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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( २३ ) नायक- (आश्चर्य के साथ देखकर) अहो यह तपोवन कितना शान्त और सुन्दर है, जहां प्रसन्न मुनिगण सन्दिग्ध वेदवाक्यों पर विचार कर रहे हैं, जहां पढ़ने वाले ब्रह्मचारी गीली गीली समिधाएँ (हवनार्थ लकड़ियां) काट रहे हैं, और जहां ऋषि कन्याएं छोटे छोटे वृक्षों की क्यारियों को (जल से) भर रही हैं। यहां निश्चय से- वृक्ष भौरों की गुंजार से मानों मधुर स्वागत (के शब्द) का उच्चारण कर रहे हैं; फल भार से झुके हुए सिरों से मानों यह प्रणाम कर रहे हैं; और फूलों की वर्षा करते हुए मानों (हमें) अर्घ्य दे रहे हैं। क्या वृक्ष भी (यहां) अतिथि पूजा (करने की विधि) सिखाए गए हैं ? अतः यह तपोवन (हमारे) रहने योग्य है। मेरा विचार है कि यहां रहते हुए हमें अत्यन्त सुख प्राप्त होगा। विदूषक- (इधर उधर देखकर) मित्र, ये हरिण अपनी गरदनों को थोड़ा घुमाए हुए हैं, इन के निश्चल मुखों से अर्ध-चर्वित कुश के कौर गिर रहे हैं, ये ऊपर उठा कर कान लगाए हुए

  1. "अहो नु खलु" आश्चर्य द्योतक है।
  2. जिन के अर्थ अनिश्चित हैं, स्पष्ट नहीं, (सन्देहयुक्त)।
  3. क्यारी।
  4. शान्त सुन्दरता-तपोवन शान्त भी है और सुन्दर भी।
  5. नति = सिर झुका कर प्रणाम करना।
  6. सपर्या = पूजा। 7. तृप्ति, सुख, आनन्द। (परा = बहुत)
  7. मोड़ना, घुमाना। 9, थोड़ा चबाए हुए।

( २४ ) दिएणैककरणा सुहणिमीलिदलोअणा आअण्णंता विअ दत्तैककर्णाः सुखनिमीलितलोचना आकर्णयन्त इव हरिणा लक्खीअन्ति । हरिणाः लक्ष्यन्ते । नायकः — (कर्णं दत्त्वा) सखे ! सम्यगुपलक्षितम् । तथाहि- स्थानप्राप्त्या दधानं प्रकटितगमकां¹ मन्दतार व्यवस्थां निर्हादिन्या² विपञ्च्या³ मिलितमलिरुतेनेव तन्त्रीस्वनेन । एते दन्तान्तरालस्थिततृणकवलच्छेदशब्दं नियम्य ⁴व्याजिह्वाङ्गाःकुरङ्गाः स्फुटललितपदं गीतमाकर्णयन्ति ॥ १३ ॥ विदूषकः — भो वअस्स ! को उण एसो तवोवणे गाअदि ? भो वयस्य ! कः पुनरेष तपोवने गायति ? नायकः — यथैताः कोमलाङ्गुलितलाभिहन्यमाना⁵ नाति- स्फुटं क्वणन्ति तन्त्र्यः, काकलीप्रधानं च गीयते, तथा तर्कयामि (अङ्गुल्यग्रेणाग्रतो निर्दिशन्) अस्मिन्ना- यतने देवतामाराधयन्ती काचिद्दिव्या योषित्पुपवीण- यतीति । श्लोक नं १३, अन्वयः— एते कुरंगाः , दन्तान्तरालस्थिततृणकवलच्छेदशब्दं नियम्य व्याजिह्वांगाः , स्थान प्राप्त्या प्रकटितगमकां मन्दतारव्यवस्थां दधानं, निर्हादिन्याः विपञ्च्याः तन्त्रीस्वनेन अलिरुतेन इव मिलितम् , स्फुटललितपदं गीतमाकर्णयन्ति ।

( २९ ) हैं, आनन्द से आंखें बन्द किए हुए हैं— मानो ये कुछ सुनते से दिखाई देते हैं। क— (कान लगाकर) मित्र ठीक समझे। क्योंकि— ये हरिण, दांतों के बीच स्थित घास के कौर के चबाने की आवाज़ को रोक कर, अपने अंगों को टेढ़े किए हुए, स्पष्ट तथा सुन्दर पदों वाले गीत को सुन रहे हैं। यह गीत उचित उच्चारण स्थान के प्राप्त करने से गमकों को प्रकटित करने वाली, धीमे तथा उच्च स्वरों की व्यवस्था लिए हुए है। और (यह गीत) बजती हुई वीणा के तारों के गाने के साथ भंवरों की गुञ्जार के समान मिला हुआ है। यक— मित्र, तपोवन में यह कौन गा रहा है? नायक— क्योंकि कोमल अंगुलियों से ताड़ित (वीणा के) तार कोई बहुत स्पष्ट रूप से नहीं बज रहे और गीत में काकली (मधुर तथा सूक्ष्म स्वर) प्रधान है, इससे मेरा विचार है—कि (अंगुली के अग्रभाग से सामने इशारा करते हुए) इस मन्दिर में देवी की आराधना करती हुई कोई दिव्या स्त्री वीणा बजा रही है। अंगुलियों को हिलाने की विधियां। बजने वाली, बजती हुई। विपञ्ची = वीणा। टेढ़े, झुके हुए। ताड़ित

( २६ ) 'विदूषकः—भो वअस्स ! एहि 'अम्हे वि देवदाअदणं भो वयस्य ! एहि, आवामपि देवतायतनं प्रेक्षावहे नायकः— वयस्य ! साधूक्तं भवता । वन्द्याः खलु देवताः (उपसर्पन् सहसा स्थित्वा) वयस्य ! कदाचिद् द्रष्टुं अनर्होऽयं स्त्रीजनो भविष्यति । तदनेन तावत्तमाल- ¹गुल्मकेनान्तरितौ देवतादर्शनावसरं प्रतिपालयावः [तथा कुरुतः [ततः प्रविशति भूमावुपविष्टा वीणां वादयन्ती मलयवती चेटी च नायिका— (गायति) उत्फुल्लकमलकेसर परागगौरद्यु ते ! मम हि गौरि ! अभिवाञ्छितं प्रसिध्यतु² भगवति ! युष्मत्प्रसादेन ॥ नायकः— (कर्णं दत्वा) वयस्य ! अहो³ गीतम् ! वाद्यम् !

श्लोक नं १४, अन्वयः— उत्फुल्लकमलकेसरपरागगौरद्यु ते हि भगवति गौरि ! युष्मत्प्रसादेन मम अभिवाञ्छितं प्रसिध्यतु ।

( २७ ) क- मित्र, आओ, हम भी इस मन्दिर को देखें ।

  • मित्र तुमने ठीक कहा है । देवताओं की वन्दना अवश्य करनी चाहिए । (पास जाते जाते सहसा रुक कर) परन्तु मित्र, शायद यह कोई स्त्री हो जिसको देखना उचित न हो । अतः तमाल की झाड़ी के पीछे छिप कर हम देवी के दर्शन के उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हैं । (ऐसा ही करते हैं) [भूमि पर बैठी हुई, वीणा बजाती हुई मलयवती और उसकी चेटी का प्रवेश ।] का- (गाती है) :- खिले हुए कमल के केसर की धूलि के समान गौर कान्ति वाली भगवती गौरी ! आपकी कृपा से मेरा मनोरथ पूर्ण हो । क- (कान लगाकर) मित्र, वाह गाना ! वाह बजाना !! गुल्मक = वृक्षों का झुण्ड; लता समूह; झाड़ी । म + सिध् + लोट् - पूर्ण होवे । वाह ! प्रशंसावाचक शब्द ।

२८ ) व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना दशविधेनाप्यत्र लब्धामुना विस्पष्टो ¹द्रुतमध्यलम्बितपरिच्छिन्नस्त्रिधायं लयः । गोपुच्छाप्रमुखाःक्रमेण ²यतयस्तिस्रोऽपि सम्पादिता- स्तत्वौघानुगताश्च वाद्यविधयः³ सम्यक्त्रयो दर्शिताः ॥ १५ ॥ चेटी—(सप्रणयम्) भट्टिदारिए ! चिरं क्खु तुए वादिदं । ण क्खु भर्तृदारिके ! चिरं खलु त्वया वादितम् । न खलु दे परिस्समो अग्गहत्थाणं? ते परिश्रमोऽग्रह⁴स्तयोः ? नायिका—(साधिक्षेपम् ) हञ्जे चउरिए ! कुदो मे देवीए पुरदो वीणं हञ्जे चतुरिके ! कुतो मे देव्याः पुरतो वीणां वादयन्तीए अग्गहत्थाणं परिस्समो ! वादयन्त्या अग्रहस्तयोः परिश्रमः ! चेटी—भट्टिदारिए ! भर्तृदारिके ! णं भणामि किं एदाए णिक्करुणाए पुरदो वाइदेण ननु भणामि किमेतस्या निष्करुणायाः पुरतो वादितेन श्लोक नं० १५, अन्वयः— अत्र अमुना दशविधेनापि व्यञ्जनधातुना व्यक्तिः लब्धा ; द्रुतमध्यलम्बितपरिच्छिन्नः त्रिधा अयं लयः विस्पष्टः ; क्रमेण गोपुच्छाप्रमुखाः तिस्रः यतयः अपि सम्पादिताः ; तत्त्वौघानुगताश्च त्रयो वाद्यविधयः सम्यक् दर्शिताः ।

( २६ ) इस गीत में वीणा बजाने के दश प्रकार के तरीकों से स्पष्ट प्राप्त हुई है। द्रुत, मध्य तथा विलम्बित तीनों प्रकार के लय भी स्पष्ट प्रतीत हो रहे हैं। क्रम से गोपुच्छा आदि तीनों यतियां भी (यथा स्थान) रखी गई हैं। और तत्त्व, ओघ तथा अनुगत नामक तीनों वाद्य-विधियां भी भली प्रकार से (इसके वीणा वाद्य में) दिखाई गई हैं। चेटी— (प्रेम पूर्वक) भर्तृदारिके (राजकुमारी) ! बहुत देर से आप वीणा बजा रही हैं। क्या आप की अंगुलियां थक नहीं गईं ? नायिका— (झिड़कती हुई) अरी चतुरिका ! देवी के आगे वीणा बजाने से मेरी अंगुलियों को थकावट कहाँ ? चेटी— राजकुमारी ! मैं तो कहती हूं कि इस दयाहीन (देवी) के आगे वीणा बजाने से क्या लाभ ? जो इतने दिनों तक (अन्य)

  1. द्रुत = तेज़; मध्य = दरमियानी ; लम्बित = धीमी
  2. विराम। 3. वीणा बजाने के तरीके।
  3. अग्रहस्तं = अंगुलियां।

( ३० ) जा एत्तिअं कालं कण्णआअणदुक्करेहिं णिअमोवासणेहिं या एतावन्तं कालं कन्यकाजनदुष्करैर्नियमोपासनैः आराधअन्तीए अज्जवि ण दे पसादं दंसेदि । आराधयन्त्या अद्यापि न ते प्रसादं दर्शयति । ९ क.-भो वअस्स ! कण्णआ क्खु एसा, किं ण पेक्खम्ह ? भो वयस्य ! कन्यका खल्वेषा । किं न प्रेक्षावहे ? – को दोषः । निर्दोषदर्शना हि कन्यका भवन्ति । किन्तु कदाचिदस्मान् दृष्ट्वा बालभावसुलभलज्जासाध्वसान्न चिरमिह तिष्ठेत् । तदनेनैव लताजालान्तरेण पश्यावः ! विदूषकः — एवं करेम्ह । एवं कुर्वः । [उभौ पश्यतः] विदूषकः — (दृष्ट्वा साश्चर्यम्) भो वअस्स ! पेक्ख पेक्ख । अहह अच्चरिअं ! भो वयस्य ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व । अहह, आश्चर्यम् ! ण केवलं वीणा विण्णाणेणेव्व सुहं करेदि, इमिणा वीणा- न केवलं वीणा¹विज्ञानेनैव सुखं करोति, अनेन वीणा- विण्णाणाणुरूवेण रूवेण वि अच्छीणं सुहं उप्पादेदि । विज्ञानानुरूपेण रूपेणापि अक्ष्णोः सुखमुत्पादयति । का उण एसा ? किं दाव देई ? ओहो णाअकण्णआ ? का पुनरेषा ? किं तावत् देवी ? आहोस्विन् नागकन्यका ? आहो विज्जाहरदारिआ ? आहो सिद्धकुलसंभवेत्ति ? आहोस्वित् विद्याधरदारिका ? आहोस्वित् सिद्धकुलसम्भवेति ?

( ३१ ) कन्याओं के लिए अति कठिन नियम और उपवासों से आराधना करने पर भी अभी तक तुम्हारे ऊपर कोई कृपा नहीं दिखाती । विदूषक — मित्र, यह तो कन्या है । हम क्यों न देखें ? नायक — हाँ क्या दोष है ? कन्याओं को देखने में कोई दोष नहीं होता । परन्तु कदाचित् हमें देखकर बालिकाओं की स्वाभाविक लज्जा और भय से देर तक यहां न ठहरे । अतः इसी लताकुञ्ज की ओट से ही देखते हैं । विदूषक — अच्छा, ऐसा ही करते हैं । [दोनों देखते हैं] विदूषक — (देखकर, आश्चर्य के साथ) मित्र ! देखो, देखो । क्या ही हैरानी की बात है ? यह केवल वीणा बजाने की कुशलता से ही आनन्दित नहीं कर रही, (वरन्) वीणा विज्ञान¹ के अनुरूप अपने सौन्दर्य से भी आंखों को आनन्द देती है । तो फिर कौन है ? क्या यह देवी है ? या नागकन्या ? या विद्याधर कन्या ? या सिद्धकुल प्रसूता है ?

  1. विज्ञान = कुशलता, प्रवीणता ।

( ३२ ) नायकः—(सस्पृहमवलोकयन् )— वयस्य, केयमिति नावगच्छामि । एतत्पुनरहं जानामि— स्वर्गस्त्री यदि तत्कृतार्थमभवच्चक्षुः सहस्रं^१ हरे- र्नागी चेन्न रसातलं शशभृता^२ शून्यं मुखेऽस्याः स्थिते । जातिर्नः सकलान्यजातिजयिनी विद्याधरी चेदियं स्यात् सिद्धान्वयजा^३ यदि त्रिभुवने सिद्धाः प्रसिद्धास्ततः॥१६॥ विदूषकः — (नायकमवलोक्य सहर्षमात्मगतम्) दिट्ठिआ चिरस्स दाव कालस्स पडिदो दिष्ट्या चिरस्य तावत्कालस्य पतितः क्खु एसो गोअरे मम्महस्स । खल्वेष गोचरे मन्मथस्य । [आत्मानं निर्दिश्य भोजनमभिनीय] अहवा, णहि णहि मम एव्व एक्कस्स बह्मणस्स । अथवा, नहि नहि ममैवैकस्य ब्राह्मणस्य । चेटी— (सप्रणयं) भट्टिदारिए ! णं भणामि—किं एदाए भर्तृदारिके ! ननु भणामि-किमेतस्या णिक्करुणाए पुरदो वाइदेण ? निष्करुणायाः पुरतो वादितेन ? [इति वीणामाक्षिपति] श्लोक नं० १६, अन्वय :— यदि (एषा) स्वर्गस्त्री (अस्ति) तत् हरेः सहस्रं चक्षुः कृतार्थमभवत् । नागी चेत्, अस्याः मुखे स्थिते रसातलं शशभृता शून्यं न (अस्ति) । विद्याधरी चेत् , जातिर्नः सकलान्यजातिजयिनी । यदि सिद्धान्वयजा स्यात्, ततः सिद्धाः त्रिभुवने प्रसिद्धाः ॥

( ३३ ) नायक - (बड़े चाव के साथ देखते हुए) मित्र, मैं यह तो नहीं जानता यह कौन है । परन्तु इतना जानता हूँ कि- यदि यह स्वर्ग की देवकन्या है तो इन्द्र की हज़ार आँखें (इसे देखने से) सफल हो गईं ; यदि यह नागकन्या है तो इस के मुख के होते हुए पाताल चन्द्रमा से रहित नहीं ; यदि यह विद्याधरी है तो हमारी जाति ने अन्य सब जातियों को परास्त कर दिया (समझो), और यदि यह सिद्धों के वंश में उत्पन्न हुई है तो फिर सिद्ध लोग त्रिलोकि में प्रसिद्ध हो गए (समझो)॥ विदूषक - (नायक को देख कर, हर्ष के साथ, मन ही मन)-सौभाग्य से बहुत दिनों के पश्चात् यह कामदेव के वश में पड़ा है । (अपनी ओर इशारा करके, खाने का अभिनय करते हुए) अथवा , (कामदेव के) नहीं, केवल मुझ ब्राह्मण के (वश में पड़ा है) । चेटी- (प्रेम पूर्वक) राजकुमारी ! मैं तो कहती हूँ कि इस दयाहीन देवी के आगे वीणा बजाने से क्या लाभ ? [ यह कह, वीणा छीन लेती है ]

  1. हरे: = इन्द्र की । अर्थात् इन्द्र की हज़ार आंखों का होना व्यर्थ ही नहीं गया । इस (नायिका) की सुन्दरता की क़दर पाने के लिए दो की बजाए हज़ारों की आवश्यकता है ।
  2. शशभृत् = चंद्रमा । शश का अर्थ है ख़रगोश । चन्द्रमण्डल में जो दाग़ है उसे ख़रगोश की उपमा देते हैं । इसलिए चन्द्रमा को शशाङ्क अथवा शशभृत् कहते हैं । पाताल में चन्द्रमा नहीं होता, परन्तु इसका मुख उस कमी को पूरा कर रहा है । अर्थात् इस का मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है । 3. अन्वय = कुल, वंश ।

( ३४ ) नायिका—(सरोषम्) हज्जे ! मा भअवदिं गोरिं अधिक्खिव। हन्जे ! मा भगवतीं गौरीमधिक्रिप¹। णं अज्ज किदो मे भअवदीए पसाओ । नन्वद्य कृतो मे भगवत्या प्रसादः । चेटी— (सहर्षम्) भट्टिदारिए ! कहेहि दाव कीरिसो सो ? भर्तृदारिके ! कथय तावत्कीदृशः स ? नायिका—हज्जे ! जाणामि, अज्ज सिविणाए एदं एव्व हन्जे ! जानामि, अद्य स्वप्न एतामेव वीणं वादयन्ती भअवदीए गोरीए भणिदम्हि— वीणां वादयन्ती भगवत्या गौर्या भणितास्मि— “वच्छे मलअवदि ! परितुट्ठम्हि तुह एदिणा वीणा- “वत्से मलयवति ! परितुष्टास्मि तवैतेन वीणा- विएणाणादिसएण इमाएअ वालजणदुक्कराए असाहारणाए विज्ञानातिशयेन, अनयाच बालजनदुष्करयाऽसाधारण्या ममोवरि भत्तिए । ता विज्जाहरचक्कवट्टी अचिरेण उज्जेव ममोपरि भक्त्या । तद्विद्याधरचक्रवर्ती अचिरेणैव दे पाणिग्गहणं णिव्वत्तइस्सदी’ त्ति । ते पाणिग्रहणं निर्वर्त्तयिष्यतीति । चेटी—(सहर्षम् ) भट्टिदारिए ! जइ एव्वं, ता कीस सिविणओ इमं भणीअदि ? भर्तृदारिके ! यद्येवं, तत्कस्मात्स्वप्नोऽयं भण्यते ?

( ३५ ) नायिका — (क्रोध के साथ) सखी, भगवती गौरी को बुरा भला मत कह । निश्चय ही आज देवी ने मुझ पर कृपा की है । चेटी — (प्रसन्नता के साथ) — राजकुमारी, तो कहो वह क्या है ? नायिका — सखी, मैं यह जानती हूँ कि आज स्वप्न में जब मैं यही वीणा बजा रही थी तो भगवती गौरी ने मुझसे कहा—" वत्से मलयवती, मैं तेरी वीणा बजाने की कुशलता और मेरे ऊपर कन्याओं के लिए कठिन तेरी इस असाधारण भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ । अतः (कोई) विद्याधर चक्रवर्ती (राजा) शीघ्र ही तेरा पाणिग्रहण करेगा । चेटी — (प्रसन्नता के साथ) राजकुमारी ! यदि ऐसा है तो इसे स्वप्न क्यों कहती हो । निश्चय ही देवी ने तुम्हारे मन में

  1. निन्दा करना ।

( ३६ ) णं हिअअत्थिदो वरो देईए दिण्णो ननु हृदयस्थितो वरो^१ देव्या दत्तः । विदूषकः—(श्रुत्वा) भो वअस्स ! अवसरो क्खु एसो अम्हाणं भो वयस्य ! अवसरः खल्वेषोऽस्माकं देवीदंसणस्स । ताएहि उपसप्पह्म । देवीदर्शनस्य । तदेह्युपसर्पावः । नायकः — न तावत्प्रविशामि । विदूषकः — (अनिच्छन्तमपि नायकं बलादाकृष्य, उपसृत्य) सोत्थि भोदिए । भोदि, सच्चं एव्व चदुरिआ भणादि स्वस्ति^२ भवत्यै । भवति ! सत्यमेव चतुरिका भणति, वरो एव्व एसो देईए दिण्णो । वर एवैष देव्या दत्तः । नायिका—(^३ससाध्वसमुत्तिष्ठन्ती नायकमुदिश्यापवार्य) हज्जे ! को णु क्खु एसो ? हञ्जे ! को नु खल्वेषः ? चेटी —(नायकं निरूप्यापवार्य) इमाए अण्णण्णसरिसीए आकिदीए एसो सो भगवदीए अनयाऽनन्यसदृश्या^४ऽऽकृत्या 'एष स भगवत्या गोरीए पसादो त्ति तक्केमि । गौर्याः प्रसाद इति तर्कयामि । [नायिका सस्पृहं सलज्जञ्च नायकमवलोकयति]

( ३७ ) ठहरा हुआ वर(ही) प्रदान कर दिया है विदूषक— (यह सुनकर) मित्र, हमारे लिए देवी के दर्शन करने का यही (उचित) अवसर है । तो आओ, समीप चलें । नायक-- मैं तो नहीं जाऊँगा । विदूषक— (न चाहते हुए भी नायक को ज़बरदस्ती खींच कर, उनके पास जाकर) श्रीमती जी, आपका कल्याण हो । चतुरिका सच ही कहती है । देवी ने यह वर ही दिया है। नायिका— (घबराहट से उठती हुई, नायक के बारे में, अलग) सखी, यह कौन है ? चेटी— (नायक को देखकर, अलग) इस असाधारण आकृति से तो मेरा विचार है कि (यही) भगवती गौरी का वर है ! [नायिका रुचि और लज्जा के साथ नायक को देखती है]

  1. वरः= 'वरदान' अथवा 'पति, चेटी सम्भवतः 'वरदान' के अर्थ में प्रयोग करती है; परन्तु विदूषक इसे 'पति' अर्थ में लेकर कहता है ।
  2. 'स्वस्ति' के साथ चतुर्थी आती है ।
  3. साध्वस=डर; घबराहट,
  4. अनन्यसदृशी = जो किसी के साथ नहीं मिलती । असाधारण । अद्वितीय ।

( ३८ ) नायकः -तनुरियं तरलायतलोचने श्वसितकम्पितपीनघनस्तनि ! श्रममलं¹ तपसैव गता पुनः किमिति संभ्रमधारिणि ! खिद्यते ॥१७॥ नायिका — (अपवार्य) हञ्जे ! अदिसद्धसेण ण सक्कुणोमि एदस्स संमुहे ठादुं । हञ्जे ! अतिसाध्वसेन न शक्नोम्येतस्य सम्मुखे स्थातुम् । (नायकं तिर्यक् सलज्जञ्च पश्यन्ति किञ्चित्परावृत्तमुखी तिष्ठति) चेटी — भद्दिदारिए ! किं एदम् ? भर्तृदारिके ! किमेतत् ? नायिका—हञ्जे ण सक्कुणोमि एदस्स आसण्णे चिट्ठिदुं । हञ्जे न शक्नोम्येतस्यासन्ने स्थातुम् । ता एहि अण्णदो गच्छह्म । तदेहान्यतो गच्छावः । (इत्युत्थातुमच्छिति) विदूषकः — भो ! भाइदि खु एसा । भो ! बिभेति खल्वेषा । मम पठिअविज्जं चित्र मुहुत्तअं धारेमि । मम पठितविद्यामिव मुहूर्त्तं धारयामि । नायकः — को दोषः ? श्लोक नं० १७, अन्वयः— तरलायतलोचने ! श्वसितकम्पितपीनघनस्तनि । इयं (ते) तनुः तपसा एव अलं श्रमम् गता । संभ्रम धारिणि ! किमिति पुनः खिद्यते ?

( ३६ ) नायक— हे बड़ी बड़ी चञ्चल आंखों वाली ! सांस लेने से कांपते हुए स्थूल तथा घने स्तनों वाली ! तुम्हारा यह शरीर तपस्या से ही काफ़ी थक चुका है ; तो हे घबराई हुई ! फिर इसे और कष्ट क्यों देती हो ? नायिका— (अलग) सखी ! अत्यन्त घबराहट के कारण मैं इस के सामने नहीं ठहर सकती । [नायक को तिरछी आंखों और लज्जा से देखती हुई मुख को कुछ फेर कर खड़ी रहती है] चेटी— राजकुमारी ! यह क्या ? नायिका— सखी, मैं इस के समीप नहीं ठहर सकती । तो, आओ कहीं और चलें । (यह कह कर उठना चाहती है) विदूषक— अरे, यह तो डरती है । मैं अपनी पढ़ी हुई विद्या के समान इसे पल भर रोक सकता हूँ । नायक - क्या हर्ज है ?

  1. अलम् = बहुत; अत्यन्त; काफ़ी; पर्याप्त ।

( ४० ) विदूषकः — भोदि ! किं एत्थ तुम्हाणं तवोवणे ईरिसो आआरो भवति ! किमत्र युष्माकं तपोवने ईदृश आचारो¹ जेण अदिही आअदो वाआ्मत्तेण वि ण संभावीअदि । येनातिथिरागतो वाङ्मात्रेणापि न सम्भाव्यते ? चेटी — (नायिकां दृष्ट्वा, आत्मगतम्) अणुरज्जदि व्विअ एत्थ एदाए दिट्ठी । भोदु एवं दाव भणिस्सं । अनुरज्यत इवात्रैतस्या दृष्टिः । भवत्वेवं तावद्भणिष्यामि । (प्रकाशम् ) भद्दिदारिए ! जुत्तं भणादि बह्मणो । उइदो भर्तृदारिके ! युक्तं भणति ब्राह्मणः । उचितः क्खु दे अदिहिजणसक्कारो । ता किं ईरिसे महाणुभावे खलु ते ऽतिथिजनसत्कारः । तत्किमीदृशे महानुभावे पडिवत्तिमूढा चिट्ठसि ? ²प्रतिपत्तिमूढा तिष्ठसि ? अहवो चिट्ठ तुमं । अहं एव्व जधाणुरूबं करिस्सं । अथवा तिष्ठ त्वम् । अहमेव यथानुरूपं करिष्यामि । ( नायकमुद्दिश्य ) साअदं अज्जअस्स । ᵌस्वागतमार्यस्य ! आसणपडिग्गहेण अलंकरेदु अज्जो इमं पदेसं । आसनपरिग्रहेणालंकरोत्वार्य इमं प्रदेशम् । विदूषकः — भो वअस्स ! सोहणं एसा भणादि । भो वयस्य ! शोभनमेषा भणति ।

( ४१ ) विदूषक — श्रीमती जी, क्या यहां आप के तपोवन में यही रीति है कि आए हुए अतिथि का शब्दों से भी सत्कार नहीं किया जाता ? चेटी — (नायक को देखकर, अपने आप) इस की दृष्टि तो मानों इसी पर अनुरक्त है। अच्छा तो फिर ऐसे कहती हूं। (प्रकट) राजकुमारी, यह ब्राह्मण ठीक ही कहता है। अतिथि का सत्कार करना आपके लिए उचित ही है। तो फिर ऐसे महानु- भाव के विषय में आप किंकर्तव्य विमूढ़ सी क्यों खड़ी है ? अथवा तू ठहर। मैं ही यथोचित करती हूं। (नायक से) आर्य, आप का स्वागत है। आसन ग्रहण करके इस स्थान को अलंकृत कीजिये। विदूषक — मित्र ! यह ठीक कहती है।

  1. आचारः = रीति, रिवाज।
  2. प्रतिपत्तिम्मूढा = जो यह नहीं जानती कि क्या करना चाहिए। अथवा, उचित व्यवहार क्या है ?
  3. ‘स्वागतं’ के साथ प्रायः चतुर्थी आती है।

( ४२ ) ' उवविसिअ मुहुत्तअं वीसमम्ह । उपविश्य, मुहूर्तं विश्राम्यावः । नायकः — युक्तमाह भवान् । (उभावुपविशतः) नायिका— (चेटीमुद्दिश्य) अइ परिहाससीले ! मा एव्वं करेहि । जइ कदावि कोवि अयि परिहासशीले ! मैवं कुरु । यदि कदापि कोऽपि तावसो पेक्खदि तदो मं ¹अविणीदेत्ति सभाविस्सदि तापसः प्रेक्षते ततो मामविनीतेति सम्भावयिष्यति [ततः प्रविशति तापसः] तापसः — आज्ञापितोऽस्मि कुलपतिना² कौशिकेन यथा— ‘वत्स शाण्डिल्य ! पितुराज्ञया सिद्धराजमित्रावसुर्भ- विष्यद्विद्याधरचक्रवर्तिनं कुमारजीमूतवाहनमिहैव मलय- पर्वते क्वापि वर्तमानं भगिन्या मलयवत्या वरहेतोर्द्रष्टु- मद्य गतः । तञ्च प्रतीक्षमाणाया मलयवत्याः कदा- चिन्मध्यन्दिनसवनवेलातिक्रामेत् । तदेनामाहूयागच्छ’ इति । तद्यावद्गौरीगृहमेव गच्छामि । (परिक्रम्य भूमिं निरूप्य सविस्मयम् ) अये ! कस्य पुनरियं पांशुले भूप्रदेशे प्रकाशचक्रमू³चिन्हा पदपंक्तिः ? (अग्रतो जीमूतवाहनं निरूप्य ) नूनमस्यैवेयं महानुभावस्य। तथाहि—