नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
प्राप्त कर लेता है वह सभी पातकों से मुक्त होकर अपने कुल का भी उद्धार करता है॥३१॥ न तथा विविधैर्दानैर्न तपोभिर्न चाध्वरैः । यथैव गुरुतां यान्ति नरा नारायणसंश्रयात् ॥३२॥ मनुष्यगण विविध दानादि के पुण्यकर्मों से तथा अपने कपटमय आचरण तथा त्रैविद्य वेदादि अनुष्ठानों वाले यज्ञों के यजन से इतना उत्कर्ष या महत्व प्राप्त नहीं कर पाते हैं जितना श्रीनारायण की शरणागति से प्राप्त कर लेते हैं॥३२॥ यथैव भगवान् विष्णुर्देवानां परमो गुरुः । तथैव हि मनुष्याणां वैष्णवः परमो गुरुः ॥३३॥ जैसे सभी देवगणों का परमगुरु तथा अत्यन्त वन्दनीय देव श्री श्रीनारायण होता है उसी प्रकार सभी मनुष्यों का वन्दनीय तथा सर्वश्रेष्ठ गुरु वैष्णव (भक्त) होता है॥३३॥ न परीक्ष्य वयो वन्द्या नारायणपरायणाः । अपि स्युर्हीनजन्मानो मान्या निघ्नेन चेतसा ॥३४॥ जो श्रीनारायण के शरणागत वैष्णवजन हैं उनकी आयु तथा अवस्थादि की परीक्षा करने के पश्चात् उनकी वन्दना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो अपने अधीन विद्यमान वैष्णव तेज से सम्पन्न हैं वे हीनवर्ण में जन्म लेकर भी मान्य तथा वन्दनीय स्थितिवाले हो जाते हैं॥३४॥ समर्पितात्मनः श्रीशे सत्वयुक्तेन चेतसा । नापायोऽभिभवेत् सन्तं सद्यः प्रशमयेदपि ॥३५॥ ऐसे वैष्णवजन जितने श्रीविष्णु अच्युत के प्रति अपने सात्विक गुणवाले चित्त से आत्मा का भार न्यस्त कर दिया हो तो न्यासयोग से समृद्ध इनको उत्तमाधिकारता के प्राप्त रहने से कोई अन्याय या दोष की प्रवृत्ति या प्राप्ति नहीं होती तथा दैववश यदि किसी अपाय की प्राप्ति हो भी जाए तो वह शीघ्र दूर हो जाती हैं॥३५॥ प्रपन्नमपि यं कञ्चित् प्रसक्तं पापकर्मणि । चिरात् संयोज्य विनयैः परिगृह्णाति माधवः ॥३६॥ और ऐसे वैष्णवजन अपने किसी दुर्भाग्य के कारण पापकर्मों में लीन भी हो जाए तो उनको अपने निषिद्ध कर्मों के फलस्वरूप शरीर दण्ड देकर (या उन्हें लंगड़ा, कूबड़ा शरीरवाला व्याधियुक्त बनाकर) प्रकाशित करवाते हुए श्रीनारायण ही उसे उचित बुद्धि प्रदान कर अपने किकिरभाव में स्थित रखते हैं॥३६॥
१३२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पूर्वेषामुत्तरेषाञ्च न्यासो नाशाय पाप्मनाम् । सर्वेषामपचाराणामयं हि क्षमापणं परम् ॥३७॥ न्यासयोग ग्रहण करने के पूर्व अनादिकाल से अर्जित पातकों का तथा न्यासग्रहण के पश्चात् किये गये प्रमादजन्य पातकों को तथा सभी प्रकार के उपचारों को हटाने के लिये यह न्यासयोग ही एक मात्र निवारक उपाय माना गया है॥३७॥ नारी वा पुरुषो वापि प्रपद्य शरणं हरिम् । तत्र चैकान्त्यवृत्त्यैव गच्छेतां भुवि भाव्यताम् ॥३८॥ सकृदेव कृतो न्यासो वृत्तिर्भवति शाश्वती । तथापि तन्मूलतया तस्यास्तादात्म्यमीरितम् ॥३९॥ कोई स्त्री अथवा पुरुष श्रीहरि की शरणागति लेते हुए तथा एकान्तिक वृत्ति रखकर अनन्यभाव से पृथ्वी पर अपना जीवन चलाते रहे। अतएव एक बार भी किया गया यह 'न्यास' जीवन पर्यन्त शाश्वत वृत्ति से चलाया जाएगा क्योंकि न्यास मूलकता होने से वृत्ति का न्यासरूप में तादात्म्य हो जाता है॥३८-३९॥ ईशे न्यस्तभराणां हि कर्तव्यं नास्ति किञ्चन । यद्यस्ति शुद्धमैच्छन्तत् सामान्यमिति यौक्तिकाः ॥४०॥ परमेश्वर के प्रति अपने को न्यासरूप में समर्पित करने के बाद कृतकृत्य हो जाने के कारण आगे कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। यदि कोई है भी तो वह शुद्ध होकर भी कर्ता की इच्छा पर निर्भर है। वह नित्यभूत सन्ध्यादि कर्म होने से सामान्यरूपवाला है जिसके न करने से प्रत्यवाय होता है, ऐसा युक्तिवादी जन का मत है॥४०॥ दृप्ताः प्रपद्य लक्ष्मीशं चपला मुक्तमानिनः । प्राप्यान्तमपि देहस्य च्यवन्त्युज्झितवृत्तयः ॥४१॥ श्रीनारायण को प्राप्त करने के अहंकार से अभिभूत तथा इन्द्रियार्थों पर चंचलभाव से आसक्त रहनेवाले तथा अपने को मुक्त रूप में समझने वाले तथा ईश की एकान्तीवृत्ति का परित्याग करते हुए शरीर का अन्त प्राप्त करने पर भी वे अन्त में मुक्ति प्राप्ति से वंचित होते हैं॥४१॥ अथैतत् परमर्षीणां ज्ञेयं तत्वविदां मतम् । दास्यं हि शुद्धं मिश्रं वा व्यामिश्रं चोदितं पृथक् ॥४२॥ तथा परमऋषि नारदादि का यह मन्तव्य ध्यान में रखना आवश्यक है कि भगवान् श्रीहरि का दास्य के शुद्ध या व्यामिश्र रूप एक दूसरे से सदा पृथक् हैं जिनमें एकायन व्यक्तियों को शुद्ध तथा त्रैविद्यजन को व्यामिश्र दास्य मोक्षप्राप्ति पर्यन्त यथासम्बन्ध बराबर आचरण में रखना चाहिए॥४२॥
हिन्दीटीकासहित १३३ सामान्या च विभक्ता च वृत्तिः सर्वस्य देहिनः । दुस्त्यजां नियतामेवमिमां प्रत्यवधार्यताम् ॥४३॥ सभी शरीरधारी मानव की वृत्ति एक तो साधारण तथा दूसरी विभक्त रूप में मानी गयी है। जिनमें प्रथम तो देहसाधारणी तथा दूसरी वर्णाश्रमादि प्रतिनियता रूपवाली नियत रहती है जो दुरुपजा या कष्ट से हटनेवाली होती है यह बात भी ध्यान देकर समझना चाहिए॥४३॥ यथा यथा निषेवेत सतो वृद्धान्निरन्तरम् । तथा तथाऽस्य वै वृत्तिर्निरपाया हि वर्द्धते ॥४४॥ अतिशय एकान्तीजन भी सत्सेवा के भाव से जैसे जैसे अपने से वृद्ध तथा अनुभवी गुरुजन का सेवन करते हैं वैसे वैसे उनकी वृत्ति उपायों से रहित होकर अभिमत रूप में वृद्धि प्राप्त करती है॥४४॥ वीर्यं स्वकर्मधीर्दृष्टिस्तेजोऽङ्कः शक्तिरर्चनम् । बलं वैराग्यमैश्वर्यं सत्सङ्गः षड्गुणा हि सा ॥४५॥ इस सत्सेवा से वृत्ति में षड्गुणों का अभिवर्द्धन होता है-जैसे स्वकर्म के विहित आचार से वीर्य, ज्ञान की प्राप्ति से दृष्टि रूप वृद्धि, अंक या चिन्ह के धारण करने से तेज, अर्चना भक्ति, उससे प्राप्त शक्ति से वैराग्य, नित्य पदार्थों से हटना, रूप बल, इस प्रकार सत्सेवा छः गुणों वाली हो जाती है॥४५॥ सेव्योऽयं कर्महस्ताङ्घ्रिर्ज्ञानदृष्टिर्भजाननः । सत्सेवनशिरा धर्मो वैराग्यौजाः सुलक्षणः ॥४६॥ वृत्ति के आश्रित लक्षणादि से अनुगत षड्गुणरूप इस धर्म के कर्म से विहित आचार हाथ तथा पैर रूप वाले हैं, ज्ञान ही इसकी दृष्टिभूत नेत्र है, भक्ति ही इसका मुख स्थानीय है, सत्सेवा ही इसका मस्तक या शिरस्स्थानीय रूप है तथा नित्य वर्णन रूप वैराग्य ही इसका 'ओज' (बल) होता है॥४६॥ वन्दतोऽपि गुणान् विष्णोः कुर्वन्तोऽपि च तत्क्रियाः । मन्दपुण्या न विन्दन्ति पारमैकान्त्यसम्पदम् ॥४७॥ श्रीहरि का गुणगान करनेवाले होकर तथा उनके अनुगत अनुष्ठानादि सत्क्रियाओं का आचरण करनेवाले होने पर भी जिनके पुण्य अल्प होते हैं वे परम एकान्तभाव की प्राप्ति करने में अक्षम रहते हैं(अर्थात् पुण्यशाली वैष्णवजन ही परमैकान्त्यभाव की स्थिति में रह पाते हैं)॥४७॥ सम्भूय च कुले श्लाघ्ये सर्वान् वेदानधीत्य च । विधाय च महत्कर्म विष्णोर्दास्यं हि दुर्लभम् ॥४८॥
४. चतुर्थ परिच्छेद: ज्ञान-योग, वैकुण्ठ-प्राप्ति एवं उपसंहार
१३४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अतिविशिष्ट तथा प्रशंसनीय कुल में जन्म प्राप्त करने पर तथा सभी वेदों का विधिवत् साङ्ग अध्ययन कर लेने पर तथा दुष्कर यज्ञादि धर्मानुष्ठानों के पूर्णतः विधिवत् सम्पन्न कर लेने पर भी श्रीविष्णु की दास्यभाव की प्राप्ति हो जाना दुर्लभ है॥४८॥ सतां निषेवणं वापि जननं वा सतां कुले । विविक्तमथवा ज्ञानं विष्णोर्दास्यावलम्बनम् ॥४९॥ परन्तु सज्जन एवं सन्तजन का सेवन अथवा एकान्ती परमवैष्णवजन के कुल में जन्म प्राप्त कर असंशय रूप केवल श्रीविष्णु की दृष्टि या ज्ञान की प्राप्ति हो जाना श्रीहरि के दास्यभाव की प्राप्ति के साधनभूत आधार होते हैं॥४९॥ अस्वतन्त्राः सदा नार्यः स्थिता गुर्वादिशासने । वर्जयेयुर्विरुद्धानि यत्किञ्चिद्धर्मसंश्रयाः ॥५०॥ तूष्णीं-प्रायाः क्रियाः स्त्रीणां मन्त्रश्रावणबोधने । वाचनञ्च परेऽन्येऽपि धारणञ्चार्चने पुनः ॥५१॥ जो स्त्रियां है उनके अलग से या स्वतंत्र रूप में धर्माचरण के न होने के कारण वे अपने मन्त्रदाता आचार्य तथा पति पिता आदि के अनुशासन में रहकर विरुद्ध वर्जनादि के साथ अपने लिये उचित तथा विहित धर्म के अनुष्ठान को करते हुए वृत्ति की पूर्णता सम्पादित कर सकते हैं। इनके तापादि संस्कार अमन्त्रक तथा होमादि क्रिया के बिना किये जाते हैं,केवल इन्हें प्रदत्त मन्त्र को सुनाने तथा होमादि क्रिया के बिना किये जाते हैं। अन्य ऋषियों का मत है कि स्त्रियों को धर्मग्रन्थों का वाचन मन्त्र का धारण तथा इष्टदेव का अर्चन भी करना चाहिए जिसकी विधियां बतलाई जावें॥५०-५१॥ भर्तुरासनदानाद्यै स्नापनालङ्क्रियादिभिः । यथा चाभ्यवहाराद्यैः परिचर्या हरेस्तथा ॥५२॥ जिस प्रकार एक स्त्री अपने स्वामी की आसनदान, आदि तथा स्नान करवाने चन्दनादि चर्चा आदि से अलंक्रिया करती हुई सुश्रूषा करती है तथा भोजनादि के द्वारा उनकी सेवा करती है उसी प्रकार वह विश्वेश श्रीहरि की भी इसी प्रकार परिचर्या करे॥५२॥ यद्वा परमसंस्काराः प्राप्या गुणसमानतः । सर्वत्र हरिरेवाच्यो नाग्निकर्मेति केचन ॥५३॥ अथवा तापादि पूर्वोक्त परमसंस्कारों को गुण की समानता के गुरु लाघव का विचार करते हुए सम्पन्न करवाने चाहिए। इनमें सभी में सम्पन्न होने के अवसर पर श्रीहरि
हिन्दीटीकासहित १३५ की (चर्या तथा) अर्चना ही प्रथम मुख्य कर्म है तथा तापादि संस्कार और होमादि कर्म की विधिकर्म के अनुगत बाद में स्थिति रहती है ऐसा अन्य विद्वानों का यहां मत है।।५३।। परमैकान्तिनां नित्या या वृत्तिर्विहिता गुरौ । तदभावे तु तत्पुत्रे गुर्वर्चा दैवतेषु सा ॥५४॥ परमैकान्ती वैष्णव की अपने गुरु के विषय में रखी जानेवाली जो विहित वृत्ति है उनके अभाव में उसके पुत्र के द्वारा गुरु तथा देवादि अर्चा सम्पन्न करवाने में रहती ही है।।५४।। सर्वेषां याग एवायं सामान्यो मुनिभिः स्मृतः । अभ्येत्य प्रणिपत्याग्रे देवायात्मनिवेदनम् ॥५५॥ पुरातन मुनिजन ने प्रायः यह सभी के लिये सामान्यरूप में यज्ञ की तरह विधिरूप में दिखलाया है कि देवता के समक्ष उपस्थित होकर उसे प्रणाम कर आत्मनिवेदन करे। यह कार्य यजन या यज्ञ के आचरण के तुल्य है।।५५।। सर्वेषामुपचाराणामर्घ्यं परममुच्यते । कृतेनैकेन तेनैव सर्वमेव कृतं भवेत् ॥५६॥ और सभी पाद्यादि उपचारों में अर्घ्य अर्पण करना श्रेष्ठ माना गया है अतः इस एक के ही प्रस्तुत या अर्पित कर देने से सभी उपचार अर्पित माने गये हैं।।५६।। अर्च्योऽर्चायां हरिर्नित्यं तदभावे तु कुत्रचित् । पुष्पेणार्घ्येण हविषा नत्या स्तुत्यापि वा परम् ॥५७॥ श्रीहरि के शालिग्रामादि बिम्ब में अर्चना नित्य होना चाहिए जिसमें अर्घ्य प्रस्तुत हो तथा इसके अभाव में उनकी व्यापकता की दृष्टि से सूर्याग्नि में भी अर्चना हो सकती है. जिसे पुष्प, अर्घ्य, हवि, प्रदान, प्रणति तथा परम स्तुति आदि के द्वारा सम्पन्न किया जाता है।।५७।। शालग्रामशिलायान्तु पूजनं ज्ञापनादपि । सा हि दिव्या हरेर्मूर्तिर्दर्शनादेव सिद्धिकृत् ॥५८॥ शालिग्राम शिला बिम्ब का पूजन उनका ज्ञान करवाने से ही माना जाता है क्योंकि वह श्रीहरि की दिव्य मूर्ति मानी गयी है जिसके दर्शनमात्र से सिद्धि को प्राप्ति होती है।।५८।। प्राप्त्याभिगमनं दृष्ट्योपादानं नभसार्चनम् । स्वाध्यायः कीर्तनाद् योगः स्वार्पणादपि केवलम् ॥५९॥
१३६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीहरि की मात्र सन्निधि प्राप्ति कर लेना ही उनके प्रति अभिगमन हो जाता है केवल ज्ञान मात्र की दृष्टि से सभी उपचारों का उपादान हो जाता है तथा उनके नमस्कार करने से अर्चना सम्पन्न हो जाती है, उनके नामकीर्तन के कार्य से स्वाध्याय तथा केवल अपने आत्मनिवेदन रूप समर्पण से योग की सम्पन्नता होती है। (अतएव इस विकल्प को भी यथासमय प्रस्तुत कर श्रीहरि की नित्य अर्चना की पूर्ति की जावे॥५९॥ एवं विद्वानेकदापि कुर्वन् सन् पाञ्चकालिकः । कृतं भवति वा सर्वमिज्ययैव हि केवलम् ॥६०॥ इस प्रकार के विधानभूत आचार से विद्वान् तत्व की दृष्टि से एक बार सम्पन्न कर एकान्तीजन अथवा पांच समय सभी वर्णों की सामान्यविधि से केवल एक भगवद् अर्चना रूप कर्म सभी अभिगमनादि कर्मों को करनेवाला हो जाता है। (क्योंकि अर्चना में ही सभी भगवत् अर्चना के अन्य कर्म भी प्रथमाङ्ग रहने से अनुप्रविष्ट माने जाते हैं॥६०॥ स्वाध्यायेनापि विदुषा सर्वं योगेन वा कृतम् । पूजनेन गुरोर्वापि सताञ्चापि निषेवणात् ॥६१॥ इसी प्रकार अन्य कर्म जैसे स्वाध्याय या योग कर्म, गुरु के अर्चन कर्म तथा सत्सेवनादि' कर्म की भी इस श्रीहरि की सामान्य पांचकालिक इज्या (अर्चानारूप अनुष्ठान) से पूर्ति हो जाती है॥६१॥ विशुद्धं वैष्णवं बिम्बं गृहीत्वा न्यासतत्ववित् । सलिले देवमावाह्याभिषिञ्चेत् स्थापनं हि तत् ॥६२॥ अतएव न्यासयोग का तात्विक ज्ञान रखनेवाला एकान्ती भक्त, विशुद्ध श्रीविष्णु के शालिग्रामादि को लेकर जल में नारायण का आवाहन कर्म कर उससे उन्हें अभिषिक्त करना ही यहां उनकी स्थापना कर्म है॥६२॥ महाभागवतो मन्त्रैः शुद्धैर्यदभिषिञ्चति । बिम्बं सर्वोपचाराणां प्रायश्चित्तमिदं परम् ॥६३॥ और जो महाभागवत पुरुष शुद्ध देवताभिसम्बद्ध काव्यों मन्त्रों से श्रीहरि के शालिग्रामादि बिम्ब पर अभिषेक करता है तो यह कार्य सभी अपचारों का परम प्रायश्चित् हो जाता है॥६३॥ न परैः सङ्करं कुर्यात् पात्राणां यज्ञकर्मणि । कांस्यानां भोजने पाके मृण्मयानां विशेषतः ॥६४॥ यज्ञादि कर्मों में भगवदाराधन में उनके निमित्त निर्मित किये जाने वाले भोजन तथा
हिन्दीटीकासहित १३७ पाकादि द्रव्यों के लिये निर्धारित कांस्य के तथा विशेष कर मिट्टी के पात्रों का दूसरे तथा अन्य कार्यों में निर्धारित पात्रों के साथ विशेषरूप में सांकर्य (मिलाना) इष्ट नहीं है॥६४॥ शुद्धव्यामिश्रपात्राणां न कुर्याच्च परस्परम् । व्यामिश्रे शुद्धशेषं स्यात्तच्छेषं न शुचौ क्वचित् ॥६५॥ शुद्ध किया या कर्मों में विनियुक्त शुद्ध पात्रों का तथा मिश्र क्रिया में विनियुक्त मिश्रपात्रों का भी परस्पर सांकर्य उचित नहीं क्योंकि पात्रों (जिन्हें मिश्र क्रियाओं में विनियोजित किया जाता है) से शुद्ध पात्र शेष हो सकते हैं किन्तु शुद्ध क्रिया में विनियोजित पात्रों को मिश्र कर्म में विनियोजित नहीं किया जा सकता है॥६५॥ सतां पादोदकं पात्रे काञ्चने मृन्मयेऽपि वा । पावनं धारयेन्नित्यं प्रच्युताद्यैरदूषितम् ॥६६॥ प्रच्युत आदि से अदूषित या अस्पृष्ट गुरुजन आदि पूज्यजन का पादोदक कांचन अथवा मिट्टी के पात्र में पवित्रभाव में रखकर उसे नित्य धारण आदि किया जाता है (धारण करना चाहिए)॥६६॥ सन्तोऽनुपरतारब्धविलयात्यन्तनिर्मलः । अशुद्धैस्तत्तथाभावान्नाश्लिष्येयुः कथञ्चन ॥६७॥ सञ्चित प्रारब्ध के विलय हो जाने से जो अतिशय निर्मल हो चुके हों ऐसे सन्तजन वैसी स्थिति प्राप्त न किये हुए तथा इसी कारण परमशुद्धता से रहित अशुद्धजन से आश्लेष न करें (न ही हीन स्थिति के ऐसे व्यक्ति से संपर्क या सांकर्य होने दे)॥६८॥ कृत्वा मन्त्रान्वयं तत्र विवाहं परिवर्जयेत् । वैवाहिकोऽन्वयः पूर्वो न तु मन्त्रं निवारयेत् ॥६८॥ आचार्य या पूज्यगुरु से मन्त्र का सम्बन्ध दीक्षा से प्राप्त करने पर फिर उस वंश के साथ विवाहादि सम्बन्ध (अथवा उस वंश की कन्या का विवाहार्थ ग्रहण) नहीं करना चाहिए (मन्त्र सम्बन्ध लेकर उस परिवार से विवाह अनुचित है किन्तु) यदि पूर्व में विवाह हो गया हो तो बाद में मन्त्र लेने का सम्बन्ध करना निषिद्ध नहीं है॥६८॥ न्यासस्य सर्वयोगस्य शुद्धस्यात्यन्तिकस्य च । अन्यादृशस्य च विधेर्नानुबन्धं परे विदुः ॥६९॥ सभी के अधिकार वाले शुद्ध योग तथा मिश्र योग रूप न्यास के साथ इससे भिन्न
१३८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विवाहादि सम्बन्ध की विधि का कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसी दूसरी मुनिजन की मान्यता है (अतएव न्यास-योग का मन्त्र सम्बन्ध तथा विवाह जैसे वंश-सम्बन्ध का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं समझना उचित है, ऐसा कुछ दूसरे मुनिजन का मत है)॥६९॥ प्राप्तुं लक्ष्मीपतेर्दास्यं शाश्वतं परमात्मनः । तमेव शरणं प्राप्य गच्छेदात्मविदं गुरुम् ॥७०॥ परमात्मा श्रीलक्ष्मीपति नारायण के नियत या शाश्वत दास्यभाव को शरण को प्राप्त करने के लिये ही श्रेष्ठ तथा आत्मज्ञ आचार्य (गुरु) को प्राप्त किया जाता है जिससे प्रपत्तिभूत न्यासयोग की दीक्षा ली जा सके॥७०॥ संवत्सरमुपासीत तमेव सुसमाहितः । वर्षवातातपादीनां सोढा युक्तोऽस्य कर्मसु ॥७१॥ वह गुरु की सेवाशुश्रूषादि में निरत रहकर वर्षा, वात, आतप (आदि का सहन करने) जैसे तप को साधते हुए तथा गुरु की सदैव शुश्रूषादि की चिन्ता रखते हुए एक वर्ष पर्यन्त उनके साथ निवास करे॥७१॥ गुरुरस्य परं स्थैर्यं शौचमास्तिक्यमार्जवम् । ज्ञात्वा चान्यगुणान् सम्यक् संस्कारैर्योजयेत् ततः ॥७२॥ इस प्रकार समय बीत जाने पर फिर गुरु इसके स्थिर भाव, बाह्य तथा आभ्यन्तर शुचिता (पवित्रता), वेदादि अर्थों तथा इष्टदेव के प्रति दृढ़ विश्वास, वाणी, मन तथा शरीर के एकरूपतावाली ऋजुता आदि अन्य गुणों को समझ कर बाद में उसको तापादि पञ्च संस्कारों से युक्त (संस्कारित) करे॥७२॥ अथ कश्चिदनुग्राह्यमबुद्धं स्वयमेव वा । परिगृह्य परं प्राज्ञः प्रापयेच्छरणं हरिम् ॥७३॥ (तथा यदि कोई) स्वयं करने की विधि तथा आचार से अनभिज्ञ तथा असमर्थ हो और उस पर करुणा बुद्धि से अनुग्रह करना उचित दिखता हो तो मनीषी आचार्य उस पर कृपा कर उसे स्वयं श्रीहरि की प्रपत्ति करवाकर श्रीहरि की शरणागत दीक्षा प्रदान करे॥७३॥ क्रमाच्च बुद्धयमानं तं बोधनीयानि बोधयेत् । कारयेत् करणीयानि प्रापयेत् परमां स्थितिम् ॥७४॥ आगे फिर समय बीतने पर क्रमशः अपने ईश के विषय में दृष्टि प्राप्त कर उसका ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरान्त उसे आवश्यक कर्तव्यों का तथा रहस्यों का ज्ञान करवाना चाहिए फिर उससे कर्तव्यों का पालन करवाने और वृत्ति का उपदेश देकर
हिन्दीटीकासहित १३९ एकान्तीजन की स्थिति तक उसे विकसित कर पहुँचावे जिससे वह उत्कृष्ट एकान्ती हो जाए॥७४॥ अजिह्मा सात्त्विकी बुद्धिर्येषां शास्त्रावगाहिनी । तेषां नारायणे भक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ॥७५॥ जिनकी बुद्धि शास्त्र का अर्थ ग्रहण करने में समर्थ सत्वगुणवाली तथा सरलवृत्ति की है उनकी अन्य देवताओं की आराधनाओं से टूट कर एकनिष्ट भाव से श्रीहरि में स्थित भक्तिवाली बुद्धि हो जाती है॥७५॥ येषां शास्त्रेषु गाढापि राजसी कुटिला मतिः । तेषां न जायते भक्तिर्हरौ जातापि च स्खलेत् ॥७६॥ और जिनकी प्रतिशास्त्र में अर्थावगाहिनी बुद्धि राजसी गुणोंवाली हो तथा जिसमें कुटिलवृत्ति के कारण अनेक देवताओं में अपेक्षावश निष्ठा निर्माण होती है तो उनकी श्रीनारायण में भक्ति उत्पन्न नहीं होती और कदाचित् उत्पन्न होती भी है तो वह स्थिर नहीं होने से बाद में स्खलित या दूर हो जाती है॥७६॥ तमसाभिप्लुता येषां शास्त्रेष्वक्रमते न धीः । न ते स्वात्मानमीशं वा बुद्धयन्ते देहबुद्धयः ॥७७॥ तथा जिनकी बुद्धि शास्त्रादि के अनुशीलन से नहीं चलती, ऐसे जो व्यक्ति तमोगुण से युक्त होते हैं वे देहादिस्थूल पदार्थ तक ज्ञान के पहुँचने के कारण आत्मा के अधिपति परमात्मा को जानने में असमर्थ रहते हैं। (तथा वे श्रीहरि के ज्ञान तथा भक्ति की प्राप्ति से वंचित हो जाते हैं)॥७७॥ लोभाद्वा यदि वा मोहाच्छिष्यं शास्ति न यो गुरुः । नास्मात् संशृणुते यश्च प्रच्युतौ तावुभावपि ॥७८॥ जो आचार्य लोभ या मोह के वश में होकर अपने शिष्य को अनुशासन में नहीं रख पाते तथा जिसके उपदेशादि शास्त्रवृत्त को शिष्य नहीं सुनते न उस पर ध्यान देते हों तो ऐसे आचार्य तथा शिष्य दोनों का पतन हो जाता है (अतएव सात्विक गुणवाले शिष्य को ही गुरु उपदेश देकर उसे कल्याण प्राप्ति करवा सकता है तथा ऐसे ही शिष्य रखना उचित है)॥७८॥ अपरीक्ष्य चिरं क्षेत्रं यः परं ज्ञानमावहेत् । प्रमाद्यतः सुगोप्तव्ये परमार्थोऽस्य हीयते ॥७९॥ इसीलिये शिष्यरूप क्षेत्र की बिना चिरकाल तक परीक्षा के ही जो उसमें परमार्थसाधक परम ज्ञानरूप बीज का आधार उपदेश द्वारा सम्पन्न करता है तो अत्यंत गोपनीय मोक्षोपायभूत ज्ञान के प्रदानरूप प्रमाद करने से उस आचार्य की भी
१४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अपने उद्देश्य या परमप्रयोजन में हानि होकर प्रमादवश पतन हो जाता है॥७९॥ न्यासे हि देहिनोऽपायैर्जायते प्रच्युतिः फलात् । वार्यत्याप्रशमनात् सा हि सद्भ्यवहार्यताम् ॥८०॥ किसी शिष्य के द्वारा आत्मा के प्रपत्तिरूप न्यास के सम्पन्न करने पर भी बाद में उपायों के प्राकृतजन संसर्गादि से बन जाने पर श्रीहरि के दास भाव की प्राप्तिरूप फल से प्रच्युति से उद्दिष्टार्थ से वंचित होना पड़ता है, अतएव प्रायश्चित्तादि से प्रशमन कर्म के आचरण तक वह प्रायश्चित रूप में शिष्टजन से बहिष्कृत होकर रहेगा तथा इस समय वह भगवत् कैङ्कर्य के अधिकार से हीन भी हो जाएगा ॥८०॥ यज्ज्ञानपूर्वं न्यसनं मन्त्रेण गुरुणा हरौ । स एव सर्वसंस्कारः प्राक्तस्मात् प्राकृताः नराः ॥८१॥ आचार्य के द्वारा मन्त्रार्थ के ज्ञान को देते हुए जो शरणागति मन्त्र से श्रीनारायण के प्रति प्रपत्ति या न्यासयोग के साथ शिष्य का समर्पण करवाया जाता है उस सभी पूर्ण संस्कार के किये गये विधान से पूर्व वह जन अवैष्णवभूत था, अतः वह तब तक प्राकृत जन था॥८१॥ प्राकृताद्यैः परिहृतो निवसेन्नासहायवान् । वसँश्चाभ्यन्तरान् प्राज्ञः संसर्गान् परिवर्जयेत् ॥८२॥ न्यासयोग प्राप्त शिष्य अकेली ही रहे वह प्राकृतादि की संगति से दूर रहे तथा अपनी कुशलबुद्धि के साथ इनसे व्यवहार रखते हुए किसी आंतरिक संसर्गवाला व्यवहार भी (जैसे साथ रहना एक साथ शयन तथा भोजन आदि व्यवहार) नहीं रखे॥८२॥ श्रद्धापूतमवैद्यस्याप्यन्नाद्यं तु कदाचन । इज्यासु विनियुञ्जीत न श्राद्धे सति किञ्चन ॥८३॥ अवैष्णवभूत श्रीहरि की प्रपत्ति न पाने वाले किसी प्राकृतजन का श्रद्धावश अर्पित अन्न (पक्व या अपक्व) या किसी श्राद्ध कर्म के या सामान्यरूप में यज्ञादि के प्रसंग में अनापत् या आपत् स्थिति में भी उपयोग न करे (इस अवैष्णव दत्त अन्न का भोजनादि में लेना या उपयोग भी फल प्राप्ति में बाधक समझना चाहिए)॥८३॥ गुणासहास्त्यजन्त्यार्या न सन्तश्चिरमंहसे । दोषासहास्त्यजन्त्येव सन्तश्च श्रेयसे परान् ॥८४॥ आर्यजन या सज्जन किसी के गुणवश ही उसका चिरकाल तक पातकादि के चलाने
हिन्दीटीकासहित १४१ पर उसका परित्याग करना उचित मानकर बाद में उसे छोड़ते हैं और दोषों को देखकर सज्जन रहने पर भी उसी के लिये प्रायश्चित्तादि आचरण के काल में उसका परित्याग करते हैं॥८४॥ धर्मच्छद्मभृतो धर्मान् घ्नन्ति वेदपराङ्मुखाः । वैदिकाभास्तथा वेदान् कृष्णैकान्त्यपराङ्मुखाः ॥८५॥ वेद प्रतिपादित धर्म से हटकर चैत्यवन्दनादि बौद्ध धर्म का ज्ञान तथा आचरण करने (या उस पर आस्था रखने) वाले केवल धर्म का छद्म् धारण करते हुए (धार्मिक होना दिखलाते हुए) धर्मों का (ज्योतिष्टोमादि सत्रो का जो कि धर्म प्राप्ति के आधार हैं) हनन करते हैं तथा जो परमार्थतः वैदिक नहीं होकर भी अपनी वैदिक स्थिति दिखला कर वेदों का हनन करते हैं ये श्री नारायण के एकान्त्यभाव में बाधक रहने से उसके प्रतिपक्षी (ही) समझना चाहिए॥८५॥ य आत्मनां परो वेद्यस्तं विष्णुं वेदयन्ति यत् । तद्वेदानां हि वेदत्वं यस्तं वेद स वेदवित् ॥८६॥ जिनसे चेतनभूत जीवात्माओं से उत्कृष्ट ज्ञानवेद्य परमात्मरूप श्रीविष्णु का ब्रह्मरूप में ज्ञान प्राप्त हो यही वेदों की सत्ज्ञानवत्ता है तथा जो वेदों के अनुशीलन से इसी रहस्यभूत ज्ञान की प्राप्ति करे वही वेदवेत्ता है। तथा इससे भिन्न तत्वों के विज्ञाता वेद के वेत्ता नहीं वे वेदविद्यघातक हैं॥८६॥ दर्शयन्त इव श्रेयो विप्लुतैर्हेतुभिर्बलात् । च्यावयन्ति श्रुतिपथात् दूरं बाह्याः स्थिरानपि ॥८७॥ हेतुवादिक अवैष्णव व कुदृष्टि रखनेवाला विद्वान् (बौद्धादि दार्शनिक) स्खलनशील हेत्वाभास जैसे हेतुओं को अपने बुद्धिबल से श्रेयस्कारी दिखलाते हुए स्थित श्रद्धाभक्तिवाले बुधजन को भी स्थिर सिद्धान्तवाले वेदमार्ग से दूर हटाकर वे उन्हें अपथगामी बना देते हैं॥८७॥ वैदिका इव चाप्यन्ये दर्शयन्तोऽन्यथा श्रुतेः । अर्थमच्युतकैङ्कर्याच्च्यावयन्ति कुदृष्टयः ॥८८॥ कुछ विद्वान् वेद का अनुगमन करनेवाले होने से वेद के आशयों को अपनी तार्किक बुद्धि के बल से अन्यरूपों में दिखलाने वाले कुदृष्टि होकर अच्युत के कैङ्कर्यभाव से दृढ़भक्ति वैष्णवों को भी भटका देते हैं॥८८॥ तस्मात् कुदृष्टिभिर्बाह्यैरप्रकम्प्यो गतव्यथः । ऐकान्त्यममलं विष्णोरातिष्ठेत् परमं सुधीः ॥८९॥ अतएव बुद्धिमान् स्थिर भक्तिवाला एकान्ती बाह्यजन की ऐसी हेतु प्रदर्शन तार्किक ६
१४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कुदृष्टियों से अपने धर्म से न हटे तथा बिना किसी कथा के श्रीहरि के परम एकान्त्यभाव में दृढ़ता से स्थिर रहे तथा अपने धर्मादि का पालन करत रहे॥८९॥ नास्तिकः संशयी मूढ इत्यदूरतरा नराः । विज्ञाय लक्षणैस्तांस्तु सम्यग् व्यवसितस्त्यजेत् ॥९०॥ अपने साथ रहने वाले निकटस्थ नास्तिक, सन्देहशील तथा मूढ़मति के मनुष्यों क उनके लक्षणों से भली प्रकार समझते हुए ऐसे सभी कुदृष्टि जन को निश्चय क उनका साहचर्य तथा संगादि छोड़ देवे॥९०॥ मत्प्रत्यक्षन्तदेवास्ति नास्त्यन्यदिति निश्चिताः । अर्थकामपराः पापा नास्तिका देहकिङ्कराः ॥९१॥ जो मुझे प्रत्यक्ष हो वही विद्यमान या सत्य है तथा अन्य पदार्थ या ईश्वरादि अप्रत्यक्ष तत्व कुछ भी नहीं है ऐसा निश्चय दिखलाने वाले अर्थ तथा कामरूप पुरुषार्थ के सेव में रत रहनेवाले अपने शरीर के धर्म के जो दास हैं वे ‘नास्तिक’ है (तथा कुदृष्टि हैं)॥९१॥ नानाविधेषु ज्ञानेषु नराः संशयिनोऽधमाः । निश्चयं नाधिगच्छन्ति लिङ्गमात्रधराः क्वचित् ॥९२॥ इसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रज्ञानों के कारण परस्पर विपरीत कथ्यों को प्राप कर संशय में स्थित रहनेवाले होकर किसी निश्चय पर नहीं पहुँचने से ‘संशयी’ तथ अधमजन हैं। इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्ति केवल अपने मत के अनुक वस्त्रादिवेषधारी मात्र होते हैं॥९२॥ देहात्मस्वर्गनरकपुण्यपापाविमर्शनः । गतानुगतिका मूढा नश्यन्ति पशुबुद्धयः ॥९३॥ कुछ देहात्मवादी, स्वर्ग, नरक, पुण्य तथा पाप के विचार से शून्य होते हुए केव अपने प्रविचारित मार्ग में स्थित रहनेवाले अज्ञानी हैं जो, इस वृत्ति के कारण पशु समान विवेक रहित हैं। ऐसे सभी प्रायः मोक्षप्राप्ति के अपात्र होने से अन्त में ना प्राप्त करते हैं॥९३॥ कुदृष्टयो बहुविधा वृथा वैदिकमानिनः । तथा मिथ्यादृशो बाह्याः सर्वैरेवावृतञ्जगत् ॥९४॥ नास्तिक एवं कुदृष्टिजन के अनेक प्रकार होते हैं। कुछ वृथा ही अपने को वेदज्ञान सम्पन्न मानने वाले वैष्णवविरोधी हैं, इसी प्रकार कुछ हेतु आदि के प्रयोगों मिथ्यादृष्टि का निर्माण करनेवाले बाह्य विद्वान् हैं (अवैदिकजनक)। इस प्रकार
हिन्दीटीकासहित १४३ अनेक जन से संसार आच्छादित है। अतः ठीक से इस आवरण में से अपने दृष्टि प्रकाश के अनुसार परीक्षा कर ऐसे मनुष्यों की संगति से दूर रहें॥९४॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः नारायणपरायणाः । धन्याः केचन तेभ्योऽपि तेषामादेशवृत्तिनः ॥९५॥ और जो वेद तथा वेदांगो के तात्त्विक आशयों के विज्ञाता हों, जो श्रीनारायण के प्रति वेदों की निष्ठा के जानने वाले हैं, वे ही धन्य हैं तथा उनसे जो उपदेश लेकर वृत्ति में स्थित हो वे भी धन्य हैं तथा दुर्लभ हैं॥९५॥ आदिष्टाः पुण्ड्रमन्त्रार्चा-नाम-ताप-पराङ्मुखाः । धूतावधूतनिर्धूत-विधूतोद्धृत-संज्ञकाः ॥९६॥ जो वैष्णवाभिमत पुण्ड्र, मन्त्र, अर्चा, नाम, ताप नामक पंचसंस्कारों से रहित हैं उन्हें क्रमशः धूत, अवधूत, निर्धूत, विधूत तथा उद्धृत के रूप में शास्त्रकारों ने बतलाया है॥९६॥ आदिष्टा एव चान्यार्चामन्त्रपुण्ड्राङ्कनामकाः । राक्षसासुरवेताल-व्याल-प्रेता नराधमाः ॥९७॥ इसी प्रकार जो अन्य अर्चानादि में लीन हैं उन्हें राक्षस, अन्य मन्त्रादि का जपादि करने वाले असुर, अन्य पुण्ड्रादि धारी बेताल, अन्य देवता के शस्त्रादि चिन्हों के धारण करनेवाले व्याल तथा अन्य नाम को धारण करनेवाले 'प्रेत' हैं, ऐसा भी आगमादि शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है॥९७॥ तथा स्वकर्मशास्त्रेशगुरु-सत्सङ्गवर्जिताः । ऊना हीना स्रस्ता नष्टा दग्धा ज्ञेयास्समाख्यया ॥९८॥ भिन्नोऽन्यनाथो भिन्नोऽन्यफलो भिन्नोऽथनिन्द्यकृत् । भग्नोऽन्यदेशिकादेशोऽनृतोऽन्यजनसंश्रयः ॥९९॥ इसी प्रकार जो अपने कर्म तथा विहिताचार से हीन हों वे 'ऊन' शास्त्र तथा दृष्टि से रहित वे 'हीन', जो इष्ट श्रीश से रहित हैं वे 'स्रस्त' जो गुरु प्राप्ति से वंचित हैं वे 'नष्ट', जो सत्संग से हीन है वे 'दग्ध' इन नामों से भी शास्त्रकारों ने दिखलाये हैं। इसी प्रकार जिसका आराध्य अन्य देवता हो वह 'भिन्न' जिसका फल मोक्ष से अन्य है वह 'अन्यफल, और जो निन्द्य कर्मकारी है वह 'निन्द्य' जो अनेक विद्वान् गुरुजन की आज्ञाएं माने वह 'भग्न' तथा जो दूसरे देवताओं का यजन करे वह 'अनज्ञ' नाम से शास्त्र में दिखलाया गया है॥९८-९९॥
१४४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता निहीनान् प्राकृतेभ्योऽपि प्रच्युतान् परिवर्जयेत् । भक्ताणाराधयन् विष्णोः प्राप्नोति परमं पदम् ॥१००॥ इति नारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे तृतीयोऽध्यायः प्राकृतजन से भी हीन ये सभी प्रच्युत कहलाते हैं अतः इनसे अपने को दूर रखते हुए तथा श्रीविष्णु की तथा इनके भक्तजन की आराधना करते हुए श्री विष्णु के परमपद मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए॥१००॥ नारद पंचरात्र भारद्वाज संहिता के परिशिष्ट की तत्वप्रकाशिका व्याख्या का तृतीयाध्याय समाप्त
हिन्दीटीकासहित १४५ परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ४ पुनरेवं मुनिश्रेष्ठं पप्रच्छुस्ते महर्षयः । कथं निक्षेपता वृत्तिर्विस्तारोऽस्याश्च कीदृशः ॥१॥ अथ चतुर्थाध्याय सभी महर्षिगण ने यह सुनकर फिर एक प्रश्न भारद्वाजमुनि से किया कि हे मुने! आत्मनिक्षेप के बाद अनुष्ठेय वृत्ति या आचार कैसा रखा जाए तथा इसका विस्तृत तथा तात्विकरूप क्या होता है॥१॥ भरद्वाजो महातेजाः श्रुत्वा तेषामिदं वचः । प्रत्युवाच परं हृष्टो भगवद्दास्यतत्ववित् ॥२॥ तब महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने उन महर्षियों के इस प्रकार के वचनों को सुनकर प्रसन्नता से हर्षित भाव में भरकर भगवद्दास्यभाव के तात्विक ज्ञान के आधार पर इस प्रकार कहा॥२॥ विशुद्धज्ञानसलिलां भक्तिकल्लोलमालिनीम् । सत्सेवनस्वादुरसां दिव्यलक्षणवारिजाम् ॥३॥ वैराग्यतीरसुभागामाचारोपवनावृताम् । वृत्त्यापगां निषेवध्वं विष्णुसागरगामिनीम् ॥४॥ हे महर्षिजन! यह वृत्तिरूप नदी ही सेवन के योग्य तथा अनुष्ठेय है। क्योंकि इसमें शुद्ध ज्ञानरूप दृष्टि ही जल है, भक्ति रूपी लहरों की मालाओं से यह भरी हुई है, सत्सेवनरूप स्वादु इसका आस्वाद है, दिव्य लक्षणों वाले ताप, पुण्ड्रादि कमल खिले हुए हैं, वैराग्य के तीर से जो रम्य भाववाली है, विहित आचाररूपी उपवनों से जो वेष्टित है और जो विष्णु रूपी सागर की ओर जाने वाली है (इसका सेवन करना चाहिए)॥३-४॥ न्यासतीर्थाभिगमनं सुदृष्टिर्यजनं हृदि । स्वकर्माण्यासनाविधिर्लक्ष्मावाहनसत्क्रिया ॥५॥ भक्तिस्तु विविधा भोगाः सत्सेवा हविरुत्तमम् । वैराग्ययोगनिर्विघ्ना यजध्वमनयेज्यया ॥६॥
१४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यह भगवदाराधनारूप वृत्ति ही इज्या (यजन, त्याग) है अथा अनुष्ठेय भी हैं क्योंकि इसमें प्रपत्तिरूप न्यास ही आरम्भक (ज्ञान) हेतु तीर्थाभिगमन होता है (जिसमें ज्ञान से हृद्याग पर्यन्त अङ्ग है,) जहां सुदृष्टि ही हृदयजन है, अपने कर्मों में विहित आचार ही जहां आसनविधि है। जिसमें लक्ष्य, आवाहन, मन्त्र, ज्ञान, अलंकार, भोग्य, पर्यङ्क आदि सत्कार है। भक्ति जहां अनेक विद्य गन्ध, माल्यादि भोग हैं, जहां उत्तम हविरूप है, वैराग्य ही जहां योग रूप ध्यान है, जिससे विघ्न दूर हो जाते हैं (वैराग्य के उपाय से जो विघ्नरहित है) ऐसी इस वृत्तिरूप इज्या से यजन किया जावे॥५-६॥ भूमाविव परे पुंसि न्यस्त-बीजबदात्मनि । विज्ञान-मूल-सन्तानः क्रियाचारनिबन्धनः ॥७॥ भक्ति-प्रकाण्ड-विस्तारो वैराग्यरसपेशलः । नाना-लक्षण-पुष्पाढ्यः सत्सेवनमहाफलः ॥८॥ उच्चैस्तरोऽतिविपुलः सर्वसन्तापनाशनः । सम्पद्यते सदा सेव्यो हरि-कैङ्कर्य-पादपः ॥९॥ यही वृत्ति एक ऐसा वृक्ष है जिसकी आधाररूप भूमि परमपुरुष श्रीविष्णु है जिनमें न्यस्त आत्मा बीज के समान है, जिसकी विज्ञान रूप दृष्टि ही मूल (जड़) स्थानीय है जो परम्पराशूप है, जिसकी विहित आचार रूप क्रियाएं उस जड़ की दृढ़ता तथा सुरक्षा के लिये बनाया गया पाला तथा उसके आसपास की वेदिका है, जिसकी शाखाओं का विस्तार भक्ति है, जो वैराग्य के रस (जलसेक) से जमा हुआ होकर मजबूत हो रहा है, अपने ताप, पुण्ड्र आदि लक्षणों वाले इसके सुन्दर पुष्प हैं, जो सन्तों की सेवा रूप पुष्ट फलों वाला है, जो आकाश तक ऊंचाई में फैला हुआ तथा बड़ा ही विशाल आकारवाला है तथा जो अपनी छाया से सभी आश्रित विश्राम लेने पथिकों का सभी त्रिविध सन्ताप दूर करनेवाला है तथा जो श्रीहरि का दास्य रूप वृक्ष है। अतः इस ऐसे वृक्ष का ही सेवन सर्वदा करना चाहिए॥७-९॥ आदौ गुरूणां विज्ञानमथ तन्त्रार्त्तचिन्तनम् । तत एवात्मनो ज्ञानं तद्धर्माणाञ्च सर्वशः ॥१०॥ परस्य पुंसः श्रीशस्य परेशस्य परात्मनः । स्वरूप-रूप-विभव-गुण-व्यापार-चिन्तनम् ॥११॥ परिबर्ह-विभूषास्त्र-पत्नी-परिजनात्मनाम् । सर्वेषाञ्चैव दिव्यानां गुणानामनुचिन्तनम् ॥१२॥ इसमें सर्वप्रथम अपने तत्ववेत्ता आचार्य के समीप उपसर्पण से आचार्य रूप का ज्ञान
हिन्दीटीकासहित १४७ तथा आगे उनसे तन्त्र (शास्त्र) के उपदेश रूप अर्थ का चिंतन तथा इसी से स्वयं का आत्मज्ञान एवं उसके सभी धर्मादि का ज्ञान होना, जिससे परम पुरुष रूप श्रीश जो ब्रह्मारुद्रादि के नायकभूत हैं तथा परमात्मा हैं, उन सर्वान्तरात्मा का ज्ञान तथा उनके दिव्यस्वरूप का, उनके विग्रहादि रूप का, उनकी विभूतियों तथा गुणों का तथा उनके कार्यादि का ज्ञान होना, श्रीहरि के गुणों में उनके अवतारादि कार्यों में धारण किये जाने वाले भूषणादि, अस्त्र तथा उनकी पत्नी तथा उनके परिवारजन का ज्ञान तथा उनके दिव्य गुणों तथा कार्यों (जैसे हिरण्यकशिपु, रावण, शिशुपालादि के संहार करने के कार्यों) का चिन्तन करना॥१०-१२॥ विमानमण्डपोद्यानवापीकूपादिशालिनः । नानाश्चर्यमयानन्त-दिव्यप्रासादमालिनः ॥१३॥ साप्सरो भूरिसङ्घस्य सदिव्यमृगपक्षिणः । पुरस्य दिवि लोकानां लोकस्य परिचिन्तनम् ॥१४॥ तथा भगवतो व्यूहविभवार्चा-व्यवस्थितेः । अन्तःस्थितेश्च जगतां सृष्ट्यादेश्च विचिन्तनम् ॥१५॥ इसी क्रम में आगे ऐसे पुरी (नगरी) का जिसमें विमान, मण्डप, उद्यान, वापी तथा कूप विद्यमान है, जिसमें अनेक आश्चर्यकारी, अनन्त एवं दिव्य प्रासाद (मन्दिरों) की पंक्तियों से (जो) शोभित हैं, जहां अप्सराओं से पूर्ण अनेक समुदाय विद्यमान है, जहां दिव्य मृग तथा पक्षिगण हैं ऐसे दिव्य लोक (स्वर्ग) के निवासीजन तथा लोक का चिन्तन किया गया है। इसी प्रकार जहां भगवान् श्रीवासुदेव तथा इनके चतुर्व्यूह उनके रामादि अवतार मय विभव, अर्चा में श्रीवैकुण्ठनाथादि की व्यवस्था तथा जगत् में अन्तर्यामित्व तथा सृष्टि, प्रलयादि का विचार है॥१३-१५॥ प्रधानमहदादीनां तत्त्वानामवबोधनम् । अण्डानां कालतत्त्वानां लोकानां भूतसंहतेः ॥१६॥ जहाँ प्रकृति तथा महत् तत्व, इन्द्रिय तथा तन्मात्रादि तत्वों का स्वरूप, ब्रह्माण्डों लोकों तथा काल तत्वों, पञ्चमहाभूतों तथा उनसे उत्पन्न जन्तुगण का भी विचार करना है॥१६॥ परसम्बन्धविज्ञानं प्रकृतेः पुरुषस्य च । कर्मयोगस्य विज्ञानं धर्माणाञ्चाप्यशेषतः ॥१७॥ ज्ञानयोगस्य विज्ञानं भक्तियोगस्य चाखिलम् । तथैव न्यासयोगस्य साङ्गस्य परिचिन्तनम् ॥१८॥ प्रकृति तथा पुरुष के भगवत्शरीर स्वरूप तथा सम्बन्ध का विशेष चिन्तन, कर्मयोग
१४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथा विशेषरूप में धर्मों का चिन्तन, इसी प्रकार ज्ञानयोग तथा भक्तियोग का समग्र विचिन्तन करना और बाद में सांग समग्र न्यासयोग विषयक विवरण तथा इस विषय पर चिन्तन करना॥१७॥१८॥ इहैव फलरूपाया वृत्तेः सम्यक् प्रदर्शनम् । देहान्निष्क्रमणस्यापि मार्गस्य च विचिन्तनम् ॥१९॥ इस लोक में फल प्राप्ति रूप वृत्ति के पूर्णरूप से विवरण के बाद इस शरीर के छोड़ने के पश्चात् निष्क्राम प्राप्त जीव के अर्चिरादि मार्गों से उत्तमकान्तिरूप यात्रा का चिन्तन॥१९॥ दिव्यलोकस्य सम्प्राप्त्या भर्तुरालोकनार्चया । निरस्तातिशया प्रीतिः सदा तस्याश्च भावना ॥२०॥ जीवकी यात्रा के क्रम में उसका दिव्य लोक की प्राप्ति तथा अपने स्वामी इष्ट देश परमेश्वर का जो परमपद के साधन भी हैं-दर्शन प्राप्ति से निरवधि प्रीति तथा उसकी स्थिति का चिन्तन॥२०॥ भगवच्चरणाम्भोजानुभवप्रीतिजन्मनः । कैङ्कर्यस्य परा काष्ठा या तस्याश्च विचिन्तनम् ॥२१॥ और आगे दिव्यलोक में अवस्थित श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का दर्शन, सेवा का अनुभव तथा उससे होनेवाली प्रीति की उत्पत्ति से दासभावना की परमानन्दा दात्री स्थिति की पराकाष्ठा का विचार॥२१॥ अनादेर्मोहकलनात् संसारावृत्तिहेतवः । प्रभवन्त्यात्मनां कर्म-वासनारुचयो यथा ॥२२॥ यथा रागादयो दोषा नित्यं चात्मगुणच्छिदः । कारणान्यपचारेषु क्षिपन्ति च तथा मतिः ॥२३॥ इसी क्रम में अनादिभूत माया (अविद्या) के सम्बन्ध में संसार में बार बार आकर जन्म प्राप्त करने के कारणभूत कर्मों की वासना तथा रुचि जैसी उत्पन्न होती है तथा अहिंसा आदि अध्यात्मगुणों के अनुरोधक राग आदि पुण्य पापकर्मादि के द्वारा संसार के बीजभूत तत्व बनकर दोषरूप में आते हैं तथा वे ही कारण होकर जीव को ऐसे अपचारों (पातकादि दोषों) में गिरा देते हैं, कैसी बुद्धि के उत्पन्न हो जाने की चिन्तना॥२२-२३॥ विमर्श इह दुःखानां यातनानां परत्र च । विषयाणाञ्च हेयत्वदर्शनं दृष्टिरुच्यते ॥२४॥ इस लोक में प्राप्त होनेवाली दुःखोंकी तथा परलोक में प्राप्त होनेवाली यातनाओं
हिन्दीटीकासहित १४९ का विचार तथा सुखदुःखादि सांसारिक विषयों की हेयता का प्रतिपादन करना आदि ये सभी 'दृष्टि' कहलाते हैं॥२४॥ सैषा सुदृष्टिर्वृत्याख्यतरोर्मूलमुदाहृता । अतोऽन्यथा कुदृष्टिर्हि तस्य सा मूलघातिनी ॥२५॥ यह दृष्टि ही इस वृत्तिभूत पूर्व कथित वृक्ष की मूल या जड़ मानी गयी है तथा इसके विपरीत दृष्टि कुदृष्टि कहलाती है जिससे मूल का ही विघात माना गया है॥२५॥ प्रथमासनसंस्कारो निषेको विधिपूर्वकः । संस्कारास्त्वाव्रतादेशात् तत्र भोगक्रमा हरेः ॥२६॥ वृत्तिरूप वृक्ष का मूलबन्ध तथा विहिताचार भगवदिज्या आदि के विचारक्रम में सर्वप्रथम वेदादि शास्त्राविधि से विहित गृहाश्रम में होनेवाला गर्भाधान संस्कार तथा इसी के आगे व्रतादेश तक के (पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन, चौल तथा उपनयनादि व्रतबन्ध तक) संस्कारों का उपचारक्रम श्रीहरि के उपचार के क्रम में प्रथम संस्कार माना गया है॥२६॥ द्वितीयमासनं विष्णोरस्योपनयनक्रिया । ज्ञानान्तास्तत्र संस्कारा बोद्धव्या भोगसम्पदः ॥२७॥ इसके आगे श्रीहरि के उपचार क्रम के द्वितीय संस्कार के क्रम में इसका उपनयन क्रिया से लेकर वेदारम्भ तथा समावर्तन पर्यन्त संस्कार इसके भोग सम्पत्ति के क्रम में ज्ञानासन के रूप में आते हैं॥२७॥ वैवाहिको विधिर्धर्मो यस्तृतीयं तदासनम् । गृहस्थधर्मा ये तत्र ते प्रसाधनविग्रहाः ॥२८॥ तथा धर्मभाव से अनुष्ठित विवाह संस्कार तृतीय आसन रूप है जहां गृहस्थों के आचार योग्य धर्मों का पालन होना प्रसाधनभूत अलंकार सदृश उपाचार क्रम में श्रीहरि के आता है॥२८॥ योगक्षेमविधिर्नित्यस्तच्चतुर्थमिहासनम् । ततः परेऽखिला यज्ञा हविषां विनिवेदनम् ॥२९॥ वनस्थाश्रमसम्प्राप्तिर्हरेः पञ्चममासनम् । नियमा ये च तत्र स्युस्ते वै भोगास्तदाश्रयाः ॥३०॥ इस गृहस्थ की वृत्ति के लिये भोग्यासन के रूप में जो अर्थार्ज्जनरूप योगक्षेम विधिवत् नित्य अपेक्षित है तथा जिसमें अग्निष्टोमादि यज्ञों के द्वारा (श्रीहरि एवं देवगण को), हवि समर्पण करने के आचारभूत कर्मवाला श्रीहरि के उपचार का आसन चतुर्थ स्थानीय
१५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता है। इस आश्रम के आगे वानप्रस्थ के प्राप्त हो जाने पर वह श्रीहरि के उपचारभूत रूप में पंचम आसन (होता) है जहां वन में स्थित रहकर आश्रम के नियत तथा उनके अनुरूप पदार्थों का भोगरूप में सेवन करना विहित है॥२९-३०॥ यत् प्रव्रजन्ति तत् षष्ठमासनं परमात्मनः । योगाख्यमतुलं शुद्धं तद्धर्मास्तित्र सत्क्रियाः ॥३१॥ इसके बाद अधिकारानुरूप जो प्रव्रजनरूप (सन्यास नामक) आश्रम है वह परमेश्वर के उपचार क्रम में षष्ठ स्थानीय है जिसका नाम योगसंस्कार है जो परमशुद्ध तथा अतुलनीय है। सन्यास के धर्मों में किये जाने वाले कर्मभूत उपचार सद्धर्मानुष्ठानरूप है जहां सत्सेवा की जाए॥३१॥ सतामुत्क्रमणादेश्च कर्तव्या विधयः परे । उद्वासनोपचारा वै भवन्ति दिवि शार्ङ्गिणः ॥३२॥ अग्नौ तु परमे व्योम्नि ध्यायेतां नित्यमच्युतम् । वैश्यत्वे चार्णवगतं शूद्रत्वे तु भुवि स्थितम् ॥३३॥ ऐसे सन्त के प्राणों के उत्सर्ग के उपरान्त उसकी उत्तरकालिक विधियों को सम्पन्न करना चाहिए। जिसमें श्रीहरि को अर्पित उद्वासनादि उपचार होते हैं। इसमें अग्नि तथा परम आकाश में स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं (क्रमशः) ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के लिये और वैश्य के लिये समुद्र में स्थित तथा शुद्र के लिये पृथ्वी पर स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं॥३२-३३॥ इत्थं वर्णाश्रमादीनां नित्यनैमित्तिकादिकम् । विहितं कर्म सकलं विष्णोराराधनं परम् ॥३४॥ इस प्रकार वर्ण तथा आश्रम आदि के नित्य एवं वैमित्रिक सम्पूर्ण विहित कर्म श्री विष्णु की परमाराधना है॥३४॥ निबोधत महाप्राज्ञस्तदेतदखिलं पुनः । वृत्त्याख्यस्य तरोरेव सुदृढं मूलबन्धनम् ॥३५॥ हे मुनिगण! इस सभी को निश्चित रूप में आपको समझाना आवश्यक है जो कि वृत्तिनामक वृक्ष के सुदृढ़ मूलबन्ध के रूप में सदा अव स्थित है॥३५॥ त्यागेन कर्मणां स्वस्य निषिद्धकरणेन च । आज्ञातिक्रमणं यत् तन्मूलबन्धोपघातकम् ॥३६॥ तथा अपने विहित कर्मों के परित्याग से तथा कर्मों के आचरण करने से जो श्रीहरि की आज्ञा का अतिक्रमण होता है वह वृत्तिवृक्ष के मूल बन्ध का उपघात करनेवाला होता है॥३६॥