पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
कूटस्थदीप का संक्षेप ६३
करता है। वह साक्षी कूटस्थ तत्व इस असत्य जगत् का आलम्बन है, इससे इसे 'सत्य' कहते हैं। सम्पूर्ण जड पदार्थों का प्रका- शक होने से इस तत्व को 'चिद्रूप' मानते हैं। सदा ही प्रेम का स्थान होने से इस साक्षीतत्व को 'आनन्दरूप' समझते हैं। यह कूटस्थ तत्व सभी अर्थों का साधक है, और सभी से सम्बद्ध है, इससे उसे 'सम्पूर्ण' भी कह देते हैं। यह कूटस्थ तत्व 'जीव' और 'ईश्वर' आदि की कल्पना से बहुत ऊपर रहता है। यह तो एक स्वयंप्रकाश केवल तथा कल्याणस्वरूप तत्व है। यद्यपि माया ने आभास के द्वारा 'जीव' और 'ईश्वर' की रचना कर डाली है, फिर भी ये दोनों काच के घड़े के समान स्वच्छ ही हैं। काच का घड़ा जैसे मिट्टी के घड़ों से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार ये जीवेश्वर भी देहादि की अपेक्षा स्वच्छ होते हैं। देह और मन दोनों ही अन्न से बनते हैं, फिर भी मन, देह से स्वच्छ होता है। इसी प्रकार मायिक होने पर भी अन्य मायिक पदार्थों से ये दोनों स्वच्छ होते हैं। ये दोनों ही चिद्रूप हैं, यह तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि—वे सब के अनुभव में चिद्रूप में ही आते हैं। उस माया शक्ति ने ही उन दोनों को चिद्रूप से प्रकाशित कर डाला है। हम तो देखते हैं कि—हमारी नींद भी—जिसे 'हमारी माया' कह सकते हैं—सुपने के चेतन जीव और सुपने के ईश्वर आदि को उत्पन्न कर ही डालती है। फिर महामाया चेतन जीवेश्वरों को उत्पन्न कर डाले इसमें आश्चर्यचकित क्यों होते हो ? परन्तु मायिकपने के वहम में इतने अधिक भी न फँस जाओ कि कहीं कूटस्थ को भी मायिक ही कह बैठो। क्योंकि कूटस्थ के मायिक होने का तो कोई भी प्रमाण नहीं मिलता। सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर 'होकर इसी कूटस्थ के वस्तुत्व का डंका
६४ पंचदशी बजा रहे हैं। वे इस कूटस्थ के विरोधी किसी भी वस्तु को सहन नहीं करते हैं। हम औपनिषद लोग तो वेदान्तों के रहस्य को खोलने का उद्योग भर करते हैं। तर्क के आधार से कुछ कहने का तो हमारा संकल्प ही नहीं है। यदि हम तर्क के सहारे से कुछ कहते तो तार्किक लोगों को हम पर आक्षेप करने का अव- काश भी मिल जाता। मुमुक्षु को चाहिए कि इस दुरवगाह आत्म- तत्व को जानने के लिए केवल श्रुति का ही सहारा पकड़ लें। श्रुति का अभिप्राय तो स्पष्ट ही यह है कि—इन जीव और ईश्वर को माया ही उत्पन्न कर देती है। ईक्षण से लेकर प्रवेश पर्यन्त जितनी भी सृष्टि है, सो सभी ईश्वर की बनाई हुई है तथा जाग्रत् से लेकर मोक्ष पर्यन्त का सभी जगत्, जीव का बनाया हुआ है। अब कूटस्थ के विषय में भी सुन लीजिये—वह तो सदा ही कूटस्थ रहता है। जन्म, जरा, रोग, अनेक प्रकार की मानसी व्यथायें और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे हैं। इन सब के होने पर भी इस तत्व में आज तक कुछ भी अतिशय नहीं हो पाया है। इसीलिए मन में यह निश्चय कर लीजिए कि—मरण और जन्म कुछ भी नहीं है। बद्ध और साधक कोई भी नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को भी नहीं कहना चाहिए। वह कूटस्थ तत्त्व मट्टी के पुतलों में वृथा ही लुक छिप कर जन्म-मरण का भ्रमपूर्ण अभिनय कर रहा है। मन और वाणी के अगम्य इस तत्व को, जब वह श्रुति किसी साधक को बता देना चाहती है, तब साधक की योग्यता के अनुसार या तो 'जीव' या 'ईश्वर' या फिर 'जगत्' का सहारा लेकर इस अवाङ्मनोगोचर तत्व का बोध ज्यों त्यों करके उसे करा देती है। इसी उद्देश्य को लेकर 'जीव' 'ईश्वर' और 'जगत्' के स्वरूप
का प्रतिपादन जहाँ तहाँ किया गया है। उसका परम तात्पर्य
कूटस्थदीप का संक्षेप ६५ का प्रतिपादन जहाँ तहाँ किया गया है। उसका परम तात्पर्य तो जिस किसी भी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध करा देना ही है। बोध कराने की प्रक्रियायें भले ही अलग अलग हों परन्तु तत्व तो एक ही होता है। क्योंकि जिन पुरुषों को बोध कराना है उन सब के चित्त एक समान नहीं होते—उनके चित्तों में बड़ी विषमतायें पायी जाती हैं। उनके चित्तों की विषमता के कारण बोध कराने की रीति भी भिन्न भिन्न हो जाती है। यह तो मानी हुई बात है कि—श्रुति का तात्पर्य तो एक ही हो सकता है। फिर भी जो लोग उनका विरुद्ध अर्थ करके आपस में झगड़ते हैं, उसका कारण यह है कि ये लोग श्रुति के पूर्वापर का विचार न करके, उसके तात्पर्य को न समझ कर, भ्रम में पड़ जाते हैं। विवेकी लोग तो श्रुति के सम्पूर्ण तात्पर्य को समझ कर आनन्दसमुद्र में विहार करने लगते हैं। विवेकी लोगों का तो यह निश्चय होता है कि—यह मायारूपी मेघ जगत् रूपी जल को जब कभी इसके जी में आये, बरसाता फिरो। इसके बरसाने और उसके बरसने से, चिदाकाश की कुछ भी हानि या लाभ नहीं होता। यदि कोई इस प्रकरण में कही हुई प्रक्रिया का सदा ही विचार रक्खे तो वह अवश्य ही कूटस्थता का महालाभ करके छोड़े।
9. Dhyanadipa
[ ६ ] ध्यानदीप का संक्षेप यदि किसी प्रतिबन्ध के कारण किसी को ब्रह्मज्ञान न हों सकता हो और वह इस मार्ग पर श्रद्धा रखता हो तो वह ब्रह्म- तत्व की उपासना ही किया करे । उससे भी उसे मुक्ति मिल ही जायगी । एक पुरुष मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने दौड़ता है, दूसरा पुरुष दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने चलता है, इन दोनों को ही यद्यपि मिथ्या ज्ञान तो समान ही हो रहा है, तौ भी प्रयोजनसिद्धि में विशेषता पायी ही जाती है—पहले को तो मणि मिल जाती है, दूसरा उससे वंचित ही रह जाता है। दीपक की प्रभा को मणि समझना 'विसंवादि भ्रम' (विफलभ्रम) कहाता है, मणि की प्रभा को मणि समझना 'संवादि भ्रम' (सफलभ्रम) माना जाता है। भाप को धुँआ समझा और उससे अग्नि का अनुमान किया और वहाँ जाकर अग्नि को पा भी लिया, यह भी संवादिभ्रम ही है। प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्र में ऐसे अनन्त संवादिभ्रम पाये जा सकते हैं। इसी भ्रम के कारण से मिट्टी लकड़ी और पत्थर तक देवता हो जाते हैं। किसी वस्तु को उलटा समझ कर भी जब अभिलषित फल अचानक मिल जाय तभी वह 'संवादिभ्रम' कहा जाता है। जैसे संवादिभ्रम भ्रम होने पर भी ठीक फल दे देता है इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपा- सना भ्रम होने पर भी मुक्ति रूपी फल को दे ही देती है।
ध्यानदीप का संक्षेप ६७ वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एक रसात्मक तत्व को परोक्ष रूप से जान कर उपासक लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' 'मैं ब्रह्मतत्व ही हूँ' इस प्रकार उपासना करने लगते हैं। यहाँ पर परोक्ष ज्ञान का अभि- प्राय यही है कि—अभी उसे प्रत्यग्व्यक्ति दीखने नहीं लगी है, केवल शास्त्र के कहने से 'ब्रह्म है' ऐसा एक सामान्य ज्ञान उसे हो गया है। केवल परोक्षता रूपी इस कमी से ही उसे 'अतत्व- ज्ञान' कह देना ठीक नहीं है। क्योंकि उसका ऐसा स्वरूप भी तो अध्यात्मशास्त्र ने ही बताया है। इस कारण जब शास्त्रीय रीति से उस सच्चिदानन्द तत्व का निश्चय होता है तब परोक्ष होने पर भी वह ज्ञान तत्वज्ञान ही रहता है, भ्रम नहीं हो जाता। शास्त्रों ने तो यद्यपि महावाक्यों के द्वारा ब्रह्म को प्रत्यक् ही बताया है और वह है भी ऐसा ही, परन्तु जो लोग विचार नहीं करते, उनकी समझ में यह बात आनी बड़ी ही कठिन है कि वह ब्रह्म- तत्व हमारा आपा ही है। देहादि को आत्मा मानने का भ्रम जब तक जाग रहा है, तब तक कोई भी पुरुष, मन्दबुद्धि होने के कारण, ब्रह्मतत्व को आत्मा जान ही नहीं सकता। जो श्रद्धालु है, जो शास्त्रदर्शी है, उसको ब्रह्म का 'परोक्ष ज्ञान' हो जाना तो बहुत ही सुकर है। अद्वैत के इस ऐसे परोक्ष ज्ञान को द्वैत का प्रत्यक्ष ज्ञान नष्ट नहीं कर सकता है। लोक में देखा जाता है कि—प्रत्यक्ष शिलाबुद्धि परोक्ष ईश्वरभाव को हटाती ही नहीं है। बताओ ? कि—प्रतिमा आदि के विष्णु होने में किस श्रद्धालु को संदेह होता है। अश्रद्धालु लोग इस बात पर भले ही विश्वास न करें, उनका उदाहरण देना यहाँ ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक बातों में केवल श्रद्धालु लोगों को ही अधिकार है। परोक्ष ज्ञान तो एक बार के आप्तोपदेश से ही उत्पन्न हो जाता है। आप्त
६८ पंचदशी के मुख से सुन कर जैसे कर्मानुष्ठान किया जा सकता है उस तरह आप्त की बात सुनते ही किसी को ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो जाता है उसके लिए तो उसे फिर फिर विचार करना पड़ता है। परोक्ष ज्ञान को रोकने वाली तो अश्रद्धा है, और कुछ नहीं। तथा अपरोक्ष ज्ञान का प्रतिबन्ध केवल अविचार ही किया करता है। विचार करने पर भी यदि किसी को ब्रह्मात्मता का परिज्ञान न हो सके, तो उसे बार बार विचार करते ही जाना चाहिये। उसे समझ लेना चाहिये कि अभी विचार में कोई कमी रह गयी होगी। क्योंकि अपरोक्षज्ञान के होते ही विचार अपने आप रुक जायगा। विचार की समाप्ति ही अपरोक्षज्ञान का अचूक चिह्न माना गया है। यदि मरण पर्यन्त विचार कर डालने पर भी किसी को आत्म- लाभ न हो तो उसे उसके प्रतिबन्धों का क्षय हो जाने पर जन्मान्तर में आत्मलाभ हो ही जायगा। व्यासमुनि ने भी कहा है कि— इस जन्म या परजन्म में भी विद्या हो जाती है। कठ श्रुति में भी कहा है कि बहुत से लोगों को तो सुनकर भी इस आत्म तत्व का ज्ञान (इस जन्म में) नहीं हो पाता। वामदेव को तो गर्भ में आत्मतत्व का ज्ञान हुआ था। लोक में भी देखते हैं कि—बहुत बार याद करने पर भी जो बात याद नहीं होती वही बात अगले दिन बिना याद किये याद आ जाती है। खेती और गर्भ जैसे उसी दिन तैयार नहीं हो जाते इसी प्रकार आत्मविचार उसी दिन अन्तिम श्रेणी पर नहीं पहुँच जाता। किन्तु धीरे धीरे पका करता है। बार बार विचार करने पर भी जब तत्व ज्ञान न हो तो समझ लेना चाहिये कि भूत, भावी या वर्तमान कोई सा प्रतिबन्ध होगा, जो कि ज्ञान को होने नहीं देता। इन तीनों में से कोई सा प्रति- बन्ध हो तो वेदपारंगत लोग भी मुक्त नहीं होते हैं। इसी अभि-
ध्यानदीप का संक्षेप ६९ प्राय से श्रुति ने हिरण्यनिधि का दृष्टान्त दिया है। भूगर्भ विद्या को न जानने वाले लोग हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते रहने पर भी उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रतिदिन ब्रह्म के पास जाती हैं, परन्तु [ विषयवासना रूपी ] अनृत से ढकी रहने के कारण, उसको पहचान नहीं सकतीं। किसी यति के लिये तो बीता हुआ महिषी का स्नेह ही ज्ञान में प्रतिबन्ध हो रहा था और उसे तत्वज्ञान नहीं हो पाया था। उसके महिषी के स्नेह का अनु- सरण करके ही जब उसे तत्व का उपदेश किया गया तब प्रति- बन्ध का क्षय हो जाने पर उसे यथार्थ ज्ञान हुआ। वर्तमान प्रतिबन्ध चार प्रकार का होता है एक विषयासक्ति दूसरा बुद्धि की मन्दता तीसरा कुतर्क चौथा अपने विपरीत- ज्ञान पर अड़ कर बैठ जाना कि 'यही ठीक है।' शमदमादि श्रवणमननादि उपायों से [ जो भी जिस जिस प्रतिबन्ध को हटाने में उपयुक्त है ] उस उस प्रतिबन्ध के हट जाने पर अपना ब्रह्म- भाव हाथ आ जाता है। जन्मान्तर दिलाने वाला जो आगामी प्रतिबन्ध होता है, जिसको प्रारब्धशेष भी कहते हैं, यह तो भोग के बिना क्षीण नहीं हो पाता। यही कारण है कि उस आगामी प्रतिबन्ध की निवृत्ति का समय नियत नहीं किया जा सकता कि—इतने दिनों में आगामिप्रतिबन्ध नष्ट हो जायगा। वह प्रतिबन्ध वामदेव का तो एक जन्म में ही क्षीण हो गया था। भरत को तो इसमें तीन जन्म धारण करने पड़े थे। गीता में तो यहां तक कहा है कि जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं—[ जो तत्व साक्षात्कार पर्यन्त विचार नहीं कर पाते। जिन का विचार बीच में ही छूट जाता है ] उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में कभी कभी बहुत जन्म लग जाते हैं। परन्तु ध्यान रहे कि इस रुकावट के
कारण उनका विचार निरर्थक नहीं हो जाता है । ज्यों ही उनका प्रतिबन्ध हटता है त्यों ही उन्हें आत्मज्ञान हो जाता है । गीता में यह भी कहा है कि—योगभ्रष्ट लोगों को आत्मविचार के प्रभाव से पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोक मिलते हैं । फिर भी यदि कोई अभिलाषा रह गयी हो तो वे पवित्र श्रीमानों के कुल में जन्म लेते हैं [ और वहां अपनी अभिलाषा को पूरा कर लेते हैं । ] यदि वे आत्म तत्व के विचार के प्रभाव से निःस्पृह हो गये हों तो लौटकर योगियों के कुल में ही जन्म लेते हैं । किन्तु ऐसा जन्म बड़ा ही दुर्लभ होता है। यह थोड़े पुण्यों से किसी को नहीं मिलता । क्योंकि ऐसा योगभ्रष्ट इस कुल में आते ही उसी पहले वाले बुद्धिसंयोग को पा जाता है । वैसा 'बुद्धियोग' उसे योगी मां- बापों से दायभाग के रूप में मिल जाता है । फिर तो वह पहले से भी दूने उत्साह से प्रयत्न करने लग पड़ता है । उसका पूर्वा- भ्यास उसे बलात् अपनी ओर खेंच ले जाता है । यों सिद्ध होने में अनेक जन्म लग जाते हैं । यदि तो किसी को ब्रह्मलोक को पाने की इच्छा हो और वह उसे वहीं दाबकर—तत्त्वज्ञान से उसको न उखाड़ कर—आत्मविचार करने लगे तो वह भी साक्षा- त्कार नहीं कर पाता । वह फिर कल्पान्त के समय इस जगत् के समष्टि अभिमानी के साथ मुक्त होता है,ऐसा शास्त्र का अभिप्राय है। कई तो ऐसे होते हैं कि उनके सांसारिक धन्धे उन्हें अपने आपे के विचार का अवसर ही नहीं आने देते। इस शरीर की दासता और मन की चाकरी में यदि उनके आठों पहर बीत जायँ तो वे घब- राते नहीं। परन्तु जिसकी कृपा से यह मट्टी का पुतला चलता फिरता है, उस अन्दर छिपे हुए प्राणाधीश की मीमांसा के लिये उन्हें एक क्षण का भी अवकाश नहीं मिलता । इतनी ही क्यों !
ध्यानदीप का संक्षेप ७१ जो लोग इस आत्मतत्व का विचार करते हैं उन्हें वे निकम्मा और मूढ़ समझते हैं। वे उनके सहवास को भी यथाशक्ति टाला करते हैं। ऐसे लोगों को ध्यान में रखकर ही तो कठ में कहा है कि बहुत से पापियों को तो वह परात्मतत्व सुनने को भी नसीब नहीं होता। जिस श्रद्धालु की बुद्धि अतिमन्द हो, जिसे अध्यात्मदर्शी गुरु हाथ न लगे, या अनुकूल देश कालादि न मिल सके, वह इतना ही करे कि दिन रात ब्रह्मोपासना (प्रणवाभ्यास) ही करता रहे। निर्गुण ब्रह्म की उपासना की रीति यह है कि उसके ज्ञान को बार बार दोहराता रहे। शैव्य प्रश्न के उत्तर में तापनीय उपनिषत् में निर्गुणोपासना का कथन किया है। प्रश्न उपनिषत् में त्रिमात्र ओंकार की उपासना का वर्णन आया है। कठ और माण्डूक्य में भी इसी निर्गुणोपासना का समुल्लेख पाया जाता है। निर्गुण उपा- सना को कैसे करें ? यह यदि जानना हो तो आद्य शंकराचार्यजी के पंचीकरण नाम के पुस्तक को देखना चाहिये। एक बात इसमें ध्यान रखने योग्य है कि सारी शाखाओं में निर्गुण ब्रह्म के जितने गुण आये हैं, उन सब का उपसंहार इस उपासना में कर लेना चाहिये। उसमें 'आनन्द' 'सत्' 'चित्' 'पूर्ण' आदि जितने विधेय गुण हैं या अस्थूल अनणु, अह्रस्व, अदीर्घ आदि जितने भी निषेध्य गुण हैं उन सभी का उपसंहार इसमें साधक को कर लेना चाहिये। ऐसा न हो कि किसी एक प्रकरण में जिन गुणों का वर्णन आया है केवल उन्हीं गुणों के आधार पर इस उपासना को करने लगें। उपासना करते हुए यह कभी न भूलें कि आनन्द आदि विधेय और अस्थूलादि निषेध्य गुणों से एकमात्र अखण्ड आत्मतत्व ही लक्षित होता है। इन सबसे जो तत्व लक्षित होता है 'वही तत्व
७२ पञ्चदशी मैं हूँ' ऐसा ध्यान साधक को यथाशक्ति आठों पहर रहना चाहिये । अब बोध और उपासना का भेद भी सुन लीजिये—बोध तो वस्तु के अधीन होता है। इसके विपरीत उपासना उपासक के हाथ की बात होती है। बोध की उत्पत्ति विचार से होती है— साधक न भी चाहे तो भी वस्तु के सामने आने पर बोध होता ही है। उसे वह रोक नहीं सकता। वह बोध रूपी दिवाकर जब उदय होता है तब इस सब संसार की सत्यता को भस्मसात् करके छोड़ता है। जब इतना हो चुकता है तब साधक कृतकृत्य हो जाता है। उसके बाद उसे नित्य तृप्ति रहने लगती है। अब वह जीवन्मुक्त हो जाता है। अब तो वह प्रारब्धक्षय की बाट जोहने लगता है कि 'यह कब समाप्त होगा' । ऐसा परमपद यदि किसी को पाना हो तो वह गुरु के उप- देश पर विश्वास करे। उस पर किसी प्रकार का भी संशय न करे और अपने उपास्य का निरन्तर ऐसा विचार करे कि—इस चिन्तन के बीच में, अन्य किसी भी विषय का विचार तक न आने दे। चिन्ता करते करते अन्त में ऐसी अवस्था आ जायगी कि साधक को स्वयं ही यह भान होने लगेगा कि ओहो ! यह चिन्त्यस्वरूप तो मैं ही हूँ। यहां पहुंचते ही साधक का चिन्तन भी छूट जायगा। फिर यह प्रयत्न करना चाहिये कि किसी तरह मरणपर्यन्त यही धारणा बराबर बनी रहे। क्योंकि उपासना पुरुष के अधीन होती है। कोई चाहे उसे करे, चाहे न करे, या जैसे जी में आये कुछ का कुछ किया करे। इस कारण उपासकों से यह बात विशेषरूप से कह देना चाहते हैं कि वे इस उपासना को सदा ही किया करें। सुपने में भी वेदपाठ करने वाले वेदपाठी का या सुपने में जप करने वाले जपिता, का जो हाल हो जाता
ध्यानदीप का संक्षेप ७३ है वही हाल उपासक का हो जाना चाहिये । उपासना की ऐसी प्रगाढता तो तभी होगी जब कि विरोधी विचारों को छोड़ कर निरन्तर भावना की जायगी और वासना का आवेश बढ़ने लगेगा । ऐसी उपासना सर्वपरित्यागी संन्यासमार्गी लोग ही कर सकते हों, यह धारणा ठीक नहीं है । क्योंकि इस उपासना में आस्था की अधिकता जब हो जायगी तब विषयव्यसनी की तरह, अपने प्रारब्ध भोगों को भोगते हुए भी, अपना लोकव्यवहार करते हुए भी, यह उपासना बराबर चल ही सकेगी । देखते हैं कि जिस नारी को परपुरुषसंग का व्यसन पड़ जाता है, वह घर के कामों में उलझी रहने पर भी, अन्दर मन में तो उसी परसंग रसायन को चखती रहती है । ऐसा करते हुए भी उसके घर के काम काज बराबर चलते ही हैं । हां, इतना तो अवश्य हो जाता है कि उसके घर के काम ऊपर के मन से होने लगते हैं । इसी प्रकार उपासना में निष्ठावाले पुरुष, ऊपर के मन से तो संसार के काम काज निभाते रहें । हम उनके ऊपर के मन को छीनना नहीं चाहते । हमें तो वे अन्दर का मन ही दे दें । अन्दर के मन से तो वे आठों पहर अखण्डोपासना-रूपी दीपक को जगाते रहें । जिस तत्वज्ञानी ने यह समझ लिया है कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मा तो केवल चैतन्य रूप है, फिर बताओ, उसे व्यवहार में क्या उलझन होगी ? व्यवहार को यह ज़रूरत तो है ही नहीं कि—यह प्रपंच सच्चा ही हो और न व्यवहार को यही दरकार है कि आत्मा जड ही हो,तब ही उसका काम चले, किन्तु इस विचारे [व्यवहार] को तो केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है। देखो व्यवहार के साधन जो मन, वाणी, शरीर अथवा ये बाह्य पदार्थ हैं, इनको तत्वज्ञानी तोड़ फोड़ कर तो फेंक ही नहीं
७४ पंचदशी देता है। फिर बताओ कि इसका व्यवहार कैसे रुकेगा ? यह मत कह बैठना कि तत्वज्ञानी भी चित्त का उपमर्दन तो करता ही है। अरे भाई ! यह बात तो तुम 'ध्याता' की कह रहे हो। तत्वज्ञानी पुरुष कभी भी चित्त का उपमर्दन नहीं कर सकता। भला क्या कहीं घटतत्व को जानने वाला पुरुष भी बुद्धि का मर्दन किया उसे एकाग्र करता देखा जाता है ? यदि केवल एकवार ज्ञान हो जाने पर फिर घट जैसा जड़ पदार्थ भी सदा ही भासने लगता है तो फिर स्वयं प्रकाश यह आत्मा एक वार ज्ञान हो जाने पर सदा ही क्यों न भासने लगेगा ? घटादि का निश्चय जब एक बार हो जाता है तब उसके बाद घटज्ञान नष्ट तो हो जाता है परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत होती है, तभी उस घट को ले जा सकते हैं। उस घट में चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत ही नहीं होती। ठीक यही बात आत्मा के विषय में भी समझ रखनी चाहिये—उसमें भी चित्त को स्थिर किये रखना आवश्यक नहीं है। जब किसी को एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय हो जाता है तब फिर जब कभी उसे अपेक्षा होती है, तभी वह ज्ञानी उसके विषय में कथन, मनन या ध्यान आदि कर ही सकता है। यदि कोई ज्ञानी भी उपासक की तरह लौकिक व्यवहार को भूल जाता है तो इस भूल को ज्ञान से हुआ मत समझो। यह विस्मरण तो उसे ध्यान से हुआ है। परन्तु यह ध्यान तो उस ज्ञानी ने अपनी इच्छा से ही पसन्द कर लिया है। शास्त्र उससे ध्यान करने को नहीं कहता। मुक्ति तो उसे केवल ज्ञान से ही मिल चुकी है। यह बात वेदान्तों में अनेक जगह कही गयी है। यदि तत्वज्ञानी लोग ध्यान न करें तो वे भले ही बाह्य व्यापारों में लगे रहें। उनकी प्रवृत्ति में किसी तरह की कोई भी रुकावट नहीं
ध्यानदीप का संक्षेप ७५
है । तत्त्वज्ञानी की बाह्य प्रवृत्ति मान कर अतिप्रसक्ति से डरना ठीक नहीं है। क्योंकि तत्त्वज्ञानी के प्रति तो 'प्रसंग' किंवा 'विधि शास्त्र' ही नहीं होता । जिस अविचारी को देह के वर्ण, आश्रम, आयु और अवस्थाओं में अभिमान बना हुआ है, ये सब विधि और निषेध शास्त्र केवल उसी के लिये बने हैं । ज्ञानी का निश्चय तो इसके विपरीत होता है । उसे तो यह मालूम हो जाता है कि— जैसे माया ने देह बनाया है, इसी तरह वर्णाश्रमादि भी उसी ने घड़ दिये हैं । बोधरूप आत्मा के तो कोई वर्ण या आश्रम आदि नहीं होते । जिसने अपने जी में से सम्पूर्ण आसक्तियों को निकाल कर फेंक दिया हो, जिसका आशय निर्मल हो चुका हो, वह तो मुक्त ही है । ऐसा महापुरुष समाधि करे या न करे, काम करे या बैठा रहे, यह सब उसकी ( प्रारब्धानुकूल ) इच्छा पर ही निर्भर होता है । इस बारे में शास्त्र की यह हिम्मत नहीं है कि उससे कुछ करने को कह सके । जो पुरुष कामवासनाओं के बन्धन से छूट चुका हो, कर्म को छोड़ बैठने या करते जाने से, फिर उसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता । समाधि और जप से भी उसका कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । "आत्मा असंग है उससे भिन्न सभी कुछ इन्द्रजाल के समान मायिक है" ऐसा स्थिरनिर्णय जिन्होंने कर लिया हो, उनके मन में वासना कैसे ठहरेगी ? जब कि तत्वज्ञानी में वासना ही नहीं रहती तब वह उसे हटाने के लिए ध्यान भी क्यों करेगा ? या जब ज्ञानी को प्रसंग ही नहीं रह गया है तो अतिप्रसंग कहां से आयेगा ? जिस बालक के लिये विधि नहीं होती, उसको अति प्रसंग भी नहीं देखते हैं । जैसा विधि का अभाव बालक को है वैसा ही तत्वज्ञानी को भी है । कुछ न जानने के कारण बालक के लिये विधि नहीं
७६ पंचदशी
होती, सब कुछ जानने के कारण ज्ञानी के लिये भी विधि नहीं रहती। सम्पूर्ण विधियों का बोझ तो अल्पज्ञ के कन्धों पर ही लदा रहता है। एक प्रासंगिक बात यह भी जानने योग्य है कि किसी किसी ज्ञानी में शाप और वरदान का सामर्थ्य भी पाया जाता है। सो यह सामर्थ्य किसी दूसरे तप से उनमें आता है। ज्ञान को उत्पन्न करने वाले तप से यह सामर्थ्य उत्पन्न होता ही नहीं। ऐसी अवस्था में जिन ज्ञानियों में शाप या वरदान का सामर्थ्य नहीं है, उनके ज्ञानी होने की शंका नहीं करनी चाहिये। प्रकृत बात तो यही कह रहे थे कि लौकिक व्यवहार जिन साधनों से चला करता है, तत्वज्ञान के हो जाने पर उन साधनों का उपमर्द ( नाश ) नहीं हो जाता, इस कारण ज्ञानी लोग राज्यादि जैसे बड़े से बड़े आरम्भ भी भले प्रकार निभा ही सकते हैं। उनको मिथ्या समझने से यदि किसी की इच्छा ही उधर को न चलती हो तो वह भले ही ध्यान करने लगे और व्यवहार को बन्द कर दे। यह सब ज्ञानी के प्रारब्ध पर ही निर्भर होता है। इसके विप- रीत उपासक को तो चाहिए कि वह तो सदा ध्यान ही करता रहे। इसे तो यह कभी भी न भूलना चाहिए कि उस (उपासक) की ब्रह्मता तो केवल ध्यान के प्रताप से ही होती है। जो चीज़ ध्यान से बनी है वह तो ध्यान के हटते ही नष्ट हो जायगी। परन्तु सच्ची ब्रह्मता तो जब उसका ध्यान नहीं भी रहता तब भी बनी ही रहती है। इसलिए ज्ञान तो उसका बोधक ही हो सकता है, जनक नहीं हो सकता। ज्ञापक के न रहने से सत्य वस्तु छिप नहीं जाती। वैसे तो उपासक भी ब्रह्म ही है, परन्तु अभी तक उस को इस बात का निश्चय नहीं हो पाया है, इस कारण उस की ब्रह्मता उस के उपयोग में नहीं आती। जैसे भूखों मरने से भीख
ध्यानदीप का संक्षेप ७७ मांगना भला होता है, इसी प्रकार और सब कामों से उपासना का दर्जा ऊँचा है। पामर लोगों के व्यवहार से तो यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान बेहतर है, उन यज्ञादियों से सगुणोपासना श्रेष्ठ है, सगुणोपासना से भी निर्गुणोपासना ऊँची मानी गयी है। इस ऊँचनीच भाव का निर्णायक आधार पूछो तो यह है कि ज्यों ज्यों विज्ञान की समीपता आती जाती है, त्यों त्यों श्रेष्ठता भी बढ़ने लगती है। निर्गुणोपासना के सर्वश्रेष्ठ होने का कारण तो यही है कि यह उपासना पीछे जाकर धीरे धीरे ब्रह्मज्ञान के रूप में बदल जाती है। फल मिलने के समय जैसे सफल भ्रम प्रमाज्ञान होजाता है इसी प्रकार मुक्ति का समय आने पर यह 'निर्गुणोपासना' ही 'ब्रह्मविद्या' बन जाती है। निर्गुणोपासना में यही विशेषता है कि वह ज्ञान के सब से अधिक समीप होती है। वह निर्गुणोपासना जब पकने लगती है तब पहिले तो इसी की 'सविकल्प समाधि' हो जाती है। फिर पीछे से उस सविकल्प समाधि की ही 'निर्विक- ल्पसमाधि' बन जाती है। यह निरोध नामक समाधि निर्गुणोपासक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जब किसी को निरोध का महालाभ हो जाता है, तब उस पुरुष के अन्दर असंग वस्तु शेष रह जाती है। उस असंग वस्तु की भावना यदि कोई बार बार करे तो 'तत्वमसि' आदि वाक्यों के याद आते ही बिजली की चमक की तरह तत्वज्ञान का उदय हो जाता है। उस समय की ज्ञानोन्मुख अवस्था की सराहना किन शब्दों में करें—उस समय ही निर्विकारता, असंगता, नित्यता, स्वप्रकाशता, एकता और पूर्णता आदि का सच्चा भाव अभ्यासी की बुद्धि में ठीक तौर पर जंचने लगता है। इन का यथार्थ मर्म तभी अभ्यासी की समझ में आता है। अपरोक्षज्ञान को उत्पन्न करने वाली इस निर्गुणोपासना को
७८ पंचदशी छोड़ कर जो लोग तीर्थों में टकराते हैं, और जपादि में व्यस्त पड़े रहते हैं, वे तो ऐसे हैं जैसे हाथ पर रक्खे गुड़ को फेंक कर कोई हाथ को ही चाटने लगता हो । विचारक के सामने तो उपासक का दर्जा भी बहुत नीचा होता है, यह बात कभी न भूलनी चाहिए। यही कारण है कि—विचार न कर सकने की अवस्था में ही 'योग' किंवा 'उपासना' का विधान किया गया है। जिन पुरुषों के चित्त अत्यन्त व्याकुल हुए रहते हैं, उन को विचार से तत्वज्ञान हो ही नहीं सकता, उन के लिए तो 'योग' ही मुख्य उपाय है। क्योंकि योग करने से उनका धीदर्प नष्ट हो जाता है। जिन महापुरुषों की बुद्धि कभी व्याकुल नहीं होती, जिन का आत्मा केवल मोह के आवरण में छिपा रहता है, उनके लिए तो 'सांख्य' नाम का विचार ही मुख्य उपाय है। क्योंकि उन्हें उसी से झटपट सिद्धि मिल जाती है। गीता में कहा है कि—'सांख्यमार्गी' जिस परमपद को पाते हैं 'योगमार्गी भी वहां पहुंच जाते हैं। जिस ज्ञानी को यह मालूम है कि परिणाम में जाकर 'सांख्य' और 'योग' एक ही हैं, जिसे इनमें भेद नहीं दीखता, उसी को शास्त्र का मर्मज्ञ समझ लो। जिसकी तो उपासना भी इस जन्म में अधकचरी रह गयी हो, वह या तो मरते समय या फिर ब्रह्मलोक में जाकर तत्व का ज्ञाता होता है और मुक्त हो जाता है। मरते समय इस जन्म के विचारों का निचोड़ (सार) प्रकट होने लगता है अर्थात् मरते समय इस जन्म के जो सब से पिछले विचार होते हैं, उनसे यह पता चल ही जाता है कि—अगला जन्म कैसा और काहे का होगा ? बच्चों को पिछले जन्म के और वृद्ध को अगले जन्म के सपने आने लगते हैं। जीवन के पिछले ज्ञान
ध्यानदीप का संक्षेप ७९ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
से आगामी जन्म की सूचना जैसे साधारण प्राणी को भी मिल जाती है या जैसे मरण के समय सगुणोपासकों को उनके सगुण ब्रह्म दर्शन दे देते हैं, इसी तरह पूर्वाभ्यास के प्रताप से मरते समय निर्गुणोपासकों को भी निर्गुणब्रह्म का ज्ञान हो ही जायगा, इसमें वृथा सन्देह क्यों किये जा रहे हो । यदि कहो कि निर्गुणो- पासक को मरण काल में निर्गुणब्रह्म की ही प्राप्ति हो सकती है, उसे मुक्ति भी मिल जायगी यह हम क्यों कर मान लें ? उसका उत्तर यह है कि तुम उस दर्शन का नित्य निर्गुण नाम भले ही गाते रहो असल में तो वह मोक्ष ही है । जैसे संवादिभ्रम कहने को तो भ्रम है, असल में तो उसे तत्वज्ञान ही कह देना चाहिए। ऐसे ही निर्गुणब्रह्म की 'प्राप्ति'और 'मुक्ति' ये दो नाम एक ही वस्तु के हैं। निर्गुणोपासना का सामर्थ्य ही कुछ ऐसा है कि—उससे मूलाज्ञान को मार भगाने वाली बुद्धि का जन्म हो ही जाता है । तापनीय- उपनिषत् में भी मोक्ष को इसी निर्गुणोपासना का फल बताया है । उपासना करते करते अन्त में तो ज्ञान की उत्पत्ति हो ही जाती है और यों 'नान्यः पन्था विद्यते' ज्ञान के सिवाय दूसरा रास्ता ही नहीं है इससे भी विरोध नहीं रह जाता । निष्काम उपासना करने से मुक्ति मिलती है, तथा सकाम उपासना करने से ब्रह्मलोक मिलता है । उस ब्रह्मलोक में जाकर भी इस उपासना के सामर्थ्य से तत्व का दर्शन हो जाता है । फिर वह उपासक इस कल्प में लौट कर नहीं आता और कल्प का अन्त होते समय कल्पेश्वर के साथ मुक्त हो जाता है। श्रुतियों में अधिकता से प्रणव की निर्गुणोपासनायें ही आयी हैं। सगुणोपासना तो कहीं कहीं दी है। पिप्पलादमुनि ने ओंकार को 'पर' और 'अपर' ब्रह्मरूप कहा है। यम ने भी नचिकेता से कहा है कि जो
मिले। प्रकरण में तो हमें केवल इतना ही कहना है कि—
८० पंचदशी इस ओंकाररूपी आलम्बन को जान ले तो वह जो चाहे वहीं उसे मिले। प्रकरण में तो हमें केवल इतना ही कहना है कि— जो निर्गुणब्रह्म की उपासना भले प्रकार कर लेता है वह इस लोक में या मरते समय या फिर ब्रह्मलोक में जाकर, ब्रह्म का साक्षात्कार करके ही छोड़ता है। आत्मगीता में भी कहा है कि—जो विचार न कर सकते हों, उन्हें तो निर्गुण ब्रह्म की उपासना निरन्तर ही करनी चाहिये। आत्मगीता में यह भी कहा है कि—जिसमें आत्मसाक्षात्कार करने की शक्ति न हो, वह निःशंक होकर मेरी उपासना ही किया करे। समय आने पर मैं उसके अनुभव में आऊंगा और निश्चय ही फलित होकर रहूंगा। अगाध खज़ाना पाना हो तो जैसे खोदना ही होगा, ऐसे ही मुझे पाना हो तो आत्म- चिन्ता करनी ही होगी। पुरुष को चाहिये कि—बुद्धि रूपी कुदाल से देह-रूपी रोड़े को दूर हटा दे। मनरूपी भूमि को बार बार खोदे और अन्त में मुझ गुप्त निधि को प्राप्त करके ही छोड़े। यदि किसी को अनुभूति न भी हो तो भी उसे 'अहं ब्रह्मास्मि' मैं ब्रह्म तत्व हूं' यह उपासना अवश्य करनी चाहिये। ध्यान का तो इतना महाप्रताप है कि उससे असत् भी मिल जाता है। नित्य प्राप्त जो सर्वात्मक ब्रह्म है वह ध्यान से मिलेगा या नहीं? ऐसी तो शंका ही कभी न करो। ध्यान करके देखो तो पता चले कि—ध्यान करने से दिन पर दिन अनात्मबुद्धि ढीली पड़ती जाती है। ध्यान के इस महाफल को देखकर भी यदि कोई ध्यान नहीं करता है तो वह बड़ा ही अभागा है। सम्पूर्ण प्रकरण का सार तो यही है कि—यदि कोई ध्यान से देहाभिमान को खोदे और अपने अद्वितीय आत्मा के दर्शन करले, तो यह अनादिकाल से मरने वाला प्राणी ही अमर हो जाय और इसी जन्म में सच्चिदानन्द ब्रह्म के दर्शन करके छोड़े।
ध्यानदीप का संक्षेप ८१ जो पुरुष इस 'ध्यानदीप' का विचार करेंगे उनके सब ही संशय भाग जायेंगे। विश्वास है कि—वे फिर सदा ही ब्रह्म ध्यान में निमग्न रहने लगेंगे।
10. Natakadipa
[१०] नाटकदीप का संक्षेप वह परमात्मतत्त्व पहले भी अद्वयानन्द पूर्ण था और अब भी है। वह कुतूहल में आकर अपनी माया के प्रताप से पहले तो जगत् बना और फिर जीवरूप से उसी में प्रवेश कर गया। उत्तम देहों में प्रवेश करके तो वह देवता हुआ। अधम देहों में प्रवेश करने से उसमें मर्त्यपन आ गया। जब उसने अनेक जन्मों तक अपने कर्म ब्रह्मार्पण करने शुरू किये तब उसमें फिर आत्मस्वरूप का विचार करने की शक्ति जाग उठी। विचार की आंच के सामने जब माया न ठहर सकी तब वह फिर स्वयम् अकेला का अकेला ही रह गया। ये जगत् और जीव सब के सब पलायन कर गये। उस अद्वितीय तत्व के सच्चे बन्ध और मोक्ष का निरूपण करने का सामर्थ्य तो किसी में है ही नहीं। जब उस तत्व को दुःखी होने का धोखा लग जाता है तब बस यही उस का 'सद्वयपना' और यही उस का 'बन्ध' कहाता है। यह दुःखीपना जब हटता है और जब स्वरूप में स्थिति मिल जाती है तब इसी को 'मोक्ष' कहने लगते हैं। जानते हो यह बन्ध कहां से आया है? सुनो, यह बन्ध अविचार से आया है और विचार करने से यह बन्ध खुल जायगा। इस कारण जब तक तत्व का साक्षात्कार न हो जाय तब तक जीव और परात्मा का विचार सदा ही करते रहना चाहिये। विचार