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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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❖ हिन्दी निरुक्त ❖
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❧ नैगम काण्ड ❧
❄ भूमिका ❄
—❖—
समाम्नाय (निघण्टु) शास्त्र में नैघण्टुक, नैगम और
दैवत ये तीन काण्ड हैं। इनमें "गौः" से "अपारे" पर्यन्त
शब्दों का संग्रह रूप जो प्रथम तीन अध्यायों के परिमाण में
नैघण्टुक काण्ड है, उसकी व्याख्या उसके भाष्य निरुक्त में
विशेष रूपसे द्वितीय अध्यायके द्वितीय पाद् से तृतीय अध्याय
की समाप्ति तक पूरी होगई है। अब नैगम काण्ड, जो "जहा"
शब्द से "ऋबीसम्" शब्द पर्यन्त शब्दों का संग्रह रूप समा-
म्नाय का चतुर्थ अध्याय है, उसकी व्याख्या निरुक्त के चतुर्थ,
पञ्चम और षष्ठ (६ठे) अध्याय में होगी। इस काण्ड में
"जहा" (६२) "सस्निम्" (८४) और "आशुशुक्षाणिः" (१३२)
ये तीन खण्ड अर्थात् कुल दो सौ अठत्तर (२७८) शब्द हैं, उन
में से प्रथम "जहा" खण्ड के बासठ (६२) शब्दों की व्याख्या
क्रम से इस निरुक्त के चतुर्थ अध्याय में होगी।
जैसे अमरकोश के प्रथम काण्ड में स्वर्ग आदि एक एक
पदार्थके अनेक अनेक नाम हैं, उसी प्रकार समाम्नाय के प्रथम
काण्ड में पृथिवी और हिरण्य आदि एक एक पदार्थ के अनेक

हिन्दी निरुक्त ( २ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
अनेक नाम हैं । एवम् अमरकोश के नानार्थ वर्ग में 'नाक' 'लोक'
आदि शब्दोंके जिस प्रकार आकाश, स्वर्ग 'लोक' 'भुवन' आदि
अनेक अनेक अर्थ बताये हैं, उसी प्रकार इस नैगम काण्ड में
एक एक शब्द के अनेक अनेक अर्थ बताए गए हैं, तथा ऐसे
शब्द, जिनके संस्कार आदि की प्रतीति नहीं होती, उनके
संस्कार आदि का अवगम भी कराया गया है । सुतराम् इस
काण्ड में अनवगत और अनेकार्थ शब्द व्याख्येय हैं । अवगत
नाम जाने हुए और अनवगत नाम नहीं जाने हुए का है ।
किन्तु इस प्रकरण में अनवगत शब्द से वे शब्द लिये गए हैं,
जिनके प्रकृति, (धातु) प्रत्यय, जाति आदि शब्द-धर्मों का अव-
गामात्र से परिज्ञान नहीं होता । भगवद्दुर्गाचार्य ने इन अन-
वगत शब्दोंके भेदोंकी एक सूची भी 'शिताम' शब्दकी टीकामें दी
है । जिस शब्द में जिस धर्म की प्रतीति नहीं होती, वह उस
धर्म से अनवगत कहा जाता है । जैसे-संस्कार (प्रकृति प्रत्यय
आदि) की प्रतीति नहीं, तो संस्कारानवगत और जाति की
प्रतीति नहीं, तो जात्यनवगत इत्यादि ।
अनवगत भेदों की उदाहरण सहित सूची ।
अनवगत भेद । उदाहरण । व्याख्या
(१) पदजात्यनवगत । "स्व" नाम, या निपात?
(२) अभिधेयानवगत । "शिताम" बाहु, यो यकृत् आदि ?
(३) स्वरानवगत । "वनेनवायो" 'वने' 'न' का स्वर या
'वनेन' का ?
(४) संस्कारानवगत । "ईशान्तासः" क्या धातु, और क्या प्रत्यय?
(५) गुणानवगत । "करूलती" किसका गुण (विशेषण) ?
(६) विभागानवगत । "मेहना" "मेहना" या "मे-इह-ना"
( नास्ति ) !

हिन्दी निरुक्त ( ३ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
अनवगत भेद उदाहरण व्याख्या
(७) क्रमानवगत । “उपरमध्वं मे वचसे” देखो-नि० अ० २
पा०७ खं० ३ 'उप' मन्त्र के बीच से उठाकर आदि में
जोड़ा गया है ।
(८) विक्षेपानवगत । “द्यावामः पृथिवी”
(९) अध्याहारानवगत । “दानमनसो नो मनुष्यान् ”
(१०) व्यवधानानावगत । “बायुश्चनियुत्वान् ”
इसके अतिरिक्त कहीं एक पदके दो पद कर लिये जाते हैं,
जैसे-“ पुरुषादः ” का ‘ पुरुषानेदनाय’। कहीं दो पद भी
एक पद कर लिये जाते हैं,जैसे-“गर्भनिधानीं सनितुः” लोक में-
“पश्यतो हरः” । एवम् आख्यात भी नाम कर लिया जाता है,
जैसे-“ सर्वाणीन्द्रस्य धनानि विभक्ष्यमाणाः” लोक में-“पचत-
भृज्जता” “खादतमंदता” इत्यादि । कहीं नाम भी आख्यात
हो जाता है । जैसे-“सोमो अदाः” ( अ०५ पा० १ खं० ३ )
अश्नोति इत्यादि । इसी प्रकार मन्त्रों में शब्दों और अर्थों
में अनेक प्रकार का संकर या मेल है, उसे वहां जैसा देखें वैसा
करे । क्योंकि-वेदमें दृष्ट (देखे हुए ) के अनुसार विधि होती
है। प्रयोजन यह है, कि-वैदिक शब्दों की काट छाट की
विधि को वैदिक शब्द ही बताते हैं, उनके अनुशासन की
विधि किसी लौकिक व्याकरण के अधीन नहीं है ।
इस अध्याय में जिस जहा खण्डके बासठ (६२) शब्दोंकी
व्याख्या की जावेगी, उनमें ( १ ) आमि, ( २ ) रजः, ( ३ )
हेरः, ( ४ ) दयतिः, ( ५ ) ष्यन्तः ये पाँच ( ५ ) शब्द केवल
अनेकार्थ हैं । ( १ ) नूचित्, ( २ ) नूच, ( ३ ) ऋधक ये तीन
( ३ ) शब्द निपात, एवम् अनेकार्थ है । यद्यपि इनके पाठ
की इस गण में आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि-निपातों में

हिन्दी निरुक्त ( ४ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
संस्कार की विचारणा नहीं है और उनकी स्वतन्त्र व्याख्या भी
प्रथमाध्याय के द्वितीय पाद में होचुकी है, तथापि इस प्रकरण
में अनेकार्थ शब्द व्याख्येय हैं, उनकी समानता से यहां पर
दिखा दिये गए हैं । ( १ ) मेहना, ( २ ) एरिरे, ये दो शब्द
विभागानवत हैं । ( १ ) जरते, ( २ ) धयसे ( ३ ) वियुते ये
तीन शब्द अर्थानवगत हैं । ( १ ) अस्याः ( २ ) अस्य, ये दो
शब्द स्वरानवगत हैं । ( १ ) गौः, ( २ ) गातुः, इन दो पदों
की व्याख्या पहिले आचुकी । ( १ ) नसन्त, ( २ ) परितक्म्या
( ३ ) शिप्रे इन तीन पदों की व्याख्या आगे होगी, और शेष
इकतालीस (४१) शब्द सब अनवगत संस्कार हैं ।
अध्यायके अन्तमें मूल (समाम्नाय) शब्दों और प्रासंगिक
शब्दों की सूचिएं भी दी जावेंगी, जिनसे इन शब्दों के अर्थ
और निगम भी जाने जा सकेंगे ॥
शब्द समाधि ।
शब्द समाधि उसे कहते हैं, जिस में उसके प्रकृति (धातु)
प्रत्यय ( विभक्ति और वचन आदि ) स्पष्ट प्रतीत होते हों,
और वह किसी ऐसे शब्दके अक्षरों व अर्थ से समानता रखता
हो, जिसके प्रकृति और प्रत्यय आदि स्पष्ट प्रतीत न होते
हों अर्थात् परोक्षवृत्ति या अतिपरोक्षवृत्ति शब्द । प्रयोजन यह
है कि-इस प्रकरणमें जितने मूल शब्द हैं, वे आपस में कोई
किसी से पर्यायता नहीं रखते, इस लिये उनकी व्याख्या में
शब्द समाधि ही एक उत्तम उपाय है, जिसके द्वारा सहजमें
निश्चय हो जाता है, कि-इस शब्द की सृष्टि इसी प्रकार है,
और इसका यह अर्थ होना उचित है । जैसे-'जहा' की शब्द
समाधि 'जघान' है । जिसके द्वारा प्रतीत होता है कि-'जहा'

हिन्दी निरुक्त ( ५ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
में 'इन्' ( अदा०प० ) धातु और लिट् के प्रथमका एक वचन
है। और 'मध्या' की 'मध्ये' इत्यादि ।
शब्द समाधि कब और किस प्रकार देना चाहिये ?
जिस मन्त्र का परोक्षवृत्ति शब्द हो, उस मन्त्र की अर्थ
परिज्ञान के लिये देखना चाहिये । जब उसके अन्य शब्दों का
अर्थ और संगति प्रतीत होजावै वहां किसी एक शब्द के सं-
स्कार या प्रकृति प्रत्यय आदि की प्रतीति नहीं, तो उस काल
में जितना अर्थ वाक्य में अपूर्ण और एक शब्दगम्य हो उसे
उस गूढ शब्द का अर्थ मानना चाहिए। अर्थ निश्चय के अन-
न्तर ही इस शब्द समाधि का उपयोग होता है, जिससे कि-
शिष्य को लाभ है।
एक काण्ड का विषय दूसरे काण्ड में ।
जिस प्रकार दो तलघ्याओं का जल एक नालीके द्वारा
मिलता हों, उसी प्रकार प्रथम दो काण्डों का विषय आपसमें
मिल जाता है। प्रथम काण्डमें एक एक अर्थ में अनेक अनेक
शब्द दिखाये हैं और दूसरे में एक एक शब्द स्वतन्त्र २ अर्थों
में संग्रह किये हैं, किन्तु दो या अधिक शब्द एक अर्थमें नहीं।
यही उनका विषय भेद है। तो भी शब्द स्वभाव उन दोनों
काण्डों के विषयको मिला देता है। अर्थात् जो ही शब्द पर-
स्पर की अपेक्षा भिन्न अर्थों को कहते हैं, वेही किसी एक अर्थ
को कहने लगते हैं। और जो एक अर्थको कहते हैं, वेही
आवश्यकतावश से भिन्न २ अर्थों को कहने लगते हैं। इस
प्रगति के अनुसार जो ही शब्द भिन्नार्थकता की दशामें नैगम
( ऐकपदिक ) काण्ड में आजाते हैं, वेही समानार्थकता के
अधीन नैघण्टुक काण्डमें चले आते हैं। यही दोनों काण्डोंका
विषय संकर ( मेल ) है।

हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
शब्दों की एकार्थता और भिन्नार्थता।
जो लुढकता है, वह ढलान की ओर चलता भी है। जो
उछैलता है, वह नीचे से ऊपर को चलता भी है जो गिरता है,
वह ऊपर से नीचे को चलता भी है। जो सरकता है, वह धीरे २
एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर चलता भी है। इस प्रकार
एक ही क्रिया दो रूपों में दिखाई देती है, इस कारण से जब
कोई किसी एक विशेष क्रिया को किसी शब्द से कहेगा,
तो वह शब्द अवश्यं दो क्रियाओं की भी बोधन करेगा। इसके
लिये फिर 'लुढकता है' आदि उक्त क्रियाओं पर ध्यान दी-
जिये, जिनके प्रयोग से 'लुढकना' और 'चलना' दोनों क्रियायें
प्रतीत होती हैं। प्रयोजन? जब इनका चलन अर्थ ही लेते हैं,
तो ये अनेक शब्द एक अर्थ के वाचक होकर नैघण्टुक काण्डमें
आजाते हैं, और जब विशेष २ अर्थों को कहने लगते हैं, तो
भिन्नार्थक होकर नैगम काण्ड में चले आते हैं। इसी रहस्य के
अनुसार भिन्नार्थकता के कारण नैगम काण्ड के विषय होने
पर भी 'कसति' 'लोठते' 'श्च्योतते' इत्यादि बहुत से धातु
( निघ० अ० २ खं० १४ ) में गमनार्थक एक सौ बाईस ( १२२ )
धातुओं के मध्य में पढे गए हैं, जिससे उनका सामान्य रूपसे
गमन-यह एक ही अर्थ होता है, तो भी प्रसिद्धि के अनुरोधसे
पृथक् २ द्रव्यों की क्रिया के वाचक ही समझने चाहियें। जैसे-
जो पुरुष कमर को ऊंची करके चलता है, वही 'कसति'-ऐसे
कहा जाता है किन्तु अन्य नहीं,-जो खड़ा २ चलता है। जो
ही कोई अचेतन लोहा आदि वा अन्य चेतन पुरुष आदि
इच्छा के बिना ढलान में लुढकता है, वही 'लोटते' ऐसे कहा
जाता है, किन्तु अन्य नहीं और ऐसे ही जब कोई द्रव द्रव्य
या पिघली हुई वस्तु झरती है, तब वही 'श्च्योतते' ऐसे कही

हिन्दी निरुक्त ( ७ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
जाती है, किन्तु अन्य नहीं। इस प्रकार गमन अर्थ वाले धा-
तुओं की एकार्थता होने पर भी प्रसिद्ध अर्थ में सामर्थ्य रखने
के कारण उन धातुओं का गमन विशेषों में योग्यतानुसार नि-
वेश जानना चाहिये, तथा ऐकपदिक भी समझना चाहिये।
ध्यान रहे कि-एक स्थान से दूसरे स्थान में प्राप्ति जो
चलन से होती है, वह सब गतियों का एकसा कार्य है, इसी
से उन सबकी एकार्थता कही है। क्यों कि-‘सामान्य अर्थ के
वाचक शब्द कहीं विशेष अर्थ के वाचक होजाते हैं, और वि-
शेष अर्थ के वाचक कहीं सामान्य अर्थ के वाचक।
नैगम काण्ड की व्याख्या का स्वरूप।
“तत्वं पर्यायशब्देन व्युत्पत्तिश्च द्वयोरपि
निगमो निर्णयश्चेति व्याख्येयं नैगमंपदे”
अर्थात् पर्याय शब्द से तत्व (अर्थ) करना। मूलशब्द और
उसके पर्याय दोनों की व्युत्पत्ति करना। निगम देना। और
उसका निर्णय करना। इसके अतिरिक्त ‘दयति’ ‘अकूपार’
आदि पदों को स्थान बना कर उनके उपदया, दान, हिंसा
आदि अनेक अर्थों को बताना, तथा इन उपदया, दान, हिंसा
आदि अनेक अर्थों का एक शब्द से वाच्य सिद्ध करना ऐसी
व्याख्या भी इस काण्ड में होगी।
दो व्याख्याएं।
इस कांड में संक्षेप से दो व्याख्यायें हैं। एक-नहीं प्रतीत
होते हुये अर्थ को पर्याय शब्द देकर विभाग पूर्वक प्रतिपादन
करना। और दूसरी शब्दकी व्युत्पत्ति करना। पहिली व्याख्या,
का प्रयोजन अर्थ का परिज्ञान है, और दूसरी का शब्द-परि-
ज्ञान। यह दोनों प्रकार की व्याख्या इस नैगम काण्ड में
यथासंभव दी जावेगी।

हिन्दी निरुक्त ( ८ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
ऐकपदिक नाम का प्रयोजन ।
पहिले काण्ड में एक एक अर्थ के वाचक पद समूह के
समूह पढे गए हैं, और इस प्रकरण में एक एक अर्थ का ज्ञापक
एक एक ही पद रखा गया है, जैसे-'जहा' 'निधा' इत्यादि,
इसी से इस काण्ड का नाम 'ऐकपदिक' (एक एक पद से रचित)
पूर्वाचार्य्यं ने धरा है।
मन्त्रों में पदों का अध्याहार ।
भाष्यकार यास्क मुनि मन्त्रों की व्याख्या में पदों को
अध्याहार करते ( ऊपर से लेते) हैं । जैसे-(नि० अ० ४ पा० १
खं० २) “कोनुमर्य्या” मन्त्रमें “को अस्मदीषते” की व्याख्या में
“कः अस्मद् भीतः पलायते' यहां 'भीतः' पद का अध्याहार
किया है । एवम् (नि० अ० ४ पा० १ खं० ६-) “संमातपन्ति”
मन्त्र में “शिरश्ना व्यदन्ति” वाक्यमें 'सूत्राणि' पद, (नि० अ० ४
पा० १ खं० ८-) “मरुत्वां इन्द्र” मन्त्र में “वृषभः” की व्याख्या
में 'अपाम्' पद, और “मदाय” की व्याख्या में 'जैत्राय' पद,
(नि० अ० ४ पा० २ खं० ४-) “इन्द्रेण संहिदृक्षसे” मन्त्र में
“अभिभ्युषा” की व्याख्या में 'गणेन' पद, (नि० अ० ४ पा० ३
खं०५) “अथानः शंयोः” मन्त्र में “शंयोः” पदकी व्याख्या में
'रोगाणाम्' 'भयानाम्' ये दो पद अध्याहार किये हैं । इस से
यह सिद्ध हुआ कि-मन्त्र में अर्थ के अविरोधि पद अध्याहार
करने चाहिएं । यह आवश्यक भी है । क्यों कि-मन्त्रोंमें प्रायः
अधूरे वाक्य बहुत हैं, यदि उन में ऐसा नहीं किया जायगा, तो
उनकी अर्थवत्ता ही न रहेगी ॥
समाम्नाय और निरुक्त का एक कर्त्ता
(प्रश्नः) “विद्याम तस्य” (नि० अ०४ पा०३ खं०२) इस मन्त्र

हिन्दी निरुक्त ( ९ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
में 'अकूपारस्य' 'दावने' इन दोनों पदों का इसी अनुक्रम से
पाठ है, और समाम्नाय में 'दावने' (३२) 'अकूपारस्य, (३३)
इस प्रकार मन्त्रपाठ के विपरीत पाठ है। इससे जाना जाता
है कि-अन्य ही ऋषियोंने समाम्नायका समाम्नान (विरचन)
किया है, और अन्य ही यह भाष्यकार है। क्यों कि यदि एक
ही पुरुष समाम्नान और भाष्य को करता, तो प्रयोजन के
विना ही एक मन्त्र-स्थ दो पदों के पाठ क्रम को न बदलता ।
(उत्तर-) समाम्नाय में जो शब्द पढे हुए हैं; वे किसी मन्त्रार्थों
के अनुरोध से नहीं पढे गये हैं, किन्तु, स्वतन्त्रतासे सब पठित
हैं, इस लिये उन शब्दों में संयोगवशात् दो पद एक मन्त्र में
आगए और उन को भाष्यकार मन्त्रोक्त क्रम से ही व्याख्या
करते हैं, इस से दोनों ग्रन्थों के एक आचार्य होने में भी कोई
दोष नहीं है। भगवद्दुर्गाचार्य का यही समाधान पञ्चम अध्याय
में 'वाजपस्त्यम् ( ४६ ) वाजगन्ध्यम् ( ५० ) इन दो शब्दों
का भी हो सकता है।
२

हिन्दी निरुक्त ( १० ) ४ अ० १ पा० १ ख०
इस अध्याय के निघण्टुस्थ शब्दों की निरुक्तस्थ संक्षिप्त व्याख्या

निघण्टु-स्थ सं०अनेकार्थतत्व (अर्थ) अवगमनिगमः
४६जामिः (४)अतिरिक्त नाम। वालियाः। भगिनी।<br>असमानजातीयावा (पा० ३ख०४)“यत्रजामयः कृणवन्नजामि”
३६रजः (२)रजतेः। ज्योतिः। उदकम्। लोकाः।<br>असृगहनी। (पा० ३ख०३)
४०हरः (३)हरतेः। ज्योतिः। उदकं। लोकाश्च<br>(पा = ३ख०३)“अग्नेयत्तेहरः”
२६द्यतिः (१)उपदाया दान विभाग दहन हिं-<br>सार्थः। (पा० ३ख० १)(१) “नवेनपूर्वद्दयमानानाः” । २।३ “द्यएतच्छद्<br>विद्यते” (४) “दुर्वर्त्त भीमोद्यते” (५)<br>“विद्दुद्द्युद्द्यमानौविशञ्चन्” ।
४२व्यन्तः (४)(अनेकार्थधातुप्रकृतिः) (पा० ३<br>ख०३)“पदेषुदेवस्य नमसा व्यन्तः” ।

निपात

हिन्दी निरुक्त ( ११ ) ४ अ० १ पा० १ ख०
३० नूचित् } [अनेकार्थत्वादिह समाम्नातः
निपातानां संस्कारोनास्ति ।]
३१ नून } पुरातनवयोरर्थयोः । (पा० ३ ख० १)
६० ऋधक् पृथक् । (पा० ४ ख० ४) "ऋधगया ऋधगुताशमिष्ठाः"
विभागानवगत
४ मेहना मंहनीयम् । मे इह न अस्ति । "यदिन्द्रचित्र मेहना"
(पा० १ ख० ४)
५० एरिरे आ-ईरिरे। 'ईरितिः' (अदा०आ०) उ- "यमेरिरे भृगवः"
पसृष्टोऽभ्यस्तः। (पा० ४ ख० २)
अर्थानवगत
५२ जरते स्तौति । (पा० ४ ख० ३) "इन्धान एनं जरते स्वाधीः"
५८ चयसे चातयसि । (पा० ४ ख० ४)
५६ वियुते द्यावापृथिव्यौ । (पा० ४ ख० ४) "सामान्या वियुते दूरे"
स्वरानवगत
६१ अस्याः अस्यै । (पा० ४ ख० ४) "अस्या उषसः"
६२ अस्य 'अस्याः' इत्येतेन व्याख्यातम् । "अस्य वामस्य पलितस्य"
(पा० ४ ख० ४)

हिन्दी निरुक्त ( १२ ) ४ अ० १ पा० १ ख०

निघण्टु-स्थ सं०अनेकार्थतत्व (अर्थ) अवगमनिगमः
व्याख्यात
५४गौःव्याख्यातः [नि०अ०२पा०२ख० १] (पा०४ख०३)“अत्राहगोरमन्वत”
५५गातुःव्याख्यातः । (पा०४ख०४)
व्याख्यास्यमान
११शिप्रिहनूनासिके । (पा०२ख०२)
२२नसन्तद्वादशाध्याये । (पा०२ख०७)
२७परितक्म्याषोडशाध्याये । (पा०ःख०८)
अर्थसंस्कारोभयानवगत और अनैकार्थ
३शितामदोः (बाहुः) । योनिः, शाकपूणेः। श्यामः, तटीकेः श्वेतमांसं, गालवस्य ।

हिन्दी निरुक्त ( १३ ) ४ अ० १ पा० १ खं०

संस्काराननवगत
१ जहा | जघान । [पा० १ खं० १] | “जहा को अस्मद्दोषिते',
२ निधा | पाश्या । यन्निनिधीयते सा नि- | “समुष्यस्मान्निधयेव बद्धान्”
| धा । [पा० १ खं० २] |
५ दमूनाः | दममनाः । दान्तमनावा । दान- | “जुष्टो दमूनाः ”
| मनावा । [पा० १ खं० ३] |
६ मषः | मशिकाः । (बहुवचनम्) (मद्- | “मषो न शिरना व्यदन्ति ।”
| मषी । मषः ।) |
७ इषिरः | ईषणवान् । एषणवान् । | “इषिरेण ते मनसा ”
| (पा० ६ खं० ७) |
८ कुरुतम | कुरुत । 'न' इति अनर्थकः । |
| “अनर्थका उपजना भवन्ति” । |
९ जठरम् | उदरम् । जग्धमस्मिन् ध्रियते | “आसिञ्चस्वजठरे” ।
| धीयते वा । (पा० १ खं० ७) |
१० तितउ | परिपवनं भवति । ततवद्वा । तुन्न- | “सक्तुमिव तितउना”
| वद्वा । तिलमात्रतुन्नमितिवा । |
१२ सध्या | सद्ध्ये । (पा० २ खं० ३१) | “सध्या कत्तौर्विवतं संजभार” ।

हिन्दी निरुक्त ( १४ ) ५ अ० १ पा० १ खं०

निघण्टु-स्थ सं०अनेकार्थतत्व (अर्थ) अवगमनिगमः
१३मन्दूमदयितृ । मन्दना इत्येके।<br>(शब्दसमाप्तौ) [पा० २ खं० ४]" मन्दू समानवर्चसा"
१४हेर्मोन्तसःसम्भीरित्तान्तः। पृथुवन्तावा ।<br>(शब्द समाधौ) [पा० २ खं० ५]" हेर्मोन्तसः"
१५कायमानःक्रोयमानः। कामयमानो वा ।<br>[पा० २ खं० ६]"कायमानो वना त्वम् "
१६लोधम्लुब्धम् ।<br>(पा० २ खं० ६)"लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः"
१७शीरम्(अग्निः ।) अनुशयिनम् आशयिनम् वा । (पा० २ खं० ६)"शीरं पावकशोचिषम् "
१८विद्रधेविदे । (पदं अनेकार्थम् ।)<br>(पा० २ खं० ७)"कनीनकेवविद्रधे "
१९दृपदेद्रुममये । (पादुके)<br>(पा० २ खं० ७)"नवेद्रुपदे अर्भके"
२०त्वतीर्थम् । तूर्णामतद् प्रायन्ति इति<br>शब्द समाधिः । (पा० २ खं०७)

हिन्दी निरुक्त ( १५ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
२१ नंसन्ते नमन्ते (पा०२ ख०२) | “विवस्वते सुवित्रं संसन्ते मरुतः”
२२ आहनसः आहननवन्तः। (पा०२ खं०७) | “एतेमद्वा आहनसः”
२४ अस्रसत् अद्रुसादिती। अद्यसानिनीवा। | “अश्वसन्न ससतो बोधयन्ती ।”
(पा०२ खं० ८)
२५ इषिभ्यः ईषणिानः। एषणिानः। ऋषीवि- | “ते वाशी मन्त इषिभ्य
नोवा। (पा० २ खं० ८)
२६ वाहः स्तोत्रम् । (पदं अनेकार्थम्)। | ‘वाहः कृणवाव जुष्टम्”
स्तोमएवहि देवानां वोढाभवति
२८ सुविते सुइते । सूते। (शब्द समाधौ) | “सुविते माधाः”
(अनेकार्थच) (पा० ३ खं०१)
३२ दावने दानस्य । (पा० ३ खं० २) | “वयमकूपारस्य दावने”
३३ अकूपारस्य अकूपारस्स्य । अकूपारः,आदि- | ‘वयमकूपारस्य”
त्यः, समुद्रः, कच्छपश्च ।
३४ शिशीते निश्यति । (पा० ३ खं०२) | “शिशीतेऽशृङ्गी रक्षसे विनिदत्त”
३५ सुतकेभिः सतकनैः । पदं अनेकार्थम् । | “अग्निः सुतुकः सुतकेभिरश्वैः”
(पा० ३ खं० ३)
३६ सुप्रावयाः सुप्रगमनः (इतिशब्दसमाधिः) | “सुप्रावया अस्मिन् यज्ञे”
(पा० ३ खं० २)

हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ४ अ० १ पा० १ सं०

निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्त्व (अर्थ) अवगम | निगमः

३७ | अप्रमायुवः | अप्रमाद्यन्तः । ( पा० ३ खं० ३ ) | "असत्रमायुवो रक्षितारो दिवे दिवे"
३८ | च्यवनः | च्यावनः । ( ऋषिः ) | "युवं च्यवानं सनयं यथा रथम्"
| | ( पा० ३ खं० ३ ) |
४१ | जहुरे | जहिरे । ( अनेकार्थधातुप्रकृ- | "जहुरे विचिंतयन्तः"
| | तिः ) ( पा० ३ खं० ३ ) |
४३ | क्राणाः | कुर्वाणाः । ( पा० ३ खं० ३ ) | "गीर्भिः क्राणा अनूषत" ।
४४ | वाशी | वाक् ( पदे अनेकार्थम् । ) | "वाशीभि स्ततक्षाश्मन्मयीभिः" ।
| | ( पा० ३ खं० ३ ) |
४५ | विषूच्यस्य | विष्वञ्चस्य । ( पा० ३ ख० ३) | "सशूद् दूर्यो विषूच्यस्य जन्तोः" ।
४७ | पिता | माता (पातवा) पालयितावा | "द्यौर्मे पिता" ।
| | जनयितावा । ( पा० ३ ख. ५ ) |
४८ | शंयोः | ( सुखंयोः ) ( पञ्चम्यन्तं वा ष- | "शशानः शंयोररपो दधात" ।
| | ष्ठ्यन्तं वा) शमनं च रोगाणां |
| | यावनं च भयानाम् । |
| | अथापिबार्हस्पत्य : । | "तच्छंयोरावृणीमहे"

हिन्दी निरुक्त ( १७ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
४६ | अदितिः | अदीना। देवमाता [पा०४खं०१] | "अदितिद्यौः" ।
५१ | जहुरिम् | जरस्थ् । [पा० ४ खं० ३] | "नीचायमानंजहुरिं न श्येनम्"
५२ | मन्दी. | मन्दतेः स्तुतिकर्मणः । [पा०४ खं० ३] | "प्रमन्दिने पितुमदर्चता वचः"
५६ | दंसयः | कर्माणि । [पा० ४ खं०४] | "कुत्साय मन्मन्नह्यश्व दंसयः" ।
५७ | तूताव | तुताव । [पा० ४ खं० ४] | "स तूताव" ।
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हिन्दी निरुक्त ( १८ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
चतुर्थाध्याय के निरुक्तस्थ कुछ प्रासंगिक शब्द
शब्द अर्थ
मर्त्याः । मनुष्यनाम मर्यादा वा । (खं० २)
मेथतिः । आक्रोशकर्मा ।
पाश्या । पाशसमूहः ।
वयः । वेर्बहुवचनम् ।
(सुपर्णाः) सुपतनाः ।
चत्तुः ख्यातेः । चष्टेर्वा ।
पूर्धि पूरय । देहि वा ।
पार्श्वम् पर्शु मयमङ्गं भवति ।
पर्शुः स्पृशतेः ।
पृष्ठम् स्पृशतेः ।
अङ्गम् अङ्गनात् । अञ्चनाद्वा
श्रोणिः श्रोणतेः
दोः द्रवतेः ।
श्यामम् श्यायतेः ।
यकृत् यथाकथाच कृत्यते ।
शितिः श्यतेः ।
मांसम् माननंवा । मानसंवा । मनोऽस्मिन् सीदति इतिवा
मेदः मेद्यतेः ।
अद्रिः आहणाति एतेन । अपिवा अत्तेः ।
राधः इतिधननाम । राध्नुवन्ति एतेन ।
उभौ समुब्धौ भवतः ।
दमः इति गृहनाम ।
मनः मनोतेः ।
अतिथिः अभ्यतितोगृहान् भवति ।
अभ्येति तिथिषु परगृहान इतिवा । गृहाणिश्चेतिवा

हिन्दी निरुक्त ( १९ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
प्रासंगिकशब्दाः।
शब्द अर्थ
दुरोणः इतिगृहनाम । दुरवा भवन्ति दुस्तर्पाः । भोजनानि
इतिवा धनानि इतिवा ।
सूचिकाः पुनर्मुष्कातेः ।
मूषः अपि, एतस्मादेव ।
त्रितः तीर्णतमो मेधया । अपिवा संख्यानामैव अभिप्रेतं
स्यात्-एकतो द्वितः त्रितःइतित्रयो बभूवुः। (खं०६)
वासराणि वेसराणि विवासनानि गमनानि-इतिवा । खं(७)
कर्त्तन
हन्तन } इति अनर्थका उपजनाः । ('न' अनर्थकः)
यातन
मरुत्वान् मरुद्भिस्तद्वान् । ( खं०८ )
वृषभः वर्षिता अपाम् ।
रणाय रमणीयाय ।
मदाय मदनीयाय ।
मधु सोमम् औपसिकम् । माद्यतेः (प्रथमपादःसमाप्तः )
द्वितीयः पादः
सक्तुः सचतेः । दुर्धावो भवति । कसतेर्वा स्याद्वि परीतस्य
विकसितो भवति । ( खं० २ )
धीराः प्रज्ञानवन्तः । ध्यानवन्तः ।
भद्रम् भगेनव्याख्यातम् । भजनीयंभूतानाम् । अभिद्रवणी-
यम् । भवद्दूरमयति इतिवा । भाजनवद्वा ।
लक्ष्मीः लाभाद् वा । लक्षणाद्वा । (लक्ष्यनाद्वा ) लाञ्छ-
नाद्वा । लषतेर्वा स्यात् प्रेप्साकर्मणः । लग्यतेर्वा-

हिन्दी निरुक्त (२०) ४ अ० १ पा० १ खं०
प्रासंगिकशब्दाः
शब्द। अर्थ
स्यात् आश्लेषकर्मणः । लज्जतेर्वा स्याद् अश्लाघा-
कर्मणः ।
हरितः आदित्यरश्मयः । (हरणाः) अश्वाः इति वा
वेसरम् अहः ।
रात्री रात्रीव, इतिवा उपमार्थे “यदत्रार्थाविरोधि
तत्प्रतिपत्तव्यम्” (खं० ३)
सिलिकमध्यमाः संसृतमध्यमाः। शीर्षमध्यमा वा । (खं०५)
शिरः (आदित्यः) यद्नुशेते सर्वाणि भूतानि । मध्ये वा
एषां तिष्ठति । इदमपि 'शिरः' एतस्मादेव । समा-
श्रितानि एतद् इन्द्रियाणि भवन्ति ।
शूरः शवतेर्गतिकर्मणः ।
दिव्याः दिविजोः ।
अत्याः अतनाः ।
हंसाः हन्तेः ।
श्रेणिः श्रयतेः ।
अज्मम् वाहिका (स्वर्गपथः)
कन्या कमनीया भवति । क्वैयं नेतव्या इति वा । कनते-
र्वा स्यात् कान्तिकर्मणः ।
दारु दृणातेर्वा । द्रुणातेर्वा ।
द्रु तस्मादेव ।
सुवास्तुः नदी । (खं० ७)
शुन्ध्युः शोधनात् । आदित्यः ) शकुनिः । आपश्च ।
वक्षः भासा अध्यूढम् । इदमपि 'वक्षः' एतस्मादेव ।
अध्यूढंकाये ।