమునుండి మరలెనా యని ధృతరాష్ట్రు డడుగగా నీపుత్రులస్పర్శచేత ఆ మహా క్షేత్రము పాడుకావలసినదేకాని వారి మనసు మరల దని సంజయు డనెను. ఒక దుష్టుని ఎన్ని సాధనములచేతనో త్రిప్పవలసియుండును గాని యోగ్యుని రెండు నిమిషములలో చెఱుపవచ్చును. నీటబడుట సులభము; గట్టెక్కుట కష్టము. మయి చానన్యయోగేన భక్తి రవ్యభిచారిణీ, వివిక్తదేశసేవిత్వ మరతి ర్జనసంసది. -- గీత. 13.11 భగవన్మార్గమునకు విరోధులైనవారిని విడువవలయు ననియు, అది యొక గొప్పసాధన మనియు చెప్పబడెను. మంచివస్తువైనను దుర్గంధ పదార్థముతోడ చేరెనేని తోడనే దుర్వాసన గలదియగును. దుష్టసహవాస మట్టిది. అట్లగుటచేత స్వామీ! నీ పాదములందు భక్తిలేని పాపులను క్షణమైనను చూడకుందును గాక. దుష్టుడు చెలికాడైనను, చుట్టమయి నను, సుతుడయినను, మఱెట్టివాడయినను వానిని త్యజించవలయును. తాను చెప్పు హితమును విననందున విభీషణుడు రావణుని విడిచిపెట్టెను. దుష్టులగువారికి సామదానభేదదండోపాయములచేత చెప్పిచూడవలయును. వినకున్న విడువవలయును. ఆత్మబంధువులతో చేరవలయును, గాని శరీ రబంధువులను అంతగ గమనింపరాదు. ఆత్మోజ్జీవనమునకు తగువారితో

मुकुन्दमाल 85 जेरवलयुनु. 'आये यिव्वुलगत्तु' अनु पाशुरमुन नम्मान्ऴ्वार्लु भगवंतु निट्लु प्रार्थिञ्चिरि. नम्माळ्वार्लु : स्वामी! नन्नु शीघ्रकालमुन दीसिकोनिपोम्मु. एन्दु चेत ननगा इंक कोंतकाल मिच्चटने युन्दुनेनि नेनुन्नु चेडिपोदुनु. (आये अनगा अम्मायनि यर्धमु. नम्माळ्वारुलु स्वामिनि अम्मायनि येल पिलिचि रनगा भगवंतु निकि मनयं दतिप्रीति युन्न दनि तेलुपुटकु अट्लु पिलिचिरि. तप्पुचेसिनपुडु तंड्रि शिक्षिंचुनु. तल्लिकि अनुग्रहमुतप्प निग्रहमु लेनं दुन कोपिंचदु. नम्माळ्वारु ली संगतिनि विशद परचिरि. मरियु निट्लनिरि. स्वामी! ई लोकमु ननुंडु स्थावरजंगम पदार्थमुलुनु नीवे. जडमु चेतनमु नीवे. स्वामि : अन्नियुनु नेनेना? नम्मा : अन्नियुनु मीरे यनुटचेत अद्वैतमनि भाविंप कुडु. ना तात्पर्यमु वेऱु. नी संबंधमुलेनि पदार्थमु लेदु. कान अन्नियुनु नीवे. प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयता महम्, मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्. -- गीता. 10.30 अनि गीतलो “ना संबंधमु लेनि वस्तुवे लेदनि मीरे चप्पितिरि. अंतर्यामिग नुन्नावु गान अन्नियुनु नीवे. नमः पुरस्ता दथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व, अनंतवीर्यामितविक्रम स्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः. -- गीता. 11.40

86 मुकुन्दमाल अनु श्लोकमुन अर्जुनुडु स्वामि! नीवु अन्नि वस्तुवुललोनु व्यापिञ्चियुन्नावु. कान अन्नियु अगुचुन्ना वनेनु. नीवु शरीरिवि. अन्नियुनु नी शरीरमु. अहं क्रतु रहं यज्ञः स्वधाऽह मह मौषधम्, मन्त्रोऽह महमे वाज्य महमग्नि रहं हुतम्. -- गीत. 9.16 अनु श्लोकमुन नेने यज्ञमु, नेने महायज्ञमु, नेने स्वध अनि यीरीति अन्नियुनु नेने यनि चेप्पितिरि. क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत, क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो र्ज्ञानं यत्तत् ज्ञानं मतं मम. -- गीत. 13.3 क्षेत्रक्षेत्रज्ञुलु ना शरीरभूतमु शेषभूतमु अनि पल्कितिरि. नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप, एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूते र्विस्तरो मया. -- गीत. 10.40 अन्न श्लोकमुन ना महिमलकु अन्तमु लेदंटिरि. आ या कारणमुलचेत नन्नियुनु नीवे यगुचुन्नावु. स्वामि : नावलन नेमि कावलयुनु? नम्मा : नन्नु मीवद्दकु तीसिकॊनिपोंडु. स्वामि : ई लोकमुन भागवतु लुन्नारु. इंकनु कॊन्नि दिनमु लुंडवच्चुनु. गॊप्पस्थितियं दुण्डुवारु वैकुण्ठमुन नुंडिननेमि, ई लोकमुन नुंडिन नेमि? नम्मा : स्वामि! इन्द्रियमुुलनु मनस्सुनु सरिपऱचितिरि. शरी रमु पाञ्चभौतिक मगुटचेत व्याधुलु वच्चुनु. मुस लितनमु वच्चुनु.

ముకుందమాల 87 జాతస్య హి ధ్రువో మృత్యుః ధ్రువం జన్మ మృతస్య చ, తస్మాదపరిహార్యేఽర్థే న త్వం శోచితు మర్హసి. -- గీత. 2.27 అనునట్లు జననమరణములు కలుగుచుండును. వ్యాధులు మనోవ్యా- ధులు అనుభవించెదను. ఇకముం దివి రాకుండుటకై నన్ను స్వీకరింపవల- యును. గొప్పవారిని ఆశ్రయించు పక్షమున వారే పిలుచుకొని పోవలెను. కాన నన్ను స్వీకరింపవలెను. స్వామి : మీరేమి చేసెదరు? నమ్మా : స్వామీ! నేను దాసభూతుడను. ఆస్తికుడను. నావం- టివారిని చేర్చుకొనువాడ వగుటచేతనే ని న్నడుగుటకు కారణ మగుచున్నది. నీవు లోకములయొక్క వ్యసనములను పోగొట్టువాడవు. స్వామి : శరీరము ధర్మసాధన మయినది కదా! ఇంకను కొన్ని యేండ్లుండరాదా? నమ్మా : స్వామీ! కొన్నిదినములీ లోకమున నుంటినేని నేను చెడిపో- దును. దాసుడ నను భావమే సమసిపోవును. ఈ లోకమును నాకు చూపవలదు. శీఘ్రముగ పిలిపించు కొమ్ము. స్వామి : లోకు లే రీతి చెడియున్నారు. లోక మెట్లు చెడియున్నది? నమ్మా : స్వామీ! నైవ కించి త్కరోమీతి యుక్తో మన్యేత తత్త్వవిత్, పశ్యన్ శృణ్వన్ స్పృశన్ జిఘ్ర న్నశ్నన్ గచ్ఛన్ స్వపన్ శ్వసన్. ప్రలపన్ విసృజన్ గృహ్ల న్నున్మిష న్నిమిషన్నపి, ఇంద్రియాణీంద్రియార్థేషు వర్తంత ఇతి ధారయన్. -- అని గీత. 5.8,9. శ్లోకములందు చెప్పబడిన పదుమూడు కార్యములందును అనగా నిద్రలేచినది మొదలు నిద్రించువరకు చేయుకార్యములందే మానవులు శ్రద్ధ గలిగియున్నారు.

८८ मुकुन्दमाल त्वच्छेषत्वज्ञानमु लेकुन्नारु. नी कृपनु सम्पादिम्पकुन्नारु. ज्ञानमु सम्पादिञ्चलेदु. भगवद्भक्त्यादि साधनमुलनु सम्पादिञ्चलेनिवारितो गूडिन दगुट चेत ई लोकमु चेदियुन्नदि. दीनिनि नाकु चूप कुडु. (नम्माऴ्वारु वण्टिवारे यिट्लु दुष्टसहवासमुनकु भीतिल्लिरि. कुलशेखरुलुनु क्षीणपुण्युलनु चूपकु डनिरि). स्वामि : अयोग्युलनु चूपुपक्षमुन कोट्टुदुरा? गिल्लुदुरा? कुलशेखरुलु : भक्तुलुग नुण्डुवारितो वारु चेदुनट्लु माट्लाडु दुरु. स्वामि : एट्लु माट्लाडुदुरु? कुल : यज्ञमाचरिञ्चुट स्वर्गमु पोन्दुतया? निच्चेन येमैना नुन्नदा? अग्निलो नेयि वेसिन स्वर्गमु वच्चुना? अनि ई रीतिग वचिन्तुरु. निजमे गदा अनि तोचुनु. नास्तिकवादुलु बहुचमत्कारमुग माट्लादुदुरु. भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृत चेतसाम्, व्यवसायात्मिकाबुद्धि स्समाधौ न विधीयते. -- गीत. २.४४श्लोकमुट्लु वारि माटल वलन चेदुदुरु. या मिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः, वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः. -- गीत. २.४२. वारि माटलु पुष्पसदृशमुग नुण्डुनु. आ माटलु बुद्धि नीड्चुनु. श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला, समाधा वचलाबुद्धि स्तदा योग मवाप्स्यसि. -- गीत. २.५३श्लोकमुट्लु एकाग्रबुद्धितो

ముకుందమాల 89 కూర్చుండి నిశ్చయించు కొనవలెను. తవచరితమపాస్య=నీ చరిత్రమును విడిచి, శ్రావ్యబంధం అన్యదాఖ్యానజాతం=చెవికింపైన ఇతర ప్రబంధములను, మాశ్రౌషం=వినకుందునుగాక (వినుటకు బాగుండినను నీ చరితమును దప్ప ఇతరమును వినకుండవలయును అని యర్థము) లేక అశ్రావ్యబంధం తవ చరిత మపాస్య=చెవికింపుగ నుండని నీ చరిత్రమును విడిచి, అన్యదాఖ్యా నజాతం=ఇతర ప్రబంధములను, మాశ్రౌషం=వినకుందునుగాక (అనగా నీ కథ వినుట కింపుగ లేకపోయినను వినవలయునుగాని, బాగుగ లేదని యిత రపురాణమును వినరాదు అని యర్థము.) లేక శ్రావ్యబంధం తవ చరిత మపాస్య=చెవి కింపైన నీ చరిత్రమును విడిచి, అన్యదాఖ్యానజాతం=ఇతర ప్రబంధములను, మాశ్రౌషం=వినకుందునుగాక. కడతేరవలెననియే కదా యే గ్రంథమునైనను చదువుదురు. కడతేరుమార్గముండెనేని అలంకారము శబ్ద సౌష్ఠవము ఉండ బనిలేదు. దివ్యమంగళనామమును ప్రయోగించి యుండి రేని గ్రంథ మెట్టిదైయుండినను పఠించువారి, వినువారి సకలపాపములను హరించును. భగవత్సంబంధముండు గ్రంథమును వేద మనుకొనవలయును. భగవత్సంబంధములేక, భాగవతసమ్మతము గాక యుండెనేని ప్రయోజనము లేదు. పుష్పసంబంధముచేత నార, రాజాధిరాజుల శిరమున జేరును. ఒక కవి యనిరి:-- “స్వామీ! నాకు సంస్కృతజ్ఞానము లేదు. కవనము చెప్పుటకును శక్తిలేదు. అయినను తెగించి గ్రంథమును వ్రాయబూని తిని. ఈ గ్రంథము నెవ్వ రాదరింతురు? కలకండ చేర్చితిని. అమృతము చేర్చితిని. అందుచేత మెప్పుపొందెను. బావినీటియందు చక్కెర చేర్చి యుండిన పక్షమున ఆ నీటిని యడుగుదురు గాని చక్కెరలేని కావేరి జలము నడుగుదురా? బావినీ రైనను కలకండ పానకమని పేరుపొం దునుగదా! అట్టి గౌరవము కలకండ వలన గలిగెనుగాని నీటియోగ్యతచేత కాదు. ఇత్యాది కారణములచేత కులశేఖరులు భగవంతుని సంబంధములేని కథలను వినగూడదని విన్నవించి మఱియు నిట్లనిరి. కుల : స్వామీ! వీరికంఔను ఇతరపాపు లున్నారు. వారెట్టివా రనగా, పైవారు భగవంతు డున్నాడని తలంచి భక్తి సేయ కుందురు. వారు భగవంతుడు లేడని చెప్పుదురు. ఈ పాపులు

९० मुकुन्दमाल अत्लुगाक भगवन्तुडु लेडनि वादिञ्चि भ्रम कलिगिञ्चेदरु. अट्टिवारिनि तलम्पकुन्दुनुगाक! कुल : भुवनपते=नीवु अणुवुलो अणुवै महात्तुनकु महात्तै उण्डगा लेडनि चेप्पु पापिनि स्मरिम्पनगुना? स्वामि : अत्तुलैन नी केमि कावलेनु? कुल : नी कैङ्कर्य सम्बन्ध मुण्डवलयुनु. अत्लुलेकये जन्म मुण्डरादु. कान स्वामी! पापात्मुनि चूडकुण्डुट, नी सम्बन्धमु लेनिकथ विनकुण्डुट, निन्नु द्वेषिञ्चु वानिनि स्मरिम्पकुण्डुट, प्रतिजन्ममुनन्दुनु नी कैङ्कर्यमु कलिगि युण्डुट अनु नाल्गु वरमुलनु प्रसादिम्पुमु. १६ जिह्वे कीर्तय केशवं मुररिपुं चेतो भज श्रीधरं पाणिद्वन्द्व समर्च याच्युतकथा श्श्रोत्रद्वय त्वं शृणु, कृष्णं लोकय लोचनद्वय हरे र्गच्छाङ्घ्रियुग्मालयं जिघ्र घ्राण मुकुन्द पादతులసీం/पादतुलसीं मूर्ध न्नमाधोक्षजम्. जिह्वे=ओ नालुका, केशवं=केशवुनि, कीर्तय=पाडुमु, चेतः=ओ मनसा! मुररिपुं=मुरासुरुनिकी शत्रुवैन विष्णुवुनु, भज=सेविं पुमु, पाणिद्वन्द्व=चेतुलजण्टा (रेण्डुचेतुलारा), श्रीधरं=लक्ष्मी देविनी (रॊम्मुनन्दु) धरिञ्चिनवानिनि, समर्चय=चक्कगा पूज सेयुमु, श्रोत्रद्वय=ओ चेवुलजण्टा, अच्युतकथाः=विष्णुकथलनु, त्वं=नीवु, शृणु=विनुमु, लोचनद्वय=ओ कन्नुलजण्टा, कृष्णं=श्रीकृ ष्ण्नि, लोकय=चूडुमु, अङ्घ्रियुग्म=ओ काळ्ळजण्टा, हरेः=विष्णु नियॊक्क, आलयं=गुडिनि, गच्छ=पॊन्दुमु, घ्राण=ओ नासिका, मुकुन्दपाद तुलसीं=विष्णुवुयॊक्क पादमुलन्दलि तुलसीदळमुनु, जिघ्र=वासनचूडुमु, मूर्धन्=ओ शिरमा, अधोक्षजं=विष्णुवुनु, नम=म्रॊक्कुमु.

ముకుందమాల 91 ఓ నాలుకా! కేశవుని పాడుము. ఓ మనసా! మురవైరిని భజింపుము. చేతులారా! శ్రీధరుని చక్కగా నారాధింపుడు. చెవులారా! అచ్యుతుని కథల నాలకింపుడు. కన్నులారా! శ్రీకృష్ణుని చూడుడు. పాదములారా! శ్రీహరి సన్నిధికి పొండు, ఘ్రాణమా! ముకుందుని పాదములందు సమర్పించిన తులసిని వాసన చూడుము. శిరమా! అధోక్షజుని నమస్కరింపుము. స్వామి : పాపులను చూడగూడదనియు, భగవత్సంబంధము లేని కథలను వినగూడదనియు, భగవంతుని ద్వేషించువానిని స్మరింపరాదనియు, ప్రతిజన్మమునందును నా కైంకర్య ములేక ఉండరాదనియు కోరితివి. ఇంకను ఏమి కావలయును? కులశేఖరులు: స్వామీ! సర్వేంద్రియములచేతను, మనోబుద్ధులచేతను సుఖము కలుగవలయును. స్వామి : అటులైన నింద్రియములను ప్రార్థించుకొమ్ము (కులశేఖ రులు మనసు చంచలమైనదని తలచి, భగవంతునియందు లయింపుమని ముందు ప్రార్థించియుండిరి. మనసు నట్లు ప్రార్థించుటచేత తదితరములైన ఇంద్రియములకు కోపము రాగా -- యతతో హ్యపి కౌంతేయ పురుషస్య విపశ్చితః, ఇంద్రియాణి ప్రమాథీని హరంతి ప్రసభం మనః. -- గీత. 2.60 అను రీతి ప్రమాదములైన ఇంద్రియములు మనసు నీడ్చునని తలం చిరి. దుష్టుడగు పుత్తునికి సద్బోధచేసి మంచిమార్గమున త్రిప్పదలచువారు వాని మిత్రులను గూడ వానిచెంత చేరనీయకుండ చేయవలయును. కేవ లము తండ్రిశుశ్రూష తప్ప నితరము నెఱుంగని ఋశ్యశృంగుని వేశ్యాంగనలు తమ యూరికి పిలుచుకొని పోలేదా? కులశేఖరు లీ కారణములను దలచి భగవదాజ్ఞగైకొని యింద్రియముల నీ రీతి ప్రార్థించిరి.)

92 ముకుందమాల కులశేఖరుడు : నాలుకా! మనసు భగవంతునియందు లయించిన నేమి? భగవన్నామమును కీర్తింపగలుగునా? నీవే ఆ పని చేయవలసిన దానవు. కాన కేశవుని కీర్తించుము. మనసా! ఇతరేంద్రియములను ప్రార్థించినంత మాత్రాన నిన్ను మరచితి ననుకొనకుము. నీవు మురవైరిని దలంపుము. చేతులారా! కేవలము భగవత్కీర్తనము చేసినజాలదు. మీరు శ్రీధరుని పూజింపుడు. చెవులారా! భగవంతుని పూజింపవలయునను కోరిక పుట్టవలయును. భగవత్కథ లను వినినపుడే భక్తి గలిగి ఆ కోరిక పుట్టును. మీరు వినినపుడే ఇతరేంద్రియాదులు పనిచేయును. కాన మీరు అచ్యుతుని కథల నాలింపుడు. కన్నులారా! ఎన్ని విధములుగ విన్నను అంతభక్తి గలుగదు. సాక్షాత్తుగ చూచినపుడే భక్తి కుదురును. కాన మీరు కృష్ణుని చూడుడు. పాదములారా! మీరు నడచి వెళ్ళిననే కదా భగవద్దర్శనము చేసికొననగును. మీరే ముఖ్యమైనవారు గాన శ్రీహరిసన్నిధికి పొండు. ఓ నాసికా! ఇంతదూరము పోయి హరిసన్నిధిని ప్రవేశించినపుడు భక్తులతో నిండి యుండు ఆ ప్రదేశమున చెమటపట్టును. ఇక చాలును, వెలుపలికి పోవలయునని తోచును. నీవు ఇతర వాసనలను కోరకుము. ఆ సన్నిధియందు ముకుంద చరణారవిందములందు సమర్పించిన తులసి యుండును. దానిని వాసన చూడుము. ఓ శిరమా! భగవంతుని సన్నిధికి పోయినప్పుడు నీవు వంగక గర్వ ముతో నుంటివేని యనర్థముసంభవించును. కావున సన్నిధిలోపలికి పోవునపుడే నమ్రతతో పొమ్ము. మనోవా క్కాయములకు అందనివాడు, ఇంద్రియములచేత గలుగు జ్ఞానమునకు గోచరించనివాడైన అధోక్షజునికి నమస్క రింపుము. (కులశేఖరులు ఆ యా యింద్రియములను