निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
११२ अ० १ पा० ४ ख० ४ । भवति हि निष्पन्ने अभिव्याहारे योगपरीष्टिः,- प्रथनात् 'पृथिवी'-इत्याहुः । 'क एनाम् अप्रथयि- ष्यत् ? किमाधारश्च'-इति । अथ वै दर्शने पृथुः, अप्रथिता चेदपि अन्यैः ॥ ३ ॥ [ खं० ४ ] अथापि, एवं सर्वे एव दुष्टप्रवादा उपा- लभ्यन्ते । यथो एतत्—'पदेभ्यः पदेतराद्धान् संचस्कार' इति । यः अनन्विते अर्थे संचस्कार स तेन गर्ह्यः । सैषा पुरुषगर्हा । यथो एतत्— 'अपरस्माद् भावात् पूर्वस्य प्रदेशो नोपपद्यते' इति । पश्यामः पूर्वोत्पन्नानां सत्त्वानाम् अपर- स्माद् भावाद् नामधेय-प्रतिलम्भम्, एकेषां, न एके षाम् । यथा—'बिल्ववादः' 'लम्बचूडकः'-इति ॥ ४ ॥ इति प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ १, ४ ॥ शाकटायनके पक्षसे इन दोषोंका प्रतिसमाधान । (शाकटायन) जिस प्रकारसे गार्ग्य मुनिने नामोंके आख्यात- जत्वके प्रतिषेधमें असमर्थ हेतु दिये हैं, उसी प्रकार हम प्रतिवक्ताके रूपसे प्रति-समाधान करेंगे । १म, प्रतिसमाधान । जोकि-तुमने डित्थ, डवित्थ, आदि शब्दोंके उदाहरणोंसे दिखाया है कि-बहुत ऐसे शब्द हैं, जिनमें
हिन्दीनिरुक्त । ११३ व्याकरणकी रीतिसे स्वर, संस्कार तथा धातुकी, कल्पना नहीं हो सकती, इससे “सब शब्द आख्यातज नहीं।” किन्तु हम कहते हैं कि-“सभी नाम क्रियासे उत्पन्न हैं" इससे तुमने जो हमें उपालम्भ दिया है, अयुक्त है। प्रयोजन यह है कि- नामोंमें क्रियावाचक धातुओंकी कल्पना करके जहां तक गम्य हो उनके आधार पर स्वर तथा संस्कारोंका अनुशासन करना चाहिए। क्योंकि-लक्षणों (व्याकरणके नियमों) की गति व्यापक है, यह शब्दका अपराध नहीं और न हमारा ही है, किन्तु यह आपकी मन्द शिक्षाका अपराध है, जिसके कारण विद्यमान भी स्वर- संस्कारोंको क्रियावाचक धातुमें तुम अनुविधान नहीं कर सकते, इससे तुम फिर व्याकरण पढ़ो, जबतक तुम्हें अनुविधानकी शक्ति हो । भाव यह है कि-व्याकरणोंमें धातु, पाठमात्रसे ही पूरे नहीं किये हैं, किन्तु उनके अतिरिक्त अन्य बहुत धातु हैं, जिनमें कोई सौत्र या सूत्रपठित, कोई तु, च, वा शब्दोंसे ज्ञातव्य, कोई अध्या- हारसे गम्य एवम् कोई पठित धातुओंके विभागसे जानने योग्य हैं। भिन्न भिन्न व्याकरणके अविरोध स्थलोंमें जो कोई विधि किसी व्याकरण हीमें कही है। ये सभी बातें शब्दके प्रयोग करनेवालेको प्रयोगकालमें उपसंहार या समेटना चाहिये। इसी रीतिसे यहांपर सभी लक्षणोंकी सब संस्कारोंकी सिद्धिके लिये अपेक्षा करनी होगी। अतः हे गार्ग्य ! तुम फिर शिक्षाका लाभ करो, जबतक तुम्हें सब शब्दोंके अखिल संस्कारोंके अनुविधानकी शक्ति हो । २रे प्रश्नका उत्तर। तुम भी देखते हो और हम भी देखते हैं,--कि समान कर्मके करनेवालोंमें कोई उस क्रियावाले नामसे बोले जाते हैं, और कोई नहीं। जैसे-तक्षा, परिव्राजक, जीवन, भूमिज । कोई मनुष्य तक्षण (लकड़ीका छोलना) क्रियासे
११४ अ० १ पा० ४ व० ४ । तक्षा कहा जाता है, और कोई तक्षण करनेसे भी 'तक्षा' (बढ़ई) नहीं कहाता । वे पूछें कि-क्या कारण है ? तो हम कहेंगे कि- लोकसे पूछो । और उसीको उपालम्भ करो । मैंने ऐसा नियम नहीं किया है । और यह कि-लोकमें बहुत मनुष्य समान कर्म करते हैं किन्तु उनमें से कोई सफल होते हैं और कोई निष्फल । वेदादिकोंमें कोई शब्द अन्य अर्थोंके होते हुए भी एक अर्थसे ही संयुक्त होते हैं । यह भी ठीक ही है, क्योंकि-शब्दोंकी अवस्थिति स्वभावसे ही उनकी अनेक क्रियाओंसे उत्पत्ति होनेपर भी किसी क्रिया- पर अवलम्बित होती है । अथवा ऐसा नियम क्रियाके अतिशय पर होता है, जो जिस कामको अधिकतासे करता है, उसमें अन्य क्रियाओंके होते हुए भी उसी क्रियासे नाम पड़ता है। यहां यह समाधान है कि-अथवा हम नहीं कहते कि-"जो जिस कालमे जहां तक्षण करता है, वही तक्षा है" बल्कि "जो जिस कालमे जहां तक्षा है, वही तक्षा है" । यह लक्षण नियत नहीं है, जहां इच्छा हो वहीं इस नियमको काममें ला सकते हैं । अर्थात् और पदार्थोंमें और भी क्रिया नियततर हैं, जिनके कारण उनके अन्य नाम पड़ते हैं। तक्षा तो विशेषकर तक्षण ही करता है, अन्योंमें वह प्रधानतासे नहीं किन्तु और और ही क्रिया प्रधान हैं तक्षण प्रसङ्गात् होता है। जीवन नाम इक्षुरस अथवा कोई शाककी जाति है । भूमिज नाम अङ्गारक या मङ्गल ग्रहका है । इनकी शक्तिका विचार भी तक्षाके समान है। ३ य प्रश्नका उत्तर भी द्वितीय उत्तरसे हो गया । देखते हैं कि- अनेक क्रिया-युक्त पदार्थोंके नाम एक क्रिया पर ही होते हैं । जैसे- तक्षा, परिव्राजक, ये ही उदाहरण हैं। क्योंकि तक्षा अन्य कर्मों को
हिन्दी निरुक्त । ११५ भी करता है, किन्तु उन क्रियाओंसे उसके नाम नहीं होते । इससे अनेकोंका एक क्रियाके सम्बन्धसे एक नाम, तथा एकके अनेक क्रियाओंके सम्बन्धसे अनेक नाम, ये दोनों बातें अयुक्त हैं। क्योंकि लोकमें शब्दोंका नियम स्वभावसे ही व्यवस्थित है। इससे व्यव- हारको अप्रसिद्धिका दोष नहीं है। इससे जो तुमने कहा कि-व्यव- हारकी अप्रसिद्धि दोषसे "सब नाम आख्यातज नहीं" यह अयुक्त है। ४र्थ प्रतिसमाधान—तुमने कहा कि—"ऐसे ही सब पदार्थों के नाम होने चाहिये जिनसे उनकी क्रिया प्रतीत होती रहे" किन्तु यह शब्दका स्वभाव है,—जोकि—"सब वैसे हो बोले जाते हैं, जैसे जैसे प्रतीतार्थ होते है" उसमें मैं आपका अपराधी नहीं बनता, और न शास्त्र ही । क्योंकि जिस प्रकार शब्द पहलेसे अवस्थित हैं, उन्हींका अभ्याख्यान या अनुवाद है, मैं शब्दोंका बनानेवाला नहीं। जो इन शब्दोंके प्रयोग करनेवाले हैं, उन्हींको चिढ़ाओ अथवा निराकरण, करो, यदि कर सको। प्रश्न हो कि—क्यो लोकमें कुछ ही शब्द प्रतीतार्थ बोले जाते हैं ? इसका भी उत्तर यही है कि--"यह शब्दोंका स्वभाव है,—कोई प्रतीतार्थ और कोई अप्रतीतार्थ" उनको भी शास्त्रसे प्रतीतार्थ हो करना चाहिये। यही शास्त्रका प्रयोजन या उसमें शास्त्रपना है, जो अप्रतीतार्थ नामोंको धातु—प्रत्यय आदिके विभागसे प्रतीतार्थ करदे। इससे कुछ लोकमें प्रतीतक्रिय हैं और कुछ को शास्त्र कर देता है। क्योंकि—शास्त्रके जितने लक्षण हैं वे सब रूढि शब्दोंमें उनके अनुसार ही चलते हैं, जैसा उनमें देखते हैं, वैसाही कार्य्य करते हैं। रूढि स्थलमें शब्दकी प्रधानता और लक्षणकी गौणता रहती है। प्रतीतक्रिय शब्दोंमें लक्षणको प्रधानता और शब्दकी गौणता रहती है।
११६ अ० १ पा० ४ ख० ४ इसके अतिरिक्त यह भी है कि—केवल निरुक्त ही में रूढि शब्दोंको प्रतीतक्रिय.बनानेका अभ्यास नहीं किन्तु व्याकरणमें भी कुछ ऐसे शब्द कृदन्त आदि स्थलमें साधन किये गये हैं, जैसे— व्रतति, दमूनाः, जाट्यः, आटणारः जागरूकः, दर्विहोमी । व्रतति नाम वल्ली या लता । दमूनाः, दममनाः या दमनशील । जाट्य अटावान् । आटणार अटनशील । जागरूक जागरणशील । दर्वि- होमी दर्वी या चाटूसे होम करनेवाला । इसी प्रकारसे रूढि शब्द प्रतीतार्थ भी हो जाते हैं, यह शाकटायनका अभिप्राय है। इससे “सब नाम आख्यातज नहीं” यह पक्ष अयुक्त है। ५म प्रतिसमाधान—शब्दके प्रयोगके अनन्तर उसके धातु आदिके विचारका प्रश्न भी ठीक नहीं है, क्योंकि—सिद्ध पदके उच्चारणमें ही योग या शास्त्रके लक्षणकी परीक्षा होती है। क्योंकि-लक्षणके सामने जबतक लक्ष्य न हो कैसे उसकी परीक्षा हो सकती है। भाव यह है कि--जो लक्षण, शब्दोंको देखकर बने है, वे उनके होने पर ही अपना काम करेंगे, शब्दके व्याहरणसे पहिले उनका कोई व्यापार नहीं होता । जोकि-यह प्रश्न है कि—“यदि प्रथनसे ‘पृथिवी’ है तो इसे किसने प्रथन किया और किस आधार पर स्थित होकर ?” हम इसका यही उत्तर देते हैं, किसीने इसका प्रथन किया है, इससे यह पृथिवी है । दूसरा यह प्रश्न कि—“जब यह प्रथित नहीं थी, तो यह पृथिवी कैसे हुई ?” यद्यपि किसीने भी इसका प्रथन नहीं किया, किन्तु देखनेमे यह फैली हुई है, इसीसे यह पृथिवी है। तीसरा यह प्रश्न कि– किसने इसका प्रथन किया और किस आधार पर स्थित होकर ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि-अन्य प्रकारसे धातुका अर्थ संघटित नहीं होता, हम वैसाही निर्वचन करेंगे जैसे
विरोध न हो । इससे शाकटायनका अभिप्राय अविरुद्ध है यह सिद्ध हुआ । यदि पृथिवीके पृथुत्वको प्रत्यक्ष होने पर हमारा उपालम्भ किया जाता है, तो इसमें मेरा ही उपालम्भ नहीं बल्कि—सम्पूर्ण प्रत्यक्षवादोकी ही निन्दा हो जाती है । गार्ग्य मुनि प्रत्यक्षमें भी दोषारोप करते हैं, इस लिये यह अयुक्त है क्योंकि—इससे प्रत्यक्ष- की हानि है जोकि—सर्वथा अनिष्ट है अतः पृथुत्वके प्रत्यक्ष दर्शन से 'पृथिवी' कही जाती है यह ठीक है । ६ठा प्रतिसमाधान । अन्य पदोंके खण्डो (टुकड़ों) को लेकर अन्य पदोंकी व्युत्पत्ति आदिका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योंकि— जो पुरुष अनन्वित अर्थमें असम्बद्ध संस्कारसे शब्दोंका संस्कार करता है, वही पुरुष निन्दनीय है किन्तु शाकटायन आचार्य ऐसा नही करते, बल्कि—एक अभिधान (नाम) में जितने अर्थ होते है, उनके अनुकूल अनेक धातुओसे एक एक नामका संस्कार करते हैं, किन्तु मूढतासे नहीं । इस लिये गार्ग्य मुनिने जो शाकटायन की निन्दा की है वह उनके अभिप्रायको न समझकर की है। यह भी उनको जानना चाहिये था कि—कोई पुरुष अशिक्षित होनेके कारण एक धातुसे होनेवाले नामको भी नहीं जान सकता, बहुत धातुओंसे होनेवालेका जानना तो उसके लिये असंभव ही है । अपिच लोकमे ऐसे भी पुरुष हैं, जो 'कारक', 'हारक' आदि स्पष्टक्रिय शब्दोको भी नहीं जान सकते कि—ये किन धातुओंसे बने हुए हे किन्तु यह पुरुषका दोष है, शास्त्रका नहीं, जाकि—वह शब्दोंको अर्थके पीछे नहीं चला सकता । शाकटायनने 'सत्य' शब्दकी भी व्याख्या ठीक ही की है, वह 'सत् अर्थको ही प्रतीत कराता है।' इससे शाकटायनमत युक्त है। गार्ग्य मुनि जिन रूढि शब्दोंको अधातुज मानते हैं, यह भी
११८ अ० १ पा० ४ ख० ४ । ठीक नहीं है। क्योंकि—रूढि शब्दोंकी व्युत्पत्ति तथा कहीं एक धातु और कहीं अनेक धातुओंसे एक नामकी व्युत्पत्ति मन्त्र और ब्राह्मणमें देखी जाती है जोकि—हमारे सबसे बड़े या पूजनीय प्रमाण हैं। जैसे—“सर्पिः” शब्दकी व्युत्पत्ति “यदसर्पत् १ तत्सपिः” इस मन्त्रमें और “नवनीत” शब्दकी व्युत्पत्ति २ “यन्नवनीतमभवन्” इस मन्त्रमें की है। इसी प्रकार ब्राह्मणमें ‘हृदय’ शब्दकी व्युत्पत्ति तीन धातुओंसे की है। ‘हृ’ हृञ् हरणे (हरति) धातु, ‘द’ अक्षर डुदाञ् दानेके ‘ददति’ रूपसे, तथा ‘य’ अक्षर इण् गतौके इकारके स्थानमें यकार आदेश करके लिया है। यही नहीं किया, बल्कि—इन तीनों अक्षरोंकी उत्पत्तिको जानने वालेके लिये तीन फल भी बताये हैं। तदेतत् त्र्यक्षरं हृदयमिति, हृ इत्येक- मक्षरं † मभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद, द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद, यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोके य एवं वेद। (श० ब्रा० १४,८,४,१) ७म प्रतिसमाधान। “पूर्वकालीन नामकी व्युत्पत्ति अपर कालीन क्रियासे होना अयुक्त है” यह आक्षेप भी मानने योग्य नहीं है। १—जो किसी द्रव्यपर पडते ही फैल जाता है। १—जो भोजनमे नवीन निकाला हुआ हो उपयुक्त होता है। सर्पि और नवनीत यह दोनों नाम घृतके ही हैं। दूसरा मन्त्र भी सर्पि नामकी व्युत्पत्तिके लिये हो सकता है। † हृदय नाममे ‘हृ’ अक्षर इस लिये है कि—जो कुछ प्राणी नाना पदार्थों को हरण करते हैं, वह इस हृदयके लिये ही करते हैं, जो देते हैं वह इसीके तावार्थ देते हैं इसलिये (द) अक्षर है, और हृदय या अन्तःकरण ही स्वर्गको जाता है क्योंकि—विभु आत्माका गमन संभव नहीं इसलिये यकार अक्षर है। (ऐसा अर्थ भी प्रतीत होता है)
हिन्दी निरुक्त । ११६ क्योंकि-हम देखते हैं कि-पूर्वोत्पन्न द्रव्योंका नाम अपर कालीन क्रियाओंसे होता भी है और द्रव्योंका नहीं भी होता । जैसे कि—“बिल्वादः” यह नाम सत्वकी भाविनी विल्वभक्षण क्रिया की कल्पना करके भी हो जाता है । तथा पश्चात् कालमें होनेवाली चूड़ालम्बन क्रियासे भी किसी सत्वका “लम्बचूडक” यह नाम पड़ जाता है । “बिल्व” शब्द भरण अथवा भेदन क्रियासे होता है । क्यो- कि—उसमें बीज भरे रहते हैं, तथा दुर्भिक्ष आदिके समय खानेवाले- का भरण (पालन) करता है । अथवा खानेके लिये वह अवश्य भेदन किया (फोड़ा) जाता है । यहां ऐसी आपत्ति भी उठाई जा सकती है कि—अति मधुर जैसा पूर्व-उत्तर पक्षोंकी रचनापूर्वक नामके आख्यातजत्वको लेकर किस लिये यह व्याख्यान किया है ? यह विस्तृत व्याख्यान शिष्योकी बुद्धिके वर्द्धनार्थ किया गया है, जिससे कि --वे व्युत्पन्नबुद्धि होकर अप्रतिबन्ध (बेरोक टोक) से सब ओर चलनेवाले लौकिक तथा वैदिक शब्दोंका निर्वचन कर सकें । किन्तु यह प्रयोजन नहीं कि—“कोई व्याकरण तथा निरुक्त अप्रमाण है”, बल्कि वेदाङ्ग होनेसे सभी प्रमाण हैं । कोई यह नही कह सकता कि—उन्हींका फल साधु है, औरोंका नहीं । भाव यह है कि-गार्ग्य व शाकटायन आदि सभी आचा- योंके विचार युक्तिसम्पन्न और प्रमाण हैं । वक्ता व श्रोताकी बुद्धि वा इच्छाके विशेषसे एक पक्षकी गौणता और दूसरेकी मुख्यता प्रतीत होने लगती है । वास्तवमे सभी युक्तियां माननीय हैं । समाप्तश्चतुर्थः पादः ।
अ० १ पा० ५ खं० १ । पञ्चमः पादः । ( १ खं० ) अथापि इदमन्तरेण मन्त्रेष्वर्थप्रत्ययो न विद्यते । अर्थमप्रतियतो न अत्यन्तं स्वरसंस्का- रोद्देशः । तदिदं विद्यास्थानं, व्याकरणस्य कार्त्स्न्यं स्वार्थसाधकं च । यदि मन्त्रार्थप्रत्ययाय, अन- र्थकं भवति,—इति कौत्सः । अनर्थका हि मन्त्राः, तदेतेन उपेक्षितव्यम् । नियतवाचो युक्तयो निय- तानुपूर्व्या भवन्ति । अथापि ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते । “उरु प्रथस्व” इति प्रथयति । “प्रोहाणि”-इति “प्रोहति ।” अथापि अनुपप- न्नार्था भवन्ति । “ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते मैनं हिंसीः” इत्याह हिंसन् । अथापि विप्रति- षिद्धार्था भवन्ति । “एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः ।” “असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि- भूम्याम्” । “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” “शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः” इति । अथापि जानन्तं सम्प्रेष्यति—‘ अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि”-इति । अथापि आह “अदितिः सर्वम्” इति । “अदिति-
हिन्दी निरुक्तः । १२१. द्यौरदितिरन्तरिक्षम्” इति । तदुपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः । अथापि अविस्पष्टार्था भवन्ति । अम्यक्, यादृश्मिसम्, जारयायि काणुकाः इति ॥ अर्थवन्तः शब्दसामान्यात् । “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्म क्रियमाणम्-ऋग् यजुर्वा- अभिवदति” इति च ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ • ( ख० २ ) “क्रीलन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः”-इति । यथो एतत् ‘नियत वाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्तिः-इति । लौकिकेष्वपि एतत् । यथा ‘इन्द्राग्नी’ ‘पितापुत्रौ’- इति । यथो एतत् -‘ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधी- यन्ते’-इति । उदितानुवादः स भवति । यथो एतत्-‘अनुपपन्नार्था भवन्ति’-इति । आम्नायवच- नात्-अहिंसा प्रतीयेत । यथो एतत्-विप्रतिषि- द्धार्था भवन्ति’ इति । लौकिकेष्वयि एतत् । यथा- ‘असपत्नोऽयं ब्राह्मणः’ अनमित्रो राजा’ ,इति । यथो एतत्—‘जानन्तं संप्रैष्यतिः इति । जानन्त- मभिवादयते । जानते मधुपर्कं प्राह । यथो एतत् ‘अदिति सर्वम्’-इति । लौकिकेष्वपि एतत् यथा- १६
३२२ अ० १ पा० ५ ख० १ । 'सुवरचा अनुष्मात्राः पानीयम्'- इति । यथौ एतत्-अविस्पष्टार्था भवन्ति' इति । नैष स्थाणोरप- राधः, यदेन मन्धो न पश्यति, पुरुषापराधः स भवति । यथा जानपदीषु विद्यातः पुरुषविशेषो भवति, पारो वर्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ॥ २ ॥ इति प्रथमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ १, ५ ॥ पञ्चमः पादः । निरुक्तका प्रयोजनान्तर । ( व्याकरण और निरुक्त ) इस प्रकारसे आरम्भसे चतुर्थपाद-पर्य्यन्त विभागसे अवस्थित जो नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात उनका लक्षण सामान्य व विशेषरूपसे निरूपण किया गया । यह पदज्ञानरूप, निरुक्त शास्त्रका पहिला प्रयोजन है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान भी दूसरा प्रयोजन है। अर्थात् जिस प्रकार पदज्ञानके विना मन्त्रोंमें अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पदार्थज्ञानके विना भी नहीं। इसीलिये शास्त्रारम्भके द्वितीय प्रयोजनको दिखानेके अर्थ यहांसे आरम्भ होता है। भाव यह है कि—इस निरुक्त शास्त्रके बिना लोक तथा वेदमें पृथक् पृथक् पद रूपसे एवम् मन्त्रोंमें वाक्यरूपसे रहते हुए नाम आदिकोंके ज्ञान हो जाने पर भी वहां जो उनका समस्त मिलित अर्थ है, जिसको जानकर
कि—मनुष्यकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति होती है, उसका विशेष रूपसे निश्चय नहीं होता । सुतराम् इस शास्त्रके विना पदा- र्थकी प्रतीति अथवा वाक्यार्थकी प्रतीति नहीं होती । पूछें कि-पदार्थ और वाक्यार्थका क्या विशेष है ? ता कहेंगे कि-पदार्थ साकाङ्क्ष और वाक्यार्थ निराकाङ्क्ष होता है। एक पदार्थ के ज्ञान हो जानेपर दूसरे पदार्थ के ज्ञानकी अपेक्षा बनी रहती है, यही पदार्थ साकाङ्क्षता है। और वाक्यार्थ के ज्ञान हो जानेपर फिर अन्य अर्थ के जाननेकी कोई आकाङ्क्षा नहीं रहती, सुतराम् वाक्यार्थ के ज्ञान होते ही पुरुषकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हो जाती है। यही वाक्यार्थकी निराकाङ्क्षता है। जैसे—किसोने “गौः” ऐसा पद कहा तो फिर आकाङ्क्षा होती है कि—क्या ? उसके अनन्तर “गच्छति” ऐसा कहते ही उसको आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है। इसी प्रकार “गच्छति” कहने पर “कः” यह आकाङ्क्षा होती है, वैसे ही “गौः” ऐसा कहते ही निराकाङ्क्षता हो जाती है। प्रयोजन यह निकला कि—“गौर्गच्छति” ( “गौ जाती है” ) ऐसा वाक्य बोलनेसे 'गौ' वहन-दोहन आदि क्रियाओंसे पृथक् होकर गमन क्रियामें अवस्थित प्रतीत होती है। और गमन क्रिया भी अन्य अश्व आदिकोंसे अलग होकर गौमें ही अवस्थित हुई प्रतीत होती है। अर्थात् “गौः” ऐसा कहनेसे गौका बोध तो हो जाता है, किन्तु वह जाती है, या चरती है अथवा वहन-दोहन आदि क्रिया करती है, कुछ पता नहीं चलता ? जब “गच्छति” ( जाती है ) कह देते हैं, तो अन्य सब क्रियाओंके सन्देह निवृत्त हो जाते हैं और गमनमें ही निश्चय हो जाता है, एवम् “गच्छति ( जाता है ) ऐसा कहनेसे घोड़ा जाता है या गौ जाती है अथवा मनुष्यादि कुछ निश्चय नहीं होता, किन्तु उसके साथ “गौः” यह पद बोलते ही जानेवालों
१२४ अ० १ पा० ५ ख० १ । में जो सन्देह होता है निवृत्त होकर गौका निश्चय हो जाता है। यही पदार्थ और वाक्यार्थका विशेष है। सो यह प्रकरणका अविरोधी वाक्यार्थ नियमसे पदार्थको लक्षित करता है, और पदार्थ पदके लक्षण को। क्योंकि—पदार्थके सामर्थ्यसे ही व्याकरणमें पदोंके प्रकृति प्रत्यय आदि लक्षण बताये जाते हैं। जब कि—ऐसा है, तो अर्थको निश्चय रूपसे नहीं जाननेवाला पुरुष स्वर तथा संस्कारोंका निश्चय नहीं कर सकता। क्योंकि— अर्थके अधीन ही शब्दके स्वर और संस्कार रहते हैं। ऐसी स्थितिमें "निरुक्त शास्त्र विद्याका स्थान है" यह सिद्ध हुआ, क्योंकि—अर्थका परिज्ञान इसीके अधीन है। इसीसे स्वर तथा संस्कारोंको अर्थके अधीन होनेके कारण यह शास्त्र व्याकरण को सम्पूर्ण बनाता है, क्योंकि—व्याकरणसे स्वर और संस्कारोंका ही विचार होता है, इससे वह अपरि समाप्त ही है जब तक निरुक्त शास्त्र नहीं पढा जाय, —इसका हेतु यह है कि—जो निरुक्त को नहीं पढा हुआ होता है, वह अर्थको निश्चय नहीं कर सकता और अनिश्चिताथ पुरुष स्वर-संस्कारोके तत्वको नहीं जान सकता। प्रश्न हो सकता है कि—जब यह शास्त्र व्याकरणको सम्पूर्ण करता है, तो यह व्याकरणका एक भाग या अङ्ग ही हुआ। जैसे कि—द्रव्यके गुण होते है। और इससे इसको विद्याका स्थान कहना भी विरुद्ध है ? नहीं। क्योकि—यह शास्त्र अपने प्रयोजनको स्वतन्त्रतासे करता हुआ ही व्याकरणकी सम्पूर्णता भी करदेता है, जैसे कि— लोंकमें कोई पुरुष अपने स्वार्थको साधन करनेके साथ दूसरेक अनुग्रह भी कर देता है।
हिन्दी निरुक्त । १२५ यह प्रश्न, कि—गुणादिके समान अङ्गभूत है ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि—व्याकरणका अङ्ग होता, तो जैसे "उणादयो बहुलम्" यह सूत्र उणादि शब्दोंका संग्रह करता है; उसी प्रकार “निघण्टवो बहुलम्” ऐसा सूत्र बनाकर पाणिनि मुनि इस शास्त्रका भी संग्रह कर देते, किन्तु ऐसा नहीं किया, इससे यह शास्त्र व्याकरणका अङ्ग नहीं है। इसलिये "यह शास्त्र अर्थके निर्वचनमें स्वतन्त्र है, व्याकरण तो केवल लक्षण प्रधान है" यह दोनोंका विशेष या भेद है। लक्षण नाम प्रकृति-प्रत्यय आदिका है, यह सब शब्द तक गति रखते हैं। कौत्सके मतसे निरुक्तकी अनर्थकता । कौत्स ऋषि कहते हैं कि—“यदि मन्त्रोंके अर्थज्ञानके लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ किया जाता है, तो अनर्थक ही है, क्योंकि—मन्त्रोंका वाच्य वाचक भाव—सम्बन्धसे कोई अर्थ नहीं है। इस लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ नहीं करना चाहिये । किन्तु निरुक्त शास्त्रके पढ़नेवालोंको उनके ऐसे कथन पर ध्यान न देना चाहिये, प्रत्युत—वेद और शास्त्रोंको देखकर बातको व्यवस्थित करना चाहिये कि—वे सत्य कहते हैं या वृथा ? अथवा जिन हेतुओंको अब हम दिखायेंगे, उनको समझकर मन्त्रोंका अर्थवत्व देखना चाहिये । कौत्सके मतमें मन्त्रोंके अनर्थक होनेमें युक्तियां । ( १ ) मन्त्रोंमें जो शब्द पढ़े हुए हैं, पर्याय शब्द बदल कर नहीं पढ़े जाते, तथा जो शब्द पूर्व पढ़ा है, वह उत्तर नहीं पढ़ा जाता । जैसे कि—लोकमें "गामानय" गौकोलेआ ऐसाभी कहते हैं; और गो शब्दके पर्याय धेनु शब्दको लेकर “धेनुमानय" भी कहते हैं । किन्तु वेदमें 'अग्न आयाहि" ( सा० सं० १, १, १, . १ ) इस वाक्यके स्थानमें 'विभावसो ! आगच्छ' इत्यादि वाक्य
१२६ अ० १ पा० ५ ख० १ । नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार लोकमें “आहर पात्रम्” ‘लेआ, पात्र’ ऐसा भी कहते हैं, और “पात्रमाहर” ‘पात्रको लेआ’ ऐसा भी। वेदमें “अग्न आयाहि” के स्थानमें ‘आयाह्यग्ने’ ऐसा नहीं कह सकते। प्रयोजन यह कि—जब अर्थ के लिये शब्द बोले जाते हैं, तो वह जिस प्रकार सिद्ध हो, वैसे ही वैसे शब्द बोले जा सकते हैं, शब्दोंके क्रम तथा विशेषको नियत करनेका कोई प्रयोजन नहीं। जब कि—मन्त्रोंमें उक्त दोनों बातें नहीं हैं तो अर्थवाले शब्दोंके विरुद्ध स्थितिके कारण वे अनर्थक ही कहे जा सकते हैं। (२) ब्राह्मण या विधि वाक्यसे जिन कर्मोंमें मन्त्र विनियोग किये जाते हैं स्वयम् उन कर्मोंको बोधन करनेकी शक्ति रखनेके कारण वे अपनेको उन कर्मोंमें विनियोग कर सकते हैं, तथापि मन्त्र ब्राह्मण वाक्यके द्वारा ही कर्मोंमें विनियुक्त होते हैं यदि ये मन्त्र अर्थवान् होते तो ब्राह्मण वाक्य इनका विनियोग नहीं करता। भाव यह है कि—जो अपने कर्त्तव्यको आप जानता है, उसे शिक्षककी आवश्यकता नहीं होती, सुतराम् मूढके लिये दूसरे विद्वान् प्रेरककी अपेक्षा होती है, इसी रीतिसे मन्त्र अर्थशून्य होनेसे मूढ़के समान है इसीसे वह दूसरे अर्थवान् ब्राह्मण शासक वाक्यके द्वारा कर्मोंमें विनियुक्त किया जाता है। जैसे— “उरुप्रथस्वेति प्रथयति” (श० ब्रा० १, १, ६, ८) इस ब्राह्मणका यह अर्थ है, कि “उरु प्रथस्व” इस मन्त्रसे (पुरोडाशका) प्रथन करे। अर्थात् इस विधिवाक्यने ‘उरुप्रथस्व” (य० वा० स० १, २२) इस यजुःको पुरोडाशके प्रथन कर्ममें विनियोग किया, तथा यह मन्त्र भी— “हे पुरोडाश ! तू फैल” अपने इस अर्थसे पुरोडाशके प्रथन कर्ममें सामर्थ्य रखता है,
क्योंकि इसके अर्थ से यह बात प्रतीत होती है। इसी प्रकार "प्रोहाणोति प्रोहति" यह ब्राह्मण, द्रोणकलशके प्रोहण कर्ममें "प्रोहाणि" इस मन्त्रको विनियोग करता है। और मन्त्र भी स्पष्ट रूपसे प्रोहणक्रियाको बता रहा है। इससे लिङ्ग सम्पन्न मन्त्रोंके विधानके कारण हम देखते हैं कि--मन्त्र अनर्थक हैं। उपर्युक्त युक्तिसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि--ब्राह्मण विनियोजक (प्रेरक) होनेसे अर्थवान् है और मन्त्र विनियोज्य (प्रेर्य्य) होनेसे अनर्थक। यदि कोई ऐसी कल्पना करे कि-- ब्राह्मण ही अनर्थक क्यों न हो, मन्त्र अपने अर्थ के सामर्थ्यसे ही विनियुक्त होता ? इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मण केवल मन्त्रका ही विनियोग नहीं करता अपितु देश, काल, कर्त्ता और दक्षिणा आदि अन्य कर्मोंके अङ्गोंको भी बताता है, वे सब कहांसे जाने जावेंगे। अतः ब्राह्मणकी अनर्थकता नहीं हो सकती। यदि बलात् ब्राह्मणकी अनर्थकता मान भी लें तो वेदके एक देश रूप मन्त्रकी अत्यन्त ही अनर्थकता होगी। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-यदि ब्राह्मणकी अनर्थकता मानें तो यह प्रश्न हो सकता है कि-ब्राह्मण फिर किस लिये है, जो विधि और कर्मको स्तुतिको नहीं करता ? किन्तु यदि मन्त्र- पर यह प्रश्न किया जाय कि यदि उसका कुछ अर्थ नहीं तो वह किस लिये है, तो उसका उत्तर यह दिया जा सकता है, उसका कर्मोंमें विनियोग होता है। अर्थात् ब्राह्मणका विधिके विना अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे उसको अर्थवान् मानना ही पड़ेगा और मन्त्रका अर्थ स्वीकार न भी किया जावे तो कोई हानि नहीं, इसलिये ब्राह्मण अर्थवान् और मन्त्र अनर्थक है यह सिद्ध हुआ । (३) मन्त्रोकी अनर्थकतामें यह भी कारण है कि-उनके जो
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- अर्थ हैं, वे किसी युक्तिसे संगत नहीं होते। अर्थात् मन्त्रोंमे जैसा अर्थ लब्ध होता है कि- यह इनमें अर्थ होगा, वह घटता नहीं। जैसे- “ओषधेत्रायस्व” ( य० वा० सं० ४, १, ६, १५) 'हे ओषधे तू इस यजमानकी रक्षा कर।' अग्निष्टोम यज्ञमें यजमानके क्षौर कर्मके आरम्भमें उसके शिरपर कुशका अङ्कुर या पत्ता लगाया जाता है कि पहिले छुरा शिरपर न टिककर उसी पर टिके, उस तृणके धरनेका यह मन्त्र है। किन्तु इस मन्त्रके अर्थको स्वीकार करें तो यह प्रश्न होगा कि-जब ओषधि अपनी ही रक्षा नहीं कर सकती तो यजमानकी क्या करेगी ?” तथा दूसरा मन्त्र छुरेके चलानेके लिये हैं- “स्वधिते मैन≍हि≍सीः” ( य० वा० सं० ४, १-६, १५) इसका अर्थ है-हे क्षुर ! पैनीधारवाले ! तू इस यजमान की हिंसा न करना। अब देखते हैं, तो-जो छुरेसे स्वयम् यजमान के बालोंको काट रहा है, वही छुरेसे न काटनेको प्रार्थना कर रहा है। कौन ऐसा है जो ऐसा कह कर, ऐसा करेगा ? लोकमें जितने ऐसे वाक्य होते हैं, वे सब उन्मत्त लोगोंके जैसे अनर्थक ही माने जाते हैं। इस लिये ये मन्त्र वाक्य भी अनर्थक ही हैं। ४-मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि-एक मन्त्रके अर्थको दूसरे मन्त्रका अर्थ निषेध करता या मिथ्या ठहराता है। जैसे कि- “एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः” “असं- ख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ( य० वा० सं० १६, ५४) “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” (ऋ० सं० ८, ७, २१, २) “शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः” (ऋ०
हिन्दी निरुक्त । ४२६ सं० ८, ५, २२, १ ) ये उदाहरण हैं। एक मन्त्रमें कहा गया है कि—'संग्राममें शत्रुओंको मारनेवाला एक ही रुद्र उठा हुआ था, कोई दूसरा न था' दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'पृथिवी पर असंख्य रुद्र हैं' यहां दोनों मन्त्रोंका परस्पर यह विरोध है कि—'एक है तो असंख्य कैसे' ? और 'असंख्य हैं, तो एक कैसे ?' तथा एक मन्त्रमें कहा है कि—'इन्द्र अशत्रु था' एवम् दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'उसने एक साथ ही शत्रुओंकी सैकड़ों सेना- ओंको जीता।' यहां भी यह प्रश्न हो सकता है कि—यदि उसके कोई शत्रु न था, तो उसने शत्रुओंकी सेनाओंको नहीं जीता' और 'यदि शत्रुओंकी बहुत सेनाओंको जीता, तो वह अशत्रु न था।' लोकमें उन्मत्त आदिकोंके ऐसे वाक्य अनर्थक समझे जाते हैं। इसीसे वे भी अनर्थक हैं। ५—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि—अध्वर्यु (ऋत्विज् विशेष) जानते हुए होता को प्रैष (प्रेरणा) करता है कि— “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” 'जलते हुए अग्निके लिये तू अनुवचनकर' किन्तु यह प्रैष निष्प्रयोजन है, क्योंकि—विधिमें विद्वान् हो होता लिया है, इस लिये वह स्वयम् जानता है कि— 'इस अवधि या समयमें मुझे यह अनुष्ठान करना चाहिये' अतः जाननेवालेको ऐसा प्रेषण अनर्थक ही होता है, फलित यह कि- 'जैसे यह अनर्थक है वैसे ही और मन्त्र भी अनर्थक होगे। - ६—कई ऐसे मन्त्र है, जो एक ही वस्तुको कभी कुछ और कभी कुछ कहते.हैं, अर्थात् जिन जिन वस्तुओंके रूपमें एक वस्तुकों बताया जाता है, वे प्रत्यक्षमें सदा ही परस्पर भिन्न हैं, जैसे— १७
१३० अ० १ पा० ४ ख० १ । "अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष म दिति र्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति जातमदितिर्जनित्वम् ॥ (ऋ० सं० १, ६, १६, ५) इस मन्त्रमें 'जो ही अदिति द्युलोक (३ द्युलोक) है वही मध्यम लोक (अन्तरिक्ष) है। एवम् वही माता, पिता, तथा पुत्र है।' ऐसी ऐसी बहुत बातें परस्पर विरुद्ध कही हुई हैं, यदि ऐसे मन्त्रोंको अर्थवान् जाना जावे तो उनका उपपादन करना अशक्य हो जायगा, इसलिये उनका अनर्थक मानना ही ठीक है। ७—इस लिये भी मन्त्र अनर्थक कहे जा सकते हैं, कि—उनमें ऐसे शब्द भी आते हैं, कि—जिनका स्पष्ट रीतिसे कोई अर्थ ही प्रतीत नहीं होता। जैसे—"अम्यक्, यादृश्मिन्, जारयायि, काणुका" इत्यादि। क्योंकि—मन्त्रोंमें इनका कुछ स्पष्ट अर्थ जाना नहीं जा सकता। ऐसी कल्पना भी नहीं हो सकती कि— “मन्त्रोंमें कुछ शब्द अनर्थक हैं, और कुछ अर्थवान्”। क्योंकि— इसमे अर्द्धावशेष रह जायगा, इस लिये सारे ही अनर्थक हैं यह मानना अच्छा है। परिसमाप्तः पूर्वपक्षः । मन्त्रोंकी सार्थकताकी स्थापना । १—यास्क—"मन्त्र अर्थवान् ही हैं" किन्तु कौत्सके कथना- नुसार अनर्थक नहीं। क्योंकि—लोक और वेदमें समान ही शब्द हैं, अर्थात् जो 'गो' शब्द लोकमें स्वर-संस्कार युक्त है, वही मन्त्रोंमे भी है, ऐसी अवस्था में 'वही शब्द लोकमें अर्थवान् रहे और मन्त्रोंमें अनर्थक'—इसमें कोई विशेष हेतु नही है। जब
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कि—'विशेष हेतु नहीं है' तो शब्दोंकी समानतासे मन्त्र अर्थवान् हीं हैं । २—कौत्सने कहा है कि—"लोकमें शब्दोंको अनियमसे प्रयोग करनेके कारण शब्द अर्थवान् हैं" और वेदमें शब्दोंके प्रयोगके नियम होनेके कारण मन्त्र अनर्थक हैं"—यह अयुक्त है । क्योंकि—लोकमें 'जो दो शब्द हैं' उनके पौर्वापर्यका परिवर्त्तन नहीं हो सकता । ३—ब्राह्मण ग्रन्थ भी स्पष्ट रूपसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको कह रहा है कि— “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रिय- माणमृग्यजुर्वाऽभिवदति” इति च । [ब्राह्मणम्] 'यह यज्ञकर्मका समृद्ध है, वह क्या ? जो रूप समृद्ध या मन्त्रलिङ्गोंसे कहा गया हों, अर्थात् किये जाते हुए कर्मको ऋचा अथवा यजू रूप मन्त्र अनुवाद करता हो । अब देखें कि—यदि मन्त्र अनर्थक हैं, तो कैसे कर्मको अनु- वाद करेंगे ? यदि अनुवाद नहीं करते तो कर्मका समर्थन कैसे करेंगे ? सर्वथा इस ब्राह्मण वाक्यसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ता स्पष्ट उक्त होती है । ब्राह्मणको अनर्थकता स्वीकार करके तुम इस प्रमाणको निष्फल कर सकते हो, किन्तु तुम्हारा यह साध्य नहीं, क्योंकि—तुम पहिले ही ब्राह्मणको “ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते” इस वाक्यसे अर्थवान् स्वीकार कर चुके हो । इससे यह दिखाया जा चुका कि—मन्त्र अर्थवान् हैं । “इहैव स्त॑ मा वियौष्टं॒ विश्वमायु॒र्व्यश्नुतस् । क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्वे गृ॒हे”