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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

१०६ पद्मावत। बहीरक्त लिख दीन्हीं पाती। सुंवा जो लीन्ह चोंच भइरांती ॥ बांधी कंठ पड़ा जस क्रांथौ। बिरहिकैं जरा जायकहँ नाथौ ॥ दो० मसि नयनों लिखनी बरन, रोय रोय लिखा अकथ्थै। आखरैं दहै न कोई छुवै, दीन्ह परेवा हाथ ॥ औ मुख बचन सो कहौसि परेवा। पहिले मोर बहुतके सेवा ॥ पुनिरै सँवार कहोसि अस दूजी। जेउ बलैं दीन्ह देवतन पूँजी ॥ सो अबहीं तब से बल लागा। वल जिवरहा न तन सो जागा ॥ अलहि ईशहूँ तुमवल दीन्हा। जहाँ तुम तहाँ भाववल कीन्हा॥ जो तुम मयौ कीन्ह पग धारा। दृष्टि दिखाय बान विषमारा ॥ जो असजाकर आशा सुखी। दुख महँ एसन मारै दुखी ॥ नयनै भिखार न मानहिं सीखा। अगमनै दौरे लीन्ह पै भीखा ॥ दो० नयनहिं नयन जो बेधगये, नहिं निकसैं वे बानै। हिये जो आखरं तुम लिखी, ते शठ घटहिं परान ॥ ते बिष बान लिखूँ कहँ ताई। रक्तै जो चुआ भीज दुनियाई ॥ जान सुकोरी रक्तपसेऊँ। सुखी न जान दुखीकर भेऊँ ॥ गिनलपीरतिन काकर चिन्तौं। प्रीतमनिष्ठुर होहि अस निन्तौं॥ कासों कहूँ बिरह की भाखा। जासों कहों होय जरराखा ॥ बिरह आग तन जरमैं जरै। नयननीर सायर सब भरै ॥ पाती लिखी सँवर तुम नामा। रक्त लिखे आखर भय श्यामा॥ आखर जरहिं न कोई छुवा। तब दुख देख चला लै सुवा ॥ लाल १ गरदन २ निशान ३ आशिक ४ काजल आंखका ५ पलक ६ हाल ७ हर्फ ८-२० जलना ६ ज़ोर १० मौजूद ११ ईश्वर १२ मेहर- बानी १३ नज़र १४ आंख १५-१७ आगे १६ तीर १८ छाती १६ खून २१ कालासांप २२ लाल पसीना २३ भेद २४ अंदेश २५ बेदर्द २६ अर्थात् हमेशा से होते आये हैं २७ आँखका पानी तथा आँसू २८ तालाब २६ अर्थात् कालेहर्फ ३० ॥

पद्मावत। १०७ दो० अय शठ मरों बुद्धि गई पाती प्रेमपियारे हाथ। भेंट होत दुख रोय सुनावत जीव जात जो साथ॥ कंचनतार १ बाँधगये २ पाती। लैगा सुवा जहां धनराती॥ जैसे कमल सूर्य की आसा। तोर कंथ बहु मरै पियासा॥ बिसरा भोग सेज सुख बासू। जहाँ भँवर सब तहां हुलासू॥ तवलगि धीर सुना नहिं पीउ। सुना तो घड़ी रहै नहिं जीउ॥ तवलगि सुख हियँ प्रेम न जामा। जहां प्रेमका सुख विश्रामा॥ अगर चंदन दुखदहे शरीरूं। औ भा अगिनकणों करचीरूँ॥ कथा कहानी सुनि सुठि जरा। जानो घीव बसन्दरै परा॥ दो० बिरहन आप सँभारे मैल चीर शिर रूख। पिउपिउ करत रातदिन, पपिहा मुख मै सूख॥ ततखन गा हीरामने आई। मरत पियास ओह जनु पीई॥ भल तुम सुआ कीन्ह है फेरा। गाँठि नजानहु प्रीतम केरा॥ बातहिं जानो विषम पहारा। हृदये नमिला न होय निराराँ॥ मर्म पानि कर जानि पियासी। जो जल मैहें ताकहँ काआसा॥ का रानी यहि पूँछहु बाता। जन कोई होय प्रेमकर राताँ॥ तुम्हरे दरशनलाग वियोगी २४। अहा सो महादेव मठ योगी॥ तुम वसन्तलै तहां सिधाई। देव पूज पुनि औ फिर आई॥ दो० दृष्टि २५ बान तस मारेहु खाय रहा तेहि ठांव। दूसर बार न बोलहि लै पद्मावत नांव॥ ० खाली १ सोनेका तार २ गरदन ३ अर्थात् पद्मावत ४ खाविन्द ५ खुशी ६ दिल ७ आराम ८ जलना ६ बदन १०-११ कपड़ा १२-१४ आग १३ उसी वक्त १५ नाम तोता १६ मुश्किल १७ टेढ़ा १८ दिल १६ अलग २० भेद २१ पानी २२ अर्थात् दीवाना २३ दुःखी २४ निगाह २५ जगह २६॥

१०८ पद्मावत । रोम रोम बान वे फूटी। सूतहिं सूत रुधिर मुख छूटी ॥ नयनन्हि चली रक्तकी धारा। कन्था भीज भयो रतनारौ ॥ सूरूज बूड उठा परभाताँ। औ मंजीठ टेसू वनराँता ॥ भयो बसन्त राती बनपती। औ जितने सब योगी यती ॥ भूमि० जो भीज भयो सब गेरू। औ राती तहँ पङ्खपखेरू ॥ राती सती अगिन सबकार्याँ। गगन मेघ राती तहँ छाया ॥ इंगुरभा पहाड़ जो भीजा। पै तुम्हार नहिं रोम पसीजा ॥ दो० तहां चकोर औ कोकिला, मर्यो हिये तेहि पैठ। नयनन रक्तै भरायहि, तुम फिर कीन्ह न डीठ ॥ ऐसो बसन्त तुम्हीं पै खेलहु। रक्त पराये सेंदुर मेलहु ॥ तुम तो खेल मन्दिर कहँ आई। वह का मर्म१६ जसजान गुसांई१७॥ कहेसि मरै को वारहि बारा। एकहि वार होहुँ जरछारौ ॥ सैर रच चहा आग जो लाई। महादेव गौरी सुधि पाई ॥ आय बुझाय दीन्ह पँथ तहां। मरनखेलकर आगमें जहां ॥ उलटा पंथ प्रेमकी वारों। चढ़ै स्वर्ग जो परै पतारा ॥ अब धसलीन्ह चही तेहिआशा। पावै श्वास कि मरै निराशा ॥ दो० पाती लिख सो पठाई, लिखा सबै दुख रोय। धौं जिवरहै कि निसरै, कहा रजायसुँ होय ॥ कहिके सुआ छोड़ दइ पाती। जानहु दब्वै छूट तसताँती ॥ गेउं२७ जो बांधा कञ्चनै तागा। राती श्याम कण्ठ जर लागा ॥ सूराख १ खून २-१५ आँख ३ गुदड़ी ४ लाल ५-८ भोर ६ लाख ७ जंगल की बूटी ६ ज़मीन १० परिन्द जानवर ११ चदन १२ आसमान १३ मेहरवानी १४ भेद १६ ईश्वर १७ राख १८ चिंता १६ राह २० पहिले २१ दरवाज़ा २२ आसमान २३ हुक्म २४ निहाई २५ गर्म २६ गरदन २७ सोना २८ लाल वा काला २६ ॥

यहाँ पृष्ठ का यथावत देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

पद्मावत । १०६ अगिन श्वास मुख निसरै ताती । तरवरै जरहिं तहां को पाती ॥ रोय रोय सुवे कही सो बाता । रक्त कि आंशु भयो मुखराता ॥ देख करठ जरलाग सो केरा । सो कस जरै बिरह अस घेरा ॥ जर जर हाड़ भये सब चूना । तहां मांस को रक्त बहूना ॥ वै तोंहिं लाग कर्यो सब जारो । तपत मीनै जल रहै न पारो ॥ दो० तुहि कारने वह योगी, भस्म कीन्ह तनदाह । तू अस निठुर निछोई, बात न पूँछी ताह ॥ कहेस सुआ मोसों सुनि बाता । चहौंतो आज मिलों जसराता ॥ पैसो मर्म न जानै भोरों । जानै मर्म जो मर के होरों ॥ हौं जानतहूँ अबहूँ कांचा । नाजेहि प्रीति रंग थिरैं रांचा ॥ नाजेहि भयो मलयगिरि १३ बासा। नाजेहिरबि १४ होय चढ़े उ अकासा ना जेहि होय भँवरकर रंगू । ना जेहि दीपक भयो पतंगू ॥ ना जेहिं किरा भृंगै की होई । ना जेहि आप जिये मर सोई ॥ ना जेहिं प्रेम ओट इक भयो । ना जेहि हिये मांझ डरगयो ॥ दो० तेहिंका कहिये रहन, जो है प्रीतम लाग । जो वह सुने लेइ धस, का पानी का आग ॥ पुनिधने कनक वान मसि १८ मांगी। उत्तरँ लिखत भीजतनआँगी॥ तस कञ्चने कहँ वही सुहागा । जोनिरमलै नगहोयसुलागा॥ हों योगी मठ मएडफ बहोरी २३ । तहवां कसन गांठ तुम जोरी ॥ गा विपभौरें देखके नयना । सखिनलाजका बोलों बयनों ॥ पेड़ १ चदन २ मछली ३ बेक़रार ४ वास्ते ५ जलाना ६ बेदर्द ७-८ भेद ९ नादान १० मरके जलना ११ क़ायम १२ चन्दन १३ सूर्य १४ नाम कौड़ा १५ तिसको रहने के वास्ते क्या कहूँ १६ पद्मावत १७ क़लम १८ सियाही १९ जवाब २० सोना २१ पाक साफ़ २२ जाना २३ बेहोश २४ आवाज़ २५ ॥

११० पद्मावत । खेल मिसें¹ मैं चन्दन घाला । मगें जागेसि तो देवों जैमाला ॥ तबहुँ न जागा गा तू सोई । जागे भेट न सोये होई ॥ अब शँशि² होय चढ़े आकासा³ । जो जिव देय सो आवै पासा ॥ दो० तबलागि भेंकि न लैसका, रावनसिय इकसाथ । कौन भरोसे अब कहों, जीव पराये हाथ ॥ अब जो सूर⁴ गगन⁵ चढ़ आवै । राहु होय तौ शँशि कहँ पावै ॥ बहुतेहिं ऐसो जीवपर खेला । तू योगी किनमाहँ अकेला ॥ बिक्रम⁶ धसा प्रेमके बारा⁷ । सम्पावतें कहँ गयो पतारा ॥ सुदीपच्छैँ खण्डारवतैं लागी । गंगनें पूर होयगा बैरागी ॥ राजकुँवरैं कंचनपुरैं गयो । मिरगावतैं कहँ योगी भयो ॥ साधुकुँवरैं खण्डारवतैं योगू । मधु मालतिकहँ कीन्ह वियोगू ॥ प्रेमावतैं कैसुरसरें सांधा । ऊषैं लगि अनिरुद्धैं बरबांधा ॥ दो० हों रानी पद्मावत, सात स्वर्ग पर वास । हाथ चढ़ों सो तेहिंके, प्रथमै करै अपनास ॥ हौं पुनि अहौं ऐस तुम रँती । आधी भेट पिरीतम पाती ॥ तोहुँ जो प्रीति निबाहै आंटा । भँवरन देख केतमहँ कांटा ॥ होहु पतङ्ग आवगँहुँ दिया । लेहसमुद्रधसहोय मरि जिया ॥ रँतै रंगजिमि²⁹ दीपकवाती । नयनै लावहोयसीपसेवाति ॥ चात्रिकैं होहु पुकारपियासा । पियो न पानि स्वातिकी आसा ॥ सारंस हो बिछुरी जस जोरी । रैयनि³³ होयजलचकइ चकोरी ॥ बहाना १ शायद २ चाँद ३-७ भीख ४ सूर्य ५ आसमान ६ राजा बिक्रमाजीत ८ दरवाजा ६ नामरानी १०-१२-१६-१८-२१ राजाभोज ११ नाम जगह १३-१५ नाम राजा १४-१७-२२ भंवर १६ दुखी २० बेटी बाणासुर २३ पोता श्रीकृष्णचन्द्रजी २४ पहिले २५ लाल तथा खुश २६ निबाह करना २७ पकड़ना २८ सुर्ख २६ जिस तरह ३० आँख ३१ पपीहा ३२ रात ३३ ॥

पद्मावत । ३११ होहु चकोर दृष्टि शश पाहां। औ रवि होहु कमल वहमाहां ॥ दो० होहुँ ऐस तुहिराती, सकेसि तो प्रीति निबाह । राहुबेध अर्जुनै होय, जीत दुरपदी ब्याह ॥ राजा यहां तैसे तप झूरा । भा जर बिरह छार कर कूंरा ॥ जिव गँवाय सों गयो विमोही। भाबिनजिव जिवदीन्हेसिओही ॥ कहा पिंगलौ सुखमन नारी। सुन्नसमाधि लाग गइ तारी ॥ बूँद समुद्र जैसो हो मेरा । गा हेराय तस मिलै न हेरा ॥ रंगहि पान मिला जस होय । आपहिं खोय रहा होय सोय ॥ सुवे आय देखा भा नाशू। नयन रक्त भर आये आंशू ॥ सदा प्रीतम गाढ़े करेई। वह न भूल भूला जिव देई ॥ दो० मूरे संजीवन आनके, औ मुखछिड़का नीर । गरुड़पंख जस झारै, अमृत बरसा कीर ॥ मुवा जिया अस वास जो पावा। लीन्हेसि श्वास पेट जिव आवा॥ देखिसि जाग सुआ शिरनावा । पाति दीन्ह मुखबचन सुनावा ॥ शब्दै सुनाय अमीमुख मेला । गुरु बुलाय बेगें चल चेला ॥ तोहि अलि कीन्ह आप भाकेवौ। हों पठवा गुरु बीच परेवा ॥ पवन श्वास तोसों मनलाई। जोवै मारगे दृष्टि बिझाई॥ जस तुम काया कीन्हों दांहूं । सो सब गुरु कहँ भयो अगाँहूं ॥ तपावन्तैं बालों लिख दीन्हा । बेगें चलावचहूँसिधि कीन्हा॥ दो० वेग चल आवो अस कहेउ, जीव बसे तुम नाउँ । निगाह १ चाँद २ सूर्य ३ नाम भाई राजा युधिष्ठिर ४ रंग ५-६ जुल्म ७ नाम बूटी ८ पानी ६ तोता १० बोल ११ जल्द १२-२४ भँवर १३ केतकी १४ बिचवानी १५ हवा १६ ढूंढ़ना १७ राह १८ निगाह १६ जलाना २० खबर २१ दिन मिला २२ ख़त २३ काम पूरा २५ ॥

११२ पद्मावत। नयनन्हि भीतरपन्थ है, हिरदयै भीतर ठाँउँ ॥ सुनि पद्मावत की अस मयाँ । भावसन्त उपँजी नई कयाँ ॥ सुआका बोल पवन होयलागा । उठासोय हनुमंत होय जागा ॥ चांदमिलनकहँ दीन्हेसि आशा । सहसँ किरनसूर्यपरकाशा ॥ पाति लीन्ह लै शीश चढ़ावा । दृष्टि चकोर चांद जस पावा ॥ आश पियासा जो जेहि केरा । जो झिककार वही सो हेरों ॥ अब यहि कौन पानि मैं पिया । भै तन पांख पतङ्ग मरजिया ॥ उठा फूल हिरदय न समाना । कन्थों टूक टूक भर आना ॥ दो० जहां प्रीतम वै बसहिं, यहि जिववलै तेहिवाँटे । जो सो बुलावै पांव सों, हम तहँ चलै ललोटें ॥ जो पन्थ मिला महेशहि सेई । गयो समुद्र ओही धसलेई ॥ जहँ वहं कुण्ड बिषमै औगाहों । जायपरा तहँ पाव न थाहा ॥ बावर अन्ध प्रेम कर लागू । सौहें धसा कुछ सूझ न आगू ॥ लीन्हेसि धसजोश्वासमनमारा । गुरू मुछन्दर नाथ सँभारा ॥ चेला परी न छांडहि पाछू । चेला मच्छ गुरू जस कांछू ॥ जस धसलीन्ह समुद्र मरजिया । उघरे नयन बरै जस दिया ॥ खोज लीन्ह सो स्वर्ग दुआरा । बज्रं जो मूंदे जाय उघारा ॥ दो० बांकचढ़ाव स्वर्ग गढ़, चढ़त गयो होय भोर । भइ पुकार गढ़ ऊपर, चढ़े सेंध दै चोर ॥ राजैं सुनि योगी गढ़ चढ़े । पूँछी पास पंडित जो पढ़े ॥ योगी गढ़ जो सेंध दै आवहिं । बोलहुशब्द शुद्धजसपावहिं ॥ आँख १ राह २ दिल ३ जगह ४ मेहरवानी ५ पैदा होना ६ बदन ७ हज़ार ८ शिर ६ देखना १० गुदड़ी ११ न्योछावर १२ राह १३ माथा १४ महादेवजी १५ टेढ़ा १६ खंवर १७ सामने १८ आसमान १६-२१ पत्थर २० कहो क्या दण्ड २२ ॥

पद्मावत। ११३ कहहिं बेद पंडित पढ़ बेदी। योग भँवर जसमालति भेदी ॥ जैसे चोर सेंध शिर मेलहिं। तस ये दोउ जीव पर खेलहिं ॥ पंथे नहिं चलहिंबेदजस लिखी। स्वर्गजाय शूलीचढ़ि सिखी ॥ चोर होय शूली पर मोषू। देजो शूली तेहि नहिं दोषू ॥ चोर पुकार बेध घर मूसा। खोलो राज भँडार मंजूसों ॥ दो० जसयेहि राजमंदिर कहँ, दीन्हरयन होय सेंध । तैसो इन्ह कहँ मोषहोय, मारहु शूली बेध ॥ खण्डबीसवां मन्त्रीखण्ड गन्धर्वसेन ॥ रांध जो मन्त्री बोले सोई। एसो जो चोर सिद्ध पै कोई ॥ सिद्ध निशंक रयनदिन भोहीं। ताकों जहां तहां अपसोहीं ॥ सिद्ध निडरपै अपने जीवा। स्वर्ग देख वो नावहि ग्रीवा ॥ सिद्ध जाय पै जिवं बघतहां। औरहिं मरन पंख अस कहां ॥ सिद्ध अमर कायो जसपारा। जरहिं मरहिं परजाय न मारा ॥ चढ़ा जो कोप गगन उपराहीं। थोरे साज मरै ते नाहीं ॥ जम्बुकै जूझचढ़े जो राजा। सिंह साजके चढ़े सो छाजा ॥ दो० छेरहि काज कृष्ण करसाजा, राजा चढ़े रिसाय । सिद्धगिद्धजहँहृष्टि गगनमहँ, बिनछरकुबनाबिसाय॥ आवहु करहुकदैरै मससाजू। चढ़हिं बजाय जहालगिराजू ॥ होहसंजोवलै कुँवरजो भोगी। सब दललैकैघरहु अब योगी॥ चौबिसलाख छत्रपति साजे। छपनकोटि दैं बाजनबाजे ॥ राह १ नजात २ पाप ३ सन्दूक ४ मर्दैकामिल ५ फिरना ६ देखना ७ पहुँचना ८ गर्दन ६ हमेशाज़िन्दा १० बदन ११ आसमान १२ सियार १३ शेर १४ फ़रेब १५ निगाह १६ लश्कर तय्यार हो १७ मुक़ाबिला १८ राजा १६ फ़ौज २० ॥

११४ पद्मावत । बाइस सहस १ सिंहली चाले । गिरि २ पहाड़ पेई सब हाले ॥ जगत बराबर वै सब चाँपा । डरा इन्द्र बासुकि ३ हियें कांपा ॥ पदम कोटि रथ साजे आवहिं । गढ़ होय खेहँ गगन ५ कहँ धावहिं ॥ जनु भौचाल जगत महँ परा । कुर्महिं ७ पीठ टूटि हिय डरा ॥ दो० छत्रहिं स्वर्ग छायगा, सूरय भयो अलोप । दिनहि रात अस देखी, चढ़ा इन्द्र होय कोप ॥ देख कटक औ मनमंतं हाथी । बोले रतनसेन के साथी ॥ होत आव दल बहुत असूझा । अस जानव कुछ होय है जूझा ॥ राजा तुइँ योगी होय खेला । यही दिवसैं कहँ हम भये चेला ॥ जहां गाढ़े ठाकूरै कर होई । सङ्ग न छांड़े सेवक सोई ॥ जो हम मरन दिवस मन ताका । आज आय पूजी वह शाका ॥ पर जिव जाय जायनहिं बोला । राजा सतसुमेरु नहिं डोला ॥ गुरू केर जो आयसु पावहिं । साँहें होहिं औ चक्र १६ चलावहिं ॥ दो० आज करहिं रण भारथ, सत बाचा दै राख । सत गुरू सत कौतुकैं, सत भरै पुनि साख ॥ गुरू कहा चेला सिध्र होहू । प्रेमबौर दै करो न कोहू ॥ जा कहँ शीशँ नायकै दीजै । रङ्ग न होय जूझ जो कीजै ॥ जेहि जिय प्रेम पानि भासोई । जेहि रंग मिलै वही रंग होई ॥ जो पै जाय प्रेम सों जूझों । कित तपमरहि सिद्ध जेहि बूझा ॥ यहि सत बहुत जूझ नहिं करिये । खड्गै देख पानी है हरिये ॥ पानी कहा खड्ग की धारा । लोट पानि सोई जो मारा ॥ = हज़ार १ पहाड़ २ नाम राजा सापोंका ३ दिल ४ राख ५ आसमान ६-८ कछुवा ७ फ़ौज ६ मस्त १० दिन ११ मुसीबत १२ मालिक १३ हुक्म १४ सामने १५ नाम हथियार १६ तमाशा १७ दरवाज़ा १८ गुस्सा १६ शिर २० पानी २१ लड़ाई २२-२३ तलवार २४ ॥

पद्मावत । ११५ पानी से ते आग का करई। आये बुझाय पानी जोपरई ॥ दो० शीश दीन्हे मैं आगमने, प्रेमपानि शिरमेल। अबसो प्रीति निवाहूँ, चलौं सिद्धहोय खेल ॥ राजै छेक धरा सब योगी। दुखेऊपर दुखसहै बियोगी² ॥ नाजिय धड़क हिये³ डरकोई। नाजियमरन जिवनकसह होई॥ नागफांस उनमेली ग्रीवाँ⁴। हर्ष न विसमो⁵ अबकोजीवाँ ॥ जोजिव दीन्ह सोलेव निरासा। बिसरेन हिंजोलहतनश्वासा॥ करै किंगरी तेहि तन्तबंजावा। यही गीत वैरागी गाँवा ॥ भलहिं अनंगगे मेली फांसी। हिये⁷ नशोचऐसीरिसनासी॥ मँगये फांद वही दिन मेला। जेहि दिन प्रेमपन्थ खेला ॥ दो० परगटे गुप्त सकलै महँ, पूररहा सो नाउँ। जहँ देखों वह देखों, दूसर नहिं कहुँ जाउँ॥ जबलग गुरु मैं अहानचीन्हा। कोटिअन्तरपैट बिचहुतदीन्हा॥ जो चीन्हा तौ और न कोई। तनमन जिव यौवन सबसोई॥ होंहों कहत धोख अन्तराहीं। जो भा सिद्ध कहां परछाहीं ॥ मारे गुरू कि गुरू जियावा। और को मारमरै सब आवा॥ सूरी मेल हस्ति¹⁴ गुरु परू। हौं नहिं जानौ जानै गुरू ॥ गुरू हस्ति परचढेसोपेखा¹⁵। जगतैं¹⁶ जोनास्तै नास्तसबदेखा ॥ अंधिमीने¹⁸ जसजलमहँधावा। जलजीवनै¹⁹ जलदृष्टि²⁰ न आवा॥ दो० गुरुमोर मोरे हिये, दिये तुरङ्गहिदोठ। भीतर करहि डुलावै, बाहर नाचै काठ ॥ शिर १ पहिले २ दुखी ३ दिल ४-१० गरदन ५-६ खुशी ६ दुःख ७ हाथ ८ ज़ाहिर ११ छिपा हुआ १२ सब १३ करोरों परदाका बीच १४ हाथी १५ देखना १६ दुनियां १७ नाश होनेवाला १८ मछली १६ ज़िंदगी २० निगाह २१ घोड़ेकी बाग २२ ॥

११६ पद्मावत । सो पद्मावत गुरुहौं चेला । योगतन्त जेहिकारने खेला ॥ तजै वह बारै न जानौंदूजा । जेहि दिन मिलै यात्रा पूजा ॥ जीवकांढ़ भुइँधरौं ललाटूँ । वहिकहँ देउँ हियौ महँपाटूँ ॥ को मोहिंलै सो छुवावै पाया । नौ अवतारैं देइ नइ काया ॥ जीवचाहि सोअधिकैं पियारी । मांगै जीव देउँ बलिहारी ॥ मांगै शीश देउँ मैं ग्रीवां । अधिक तेरे जो मारै जीवा ॥ अपने जिवकर लोभ न मोहीं । प्रेम वार होय माँगौं ओहीं ॥ दो० दरशन वहकादिया जस, हों मुखिकारी पतंग । जो करवै शिर सारी, मरत न मोरों अंग ॥ पद्मावत कमला शशि ज्योती । हँसै फूल रोवै तब मोती ॥ परजापतें हँसी औ रोनूँ । लाये दूत होय नित्तँखोजू ॥ जबहिं सूर्य्य कहँलागाराहू । तबहिंकमल मनभयो अग़ाहूँ ॥ बिरह अगस्ते जोविसमो भयउ । सरवरे हरषे सूखसब गयउ ॥ परगटै ढारसकै नहिं अंशू । घुटघुट मांसगुंस होयनाशू ॥ जस दिनमांझ रयनिहोय आई । विगसतकमल गयो मुरझाई ॥ रांतौं बदन गयो होय सेताँ । भवंत भँवर रहिगई अचेता ॥ दो० चितहिं जो चित्र कीन्हधुने, रोवोंअङ्ग समीप । सहसै सालदुख आहभर, मुरछै परीकामीप ॥ पद्मावत सँग सखी सयानी । गनकेनखत पीरशशि जानी ॥ वास्ते १ छोड़ना २ दरवाज़ा ३ शिर ४-११ दिल ५ तख़्त ६ नया जन्म ७ बदन ८ ज्यादा ६-१० गरदन १२ शिर उतारना १३ चाँद १४ बाप पद्मावत १५ रोना १६ हररोज़तलाश १७ तथा राजारतनसेन १८ तथा पद्मावत १६ ख़बर २० आग २१ तेज २२ तालाब २३ खुशी २४ ज़ाहिर २५ छिपा २६ लाल २७ सफ़ेद २८ याद २६ तसवीर ३० पद्मावत ३१ हज़ार ३२ बेहोशी दूरहोती ३३ चाँद तथा पद्मावत ३४ ॥

पद्मावत। ३१७ जानेहुमर्म कमलकर कोई। देख बिथा बिरहिन की रोई॥ बिरहा कठिन काल की कला। बिरहन सही कालपर भला॥ काल काढ़ि लैजीव सिधारा। बिरह काल मारे पर मारा॥ बिरह आग पर मेलै आगी। बिरहघावपर घावबिजाँगी॥ बिरह बानपर बान पसारा। बिरह रोग पर रोग सँचारा॥ बिरहसालै परसालि नवेला। बिरहकाल परकाल दहेला॥ दो० तनरावन होय शिरचढ़ा, बिरह भयो हनुमन्त। जारे ऊपर जरै, तजै न कै भसमन्त॥ कोइकुमोदैंपरसहिंकरपाया। कोइमलयागिरि छिड़कहिंकाया॥ कोइ मुख शीतलनीर चुवावै। कोइ अंचलसों पवनडुलावै॥ कोइमुखअमृत आननिचोवा। जनुबिषदोन्हअधिकैं धने सोवा॥ जोवहिंश्वास खनँहिखनसखी। कब जिव फिरै पवन औ पँखी॥ बिरहकाल होयहिये जो पैठा। जीव काढ़ लै हाथे बैठा॥ खनक मवन बांधा खनखोला। गहेसि जीभमुखजायनबोला॥ खनहि बीजै की बानन मारा। कँपकँप नारिमरै बिकरारा॥ दो० कतहू विरह न छोड़ै, भा शशिगहन गिराश। नखत चहूँदिशि रोवहिं, अँधरे धरत अकाश॥ घड़ीचारइमि गहनगिराशी। पुनिविधि हिये ज्योतिपरकाशी॥ निससे ऊभभर लीन्हे श्वासा। भइ अधार जीवनकी आसा॥ बिनवहिं सखी छूटशिशि राहू। तुम्हरी ज्योति ज्योतिसबकाहू॥ ⋆भेद १ कोकावेली २-७ आंग ३ सुराख ४ भारी ५ छोड़ना ६ चन्दन ८ ठण्ढापानी ६ बहुत १० पद्मावत ११ हरघड़ी १२ दिल १३ रुकना १४ बिजुली १५ बेकरार १६ चाँदगहन १७ इस तरह १८ ईश्वर १६ दिल २० रोशनी २१ बेहोश २२ कछु खाया २३ चाँद २४ना

३१६ पद्मावत। तूँ शशिबदनें जगतैं उजियारी। कै हरलीन्ह कीन्ह अँधियारी॥ तू गजगाँमिनि गर्व गहेली। अबकसअँस सतछांड़ दहेली॥ तूहर लंक हेराई केहरँ। अब कंसहार करेसि है हर॥ तू कोकिलि बैनी गजमोहा। कौनव्याधहोयगहीनिछोहा॥ दो० कमलकरी तू पद्मिन, गइ निशिं भयौ बिहान। अबहुँ न सम्पुट खोलिसि, जोरिउठाजगभानै॥ भाननाउँ सुनिकमल विकासा। फिरिकै भँवरलीन्ह मधुवासा॥ शरदचन्दें मुखजीभ उघेली। खंजननयनैं उठी करकेली॥ बिरह न बोल आव मुखमाई। मरमर बोल जीववरियाई॥ डोलबिरहदारुनैं हिये कांपा। खोलनजाय विरहदुखझांपा॥ उदंधिसमुद्रजंसतरंगै दिखावा। चेपंघूमहिंमुखबात न आवा॥ यह शठ लहर लहर परधावा। भँवरपरा जिव थाह न पावा॥ सखी आन विष देवतो मरनू। जीव न पेट मरन का डरनू॥ दो० खंनै उठै खनवूड़ै, अस हिय कमल सकेंत। हीरामनहिं बुलावहि, सखी कहन जिव लेत॥ चेरी धाय सुनत खन धाई। हीरामन लै आय बुलाई॥ जनहु वैद्य औषध लैआवा। रोगियें रोग मरतजिव पावा॥ सुनत अशीश नयनधनखोली। बिरहबैनकोकिलजिमि बोली॥ कमलहि बिरहबिथा जसबाढ़ी। केशरै बरनपीर हिय काढ़ी॥ कित कमलहि भा प्रेम अँगूरू। जो पै गहन लेह दिन सूरूँ॥ चाँद कैसा मुँह १ दुनियां २ हाथीकी चाल ३ गुरुर ४ भारी ५ कमर ६ चीता ७ आवाज ८ बेदर्द ९ रात १० सूर्य ११ कातिककी पूरनमांसीका चांद १२ ममोलाकी आंख १३ भारी १४ मुश्किल १५ दिल १६ नामसमुद्र १७ लहर १८ आंख १९ कभू २० बन्द २१ जिसतरह २२ पीला २३ सूर्य २४॥

| पद्मावत | ११६ पुरयन छाहिं कमल की करी। सकल विथा सुनियस तुमहरी॥ पुरुष गंभीर न बोलहिं काहू। जो बोलहिं तो और निबाहू॥ दो० इतना बोल कहत मुख, पुनि होइगई अचेत। पुनिकै चेत सँभारी, वही वकत मुखलेत॥ और दग्ध का कहौं अपारा। सती जो जरे कठिन असझारा॥ होय हनुमन्त पैठहै कोई। लङ्का दाह लाग तन सोई॥ लङ्का बुझी आग जो लागी। यहिन बुझैतस आँच विजागी॥ जनहु अगिनके उठहिं पहारा। वैसब लागहिं अंग अँङ्गारा॥ कट कट मांस सराँग पुरोवा। रक्तकी आंसु मांस सबरोवा॥ खनक वार मांस अस भूंजा। खनहिंचपायसिंह असगूंजा॥ यहरी दग्ध हत अतममरीजे। दग्ध न सही जीवपर दीजे॥ दो० जहँलग चन्दन मलयागिरि १०, औ सायर सबनीर २। सबमिल आय बुझावहिं, बुझहि न आगशरीर॥ हीरामंन जो देखेसि नारी। प्रीति बेल उपैजी हियें १३ बारी॥ कहेसि न तुम कस होहु दहेली १५। उरझी प्रेम प्रीतकी बेली॥ प्रीतिबेल जन उरझै कोई। उरझा मुये न छूटै सोई॥ प्रीति बेल ऐसे तन डाढ़ा। पलहत सुख बाढ़त दुख बाढ़ा॥ प्रीति बेलकी अमर को बोई। दिनदिनबढ़े क्षीण नहिं होई॥ प्रीतिबेल सँग विरह अपारा। स्वर्ग पताल जरै तेहिझारा॥ प्रीति अकेल बेल जहँ छावा। दूसर बेल न सरबर पांवा॥ दो० प्रीतिबेल उरझाय जब, तब सुजान सुखसाख। मिले प्रीतम आयके, दाखैं बेल रस चाख॥ सब १ अच्छे लोग २ जलन ३ मुशकिल ४ जलाना ५ आग ६ सीख ७ कभी ८ शेर ६ चन्दन १० तालाव ११ पानी १२ पैदा १३ दिल १४ भारी १५ घटना १६ आसमान १७ बराबरी १८ अंगूर १६॥

पद्मावत उठि टेंके पाया। तुमहुँ तो देखौ प्रीतम छाया ॥ कहत लाज और हिये¹ न जीव। इक दिशँ² आग दूसर दिशि पीव॥ तुमसो मोर खेवकै³ गुरु देवा। उतरों पार तेही विधि खेवा ॥ सूरै उदयगढ़ चढ़त सुंताना। गहने गहा कमल कुँभलाना॥ औ हत होय मरों नहिं झूरी। यह शठ मरों जो नेरहि दूरी॥ घट महँ वकत वकत भा मेरूँ। मिलहिन मिलहि परा तस फेरू॥ दमर्नाहिं नलहिं जोहंसमिलावा। तब हीरामन नाउँ कहावा॥ दो० मूरै संजीवन दूर है, सालै शक्की वान। प्राण मुक्ति⁹ अब होत है, वेगें¹⁰ देखावहि आन॥ हीरामन भुइँ धरा ललांटू। तुमरानी युगयुगैं सुखपोंटू॥ जेहिकै हाथ जरी औ मूरी¹⁴। सो योगी अब नाहीं दूरी ॥ पिता तुम्हार राज कर भोगी। पूजे विप्रे¹⁶ मरावै योगी ॥ पँवेरैं पँवर कुतवाल सो बैठा। प्रेमकलुम्बै¹⁷ सुरँग होय पैठा ॥ चढ़त रयनिगढ़ होयगा भोरू। आवत वोरें धराकै चोरू ॥ अब लैगयें देय वह शूरी। तेंहिसो अगौँहैं विधातुमपूरी ॥ अब जिव तुम कायों वह योगी। काया रोग जान पै रोगी ॥ दो० रूप तुम्हार योगी आपनं, पिंड कमावा फेर। रहा हेराय खंड तेहि आपै, काल न पावत हेर ॥ हीरामन जो बात यहि कही। सूर्य्यकी गहन चांद पुनि गही॥ सूर्य्यकीदुखजोशशि²² होयदुखी। सो कित दुखमाने करमुखी॥ अबजो योगि मेरै मोहिं नेहौँ। मोहिं वह साथ धर्तगगनेहौँ ॥ छाती १ इकतरफ़ २ मल्लाह ३ सूर्य्य ४ मुलाक़ात ५ रानीदमन ६ नाम राजा ७ नाम बूटी ८ सूराख ६ आख़िर १० जल्द ११ शिर १२ हमेशा १३ तख़्त १४ जड़ १५ ब्राह्मण १६ ड्योढ़ी १७ प्रेमका भराहुआ १८ दरवाज़ा १६- ख़बर २० बदन २१ चांद २२ मुहब्बत २३ ज़मीन-आसमान २४ ॥

रहै तो करौं जन्म भर सेवा । चलैतो यह जिव साथ परेवा ॥ कौनसो करं लैगहि गुरुसोई । पर कायां प्रवेश जो होई ॥ पलटसो कौन पंथै बिधिकेला । चेला गुरु गुरु होय चेला ॥ कौन खण्ड अस रहा लुकाई । आवै काल हेरै फिर जाई ॥ दो० चेला सिद्ध सो पावै, गुरुसों करैअछेद । गुरु करै जो कृपा, कहै सो चेला भेद ॥ अनरानी तुम गुरु वह चेला । मोहिं पूँछहु कै सिद्ध नवेला ॥ तुम चेला कहँ परशन भई । दरशन देय मँडफ चलगई ॥ रूप गुरू कर चेलहि दीठा । जितसमायहोयचित्रं सोपैठा ॥ जीव काढ़ लै तुम अपसई । वह भा काया जिव तुम भई ॥ क्या जो लाग धूप औ सेऊँ । क्या न जान जानि पै जीऊ ॥ भोग तुम्हार मिला वह जाई । जो वहबिथा सोतुम कहँआई ॥ तुम चहकी घट वह तुम माहां । काल कहां पावै वह छाहां ॥ दो० अस वह योगी अमरै भा, परकाया परबेश । आवकाल गुरु तनदेखी, फिर सोकरै अदेश ॥ सुनि योगी की आमर करनी । न्योरी बिरहबिथाकीमरनी ॥ कमलकरीहोय बिकसो जीव । जनु रविउदय छूटगासीवैं ॥ जो भा सिद्धको मारै पारा । नींबूरसते होय जो बारों ॥ कहो जाय अब मोर सँदेशू । तजो योगअबहोहु नरेशू ॥ जन जानहु हौं तुमसों दूरी । नयनहिं मांझ गड़ी वहशूरी ॥ तुम सँचेत घटै घट केरा । मोहिंघटजीव घटननहिंबेरा ॥


पाद-टिप्पणी (Footnotes): १ हाथ १ पकड़ना २ यत्न ३ राह ४ देखना ५-६ कमाल ६ दुई न राखै ७ नया ८ तसवीर १० छिपना ११ जाड़ा १२ हमेशा ज़िन्दा १३ सलाम १४ आख़िर १५ खिलना १६ सूर्यके उदय जाड़ा जाय १७ राख १८ छोड़ना १६ बहादुर २० पसीना २१ देर २२ ॥

१३२ पद्मावत । तुम कहँ पाटँ हिये² में साजा । अब तुम मोर दुहूँ जगराजा ॥ दो० जोरीजियहिं मिलगलरहै, मरहिं तोएकहिं दोउ । तुमपै जियनहोयकछु, मोजियहोयसोहोउ ॥ खण्डइक़ीसवां शूलीखण्डरतनसेन ॥ बाँधतपौ आनी जहँ शूरी । जुरेआय सब सिंहल पूरी ॥ पहिले गुरूदेय कहँ आना । देखरूप सब कोउ पछताना ॥ लोगकहें यहि होय न योगी । राजकुँवर कोउअहैवियोगीँ ॥ काहू लाग भयो है तपा । हिये सुम्राल केर मुखजपा ॥ जस मारे कहँ बाजा तूरूँ । शूरीदेख हँसा मन्मूरूँ ॥ चमके दशनँ भयो उजियारा । जो जहँ तहां वीज असमारा॥ योगी केर करो पै खोजूं । मंगे यहिहोय न राजा भोजू ॥ दो० सब पूँछहिं कहु योगी, जात जन्म औ नाउ । जहाँ ठाँव रावकर, हँसा सो कहु केहिभाउ ॥ का पूँछौ अब जात हमारी । हम योगी औ तपा भिखारी ॥ योगी जात कौन हो राजा । गारिन कोहमोरैं नहिं लाजा ॥ निलज भिखारलाजजेहिं खोई । तेहिकी खोज परै जन कोई ॥ जाकर जीव मरे पर बसा । शूरीदेख सो कसनहिं हँसा ॥ आज नेहसों होय निबेरौँ । आजभूमि¹⁴ तजें गगनें बसेरा॥ आज कर्या पिंजर बँद टूटा । आजहिं प्रान परेवां छूटा ॥ आज नेह सो होय नियारा । आज प्रेमसँग चला पियारा ॥ दो० आजअबध सरै पहुँची, गयेजाउँमुखराँते । तख़्त-१ दिल २-५-योगी ३ दुखी ४ नामवाजा ६ नाम मर्द कामिल ७ दांत ८ बिजुली ९ तलाश १० शायद ११ गुस्सा १२ जुदाई १३-१६ ज़मीन १४ छोड़ना १५ आसमान १६ चढ़न १७ उड़नेवाला १८ हद २० बराबर २१ लाल २२ ॥

[header] पद्मावत। ५२३ [/header]

बेगे होहु मोहिं मारहु, जन चालहु यह बात ॥ कहहिंसँवरि जेहि चाहेसिसँवरा। हमतुमकरहिं केतिकर भँवरा॥ कहेसि वही संवरों हर फेरा। मुयेजीत आहों जेहि केरा ॥ औ सुमिरों पद्मावत रामा। यहिजिवन्योछावरतेहिनामा ॥ रक्त की बूँद कया जब परहीं। पद्मावत पद्मावत कहहीं ॥ रहे तो बूँद बूँद महँ ठाँऊँ। परहुँ तो सोई लै लै नाऊँ ॥ रोम रोम तन तासो ओधो। सूतैहि सूत बेध जिवसोधो ॥ हाड़हिहाड़ शब्द सो होई। नस नस माँह उठै धुनिसोई ॥ दो० खाय बिरह गांताकर, गूद मांस किये हान। हों पुनि सांचा होयरहा, वहकी रूप समानाँ॥ योगिहि जबहिं गाढ़ै असपरा। महादेव कर आसन टरा ॥ औ हँसि पार्वती सो कहा। जानहुसूर गहन असगहा ॥ आज चढ़े गढ़ ऊपर तपी। राजैं गहा सूर तब छिपा ॥ जग देखेगा कौतुकै आजू। कीन्हें तपा मारे कहँ साजू ॥ पार्वती सुनि पाँयन परी। चलौ महेश देखें इक घरी ॥ भेष भाट भाटिन कर कीन्हा। औ हनुमन्तवीर सँगलीन्हा॥ आय गुसँ है देखन लागे। वहसूरति कस सती सभोंगे ॥ दो० कटकै असुझदेखके आपन, राजागर्व करेय। दईकीदिशाँ न देखे, वह काकहँ जयै देय ॥ आसन लिये रहा हो तपा। पद्मावत पद्मावत जपा ॥ मन समाध तासों धुन लांगी। जेहिदरशन कारण बैरागी ॥

जल्द १ चंदन २ जगह ३ बेधना ४ सुराख ५ आवाज़ ६ समाना ७ मुशकिल ८ सूर्य ९ योगी १० तमाशा ११ महादेवजी १२ छिपकर १३ सतीकी तरह क़ायम १४ फ़ौज १५ ग़रूर १६ ईश्वरकी तरफ़ १७ जीत १८॥

१२४ पद्मावत । रहा समाय रूप वह नाऊँ। और न सूझ वारे जहँ जाऊँ ॥ औ महेशँ कहँकरो अदेशू। जेहि यहपन्थै दीन्ह उपदेशू ॥ पार्बती पुनि सत्य सराहा। औ फिरमुख महेश करजाहौं ॥ हिये महेशँ भईजोमहेशी। कित शिरनावहिं ये परदेशी ॥ मरतेहुँ लीन्ह तुम्हारा नाऊँ। तुमचित कीन्ह रही यहठाँऊँ ॥ दो० मारतही परदेशी, राखलेहु यहि वीर। कोइ काहू कर नाहीं, जो हो चलै न तीर ॥ लै संदेश सोंटों गा तहाँ। शूली देहिं रतन को जहां ॥ देख रतन हीरामन रोवा। राजा जिव लोगनहठ खोवा ॥ देख रोदनै हीरामन केरा। रोवहिं सब राजा मुखहेरों ॥ मांगहिं सब विधीनों सों रोई। की उपकोरै छुड़ावै कोई ॥ कहि सँदेश सब विपतिसुनाई। बिकल बहुत कुछकहीनजाई ॥ काढ़ प्रान बैठ लिये हाथा। मरै तो मरों जियो इक साथा ॥ सुनि सँदेश राजा तब हँसा। प्रान प्रान घट घट महँ वसा ॥ दो० हीरामन औ भाट दसौंधी, भये जिवपर इकठाउँ । चल सो जाय अब देख तहँ, जहँ बैठो रहिराउँ ॥ राजा रहा दृष्टि १५ कै औंधी। रहिनसका तब भाट दसौंधी ॥ कहेसि मेलकै हाथ कटारी। पुरुप न आछे बैठि पिटारी ॥ कान्ह कोप कै मारा कंसू। गोकुल मांझ बजावा वंसू ॥ गन्धबसेन जहां रिस बाढ़ा। जाय भाट आगे भा ठाढ़ा ॥ ठाढ़ देख सब राजा राऊ। बायें हाथ दीन्ह वरभाँऊ ॥ दरवाज़ा १ महादेवजी २-७ सलाम ३ राह ४ देखना ५ दिल ६ मेहरबानी ८ जगह ६ तोत्ता १० रोना ११ देखना १२ ईश्वर १३ कोशिश १४ निगाह १५ आशीर्वाद १६ ॥

। पद्मावत । १२५ बोला गन्ध्रबसेन रिसाई। कैस योगि कस भांट असीई ॥ योगी पानि आग तू राजा। आगहि पानि जूझ नहिं छाजा ॥ दो० आग बुझाई पानि सो, जूझ न राजा बूझ। लीन्हे खप्पर बारै तुहिं, भिक्षा देहि न जूझ ॥ योगि न होय आहि सो मोंजू। जानहु भेद करो सो खोजू ॥ भारथे होय जूझै जो ओधा। होहिं सहाय आय सब योधा ॥ महादेव रण घण्ट बजावा। सुनिकै शब्दे ब्रह्म चलि आवा ॥ वासुकि फण पतार सों काढ़ा। अष्टोकली नाग भा ठाढ़ा ॥ छप्पन कोटि बसन्देरं बरा। सवालाख पर्वत फुरहरौ ॥ चढ़े अस्त्र लै कृष्ण मुरारी। इन्द्र लोग सब लाग गुहारी ॥ तेंतिस कोटि देवता साजा। औ छानबे मेघदल गाजा ॥ दो० नव्वे नाथ चलि आवहिं, औ चौरासी सिद्ध। आज महाभारत चलै, गगनैं गरुड़ै औ गिद्ध ॥ भइ अजौ को भाट औ भारूँ। बायें हाथ दिये बरभारूँ ॥ को योगी अस नगरी मोरै। जो दै सेंध चढ़े गढ़ चोरै ॥ इन्द्र डरै नित नावै माथा। जानत कृष्ण शेष जे नाथा ॥ ब्रह्मा डरै चतुरमुख जासू। औ पाताल डरै बलि बासू ॥ धरति डरै औ मण्डफ मेरू। चन्द्र सूर्य्य औ गगनैं गँभीरू ॥ मेघ डरहिं बिजुली जेहि डीठी। कूर्म डरै धरती जेहिं पीठो ॥ चहोंतो सबमोंकों धर केशा। और को गिनेतैं अनेग नरेशाँ ॥

  • बेंअदब १-१६ लड़ाई २ दरवाज़ा ३ भारी लड़ाई ४ मारना ५ मदद ६ आवाज़ ७ नाम राजा साँपों का ८-२० नाम हाथी ९ आग १० मौजूद ११ हथियार १२ आसमान १३ नाम राजा पक्षी १४ हुक्म १५ सलाम १७ चार मुँह १८ राजा दैत्य १६ नाम पहाड़ २१ आसमान २२ निगाह २३ कछुवा २४ फेरुआ देना २५ गिनती २६ राजा २७ ॥