पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
३२६ पञ्चदशी कर, इस कर्म और भोग के दुःखदायी अनन्त चक्र में से उन का भी उद्धार करले] । अविद्वदनुसारेण वृत्ति र्बुद्धस्य युज्यते । स्तनन्धयानुसारेण वर्तते तत्पिता यतः ॥२८७॥ ज्ञानी लोगों का बर्ताव तो अज्ञानियों के अनुसार ही होना चाहिये। देखते हैं कि छोटे-छोटे बच्चों के माता पिता उन्हीं के अनुकूल बर्ताव किया करते हैं । अधिक्षिप्तस्ताडितो वा बालेन स्वपिता तदा । न क्लिश्नाति न कुप्येत बालं प्रत्युत लालयेत् ॥२८८॥ देखा जाता है कि जब बच्चा पिता को भला बुरा कहता या मार बैठता है तब भी उसके पिता को क्रोध कुछ भी नहीं होता। प्रत्युत वह इसके बदले में भी उसे प्यार ही किया करता है । निन्दितः स्तूयमानो वा विद्वानज्ञैर्न निन्दति । न स्तौति किन्तु तेषां स्याद् यथा बोधस्तथा चरेत् ॥२८९॥ अज्ञानी लोग जब विद्वान् पुरुष की निन्दा या स्तुति करें तब इसके बदले में वह स्वयं उनकी निन्दा या स्तुति न करने लगे । किन्तु इन लोगों को जैसे भी बोध हो सके वैसा वैसा प्रयत्न करता रहे । येनायं नटनेनात्र बुध्यते कार्यमेव तत् । अज्ञप्रबोधान्नैवान्यत् कार्यमस्त्यत्र तद्विदः ॥२९०॥ विद्वान् के जिस जिस तरह के आचरण करने से, इस अज्ञानी को ज्ञान हो जाय, ज्ञानी को वही वही आचरण करते जाना चाहिये । ज्ञानी का तो इसके अतिरिक्त और कुछ भी
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२७
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२७ कर्तव्य नहीं है कि वह अज्ञानी प्राणी को किसी तरह बोध करादे । [ इस कारण ज्ञानी को उनका अनुसरण करके तत्व बोध कराना चाहिये । अज्ञानी की तरह सब कुछ करने लगना इष्ट नहीं है । ] कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥२९१॥ यह विद्वान् पहले तो कृतकृत्य हो जाने के कारण तृप्त हो कर, फिर आगे कही विधि से प्राप्तप्राप्तव्य हो जाने के कारण तृप्त होकर, अपने मन में सदा यही सोचा करता है— धन्योऽहं धन्योहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि । धन्योहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥२९२॥ मैं धन्य हूँ । क्योंकि मैं अपने आत्मतत्व को साक्षात् जान गया हूँ । यों आत्मा को समझ लेने से ही मुझे परम हर्ष है । ब्रह्म नाम का जो आनन्द है, वह अब मुझे स्पष्ट ही प्रतीत होने लगा है । यों आत्मज्ञान के फल के मिलने से मैं परम धन्य होगया हूँ । धन्योहं धन्योहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य । धन्योहं धन्योहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥२९३॥ आज तो मुझे कोई भी सांसारिक दुःख नहीं दीखता । इस कारण अनिष्ट की निवृत्ति हो जाने से भी मैं धन्य हो गया हूँ । क्योंकि आज मेरा अज्ञान [ अनेक कर्मों की वासनाओं का पुञ्ज ] न मालूम कहां भाग गया है ? [ यही कारण है कि अब मुझे कोई दुःख प्रतीत नहीं होता । इसी से मैं कृतार्थ हो चुका हूँ । ]
३२८ पञ्चदशी धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किञ्चित् । धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य सम्पन्नम् ॥२९४॥ मैं धन्य हूँ, आजतो मुझे कुछ कर्तव्य ही नहीं रहा है। मैं धन्य हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह सब आज मिल चुका है । धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तिर्मे कोपमा भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥२९५॥ मैं धन्य हूँ । आज मेरे समान तृप्ति किसको है ? इससे अधिक और क्या कहूँ ? कि मैं धन्य हूँ,मैं धन्य हूँ,मैं बार बार धन्य हूँ [ मुझे तो अब तृष्टि ही तृष्टि दिखाई दे रही है । ] अहो पुण्यं महो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् । अस्य पुण्यस्य संपत्ते रहो वयमहो वयम् ॥२९६॥ वे मेरे अनन्त कोटि जन्मों के अनन्त पुण्य आज निश्चय ही फलरूप में आगये । पुण्यों की इस राशि के प्रताप से आज मैं आनन्द सागर की लहरों में हिलोरे ले रहा हूँ । आज मेरे पुण्यों के प्रताप से वह सारा संसार मुझे संतोष ही संतोष दीख पड़ रहा है । अहो शास्त्र महोशास्त्र महो गुरु रहो गुरुः । अहो ज्ञान महो ज्ञान महो सुखमहो सुखम् ॥२९७॥ उन शास्त्रों और उन गुरुओं को स्मरण करके भी आज मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है, जिनके कि प्रताप से मेरी हृदय की ग्रन्थि खुली है । ज्ञान के प्रताप से मैं इस हर्षातिरेक में आया हूँ और आनन्दित हो रहा हूँ उस ज्ञान और उस सुख की महिमा का क्या वर्णन करूँ ?
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२९
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२९ तृप्तिदीपमिमं नित्यं येऽनुसन्दधते बुधाः । ब्रह्मानन्दे निमज्जन्तस्ते तृप्यन्ति निरन्तरम् ॥२९८॥ जो बुध लोग इस तृप्तिदीपनाम के प्रकरण का विचार नित्य करेंगे वे ब्रह्मानन्द में निमग्न हो कर सदा ही तृप्त रहने लगेंगे। इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं तृप्तिदीपप्रकरणं समाप्तम् ।
8. Kutasthadipa
ॐ कूटस्थदीपप्रकरणम् खादित्यदीपिते कुड्ये दर्पणादित्यदीप्तिवत् । कूटस्थभासितो देहो धीस्थजीवेन भास्यते ॥१॥ जो भित्ति पहले सूरज से दीपित हो रही है, उसी भित्ति पर जैसे दर्पण में के सूरज की दूसरी दीप्ति भी जा पड़ती हो, [और वह भित्ति दो प्रकाशों से चमक उठती हो] उसी प्रकार [पहले] कूटस्थ [अविकारिचैतन्य] से भासित भी यह देह [फिर दुबारा] बुद्धिस्थ चिदाभास से भी भासित हुआ करता है। सूर्य के प्रकाश से जो भित्ति अभी तक सामान्यतया प्रकाशित हो रही थी, दर्पण पर गिर कर लौट कर भित्ति पर पड़ी हुई सूर्य की रश्मि फिर जैसे उसी भित्ति को विशेषतया प्रकाशित किया करती है, इसी प्रकार निर्विकार चैतन्य ने इस देह को सामान्यतया प्रकाशित तो कर ही रक्खा है, उसे ही यह बुद्धिस्थ चिदाभास फिर दुबारा विशेष रूप से प्रकाशित किया करता है। यों देह को प्रकाशित करने वाले दो चैतन्य हैं—। एक सामान्य चेतन दूसरा विशेष चेतन। अनेकदर्पणादित्यदीप्तीनां बहुसन्धिषु । इतरा व्यज्यते, तासामभावेऽपि प्रकाशते ॥२॥ यदि एक ही भित्ति पर अनेक दर्पणों के आदित्यों के आभास [प्रभा-अक्स] डाले जांय, तो उन आभासों किंवा
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३१
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३१ दीप्तियों के बीच बीच में दूसरी जो सामान्यप्रभा रूपी सूर्य- दीप्ति है वह भी देखी ही जाती है। दर्पणों की अनेक प्रभायें जब नहीं रहतीं वह [सामान्य प्रभा] तो तब भी सब जगह प्रकाशित ही रहती है। चिदाभासविशिष्टानां तथानेकधियामसौ । सन्धिं धियामभावं च भासयन् प्रविविच्यताम् ॥३॥ ऊपर कहे हुए दृष्टान्त के अनुसार, चिदाभासयुक्त जो अनेक बुद्धियां किंवा अनेक बुद्धिवृत्तियां होती हैं, [जाग्रत् तथा स्वप्न में तो] उन बुद्धियों के सन्धिकाल को प्रकाशित करने वाले तथा [सुषुप्ति के समय] उन बुद्धियों के अभाव को प्रकाशित करने वाले, इस कूटस्थ को [ऊपर कहे दृष्टान्त के अनुसार उन बुद्धियों से] पृथक् जान लो। जाग्रत् तथा स्वप्न के समय एक वृत्ति नष्ट होती है; दूसरी उत्पन्न होती है। इन दोनों वृत्तियों की सन्धि को जब कि थोड़े से समय के लिये कोई भी वृत्ति नहीं रहती—जो कोई तत्व प्रकाशित करता है, वही कूटस्थ चैतन्य है। सुषुप्ति के समय जब कोई भी बुद्धिवृत्ति नहीं रहती, तब वृत्तियों के अभाव को जो कोई तत्त्व प्रकाशित करता है, वही कूटस्थ चैतन्य है। वह इन बुद्धिवृत्तियों से और इनके अभावों से सर्वथा भिन्न है। यों उस कूटस्थ तत्व का विवेक कर लेना चाहिये। घटैकाकारधीस्था चिद्घटमेवावभासयेत् । घटस्य ज्ञातता ब्रह्मचैतन्येनावभासते ॥४॥ घट को देखते समय जो बुद्धि केवल घटाकार हो जाती है, उस बुद्धि में जिस चैतन्य का आभास पड़ता है, वह तो
३३२ पञ्चदशी केवल घट को ही प्रकाशित किया करता है । परन्तु उस घट में जो ज्ञातता नाम का धर्म रहता है [जिस धर्म के सहारे से ‘घट को जान लिया’ यह व्यवहार किया जाता है] उसको तो [घट की कल्पना का अधिष्ठान] ब्रह्मचैतन्य ही प्रकाशित किया करता है [यों देह से बाहर चिदाभास और ब्रह्म को पृथक् पृथक् समझ लेना चाहिये ] अज्ञातत्वेन ज्ञातोयं घटो बुद्धयुदयात् पुरा । ब्रह्मणैवोपरिष्टात्तु ज्ञातत्वेनेत्यसौ भिदा ॥५॥ जब तक बुद्धि उत्पन्न नहीं हो जाती, तब तक तो यह घट अज्ञात रूप से ब्रह्मतत्त्व से ही ज्ञात रहता है । बुद्धि की उत्पत्ति हो जाने पर तो वही ब्रह्म इसे ज्ञातरूप से प्रकाशित करने लग पड़ता है, बस केवल इतना सा ही भेद है [ऐसी अवस्था में यह शंका निर्मूल हो जाती है कि—ज्ञातता को भासित करने वाले चैतन्य से ही घट की प्रतीति भी हो सकती है। बुद्धि की क्या आवश्यकता होती है ? क्योंकि ज्ञातता आदि भेदों की सिद्धि के लिये बुद्धि की भी परमावश्यकता तो रहती ही है ।] चिदाभासान्तधीवृत्तिर्ज्ञानं लोहान्तकुन्तवत् । जाड्यमज्ञानमेताभ्यां व्याप्तः कुम्भो द्विधोच्यते ॥६॥ [‘ज्ञातता’ और ‘अज्ञातता’ कराने वाले ‘ज्ञान’ और ‘अज्ञान’ का स्वरूप इस श्लोक में बताया गया है] भाले की नोक पर जैसे लोहा लगा रहता है, इसी प्रकार चित्प्रतिबिम्ब से युक्त जो बुद्धि वृत्ति है [ जिस बुद्धिवृत्ति के अन्त अर्थात् अग्रभाग में चिदाभास लगा रहता है ] उस को तो ‘ज्ञान’ कहते हैं। जो तो जाड्य है—[जो स्वतः स्फूर्ति का न होना है]
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३३
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३३ वही 'अज्ञान' कहाता है । जब कोई कुम्भ इस ज्ञान से व्याप्त होता है तब उसे 'ज्ञात कुम्भ' कहते हैं। जब कोई कुम्भ अज्ञान से व्याप्त हुआ रहता है तब उसको 'अज्ञात कुम्भ' कहा जाता है । अज्ञातो ब्रह्मणा भास्यो ज्ञातः कुम्भ स्तथा न किम् । ज्ञातत्वजननेनैव चिदाभासपरिक्षयः ॥७॥ जैसे अज्ञात कुम्भ ब्रह्म से भास्य होता है, क्या ऐसे ही ज्ञात कुम्भ ब्रह्म से भास्य नहीं होसकता ? [किन्तु हो ही सकता है। अज्ञातता को उत्पन्न करके जैसे अज्ञान उपक्षीण हो जाता है इसी प्रकार] चिदाभास [ ज्ञान ] भी ज्ञातता को उत्पन्न करके क्षीण होजाता है, [उसके बाद उसका कोई उपयोग नहीं रहता, फिरतो अज्ञात कुम्भ की तरह ज्ञात कुम्भ भी ब्रह्म से ही भास्य होता है] आभासहीनया बुद्ध्या ज्ञातत्वं नैव जन्यते । तादृग्बुद्धेर्विशेषः को मृदादेः स्याद् विकारिणः ॥८॥ जो बुद्धि आभास से हीन है, उससे तो ज्ञातता उत्पन्न ही नहीं होती। वैसी बुद्धि में और मिट्टी पत्थर में तो कोई भेद ही नहीं होता । [इसलिये चिदाभास को निरर्थक मत समझो । अकेली बुद्धि के बस का यह काम नहीं है कि वह ज्ञातता को उत्पन्न कर सके ।] ज्ञात इत्युच्यते कुम्भो मृदा लिप्तो न कुत्रचित् । धीमात्रव्याप्तकुम्भस्य ज्ञातत्वं नेष्यते तथा ॥९॥ लोक में भी देखलो कि—जो घड़ा मट्टी से ढकरहा हो उसे कोई भी ज्ञात कुम्भ नहीं कहता। ईसी प्रकार जो कुम्भ
१३४ पञ्चदशी चिदाभासरहित बुद्धि से व्याप्त हो रहा हो उसे कोई भी 'ज्ञात कुम्भ' नहीं मान सकता। ज्ञातत्वं नाम कुम्भेऽतश्चिदाभासफलोदयः । न फलं ब्रह्मचैतन्यं मानात् प्रागपि सत्वतः ॥१०॥ [क्योंकि केवल बुद्धि तो ज्ञातता को उत्पन्न करही नहीं सकती] इस कारण कुम्भ में चिदाभासरूपी फल का उदय हो जाना ही 'ज्ञातता' कहाती है । ब्रह्मचैतन्य को ही फल मान लें और [चिदाभास को हटादें] यह भी ठीक नहीं है [ क्योंकि ब्रह्मचैतन्य को तो फल अर्थात् घटादिका स्फुरण कह ही नहीं सकते इसका कारण यह है कि ] ब्रह्म चैतन्य तो प्रमाणों से भी पहले से विद्यमान रहता है । [प्रमाणों का फल तो उसे कहना चाहिये जो प्रमाणों के पीछे से होता हो] बात यह है कि जिसे अनुभव या स्फूर्ति या प्रतीति कहते हैं, वह तो अजर अमर अखण्ड और एकरस है। वह अनादि काल से ऐसी ही है, और ऐसी ही रहेगी। परन्तु हम विचारदरिद्र लोगों को इस अखण्ड अनन्त सदातन स्फूर्ति का ध्यान बिल्कुल भी नहीं है। अब यह होता है कि जब किसी पदार्थ में ज्ञातता नाम का धर्म उत्पन्न हो जाता है, त्यों हीं हम उस पदार्थ की स्फूर्ति होना मान लेते हैं। असलमें देखा जाय तो वहां जो स्फूर्ति है वह तो सदातन ब्रह्म चैतन्य ही है। ज्ञातता उत्पन्न होने के कारण जो पदार्थ उस अखण्ड स्फूर्ति के लपेटे में आगया है वह भी प्रतीत सा होने लग पड़ा है। तत्व विचार से मालूम होता है कि यह प्रतीति प्रमाणों से पैदा नहीं होती । प्रमाणों से तो पदार्थों
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३५
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में चिदाभास रूपी फल का उदय हो जाना ही घट का जान लिया जाना है । परागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन सम्मता । संवित् सैवेह मेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः ॥११॥ परागर्थ जो घटादि वाह्य पदार्थ हैं, वे जब प्रमेय अर्थात् प्रमाण के विषय होते हैं, उस समय प्रकट होने वाली जो संवित् (ज्ञान) प्रमाणों का फल मानली गयी है, वही संवित् इस वेदान्तशास्त्र में वेदान्त वाक्य रूपी प्रमाणों से जानने योग्य एक पदार्थ है । इति वार्तिककारेण चित्साहृश्यं विवक्षितम् । ब्रह्मचित्फलयोर्भेदः साहश्यां विश्रुतो यतः ॥१२॥ ऊपर कहे हुए श्लोक में वार्तिककार सुरेश्वराचार्य ने चित्साहश्य की विवक्षा की है—अर्थात् ब्रह्म चैतन्य के सदृश चिदाभास को प्रमाणों का फल कहा है । ब्रह्मचैतन्य को फल नहीं कहा । वार्तिककार के गुरु श्रीमच्छंकराचार्य ने भी उपदेश- साहसी में ब्रह्मचैतन्य तथा ब्रह्मचैतन्य के फल [चिदाभास] को भिन्न भिन्न बताया है । आभास उदित स्तस्माज्ज्ञातत्वं जनयेद् घटे । तत् पुनर्ब्रह्मणा भास्य मज्ञातत्ववदेव हि ॥१३॥ प्रकृत बात तो यही हुई कि-क्योंकि ब्रह्मचित् तथा चिदा- भासका भेद सिद्ध होचुका, इसलिये घट में जो आभास उदित होता है, वह घट में ज्ञातता को उत्पन्न किया करता है । वह ज्ञातता, अज्ञातता की तरह, ब्रह्म से ही भास्य होती है, यह तो प्रसिद्ध ही है ।
३३६ पञ्चदशी धीवृत्त्याभासकुम्भानां समूहो भास्यते चिता । कुम्भमात्रफलत्वात् स एक आभासतः स्फुरेत् ॥१४॥ ब्रह्मचैतन्य से तो धीवृत्ति, चिदाभास तथा कुम्भ ये सब के सब ही प्रकाशित होते हैं। चिदाभास बिचारा तो केवल कुम्भ में ही रहने वाला एक फल है । इस कारण उस चिदा- भास से तो वह अकेला घट ही घट भास सकता है । यों ब्रह्मचैतन्य का तथा चिदाभास का विषयभेद भी है । चैतन्यं द्विगुणं कुम्भे ज्ञातत्वेन स्फुरत्यतः । अन्येऽनुव्यवसायाख्य माहुरेतद् यथोदितम् ॥१५॥ क्योंकि एक घट, चिदाभास और ब्रह्मचैतन्य दोनों से ही भास्य होता है, इस कारण घट में ज्ञातता उत्पन्न होजाने पर तो दुगना चैतन्य होजाता है । दूसरे तार्किक लोग तो ऊपर बताये हुए इसी को अनुव्यवसाय नाम का दूसरा ज्ञान कह देते हैं। घटोऽयमित्यसावुक्ति राभासस्य प्रसादतः । विज्ञातो घट इत्युक्ति र्ब्रह्मानुग्रहतो भवेत् ॥१६॥ जब हम कहते हैं कि 'यह घट है' तब यह कहना चिदा- भास की सहायता से होता है। जब हम कहते हैं कि 'घट को जान लिया' तब यह कथन ब्रह्म के अनुग्रह से हुआ करता है । [यों व्यवहार के भेद से भी चिदाभास और ब्रह्म का भेद जान लेना चाहिये] आभासब्रह्मणी देहाद् बहिर्यद्वद् विवेचिते । तद्वदाभासकूटस्थौ विविच्येतां वपुष्यपि ॥१७॥ देह से बाहर जैसे चिदाभास और ब्रह्मका विवेक यहां
कूटस्थदीपप्रकरणम् · ३३७
कूटस्थदीपप्रकरणम् · ३३७ तक किया है, ठीक इसी प्रकार देह के अन्दर भी चिदाभास का और कूटस्थ का विवेक [ ज्ञान की चलनी से ] कर लेना चाहिये । अहंवृत्तौ चिदाभासः कामक्रोधादिकासु च । संव्याप्य वर्तते, तप्ते लोहे वह्निर्यथा तथा ॥१८॥ तपे हुए लोहे में आग की तरह, अहंवृत्ति में और काम क्रोधादि वृत्तियों में चिदाभास व्याप्त हुआ रहता है । स्वमात्रं भासयेत् तप्तं लोहं नान्यत् कदाचन । एवमाभाससहिता वृत्तयः स्वस्वभासिकाः ॥१९॥ तपकर लाल हुआ लोहा केवल अपने आपको ही प्रका- शित किया करता है । अन्य किसी वस्तु को प्रकाशित करने का सामर्थ्य उसमें नहीं होता । ठीक इसी प्रकार, आभास से युक्त वृत्तियां भी केवल अपनी ही भासक होती हैं, दूसरे की नहीं । क्रमाद् विच्छिद्य विच्छिद्य जायन्ते वृत्तयोऽखिलाः । सर्वा अपि विलीयन्ते सुप्तिमुर्च्छासमाधिषु ॥२०॥ जितनी भी वृत्तियां हैं, वे सब क्रमसे रुक रुक कर पैदा हुआ करती है । जब एक वृत्ति नष्ट होजाती है तब दूसरी वृत्ति का उदय होता है । इसी प्रकार तीसरी और चौथी आदि वृत्तियों की उत्पत्ति को भी समझना चाहिये । सुप्ति मूर्छा और समाधि के समय तो वे सभी वृत्तियां विलीन हो जाती हैं फिर तो उनमें से एक भी नहीं रहजाती । सन्धयोऽखिलवृत्तीना मभावाश्चावभासिताः । निर्विकारेण येनासौ कूटस्थ इति चोच्यते ॥२१॥ २१
३३८ पञ्चदशी सब वृत्तियों की सन्धियां [जब कि एक वृत्ति नष्ट हो कर दूसरी उत्पन्न होने को होती है] तथा सब वृत्तियों के अभाव [जबकि कोई भी वृत्ति नहीं रहती] जिस निर्विकार चैतन्य से प्रकाशित [ज्ञात] होते हैं, उसीको कूटस्थ कहा जाता है । घटे द्विगुणचैतन्यं यथा बाह्ये तथान्तरे । वृत्तिष्वपि, ततस्तत्र वैशद्यं सन्धितोऽखिलम् ॥२२॥ जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य [एक तो घटमात्र का भासक चिदाभास तथा दूसरा घट की ज्ञातता का भासक ब्रह्मचैतन्य] होता है, इसी प्रकार अन्दर की अहंकारादि वृत्तियों में भी एक तो कूटस्थ चैतन्य रहता है, दूसरा केवल वृत्तियों का चिदाभास होता है । यों अन्दर भी दुगना चैतन्य होता है । दुगना चैतन्य होने के कारण ही, इन वृत्तियों में, संधियों से अधिक स्पष्टता आगयी है । [चैतन्य की इतनी विशदता सन्धियों में नहीं होती, जितनी कि इन वृत्तियों में होती है ।] ज्ञातताज्ञातते न स्तो घटवद् वृत्तिषु क्वचित् । स्वस्य स्वेनागृहीतत्वात् तामिस्राज्ञाननाशनात् ॥२३॥ घट में जैसे ज्ञातता और अज्ञातता होती है, वैसे वृत्तियों में कभी भी ज्ञातता और अज्ञातता नहीं होतीं । क्योंकि अपना आपा अपने आप से गृहीत नहीं हो सकता तथा उन वृत्तियों के उत्पन्न होते ही उनसे अज्ञान का नाश हो जाता है । [भाव यह है कि ज्ञान की व्याप्ति से ज्ञातता और अज्ञान की व्याप्ति से अज्ञातता होती है । वृत्तियां स्वयंप्रकाश होती हैं, इस कारण उनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती और 'ज्ञातता' नहीं आती । वे वृत्तियाँ जब उत्पन्न हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३९
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३९
स्वविषयक अज्ञान को हटा देती हैं। यों अज्ञान की व्याप्ति भी वृत्तियों में नहीं रहती और 'अज्ञातता' भी नहीं आती । ] द्विगुणीकृतचैतन्ये जन्मनाशानुभूतितः । अकूटस्थं तदन्यत्तु कूटस्थमविकारतः ॥२४॥ सार बात तो यह है कि उस दुगुने चैतन्य में [ उन दो प्रकार के चेतनों में]जिस चैतन्य के जन्म और नाश होते हुए प्रतीत होते हों, उसे तो 'अकूटस्थ' मानना चाहिए। अविकारी होने के कारण उससे भिन्न जो दूसरा चैतन्य है, उसे 'कूटस्थ' जान लेना चाहियें । अन्तःकरणतद्वृत्तिसाक्षीत्यादावनेकधा । कूटस्थ एव सर्वत्र पूर्वाचार्यैर्विनिश्चितः ॥२५॥ 'अन्तःकरण तद्वृत्तिसाक्षी चैतन्यविग्रहः। आनन्दरूपः सत्यः सन् किं नात्मानं प्रपद्यसे' इत्यादि श्लोकों में सब जगह पूर्वाचार्यों ने चिदाभास से भिन्न कूटस्थ का उपपादन किया है। [यह कूटस्थ हमारा कपोलकल्पित नहीं है ]। आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा । गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामित्याभासश्च वर्णितः ॥२६॥ जैसे (१) मुख (२) मुखाभास तथा (३) उसका आश्रय अर्थात् दर्पण होता है इसी प्रकार (१) कूटस्थ आत्मा (२) आभास तथा (३) अन्तःकरण आदि उसका आश्रय होता है। ये तीनों शास्त्र और युक्ति से जाने जाते हैं। यहाँ जो आभास का वर्णन है उसका अभिप्राय कूटस्थ से भिन्न चिदाभास से ही है ['मनसः साक्षी बुद्धेः साक्षी' यह शास्त्र तो बुद्धि के साक्षी कूटस्थ का प्रतिपादन करने वाला है। 'रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव' (कठ
५-९) यह शास्त्र चिदाभास का प्रतिपादन करता है इन में से
३४० पञ्चदशी ५-९) यह शास्त्र चिदाभास का प्रतिपादन करता है इन में से एक [चिदाभास] विकारी है दूसरा [कूटस्थ] अविकारी है। यह तो २४वें श्लोक में युक्ति देकर बता चुके हैं। बुद्धयवच्छिन्नकूटस्थो लोकान्तरगमागमौ । कर्तुं शक्तो घटाकाश इवाभासेन किं वद ॥२७॥ जैसे कि घट के द्वारा घटाकाश गमनागमन कर लेता है, इसी प्रकार बुद्धि से अवच्छिन्न जो कूटस्थ है वही बुद्धि के द्वारा लोकान्तर का गमनागमन कर लेगा। फिर यह बताओ कि तुम इस चिदाभास को क्यों मानते हो ? [ चिदाभास की कल्पना में तो गौरव होता है । ] शृण्वसङ्गः परिच्छेदमात्राज्जीवो भवेन्नहि । अन्यथा घटकुड्याद्यै रवच्छिन्नस्य जीवता ॥२८॥ इसका उत्तर भी सुनो, कि केवल परिच्छेद हो जाने से ही वह असङ्ग तत्व जीव नहीं हो जाता है। यों यदि केवल परिच्छेद होने से ही वह 'जीव' हो जाता होता तब तो घट और भित्ति आदि से परिच्छिन्न हो जाने पर भी वह जीव हो गया होता । [जो तुम्हें भी इष्ट नहीं है ।] न कुड्यसदृशी बुद्धिः स्वच्छत्वादिति चेत्तथा । अस्तु नाम परिच्छेदे किं स्वाच्छ्येन भवेत्तव ॥२९॥ यदि यह कहो कि स्वच्छ होने के कारण बुद्धि तो भित्ति के समान नहीं है, इस कारण बुद्धि परिच्छेद कर सकती है, भित्ति नहीं कर सकती। सो यह भी कथन निःसार ही है। क्योंकि बुद्धि स्वच्छ है तो हुआ करे। परिच्छेद में तो स्वच्छता का कुछ भी उपयोग नहीं है।
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४१
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४१ प्रस्थेन दारुजन्येन कांस्यजन्येन वा न हि । विक्रेतुस्तण्डुलादीनां परिमाणं विशिष्यते ॥३०॥ लोक में भी देख लो कि जो प्रस्थ नाम का तोलने का पैमाना लकड़ी का बना है या जो कांसे का बनाया गया है उन में से लकड़ी का पैमाना अस्वच्छ है कांसे का स्वच्छ है । इन दोनों की स्वच्छता और अस्वच्छता से बेचने वाले के चावलों के परिमाण में विशेषता या न्यूनाधिकभाव नहीं आ जाता है । परिमाणाविशेषेऽपि प्रतिबिम्बो विशिष्यते । कांस्ये यदि,तदा बुद्धावप्याभासो भवेद् बलात् ॥३१॥ कांसे के बने प्रस्थ से नापने पर यद्यपि चावलों के परि- माण में अधिकता नहीं आती, परन्तु उसमें चावलों का प्रति- बिम्ब तो पड़ता ही है। यही उस में लकड़ी के प्रस्थ से अधिकता है । ऐसा यदि कहा जायगा तो हम कहेंगे कि तब तो तुम्हें ज़बरदस्ती ही बुद्धि में भी आभास पड़ने की बात मान लेनी पड़ेगी । ईषद्भासनमाभासः प्रतिबिम्बस्तथाविधः । बिम्बलक्षणहीनः सन् बिम्बवद् भासते हि सः॥३२॥ थोड़े भास को 'आभास' कहते हैं, वैसा ही प्रतिबिम्ब भी होता है । उस प्रतिबिम्ब में बिम्ब का कोई भी लक्षण [निश्चय हीं] नहीं होता । तब भी वह बिम्ब की तरह भासा करता है । [यों 'आभास' और 'प्रतिबिम्ब' एक ही बात हो जाती है ।] ससङ्गत्वविकाराभ्यां बिम्बलक्षणहीनता । स्फूर्तिरूपत्वमेतस्य बिम्बवद् भासनं विदुः ॥३३॥
३४२ पञ्चदशी यह चिदाभास ससङ्ग भी है और विकार युक्त भी है, इस कारण इसमें बिम्ब के [असंगता और अविकारिता रूपी] लक्षण तो नहीं रहते, परन्तु तो भी वह चिदाभास स्फूर्तिरूप है, यही इसका बिम्ब की तरह भासना कहाता है । [हेतु के लक्षणों से रहित हो और हेतु की तरह भासता हो जैसे उसे हेत्वाभास कहते हैं, ऐसे ही बिम्ब के लक्षणों से रहित हो और बिम्ब की तरह भासता हो, उसे 'आभास' कहा जाता है।] नहि धीभावभावित्वादाभासोऽस्ति धियः पृथक् । इति चेदल्पमेवोक्तं धीरप्येवं स्वदेहतः ॥३४॥ जैसे मिट्टी के होने पर ही उत्पन्न होने वाला घट, मिट्टी से भिन्न नहीं होता, इसी प्रकार बुद्धि के होने पर ही होने वाला चिदाभास, बुद्धि से पृथक् नहीं होता, ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे कि यह तो तुमने बहुत ही थोड़ा कहा है इस तरह तो देह से भिन्न बुद्धि भी सिद्ध नहीं हो सकेगी [क्योंकि देह के होने पर ही बुद्धि रहती है देह के न रहने पर नहीं रहती] देहे मृतेऽपि बुद्धिश्चेच्छास्त्रादस्ति तथासति । बुद्धे रन्यश्चिदाभासः प्रवेशश्रुतिषु श्रुतः ॥३५॥ यदि कहो कि—देह के मर जाने पर भी 'सविज्ञानो भवति' इस शास्त्र के प्रमाण से बुद्धि तो रहती ही है। तो हम कहेंगे कि जो तुम श्रुति के बल से देह से भिन्न बुद्धि को मानते हो, वह तुम प्रवेश श्रुतियों के बल से बुद्धि से भिन्न चिदाभास को क्यों नहीं मान लेते हो। धीयुक्तस्य प्रवेशश्चैन्नैतरेये धियः पृथक् । आत्मा प्रवेशं संकल्प्य प्रविष्ट इति गीयते ॥३६॥
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४३
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४३ यदि यह कहा जाय कि—बुद्धि से युक्त ही वह प्रवेश करता है, सो यह ठीक नहीं। क्योंकि ऐतरेय में तो कहा गया है कि— बुद्धि से पृथक् आत्मा ने पहले तो बुद्धि में प्रवेश का संकल्प किया और फिर उसमें प्रविष्ट हो गया । ऐसी अवस्था में बुद्धि रूपी उपाधि वाले आत्मा का प्रवेश मानना ठीक नहीं है। कथंन्विदं साक्षदेहं मदृते स्यादितीरणात् । विदार्य मूर्धसीमानं प्रविष्टः संसरत्ययम् ॥३७॥ उस श्रुति में कहा गया है कि—इन्द्रियों और देह सहित यह जड संसार मुझ चेतन को छोड़ कर कैसे रहेगा ? इसका निर्वाह मुझ चेतन के बिना कैसे होगा ? यह विचार कर मूर्ध सीमा को विदीर्ण करके [तीनों कपालों के मध्यदेश को भेद कर] प्रविष्ट हो गया है और संसार में फंसा फिरता है। अर्थात् जाग्रत् आदि अवस्थाओं का अनुभव कर रहा है । कथं प्रविष्टोऽसङ्गश्चेत् सृष्टिर्वास्य कथं वद । मायिकत्वं तयोस्तुल्यं विनाशश्च समस्तयोः ॥३८॥ यदि पूछो कि—जब वह असंग है तब वह प्रविष्ट ही कैसे हो गया ? तो हम पूछेंगे कि फिर उस असंग ने सृष्टि रचना ही कैसे कर दी ? यदि कहो कि मायिक होने से सृष्टि कर दी तो हम कहेंगे कि मायिक होने से ही वह प्रवेश भी कर गया है। मायिक होना तो दोनों बातों में समान ही है [कहो सृष्टि मायिक है तो कहेंगे प्रवेश भी मायिक है]। क्योंकि उन दोनों [सृष्टि और जीव] का विनाश भी सम ही है। समुत्थायैष भूतेभ्यस्तान्येवानुविनश्यति । विस्पष्टमिति मैत्रेय्यै याज्ञवल्क्य उवाच हि ॥३९॥
३४४ पञ्चदशी यह प्रज्ञानघन आत्मा पांच भूतों [से बने हुए इन देह इन्द्रिय आदि उपाधियों] के सहारे से उठ खड़ा होता है [अर्थात् जीवत्व का अभिमान करने लगता है] जब वे देहादि नष्ट होने लगते हैं तब वह भी उनके पीछे पीछे—उन्हीं के साथ हो जाता है [अथवा यों समझो कि उनके नष्ट हो जाने पर, उनके कारण किये हुए,जीवत्व के अभिमान को छोड़ देता है। अर्थात् जब ये देहादि नष्ट हो जाते हैं तब फिर उसका जीवत्व का अभिमान भी नहीं रहता] इस रीति से याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी स सोपाधिकरूप को— जिसको कि हम चिदाभास कहते हैं—स्पष्ट ही विनाशी बताया है। अविनाश्ययमात्मेति कूटस्थः प्रविवेचितः । मात्राऽसंसर्ग इत्येवमसङ्गत्वस्य कीर्तनात् ॥४०॥ 'अविनाशी वारेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा' (बृ० ४-५-१४) इस श्रुति में कूटस्थ को उस [चिदाभास] से भिन्न बताया है। 'मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति' (बृ० ४-५-१४) इस श्रुति में आत्मा की असंगता का कीर्तन किया गया है कि—मात्रा अर्थात् देहादि से इस आत्मा का संसर्ग कभी भी—देह धारण करने पर भी नहीं हो पाता [आत्मा की यह असंगता ही आत्मा के अविनाशी होने का कारण है।] जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न सः । इत्यत्र न विमोक्षोऽर्थः किन्तु लोकान्तरे गतिः ॥४१॥ 'जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न जीवो म्रियते' (छा० ६-११-३) जीव से छोड़ा हुआ यह शरीर ही मरा करता है जीव नहीं मरता। इस श्रुति में मोक्ष का वर्णन नहीं है किन्तु इसमें तो लोकान्तर की गति का वर्णन किया गया है।
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४५
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४५ नाहं ब्रह्मेति बुध्येत स विनाशीति चेन्न तत् । सामानाधिकरण्यस्य बाधायामपि संभवात् ॥४२॥ प्रश्न यह है कि—वह चिदाभास यदि विनाशी है तो फिर वह अपने को यह कैसे जानेगा कि मैं ब्रह्म हूँ ? क्योंकि विनाशी और अविनाशी दो पदार्थ एक कैसे हो सकेंगे ? इसका उत्तर यह है कि सामानाधिकरण्य तो बाधा में भी हो जाता है । सामानाधिकरण्य दो प्रकार होता है—एक मुख्य सामा- नाधिकरण्य, दूसरा बाधसामानाधिकरण्य । सो यहां मुख्य सामानाधिकरण्य न सही, बाधा में सामानाधिकरण्य तो हो ही सकता है । अपने जीवभाव की बाधा करके ब्रह्मभाव का ज्ञान उसे हो ही सकता है । योऽयं स्थाणुः पुमानेष पुंधिया स्थाणुधीरिव । ब्रह्मास्मीति धिया शेषाप्यहंबुद्धि र्निवर्त्यते ॥४३॥ 'यह जो स्थाणु है यह तो पुरुष है' इस वाक्य में जैसे पुरुषज्ञान से स्थाणुज्ञान निवृत्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं ब्रह्म हूं' इस बुद्धि से 'मैं कर्ता हूं मैं भोक्ता हूं' इत्यादि सभी क्षुद्र बुद्धियां निवृत्त हो जाती हैं। ['पूर्ण अहं' से 'क्षुद्र अहं' मार डाला जाता है] नैष्कर्म्यसिद्धावप्येवमाचार्यैः स्पष्टमीरितम् । सामानाधिकरण्यस्य बाधार्थत्वमतोऽस्तु तत् ॥४४॥ वार्तिककार ने नैष्कर्म्य सिद्धि में यह बात स्पष्ट कही है कि—सामानाधिकरण्य बाध के लिये भी होता है । इस कारण 'मैं ब्रह्म हूँ'—इस वाक्य में जो सामानाधिकरण्य है वह बाधा- र्थक होही सकता है