पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
१२६ | पद्मावत । दो० बोला भाट नरेश सुनि, गर्व न छाजा जीव । कुम्भकरणकी खोपड़ी, बूडत बाचों भीवँ ॥ रावण गर्व बिरोधों रामू । ओही गर्व भयो संग्रामू ॥ तसरावण असको बरबंडा । जेहिदशशीशँ बीसभुजदंडा ॥ सूरज जेहि की तपै रसोई । निज बसन्दर धोती धोई ॥ मूर्क मुनेटाँ शशिमसयारों । पवनैं करैनित बोरै बोहारा ॥ मीचैं लाये कै पादी बांधा । रहा न दूसर सपने कांधा ॥ जो अस बज्र टरहि नहिं टारा । सोउ मर दोउ तपेंसी करमारा ॥ नाती पूत कोटि दश अहा । रोवनहार न एको रहा ॥ दो० ओझ जान के काहू, जनकोइ गर्व करेय । ओछी पार दई है, जीत पत्र जो देय ॥ अबजो भाट तहां हंत आगे । बिनयें उठा राजा रिसलागे ॥ भाट अह्रै ईश्वर की कला । राजा सबराकैं अरकला ॥ भाट मीच पै आपन दीसा । ताकहँ कौन करै रिस रीसा ॥ भयो रजाये सुगन्ध्रब सेनी । काहिं मीचके चढ़ा नसेनी ॥ कह अनी बानी अस पढ़े । करसि न बुद्धे भेंट जो कढ़े ॥ जातभाट कितऔगुन लावस । बायें हाथँ राजबर भावसैं ॥ भाट नाउँ का मारों जीवा । अबहूं बोल नायके ग्रीवां ॥ दो० तुइरे भाट वै योगी, तोहि यह कहांक सङ्ग । कहां चढ़ै असपावा, कहां भया चित भङ्ग ॥
- ग़रूर १ वचना २ नाम पहलवान ३ सज़ादेना ४ लड़ाई ५ ज़बरदस्त ६ शिर ७ नाम गुरु राक्षसोंका ८ चोबदार ६ चाँद मशालची १० हवा ११ दरवाज़ा १२ मौत १३ श्रीराम लक्ष्मण १४ ग़रूर १५ कमज़ोर की तरफ़ १६ अर्ज़ १७ मुकाबिला न चाही १८ हुक्म १६ सीढ़ी २० अक़्ल २१ बेहुनर २२ सलाम २३ गर्दन २४ ॥
पद्मावत। १२७ जो सत पूँछेसि गन्ध्रब राजा। सत पै कहूँ परे नहिं गाजा ॥ भाटहि काहि मीचसों डरना। हाथ कटार पेट हन मरना ॥ जम्बूद्वीप चितावर देशू । चित्रसेन बड़ तहां नरेशू ॥ रतनसेन यहि तांकर बेटा। कुल चौहान जाय नहिं मेटा ॥ खांडेअंचल सुमेरु सुभारू । टरै न जो लागै संसारू ॥ दान सुमेरु देत नहिं खांगो। जो यह मांग न औरहि मांगा ॥ दाहिन हाथ उठायों ताही। और को अस वरभावो जाही ॥ दो० नाउँ महापात्र गुहिं, तेहेकि भिखारी डीठँ । रिसलागे खरिवात कहि, खरि पै कहै वसीठँ ॥ ततखनं सुनि महेश मनलाजा। भाटकिरंनि है विनवां राजा ॥ गन्ध्रबसेन तू राजा महां। हों महेश मूरत सुनि कहा ॥ पै जो बात होय भल आगे। कहा चही काभा रिस लागे ॥ राजकुँवर यहिहोहिं न योगी। सुनि पद्मावत भयो वियोगी ॥ जम्बूद्वीप राजघर बेटा। जोहै लिखा सो जाय न मेटा ॥ तूरै सुवै जाय वह आना। औ जाकर बिरोकै तैमाना ॥ पुनि यह बात सुनीशिवलोका। कर सुविवाह धर्म है तोका ॥ दो० मांग भीख खप्पर लिये, मुये न छांड़ै बौरै। चूमदेखजो कनककचौरी, भीखदेह नहिंमार ॥ औ हेंट होहरे भाट भिखारी। का तू मोहिं देइ अस गारी ॥ को मोहियोगीं जगतहोइपारा। जासों हेरों जाय पतारा ॥ योगी यती आव जित कोई। सुनत त्रासे मान भा सोई ॥ बिजुली १, राजा २ तलवार बहादुर ३ कमी ४ शोख ५ वकील ६ उसी वक्त ७ महादेवजी ८ मानिन्द ९ तारीफ़ १० कहामान ११ दुःखी १२ गुस्सा १३ दरवाज़ा १४ सोने की कटोरी १५ दूर हो १६ लायक १७ देखना १८ डर १६ ॥
१३८ पद्मावत । भीखलेहु फिर मांगो आगे । यहि सब रयैंनि रहै गढ़लागे ॥ जसचहि इच्छै चहूँतेहिदीन्हा । नाहिं बेध शूली जिवलीन्हा॥ जेहि अससाधहोय जिवखोवा । सो पतंग दीपक तस रोवा॥ सुर नर मुनि गुनि गन्ध्रव देवा । तेहिं को गिने करहिं नितसेवा॥ दो० मोसों को सरवर्र करै, अरे सुनि झूठे भाट । क्षार होय जो चाजौं, गर्जै हस्तिर्न के ठाट॥ योगी धर मेले सब पाछे । उरये मालँ आये रण काछे ॥ मंत्रिन्र कहा सुनो हो राजा । देखहु अब योगिनकर काजा॥ हमजो कहा तुमकरहुंन जूझं । होत आवदेरं जगतअसूझा॥ खंने इकमहँ झुरमटहो बीता । दरमहँ चढ़ै जोरहै सोजीता ॥ कै धीरज राजा तब कोंपा । अङ्गद आय पांव रण रोपा ॥ हस्तिं पांच जो अगमनैं धाये । तें अङ्गद धर सूंडि फिराये॥ दीन्ह उड़ाय स्वर्ग कहँ गये । लौट न फिरैं तहहिं के भये ॥ दो० देखत रहें अचम्भो योगी, हस्ती बहुरन आय । योगीकर अस जूझव, भूमि न लागत पाँय॥ कहहिं बात योगी हम पाये । छिन इक मांह चहतहैं धाये ॥ जौ लहि धावहिं असका खेलहु । हस्तिहिंकर जूहे सब पेलहु ॥ जोगर्र्ज पेल होय रण आगे । तस वगमेल करहु संग लागे ॥ हस्ति की जूह आय अंगसारी । हनुमत तबै लँगूर पसारी ॥ जोहिसो सैनं बीच रण आई । सबै लपेट लँगूर चलाई ॥ बहुतक टूट भये नौ खण्डा । बहुतक जायपरे ब्रह्माण्डौ ॥ रात १ चाहना २ बराबरी ३ राख ४ हाथी मस्त ५ हाथी ६ पहलवान ७ सलाहकार ८ लड़ाई ६ फ़ौज १० पल ११ बालि का बेटा १२ हाथी १३ पहिले १४ आसमान १५-२१ ज़मीन १६ हलका १७ मस्त हाथी १८ मुक़ाबिला १६ फ़ौज २० ॥
बहुतक भुवन सोह अत्रीखा। रहे जो लाख भये ते लेखा ॥ दो० बहुतक परे समुद्रमहँ, परत न पावां खोज। जहां गर्व तहँ पीरा, जहां हँसी तहँ रोजै ॥ फिर आगे का देखे राजा। ईश्वर केर घ्रंट रण बाजा ॥ सुना शंख जो विष्णु अपूरा। आगे हनुमत केर लँगूरा ॥ लीन्हें फिरै लोक ब्रह्माण्डा। स्वर्ग पतारलोवा म़तमण्डाँ ॥ बलि बासुकि औ इन्द्रनरेन्दू। राहु नखत सूरज औ चन्दू ॥ जामवन्त दानव राक्षस पूरे। अहंतो बह्न आय रण जुरे ॥ जेहिकर गर्व करत हत राजा। सो सब फिरि बैरी होइ साजा ॥ जहँवां महादेव रण खड़ा। शीश नाय नृप पांयन पड़ा ॥ दो० केहिकारणे रिसकीजिये, हौं सेवक औ चेर। जेहिचाही तेहि दीजिये, बारि गुसाई केर ॥ जब महेश उठ कीन्हवसीठी। पहिले कडू अन्तहोय मीठी ॥ तू गन्ध्रब राजा जग पूजा। गुण चौदह सिख देइको दूजा॥ हीरामन जो तुम्हार परेवां। गा चितौर औ कीन्हेसि सेवा ॥ तेहि बुलाय पूँछौ वह देशू। औ पूँछौ योगिहि जस बेशू ॥ हमरे कहत रोप नहिं मानो। जो वह कहै सोई परमानो ॥ जहां बारितहँ आववर ओका। कर विवाह धर्म बड़ तोका ॥ जौ पहिले मन माननकांधे। परखै रतन गांठ तब बांधे ॥ दो० रतन छिपाये ना छिपै, पारख होय सो पेष। बाल कसौटी दीजिये, कनक कचोरी वेष ॥
१ फिरना २ बीच ३ मगर ३-११ रोना ४ महादेव जी ५-१५ जमीन ६ नाम राजा दैत्य ७ नाम राजी सांप ८ राजा ६-१२ पत्थर १० वास्ते १३ लड़की १४ वकालत १६ जानवर परिन्द १७ यकीन १८ सोने की कटोरी १६॥
१३० पद्मावत । हीरामन जो राजैं सुना । रोषे¹ बुझाय हिये² महँ गुना ॥ आज्ञाभई बोलावहु सोई । पण्डितहूते दोषै³ नहिं होई ॥ एक कहत सहसर्कै⁴ दशधाये । हीरामनहिं वेग लै आये ॥ खोला आगे आन मँजूसाँ⁵ । मिलानिकसिबहुदिनकररूसा॥ अस्तुति करत मिला बहुभांती⁶ । राजैं सुना हिये भइ शांती⁷ ॥ जानौं जरत अगिन जलपरा । होयफुलवाररहस हियभरा ॥ राजैं मिल पूँछी हँस बाता । कसतन पियर वरन मुखराताँ⁸ ॥ दो० चतुरबेदतुम पण्डित, पढ़े शास्त्र वो वेद । कहां चढ़े योगीगढ़, आन कीन्ह घर भेद ॥ हीरामन रसनाँ रस खोला । दैअशीश औ अस्तुति बोला ॥ इन्द्रराज राजेश्वर महा । सुनिहियैं रिसकुछ जाय न कहा॥ पै जो बात होय भल आगे । सेवक निडर कहै रिस लागे ॥ सुवा सुफल अमृत पैखोजा । होय न विक्रमें राजा भोजा ॥ हौं सेवक तुम आदि गुसांई । सेवा करों जियों जब तांई ॥ जो जिव दीन्ह देखावा देशू । सोपै जिय महँ बसै नरेशू ॥ जो वह सँवरै एकै तोहीं । सोई पंख जगत रतिमोहीं ॥ दो० नयन बैन औ श्रवण, सबही तोर प्रसाद । सेवा मोर यही नित, बोलों आशिरबाद ॥ जो अस सेवक जेहि तपँकसा । तेहिक जीभ पै अमृत वसा ॥ तेहिं सेवक कै करमहिं दोषू । सेवा करत करै पतिरोषू ॥ औ जेहिदोष निदोषहिं लागा । सेवक डरा जीव लै भागा ॥ गुस्सा १-१६ दिल २-११ क़सूर ३-१८ हज़ार ४ पिंजरा ५ बहुत तरह ६ तसल्ली ७ लाल ८ चार ६ ज़बान १० राजा विक्रमादित्य १२ सबसे पहिले १३ राजा १४ लालमुँह १५ आँख ज़बान कान १६ मेहनत की १७ बेक़सूर २० ॥
पद्मावत। १३१ जो पक्षी कहवां थिरै रहना। ताकै जहां जाय जो डहनाँ ॥ सप्तदीपँ फिर देखेउँ राजा। जम्बूदीप जाय तब बाजाँ ॥ तहँ चित्तौर देखो गढ़ ऊँचा। ऊँचराज शिर तोपहँ पहुँचा ॥ रतनसेन यह तहां नरेशू। सो आन्यो योगी कर बेशू ॥ दो० सुवासुफल लै आनी, है तेहि गुण मुखरातैं। कयाँ पीत सो तासों, सँवरौं बिक्रम बात ॥ पहिले भयो भाट सत भाखी। पुनि बोला हीरामन साखी ॥ राजा भा निश्चयें मन माना। बांधा रतन छोड़ कै आना ॥ कुल पूँछा चौहान कुलीना। रतन न बांधे होय मलीना ॥ हीरा दशन पान रँग पागी। विहँसत बदन बीजब्रतागी ॥ मुन्द्रा श्रवणँबीन सों चांपे। राजबैनँ उघरे सब झांपे ॥ आना काठर एक तुखारूँ। कहा सुफेरिभयो असवारू ॥ फेरा तुरी छतीसो खुरी। सबहिं बखानी सिंहलपुरी ॥ दो० कुँवर बतीसो लक्षना, सहसैं किरन जस भानैं। काह कसौटी कसिये, कञ्चैन बारह बान ॥ देख सूर्य्य करकमलँ सँयोगू। अस्तँअस्त बोला सबलोगू ॥ मिला सोवंश अंश उजियारा। भाविरोकं औ तिलक सँवारा ॥ अनिरुद्धको जो लिखजयमारा। को मेटै बाणासुर हारा ॥ आज मिलीअनिरुधकहूँ ऊपा। देव इन्द्र दीन्ह शिर दूषा ॥ खड्ग मूर भुइँ सरवरे केवा। वन खंड भँवरहोय रसलेवा ॥ क़ायम १ बाजू २ सातों मुल्क ३ पहुँचा ४ लाल ५ वदन ६ यक़ीन ७ कानकी बाली ८ सरदारी की बातें ६ घोड़ा १०-११ तारीफ़ १२ हज़ार १३ सूर्य्य १४-२० सोनाख़ालिस १५ तथा रतनसेन १६ तथा पद्मावत के लायक़ १७ इष्ट चाह १८ टीका १६ तालाब २१ ॥
१३२ पद्मावत । पच्छिम का बार पूर्बकी बारी । लिखी जो जोरी होयनन्यारी ॥ मानुषसाज लाख मन साजा । सोई होयजो बिधिउपराजा ॥ दो० गये बाजन जो बा जंत, जिय मारण रणमाहँ । फिर बाजन ते बाजे, मंगलचार उनाहँ ॥ बोल गुसाईं कर मैं माना । कहिसोजगतउतरे कहँआना ॥ मानाबोल हर्ष जिव बाढ़ा । औ बिरोकैं भा टीका गाढ़ा ॥ दोनों मिले मनावा भला । पुरुष आप आप कहँ चला ॥ लीन्ह उतारी जो हत योगू । जो तप करै सो पावै भोगू ॥ वह मन चित जो एकै अहा । मार लीन्ह न दूसर कहा ॥ जो अस कोई जिव परछैंवा । देवता आय करहिं तेहिसेवा ॥ दिनदश जीवन जो दुख देखा । भायुगयुगसुख जहानलेखा ॥ दो० रतनसेन का बरनों, पद्मावत कर व्याह । मन्दिरबेगि सँवारो, मन्दिर तोरा छाह ॥ खण्डबाईसवां ब्याह राजारतनसेनऔरपद्मावत ॥ लगन धरी औ रचा बिवाहू । सिंहल निवत फिरा सबकाहू ॥ बाजन बाजे कोटि पचासा । भा आनंद सगरे कैलासा ॥ जेहिदिनकानितदेवमनावा । सोई दिवसे पद्मावत पावा ॥ चांद सूर्य्य मन माथे भागू । औगावहिंसबनखेंत सुहागू ॥ रचरचमाणिकै माड़ौ छावहिं। औभुइँराति १४ बिछावबिछावहिं॥ चन्दन खम्भ रचे चहुँ पांती । माणिकदिया बरहिंदिनराती ॥ घर घर मन्दिर रचे दुवारा । जहँतक नगर गीत झंकारा ॥ . लड़का १ लड़की २ अलग ३ ईश्वरने पैदाकिया ४ जमाव ५ खुशी ६ टीका ७ खेलना ८ तारीफ़ करना ९ जल्द १० दिन ११ तथा सहेलियां १२ जवाहर १३ लाल १४ ॥
पद्मावत । १३३ दो० हाट बाट सब सिंहल, जहाँ देखी तहँ राते । धन रानी पद्मावत, जाकर ऐसि बरात ॥ रतनसेन कहँ कपड़ा आये । हीरा मोति पँदारथ लाये ॥ कुँवर सहसँ संग अहे सभागे । बिनयै करैं राजा पहँ लागे ॥ जेहिलग तुम साधा तप योगू । लेहु राज मानो सुख भोगू ॥ मज्जनें करहु बिभूति उतारो । करो अस्नानचित्रे समसारो ॥ काढ़हु मुन्द्रा फटक अभाऊ । पहिरो कुण्डल कनकॅजड़ाऊ ॥ छोरहु जटा फुलायल लेहू । झारहु केश मुकुट शिरदेहू ॥ काढ़हु कंथौ चिरकुट लावा । पहिरो राता दगला सुहावा ॥ दो० पांवरि तजहु देहुपगपैरी, आवा बांक तुखारं । बांध मौर धरि छत्र शिर, वेगेँ होहु असवार ॥ साजा राजा बाजन बाजे । मदनसहाय दोउदल गाजे ॥ औ राँता सोने रथ साजा । भई बरात गोहेन सब राजा ॥ बाजत गाजत भा असवारा । सब सिंहलने कीन्ह जुहारों ॥ चहुँदिशियश अलखततँरोई । सूरज चढ़ा चांद की ताई ॥ सब दिन तपे जैस हिये माहां । तैसि रात पाई सुख छाहां ॥ ऊपर छत्र राति तस छावा । इन्द्रलोक सब सेवा आवा ॥ आज इन्द्रअप्सर सौं मिला । सब कैलास होहिं सिंहला ॥ दो० धरती स्वर्ग चहुँ दिश, पूररही मशयार । बाजत आवै मंदिर कहँ, होहिं मंगलाचार ॥ पद्मावत धौराहरँ चढ़ी । धौकसरवि जाकहँशशि करी॥ लाल १-१२-१७ हज़ार २ अर्ज़ ३ नहाना ४ तसवीर ५ वाली नाचीज़ ६ सोना ७ गुदड़ी ८ खड़ाऊं ९ घोड़ा १० जल्द ११ साथ १३ सलाम १४: छोटे सितारे १५ दिल १६ इन्द्रलोक की परी १७ आसमान १८ महल २० सूर्य २१ चांद २२ ॥
१३४ पद्मावत । देख बरात सखिनसों कहा। यह महँ कौनसो योगी अहा॥ कैसो योग लै ओरै निवाहा। भयो सूरै चढ़चांद बिवाहा॥ कौन सिद्धसो ऐसो अकेला। जे शिर लाय प्रेमसो खेला॥ कासों पिता बचन असहारी। उतरै न दीन्हदीन्हतेहि वौरी॥ काकहँ दई ऐसो जिव दीन्हा। जे जिहमार जीत रण लीन्हा॥ धन पूरुष अस नवै न नाये। औसैं परसहो देश पराये॥ दो० को बरबन्द वीर अस, मोहिं देखे कर चावँ। पुनिजायहिजनवासहि, सखीरी वेगैं देखाव॥ सखी देखावहिं चमकहिं वाहू। तू जसचांद सूर्य्य तोरनाहूँ॥ छिपा न रहै सूर्य्य परकाशू। देखकमलमन भयो विकाशू॥ वह उजियार जगत उपराहीं। जगउजियारसो तेहिपरछाहीं॥ जस रवि११. देखउठै परभातों। उठा छत्र देखहिं सब राता॥ वही मांझ भा दूलह सोई। और बरात संग सब कोई॥ सहसैंहिं१३ किरणरूपविधि१४ गढ़ा। सोने के रथ आवै चढ़ा॥ मन माथे दरशन उजियारा। सौंहैं निरखनहिंजायनिहारा॥ दो० रूपवन्त जस दरपण, धन तू जाकर कन्त। चाही जैसो मनोहरा, मिलासो मनभावन्त॥ देखा चांद सूर्य्य जस साजा। सहसैंहिं भावमदैनतनगाजा॥ हुलसे नयन दरश मदमाते। हुलसे अधरैं रंग रस राते॥ हुलसा बदनै ऊपररवि२० आई। हुलसाहियों कंचुकि२२ नसमाई॥ हुलसे कुंचैं कसनी बँद टूटी। हुलसेभुजबैलियों कर फूटी॥ आखिरतक १ सूर्य्य २-११-२० जवाब ३ लड़की ४ इतमीनान ५ ज़बर्दस्त ६ चाह ७ जल्द ८ ख़ाविन्द ९ खिलना १० भोर १२ हज़ार १३- १६ ईश्वर १४ सामने देखना १५ काम पैदा हुआ १७ होंठ १८ मुँह १६ दिल २१ अँगिया २२ छाती २३ चूड़ी २४॥
पद्मावत। १३५ हुलसी लंक कि रावण राजू। रामलषणदर्र साजहिं साजू ॥ आज चांद घर आवा सूरू। आज श्रृंगारहोय सब चूरू ॥ आज कटकै जो राहत कामू। आज विरहकरहोय संग्रामू ॥ दो० अंग अंग सब हुलसैं, कोइ कतहूँ न समाय। ठांवहिं ठांव विमोही, गइ मुरछा गत आय॥ सखी सँभार पियावहिं पानी। राजकुँवरि काहे कुँभिलानी ॥ हमतो तोहिं देखावा पीव। तू मुरझान कैस भा जीव ॥ सुनहु सखी सब कहै विवाहू। मोकहँ जैसो चांद कहँ राहू ॥ तुम जानहु आवै पिउ साजा। यह धमधम मोकहँ सब बाजा ॥ जते बराती औ असवारा। यह सब मोरे चालनहारा ॥ सो आगमँ देखत हों भली। आपन रहन न देखों सखी ॥ होय विवाह पुनि होयहै गौना। गवनवतहां बहुरि नहिं अवना ॥ दो० अब सो मिलन कितहै सखी, परा विछोवा टूट। तैसि गांठ पिउ जोरब, जन्म न होय है छूट ॥ आय बजावत बैठ बराता। पान फूल सेंदुर सब राताँ ॥ जहाँ सोने कर चित्र सँवारी। आन बरात तहां बैठारी ॥ माझ सिंहासन पाट सँवारा। दूलह आन तहां बैठारा ॥ कनकके खंभ लागे चहुँ पांती। माणिकै दिया बरहि दिनराती ॥ भयो अचल धुवै योग पखेरू। फूलबैठ थिरै जैस सुमेरू ॥ आज दई हों कीन्ह सुभागा। जस दुख कीन्ह नेग सब लागा ॥ आज सूर शशिके घरआवा। चांद सूर्य दुहुँ भयो मिलावा ॥ फ़ौज १-३ सूर्य २-१६ लड़ाई ४ दूरअंदेशी ५ लौटके ६ लाल ७ तस- वीर ८ बीचोबीच ६ तख्त १० सोना ११ जवाहिरात १२ नाम नखत जिसे कुतुब कहते हैं १३ क़ायम १४ नामपहाड़ १५ चाँद १७ ॥
९३६ पद्मावत । दो० आज इन्द्रहोय आयोँ, मैं बरात कैलाश १ आज मिली मोहिं अप्सरा, पूजी मन की आश ॥ होय लाग ज्योनार पसारा। कनक पत्र परसे पनवारा ॥ सोन थार मणि माणिक जरे। राये रङ्क सब आगे धरे ॥ रतन जड़ाऊ खोरौखोरी। जन जन आगे सौ सौ जोरी ॥ गडुवन हीरे पदारथ लागे। देख विमोहे पुरुष सभागे ॥ जानहुँ नखत करहिं उजियारा। छिप गये दीपक औ मसयारा ॥ भइमिल चाँद सूर्य की कला। भा उदोत तैसी निरमला ॥ जेहिं मानुष कहँ ज्योति न होती। तेहि भइ ज्योति देख वह ज्योती ॥ दो० पांति पांति सब बैठी, भांति भांति ज्योनार । कनक पत्र दोने तरे, कनक पत्र पनवार ॥ पहिले भात परोसे आना। जनहुँ सुवास कपूर बसाना ॥ बालहिं माड़ा औ घी पोई। उजियर देख पाप गयो धोई ॥ लुचई पूरी सुहारी पूरी। एक तो ताती औ सुठ कँवरी ॥ खंडरा खांड़ जो खण्डे खण्डे। बरी अकोतर सो कहँ हण्डे ॥ पुनि सँधाने आने बहु सांधी। दूध दही कि सुरन्दों बांधी ॥ पुनि बांवन प्रकार जो आये। नहिं अस देख न कबहूँ खाये ॥ पुनि जाँवरे पीफावरे आई। घृत खांड़ का कहौं मिठाई ॥ दो० जेवँत अधिक सुवासिक, मुहँ महँ परत विलाय । सहसै स्वाद सो पावै, एक कौर जो खाय ॥ जेवन आवा बीन न बाजा। बिनु बाजहिं नहिं जेवैं राजा॥ इन्द्रपुरी १ सोना २-८ राजाको भाई ३ कटोरा कटोरी ४ रोशनी ५ साफ़ ६ रौनक़ ७ बारीक माड़ी ६ एक क़िस्म का खाना १० अचार बहुत तरह का ११ लड्डुवा १२ खीर १३ मुरब्बा १४ हज़ार १५ ॥
सब कुँवरन पुनि खैंचा हाथू। ठाकुर जेवैं तो जेवैं साथू ॥ बिनय करहिं पण्डित बिचवाना। काहे नहिं जेवहिं यजमाना॥ वह कैलास इन्द्र कर बासू। जहां न अन्न न माछर मांसू ॥ पान फूल ओछी सब कोई। तुमकारणे यह कीन्ह रसोई ॥ भूख तर्जन १ अमृत है सूखा। धूपतो सीरकैं २ नींबी रूखा ॥ नींदतो सुइँ जनु सेज सैपेती ३। छांड़ो का चतुराई येती ॥ दो० कौन काज केहि कारण, बिकल भयो यजमान। होय रजायसुं ४ सोई, बेगि देहिं हम आन ॥ तुम पण्डित जानहु सब भेदू। पहिले नाद भयो तब बेदू ॥ आदि पिता ५ जो बिधि अवतारा। नादसंग जिवं ज्ञान सँचारा ॥ सो तुम बरजै नेकका कीन्हा। जेवन संग भोग बिधि दीन्हा ॥ नयनैं बैन नासक दुइश्रवना। यहिचारहुँ सँग जेवनश्रवना॥ जेवन देखा नयन सिरानी। जीभहिस्वादमुकै रसजानी ॥ नासक सबै बासना पाई। श्रवनहिका सँवरत पहुनाई ॥ तेहिं का होय नाद पै पोषौ १०। तब चारहुँ कर होय सँतोषौ ॥ दो० औ सब सुनहुँ शब्द इक, जिनहिं पड़ा कुछ सूझ। नाद सुननि पण्डित बरज, कहो सो तुमकाबूझ ॥ राजा उतरै सुनहु अब सोई। महि १७ डोलै जो बेद न होई ॥ नाद वेद मर्द पैंड़े २० जो बारी। काँयों महँते लेहु बिचारी ॥ नाद हिये २२ मन उपजी कायौं। जहँमदतहां पैंड़े नहिं छाया ॥ खुराक १-१३ वास्ते २ छोड़ना ३ ठण्डा रहे धूप लगने पर भी ४ सफ़ेद बिछौना ५ हुक्म ६ जल्द ७ ब्रह्मा ८ ईश्वर ६ बदन में जानआई १० रोक ११ आंख मुँह नाक कान १२ आसुदगी १४ क़रार १५ बात १६ जवाब १७ ज़मीन १८ मस्ती १६ शरीयत २०-२४ चदन २१-२३ दिल २२ ॥
An exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
१३८ पद्मावत। होय अनमद जूझ सो करिये। जान वेद आंकुश शिरधरिये॥ योगी होय नाद सो सुना। जेहि सुनि कामजरै चौगुना॥ किये जो परसै तन्त मनलांवा। घूम सांत सुनि और न भांवा॥ गये जो धर्म्म पन्थ है राजा। ताकहँ पुनि जो सुनै तो बाजाँ॥ दो० जस मदपियें घूम कोउ, नाद सुनै पै घूम। तेहिते बरजे नेकहै, चढ़ै रहसें के दूम॥ भई ज्योनाार फिरा खड़वाँनी। फिरा अरगंजा कुहकहँवानी॥ फेरे पान फिरा सब कोई। लाग्यो व्याहचार सब होई॥ माड़ो सोन कि गगन सँवारा। वन्दनवार लाग सब बाराँ॥ सजा पार्ट छत्र के छाहां। रतनै चौक पूरी तेहि मांहां॥ कंचने कलश नीर भरिधरा। इन्द्रे पास आनी अपसरों॥ गांठ दुलहिन दूलहकी जोरी। दुहूँ जगत जो जाय न छोरी॥ वेद पढ़ै पण्डित तेहि ठाऊँ। कन्या तुला राशि लै नाऊँ॥ दो० चांद सूर्य दोउ निरमलै, दोउसे योग अनूप। सूर्य चाँद सो मूला, चांद सूर्य के रूप॥ दोहूँ नाउँ लै गावहिं वारी। करहिं सो पद्मिनी मंगलचारा॥ चाँद के हाथ दीन्ह जयमाला। चांद आन सूर्य गरेँ घाला॥ सूरज लीन्ह चांद पहिराई। हार नखतै नेरहिं सो पाई॥ पुनि धनै भर अंजुल जल लीन्हा। यौवन जन्म कंत कहँ दीन्हा॥ कन्त लीन्ह दीन्हों धन हाथा। जोरी गांठ दुहूँ इक साथा॥ १ मेहनत २ राह ३ तारीफ़ ३ राग सुननेसे दूनी कैफ़ियत होती है ४ शरबत ५ अतर ६ आसमान ७ दरवाज़ा ८ तख़्त ६ जवाहिरात १० सोना ११ पानी १२ तथा राजा १३-१७ तथा पद्मावत १४-१८ पाकसाफ़ १५ मिलना १६ लड़की १६ पद्मावत २०-२४ सूरय तथा रतनसेन २१ गरदन २२ तथा सहेलियां २३॥
चांद सूर्य्य दुइ भांवर लीन्हीं। नखतमोत न्योछावर कीन्हीं॥ फिरहिं दोउ सतफेर गुंते के। सातहिं फेर गांठ सो एके ॥ दो० भइ भांवर न्योछावर, राजचार सब कीन्ह । दायज कहूं कहांलग, लिख न जाय ततदीन्ह ॥ रतनसेन जो दायज पावा। गन्ध्रवसेन आय कंठलावा ॥ मानुषचिन्तआनकुछ निन्ता। करै गुसांइन मनमहँ चिन्ता ॥ अब तुम सिंहलद्वीप गुंसाई। हम सेवक आहें सेवकाई ॥ जस चितोरगढ तुम्हरो देशू। तस तुम यहां हमार नरेंगू ॥ जम्बू दीप दूरका काजू । सिंहलद्वीप करहु नित राजू ॥ रतनसेन बिनवौं करजोरी । अस्तुति योग जीभकहँ मोरी ॥ तुम गुसाँई जे छारै छुडाई। की मानुष अति दीन्ह बड़ाई ॥ दो० जो तुम दीन्ह सो पावा, जिवों जन्मसुखभोग । नाहत खेहँ पाय कीं, हों योगी केहि योग ॥ धौराहर पर दीन्हा वासू । सात खण्ड जहँवां कैलासू ॥ सखी सहसँ दश सेवा पाई। जनहुँ चांदसँग नखततराई ॥ हेममंडल शशिके चहुँ पासा। शशि सूरैंहिले चढ़ी अकासा॥ चलसूरज दिन अथवै जहां । शशिनिरमलै तू पावसितहां ॥ गन्ध्रवसेन धौराहेर कीन्हा। दीन्हनराजहियोगिहिदीन्हा॥ मिलीजाहिंशशिके चहुँपाहां । सूर्य्य न चापै पावै बाहां ॥ अब योगी गुरु पायो सोई। उतरा योग भस्म गा धोई ॥ दो० सातखण्ड धौराहेरै, सात रंग नग लाग । गोतवाले १ राजा २ अर्ज़ करना हाथ जोड़के ३ धूर ४-५ महल ६- १२-१५ हज़ार ७ छोटे सितारे ८ पद्मावंत ६ रतनसेन १० साफ़ ११ चाँद तथा पद्मावंत १३ तथा राजा ख़िलवत न करसका १४ ॥
१४० पद्मावत । देखतका कैलासहिं, दृष्टिपाप सब भाग ॥ सातखण्ड सातों कैलासा । काबरणौं जस उत्तम बासा ॥ हीरा ईंट कपूर गिलावा । मलयागिरि ३ चन्दनसबलावा ॥ चूनाकीन्ह ओट गजमोती । मोतिहिचाह ४ अधिकतेहिज्योती ॥ बिश्वकर्महिं सैं हाथ सँवारा । सात खण्ड सातहिं चौपारा ॥ अतिनिरमलैं नहिंजायविशेखा । जसदरपनमहँदरशनदेखा ॥ भुइँ गच जनहुँ समुद्र हिलोरा । कनक ५ खम्भ जनुरचोहिंडोरा ॥ रतनपदार्थे होय उजियारा । भूले दीपक औ मसियारा ॥ दो० तहँ अप्सर पद्मावत, रतनसेन के पास । सातस्वर्ग हाथजनु आये, औसातों कैलास॥ पुनि तहँ रतनसेन पगधारा । जहां रतननौ सेज सँवारा ॥ पुतरी गढ़ गढ़ खम्भनकाढ़ी । जनु सजीव सेवा सब ठाढ़ी ॥ काहू हाथ चन्दन की खोरी । कोइ सेंदुर कोइ गहे सिंघौरी ॥ कोइ कुंकहि केसर लिये रहें । लावै अंगें रहस जनु चहें ॥ कोई लिये कुंकुमा चोवा । धन कब चहै ठाढ़मुखजोवौं ॥ कोइ बीरा कोइ लीन्हे बीरी । कोइपरमलअतिसुगंधसैंमीरी ॥ काहु हाथ कस्तूरी मेदू १३ । भांतिहिभांति लागसब भेदू ॥ दो० पांतिहि पांति चहूँ दिश, सब सोंधी करहाट । मांझै रचा इन्द्रासन, पद्मावत कहँ पौर्ट ॥ खण्ड तेईसवां मुलाक़ात पद्मावत वा राजा रतनसेन ॥ सात खण्ड ऊपर कैलासू । तहँवाँ नारसेज सुख साजू ॥ १ निगाह २ तारीफ़ २ चन्दन ३ ज्यादा ४ पाकसाफ़ ५ सोना ६ जवाहि- रात ७ आसमान ८ कटोरी ६ चंदन १० देखना ११ हवा १२ मुश्क १३ अम्बर १४ बीचोंबीच १५ तख़्त १६ ॥
[Header] पद्मावत। १४१ चार खम्भ चारहुँदिश धरे। हीरा रतन १ पदारथ जरे॥ माणिकै दिया जड़े औ मोती। होय उजियार रहा तेहिज्योती॥ ऊपर रातोँ चंदवा छावा। औ मुँइसुरँग विछावत्रिविछीवा॥ तेहिमहँ पलँग सेज सुखदासी। कीन्हेविछावन फूलहिवासी ॥ दोहुँदिश गेंदवा औगल सोई। कांची पार्ट भरी धुन रोई॥ फूलहिं भरे ऐसो केहि योगू। को तहँ पौढ़ मानरस भोगू ॥ दो० अतिसुकमार सेज सो डाँसी, छुवै न पावै कोय। देखत नवै खनहिं खन, पांव धरत रिस होय ॥ राज तपत सेज जो पाई। गाँठ छोरि धन सखिन छिपाइ॥ अह्रै कुँवर हमरे अस चारु। आजुकुँवरकर करब शिंगारू ॥ हरद उतारि चढ़ावव रंगू। तब निशि० चांद सूर्य्य सो संगू ॥ जनु चातकै मुख बूँद सेवाती। राजा चकचौहत तेहिभांती ॥ योग छूटि जनु अपसर साथा। योग हाथकर भयो बिहाथा ॥ वै चतुरों कर लै अपनैसई। मित्र अमोल छीन लैगई ॥ बैठा खोय जरी औ बूटी। लाभ न पाव मूल भइ टूटी ॥ दो० खाय रहा ठग लाडू, तन्त मन्त बुधि खोय। धौराहरे बनखंडेँ भयो, ना हँसि आव न रोय॥ अस तप करतभयो दिनभारी। चार पहर बीते युग चारी ॥ परीसांझ पुनि सखी सो आई। चांद रहा अपनी जो तराई ॥ पूँछहिं गुरु कहारे चेला। विनशेशि रेकस सूर अकेला॥ धात कमाय सिखे तूँ योगी। अबकसजसनिरधातबियोगी ॥ चारोतरफ १ जवाहिरात २-३ लाल ४- तकिया ५ रेशम ६ बिछौना ७ पद्मावत ८ रस्म ६ रात १० पपीहा ११ होशियारी १२ छिपजाना १३ महल १४ जंगल १५ छोटे नखत १६ चांद १७ सूर्य १८ दुखी १६ ॥ ...
१४२ पद्मावत । कहां सो खोयहु बिरवा लोना। जेहिते होय रूप औ सोना ॥ कसं हतार पार नहिं पावा। गंधक कहां करकटो खावा ॥ कहां छिपायहु चंद हमारा। जेहिबिन रयनि जगत अँधियारा॥ दो० नयन कौड़िया हियैं समुद्र, गुरू सो तेहिम हँ ज्योति । मन मराजिया न होय परे, हाथ न आवै मोति ॥ का पूँछौ तुम धात निछोही । गुरुजो कीन्ह अंतरपेंट ओही॥ सिधि गुटका जो मोसों कहा। भयो रांग सत हिये न रहा। सोन रूप जासों दुख खोलों। गयो भरोस तहां का बोलों ॥ जहँ लोना बिरवा की जाती। कहिको संदेश आनको पाती॥ कि जो पार हरतार करेजे। गन्धक देख अमहिं जिव दीजे ॥ तुम जोरा की सूरँ मयंकू । पुनि विछोय सो लीन्ह कलंकू॥ जो यहि घड़ी मिलावै मोही। शीश देउँ बलिहारी ओही ॥ दो० होय अबरक इंगुर हुआ, फेर अगिन महँ दीन्ह । काया पीतर होय कनकें, जो तुम चाहो कीन्ह॥ का विसाय जो गुरु असबूझा। चकाव्यूहैं अभिमनै ज्यों जूझा॥ बिष जो दीन्ह अमृत देखराई। तेहिरे निछोहैं को पतियाई॥ मरै सुजान होय तन सूना। पीर न जानै पीर बिहूनों ॥ पार न पाव जो गन्धक पिया। सो हरतार कहो किमजिया॥ हम सिधिगुटका जानहिंनाहीं। कौन धात पूँछहु तेहि पाहीं ॥ अब तेहि बाजैं रंगभां डोलों। होय सांर तो बैंरगी बोलों ॥ अबरक कै तन इंगुर कीन्हा। सो तन फेर अगिन महँ दीन्हा॥ जोड़ना १ रात २ दिल ३ बेदर्द ४ छिपाना ५ कलेजा ६ सूर्य ७ चांद ८ बदन ६ सोना १० नांम क़िला ११ बेटा अर्जुन १२ बेदर्द १३ अलग १४ बिदून उसके १५ फ़ौलाद १६ तिपतिया १७ ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:
पद्मावत। १४३ दो० मिल जो प्रीतम बिछुरहि, काया अगिन जराय । कैसु मिलै तन तप बुझै, कै अब मोहि बुझाय ॥ सुनि के बात सखी सब हँसीं । जानहुँ रयनि तरैँ परगँसी ॥ अब सो चांद गगन महँ छिपा । लाल चकै कित पावस तर्पा ॥ हमहुँ न जाने धौं सो कहां। कर खोज औ बिनवबँ तहां ॥ औ अस कहब आहि परदेशी । कर मार्या हत्या जन लेशी ॥ पीर तुम्हार सुनत भा छोहू । देव मनाय होय अस ओह ॥ तूँ योगी तप कर मन जीता । योगिहि कौन राज की कथा ॥ वह रानी जहँवाँ सुख राजू । बारह अभरण करै सो साजू ॥ दो० योगी ह्वै आसन कर, इस्थिर धरम न ठांव । जो न सुने तौ अब सुनि, बारह अभरण नांव ॥ प्रथमहि मज्जन होय शरीरू । पुनि पहिरै तन चंदन चीरू ॥ साज मांग शिर सेंदुर सारा । पुनि ललाट रचि तिलक सँवारा ॥ पुनि अंजन दोउ नयनहि करे । पुनि सो कानन कुण्डल पहरे ॥ पुनि नासक झल फूल अमोला । पुनि रातौ मुख खाय तमोला ॥ गयें अभरण पहिरे जहँ ताई । औ पहिरे कर कँगन कलाई ॥ कटि क्षुद्रावल अभरण पूरा । पांयन पहिरे पायलें चूरा ॥ बारह अभरण यही बखाने । ते पहिरे बारहूँ अस्थाने ॥ दो० पुनि सोरहों शिंगार जस, चारहुँ योग कुलीन । दीर्घ चार चार लघु, चार शुभैं चहुँखीन ॥ पद्मावत जो सँवारी लीन्हा । पून्यो रात दई शशिकरीन्हा ॥
पाद-टिप्पणी (शब्दार्थ): १ बदन १ रात २ छोटे नखत ३ खिलना ४ आसमान ५ योगी ६ अर्ज़ करना ७ मेहरवानी ८-६ जेवर १० मज़बूत ११ क़ायम १२ पहिले १३ नहाना १४ लाल १५ गरदन १६ हाथ १७ कमर १८ करधनी १६ पांजेब वा छुड़े २० बड़े २१ छोटे २२ मोटे २३ पतला २४ पूरनमासी २५ ॥
१४४ पद्मावत । करिमज्जनं १ तन कीन्ह नहानू । पहिरो चीर गयो छिप भानू २ ॥ रचि पत्रावलै ३ मांग सेंदूरी । भरिमोतिन औ माणिकैं पूरी ॥ चंदन चीर पहिर बहु भांती । मेघ घटा जानहुँ बकें ४ पांती ॥ श्री जो रतन मांग बैठारा । जानहुँ गगनैं ६ टूटिनिशि ७ तारा ॥ तिलक ललाट ८ धरातस दीठा । जनहुँ दुइज पर नखत न बैठा ॥ कानन कुंडल खूँट ९ औ खूँटी १० । जानहुँ परी केंचीची ११ टूटी ॥ दो० पहिर जड़ाउ ठाढ़ भइ, कहि न जाय तस भाव । मानहुँ दरपन गगनैं भा, तो शशि १२ तार देखाव ॥ बांक नयन औ अञ्जन रेखा । खंजनै १४ जानु शरदऋतु देखा ॥ जो जो हेरै १५ फेर चषै १६ मोरी । लरै शरद महँ खंजन जोरी ॥ भौंहैं धनुष धनुष पै हारा । नयन सांध जनु बाएन मारा ॥ करनफूल नासक अतिशोभा । शशि १२ मुख आय सूक जनु लोभा ॥ सुरंग अधर १७ औ लीन्ह तँवोरा । सोहै पान फूल कर जोरा ॥ कुसुम गेंद अस सुरंग कपोलों । तेहि पर अलकैं भुवंगिनैं डोला ॥ तिल कपोल अल पंकज बैठा । वेधा सोई जो वह तिल दीठा ॥ दो० देख शिंगार अनूपै २२ विधि, विरह चला तब भाग । कालकष्ट वह उनवा, सब मोरे जिय लाग ॥ का बरणों अभरणैं २३ औ हारा । शशि पहिरे नखतन की मारा ॥ चीर चार औ चन्दन चोला । हीर हार नग लाग अमोला ॥ तेहिं झांपी रोमावल कारी । नागिनि रूप डंसी हत्यारी ॥ कुचैं २४ कंचुकी २५ श्रीफल उभे । हुलसहिं चहहिं कंत हिय चुभे ॥ उबटन १ सूर्य २ नामदाया ३ बगुल ४ टीका ५ आसमान ६ ७-१३ रात ८ माथा ९ बाली १० करनफूल ११ नाम छोटे नखत १२ चांद १४-१९ ममोला १५ देखना १६ आंख १७ होंठ १८ गाल २० बाल २१ नागिन २२ बेमिसाल २३ ज़ेवर २४ छाती २५ अँगिया २६ ॥
बाहहिं बाहू ताड़ै सलोनी । डोलत बांह आवगत लोनी ॥ तरवन कमलंकली जनु बांधे । बसौ लंक जानहु दुइ आधे ॥ छुद्रघंट कटि कंचन बागा । चलते उठहिं छतीसो रागा ॥ दो० चूँरा पायल अनवट बिछिया पांयनपरी बियोगें । हिये लायटुकहमकहसमंदै नहिंतुमजानअौभोग ॥ अस बारह सोरह धने साजी । छाजनै और बहीपै छाजी ॥ विनवहिंसखी गहेरैका कीजे । जें जिवदीन्ह ताहिजिवदीजे ॥ सँवरि सेज धन मन भइ शंका । ठाढ़ तेवान टेक कर लंकाँ ॥ अनचिन्हा पियकांपोंमनमाहां । का मैं कहब गहैब जो बाहां ॥ वारि वैसगइ प्रीति न जानी । तरुणे भई मै मन्ते भुलानी ॥ यौवनगर्व न कुछ मैं चेता । नेह न जानु श्याम के सेता ॥ अब जो कंत पूँछहि सब बाता । कस मुख होय पीत कै राताँ ॥ दो० हों सुवारि औ दुलहिन, पियसो तरुणै औ तेज । नाजानों कस होय है, चढ़त कन्त की सेज ॥ सुनि धनडर हिरदय तब ताईं । जौलहिरहस मिलानहिंसाईं ॥ कौन कली जो भँवरन राई । डारन टूटि पहुँपै गरुवाई ॥ मात पिता जो व्याहे सोई । जन्म निवाह कंत सँग होई ॥ भरे यमवार चहै जहँ रहा । जाय न मेटा ताकर कहा ॥ ताकहँ बिलंब न कीजे वारी । जो पिय आयसु सोइ पियारी ॥ चलहुवेगि आयसु भा जैसे । कन्त बोलावे रहै सो कैसे ॥ मान न कर थोरा कर लाडू । मान करत रस मानै चाँडू ॥ :: नाम जेवर १-२-८-६ खूबसूरत ३ भँवर ४ कमर ५-७-१६ करंधनी ६ दुखी १० दिल ११ मुलाकात १२ पद्मावत १३ सोहना १४ देर १५ पकड़ना १७ जवान १८-२३ मस्त १६ जवानो का गरूर २० काला या सफेद २१ लाल २२ फूल २४ मरनेके दमतक २५ हुक्म २६ जल्द २७ गुस्सा २८ ॥