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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३८. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५१

३८. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५१ न सम्भवतीत्यहेतवो हेत्वाभासाः । तदिदं हेतूदाहरणयो सामर्थ्यं१ परमसूक्ष्मं दुःखबोधं पण्डितरूपवेदनीयमिति ॥ ३७ ॥ उपनयलक्षणम् उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः ॥ ३८ ॥ उदाहरणापेक्षः = उदाहरणतन्त्रः, उदाहरणवशः । वशः = सामर्थ्यम् । साध्यसाधर्म्ययुक्ते उदाहरणे—स्थाल्यादि द्रव्यमुत्पत्तिधर्मकमनित्यं दृष्टम्, तथा 'शब्द उत्पत्तिधर्मकः' इति साध्यस्य शब्दस्योत्पत्तिधर्मकत्वमुपसंह्रियते । साध्यवैधर्म्ययुक्ते पुनरुदाहरणे आत्मादि द्रव्यमनुत्पत्तिधर्मकं नित्यं दृष्टम्, न तथा शब्द इति, अनुत्पत्तिधर्मकत्वस्योपसंहारप्रतिषेधेनोत्पत्तिधर्मकत्वमुप- संह्रियते । तदिदमुपसंहारद्वैतमुदाहरणद्वैताद्भवति । उपसंह्रियतेऽनेनेति चोपसंहारो वेदितव्य इति ॥ ३८ ॥ द्विविधस्य पुनर्हेतोर्द्विविधस्य चोदाहरणस्योपसंहारद्वैते च समानम्— सम्भव नहीं हैं; क्योंकि हेत्वाभास अहेतुक हैं । यह हेतु-उदाहरण का सामर्थ्य ( सादृश्य ) परमसूक्ष्म है, दुरवबोध है, न्यायशास्त्रज्ञ विद्वान् ही इसे समझ सकते हैं ॥ ३७ ॥ उदाहरण की अपेक्षा रखते हुए 'वैसा ही यह है' या 'वैसा यह नहीं है'—साध्य का यह उपसंहार 'उपनय' कहलाता है ॥ ३८ ॥ 'उदाहरणापेक्ष' से तात्पर्य है उदाहरणानुसारो अर्थात् उदाहरणवश । 'वश' कहते हैं 'सामर्थ्य' को । अक्षरार्थ हुआ 'उदाहरण से सामर्थ्य ( शक्ति ) पाया हुआ' । जिस प्रमाता ने साध्य के सादृश्य से युक्त उदाहरण में स्थाली-आदि द्रव्य को उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य देखा है, वह प्रमाता 'शब्द उत्पत्तिधर्मक है' इस अनुमान में साध्य द्रव्य का अनित्यत्वविशिष्ट शब्द में उत्पत्तिधर्मकत्व उपसंहृत कर लेता है। इसी तरह साध्य की असदृशता से युक्त उदाहरण में आत्मा-आदि द्रव्य को अनुत्पत्तिधर्मा होने से नित्य समझा है, वह नित्यत्व शब्द में नहीं है, क्योंकि अनुत्पत्तिधर्मकत्व के उप- संहारप्रतिषेध से वहाँ उत्पत्तिधर्मकत्व उपसंहृत हो जाता है । अन्वय-व्यतिरेकी रूप से उदाहरण के दो भेदों से उपसंहार के ये दो भेद हो जाते हैं । जिससे उपसंहार ( उपन्यास ) हो वह 'उपसंहार' कहलाता है ॥ ३८ ॥ दो प्रकार के हेतु कह दिये गये तथा दो प्रकार के उदाहरण और उपसंहार (उप- नय) भी बता दिये गये, उसी तरह अब दो प्रकार के निगमन का भी व्याख्यान कर रहे हैं। १. 'साधर्म्यम्'—इति पाठः।

५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० निगमनलक्षणम् हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञाया पुनर्वचनं निगमनम् ॥ ३९ ॥ साधर्म्योक्ते वा वैधर्म्योक्ते वा यथोदाहरणमुपसंह्रियते, 'तस्मादुत्पत्ति- धर्मकत्वादनित्यः शब्दः' इति निगमनम् । निगम्यन्ते अनेनेति प्रतिज्ञाहेतूदाहरणो- पनया एकत्रेति निगमनम् । निगम्यन्ते = समर्थ्यन्ते, सम्बध्यन्ते । तत्र साधर्म्योक्ते तावद्धेतौ वाक्यम् —'अनित्यः शब्दः' इति प्रतिज्ञा, 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्' इति हेतुः, 'उत्पत्तिधर्मकं स्थात्यादि द्रव्यमनित्यम्' इत्यु- दाहरणम्, 'तथा चोत्पत्तिधर्मकः शब्दः' इत्युपनयः, 'तस्मादुत्पत्तिधर्मकत्वा- दनित्यः शब्दः' इति निगमनम् । वैधर्म्योक्तेऽपि — 'अनित्यः शब्दः', 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्', 'अनुत्पत्तिधर्म- कमात्मादि द्रव्यं नित्यं दृष्टम्', 'न च तथानुत्पत्तिधर्मकः शब्दः', 'तस्मादुत्पत्ति- धर्मकत्वादनित्यः शब्दः' इति । अवयवसमुदाये च वाक्ये सम्भूयेतरेतराभिसम्बन्धात् प्रमाणान्यर्थान् साध- यन्तीति । सम्भवस्तावत्-शब्दविषया प्रतिज्ञा, आप्तोपदेशस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यां हेतु-कथन के बाद प्रतिज्ञा को फिर से दुहराना ही 'निगमन' कहलाता है ॥ ३९ ॥ साधर्म्ययुक्त या वैधर्म्ययुक्त हेतुकथनानन्तर जैसे उदाहरण अपना काम कर चुका होता है, उसी प्रकार उत्पत्तिधर्मकत्वहेतु से उपसंहृत 'शब्द अनित्य है'—इस प्रकार प्रतिज्ञा को पुनः दुहराना ही 'निगमन' कहलाता है । निगमन में प्रतिज्ञा-आदि चतुष्टय समर्थित होते हैं । साधर्म्ययुक्त हेतु में वाक्य यों विभक्त होगा—'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा हुई, 'उत्पत्तिधर्मा होने से' यह हेतु हुआ, 'उत्पत्तिधर्मा स्थाली आदि द्रव्य अनित्य होते हैं' यह उदाहरण हुआ, 'वैसा ही यह शब्द है' यह उपनय हुआ, 'इसलिये उत्पत्तिधर्मा होने से शब्द अनित्य है' यह निगमन हुआ । वैधर्म्ययुक्त हेतुवाक्य में—'शब्द अनित्य हैं', 'उत्पत्तिधर्मा होने से', 'अनुत्पत्तिधर्मा आत्मादि द्रव्य नित्य देखा गया हैं', 'यह शब्द वैसा अनुत्पत्तिधर्मक नहीं है', 'इसलिये उत्पत्तिधर्मक होने से शब्द अनित्य है'—इस प्रकार पञ्चावयव का प्रयोग होगा । इस पञ्चावयवयुक्त वाक्य में अनेक प्रमाण सम्मिलित होकर परस्पर सम्बद्ध रहते हुए अर्थसाधन करते हैं । प्रमाणों के इस सम्मिश्रण को इस तरह समझना चाहिये—'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा आप्तोपदेश है, ऋष्यनुक्त आप्तोपदेश स्वतन्त्र नहीं हो सकता, उसमें अवश्य प्रत्यक्ष या अनुमान की आवश्यकता पड़ेगी, अतः प्रतिज्ञा में प्रत्यक्ष तथा अनुमान का सम्मिश्रण हुआ । इसी प्रकार साध्य-साधन की व्याप्ति को उदाहरण में देखकर ही हेतु का CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३९. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५३

३९. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५३ प्रतिसन्धानाद्, अनुह्वेश्च स्वातन्त्र्यानुपपत्तेः । अनुमानं हेतुः, उदाहरणे सादृश्य- प्रतिपत्तेः। तच्चोदाहरणभाष्ये १ (१.१.३६) व्याख्यातम् । प्रत्यक्षविषयमुदाहरणम्, दृष्टेनादृष्टसिद्धेः । उपमानमुपनयः, 'तथा' इत्युपसंहारात्, 'न च तथा' इति वोपमानधर्मप्रतिषेधे विपरीतधर्मोपसंहारसिद्धेः। २सर्वेषामेकार्थप्रतिपत्तौ सामर्थ्य- प्रदर्शनं निगमनमिति । इतरेतराभिसम्बन्धोऽपि-असत्यां प्रतिज्ञायामनाश्रया हेत्वादयो न प्रवर्त्तेरन् । असति हेतौ कस्य साधनभावः प्रदर्श्येत, उदाहरणे साध्ये च कस्योपसंहारः स्यात्, कस्य चापदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनं स्यादिति ! असत्युदाहरणे केन साधर्म्यं वैधर्म्यं वा साध्यसाधनमुपादीयेत, कस्य वा साधर्म्यवशादुपसंहारः प्रवर्त्तेत ! उपनयं चान्तरेण साध्येऽनुपसंहृतः साधको धर्मो नार्थं साधयेत् । निगमनाभावे चानभिव्यक्तसम्बन्धानां प्रतिज्ञादीनामेकार्थेन प्रवर्त्तनं 'तथा' इति प्रतिपादनं कस्येति ! अथावयवार्थः—साध्यस्य धर्मस्य धर्मिणा सम्बन्धोपादानं प्रतिज्ञार्थः, हेतुत्व निश्चित होता है, अतः उदाहरण में सादृश्य-प्रतिपादन से हुए अनुमान को ही 'हेतु' कहते हैं । इसका विशद विवेचन हम पीछे उदाहरणसूत्र-व्याख्यान (१.१.३६) के समय कर आये हैं । उदाहरण प्रत्यक्षाधीन होता है; क्योंकि उस दृष्ट उदाहरण से अदृष्ट (परोक्ष) की सिद्धि की जाती है । उपनय को उपमान प्रमाण की जरूरत पड़ती है; क्योंकि इस उपनय में 'वैसा ही' यह उपसंहार होता है, या 'वैसा नहीं' यह उपमान- धर्म प्रतिषिद्ध होने पर विपरीतधर्मा (वैधर्म्ययुक्त) उपसंहार सिद्ध हो सकेगा । 'प्रतिज्ञा से उपनय तक का अर्थ या स्वभाव प्रतिबद्धलिङ्ग हैं'-ऐसा प्रतिपादनसामर्थ्य दिखाना निगमन का अर्थ होने से उसमें सब प्रमाणों का सम्मिश्रण स्पष्ट ही है । इनका परस्पर सम्बन्ध यों समझना चाहिये-पहली बात तो यह है कि वाक्य में में प्रतिज्ञा के न रहने पर आश्रयरहित हेत्वादि की प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । हेतु के न रहने पर वाक्य में साधनत्व किसका दिखायेंगे ! उदाहरण और साध्य में किसका उप- संहार करेंगे ! किसके कथनानन्तर प्रतिज्ञा का पुनर्वचन करेंगे कि वाक्यपूर्ण हो जाये ! दूसरी बात यह है कि उदाहरण के न कहने पर किसके साथ समानता या असमानता मानकर साध्य की सिद्धि दिखायेंगे और किस साधर्म्य की अपेक्षा से उपसंहार करेंगे ! उपनय के बिना साध्य में अनुपसंहृत साधक धर्म अर्थसिद्धि नहीं कर सकता ! निगमन के बिना प्रतिज्ञादिकों का परस्पर सम्बन्ध अभिव्यक्त न हो पायेगा, तब उनकी एक प्रयोजन से प्रवृत्ति, 'तथा' ऐसा प्रतिपादन किसका होगा ! अब अवयवों का फलनिरूपण करते हैं—साध्य धर्म का धर्मी से सम्बन्ध-बोधन १. उदाहरणसूत्रव्याख्यावसर इत्यर्थः । २. प्रतिज्ञादिनिगमनान्तानाम् ।

५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० उदाहरणेन समानस्य विपरीतस्य वा साध्यस्य धर्मस्य साधकभाववचनं हेत्वर्थः, धर्मयोः साध्यसाधनभावप्रदर्शनमेकत्रोदाहरणार्थः, साधनभूतस्य धर्मस्य साध्येन धर्मेण सामानाधिकरण्योपपादनमुपनयार्थः, उदाहरणस्थयोर्धर्मयोः साध्यसाधन- भावोपपत्तौ साध्ये विपरीतप्रसङ्गप्रतिषेधार्थं निगमनम् । न चैतस्यां हेतूदाहरणपरिशुद्धौ सत्यां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वं प्रक्रमते । अव्यवस्थाप्य खलु धर्मयोः साध्य- साधनभावमुदाहरणे जातिवादी प्रत्यवतिष्ठते । व्यवस्थिते तु खलु धर्मयोः साध्यसाधनभावे दृष्टान्तस्थे गृह्यमाणे साधनभूतस्य धर्मस्य हेतुत्वेनोपादानम्; न साधर्म्यमात्रस्य, न वैधर्म्यमात्रस्य वेति ॥ ३९ ॥ न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् [ ४०-४१ ] तर्कलक्षणम् इत ऊर्ध्वं तर्को लक्षणीय इति । अथेदमूच्यते— अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः ॥ ४० ॥ अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे १ जिज्ञासा तावज्जायते—जानीयेममर्थमिति । अथ जिज्ञासितस्य वस्तुनो व्याहतो धर्मौ विभागेन विमृशति—किंस्विदित्थम्, आहो- प्रतिज्ञा का प्रयोजन है। उदाहरण के तुल्य या विपरीत साध्य धर्म के प्रति साधकत्व- बोधन ही हेतु का प्रयोजन है । लिङ्ग-लिङ्गी की व्याप्ति को एक दृष्टान्त में बोधन करना उदाहरण का प्रयोजन है । साधनभूत धर्म का साध्य धर्म से सामानाधिकरण्य बतलाना उपनय का कार्य है । उदाहरण में मिले धर्मों का साध्य-साधनभाव बन जाने पर साध्य में विपरीत प्रसङ्ग का निषेध बतलाना निगमन का प्रयोजन है । हेतु और उदाहरण का इतना स्पष्ट व्याख्यान कर देने पर वाद में साधर्म्य तथा वैधर्म्य के प्रतिषेध से जातिनिग्रहस्थान का बाहुल्य नहीं हो पायेगा; उदाहरण में लिङ्ग- लिङ्गी के धर्मों का साध्यसाधनभाव अनङ्गीकार करके जातिवादी प्रतिषेध का बाहुल्य करता है । दृष्टान्तस्थ धर्मों का साध्यसाधनभाव व्यवस्थित ( प्रमित, शुद्ध ) रूप से स्वी- कार कर लेने पर तो साधनभूत धर्म का ही हेतुरूप से ग्रहण होगा, न कि साधर्म्यमात्र या वैधर्म्यमात्र के हेतुत्व का ॥ ३९ ॥ अवयनिरूपण के बाद तर्क का लक्षण दिखाना चाहिये, अतः अब उसे कहते हैं— सम्यक्तया अविज्ञात अर्थ में कारणोपपत्ति द्वारा उसके तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा करना 'तर्क' कहलाता है ॥ ४० ॥ भली भाँति न जाने हुए अर्थ को जानने की इच्छा होती है—'इस अर्थ को जान लूँ'। तदनन्तर उस जिज्ञासित वस्तु के विरुद्ध धर्मों पर विभागशः विचार करता है—'क्या यह १. अविज्ञायमान०-पाठा० ।

४०. सू० ] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५५

४०. सू० ] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५५ स्विन्नेत्थमिति । विमृश्यमानयोर्धर्मयोरेकं कारणोपपत्त्या अनुजानाति—सम्भ- वत्यस्मिन् कारणं प्रमाणं हेतुरिति, कारणोपपत्त्या स्यात्-एवमेतन्नेतरदिति । तत्र निदर्शनम्-योऽयं ज्ञाता ज्ञातव्यमर्थं जानीते तं 'तत्त्वतो भो जानीयं' इति जिज्ञासते । 'स किमुत्पत्तिधर्मकः ? अनुत्पत्तिधर्मकः ?' इति विमर्शः । विमृश्य- मानेऽविज्ञाततत्त्वेऽर्थे यस्य धर्मस्याभ्यनुज्ञाकारणमुपपद्यते तमनुजानाति-‘यद्य- यमनुत्पत्तिधर्मकः, ततः स्वकृतस्य कर्मणः फलमनुभवति ज्ञाता । दुःखजन्मप्रवृत्ति- दोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरमुत्तरं पूर्वस्य पूर्वस्य कारणमुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भावादपवर्ग इति स्यातां संसारापवर्गौ । उत्पत्तिधर्मके ज्ञातारि पुनर्न स्याताम् । उत्पन्नः खलु ज्ञाता देहेन्द्रियबुद्धिवेदनाभिः सम्बध्यत इति नास्येदं स्वकृतस्य कर्मणः फलम्, उत्पन्नश्च भूत्वा न भवतीति तस्याविद्यमानस्य निरुद्धस्य वा स्वकृतकर्मणः फलोपभोगो नास्ति । तदेवमेकस्यानकशरीरयोगः शरीर- वियोगश्चात्यन्तं न स्यात्' इति । यत्र कारणमनुपपद्यमानं पश्यति तन्नानुजानाति । सोऽयमेवंलक्षण ऊहस्तर्क इत्युच्यते । ऐसी हैं' या 'क्या यह ऐसी नहीं हैं' । दोनों धर्मों पर विचार करता हुआ वह किसी एक धर्म के बारे में कारणोपपादन से अनुमान करता है कि 'इसमें यह कारण, यह हेतु, यह प्रमाण स्पष्ट है । कारणोपपादन से यह ऐसा ही है या ऐसा नहीं हैं' । उदाहरण—कोई प्रमाता ज्ञातव्य अर्थ को साधारणतः जानता है, तब उसे 'अरे, इसे सम्यक्तया ( भली भाँति ) जान लूँ'—ऐसी जिज्ञासा होती है । 'यह ज्ञातव्य अर्थ उत्पत्तिधर्मक है या अनुत्पत्तिधर्मक ?'—यह 'विमर्श' कहलाता है । उस अविज्ञाततत्त्व वाले अर्थ का विमर्श करने पर जिस धर्म की स्वीकृति का कारण उपपन्न हो जाये, उसका वह अनुमान करता है । जैसे—"यदि यह ज्ञाता अनुत्पत्तिधर्मक है तो स्वकृत कर्मफल का अनुभव करता है । दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्याज्ञान—ये उत्तरोत्तर अपने से पूर्व पूर्व के कारण हैं, उत्तरोत्तर के अपाय से बाद में कुछ शेष नहीं रह जाता, तब मोक्ष हो जाता है । अतः उस ज्ञाता के—संसार तथा अपवर्ग, दोनों हो सकते हैं । उस ज्ञाता के उत्पत्तिधर्मा होने पर ये—संसार तथा अपवर्ग, उसको नहीं नहीं बनेंगे; क्योंकि उत्पन्न ज्ञाता देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना से सम्बद्ध रहता है इसलिये यह स्वकृत कर्म का फल नहीं बन सकता ( क्योंकि वह ज्ञाता अनित्य होने से कालान्तरभावी फल का अधिकरण नहीं बन सकता ) । उत्पन्न होकर वह पुनः न उत्पन्न हो—यों अपना विनाश या निरोध होने पर स्वकृतकर्म-फल वह कैसे भोगेगा ! इस तरह एक का अनेक शरीरों के साथ सम्बन्ध, तथा वियोग भी नहीं बनेगा ।" जहाँ कारण उत्पन्न नहीं होता वहाँ वह कोई अनुमान भी नहीं कर पाता । इस तरह के लक्षणों वाली यह जिज्ञासा तर्क कहलाती है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० कथं पुनरयं तत्त्वज्ञानार्थः, न तत्त्वज्ञानमेवेति ? अनवधारणात् । अनुजा- नात्ययमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या, न त्ववधारयति, न व्यवस्यति, न निश्चि- नोति—'एवमेवेदम्' इति । कथं तत्त्वज्ञानार्थ इति ? तत्त्वज्ञानविषयाभ्यनुज्ञालक्षणानुग्रहभावितात् १ प्रसन्नादनन्तरप्रमाणसामर्थ्यात्तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इत्येवं तत्त्वज्ञानार्थ इति । सोऽयं तर्कः प्रमाणानि प्रतिसन्दधानः प्रमाणाभ्यनुज्ञानात् प्रमाणसहितो वादेऽपदिष्ट२ इति अविज्ञाततत्त्वमनुजानाति–यथा सोऽर्थो भवति तस्य ३तथा- भावस्तत्त्वमविपर्ययो याथातथ्यम् ॥ ४० ॥ निर्णयलक्षणम् एतस्मिंश्च तर्कविषये— विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः ॥ ४१ ॥ स्थापना = साधनम्, प्रतिषेधः = उपालम्भः । तौ साधनोपालम्भौ पक्षप्रति- उक्त जिज्ञासु का वह तर्क 'तत्त्वज्ञान के लिये' क्यों कहा जाये, उसे तत्त्वज्ञान' ही क्यों न मान लिया जाये ? अवधारण ( निश्चय ) न होने से उसे तत्त्वज्ञान नहीं कहा जा सकता । वह कारणोपपत्ति से किसी एक धर्म को लेकर समझने से अनुमान ही कर पाता है, उनमें भेद नहीं कर पाता, न उनके भेद का प्रयास करता है । न 'यह ऐसा ही है'—यों निश्चयकर पाता है ! यह 'तत्त्वज्ञान के लिये' कैसे है ? तत्त्वज्ञानविषय अभ्यनुज्ञायुक्त जिज्ञासा से भली भांति भावित होने के बाद प्रमाण का समर्थन पाकर तत्त्वज्ञान होता है—इसलिये 'तत्त्व- ज्ञान के लिये' कहा । ऐसा यह तर्क प्रमाणों का समर्थन करता हुआ प्रमाणस्वीकृति से प्रमाणों के साथ हुआ वाद में व्यवहृत होता है । यों वह जिज्ञासु अविज्ञात तत्त्व का अनुज्ञान करता है—'जो अर्थ जैसा है उसका वैसा ही होना तत्त्व है' । इसे ही 'अविपर्यय' या 'याथा- तथ्य' कहते हैं ॥ ४० ॥ इस तर्क के विषय में— विचारकर पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का निश्चय करना 'निर्णय' कहलाता है ॥ ४१ ॥ वाद में स्वपक्षस्थापन साधन है, परपक्षप्रतिषेध उपालम्भ है, ये साधन-उपालम्भ क्रमशः पक्षप्रतिपक्षाश्रित हैं, एक दूसरे के विरुद्ध हैं, परन्तु साथ (एक वाद में) ही रहते हैं, इन्हें ही पक्ष-प्रतिपक्ष कह देते हैं । ( वाद में ) इन दोनों में से किसी एक की निवृत्ति १. '०णानूहाद्भा०' इति पाठ० । २. 'उपदिष्टः', कुत्रचिच्च 'प्रदिष्टः' इति पाठ० । ३. 'यथाभावः' इति पाठ० ।

सूत्र में ‘विमृश्य’ का अर्थ है विमर्श करके। यह विमर्श पक्ष-प्रतिपक्ष को नियम से

४१. सू०] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५७ पक्षाश्रयौ व्यतिषक्तावनुबन्धेन प्रवर्त्तमानो पक्षप्रतिपक्षावित्युच्येते। तयोरन्यतरस्य निवृत्तिः, एकतरस्यावस्थानमवश्यम्भावि। यस्यावस्थानं तस्यावधारणं निर्णयः। नेदं पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं सम्भवतीति, एको हि प्रतिज्ञातमर्थं हेतुतः स्थापयति, प्रतिषिद्धं१ चोद्धरति द्वितीयस्य। द्वितीयेन स्थापनाहेतुः प्रतिषिद्ध्यते, तस्यैव प्रतिषेधहेतुश्चोद्ध्रियते स निवर्त्तते, तस्य निवृत्तौ योऽवतिष्ठते तेनार्थाव- धारणं निर्णय इति ? उभाभ्यामेवार्थविधारणमित्याह। कया युक्त्या? एकस्य सम्भवो द्वितीय- स्यासम्भवः, तावेतौ सम्भवासम्भवौ विमर्शं सह निवर्त्तयत उभयसम्भवे। उभयासम्भवे त्वनिवृत्तो विमर्श इति। विमृश्येति विमर्शं कृत्वा। सोऽयं विमर्शः पक्षप्रतिपक्षाववद्योत्य२ न्यायं प्रवर्त्तयतीत्युपादीय्त इति। एतच्च विरुद्धयोरेकधर्मिस्थयोर्बोद्धव्यम्। यत्र तु धर्मिसामान्यगतौ विरुद्धौ धर्मौ हेतुतः सम्भवतः तत्र समुच्चयः; हेतुतोऽर्थस्य तथाभावोपपत्तेः। यथा तथा एक की स्थापना अवश्यम्भावी है। जिसकी स्थापना हो उसका निश्चय करना ही ‘निर्णय’ कहलाता है। शङ्का—यह पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थावधारण नहीं बन पायेगा; क्योंकि इसमें वादी पक्ष प्रतिज्ञात अर्थ की स्थापना हेतु से उपस्थित करता है, तब प्रतिवादी = प्रतिपक्ष उस स्थापनाहेतु का खण्डन करता है। पुनः वादी प्रतिवादी के मत का निराकरण कर स्वस्थापनाहेतु का मण्डन करता है। यों अन्त में एक के ही विजयी होने पर दूसरे के हट जाने से पक्ष या प्रतिपक्ष में से किसी एक के ही निर्णय की स्थिति बनेगी, अतः सूत्र में ‘पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा’—यह पद निरर्थक है ? दोनों से अर्थावधारण होता है—ऐसा ही मानते हैं। किस युक्ति से ? एक (वादी) का स्थापनापक्ष ‘संभव’ तथा दूसरे (प्रतिवादी) का खण्डनपक्ष ‘असम्भव’ कहलाता है, ये दोनों (सम्भव और असम्भव) मिलकर ही विमर्श (संशय) की निवृत्ति करते हैं। दोनों (वादी-प्रतिवादी) के होने पर तो वह (वाद) निवृत्त नहीं होगा, अतः विमर्श ही कहलायेगा, ‘निर्णय’, नहीं। सूत्र में ‘विमृश्य’ का अर्थ है विमर्श करके। यह विमर्श पक्ष-प्रतिपक्ष को नियम से स्वविषय बनाकर न्याय को प्रवृत्त करता है, अतः वाद में इसका ग्रहण करना आव- श्यक है। तथा विरुद्ध होते हुए एकधर्म में रहने वाले सम्भव असम्भव का ही यह विमर्श समझना चाहिये। यह विरोध व्यक्तिभेद और कालभेद से द्विविध है। जहाँ दोनों विरुद्ध १. प्रतिषेधमित्यर्थः। वाद्युक्तहेतोर्दूषणमिति भावः। २. नियमेन विषयीकृत्य।

५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० ‘क्रियावद् द्रव्यम्’ इति लक्षणवचने यस्य द्रव्यस्य क्रियायोगो हेतुतः सम्भवति तत् क्रियावत्, यस्य न सम्भवति तदक्रियमिति । एकधर्मिस्थयोश्च विरुद्धयोर्धर्म- योरयुगपद्भाविनोः कालविकल्पः, यथा—तदेव द्रव्यं क्रियायुक्तं क्रियावत्, अनु- त्पन्नोपरतक्रियं पुनरक्रियमिति । न चायं निर्णये नियमः—विमृश्यैव पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णय इति; किन्त्विन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नप्रत्यक्षेऽर्थावधारणं निर्णय इति । परीक्षा- विषये तु विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः, शास्त्रे वादे च विमर्शवर्जम् ॥ ४१ ॥ इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथममाह्निकम् । धर्म धर्मसामान्य में ही युक्ति द्वारा व्यवस्थित हैं, वह 'समुच्चय' (सामान्य मेलन) कहलाता है; क्योंकि हेतु से विरुद्ध-धर्मद्वयोपपत्ति होती है, जैसे—'द्रव्य क्रियावान् है' इस लक्षणवाक्य में जिस द्रव्य का क्रियायोग हेतु से संभव है वह 'क्रियावान्' है, जिसका क्रियायोग संभव नहीं है, वह 'अक्रिय' है । तथा ऐसे धर्म जो विरुद्ध हों, तथा एकधर्मी में रहते हों, परन्तु एक कालावच्छिन्न न (अयुगपद्भावी) हों, वह 'कालविकल्प' कहलाता है । जैसे—वही द्रव्य जब क्रियायुक्त रहता है तब 'क्रियावान्' कहलाता है, जब वह अनुत्पन्नोपरतक्रिय (उसमें क्रिया न रहे) हो तो 'अक्रिय' कहलाता है । निर्णय में यह नियम नहीं है कि वह सन्देह करके पक्ष-प्रतिपक्ष से अर्थावधारण करे तभी निर्णय कहलाये; अपितु इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष से उत्पन्न प्रत्यक्षविषयक अर्थ का अव- धारण भी निर्णय कहलाता है । परीक्षास्थलों में ही विमर्श करके पक्षप्रतिपक्ष से अर्था- वधारण निर्णय कहलाता है, शास्त्र और वाद के स्थलों में इस निर्णय-लक्षण में 'विमृश्य' पद की आवश्यकता नहीं है ॥ ४१ ॥ वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य (सहित न्यायदर्शन) में प्रथमाध्याय के प्रथमाह्निक का व्याख्यान समाप्त ॥

कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ]

[ अथ द्वितीयमाह्निकम् ] कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ] वादलक्षणम् तिस्रः कथा' भवन्ति—वादः, जल्पः, वितण्डा चेति । तासाम्— प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्न पक्षप्रतिपक्ष- परिग्रहो वादः ॥ १ ॥ एकाधिकरणस्थौ विरुद्धौ धर्मो पक्षप्रतिपक्षौ, प्रत्यनीकभावाद्-अस्त्यात्मा, नास्त्यात्मेति । नानाधिकरणस्थौ विरुद्धौ न पक्षप्रतिपक्षौ, यथा—नित्य आत्मा, अनित्या बुद्धिरिति । परिग्रहः = अभ्युपगमव्यवस्था । सोऽयं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । तस्य विशेषणं प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः—प्रमाणतर्कसाधनः, प्रमाण- तर्कोपालम्भः । प्रमाणैस्तर्केण च साधनमुपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति। साधनम् = स्थापना । उपालम्भः = प्रतिषेधः । तौ साधनोपालम्भौ उभयोरपि पक्षयोर्व्य- तिषक्तावनुबद्धौ च यावदेको निवृत्त एकतरो व्यवस्थित इति निवृत्तस्योपालम्भः, व्यवस्थितस्य साधनमिति । वाद, जल्प, वितण्डा भेद से कथा तीन प्रकार की होती हैं, उनमें— प्रमाण तथा तर्क द्वारा स्वपक्षस्थापन-परपक्षनिषेध से युक्त, सिद्धान्त के अनुकूल, प्रतिज्ञादि पञ्चावयव सम्पन्न, पक्ष-प्रतिपक्षसहित वाक्यसमूह को 'वाद' कहते हैं ॥ १ ॥ एक अधिकरण में रहनेवाले, परस्पर विरोधी होने से विरोधी धर्म एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष कहलाते हैं। जैसे—'आत्मा हैं' और 'आत्मा नहीं हैं', ये दोनों वाक्य एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष हैं, क्योंकि एक ही अधिकरण की सत्ता का स्थापन या निषेध किया जा रहा है । अनेक अधिकरणवाले विरोधी धर्म आपस में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन पाते । जैसे 'आत्मा नित्य हैं' और 'बुद्धि अनित्य हैं', ये दोनों वाक्य परस्पर में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन सकते; क्योंकि यहाँ नित्यता-अनित्यता की स्थापना या निषेध पृथक् अधिकरण में किया जा रहा है। परिग्रह = स्वीकृति की व्यवस्था । ऐसा यह पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह 'वाद' कहलाता है । 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ' वाद का विशेषण है । अर्थात् इस वाद में प्रमाण तर्क ( स्वपक्ष में ) उपस्थित किये जाते हैं तथा ( परपक्ष के ) प्रमाण तर्क का खण्डन होता है । 'साधन' का अर्थ है 'स्थापना', उपालम्भ का अर्थ है 'प्रतिषेध' । ये साधन और उपालम्भ दोनों ही पक्षों में लगे हुए हैं, उनमें अनुबद्ध है । जहाँ एक निवृत्त हुआ दूसरा स्थित हो ही जायगा । संक्षेप में निवृत्त का निषेध तथा व्यवस्थित की स्थापना ही वाद का लक्ष्य है। १. नानाप्रवक्तृकविचारविषया वाक्यसन्दृब्धिः कथा'—इति तात्पर्यटीकासम्मतं कथालक्षणम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० जल्पे निग्रहस्थानविनियोगाद् वादे तत्प्रतिषेधः । प्रतिषेधे कस्यचिदभ्यनुज्ञा- नार्थम् ‘सिद्धान्ताविरुद्धः’ इति वचनम् । ‘सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः’ ( १. २. ६ ) इति हेत्वाभासस्य निग्रहस्थानस्याभ्यनुज्ञा वादे । ‘पञ्चावयवोपपन्नः’ इति—‘हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्’ (५. २. १२), ‘हेतूदाहरणाधिकमधिकम्’ (५. २. १३) इति च—एतयोरभ्यनुज्ञानार्थामिति । अवयवेषु प्रमाणतर्कान्तर्भावे, पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणं साधनोपालम्भव्यति- षङ्गज्ञापनार्थम् । अन्यथोभावपि पक्षौ स्थापनाहेतुना प्रवृत्तौ वाद इति स्यात् । अन्तरेणापि चावयवसम्बन्धं प्रमाणान्यर्थं साधयन्तीति दृष्टम्, तेनापि कल्पेन ‘साधनोपालम्भौ वादे भवतः’ इति ज्ञापयति । ‘छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपा- लम्भो जल्पः’ इति वचनाद् विनिग्रहो जल्प इति मा विज्ञायि, छलजातिनिग्रह- स्थानसाधनोपालम्भ एव जल्पः, प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भो वाद एव—इति मा क्योंकि निग्रहस्थान को जल्प में स्वीकार किया गया है, अतः उसका वाद में प्रयोग नहीं होता । निग्रहस्थान के निषिद्ध होने पर भी किसी एक की अभ्यनुज्ञा ( स्वीकृति ) के लिये लक्षण में सिद्धान्ताविरुद्ध पद दिया गया है । ‘अभ्युपेतसिद्धान्त के विरोध में जो अर्थ है वह विरुद्ध होता हैं’ ( १. २. ६ )—इस ‘विरुद्ध’ हेत्वाभासरूप निग्रहस्थान की वाद में स्वीकृति है । पञ्चावयवोपपन्न पद ‘“पञ्चावयवों में किसी एक अवयव से हीन वाक्य का प्रयोग ‘हीन’ निग्रहस्थान होता है” (५. २. १. १२) तथा “एक से कार्य सिद्ध होनेपर भी वाक्य में अधिक हेतु या उदाहरणों का प्रयोग ‘अधिक’ निग्रहस्थान कहलाता है” (५. २. १३) इन दोनों निग्रहस्थानों की स्वीकृति के लिये है । अवयवों में प्रमाण तथा तर्क का अन्तर्भाव हो सकने पर भी उनका लक्षण में पृथक् ग्रहण स्थापना तथा निषेध का व्यतिषङ्ग ( अनुबन्ध ) बतलाने के लिये किया है । अन्यथा वाद में प्रवृत्त दोनों ही पक्ष अपने-अपने अर्थ की स्थापनामात्र करेंगे, तब पक्ष- स्थापनामात्र ‘वाद’ कहलाने लगेगा । तथा अवयव-सम्बन्ध के विना भी प्रमाण अर्थ की साधना कर देते हैं—ऐसा लोक में देखा जाता है । इस कल्प में प्रमाण से ‘स्थापना’ और ‘प्रतिषेध’ वाद में हो सकते हैं—यह ज्ञापित करते हैं । उक्त दोनों पदों के ग्रहण का यह भी प्रयोजन है कि अनुपद वक्ष्यमाण ‘छल जाति-निग्र- हस्थान-साधनोपालम्भयुक्त पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह जल्प कहलाता है’ ( १. २. २ )—इस वचन से ‘जल्प वादगत निग्रहरहित होता है’—ऐसा न समझ ले । अथ च, यह भी न समझ बैठे कि ‘छल-जाति-निग्रहस्थान साधनोपालम्भ ही जल्प है’ या ‘प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ ही वाद CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२. सू० ] कथालक्षणप्रकरणम् ६१

२. सू० ] कथालक्षणप्रकरणम् ६१ विज्ञायि-इत्येवमर्थं पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणमिति ॥ १ ॥ जल्पलक्षणम् यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः ॥ २ ॥ यथोक्तोपपन्न इति—प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चाव- यवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः१। छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भ इति— छलजातिनिग्रहस्थानैः साधनम्, उपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति एवंविशेषणो जल्पः। न खलु वै छलजातिनिग्रहस्थानैः साधनं कस्यचिदर्थस्य सम्भवति, प्रतिषे- धार्थतैवँषां सामान्यलक्षणे विशेषलक्षणे च श्रूयते—'वचनविघातोऽर्थविकल्पो- पपत्त्या छलम्' (१. २. १०) इति, 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः' ( १. २. १८), 'विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्' ( १. २. १९ ) इति । विशेषलक्षणेष्वपि यथास्वमिति । न चैतद्विजानीयात्-प्रतिषेधार्थतयैवार्थं साध- होता है। इस सब को हृदय में रखकर सूत्रकार ने 'वाद' के लक्षण में प्रमाण तथा तर्क का ग्रहण किया है ।। १ ।। उक्त वाद के लक्षणों से युक्त तथा छल, जाति, निग्रहस्थानों से स्थापना और प्रतिषेध वाले पक्ष-प्रतिपक्षों का परिग्रहक वाक्यसमूह 'जल्प' कहलाता है ॥ २ ॥ यथोक्तोपपन्न पद से वादलक्षणोक्त प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ सिद्धान्ताविरुद्ध पञ्चावयवोपपन्न पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह समझना चाहिये। छलजाति-निग्रहस्थानसाधनोपालम्भ पद से सूत्रकार कहना चाहते हैं कि छल, जाति, निग्रहस्थानों से जिस कथा में स्थापना तथा प्रतिषेध किया जाये वह 'जल्प' है। शङ्का—छल, जाति, निग्रहस्थानों से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती, उलटे इनके सामान्य लक्षणों या विशेष लक्षणों में प्रतिषेधार्थता ही सुनने में आती है। जैसे—'अर्थ- विकल्पोपपादन द्वारा वचनविघात 'छल' कहलाता हैं' (१. २. १०.), 'साधर्म्य-वैधर्म्य द्वारा अर्थ का प्रतिषेध करना 'जाति' कहलाती हैं' (१. २. १८), 'अर्थ की विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति 'निग्रहस्थान' कहलाता हैं' (१. २. १९)—ये इनके सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षणों में भी इसी तरह समझें। यदि यह कहें कि प्रयोक्ता को यह ज्ञात कराने के लिये कि 'प्रतिषेधार्थता से ही ये तीनों अर्थ की सिद्धि करते हैं' ये लक्षण किये हैं तो १. एतस्मिन्नर्थे वार्त्तिककारस्यारुचिः । स तु 'सिद्धान्ताविरुद्धः', 'पञ्चावयवोपपन्नः' इति वादलक्षणस्थे पदे नियमार्थे एवेत्याह ।

६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० यन्तीति, छलजातिनिग्रहस्थानोपालम्भो जल्प इत्येवमप्युच्यमाने विज्ञायत एतदिति ? प्रमाणैः साधनोपालम्भयोश्छलजातिनिग्रहस्थानानामङ्गभावः, स्वपक्ष- रक्षणार्थत्वात्, न स्वतन्त्राणां साधनभावः। यत्तत्प्रमाणैरर्थस्य साधनं तत्र छलजातिनिग्रहस्थानानामङ्गभावः, स्वपक्षरक्षणार्थत्वात् । तानि हि प्रयुज्य- मानानि परपक्षविघातेन स्वपक्षं रक्षन्ति । तथा चोक्तम्—'तत्त्वाध्यवसायसंरक्ष- णार्थं जल्पवितण्डे, बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत्' (४. २. ५० ) इति । यश्चासौ प्रमाणैः प्रतिपक्षस्योपालम्भस्तस्य चैतानि प्रयुज्यमानानि प्रति- षेधविघातात् सहकारिणि भवन्ति । तदेवमङ्गीभूतानां छलादीनामुपादानं जल्पे, न स्वतन्त्राणां साधनभावः । उपालम्भे तु स्वातन्त्र्यमप्यस्तीति ॥ २ ॥ वितण्डलक्षणम् स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा ॥ ३ ॥ स जल्पो वितण्डा भवति । किंविशेषणः ? प्रतिपक्षस्थापनाया हीनः । यौ तौ समानाधिकरणौ विरुद्धौ धर्मौ पक्षप्रतिपक्षावित्युक्तम्, तयोरेकतरं वैतण्डिको न स्थापयतीति, परपक्षप्रतिषेधेनैव प्रवर्त्तत इति । 'छलजातिनिग्रहस्थानोपालम्भ ही जल्प होता है' इतना लक्षण करने से भी यह बात ज्ञात हो जाती ? उ० प्रमाणों द्वारा स्वपक्षस्थापन तथा परपक्षप्रतिषेध में ये तीनों सहायक हैं; क्योंकि ये तीनों ही स्वपक्षरक्षण करते हैं। हाँ, ये स्वातन्त्र्येण कोई अर्थसिद्धि नहीं करते, अपितु प्रमाणों द्वारा की जा रही अर्थसिद्धि में स्वपक्षरक्षण-कार्य द्वारा सहायक होते हैं । इनका प्रयोग किया जाये तो परपक्ष-खण्डन द्वारा भी स्वपक्षरक्षण करते हैं। इसीलिये आगे कहा है—'जल्प, वितण्डा का प्रयोग तत्त्वाध्यवसाय-संरक्षण के लिये होता है, जैसे छोटे- छोटे पौधों की रक्षा के लिये उनके चारों ओर कांटेदार झाड़ी लगा दी जाती है' (४. २. ५०)। प्रमाणों द्वारा प्रतिपक्ष के निषेध में वादी द्वारा प्रयुक्त हुए ये तीनों अपने प्रतिषेधविघातक कार्य द्वारा सहायक होते हैं । अतः निष्कर्ष यह निकला कि जल्प में स्वपक्षस्थापना के लिये छलादि का ग्रहण 'अर्थसाधन के सहायक' रूप में होता है, न कि स्वतन्त्रतया । हाँ, परपक्षप्रतिषेध में ये स्वतन्त्र रूप से भी प्रयुक्त हो सकते हैं ॥ २ ॥ उपर्युक्त जल्प जब प्रतिपक्षस्थापनाहीन होता है तो 'वितण्डा' कहलाता है ॥ ३ ॥ वह जल्प 'वितण्डा' भी हो सकता है। कब ? जब वह प्रतिपक्ष-स्थापना से रहित हो । हम अनुपद में ही एकाधिकरणक दो विरुद्ध धर्मों को 'पक्ष-प्रतिपक्ष' कह आये हैं (१. २. १), यह वितण्डावादी उनमें से एक की भी स्थापना करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता, केवल परपक्षखण्डन में ही लगा रहता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ]

५. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६३ अस्तु तर्हि स प्रतिपक्षहीनो वितण्डा ? यद्वै खलु तत्परप्रतिषेधलक्षणं वाक्यं स वैतण्डिकस्य पक्षः, न त्वसौ साध्यं कञ्चिदर्थं प्रतिज्ञाय स्थापयतीति । तस्माद्यथान्यासमेवास्त्विति ॥ ३ ॥ हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ] हेतुलक्षणाभावादहेतवो हेतुसामान्याद्धेतुवदाभासमानाः । त इमे— सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः ॥ ४ ॥ (क) सव्यभिचारलक्षणम् तेषाम्— अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ॥ ५ ॥ व्यभिचारः = एकत्राव्यवस्थितिः¹ । सह व्यभिचारेण वर्त्तते इति सव्य- भिचारः । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दोऽस्पर्शत्वात्, स्पर्शवान् कुम्भोऽनित्यो दृष्टः, न च तथा स्पर्शवान् शब्दः, तस्मादस्पर्शत्वान्नित्यः शब्दः' इति । दृष्टान्ते—स्पर्शवत्त्वमनित्यत्वं च धर्मौ न साध्यसाधनभूतौ दृश्येते, स्पर्शवाँ- क्यों न तब 'प्रतिपक्षहीन जल्प वितण्डा है'—इतना ही लक्षणसूत्र रखा जाये ? वितण्डावादी के परपक्षखण्डनपरक वाक्य ही औपचारिक रूप से उसका 'पक्ष' है ! हाँ, यद्यपि वह स्पष्टरूप से किसी साध्य अर्थ की प्रतिज्ञा करके अपना कोई पक्ष नहीं रखता; फिर भी किसी न किसी रूप में उसका भी प्रतिपक्ष बन ही सकता है, अतः सूत्रकारोक्त लक्षण ही उचित है ॥ ३ ॥ हेतुलक्षण न घटने से वस्तुतः जो अहेतु हों, परन्तु हेतु-सादृश्य से जिनका हेतु की तरह आभास (प्रतीति) होता हो, वे 'हेत्वाभास' कहलाते हैं। वे ये हैं— १. सव्यभिचार, २. विरुद्ध, ३. प्रकरणसम, ४. साध्यसम तथा ५. कालातीत— ये पांच 'हेत्वाभास' कहलाते हैं ॥ ४ ॥ उनमें— जो ( हेतु ) एक ही (साध्य तथा साध्याभाव) के अन्त (अधिकरण) में न रहे उसे 'सव्यभिचार' हेत्वाभास कहते हैं ॥ ५ ॥ 'व्यभिचार' से तात्पर्य है—एक जगह न रहना। व्यभिचार के साथ जो प्रवृत्त हो वह 'सव्यभिचार' कहलाता है। इसका उदाहरण—'शब्द नित्य है, अस्पर्श होने से; लोक में स्पर्शवान् घट अनित्य देखा गया है, शब्द स्पर्शवान् नहीं है अतः अस्पर्शत्वहेतु से वह नित्य है'। यहाँ दृष्टान्तस्थ स्पर्शवत्त्व अनित्यत्व हेतुओं में साध्यसाधनभाव नहीं देखा १. व्यवस्था—इति पाठ० ।

६४ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० २ . आ० श्चाणुर्नित्यश्चेति । आत्मादौ च दृष्टान्ते-'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः' ( १. १. ३४ ) इति अस्पर्शत्वादिति हेतुर्नित्यत्वं व्यभिचरति—'अस्पर्शा बुद्धिर- नित्या च' इति । एवं द्विविधेऽपि दृष्टान्ते व्यभिचारात्साध्यसाधनभावो नास्तीति लक्षणाभावादहेतुरिति । नित्यत्वमप्येकोऽन्तः, अनित्यत्वमप्येकोऽन्तः, एकस्मिन्नन्ते विद्यत इति ऐकान्तिकः, विपर्ययादनैकान्तिकः, १उभयान्तव्यापकत्वादिति ॥ ५ ॥ (ख) विरुद्धलक्षणम् सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः ॥ ६ ॥ तं विरुणद्धीति तद्विरोधी, अभ्युपेतं सिद्धान्तं व्याहन्तीति । यथा—'सोऽयं विकारो व्यक्तेरपैति नित्यत्वप्रतिषेधात्', न नित्यो विकार उपपद्यते । 'अपैतोऽपि विकारोऽस्ति, विनाशप्रतिषेधात्' । सोऽयं नित्यत्वप्रतिषेधादिति हेतुर्व्यक्तेर- पैतोऽपि विकारोऽस्तीत्यनेन स्वसिद्धान्तेन विरुध्यते । कथम् ? व्यक्तिः = आत्म- लाभः, अपायः = प्रच्युतिः; यद्यात्मलाभात् प्रच्युतो विकारोऽस्ति ? नित्यत्वप्रति- षेधो नोपपद्यते । यद्व्यक्तेरपेतस्यापि विकारस्यास्तित्वं तत् खलु नित्यत्वमिति । जाता; क्योंकि स्पर्शवान् भी अणु और नित्य हो सकता है। आत्मा-आदि दृष्टान्तस्थ “उदाहरणसादृश्य से साध्य का साधक 'हेतु' है” ( १ . १ . ३४ )—इस हेतुलक्षण से 'अस्पर्शत्व' हेतु नित्यत्व से व्यभिचरित होगा; क्योंकि बुद्धि अस्पर्शवती होती हुई भी अनित्य है। इस प्रकार दोनों ही तरह के दृष्टान्तों में साध्यसाधनभाव न होने से हेतु- लक्षण नहीं घट पायेगा, अतः वह हेतु नहीं बन सकता । यहाँ नित्यत्व एक अन्त है, अनित्यत्व भी एक अन्त है। एक अन्त (अधिकरण) में साध्यसाधनभाव रहे अतः 'ऐकान्तिक' हेतु कहते हैं। इसके विपरीत 'अनैकान्तिक' कह- लाता है; क्योंकि वह दोनों अन्तों में व्याप्त रहता है ॥ ५ ॥ जो हेतु अभ्युपगतार्थ का विरोधी हो वह 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहलाता है ॥ ६ ॥ उसका जो विरोध करे वह हुआ 'तद्विरोधी' अर्थात् जो प्रतिज्ञा तथा हेतु से प्रकाशित सिद्धान्त का विरोध करे। जैसे साङ्ख्यकार का मत है—'परिणामाख्य कार्य अभिव्यक्त स्वरूप से विश्लिष्ट हो जाता है, अनित्य होने से', 'अभिव्यक्तिरहित वह परिणामाख्य कार्य रहता भी है, स्वरूपहानि न होने से'; यहाँ 'विकार नित्य उपपन्न नहीं होता' यह हेतु 'व्यक्ति से असंश्लिष्ट होकर भी विकार रहता है, स्वरूप-हानि न हो ने से' इस स्वसिद्धान्त से विरुद्ध पड़ता है। कैसे? 'व्यक्ति' कहते हैं आत्मलाभ को, 'प्रच्युति' कहते हैं असंश्लेष को। उसमें नित्यत्वप्रतिषेध उपपन्न नहीं है, क्योंकि आत्मसत्ता से अलग होकर भी विकार १. 'उभयत्र'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

७. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६५

७. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६५ नित्यत्वप्रतिषेधो नाम विकारस्यात्मलाभात्प्रच्युतेरुपपत्तिः । यदात्मलाभात्प्रच्यवते तदनित्यं दृष्टम्, यदस्ति न तदात्मलाभात् प्रच्यवते । अस्तित्वं चात्म- लाभात् प्रच्युतिरिति च-विरुद्धावेतौ धर्मौ न सह सम्भवत इति । सोऽयं हेतुर्यं सिद्धान्तमाश्रित्य प्रवर्त्तते तमेव व्याहन्तीति । (ग) प्रकरणसमलक्षणम् यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः ॥ ७ ॥ विमर्शाधिष्ठानौ पक्षप्रतिपक्षावुभावनवसितौ प्रकरणम् । तस्य चिन्ता = विमर्शात्प्रभृति प्राङ्निर्णयाद्यत्समीक्षणम् । सा जिज्ञासा यत्कृता स निर्णयार्थं प्रयुक्त उभयपक्षसाम्यात् प्रकरणमनतिवर्तमानः प्रकरणसमो निर्णयाय न प्रकल्पते । प्रज्ञापनं तु—‘अनित्यः शब्दो नित्यधर्मानुपलब्धेः’ इति । अनुपलभ्यमान- नित्यधर्मकमनित्यं दृष्टं स्थाल्यादि । ‘नित्यः१ शब्दोऽनित्यधर्मानुपलब्धेः’ अनुपलभ्यमानानित्यधर्मकं नित्यं दृष्टमाकाशादि१ । रहे—यही उसका नित्यत्व हैं; क्योंकि नित्यत्वप्रतिषेध का मतलब है—विकार का आत्मसत्ता से प्रच्युति का उपपादन अर्थात् जो आत्मलाभ से प्रच्युत नहीं होता । अस्तित्व तथा आत्मलाभ से प्रच्युति—ये दोनों विरुद्ध धर्म एकत्र नहीं रह सकते । इस प्रकार यह नित्यत्वप्रतिषेध हेतु जिस सिद्धान्त को लेकर प्रवृत्त हुआ था, उसी का व्याघात कर रहा है ॥ ६ ॥ जिसको लेकर प्रकरण पर विचार किया जा रहा हो और वही निर्णय के लिये प्रयुक्त हो वह हेतु ‘प्रकरणसम’ हेत्वाभास कहलाता है ॥ ७ ॥ संशयाधिष्ठान अनिर्णीत पक्ष-प्रतिपक्ष ही ‘प्रकरण’ कहलाते हैं । प्रकरण की चिन्ता अर्थात् विमर्श से लेकर निर्णय तक का समीक्षण । वह जिज्ञासा जिसकी वजह से हो वही निर्णय के लिये प्रयुक्त कर दिया जाए—ऐसा हेतु प्रकरण की परिधि में रहता हुआ ‘प्रकरणसम’ कहलाता है । ऐसा हेतु साधक या बाधक न रहने से निर्णय करने में असमर्थ है । उदाहरण—‘शब्द अनित्य है, नित्यधर्म की उपलब्धि न होने से’ यह अनुमान । यहाँ अनुपलब्ध्यमान नित्यधर्मक अनित्य भी देखा गया है, जैसे—स्थाल्यादि । ‘शब्द नित्य है, अनित्यधर्म की उपलब्धि न होने से’—यहाँ भी अनुपलब्ध्यमान अनित्यधर्मक नित्य देखा गया है, जैसे—आकाशादि । १-१. अयं पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके । न्या० द० : ५

६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० यत्र समानो धर्मः संशयकारणं हेतुत्वेनोपादीयते स संशयसमः सव्यभिचार एव। या तु विमर्शस्य विशेषापेक्षिता उभयपक्षविशेषानुपलब्धिश्च सा प्रकरणं प्रवर्तयति। यथा-- शब्दे नित्यधर्मो नोपलभ्यते, एवमनित्यधर्मोऽपि; सेयमुभय- पक्षविशेषानुपलब्धिः प्रकरणचिन्तां प्रवर्तयति। कथम् ? विपर्यये हि प्रकरण- निवृत्तेः। यदि नित्यधर्मः शब्दे गृह्येत, न स्यात्प्रकरणम् । यदि वा अनित्य- धर्मो गृह्येत, एवमपि निवर्तेत प्रकरणम् । सोऽयं हेतुरुभौ पक्षौ प्रवर्तयन्नन्य- तरस्य निर्णयाय न प्रकल्पते ॥ ७ ॥ (घ) साध्यसमलक्षणम् साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ॥ ८ ॥ द्रव्यं छायेति साध्यम्, गतिमत्त्वादिति हेतुः साध्येनाविशिष्टः साधनीयत्वात् साध्यसमः । अयमप्यसिद्धत्वात्साध्यवत्प्रज्ञापयितव्यः । साध्यं तावदेतत्—किं पुरुषवच्छायापि गच्छति, आहोस्विदावरकद्रव्ये संसर्पति, आवरणसन्ताना- दसन्निधिसन्तानोऽयं तेजसो गृह्यत इति ? सर्पता खलु द्रव्येण यो यस्तेजो- जहां संशयकारण समानधर्म हेतुरूप से दिया गया हो वह 'संशयसम' हेत्वाभास कहलाता है, जो कि सव्यभिचार हेत्वाभास में अन्तर्भूत है । विमर्श की विशेषापेक्षित उभयपक्ष-चिन्ताओं में विशेषानुपलब्धि है वही प्रकरण को प्रवृत्त करती है । जैसे शब्द में नित्यधर्म नहीं मिलता; वैसे ही अनित्यधर्म भी नहीं मिलता—यह उभयपक्ष की विशेषा- नुपलब्धि ही प्रकरण पर समीक्षण का प्रारम्भ करती है; क्योंकि विपरीत स्थिति होने पर प्रकरण की निवृत्ति ही हो जाती है। यदि शब्द में नित्य धर्म मानोगे तो प्रकरण उठेगा नहीं, यदि केवल अनित्य धर्म मानोगे तो भी प्रकरण की निवृत्ति ही होगी। इस प्रकार, ऐसा हेतु जो दोनों पक्षों में प्रवृत्त हो सकता हो वह किसी एक तरफ का निर्णय करने में समर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥ साध्य से अविशिष्ट ( साधनीय ) हेतु स्वयं साध्य होने से 'साध्यसम' हेत्वाभास होता है ॥ ८ ॥ 'छाया द्रव्य है, गतिमान् होने से'–इस अनुमान में 'द्रव्य छाया' साध्य है, 'गतिमत्त्व' यह हेतु साध्य से अविशिष्ट ही है; क्योंकि इसकी भी साध्य की तरह सिद्धि करनी पड़ेगी, इसलिए यह 'साध्यसम' है। अर्थात् यह हेतु भी असिद्ध है, अतः साध्य की तरह इसे भी सिद्ध करना पड़ेगा ! इस अनुमान में साध्य है—क्या पुरुष की छाया वस्तुतः चलती है, या आवश्यक द्रव्य में छिपजाती है, या यह आवरणसन्तान से तेज की असन्निधिसन्तान रूप ही तो नहीं CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

९. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६७

९. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६७ भाग आवृयते तस्य तस्यासन्निधिरेवाविच्छिन्नो गृह्यत इति । आवरणं तु प्राप्तिप्रतिषेधः ॥ ८ ॥ (ङ) कालातीतलक्षणम् कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ॥ ९ ॥ कालात्ययेन युक्तो यस्यार्थैकदेशोऽपदिश्यमानस्य स कालात्ययापदिष्टः 'कालातीतः' इत्युच्यते । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दः संयोगव्यंग्यत्वाद् रूपवत्' । प्रागूर्ध्वं च व्यक्तेरवस्थितं रूपं प्रदीपघटसंयोगेन व्यज्यते । तथा च शब्दोऽप्यव- स्थितो भेरीदण्डसंयोगेन व्यज्यते, दारुपरशुसंयोगेन वा । तस्मात्संयोगव्यंग्यत्वात् 'नित्यः शब्दः' इत्ययमहेतुः, कालात्ययापदेशात् । व्यञ्जकस्य संयोगस्य कालं न व्यङ्ग्यस्य रूपस्य व्यक्तिरत्येति । सति प्रदीपघटसंयोगे रूपस्य ग्रहणं भवति, न निवृत्ते संयोगे रूपं गृह्यते । निवृत्ते दारुपरशुसंयोगे दूरस्थेन शब्दः श्रूयते विभागकाले, सेयं शब्दस्य व्यक्तिः संयोगकालमत्येतीति न संयोगनिमित्ता भवति । कस्मात् ? कारणाभावाद्धि कार्याभाव इति । एवमुदाहरणसाधर्म्य- स्याभावादसाधनमयं हेतुर्हेत्वाभास इति । है ! चलते हुए द्रव्य से तेज का जो जो भाग ढक जाता है उससे उस तेज की अविच्छिन्न असन्निधि ही तो 'छाया' कहलाती है । आवरण से तात्पर्य है प्राप्ति-प्रतिषेध ॥ ८ ॥ जिस प्रयुज्यमान हेतु का एकदेश कालात्यय से युक्त हो वह 'कालातीत' हेत्वा- भास कहलाता है ॥ ९ ॥ जिस अर्थानुमान में प्रयुज्यमान हेतु का एकदेश कालात्यय से युक्त हो वह काला- त्ययापदिष्ट 'कालातीत' कहलाता है । उदाहरण—'शब्द नित्य है, संयोगव्यङ्ग्य होने से, रूप की तरह' । जैसे पहले या पीछे घट व्यक्ति में रहा हुआ रूप प्रदीपघट-संयोग से व्यक्त हो जाता है, इसी तरह निहित (अव्यक्त) शब्द भेरीदण्डसंयोग से या कुठार और काष्ठ के संयोग से व्यक्त हो जाता है; अतः 'संयोगव्यङ्ग्य होने से शब्द नित्य हैं' में 'संयोगव्यङ्ग्य' यह हेतु नहीं बनेगा; क्योंकि यहाँ कालात्ययापदेश है । व्यङ्ग्य रूप की अभिव्यक्ति व्यञ्जक संयोग के काल को अतिक्रान्त नहीं करती । घटप्रदीपसंयोग होने पर ही रूप की अभिव्यक्ति होती है, संयोग के निवृत्त होने पर नहीं हो पाती; परन्तु (हेतुवाक्यावयव में) भेरीदण्ड-संयोग के निवृत्त होने पर दूरस्थ शब्द संयोगाभाव काल में सुनायी देता है, यों यह शब्द की अभिव्यक्ति संयोगकाल को अतिक्रान्त कर जाती है । अतः यह संयोगोत्पन्न नहीं कही जा सकती; सिद्धान्त यह है—कारणाभाव से कार्याभाव होता है । इस नय से यह हेतु उदाहरणसादृश्य न मिलने से साध्य का साधक नही बन सकता, अतः यह हेत्वाभास है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ?

६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ? "यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः। अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम्” ॥ इत्येतद्वचनाद्विपर्यसिनोक्तो हेतुरुदाहरणसाधर्म्यात्तथा वैधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुलक्षणं न जहाति। अजहद्धेतुलक्षणं न हेत्वाभासो भवतीति । 'अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्' ( ५. २. ११) इति निग्रहस्थानमुक्तम्, तदेवेदं पुनरुच्यत इति, अतस्तन्न सूत्रार्थः ॥ ९ ॥ छलप्रकरणम् [ १०-१७ ] छललक्षणम् अथ छलम्। वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम् ॥ १० ॥ न सामान्यलक्षणे छलं शक्यमुदाहर्तुम्, विभागे तूदाहरणानि ॥ १० ॥ [बौद्ध नैयायिक इस सूत्र का अन्यथा व्याख्यान करते हैं-'प्रतिज्ञा' के बाद उदाहर- णादि का पूर्वकाल हेतुवचन के उस काल को अतिक्रान्त कर जाता है, अतः यह हेतुवचन 'कालात्ययापदिष्ट' है। इसका खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं-] प्रतिज्ञादि अवयवों में विपर्यास बताना सूत्र का अर्थ नहीं है; क्योंकि- 'जिसका जिसके साथ अर्थसम्बन्ध होता है, वह अर्थसम्बन्ध उसके दूरस्थ होने पर भी हो ही जाएगा, असमर्थ का अर्थ से आनन्तर्य विरोधी नहीं हुआ करता' । इस वचनप्रमाण द्वारा विपर्यास से कहा हुआ हेतु भी उदाहरण के सादृश्य या वैसादृश्य से अपने हेतुत्व को नहीं छोड़ेगा । यतः उसने अपना हेतुलक्षण नहीं छोड़ा, तब वह हेतु हेत्वाभास क्यों कर हो सकेगा ! दूसरी बात यह भी है-आगे निग्रहस्थानवर्णनप्रसङ्ग (५. २. ११) में भी 'अवयव- विपर्यासबोधक अप्राप्तकाल' नामक निग्रहस्थान बताया जायेगा, इस सूत्र का उपर्युक्त अर्थ करने पर वहाँ पुनरुक्ति दोष होगा, अतः यह सूत्रार्थ नहीं है ॥९ ॥ प्रतिवादी के अभिमत अर्थ से विरुद्ध कल्पनोपपादन वचनविघात 'छल' कहलाता है ॥ १० ॥ [वादी, प्रमादी या प्रतिवादी द्वारा समीचीन उत्तर न देने की हालत में विजय- कामना से तदाभास उत्तर भी दे डालता है, सूत्रकार उसी का अब विवेचन कर रहे हैं। इनमें 'जात्युत्तर' स्वपक्ष में भी हानि पहुँचा डालता है, अतः उससे पहले छल का बोध कराना ही उचित है ।] इस छल के सामान्य लक्षण का उदाहरण मिलना असम्भव हैं । हाँ, इसका विभाग करने पर उन विभागों के उदाहरण दिये जा सकते हैं ॥ १० ॥ १. बौद्धाभिमतसूत्रार्थखण्डने प्रक्रमते भाष्यकारः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९

१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९ विभागश्च— तत्त्रिविधम्—वाक्छलम्, सामान्यच्छलम्, उपचारच्छलं चेति ॥ ११ ॥ वाक्छललक्षणम् तेषाम्— अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ॥ १२ ॥ 'नवकम्बलोऽयं माणवकः' इति प्रयोगः। अत्र 'नवः कम्बलोऽस्य' इति वक्तु- रभिप्रायः। विग्रहे तु विशेषः, न समासे। तत्रायं छलवादी वक्तुरभिप्रायादवि- वक्षितमन्यमर्थम्—'नव कम्बला अस्येति तावदभिहितं भवता' इति कल्पयति, कल्पयित्वा चासम्भवेन प्रतिषेधति—'एकोऽस्य कम्बलः कुतो नव कम्बलाः' इति। तदिदं सामान्यशब्दे वाचि छलं वाक्छलमिति। अस्य प्रत्यवस्थानम्—सामान्यशब्दस्यानेकार्थत्वेऽन्यतराभिधानकल्पनायां विशेषवचनम्। 'नवकम्बलः' इत्यनेकार्थाभिधानम्—'नवः कम्बलोऽस्य' इति, 'नव कम्बला अस्य' इति। एतस्मिन् प्रयुक्ते येयं कल्पना 'नव कम्बला अस्य' इत्येतद्भवताऽभिहितं तच्च न सम्भवति' इति, एतस्यामन्यतराभिधानकल्पनायां

अतः अब उसका विभाग किया जा रहा है— १. वाक्छल, २. सामान्यछल, तथा ३. उपचारछल—यों वह तीन प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ उनमें समासादिवृत्तिविषयक वाक्छल का व्याख्यान करते हैं— सामान्येन कथित अर्थ में वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अर्थ की कल्पना 'वाक्छल' कहलाता है ॥ १२ ॥ जैसे 'नवकम्बल वाला यह माणवक है' इस वाक्य में 'नवकम्बल' शब्द से वक्ता का अभिप्राय बहुव्रीहि समास द्वारा 'नवीन कम्बल वाला' में है। इस शब्द के विग्रह में विशेषता है, समास में नहीं। वहाँ यह छलवादी, वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अन्य अर्थ—'नौ हैं कम्बल जिसके' की कल्पना कर असम्भव अर्थ से उसका खण्डन करता है—'अरे इसके पास तो एक ही कम्बल है, नौ कहाँ से आये !' यह सामान्येन कथित अर्थबोधक वाक् (वाणी) में छल 'वाक्छल' कहलाता है। इसका प्रतीकार यों है—सामान्य शब्द के अनेकार्थक होनेपर किसी एक की कल्पना के लिये विशेषतया कथन करना पड़ता है। 'नवकम्बल' यह शब्द अनेकार्थाभिधायी है— 'नया है कम्बल जिसके' या 'नौ हैं कम्बल जिसके'। इस शब्दप्रयोग में आपकी 'नौ हैं कम्बल जिसके' यह कल्पना सम्भव नहीं है; क्योंकि अनेकों में किसी विशिष्ट एक की

७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० विशेषो वक्तव्यः । यस्माद्विशेषोऽर्थविशेषु विज्ञायते—अयमर्थोऽनेनाभिहित इति, स च विशेषो नास्ति । तस्मान्मिथ्याभियोगमात्रमेतदिति । प्रसिद्धश्च लोके शब्दार्थसम्बन्धोऽभिधानाभिधेयनियमनियोगः । 'अस्याभि- धानस्यायमर्थोऽभिधेयः' इति समानः सामान्यशब्दस्य, विशेषो विशिष्टशब्दस्य । प्रयुक्तपूर्वाश्चेमे शब्दा अर्थे प्रयुज्यन्ते, नाप्रयुक्तपूर्वाः । प्रयोगश्चार्थसम्प्रत्ययार्थः, अर्थप्रत्ययाच्च व्यवहार इति । तत्रैवमर्थगत्यर्थे शब्दप्रयोगे सामर्थ्यात् सामान्य- शब्दस्य प्रयोगनियमः । 'अजां ग्रामं नय', 'सर्पिराहर', 'ब्राह्मणं भोजय' इति सामान्यशब्दाः सन्तोऽर्थावयवेषु प्रयुज्यन्ते । सामर्थ्याद्यत्रार्थक्रियादेशना सम्भवति तत्र प्रवर्तन्ते, नार्थसामान्ये; क्रियादेशनाऽसम्भवात् । एवमयं सामान्यशब्दः 'नव- कम्बलः' इति योऽर्थः सम्भवति-'नवः कम्बलोऽस्य' इति, तत्र प्रवर्तते; यस्तु न सम्भवति-'नव कम्बला अस्य' इति, तत्र न प्रवर्तते । सोऽयमनुपपद्यमानार्थ- कल्पनया परवाक्योपालम्भस्ते न कल्पत इति ॥ १२ ॥ सामान्यच्छललक्षणम् सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम् ॥ १३ ॥ कल्पना करने से पूर्व तद्बोधक कोई विशिष्ट वचन करना चाहिए, जिससे वह विशेष अर्थ जाना जा सके कि इस शब्द द्वारा यहाँ यही अर्थ बोधित है । वैसा विशेष यहाँ कुछ नहीं कहा गया, अतः आपका यह अभियोग मिथ्या है । लोक में समग्र शब्दार्थ-सम्बन्ध अभिधानाभिधेय-नियम से जुड़ा हुआ है—इस शब्द का यही अर्थ अभिधेय है । सामान्य के बोधक शब्द के साधारण तथा विशेष शब्द के विशिष्ट अर्थ होंगे । पहले कभी उस अर्थ के लिये प्रयुक्त हुए शब्द ही आज उस अर्थ में प्रयुक्त किए जा सकते हैं, अपूर्व नहीं; क्योंकि शब्दों का प्रयोग अर्थज्ञान के लिए होता है, अर्थज्ञान से व्यवहार चलता है । इस प्रकार, अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग मानने पर प्रकाशक होने से उस अर्थ में सामान्यशब्द का प्रयोग-नियम भी मानना उचित है । 'अजा को गाँव ले जाओ', 'घी लाओ', ब्राह्मण को खिलाओ' आदि शब्द सामान्य होते हुए अपने अपने किसी एक अर्थ में ही प्रयुक्त होते हैं। जैसे ये अपनी सामर्थ्य से, जहाँ विशेष अर्थक्रियादेशना सम्भव हो, वहीं प्रवृत्त होते हैं। अर्थसामान्य में क्रियादेशना सम्भव नहीं होती । इस रीति से 'नवकम्बल' यह सामान्यशब्द 'नये कम्बल वाला' इस अर्थ में ही प्रयुक्त होता है, 'नौ कम्बल वाला' यह अर्थ वक्ता के अभिप्राय में अन्वित नहीं, अतः उस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता । इसलिए प्रकृत में उपपन्न न होनेवाली अर्थकल्पना से परवादी के वाक्य का उपालम्भ उचित नहीं है ॥ १२ ॥ अतिसामान्य योग से सम्भव अर्थ की असम्भव अर्थकल्पना करना 'सामान्यच्छल' कहलाता है ॥ १३ ॥