मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
| ३८ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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| ननु-एतं मोक्षमिच्छन्ति केचित् । | शङ्का— परन्तु कोई-कोई तो इसीको मोक्ष समझते हैं ? | | न; "इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" (मु० उ० ३ । २ । २)<br><br>"ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति" (मु० उ० ३ । २ । ५) इत्यादि-श्रुतिभ्योऽप्रकरणाच्च । अपर-विद्याप्रकरणे हि प्रवृत्ते न ह्यक-स्मान्मोक्षप्रसङ्गोऽस्ति । विरज-स्त्वं त्वापेक्षिकम् । समस्तमपर-विद्याकार्यं साध्यसाधनलक्षणं क्रियाकारकफलभेदभिन्नं द्वैतम् एतावदेव यद्धिरण्यगर्भप्राप्त्यव-सानम् । तथा च मनुनेोक्तं स्था-वराद्यां संसारगतिमनुक्रामता<br><br>"ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महान-व्यक्तमेव च । उत्तमां सात्त्वि- | समाधान— ऐसा समझना उचित नहीं है। "उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" "वे संयतचित्त धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्मको सब ओर प्राप्तकर सभीमें प्रवेश कर जाते हैं" इत्यादि श्रुतियोंसे [ ब्रह्म-वेत्ताको इसी लोकमें सम्पूर्ण कामना-ओंसे मुक्ति और सर्वात्मभावकी प्राप्ति बतलायी गयी है ] । इसके सिवा यह मोक्षका प्रकरण भी नहीं है । अपरा विद्याके प्रकरणके चालू रहते हुए अकस्मात् मोक्षका प्रसङ्ग नहीं आ सकता । और उसकी विरजस्कता ( निष्पापता ) तो आपेक्षिक है । अपरा विद्याका समस्त कार्य साध्य-साधनरूप, क्रिया-कारक और फलरूप भेदोंसे भिन्न तथा द्वैतमय होनेसे इतना ही है जिसका कि हिरण्यगर्भकी प्राप्तिमें ही पर्यवसान होता है । स्थावरोंसे लेकर क्रमशः संसारगतिकी गणना करते हुए मनुजीने भी ऐसा ही कहा है—"ब्रह्मा, मरीचि आदि प्रजापतिगण, यमराज, महत्तत्त्व और अव्यक्त
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
| कीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः" (मनु० १२।५०) इति ॥११॥ | होना ]—यह विद्वानोंने उत्तम सात्त्विकी गति बतलायी है"॥११॥ |
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ऐहिक और पारलौकिक भोगोंकी असारता देखनेवाले पुरुषके लिये संन्यास और गुरूपसदनका विधान
| अथेदानीमसात्साध्यसाधनरूपात्सर्वस्मात्संसाराद्विरक्तस्य परस्यां विद्यायामधिकारप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते— | तत्पश्चात् अब इस साध्य-साधनरूप सम्पूर्ण संसारसे विरक्त हुए पुरुषका परा विद्यामें अधिकार दिखानेके लिये यह कहा जाता है— |
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परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो
निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२॥
कर्मद्वारा प्राप्त हुए लोकोंकी परीक्षा कर ब्राह्मण निर्वेदको प्राप्त हो जाय, [क्योंकि संसारमें] अकृत (नित्य पदार्थ) नहीं है, और कृतसे [हमें प्रयोजन क्या है ?] अतः उस नित्य वस्तुका साक्षात् ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो हाथमें समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही पास जाना चाहिये ॥ १२ ॥
| परीक्ष्य यदेतदृग्वेदाद्यपरविद्याविषयं स्वाभाविक्याविद्याकामकर्मदोषवत्पुरुषानुष्ठेयम् अविद्यादिदोषवन्तमेव पुरुषं प्रति विहितत्वात्तदनुष्ठानकार्यभूताश्च | यह जो ऋग्वेदादि अपरविद्याविषयक, तथा अविद्यादि दोषयुक्त पुरुषके लिये ही विहित होनेके कारण स्वभावसे ही अविद्या काम और कर्मरूप दोषसे युक्त पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान किये जानेयोग्य कर्म है तथा उसके अनुष्ठानके कार्यभूत |
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| ४० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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| लोका ये दक्षिणोत्तरमार्गलक्षणाः फलभूताः, ये च विहिताकरण-प्रतिषेधातिक्रमदोषसाध्या नरक-तिर्यक्प्रेतलक्षणास्तानेतानपरीक्ष्य प्रत्यक्षानुमानोपमानागमैः सर्वतो याथात्म्येनावधार्य । लोकान् संसारगतिभूतान् अव्यक्तादि-स्थावरान्तानव्याकृताव्याकृत-लक्षणान् बीजाङ्कुरवदितरेतरोत्प-त्तिनिमित्ताननेकानर्थशतसहस्र-सङ्कुलान्कदलीगर्भषदसारान् मायामरीच्युदकगन्धर्वनगराकार-स्वप्नजलबुद्बुदफेनसमान्प्रति-क्षणप्रध्वंसानपृष्ठतः कृत्वाविद्या-कामदोषप्रवर्तितकर्मचितान्धर्मा-धर्मनिर्वर्त्तितानित्येतत् । ब्राह्मण-स्यैव विशेषतोऽधिकारः सर्वत्या-गेन ब्रह्मविद्यायामिति ब्राह्मण-ग्रहणम्।परीक्ष्य लोकान्किं कुर्यात् | अर्थात् फलरूप दक्षिण एवं उत्तरमार्गरूप लोक हैं और विहित कर्मके न करने एवं प्रतिषिद्धके करनेके दोषसे प्राप्त होनेवाली जो नरक, तिर्यक् तथा प्रेतादि योनियाँ हैं उन इन सभीकी परीक्षा कर अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम—इन चारों प्रमाणोंसे सब प्रकार उनका यथावत् निश्चय कर जो बीज और अङ्कुरके समान एक-दूसरेकी उत्पत्तिके कारण हैं अनेकों—सैकड़ों-हजारों अनर्थोंसे व्याप्त हैं, केलेके भीतरी भागके समान सारहीन हैं, माया, मृगजल और गन्धर्वनगरके समान भ्रमपूर्ण तथा स्वप्न, जलबुद्बुद और फेनके सदृश क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं और अविद्या एवं कामरूप दोषसे प्रवर्तित कर्मोंसे प्राप्त यानी धर्मा-धर्मजनित हैं उन व्यक्त-अव्यक्तरूप तथा संसारगतिभूत अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त लोकोंकी ओरसे मुख मोड़कर ब्राह्मण [ उनसे विरक्त हो जाय ] । सर्व-त्यागके द्वारा ब्राह्मणका ही ब्रह्म-विद्यामें विशेषरूपसे अधिकार है; इसलिये यहाँ 'ब्राह्मण' पदका ग्रहण किया गया है। इस प्रकार लोकोंकी परीक्षा कर वह क्या करे, सो बत- |
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| इत्युच्यते—निर्वेदं निःपूर्वो | लाते हैं—‘निर्वेद करे’। यहाँ ‘नि’ |
| विदिरत्र वैराग्यार्थे वैराग्य- | पूर्वक ‘विद्’ धातु वैराग्य अर्थमें है; |
| मायात्कुर्यादित्येतत् । | अतः तात्पर्य यह है कि ‘वैराग्य करे’। |
| स वैराग्यप्रकारः प्रदर्श्यते । | अब वह वैराग्यका प्रकार |
| इह संसारे नास्ति कश्चिदप्यकृतः | दिखलाया जाता है । इस संसारमें |
| पदार्थः । सर्व एव हि लोकाः | कोई भी अकृत (नित्य) पदार्थ |
| कर्मचिताः कर्मकृतत्वाच्चानित्याः, | नहीं है । सभी लोक कर्मसे सम्पादन |
| न नित्यं किञ्चिदस्तीत्यभिप्रायः। | किये जानेवाले हैं और कर्मकृत |
| सर्वं तु कर्मानित्यस्यैव साधनम्। | होनेके कारण अनित्य हैं । तात्पर्य |
| यस्माच्चतुर्विधमेव हि सर्वं कर्म | यह कि इस संसारमें नित्य कुछ भी |
| कार्यमुत्पाद्यमाप्यं संस्कार्यं | नहीं है । सारा कर्म अनित्य फलका |
| विकार्यं वा, नातः परं कर्मणो | कार्य, उत्पाद्य, आप्य और विकार्य |
| विशेषोऽस्ति । अहं च नित्येन | अथवा संस्कार्य चार ही प्रकारके |
| अमृतेनाभयेन कूटस्थेनाचलेन | हैं, इनसे भिन्न कर्मका और कोई |
| ध्रुवेणार्थेनार्थी न तद्विपरीतेन । | प्रकार नहीं है । किन्तु मैं तो एक |
| अतः किं कृतेन कर्मणायासबहु- | नित्य, अमृत, अभय, कूटस्थ, अचल |
| लेनानर्थसाधनेनेत्येवं निर्विण्णो- | और ध्रुव पदार्थकी इच्छा करनेवाला |
| ऽभयं शिवमकृतं नित्यं पदं | हूँ; उससे विपरीत स्वभाववालेकी |
| यत्तद्विज्ञानार्थं विशेषेणाधिगमार्थं | मुझे आवश्यकता नहीं है । अतः |
| स निर्विण्णो ब्राह्मणो गुरुमेवा- | इस श्रमबहुल एवं अनर्थके साधन- |
| चार्यं शमदमदयादिसम्पन्नमभि- | भूत कृत—कर्मसे मुझे क्या प्रयो- |
| गच्छेत्। शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येण | जन है? इस प्रकार विरक्त होकर जो |
| अभय, शिव, अकृत और नित्य- | |
| पद है उसके विज्ञानके लिये— | |
| विशेषतया जाननेके लिये वह विरक्त | |
| ब्राह्मण शम-दमादिसम्पन्न गुरु यानी | |
| आचार्यके पास ही जाय । शास्त्रज्ञ | |
| होनेपर भी स्वतन्त्रतापूर्वक ब्रह्मज्ञान- |
४२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
| ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यादित्येतद्<br><br>गुरुमेवेत्यवधारणफलम् ।<br><br>समित्पाणिः समिद्भारगृहीत-<br><br>हस्तः श्रोत्रियमध्ययनश्रुतार्थ-<br><br>सम्पन्नं ब्रह्मनिष्ठम् । हित्वा सर्व-<br><br>कर्माणि केवलेऽद्वये ब्रह्मणि निष्ठा<br><br>यस्य सोऽयं ब्रह्मनिष्ठो जपनिष्ठ-<br><br>स्तपोनिष्ठ इति यद्वत् । न हि<br><br>कर्मिणो ब्रह्मनिष्ठता सम्भवति<br><br>कर्मात्मज्ञानयोर्विरोधात् । स<br><br>तं गुरुं विधिवदुपसन्नः प्रसाद्य<br><br>पृच्छेदक्षरं पुरुषं सत्यम् ॥१२॥ | का अन्वेषण न करे—यही ‘गुरुमेव’ इस पदसमूहमें आये हुए निश्चयात्मक ‘एव’ पदका अभिप्राय है ।<br><br>समित्पाणिः अर्थात् हाथमें समिधाओंका भार लेकर श्रोत्रिय यानी अध्ययन और श्रवण किये अर्थसे सम्पन्न तथा ब्रह्मनिष्ठ [ गुरुके पास जाय ]—सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर जिसकी केवल अद्वितीय ब्रह्ममें ही निष्ठा है वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है; जपनिष्ठ तपोनिष्ठ आदिके समान ही यह ‘ब्रह्मनिष्ठ’ शब्द है । कर्मठ पुरुषको ब्रह्मनिष्ठा कभी नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म और आत्मज्ञानका परस्पर विरोध है । इस प्रकार उन गुरुदेवके पास विधिपूर्वक जाकर उन्हें प्रसन्नकर सत्य और अक्षर पुरुषके सम्बन्धमें पूछे ॥ १२ ॥ |
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गुरुके लिये उपदेशप्रदानकी विधि
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्य-
क्प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं
प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
वह विद्वान् गुरु अपने समीप आये हुए उस पूर्णतया शान्तचित्त एवं जितेन्द्रिय शिष्यको उस ब्रह्मविद्याका तत्त्वतः उपदेश करे जिससे उस सत्य और अक्षर पुरुषका ज्ञान होता है ॥ १३ ॥
| तस्मै स विद्वान् गुरुर्ब्रह्मविद् उपसन्नायोपगताय सम्यग्यथाशास्त्रमित्येतत् , प्रशान्तचित्ताय उपरतदर्पादिदोषाय शमान्विताय बाह्येन्द्रियोपरमेण च युक्ताय सर्वतो विरक्तायेत्येतत् । येन विज्ञानेन यया विद्यया परयाक्षरमद्रेश्यादिविशेषणं तद्देवाक्षरं पुरुषशब्दवाच्यं पूर्णत्वात् पुरिशयनाच्च सत्यं तदेव परमार्थस्वाभाव्यादक्षरं चाक्षरणादक्षतत्वादक्षयत्वाच्च वेद विजानाति तां ब्रह्मविद्यां तत्त्वतो यथावत् प्रोवाच प्रब्रूयादित्यर्थः। आचार्यस्याप्ययं नियमो यन्न्यायप्राप्तसच्छिष्यनिस्तारणमविद्यामहोदधेः ॥ १३ ॥ | वह विद्वान्—ब्रह्मवेत्ता गुरु अपने समीप आये हुए उस सम्यक्—यथाशास्त्र प्रशान्तचित्त—गर्व आदि दोषोंसे रहित तथा शमसम्पन्न—बाह्य इन्द्रियोंकी उपरतिसे युक्त और सब ओरसे विरक्त हुए शिष्यको, जिस विज्ञान अथवा जिस परा विद्यासे उस अद्रेश्यादि विशेषणवाले तथा पूर्ण होने या शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण 'पुरुष' शब्दवाच्य अक्षरको, जो क्षरण (च्युत होना) क्षत (व्रण) और क्षय (नाश) से रहित होनेके कारण 'अक्षर' कहलाता है, जानता है उस ब्रह्मविद्याका तत्त्वतः—यथावत् उपदेश करे—यह इसका भावार्थ है। आचार्यके लिये भी यही नियम है कि न्यायानुसार अपने समीप आये हुए सच्छिष्यको अविद्यामहासमुद्रसे पार कर दे ॥ १३ ॥ |
इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये प्रथममुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
समाप्तमिदं प्रथमं मुण्डकम् ।
द्वितीय मुण्डक (प्रथम खण्ड) - ब्रह्मका विश्वरूप व सर्वकारणत्व
द्वितीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
| वक्ष्यमाणग्रन्थस्य प्रयोजनम् | |
|---|---|
| अपरविद्यायाः सर्वं कार्यम्<br>उक्तम् । स च<br>संसारो यत्सारो<br>यस्मान्मूलादक्षरात्<br>सम्भवति यस्मिंश्च प्रलीयते तद-<br>क्षरं पुरुषाख्यं सत्यम्। यस्मिन्<br>विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति<br>तत्परस्या ब्रह्मविद्याया विषयः<br>स वक्तव्य इत्युत्तरो ग्रन्थ<br>आरभ्यते— | यहाँतक अपरा विद्याका सारा कार्य कहा । यही संसार है; उसका जो सार है, जिस अपने मूलभूत अक्षरसे वह उत्पन्न होता है और जिसमें उसका लय होता है वह पुरुषसंज्ञक अक्षरब्रह्म ही सत्य है, जिसका ज्ञान होनेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है, वह परा विद्याका विषय है। उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है— |
अग्निसे स्फुलिङ्गोंके समान ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥
वह यह (अक्षरब्रह्म) सत्य है। जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्निसे उसीके समान रूपवाले हजारों स्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) निकलते हैं, हे सोम्य ! उसी प्रकार उस अक्षरसे अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं ॥ १ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
| यदपरविद्याविषयं कर्मफललक्षणं सत्यं तदापेक्षिकम् । इदं तु परविद्याविषयं परमार्थसल्लक्षणत्वात् । तदेतत्सत्यं यथाभूतं विद्याविषयम्, अविद्याविषयत्वाच्चानृतमितरत् । अत्यन्तपरोक्षत्वात्कथं नाम प्रत्यक्षवत्सत्यम् अक्षरं प्रतिपद्येरन्निति दृष्टान्तमाह- | जो अपरा विद्याका विषय कर्मफलरूप सत्य है वह आपेक्षिक है; परन्तु यह परा विद्याका विषय परमार्थसत्स्वरूप होनेके कारण [निरपेक्ष सत्य है]। वह यह विद्याविषयक सत्य ही यथार्थ सत्य है; इससे इतर तो अविद्याका विषय होनेके कारण मिथ्या है। उस सत्य अक्षरको अत्यन्त परोक्ष होनेके कारण किस प्रकार प्रत्यक्षवत् जानें? इसके लिये श्रुतिने यह दृष्टान्त दिया है— |
| यथा सुदीप्तात्सुष्ठु दीप्ताद् इद्धात्पावकादग्नेर्विस्फुलिङ्गा अग्न्यवयवाः सहस्रशोऽनेकंशः प्रभवन्ते निर्गच्छन्ति सरूपा अग्निसलक्षणा एव तथोक्तलक्षणात् अक्षराद्विविधा नानादेहोपाधिभेद्मनुविधीयमानत्वाद्विविधा हे सोम्य भावा जीवा आकाशादिव घटादिपरिच्छिन्नाः सुषिग्भेदा घटाद्युपाधिप्रभेदमनुभवन्ति, एवं नानानामरूपकृतदेहोपाधि- | जिस प्रकार सुदीप्त—अच्छी तरह दीप्त अर्थात् प्रज्वलित हुए अग्निसे उसीके-से रूपवाले सहस्रों—अनेकों विस्फुलिङ्ग—अग्निके अवयव निकलते हैं उसी प्रकार हे सोम्य ! उक्त लक्षणवाले अक्षर ब्रह्मसे विविध—अनेक देहरूप उपाधिभेदके अनुसार विहित होनेके कारण अनेक प्रकारके भाव—जीव उस नाना नाम-रूपकृत देहोपाधिके जन्मके साथ उसी प्रकार उत्पन्न हो जाते हैं जैसे घटादि उपाधिभेदके अनुसार आकाशसे उन घटादिसे परिच्छिन्न बहुतसे छिद्र (घटाकाशादि)। |
| ४६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| प्रभवमनुप्रजायन्ते तत्र चैव तस्मिन्नेवाक्षरेऽपियन्ति देहोपाधिविलयमनुली यन्ते घटादिविलयमन्विव सुषिरभेदाः । | तथा जिस प्रकार घटादिके नष्ट होनेपर वे [ घटाकाशादि ] छिद्र लीन हो जाते हैं उसी प्रकार देहरूप उपाधिके लीन होनेपर वे सब उस अक्षरमें ही लीन हो जाते हैं। |
| यथाकाशस्य सुषिरभेदोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वं घटाद्युपाधिकृतमेव तद्वदक्षरस्यापि नामरूपकृतदेहोपाधिनिमित्तमेव जीवोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वम् ॥१॥ | जिस प्रकार छिद्रभेदोंकी उत्पत्ति और प्रलयमें आकाशका निमित्तत्व घटादि उपाधिके ही कारण है उसी प्रकार जीवोंकी उत्पत्ति और प्रलयमें नामरूपकृत देहोपाधिके कारण ही अक्षरब्रह्मका निमित्तत्व है ॥ १ ॥ |
| नामरूपबीजभूतादव्याकृताख्यात्स्वविकारापेक्षया परादक्षरात्परं यत्सर्वोपाधिभेदवर्जितम् अक्षरस्यैव स्वरूपमाकाशस्येव सर्वमूर्तिवर्जितं नेति नेतीत्यादिविशेषणं विवक्षन्नाह— | अपने विकारोंकी अपेक्षा महान् तथा नामरूपके बीजभूत अव्याकृतसंज्ञक अक्षरसे भी उत्कृष्ट जो अक्षर परमात्माका आकाशके समान सब प्रकारके आकारोंसे रहित 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंसे विशेषित एवं सम्पूर्ण औपाधिक भेदोंसे रहित स्वरूप है उसे बतलानेकी इच्छासे, श्रुति कहती है— |
ब्रह्मका पारमार्थिकस्वरूप
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
[ वह अक्षर ब्रह्म ] निश्चय ही दिव्य, अमूर्त्त, पुरुष, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध एवं कार्यवर्गकी अपेक्षा श्रेष्ठ अक्षर (अव्याकृत प्रकृति) से भी उत्कृष्ट है ॥ २ ॥
| दिव्यो द्योतनवान्स्वयंज्यो- | [ वह अक्षरब्रह्म ] स्वयंप्रकाश |
|---|---|
| तिष्त्वात् । दिवि वा स्वात्मनि | होनेके कारण दिव्य—प्रकाशित |
| भवोऽलौकिको वा । हि यस्माद्- | होनेवाला है, अथवा दिवि— |
| मूर्तः सर्वमूर्तिवर्जितः पुरुषः पूर्णः | अपने स्वरूपमें ही स्थित या |
| पुरिशयो वा, दिव्यो ह्यमूर्तः | अलौकिक है; क्योंकि वह अमूर्त्त— |
| पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरः सह | सब प्रकारके आकारसे रहित, |
| बाह्याभ्यन्तरेण वर्तत इति । | पुरुष—पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें |
| अजो न जायते कुतश्चित्स्वतोऽ- | शयन करनेवाला, सबाह्याभ्यन्तर— |
| न्यस्य जन्मनिमित्तस्य चाभावात्; | बाहर और भीतरके सहित सर्वत्र |
| यथा जलबुद्बुदादेर्वाय्वादि , | वर्तमान और अज—जो किसीसे |
| यथा नभःसुषिरभेदानां घटादि । | उत्पन्न न हो—ऐसा है; क्योंकि |
| सर्वभावविकाराणां जनिमूूलत्वात् | अपनेसे भिन्न कोई उसके जन्मका |
| तत्प्रतिषेधेन सर्वे प्रतिषिद्धा | निमित्त है ही नहीं; जिस प्रकार |
| भवन्ति । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजो- | कि जलसे उत्पन्न होनेवाले बुद्बुदों- |
| ऽतोजरोऽमृतोऽक्षरो ध्रुवोऽभय | का कारण वायु आदि है तथा |
| इत्यर्थः । | घटाकाशादि भेदोंका हेतु घट आदि |
| पदार्थ हैं [ उसी प्रकार उस | |
| अजन्माके जन्मका कोई भी कारण | |
| नहीं है ] । वस्तुके सारे विकारोंका | |
| मूल जन्म ही है; अतः उस (जन्म) | |
| का प्रतिषेध कर दिये जानेपर वे | |
| सभी प्रतिषिद्ध हो जाते हैं। क्योंकि | |
| वह परमात्मा सबाह्याभ्यन्तर अज | |
| है इसलिये वह अजर, अमर, अक्षर, | |
| ध्रुव और भयशून्य है—यह इसका | |
| तात्पर्य है। |
| ४८ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| यद्यपि देहाद्युपाधिभेददृष्टीनामविद्यावशाद्देहभेदेषु सप्राणः समनाः सेन्द्रियः सविषय इव प्रत्यवभासते तलमलादिमदिव आकाशं तथापि तु स्वतःपरमार्थदृष्टीनामप्राणोऽविद्यमानः क्रियाशक्तिभेदवांश्चलनात्मको वायुर्यस्मिन्ससावप्राणः। तथाऽमना अनेकज्ञानशक्तिभेदवत्सङ्कल्पाद्यात्मकं मनोऽप्यविद्यमानं यस्मिन्सोऽयम् अमनाः। अप्राणो ह्यमनाश्चेति प्राणादिवायुभेदाः कर्मेन्द्रियाणि तद्विषयाश्च तथा च बुद्धीमनसी बुद्धीन्द्रियाणि तद्विषयाश्च प्रतिषिद्धा वेदितव्याः। तथा श्रुत्यन्तरे—“ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४।३।७ः) इति। <br><br> यस्माच्चैवं प्रतिषिद्धोपाधिद्वयः तस्माच्छुभ्रः शुद्धः। अतोऽक्षरान्नामरूपबीजोपाधिलक्षितस्व- | जिस प्रकार [दृष्टिदोषसे] आकाश तल-मलादियुक्त भासता है उसी प्रकार देहादि उपाधिभेदमें दृष्टि रखनेवालोंको यद्यपि विभिन्न देहोंमें [वह अक्षर ब्रह्म] प्राण, मन, इन्द्रिय एवं विषयसे युक्त-सा भासता है तो भी परमार्थस्वरूपदर्शियोंको तो वह अप्राण—जिसमें क्रियाशक्तिभेदवाला चलनात्मक वायु न रहता हो तथा अमना—जिसमें ज्ञानशक्तिके अनेकों भेदवाला सङ्कल्पादिरूप मन भी न हो, [इस प्रकार प्राण और मनसे रहित ही भासता है।] ‘अप्राणः’ और ‘अमनाः’ इन दोनों विशेषणोंसे प्राणादि वायुभेद, कर्मेन्द्रियाँ और उनके विषय तथा बुद्धि, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ और उनके विषय प्रतिषिद्ध हुए समझने चाहिये; जैसा कि एक दूसरी श्रुति उसे ‘मानो ध्यान करता हुआ-सा, मानों चेष्टा करता हुआ-सा’—ऐसा बतलाती है। <br><br> इस प्रकार क्योंकि वह [प्राण और मन इन] दोनों उपाधियोंसे रहित है इसलिये वह शुभ्र—शुद्ध है। अतः नाम-रूपकी बीजभूत उपाधिसे जिसका स्वरूप लक्षित |
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४१ |
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| रूपात्सर्वकार्यकारणबीजत्वेनोप- | होता है उस अक्षरसे—सम्पूर्ण |
| लक्ष्यमाणत्वात्परं तदुपाधिलक्षण- | कार्य-कारणके बीजरूपसे उपलक्षित |
| मव्याकृताख्यमक्षरं सर्वविकारेभ्यः | होनेके कारण उन उपाधियोंवाला |
| तस्मात्परतोऽक्षरात्परो निरु- | अव्याकृतसंज्ञक वह अक्षर अपने |
| पाधिकः पुरुष इत्यर्थः । | सम्पूर्ण विकारसे श्रेष्ठ है; उस सर्वोत्कृष्ट .<br>अक्षरसे भी वह निरुपाधिक पुरुष<br>उत्कृष्ट है—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| यस्मिंस्तदाकाशाख्यमक्षरं | किन्तु जिसमें सम्पूर्ण व्यवहार- |
| संव्यवहारविषयमोतं प्रोतं च | का विषयभूत वह आकाशसंज्ञक |
| कथं पुनरप्राणादिमत्त्वं तस्येत्यु- | अक्षरतत्त्व ओतप्रोत है वह |
| च्यते । यदि हि प्राणादयः प्रागु- | प्राणादिसे रहित कैसे हो सकता |
| त्पत्तेः पुरुष इव स्वेनात्मना | है ? ऐसी शङ्का होनेपर कहते<br>हैं—यदि प्राणादि अपनी उत्पत्तिसे |
| सन्ति तदा पुरुषस्य प्राणादिना | पूर्व भी पुरुषके समान स्वरूपसे |
| विद्यमानेन प्राणादिमत्त्वं भवेन्न | विद्यमान रहते तो उन विद्यमान |
| तु ते प्राणादयः प्रागुत्पत्तेः | प्राणादिके कारण पुरुषका प्राणादि-<br>युक्त होना माना जा सकता था । |
| पुरुष इव स्वेनात्मनां सन्ति | किन्तु उस समय वे अपनी उत्पत्तिसे<br>पूर्व पुरुषके समान स्वरूपतः हैं नहीं; |
| तदा, अतोऽप्राणादिमान्परः | इसलिये, जिस प्रकार पुत्र उत्पन्न न |
| पुरुषः; यथानुत्पन्ने पुत्रेऽपुत्रो | होनेतक देवदत्त पुत्रहीन कहा जाता |
| देवदत्तः ॥ २ ॥ | है उसी प्रकार परम पुरुष भी<br>अप्राणादिमान् है ॥ २ ॥ |
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५० : मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
ब्रह्मका सर्वकारणत्व
| कथं ते न सन्ति प्राणादय इत्युच्यते यस्मात्— | वे प्राणादि उस अक्षरमें क्यों नहीं हैं? सो बतलाते हैं—क्योंकि— |
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एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥
इस (अक्षर पुरुष) से ही प्राण उत्पन्न होता है तथा इससे ही मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सारे संसारको धारण करनेवाली पृथिवी [उत्पन्न होती है] ॥ ३ ॥
| एतस्मादेव पुरुषान्नामरूपबीजोपाधिलक्षिताज्जायत उत्पद्यतेऽविद्याविषयविकारभूतो नामधेयोऽनृतात्मकः प्राणः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) “अनृतम्” इति श्रुत्यन्तरात् । न हि तेनाविद्याविषयेणानृतेन प्राणेन सप्राणत्वं परस्य स्यादपुत्रस्य स्वप्नदृष्टेनेव पुत्रेण सपुत्रत्वम् ।<br><br>एवं मनः सर्वाणि चेन्द्रियाणि विषयाश्चैतस्मादेव जायन्ते । | नाम-रूपकी बीजभूत [अविद्यारूप] उपाधिसे उपलक्षित* इस पुरुषसे ही अविद्याका विषय विकारभूत केवल नाममात्र तथा मिथ्या प्राण उत्पन्न होता है; जैसा कि “विकार वाणीका विलास और नाममात्र है” “वह मिथ्या है” ऐसी अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। उस अविद्याविषयक मिथ्या प्राणसे परब्रह्मका सप्राणत्व सिद्ध नहीं हो सकता, जैसे कि स्वप्नमें देखे हुए पुत्रसे पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् नहीं हो सकता।<br><br>इस प्रकार मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके विषय भी इसीसे उत्पन्न |
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* निरुपाधिक विशुद्ध ब्रह्मसे किसी भी विकारकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है। इसलिये जब उससे किसीकी उत्पत्तिका प्रतिपादन किया जायगा तो उसमें अविद्या या मायाके सम्बन्धका आरोप करके ही किया जायगा।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
| तस्मात्सिद्धमस्य निरुपचरितम् अप्राणादिमत्त्वमित्यर्थः। यथा च प्रागुत्पत्तेः परमार्थतोऽसन्तस्तथा प्रलीनाश्चेति द्रष्टव्याः । यथा करणानि मनश्चेन्द्रियाणि तथा शरीरविषयकारणानि भूतानि खमाकाशं वायुरन्तर्बाह्य आवहादिभेदः, ज्योतिरग्निः, आप उदकम् , पृथिवी धरित्री विश्वस्य सर्वस्य धारिणी एतानि च शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोत्तरोत्तरगुणानि पूर्वपूर्वगुणसहितान्येतस्मादेव जायन्ते ॥ ३ ॥ | होते हैं। अतः उसका मुख्यरूपसे अप्राणादिमान् होना सिद्ध हुआ। वे जिस प्रकार अपनी उत्पत्तिसे पूर्व वस्तुतः असत् ही थे उसी प्रकार लीन होनेपर भी असत् ही रहते हैं—ऐसा समझना चाहिये। जिस प्रकार करण—मन और इन्द्रियाँ [इससे उत्पन्न होते हैं] उसी प्रकार शरीर और इन्द्रियोंके विषयोंके कारणस्वरूप भूतवर्ग आकाश, आवहादि भेदोंवाला बाह्य वायु, अग्नि, जल और विश्व यानी सबको धारण करनेवाली पृथिवी—ये पाँच भूत, जो पूर्व-पूर्व गुणके सहित उत्तरोत्तर क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन गुणोंसे युक्त हैं, उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ |
| संक्षेपतः परविद्याविषयमक्षरं निर्विशेषं पुरुषं सत्यं दिव्यो ह्यमूर्त इत्यादिना मन्त्रेणोक्त्वा पुनस्तदेव सविशेषं विस्तरेण वक्तव्यमिति प्रवृत्तते; संक्षेपविस्तरोक्तो हि पदार्थः सुखाधिगम्यो | परविद्याके विषयभूत निर्विशेष सत्य पुरुषका ‘दिव्यो ह्यमूर्तः’ इत्यादि मन्त्रसे संक्षेपतः वर्णन कर अब उसी तत्त्वका सविशेषरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसीके लिये यह श्रुति प्रवृत्त होती है; क्योंकि सूत्र और उसके भाष्यके समान [पहले] संक्षेपमें और [फिर] विस्तारपूर्वक कहा हुआ |
| ५२ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| भवति सूत्रभाष्योक्तिवदिति । योऽपि प्रथमजात्प्राणाद्धिरण्यगर्भाज्जायतेऽण्डस्यान्तर्विराट् स तत्त्वान्तरितत्वेन लक्ष्यमाणोऽप्येतस्मादेव पुरुषाज्जायत एतन्मयश्चेत्येतदर्थमाह।तं च विशिनष्टि— | पदार्थ सुगमतासे समझमें आ जाता है । जो ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती विराट् प्रथम उत्पन्न हुए प्राण यानी हिरण्यगर्भसे उत्पन्न होता है वह अन्य तत्त्वरूपसे लक्षित कराया जानेपर भी इस पुरुषसे ही उत्पन्न होता है और पुरुषरूप ही है—यही बात यह मन्त्र बतलाता है और उसके विशेषणोंका उल्लेख करता है— |
सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्मका विश्वरूप
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥
अग्नि (द्युलोक) जिसका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, प्रसिद्ध वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सारा विश्व जिसका हृदय है और जिसके चरणोंसे पृथिवी प्रकट हुई है वह देव सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥
| अग्निर्द्यूलोकः “असौ वाव लोको गौतमाग्निः” (छा० उ० ५ । ४ । १) इति श्रुतेः, मूर्धा यस्योत्तमाङ्गं शिरः । चक्षुषी चन्द्रश्च सूर्य्यश्चेति चन्द्रसूर्यौ | अग्नि अर्थात् “हे गौतम ! यह [स्वर्ग] लोक ही अग्नि है” इस श्रुतिके अनुसार द्युलोक ही जिसका मूर्धा—उत्तमाङ्ग यानी शिर है, चन्द्र-सूर्य यानी चन्द्रमा और सूर्य ही नेत्र हैं। इस मन्त्रमें |
.खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
| यस्येति सर्वत्रानुषङ्गः कर्तव्यः, अस्येत्यस्य पदस्य वक्ष्यमाणस्य यस्येति विपरिणामं कृत्वा । दिशः श्रोत्रे यस्य । वाग्विवृता उद्घाटिताः प्रसिद्धा वेदा यस्य । वायुः प्राणो यस्य । हृदयमन्तःकरणं विश्वं समस्तं जगदस्य यस्येत्येतत् । सर्वं ह्यन्तःकरणविकारमेव जगन्मनस्येव सुषुप्ते प्रलयदर्शनात् । जागरितेऽपि तत एवाग्निविस्फुलिङ्गवत्प्रतिष्ठानात् । यस्य च पद्भ्यां जाता पृथिवी । एष देवो विष्णुरनन्तः प्रथमशरीरी त्रैलोक्यदेहोपाधिः सर्वेषां भूतानामन्तरात्मा ॥ ४ ॥ | आगे कहे हुए 'अस्य' पदको 'यस्य' में परिणत कर उसकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । दिशाएँ जिसके कर्ण हैं, विवृत—उद्घाटित यानी प्रसिद्ध वेद जिसकी वाणी हैं, वायु जिसका प्राण है, विश्व—समस्त जगत् जिसका हृदय—अन्तःकरण है; सम्पूर्ण जगत् अन्तःकरणका ही विकार है, क्योंकि सुषुप्तिमें मनहीमें उसका प्रलय होता देखा जाता है और जाग्रत् अवस्थामें अग्निसे स्फुलिङ्गके समान उसे उसीसे निकलकर स्थित होता देखते हैं। तथा जिसके चरणोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है यह त्रैलोक्यदेहोपाधिक प्रथम शरीरी अनन्त देव विष्णु ही समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥ |
| स हि सर्वभूतेषु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता सर्वकारणात्मा<br><br>पञ्चाग्निद्वारेण च याः संसरन्ति | सबका कारणरूप वह परमात्मा ही समस्त प्राणियोंमें द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है तथा पञ्चाग्नि-के द्वारा* जो प्रजाएँ जन्म-मृत्युरूप संसारको प्राप्त होती हैं वे भी |
* स्वर्ग, मेघ, पृथिवी, पुरुष और स्त्री इन पाँचोंका छान्दोग्योपनिषद्के पञ्चम प्रपाठकके तृतीय खण्डमें पञ्चाग्निरूपसे वर्णन किया है ।
५४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २
| प्रजास्ता अपि तस्मादेव पुरुषात्प्रजायन्त इत्युच्यते— | उस पुरुषसे ही उत्पन्न होती हैं— यह बात अगले मन्त्रसे बतलायी जाती है— |
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अक्षर पुरुषसे चराचरकी उत्पत्तिका क्रम
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः
सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां
बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥
उस पुरुषसे ही, सूर्य जिसका समिधा है वह अग्नि उत्पन्न हुआ है । [ उस द्युलोकरूप अग्निसे निष्पन्न हुए ] सोमसे मेघ और [ मेघसे ] पृथिवीतलमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुष स्त्रीमें [ ओषधियोंसे उत्पन्न हुआ ] वीर्य सींचता है; इस प्रकार पुरुषसे ही यह बहुत-सी प्रजा उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥
| तस्मात्परस्मात्पुरुषात्प्रजावस्थानविशेषरूपोऽग्निः । स विशेष्यते; समिधो यस्य सूर्यः समिध इव समिधः । सूर्येण हि द्युलोकः समिध्यते । ततो हि द्युलोकान्निष्पन्नात् सोमात्पर्जन्यो द्वितीयोऽग्निः सम्भवति । तस्माच्च पर्जन्यात् ओषधयः पृथिव्यां सम्भवन्ति । ओषधिभ्यः पुरुषाग्नौ हुताभ्य उपादानभूताभ्यः। पुमानग्नी रेतः | उस परम पुरुषसे प्रजाका अवस्थाविशेषरूप अग्नि उत्पन्न हुआ । उसकी विशेषता बतलाते हैं—सूर्य जिसका समिधा (ईंधन) है—[ अग्निहोत्रके ] समिधाके समान ही समिधा है, क्योंकि सूर्यसे ही द्युलोक समिद्ध ( प्रदीप्त ) होता है । उस द्युलोकरूप अग्निसे निष्पन्न हुए सोमसे [ पञ्चाग्नियोंमें ] दूसरा अग्नि मेघ उत्पन्न होता है । फिर उस मेघसे पृथिवीतलमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषरूप अग्निमें हवन की हुई वीर्यकी कारणरूप ओषधियोंसे [ वीर्य होता है ] । उस |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
| सिञ्चति योषितायां योषिति योषाग्नौ स्त्रियामिति । एवं क्रमेण बह्वीर्बह्वयः प्रजा ब्राह्मणाद्याः पुरुषात्परस्मात्सम्प्रसूताः समुत्पन्नाः ॥ ५ ॥ | वीर्यको पुरुषरूप अग्नि योषित्—योषिद्रूप अग्नि यानी स्त्रीमें सींचता है। इस क्रमसे यह ब्राह्मणादिरूप बहुत-सी प्रजा परम पुरुषसे ही उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥ |
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कर्म और उनके साधन भी पुरुषप्रसूत ही हैं
| किं च कर्मसाधनानि फलानि च तस्मादेवेत्याह; कथम् ? | यही नहीं, कर्मके साधन और फल भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं, ऐसा श्रुति कहती है—सो किस प्रकार ? |
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तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
उस पुरुषसे ही ऋचाएँ, साम, यजुः, दीक्षा, सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, संवत्सर, यजमान, लोक और जहाँतक चन्द्रमा पवित्र करता है तथा सूर्य तपता है वे लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ६ ॥
| तस्मात्पुरुषादृचो नियताक्षरपादावसाना गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टा मन्त्राः । साम पाञ्चभक्तिकं च सप्तभक्तिकं च स्तोभादिगीतविशिष्टम् । यजूंषि | उस पुरुषसे ही ऋचाएँ—जिनके पाद नियत अक्षरोंमें समाप्त होनेवाले हैं वे गायत्री आदि छन्दोंवाले मन्त्र, साम—पाञ्चभक्तिक अथवा सप्तभक्तिक स्तोभादि* गानविशिष्ट मन्त्र तथा यजुः— |
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* जिस मन्त्रमें हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन—ये पाँच अवयव रहते हैं उसे 'पाञ्चभक्तिक' और जिसमें उपद्रव तथा आदि—ये दो अवयव और होते हैं उसे 'सप्तभक्तिक' कहते हैं। 'हुं फट्' आदि अर्थशून्य वर्णोंका नाम 'स्तोभ' है ।
| ६६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| अनियताक्षरपादावसानानि वाक्यरूपाण्येवं त्रिविधा मन्त्राः। दीक्षा मौञ्ज्यादिलक्षणा कर्तृनियमविशेषाः । यज्ञाश्च सर्वेऽग्निहोत्रादयः । क्रतवः सयूपाः । दक्षिणाश्चैकगवाद्यपरिमितसर्वस्वान्ताः । संवत्सरश्च कालः कर्माङ्गः । यजमानश्च कर्ता । लोकास्तस्य कर्मफलभूतास्ते विशेष्यन्ते; सोमो यत्र येषु लोकेषु पवते पुनाति लोकान्यत्र येषु सूर्यस्तपति च ते च दक्षिणायनोत्तरायणमार्गद्वयगम्या विद्वदविद्वत्कर्तृफलभूताः ॥ ६ ॥ | जिनके पादोंका अन्त नियमित अक्षरोंमें नहीं होता ऐसे वाक्यरूप मन्त्र—इस प्रकार ये तीनों प्रकारके मन्त्र [ उत्पन्न हुए हैं ! तथा उसीसे] दीक्षा—मौञ्जी-बन्धन आदि यज्ञकर्ताके नियमविशेष, अग्निहोत्रादि सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु—यूपसहित यज्ञ, दक्षिणा—एक गौसे लेकर अपने अपरिमित सर्वस्वदानपर्यन्त, संवत्सर—कर्मका अङ्गभूत काल, यजमान—यज्ञकर्ता, तथा उसके कर्मके फलस्वरूप लोक उत्पन्न हुए हैं। उन लोकोंकी विशेषताएँ बतलाते हैं—जिन लोकोंमें चन्द्रमा लोकोंको पवित्र करता है और जिनमें सूर्य तपता रहता है वे विद्वान् और अविद्वान् कर्ताके कर्मफलभूत दक्षिणायन-उत्तरायण इन दो मार्गसे प्राप्त होनेवाले लोक उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥ |
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः
साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च
श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
उससे ही [कर्मके अङ्गभूत] बहुत-से देवता उत्पन्न हुए। तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीहि, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि [ये सब भी उसीसे उत्पन्न हुए हैं] ॥ ७ ॥
| तस्माच्च पुरुषात्कर्माङ्गभूता देवा बहुधा वस्वादिगणभेदेन सम्प्रसूताः सम्यक्प्रसूताः। साध्या देवविशेषाः। मनुष्याः कर्माधिकृताः। पशवो ग्राम्यारण्याः। वयांसि पक्षिणः। जीवनं च मनुष्यादीनां प्राणापानौ व्रीहियवौ हविरर्थौ। तपश्च कर्माङ्गं पुरुषसंस्कारलक्षणं स्वतन्त्रं च फलसाधनम्। श्रद्धा यत्पूर्वकः सर्वपुरुषार्थसाधनप्रयोगश्चित्तप्रसाद आस्तिक्यबुद्धिस्तथा सत्यम् अनृतवर्जनं यथाभूतार्थवचनं चापीडाकरम्। ब्रह्मचर्यं मैथुनासमाचारः। विधिश्चेतिकर्तव्यता ॥ ७ ॥ | उस पुरुषसे ही वसु आदि गणके भेदसे कर्मके अंगभूत बहुत-से देवता उत्पन्न हुए हैं। तथा साध्यगण—देवताओंकी जाति-विशेष, कर्मके अधिकारी मनुष्य, गाँव और जङ्गलमें रहनेवाले पशु, वयस्—पक्षी, मनुष्यके जीवनरूप प्राण-अपान (श्वासोच्छ्वास) हविके लिये व्रीहि और यव, पुरुषका संस्कार करनेवाला तथा स्वतन्त्रतासे फल देनेवाला कर्मका अंगभूत तप, श्रद्धा—जिसके कारण सम्पूर्ण पुरुषार्थसाधनोंका प्रयोग, चित्त-प्रसाद और आस्तिक्यबुद्धि होती है, तथा सत्य—मिथ्याका त्याग एवं यथार्थ और किसीको पीडा न देनेवाला वचन, ब्रह्मचर्य—मैथुन न करना और ऐसा करना चाहिये—इस प्रकारकी विधि [ये सब भी उस पुरुषसे ही उत्पन्न हुए हैं] ॥७॥ |
इन्द्रिय, विषय और इन्द्रियस्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं
| किं च— | तथा— |
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सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।