भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८५

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८५ फलों को भोगा करे, उससे जगत् के मिथ्या होने के विचार को चोट नहीं लगती [ अथवा उनको मिथ्या समझ लेने से प्रारब्ध भोग में कुछ भी रुकावट नहीं पड़ती ] । निर्बन्धस्तत्त्वविद्याया इन्द्रजालत्वसंस्मृतौ । प्रारब्धस्याग्रहो भोगे जीवस्य सुखदुःखयोः ॥१७५॥ तत्त्वविद्या का निर्बन्ध अथवा उद्देश्य तो बस इतना ही है कि—इस जगत् को इन्द्रजाल के समान मिथ्या समझ लिया जाय [ भोगों का अपलाप करना उसका उद्देश्य कदापि नहीं है ] प्रारब्ध का आग्रह भी केवल इतना ही है कि जीव को सुख या दुःख पहुँचा दिये जांय। भोगों को सत्य सिद्ध करने में उसका आग्रह कदापि नहीं है [ यों प्रारब्ध और ज्ञान दोनों ही भिन्न विषय वाले हैं ] । विद्यारब्धे विरुध्येते न भिन्नविषयत्वतः । ज्ञानद्भिरप्यैन्द्रजालविनोदो दृश्यते खलु ॥१७६॥ ऊपर वर्णित रीति से भिन्न विषयवाले होने के कारण, ज्ञान और प्रारब्ध में आपस में विरोध नहीं होता। लोक में भी देखते हैं कि—जो लोग इन्द्रजाल को इन्द्रजाल जान लेते हैं, वे भी इन्द्रजाल के चमत्कारों को तो देखा ही करते हैं [ इस दृष्टान्त से जान पड़ता है कि ज्ञान और प्रारब्ध भोग में कोई लड़ाई नहीं है ] । जगत्सत्यत्वमापाद्य प्रारब्धं भोजयेद् यदि । तदा विरोधि विद्याया, भोगमात्रान्न सत्यता ॥१७७॥ यदि तो प्रारब्ध कर्म, इस जगत् को सत्य बनाकर ही, जीव को सुख दुःख दिया करता होता, तो [ अवश्य ही ] यह विद्या

२४६ पञ्चदशी 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 का विरोधी होता। क्योंकि तब यह विद्या के विषय मिथ्यात्व को स्वयं ही नष्ट कर डालता। परन्तु यह प्रारब्ध ऐसा तो कुछ भी नहीं करता। यह तो केवल भोग ही भोग देता है। इसी कारण कहते हैं कि प्रारब्ध, विद्या का विरोधी नहीं होता। केवल भोग दे देने मात्र से ही कोई पदार्थ सत्य नहीं हो जाता है। [कैसे सो अगले श्लोक में कहेंगे ]। अनूनो जायते भोगः कल्पितैः स्वप्नवस्तुभिः । जाग्रद्वस्तुभिरप्येव मसत्यैर्भोग इष्यताम् ॥१७८॥ देख लो कि—स्वप्न की भी जो मिथ्यावस्तुयें होती हैं, उन से जो भोग होता है, वह जाग्रत् के पदार्थों से किसी बात में भी कम नहीं होता। इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि— जाग्रत्काल के मिथ्या पदार्थों से भी भोग मिल ही सकता है। [सुपने के मिथ्यापदार्थों से जैसे भोग होता है, ऐसे ही मिथ्या होने पर भी जाग्रत् के पदार्थों से भोग हो सकता है। भोग देने के कारण से ही जाग्रत् के पदार्थों को 'सत्य कहना ठीक नहीं है। यदि विद्यापह्नुवीत जगत् प्रारब्धघातिनी । तदा स्यान्नतु मायात्वबोधेन तदपह्नवः ॥१७९॥ यदि ज्ञान, जगत् का अपह्नव कर देता तो वह प्रारब्ध का घातक हो जाता, किसी को माया समझ लेने से ही उसका अपह्नव नहीं हो जाता। यदि तो यह ज्ञान जगत् के भोग्य पदार्थों का अपह्नव कर देता—दीखने वाले भोग्य पदार्थों के स्वरूप को विलीन कर देता [जैसे कि 'नेदं रजतम्'='यह रजत नहीं' इस ज्ञान से कल्पित रजत का स्वरूप विलीन हो जाता है] तो यह प्रारब्ध का

घातक हो जाता। क्योंकि यह उस अवस्था में प्रारब्ध भोग के साधनों को ही नष्ट कर डालता। परन्तु यह ऐसा नहीं करता है। किन्तु उसको केवल मिथ्या ही बताता है। इसी से कहते हैं कि—यह ज्ञान प्रारब्ध कर्म का विरोधी नहीं है। किसी को माया समझ लेने से ही उसका अपह्नव नहीं हो जाता है। इन्द्र- जाल आदि में देखते हैं कि—स्वरूप का विलय किये बिना भी लोग उसको मिथ्या समझ ही लेते हैं। अनपह्नुत्य लोकास्तदिन्द्रजालमिदं त्विति। जानन्त्येदानपह्नुत्य भोगं मायात्वधीस्तथा ॥१८०॥ देखते हैं कि—मनुष्य उस इन्द्रजाल के स्वरूप को न हटा कर भी, यह जान लेते हैं, कि यह तो इन्द्रजाल है। ठीक इसी प्रकार भोग्यपदार्थ को विलय किए विना भी, जगत् के मिथ्या- पन का भान हो ही सकता है। यत्र त्वस्य जगत् स्वात्मा पश्येत् कस्तत्र केन कम्। किं जिघ्रेत् किं वदेद्वेति श्रुतौ तु बहु घोषितम् ॥१८१॥ तेन द्वैतमपह्नुत्य विद्योदेति न चान्यथा। तथा च विदुषो भोगः कथं स्यादिति चेच्छृणु ॥१८२॥ जिस विद्यावस्था के आजाने पर, यह सकल जगत्, उस विद्वान् का आत्मा अथवा स्वरूप ही हो जाता है, उस दशा में, कौन देखने वाला ? किस साधन से ? किस पदार्थ को देखे ? किस फूल आदि को सूंघे ? क्या कुछ बोले ? सुने ? स्पर्श करे ? यह बात श्रुति में अनेक जगह कही गयी है। १८१॥ इस सबसे यही निश्चय होता है कि विद्या तो द्वैत का अपह्नव करके ही उत्पन्न होती है—[वह विद्या जब तक द्वैत का उपमर्द नहीं कर लेतीतब तक वह उत्पन्न

उक्तं स्वाप्ययसंपत्योरिति सूत्रे ह्यतिस्फुटम् ॥१८३॥

३८८ पञ्चदशी ही नहीं होती ] फिर ऐसी अवस्था में विद्वान् को भोग कैसे होगा ? इस प्रश्न का उत्तर भी सुन लो— सुषुप्तिविषया मुक्तिविषया वा श्रुतिस्त्विति । उक्तं स्वाप्ययसंपत्योरिति सूत्रे ह्यतिस्फुटम् ॥१८३॥ 'स्वाप्ययसंपत्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि' * इस व्याससूत्र में यह बात बहुत ही स्पष्ट करके समझायी गयी है कि 'यत्रत्वस्य' (बृ. ४-५-१५) यह श्रुति या तो सुषुप्ति अवस्था का वर्णन कर रही है, या फिर मुक्ति अवस्था को बता रही है [ विद्या (ज्ञान) से जगत् के अपह्नव हो जाने की बात को यह श्रुति नहीं कह रही है । ] अन्यथा याज्ञवल्क्यादे राचार्यत्वं न संभवेत् । द्वैतदृष्टावविद्वत्ता द्वैतादृष्टौ न वाग्वदेत् ॥१८४॥ यदि इस श्रुति को सुषुप्ति आदि विषयक न मानें, तो याज्ञवल्क्यादि ब्रह्मविद्या के आचार्य ही न हो सकेंगे । क्योंकि यदि वे द्वैत को देख रहे हैं तो कहना होगा कि उनको अद्वैत का ज्ञान नहीं हो रहा है । फिर वे आचार्य या ब्रह्मवेत्ता कैसे होंगे ? [यदि वे द्वैत को नहीं देख रहे हैं तो शिष्यादि के न दीखने से आचार्य की वाणी ही न निकलेगी । यों विद्यासंप्र- दाय का उच्छेद ही हो जायगा ] । निर्विकल्पसमाधौ तु द्वैतादर्शनहेतुतः । सैवापरोक्षविद्येति चेत् सुषुप्तिस्तथा न किम् ॥१८५॥ *-वेदान्त ४-४-१६ क्योंकि यह बात प्रकरण से आविष्कृत है इसलिये सुषुप्ति में और परममुक्ति में एक दूसरे की अपेक्षा से यह विशेष ज्ञान का अभाव बताया है ।

[Page Header: तृप्तिदीपप्रकरणम् २८९]

[Page Header: तृप्तिदीपप्रकरणम् २८९]

'निर्विकल्प समाधि में क्योंकि द्वैत का दर्शन नहीं होता, इससे केवल उसे ही अपरोक्ष विद्या समझ बैठना ठीक नहीं। क्योंकि फिर ऐसे तो सुषुप्ति को भी 'अपरोक्ष विद्या' क्यों नहीं कहते हो [उस सुषुप्ति में भी तो द्वैत की प्रतीति नहीं होती है]। आत्मतत्त्वं न जानाति सुप्तो यदि तदा त्वया। आत्मधीरेव विद्येति वाच्यं न द्वैतविस्मृतिः ॥१८६॥ यदि यह कहा जाय कि—सुषुप्त पुरुष [द्वैत का दर्शन तो नहीं करता, परन्तु वह तो] आत्मतत्व को भी नहीं जानता। इससे उसे विद्यावान् नहीं माना जाता। तब तो फिर स्पष्ट शब्दों में आत्मज्ञान को ही विद्या कहना चाहिए, [द्वैत के विस्मरण को आत्मज्ञान कहना ठीक नहीं है]। उभयं मिलितं विद्या यदि तर्हि घटादयः । अर्धविद्याभाजिनः स्युः सकलद्वैतविस्मृतेः ॥१८७॥ यदि तो 'द्वैत का अदर्शन' और 'आत्मज्ञान' इन दोनों को मिला कर 'विद्या' कहा जाय तो यह मानना पड़ेगा कि घटादियों को आधा ज्ञान तो प्राप्त हो ही गया है। क्योंकि ये सम्पूर्ण द्वैत को तो भूले हुए ही हैं। [विद्या के दो भाग हैं एक द्वैत का अदर्शन दूसरा आत्मदर्शन ऐसा यदि मानें तो विद्या का एक भाग घटादि में भी पाया जाता है तो क्या वे भी विद्यावान् हैं ?] मशकध्वनिमुख्यानां विक्षेपाणां बहुत्वतः । तव विद्या तथा न स्याद् घटादीनां यथा दृढा ॥१८८॥ मच्छर की ध्वनि आदि बहुत से विक्षेप होने के कारण तेरी विद्या तो उतनी दृढ भी नहीं है, जितनी कि घटादि की

२९० पञ्चदशी है [घटादि जैसे द्वैत को भूल गये हैं वैसे तो तुम भूल भी नहीं सकते हो] । आत्मधीरेव विद्येति यदि तर्हि सुखी भव । दुष्टचित्तं निरुन्ध्याच्चेन्निरुन्धि त्वं यथासुखम् ॥१८९॥ [यों नाकेबन्दी कर देने पर जब तुम बेबस होकर यह कह उठोगे कि] फिर ऐसे तो आत्मज्ञान ही 'विद्या' है । तो [हमारा आशीर्वाद लो और] सुखी रहो । यदि [आत्मज्ञान की रक्षा के लिए] दुष्ट चित्त को रोकना चाहो तो तुम सुभीते के अनुसार चित्त को रोका करो । तदिष्ट मेष्टव्यमायामयत्वस्य समीक्षणात् । इच्छन्नप्यज्ञवन्नेच्छेत् किमिच्छन्निति हि श्रुतम् ॥१९०॥ उस दुष्ट चित्त को रोकना तो हमें भी इष्ट ही है । क्योंकि [चित्त के दोषों के नष्ट हो जाने पर ही अद्वितीय आत्मा का ज्ञान होने के लिए] आवश्यक जो जगत् की मायामयता है उसका भले प्रकार ईक्षण तभी (दुष्ट चित्त के रुकने पर ही) किया जा सकता है [इसीलिए चित्तनिरोध हमें इष्ट है] सो भाई ! यह ज्ञानी चाहता तो है परन्तु अब यह अज्ञानी की तरह नहीं चाहता है । अब यह भोगों की खुशामद नहीं करता है, भोग मिलो या मत मिलो इसे इसकी परवा नहीं होती । इसी सब अभिप्राय को लेकर हमारी व्याख्येय श्रुति में 'किमिच्छन्' यह शब्द कहा गया है । रागो लिङ्गमबोधस्य, सन्तु रागादयो बुधे । इति शास्त्रद्वयं सार्थमेवं सत्याविरोधतः ॥१९१॥ 'रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु । कुतः शांदूलता तस्य

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९१

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९१ यस्याग्निः कोटरे तरोः' यह शास्त्र तो कहता है कि 'राग अज्ञान की निशानी है' अर्थात् तत्वज्ञानी में राग नहीं होना चाहिये । 'शास्त्रार्थस्य समाप्तत्वान्मुक्तिः स्यात्तावता मितेः। रागादयः सन्तु कामं न तद्भावोऽपराध्यते' यह दूसरा शास्त्र कहता है कि 'ज्ञानी में रागादि हैं तो हुआ करें । उनके होने से ज्ञानी के ज्ञान को आँच नहीं लगती । तत्वज्ञानी का राग दृढ राग नहीं होता है' ऐसा मान लेने पर ही अंविरोध होजाने के कारण ये दोनों शास्त्र सार्थक हो जाते हैं । इन दोनों शास्त्रों की संगति लग जाती है । जो शास्त्र ज्ञानी में राग का निषेध करता है उसका अभि- प्राय यही है कि—ज्ञानी में दृढराग नहीं होता । जो शास्त्र यह कहता है कि—ज्ञानी में राग हुआ करो उसका कुछ बिगड़ता नहीं । उसका अभिप्राय यही है कि ज्ञानी में दिखावटी राग हुआ करो उसका होना कुछ बुराई नहीं है । जगन्मिथ्यात्ववत् स्वात्मासङ्गत्वस्य समीक्षणात् । कस्य कामायेति वचो भोक्त्रभावविवक्षया ॥१९२॥ जगत् को मिथ्या समझ लेने के कारण सच्चा काम्य पदार्थ कोई भी नहीं है, यह बात जैसे 'किमिच्छन्' इस पद से कही गयी है, इसी प्रकार जब आत्मा को असंग रूप में पहचान लिया जाता है, तब तो वास्तव भोक्ता भी कोई नहीं रह जाता। इसी भाव को श्रुति ने 'कस्य कामाय' किसके लिये इस वाक्य से व्यक्त किया है । पतिजायादिकं सर्वं तत्तद्भोगाय नेच्छति । किन्त्वात्मभोगार्थमिति श्रुतावुद्घोषितं बहु ॥१९३॥ यह प्राणी पति, पत्नी आदि जिस किसी को भी चाहता है,

१९२ पञ्चदशी उसे उसके भोग के लिये नहीं चाहता। उसे तो वह केवल अपने भोग के लिए ही चाहता है। यह बात श्रुति में बड़े ज़ोरों से कही गयी है । किं कूटस्थश्चिदाभासोऽथवा किं वोभयात्मकः । भोक्ता, तत्र न कूटस्थोऽसङ्गत्वाद् भोक्तृतां व्रजेत् ॥१९४॥ यदि कोई आत्मा को भोक्ता समझता हो तो वह यह बताये कि—कूटस्थ, चिदाभास, या ये दोनों मिले हुए, इन तीनों में से भोक्ता कौनसा है ? असङ्ग होने के कारण कूटस्थ तो भोक्ता नहीं हो सकता । सुखदुःखाभिमानारख्यो विकारो 'भोग' उच्यते । कूटस्थश्च विकारी चेत्येतन्न व्याहतं कथम् ॥१९५॥ सुख दुःख में अभिमान करना—अपने आपको सुखी या दुःखी मानने लगना,सुख दुःख आ पड़ने पर विकारी हो जाना, बस यह विकार ही तो 'भोग' कहाता है। तब बताओ कि— कूटस्थ भी हो और विकारी भी हो, यह बात व्याहत क्यों नहीं है ? [कूटस्थता और विकारिता एक जगह रह ही नहीं सकती है ।] विकारिबुद्ध्यधीनत्वा दाभासे विकृतावपि । निराधिष्ठानविभ्रान्तिः केवला नहि तिष्ठति ॥१९६॥ चिदाभास तो विकारशील बुद्धि के अधीन हुआ करता है, इस कारण उस आभास के अपने स्वरूप में विकार होना सम्भव है,परन्तु भ्रान्ति का स्वभाव है कि.वह बिना अधिष्ठान के केवल तो रहती ही नहीं---

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९३

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९३ कर तो अकेला चिदाभास स्वतन्तरूप से रहता ही नहीं इस कारण अकेला चिदाभास भी भोक्ता नहीं हो सकता । ] उभयात्मक एवातो लोके भोक्ता निगद्यते । तादृगात्मानमारभ्य कूटस्थः शेषितः श्रुतौ ॥१९७॥ [जब कि अकेला कूटस्थ या अकेला चिदाभास भोक्ता हो ही नहीं सकता ] इस कारण से लोक [ व्यवहार दशा ] में उभयात्मक [ अर्थात् अधिष्ठान सहित चिदाभास ] ही भोक्ता माना जाता है। [लोक में कहने का भाव यह है कि परमार्थ दृष्टि कर बैठें तो उसकी उभयात्मकता ही सम्भव नहीं है] बुद्धि रूपी उपाधि वाले इसी भोक्ता आत्मा का वर्णन करना प्रारम्भ करके, बृहदारण्यक आदि श्रुतियों में, इसी कूटस्थ आत्मा को जो कि बुद्धि आदि की कल्पना का अधिष्ठान भूत चिदात्मा है, शेष रख लिया है [ अर्थात् बुद्धि आदि जितने भी अनात्मपदार्थ हैं, उन सब का निरास करने के पश्चात् उसी को शेष कर दिया जाता है । ] आत्मा कतम इत्युक्ते याज्ञवल्क्यो विबोधयन् । विज्ञानमयमारभ्यासङ्गं तं पर्यशेषयत् ॥१९८॥ जनक ने जब याज्ञवल्क्य से आत्मा के विषय में यह पूछा कि—आत्मतत्व कौन सा है ? तब याज्ञवल्क्य ने उसे समझाते हुए, 'विज्ञानमय' से लेकर वर्णन करना प्रारम्भ करके, इसी असंग कूटस्थ तत्व को शेष रख लिया था । कोऽयमात्मेत्येवमादौ सर्वत्रात्मविचारतः । उभयात्मकमारभ्य कूटस्थः शेष्यते श्रुतौ ॥१९९॥ 'कोयमात्मा' इत्यादि (ऐतरेय ५-१) सभी उपनिषदों में आत्मा

[Page Header] २९४ पञ्चदशी

का जो विचार किया गया है, वहां सभी जगह यह परिपाटी रक्खी है कि—उभयात्मक आत्मा से [ वर्णन करना ] प्रारम्भ करके पीछे से कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। [अन्तः- करण उपाधि वाले आत्मा से प्रारम्भ करके, केवल प्रज्ञानरूपी कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। इन सब श्रुतियों के विचार से यही सिद्ध होता है कि जो उभयात्मक भोक्ता है वह तो मिथ्या होता है, तथा जो पारमार्थिक असङ्ग कूटस्थ है वह अभोक्ता ही है]। कूटस्थसत्यतां स्वस्मिन्नध्यस्यात्मविवेकतः। तात्त्विकीं भोक्तृतां मत्वा न कदाचिज्जिहासति ॥२००॥ भोक्ता कहाने वाला यह जब अपने अविवेक के कारण, अपने और कूटस्थ के विवेक को भूल जाता है, तब कूटस्थ की सत्यता का अपने में अध्यास कर लेता है और उस सत्यता के द्वारा अपने भोक्तापन को भी सत्य ही मान बैठता है। बस फिर तो वह कभी भी भोगों को छोड़ना नहीं चाहता। [वह समझता है कि मुझ में भोक्तापन सदा रहता है, मुझे भोगों की ज़रूरत सदा ही रहती है, इस भ्रान्त विचार में आकर अब वह भोगों को छोड़ना नहीं चाहता है]। भोक्ता स्वस्यैव भोगाय पतिजायादिमिच्छति। एष लौकिकवृत्तान्तः श्रुत्या सम्यगनूदितः ॥२०१॥ लोक में जो भोक्ता प्रसिद्ध है, वह अपने ही भोग के लिये पति या पत्नी आदि भोगसामग्री को चाहा करता है। इस लौकिक वृत्तान्त का ही श्रुति ने केवल अनुवाद कर दिया है। उसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि—इन भोगों को कूटस्थ

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९५

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९५ आत्मा का उपकरण बता दिया जाय। लोक में जो उभयात्मक भोक्ता प्रसिद्ध है ये भोगोपकरण उसी के शेष हैं, इस बात का श्रुति ने अनुवाद भर किया है। इन भोगों को शुद्ध आत्मतत्त्व का शेष सिद्ध करने में श्रुति का अभिप्राय कदापि नहीं है]। भोग्यानां भोक्तृशेषत्वान्माभोग्येष्वनुरज्यत्ताम् । भोक्त्र्येव प्रधानेऽतोऽनुरागं तं विधित्सति ॥२०२॥ भोग्य जो पति पत्नी आदि पदार्थ हैं, वे सब भोक्ता ही के उपकरण हैं [जो भूल से अपने को भोक्ता मान रहा है ये उसी के काम के हैं। जो अपने को भोक्ता नहीं समझता वे भोग उसके किसी भी काम के नहीं हैं ] यह समझ कर भोगों में अनुराग नहीं करना चाहिये। किन्तु अपना अनुराग प्रधानभूत भोक्ता में ही रखना चाहिये, वह श्रुति बस यही बात लोगों को बताना चाहती थी। या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी । त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु ॥२०३॥ जो लोग अविवेकी हैं, जिन्हें आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं है, उनकी विषयों में जैसी दृढ भक्ति होती है विषयों के प्रति वैसी दृढ भक्ति हे लक्ष्मीपते ! तेरा सदा चिन्तन करते हुए मेरे मन में से निकल कर भाग जाय [मेरा मन विषयों की आसक्ति को छोड़ कर सदा तुम्हीं में रहने लगे]। अथवा—अविवेकी लोगों को विषयों में जैसी दृढ प्रीति हो रही है तेरा स्मरण करने वाले मेरे हृदय में से तेरी वैसी दृढ प्रीति कभी भी न जाय [तेरे लिए वैसा दृढ अनुराग मेरे हृदय में सदा ही बना रहे]।

है उस प्रेम को भोक्ता आत्मा में ही समेट कर अब यह विवेकी

२१६ पञ्चदशी इति न्यायेन सर्वस्माद् भोग्य जाताद् विरक्तधीः । उपसंहृत्य तां प्रीतिं भोक्त्र्येव बुभुत्सते ॥२०४॥ ऊपर कहे प्रकार से, पति पत्नी आदि सभी भोग्य पदार्थों से विरक्त होकर, भोग्य पदार्थों में हमारा जो प्रेम बिखरा पड़ा है उस प्रेम को भोक्ता आत्मा में ही समेट कर अब यह विवेकी इसी आत्मतत्व को जानना चाहता है [ कि यह आत्मतत्व कैसा है ? ] स्रक्चन्दनवधूवस्त्रसुवर्णादिषु पामरः । अप्रमत्तो यथा, तद्वन्न प्रमाद्यति भोक्तरि ॥२०५॥ पामर प्राणी जैसे माला, चन्दन, पत्नी, वस्त्र तथा सुवर्ण आदि पदार्थों [के कमाने और उनकी रक्षा करने] में सावधान रहता है,[दिन रात जुटा रहता है—इनके कमाने आदि में दिन- रात एक कर देता है] मुमुक्षु पुरुष की यह पहचान है कि— वह भी इसी तरह, आत्मतत्व के विषय में कभी प्रमाद नहीं करता । वह सदा उसी का चिन्तन करता रहता है । [उस पर इसी प्रकार आत्मतत्व का स्पष्ट दर्शन कर लेने की धुन सवार हो जाती है ] । काव्यनाटकतर्कादिमभ्यस्यति निरन्तरम् । विजिगीषुर्यथा, तद्वन्मुमुक्षुः स्वं विचारयेत् ॥२०६॥ विजिगीषु पुरुष जिस प्रकार सदा काव्य, नाटक तथा तर्क आदि का अभ्यास किया करता है, मुमुक्षु लोग भी ऐसी ही लगन से सदा अपने आत्मा का विचार किया करें । जपयागोपासनादि कुरुते श्रद्धया यथा । स्वर्गादिवाञ्छया, तद्वच्छ्रद्दध्यात् स्वे मुमुक्षया ॥२०७॥

तृप्तिदीपप्रकरणम् २१७

तृप्तिदीपप्रकरणम् २१७ जिस प्रकार वैदिक लोग, स्वर्ग आदि की इच्छा को लेकर उसके साधन जप याग या उपासना आदि को श्रद्धापूर्वक किया करते हैं, इसी प्रकार मुमुक्षु लोग भी, केवल मोक्ष की अभि- लाषा को लेकर, अपने आत्मा पर ही विश्वास करें [विषयों पर श्रद्धा करना छोड़ दें]। चित्तैकाग्र्यं यथा योगी महायासेन साधयेत् । अणिमादिप्रेप्सयैवं विविच्यात् स्वं मुमुक्षया ॥२०८॥ जिस प्रकार योगी लोग, अणिमा आदि ऐश्वर्य पाने के लिए, बड़े भारी प्रयत्न से चित्त को एकाग्र किया करते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक समझदार आदमी मोक्ष की इच्छा को लेकर, सदा ही अपने आत्मा का विवेक किया करे [इस अपने आत्मा को देहादियों से पृथक् पहचान ले। इसको देहादियों में रिला मिला न रहने दे]। कौशलानि विवर्धन्ते तेषामभ्यासपाटवात् । यथा तद्वद्विवेकोऽस्याप्यभ्यासाद् विशदायते ॥२०९॥ अभ्यास की पटुता से जैसे इन काव्यादि का अभ्यास करने वाले लोगों की चतुरता उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है, इसी प्रकार अभ्यास करते करते इस मुमुक्षु का विवेक [देहादियों से आत्मा का भेदज्ञान] भी निखरने लगता है। विविञ्चता भोक्तृतत्त्वं जाग्रदादिष्वसंगता । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां साक्षिण्यध्यवसीयते ॥२१०॥ अन्वयव्यतिरेक नाम की युक्ति के सहारे से, जब कोई पुरुष भोक्ता के पारमार्थिक स्वरूप को, भोग्य पदार्थों से पृथक् १९

२१८ पञ्चदशी पहचान लेता है, तब फिर उस पुरुष को जाग्रदादि सभी अव- स्थाओं में साक्षी तत्व के असंगपने का निश्चय हो जाता है। यत्र यद् दृश्यते द्रष्ट्रा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । तत्रैव तन्नेतरत्रेत्यनुभूतिर्हि संमता ॥२११॥ यह द्रष्टा, जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति में क्रम से जिन [स्थूल सूक्ष्म और आनन्द नाम के] भोग्यों को अनुभव किया करता है, वे भोग्य पदार्थ केवल उन ही अवस्थाओं में हुआ करते हैं। [दूसरी अवस्थाओं के आजाने पर वे भोग्य पदार्थ नहीं रहते] परन्तु इन तीनों अवस्थाओं में अनुगत रहने वाला जो इनका द्रष्टा है, वह तो इन सब से पृथक् ही है यह अनुभव तो सभी को सम्मत है। स यत्तत्रेक्षते किंचित्तेनानन्वागतो भवेत् । दृष्ट्वैव पुण्यं पापं चेत्येवं श्रुतिषु डिण्डिमः ॥२१२॥ ‘स यत्तत्र किंचित् पश्यति अनन्वागतस्तेन भवति, असंगोह्ययं पुरुषः सवाएष एतस्मिन् संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं पापं च पुनः प्रति- न्यायं प्रतियोन्याद्रवति’ (वृ० ४-३-१५) इस श्रुति में डंके की चोट कहा गया है कि—वह आत्मा उस अवस्था में, जिस किसी भी भोग्य को देखता है, उसके साथ अनुगत नहीं होता—किंवा उससे सम्बद्ध नहीं हो जाता [किन्तु वह वहां के दृश्यों को वहीं छोड़ कर, अकेला ही दूसरी अवस्था में पहुँचता है। वह वहां के पुण्य पाप किंवा सुख दुःखों को देखकर ही चला जाता है। उन्हें अपने साथ नहीं ले जाता।] जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादि प्रपंचं यत् प्रकाशते । तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥२१३॥

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९९

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९९ सत्य ज्ञान आनन्द रूप जो महान् तत्व, जाग्रदादि प्रपंच को प्रकाशित किया करता है, वही ब्रह्मनामक तत्व मैं हूँ। [जन्म, जरा, मृत्यु आदि के बस में आने वाला क्षुद्र प्राणी मैं नहीं हूँ]। श्रुति और अनुभव के कहने से, जब कोई, इस बात को जान या मान लेता है तब फिर वह [कर्ता भोक्ता आदि] सभी बन्धनों से पूर्ण रूप से छुट जाता है। एक एवात्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । स्थानत्रयव्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥२१४॥ जाग्रत् स्वप्न या सुषुप्ति तीनों में एक ही आत्मतत्व है, ऐसा जान लेना चाहिये। जब किसी का आत्मा, ज्ञान के प्रताप से इन तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठ जाता है, तब फिर उसका पुनर्जन्म कभी भी नहीं हो पाता। [इस शरीर के गिर जाने पर उसे दूसरा शरीर नहीं मिलता।] त्रिषु धामसु यद् भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद् भवेत् । तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥२१५॥ जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति नाम के तीनों धामों में, जो तीन तरह के [स्थूल सूक्ष्म तथा आनन्दरूपी] भोग्य हैं, जो तीन तरह के [विश्व तैजस तथा प्राज्ञ नाम के] भोक्ता हैं, तथा इनमें जो नानाविध भोग [अनुभव] होता है, इन सभी से विलक्षण जो एक चिन्मात्र रूप सदा कल्याणस्वरूप साक्षी परमात्मा है, वही तो मैं हूँ। एवं विवेचिते तत्वे विज्ञानमयशब्दितः । चिदाभासो विकारी यो भोक्तृत्वं तस्य शिष्यते ॥२१६॥ ·इस प्रकार आत्मतत्व की विवेचना कर चुकने के बाद

३०० पञ्चदशी [जब कि उसको असंग जान लिया जाता है तब] विकारी होने के कारण विज्ञानमय कहानेवाला जो चिदाभास है वह ही भोक्ता रह जाता है । मायिकोयं चिदाभासः श्रुतेरनुभवादपि । इन्द्रजालं जगत् प्रोक्तं तदन्तःपात्ययं यतः ॥२१७॥ श्रुति और अनुभव इन दोनों का कहना मानें तो यह चिदा- भास तो मायिक [किंवा मिथ्या] है । विद्वान् लोग तो इस सभी जगत् को इन्द्रजाल की तरह मिथ्या मानते हैं । वे कहते हैं कि—क्योंकि यह चिदाभास भी उस जगत् के अन्तर्भूत ही है, इस कारण यह भी मिथ्या ही है । बिलयोप्यस्य सुप्त्यादौ साक्षिणा ह्यनुभूयते । एतादृशं स्वस्वभावं विविनक्ति पुनः पुनः ॥२१८॥ सुषुप्ति या मूर्छा जब आजाती है, तब यह साक्षी [आत्मा] इस चिदाभास के विलय किंवा नाश को अनुभव किया करता है । यों कूटस्थ से अलगाये हुए चिदाभास को मायिक समझ लेने पर यह होता है कि यह चिदाभास अपने ऐसे मिथ्या स्वभाव का स्वयं ही बार बार विवेक करने लगता है । [यह अपनी कमी को—अपने नश्वरपने को पहचान कर अपने मन में इस बात को अनन्त बार दोहराता है, उसको इस जगद्व्यवहार को देख कर हँसी और आश्चर्य दोनों होते हैं] । विविच्य नाशं निश्चित्य पुनर्भोगं न वाञ्छति । मुमूर्षुः शायितो भूमौ विवाहं कोऽभिवाञ्छति ॥२१९॥ विवेक करते करते, अपने नाश का निश्चय जब कर लेता है, तब वह भोगों की इच्छा करना ही छोड़ बैठता है । क्या

भला जिस मुमूर्षु को खाट से भूमि पर उतार लिया गया हो वह कभी भी अपना विवाह कराना चाहेगा ? जिहेति व्यवहर्तुं च भोक्ताहमिति पूर्ववत् । छिन्ननास इव हीतः क्लिश्यन्नारब्धमश्नुते ॥२२०॥ उसकी कुछ ऐसी विचित्र अवस्था हो जाती है कि-यह तो अब पहले की तरह, अपने को भोक्ता कहता हुआ भी शरमाता है। 'अभी तक मेरे प्रारब्ध कर्म समाप्त नहीं हुए' इस दुःख को लिये हुए ही, नाक कटे आदमी के समान लज्जित रह कर अपने प्रारब्ध को भोगा करता है। यदा स्वस्यापि भोक्तृत्वं मन्तुं जिह्वेत्ययं तदा । साक्षिण्यारोपयेदेतदिति कैव कथा वृथा ॥२२१॥ यह चिदाभास जब अपने आपको भी भोक्ता मानता हुआ शरमाने लगता है तब यह बिचारा अपने भोक्तापने के दोष को साक्षी पर लादेगा, ऐसी वृथा शंका तो करनी ही नहीं चाहिए। इत्यभिप्रेत्य भोक्तार माक्षिपत्यविशङ्कया । कस्य कामायेति ततः शरीरानुज्वरो न हि ॥२२२॥ [कूटस्थ या चिदाभास कोई भी पारमार्थिक भोक्ता नहीं है] इसी अभिप्राय को लेकर 'कस्य कामाय' इस श्रुति ने निःशंक होकर भोक्ता का निषेध कर दिया है। ऐसा हो जाने पर फिर उसे इस शरीर के साथ कभी भी सन्तप्त होना नहीं पड़ता । [ऐसा ज्ञानी जब ज्वर से पीड़ित होता है तब उसका विश्लेषण यों करना चाहिए कि-उसके शरीर को ज्वर आता है, वह तटस्थ होकर उस ज्वरित शरीर को देखा करता है। उस दुःखी शरीर के साथ वह दुःखी कभी नहीं होता । कैसा भी कष्ट आ पड़ने

३०२ पञ्चदशी पर वह अपनी तटस्थता को टूटने नहीं देता । यह तटस्थता ही ज्ञानियों का गुप्त धन माना जाता है ] । स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च शरीरं त्रिविधं स्मृतम् । अवशं त्रिविधोऽस्त्येव तत्र तत्रोचितो ज्वरः ॥२२३॥ स्थूल सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार का शरीर होता है। उन उन शरीरों में तीनों तरह का संताप भी हुआ ही करता है। [उसमें किसी का बस नहीं है कि उस सन्ताप को हटा सके।] वातपित्तश्लेष्मजन्यव्याधयः कोटिशस्तनौ । दुर्गन्धित्वकुरूपत्वदाहभङ्गादयस्तथा ॥२२४॥ इस स्थूल शरीर में वात, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाली, अनन्त बीमारियां, दुर्गन्धि किंवा कुरूप होना, जल जाना, या चोट लग जाना, आदि अनेक ज्वर [उपद्रव] रहते ही हैं। कामक्रोधादयः शान्तिदान्त्याद्या लिङ्गदेहगाः ज्वरा, द्वयेऽपि बाधन्ते प्राप्त्याप्राप्त्या नरं क्रमात्॥२२५॥ काम क्रोधादि तथा शान्ति दान्ति आदि लिङ्ग शरीर के ज्वर हैं। जब काम क्रोधादि आते हैं तब वे सूक्ष्म शरीर को दुःखी करते हैं तथा जब शान्ति आदि नहीं आते तब भी लिङ्ग देह दुःखी होता है। यों ये दोनों, क्रम से पाने और न पाने से दुःखी किया करते हैं। स्वं परं च न वेत्त्यात्मा विनष्ट इव कारणे । आगामिदुःखबीजं चेत्येतदिन्द्रेण दर्शितम् ॥२२६॥ ‘नहि खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति, नो एवेमानि भूतानि,विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्रभोग्यं पश्यामि’ (छा० ८-११-२) इस श्रुति में इन्द्र ने अपने प्रजापति गुरु से यह कहा है कि—

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०३

[Page Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०३


वह न तो अपने आपको ही जानता है और न दूसरे को ही पहचान पाता है। कारण शरीर में पहुँच जाने पर तो यह [अज्ञान के कारण] विनष्ट सा ही हो जाता है, यही अवस्था अगले दिनों में आने वाले दुःखों का कारण भी होती है। एते ज्वराः शरीरेषु त्रिषु स्वाभाविका मताः । वियोगे तु ज्वरैस्तानि शरीराण्येव नासते ॥२२७॥ तीनों शरीरों में प्रतीत होने वाले ये ज्वर शरीरों के साथ ही साथ लगे हुए हैं। ये तो उनमें स्वभाव से ही रहते हैं। इन्हें कोई उनमें से हटा नहीं सकता। स्थूल शरीर रोगी न हों, काम क्रोधादि मन में उत्पन्न न हों, अज्ञान में दुःख रूपी भेड़िये छिपे न बैठे हों, यह कभी होना ही नहीं है। क्योंकि इन ज्वरों का जब इन शरीरों से वियोग हो जाता है तब तो फिर ये शरीर ही नहीं रहने पाते [इसी से कहते हैं कि ये तो स्वाभाविक हैं] तन्तौर्वियुज्येत पटो वालेभ्यः कम्बलो यथा । मृदो घटस्तथा देहो ज्वरेभ्योऽपीति दृश्यताम् ॥२२८॥ तन्तु से यदि वस्त्र वियुक्त हो सकता हो, बालों से यदि कम्बल को पृथक् किया जा सकता हो, मिट्टी से यदि घट को अलग करना सम्भव हो तो यह भी हो सकता है कि ज्वरों से देह को बचाया जा सके [ये शरीर तो विपत्ति के वृक्ष हैं] । चिदाभासे स्वतः कोऽपि ज्वरो नास्ति, यतश्चितः । प्रकाशैकस्वभावत्वमेव दृष्टं न चेतरत् ॥२२९॥ चिदाभास को स्वयं तो कोई भी ज्वर नहीं होता [उसको तो शरीरों के सम्बन्ध के कारण ही ज्वर होते हैं]। विद्वान् साधक जब समाधिभावना में बैठ कर देखते हैं, तब वे चित्

३०४ पञ्चदशी

को केवल प्रकाश स्वभाव वाला ही पाते हैं। [यह चिदाभास
उस चित् का ही प्रतिबिम्ब है इस कारण उसमें भी कोई ज्वर
नहीं होता]।
चिदाभासेऽप्यसंभाव्या ज्वराः, साक्षिणि का कथा।
एवमप्येकतां मेने चिदाभासो ह्यविद्यया ॥२३०॥
यों जब कि चिदाभास में भी ज्वरों का होना असंभव है
तब फिर साक्षी में ज्वर नहीं होते, इसका तो कहना ही क्या ?
वस्तुस्थिति तो यही है फिर इस चिदाभास ने अपनी अविद्या
[बेसमझी] के कारण [उन शरीरों से] अपनी एकता मान ली
है [और यह अब अपने आपको ही सन्तापशील मान
बैठा है]।
साक्षिसत्यत्वमध्यक्ष्य स्वेनोपेते वपुस्त्रये।
तत्सर्वं वास्तवं स्वस्य स्वरूपमिति मन्यते ॥२३१॥
[एकता मानने की रीति तो यह है कि] उस चिदाभास ने,
अपने से युक्त इन तीनों शरीरों में, साक्षी की सत्यता का
अध्यास किया और फिर पीछे से ज्वरों से जलते हुए उन तीनों
शरीरों को ही, अपना सच्चा रूप समझ लिया। [मानों कोई
दहकती हुई भट्टी में घुस कर उस भट्टी को ही अपना आपा
मान बैठा हो और अन्दर बैठा बैठा जल रहा हो।]
एतस्मिन् भ्रान्तिकारेऽयं शरीरेषु ज्वरत्स्वथ।
स्वयमेव ज्वरामीति मन्यते हि कुटुम्बिवत् ॥२३२॥
इस भ्रान्ति के रहते रहते जब इस चिदाभास के किसी
शरीर को कोई ज्वर होजाता है तब यह कुटुम्बी पुरुष की तरह
अपने आपको ही ज्वरशील मान बैठता है।