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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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परिमल संस्कृत ग्रन्थमाला—46

श्रीभर्तृहरिविरचितम्

नीतिशतकम्

(विस्तृत भूमिका, अन्वय, हिन्दी अनुवाद, 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या,
व्याकरणात्मक एवं आलोचनात्मक टिप्पणी सहित)

व्याख्याकार
डॉ० राकेश शास्त्री
बी० ए० (आनर्स), एम. ए. (संस्कृत)) डी.फिल्.
साहित्य-पुराणेतिहासाचार्य (लब्धस्वर्णपदक द्वय)
अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
बांसवाड़ा (राजस्थान)


परिमल पब्लिकेशन्स
दिल्ली - ११०००७

प्रकाशक
परिमल पब्लिकेशन्स
२७/२८, शक्ति नगर
दिल्ली- ११०००७

© लेखक
द्वितीय संस्करण १९९८
तृतीय संस्करण २००३

मूल्य : ६०.०० रुपये

ISBN: 81-7110-132-8

मुद्रक
हिमांशु लेजर सिस्टम
४६, संस्कृत नगर
रोहिणी सेक्टर- १४
दिल्ली-११००८५
फोन- ७८६२१८३

समर्पण

हिन्दी जगत् की
प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं कहानीकार,
स्नेह ममता एवं वात्सल्य की प्रतिपूर्ति,
प्रातःस्मरणीया, पूजनीया अम्मा जी,
डॉ० शशि प्रभा शास्त्री
के कर-कमलों में
सादर समर्पित

पुस्तक परिचय

संस्कृत में खण्डकाव्य के अन्तर्गत स्तोत्र एवं नीति-विषयक काव्य प्रायः मुक्तक काव्य के रूप में उपलब्ध होते हैं। महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित शृंगारशतक, नीतिशतक तथा वैराग्य शतक, मुक्तक काव्य के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। इस शतक के सौ से अधिक श्लोकों में कवि ने विद्या, परोपकार, वीरता, परिश्रम, साहस और उदारता आदि उदात्त मनोभावों का सरल भाषा में मनोहारी चित्रण किया है। इसमें कवि के ऐश्वर्य सम्पन्न राजाओं की निष्ठुरता, हृदयहीनता, अहंकारिता, दुर्जनों एवं मूर्खों के द्वारा सज्जनों को दिए जाने वाले कष्टों एवं अपमान का चित्रण करते हुए, उसके प्रति विद्रोहात्मक स्वर को मुखरता मिली हैं। अनेक नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए, मानवतावादी दृष्टिकोण को अत्यन्त हृदयग्राही रूप में यहाँ चित्रित किया गया है। वस्तुतः नीतिशतकम् सम्पूर्ण सूक्ति-साहित्य का अलंकार स्वरूप ग्रन्थ है, जिसमें अनेक दीप्तिमान् माणिक स्थल-स्थल पर जड़े हुए हैं।


लेखक परिचय

राजकीय महाविद्यालय, बांसवाड़ा में स्नातकोत्तर संस्कृत-विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत डॉ० राकेश शास्त्री संस्कृत के लिए पूर्णतया समर्पित व्यक्तित्व हैं। आपने राजस्थान के सुदूर आदिवासी जनजाति बहुल अंचल में संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए अनेक कार्य करके उल्लेखनीय योगदान दिया है। यही कारण है कि आज इस क्षेत्र में युवापीढ़ी में संस्कृत के प्रति रुझान बढ़ा है।

२० मार्च १९५५ में मेरठ के निकट दोराला ग्राम में जन्मे डॉ० शास्त्री ने सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की हैं। साथ ही बी०ए० (आनर्स), १९७५ की परीक्षा में महाविद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्तकर वि० वी० की मैरिट लिस्ट में छठा स्थान प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त पुराणितिहासाचार्य परीक्षा में सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि० वी० में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। आपका शोधकार्य ऋग्वेद के निपातों पर है।

आपकी अबतक वेद, उपनिषद्, दर्शन, व्याकरण साहित्य एवं पुराणों पर लगभग १० पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संस्कृत को सरल करने की दिशा में आपका उल्लेखनीय योगदान है। आपकी एक व्याकरण पुस्तक "स्नातक संस्कृत सरला' को राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा मार्च, ९७ में नवोदित प्रतिभा पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

अध्ययन, अध्यापन, लेखन एवं शोध में आपकी गहन रुचि है। बहुत शीघ्र ही आपकी कुछ अन्य पुस्तकें प्रकाशित होने वाली हैं।

प्रकाशित-पुस्तक सूची

१. ऋग्वेद के नियात, २. मार्कण्डेय महापुराण (हिन्दी अनुवाद), ३. मधु कणिका४. स्नातक संस्कृत सरला, ५. नीतिशतकम्, ६. ऋक् सूक्त चन्द्रिका, ७. बृहदारण्य कोपनिषद् (तृतीय अध्याय), ८. सुगम संस्कृत व्याकरण, ९. सांख्यकारिका, १०. मनुस्मृति (द्वितीय अध्याय), ११. नागानन्दम्

दो शब्द

नीतिशतकम् की प्रस्तुत पुस्तक को देखकर यह उत्सुकता स्वाभाविक है कि इतनी व्याख्याएँ होने पर एक और व्याख्या क्यों? इस विषय में मेरा विनम्र निवेदन है कि हमारे विद्यार्थियों की एक जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से रहती है कि किसी श्लोक की हिन्दी व्याख्या किस प्रकार की जाए, क्योंकि उपलब्ध नीतिशतकम् की व्याख्याओं से उनकी इस जिज्ञासा की निवृत्ति नहीं होती। इसी बात को ध्यान में रखते हुए यह व्याख्या लिखने का विनम्र प्रयास किया गया है।

यह व्याख्या मेरे पिछले लगभग १५ वर्षों के अध्यापन अनुभव का परिणाम है। इस विषय में मेरा प्रयत्न रहा है कि यह पुस्तक विद्यार्थियों के लिए साक्षात् अध्यापक के समान मार्गदर्शन करे, क्योंकि इसमें अत्यन्त सरल बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। कठिन और संस्कृतनिष्ठ शब्दों से प्रायः बचने का ही प्रयास रहा है।

मूल श्लोकों के बाद अन्वय, शब्दानुसार हिन्दी अनुवाद देने के बाद विस्तृत हिन्दी व्याख्या दी गई है। व्याख्या में श्लोक में निहित गूढ़तम भावों को भी स्पष्ट करने का प्रयास रहा है। तत्पश्चात् व्याख्यात्मक एवं व्याकरणात्मक टिप्पणियाँ देते हुए श्लोक की सर्वांगीण व्याख्या प्रस्तुत करना ही प्रमुख दृष्टिकोण रहा है।

विशेष के अन्तर्गत श्लोक में निहित गूढ़ रहस्यों, अलंकार, छन्द आदि का उल्लेख किया गया है। छन्दों का यद्यपि बार-बार प्रयोग हुआ है, तथापि छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए छन्दों का लक्षण उसी स्थल पर बार-बार दिया गया है। इसके पीछे भावना रही है कि उन छन्दों के लक्षण बार-बार पढ़ने से हमारे छात्र उन्हें हृदयंगम कर सकें।

व्याकरणात्मक टिप्पणी के अन्तर्गत शब्द निर्माण में धातु, प्रकृति, प्रत्यय, समास-विग्रह, समास का नाम आदि विस्तारपूर्वक दिए गए हैं। इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य रहा है कि छात्रों के व्याकरण विषयक ज्ञान में वृद्धि हो। इसी शीर्षक के अन्तर्गत संधि-विच्छेद करके संधि का नाम तथा संधि-सूत्र का भी उल्लेख किया गया है, जिससे छात्रों को संधि के स्वरूप को समझ कर श्लोक के अर्थ को समझने में भी सहायता प्राप्त हो।

नीतिशतकम् की सभी उपलब्ध प्रतियों में श्लोकों का क्रम एक जैसा नहीं है। साथ ही कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जो कुछ प्रतियों में नहीं मिलते हैं। हमने इन सभी श्लोकों का विषयवार संग्रह करके विद्यार्थियों के हित को देखते हुए सभी की व्याख्या प्रस्तुत की है।

तथा श्लोकों का क्रम निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित भर्तृहरित्रिशती के आधार पर रखा है।

पुस्तक के प्रारम्भ में विस्तृत भूमिका दी गई है। जिसमें गीतिकाव्य का स्वरूप, गीतिकाव्य का उद्भव एवं विकास, संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ आदि विषयों का तथा कवि भर्तृहरि के जीवनचरित, स्थितिकाल, कृतियाँ एवं भाषा शैली आदि का विस्तार से उल्लेख किया है, क्योंकि अधिकांश विश्वविद्यालयों में कवि एवं कृति पर प्रश्न पूछने की परम्परा रही है।

भूमिका में ही सभी दस पद्धतियों का सारांश देने का विचार था, किन्तु उससे पुस्तक के कलेवर में अत्यधिक वृद्धि हो जाती, जिससे बचने के लिए हमने परिशिष्ट में केवल एक विद्वत्पद्धति का सारांश दे दिया है। छात्रों को उसके आधार पर ही अन्य पद्धतियों के सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।

कुछ विश्वविद्यालयों में श्लोकों की संस्कृत व्याख्या भी परीक्षा में पूछी जाती है। हमने प्रत्येक श्लोक की संस्कृत व्याख्या न करके नमूने के रूप में एक श्लोक की व्याख्या परिशिष्ट में दी है। उसके आधार पर अन्य श्लोकों की संस्कृत व्याख्या की जा सकती है।

छात्रों में एक जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए श्लोक की हम किस प्रकार हिन्दी व्याख्या करें। उनकी इस जिज्ञासा के लिए हमने परिशिष्ट में एक हिन्दी व्याख्या भी उदाहरण रूप में दी है।

प्रत्येक श्लोक के कुछ कठिन शब्दों के अर्थों को भी परिशिष्ट के अन्तर्गत पुस्तक के अन्त में अकारादिक्रम में दिया गया है। साथ ही वहीं पर श्लोकानुक्रमणिका का भी उल्लेख किया गया है।

तदनन्तर में इस पुस्तक की प्रेरणास्रोत मेरी शक्ति-स्वरूपा सहधर्मिणी डॉ. प्रतिमा शास्त्री, व्याख्याता (स्कूल-शिक्षा) के प्रति भूरिशः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। जिन्होंने मुझे बार-बार स्मरण कराते हुए इस कार्य को शीघ्र पूर्ण करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया एवं अनेक दायित्वों को अपने ऊपर लेकर सहयोग प्रदान किया। कु० प्राची शास्त्री ने तो पाण्डुलिपि तैयार करने में भी अनेकशः सहायता की है। एतदर्थ उसे कोटिशः आशीर्वाद। नन्हें आत्मज आयुष्मान् सुवासित शास्त्री को भी असीम शुभकामनाएँ और हार्दिक प्यार इस कामना के साथ कि उसका भी निरन्तर संस्कृत के अध्ययन के प्रति रुझान हो।

अन्त में मैं संक्षेप में केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि हमारी आने वाली संस्कृत अध्येता छात्रों की पीढ़ी का व्याकरण विषयक ज्ञान अत्यल्प है। वह इसे अत्यन्त क्लिष्ट

समझती है। प्रस्तुत पुस्तक उसकी इस भावना को दूर करने का एक तुच्छ प्रयास मात्र है। जो अत्यन्त विनम्र भाव से अर्पित है।

इस पुस्तक के लेखन में मुझे अभी तक प्रकाशित सभी नीतिशतकम् की व्याख्याओं से सहायता प्राप्त हुई, एतदर्थ मैं उन सभी के विद्वान् व्याख्याकारों का हृदय से आभार व्यक्त करना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूँ। इति शम्

१४ मार्च, १९९६ -
शास्त्री निलयम्, १ एच ३१,
हाउसिंग बोर्ड कालोनी,
बांसवाड़ा - ३२७००१
दूरभाष - ०२९६२/४१०२६

विदुषां वशंवद
राकेश शास्त्री

विषय-सूची

१. दो शब्द
२. भूमिका
(क) गीतिकाव्य का स्वरूप१०
(ख) गीतिकाव्य का उद्भव एवं विकास१०
(ग) संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ११
(घ) भर्तृहरि का जीवन चरित१३
(ङ) स्थितिकाल१५
(च) कृतियाँ१७
(छ) भाषा शैली१८
अथ नीतिशतकम्
४. मूर्ख पद्धति,३
५. विद्वत्पद्धति१९
६. मानशौर्य पद्धति३६
७. अर्थ पद्धति५२
८. दुर्जन पद्धति६७
९. सज्जन पद्धति८०
१०. परोपकार पद्धति९६
११. धैर्य पद्धति११२
१२. दैव पद्धति१२६
१३. कर्म पद्धति१४४
१४. परिशिष्ट१६१
(क) संस्कृत व्याख्या (उदाहरण रूप में)१६१
(ख) हिन्दी व्याख्या (उदाहरण रूप में)१६२
(ग) विद्वत्पद्धति का सारांश१६२
(घ) शब्दार्थ (अकारादिक्रम में)१६४
(ङ) श्लोकानुक्रमणिका१६९

भूमिका

संस्कृत भारत की ही नहीं, अपितु विश्व की सर्वाधिक प्राचीन भाषा है। सम्पूर्ण विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद भी इसी भाषा में निबद्ध है। भारत के प्राचीन वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए हमारे समक्ष संस्कृत भाषा के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।

संस्कृत में निबद्ध साहित्य भी इतना समृद्ध है कि उसकी उपमा अथवा साम्य विश्व के किसी भी अन्य साहित्य के साथ करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है।

इस सम्पूर्ण साहित्य को हम प्रथमतः दो भागों में विभाजित कर सकते हैं। १. वैदिक संस्कृत साहित्य २. लौकिक संस्कृत साहित्य। वैदिक साहित्य के अन्तर्गत संहिता ग्रन्थों से लेकर ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदाङ्ग एवं सूत्र ग्रन्थों तक समस्त साहित्य आ जाता है।

वैदिक संस्कृत के समानान्तर ही एक लौकिक संस्कृत की धारा भी अविरत गति से प्रवाहमान होती दिखाई देती है। जिसके दर्शन हमें पुराणों में होते हैं। सम्भवतः इसी कारण विद्वानों ने “पुराणं पञ्चमो वेदः” कहकर उसे वेद के निकट माना। यह संस्कृत अत्यन्त सरल एवं जनसामान्य की रही।

किन्तु बाद में रामायण काल से इसी भाषा में काव्यों की रचना की गई। जहाँ से लौकिक संस्कृत के व्यवस्थित रूप से दर्शन होते हैं। इसी कारण रामायण को आदिकाव्य और महाकवि वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है।

उपलब्ध समस्त लौकिक संस्कृत साहित्य को शैली की दृष्टि से प्रथमतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है— दृश्यकाव्य और श्रव्यकाव्य। दृश्य काव्य के अन्तर्गत रूपक उपरूपक आदि आते हैं तथा श्रव्य काव्य को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं— गद्य, पद्य और चम्पूकाव्य।

इनमें भी पद्य काव्य के पुनः दो भेद महाकाव्य और खण्डकाव्य तथा गद्य काव्य के कथा और आख्यायिका किए जा सकते हैं। पद्यकाव्य के भेद खण्डकाव्य को विषय की दृष्टि से स्तोत्र, नीति और शृंगारि काव्य के रूप में तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। इस सम्पूर्ण विभाजन को इस प्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं—


                              काव्य
                   _____________|_____________
                  |                           |
                श्रव्य                       दृश्य
         _________|_________             _____|_____
        |         |         |           |           |
       गद्य      पद्य      चम्पू       रूपक       उपरूपक
        |         |                     |           |
    (१) कथा    महाकाव्य             (नाटकादि     (नाटिकादि
    (२) आख्यायिका  |                 १० भेद)     १८ भेद)
              खण्डकाव्य (गीति काव्य)
                  |
        १. स्तोत्र  २. नीति  ३. शृंगारि

१०

इनमें स्तोत्र एवं नीति-विषयक काव्य प्रायः मुक्तक काव्य के रूप में उपलब्ध होते हैं। यहाँ मुक्तकों से अभिप्राय उन स्वतन्त्र छन्दोबद्ध रचनाओं से है जिनमें पूर्वापर प्रसङ्ग की अपेक्षा नहीं होती, अपितु इनका प्रत्येक पद्य स्वतन्त्र रूप से अपने अभिप्राय को अभिव्यक्त करने में पूर्णतया समर्थ तथा स्वतः पूर्ण रसास्वादन कराने में सक्षम होता है।

महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित शृंगार शतक, नीतिशतक तथा वैराग्य शतक, मुक्तक काव्य के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। यहाँ हमारा विवेच्य इस शतकत्रय में से नीतिशतकम् है जो लौकिक संस्कृत साहित्य की श्रव्य-काव्य परम्परा में पद्यकाव्य की खण्डकाव्य अथवा गीतिकाव्य कोटि के अन्तर्गत नीतिपरक मुक्तक काव्य के रूप में परिगणित है।

अतः इस ग्रन्थ के विवेचन से पूर्व गीतिकाव्य के विषय में विस्तार से ज्ञान प्राप्त करना उचित होगा।

(क) गीतिकाव्य का स्वरूप- काव्य का वह स्वरूप जिसमें पद्यबद्ध रचनाएँ होने के साथ-साथ पूर्वा-पर प्रसङ्ग की आवश्यकता नहीं होती अर्थात् प्रत्येक पद्य भावाभिव्यक्ति में पूर्णतया स्वतन्त्र होता है, शास्त्रीय दृष्टि से खण्डकाव्य का ही दूसरा नाम गीतिकाव्य है, जिसमें काव्यतत्त्व के साथ-साथ संगीतात्मकता की प्रमुखता और भावों की प्रधानता होती है।

प्राचीन ग्रन्थों में गीतिकाव्य के स्वरूप पर विचार किया गया है— १. मुक्तकं श्लोक एवैकश्चमत्कार क्षमः सत्ताम्। (अग्निपुराण ३३७-३६) २. खण्डकाव्यं भवेत् काव्यस्यैकदेशानुसारि च। (साहित्यदर्पण. ६.३३९) ३. पूर्वापरनिरपेक्षेणापि येन रसचर्वणा क्रियते तदेवमुक्तम्। (ध्वन्यालोक)

उक्त बातों को ध्यान में रखते हुए ही डॉ. कपिलदेव द्विवेदी ने गीतिकाव्य को परिभाषित करने का सुन्दर प्रयास किया है— ‘‘गीतिकाव्य भाव-प्रधान होते हैं। इनमें अन्तरात्मा की ध्वनि होती है। जीवन का कोई एक पक्ष वर्णित होता है। महाकाव्य यदि जीवन की समग्रता है तो गीतिकाव्य एक देशीयता। महाकाव्य में विस्तार है तो गीतिकाव्य में घनत्व। महाकाव्य में शिथिलता है तो गीतिकाव्य में एकाग्रता और तन्मयता है।’’

(ख) गीतिकाव्य का उद्भव और विकास- जिस प्रकार सभी प्रकार की साहित्यिक विधाओं का उद्गमस्थल वेद को माना गया है। ठीक उसी प्रकार गीतिकाव्य के बीज भी हमें ऋग्वेद में सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। वहाँ विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियों में मुक्तक स्तोत्रसाहित्य के मूलतत्त्व हमें उपलब्ध होते हैं। इन स्तुतियों में भी हमें भावुकता परिलक्षित होती है।

इसके पश्चात् विकासक्रम की दृष्टि से गीतिकाव्य के लक्षण हमें आदिकाव्य रामायण, पुराण, महाभारत आदि में अनेक स्थलों पर विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियों

११

में प्राप्त होते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि यहाँ तक के साहित्य में प्रायः स्तोत्र गीतिकाव्य के ही दर्शन होते हैं। जिसे हम धार्मिक गीतिकाव्य भी कह सकते हैं। परवर्ती पौराणिक साहित्य में इसका विकसित रूप देखने को मिलता है।

किन्तु लौकिक संस्कृत साहित्य में गीतिकाव्य का वर्तमान स्वरूप हमें विधिवत् रूप से महाकवि कालिदास के मेघदूत तथा ऋतुसंहार में परिलक्षित होता है। इसके बाद इस परम्परा का दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ घटकर्पर का २२ पद्यों में निबद्ध घटकर्पर काव्य है। जिसमें वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में एक विरहिणी पत्नी दूर स्थित अपने पति के पास अपना संदेश प्रेषित करती है।

पुनः इसी प्रणयसंदेश परम्परा में कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का गीतिकाव्य साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, जिनमें कृष्णमूर्ति का यज्ञोल्लास, श्रीराम शास्त्री का मेघ प्रति संदेश, महाकवि विक्रम का नेमिदूत, वेदान्त देशिक का हंस-संदेश, रुद्रवाचस्पति का भ्रमरदूत, वेंकटाचार्य का कोकिल-संदेश एवं कृष्णचन्द्र पन्त का चन्द्रदूत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इसी परम्परा को पोषित करने वाले ग्रन्थों में महाकवि जयदेव विरचित गीतगोविन्द विशेषतया उल्लेखनीय है। महाकवि हाल (सन् १२५ ई.) की गाथा सप्तशती, महाकवि भर्तृहरि (छठीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) का नीतिशतक, शृंगारशतक तथा वैराग्यशतक, महाकवि अमरु (लगभग ७०० ई.) का अमरुशतक, महाकवि विल्हण की चौरपंचाशिका आदि इसी परम्परा के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं।

महाकवि हाल के अनुकरण पर ही गोवर्धनाचार्य ने आर्यासप्तशती की रचना की। गीतिकाव्यों की परम्परा में पण्डित जगन्नाथ का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने पीयूष-लहरी, सुधा-लहरी, करुणा-लहरी, यमुना वर्णन, भामिनी-विलास आदि ग्रन्थों का प्रणयन करके स्तोत्र गीतिकाव्य में श्री वृद्धि की।

इसके अतिरिक्त इस परम्परा के कुछ उल्लेखनीय ग्रन्थ इस प्रकार हैं— शारङ्गधर-पद्धति, उद्भट-सागर, शंकराचार्य का चतुःशतक, पुष्पदन्त का महिम्नस्तोत्र, आनन्दवर्धनाचार्य का देवीशतक, यामुनाचार्य का चतुःश्लोकी स्तोत्ररत्न तथा महाकवि जयदेव का गंगास्तव, कवीन्द्ररससमुच्चय, सदुक्तिकर्णामृत, सूक्तिमुक्तावली, सुभाषितावली, पद्यावली, पद्यरचना, काव्यसंग्रह तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारम् इत्यादि।

(ग) संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ— उपलब्ध गीतिकाव्य साहित्य के आधार पर हम कुछ विशेषताओं का यहाँ उल्लेख कर रहे हैं, जिनके कारण इन्हें सहृदय समाज में लोकप्रियता प्राप्त हुई—

१. शृंगारिकता— गीतिकाव्यों में कुछ काव्य शृंगार प्रधान हैं, किन्तु उनकी विशेषता यह है कि वहाँ प्रेम का उदात्त स्वरूप चित्रित हुआ है तथा उसके बाह्य सौन्दर्य की

१२

अपेक्षा अन्तः सौन्दर्य को प्रधानता दी गई है। शृंगार के दोनों पक्ष संयोग और वियोग का प्रभावी चित्रण इन काव्यों में देखने को मिलता है। भर्तृहरि का शृंगार शतक इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

२. कोमल भावों की प्रधानता- इनमें मानव के अत्यन्त कोमल भावों का उदात्त चित्रण देखने को मिलता है। इन काव्यों में भयानक, वीभत्स आदि रसों का प्रायः अभाव ही हैं। यही कारण है कि इनमें शृंगार, शान्त अथवा वीर रस को प्रधानता मिली है।

३. संगीतात्मकता- सभी प्रकार के गीतिकाव्यों में यह विशेषता हमें प्रमुखतया देखने को मिलती है। यहाँ सभी गेयात्मक छन्दों का चयन किया गया है, यही कारण है कि इन काव्यों में हृदय को छूने वाली वीणा की झंकार-सी स्वर की मधुरिमा का सहज ही अनुभव किया जा सकता है।

४. भावपक्ष की प्रमुखता- गीतिकाव्यों में भाव, कल्पना, संवेदनशीलता एवं अनुभूति आदि काव्य के भावपक्ष विषयक तत्त्वों को ही प्रमुखता मिली है। कलापक्ष यहाँ प्रायः सभी कवियों की दृष्टि में गौण ही रहा है। विशेषतया धार्मिक दृष्टि से लिखे गए गीतिकाव्यों में संवेदनात्मक भावों की प्रबलता का मार्मिक स्वरूप सहज ही प्रवाह रूप में देखा जा सकता है।

५. प्रसाद एवं माधुर्य गुण की प्रधानता- इन काव्यों में ओजगुण का प्रायः अभाव ही रहा है, क्योंकि भाषा का अत्यन्त सरल रूप, कोमलकान्त पदावली के साथ सहजता और सरसता में अभिवृद्धि करता हुआ, यहाँ सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।

६. जीवन के सभी पक्षों का चित्रण- संस्कृत गीतिकाव्यों में जीवन के सभी पक्षों प्रेम, भक्ति, सुख, दुःख, वैराग्य आदि सभी का स्पर्श किया गया है। वास्तविकता तो यह है कि मानव के जीवनदर्शन को जो मुखरता आकर्षक रूप में इन काव्यों में प्राप्त हुई है, वह अन्यत्र काव्य की किसी विधा में नहीं।

७. कल्पना की स्वच्छन्दता- इन काव्यों में विषय-विशेष की सीमाओं से परे कवि हृदय को कल्पनाओं के सागर में स्वच्छन्द रूप से गोते लगाने का अधिक आनन्द प्राप्त होता है। यही कारण है कि यहाँ अनुभूति की मार्मिकता, निरीक्षण की सूक्ष्मता, भाषा की सरसता और सरलता, अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग, विचारों की नवीनता एवं छन्दों की व्यवस्था को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है।

इसके अतिरिक्त गीतिकाव्य में धार्मिकभावना, नैतिक-शिक्षा, अनुभव की गम्भीरता, नखशिख वर्णन एवं प्रकृति का मनोहारी बाह्य एवं आन्तरिक चित्रण भी देखने को मिलता है। जिनका यहाँ विस्तार की दृष्टि से विवेचन नहीं किया जा रहा है।

इसके पश्चात् अब हम गीतिकाव्य के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण नीतिशतकम् के रचयिता महाकवि भर्तृहरि के विषय में विचार करेंगे-

१३

(घ) भर्तृहरि का जीवन-चरित- महाकवि भर्तृहरि के जीवनचरित के विषय में कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु जनश्रुति के आधार पर कुछ कथाएँ प्रचलित हैं, जिनका हम यहाँ संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं—

महाराजा गंधर्वसेन की दो पत्नियाँ थीं, जिनमें से एक के पुत्र महाकवि भर्तृहरि थे और दूसरी पत्नी के पुत्र का नाम विक्रम था। विक्रम की माता मालवा के राजा की पुत्री थी। उस समय मालवा की राजधानी धारा थी। विक्रम और भर्तृहरि की शिक्षा-दीक्षा उनके नाना धाराधिपति की देखरेख में ही सम्पन्न हुई। शिक्षा पूर्ण होने पर उन्होंने अपने नाती विक्रम को अपना राज्य देने की इच्छा प्रकट की, क्योंकि उन्हें कोई पुत्र नहीं था।

किन्तु विक्रम ने अपने बड़े भाई के रहते राज्य को स्वीकार करने से मना कर दिया। अन्त में विक्रम की इच्छानुसार भर्तृहरि राजा बने और विक्रम प्रधानमन्त्री बन कर राज्य की देखभाल करने लगे। इसी बीच उन्होंने मालवा की राजधानी धारा से हटाकर उज्जैन को बना दिया।

इधर राजा भर्तृहरि भोग-विलास में डूब गए, उन्होंने राज्य की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी काल में उन्होंने शृंगार शतक की रचना की। विक्रम ने अपने बड़े भाई को बहुत समझाया, किन्तु परिणाम उल्टा ही हुआ और विक्रम एक षड्यन्त्र के शिकार होने के कारण राज्य से बाहर निकाल दिये गए। कहते हैं इसके पश्चात् विक्रम ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया, बाद में वे पूर्वी बंगाल में ढाका के निकट जाकर बस गए जो स्थान आज भी विक्रमपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

इस बीच भर्तृहरि के साथ एक महत्त्वपूर्ण घटना घटी। एक दिन अकस्मात् एक साधु राजा भर्तृहरि के पास आया और एक फल देकर कहा कि इसे खाने से अक्षययौवन की प्राप्ति होगी। राजा अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। अतः उन्होंने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया, किन्तु उनकी पत्नी किसी अन्य पुरुष से प्रेम करती थी। अतः उसने वह फल अपने प्रेमी को दे दिया। उसका प्रेमी, रानी से प्रेम न करके किसी वेश्या को अत्यधिक चाहता था। इसलिए उसने वह फल वेश्या को दे दिया। वह वेश्या भर्तृहरि के प्रति अत्यधिक श्रद्धा करती थी। अतः उसने वह फल राजा को लाकर दे दिया।

राजा उस फल को देखकर चौंक उठा। उसने इस विषय में गहन पूछताछ की तो उसे सभी प्रेम सम्बन्धों का पता चल गया। जब रानी को इस सबका पता लगा तो उसने महल से कूदकर आत्महत्या कर ली। राजा को इस सम्पूर्ण घटना से अत्यन्त दुःख हुआ। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर उन्होंने प्रस्तुत श्लोक की संरचना की—

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥

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कहते हैं कि भर्तृहरि ने इस घटना को शीघ्र ही भुला दिया और फिर से दूसरी पत्नी पिङ्गला से पहले के समान ही प्रेम करने लगे।

एक बार भर्तृहरि शिकार के लिए जंगल गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक शिकारी ने एक हिरण का शिकार किया, किन्तु उसी समय शिकारी को एक सांप ने काट लिया और वह वही मर गया। तभी उस हिरण की पत्नी वहाँ आई और अपने पति के शरीर पर मृत होकर गिर पड़ी। उधर शिकारी की पत्नी को जब शिकारी की मृत्यु का पता लगा तो उसने भी अपने पति के साथ चिता में अपने प्राण त्याग दिये।

भर्तृहरि इस सब घटनाक्रम को देखकर अत्यन्त विस्मित हुए उन्होंने घर आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त अपनी प्रियतमा पिङ्गला¹ को सुनाया। उसने बिना किसी आश्चर्य की अभिव्यक्ति करते हुए कहा कि सती तो बिना अग्नि को जलाए भी स्वयं को भस्म कर सकती है। यह सुनकर राजा चुप रहे, किन्तु उन्होंने अपनी पत्नी की परीक्षा लेने का मन ही मन निश्चय कर लिया।

एक बार वे शिकार के लिए वन में गए और वहाँ से खून में लथपथ अपने कपड़े एक सेवक के द्वारा भिजवाकर यह संदेश दिया कि 'राजा तो व्याघ्र द्वारा मारे गए' रानी यह सुनकर खून से सने कपड़े लेकर, उन्हें पृथ्वी पर रखकर, प्रणाम करके वहीं समाप्त हो गई।

उधर राजा ने जब यह सब समाचार सुना तो उन्हें बहुत गहरा धक्का लगा और उन्हें वैराग्य हो गया। उन्होंने राजकाज का परित्याग कर दिया और वन में जाकर एक तपस्वी का जीवन व्यतीत करने लगे। वहीं पर उन्होंने महान् योगी गोरखनाथ से योग की दीक्षा भी ग्रहण की और अमरत्व प्राप्त किया।

उपर्युक्त कथा के कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होते, न ही उनके ग्रन्थों से इस प्रकार की घटना का कोई संकेत प्राप्त होता है। एक मात्र श्लोक ‘‘यां चिन्तयामि’’ इत्यादि से ही इस ओर थोड़ा संकेत प्राप्त होता है, किन्तु कुछ विद्वान् इस श्लोक को ही प्रक्षिप्त मानकर इसकी प्रामाणिकता में संदेह व्यक्त करते हैं। वस्तुतः महाकवि भर्तृहरि का जीवनचरित भी कालिदास आदि अन्य प्रसिद्ध कवियों के समान ही पूर्णतया अनुमान पर ही आधारित है। उस पर भी जटिलता उस समय और अधिक बढ़ जाती है, जब भर्तृहरि नाम के अन्य व्यक्ति भी इतिहास में उपलब्ध होते हैं। इतना ही नहीं जिन विक्रम नाम के व्यक्ति को इनका बड़ा भाई बताया गया, वह विक्रमादित्य ही थे या कोई और, इस विषय में भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि विक्रम नाम के व्यक्ति भी इतिहास में अनेक हुए हैं। इसलिए यह गुत्थी बहुत अधिक उलझ जाती है। कहते हैं इनके वनप्रवास में इनकी बहन के पुत्र गोपीचन्द इनके साथ थे।


१. रानी के नाम के सम्बन्ध में विद्वानों में मतवैमत्य मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह नाम पद्माक्षी तो अन्यों के अनुसार यह नाम भानुमती या अनङ्ग सेना था।

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किन्तु उपर्युक्त कथा के आधार पर तथा भर्तृहरि के द्वारा विरचित शतकत्रय के आधार पर इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि महाकवि भर्तृहरि का सम्बन्ध राजकीय जीवन से था तथा वे अत्यन्त नीति-निपुण थे। अपने युवाकाल में उन्होंने शृंगारशतक, प्रौढावस्था में नीतिशतक तथा वनवास काल में वैराग्यशतक की रचना की।

(ङ) भर्तृहरि का स्थिति काल- महाकवि भर्तृहरि जिन्होंने शतकत्रय की रचना की, वे किस काल में हुए, इस विषय में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है। इसके प्रमुख कारण है-

१. कालिदास आदि के समान उन्होंने भी अपनी रचनाओं में कहीं भी इस ओर संकेत नहीं किया है। २. भर्तृहरि नाम से इतिहास में कुछ अन्य व्यक्ति भी हुए तथा उन्होंने भी संस्कृत ग्रन्थों की रचना की। ३. जनश्रुति के आधार पर इन्हें विक्रमादित्य के साथ जोड़ा जाता है, किन्तु ये कौन से विक्रमादित्य थे, यह भी अस्पष्ट है।

इसलिए विद्वानों ने अपने-अपने विवेक के अनुसार महाकवि भर्तृहरि के काल का निर्धारण करने का प्रयास किया है, किन्तु फिर भी विद्वानों में इस विषय में मतैक्य नहीं हो सका है। हम यहाँ इस विषय में संक्षेप में विचार कर रहे हैं-

१. एक मत के अनुसार- भर्तृहरि विक्रम संवत् का प्रारम्भ करने वाले सम्राट् विक्रमादित्य के भाई थे। अतः इनका समय ईसा पू. ५७ के लगभग मानना चाहिए। २. कुछ विद्वानों के अनुसार- ये विक्रमादित्य (६४४ ई. में) हूणों को हराने वाले थे। महाकवि भर्तृहरि इन्हीं के भाई थे। ई. पू. ५७ ई. वाले सम्राट् विक्रमादित्य के नहीं। ३. चीनी बौद्धयात्री इत्सिंग ने लिखा है कि लगभग ६५१ ई. में भर्तृहरि नामक वैयाकरण का देहान्त हुआ था। ये ही प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ 'वाक्यपदीय' के रचयिता माने जाते हैं। ४. सम्भवतः इसी आधार पर डॉ. कीथ¹ ने भी वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को ही शतकत्रय का भी रचयिता स्वीकार करते हुए उनका समय ६५० ई. के आसपास निर्धारित किया है। ५. डॉ. सूर्यकान्त² ने भी भर्तृहरि को वाक्यपदीय की रचना करने वाला स्वीकार करते हुए उनकी मृत्यु ६५१ ई. में स्वीकार की है। ६. ईसा की सप्तमशती के अन्त में स्थित अमरुक कवि द्वारा विरचित अमरुक शतक पर महाकवि भर्तृहरि के पद्यों का प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है। अतः इस


१. संस्कृत साहित्य का इतिहास- डॉ. कीथ पृ. २१५ २. संस्कृत वाङ्मय का विवेचनात्मक इतिहास- डॉ. सूर्यकान्त १९७२ पृ. २४७

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आधार पर इन्हें अमरुक कवि से कुछ पूर्व अर्थात् छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध अथवा संप्तम शती के पूर्वार्द्ध में मानना उचित प्रतीत होता है।

अब हम उपर्युक्त तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में इस विषय पर विचार कर रहे हैं—

१. प्रथम तो हमें विचार करना होगा कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य को परस्पर जोड़ना कितना उचित है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर इतना तो स्पष्ट ही है कि उनका विक्रमादित्य के साथ सम्बन्ध अधिकांश विद्वानों द्वारा तथा जनश्रुतियों में स्वीकार किया गया है।

सिंहासनद्वात्रिंशिका तथा विक्रमांकदेव चरितम् में भर्तृहरि का विशेष उल्लेख करते हुए उन्हें राजा विक्रमादित्य का बड़ा भाई बताया गया है।

हाँ इस विषय में कुछ विद्वान् इन्हें सम्राट् विक्रमादित्य का बड़ा भाई स्वीकार नहीं करते, किन्तु उनके मत में— 'विक्रमादित्य से इन्हें बड़े भाई के समान सम्मान प्राप्त था।'

अतः इतना तो सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य का कोई सम्बन्ध अवश्य था। ई. पू. ५७ में स्थित विक्रमादित्य को भर्तृहरि से जोड़ना इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि उस स्थिति से बाकी किसी भी बात का तालमेल नहीं बैठ पाता है। अतः इन्हें ईसा की सप्तम शती में स्थित विक्रमादित्य मानना ही उचित प्रतीत होता है।

हाँ, इस विषय में इतना अवश्य निश्चय से कहा जा सकता है कि चीनी यात्री इत्सिंग द्वारा उल्लिखित वैयाकरण भर्तृहरि तथा शतकत्रय के रचयिता भर्तृहरि दोनों को एक मानना किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। इसके पक्ष में कुछ तर्क प्रस्तुत हैं—

१. चीनीयात्री इत्सिंग ने भर्तृहरि को बौद्ध मतावलम्बी माना है, किन्तु शतकत्रय का सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करने पर कोई एक भी प्रमाण उनके बौद्ध धर्मावलम्बी होने का प्राप्त नहीं होता, अपितु उनके आधार पर उन्हें वैदिक धर्मावलम्बी शिवभक्त अथवा वैष्णव अवश्य कहा जा सकता है।

२. उनकी रचनाओं में जो भाषा की सरलता दृष्टिगोचर होती है वह किसी वाक्यपदीयकार जैसे उच्चकोटि के वैयाकरण से अपेक्षित प्रतीत नहीं होती, क्योंकि वह अपने व्याकरण विषयक ज्ञान के प्रदर्शन के लोभ संवरण को रोकने में कैसे समर्थ हो सकता था, जाने अन्जाने में उसका प्रदर्शन स्वाभाविक भी था, किन्तु शतकत्रय में कहीं भी ऐसा नहीं हुआ है।

३. इत्सिंग के कथन में भी असत्यता नहीं है। यदि हम वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को शतकत्रय के रचयिता भर्तृहरि से भिन्न मान लेते हैं तो, यह गुत्थी स्वतः ही सुलझ जाती है।

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४. प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान् प्रोफेसर के. ए. सुब्रह्मण्य अय्यर¹ ने वाक्यपदीयकार भर्तृहरि को शतकत्रय के भर्तृहरि से भिन्न ही स्वीकार किया है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि भर्तृहरि सम्राट् विक्रमादित्य (६४४ ई.) के समकालिक एवं उनके अत्यन्त निकट थे। ये शैव वेदान्ती थे। बौद्ध धर्मावलम्बी भर्तृहरि इनसे भिन्न और वाक्यपदीय ग्रन्थ के रचयिता हैं। इन्होंने जीवन में ऐश्वर्यों का अत्यधिक भोग किया तथा जीवन के अन्तिम क्षणों में इन्हें वैराग्य हुआ। इनका समय सप्तम शती का पूर्वार्द्ध मानना अधिक उचित प्रतीत होता है।

(च) भर्तृहरि की कृतियाँ- यों तो भर्तृहरि के नाम से अनेक ग्रन्थ¹ मिलते हैं, किन्तु हमारे विवेच्य महाकवि भर्तृहरि के मुक्तक पद्यों के तीन संकलन ही उपलब्ध होते हैं— शृंगारशतक, नीतिशतक और वैराग्यशतक। भारतीय परम्परा के अनुसार ये तीनों शतक एक ही कवि द्वारा प्रणीत हैं। अब हम यहाँ इनका संक्षेप में परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं—

१. शृंगारशतकम्- इसमें कवि ने सुमधुर शैली में रमणियों के मनमोहक सौन्दर्य के आकर्षण को चित्रित किया है। इसके अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने स्त्रियों की शृंगारिक चेष्टाओं एवं हावभावों का सूक्ष्म अध्ययन किया था।

साथ ही इस रचना के अन्त में उन्होंने सुन्दरता एवं प्रेम को सर्वोच्च न मानकर उसकी निस्सारता और प्रेम की दुःखद परिणति का भी चित्रण किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस रचना का प्रारम्भ उन्होंने अपनी युवावस्था में किया और समाप्ति प्रौढावस्था में। यही कारण है कि यहाँ कवि आकर्षण से विकर्षण की ओर, अतिप्रणय से अप्रणय की ओर बढ़ता हुआ दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः इस शतक में सांसारिक भोग और वैराग्य इन दोनों विकल्पों के मध्य अनिश्चय की मनःस्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है, जो धीरे-धीरे वैराग्य के प्रति निश्चयात्मक स्वरूप में बदल गई है।

२. नीतिशतकम्- इस शतक के सौ से अधिक श्लोकों में कवि ने विद्या, परोपकार, वीरता, परिश्रम, साहस और उदारता आदि उदात्त मनोभावों का सरल भाषा में मनोहारी चित्रण किया है। इसमें कवि के ऐश्वर्यसम्पन्न राजाओं की निष्ठुरता, हृदयहीनता, अहंकारिता, दुर्जनों एवं मूर्खों के द्वारा सज्जनों को दिए जाने वाले कष्टों एवं अपमान का चित्रण करते हुए, उसके प्रति विद्रोहात्मक स्वर को मुखरता मिली है। अनेक नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए, मानवतावादी दृष्टिकोण को अत्यन्त हृदयग्राही रूप में यहाँ चित्रित किया गया है। वस्तुतः नीतिशतकम् सम्पूर्ण सूक्ति-साहित्य का अलंकार स्वरूप ग्रन्थ है, जिसमें अनेक दीप्तिमान् माणिक स्थल-स्थल पर जड़े हुए हैं।


१. भर्तृहरि का वाक्यपदीय - अय्यर - राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी - १९८१
१. वाक्यपदीय, वाक्यपदीय टीका, महाभाष्यदीपिका, मीमांसाभाष्य, वेदान्तसूत्रवृत्ति, शब्दधातु समीक्षा, शृंगार, नीति और वैराग्यशतक।

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३. वैराग्यशतकम्- इस संरचना में कवि की सांसारिक भोगों एवं आकर्षणों के प्रति उदासीनता की भावना को सुन्दर अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। इसमें कवि ने संसार की निस्सारता, विषमता, भोगतृष्णा की विभीषिका तथा यौवन की अस्थिरता का मार्मिक चित्रण करते हुए अपने सहृदय पाठक को वैराग्य की ओर उन्मुख करने का सफल प्रयास किया है। वस्तुतः तीनों शतकग्रन्थ संस्कृत गीतिकाव्य साहित्य की अग्रणी एवं उत्कृष्ट रचनाएँ कही जा सकती हैं।

(छ) भर्तृहरि की भाषा-शैली- महाकवि भर्तृहरि के ग्रन्थों में सर्वत्र भाषा का अत्यन्त सरल स्वरूप देखने को मिलता है। उन्होंने भाषा में सर्वत्र शब्दों का उचित प्रयोग किया है। यहाँ हमें भाषा में स्वाभाविकता के दर्शन होते हैं। उन्होंने प्रसाद एवं माधुर्य गुणों का सर्वाधिक प्रयोग किया है। वाक्ययोजना इतनी सरल प्रयुक्त हुई है कि पढ़ते ही अर्थ हृदयंगम हो जाता है। इनका प्रत्येक पद्य स्वयं में पूर्ण है।

महाकवि ने जीवन के सभी पक्षों को अत्यन्त निकट से देखा और अनुभव किया है, इसलिए उनका वर्णन अत्यन्त स्वाभाविक एवं हृदयग्राही बन पड़ा है। उन्होंने सर्वत्र भावों के अनुरूप ही भाषा का प्रयोग किया है। वस्तुतः संस्कृत-कविता का सुन्दरतम स्वरूप हमें महाकवि की कविता में सर्वत्र देखने को मिलता है। यद्यपि उन्होंने सर्वत्र वैदर्भी रीति का प्रयोग किया है, किन्तु कुछ स्थलों पर गौड़ी रीति के दर्शन भी हमें सहज ही होते हैं—

क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि कष्टां दशामापन्नोऽपि,
शिथिलप्रायोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि।
मत्तेभेन्द्रविभिन्नकुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः,
किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी॥२७॥

उनकी भाषा में सर्वत्र अलंकारों का अत्यन्त स्वाभाविक प्रयोग हुआ है, कहीं भी उन्होंने अलंकारों से भाषा को सजाने का सायास प्रयास नहीं किया है। उनके शतकत्रय में हमें अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, दीपक, दृष्टान्त, समुच्चय, परिसंख्या, अर्थापत्ति, अप्रस्तुत-प्रशंसा, स्वभावोक्ति, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग देखने को मिलता है। अर्थान्तरन्यास एवं पर्यायोक्ति अलंकारों का उन्होंने सर्वाधिक प्रयोग किया है।

व्यंग्यार्थ उनकी सबसे बड़ी विशेषता है जिसके द्वारा वे अपने पाठक को सहज ही कोई न कोई उपदेश प्रदान कर देते हैं। वस्तुतः उनकी शैली में रोचकता, तार्किकता, उक्ति-वैचित्र्य की निपुणता, भावों की स्वाभाविकता, भाषा का लालित्य सहज ही देखने को मिलते हैं।

उनके काव्य की विशेषता है कि यहाँ आदर्शवादी व्यक्ति को नीतिपरक श्लोकों की उपलब्धि होती है, शृंगारिक वृत्ति वाले पाठक को शृंगाररस से ओतप्रोत काव्य के दर्शन

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होते हैं तथा विरक्त व्यक्ति को उसकी रुचि के अनुरूप शान्तरस की अनुभूति होती है। यहाँ पर आचार, नीति, कर्तव्याकर्तव्य, परोपकार, दुर्जन, सज्जन, कर्म, भाग्य, मान, शौर्य, क्रौर्य, प्रेम, नश्वरता आदि सभी विषयों को कवि ने अपनी लेखनी का विषय बनाया है।

उनके श्लोक इतने मार्मिक हैं कि सीधे हृदय पर प्रभाव डालते हैं। रसों की दृष्टि से उनके काव्य में श्रृंगार, वीर और शान्त रस का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। वीभत्स रस का यहाँ प्रायः अभाव ही है।

महाकवि भर्तृहरि के काव्यों में सर्वाधिक शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त स्रग्धरा, आर्या, अनुष्टुप्, वसन्ततिलका, शिखरिणी, हरिणी, द्रुतविलम्बित, इन्द्र-वज्रा, उपेन्द्रवज्रा उपजाति, वंशस्थ आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है। उनके सभी छन्द प्रायः गेयात्मकता लिए हुए हैं।

अन्त में हम महाकवि भर्तृहरि की भाषाशैली के विषय में संक्षेप में इतना ही कह सकते हैं कि उनके काव्य में कलापक्ष की अपेक्षा भावपक्ष अधिक प्रबल रहा है। उनके काव्य का प्रमुख उद्देश्य है, मानव जीवन के विविध पक्षों को चित्रित करते हुए सम्पूर्ण समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करना। जिसमें उन्होंने अधिकांश रूप में सफलता भी अर्जित की है। सुभाषित तो उनके तीनों शतकों में पदे-पदे भरे पड़े हैं।

उपर्युक्त कथ्यों की पुष्टि में कुछ उदाहरण हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। भाषा का माधुर्य एवं सरल स्वरूप द्रष्टव्य है—

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥

प्रेम का अस्थिर स्वरूप ऐन्द्रिक सुख के प्रति वैराग्य तो स्वयं कवि के जीवन में भी हलचल पैदा कर देता है। विषय प्रतिपादन के साथ-साथ भाषा का प्रवाह द्रष्टव्य है—

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
साऽप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥२॥

धन के विषय में कवि की अभिव्यक्ति कितनी सुन्दर बन पड़ी है—

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥४३॥