निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । ८१ गिरः । गृणातेः । “अयमुते समतसि” । अयं ते समतसि इवोऽपि दृश्यते ॥ ५ ॥ ॰ [जैसे] “पर्याया इव त्वदाश्विनम्” [ऋ० प्रा० १२, १०] आश्विन और पर्याय। यहांसे पदपूरण निपात हैं। गद्य ग्रन्थोंमें जो निपात अन्य पदोंसे ही अर्थ पूरा होनेपर वाक्यकी पूर्त्तिके लिये आते हैं, वे ही पद्य ग्रन्थोंमें पदपूरण होते हैं। दोनों ही स्थलोंमें अनर्थक होते हैं। [कौन] ‘कम्’ ‘ईम्’ ‘इत्’ ‘उ’ ये चार निपात। [जैसे ‘कम्’] “निष्ठूक्त्रासः”००० कम्” [ ] वस्त्रोंसे रहित बहुत सन्तानवाले कोई दरिद्र मनुष्य हेमन्त ऋतुमें भेड़ियेके समान जाड़ेसे डरते हुए ऐसा पुकारते थे, कि ‘शिशिर ऋतु हमारे जीवनके लिये आता है।’ [क्योंकि उसमें शीत कम होता है, इससे उसमें हम सुखसे जीवेंगे।] शिशिर ऋतु जीवनके अर्थ होता है। [क्योंकि उसमें शरद् ऋतुके बहुत धान्य पैदा होते हैं। ‘शिशिर’ शब्द ‘शृ’ हिंसायाम् धातुसे होता है। अथवा ‘शम्’ हिंसार्थक धातुसे बनता है। [क्योंकि उस कालमें निर्विघ्न होकर दावानल या वनका अग्नि सूखे ओषधि और वनस्पतियोंको जला देता है। [ईम्] “एमेनम्०” [ऋ० सं० १, १, १७, २] हे अध्वर्युओ ! सोमके निचूड़ जानेपर इसे उक्थ पात्र और चमस पात्रोंसे तैयार करो। [इत्] “तमिद् वर्द्धन्तु नो गिरः” [ऋ० सं० ७, १, २०, ५] हमारी वाणियें उस सोमको वीर्ययुक्त करें। ‘गिर्’ नाम स्तुतिका है। [उ] “अयमु ते समतसि” [ऋ० सं० १, २, २८, ४] हे इन्द्र ! यह तेरा सोम है, जिसके लिये तू नित्य गिरता है। और ‘इव’ भी कभी अनर्थक आता है ॥ ५ ॥ ११
८२ अ० १ पा० ३ खं० ६ । (मं० ३) “सुविदुरिव” । “सुविज्ञायेते इव । अथापि 'न' इत्येषः, 'इत्' इत्येतेन संप्रयुज्यते परिभये । “हविर्भिरिके स्वरितः सचन्ते सुन्वन्त एके सवनेषु सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभिर्नेज्जिह्मा- यन्त्यो नरकं पताम” इति । नरकं = न्यरकं = नीचैर्गमनम् । नास्मिन् रमणं स्थानमल्पमप्यस्ति, इति वा । अथापि 'न च' इत्येषः 'इत्' इत्येतेन संप्रयुज्यते अनुपृष्टे । “नचेत् सुरां पिबन्ति” इति । सुरा सुनोतेः । एवम् उच्चावचेषु अर्थेषु निपतन्ति, ते उपेक्षितव्याः ॥ ६ ॥ इति तृतीयः पादः । अर्थ—ब्राह्मण यज्ञको अच्छे प्रकार जानते हैं। ब्राह्मणोंसे यज्ञ और नक्षत्र भले प्रकार जाने गये हैं। यहांसे [निपात समा- हार है।] 'न' यह 'इत्—इसके साथ सब ओरसे भय अर्थमें बोला जाता है। [जैसे] “हविर्भिः”—कोई मनुष्य इस लोकसे हवि- योंके दानसे स्वर्गको जाते हैं, कोई मनुष्य यज्ञोंमें सोमोके अभि- षवण कर्मको करते हुये, कोई स्तुतियोंसे देवताओंको प्रसन्न करते हुये और कोई दक्षिणाओंसे स्वर्गको जाते हैं। [यदि हम पति- योंसे भी धोका करें, जिस अवस्थामें कि स्त्रियोंको यज्ञ आदि कर्मका अधिकार नहीं है तो निरुपाय होकर, नरकमें गिरें ] 'नरक' नाम न्यरक अर्थात् नीचेको जाना या अधोगतिका है।
॥ हिन्दी निरुक्त । ८३ अथवा इसमें थोडा भी रमण स्थान नहीं है। और 'न च' यह 'इत्' इसके साथ अनुप्रश्न [दुबारा प्रश्न]में बोला जाता । [जैसे] “नचेत् सुरां पिबन्ति”। जो नहीं सुरा [मदिरा] पीते हुए होते । [कोई किसीसे पूछता है—'हैं शुद्र ? उत्तर—हैं । फिर प्रश्न— यदि हैं तो क्यो नहीं आते ? फिर उत्तर—'नचेत् सुरां पिवन्ति' यदि सुरा न पीते हुये होते तो आजाते । इस प्रकार विविध अर्थोंमें निपात गिरते हैं, सो देखने चाहिये ॥ ६ ॥ इति तृतीयः पादः ॥ द्वितीयपादकी विशेष व्याख्या । अथ निपाताः । उपमार्थकाः १—इव ( १ ) न ( २ ) चित् ( ३ ) नु ( ४ ) कर्मोप- सङ्ग्रहार्थाः २—च( १ ) आ ( २ ) वा ( ३ ) अह ( ४ ) ह ( ५ ) उ (६) हि ( ७ ) किल ( ८ ) [ निपात-समाहारौ—न किल, न-नु, किल ] मा ( ६ ) खलु ( १० ) शश्वत् ( ११ ) नूनम् ( १२ ) सीम् १३ सीमा ( १४ ) त्व ( १५ ) त्वत् ( १६ ) कम् ( १७ ) ईम् ( १८ ) इत् ( १६ ) उ ( २० ) इव ( २१ ) [ निपात-समाहारौ ]-नेत्-[ न-इत् ] नचेत्,- [ न-च-इत् ] पद-पूरणाः ३—कम् ( १ ) ईम् ( २ ) इत् ( ३ ) उ ( ४ ) [ कदाचित् ]-इव ( ५ ) प्रथमः खण्डः । ( १ )—उपमार्थक-निपात । इव, न चित् और नु ये चार निपात उपमार्थक हैं। ये चारों प्रायः अर्थवान् होते हैं, निरर्थक कहीं ही आते होंगे ।
८४ अं० १ पा० २ ख० २ । निपात । अर्थ । स्थान । उदाहरण । वेदे:—( १ ) “अग्निरिव”† ४ [ऋ० सं० ८, ३, १६,२ ] ( २ ) “इन्द्र ( १ )—इव—उपमा इव” ५ [ ऋ० सं० ८, ८, ३१, २ ] लोके:—( १ ) अग्निरिव तीक्ष्णः ६ (२) इन्द्रइव विक्रान्तः ७ लोके:—( १ ) घटो नास्ति— ( २ )—न * प्रतिषेध: वेदे:—( १ ) नेन्द्रं देवममंसत ८ [ ऋ० सं० ८, ३, २६, १ ) उपमां— वेदे:—( १ ) दुर्मदासो न सुरायाम् ६ [ऋ० सं० ५, ७, १६, १] द्वितीयः खण्डः । पूजा—लोके—(१) आचार्यञ्चिदिदं ब्रूयात् १० ( ३ )—चित् — उपमा—लोके—(२) दधिचिदोदनः ११ अनेककर्मा निन्दा—लोके—(३) कुल्माषांश्चिदाहर १२
- वेदमें 'न' निपातके प्रतिषेध और उपमा दो अर्थ होते हैं । प्रतिषेध अर्थ मे प्रतिषेध्यसे पूर्व और उपमा अर्थ मे उपमेयके अनन्तर आता है । † ‘अग्निरिव मन्यो त्विषित सहस्व सेनानीर्न सहुरे हतन्धि । हत्वा य शत्नून्भजस्व वेद चौजा सिमामो विषुधो नुदस्व” ॥ [ ऋ० स० ८, ३, १६, २ ] तमस का पुत्र मन्यु ऋषि । त्रिष्टुप् छन्द । मन्यु देवता । श्येनादिकोंमें निष्क्री वल्लभे मन्त्र । १—उपमा अर्थौ येवा ते उपमार्थका । उपमा रूप अर्थवाले शब्द उपमार्थक कहलाते हैं । उपमा नाम—किसी वस्तुमें कोई गुण प्रसिद्ध हो तथा वही गुण उससे अन्य किसी वस्तुमें रहकर भी अप्रसिद्ध हो, उस अप्रसिद्ध गुणवाले वस्तुमें शब्दभावके सम्बन्धसे उस गुणका प्रकाश करना है । (नोट) यह मन्यु इन्द्र ही है क्योकि आत्मवित् और नैरूक्तोके मतमें माहाभाग्य तथा कर्मके भेदसे एक देवताके बहुत नाम हो जाते हैं जैसे कि “मन्युरिन्द्रो मन्युरेवा स देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदा’” ( ऋ० ८, ३, १६, २ ) यह ऋचा है । याज्ञिकोंके मतमें इस नाम
- का स्वतन्त्र देवता है ।
हिन्दीनिरुक्त । ८७ २—अर्थोपसं ग्रहायेत्याः इत्यर्थः । इस शास्त्रमें प्रायः 'कर्म' शब्द अर्थका पर्याय आता है । जैसे—"गतिकर्माण उत्तरे धातवः” ( ३, २, ३ ), यहां पर 'गतिकर्म' शब्दसे गत्यर्थ प्रतीत होता है । ३—पदमेव पूरयितव्यं येषा मतु कश्चिदभिधेयोऽर्थ इति पदपूरणाः । जिन निपातोंसे पद अथवा पादकी पूर्ति मात्र ही होती है, किन्तु कोई अभिधेय अर्थ नहीं होता वह पद पूरण कहाते हैं । इस प्रकार अर्थके भेदको लेकर संक्षेपसे निपातोंके तीन विभाग होते हैं । ४ हे सखो ! सहनशील इस शत्रुओंके तिरस्कार कालके उपस्थित होने पर हमसे बुलाया हुआ तू हमारी सेनाका नेता हो , और उसके पश्चात् अग्निके समान तेजस्वी प्रदीप्त होकर तू हमारे शत्रुओंका तिरस्कार कर, तथा उनको मारकर उनके धनको लेकर हमारे सैनिकोंके बलको बढाते हुये योग्यतानुसार बांट दे । और मरनेसे बचे हुये, जो शत्रु योद्धा हमसे धनको लौटाना चाहते हैं, उनको तावन्मात्र शेष करके तू दूर फेंक दे जिससे कि फिर वे न आवें । ५ 'इहैवैधि मापच्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः । इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठे ह राष्ट्रमृधारय ॥' इस अनुष्टुप् छन्दसे आङ्गिरस ध्रुवने राजाका अभिषेक किया था । इसी राष्ट्रमें तू रह, और तू पर्वतके समान क्रियाशून्य मत हो, तथा इन्द्रके समान ध्रुव होकर स्थित हो, और विभूतिसम्पन्न इस राज्यको धारण कर । ६ अग्निके समान तीक्ष्ण । ७ इन्द्रके समान विक्रमवाला है । ८ आदित्यकी रश्मियोंने इन्द्रको अपना तेज या दीपन करने वाला नहीं माना । ९ “हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् । ऊधर्न नग्ना जरन्ते ।” [ ऋ० सं० ५, ७, १६, १ ] कण्व मेधातिथि और आङ्गिरस प्रियमैध दो ऋषि । इन्द्र देवता । गायत्री छन्द । वाचस्तोमेमें विनियोग । (नोट) जिन मन्त्रोंका कहीं भी विनियोग नहीं है, वे भी वाचस्तोमेमे विनियुक्त होते हैं । पान किये हुये सोम हृदयमें स्थित होकर अपनी अपनी श्रेष्ठताको कहते हुये परस्पर युद्ध करते हैं जैसे मदिरा पानेसे उन्मत्त हुये कोई पुरुष युद्ध करें । इसके अतिरिक्त आत्मलाभसे परितुष्ट होकर उसी यजमानकी स्तुति जैसी करते हैं; जिस प्रकार रात्रिके समय पुरुष नग्न होकर स्त्रीके सं'योगके लिये उसकी स्तुति करते हैं । १० आचार्य ऐसा कह सकता है और कौन ऐसा कहेगा । ११ दहीके समान भात है । १२ कुल्माष भी ले जा, और जानेकी तो बात ही क्या है ।
८६ अ० १ पा० २ ख० ४ । ┌ (१) हेत्वपदेश—लोके—इदन्नु करिष्यति । │ (२) अनुपृष्ट१—लोके—कथन्नु करिष्यति । नन्वे- │ तदकार्षीत् २। नु—┤ ( तृतीयः खण्डः ) │ (३) उपमा—वेदे—वृक्षस्य नु ते पुरुहूत वयाः ३ └ [ऋ० सं० ४, ६, १७, २] ‡( २ ) कर्मोपसंग्रहार्थक ४ । ┌ (१)—लोके—अहञ्च त्वञ्च । हरश्च हरिश्च । च-समुच्चय { (२)—वेदे—अहञ्च त्वञ्च वृत्रहन् ५ [ऋ० सं० └ ६, ४, ४१, ५, ] आ—समुच्चय—वेदे—देवेभ्यश्च पितृभ्य आ० ६ [ऋ० सं० ७, ६, २२, १] ┌ विचारणार्थ—वेदे—┌ हन्ताहं पृथिवीमिमां निदधा- │ │ नीह वेहवा कुवित्सोमस्या वा---┤ └ पामिति'७[ऋ० सं० ८,६,२७,३] │ समुच्चयार्थ—वेदे—वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा८[यजु० └ सं० ६,७,] ( चतुर्थः खण्डः † अह—विनिग्रह—लोके—अयमहेदं करोतु । अयमिदम् । † ह—विनिग्रह—लोके—अयमिदमिदं ह करिष्यति । इदन्न करिष्यति ।
† पूर्वेण संप्रयुज्यते । ‡ वाक्ये यो वक्ता प्रयुक्तः समाप्ते च श्रोत्राऽध्याहृतः सन् एकस्मिन्कर्मणि द्वौवा बहून्वाऽर्थान् उपसंगृह्णाति उपसं बध्नाति स कर्मोपसंग्रहार्थः । यथा देवदत्त-यज्ञदत्तौ पचेते, यज्ञदत्तोदेवदत्तश्च पचेते। १ 'इदन्नु करिष्यति' ( एक बार किसी वस्तुके प्रश्नका उत्तर हो जाने पर फिर उसीके प्रश्न का उत्तर होना अनुपृष्ट कहलाता है ) कैसे करेगा ? उ० करेगा। कैसे करेगा ? ऐसा ही करेगा। यह द्वितीय उत्तर उक्त वाक्यका अर्थ है।
हिन्दी निरुक्त । ८७ २.--इसने यह किया है, यह कैसे कहता है कि "यह कैसे करेगा १।" ३-चक्रो न चक्रो. शूर बृहन् प्रते मङ्गा रिरिचे रोदस्यो । वृक्षस्य नु ते पुरुहूत वया व्यूतयो बभूविन्द्र पूर्व्वी ॥ [ ऋ० सं० ४, ६, १७, ३ ] बार्हस्पत्य भरद्वाजने इस त्रिष्टुप् छन्दके पूर्व्व अर्द्धर्च से इन्द्रकी स्तुति करके उत्तरार्द्ध से उसका उपालम्भ किया है । हे शूर ! इन्द्र ! पुरुहूत ! पृथ्वी और द्युलोकसे दो चक्रोंस महाम् घुरके समान तेरी बड़ी विभूति है, तेरे ऐसी विभूतिवालेके भक्त होने पर भी वृक्षकी शाखाओंके समान पुरानी हमारे यज्ञके आगमन मार्ग तेरे न आनेसे शून्य हैं। अहो खेद ! हमारे मन्दभाग बैठता है जिन हम लोगोंके पासकि-वह धन नहीं है जिससे तेरी पूजा करें, इसमें हम तुमको क्या कह सकते हैं ? ३-कोई निपात ऐसे होते हैं कि जो वाक्यमें सुने या बोले नभी जाव तो भी उन स्थानमें
- अध्याहारसे अपना अर्थ देते हैं उनका अर्थ अनेक पदार्थों का भेद दिखलाना ही है ऐसे निपातोंके स्थानके जाननेके लिये सदृश अथवा विरुद्ध शब्दोंका एकत्रत्व तथा चश्च का सामर्थ्य ही उपाय है, ऐसे निपात कर्मोपसङ्ग्रहार्थ कहलाते हैं । जैसे- देवदत्त यज्ञदत्तौ † = "देवदत्तश्च यज्ञदत्तश्च"
- वाक्यमे उसके अर्थ को पूर्ण करनेके लिये किसी बाह्य शब्दके ग्रहण करनेका नाम अध्याहार है । † यद्यपि यहाँ पर देवदत्त और यज्ञदत्त दोनों ही श्रवणके विषय होते हैं किन्तु उनका चौद्दिक (उच्चारण कृत ) पृथक्त्व नहीं है अर्थात् "गा, अश्वान्, पुरुषान्, पशून्" यहाँ प्रत्येक पदके उच्चारणसे ही उन पदार्थों का भेद प्रतीत होता है, किन्तु "देवदत्त- यज्ञदत्तौ, इन उदाहरणमें विवृद्धि या दोनों पदोंके अलग कर देने तथा च शब्दके आगम से पृथग्भाव प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ दो या बहुत अर्थों को मिश्रित करके एक क्रियामें उपसमावेश किया जाय वह कर्मोपसंग्रह होता है। जैसे-(देव- दत्त यज्ञदत्तौ पचेते) देवदत्त यज्ञदत्त पाक करते हैं। यहा एक ही पाक क्रियाम देवदत्त यज्ञदत्त दोनोंका समावेश है। इससे यह कर्मोपसंग्रह हुआ। अथवा 'अहञ्चत्वञ्च' ऐसा कहने पर अहञ्च भी दूसरा पदार्थ उपस्थिति प्रतीत होता है वह कर्मोपसंग्रह है। एवम् इस कर्मोपसंग्रह अर्थ में रहनेवाले निपात कर्मोपसंग्रहार्थ कहलाते हैं ।
८८ अ० १ पा० २ ख० ३ । ५—"अहं च॒ त्वं च॑ वृत्रहन्त्सयु॒ज्याव॒ सनि॑भ्य॒ आ । अरा॑ती बाचिद- द्विवोऽनु॑नो मूर॒मंस॑ते भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑ ॥ [ऋ० सं० ६, ४, ४१, ५] घोरपुत्र प्रगाथ ऋषि । इन्द्र देवता । पंक्ति छन्द । इन्द्रके सखिभावको इच्छाने प्रगाथ ऋषि बोले कि 'हे इन्द्र ! मैं (प्रगाथ ) और तू दोनो एक प्रयोजनके लिये उसकी प्राप्ति तक संयुक्त हो जावें' । 'हे अद्रिव' ! ( इन्द्र ! ) हम दोनोंको इस प्रकारसे संयुक्त देखकर अदानशील या कृपण भी हमारे लिये अवश्य देनेको अनुमत होगा । ऐसा समझकर कि—'इन्द्रको देना कल्याणकारी है । प्रयोजन यह है कि—'कौन ऐसा है, जो इन तुम्हारे'संयोग होनेपर न देगा' । नोट—कभी यही समुच्चयार्थक चकार अलग हुए—हुए दोनों ही अर्थों के साथ संयुक्त होकर आता है, जैसा कि—इसी मन्त्रमें 'अहञ्च त्वंच' ॥ ६—"यो अ॒ग्निः क॒व्यवा॑हनः पि॒तॄन् यक्षदृता॒वृधः॑ । प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ ॥ [ऋ०स० ७, ६, २२, १] अनुष्टुप् छन्द । अग्नी-देवता । पितृयज्ञ॒अमें विनियोग । जो अग्नि कव्य (पित्रा अन्न) का प्रेरक है, अर्थात् जिसका यह अधिकार है, कि—वह कव्योंको प्रेरक, वह इस हमारे पितृयज्ञ॒अमें होताके रूपमें स्थित होकर पितरोंको पूजा करे, कि—जो पितर सत्य वा यज्ञजके बढ़ाने वाले हैं। तथा देवता और पितरोंको हमारे दिये हविषोंकी सूचना देवे । ७—ऐन्द्रलव ऋषि । गायत्री छन्द । लव कहता है कि—क्या मैं इस पृथ्वीको इस स्थानसे उठाकर इस अन्तरिक्ष लोकमें, या इस द्युलोकमें, या इस दाहिने कन्धे पर अथवा इस बांए' कन्धे पर रखूं । क्योंकि—मैंने अधिक सोमपान किया है, उस सोमपानके अनुरूप (समान) ही मुझमें ऐसा पराक्रम है । ८—"वायुर्वा॒ त्वा मनु॑र्वा॒ त्वा ग॑न्ध॒र्वाः स॒प्तविं॑शतिः । ते अग्रे॑ अश्व॑मयुञ्ज॒ंस्ते अ॒स्मिञ्जव॒माद॑धुः” [य० सं० ६, ७] अनुष्टुप् छन्द । वाजपेयमें अश्वके योजनमें विनियोग । 'हे अश्व ! वायु, मनु और सप्ताईस (२७) गन्धर्व देवता तुझे इस रथमें बांधते हैं'। क्योंकि वे जानते हैं, जिस प्रकार तू बांधने योग्य है। तथा इन्होंने देवताओं और ऋषियोंके अश्वको जो पहिले
हिन्दी निरुक्त । ८६ ┌ (१) विनिग्रह लोके मृषेमे वदन्ति, सत्यमु ते │ 'वदन्ति । † उ ──┤ (२) पदपूरण वेदे ६ इदमू [ऋ० सं० ३-८- │ २-१] १० 'तदु' [ऋ० └ सं० १-५-२-१] ॥ ┌ (१) हेत्वपदेश ˙ लोके इदंहि करिष्यति । हि───┤ (२) अनुपृष्ट लोके कथंहि करिष्यति । └ (३) असूया लोके कथंहि व्याकरिष्यति । किल─────विद्याप्रकर्ष लोके एवं किल । ┌ न-किल─ अनुपृष्ट लोके न किलैवम् । ┐ └ ननु-किल─ अनुपृष्ट लोके ननु किलैवम् । ┘ मा───────प्रतिषेध लोके (१) मा कार्षीः (२) मा हार्षीः । ┌ प्रतिषेध लोके (१) खलु कृत्वा (२) खलु ──┤ खलु कृतम् । └ पदपूरण लोके एव खलु तद् बभूव शश्वत ───विचिकित्सा लोके ( शश्वद्ब्राह्मणोऽयम् । ┌ शश्वदेवम् ┐ अनुपृष्ट लोके शश्वदेवम् │ │ └ एव शश्वत् ┘ अस्वयंपृष्ट लोके एवं शश्वत् । नाना सं आर उसमें वेगकी धारणा किया है । इमोसं ई अग्रे । में कहता हूँ कि— इस अश्वका वै ही जोडे और उसमें बलका आधान करे ।
- दर्भेषु सम्प्रथ्युच्येत । ६—"इदमू त्यत् पुरुतमं पुरस्ताज्ज्योतिस्तमसा वयुनावदस्थात् । नून दिवो दुहितरो विभातीर्गातुं कृण्वन्नुषसो जनाय ॥ [ऋ० सं० ३. ८, २, १] वामदेव गौतमने इस त्रिष्टुप् छन्दसे उषाकी स्तुति की है । प्रातरनुवाक और आश्विनम शस्त्र है ।
६० अ० १ पा० ३ ख० १ २ । तृतीय पादकी विशेष व्याख्या । ( प्रथमः खण्डः ) नूनम्— { १ विचिकित्सा { —लोके——नूनं तव गृहे धनम् ? { —वेदे— { २ न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् अन्यस्य चित्तमभि-सञ्च रेण्य मुताधीतं विनश्यति [ ऋ० सं० २-४-१०-१ ] ( २-यः खण्डः ) पदपूरण————वेदे— { ३नून साते प्रतिवर जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी शिक्षा स्तोतृभ्यो मतिधग् भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः यह वह ज्योति है, जिसको मनुष्य बहुत कुछ कहते हैं क्योंकि—वह अन्धकारको दूर करके अपनेको प्रकट करती है। [उक्तिया] पूर्व दिशामे प्रज्ञानके समान ज्योति उठ रही है। निश्चय ही ये द्युलोककी दुहिताए (कन्यायि) रात्रिके व्यर्थरेको दूर करतो हुई, मनुष्योंके गमनको सफल करती हुई उषा आ रही हैं, जैसे कि यह पूर्व दिशा लाल होती आती है, और अन्धकार नष्ट होता जाता है। एक ही उषाके प्रशसाके लिये बहु वचन दिया है। १०—“तदु प्रयक्षतममस्य कम दस्मस्य चारुतममस्ति दसः । उप हरे यदुपरा अपिन्वन् मध्यर्णसो नद्य १ श्रतसृः ॥ [ऋ० सं० १, ५, ५, १] दूसरा उद्धरण— गौतम नौधस् ऋषिने इस त्रिष्टुप् छन्दमे इन्द्रकी स्तुतिकी है। प्रवर्ग्य मे विनियोग है। इस दानशील या दर्शनीय इन्द्रका और भी बहुत प्रकारका पूज्यतम कर्म है, जोकि— उसने एकान्त देशमे जहां मनुष्योंकी भीड नही है, बैठ कर चार मोटे जलवालो नदियोंको गिलाया और यज्ञ आदि कामको प्रवृत्त किया, अर्थात यहो इसका पूज्यतम कर्म है। १—विवेक पूर्वक निश्चयके अभिप्रायको विचिकित्सा कहते हैं ।
Here is the accurate, line-by-line transcription of the text in Unicode Devanagari:
हिन्दी निरुक्त। ६१ ┌ पदपूरण----------वेदे--- ४ प्रसोमादित्यो असृजत् │ [ ऋ०-सं०-२-७-६-४ ] │ [ व्याख्या - प्रासृजत सूर्यों रश्मीन् ] │ ( इति पदपूरण एव ) │ ┌प्रसीमेत्यादि० [ऋ० सं० सीम ┤ │ २-७-६-४] व्याख्या-प्रससृजत् │ │ सर्वत -( इति परिग्रहार्थ ) │ │ ५ विसीमतः सुरुचो वेन │ │ आवः ( वक्ष्यमाण ) └ परिग्रह----------वेदे---┤ [ यजु० सं० १३-३६ ] │ विसोमतःसु--वः [मा० │ स० छ० आ० ४-१-३-६] │ [व्याख्या आदिव्य सुरुच = रश्मीन्, │ सीमत = सन्त वि=आव = └ वातवान् । ३- - अगस्त्यने पहिले इन्द्रके लिये हविका निर्वाप करके पीछे मरुत देवताओका देनेका विचार कर लिया, इससे इन्द्रने आकर परिदेवना की, परिदेवना नाम क्रोधपूर्वक विलापका है। इसी निदानपर यह मन्त्र प्रकट हुआ है। | इन्द्र |--मेरा पहिले यह विचारणीय है कि - 'आजका हवि मेरा नही है, तो कलका भी न होगा। अर्थात आजके भागको छोड़कर कलके भागपर भी आशा नही कर सकते, क्योंकि—आज जो हमारे लिये हवि निर्वाप किया गया था, वही हमे नही मिला, तो कल पर क्या प्रत्याशा है ? कारण यह है कि -जो वस्तु उत्पन्न नहीं हुई है, उसको कौन जानता है, वह किसको होगी ? मेरी या दूसरेकी। और यह भी कारण है कि -दूसरेका चित्त चञ्चल होता है, उसकी स्थिरता नहीं। आजके हविको मैने जाना था कि—यह मेरा होगा, तो भी यह नष्ट हुआ जाता है। ३-गृत्समद ऋषि । पृष्ट्यके चतुर्थ अहन्में मरुत्त्वतीयम शस्त्र हैं। इस मन्त्रमें 'नूनम्' केवल पदपूरणके लिये ही है। हे इन्द्र ! तेरे पुत्रभावक कर्मम रहनेवाली जो दक्षिणा है, सो स्तुति करनेवाले यजमानको वर दे। [यद्यपि दक्षिणावान् कर्मसे ही फलकी प्राप्ति होती है, किन्तु दक्षिणासे नहीं, तथापि यहां दक्षिणाकी महिमा कहनेके लिये उसीमे फल सामर्थ्य कहा गया है ] दक्षिणामें हिरण्य धान्य आदि सब रहता है। और हे इन्द्र ! तू ऋत्विजोंको शिक्षा या सद्बुद्धि दे। और हम छोड़कर औरोंको
६२ अ० १ पा० ३ ख० २।
धन मत दे, अर्थात् पहिले हमें दे, और फिर औरोंको । और हमको धन मिल. जिससे कि हम् यज्ञमे या घरमें बडी बडी बाते कहे कि—“दो—खावे”। इसके अतिरिक्त हम वीरोंवाले होवे, अर्थात यदि अपुत्रवाले होवे, तो पुत्रवान् बने , और पुत्र- वान् होवे, तो कल्याण वीर पुत्रवाले हो । ४—ग्टत्सम-कूर्म्म या ग्टत्समदका पुत्र कूर्म ऋषि । त्रिष्टुप् छन्द सूर्य्य देवता। इस ऋचामि सूर्य्य की वरुण नामसे स्तुति की गई है । “प्रसीमादित्यो असृजद् विधर्त्ता ॠतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति । न श्राम्यन्ति न विमुञ्चन्त्येते वयो न पप्तू रघूया परिज्मन्” ॥ [ऋ० सं० २, ७, ६, ४] ‘सीम्’ निपात जब पदपूरण रहता है, तब इसका कुछ अर्थ नही लिया जाता। “आदित्य प्र असृजत” आदित्यने अपनी किरणोंको फैला दिया । [इस पक्षमे कहासे फैलाया ? या कहा फैलाया ? यह प्रश्न नही उठाया जाता] जब उक्त निपात परि- ग्रह अर्थमें होता है, [तो] “आदित्य सीम ( सर्वत ) प्र असृजत” आदित्य (सूर्य) ने सब जगहसे किरणोंको फैलाया’ [ऐसा अर्थ हो जाता है।] जो [सूर्य] ‘विधर्त्ता’ नाम रसोका या रश्मियोंका धारण करनेवाला है, अथवा अपनी रश्मियोंके जालके अन्तर्गत सब जगत्को धारण करनेवाला है। सूर्यके रश्मि वर्षाकालमे सरल या पूर्व दिशासे आभिमुख्यसे झरने लगते है, एव वैसेही सूर्यनारायणसे प्रेरित होकर सर्वलोकके जलको लेकर वरुण नाम सूर्यके मण्डलको चले जाते हैं इस प्रकार गति-दिवस- जलका लेना और छोडना इस अपने कर्मको करते हुए नहीं थकते हैं, तथा थक कर भी वैराग्यसे भी उस कर्मको नहीं छोडते। पक्षियोंके समान शीघ्र गतिसे सम्पूर्ण जगत्मे गमन करते हुए भी ये रश्मि न थकते ही है और न अपने कर्मको छोडते ही हैं। थकनेके भयसे इन्हे अपनी गति कभी धीमी नहीं करनी पडती । ऐसे गुणवाले रश्मियोका भी फैलाने या समेटनेमें सूर्य ही प्रभु है, इस लिये उस सूर्यकी ही स्तुति है । ५—वामदेवके पुत्र नकुल ऋषिने इस त्रिष्टुप् छन्दसे आदित्य देवताकी स्तुति की है। प्रवर्ग्य मे तथा अग्निचयनमें सुवर्णके धारणम विनियोग ह । 'ब्रह्म जज्ञानं प्रथम पुरस्ताद् विसीमतः सुरुचो वेन आवः । सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ॥ [य० सं० १३, ३] आदित्याख्य ब्रह्मने जब जगत्में अन्य पदार्थ उत्पन्न नहीं हुये थे, पहिले पूर्व दिशामे का
हिन्दीनिरुक्त । ६३ ( ३ यः खण्डः ) १ सर्वनाम-अन्य अर्थमे | १ ऋचांस्त्वः पोषमास्ते प्रथमा एक.व० | पुपुष्वान् गायत्रन्त्वो गा- . | र्यात शक्करीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्वः ॥ [ऋ०स० ८,५,२-२४] * त्व-सर्वनाम २ अङ्गनाम-द्वितीया- ⎧ २ उत त्व सख्ये स्थिरपीत- अनुदात्त एक वच० ⎨ माहु' इति ⎩ [ऋ०सं० ८,२-२३-४] ३ अन्यार्थ-चतुर्थी- । ३ उतौ त्वस्मै तन्वं विसस्रे एक व० । [ऋ० स० ८-२ २३-५] ( चतुर्थ खण्डः ) ४अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । ४ ,, प्रथमा बहु च० आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥ [ ऋ० स० ८-२-३४-२ ] अच्छे प्रकाशवाली अपनी किरणोंको सर्व ओर फैलाया था, इस कर्मके उपलक्षणसे प्राची (पूर्व) दिशा अपना प्राचीत्त्व रखती है। उसी मेधावी आदित्यने सब दिशा- ओंको फैलाया या प्रकट किया है, जो दिशायें बुध नाम अन्तरिक्षकी अवयवभूत और सब जगत्को उपनिर्माण करनेवाली हैं अर्थात् इनमे ही सब जगत् प्रतिष्ठित होता है। तथा इन्हींमें सब जगत् भिन्न भिन्न होकर स्थित होता है, भाव यह है, कि—ऐसे गुणोंवाली दिशायें सूर्यके उदयसे ही प्रकट होती हैं। एवम् उसी आदित्य ब्रह्मने स्थूल सूक्ष्म जगत्के कारणको प्रकट किया है ॥ *- त्व शब्दकी कई आचार्योंने निपातोंमें गणना की है, किन्तु भाष्यकारके मतमें लौकिक वैदिक उदाहरणादि उपपत्तियोसे सर्वनामसंज्ञक नाम ही है सन्दिग्ध होनेसे ही निपातोंमे इसका अवतरण हुआ है। १—अत्र प्रथमादिपादेषु होतुद्गात्रुब्रह्माख्येषु प्रत्येक कर्मण ऋगध्ययन सामगानमितरैश्च
६४ अ० १ पा० ३ ख० ५ । ( पञ्चम-खण्डः ) त्वत्—समुच्चयार्थे—वेदे—पर्याया इव त्वदाश्विनम् [ऋ०प्रा०१२-१० [व्याख्या आश्विनञ्च पर्यायाश्च] ऋत्विगभ्य "इदमन्वब्रूवत इति विज्ञाानकथनम् इतिकर्त्तव्यताकरणञ्च इतीतेषा कर्मणा विनियोग उक्तः । इस ऋचामें होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्यु, चारो ऋत्विजोका कर्म निरूपण किय है। जैसे होता नाम ऋत्विज् कर्मकालमे ऐसी ऋचाओकों अध्ययन करता है, जिनमे देवताओके यथार्थ स्वरूप तथा कर्मके मर्मस्थानोकी क्रियाका वर्णन होता है, एवम् जिनके अध्ययनसे कर्मका पोषण होता है। उद्गाता ऋत्विज् शक्वरी नामवाली ऋचाओमे गायत्र छन्दका गान करतां है। अर्थात उद्गाताका सामगानरूप कर्म नियत है। ब्रह्मनाम एक ऋत्विज् कर्ममे कोई प्रायश्चित्त उपस्थित होनेपर अन्य ऋत्विजोको उसका विज्ञान कराता है, कि 'यज्ञा यह करो'। क्योकि ब्रह्मा तीनो वेदोका जानर्न वाला होनेसे सब विद्याओका वक्ता होता है। जो सब ज्ञज्ञ नहीं होता वह ऐसे अधिकारको नही निभा सकता। और अध्वयु नाम ऋत्विज् यज्ञअकी नानाप्रकारकी इतिकृत्त ग्यताको करता है। इसका व्याख्यान १ माध्यार्क ६ठ पाद ४ खण्डमें देखो। व्याख्यान अ०१ पा०६ ख०३ मे देखी। “उ॒तत्व॒: पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॒-मु॒तत्व॒: शृ॒ण्वन्नशृ॑णोत्येनाम् । उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं १ विस॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑ ॥ [ऋ० स० ८, २, २३, ४] ५ बृहस्पति ऋषि। विद्यामक्त ऐसे मनुष्य जो सब नेत्रवाले है, इतना ही नहीं, बल्कि— उनको सभी इन्द्रियां समान हैं, तथा पीठ, पेट, हाथ और पांव भी समान है, एवम् सभी मनुष्य सखि नाम समान जानकारी- वाले हैं, अथवा समान शास्त्रोंमें श्रम किये हुये है, अर्थात् वैयाकरण वैयाकरणोंके ही समानख्यान है, नैरुक्त (निरुक्तके पढ़नेवाले) नैरुक्तोंके ही समानख्यान (ज्ञान) हैं, तो भी वे मनोगम्य (प्रतिभासे जानने
हिन्दी निरुक्त । ६५ [ (३) पदपूरण ] क्रियावाचकमाख्यातमुपसर्गोविशेषकृत् । सत्त्वाभिधायकं नाम निपातः पदपूरणः ॥ कम्, ईम, इत् और उ,और कहीं कहीं इव य निपात गद्यग्रन्थोमे वाक्यपूरण और पद्य-ग्रन्थोंमें पदपूरण होते है । ये प्रायः अनर्थक होते है, अर्थवान् कदाचित् ही कही होते होगे ॥ कम्—पदपूरण—वेदे—१ निष्षक्रासश्चिद्विन्नरो भूरितोका वृकादिव । बिभ्यस्यन्तो ववाशिरे शिशिरञ्चोवनाय कम् ॥ २—मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कम् [ऋ० स० ८, ८, १६, १] { व्याख्या - कम् इति पदपूरण एव, } { जीवनाय कम् जीवनाथमित्यर्थ } [ आ-इम-ण्ण | ] योग्य) अर्थोंमे समान नही होते, किन्तु कोई पुरुष ऊहा, अपोहन, धारण और वक्तृत्वमें समर्थ होते है और कोई मेधा रहित होते हैं वे सच्ची बातोतक पहुचते नही । ये किस प्रकार परस्पर असमान है, यह दृष्टान्तसे प्रतिपादन करता है ।—कोई विद्वान् बुद्धिसे उस ह्रद (तडाग) के समान हैं, जिसमे मनुष्यके मुखके बराबर जल भरा हुआ है, कोई काखके समान जलवाले ह्रदके समान है, और कोई विद्वान् अपरिमित जलवाले तडागोके समान है, अर्थात् उनके प्रज्ञानका कोई प्रमाण नही है, वे ऐसे दिखाई देते हैं ।
- आ-इम एनम् = एसनम् । आ ( आङ् उप० ) आमुखा अर्थ मे 'सन्नत' क्रियामें स युक्त हांगया, और 'णभ्' उसीका कर्मकारक है, तथा 'इम्' निरर्थक होकर पदपूरण मात्र करता है । , "शिशिरञ्चौवनाय कम्" इस उदाहरणका शेषभाग वृत्तिकारको सन्तोषदायक नही मिला इससे उन्होंने "गाथ्वान्तरंषु ग्रैषो दृष्ट्वा " ऐसा कर दिया है। जो कुछ
६६ अ० १ पा० ३ ख० ६ । ईम्--पदपूरण--वेदे--*एमेनं सृजता सुते .(ऋ०स० १,१,१७,२)
- व्याख्या:-आसृजतैनं सुते--आभिमुख्येन-'ईम्' इति पदपूरण एव । इत्--पदपूरण--वेदे--१ तमिद्वर्द्धन्तु नो गिरो वत्स सशिश्वरीरिव । य इन्द्रस्य हृद् सनिः [ऋ०सं०-७ १-२०-५] उ--पदपूरण--वेदे--२ अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥ [ऋ०स०१-२-२८-४] अयम् इति वर्त्तमान सन् अय मान य प्रात नित्यकालमेव त्वं सम्पतसि उ-इति पदपूरण ( षष्ठः खण्डः ) ( कदाचित् ) इव--वाक्यपूरण (१) सुविदुरिव व्या०( सृष्टु विदु यज्ञज्ञ ब्राह्मण, इति ) (२) सुविज्ञायते इव [इवोऽनर्थक एव वाक्य पूरण ] [व्याख्या —सृष्ट विज्ञायते यज्ञज्ञो नक्षत्र ब्राह्मणै ]
उनको पाठ मिला वह उन्होंने पूर्णरूपसे यह उद्धृत कर दिया है । किन्तु “केचित्” पदके द्वारा इसमें वे अपनो अरुचि प्रकट करते है। प० सत्यव्रत सामश्रमी महाशयने इसका ऋक्सं हितामे पता दिया है वहाँ दूसरे उदाहरणके अनुसार पता व पाठ है । “शिशिरं जीवनाय कम्” इस मन्त्रमें ‘कम्’ यह निपात पदपूरण है । शेष वाक्यका यह अर्थ है, कि-शिशिर ऋतु प्राणियोंके जीवनके लिये होता है क्योकि उसमें शरद्ऋतुके बोये हुये धान्य बहुत निपजते है । सम्पूर्ण मन्त्रका अर्थ--कोई वस्त्रहीन बहुतसन्तानवाले दरिद्र मनुष्य हेमन्तऋतुमे शीतसे भेड़ियेके समान डरते हुये बार बार चिल्लाते हैं, कि 'हमारे जीवनके लिये शिशिर ऋतु आता है,
हिन्दी निरुक्त । ६७ (४) निपात समाहार. नेत्—०—परिभये—वेदे—१ हविर्भिरेके स्वरितः सचन्ते (न+इत्) (सर्वतोभये) सुन्वन्त एके सवनेषु सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभि र्ने ज्जिह्मा- यन्त्यो नरकम्पतामेति ॥ व्याख्या —नेत्—इति पदपूरण वय जिह्मायन्ता जिह्मम् आचरन्त्य भगवन्- } नरकं पताम नचेत्— अनुपृष्टेऽर्थे—लौके—नचेत् सुरां पिबन्ति (न+च+इत्) व्याख्या — { कोई किसीसे पूछता ह प्र० खड हैं शूद्र उ० खड़े हैं । अनु० प्र० खड हे तब क्यों नहीं आजाते पुन उ० नचेत् सुरा पिबन्त्यागमिष्यन्ति यदि सुरा नहीं पीते हैं तो आजायेंगे । क्योकि उसमे बहुत थोड़ा शीत होता है, उनमें हम सुखसे जीयेंगे” ॥ १ अमहीयु आङ्गिरस ऋषि । सोम देवता । गायत्री छन्द । ग्रावस्तुतिमं विनियोग है । हमारी गिरायें (वाणियें) उस सोमको, जो इन्द्रके हृदयमें लगता है, बढ़ावें, जैसे-एक बच्छेवाली बहुतसीं गौवें क्रम क्रमसे अपन अपन दुग्धोसे एक बच्छेका पोषण करती हैं। अर्थात् बहुत गौओंके और और बच्चे मर जानेपर कदाचित् उनका एक बच्छा ही जीता रहे और वे सब उसी वत्ससे अपना स्नेह कर लें । तथा उसे ही अपना अपना दुग्ध पिलाने लगें । १३
६८ अ० १ पा० ३ ख० ६ । (नोट) इस प्रकार अनेक (ऊंचे नीचे) अर्थोंमें निपात समाहार आते हैं। वे सब लक्षण शास्त्रके अनुसार (निरुक्तकी रीतिसे) कौन किस अर्थमें हैं सो देख लेने चाहियें। ( इति तृतीयः पादः समाप्तः ) २ यूपमें नियुक्त हुये शुनःशेपने अपने मोक्षकी इच्छासे इस गायत्री छन्दसे इन्द्रकी स्तुतिकी है। हे इन्द्र ! जिस प्रकार कपोत (कबूतर) कपोतिका (कब्तूरी) या अपने अण्डोंवाले घोंसलेके प्रति बार बार गिरता है उसी प्रकार जिस सोमके प्रति तू नित्यकाल ही गिरता है, वही यह सोम ऋत्विजोंसे तैयार किया हुआ है। इससे हमसे तुम्हारा यह क्या प्रयोजन होगा ? हमे छुड़ा दे। क्या हमारे बार बार रोते हुओंके स्तुतिरूप इस वचनके अभि- प्रायको तू नहीं जानता ? कि हम किस प्रयोजनसे यह कह रहे हैं। कौनसे तुम्हारे गुण इसमें नहीं आये, जिससे कि तू हमें इस यूपसे नहो छुड़ाता है। अर्थात् यह सुन कर बुद्धिसे अर्थको जानकर तथा हमारी आर्त्तता (पीड़ा) को निश्चय करके कारुण्य भावसे हमे छुड़ा दे। भाव यह है कि हमसे हो तुम्हारा क्या प्रयोजन है; जब कि हमसे भी बहुत उत्तम सोमरस तुम्हारे लिये अभिषुत तैयार है। १ ऐसा सुना गया है कि नारदजीने परीक्षार्थ असुरोंकी स्त्रियोंको उनके पतियोंमें अश्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये कुछ धोखेकी बात कही थी, उसीका उत्तर उन्होंने नारद जीको इस मन्त्रसे दिया है। कोई पुरुष देवताओके लिये पुरोडाश आदि रूप हवि देकर इस लोकसे स्वर्गमें जाते हैं। कोई सोमयाग करके स्वर्गमें चले जाते हैं, कोई स्तुति करके, एवम् कोई बहुत दक्षिणाओंके दानसे स्वर्गको प्राप्त कर लेते हैं, इस रीतिसे भिन्न भिन्न उपायोंसे अपने अपने
अथ द्वितीय-तृतीय-पादयोः ————— प्रासङ्गिकाः शब्दाः। (द्वितीयः पादः) २-यः खण्डः। (चित्) (१) आचार्य्यः = (१) आचारं ग्राहयति (२) आचिनोत्यर्थान् (३) आचिनोति बुद्धिम्। (२) कुल्माषाः = कुलेषु सीदन्ति ” ३-यः खण्डः। (नु) (१) वयाः = शाखाः वेतेः-वातायना भवन्ति (२) शाखाः = खशयाः शक्नोतेर्वा (चादि) कर्मोपसङ्ग्रहः = यस्यागमात् अर्थ पृथक्त्वमह विज्ञा- यते नत्वौद्देशिकमिव विग्रहेण पृथक्त्वात् स कर्मोपसङ्ग्रहः ॥ ———— ( ३-यः पादः ) १-मः खण्डः। (क) (नूनम्) (१) न नूनमस्ति- विनश्यति = अगस्त्य इन्द्राय ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ कल्याणके प्रति सब प्राणियोंके उद्यत होने पर, हमें भी जप होम आदिका अधिकार न रहनेसे अपने कल्याणके अर्थ पतियोंकी सेवा करना चाहिये, जो कि स्त्रियोंके लिये एकमात्र उपाय है। यदि हम उसे भी न करें, या उनसे भो छल करें तो हमें नरक ही मिलेगा। भाव यह है कि स्त्रियोंके लिये पतिसेवासे अन्य और कोई धर्म नहीं है॥
१०० अ० १ पा० ३ ख० २ । हविर्निरूप्य मरुद्भ्यः [विचिकित्सा] सम्प्रदित्सांचकार सइन्द्र एत्य परिदेवयांचक्रे । (२) परिदेवना = मन्युपूर्वको विलापः । (३) द्युः = इति अह्नो नामधेयं द्योतते इति सतः, (द्योतते इति कर्तृकारकम् ) सतः-सदिति यत्र ब्रूयात् तत्रो- च्चारित एव कारकनियमो द्रष्टव्यः अन्यत्र यथेष्टं योज्यम् । (४) श्वः = उपशंसनीयः कालः । (५) ह्यः = ह्नो हीनः कालः । (६) अद्भुतम् = अभूतम्, अभूतमिवान्यस्य, शोणितवर्षादि, अभूतमिव कादाचित्कत्वात् । (७) अभिसञ्चरेण्यम् = अभिसञ्चारि । (८) अन्यः = (१) नानेयः—नानात्वेन व्यवस्थितस्य असत्कुलजस्यापत्यम्, ( २ ) अथवा न सतामानेयः । (९) चितम् = चेततेः । (१०) आधीतम् = आध्यातम् अभिप्रेतम् । २-यः खण्डः । (ख) (नूनम्)॰ (१) वरः = वरयितव्यो भवति । [ पदपूरणे ] (२) जरिता = गरिता इति स्तुत्यर्थस्य । (३) मघोनी = मघवती (धनवती) । (४) मघम् = धनम् ( मंहतेर्दानकर्मणः )