पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
२३४ पद्मावत । दो० बरनों नारि जहां लग, दृष्टि झरोखें आय । और जो अहै अदृष्टिधन, सो मोहिं वरनिन जाय ॥ काधन कहौं जैसो सुकुमारा । फूलके छुये होय बिकरारा ॥ पखुरी काढैं फूलत सेती । सोई डांसी सोरै सपेती ॥ फूल समूचा रहै जो पांवा । व्याकुल होय नींदन हिं आवा ॥ सहै न क्षीरैं खांड़ औ घीव । पान अधार रहै तन जीव ॥ नस पानन की काढैं हेरी । अधरनं गड़ै फांस वहकेरी ॥ मकरिक तार ताहिकर चीरू । सोपहिरे जरजाय शरीरू ॥ पालँग पांव कि आछे पाटी । नेतें बिछाय चलै जो बाटी ॥ दो० कहां नयन जो राखौं, पलक न लाऊँ ओट । प्रेमक लुब्धौं पावै, काहि सो बड़ का छोट ॥ जो राघव धन वरन सुनाई । सुना शाह मुरछा गत आई ॥ जनु मूरति वह परगट भई । दरश देखाय ताहि छिपगई ॥ जो जो मंदिर पद्मिनी लेखे । सुना सोकमल कुमुदें जो देखे ॥ होय मालती धैन चित पैठी । और पुहुपें कोइ आव न दीठी ॥ मन होय भँवर भयो वैरागा । कमल छांड़ि चित और न लागा॥ चांदकी रङ्ग सूर्य्य जस राता । और नखत सो पूँछन बाता ॥ तब आलि अलाउद्दीन जगसूरू । लेऊँ नारि चित्तौर कै चूरू ॥ दो० जो वह मालति मानसर, अलिर्न मँ लीन्हीं जात । चित्तौर महँ जो पद्मिनी, फेरवही कहु बात ॥ ये जगसूरै कहूँ तुम पाहां । और पांच नग चितौर माहां ॥ नज़र १ नज़र में नहीं २ विछाना ३ बिछौना ४ दूध ५ होंठ ६ कपड़ा ७ बदन ८ तख्त ९ ज़ेरअन्दाज़ १० आशिक़ ११ ज़ाहिर १२ कोंकावेली १३ पद्मावत १४ फूल १५ लाल १६ भँवर १७-१६ सूर्य्य १८-२१ ताम्बुल २० ॥
पद्मावत । २३५ एक हंस है पंख अमोला। मोती चुनै पदारथे बोला ॥ दूसर नग जो अमृत बसा। सब बिष हरै जहांलग डसा ॥ तीसर पाहनपरस बखाना। लोहछुये होय कञ्चन बाना ॥ चौथ अहै सांदूर अहेरी। जेहि बन हस्ति धरै सब घेरी ॥ पांचों है सो तहां लागना। राजपंख पंखी गरजना ॥ हरनिरोझ कोइ बाचन भागा। जैस शचान तैस उड़भागा ॥ दो० नग अमोल अस पांचों, मान समुद्र वह दीन्ह । इसकन्दर नहिं पाई, जोरे समुद्र धस लीन्ह ॥ पान दीन्ह राघव पहिरावा। दश गजमत्त घोर सो पावा॥ अरु दूसरि कङ्कन की जोरी। रतनजोलागवह तीसकरोरी॥ लाख दिनारे देवाई जेवों। दारिद हरा समुद्रकी सेवों ॥ हों जेहि दिवसै पद्मिनी पाऊँ । तोहि राघव चित्तौर बैठाऊँ ॥ पहिले कर पांचों नग मूठी। सोनगलेउँजोकनकें अँगूठी ॥ सुरजा वीर पुरुप बरयारू। नाजनै नाग सिंह असवारू॥ दीन्हपत्रिलिख बेगैं चलावा। चित्तौरगढ़ राजापहँ आवा ॥ दो० राजैं पत्रि बँचावा, किरपा लिखी अनेक । सिंहलकी जो पद्मिनी, पठैदेव तेहि बेग ॥ खण्डचौंतीसवां लड़ाई राजा और बादशाह ॥ सुन अस लिखा उठाजर राजा। जौं नौदैवतड़प घनै गाजौं ॥ का मोहिं सिंह देखावस आई। कहौं तो शार्दूलै धरखाई ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes): लाल १ पारसपत्थर २ सोना-३ शेरसुर्ख ४-२३ हाथी ५ सीमुर्ग ६ नाम जानवर ७ शिकरा ८ खिलअत ६ हाथीमस्त १० अशरफ़ी ११ दक्षिणा १२ ख़िदमत १३ दिन १४ राजपर बैठाऊँ १५ सोना १६ ज़बरदस्त १७ कोड़ा १८ जल्द १६ मेहरबानी २० बादल २१ बिजली २२ ॥
२३६ पदमावत । भलहिंजोशाहभूमिपति भारी । मांग न कोऊपुरुपकी नारी ॥ जो सो चक्रवे ताकहँ राजू । मन्दिरै एकअपनकहँ सांजू ॥ अपसरैं जहां इन्द्र पै आवै । और जो सुनै न देखै पावै ॥ कंसका राजजिता जो गोपी । कान्हेन दीन्ह काहुँकहँगोपी ॥ को म्वहिंते अस शूर अगारा । चढ़ै स्वर्ग घुसपरै पतारा ॥ दो० का तोहिं जीव मराऊं, सकत आनका दोष । जोतसईभैनसमुद्रजल, सोझुझाय कितओस ॥ राजा अस न होहु रिसरातौं । सुनहुन जूड़ नजरकहुबाता ॥ मैं हों यहां मरे कहँ आवा । बादशाह अस जानपठावा ॥ जोतोहिभारनऔरहिलीन्हा। पुनिसोकाले उतरैबहिदीन्हा॥ बादशाह कहँ ऐस न बोलू । चढ़े तौ परै जगत महँ डोलू ॥ सूरैहि चढ़त लांग नहिं वारा । दहक आग तेहि स्वर्गपतारा ॥ परबत उड़हिं सूरैके फूकें । यहिगढ क्षारैहोइ यक झोंकें ॥ धसै सुमेरुँ समुद्र गा पाटा । भूमी डोल शेष फण फाटा ॥ दो० तासों कौन लड़ाई, बैठ न चितौर खास । ऊपर लेहु चंदेरी, का पश्मिन इक दास ॥ जो पै धेरनि जाय घरकेरी । का चितौर का राज चंदेरी ॥ जेईलेई घर कारने कोई । सो घरदेई जो योगी होई ॥ रनथंभोरैं हों नाथ हमीरूँ । कल्पै माथ जे दीन्ह शरीरूँ ॥ होंसो रतनसेन शकबँधी । राहुँ वेध जीते सरवन्धी ॥ ज़मीन का मालिक १ तमाम दुनिया का राजा २ क़िला ३ परी ४ श्रीकृष्णचन्द्र५शूरमा ६ आसमान ७ पाप८ प्यासबुझे६ लाल १० दुश्मन११ अंचाव १२ सूर्य १३ नामराजा १४ धूर १५ नामपहाड़ १६ ज़मीन १७ कौ- रंत १८ जो कोई किसी की औरत लैले १६ नामक़िला २० नामराजा २१ शिरकटाना २२ बदन २३ मशहूर २४ निशानाजीत द्रौपदी व्याही २५ ॥
| पद्मावत । २३७ हनुमतसरसें भारें जें कांधा । राघवँ सम समुंद्र जें बांधा ॥ बिक्रमें सरस कीन्ह जें शाका । सिंहलदीप लीन्ह जो ताका॥ जो अस लिखा भयो नहिं ओछा । जियत सिंहकी गहि को मोछा॥ दो० द्रब्यलेइ तो मानौं, सेवक करौं गहि पांव । चाहै नारी पद्मिनी, सिंहलदीपहि जांव ॥ बोलन राजा आप जनौई । लीन्ह उदयगिरि और छितौई ॥ सप्तद्बीपे राजा शिर नावहिं । सेना चली पद्मिनी आवहिं ॥ जाकर सेव करै संसारा । सिंहलदीप लेत कित बारा ॥ जनि जाने सियह गांढ़ तोपाहीं । ताकर सबै तोर कुछ नाहीं ॥ जेहि दिन आय गढ़ीको छैकी । सरबसै लेइ हाथ को टेकी ॥ शीशें भार खेहैं के लागे । सो शिरफार होय दुख आगे ॥ सेवाकर जु जियन तोहिं भाई । नाहित फेर माखें होय जाई ॥ दो० जाकर जीव दीन्ह पै, अगमर्न शीशँ जोहारि । तेहि करेंगे सब जानै, काह पुरुष का नारि ॥ तुरुकें जायकहि मरै न धाई । हो ये इसकन्दरँ की नाई ॥ सुन अमृत कजैलिवन धावा । हाथ न चढ़ा रहा पछतावा ॥ औ तेहि दीप पतंगें होय परा । अगनी भाड़ पांव दै जरा ॥ धर्ती लोह स्वर्ग भा तांबा । जीवदीन्ह पहुँचत करै लांबा ॥ यह चितौरगढ़ सोइ पहारू । मूरै उठै होय दहक अँगारू ॥ जैबर इसकन्दरें सरकीन्हीं । समुद्र लियो धसजसवेलीन्हीं ॥ : बराबर १ बोझ २ श्रीरामचन्द्रजी ३ राजा विक्रमादित्य ४ अपनी ता- रीफ़ ५ नाममुल्क ६-७ सातों मुल्क ८ फ़ौज ९ क़िलाको घेरे १० सब ११ रोकना १२ शिर १३-१७ धूल १४ गुस्सांदिली १५ पहिले १६ किया हुआ १८ बादशाह १६ नाम बादशाह २० जहां अमृत है २१ पांखी २२ आसमान २३ हाथ २४ सूर्य २५ जैसे सिकन्दर ने दुःख पाया २६ ॥
२३८ पद्मावत । जो चढ़ै आनीजाय जिताई । तब का भै सो जीत जिताई ॥ दो० महूँ समुझ यहि आगमनै, सजराखा गढ़साज । काल्ह होय जेहि आवन, सोचल आवै आज ॥ शुरजाँ पलट शाहपहँ आवा । देव न मानै बहुत मनावा ॥ आग जु जरै आग पै सूखा । जरत रहे न बुझाये बूझा ॥ ऐसे माथ न नावै देवा । चढ़ै सुलेमाँ मानै सेवा ॥ सुनके अस रातौ सुलतानू । जैसे तपै जेठ कर भानू ॥ सहसँ किरनरोष तस भरा । जेहि दिशि देखै तेहि दिशि जरा ॥ हिन्दू देव काह बरै खाँचा । सरकै न आप आगसों बांचा ॥ यहिजैँग आगजुभरमहिंलीन्हा । सोसँग आग दुहूँ जग कीन्हा ॥ दो० रनथँभोरै जसजरबुझा, चितौर परै सो आग । फेर बुझाये ना बुझै, जरै दिवसै के लाग ॥ लिखी पत्रि चारहुँदिशिधाये । जहाँ तहँ उमरा बेगेँ बुलाये ॥ द्वन्द्वै घाव भा इन्द्र सकाना । डोला मेरु शेष अकुलाना ॥ धर्ती डोल कूँर्म खरभरा । महनामर्थे समुद्र महँ परा ॥ शाह बजाय चढ़ाजगजाना । तीसकोसभा पहिल पयानाँ ॥ चितौर सौहँ बारगह तानी । जहँलगसुना कूचसुलतानी ॥ उठसरवानै गगनै लहि छाई । जानहु राँते मेघ दिखाई ॥ जो जहाँ तहँ सोता असजागा । आयजुहार कटकै सब लागा ॥ दो० हस्ति घोर औ दैरैं पुरुष, जहँ तक बेसरौँ ऊँट । जब बादशाह आयेंगे १ पहिले २ नामपहलवान ३ नामबादशाह ४ लाल ५ सूर्य ६ हज़ार ७ गुस्सा ८ घमण्ड ९ भागना १० दुनियामें आगसे जलाया जायगा ११ नाम क़िला १२ दिन १३ जल्द १४ नामबाजा १५ नामपहाड़ १६ नामराजासाँप १७ कछुवा १८ उलटपलट १६ कूच २० सामने २१ खीमा २२ आसमान २३ लाल २४ फ़ौज २५-२७ हाथी २६ खच्चर २८ ॥
पद्मावत । २३६ जहँ तहँ लीन्ह पलाने, कटकेँ¹ सुरहें² अस छूट ॥ चले सहसबेसक³ सुलतानी । तीपैंतुरंग⁴ बांक कनकानी ॥ पंखेरी चली जो पाँतिहिंपाँती । वरण वरण औ भाँतिहिंभाँती ॥ काँले कुँमेते नील संपेती । खिंगंकुरंगे बीजें²³ दोरें²⁴ कतीती²⁵ ॥ अवलकेँ¹⁶ अबरसे¹⁷ लँखीशिरौंजी । चौधैर चाचसमुँदसबताजी ॥ किरमर्जे²⁰ नुकरों²¹ जरदौ भले । रूपकगनै बोलसरै चले ॥ पँचकल्याने²² संजावै बखानी । महि²६ सायरसबंचुन²⁷आनी ॥ मुशँकी औहिरमँजी²⁹ इराँकी³० । तुरँकी³¹ कहीसुथौरे बुलौँकी ॥ दो० शिर औ पूँछ उठाये, चहुँदिशि श्वास उनाहिं । रोषे³³ भरे जस बावरे, पवन की बाँसेँ उड़ाहिं ॥ लोहे साँरे³५ हस्ति पहिराये । मेघश्याम³६ जनु गरजतआये ॥ मेघहि चाह अधिकै वैकारे । भयो अमूझ देख अँधियारे ॥ जस भादौ निशि³८ आवैदीठी । स्वँग जाय हरके तेहिपीठी ॥ सोरह लख हँस्ती जब चाला । परवत सरस चलै जग हाला ॥ चले गैंड़ माते मद आवहिं । भागहिंहस्ति⁴² गन्धजोपावहिं ॥ ऊपरजाय गगनै शिर घिसा । औ धर्ती तरिकहँ धस मंसा ॥ भा भूचाल चलत गजगानी । जहँ पग धरहिं उठै तहँ पानी ॥ दो० चलत हस्ति जगकाँपा, चाँपा शेष पतार । कूँर्म जे धर्ती ले रहा, बैठ भयो गजभार ॥ चले सो उमर अमीर बखाने । का बरणों जस उनके बाने ॥ फ़ौज १ टीड़ी २ हज़ार कुरसी ३. तेज़ घोड़ा ४ निशान ५ घोड़ों की ज़ात ६ सें २५ तक सब दुनिया २६ घोड़े की ज़ात २७ से ३२ तक गुस्सा ३३ डर ३४ भूल लोहे की ३५ हाथी ३६-४१-४२ कालें बादल ३७ बहुत ३८ रात ३६ आसमान ४०-४३ कछुवा जिसके ऊपर ज़मीन है ४४ ॥
२४० | पद्मावत । खुरासाने औ चला हरेऊँ । गोरेँ बँगाल रहा नहिं केऊ ॥ रहा न रूमे शामे सुलतांनू । काशमीरेँ ठट्ठौँ मुलतानू ॥ जहँतक बड़बड़ तुरुवा जाती । मांडोवाली अरु गुजरोंती ॥ पटनौ उड़ीसौ के सब चले । लै गजहस्ति जहांगल भले ॥ कमरूँ कामतेँ औ पँड़वैई । देवगढ़ैलेत उदयगिरि १७ आई ॥ चला सो परबत और कर्मेऊँ । घिसर्योनगर जहांगल नाऊँ ॥ दो० उदयअस्तं लहिदेश जो, को जाने तेहिनाउँ । सातोंद्वीप नवो खंड, जुरे आय इक ठाँउँ ॥ धनिसुलतान जेहिक संसारा । वही कटके अस जुरी अपारा ॥ सबै तुर्क शिरताज वखोने । तबल बाज औ बांधे बाने ॥ लाखन मीर बहादुर जंगी । चित्रेँ कमानी तीर खदंगी २६ ॥ जीमा खोल रग सो मैढ़े । लेज़म घाल इराकेँहि चढ़े ॥ चमकै पखँरी सारिसँवारी । दरपण छाँहिअधिक उजियारी ॥ बरण बरण औ पाँतिहिंपाँती । चलीसो सेनाँ भाँतिहिंभाँती ॥ बीहर बीहरे सब की बोली । विधि ३२ यहिकहांकहांसोखोली ॥ दो० योजनैं सत ससकर, इक इक होय पयानैं । अगिलहिंजहांपयानहोय, पछिलहिंतहांमिलान ॥ डोले गढ़ गढ़पति सब कांपे । जीवन पेट हाथ हियेँ चांपे ॥ कांपा रनथंभौरेँ डर डोला । तरवैरेँ गयो भुराय तँबोला ॥ चूनागढ़ै औ चंपा तेरी ४१ । कांपा माँड़ो लेत चँदेरी ४२ ॥ नाम मुल्क १ से १६ तक पूर्व से पश्चिमतक २० सातों मुल्क २१ जगह २२ फ़ौज २३ बयान २४ तसवीर २५ नामतीर २६ मूठ ताँत से मढ़ी २७ घोड़ा २८ निशान २६ ज्यादा ३० फ़ौज ३१ अलग ३२ ईश्वर ३३ कोस३४ कूच ३५ क़िलादार ३६ दिल ३७ नामक़िला ३८ पेंड ३६ नाममुल्क ४० से ४३ तक ॥
पद्मावत। २४१
ग्वालियर गढ़१ महँ परी मथानी। औ कन्धार२ मथा होय पानी॥ कालिंजर३ महँ परा भगाना। भाग उजैगढ़४ रहा न थाना॥ कांपा बांदौ५ नरंदुर्रानी६। डर रुहतासँ विजयगिरिमानी॥ कांप उदयगढ़ देवगढ़८ डेरा। तब सो छिपाय आपकहँ घेरा॥ दो० गढ़ गढ़पति जहँतक सबै, कांप डोल जस पात। काकहँ बोल सौंहँ भा, वादशाह करछात॥ चितौर गढ़ औ कंभलनेरी। साजे दोनों जैसि सुमेरी११॥ दूतन कहाँ आय जहँ राजा। चढ़ा तुर्क१२ आवै देरै१३ साजा॥ सुनि राजा दौड़ाई पाँती। हिन्दूनाउँ जहांगलग जाती॥ चितौर हिन्दुनकर अस्थानौं। शत्रू१५ तुर्कहठ कीन्ह पयानौं॥ आदि समुद्र रहे ना बांधा। मैं हों मेड़ भोरै शिर कांधा॥ पुरवहु साथ तुम्हार बड़ाई। नाहित सबकहँ मार चढ़ाई॥ जौलहि मेड़ रहै सुख साखा। टूटहिं वोर जाय नहिं राखा॥ दो० सती जो जियमहँ सतधरै, जरै न छोड़े साथ। जहँ वीड़ा तहँ चून है, पान सुपारी काथ॥ करत जो रहे शाहकी सेवा। तिनकहँ पुनि असभाव परेवां॥ सब होय एकमते जु सिधारे। वादशाह कहँ आन जुहारे॥ है चितोर हिन्दुन की माता। गाँढ़े परै तजजायै न नाता॥ रतनसेन है जूंन्हरै साजा। हिन्दुन मांफ आहि बड़राजा॥ हिन्दुन केर पतंग कर लेखा। दौर परहिं अग्नी जो देखा॥ कृपाँ करहु तौ करहु समीरों। नाहित हमहिं देहु हँस वीरा॥
नाम मुल्क १ से १० तक सामने ११ नाम पहाड़ १२ बादशाह १३ फ़ौज १४ मकान १५ दुश्मन १६ कूच १७ बोझ १८ दरवाज़ा १६ दूत २० एकसलाह २१ मुश्किल २२ छोड़ना २३ मौत का सामान २४ मेहरबानी २५ माफ़ २६॥
२४२ पद्मावत । पुनिहमजाहिं मरहिं वह ठाँऊँ । मेट न जाय लाजकर नाऊँ ॥ दो० दीन्ह शाह हँस वीरा, और तीन दिन वीचैं । तेहिं शीतलकैको राखे, जिन्हें अगिनमहँ मीचैं ॥ रतनसेन चितोर महँ साजा । आय बजाय बैठ सब राजा ॥ तोमरै बैसं. पनवारँ सर्वांई । औगोहलौर्त आयशिरनाई ॥ क्षंत्री औबचवानै बघेली१३ । अगरवारै चौहानै चंदेली१५ ॥ गहरवारै परहारैं सूकरे१८ । कलैहँस औ ठकुरायजुरे२० ॥ आगे ठाढ़ बजावहिं ढाँढ़ी । पाछे ध्वजा मरण की गाढ़ी ॥ बाजहिं संग शंख औ तूरों । चन्दन खोरी२३ भरे सेंदूरा ॥ सज संग्रामै बांध सब शाखा । छांड़ा जियन मरणसवताका ॥ दो० गगनै धर्ति जो टेकँ , तेहि कागरू पहार । जौलहिजिवकायाँमहँ, परैसो अँगनै भार ॥ गढ़ तस सजा जो चाहै कोई । बरप सातलग खांगैं न होई ॥ बांकीचाँह बांकगढ़ कीन्हा । औसबकोटे' चित्रै समलीन्हा ॥ खण्ड खण्ड चौखण्ड सँवारे । धरे विपम गोलन के मारे ॥ ठांवहिंठांवै लीन्ह सब बांटी । रहा न बीचजोसँचरे ३४ चांटी ॥ बैठे धानुकै कँगुरन कँगूरा । भूमि३६ नआंटीअँगुरिनअँगूरा॥ औ बांधे गढ़ गढ़मत बौरे । फाटै भूमि३८ होहिं जो ठारे ॥ बिच बिच बुर्ज बने चहुँफेरी । बाजै तवैल ढोल औभेरी४० ॥ दो० भागढ़राज सुमेरु जस, स्वँगै छुवैपै चाह । जगह १ तीनदिन की मोहलत २ ठण्डा ३ मौत ४ राजपूतों की ज़ात ५ से.२० तक नामबाजा २१-२२-३६-४० कटोरी २३ लड़ाई २४ आसमान २५ उठाना २६-२८ बदन २७ कमी २६ पँचद्वार खाई ३० क़िला ३१ तसवीर ३२ जगह ३३ चोंटी न जासके ३४ चौकीदार ३५ ज़मीन ३६-३८ हाथी मस्त ३७ नाम पहाड़ ४१ आसमान ४२ ॥
पद्मावत । २४३ समुद्र न लेखैं लावै, गंग सहसै मुखनाह । बादशाह हठ कीन्ह पयानाँ । इन्द्र भंडार डोल भयमाना ॥ नब्बे लाख सवार जुचंदा । जो देखा सो लोहे मढ़ा ॥ बीस सहसै घुमरहहिं निशाना । गुर्ल कञ्चन फेरै असमाना ॥ बैरख ढाल गगनैं का छाई । चला कटक धर्ती न समाई ॥ सहस पांति गजमत्त चलावा । घुसतअकाशधसतभुइँआवा ॥ वृक्ष उचार पेड़ि सो लीन्ही । मस्तक भार तारमुखदीन्ही ॥ चढ़हिं पहाड़हिं भयगढ़लागू । बनखंडखोह न देखहिं आगू ॥ दो० कोउ काहू न सँभारे, होत आव दर चांप । धर्ति आप कहँ कांपै, स्वर्ग आपकहँ कांप॥ चलीं कमानें जेहिमुखगोला । आवहिं चलीधर्ति सबडोला॥ लागे चक्र बज्रके गढ़े । चमकहिं रथ सोने के मढ़े ॥ तेहिपर विषमें कमानें धरीं । सांचे अष्टधातु की भरीं ॥ सौसौ मनै पियहिं वै दारूँ । लागहिं जहां सो टूट पहारू॥ माती रहहिं रथहिं पर परीं । शत्रुनैं कहँ सौहैं उठ खरी ॥ जो लागै संसार न डोलहिं । होयभुइँकम्पजीभजो खोलहिं॥ सहसैं सहसहस्तिनंकी पाँती । खांचहिंरथडोलहिं नहिंमाँती ॥ दो० नदी नार सब पानी, जहां धरैं वै पाँव । ऊँच खाल बनबीहर, होत बराबर आव ॥ कहौं शृंगार जैसि वै नारी । दारू पियहिं जैसि मतवारी ॥ उठै आग जो छोड़हिंश्वासा । धुवां सो लोगै जाय अकासा॥ हज़ार १ कूच २ हज़ार ३ चोंटी ४ आसमान ५ फ़ौज ६ हाथीमस्त ७ जड़ ८ आसमान ६ तोपैं १० पहिया ११ भारी १२ तथा बारूद १३ दुश्मन १४ सामने १५ हज़ार १६ हाथी १७ ॥
२४४ पद्मावत । सैंदुर आग शीश उपराहीं । पहियातरखन चमकत जाहीं ॥ कुच गोलादुइ हिरदै लाई । अञ्चलध्वजा रहहिं छिटकाई ॥ रसनों लूक रहहिं मुखखोलें । लङ्का जरै सो उनके बोलें ॥ अलकें जँजीरबहुतगयँ वांधे । खींचहिं हस्ती टूटहिं कांधे ॥ बीर शृंगार दोउ इकट्ठाऊँ । शत्रुशार्ल गढ़भंजन नाऊँ ॥ दो० तिलक पलीता माथे, दशनैं वज्रके बानै । जेहिहेरहिं तेहिमारहिं, चुरकुसकरैनिदानै ॥ जेहिं जेहिंपंथ चलीवेआवहिं । आवहिंजरतआगतसलावहिं॥ जरहिंजोपरबतलागअकासा । बनखंडधकहहिंपलाशैकोपासा॥ गैंड़ा गयँद जरे भे कारे । आवैं मृगी रोजै झनकारे ॥ कोयल नाग काग औ भौंरा । औरजुजरे तिनहिको सँवरा ॥ जरा समुद्र पानि भा खारा । यमुना श्यामभई तेहि झारा ॥ धूमें श्यामअंत्रक्ष भे मेघौ । गगनै श्यामभा धुवां जु भेघा॥ सूरूज जरा चांद औ राहू । धर्ती जरी लङ्क भा दाहू ॥ दो० धर्ती स्वर्ग असूझभा, तबहुँ न आग बुझाय । उठहिं बज्र जर डंगैवे, धूमें रही जगछाय ॥ आवै डोलत स्वर्ग पतारू । कांपे धर्ति न अँगवे भारू ॥ टूटहिं परपत मेरू पहारा । होयहोयधूरउड़हिं होयक्षारौँ ॥ सतखंड धर्ती भइ खंडखण्डा । ऊपर अष्ट भये ब्रह्माण्डौ ॥ इन्द्र आय तेहि खंडहोयछावा । चढ़सबकटकै घोर दौड़ावा ॥
शिर १ छाती २ सीना ३ ज़बान ४ बाल ५ गरदन ६ हाथी ७ जगह ८ दुश्मन को मारनेवाली ६ क़िला तोड़नेवाली १० दांत ११ तीर १२ देखना १३ बहुत १४ ढांख १५ हाथी १६ नाम जानवर १७-१८ धुवां १६-२६ बीच २० बादल २१ आसमान २२-२४-२७-३१ जलना २३ ढेर २५ बोझ न उठाना २८ नाम पहाड़ २६ धूर ३० फ़ौज ३२ ॥
पद्मावत । २४५ जेहिंपंथँ चल ऐरावतं हाथी । अबहिंसोडगरगर्गनँमहँआती ॥ औ जहँ जामरही वह धूरी । अबहूँ बसे सो हरिचंद पूरी ॥ गगन में छिपा खेहें तसब्राई । सूरज छिपा रयँनिहोय आई ॥ दो० गयोसिकंदरकजलिवन, भयो सो तस अँधियार । हाथ पसार न सूझे, बरै लाग मसयार ॥ दिनहिं रात अस परीअचाका । भारवि अस्तचन्द्ररथ हांका ॥ मंदिरनैं जगतैं दीपपरगसी । पंथकें चलत बसेरें बसी ॥ दिनके पंख जरत उड़ भागे । निशि केनिसचरेसकलागे ॥ कमल सुकेता कुमुदिनिफूले । चकई बिछुरा चकमन भूले ॥ चला कटक अस चढ़ा अपूरी । अगलहिंपानी पिछलहिंधूरी ॥ महिं उजड़ीसायरैंसवसूखा । वनखँडै रहे न एको रूखा ॥ गंदैं गिरि फूटभयेसव माटी । हस्तिं हेरान तहांको चांटी ॥ दो० खेहँ उड़ानी जाहिघर, हेरत फिरत सो खेह । पियआवाहिंअवंहैंटितोहिं, अंजननयनउरेह ॥ यहिविधिहोतपयाने सोआवा। आय शाह चितौर नियरावा ॥ राजा राउ देख सब चढ़ा । आव कटकें सब लोहे मढ़ा ॥ चहुँदिशिंदृष्टि परी गजजूहाँ । श्यामघंटा मेघा जस रूहा ॥ औरो उँरूकूछ सूझ न आना । स्वर्गलोकघुमरहहिंनिशाना ॥ चढ़ धौराहर देखहिं रँनी । धनतुईअस जाकर सुलतानी ॥ कै धन रतनसेन तुइँ राजा । जाकहँतुकंकटके यहिसाजा ॥ राह १ नाम हाथी २ आसमान ३ खाक ४ रात ५-११ सूर्य ६ मकान ७ दुनियां ८-रोशन ६ मुसाफिर १० कोकाबेली १२ फ़ौज १३-२४-३२ ज़- मीन १४ तालाव १५ जंगल १६ क़िला १७ पहाड़ १८ हाथी १६ चींटी २० धूर २१ निगाह २२-२५ कूच २३ हाथियोंका हलक़ा २६ काली घटा छाई २७ वार पार २८ आसमान २६ महल ३० पद्मावत ३१ ॥
२४६ पद्मावत। बैरख ढालकेर परछाहीं। रयेनि होत आवै दिनमांहीं ॥ दो० अन्धकूप भा आवै, उड़त आव तसक्षारे । ताल तलावा पोखर, धूर भरी ज्योनार ॥ राजै कहा कीन्ह जस करना । भयोअमूंझसूझ अब मरना ॥ जहाँलग राज साजसबहोऊ । ततखनैं भयो सँजोउसँजोऊँ ॥ बाजे तबल अकोट जुझाऊ । चढ़ा कोप सब राजा राऊ ॥ करहिंतुखारैं पवनसों रीसाँ। कन्थ ऊँच असवार न दीसा ॥ का बरणों अस ऊँच तुखारा। दुई बेर पहुँचे असवारा ॥ बांधे मोरछाँह शिर सारहिं। भीजहिं पूँछ चैंवरजनुदारहिं ॥ रंग सँधार्हो पहुँचे तोपा । लोहे सार पहिर सब कोपा ॥ दो० तैसे चँवर बनाये, औ घाले गलझर्प । बांध सेतें गजगाँहें तहँ, जो देखे सोकम्प ॥ राज तुरङ्गम बरनों काहा । आनी छोर इन्द्र रथवाहा ॥ ऐसो तुरङ्गम परी न दीठी । धनअसवाररहहिं तेहि पीठी॥ जात बालका समुद्र थहाये। श्वेतेँ पूँछ जनु चैंवर बनाये॥ बरण बरणपँखुरी अतिलोनी। जानहुँ चित्रे सँवारे सोनी ॥ माणिकैं जड़े शीशें औ कांधे । चँवर लाग चौरासी बांधे ॥ लागे रतनैं पदारथ हीरा। बरहिंदिनाहिंदीपकचहुँ फेरा ॥ चढ़हिं कुँवर मनकरहिं उछाहूँ। आगे घाल गिनै नहिंकाहू ॥ दो० सेंदुर शीश चढ़ायें, चन्दन खोरें देह । सो तन काह लगाई, अन्त होय जो खेहँ ॥ 'रात १ ख़ाक २ तुरन्त ३ सांमान ४ घोड़ा ५ गुस्सा' ६ मौरछल ७ तेज़-चालाक ८ गलखोद ६ सफ़ेद १० नाम ज़ेवर ११ घोड़ा १२ नज़र १३ सफ़ेद १४ रङ्गरङ्ग निशान १५ बहुत १६ खूबसूरत १७ तसवीर १८ ज- बाहिरात १६-२१ शिर २० खुशी २२ धूर २३ ॥
पद्मावत। ३४७ गर्जे मैमत पुखरी नृपबारौ। देखे जानहुँ मेघ पहारौ ॥ श्वेतगयन्दै पीत औ राँते। हरे श्याम घूमहिं मदमाते ॥ चमकहिं दरपनै लोहें सारी। जनु परवतपर परी अँबारी ॥ श्री मेल पहिराये मूँड़ें। कनकँ नभायँ पाँयतररौंदें ॥ सोने मेल सो दांत सँवारे। गिरिवरँ टरहिंसो उनके टारे ॥ परवत उलटि भूमिसों मारहिं। परै जो भीरतीर अस झारहिं ॥ ऐस गयन्दै सजे सिंहली। कोटि कूर्म्म पीठी कलहली ॥ दो० ऊपर कनक मँजूषों, लाग चँवर औ ढार। भलपति बैठ भालै लै, औ बैठे धन्कोरै ॥ अश्वदलैगं जदेलदोनों साजे। औघनतवल जुझारू बाजे ॥ माथे मुकुट छत्र शिर साजा। चढ़ावजाय इन्द्रअस राजा ॥ आगे रथ सेनाँ सब ठाढ़ी। पाछे ध्वजा मरन की काढ़ी ॥ चढ़े वजाय चढ़ा जस इन्दू। देवलोक गोहनैं भा हिन्दू ॥ जानहुँ चांद नखत लै चढ़ा। सूरजकटकेँ रयनिमर्से मढ़ा ॥ जौलहिं भूंर जाहि दिखरावा। निकस चांद घर बाहर आवा ॥ गगनैनखत जसगिनेनजाहीं। निकस आयत समुइँन समाहीं ॥ दो० देख अनी राजाकी, जग होयगयो असूझ। वहिं कस होय चहतहै, चांद सूर्य्सों जूझ ॥ यहां राज अस साज बनाई। वहां शाहकी भई अवाई ॥ अगलेँ दौड़े आगे आई। पिछले पाछ कोस दश ताईं ॥ हाथी १-१० राजाका दरवाज़ा २ सफ़ेद हाथी ३ लाल ४ चार आईना ५ टीका ६ सोना ७ पहाड़ ८ ज़मीन ६ कछुवा ११ सोने की अंबारी १२ नेज़ा १३ तीरअन्दाज़ १४ घोड़े की फ़ौज १५ फ़ौज १६ साथ १७ तथा सुलतानी फ़ौज १८ रातकी स्याही में १६ सूर्य २० तथा राजा २१ आसमान २२ फ़ौज २३॥
२४८ पद्मावत। शाह आय चितोरगढ़ बाजां । हस्ती सहसबीस सँगगाजा ॥ उनई आय दोउ दल गाजे । हिन्दू तुरुक दोउसमें बाजे ॥ दोउसमुंद्रदधि उदधि अपारा । दोनों मेरु खंखड पहारा ॥ कोप जो झार दुहूँदिश मेली । औ हस्ती हस्तहिं सो पेली ॥ आंकुश चमक बीज असवाजहिं। गरर्जाहंहस्तिमेघजनुगाजहिं ॥ दो० धर्ती स्वर्ग दोऊ दल, जूझहिं ऊपर जूझ । कोई टरै न टारै, दोनों वज्र समूह ॥ खण्डपैंतीसवां सुलह राजा और वादशाह ॥ हस्तिंहि साँहस्ती हठगाजहिं । जनु परवत परवतसोंबाजांहं ॥ कोउ गयंद न टारें टरहीं । टूटहिं दांत मूँड़ गिरंपरहीं ॥ परबतआय जो परहिं तराहीं । दलं महँ चांपखेहँ मिलजाहीं ॥ कोइ हस्ती असवारहिं लेहीं । सूँड़ समेट पांय तर देहीं ॥ कोइ असवारसिंह दै मारहिं । हन मस्तक सों सूँड़ उतारहिं ॥ गैब गयंदैं तनगगनें पसीजा । रुधिरे चले धर्ती सबभीजा ॥ कोइ मैमत सँभारहिं नाहीं । तबजाने जब गुदशिरेंखाहीं ॥ दो० गगन रुधिर जसवरसे, धर्तीभीज मिलाय । शिरधरटूटंबिलाहिंतस, पानी वेगेँ विलाय ॥ उठो बज्रजूझे जस सुना । तेहिंते अधिकै भयो चौगुना ॥ बाजहिं खङ्ग उठी डर आगी । भुइँजर चही स्वर्ग कहँ लागी ॥ चमकहिं बीज होय उजियारा । जेहि शिरपरै होय दुइ फारा ॥ सेनमेघ अस दुहुँदिशि गाजा । खङ्गजोबीजबीजें असवाजा ॥ पहुंचा १ हाथी २-६-७-८ बराबर ३ समुद्र दही का ४ पहाड़ ५ फ़ौज ६ धूर १० शेर ११ गरूर १२ हाथी १३ आसमान १४-२१ खून १५ भेजा शिरका १६ जल्द १७ भारी लड़ाई १८ बहुत १९ तलवार २० वादल सी फ़ौज २२ बिजुली २३ ॥
पद्मावत । २४६ बरसहिं सेल बान होय कांदों । जस बरसै सावन औ भादों ॥ लपटहिं कोप परहिं तरवारी । औ गोला ओला जस भारी ॥ जूझै बीर लिखौं कहँ ताई । लै अप्सरै १ कैलास सिधाई ॥ दो० स्वामि काज जो जूझै, सोइगये मुख रातै २। जो भागे संत छांड़ के, मँसिमुखचढ़ैबरातै ॥ भा संग्राम नभा अस काऊ । लोहे दुहुँदिशि भयो अगाऊ ॥ कन्दहि कोदहिपुरं भुँइँपरे। रुधिरसलिलैं'होय सायर भरे ॥ आनंद व्याह करै मसखावा । अभभख जन्मजनमकहँ पावा॥ चौंसठ योगिन खप्पर पूरा । बुकेंजम्बुकै घर बाजहिं तूरा ॥ गृद्ध चील्ह सब मण्डपछावहिं । काककलोलकरहिंऔगावहिं॥ आज शाहहठभैनी बिवाही । पाई भुक्ति जैसि मनचाही ॥ जेहिं जस मांसू अखा परावा । तस तेहिकर लै औरहिं खावा॥ दो० काहू साथ न तनको, सकत मुवे सब पोष । ओछे १५ पूरजू जानत, जो नहिंआवतजोष ॥ चांद न टरै सूर सो कोपा । दूसरि छत्र सौहिं १७ के रोपा ॥ सुना शाह अस भयो समूहा । पेले सब हस्तिनें के जूहा ॥ आज चन्द्र तोर करौं निपांतूं । रहै न जगमहँ दूसर द्यूतू ॥ सहसें किरन होय किरनपसारा। छेंका चांदे जहांलग तारा ॥ ढेरै लोहे दरपन भा आवा । घटघट जानों भोंचु देखावा ॥ बहु क्रोधित सेनों हलधाई । अगिन पहार जरत जनु आई ॥ इन्द्रलोक की परी १ गालिका २ लाल ३ सियाही ४ ईश्वरके सामने ५ लड़ाई ६ तलवार की विजुली से बहुत लोग ज़मीन में गिरे ७ पानी ८ ता- लाव ९ भेड़िया १० सियार ११ फ़ौज १२-२३-२५खुराक १३ तनसाथ नहींजाता चाहे मोटा हो १४ ओछा पेटफरता-जोदाना है अन्दाज़ रखता १५ सूर्य्य १६सा- मने १७ गुस्सा १८ हाथी १६ नाश २० हज़ार २१ तथा राजा २२ तलवार २४ ॥
२५० पद्मावत । खड्गैं बीज सब तुर्क उठाई । ओड़नें चन्दकमल करैं पाई ॥ दो० जग मग अनी देखके, धाय दृष्टि तेहि लाग । छुवे होय जो लोहे, माझँ आव तेहि आग॥ सूरजेँ देख चांद मन लाजा । विकसतैंकमलकुमुदँ भाराजा॥ पहिलहिचन्दआवनिशिपँाई। दिनदिनेरै सो कौन बड़ाई ॥ अह्रै जो नखतचांदसँग तपी। सूरे की दृष्टिगगनैमँहँ छिपी ॥ की चिंता राजा मन बूझा । जेहिसो स्वर्ग न धर्तीजूझा ॥ गढ़पति उत्तरलड़े नहिं धाई। हाथपरें गढ़ हाथ पराई ॥ गढ़पतिइन्द्रगगनगढ़ काजा । दिवसे न निसरइँनिकरराजा॥ चन्द्रसयनिरहिनखतहिंमांझा । सूर्य्यनसौंहि होयचहिसांझा॥ दो० देखा चन्द्र भोर भा, सूरज के बड़ भाग । चांदफिराभागढ़पति, सूर्य्यगगनगढ़लाग ॥ कटकैं असूझअलवलशाही । आवत कोइ न सँभारै ताही ॥ उदह समुद्र जस लहरे देखी । नयनदेख मुखजाय नलेखी ॥ केते बजावत उतरे घाटी । केते बजावत मिलगये माटी ॥ केतेहिं नितहिं देइनवसाजा। कबहुँ न साज घटै तस राजा ॥ लाखजाहिँआवहिंनवलाखा । फरै भरै उपैनी नइशाखा ॥ जो आवै गढ़ लागै सोई । थिर है रहै न पावै कोई ॥ उमर अमीर रहे जहँ ताई । सबही वांट अलंगै पाई ॥ दो० लाग कटकैं चारहुँ दिशि, गढ़सोपराइकदाहुँ । सूर्य्यगहन भा चांदहिं, चांदभयोजसराहु ॥ सूर्य्य १-११-१२ ढाल २-हाथ ३ फ़ौज ४-१६-२५ निगाह ५ बीच ६ तथा बादशाह ७ खिलना ८ कोकविली ६ रात १०-१७ नज़र १३ आस- मान १४-१५ दिन १६ सामने १८ दरिया आगका २० हमेशा २१ पैदा होना २२ क़िला तथा दुनिया २३-हद २४-आग २६ तथा राजा २७ ॥
पद्मावत । २५१ अथवादिवसैं सूरै भा बासा। परीरयैनि शंशिउवा अकासा॥ चांद छत्रै दय बैठो आय। चहुँदिश नखत दीन्ह छिटकाय॥ नखत अकाशा हिं चढ़े दिपाई। ततत लूका परहिं बुझाई॥ परहिं सेल जसपरहिं विजाँगी। पहर्नहिं पहन वाज उठआगी॥ गोला पर गोला ढरकावहिं। खून करत चारहुँ दिशि आवहिं॥ उनई घटा वर्ष भर लाई। ओला टपकैं परे बुझाई॥ तुरकन मुख फेरैं गढ़ लागी। एक मरे दूसर होय आगी॥ दो० नृपति बार्न सनमुख परहिं, सकै न कोई गाँढ़। उनई शाह सेनें सब, रही भोर लग ठाढ़॥ भयो विहान भानुं पुनि चढ़ा। सहसैं किरन जैसो विधि १४ गढ़ा॥ भा धावा गढ़ लीन्ह गरेरी। कोपा कटकै लाग चहुँफेरी॥ बान करोर एक मुख छूटहिं। बाजैहिं जहाँ फोकल हि फूटहिं॥ नखत गगने जस देखे घने। तस गढ़ फाटहिं बानहिं हने॥ बानवेध साही किये राखा। गढ़ भा गरुड़ फुलावै पांखा॥ उड़गाकीरै कठिने हियवाला। तोपै लहैं होय मुखराताँ॥ पीठ दीन्ह तेहिं बानहिं लागे। चांपत जाहिं पगहिं पग आगे॥ दो० चार पहर दिन जूझ भा, गढ़ न टूट तस बांक। गरू होत पै आवै, दिन दिन नाकहिं नाक॥ छैका कोट जोर अस कीन्हा। घुसा नगर सुरंग तहँ दीन्हा॥ गरगंजे बांध कमाँनै धरीं। बज्र अगिन मुख दारू भरीं॥ हवशी रूमी और फिरङ्गी। बड़ बड़ गुनी और तेहिसङ्गी॥ ... दिन १ सूर्य २ रात ३ चांद ४ तथा रतनसेन ५ गोला ६ आग ७ पत्थर ८ राजा के तीर ६ सामने १० फ़ौज ११-१५ सूर्य १२ हज़ार १३ ईश्वर १४ पहुँचना १५ आसमान १७ राजा के हवास को तोता उड़ गया १८ मुश्किल १६ मुँह लाल २० घेरा क़िला २१ मरहला २२ तोपें २३॥
२५२ | पद्मावत । जेहिकी ज्योति जाहिं उपराहीं । जहँ ताकहिं चूकहिं तहँ नाहीं ॥ अष्टधात के गोला छूटहिं । गिरि पहाड़ चून होय फूटहिं ॥ इकवारहिं सब छूटहिं गोला । गरजै गगनं धर्तिसबडोला ॥ फूटे कोटँ फूट जनु शीला । उड़हिं बुर्ज जायँ सब पीसा ॥ दो० लंका रावटै जस भई, दाह पड़ा गढ़ सोय । रावणभालेंजोजरलिखो, कहुकिमअजरसोहोय॥ राजाकेर लाग गढ़ धुई । फूटे जहां सँवारहि सोई ॥ बांकी वरसहिं वानकै फेरइ । रातहिं कोट चित्र कै लेइ ॥ गाजे गगनं चढ़ा जस मेघा । वरसहिं वज्र सलिलको ठेघा ॥ सौसौ मनकें वरसहिं गोला । वरसहिं टपकतीरजसचोला ॥ जानहु परी स्वर्ग हत गाजाँ । फाटी धर्ति आय जो नाजाँ ॥ गरगजें चूर चूर होय परहीं । हस्तिं घोर मानुप संहरहीं ॥ सबहिं कहा अब परलै आवा । धर्ती स्वर्ग जूझ तस लावा ॥ दो० उठो वज्र सनमुख जरे, होय इक डङ्गोईं लाग । जगत जरै चारहुँदिशा, कोरे बुझावै आग ॥ तबहूँ राजा हिये १७ न हारा । राजपँवैरै १८ पर रचा अखारा ॥ सौहें शाह कर बैठक जहां । सामहिं नाच करावै तहां ॥ जंत्रपखावजं २० आदिजोबाजा । सुरैमन्दिर २१ खावै २२ भलसाजा ॥ बीनें २३ निपातककमायजें २४ गहे । बाजउमरेंती २५ अति कहकहे ॥ चंगें २६ उपंगें २७ नाँदें २८ सुरै २९ तूरा । सुहैरं ३१ बंसै ३२ बाजे भल तूरों ॥ आसमान १-७ क़िला २ राख ३ माथा ४ ढांक बनानेवाला ५ तसवीर ६ कड़े पत्थर के गोले ८ आसमान से बिजुली गिरी ६ पहुँचना १० मर- हता ११ हाथी १२ मरना १३ क़यामत १४ पत्थर १५ इक तरफ़ा १६ दिल १७ खास महल १८ सामने १६ नाम बाजा २०-२१-२२-२३-२४-२५-२६- २७-२८-२६-३०-३१-३२ ॥
पद्मावत । २५३ हुडुकैबाज डफैबाज गँभीरा । औ बाजहिं भलझाँझमँजीरा ॥ तन्त वितन्त शुश्रैं घनतारा । बाजहिं शब्द होय झनकारा ॥ दो० जग शृंगार मनमोहन, पातुर नाचहिं पांच । बादशाह गढ़ छेंका, राजा भूला नाच ॥ बीजा नगर केर सब गुनी । करहिं अलाप बुद्धि चौगुनी ॥ प्रथमँ रागभैरौँ ६ तेहि कीन्हा । दूसरे मालकोसँ पुनि लीन्हा ॥ रागहिंडोलँ सो तिसरे गाई । चौथे मेघ मलार सोहाई ॥ पँचयें शिरी १० राग भलाकिया । छठयें दीपकै उठा बरदिया ॥ छह्रो राग गाये भल गुनी । औ गाई छत्तिस रागिनी ॥ ऊपर भई सो पुतली नाचहिं । तर भये तुर्क कमानैं खाँचहिं ॥ काढ़ा माथा घुमरौँ झुमरा । तर भये देख मीर औ उमरा ॥ दो० सुनसुन शीशैंधुनहिं सब, करमलिमलिपछिताहिं । कब हम हाथ चढ़हिं यहि, कै तब यहदुखजाहिं ॥ छह्रों राग गावैं पातुरैंनी । पुनि तेहिकीन्ह लियेरागिनी ॥ भाकल्यानें कान्हरौ कीन्हीं । रागविहागै किदारौ लीन्हीं ॥ ललितैं बँगलाँ गीतहिंसोई । आसाँवरी भयो सब कोई ॥ धनाशिरी २४ सोहो २५ सोकीन्हीं । भयोबिलावलै मारूँ लीन्हीं ॥ रामकली २६ गुनकली सोहाई । सारँग औ विभासैं मुँहआई ॥ नितमलौरै जौ मिला सुनाई । श्यामै गूजरी पुनि भलगाई ॥ पुरैवी औ देसाखै कुरारी । ३४ तोड़ी ३५ गौड ३६ सोभईनिरारी ॥ दो० गौरी ३७ गौराँ तरवनै, सिद्ध अलापहिं ऊँच । .नामबाजा १-२-३ मोटे बहुत तार ४ पहिले ५ नाम राग ६-७-८-६- १०-११ मुसलमानलोग तोपें मारते थे १२ जिसने राजा की फ़ौजसे शिर निकाला वह वहीं रहा १३ शिर १४ हाथ १५ तवायफ़ १६ नाम राग रागिनी १७ से ४० तक ॥