भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीप का संक्षेप ४५


स्वयमेव छूट जाता है । इस तत्व का ज्ञान होने पर भी यदि भूख प्यास से इस तत्व को चोट लगती हो, यह तत्व, भाग जाने को या ओझल हो जाने को तय्यार होता हो, तो भूख प्यास जिस अहंकार को लगी है उसी में रहने दो । दूसरे के धर्मों को अपने में मत लादो । ये भूख प्यास तादात्म्य कर लेने से ही आत्मा को लगती है। उस अध्यास को हटाकर विवेक की आवृत्तियें सदा करनी चाहिये । क्योंकि अध्यास रूपी शत्रु के हमलों को विवेक की ढाल से ही रोका जा सकता है । चिदात्मा को अलग रक्खा जाय और अहंकार को पृथक् जाना जाय तो अब आप आजाद होकर करोड़ों पदार्थों की इच्छा कीजिये, ग्रन्थि भेद हो चुकने से अब आपको बाधा नहीं होगी । ग्रन्थि भेद हो चुकने पर भी प्रारब्ध के दोष से इच्छायें हो ही सकती हैं । इच्छाओं से घबराने की ज़रूरत नहीं है । देह में व्याधि हों, वृक्ष आदि पैदा हो या सूखे, अहंकार में इच्छा हो तो इससे चेतन आत्मा का क्या बिगाड़ होता है ? आत्म तत्व का बिगाड़ वैसे तो ग्रन्थिभेद से पहले कुछ भी नहीं होता था यह बात अगर समझ में आती है तो इसी को 'ग्रन्थि-भेद' होना कहते हैं । परन्तु अज्ञानी पुरुष इस बात को समझते नहीं हैं, यही तो एक 'ग्रन्थि' है । अज्ञानी और ज्ञानी में इस 'ग्रन्थि' के होने और न होने का ही भेद है । वैसे देखने में-व्यवहार में-तो दोनों एक ही से होते हैं । ग्रन्थि के टूटने की पहचान गीता में यों कही है कि आये हुए दुःखों से द्वेष नहीं करता तथा जाने वाले सुखों से 'और ठहरो' नहीं कहता । किन्तु उदासीन की तरह से काम करता है । अर्थात् अंदर से त्याग और बाहर से संग रख कर काम में लगा रहता है। जो लोग काम करना छोड़ देने को ही

४६ पंचदशी


ज्ञान का फल मानते हैं वे चूक करते हैं। उनकी समझ में आया हुआ ज्ञान तो शरीर आदि को निकम्मा कर देने वाला एक प्रकार का रोग ही है। छोड़ने की चीज़ तो संग है। व्यवहार छोड़ने की चीज़ ही नहीं है। जिसे सुख की इच्छा हो वह संग का परित्याग करे। व्यवहार से किसी का भी कुछ नहीं बिगड़ता। किन्तु संग से बिगाड़ होता है। लोक में भी किसी से मनुष्य- हत्या का व्यवहार हो जाय और उसमें उसकी सक्ति न हो तो वह उस पाप का अपराधी नहीं होता। व्यवहार के बन्द होने का कारण ज्ञान नहीं है। व्यवहार के चलने और बन्द होने की बात को समझने के लिये 'वैराग्य' 'ज्ञान' तथा 'उपरम' को भले प्रकार समझ लेना चाहिये। भोगों में दोषदर्शन से वैराग्य उत्पन्न होता है, भोगों को त्याग देने की इच्छा, वैराग्य का स्वरूप है, भोगों में दीनभाव न रहना वैराग्य का कार्य है। श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, सत्य और असत्य की पहचान हो जाना तत्वज्ञान का स्वरूप है, ग्रन्थि का फिर न लगना तत्वज्ञान का कार्य है। यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरभक्ति) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि करते रहने से उपरम पैदा होता है, बुद्धि का रुक कर खड़ा हो जाना उपरम का स्वरूप है, व्यवहार का घट जाना या बन्द हो जाना यह उपरम का कार्य है, तत्वज्ञान होते ही जो लोग जल्दबाजी में आकर बाह्य व्यवहार को बन्द कर देने पर तुल जाते हैं, उनके मनो-व्यापार तो चलते ही हैं। यों ज़बर- दस्ती व्यवहार को त्यागनेवाले की अन्दर अन्दर अवनति होती ही जाती है। उसकी अतृप्त वासनायें कभी भी जाग कर उपद्रव

चित्रदीप का संक्षेप ४७


खड़ा कर देती हैं। होना यह चाहिये कि तत्वज्ञान होने पर जब हमारा मानस-संसार (या जीव का द्वैत) मर जाय या मार दिया जाय तब हम ईश्वर के संसार को (ईश्वर के द्वैत को) ध्यान में रखकर व्यवहार करने लगें। अर्थात् अब तक जो कर्म हमारे संसार में आसक्ति-पूर्वक हो रहे थे, वे अब ईश्वर के संसार में अनासक्तिपूर्वक होने लगें। यमादि का अभ्यास करने से हमारा मानस जगत् छिपने लगेगा तथा ईश्वर का संसार हमारी आंखों के सामने आ जायगा। यों दैवी सम्पत्ति का विकास होगा और वह भी धीरे-धीरे हमको पूर्ण-तत्व में जाकर जब छोड़ देगा, तब अपने आप स्वाभाविक रीति से व्यवहार क्षीण होगा। उपरति के अभ्यास से ही सच्चा व्यवहार क्षय होगा। यदि व्यवहार क्षय करने में आसक्ति होगी तो वह भी तो व्यवहार की तरह ही बन्धक होगी। व्यवहार का क्षय तो उपरम से होता है ज्ञान से व्यवहार का क्षय कदापि नहीं होता। वैराग्य और उपरम पूर्ण हों बोध रुका हो तो मोक्ष मिलने वाला नहीं है। बोध में पूर्णता हो फिर चाहे वैराग्य और उपरम पूर्ण न भी हो (अधूरे हों) तो भी मोक्ष अवश्य मिलेगा, परन्तु जीवन्मुक्ति का देवदुर्लभ आनन्द नसीव नहीं होगा। ब्रह्म-लोक तक को तृण-तुल्य समझना वैराग्य की अन्तिम सीमा है। देहात्मा की तरह पर तत्व को आत्मा समझ लिया जाय यह बोध की अन्तिम दशा है। सुप्ति की तरह संसार को जागरण में भी भूल जाना उपरम की सीमा है। हमारे आत्म-चैतन्य में जो यह जगत् रूपी चित्र माया ने बना दिया है ज्ञान की महिमा से इसकी ओर न देखकर जब हम अपने आत्म-चैतन्य को शेष रख लेंगे तब जगच्चित्र को देखकर भी मोह नहीं होगा।

7. Triptidipa

:[७] तृप्तिदीप का संक्षेप पुरुष यदि अपने आपे को पहचान जाय कि यह तत्व मैं हूँ ( मेरा स्वरूप यह है ) तो फिर न तो इच्छा करने की कोई वस्तु ही रह जाती है और न कोई इच्छा करने वाला तत्व ही शेष रहता है। यों आत्मज्ञानी को शरीर के सुखदुःखों के साथ साथ सुखी या दुःखी होना नहीं पड़ता। इसी बात का विस्तार पूर्वक वर्णन इस 'तृप्तिदीप' नामक प्रकरण में जीवन्मुक्त महाशयों में रहने वाली तृप्ति को बताने के लिये किया है। इसे समझने के लिये जीव को दो भागों पर विचार कीजिये— एक इसका भ्रम भाग है दूसरा इसका अधिष्ठान भाग है। जब भ्रम भाग की प्रधानता होती है और अधिष्ठान भाग दबा सा रहता है तब तो यह 'जीव' अपने को 'संसारी' माना करता है। जब तो भ्रम भाग को मिथ्या समझ कर उसका अनादर कर दिया जाता है—जब भ्रम को भुला दिया जाता है और अधिष्ठान भाग ही प्रधान बन जाता है तब यही जीव 'मैं तो चिदात्मा हूँ मैं तो असंग हूँ' ऐसा जानने लग पड़ता है। कल्पित सर्प का वहां से नष्ट हो जाना जैसे सत्य नहीं होता है,इसी प्रकार जीवों को होने वाला 'मैं असंग हूँ' इत्यादि ज्ञान भी सत्य तो नहीं होता है परन्तु जैसे कांटों से कांटों को निकाल देते हैं इसी प्रकार इन असत्य ज्ञानों से भी असत्य संसार का नाश तो हो ही जाता है।

तृप्तिदीप का संक्षेप ४९ जब हम किसी बड़े भारी जनसमुदाय में घुसते हैं तब अपने खो जाने के डर से अपने शरीर पर कोई भी चिह्न नहीं कर देते हैं। क्योंकि हमको इन शरीरों के आत्मा होने का सन्देह भी नहीं होता है, और हमें इस विषय में विपर्यय भी कुछ नहीं होता है। इतना ही पक्का ज्ञान जब किसी को आत्मतत्व के विषय में हो जाय—व्यापक जगदात्मा को ही जब कोई अपना आपा समझने लग पड़े, जब कोई देहात्मज्ञान की पूरी पूरी बाधा कर सके—तब ऐसे पुरुष की मुक्ति उसके न चाहने पर भी होती ही है। यों तो यह आत्मतत्व सब को सदा प्रत्यक्ष ही रहता है, परन्तु नित्य प्रत्यक्ष रहनेवाले भी इस आत्मतत्व में 'परोक्षता' और 'अपरोक्षता' तथा 'ज्ञान' और 'अज्ञान' दोनों ही बातें दसवें की तरह रहती हैं—कोई दस मनुष्य नदी को पार करके अपने को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन लेता था, और रोता था कि हाय ! दसवां तो नदी में डूब गया। इस उदाहरण में दसवें को अपना 'ज्ञान' भी है और 'अज्ञान' भी है। दसवें का उसे 'प्रत्यक्ष' भी है और 'अप्रत्यक्ष' भी है। अब कोई भलामानस उन सब को गिनकर उसको ही दसवां बता देता है, तब उसे उसका पूर्ण प्रत्यक्ष हो जाता है। फिर दसवें का अप्रत्यक्ष या अज्ञान कभी नहीं होता। इसी प्रकार आत्मतत्त्व की बात भी है। यह आत्मतत्त्व संसार की सब वस्तुओं को तो जानता है, परन्तु संसार के पदार्थों में आसक्त होकर, संसार के सब पदार्थों को जाननेवाला जो उसका अपना आपा है, उसके विषय में उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है। अनुभवी लोगों के मुख से जब यह मार्मिक आत्मकथा सुनता है और उसपर बार बार विचार करता है, तब उसे आत्मा का—सर्वव्यापक चेतना

५० पंचदशी

का—जो असली कूटस्थ रूप है, उसका प्रत्यक्ष होजाता है। अनु- भवी लोगों के समझाने से आत्मा के न होने के भ्रान्त विचार तो सदा के लिए नष्ट होजाते हैं, परन्तु आत्मा के प्रतीत न होने के जो भ्रान्त विचार हैं वे तो तब नष्ट होते हैं जब समाधिभावना ( तीव्र लगन ) से आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। यह पिछली अवस्था जब आती है तब ही जीवभाव नष्ट होता है और सब शोक छिप जाते हैं। अपने नित्यमुक्तपने की नष्ट स्मृति दुबारा जाग उठती है। इसी अवस्था को ध्यान में रखकर कहा है कि “आत्मा को यदि जाना जाय कि यह तत्त्व मैं हूँ”। यों तो आत्मा स्वयंप्रकाश तत्व है ही, परन्तु इतने से साधक का कुछ भी उप- कार नहीं होता। जब साधक की बुद्धि आत्मा के इस स्वयंप्रकाशपने को अनुभव (महसूस) भी करले तब उस अवस्था की ओर को इस श्लोक में संकेत (इशारा) किया है कि 'यह मैं हूँ।' 'तू ही तो दसवाँ है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है, तब खोया हुआ दसवां उसके सामने आ खड़ा होता है। इसी प्रकार 'आत्मा ब्रह्म है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है तब आत्मा और ब्रह्म के एक होने की बात आंखों के सामने आखड़ी होती है। दसवां कौन सा है ? इस प्रश्न के उत्तर में जब दसवां तू ही है, यह कहा जाता है और जब शेष नौ के साथ मिलाकर अपने आपको गिना जाता है, तब अपने आपके दसवेंपन की स्मृति जाग उठती है। अब आप उसे हज़ार बार नदी में को निकाल लीजिये और गिनवाइये अब वह दसवें को कभी भी नहीं भूलेगा। क्योंकि उसे दसवें का अनुभवपूर्ण ज्ञान हो चुका है । इसी प्रकार विचार के द्वारा जब आत्मा के व्यापक होने का ज्ञान अनुभव का रूप धारण कर लेता है—या यों कहिये कि जब इस ज्ञान का

तृप्तिदीप का संक्षेप ५१

विज्ञान बनजाता है, तब शरीरों के किसी भी व्यवहार में लगे रहने पर भी अपनी व्यापकता भूल जाने वाली बात नहीं रहती । वह अवस्था अभ्यास से पकते-पकते जब पूर्ण यौवन पर आती है तब ब्रह्माभ्यासी पुरुष अपने को सर्वत्र परिपूर्ण ज्ञान और आनन्दरूप में पाकर स्वभावतृप्त रहने लग पड़ता है। हमारा जो जीव है वह क्योंकि अन्तःकरण से युक्त है इस कारण से हमें केवल उतने ही भाग के प्रत्यक्ष होने की बात तो समझ में आती है, परन्तु अन्तःकरण से रहित जो सर्वत्र व्यापक महा- चेतना है, उसका हमें कभी प्रत्यक्ष हो सकेगा, यह बात जिनकी समझ में न आती हो वे इस पर यों विचार करें-दो गुरु शिष्यों में से गुरु के कान में कुण्डल पहने हुए हों तथा शिष्य के कान में कुण्डल न हों। अब हमें उन दोनों का पृथक् पृथक् परिचय देने में एक का चिह्न तो कुण्डल का होना बताना पड़ेगा तथा दूसरे शिष्य का चिह्न कुण्डल न होना ही बताना पड़ेगा कि जिसके कान में कुण्डल नहीं है वही शिष्य है। यों जैसे किसी वस्तु का 'होना' लक्षण हो सकता है वैसे ही किसी वस्तु का 'न होना' भी लक्षण हो सकता है। इसी प्रकार 'अन्तःकरण का होना' जीव- भाव की पहचान है तथा 'अन्तःकरण का न होना' या न रहना ब्रह्मभाव की पहचान मानी जाती है। यही कारण है कि कभी तो वेदान्त सच्चिदानन्द आदि धर्मों से उसका प्रतिपादन करते हैं और कभी नेतिनेति की निषेध प्रक्रिया से उसका वर्णन करने लग पड़ते हैं। जब हम अपने चिदात्मा पर से अपने अन्तःकरण का बन्धन (किंवा पाबन्दी) उठा सकेंगे, तब यही हमारी अब की क्षुद्र चेतना, व्यापक चेतना के रूप में, किंवा ब्रह्म के रूप में, प्रकट होकर रहेगी। इस स्वयंप्रकाश चेतन के दर्शन के लिए, हमको केवल

५२ पंचदशी इतना ही करना पड़ेगा, कि हम अपनी बुद्धिवृत्ति को, उसके आकार का बना डालें। ऐसा करने पर व्यापक चेतन को आवृत कर रखने वाला अज्ञान, नष्ट हो जायगा और स्वयं प्रकाश तत्व अपने आप ही दीखने लग पड़ेगा। परन्तु अनादि काल से हमारे मन में बैठे हुए ये विचार ही कि "हम व्यापक कैसे हो सकते हैं ? हम तो कुछ करने और कुछ भोगने वाले तथा परिमित क्षेत्र में बद्ध रहने वाले प्राणी हैं" हमारे इस व्यापक रूप के दर्शन को दृढ नहीं होने देते हैं। हमें अपने इस व्यापक रूप में या तो संदेह बना रह जाता है या अपना यह व्यापक रूप भूल कर फिर फिर वही संकीर्णता की भावना जाग उठती है। परन्तु जब हम सर्वात्मना तत्पर होंगे, तब तो व्यापक रूप के दर्शन में सफल न होने का कोई कारण ही नहीं रह जायगा। इस प्रकार के आत्म- दर्शन में विघ्न डालने वाली असंभावना और विपरीत भावना को हटाने का एक मात्र यही उपाय है कि आत्मतत्व में बुद्धि की एकाग्रता के प्रयत्न को निरन्तर चालू रखा जाय। नहीं तो अनादि काल की वासनाएँ इस विचार रूपी नन्हें बालक को पनपने ही नहीं देंगी। एक बात विशेष ध्यान रखने की है कि इस तत्व को यदि हम कुछ काल के लिए भूल भी जायेंगे तो भी कोई अनर्थ नहीं हो जायगा। अनर्थ तो तब होता है जब हम इस तत्व को पहले की तरह फिर संकीर्ण समझने लग पड़ते हैं। तत्परता से जब कि यह तत्व बार बार स्मृति में लाया ही जा रहा है तब इस प्रकार की विपरीत वृत्ति के जाग उठने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता है। जब आन्तरदर्शन पर विश्वास बढ़ता है और बाह्यदर्शन पर से विश्वास उठ चुकता है तब जितने दिनों तक के लिए यह शरीर रचा गया है, उतने दिनों तक बाह्य प्रवृत्ति

तृप्तिदीप का संक्षेप ५३


रहती तो है, परन्तु दृष्टिकोण बदल जाने से अब क्लेशरहित जीवन-
यात्रा होने लग पड़ती है। अब उसे शरीर के सुख दुःखों के
अनुसार सुखी दुःखी नहीं होना पड़ता है। जगत् की असारता
को समझ चुकने पर इच्छा करने वाले की और अभिलाषा करने
योग्य पदार्थ की विचारहीन भावना पर कुठाराघात हो जाता है।
फिर तो तैलरहित दीपक जैसे बुझ जाता है उसी तरह संसारताप
स्वयं शान्त हो जाता है। अब तो तमाशे में देखते हुए काल्प-
निक पदार्थों की तरह इस संसार के प्रिय से प्रिय समझे जाने
वाले पदार्थों को भी खुशी खुशी छोड़ा जा सकता है। इस प्रकार
का तत्त्व दर्शन हो चुकने पर भी जब तक इस शरीर के जीवन
का काल रहता है तब तक इच्छा अनिच्छा और परेच्छा प्रारब्धों
से प्रभावित होकर लौकिक भोगों में प्रवृत्त होते ही रहते हैं। इस
प्रकार की प्रारब्धप्रवृत्ति की रोक थाम करना अत्यन्त असंभव
है। युधिष्ठिर और राम जैसे तत्त्वदर्शी लोग भी इस प्रकार के व्यव-
हार को रोक नहीं सके हैं। आत्मदर्शी की तथा दूसरों की
इच्छाओं में यही भेद होता है कि आत्मदर्शी की इच्छा से आगे
को व्यसन की उत्पत्ति नहीं हो पाती। उसे भोगों का भोग तो प्राप्त
हो जाता है परन्तु वह भोगों का व्यसनी (दास) नहीं बन जाता।
जब कि हम संसारी लोग भोग भी भोगते हैं और आगे को उनके
दास भी बन जाते हैं। भोग देकर चरितार्थ हुआ प्रारब्ध कर्म
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का ही मर जाता है परन्तु अज्ञानी लोगों
की इस भ्रान्त धारणा से कि ये भोग तो सच्चे हैं आगे को भी
भोगों का व्यसन लग जाता है। वह ज्ञानी को नहीं लगता। जब
कि यह सारा ही जगत् उसका आत्मा बन चुकता है तब व्यसन
से प्रभावित होने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता। तत्त्वज्ञान

५४ पंचदशी

का जो प्रभाव है वह तो व्यवहार में ही देखा जा सकता है। व्यवहार रुक जाने पर तत्वज्ञान का प्रभाव देखने को मिल ही नहीं सकता। यही कारण है कि निर्विकल्प समाधि को तत्वज्ञान की अवस्था माना ही नहीं जाता। निर्विकल्प समाधि तो उपरति की ही एक अवस्था है। वह ज्ञान की कोई सी भी अवस्था नहीं है। हां, यह बात तो है कि जगत् की मायामयता का सम्पूर्ण दर्शन 'तभी हो सकता है जब कि चित्त का निरोध हो चुका हो। मनुष्य- जीवन की गम्भीर समस्याओं को समझने का अवसर चित्त के रुकने पर ही आता है। इस भाव को लेकर चित्त के रोकने का अभ्यास किया जा सकता है। परन्तु चित्तनिरोध ही हमारा एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आत्मरूप का अनुभवयुक्त ज्ञान हो जाना ही राजयोग का मुख्य ध्येय है। आत्मा के स्वरूप का इस प्रकार का दर्शन मिल जाने पर ही शरीरों के साथ सुखी दुखी न हो सकने की शान्तिवर्धक अवस्था आती है। हमारे ये तीनों शरीर स्वभाव से ही दुःखों के निवासभवन हैं। शरीर में वात,पित्त, कफ की न्यूनाधिकता से करोड़ों बीमारी खड़ी होती रहती हैं। मन में काम क्रोध आदि की अशान्तिकारक भावनाएँ आती ही रहती हैं। यों इन शरीरों में स्वभाव से ही दोष भरे पड़े हैं। इन दोषों से इनका वियोग कर सकना ऐसा ही असंभव है जैसे घड़े को मिट्टी से अलग करना। परन्तु अविद्या से प्रभावित होकर जब इन दुःखपूर्ण शरीरों की और आत्मा की परस्पर एकता मान ली जाती है तब परस्पर में धर्मों का लेन देन हो जाता है। आत्मा की सत्यता इन शरीरों में मान कर इस सम्पूर्ण मिश्रण को अपना स्वरूप समझने की भूल की जाती है। शरीर दुःखी हो तो कुटुम्ब के किसी भी व्यक्ति के दुःखी होने से अपने को ही दुःखी

[header] तृप्तिदीप का संक्षेप ५५ [/header]

मानते हुए कुटुम्बनेता की तरह अपने आपको ही दुःखी माना जाने लगता है । यह भूल साक्षित्व का ध्यान न आने तक ही चलती है । सर्पबुद्धि से भयभीत पुरुष पीछे से रज्जु रूप को पहचान कर जैसे अपनी पहली समझ पर हँसता है, उसी तरह ज्ञानी को भी अपनी पहली भ्रान्ति पर उपहासपूर्ण उपेक्षा का भाव आता है । जड और चेतन के मिश्रण रूपी इसी अपराध को क्षमा कराने के लिये ही मानो साधक, ज्ञान की अनन्त आवृत्तियाँ किया करता है और जब तक स्पष्ट रूप से व्यापक चेतन अलग और ये शरीर अलग दिखायी देने नहीं लगते, तब तक ज्ञान की आवृत्ति करता ही जाता है। इस अपने पूर्वापराध को क्षमा कराने की इसके सिवाय दूसरी कोई विधि ही नहीं है। जब तक यह प्रारब्ध देह है तब तक जीवभाव की गन्ध कभी कभी तो ज्ञानी के व्यवहार में आया ही करेगी। परन्तु इतनी सी घटना से तत्वज्ञान को विनष्ट हुआ नहीं समझा जायगा। क्योंकि जीवन्मुक्ति नाम का कोई व्रत नहीं है जो साधकों पर लागू कर दिया गया हो। यह तो जिस क्रम से चलता है—जैसे धीरे धीरे उन्नति करता है—इसे तो वैसा का वैसा ही चलने देना पड़ेगा। दसवें के हमारे उपर्युक्त दृष्टान्त में भी यही बात है कि दसवें की अप्राप्ति के लिये रोना तो उसका ज्ञान होते ही नष्ट हो जाता है। परन्तु दसवें के शोक में सिर पीटते पीटते जो घाव पड़ गया है, वह तो महीने दो महीने में जाकर अच्छा हो पाता है। हां, यह बात तो है कि दसवें के न मरने के महालाभ से उसे जो हर्ष होता है वह सिर के घाव की पीड़ा को उपेक्षित करा देता है। इसी प्रकार जड़ चेतन के ग्रन्थिमोक्ष से प्रारब्ध दुःख तो ढक ही जाते हैं—वे

५६ पंचदशी नगण्य होजाते हैं—वे फिर सुलझाने योग्य समस्या नहीं रह जाते। शरीर आदि की रचना यदि केवल अज्ञान से हुई होती तो हां संसारविषयक भ्रमपूर्ण धारणा के हटते ही शरीर का भी पात होजाता। परन्तु इनकी रचना तो अज्ञान और कर्म दोनों से मिलकर हुई है। संसारविषयक अज्ञान के नष्ट हो चुकने पर भी कर्मों का परिचालित वेग जब तक पूरा पूरा शान्त नहीं हो लेगा, तब यह ज्ञानिशरीर जीवित रहेगा ही और संसार तथा मोक्ष का मिश्रित अनुभव लेता ही रहेगा। इसके पश्चात् ज्ञानी की तृप्ति में एक अभूतपूर्व परिवर्तन की अवस्था आयेगी। अब ज्ञानी को कुछ भी कर्त्तव्य शेष दीख नहीं पड़ेगा। अब वह दूसरे कर्त्तव्याक्रान्त लोगों को पहाड़ पर चढ़े हुए पुरुष की तरह उपेक्षाभाव से देखेगा। अब वह अपने मन से ऐसे प्रश्नों की झड़ी लगा देगा कि जिन का उसके मन पर जीवन्मुक्त होजाने के सिवाय कुछ भी सन्तोष जनक उत्तर नहीं होगा। मन के इस निरुत्तरपने का परिणाम यह होगा उसे अपना संसरण का विभाग, अपने लाभा- लाभ के विचार से तो एकदम बन्द कर देना ही होगा। हां, जिस शास्त्रीय मार्ग पर चलकर उसने मुक्ति का महालाभ उठाया है, वह मार्ग दूसरों के लिये भी अक्षुण्ण बना रहे इस लोक संग्रह के विचार से अपने जीवनरथ को शास्त्रीयपद्धति पर ही दौड़ाता चला जायगा। परन्तु एक बात भले प्रकार समझ रखने की है कि ज्ञानी की शास्त्रीयमार्ग पर कर्म करने की अपनी कुछ भी आवश्यकता नहीं है। उसके ज्ञान की स्थिरता में कर्म का उपयोग लेशमात्र भी नहीं है। उस के ज्ञान की जो निरन्तर धार बहेगी वह कर्म करने से नहीं बहेगी। वह तो एकमात्र ज्ञान के अबाधित होने से ही बहती रह सकेगी।

इसके अतिरिक्त कोई सा भी साधन ज्ञान को निरन्तर स्थिर नहीं रख सकेगा । इस बाधित संसार का यह विस्तृत पसारा उसके ज्ञान को मार गिरायेगा ऐसी तो शंका ही निर्मूल है । ये सब पदार्थ जब अपने पूर्ण यौवन में थे तब उन सब को मार कर आत्मलाभ करने वाला ज्ञान, क्या भला अब इन मृतों से मार खा सकेगा ? जिस ज्ञान ने बचपन में सारे पसारे को सकोड़ दिया था अब अपने यौवन में उनसे कैसे हार मान लेगा ? ज्ञान हो चुकने के पश्चात् भी दीखते रहने वाले इस संसार रूपी मुरदे से तो ज्ञानराजा की कीर्त्ति ही बढ़ेगी । इस प्रकार का ज्ञान जिस ज्ञानी को कभी भी छोड़ कर नहीं जाता, उस ज्ञानी के देहादि कुछ करें या न करें इन घटनाओं से वह प्रभावित नहीं होता । प्रवृत्ति की ओर जिसको आग्रह है वह तो ज्ञानी की पंक्ति में बैठने का अधिकारी नहीं है । क्योंकि सांसारिक या पारमार्थिक सुख पाने के लिए यत्न करने का भाव यही है कि अभी तक वह सुख के स्वरूप को पा नहीं सका है। ऐसे अवसर पर ज्ञानी का एक ही कर्त्तव्य है कि ऐसे लोगों में रह कर इन्हें कर्त्तव्य का पाठ स्वयं व्यवहार करके सिखाया करे। तथा जिज्ञासुओं को कर्मों के दूषण दिखा दिखा कर कर्म करने से छुड़ा छुड़ा कर उन्हें ज्ञानमार्ग पर डालता जाय । अपने मानापमान की कुछ भी परवा न करके उन्हें अपने-अपने अधिकार के अनुरूप मार्गों पर डालता जाय । यह अमानवी अवस्था जब प्राप्त हो चुकेगी तब की देव दुर्लभ कृतकृत्यता का वर्णन करने के लिए मानवी भाषा को दिवालिया हो जाना पड़ेगा । आइये उस स्थिति का अनुभव लेने के लिए हम आज से ही उद्योग प्रारम्भ कर दें ।

8. Kutasthadipa

[८] कूटस्थदीप का संक्षेप किसी भित्ति पर सूरज का प्रकाश पड़ रहा हो। उसी भित्ति पर यदि दर्पण के सूरज का दुहरा प्रकाश पड़ जाय और वह भित्ति दो प्रकाशों से जगमगा उठे, इसी प्रकार निर्विकार चैतन्य ने इस देह को भी साधारणतया [अन्य सृष्टि की तरह] प्रकाशित तो कर ही रक्खा है परन्तु इस देह को ही इस बुद्धिस्थ चिदा- भास ने दोबारा विशेष रूप से प्रकाशित कर डाला है। यों, देहों को प्रकाशित करने वाली दो चेतना हैं। इसे समझने के लिए कल्पना करो कि एक भित्ति पर बहुत से दर्पणों की दीप्तियाँ पड़ रही हैं, उन बहुत सी दीप्तियों के बीच बीच में जहाँ दर्पण की दीप्ति नहीं पड़ रही हैं वहाँ सूर्य की सामान्य दीप्ति तो दीखती ही है। इतना ही नहीं जब एक भी दर्पणदीप्ति शेष नहीं रह जाती तब भी वह सामान्य सूर्यदीप्ति दीखा ही करती है। इसी प्रकार चिदाभास से युक्त जो बहुत सी बुद्धियाँ हैं उनके बीच बीच में [जहाँ एक बुद्धि नष्ट होती है और दूसरी उत्पन्न होने की तैयारी में लगी रहती है तब बीच में] यह कूटस्थ तत्व रहता है। विवेकी लोग इसी कूटस्थ को पहचानें। सुषुप्ति के समय जब कोई भी बुद्धिवृत्ति नहीं रह जाती, तब इन बुद्धियों के अभाव को जो कोई तत्व प्रकाशित किया करता है वह यह कूटस्थ चैतन्य ही तो है।

कूटस्थदीप का संक्षेप ५९

जो बुद्धि घटाकार हो गई है, उसमें जो चिति है, वह तो केवल घट को ही प्रकाशित कर सकती है। परन्तु घट में जो ज्ञातता नाम का धर्म आ जाता है ( जिसके आने पर हम कहने लगते हैं कि हमने घट को जान लिया) वह तो ब्रह्म चैतन्य से ही प्रकाशित हुआ करता है। भेद केवल इतना ही होता है कि—बुद्धि के उत्पन्न होने से पहले पहले वह ब्रह्म इस घट को अज्ञात रूप से प्रकाशित कर रहा था। अब बुद्धि के उत्पन्न हो जाने के बाद तो वही ब्रह्म इसको ज्ञात रूप से प्रकाशित करने लगता है। समझते हो ज्ञान क्या है ? भाले की नोक पर जैसे लोहा लगा रहता है इसी प्रकार बुद्धिवृत्ति के अग्र भाग में जब चिदाभास लग जाता है तब उसे ही 'ज्ञान' कहते हैं। अज्ञान का विवरण हम क्या करें। वह तो जाड्य ही है। अर्थात् स्वयं स्फूर्ति का न होना ही 'अज्ञान' कहाता है। अब जो कोई घड़ा ज्ञान से व्याप्त हो जाता है तो उसे 'ज्ञात घट' कहते हैं, तथा जो घड़ा अज्ञान से व्याप्त रह जाता है उसे 'अज्ञात घट' कहा जाता है। जैसे 'अज्ञात घट' ब्रह्म से भास्य रहता है ठीक इसी तरह 'ज्ञात घट' भी ब्रह्म से ही भास्य होता है। चिदाभास का उपयोग तो केवल इतना ही है कि—वह ज्ञातता नाम के धर्म को उसमें उत्पन्न कर दिया करे। इस धर्म को उत्पन्न करने के पश्चात् वह चिदाभास क्षीण हो जाता है। जिस बुद्धि में चैतन्य का आभास न पड़ा.हो, उस बुद्धि में तो ज्ञातता को उत्पन्न करने का सामर्थ्य ही नहीं होता। घट में जब चिदाभास नाम के फल का उदय हो जाता है तब बस यही 'ज्ञातता' कहाती है। वह ब्रह्म चैतन्य तो (१) बुद्धिवृत्ति (२) चिदाभास तथा (३) घटादि विषय इन तीनों को ही प्रकाशित किया करता है। परन्तु अकेले

६० पंचदशी


घट को प्रकाशित करने वाला तो अकेला चिदाभास ही है । जब घट में ज्ञातता नाम का धर्म आ जाता है तब उसमें दुहरा चैतन्य हो जाता है । जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कथन चिदाभास की कृपा का फल है । जब हम कहते हैं कि 'घट को जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता है । यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास का और ब्रह्मतत्व का भेद जान लेना चाहिए । देह से बाहर चिदाभास और ब्रह्म का विवेक यहाँ तक हमने किया है । आइये अब यह भी देख लें कि—देह के अन्दर के मामलों में ये दोनों कैसे रहते हैं ? तपा हुआ लोहा जैसे केवल अपने आपको ही प्रकाशित किया करता है, इसी प्रकार चिदाभास से युक्त जो अहंवृत्ति और कामक्रोधादि वृत्तियाँ हैं—जिनमें तपे हुए लोहे में अग्नि के समान ही चिदाभास व्याप्त हुआ रहता है—वे वृत्तियाँ केवल अपनी ही भासक होती हैं । इतना सामर्थ्य उनमें नहीं होता कि वे दूसरे की भासक हो सकें। इन वृत्तियों का यह स्वभाव है कि ये क्रम क्रम से रुक रुक कर पैदा होती हैं, और सुप्ति मूर्छा या समाधि के समय तो सब की सब विलीन हो जाती है—तब इनमें से एक भी शेष नहीं रह जाती । अब यदि अन्दर के कूटस्थ तत्व को समझना हो तो यों समझना चाहिए कि—जो निर्विकार रहने वाली वस्तु, इन सब वृत्तियों की सन्धियों को, और इन सब वृत्तियों के अभावों को, प्रकाशित किया करती है अथवा जाना करती है, वही निर्विकार वस्तु 'कूटस्थ' कहलाती है । जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य हो जाता है, इसी प्रकार अन्दर की वृत्तियों में भी दुगना चैतन्य इकट्ठा हो जाता है । यही कारण है कि—सन्धियों की अपेक्षा वृत्तियों में चैतन्य की अधिक विशदता पायी जाती है । वृत्तियों

कूटस्थदीप का संक्षेप ६१ के स्वयं प्रकाश होने के कारण इनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती और उनमें ज्ञातता भी उत्पन्न नहीं होती। ये वृत्तियाँ जब उत्पन्न हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही स्वविषयक अज्ञान को भगा देती है। यों अज्ञान की व्याप्ति भी इन वृत्तियों में नहीं रहती और अज्ञातता भी नहीं होती । जिस दुगने चैतन्य का वर्णन ऊपर किया है, उसमें से जितने चेतन भाग के जन्म और नाश होते हुए प्रतीत होते हों, उसे तो अकूटस्थ मान लो तथा जो अविकारी भाग प्रतीत होता हो उसे 'कूटस्थ' जान लो । देह इन्द्रिय मन बुद्धि आदि से युक्त जो जीवाभास रूपी भ्रम हो गया है, इस भ्रम का अधिष्ठान जितना कुछ चेतन है, उसी चेतन को हम 'कूटस्थ' कह रहे हैं। तथा जिसको वेदान्तों ने सम्पूर्ण जगद्भ्रम का मूलाधिष्ठान बताया है उसे हम 'ब्रह्म' कहना चाहते हैं। जब एक ही चैतन्य में इस सम्पूर्ण जगत् का आरोप कर लिया गया है तब इस जीवाभास के विषय में जो कि उसी का एक भाग है शंका करनी व्यर्थ है। जगत् और जगत् का एकदेश यह चिदाभास ये दोनों आरोप- णीय पदार्थ हैं। यदि कोई किसी महायुक्ति से इन दोनों आरोप- णीय पदार्थों के भेद की विवक्षा करना छोड़ बैठे, तो फिर चिति एक की एक ही रह जाती है—फिर 'तत्' 'त्वं' पदार्थों में भेद नहीं रह जाता । अर्थात् चिति में जो भेद है वह तो औपाधिक किंवा भ्रान्तिजन्य है। सच्ची तो एकता ही है। भ्रम का कारण तो यह होता है कि—इस आभास ने बुद्धि के कर्तृत्व भोक्तृत्व आदि धर्मों को तथा आत्मा के स्फूर्ति नाम के धर्म को अपने में धारण कर लिया है। भ्रमस्थल की चांदी में जैसे अधिष्ठान और आरोप्य दोनों के ही धर्म दीखते हैं और वह कल्पित मानी जाती

६२ पंचदशी है, इसी प्रकार दोनों के धर्म दीखने से यह आभास भी कल्पित वस्तु ही है । बुद्धि क्या है ? आभास कौन है ? इन सब में आत्मा नाम का पदार्थ कहाँ छिपा बैठा है ? यह जगत् का बवण्डर कैसे बन कर खड़ा हो गया है ? इन प्रश्नों को जब कोई सन्तोषजनक रीति से नहीं सुलझा लेता तब उसे मोह में फँसना पड़ जाता है । इन प्रश्नों का हल न करना ही 'संसार' कहाता है । यही मोह मुमुक्षु लोगों को हटाना है । यही सब अनर्थों का मूल निकास है । जिसने तो बुद्धि आदि के स्वरूप का विवेक कर लिया हो, वही ज्ञानी है, वही सब अनर्थों से मुक्त हो गया है । यह बात वेदान्तों ने डंके की चोट कही है । जिस संसार और जिस मोक्ष का वर्णन ऊपर किया है, उनको यदि कोई सच्चे मानों में समझ जाय, यदि किसी को यह मालूम हो जाय कि ये बन्ध और मोक्ष तो केवल अविवेक की खसकीली बुनियाद पर चिन कर खड़े कर दिए गये हैं तब फिर बन्ध किस का ? और मोक्ष किस का ? इत्यादि कुशंकाओं का समाधान साधक के हृदय में स्वयमेव हो जाता है—वह जान जाता है इन प्रश्नों को जिसने हल नहीं किया वह बद्ध है । जिसने इन प्रश्नों का हल कर दिया वह मुक्त ही है । इस कूटस्थ तत्व को संक्षेप में यों समझना चाहिए कि जब वृत्तियाँ उदय हो जाती हैं, तब यह तत्व वृत्तियों का साक्षी होकर, जब तक वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होतीं तब तक यह तत्व वृत्ति के प्रागभाव का साक्षी बन कर, आत्मजिज्ञासा जब किसी को हो जाय तब यह तत्व उसी का साक्षी रह कर, उससे पहले 'मैं अज्ञानी हूँ' ऐसे अज्ञान के साक्षी के रूप में, यह तत्व रहा

कूटस्थदीप का संक्षेप ६३

करता है। वह साक्षी कूटस्थ तत्व इस असत्य जगत् का आलम्बन है, इससे इसे 'सत्य' कहते हैं। सम्पूर्ण जड पदार्थों का प्रका- शक होने से इस तत्व को 'चिद्रूप' मानते हैं। सदा ही प्रेम का स्थान होने से इस साक्षीतत्व को 'आनन्दरूप' समझते हैं। यह कूटस्थ तत्व सभी अर्थों का साधक है, और सभी से सम्बद्ध है, इससे उसे 'सम्पूर्ण' भी कह देते हैं। यह कूटस्थ तत्व 'जीव' और 'ईश्वर' आदि की कल्पना से बहुत ऊपर रहता है। यह तो एक स्वयंप्रकाश केवल तथा कल्याणस्वरूप तत्व है। यद्यपि माया ने आभास के द्वारा 'जीव' और 'ईश्वर' की रचना कर डाली है, फिर भी ये दोनों काच के घड़े के समान स्वच्छ ही हैं। काच का घड़ा जैसे मिट्टी के घड़ों से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार ये जीवेश्वर भी देहादि की अपेक्षा स्वच्छ होते हैं। देह और मन दोनों ही अन्न से बनते हैं, फिर भी मन, देह से स्वच्छ होता है। इसी प्रकार मायिक होने पर भी अन्य मायिक पदार्थों से ये दोनों स्वच्छ होते हैं। ये दोनों ही चिद्रूप हैं, यह तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि—वे सब के अनुभव में चिद्रूप में ही आते हैं। उस माया शक्ति ने ही उन दोनों को चिद्रूप से प्रकाशित कर डाला है। हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—जिसे 'हमारी माया' कह सकते हैं—सुपने के चेतन जीव और सुपने के ईश्वर आदि को उत्पन्न कर ही डालती है। फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को उत्पन्न कर डाले इसमें आश्चर्यचकित क्यों होते हो ? परन्तु मायिकपने के वहम में इतने अधिक भी न फँस जाओ कि कहीं कूटस्थ को भी मायिक ही कह बैठो। क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का तो कोई भी प्रमाण नहीं मिलता। सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर 'होकर इसी कूटस्थ के वस्तुत्व का डंका

६४ पंचदशी बजा रहे हैं। वे इस कूटस्थ के विरोधी किसी भी वस्तु को सहन नहीं करते हैं। हम औपनिषद लोग तो वेदान्तों के रहस्य को खोलने का उद्योग भर करते हैं। तर्क के आधार से कुछ कहने का तो हमारा संकल्प ही नहीं है। यदि हम तर्क के सहारे से कुछ कहते तो तार्किक लोगों को हम पर आक्षेप करने का अव- काश भी मिल जाता। मुमुक्षु को चाहिए कि इस दुरवगाह आत्म- तत्व को जानने के लिए केवल श्रुति का ही सहारा पकड़ लें। श्रुति का अभिप्राय तो स्पष्ट ही यह है कि—इन जीव और ईश्वर को माया ही उत्पन्न कर देती है। ईक्षण से लेकर प्रवेश पर्यन्त जितनी भी सृष्टि है, सो सभी ईश्वर की बनाई हुई है तथा जाग्रत् से लेकर मोक्ष पर्यन्त का सभी जगत्, जीव का बनाया हुआ है। अब कूटस्थ के विषय में भी सुन लीजिये—वह तो सदा ही कूटस्थ रहता है। जन्म, जरा, रोग, अनेक प्रकार की मानसी व्यथायें और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे हैं। इन सब के होने पर भी इस तत्व में आज तक कुछ भी अतिशय नहीं हो पाया है। इसीलिए मन में यह निश्चय कर लीजिए कि—मरण और जन्म कुछ भी नहीं है। बद्ध और साधक कोई भी नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को भी नहीं कहना चाहिए। वह कूटस्थ तत्त्व मट्टी के पुतलों में वृथा ही लुक छिप कर जन्म-मरण का भ्रमपूर्ण अभिनय कर रहा है। मन और वाणी के अगम्य इस तत्व को, जब वह श्रुति किसी साधक को बता देना चाहती है, तब साधक की योग्यता के अनुसार या तो 'जीव' या 'ईश्वर' या फिर 'जगत्' का सहारा लेकर इस अवाङ्मनोगोचर तत्व का बोध ज्यों त्यों करके उसे करा देती है। इसी उद्देश्य को लेकर 'जीव' 'ईश्वर' और 'जगत्' के स्वरूप