न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
४९. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५७
४९. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५७ संस्कारानुपपत्तिर्भवति । यथाविधे शरीरे चेतना गृह्यते, तथाविध एवात्यन्तोपरम- श्चेतनाया गृह्यते । तस्मात् संस्कारवदित्यसमः समाधिः । अथापि शरीरस्थं चेतनोत्पत्तिकारणं स्याद् ? द्रव्यान्तरस्थं वा ? उभयस्थं वा ? तन्न; नियमहेत्वभावात् । शरीरस्थेन कदाचिच्चेतनोत्पद्यते, कदाचिन्नति नियमे हेतुर्नास्तीति । द्रव्यान्तरस्थेन च शरीर एव चेतनोत्पद्यते, न लोष्टादिषु इत्यत्र न नियमहेतुरस्तीति । उभयस्य निमित्तत्वे शरीरसमानजातीयद्रव्ये चेतना नोत्पद्यते, शरीर एव चोत्पद्यते इति नियमे हेतुर्नास्तीति ॥ ४७ ॥ यच्च मन्येत—सति श्यामादिगुणे द्रव्ये श्यामाद्युपरमो दृष्ट, एवं चेतनोपरमः स्यादिति ? न; पाकजगुणान्तरोत्पत्तेः ॥ ४८ ॥ नात्यन्तं रूपोपरमो द्रव्यस्य, श्यामरूपे निवृत्ते पाकजं गुणान्तरं रक्तं रूपमुत्पद्यते, शरीरे तु चेतनामात्रोपरमोऽत्यन्तमिति ॥ ४८ ॥ अथापि— प्रतिद्वन्द्विसिद्धेः पाकजानामप्रतिषेधः ॥ ४९ ॥ परन्तु जिस स्थिति के शरीर में चेतना गृहीत होती है उसी तरह के शरीर में चेतना का नाश भी देखा जाता है । अतः 'संस्कार की तरह' यह समाधान तुल्य नहीं है । यदि यह कहें कि शरीरस्थ या द्रव्यान्तरस्थ या शरीरस्थ द्रव्यान्तरस्थ—दोनों ही उत्पत्तिकारण हैं ? नियमहेतु न होने से यह नहीं कह सकते; क्योंकि 'शरीरस्थ कारण से कभी चेतना उत्पन्न हो, कभी नहीं'—इस नियम में कोई हेतु नहीं बनता । तथा 'द्रव्यान्तरस्थ कारण से शरीर में चेतना उत्पन्न हो, सिकता-पाषाणादि में नहीं'—इस नियम में भी कोई हेतु नहीं बन सकता । अथ च—उभयस्थ मानने पर, 'शरीरसमानजातीय द्रव्य में चेतना उत्पन्न न हो, केवल शरीर में ही उत्पन्न हो'—इस नियम में भी कोई हेतु नहीं बन पाता ॥ ४७ ॥ और जो ऐसा माना जाय कि 'जैसे श्यामादिगुणवान् द्रव्य में, द्रव्य के रहते हुए भी श्यामादि गुण का नाश हो जाता है, उसी तरह शरीर के रहते चेतना का उपरम हो जाता है ?' पाकजगुणान्तरोत्पत्ति के कारण ऐसा नहीं मान सकते ॥ ४८ ॥ द्रव्य का आत्यन्तिक रूपनाश नहीं होता । श्यामरूप के निवृत्त होने पर पाकजन्य गुणान्तर रक्तरूप उत्पन्न होता है, किन्तु शरीर में चेतनामात्र का आत्यन्तिक उपरम हो जाता है । अतः यह दृष्टान्त अनुपपन्न है ॥ ४८ ॥ एक बात और— प्रतिद्वन्द्वी की सिद्धि होने से यहाँ पाकज गुणों वाला प्रतिषेध भी नहीं बनता ॥४९॥ न्या० द० ३८/३७
२५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० यावत्सु द्रव्येषु पूर्वगुणप्रतिद्वन्द्विसिद्धिस्तावत्सु पाकजोत्पत्तिर्दृश्यते; पूर्वगुणैः सह पाकजानामवस्थानस्याग्रहणात् । न च शरीरे चेतनाप्रतिद्वन्द्विसिद्धौ सहानव- स्थायि गुणान्तरं गृह्यते, येनानुमीयेत तेन चेतनाया विरोधः । तस्मादप्रतिषिद्धा चेतना यावच्छरीरं वर्त्तेत ! न तु वर्त्तते, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतना इति ॥ ४९ ॥ २. इतश्च न शरीरगुणश्चेतना; शरीरव्यापित्वात् ॥ ५० ॥ शरीरं शरीरावयवाश्च सर्वे चेतनोत्पत्त्या व्याप्ता इति न क्वचिदनुत्पत्तिश्चे- तनायाः । शरीरवच्छरीरावयवाश्चेतना इति प्राप्तं चेतनबहुत्वम् । तत्र यथा प्रतिशरीरं चेतनबहुत्वं सुखदुःखज्ञानानां व्यवस्था लिङ्गम्, एवमेकशरीरेऽपि स्याद् । न तु भवति, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति ॥ ५० ॥ यदुक्तम्—न क्वचिच्छरीरावयवे चेतनाया अनुत्पत्तिरिति ? सा न; केशनखादिष्वनुपलब्धेः ? ॥ ५१ ॥ केशेषु नखादिषु चानुत्पत्तिश्चेतनाया इति अनुपपन्नं शरीरव्यापित्व- मिति ? ॥ ५१ ॥ जितने द्रव्यों में पूर्व गुण विरोधी गुण की उत्पत्ति होती हो उतने ही द्रव्यों में पाकज गुण की उत्पत्ति देखी जाती है; क्योंकि पूर्व गुणों के साथ पाकज गुणों का अवस्थान नहीं देखा जाता । चेतना में ऐसी बात नहीं है; क्योंकि शरीर में चेतनाप्रतिद्वन्द्वी की सिद्धि होती हो—ऐसा गुणान्तर गृहीत नहीं होता, जिस से कि चेतना के विरोध का अनुमान हो । विरोध न होने से चेतना को शरीर के स्थायितापर्यन्त रहना चाहिये, परन्तु रहती नहीं, अतः चेतना शरीरगुण नहीं है ॥ ४९ ॥ २. इस कारण भी चेतना शरीरगुण नहीं है; शरीरव्यापी होने से ॥ ५० ॥ शरीर तथा उसका प्रत्येक अवयव चेतनोत्पत्ति से व्याप्त है, क्योंकि उसमें शरीर के किसी भी भागमें चेतना की अनुत्पत्ति नहीं देखी जाती । तो जब शरीर की तरह शरीरावयव भी चेतन हैं तब आपको अनेक चेतन मानने पड़ेंगे । जैसे प्रत्येक शरीर में चेतन का पार्थक्य सुख-दुःख, ज्ञान आदि का व्यवस्थापक हेतु है, उसी तरह अब एक शरीर में भी चेतनबहुत्व होता हुआ सुखादि का व्यवस्थापक होने लगेगा, होता है नहीं; अतः मानना चाहिये कि चेतना शरीरगुण नहीं है ॥ ५० ॥ शंका—यह जो कहा था कि 'किसी भी शरीरावयव में चेतना का अनुत्पाद नहीं है' ? यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि केशनखादि में चेतना उपलब्ध नहीं होती ? ॥ ५१ ॥ केश तथा नखादि में चेतना उपलब्ध नहीं होती, अतः चेतना का शरीरव्यापित्व सिद्ध नहीं होगा ॥ ५१ ॥
५५. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५९
५५. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५९ त्वक्पर्यन्तत्वाच्छरीरस्य केशनखादिष्वप्रसङ्गः ॥ ५२ ॥ इन्द्रियाश्रयत्वं शरीरलक्षणम् । त्वक्पर्यन्तं जीवमनःसुखदुःखसंवित्त्यायतन- भूतं शरीरम्, तस्मान्न केशादिषु चेतनोत्पद्यते । अर्थकारितस्तु शरीरोपनिबन्धः केशादीनामिति ॥ ५२ ॥ ३. इतश्च न शरीरगुणश्चेतना; शरीरगुणवैधर्म्यात् ॥ ५३ ॥ द्विविधः शरीरगुणः—अप्रत्यक्षश्च गुरुत्वम्, इन्द्रियग्राह्यश्च रूपादिः। विधान्तरं तु चेतना—नाप्रत्यक्षा संवेद्यत्वात्, नेन्द्रियग्राह्या मनोविषयत्वात्। तस्माद् द्रव्या- न्तरगुण इति ॥ ५३ ॥ न; रूपादीनामितरेतरधर्म्यात् ? ॥ ५४ ॥ यथेतरेतरविधर्माणो रूपादयो न शरीरगुणत्वं जहति, एवं रूपादिद्वैधर्म्या- च्चेतना शरीरगुणत्वं न हास्यतीति ? ॥ ५४ ॥ ऐन्द्रियकत्वाद् रूपादीनामप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥ केश-नखादि में चेतना क्यों नहीं उपलब्ध होती ? शरीर के त्वक्पर्यन्त माना जाने से केश-नखादि में चेतना नहीं बनती ॥ ५२ ॥ शरीर इन्द्रियाधिष्ठान है। यह शरीर जीव, मन, सुख-दुःख संवित्ति का अधिष्ठान- भूत है, उक्त संवित्ति त्वक्पर्यन्त होती हैं, अतः उतने को ही शरीर माना जाता है, केश नखादि को नहीं । शरीरसंयुक्त होने से केशादि को शरीर कह देते हैं, वस्तुतः वे शरीरा- वयव नहीं हैं ॥ ५२ ॥ ३. इस कारण भी चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि ( चेतना ) शरीरगुणों से विलक्षण है ॥ ५३ ॥ शरीरगुण दो प्रकार के हैं—कोई अप्रत्यक्ष अनुमेय हैं, जैसे—गुरुत्वादि; कोई प्रत्यक्ष इन्द्रियग्राह्य हैं, जैसे—रूपादि। चेतना इन दोनों ही प्रकारों से विलक्षण है। वह संवेद्य होने से भी अप्रत्यक्ष नहीं होती, और मनोविषय होने से इन्द्रियग्राह्य नहीं है। अतः चेतना शरीरगुण नहीं, अपितु किसी अन्य द्रव्य का गुण है ॥ ५३ ॥ शरीरगुणों से वैलक्षण्यमात्र चेतना का शरीरावृत्तित्व सिद्ध नहीं करता; क्योंकि रूपादि गुण भी इतरेतरविलक्षण हैं ? ।।५४।। जैसे एक दूसरे से विलक्षण रूप-स्पर्शादि शरीरगुणत्व से च्युत नहीं होते, उसी तरह रूपादि से विलक्षण होने के कारण ही चेतना शरीर-गुणत्व को कैसे छोड़ेगी ? ।। ५४ ।। रूपादिक के ऐन्द्रियक होने से उनमें शरीराश्रयत्व है ॥ ५५ ॥
२६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० अप्रत्यक्षत्वाच्चेति । यथेतरेतरविधर्माणो रूपादयो न द्वैविध्यमतिवर्तन्ते, तथा रूपादिदैधर्म्याच्चेतना न द्वैविध्यमतिवर्तेत यदि शरीरगुणः स्यादिति ! अतिवर्तते तु, तस्मान्न शरीरगुण इति । भूतेन्द्रियमनसां ज्ञानप्रतिषेधात् सिद्धे सत्यारम्भो विशेषज्ञापनार्थः । बहुधा परीक्ष्यमाणं तत्त्वं सुनिश्चिततरं भवतीति ॥ ५५ ॥ मनःपरीक्षाप्रकरणम् [ ५६-५९ ] परीक्षिता बुद्धिः, मनसः इदानीं परीक्षाक्रमः । तत् किं प्रतिशरीरमेकम्, अनेकं वा ? इति विचारे— ज्ञानायौगपद्यादेकं मनः ॥ ५६ ॥ अस्ति खलु वै ज्ञानायौगपद्यमेकैकस्येन्द्रियस्य यथाविषयम्, करणस्यैकप्रयत्न- निर्वृत्तौ सामर्थ्यान्न तदेकत्वे मनसो लिङ्गम् । यत्तु खल्विदमिन्द्रियान्तराणां विषयान्तरेषु ज्ञानायौगपद्यमिति तल्लिङ्गम् । कस्मात् ? सम्भवति खलु वै बहुषु मनःस्विन्द्रियनःसंयोगयौगपद्यमिति ज्ञानयौगपद्यं स्यात्, न तु भवति । तस्माद्विषये प्रत्ययपर्यायादेकं मनः ॥ ५६ ॥ अप्रत्यक्ष होने से भी । जैसे रूपादि इतरेतरविधर्मी होते हुए भी मुख्य अंश में समानधर्मा ही हैं, क्योंकि पूर्वोक्त (३. २. ५३) द्वैविध्य (अप्रत्यक्षत्व व बहिरिन्द्रिय- ग्राह्यत्व) को वे अतिक्रान्त नहीं करते । उसी तरह चेतना भी यदि शरीर-गुण होती तो उक्त द्वैविध्य को अतिक्रान्त न करती ! जब कि वह अतिक्रान्त करती है, अतः यह सिद्ध है कि वह शरीरगुण नहीं, अपितु द्रव्यान्तरगुण है । भूत, इन्द्रिय तथा मन में ज्ञान का प्रतिषेध हम पीछे (३. २. ३८) कर आये, यों सिद्ध होने पर भी विशेष ज्ञान के लिये फिर से बात को उठाया गया; क्योंकि अनेक तरह से परीक्षित तत्त्व ही सुनिश्चित हुआ करता है ॥ ५५ ॥ बुद्धि की परीक्षा हो चुकी, अब मन की परीक्षा का उपक्रम कर रहे हैं। वह मन प्रत्येक शरीर में एक है, या अनेक ? —ऐसा विचार (संशय) उपस्थित होने पर, कहते हैं— ज्ञानायौगद्य हेतु से मन एक ही है ॥ ५६ ॥ ज्ञान युगपत् उत्पन्न नहीं होते, अपितु क्रमिक ही होते हैं । प्रत्येक इन्द्रिय स्वस्व- विषयक ज्ञान कराने में नियत है, अर्थात् उस-उस इन्द्रिय का एक काल में स्वस्वविषयक एक ही ज्ञान कराने में सामर्थ्य देखा जाता है—ऐसा एकत्व मन की सिद्धि में हेतु नहीं; बल्कि दूसरी इन्द्रियों के विषयान्तरों का ज्ञानायौगपद्य (एक ही ज्ञान) मन की सिद्धि में हेतु है; क्योंकि अनेक मन मानने पर दूसरी इन्द्रियों के साथ भी मनःसंयोग होने से इन्द्रियान्तरज युगपत् अनेक ज्ञान होने लगेंगे । ऐसा होता है नहीं, अतः उस उस विषय का तत्तदिन्द्रियों द्वारा एक ज्ञान होने से 'मन' सिद्ध हो जाता है ॥ ५६ ॥
५८. सू० ] मनःपरीक्षाप्रकरणम् २६१
५८. सू० ] मनःपरीक्षाप्रकरणम् २६१ न; युगपदनेकक्रियोपलब्धेः ? ॥ ५७ ॥ अयं खल्वध्यापकोऽधीते, व्रजति, कमण्डलुं धारयति, पन्थानं पश्यति, शृणो- त्यरण्यान् शब्दान्, बिभेति, व्याललिङ्गानि बुभुत्सते, स्मरति च गन्तव्यं स्थानी- यमिति क्रमस्याग्रहणाद्युगपदेताः क्रिया इति प्राप्तं मनसो बहुत्वमिति ? ॥५७॥ अलातचक्रदर्शनवत् तदुपलब्धिराशुसञ्चारात् ॥ ५८ ॥ आशुसञ्चारादलातस्य भ्रमतो विद्यमानः क्रमो न गृह्यते, क्रमस्याग्रहणा- दविच्छेदबुद्ध्या चक्रवद् बुद्धिर्भवतीति; तथा बुद्धीनां क्रियाणां चाशुवृत्तित्वाद् विद्यमानः क्रमो न गृह्यते, क्रमस्याग्रहणाद् युगपद् क्रिया भवन्तीति अभिमानो भवति । किं पुनः-क्रमस्याग्रहणाद् युगपद् क्रियाभिमानः ? अथ युगपद्भावादेव युग- पदनेकक्रियोपलब्धिरिति ?—नात्र विशेषप्रतिपत्तेः कारणमुच्यते इति ? उक्तम्— इन्द्रियान्तराणां विषयान्तरेषु पर्यायेण बुद्धयो भवन्तीति । तच्चाप्रत्याख्येयम्; शङ्का— एक साथ अनेक क्रियाएँ उपलब्ध होने के कारण आप ऐसा नहीं कह सकते ? ॥ ५७ ॥ जैसे एक ही अध्यापक पढ़ता भी है, चलता भी है, कमण्डलु उठाता है, रास्ता देखता है, जंगल में होने वाले शब्द सुनता है, उनसे डरता है, सांप के निशान को देखना चाहता है, गन्तव्य स्थान का स्मरण करता है—यों इस अध्यापक की इन क्रियाओं में क्रमिक ग्रहण न होने से ये क्रियाएँ एक साथ ही हुईं—ऐसा मानना पड़ेगा, ऐसी स्थिति में मन में अनेकत्वप्रसङ्ग हुआ कि नहीं ? ॥ ५७ ॥ उत्तर— अलातचक्र की तरह, उन क्रियाओं की युगपदुपलब्धि आशुसंचार से हो जाती है ॥५८॥ अति शीघ्र घूमने से घूमते हुए अलात (जलती लकड़ी) में विद्यमान क्रम जैसे ज्ञात नहीं होता, क्रम के अग्रहण से वहाँ अविच्छिन्नत्व बुद्धि होने लगती है; उसी तरह बुद्धि तथा क्रियाओं में अतिशैघ्य होने से उनमें विद्यमान क्रम ज्ञात नहीं हो पाता । क्रम के अज्ञात रहने से वहाँ युगपत् क्रियाएँ हुईं—ऐसा भ्रम होता है । वस्तुतः ये क्रियायें क्रमिक ही हैं । शङ्का— यहाँ क्रम के अग्रहण से युगपत् क्रिया का भ्रम है ? या क्रियाओं के युगपद् होने से वहाँ क्रियायौगपद्य गृहीत होता है ?—इनमें से हम किस बात को उचित समझें; किसी पक्ष में कोई हेतु दीजिये ? उत्तर—कहा तो कि विषयान्तर में इन्द्रियान्तरों का ज्ञान क्रमिक ही होता है, इसके स्वसिद्ध (प्रत्यात्मवेदनीय) होने से । इस सिद्धान्त का आप खण्डन नहीं कर सकते । एक
२६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० आत्मप्रत्यक्षत्वात् । अथापि दृष्टश्रुतानर्थान् चिन्तयतः क्रमेण बुद्धयो वर्त्तन्ते, न युगपत्-अनेनानुमातव्यमिति । वर्णपदवाक्यबुद्धीनां तदर्थबुद्धीनां चाशुवृत्ति- त्वात्क्रमस्याग्रहणम् । कथम् ? वाक्यस्थेषु खलु वर्णेषूच्चरत्सु प्रतिवर्णं तावच्छ्रवणं भवति, श्रुतं वर्णमेकमनेकं वा पदभावेन प्रतिसन्धत्ते, प्रतिसन्धाय पदं व्यवस्यति, पदव्यवसायेन स्मृत्या पदार्थं प्रतिपद्यते, पदसमूहप्रतिसन्धानाच्च वाक्यं व्यवस्यति, सम्बद्धांश्च पदार्थान् गृहीत्वा वाक्यार्थं प्रतिपद्यते । न चासां क्रमेण वर्त्तमानानां बुद्धीनामाशुवृत्तित्वात् क्रमो गृह्यते, तदेतदनुमानमन्यत्र बुद्धिक्रिया- यौगपद्याभिमानस्येति । न चास्ति मुक्तसंशया युगपदुत्पत्तिर्बुद्धीनाम्, यया मनसां बहुत्वमेक- शरीरेऽनुमीयेत इति ॥ ५८ ॥ यथोक्तहेतुत्वाच्चाणु ॥ ५९ ॥ अणु मन एकं चेति धर्मसमुच्चयः; ज्ञानायौगपद्यात् । महत्त्वे मनसः सर्वे- न्द्रियसंयोगाद् युगपद्विषयग्रहणं स्यादिति ॥ ५९ ॥ अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ६०-७२ ] मनसः खलु भोः ! सेन्द्रियस्य शरीरे वृत्तिलाभः, नान्यत्र शरीरात् । ज्ञातुश्च बात और-दृष्ट या श्रुत अर्थों को विचारती हुई बुद्धि क्रम से ही प्रवृत्त होती है, एक साथ सर्वत्र नहीं, इससे अनुमान होता है कि ज्ञान क्रमिक होते हैं । वर्ण, पद, तथा वाक्य और उनके अर्थ ज्ञानों के क्रम का ग्रहण उनमें आशुवृत्तित्व होने से नहीं हो पाता । कैसे ? वाक्यस्थ वर्णों के उच्चारण करने पर प्रत्येक वर्ण का श्रवण होता है, सुना गया एक या अनेक वर्ण पदरूप से जोड़ा जाता है, जोड़ कर उसे पदरूप से समझा जाता है। पदरूप से समझकर अर्थ की स्मृति से उस पाद का अर्थ समझा जाता है; इसी तरह पदसमूह को याद कर उन्हें वाक्यरूप में समझा जाता है। पदों के सम्बद्ध रूप में अर्थ को याद कर वाक्यार्थ समझा जाता है। इन सभी क्रियाओं तथा बुद्धियों में, अतिशीघ्रता हो जाने से क्रम गृहीत नहीं हो पाता । वस्तुतः हैं तो ये सब क्रमिक ही। इसी तरह अन्यत्र भी क्रिया के बुद्धिगत यौगपद्य-भ्रम के बारे में समझ लें । वस्तुतः उभयवादिसम्मत ज्ञानों की ऐसी कोई संशयरहित युगपद् उत्पत्ति नहीं है, जिससे एक शरीर में मन का अनेकत्व अनुभूत हो सके ॥ ५८ ॥ यथोक्त (ज्ञानायौगपद्य ) हेतु से मन का अणुत्व भी सिद्ध होता है ॥ ५९ ॥ 'मन अणु है तथा एक है' यह धर्मसमुच्चय भी तभी सिद्ध होता है जब हम ज्ञानायौग- पद्य सिद्धान्त मानते हैं । अन्यथा मन के 'महत्' होने पर इसका एक ही समय में अनेक इन्द्रियों के साथ संयोग होकर अनेक ज्ञान उत्पन्न होने लगेंगे । होते हैं नहीं; अतः सिद्ध है कि मन अणु तथा एक है ॥ ५९ ॥ इन्द्रियसहित मन का शरीर में ही रहना मिलता है, शरीर से अन्यत्र नहीं । ज्ञाता
६०. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६३
६०. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६३ पुरुषस्य शरीरायतना बुद्ध्यादयो विषयोपभोगो जिहासितहानमीप्सितावाप्तिश्च, सर्वे च शरीराश्रया व्यवहाराः । तत्र खलु विप्रतिपत्तेः संशयः—किमयं पुरुष- कर्मनिमित्तः शरीरसर्गः ? आहोस्विद् भूतमात्रादकर्मनिमित्त इति ?—श्रूयते खल्वत्र विप्रतिपत्तिरिति । तत्रेदं तत्त्वम्— पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः ॥ ६० ॥ पूर्वशरीरे या प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भलक्षणा तत्पूर्वकं कर्मोक्तम्, तस्य फलं तज्जनितौ धर्माधर्मौ, तत्फलस्यानुबन्ध आत्मसमवेतस्यावस्थानम्, तेन प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यस्तस्योत्पत्तिः शरीरस्य, न स्वतन्त्रेभ्य इति । यदधिष्ठानोऽय- मात्मा—'अयमहम्' इति मन्यमानो यत्राभियुक्तो यत्रोपभोगतृष्णया विषयमनुप- लभमानो धर्माधर्मौ संस्करोति तदस्य शरीरम् । तेन संस्कारेण धर्माधर्मलक्षणेन भूतसहितेन पतितेऽस्मिन् शरीरे उत्तरं निष्पद्यते, निष्पन्नस्य चास्य पूर्वशरीर- वत् पुरुषार्थक्रिया, पुरुषस्य च पूर्वशरीरवत् प्रवृत्तिरिति कर्मापेक्षेभ्यो भूतेभ्यः शरीरसर्गे सत्येतदुपपद्यते इति । दृष्टा च पुरुषगुणेन प्रयत्नेन प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यः पुरुषार्थक्रियासमर्थानां द्रव्याणां रथप्रभृतीनामुत्पत्तिः । तयाऽनुमातव्यम्— पुरुष के बुद्ध्यादि गुण, विषयोपभोग—हेय का त्याग और ईप्सित की प्राप्ति—आदि सभी व्यवहार शरीर का ही आश्रय लिये हुए हैं। यहाँ विप्रतिपत्ति होने पर संशय होता है कि क्या यह शरीर पुरुषकर्मनिमित्तक है ? या विना किसी कर्मनिमित्त से भूतों के सम- वाय से हो जाता है ? यहाँ यह विप्रतिपत्ति सुनायी देती है । यद्यपि वास्तविकता यह है— पूर्वजन्मकृत फलानुबन्ध से शरीर की उत्पत्ति होती है ॥ ६० ॥ पूर्व जन्म में शरीर, वाणी या बुद्धि द्वारा किये गये कार्य पूर्वकृत कर्म कहलाते हैं। उससे उत्पन्न हुए धर्म तथा अधर्म उसके फल हैं। उस फल का अनुबन्ध जीव का आत्मा में रहना है। उस अनुबन्ध से प्रयुक्त भूतों द्वारा ही उस जीव की शरीरोत्पत्ति होती है; न कि स्वतन्त्रतया भूतों से । जिसका सहारा लेकर यह आत्मा 'यह मैं हूँ'—ऐसा मानता हुआ सम्बद्ध हो, विषयोपभोग की कामना से विषयों को चाहता हुआ विषयों की उपलब्धि नहीं करता हुआ धर्म तथा अधर्म का संस्कार करता है, स्थिर बनाये रखता है वह 'शरीर' है । इस शरीर के विनष्ट होने पर भूतसहित धर्माधर्मलक्षणक उस संस्कार से दूसरा शरीर बनता है। बनने पर इस दूसरे शरीर की भी पहले की तरह पुरुषार्थ-क्रियाएँ प्रारम्भ होती हैं। पुरुष ( आत्मा ) की भी पहले की तरह प्रवृत्ति होने लगती है। ये उपर्युक्त सब बातें कर्म की अपेक्षा रखनेवाले भूतों से शरीर-सृष्टि होने से ही उपपन्न हो पाती हैं। लोक में भी पुरुषसम्बन्धी प्रयत्न द्वारा प्रयुक्त भूतों से
भूतेभ्यो मूर्त्युपादानवत् तदुपादानम् ? ॥ ६१ ॥
२६४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० शरीरमपि पुरुषार्थक्रियासमर्थमुत्पद्यमानम् पुरुषस्य गुणान्तरापेक्षेभ्यो भूतेभ्य उत्पद्यत इति ॥ ६० ॥ अत्र नास्तिक आह— भूतेभ्यो मूर्त्युपादानवत् तदुपादानम् ? ॥ ६१ ॥ यथा कर्मनिरपेक्षेभ्यो भूतेभ्यो निर्वृत्ता मूर्तयः सिकताशर्करापाषाणगैरिका- ञ्जनप्रभृतयः पुरुषार्थकारित्वादुपादीयन्ते, तथा कर्मनिरपेक्षेभ्यो भूतेभ्यः शरीरमुत्पन्नं पुरुषार्थकारित्वादुपादीयते इति ? ॥ ६१ ॥ न; साध्यसमत्वात् ॥ ६२ ॥ यथा शरीरोत्पत्तिरकर्मनिमित्ता साध्या, तथा सिकताशर्करापाषाणगैरिका- ञ्जनप्रभृतीनामप्यकर्मनिमित्तः सर्गः साध्यः । साध्यसमत्वादसाधनमिति । 'भूतेभ्यो मूर्त्युत्पादनवत्' इति चानेन साध्यम् ॥ ६२ ॥ न; उत्पत्तिनिमित्तत्वान्मातापित्रोः ॥ ६३ ॥ विषमश्चायमुपन्यासः । कस्मात् ? निर्बीजा इमा मूर्तय उत्पद्यन्ते, बीजपू- र्विका तु शरीरोत्पत्तिः । मातापितृशब्देन लोहितरेतसी बीजभूते गृह्येते । तत्र पुरुषार्थक्रियासमर्थ रथ-आदि द्रव्यों की उत्पत्ति देखी जाती है । उससे अनुमान करना चाहिये कि शरीर भी पुरुषार्थक्रियासमर्थ उत्पन्न होता हुआ पुरुष के (धर्माधर्म) गुणान्तरापेक्ष भूतों से उत्पन्न होता है ॥ ६० ॥ तथापि यहाँ पुनर्जन्म न माननेवाला नास्तिक (चार्वाक) कहता है— भूतों से अन्यद्रव्योत्पत्ति की तरह शरीरोत्पत्ति होती है ॥ ६१ ॥ जैसे लोक में कर्मनिरपेक्ष भूतों द्वारा निर्मित, मिट्टी, धूल, पत्थर, गेरु, अञ्जन आदि द्रव्य उपभोग साधन होने से प्राप्त किये जाते मिलते हैं; उनमें अदृष्ट सहायक नहीं होता; उसी तरह यह शरीर भी भूतों से उत्पन्न हुआ पुरुषार्थ-साधन होने से उपा- देय है, इसमें कर्म (अदृष्ट) की क्या अपेक्षा है ? इस हेतु के साध्यसम होने से (आप ऐसा) नहीं (कह सकते) ॥ ६१ ॥ जैसे आपको 'अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति' सिद्ध करनी है, उसी तरह 'उक्त सिक- तादि द्रव्यों की सृष्टि भी अकर्मनिमित्तक हैं'—यह भी आपको सिद्ध करना पड़ेगा; अतः इस हेतु के साध्यसम होने से यह हेत्वाभास है, अतः इससे कोई अनुमान नहीं बन सकता ॥ ६२ ॥ अथवा, भूतों द्वारा सिकता-पाषाणादि के उत्पादन से इस शरीरोत्पत्ति की समानता नहीं है; क्योंकि इस में माता-पिता निमित्त हैं ॥ ६३ ॥ आपका सिकतापाषाणादि का दृष्टान्त प्रकृत से विरुद्ध है, क्योंकि उक्त सिकतादि द्रव्य निर्बीज उत्पन्न होते हैं और यह शरीरोत्पत्ति (माता-पिता के) बीज से होती है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
६५. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६५
६५. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६५ सत्त्वस्य गर्भवासानुभवनीयं कर्म, पित्रोश्च पुत्रफलानुभवनीये कर्मणो मातृ- गर्भाश्रये शरीरोत्पत्ति भूतेभ्यः प्रयोजयन्तीत्युपपन्नं बीजानुविधानमिति ॥ ६३ ॥ तथाऽऽहारस्य ॥ ६४ ॥ उत्पत्तिनिमित्तत्वादिति प्रकृतम् । भुक्तम् पीतम् = आहारः तस्य पक्तिनिर्वृत्तं रसद्रव्यम् मातृशरीरे चोपचिते बीजे गर्भाशयस्थे बीजसमानपाकम्, मात्रया चोपचयो बीजे यावद्व्यूहसमर्थं सञ्चयः इति । सञ्चितं चार्वुदमांसपेशी- कललकण्डरशिरःपाण्यादिना च व्यूहेनेन्द्रियाधिष्ठानभेदेन व्यूह्यते, व्यूहे च गर्भ- नाड्यावतारितं रसद्रव्यमुपचीयते यावत्प्रसवसमर्थमिति । न चायमन्नपानस्य स्थाल्यादिगतस्य कल्पत इति । एतस्मात् कारणात् कर्मनिमित्तत्वं शरीरस्य विज्ञायते इति ॥ ६४ ॥ प्राप्तौ चानियमात् ॥ ६५ ॥ न सर्वो दम्पत्योः संयोगो गर्भाधानहेतुर्दृश्यते । तत्रासति कर्मणि न भवति, 'मातापितृ'-शब्द से उनके रजःशुक्र बीजरूप में गृहीत होते हैं । उनमें से प्राणी को गर्भ- वास के दुःखादि अनुभावक कर्म के अनुरूप भोगने पड़ते हैं तथा माता-पिता को पुत्र- जन्म-सुखादि के अनुभावक कर्म होते हैं । इस प्रकार ये सब कर्म मिलकर माता के गर्भाशय में शरीरोत्पाद को भूतों के सहारे प्रयुक्त करते हैं—यों बीज शरीरोत्पत्ति में साक्षात्कारण सिद्ध हो गया ॥ ६३ ॥ तथा आहार के ॥ ६४ ॥ शरीरोत्पत्तिनिमित्तक होने से यह शरीरोत्पाद निर्निमित्तक नहीं हैं । खाया पीया हुआ अन्न-जल 'आहार' कहलाता है । उस आहार के पाक से बना रसद्रव्य मातृ-शरीर में उपचित गर्भाशयस्थ बीज में सम्मिलित होकर उसके तुल्य पाकवाला हो जाता है, वह उस बीज में इतनी मात्रा में सम्मिलित होता है कि गर्भ की आकृति बन जाये । सम्मि- लित हुआ वह रस अर्बुद, मांसपेशी, कलल, कण्डरा (स्नायु), सिर, हाथ-पैर आदि आकारों द्वारा इन्द्रियाधिष्ठान-भेद से अवयवी बनता जाता है । और गर्भनाडी से पहुँचा हुआ रस उस आकार में उपचित होता रहता है जब तक कि प्रसव न हो जाये । यह इतनी लम्बी-चौड़ी सूक्ष्म प्रक्रिया स्थाल्यादिगत अन्नपान ( आहार ) के बारे में कल्पित नहीं की जा सकती । इस कारण, 'शरीर कर्मनिमित्त है'—ऐसा समझा जाता है ॥ ६४ ॥ दम्पति-संयोग में नियम न होने से भी ॥ ६५ ॥ लोक में सभी स्त्री-पुरुषों का संयोग गर्भस्थिति का हेतु नहीं देखा जाता । वैसा (गर्भस्थित्यनुकूल) अदृष्ट कर्म न रहने से गर्भस्थिति नहीं होती, अनुकूल अदृष्ट होने से गर्भस्थिति हो जाती है । इस रीति से नियमाभाव उपपन्न नहीं हुआ । कर्मनिरपेक्ष भूतों को शरीरोत्पत्तिहेतु मानने पर नियम बन जायेगा कि सभी स्त्री-पुरुषों का संयोग शरीरो-
२६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० सति च भवतीत्यनुपपन्नो नियमाभाव इति, कर्मनिरपेक्षेषु भूतेषु शरीरोत्पत्ति- हेतुषु नियमः स्यात् । न ह्यत्र कारणाभाव इति ॥ ६५ ॥ अथापि— शरीरोत्पत्तिनिमित्तवत् संयोगोत्पत्तिनिमित्तं कर्म ॥ ६६ ॥ यथा खल्विदं शरीरं धातुप्राणसंवाहिनीनां नाडीनां शुक्रान्तानां धातु- नां च स्नायुत्वगस्थिशिरापेशीकललकण्डराणां च शिरोबाहूदराणां सक्थ्नां च कोष्ठगानां वातपित्तकफानां च मुखकण्ठहृदयामाशयपक्वाशायाधःस्रोतसां च परम- दुःखसम्पादनीयेन सन्निवेशेन व्यूहनमशक्यं पृथिव्यादिभिः कर्मनिरपेक्षैरुत्पाद- यितुमिति 'कर्मनिमित्ता शरीरोत्पत्तिः' इति विज्ञायते । एवं च प्रत्यात्मनियतस्य निमित्तस्याभावान्निरतिशयैरात्मभिः सम्बन्धात् सर्वात्मनां च समानः पृथिव्यादिभिरुत्पादितं शरीरम्, पृथिव्यादिगतस्य च नियम- हेतोरभावात् सर्वात्मना सुख-दुःखसंवित्त्यायतनं समानं प्राप्तम् ? यत्तु प्रत्यात्मं व्यवतिष्ठते, तत्र शरीरोत्पत्तिनिमित्तं कर्म व्यवस्थाहेतुरिति विज्ञायते । परिपच्यमानो हि प्रत्यात्मनियतः कर्माशयो यस्मिन्नात्मनि वर्तते त्पत्ति कर सकेगा; क्योंकि इस नियम के न बनने में कोई विरोधी कारण आप नहीं दिखा सकते। हमारे मत में तो अदृष्ट कर्म विरोधी कारण है ॥ ६५ ॥ एक बात और— वह अदृष्टकर्म शरीरोत्पत्तिनिमित्त की तरह संयोगोत्पत्ति का भी निमित्त है ॥ ६६ ॥ जैसे यह सूक्ष्मावयवारब्ध शरीर बना हुआ है, जिसमें कि स्थूलसूक्ष्म धातु तथा प्राणवाही नाडियों, शुक्रपर्यन्त सात धातुओं, स्नायु-त्वक्-अस्थि-शिरा-पेशी-कलल-कण्ड- राओं, शिर-बाहु-उदर, जाँघ, कोष्ठगत वात-पित्त-कफ, मुख-कण्ठ-हृदय-आमाशय-पक्वा- शय-अधःस्रोतों ( मलमूत्रेन्द्रियों ) को यथास्थान एकत्र कर उन्हें आकार देना अतीव कष्टसाध्य है, अतएव कर्मनिरपेक्ष पृथिवी-आदि जड़ महाभूतों द्वारा ऐसा उत्पाद होना अशक्य ही है, अतः 'शरीरोत्पत्ति कर्मनिमित्तक ही है'—ऐसा समझ में आता है । शङ्का—इस तरह प्रत्यात्मनियत किसी निमित्त के अभाव होने से समानतया स्थित सभी जीवात्माओं से सम्बन्ध होने के कारण सभी आत्माओं के लिये पृथिवी-आदि से उत्पादित यह शरीर समान है और पृथिव्यादि में भी कोई व्यावर्तक हेतु न होने से सभी आत्माओं के सभी शरीर होने से सुख-दुःखसंवित्ति का समान रूप से अधिष्ठान होने लगेगा ? उत्तर—'एक आत्मा का एक शरीर अधिष्ठान है—इस व्यवस्था में शरीरोत्पत्ति- निमित्तक कर्म हेतु हैं'—ऐसा समझा जाता है । परिपाक को प्राप्त हुआ प्रत्यात्मनियत कर्माशय जिस आत्मा में रहता है, उसी के लिये एक उपभोगाधिष्ठान शरीर उत्पन्न कर उसी शरीर के साथ उस आत्मा के संयोग को उपभोग का साधन बनाता है। इस प्रकार
६७. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६७
६७. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६७ तस्यैवोपभोगायतनं शरीरमुत्पाद्य व्यवस्थापयति । तदेवम् ‘शरीरोत्पत्तिनिमित्त- वत्संयोगनिमित्तं कर्म' इति विज्ञायते । प्रत्यात्मव्यवस्थानं तु शरीरस्यात्मना संयोगं प्रचक्ष्महे इति ॥ ६६ ॥ एतेनानियमः प्रत्युक्तः ॥ ६७ ॥ योऽयमकर्मनिमित्ते शरीरसर्गे सत्यनियम इत्युच्यते, अयं शरीरोत्पत्ति- निमित्तवत् संयोगोत्पत्तिनिमित्तं कर्मेत्यनेनानियमः प्रत्युक्तः । कस्तावदयं नियमः ? यथैकस्यात्मनः शरीरं तथा सर्वेषामिति नियमः । अन्यस्यान्यथा, अन्यस्यान्यथेत्यनियमो भेदो व्यावृत्तिर्विशेष इति । दृष्टा च जन्मव्यावृत्तिः-उच्चा- भिजनो निकृष्टाभिजन इति, प्रशस्तं निन्दितमिति, व्याधिबहुलमरोगमिति, समग्रं विकलमिति, पीडाबहुल सुखबहुलमिति, पुरुषातिशयलक्षणोपपन्नं विप- रीतमिति, प्रशस्तलक्षणं निन्दितलक्षणमिति, पट्विन्द्रियं मृद्विन्द्रियमिति । सूक्ष्मश्च भेदोऽपरिमेयः । सोऽयं जन्मभेदः प्रत्यात्मनियतात् कर्मभेदादुपपद्यते । असति कर्मभेदे प्रत्यात्म- नियते निरतिशयित्वादात्मनां समानत्वाच्च पृथिव्यादिगतस्य नियमहेतोरभावात् जैसे वह अदृष्ट शरीरोत्पत्ति में निमित्त है, उसी तरह उस आत्मा का उस शरीर से उपभोगक्षम सम्बन्ध कराने में भी वही निमित्त है, ऐसा समझ में आता है। 'प्रत्यात्म- व्यवस्था' का तात्पर्य हम 'उस शरीर से उसी आत्मा का संयोग' कहते हैं ॥ ६६ ॥ अब अकर्मनिमित्त शरीरोत्पत्तिरूप साङ्ख्यमत का खण्डन करते हैं- इस ( उपर्युक्त व्यवस्था ) से ( सांख्यसम्मत ) अनियमवाद का भी उत्तर दे दिया गया ॥ ६७ ॥ जो यह 'अकर्मनिमित्तक ही शरीरसृष्टि होती है, इसमें अनियम होगा'-ऐसा कहा था, वह भी प्रत्याख्यात हो गया । नियम क्या है ? 'एक आत्मा के शरीर की तरह सब आत्माओं को शरीर होता है'-यह नियम है । 'किसी की एक तरह और किसी की दूसरी तरह शरीरोत्पत्ति होती है' यह अनियम है । इसी को भेद, व्यावृत्ति या विशेष कह देते हैं । यह विशेषता लोक में देखी भी जाती है, जैसे-एक शरीर उच्च कुल में उत्पन्न होता है, दूसरा नीच कुल में; एक शरीर पूजित होता है, दूसरा निन्दित; एक शरीर सुन्दर, सभी अवयवों से सम्पन्न होता है, दूसरा बेडोल, टेढे-मेढे अवयवों वाला; एक शरीर सुख भोगनेवाला, दूसरा हमेशा दुःख के पालने में झूलनेवाला; एक शरीर सत्पुरुषों के लक्षणों से युक्त, दूसरा चोर डाकू-आदि परवञ्चक पुरुषों के चिह्नों से युक्त; एक सुलक्षण, दूसरा कुलक्षण; एक कार्यकुशल, दूसरा अकुशल-ये कुछ मोटे-मोटे भेद गिना दिये । सूक्ष्म भेद तो अपरिममेय तथा असंख्य हैं । यह उपर्युक्त जन्मभेद प्रत्यात्मनियत कर्मभेद से उपपन्न होता है । यदि प्रत्यात्मनियत कर्मभेद न मानोगे तो आत्माओं में समानता होने तथा पृथिवी- आदि के पृथिव्यादिगत नियमहेतु के अभाव से सभी आत्माओं को समान शरीर उत्पन्न
२६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० सर्वं सर्वात्मनां प्रसज्येत ! न त्विदमित्थम्भूतं जन्म, तस्मान्नाकर्मनिमित्ता शरी- रोत्पत्तिरिति । उपपन्नश्च तद्वियोगः, कर्मक्षयोपपत्तेः । कर्मनिमित्ते शरीरसर्गे तेन शरीरे- णात्मनो वियोग उपपन्नः । कस्मात् ? कर्मक्षयोपपत्तेः । उपपद्यते खलु कर्मक्षयः । सम्यग्दर्शनात् प्रक्षीणे मोहे वीतरागः पुनर्भवहेतु कर्म कायवाङ्मनोभिर्न करोति इत्युत्तरस्यानुपचयः, पूर्वोपचितस्य विपाकप्रतिसंवेदनात्प्रक्षयः । एवं प्रसवहेतोर- भावात् पतितेऽस्मिन् शरीरे पुनः शरीरान्तरानुपपत्तेरप्रतिसन्धिः । अकर्मनिमित्ते तु शरीरसर्गे भूतक्षयानुपपत्तेस्तद्वियोगानुपपत्तिरिति ॥ ६७ ॥ तददृष्टकारितमिति चेत्१ ? पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे ॥ ६८ ॥ 'अदर्शनं खल्वदृष्टमित्युच्यते अदृष्टकारिता भूतेभ्यः शरीरोत्पत्तिः । न जात्व- नुत्पन्ने शरीरे द्रष्टा निरायतनो दृश्यं पश्यति, तच्चास्य दृश्यं द्विविधम्-विषय- श्च, नानात्वं चाव्यक्तात्मनोः; तदर्थः शरीरसर्गः । तस्मिन्नवसिते चरितार्थानि होने लगेगा । जबकि ऐसा लोक में देखा नहीं जाता । अतः मानना पड़ेगा कि शरीरो- त्पत्ति कर्मनिमित्तक ही है । इस सिद्धान्त से, तन्निमित्तक कर्मों के क्षीण होने पर उस शरीर का नाश भी सम्भव है । जब हम कर्मनिमित्तकशरीरसृष्टिसिद्धान्त मान लेते हैं तो उस सिद्धान्त से 'एक न एक दिन शरीर-आत्मा का वियोग' भी सिद्ध है; क्योंकि जिन कर्मों से वह शरीर उत्पन्न हुआ, वे कभी न कभी तो क्षीण होंगे ही, उस दिन उक्त वियोग सम्भव है । कर्म क्षीण होते हैं—यह बात युक्ति से भी समझ में आ जाती है । क्योंकि प्रमाणादि पदार्थों के तत्त्वज्ञान से अज्ञान (मोह) के नष्ट होने पर तन्मूलक राग दूर हो जाता है, राग के दूर होने पर पुनरुत्पत्तिकारण त्रिविध (शरीर वाणी या मन से) कर्म नहीं होते कि जिनके उपभोग के लिए पुनः शरीरोत्पत्ति हो, यों आगामी कर्म बनेंगे नहीं, पिछलों का उपभोग से क्षय हो चुका । इस प्रकार, उत्पत्तिहेतु के न रहने से वर्तमान शरीर के विनष्ट होने पर पुनः शरीरान्तरोत्पाद में प्रतिसन्धान नहीं होगा । अकर्मनिमित्तक शरीर सृष्टि मानने पर भूतों के क्षीण न होने से शरीरपरम्परा कभी रुकेगी नहीं तो आपके (सांख्य के) मत में अपवर्ग कैसा ! ॥ ६७ ॥ वह शरीरवियोग अदृष्टकारित है, ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि यों तो अपवर्ग के बाद भी अदृष्टवशात् पुनः शरीरोत्पत्ति होने लगेगी ॥ ६८ ॥ शङ्का—'अदृष्ट' से तात्पर्य है 'अदर्शन' । भूतों से शरीरोत्पत्ति अदृष्टवश होती है; क्योंकि बिना शरीर के उत्पन्न हुए अधिष्ठान के बिना द्रष्टा (पुरुष) दृश्य को देखेगा कैसे ! इसका यह दृश्य दो प्रकार का है—१. दृश्य, तथा २. अव्यक्त व आत्मा का १. एतावत्पर्यन्तं भाष्यान्तर्गतं क्वचित्पुस्तके ।
६८. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६९
६८. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६९ भूतानि न शरीरमुत्पादयन्तीत्युपपन्नः शरीरवियोगः' इति, एवं चेन्मन्यसे ? पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे। पुनः शरीरोत्पत्तिः प्रसज्यते इति। या चानुत्पन्ने शरीरे दर्शनानुत्पत्तिरदर्शनाभिमता, या चापवर्गे शरीरनिवृत्तौ दर्शनानुत्पत्तिरदर्शन- भूता--नैतयोर्दर्शनयोः क्वचिद्विशेष इत्यदर्शनस्यानिवृत्तेरपवर्गे पुनः शरीरो- त्पत्तिप्रसङ्ग इति । चरितार्थता विशेष इति चेत् ? न; करणाकरणयोरारम्भदर्शनात् १। चरितार्थानि भूतानि दर्शनावसानान्न शरीरान्तरमारभन्ते इत्ययं विशेषः-एवं चेदुच्यते ? न; करणाकरणयोरारम्भ- दर्शनात्। चरितार्थानां भूतानां विषयोपलब्धिकरणान् पुनः पुनः शरीरारम्भो दृश्यते, प्रकृतिपुरुषयोर्नानात्वदर्शनस्याकरणान्निरर्थकः शरीरारम्भः पुनर्दृश्यते। तस्मादकर्मनिमित्तायां भूतसृष्टौ न दर्शनार्था शरीरोत्पत्तिर्युक्ता, युक्ता तु कर्म- निमित्ते सर्गे दर्शनार्था शरीरोत्पत्तिः। नानात्व, उसके लिये यह शरीरोत्पत्ति होती है। इस उत्पत्ति के हो जाने पर भूत अपना कार्य कर चुके-अतः पुनः शरीरोत्पत्ति न करेंगे, यों शरीरवियोग हमारे मत में भी उपपन्न है ? उत्तर-यदि ऐसा मानते हो तो अपवर्ग के बाद भी उस दृश्य के लिए शरीरोत्पाद होना कौन रोकेगा ! अतः पुनः शरीरोत्पत्ति होने लगेगी; क्योंकि आपकी दोनों बातों में शरीरोत्पत्ति के पूर्व दर्शनाभावात्मक अदर्शन और शरीरध्वंस (अपवर्ग) में होनेवाला दर्शनाभावात्मक अदर्शन-दोनों में अन्तर क्या हुआ ! अतः उक्त अदर्शन की निवृत्ति न होने से अपवर्गानन्तर भी शरीरोत्पादप्रसङ्ग हो सकता है। शङ्का-उक्त प्रथम अदर्शन में प्रकृतिपुरुष का नानात्वादृश्यत्व करना ही प्रयोजन है, वह निवृत्त कर देने से शरीरोत्पत्ति का प्रयोजन समाप्त हो गया, अब अपवर्ग के बाद उसके निष्प्रयोजन होने से वह शरीरोत्पत्ति नहीं करेगा ? आप करण तथा अकरण का आरम्भ देखा जाने से ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि उक्त कार्य कर देने से चरितार्थ होने पर भी भूतों द्वारा पुनः पुनः विषयोपलब्धिनिमित्त- वशात् शरीरारम्भ देखा जाता है; दूसरे, प्रथम प्रकार का अदर्शन तो प्रथम शरीरोत्पत्ति से ही निवृत्त हो गया, अब द्वितीय प्रकार के दर्शनहेतु में पुनः पुनः शरीरोत्पत्ति होगी, तब भी उक्त नानात्व के दर्शन के न होने पर भी पुनः पुनः शरीरारम्भ होता है। तो 'अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति' सिद्धान्त में दर्शन के लिये भूतसृष्टि का मानना अनुपपन्न ही है। 'कर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति' सिद्धान्त में दर्शनमात्र के लिए हुई भूतसृष्टि उपपन्न हो सकती है। अतः यही सिद्धान्त उचित है। १. न्यायसूचीनिबन्धे न परिगणितम्, वृत्तिकृता च न व्याख्यातमतो नैतत्सूत्रमपि तु भाष्यमेव ।
२७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० कर्मविपाकसंवेदनं दर्शनमिति । तददृष्टकारितमिति कस्यचिद्दर्शनम्-अदृष्टं नाम परमाणूनां गुणविशेषः क्रियाहेतुः, तेन प्रेरिताः परमाणवः सम्मूर्च्छिताः शरीरमुत्पादयन्तीति ? तत्र मनः समाविशति स्वगुणेनादृष्टेन प्रेरितम् । समनस्के शरीरे द्रष्टुरुपलब्धिर्भवतीति ? एतस्मिन् वै दर्शने गुणानुच्छेदात् पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे । अपवर्गे शरीरो- त्पत्तिः परमाणुगुणस्यादृष्टस्यानुच्छेदत्वादिति ॥ ६८ ॥ मनःकर्मनिमित्तत्वाच्च संयोगानुच्छेदः ॥ ६९ ॥ मनोगुणेनादृष्टेन समावेशिते मनसि संयोगव्युच्छेदो न स्यात्, तत्र किंकृतं शरीरादपसर्पणं मनस इति ! कर्माशयक्षये तु कर्माशयान्तराद्विपच्य- मानादपसर्पणोपपत्तिरिति । अदृष्टादेवापसर्पणमिति चेत्-योऽदृष्टः शरीरोप- सर्पणहेतुः, स एवापसर्पणहेतुरपीति ? न; एकस्य जीवनप्रायणहेतुत्वानुपपत्तेः । एवं च सति एकमदृष्टं जीवनप्रायणयोर्हेतुरिति प्राप्तम्, नैतदुपपद्यते ॥ ६९ ॥ नित्यत्वप्रसङ्गश्च प्रायणानुपपत्तेः ॥ ७० ॥ विपाकसंवेदनात् कर्माशयक्षये शरीरपातः प्रायणम्, कर्माशयान्तराच्च जैनमतखण्डन— १. कुछ वादी कर्मविपाक संवेदन ( कर्मफलभोग ) को ( अदृष्टजन्य ) मानते हैं । वे उस 'अदृष्टकारित' का यो प्रतिपादन करते हैं—परमाणुओं का गुणविशेष 'अदृष्ट' है, वह क्रियाकारण है । उस कारण से इकट्ठे हुए पार्थिवादि परमाणु शरीर को उत्पन्न करते हैं, अदृष्ट स्वगुण से प्रेरित होकर मन उस शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । उक्त सांख्याभिमत द्रष्टा के इस मनःसहित शरीर से दृश्योपलब्धि होती है ? इस मत में भी उक्त अदृष्ट गुणविशेष का उच्छेद न होने से, अपवर्गानन्तर भी शरीरोत्पाद हो ही सकता है, अतः यह मत भी सदोष है ॥ ६८ ॥ २. इसी मत में दूषणान्तर दिखाते हैं— मनःकर्मनिमित्त मानने पर उसका संयोगोच्छेद नहीं बनेगा ॥ ६९ ॥ अदृष्ट स्वगुण से प्रेरित मन जब एक बार शरीर में प्रविष्ट हो गया तो फिर वह उस शरीर से वियुक्त क्यों होगा, जबकि वैसा कोई कारण न हो ! 'कर्मनिमित्तक उत्पत्ति' सिद्धान्त में कर्म के क्षीण होने से वह मन उस शरीर से वियुक्त हो सकता है । यदि यह कहें कि उसी स्वगुण अदृष्ट से, जो संयोग कराता हैं, वियोग भी हो जायेगा ? तो यह नहीं कह सकते; क्योंकि एक ही कारण जीवन तथा मृत्यु का कारक नहीं बना करता, जबकि आप उस एक ही कारण को जीवन तथा मृत्यु का कारक बता रहे हैं ! अतः यह मत भी समीचीन नहीं ॥ ६९ ॥ विनाश ( मृत्यु ) न होने से शरीर में नित्यत्व-प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ ७० ॥ विपाक ( कर्मफल ) के भोग से उस कर्माशय के क्षीण होने पर शरीरनाश (मृत्यु) हो जाता है, तथा अन्य कर्माशय होने पर 'जन्म' होता है । यदि कर्मनिरपेक्ष भूतमात्र
७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २७१
७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २७१ पुनर्जन्म । भूतमात्रात्तु कर्मनिरपेक्षाच्छरीरोत्पत्तौ कस्य क्षयाच्छरीरपातः प्राय- णमिति-प्रयाणानुपपत्तेः खलु वै नित्यत्वप्रसङ्गं विद्मः । यादृच्छिके तु प्रायणे प्रायणभेदानुपपत्तिरिति ॥ ७० ॥ पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्ग इत्येतसत् माधित्सुराह— अणुश्यामतान्नित्यत्ववदेतत् स्यात् ? ॥ ७१ ॥ यथा अणोः श्यामता नित्या अग्निसंयोगेन प्रतिविद्धा न पुनरुत्पद्यते, एवम- दृष्टकारितं शरीरमपवर्गे पुनर्नोत्पद्यत इति ? ॥ ७१ ॥ न; अकृताभ्यागमप्रसङ्गात् ॥ ७२ ॥ नायमस्ति दृष्टान्तः, कस्मात् ? अकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । अकृतम् = प्रमाणतो- ऽनुपपन्नम्, तस्याभ्यागमोऽभ्युपपत्तिर्व्यवसायः । एतच्छ्रद्दधानेन प्रमाणतोऽनुपपन्नं मन्तव्यम् । तस्मान्नायं दृष्टान्तः । न प्रत्यक्षं न चानुमानं किञ्चिदुच्यत इति । तदिदं दृष्टान्तस्य साध्यसमत्वमभिधीयत इति । अथ वा—नाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । अणुश्यामतादृष्टान्तेनाकर्मनिमित्तां से शरीरोत्पत्ति मानें तो किसके क्षीण होने पर शरीरनाश होगा ! जब शरीरनाश नहीं होगा तो उसमें नित्यत्व आ गया—ऐसा हम समझते हैं । निष्कर्ष यह है कि स्वेच्छया नाश मानें तो कदाचित् तब भी नाश अनुपपन्न ही है ॥ ७० ॥ इस मत में, अपवर्ग के बाद पुनः शरीरोत्पत्ति होने लगेगी—इस शंका का समा- धान करना चाहते हुए कहते हैं— अणु की श्यामता के नित्यत्व की तरह यह शरीर अपवर्ग होने पर विनष्ट हो जायेगा ? ॥ ७१ ॥ जैसे अणु की श्यामता ( कृष्णरूप ) नित्य हैं; क्योंकि वह अग्निसंयोग से एक बार विनष्ट होकर पुनः उत्पन्न नहीं होती; उसी तरह अपवर्ग होने पर हमारे मत में पुनः शरीरोत्पत्ति नहीं होगी ? ॥ ७१ ॥ अकृताभ्यागम दोष होने से यह दृष्टान्त उचित नहीं ॥ ७२ ॥ यह दृष्टान्त यहाँ देना उचित नहीं; क्योंकि स्वयं इसमें अकृताभ्यागम दोष है । ‘अकृत’ अर्थात् प्रमाण से अनुपपन्न, उसका अभ्यागम अर्थात् अभ्युपपत्ति ( स्वीकृति ), व्यवसाय । श्यामता के दृष्टान्त से शरीरोत्पत्ति न माननेवाले को प्रमाण से अनुपपन्न ( अपने हठ को सिद्ध करने के लिये प्रमाणादि की आवश्यकता न माननेवाला ) ही समझना चाहिये । अतः यह दृष्टान्त नहीं है; क्योंकि यह प्रत्यक्ष और अनुमान को सहारा लेकर नहीं कहा जा रहा है । यों यह दृष्टान्त स्वयं साध्य होने से असिद्ध है अथवा सूत्र का व्याख्यान यों समझना चाहिये—अणु श्यामता के दृष्टान्त से
२७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० शरीरोत्पत्ति समादधानस्याकृताभ्यागमप्रसङ्गः । अकृते सुखदुःखहेतौ कर्मणि पुरुषस्य सुखं दुःखमभ्यागच्छतीति प्रसज्येत । ओमिति ब्रुवतः प्रत्यक्षानुमाना- गमविरोधः । प्रत्यक्षविरोधस्तावद्—भिन्नमिदं सुखदुःखं प्रत्यात्मवेदनीयत्वात् प्रत्यक्षं सर्वशरीरिणाम् । को भेदः ? तीव्रं मन्दं चिरमाशु नानाप्रकारमेकप्रकार- मिति एवमादिर्विशेषः । न चास्ति प्रत्यात्मनियतः सुखदुःखहेतुविशेषः, न चासति हेतुविशेषे फलविशेषो दृश्यते । कर्मनिमित्ते तु सुखदुःखयोगे कर्मणां तीव्रमन्दतोपपत्तेः कर्मसञ्चयानां चोत्कर्षापकर्षभावान्नानाविधैकविधभावाच्च कर्मणां सुखदुःखभेदोपपत्तिः । सोऽयं हेतुभेदाभावाद् दृष्टः सुखदुःखभेदो न स्या- दिति प्रत्यक्षविरोधः ! तथाऽनुमानविरोधः—दृष्टं हि पुरुषगुणव्यवस्थानात् सुखदुःखव्यवस्थानम् । यः खलु चेतनावान् साधननिर्वर्तनीयं सुखं बुद्ध्वा तदीप्सन् साधनावाप्तये प्रयतते स सुखेन युज्यते, न विपरीतः । यश्च साधननिर्वर्तनीयं दुःखं बुद्ध्वा तज्जिहासुः साधनपरिवर्जनाय यतते स च दुःखेन त्यज्यते, न विपरीतः । अस्ति अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति माननेवाले को अकृताभ्यागम-प्रसङ्ग होगा; क्योंकि तब पुरुष सुख-दुःख कारणों वाले कर्म को न करने पर भी सुख-दुःख प्राप्त करने लगेगा । यदि यह अकृताभ्यागम स्वीकार करते हो तो आपके इस मत में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम— तीनों ही प्रमाणों से विरोध उपस्थित होगा । १. प्रत्यक्षप्रमाण-विरोध, जैसे—सभी प्राणियों के ये प्रत्यात्मवेदनीय सुख-दुःख प्रत्यक्षतः भिन्न-भिन्न देखे जाते है। भेद क्या है ? कोई सुख-दुःख तीव्र तथा कोई मन्द होता है, कोई चिरकाल तथा कोई अल्पकाल तक ठहरता है । यों, नाना प्रकार तथा एक प्रकार का देखा जाने से उसमें भेद ज्ञात होता है । परन्तु आपके मत में नियत सुख- दुःखहेतु विशेष नहीं दिखायी देता, हेतुविशेष के न रहने पर फलभेद भी नहीं होगा । कर्मनिमित्तक सुख-दुःखसम्बन्ध मानने पर, कर्मों की तीव्रता या मन्दता के उपपादन से या कर्म-सञ्चय के उत्कर्ष-अपकर्ष से उससे होने वाले सुख-दुःख में नानाप्रकारता तथा एकप्रकारता आ ही जायेंगी—अतः कर्मों से सुख-दुःख-भेद बन जायेगा । परन्तु आपके मत में हेतुभेद न होने से प्रत्यक्षदृष्ट सुख-दुःख-भेद उपपन्न न होगा—यह प्रत्यक्षप्रमाण से विरोध है ! २. अनुमानप्रमाण-विरोध, जैसे-पुरुषगुणानुरोध से सुख-दुःख की उत्पत्ति लोक में उपपन्न होती है । जो चेतन प्राणी साधन से उत्पादनीय सुख को प्रमाणों द्वारा जानकर उसको चाहता हुआ उक्त साधनप्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है तो वह सुखी होता है, दूसरा नहीं । और जो साधनों से उत्पादनीय दुःख को प्रमाणों द्वारा जानकर उसको छोड़ने की इच्छा करता हुआ उक्त साधननिवृत्ति के लिये प्रयत्न करता है तो वह दुःखों से
७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वप्रकरणम् २७३
७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वप्रकरणम् २७३ चेदं यत्नमन्तरेण चेतनानां सुखदुःखव्यवस्थानम्, तेनापि चेतनगुणान्तरव्यव- स्थाकृतेन भवितव्यमित्यनुमानम् । तदेतदकर्मनिमित्ते सुखदुःखयोगे विरुध्यते इति । तच्च गुणान्तरमसंवेद्यत्वाददृष्टं विपाककालनियमाच्चाव्यवस्थितम् । बुद्ध्यादयस्तु संवेद्याश्चापवर्गिणश्चेति । अथागमविरोधः—बहु खल्विदमार्षमृषीणामुपदेशजातमनुष्ठानपरिवर्जना- श्रयमुपदेशफलं च । शरीरिणां वर्णाश्रमविभागेनानुष्ठानलक्षणा प्रवृत्तिः, परि- वर्जनलक्षणा निवृत्तिः । तच्चोभयमेतस्यां दृष्टौ, नास्ति कर्म सुचरितं दुश्चरितं वा, कर्मनिमित्तः पुरुषाणां सुखदुःखयोग इति विरुध्यते । सेयं पापिष्ठानां मिथ्यादृष्टिः—'अकर्मनिमित्ता शरीरसृष्टिः, अकर्मनिमित्तः सुखदुःखयोगः' इति ॥ ७२ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ❀ समाप्तश्चायं तृतीयोऽध्यायः ❀ छुटकारा पा जाता है, दूसरा नहीं पाता । हाँ, कभी-कभी प्रत्यक्षतः पुरुषप्रयत्न के बिना हो अतर्कित सुख-दुःख उपस्थित हो जाते हैं, इस प्रसङ्ग में यही अनुमान करना पड़ता है कि यह अतर्कित सुख-दुःख भी इस चेतन के किसी अन्य गुणविशेष के कारण उपपन्न हुआ है । यह अनुमान अकर्मनिमित्तक सृष्टि मानने पर नहीं बन सकता । यह अतर्कित सुखदुःखोत्पादक पुरुषगुणान्तर न प्रत्यक्ष है, न क्षणिक, अपितु बुद्ध्यादि पुरुषगुणों की तरह विलक्षण है; क्योंकि यह अदृष्ट गुणविशेष असंवेद्य है, परन्तु विपाककालनियम से बँधा हुआ नहीं है । जैसे बुद्ध्यादि मात्र संवेद्य भी हैं, तथा विनाशी भी ।- ३. आगमप्रमाण-विरोध, जैसे—यह हमारा साङ्गोपाङ्ग ऋषिप्रणीत धर्मशास्त्र, जिसमें ऋषियों के विधिनिषेधपरक उपदेश भरे पड़े हैं, तथा उन उपदेशों पर आचरण करने वालों के दृष्टान्त भी वर्णित हैं ! इन शास्त्रों में प्राणियों के लिये वर्णाश्रमभेद से विधिपरक प्रवृत्ति तथा निषेधपरक निवृत्ति दिखायी गयी हैं । यह प्रवृत्ति-निवृत्ति अकर्म- निमित्तक सृष्टि माननेवालों के मत में कैसे बनेगी; क्योंकि इनके मत में शुभाचरण या दुराचरण रूप कोई कर्म नहीं कि जिसका फल मिले, जब कि सुकर्म तथा निमित्त से ही सुख-दुःखोत्पत्ति होती हुई देखी जाती है । अतः 'शरीरोत्पत्ति अकर्मनिमित्तक है, सुख-दुःखसम्बन्ध भी अकर्मनिमित्तक है'— यह मिथ्यादृष्टि अतिशयेन पापपङ्कनिमग्न पुरुषों को ही हो सकती है, शास्त्रप्रमाणसम्पन्न आस्तिकजन तो समग्र सृष्टि को कर्मनिमित्तक ही मानते हैं, अतः उनके मत में कर्मों के क्षीण होने से अत्यन्तापवर्ग सम्पन्न होना उचित ही है ॥ ७२ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में तृतीय अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ तृतीय अध्याय भी समाप्त ❀ न्या० द० : १८
प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ १-२ ]
अथ चतुर्थोऽध्यायः [ प्रथममाह्निकम् ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ १-२ ] मनसोऽनन्तरा प्रवृत्तिः परीक्षितव्या । तत्र खलु यावद्धर्माधर्माश्रयशरीरादि परीक्षितम्, सर्वा सा प्रवृत्तेः परीक्षैत्याह— प्रवृत्तिर्यथोक्ता¹ ॥ १ ॥ तथा परीक्षितेति ॥ १ ॥ प्रवृत्त्यनन्तरास्तर्हि दोषाः परीक्ष्यन्ताम् ? इत्यत आह— तथा दोषाः ॥ २ ॥ परीक्षिता इति । बुद्धिसमानाश्रयत्वादात्मगुणाः प्रवृत्तिहेतुत्वात् पुनर्भव- प्रतिसन्धानसामर्थ्याच्च संसारहेतवः, संसारस्यानादित्वादनादिना प्रबन्धेन उद्देशसूत्र (१.१.९) में मन के बाद प्रवृत्ति का नाम गिनाया गया है, अतः मन की परीक्षा के बाद 'प्रवृत्ति' की परीक्षा किया जाना आवश्यक है । परन्तु पीछे जो धर्म, तथा अधर्म के आश्रयभूत शरीरादि की परीक्षा की गयीं, वे सब एक तरह से 'प्रवृत्ति' की ही परीक्षा हैं; क्योंकि प्रवृत्ति धर्माधर्मान्तःपाती है। अतः धर्माधर्म की परीक्षा से उसकी भी परीक्षा हो ही गयी—इसी आशय को लेकर (सूत्रकार) कहते हैं प्रवृत्ति (शरीरादि की परीक्षा) जैसे पीछे वर्णित की जा चुकी है ॥ १ ॥ उस वर्णन से ही उसका परीक्षा हो चुकी । ( पीछे हम जैसा उसका लक्षण कर आये हैं, उस लक्षण के सहारे जो कुछ भी हम प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर उसके वारे में कह चुके हैं, उसीसे इस ( प्रवृत्ति ) पर अच्छी तरह विचार किया जा चुका ) ॥ १ ॥ तो फिर प्रवृत्ति के बाद परिगणित दोषों की ही परीक्षा कर लें ? इस पर कहते हैं— उसी तरह दोष भी ॥ २ ॥ परीक्षित हो चुके । दोषों के प्रवृत्तितुल्य होने से पूर्वपरीक्षा से दोषों की भी परीक्षा हो चुकी । कहने का तात्पर्य यह है कि दोष बुद्धि के समानाश्रय हैं, यों वे भी आत्मगुण होते हुए प्रवृत्ति के हेतु हैं, और पुनर्जन्म की प्रतिसन्धि कराने में सामर्थ्य रखते हैं, अतः वे भी संसार के हेतु हैं, तथा संसार के अनादि होने से दोष भी अनादि सन्तानरूप १. वार्त्तिककारास्तु सूत्रोक्तं यथाशब्दं द्वितीयसूत्रस्थेन 'तथा' शब्देन योजयन्ति । 'प्रवृत्तिर्यथोक्ता' तथा दोषा अपि इति तस्य हृदयम् ।
३. सू० ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् २७५
३. सू० ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् २७५ प्रवर्त्तन्ते; मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तत्त्वज्ञानात्, तन्निवृत्तौ रागद्वेषप्रबन्धोच्छेदेऽपवर्ग इति प्रादुर्भावतिरोधानधर्माणः—इत्येवमाद्युक्तं दोषाणामिति ॥ २ ॥ दोषत्रैराश्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ३-८ ] ‘प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः’ ( १. १. १८ ) इत्युक्तम्, तथा चेमे मानेर्ष्यासूया- विचिकित्सामत्सरादयः, ते कस्मान्नोपसङ्ख्यायन्ते ? इत्यत आह— तत्त्रैराश्यं रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् ॥ ३ ॥ तेषां दोषाणां त्रयो राशयः, त्रयः पक्षाः । रागपक्षः—कामो मत्सरः स्पृहा तृष्णा लोभ इति; द्वेषपक्षः—क्रोध ईर्ष्या असूया द्रोहोऽमर्ष इति; मोहपक्षः— मिथ्याज्ञानं विचिकित्सा मानः प्रमाद इति; त्रैराश्यान्नोपसंख्यायन्ते इति । लक्षणस्य तर्ह्यर्थभेदात्त्रित्वमनुपपन्नम् ? रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् नानुप- पन्नम् । आसक्तिलक्षणो रागः, अमर्षलक्षणो द्वेषः, मिथ्याप्रतिपत्तिलक्षणो मोह इति । एतत्प्रत्यात्मवेदनीयं सर्वशरीरिणाम् । विजानात्ययं शरीरी रागमुत्पन्नम्— से प्रवृत्त होते रहते हैं । (यों दोष प्रादुर्भाव-धर्म वाले हैं । उधर) तत्त्वज्ञान से मिथ्या- ज्ञान की निवृत्ति होती है, मिथ्याज्ञान-निवृत्ति से रागद्वेषसन्तति की उच्छेद हो जाता है, इस उच्छेद हेतु से अपवर्ग हो जाता है ! इस तरह दोष प्रादुर्भाव-विनाशवाले हैं । प्रसङ्ग-प्रसङ्ग (१. १. २, १. १. १८, ३. १. २५) पर जो कुछ दोषों के बारे में कहा जा चुका है वह सब इनकी परीक्षा ही समझी जानी चाहिये ॥ २ ॥ पीछे आप कह आये हैं कि 'दोष प्रवृत्ति के हेतु हैं' (१. १. १८) तो जब मान, ईर्ष्या, असूया, विचिकित्सा, मत्सर-आदि भी प्रवृत्ति के हेतु हैं; फिर इनकी गणना क्यों नहीं की गयी ? इस पर कहते हैं— राग, द्वेष तथा मोह—इस भेद से उस दोष के तीन समूह हैं ॥ ३ ॥ उन दोषों तीन राशियां, तीन वर्ग हैं । १. रागपक्ष में, जैसे—काम, मत्सर, स्पृहा, तृष्णा तथा लोभ—इनका परिगणन होता है । २. द्वेषपक्ष में, जैसे—क्रोध, ईर्ष्या, असूया, द्रोह तथा अमर्ष (—इनका परिगणन होता है) । ३. मोहपक्ष में, जैसे—मिथ्या- ज्ञान, विचिकित्सा, मान तथा प्रमाद ( —इनका परिगणन होता है ) । इस त्रिराशि के कारण ही उक्त सब का परिगणन नहीं किया गया । इस तरह तो लक्षण का भेद न होने से उक्त बहुविधत्व की तरह त्रित्व भी नहीं बनेगा ? क्यों नहीं बनेगा, जब कि राग द्वेष तथा मोह में अर्थभेद है । राग कहते हैं वस्तु में आसक्ति को । द्वेष कहते हैं किसी वस्तु में असहिष्णुतारूप अमर्ष को । तथा मोह मिथ्याज्ञान कहलाता है । यह प्राणी, जब इसे राग उत्पन्न होता है तो जानता है कि CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ १. आ० अस्ति मेऽध्यात्मं रागधर्म इति, विरागं च विजानाति-नास्ति मेऽध्यात्मं रागधर्म इति । एवमितरयोरपीति । मानेर्ष्यासूयाप्रभृतयस्तु त्रैराश्यमनुपतिता इति नोप- संख्यायन्ते ॥ ३ ॥ न; एकप्रत्यनीकभावात् ? ॥ ४॥ नार्थान्तरं रागादयः, कस्मात् ? एकप्रत्यनीकभावात् । तत्त्वज्ञानम् = सम्य- ङ्ग्मतिः, आर्यप्रज्ञा, सम्बोधः-इत्येकमिदं प्रत्यनीकं त्रयाणामिति ? ॥ ४ ॥ व्यभिचारादहेतुः ॥ ५ ॥ एकप्रत्यनीकाः पृथिव्यां श्यामादयोऽग्निसंयोगेनैकेन, एकयोनयश्च पाकजा इति ॥ ५ ॥ सति चार्थान्तरभावे— तेषां मोहः पापीयान्, नामूढस्येतरोत्पत्तेः ॥ ६ ॥ मोहः पापः, पापत्तरो वा द्वावभिप्रेत्योक्तम्, कस्मात् ? नामूढस्येतरोत्पत्तेः । अमूढस्य रागद्वेषौ नोत्पद्येते, मूढस्य तु यथासङ्कल्पमुत्पत्तिः । विषयेषु रञ्ज- उसके मन में रागधर्म उत्पन्न हो गया है। जब इसे वैराग्य होता है तब भी जानता है कि उसके मन में अब रागधर्म नहीं है। इसी तरह द्वेष तथा मोह के वारे में भी सम- झना चाहिये। मान, ईर्ष्या, तथा असूया-आदि इसी समूह में अन्तर्भूत हो जाते हैं— अतः उनकी पृथक् गणना नहीं की गयी ॥ ३ ॥ उनका एक ही विरोधी होने से अर्थभेद नहीं है ? ॥ ४ ॥ रागादि अर्थान्तर नहीं हैं; क्योंकि उनका एक ही विरोधी है। तत्त्वज्ञान अर्थात् यथार्थमति, आर्यप्रज्ञा या सम्यग्बोध—यह एक इन तीनों का ही विरोधी है ॥ ४ ॥ व्यभिचारी होने से उक्त हेतु नहीं बनता ॥ ५ ॥ एकप्रत्यनीकत्व हेतु व्यभिचारी है; क्योंकि एकप्रत्यनीकत्व से किसी का नानात्व नष्ट नहीं हुआ करता; जैसे—पृथिवी में श्यामादि गुण एक ही अग्निसंयोग से नष्ट हो जाते हैं, तो क्या उनमें नानात्व न माना जाये ! इसी तरह रूपादि गुण पाकरूपैककारणजन्य हैं, तो क्या उन सब में एकत्व मान लिया जाये ! ॥ ५ ॥ यों अर्थान्तर सिद्ध करने के बाद कहते हैं— उन तीनों में मोह अधिक अनर्थ की जड़ है; क्योंकि अमूढ को रागद्वेष नहीं हुआ करते ॥ ६ ॥ रागद्वेष की अपेक्षा से अतिशयबोधन के लिये मोह को पापतर कहा गया है; क्योंकि मोहरहित को रागद्वेष नहीं हुआ करते। मोहसम्पन्न को संकल्पानुसार रागद्वेष