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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

सत कहि सती सँवारै सरा । आगलाय चहुँदिशि¹ सतजरा ॥ दुइजग² तरा सत्य जें राखा । और पियार दीन्ह सतभाखाँ ॥ सो सतछांड़ि जो धर्म बिनाशाँ। कामतिकीन्ह हिये⁴ सतनाशा ॥ दो० तँम सयान औ पण्डित, असतं न भाषौं काउ । सत्य कहो मोसों वह, काकर अपनाउँ ॥ सत्य कहत राजा जिव जाउ । पै मुखअसतं न भाषौं काउ ॥ हौं लिय सत्य निसस्यौ यहिँते । सिंहलदीप राजघर जेहिँते ॥ पद्मावत राजा की बारी । पद्मगन्धे शेशि दईसँवारी ॥ शेशि मुख अंगैं मलयँगिरिरानी। कनैंक सुगन्धहि द्वादशँ बानी ॥ है पद्मिन जो सिंहलमाहां । सुगंध स्वरूपसो वहकी छाहां ॥ हीरामन हौं तिहके परेवाँ । कंठि फूटि करत तेहि सेवा ॥ औ पायौं मानुष की भाखाँ । नाहीं तो पंखै मूठभरं पांखा ॥ दो० जबलहिं जियों रातदिन सँवरों, मरों वही लै नाउँ । मुखराताँ तनहरिहर कीन्हा, दुहूं जगंते लैजाउँ ॥ हीरामन जो कमल बखानौँ । सुनि राजा होय भँवरभुलाना ॥ आगे आव पंखैँ उजियारे । कहै सुदीप पतंग किय मारे ॥ रहा जो कनकें सुबासके ठाउँ । कस न होय हीरामन नाउँ ॥ को राजा कस दीप अतंगू । जेहिरे सुनत मन भयो पतंगू ॥ सुनिसुसमुद्रचरैं भये कलकलाँ । कमलवाहिभँवरहोय मिला ॥ कहौसुगंधधनि²⁸ कसनिरमॅली। भाअलि²⁹ संगकिअबहींकली ॥


फुटनोट्स: चारौतरफ़ १ दोनों जहान २ बोली ३ नाश ४ दिल ५ झूठ ६-८ क़सूर ७ लड़की ६ कमलकी खुशबू १० चांद ११-१२ बदन १३ चन्दन १४ सोना १५- २४ ख़ालिस १६ उड़ने वाले जानवर १७-१६-२३ आवाज़ १८ बाल २० दुनियां २१ वयान करना २२ जगह २५ आंख २६ नाग जानवर २७ पद्मावत २८ पाकसाफ़ २६ भँवर ३० ॥

४४ | पद्मावत । औ बहुत तहां जो पद्मिनी लोनी १। घर घर सबके होहिं जस होनी ॥ दो० सबै बखानें तहां कर, कहंत सो मोसों आव । चहौं दीप वह देखा, सुनत उठा तस चाव ॥ का राजा हौं बरैनौं तासू । सिंघलदीप अह्रै कैलासू ॥ जो गा तहां भुलाना सोय । गये युग बीत न बहुरा कोय ॥ घर घर पद्मिनि छत्तीस जाती । सदा बसंत दिवसै अरु राती ॥ जेहिं जेहिं बरनैं फूल फुलवारी । तेहिं तेहिं वरनं सुगन्ध सुनारी ॥ गन्ध्रपसेन तहां बड़ राजा । अप्सरैंहिं माहिं इन्द्रासन साजा ॥ सो पद्मावत ताकी बाँरी । औ सब दीप माहिं उजियारी ॥ चहूँखण्ड के वर जो आहीं । गर्वहिं १० राजा बोलहिं नाहीं ॥ दो० उदित सूरै जस देखी, चांद छिपै जेहि धूप । ऐसे सबै जाहिं छिप, पद्मावत की रूप ॥ सुनि रबि १२ नाँउ रतनैं भारती १३। पण्डित वही फेर कहु बाता ॥ तुइ सुरङ्ग मूरति वह कहीं । चितमहँ लाग चित्रैं हैरही ॥ जनु होय सूर्य आय मनबसे । सब घटपूर हिये १६ परगँसे ॥ अबहूँ सूर्य चांद वह छाया । जल बिन मीनें रक्त बिन काया ॥ करनें करान आ प्रेम अँगूरू । जो शेशि स्वर्ग चढ़ौं होय सूरू ॥ सहसें किरन रूपमन भूला । जहँ जहँ दृष्टि २५ कमल जनु फूला ॥ तहां भँवर जहँ कमला गन्धी । भइ शाशी २६ राहुकेर ऋण बन्धी ॥ दो० तीन लोक खण्ड चौदह, सबै परै मोहिं सूझ । खूबसूरत १ तारीफ़ २-३ दिन ४ रंग ५-६ इंद्रलोककी परी ७ लड़की ८ चारों तरफ़ ६ ग़रूर १० सूर्य ११-१२-२३ राजारतनसेन १३ दीवाना १४ तसवीर १५ दिल १६ खिलना १७ मछली १८ वदन १९ नसनस में २० चांद २१-२६ आसमान २२ हज़ार ज्योति तथा पद्मावत २४ निगाह २५ ॥

पद्मावत । ४१ कान टूटि जेहि आभरणें, का लै करब सुसोन ॥ राजा सुनि बियोगं तसमाना । जैसेहियँ बिक्रमे पछिताना ॥ वह हीरामन पण्डित सुवा । जो बोलै मुख अमृत चुवा ॥ पण्डित दुखखण्डित निरदोषा । पण्डित हियेँ परै नहिं धोखा ॥ पण्डित केर जीभ मुख शोधे । पण्डित बात न कहैं विरोधै ॥ पण्डित सुमति दै पन्थँहि लावा । जोकुपंथ तेहिपण्डितनआवा॥ पण्डित राती बदन सरेखा । जो हत्यार रुहिरै पै देखा ॥ की प्रान घट आनहि मेती । की जलिहोहिं सुआ संग सती ॥ दो० जन जानहुकि ये अवगुण, मंदिर होय सुखराज । आयसु मेट कन्तै कै, काकर भय न अकाज ॥ चांद जैस धनि उजेर अहे । भा पिउरोष गहन अस गहे ॥ परमसुहाग निवाहन पारी । भावै धाग सेवा जब हारी ॥ इतनक दोषैं वीरज पिउ रूठा । जो पिउ आपन कहै सुझूठा॥ ऐसे गर्व नहिं भूलै कोई । जेहि डर बहुत पियारो सोई ॥ रानी आय धौय के पासा । सुआ भवा सेमर की आसा ॥ पराप्रीति कंचन महँ सीसा । बिथरन मिले श्याँम पै दीसा ॥ कहां सुनार पास जेहि जाऊँ । दे सुहाग करै इक ठाँऊँ ॥ दो० मैं पिय प्रीति अरोसे, गर्व कीन्ह जिव माहँ । तेहिरिस हों परहेली, नगररोप की नाँहँ ॥ उत्तर धाय तब दीन्ह रिसाई । रिसआपहिंबुधि अवरहिंखाई ॥ ज़ेवर १ दुख २ दिल ३-५ राजा विक्रमादित्य ४ बेहूदा ६ राह ७ बद राह ८ लालमुँह ६ खून १० नागमती रानी ११ हुक्म १२ खाविन्द १३- २०-२४ रानी १४ छोड़ना १५ क़सूर १६ गरूर १७ लौंडी १८-२६ सोना १६ जगह २१ अहंकार २२ दूर २३ जवाब २५ अक़्ल २७ ॥

४२ पद्मावत।

मैं जो कहा रिस करहुन बाला। कोन गयो यहि रिस कर घालाँ ॥ बिरस बिरोध रसहि पै होई। रिस मारै तेहि मार न कोई ॥ तुइ रिस भरी न देखेसि आगू। रिसमहँ काकहँ भयो सुहागू ॥ जेहि रिस तेहि रस जोग न जाई। बेरस हरैदि होय पीराई ॥ जेहिके रिस मिलाय रस दीजै। सो रस तज रिस कोह न कीजै ॥ कंतै सुहाग की पाई साधा। पावै सो जो वही चित बांधा ॥ दो० रहै जो पियकी आयसु, और बरती होय हीन। निरमर्ल देखै चांद जस, जन्म न होय मलीनँ ॥ जुवाहार मन समुझी रानी। सुआ दीन्ह राजाकहँ आनी ॥ नागमती हौं गर्व न लीन्हा। कंत तुम्हार भर्म पिय लीन्हा॥ सेवा करै जो बारहमासा। अतनकि अवगुण करै नियासों ॥ जो तुम देइ नाय के ग्रीवों। छांड़हि नहिं बिन मारे जीवा॥ मिलतहि महँ जन अहो निरौरे। तुमसो अहो अदेशों पियारे ॥ मैं जाना तुम मोहे माहां। देखों ताक तो हौ सबमाहां ॥ का रानी का चेरी कोई। जेहिकहँ मयौ करै भल सोई ॥ दो० तुम सों कोई न जीता, हारा बिक्रर्म भोजँ। पहिले आपहिं खोयकर, करै तुम्हारा खोज ॥ राजै कहा सत्य कहु सुआ। बिनसत कस जस सेंमर भुआ ॥ हो सुख रौती कहो सत बाता। जहाँ सत्य तहँ धर्म संघाता ॥ बांधी सृष्टि १८ अहै सतकेरी। लक्ष्मी अहै सत्य की चेरी ॥ सत्य जहाँ साहस सिधि २० पावा। औ सतबौंदी पुरुष कहावा ॥


पाद-टिप्पणी (Footnotes): औरत १ खराब २-११ हल्दी ३ खाविन्द ४-६ हुक्म ५ पाकसाफ़ ६ मैला ७ गरूर ८ भेद १० गरदन १२ अलग १३ सारा जहान १४ मुहब्बत १५ राजा बिक्रमाजीत १६ नामराजा १७ लाल १८ दुनियां १६ कामिल २० सच बोलनेवाला २१ मर्द २२॥

१. सूआ मिलन व रत्नसेन की विरह यात्रा

कहौं लिलाट दुइजकी जोती । दुइजहिज्योतिकहां जगँओती॥ सहसँ किरणिजोसूर्य्यदिपाये । देखि लिलाट सोउ छिपजाये ॥ का शिर बरणौं दिपै मयंकू । चांद कलंकी वह निकलंकू ॥ आवचांद पुनि राहु गरासा । वह बिन राहु सदा परकासा ॥ तेहिलिलाट पर तिलक जो बैठा । दुइजपास जानहुध्रुवै दीठा ॥ कनक पाट जनु बैठो राजा । सबै सिंगार अस्त्रं लै साजा ॥ वह आगे थिरै रहैन कोऊ । वहका कहिं अस जुरा सँजोऊँ॥ दो० खड्ग धनुष औ चक्रवान, दुइजग मारन नाउँ । सुनिके परा मुरछकै राजा, मोकहँ भये यकठाउँ ॥ भौंहें श्यामैं धनुर्प जनुताना । जासों हेरै मारि बिख बाना ॥ ओहि धनुष वह भौंह चढ़ा । कै हत्यार काल अस गढ़ा ॥ ओहि धनुष कृष्ण पै अहा । ओही धनुष राघव केर गहा ॥ ओहि धनुष रावण संहारों । ओहि धनुष कंसासुर मारा ॥ ओहि धनुष बेधा हत राहू । मारा वही सहस्राबाँहू ॥ ओहि धनुपमें उपनहि चीन्हा । धानिकै आप्पन वै जग कीन्हा वहिभौंहहिशरैं कोइ न जीता । अप्सरैंहिं छिपी छिपी गोपितों ॥ दो० भौंहँधनुष धनधान कै, दूसर सैर न कराय । गगन धनुष उगवै, लांजहि सो छिपजाय ॥ नयने वान सैर पूचन कोऊ । जनुसमुद्र अस उलटहिं दोऊ ॥ रौती कमल करहिं अलभैंवाँ । गुंजहिं मातनकरहिं अपसवां ॥ शिर १-४-६ दुनियाँ २-२४ हज़ार ३ तारीफ़ ५ चांद ६ ऐब ७ रोशन ८ नाम नखत १० सोना ११ हथियार १२ क़ायम १३ मिलना १४ सियाह १५ कमान १६ देखना १७ मौत १८ हाथ १६ मारडालना २० नामराजा २१ तीर अंदाज़ २२ निशाना २३ वान २५ इन्द्रलोककी परी २६ गोपी २७ पंचायत तीर अंदाज़ २८ बराबर २६-३२ आसमान ३० आंख ३१ लाल ३३ भँवर ३४ ॥

४८ पद्मावत । उठहिं तुरंग लेहिं नहिं बागा । जानौँ उलट गगन कहँ लागा ॥ पवन झकोरें देहिं हिलोरा । स्वर्ग लाय भुइँ लाइ बहोरा ॥ जंग डोलै डोलत नयनोंहाँ । उलट औझर चहै पलमाहां ॥ जबहिं फिराये कङ्कन चूरा । असवै भौंह भँवरकी जोरा ॥ समुद्र हिलोर करहिं जनु झूले । खंजन लरहिं मिरगँ वन भूले ॥ दो० भरे समुद्र अस नयन दुइ, माणिक भरे तरंग । आवहिं तीर जाहिं फिर, काल भँवर तेहि सग ॥ ४७ ॥ बरुनी का बरनौं इमै वनी । साधे बान जानु वहि अनी ॥ जुरी राम रावणकी सैना । बीच समुद्र भयें वह नयना ॥ वारहि पार न्यावर सांधे । जासों हेरें लाग विये वांधे ॥ उन्ह बानहिं अस कौन न मारा । वैध रहा सगरा संसारा ॥ गगन नखत जस जाहिं न गिने । वै सब बान वही के हने ॥ धरती बान बेध सब राखे । शाखा ठाढ़ वही सब शाखे ॥ रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढ़े । सूतहिं सूत बेध अस गाढ़े ॥ दो० वरुनि बान जस उपनहिं, वेधी रन वन ढंख । सो जेहि तन सब रोवां, पंखहि तन सब पंख ॥ नासकेँ खंग देवों केहि योगू । खंग खीन वह बदन सँयोगू ॥ नासकेँ देखिल जान्यो सुआ । शुक आय बेसर होय उआ ॥ सुआ जो पियर हीरामन लाजा । और भाव का वरनौं राजा ॥ सुआ सुनाक कठौर नवौरी । वह कोमलैं तिलपुहुँपै सँवारी ॥ घोड़ा १ आसमान २-३-१८ दुनियां ४ आँख ५-८ ममोली ६ हिरन ७ जवाहर ६ लहरि १० किनारा ११ पलक १२-२० तारीफ़ १३ इसतरह १४ फ़ौज १५-१६ देखना १७ सूराख १६ जानवर परिन्द २१ नाक २२-२७ तलवार २३-२५ बराबरी २४ पतली २६ नाम नखत २८ वयान करना २६ सख्त ३० टेढ़ी ३१ मुलायम ३२ फूल ३३ ॥

4 पद्मावत । ४५ प्रेम छोड़ि कुछ और नहिं, सुना जो देखौं मनबूझ ॥ प्रेम सुनत मनभूल न राजा। कठिनप्रेम शिरदियेतेहिछाजा॥ प्रेम फन्द जो पड़ा न छूटा। जीव दीन्ह पै फांद न छूटा॥ गिरगिटै छन्दधरै दुखतीताँ। खनहो पीतं रोंति खन सीतोँ॥ जानिपुछारै जो भयबनबासी। रोवँरोवँपरी फांदनकोआसी॥ पांख फरेरा सोई फांदू। उड़ न सकहिं उरझे भये बाँदू॥ मेउमेउँ निशि दिन चिल्लाय। वही रोष नागिन धरखाय॥ पांडुकै सुआकण्ठ वह चीन्हा। ज्यहिँगै परा चाहि जिवदीन्हा॥ दो० तीतर गयैं ११ जो फांद है, नितहिं १२ पुकारै दोष। मुकि १३ हँकारै फांदगैं १४, मेले कित मारे पुनमोषै॥ राजा लीन्ह ऊबके श्वासा। ऐसे बोल नहिं बोल निरासाँ॥ पहिल प्रेमहै कठिन दुहेलोँ। दोजगँ तरा प्रेम जेहि खेला॥ दुख भीतर प्रेम मधुँ राखा। किंचन मरन चहै सो चाखा॥ जेहिनाहिंशीशँ प्रेमपंथ लावा। सो पृथ्वी मँहँ काहेक आवा॥ अब मैं पीय प्रेमपंथ मेला। पायन ठेल राख कै चेला॥ प्रेमवारसो २६ कहै जो देखा। जें न देखि का जानि विशेखा॥ तबलंग दुख प्रीतम नहिं भेंटाँ। मिलातोजा जरमकैं दुखमेटा॥ दो० जस अनूप तुइ बरैणी, नखँशिख बरौँ शिंगार। है मोहिं आश मिलन की, जो पुखै करतारै॥ १ रंग १ गर्म २ पीला ३ लाल ४ सफ़ेद ५ मोर ६ प्रेमका फन्दा ७ रात ८ गुस्सा ६ कुमरी १० गरदन ११-१५ हमेशा १२ चुप १३ बोलाना १४ नजात १६ नाउम्मेद १७ मुश्किल १८ भारी १६ दोनों जहान २० शराब २१ शिर २२-३५ राह २३-२५ ज़मीन २४ दरवाज़ा २६ मुलाक़ात २७ बहुत दिन २८ बयान करना २६ नाखून से शिरकी चोटी तक ३० तारीफ़ ३१ ईश्वर ३२॥

४६ पद्मावत । खण्ड सातवां श्रृंगारखण्ड पद्मावत ॥ का शिंगार वह बरर्णौं राजा । वहक शिंगार वही पै छाजा ॥ प्रथमे शीशँ कस्तूरी केशौँ । बलि बासुकिको और नरेशाँ ॥ भँवरकेश वह मालति रानी । विषहरँ लरहँ लेहिँअर्घौनी ॥ बेनी छोरि भार जो बारा । स्वर्ग पताल होय अँधियारा ॥ कोमलँ कुटिलँ केशँ नगकौरे । लहरे भरी भुअँगँ बैसारे ॥ बेधीजानि मलैयंगिरि वासा । शीशँ चढ़ी लोटहिँ चहुँपासा ॥ घुंघुरवार अलकें विषै भरे । संकरें प्रेम ज्यों गैयें परे ॥ दो० असफँदवार केशँ वै राजा, पराशीशँ मैं फांद । अष्टोकुलीनार्ग सब डरके, भये केशँ के बांदें ॥ बरैनौँ मांग शीशँ उपराहीं । सेंदुर असै चढ़ा जेहि नाहीं ॥ बिन सेंदुर अस जानहिं दिया। उजेरपंथे रैयैनि महँ किया ॥ कंचन रेख कसौटी कसी । जनु घनमहेँ दामिनि परगँसी ॥ सूर्य्यकिरणजनुगगनैँ बिशेखी। यमुना मांझ सरस्वती देखी ॥ खांड़े धार रुधिरँ जनु भरा । कर्रवँट ले बेनी पर धरा ॥ तेहि पर पूर धरे जो मोती । यमुना मांझ गङ्गाकी सोती ॥ कर्रवँट तपौँ लीन्ह होय चूरू । मगैँ सुरुधिरै लेदेइ सेंदूरू ॥ दो० कनकँ द्वादशँ बानि होय, चही सुहाग वह मांग । सेवा करहिं नखत शेशि तरैई, उवै गगनँ तस मांग ॥ तारीफ़ १ पहिले २ शिर ३-२०-२६-३२ मुश्क ४ बाल ५-६-१६-२६- २५-२६ न्योछावर ६ नामसांप ७ आदमी = सांप १०-१७-१८ खुशबू ११ चोटी १२-४१ आसमान १३-३८-५० मुलायम १४ पेचदार १५ चन्दन १६ ज़हर २२ जंजीर २३ गरदन २४-२७ नाम सांप २८ गुलाम ३० तारीफ़ ३१ राह ३३ रात ३४ सोना ३५-४६ बिजुली ३६ चमक ३७ ख़ून ३६-४५ लोटके ४० नाम जगह जहाँ शिर कटाते हैं ४२ फ़क़ीर ४३ शायद ४४ ख़ालिस ४७ चांद ४८ नखत ४६ ॥

॥ पद्मावत ॥ ५६ पुहुपँ सुगन्ध करहि सब आसा। मगैं हरका थलेइ हम पासा॥ अधरें दशनें पर नासकँ शोभा। दाड़िमँ देखि लुभान मन लोभा॥ खंजनै वेहिदिशँ केलि कराहीं। वेहिँ वहर सको पाव कोउ नाहीं॥ दो० देखि अमी रस अधरनहूँ, भयो नास को कीरै। पवनै बासु पहुँचावे, आश्रम छाडन तीरे॥ अधरै सुरंग अमी रस भरे। बिम्बेँ सुरँग लाज बन फरे॥ फूल दुपहरी जानहु रातैं। फूल झरहिं जो जो कहि बाता॥ हीरा लीन्ह सुविद्रुम धारा। बिहँसत जग तैं होय उजियारा॥ भइ मँजीठ बातहिं रँग लागैं। कुसुम रंग थिरैं रहैन आगैं॥ वहिके अधरैं अँमी भर राखे। अबहिं अछूति न काहूं चाखे॥ मुख तम्बोलैं धार नहिं रसा। केहि मुख योग सो अमृत वसा॥ राता जगत देख रँग राँती। रुधिरैं भरी आद्यहिं बिहँसाँती॥ दो० अमी अधर अस राजा, सब जगै आस करेइ। केहिका कमल बिकासौ, को मधुकरै रस लेइ॥ दशनैं चौक बैठे जनु हीरा। औ बिच बिच रँग श्याम गँभीरा॥ जनु भादौं निशि दामिनि दीसी। चमक उठै तसत ही बत्तीसी॥ वह सो ज्योति हीरा उपराहीं। हीरा वेहिसों तेहि परछाहीं॥ जेहि दिन दशनैं ज्योति निरमई। बहुतै ज्योति ज्योति दा भई॥ रवि शशिन खत दीन्ह वह ज्योती। रतनैं पदारथ माणिक मोती॥ जेहि तेहि विहँसि सभामहँ हँसी। तहँ तहँ छिटक ज्योति परकँसी॥ फूल १ शायद २ बोलना ३ होंठ ४-११-१६-२४-३० दात ५-३४-३६ नाक ६-१२ अनार ७ ममोला ८ तरफ ६ अमृत १०-२५ तोता १३ हवा १४ किनारा १५ कुन्दरू १७ लाल १८-२७ मूंगा १६ हँसना २०-२६-४४ दुनियां २१-३१ लाख २२ क़ायम २३ पान २४ खून २८ खिलना ३२ संवरा ३३ बहुत काला ३५ राति ३६ बिजुली ३७ देख पड़ना ३८ बनाई गई ४० सूर्य ४१ चांद ४२ जवाहिऱात ४३ उजियारा ४५॥

५० पद्मावत ।

दामिनि¹ चमकन सरखँरि पूजा । पुनिवहज्योतिहोयकोदूजा॥ दो० बिहँसत हँसत दशनैं³ तस, चमकी पाहनैं⁴ उठी लूँक⁵ । (१०७) दाड़िम⁶ सरै जो नकैसँका, फाट्यो हिया दर्क॥ रसना⁸ कहौं जो कहि रसबाता । अमृत बचन सुनत मनराता ॥ हरीशिशिरं चातकैं कोकिला । वीनवंशीवेनैं जेहिमिला ॥ चातकैं कोकिलरसहिंजोनाहीं । सुनिवै वयनैं लाजछिपजाहीं ॥ भरै प्रेम मँधु बोलहिं बोला । सुनै सो मात घूमके डोला ॥ चतुरैवेदमति सब वह पाहां । ऋगयजुसामअथर्वणमाहां ॥ इकइक बोल अर्थ जो गुना । इन्द्र मोहि ब्रह्मा शिरधुना ॥ भागवतभैर्थ पिंगलऔगीता। अर्थजो जेहिपण्डितनहिंजीता ॥ दो० भाखैंसँती औ व्याकरण, सुनी पिंगल पाठ पुराण । (१०८) वेद भेदसों बात कहि, जनुलागैं हिये¹⁷ बाण ॥ पुनि बरैनों का सुरंग कपोलों । इक नारँगके दो किये गोला ॥ पहुपैं पंगरसमृतसांधे । कै अस सुरंग खरोरैं बांधे ॥ तेहि कपोलैं बायें तिलपरा । जो तिल देखिसो तिलतिलजरा ॥ जनु घुंघुंची वह तिलकरमुँहाँ । बिरहबान सांधो सामुहां ॥ अगिनबान तिल जानहु सूझा । इककटाक्ष लाख दुइजूझा ॥ सो तिलकाल मेट नहिं गयो । अब वह कालकाल जग भयो ॥ देखत नयनैं परी परछाहीं । तेहिते रातैं श्याम उपराहीं ॥ दो० सोतिल देखि कपोलैं पर, गगनैं रहाध्रुवै गाड़ । बिजुली १ बराबर २ दांत ३ पत्थर ४ लूक ५ अनार ६ बराबरी ७ जीभ ८ दूरकरता जरदीका ६ पपीहा १०-१२ आवाज़ ११-१३ शराब १४ चार १५ महाभारत पुराण १६ पोथी १७ दिल १८ बयान करना १६ गाल २०-२३-२६ फूल २१ लड्डू २२ कालामुँह २४ दुनियां २५ आंख २६ लाल २७ सियाह २८ आसमान ३० नामनखत ३१ ॥

। पद्मावत । ५१. खनहि उठै खन बूड़ै, डोलै नहिं तिलछाड़ ॥(१०५) श्रवण सीप दुइ दीप सँवारे। कुण्डल कनक रचे उजियारे ॥ मणिकुण्डल चमकहिं अतिलोने। जनुकैंबधाल वकहिं दुइ कोने ॥ दोउदिश चांदसूर्यचमकाहीं। नखतहँसरीनिरखि नहिंजाहीं॥ तेहिपर घूंघट दीप दुइ वारे। दुइ ध्रुवं दुहुं खूंट बैठारे॥ पहिरें घंटी सिंहलदीपी। जानहु भरे कहजही सीपी ॥ खनखन जाहि चीर शिरगहाँ। कांपतबीज धौलंदिशि रहा॥ डरहिं देव लोक सिंहला। पड़ैन बीज टूटि तेहि कला॥ दो० करहिं नखत सब सेवा, श्रवण दीन्ह अस दोउ । चांद सूर्य अस कहैं, और जगत का कोउ ॥ (१०६) बैरण ग्रीवं कोंवै कीरीसा। कंचन तार जुलाग्यो सीसा ॥ कँडे फेर जानुगैं गाढ़े। हरी एडुंरें ठगे जनु ठाढ़े ॥ जनु हिये काढि परेवाँ ठाढ़ा। तेहिते अधिक भावगैं बढ़ा॥ चाक चढ़ाय सांच जनु कीन्हा। वागतुरंगें जानगाहिलीन्हा॥ गये मयूर तमचोरेँ जोहारा। उन्हें पुकारैं सांझ सकारा ॥ पुनितेहिठाँउ परी त्रिय रेखा। घूंट जो पीक लीक तसदेखा ॥ धन वह ग्रीवं दीन्ह विधि भाउ। वहिकाकहिं ले करे मिराँउ ॥ दो० कण्ठै श्री मुक्ताबन मालौ, सोहै अनूरुवै ग्रीवै । की होय हारकण्ठ लागै, कै तप साधा जीव ॥ (१०७) कनकें दण्ड दुई भुजा कलाई। जानहु फेर कँडेरे भाई ॥ कान १-१३ सोना २-१८-३७ खूबसूरत ३ देखना ४ वाली ५-७ नाम नखत ६ सेचना बिंजुली ६-१२ सफ़ेद १० तरफ ११ दुनियां १४ तारीख़ १५ गरदन १६-२०-२५-३०-३६ कलंगी १७ खरादी १८-३८ मोर २१-२७ दिल २२ कबूतर २३ बहुत २४ घोड़ा २६ सुरगा २८ जगह २६ ईश्वर ३१ मुलाक़ात ३२ नाम ज़ेवर ३३ मोतीका हार ३४ ज़ेवर ३५ ॥

५२ पद्मावत । कदल गाभकी जानौ जोरी । औ राँती वह कमल हथोरी ॥ जानौ रक्त हथोरी बूड़ी । रवि प्रभातें तातें वै जूडी ॥ हियाँ काढ़ि जनु लीन्हेसि हाथा । रुधिरें भरी अँगुरी तेहि साथा ॥ औ पहिरें नगजरी अँगूठी । जग बिन जीव जीव वह मूठी ॥ बाहूं कंगन ताड़ सलोने । डोलत बाहु भावगत लोने ॥ जानो गति वेरैनै देखराय । बाहुँ डुलाय जीव लेजाय ॥ दो० भुज उपमाँ पौनारिनै पूजी, खीनें भई तेहि चिन्तैं । ठाँवहिं ठावँ बेधै भई हृदयैं, ऊव सांसले निन्त ॥ हियों थार कुचैं कंचने लाडू । कनक कचूर उठेकै चाडू ॥ बेधे भँवर कंट केतकी । चाहैं वेध कीन्ह कंचुकी ॥ कुन्दन बेल साज जनु गूँदे । अमृत भरे रतन दुइ मूंदे ॥ यौवन बाण लेहिं नहिं बागा । चाहहिं हुलसहिये में लागा ॥ अगिन बाण दुइ जानों सांधे । जगै वेधे जो होहिं न बांधे ॥ उतंग जंभीर होय रखवारी । छुइको सकै राजाकी वौरी ॥ दाड़िम दाखैं फरी अब चाखा । असनारँग वेहिका कहिराखा ॥ दो० राजा बहुत मुये तप, लाय लाय भुइँ माथ । काहूं छूय न पारी, गये मरोरत हाथ ॥ पेट पतरि जनु चन्दन लावा । कहकहकेसरँ वरणैं सुहावा ॥ क्षीर अहार न कर सुकमारा । पान फूल लैरहै अधारा ॥ श्यामभुअंगिनि रोमावली । नाभी निकस कमलकहँ चली ॥

लाल १ लोहू २-७ सूर्य ३ ओर ४ गर्म ५ दिल ६-२०-३० दुनियां ८-३१ नामज़ेवर ६ खूबसूरत १०-११ तवायफ़ १२ बराबरी १३-१५ कमलकी नाल १४ पतली १६ शौच १७ जगह १८ छेद १६-२५-२७ छाती २१-२२ सोना २३-२४नोक छाती के एडडी की २६ अँगिया २८ पोशाक २६नीबू ३२ बेटी ३३ अनार ३४ अंगूर ३५ खुशबू ३६ रंग ३७ दूध ३८ कालीनागिनि ३६ ॥

पद्मावत । ५३ आय दोहों नारंग बिच भये । देखि मयूर ठमक रहिगये ॥ आय जुरी भँवरन की पांती । चन्दन गाभ वास की माती ॥ गइ कालिन्दी बिरह सताई । चलपराग अरबैल बिचआई ॥ नाभी कुंड सो वानारसी । साँहें को होय मीचें तेहिलिखी ॥ दो० शिरकरवँततनकाशी लैले, बहुतसीफ तेहिआश । (१५४) बहुत धूम घूँट मैं देखी, उत्तर न देइ निराश ॥ चोंटी पीट लन्हि वै पाछें । जनु पहिर चली अप्सरा काँछें ॥ मलैयागिरि की पीठि सँवारे । बेनी नाग चढ़ा जनु कारे ॥ लहरैं देत पीठ जनु चढ़ा । चीर उढ़ावा केंचुल मढ़ा ॥ वेहिकाकहँ अस बेनी कीन्ही । चन्दनवास भुअंगहि लीन्ही ॥ कृष्णकरा चढ़ा वह माथे । तब सो लूटि अब छूटन नाथे ॥ कारे कमल गहे मुख देखा । शशि पीछे जनु राहुबिशेखा ॥ को देखै पावै वह नागु । सो देखै माथे मन भागू ॥ दो० पन्नग जो पंकज मुखगहे, खंजन तेहिशिर बैठ । (१५५) छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जो दीठ ॥ लंक खीन असआहिनकाहू । केहरि कहूँन वह सरताहू ॥ बसा लंक पखनीगजभीनी । तेहितेँ अधिक लंक वहखीनी ॥ परहँस पिवर भये तहँ बसौ । लिये डंख मानुष कहँ डसां ॥ मानहुँ नलिन खंड दुइ भये । दुहँबिच लंक तार रहिगये ॥ हिये सोमूड़परचलीवहनागा। पैगदेत कितसहसैकै लागा ॥ यमुना १ नाममुक़ाम २ बराबर ३ मौत ४ धुआं ५ जवाब ६ ना- उम्मेद ७ इन्द्रपरी ८ धोती ६ चन्दन १० चोटी ११-१२ काला नाग १३- १४ पकड़ना १५-१६ चांद १६ सांप १७ कमल १८ ममोला २० कमर २१- २५-२८-३३ पतली २२ चीता २३ भंवरा २४-३१ बहुत पतली २६ बहुत २७ बारीक २६ डाह ३० कोकावेली ३२ छाती ३४ डर ३५ ॥

छुद्रघंट मोहहिं नरराजा । इन्द्र अखाड़ आये जनु बाजा ॥ नाम बीन गैहे कामिनी । लाकहिं सबै राग रागिनी ॥ दो० सिंहैं नजीता लंकैं शर, हार लीन्ह बनवास । तेहि रिस रक्तपिये मानुष, खाय मारके मांस ॥११५॥ नाभी कुण्डसो मलयसमीरू । समुद्र भँवर जस भवै गंभीरू ॥ बहुते भँवर बौंडर भये । पहुँच न सके स्वर्ग कहँ गये ॥ चन्दनमांझ कुरंगिन खोजू । वेहिंको पाव को राजा भोजू ॥ को वह लागहि वंचल सींझा । काकहिं लिखी ऐसको रीझा ॥ सोहै कमल सुगन्ध शरीरू । समुद्र लहर सोहै तन चीरू ॥ झूलहि रतन पाटके झोपां । साज मदन वहिकाकहँ कोपा ॥ अबहिं सो अहै कमलकी करी । नजनों कौन भँवर कहँ धरी ॥ दो० बेधरही जग बासना, निरमलै मेदै सुगन्ध ।११६। तेहि अरघान भँवर सब लुब्धे, तजेंहिं न दियेबन्ध ॥ बैरणों तम्बै लंकै की शोभा । औ गर्जे गवनदेख सबलोभा॥ जुरे जंघ शोभा अति पाये । केला खंभ फेर जनु लाये ॥ कमल चरण अतिरौंत विशेखी । रहै पांट पर भूमि नदेखी ॥ देवता हाथ हाथ पगलेहीं । जहँ पगपरै शीशँ तहँ देहीं ॥ माथे भागन कोउ अस पावा । चरणकमल लै शीशँ चढ़ावा॥ चौरा चांद सूर्य उजियारा । पायल बीच करहिं झनकारा॥ अनवट बिछिया नखत तँराई । पहुँच सकै को पांइन ताई ॥

करधनी १ नामबाजा २ पकड़ेहुये ३ चीता ४ कमर ५ चन्दनकी हवा ६ गंहिरा ७ आसमान ८ हरिनके पांवका निशान ९ लहँगा १० कामदेव ११ पांकसांझ १२ केसर १३ छोड़ना १४ तारीफ़ करना १५ चूतड़ १६ कमर १७ हाथी १८ बहुत लाल १६ तख़्त २० ज़मीन २१ क़दम २२ शिर २३-२४ छोटे नखत २५ ॥

पद्मावत । ५५ दो० वरन शिंगार न जान्यो, नखशिख जैस अभोग । तस जग में कछू न पायों, उपमां देव वह योग ॥ मुनिके राजा गयो मुरझाय । जानो लहर सूर्य के पाय ॥ प्रेम घाव दुख जानि न कोई । जेहि लागै जानै पै सोई ॥ परा सुप्रेम समुद्र अपारा । लहरहिं लहर होय बिसआराँ ॥ विरह भँवर होय भांवर देय । खनखन जीव हिलोरहिं लेय ॥ कितहिं निसाँसँ बूड़िजिवजाइ । कितहिं उठै निसाँसै बौराइ ॥ कितहिं पतिं खन हो मुखसेताँ । कितहिंचेते खनहोयअचेताँ ॥ कठिन मरन ते प्रेम व्यवस्था । नान जिये न जाय अवस्थाँ ॥ दो० जनु लै हारहिंलीन्ह जिव, हरहिं त्राँसेहि ताहि । इतना बोल न आव मुख, करें त्राहि त्राहि ॥ जहँलग कुटुंब लोग औ नेगी । राजारायआय सब बेगी ॥ ज्ञानवन्त गुणी कारणी आये । ओझा वैद्य सयान बुलाये ॥ चरचहिं चेतै परखहिं नारी । नेरें नाहिं औषध तहिं बारी ॥ है राजा लक्ष्मण के कराँ । शक्ती बान मोह है पराँ ॥ तहँ सो राम हनुमन्त बलदौरी । को लै आव सजीवनमूरी ॥ बिनय करहिं जेतो गढ़पती । का जीव कीन्ह कौन मतमती ॥ कहोसो पियर काहि पुनि खांगा । समुद्रसुमेरु औरतुमहिंमांगा ॥ दो० धावने तहां पठावैं, देहिं लाख दशरोकें । होयसो बेल जेहिबारी, आनहिं सबै बरोकैं ॥ जो भा चेत उठा बैरागा । बावर जनो सोय उठि जागा ॥ दुनियाँ १ मिसाल २ बेकरार ३ वेदम ४-५ पीला ६ सफ़ेद ७ होश ८ बेहोश ६ हाल १० दुखदेना ११ जल्द १२-१६ चेहरेकी हालत १३ नजदीक १४ मानिन्द १५ राजा १६ दूत १७ नक़द १८ ॥

५६ पद्मावत । आय जगत बालक जस रोवा। उठा रोय हा ज्ञान सो खोवा॥ हौं तो अहा अमर पुर जहां। यहां मरन पुर आयों कहां॥ कै उपकारै मरन पर कीन्हा। सुँकि जगाय जीव हर लीन्हा॥ सोवत रहा जहां सुख साखा। कसन तहां सोवत विधि राखा॥ अब जिव वहां यहां तन सूना। कवलग रह यहि भान वहूना॥ जो जिव घटै कालके हाथा। कठिन नेकपै जीवन साथा॥ दो० उठहिं हाथ तन सरवरैं, हियाँ कमल तेहि माहिं। नयनन्हिं जानहु नेरे, फेर पहुँचत अवगौहिं॥ सबहिं कहा मन समझो राजा। कालें से ते कुछ जूझे न छाजा॥ तासों जूझें जात जो जीता। जातन कृष्ण तजेंहिं गोपिता॥ उनहिं नेहूँ काहू से कीजे। नाउँ मेटि काहे जिव दीजे॥ पहिलहिं सुख नेहूँ जब जोरा। पुनि हो कठिन निबाहत ओरा॥ रहत हाथ तन जैसे शरीरू। पहुँच न जाय परातस फेरू॥ गगनं दृष्टि सो जाई पहुँचा। प्रेम अहँ दृष्टि गगनै ते ऊँचा॥ ध्रुवै ते ऊँच प्रेम धुवै उँचा। शिर दै पाऊँ दिये सो लुआ॥ दो० तुम राजा औ सुखिया, करो राजसुख भोग। यहरे पंथ सो पहुँचे, सहै जो दुःख वियोग॥ सुवै कहा मन समझो राजा। करत प्रीति कठिन है काजा॥ तुमहि अबहिं जेई घर पोई। कमल न भेटहिं भेटहिं कोई॥ जानहि भँवर जो तेहि पँथै लूटे। जीव देहि औ दिये न छूटे॥ दुनियाँ १ बैकुंठ २ अहसान ३ चुपचाप ४ ईश्वर ५ अलग ६ तालाव ७ दिल ८ आंख ६ हाथ १० गहरा ११ मौत १२ लड़ाई १३-१४ छोड़ना १५ मुहब्बत १६-१७ मुश्किल १८-२८ कदम १६ आसमान २०-२३ निगाह २१ अंग्रेज २२ नाम रुखत २४-२५ राह २६-३१ विरह २७ मुला- क़ात २६ कोकावेली ३०॥

पद्मावत। ५७ कठिनै आह सिंहलकर साजू । पाई नाहिं जो झांकै साजू ॥ वह पंथै जाय जो होय उदासी। योगी यैती औ तपी संन्यासी॥ भोग किये पायत वह भोगू । तर्ज सो भोग कोइ करतन योगू ॥ तुम राजा चाहो सुख पावा। योगहि भोग करत नहिं आवा ॥ दो० साधेन सिद्धन पाई, जोलौ साधि न तप्प । सोपै जानहिं बापुरो, शीशें जो करतहिं कल्प ॥ का भाखे कहानी कथा। निकसै घीव न बिन दधि मथा ॥ जो लह आप हेराय न कोई। तौलहि हेरत पाव न सोई ॥ प्रेम पहाड़ कठिनै बिधि १२ गढ़ा। सोपै जाय शीशें सों चढ़ा ॥ पंथै सूरि नगर उठा अँगूरू। चोर चढ़ार्क चढ़ि मंसूरू ॥ तुइँ राजा का पहिरेसि कंथा। तोरे घरहिमांझ दश पंथा ॥ कामक्रोधे तृष्णां मनमाया। पांचौ चोर न छांड़हिं कायों ॥ नव सेंध २१ गढ़े २२ के मंझियारों । घर मूसहिं निशि २३ के उजियारा॥ दो० अबहूँ जागि अयानी, होत आवनि शि२७ ओर। पुनि कुछ हाथ न लागै, मूसजायँ जब घोर ॥ सुनि सो बात राजा मन जागा। पलकन मारि टकटकालागा॥ नयनन्हिं ढरहिं मोति औ मूंगा। जस गुड़ खाय रहा है गूँगा ॥ हियें की ज्योति दीपवह सूझा । यह जो दीप अँधेरा बूझा ॥ उलटि दृष्टि ३० माया सो रूठी। पलक न फिरी जान कै झूठी॥ जो पै नाहीं इस्थिर दसा । जंग उजारि का कीजे वसा ॥ : मुश्किल १-११ लड़ाई २ राह ३ किस्मफ़क़ीर ४-५-६-७ छोड़ना ८ फ़क़ीर ६-१५ शिर १०-१३ ईश्वर १२ राहसूरीकी १४ गुदड़ी १६ बीच १७ राह तथा नाक कान आँख मुहँ गुदा लिंग १८ गुस्सा १६ हवस २० बदन २१ सूराख २२ क़िला २३ दरमियान २४ रात २५-२७ नादान २६ आंख २८ दिल २६ नज़र ३० ॥

५८ पद्मावत। गुरु बिरह चिनगी पै मेला। जो सुलगाय लिये सो चेला॥ अबकी पतङ्गे भृङ्ग की करौं। भँवर होऊँ जेहि कारन जरा॥ दो० फूल फूल फिर पूँछौं, जो पूँछौं वह केतें। तन न्यौछावर कै मिलौं, ज्यों मधुकैरै जिउदेत॥ हिन्दूमीतैं बहुत समझाया। मान न राजा गवन भुलावा॥ उपजै प्रेमपीर जेहि आये। परबुधि होत अधिकै सोआये॥ अमृत वात कहत बिष जाना। प्रेमको वचन मीठ कै माना॥ जो वह बिषे मारिकै खाय। पूँछौ ताही प्रेम मिठाय॥ पूँछौ बात भरथंरहि जाय। अमृतराज तँजो विषखाय॥ औ महेशैं बड़ सिद्ध कहावा। उनहूँ विषे कण्ठ पै लावा॥ होतउयो रबि किरण निकासा। हनुमन्तहोय को देइसुआसा॥ दो० तुमसब सिद्धि मनावहु, होय गणेश सिधिलेहु। चेला कीन चलावै, तुलै गुरू जेहि भेहु॥ तजौं राज राजा भा योगी। केरै किंकरी तन कियो वियोगी॥ तन बिसभेरैं मनबावरलटा। उरझा प्रेम परी शिर जटा॥ चन्द्रबदनै औ चन्दनदेहा। भस्म चढ़ाय कीन्ह तनखेहौँ॥ मेखलँ सिंहे चक्र ढिंढारे। लीन्ह हाथ तिरशूल सँभारे॥ कंथों पहिर दण्ड केरै गहौँ। सिद्धिँ होयकहँ गोरखेँ कहा॥ मुद्रौं श्रवणैं करँठे जपमाला। केरैउहियां कांध सिंहंछाला॥ पांवरेँ पायलीन्ह शिर छाता। खप्पर लीन्ह भेषै कै रातौँ॥ ┈┈ परवाना १ नामकीड़ा २ मानिन्द ३ केतकी ४ भँवरा ५ दोस्त ६ नसी- हत ७ बहुत ८ वांत ६ राजाभरथरी १० छोड़ना ११-१४ महादेवजी १२ सूर्य १३ हाथ १५-२२ दुःखी १६ बेकरार १७ मुँह १८ राख १६ मस्तहाथी २० गुदड़ी २१ पकड़ना २३ पूराहोना २४ नामफ़क़ीरकामिल २५ वाला २६ कान २७ गरदन २८ सुमरिनी २६ चीतेकीखाल ३० खड़ाऊँ ३१ सूरत ३२ लाल ३३॥

पद्मावत । ५६ दो० चला भीखि मांगने कहँ, साजकिया तप योग । सिद्धिहोय पद्मावत पाये, हृदयँ जबकि बियोग ॥ गणकैकहहिं करगवन न आजू । दिन लै चलहिं होयसिधकाजू ॥ प्रेमलुब्ध दिन घड़ी न देखा । तब देखी जब होय सरेखा ॥ जेहितन प्रेम कहां तेहि मासू । काया रक्त न नयनहि आंसू ॥ पण्डित भुलान न जानहिचालू । जीवलेत दिन पूँछ न कालू ॥ सती कि बौरी पूँछै पांडे । औ घर बैठि नसैं तैं भांडे ॥ मरिजो चलै गङ्गा गति लेइ । तेहि दिन कहां घड़ी को देइ ॥ मैं घर वार कहां कर पावा । घरकार्यों पुनि अन्ते परावा ॥ दो० होरे पखेरू पंखी, जेहि वन मोर निवाहि । खेलचला तेहि वन कहँ, तुम अपने घरजाहि ॥ चहुँदिशे आनसो डौंड़ी फेरी । भइ कट्केई राजा केरी ॥ जानवन्त अहहि सकलें दरकानौ । सांभरलेहु दूरहै जाना ॥ सिंहलद्वीप जायसब चाहा । मोल न पावब जहां बिसाहा ॥ सबनिवहै पुनि आपन सांठी । सांठी बिनसोरहँ सुखमाठी ॥ राजा चला साज कै योगू । साजो बेगेँ चलें सबलोगू ॥ गैर्बजो चढ़ीतुरौ केपीठी । अबमुइँच लहुस्वर्ग सोडीठी ॥ मंत्रों लीन्ह होहु सँग लागू । गुदरजाय सबहो यह आगू ॥ दो० का निश्चिन्तै रे मनै, अपनी चिन्ता आछ । लेह सजगेँ आ आगमनैं, पुनि पछतास न पाछ ॥ कामिल १-२ दिल ३ दुःख ४ नजूमी ५ पूरा ६ दीवाना ७ होशियार ८ बदन ९-१० आखिर ११ चारोंतरफ़ १२ फ़ौज १३ सब १४ अरकानदौलत १५ पूँजी १६-१७ जल्द १८ गरूर १६ घोड़ा २० आसमान २१ निगाह २२ सलाह २३ ग़ाफ़िल २४ फ़िकिर २५ होशियार २६ पहिले २७ ॥

६० पद्मावत। बिनवै रतनसेन की मायाँ । माथेछात पाटें नितैं पाया ॥ बर्षहिनवनिधि⁴ लक्षापियारी । राजछांड़ि जन होहिं भिखारी ॥ नितैं चन्दन लागै जेहि देहा । सो तन देखि भश्वअवखेहां ॥ सब दिन रहे करत तुम भोगू । सो कैसे साधव तप योगू ॥ कैसे धूप सहब बिन छाहां । कैसे नींद पड़ै भुइँ माहां ॥ कैसे ओढ़ब काँथर कंथाँ । कैसे पांय चलब भुइँ पंथाँ ॥ कैसे सहब खनहिं खन भूखा । कैसे खाव करकटा सूखा ॥ दो० राज पौंटं देरै पुरुष सब, तुमहीं सों उजियार । बैठि भोग रस माहिंके, नचल तेहि अँधियार ॥ मोहिं यह लोभ सुनाव न माया । काकर सुख काकर यह काया॥ योनियानं तन होइ यहछारों । मोटी पोष मरै को भारा ॥ का भूलौं यहि चन्दन चोवा । वैरी जहां अंग के रोवा ॥ हाथ पांय श्रवणैं औ आंखी । ये सब भरहिं आय पुनि साँखी ॥ सूति १६ सूतितन बोलहिं दोखाँ । कहो कहँहो यह गति मोखाँ ॥ जो भलहोत राज औ भोगू । गोपिचन्दै नहिं साधत योगू ॥ उन्हें सृष्टि २० जो देख परेवा । तजौं राज कजरी वनसेवा ॥ दो० देखि अन्तैं अस होयहि, गुरू दीन्ह उपदेश । सिंहलद्वीप जाबमैं माता, तुमसों मोर अंदेशै ॥ रोवहिं नागमती रनवासू । कै तुम कन्तै दीन्ह वनवासू ॥ अबको हमहिं कोहि भोगिनी । हमहूँ साथ होयहहिं योगिनी॥ की हम लावहु आपन साथा । की अब मार चलहु सेंहाथा ॥ अरज़करना १ तख़्त २-१० हमेशा ३-५ सब दुनियांकी दौलत ४ राज ६- १३ गुदड़ी ७ राह ८ टुकड़ा रोटी ६ फ़ौज ११ आख़िर १२-२२ कान १४ गवाही १५ सूराख़ १६-पाप १७ नजात १८ नामराजा १६ संसार २० छोड़ना २१ सलाम २३ ख़ाविन्द २४ ॥