भारतकोश
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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

शृङ्गभङ्गे चरेत् पादं द्वौ पादौ नेत्रघातने ॥१७॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९३ पाषाणेनार्थ दण्डेन गावो येताऽभिघातिताः । शृङ्गभङ्गे चरेत् पादं द्वौ पादौ नेत्रघातने ॥१७॥ किसी व्यक्ति के द्वारा पत्थर या डण्डे से आघात करने पर यदि गाय का सींग टूटकर गिर जाय, या उसकी आँखें फूट जायें, तो सींग गिरने पर चौथाई व्रत और नेत्र-भंग होने पर आधा व्रत करना चाहिए ॥१७॥ लाङ्गूले पादकृच्छ्रं तु द्वौ पादावस्थिभञ्जने । त्रिपादं चैव कर्णे तु चरेत् सर्वं निपातने ॥१८॥ पूँछ टूट जाने पर पादकृच्छ्र व्रत करे, हड्डी टूटने पर आधा कृच्छ्र, कान टूटने पर तीन चौथाई व्रत और मरण होने पर सम्पूर्ण व्रत करना उचित है ॥१८॥ शृङ्गभङ्गेऽस्थिभङ्गे च कटिभङ्गे तथैव च । यदि जीवति षण्मासान् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१९॥ किसी गाय का सींग टूटने, हड्डी टूटने या कमर टूटने पर भी यदि वह छः मास तक जीवित रह जाय तो उसके लिए किसी प्रकार का प्रायश्चित्त आवश्यक नहीं है ॥१९॥ व्रण-भङ्गे च कर्त्तव्यः स्नेहाभ्यङ्गस्तु पाणिना । यवसश्चोपहर्त्तव्यो * यावद् दृढबलो भवेत् ॥२०॥ यदि अपने हाथ से गाय का फोड़ा फूट जाय तो उसमें जब तक गाय स्वाभाविक अवस्था में न हो जाय तब तक घी या तेल लगाते रहना चाहिए और भोजन के लिए हरा चारा या घास देते रहना चाहिए ॥२०॥ यावत्सम्पूर्ण-सर्वाङ्गस्तावत् तं पोषयेन्नरः । गोरूपं ब्राह्मणस्याऽग्रे नमस्कृत्या विसर्जयेत् ॥२१॥ ———————————————————————————————— १. 'नैव' इति क्वचित्पुस्तके ।

९४ पाराशरस्मृतिः [ नवमो- जब तक उस गाय का सम्पूर्ण अंग पूरा न हो जाय, तब तक उसकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए । तत्पश्चात् किसी ब्राह्मण को नम- स्कार करके उसे अर्पित कर देना उचित है ॥२१॥ यद्यसम्पूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहो भवेत् तदा । गोघातकस्य तस्याऽर्द्ध प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२२॥ सम्पूर्ण अंग ठीक होने से पहले ही यदि उस गाय की मृत्यु हो जाय तो हत्यारे को आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२२॥ काष्ठ-लोष्ठ-पाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतो बलात् । व्यापादयति यो गां तु तस्य शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥२३॥ काठ, ईंट, पत्थर या शस्त्र से सज्जित मनुष्य जब बलात् गाय का वध करे, तो उसकी शुद्धि इस प्रकार कही गयी है—॥२३॥ चरेत् सान्तपनं काष्ठे प्राजापत्यं तु लोष्टके । तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चैवाऽतिकृच्छ्रकम् ॥२४॥ काठ से मारने पर सान्तपन नामक व्रत, ईंट से प्राजापत्य, पत्थर से तप्तकृच्छ्र और शस्त्रों द्वारा आघात करने में अतिकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ॥२४॥ पञ्च सान्तपने गावः प्राजापत्ये तथा त्रयः । तप्तकृच्छ्रे भवन्त्यष्टावतिकृच्छ्रे त्रयोदश ॥२५॥ सान्तपन नामक व्रत में पाँच, प्राजापत्य में तीन, तप्तकृच्छ्र में आठ और अतिकृच्छ्र में तेरह गोदान करने का विधान बतलाया गया है ।२५।। प्रमापणे प्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिरूपकम् । तस्याऽनुरूपं मूल्यं वा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः ॥२६॥ महर्षि मनु ने कहा है कि जिस प्रकार के पशु का हनन किया गया हो, पशुपालक को बदले में वैसा ही पशु देना चाहिए अथवा

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९५ किन्हीं दो मनुष्यों द्वारा मृत पशु के किये गये मूल्यांकन का मूल्य चुका देना चाहिए ॥२६॥ अन्यत्राङ्कन-लक्ष्मभ्यां वाहने मोचने तथा । सायं सङ्गोपनार्थं च न दुष्येद् रोध-बन्धयोः ॥२७॥ वृषोत्सर्ग आदि के समय शङ्ख द्वारा अंकन करने तथा उस अंकन के लिए गोमय के चिह्न बनाने, बोझ लादने, बोझ उतारने और सायंकाल पशु के रक्षण के निमित्त रोध और बन्ध करने पर मरनेवाली गाय का कोई दोष नहीं माना जाता ॥२७॥ अतिदाहेऽतिवाहे च नासिकाभेदने तथा । नदी-पर्वतसञ्चारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२८॥ पशु को बहुत अधिक दागने, लादने, जोतने, नाक छेदने अथवा नदी या पर्वतस्थल में चराने पर, गाय का मरण होने पर प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२८॥ अतिदाहे चरेत् पादं द्वौ पादौ वाहने चरेत् । नासिक्ये पादहीनं तु चरेत् सर्वं निपातने ॥२९॥ अत्यधिक दागने के कारण होनेवाली मृत्यु में चतुर्थांश, बहुत अधिक भार लादने से होनेवाली मृत्यु में आधा, नाथने में तीन चौथाई और वध में पूरा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२९॥ दहनात्तु विपद्येत अनड्वान् योक्त्रयन्त्रितः । उक्तं पराशरेणैव ह्येकं पादं यथाविधि ॥३०॥ घर में आग लगने पर जुए में जुता हुआ बैल यदि मर जाय तो उसके प्रायश्चित्त में महर्षि पराशर ने चौथाई व्रत करने का विधान किया है ॥३०॥ रोधनं बन्धनं चैव भारप्रहरणं तथा । दुर्गप्रेरण-योक्त्रं च निमित्तानि वधेषु¹ षट् ॥३१॥ १. 'वधस्य' इति ।

९६ पराशरस्मृतिः [ नवमो- अवरोध (रोकना), बन्धन, भार, आघात, बीहड़ स्थान में ले जाना और जुए में जोतना—ये छः कर्म वध के कारण होते हैं ॥३१॥ बन्ध-पाश-सुगुप्ताङ्गो म्रियते यदि गोपशुः । भवने तस्य पापी स्यात् प्रायश्चित्तार्द्धमर्हति ॥३२॥ यदि किसी के घर में गाय या बैल बन्धन या फन्दे में बँधा हुआ ही मर जाय तो वह भी पाप का भागी होता है । उसे दोष निवारण के लिए आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३२॥ न नारिकेलैर्न च शाणवालै- र्न चाऽपि मौञ्जैर्र्न च वल्कशृङ्खलैः । एतैस्तु गावो न निबन्धनीया बन्ध्त्वाऽपि तिष्ठेत् परशुं गृहीत्वा ॥३३॥ किसी गाय को नारियल की बनी रस्सी, सन, बाल, मूँज और वृक्ष की छाल के रस्से से अथवा लोहे की जंजीर से नहीं बांधना चाहिए । यदि उपर्युक्त वस्तुओं से बांधना आवश्यक ही हो तो उसे काटने का शस्त्र लेकर तत्पर रहना चाहिए ॥३३॥ कुशैः काशैश्च बध्नीयाद् गोपशुं दक्षिणामुखम् । पाशलग्नाग्निदग्धासु२ प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३४॥ कुश और कास की रस्सी से गाय को दक्षिण मुख बाँधने पर यदि वह जल मरे या फन्दा लगा ही रह जाय तो भी किसी प्रकार का दोष नहीं लगता है ॥३४॥ यदि तत्र भवेत् काष्ठं प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? । जपित्वा पावनीं देवीं मुच्यते तत्र किल्बिषात् ॥३५॥ कुश या कास की रस्सियों में लकड़ी पिरोकर यदि गाय को बाँधा गया हो तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इसमें गायत्री १. 'बद्ध्वा तु' इति । २. 'दग्धेषु' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९७ देवी का एक सौ आठ बार जप करने से मनुष्य के पाप का मोचन होता है ॥३५॥ प्रेरयन् कूप-वापीषु वृक्षच्छेदेषु पातयन् । गवाशनेषु विक्रीर्णस्ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥३६॥ जब किसी कुएँ, तालाब और बड़े-बड़े वृक्ष काटने के स्थान में गाय को ले जाय अथवा किसी कसाई के हाथ उसे विक्रय कर दे तो गोवध करने का प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३६॥ आराधितस्तु यः कश्चिद् भिन्नकक्षो यदा भवेत् । श्रवणं हृदयं भिन्नं भग्नो वा कूपसङ्कटे ॥३७॥ यत्नपूर्वक बलवान् बनाकर किसी बैल को दौड़ाने पर जब वह कक्षहीन हो जाय अथवा किसी कुएँ आदि में गिरने से उसके कान और हृदय विदीर्ण हो जायें, ॥३७॥ कूपादुत्क्रमणे चैव भग्नो वा ग्रीव-पादयोः । स एव म्रियते तत्र त्रीन् पादांस्तु समाचरेत् ॥३८॥ कुएँ से निकालने के समय यदि गरदन या पैर टूट जाय तो उस बैल के मरने पर तीन चौथाई प्राजापत्य नामक व्रत करने का विधान बतलाया गया है ॥३८॥ कूपखाते तटाबन्धे नदीबन्धे प्रपासु च । पानीयेषु विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३९॥ यदि कोई बैल पुराने कुएँ के गड्ढे, बाँध, पुल, पौसरे और पानी के गड्ढे में डूबकर मर जाय तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता ॥३९॥ कूपखाते तटाखाते १दीर्घीखाते तथैव च । स्वल्पेषु धर्मखातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४०॥ १. 'दीर्घखाते' इति पा० । ७

९८ पाराशरस्मृतिः [ नवमो- कूपखात, तटाखात, दीर्घखात और घर्मखात-इन गड्डों में गिरकर मृत्यु को प्राप्त होने पर कोई प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता ॥४०॥ वेश्मद्वारे निवासेषु यो नरः खातमिच्छति । स्वकार्यगृहखातेषु प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४१॥ घर के दरवाजे पर, गोशाला में अथवा गृहनिर्माण के लिए किये गये गड्ढे में गिरकर पशु के मरने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥४१॥ निशि बन्धनिरुद्धेषु सर्पव्याघ्रहतेषु च । अग्नि-विद्युद्विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४२॥ रात में रोकने या बाँधने से, सर्प या सिंह आदि हिंसक जन्तुओं के द्वारा मारे जाने पर, अग्निकाण्ड होने अथवा बिजली गिरने से मृत पशुओं के निमित्त किसी प्रायश्चित्त का विधान नहीं है ॥४२॥ ग्रामघाते शरौघेण वेश्मभाङ्गनिपातने । अतिवृष्टिहतानां च प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४३॥ शत्रु द्वारा ग्राम के घेरने, शत्रु द्वारा चलाये हुए बाणों से बिंधने, मकान के ध्वस्त होने अथवा मूसलधार वृष्टि के कारण पशुमरण होने पर प्रायश्चित्त नहीं किया जाता है ॥४३॥ संग्रामे प्रहतानां च ये दग्धा वेश्मकेषु च । दावाग्नि ग्रामघातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४४॥ युद्धस्थल में, दावानल की लपेट में आये हुए, घर में जलने और सम्पूर्ण गांव के विध्वंस होने पर मृत गाय के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं किया जाना चाहिए ॥४४॥ यन्त्रिता गौश्चिकित्सार्थं मूढगर्भविमोचने । यत्ने कृते विपद्येत प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४५॥ १. '-ऽपहृताना' इति पा० ।

अध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९९

अध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९९ औषध पिलाने के निमित्त अथवा उदरस्थ मृत बछड़े को निकालने के लिए बँधी हुई गाय के मरने पर कोई दोष नहीं लगता है ॥४५॥ व्यापन्नानां बहूनां च बन्धने रोधनेऽपि वा । भिषङ्मिथ्योपचारे१ च प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४६॥ बाँधने या रोकने से अथवा पशु-चिकित्सक के गलत उपचार के द्वारा यदि बहुत सी गायों का निधन हो जाय तो प्रायश्चित्त करना आवश्यक होता है ॥४६॥ गो-वृषाणां विपत्तौ च यावन्तः प्रेक्षका जनाः । अनिवारयतां तेषां सर्वेषां पातकं भवेत् ॥४७॥ यदि गाय या बैल किसी कुएँ आदि में या और किसी प्रकार मर जायें और दर्शकों द्वारा उनको बचाने का प्रयास न किया जाय तो उसका प्रायश्चित्त लगता है ॥४७॥ एको हतो यैर्बहुभिः समेतैर्न ज्ञायते यस्य हतोऽभिघातात् । दिव्येन तेषामुपलभ्य हन्ता निवर्तनीयो नृपसन्नियुक्तः ॥४८॥ जब कई व्यक्तियों ने एक साथ मिलकर सम्मिलित वध किया हो और इस बात का निश्चय न हो सके कि किसके प्रहार से गोहत्या हुई है, तो राज-द्वारा नियुक्त मनुष्य को चाहिए कि हत्यारों को शपथ दिलाकर मारनेवाले का निर्णय करे और सबके समक्ष उसे अलग करके सब लोगों को दिखला दे ॥४८॥ एका चेद् बहुभिः काचिद् दैवाद् व्यापादिता भवेत्२ । पादं पादं तु हत्यायाश्चरेयुक्ते पृथक् पृथक् ॥४९॥ यदि एक गाय को किसी मनुष्य ने मारा हो तो उन सब व्यक्तियों को अलग-अलग सम्पूर्ण व्रत का चतुर्थांश प्रायश्चित्त के रूप में करना चाहिए ॥४९॥ १. ‘-मिथ्यापचारेण’ इति पा० । ‘-मिथ्यापचारे’ इति । २. ‘क्वचित्’ इति ।

१७० पाराशरस्मृतिः [ नवमो- हते तु रुधिरं दृश्यं व्याधिग्रस्तः कृशो भवेत् । लाला भवति १दष्टेषु एवमन्वेषणं भवेत् ॥५०॥ गाय की मृत्यु के कारण का निश्चय इस प्रकार करना चाहिए— यदि रक्त दिखाई पड़े तो वध द्वारा, दुर्बलता के कारण मृत्यु होने से बीमारी द्वारा और मुंह से झाग या फेन निकलने पर सर्पदंशन द्वारा मृत्यु का कारण समझना चाहिए । ५०॥ ग्रासार्थं चोदितो वाऽपि अध्वानं नैव गच्छति । मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता ॥५१॥ खाने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी यदि गाय अपने स्थान से न हिले तो उसे क्लेशित समझना चाहिए। ऐसा सर्वशास्त्रवेत्ता मनु ने बतलाया है ॥५१॥ प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् । केशानां रक्षणार्थाय द्विगुणं व्रतमाचरेत् ॥५२॥ उन्होंने गोहत्या को प्रायश्चित्त के रूप में चान्द्रायण नामक व्रत का अनुष्ठान करने का निर्देश किया है और केशों का मुण्डन न कराने पर दुगुने व्रत का विधान बतलाया है ॥५२॥ द्विगुणे व्रत आदिष्टे द्विगुणा दक्षिणा भवेत् । राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥५३॥ दुगुना व्रत करने में दक्षिणा भी दुगुनी देनी पड़ती है। राजा, राजपुत्र अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण ॥५३। अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । यस्य न द्विगुणं दानं केशश्च परिरक्षितः ॥५४॥ यदि गोहत्या में हत्यारे का सिर मुड़ाये बिना दुगुना प्रायश्चित्त न करे ॥५४॥ १. 'दंष्ट्रेषु' इति ।

ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १०१ तत्पापं तस्य तिष्ठेत १वक्ता च नरकं व्रजेत् । यत्किञ्चित् क्रियते पापं सर्वं केशेषु तिष्ठति ॥५५॥ तो वह स्वयं पातकी होता है और बतलानेवाला नरकगामी होता है, क्योंकि सभी प्रकार के किये हुए पाप केशों में विद्यमान रहते हैं ॥५५॥ सर्वान् केशान् समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् । एवं नारी-कुमारीणां शिरसो मुण्डनं स्मृतम् ॥५६॥ विवाहिता अथवा अविवाहिता स्त्री के मुण्डन में केश के ऊपरी सिरे को पकड़कर दो-दो अंगुल बाल काट लेना चाहिए ॥५६॥ न स्त्रियाः केशवपनं न दूरे शयनाऽऽसनम् । न च गोष्ठे वसेद् रात्रौ न दिवा गा अनुव्रजेत् ॥५७॥ स्त्रियों के समस्त केशों को मूंडना, अलग होकर सोना, बैठना, गोशाले में रहकर रात बिताना और दिन में गायों के झुण्ड के पीछे- पीछे घूमना—ये सब कार्य वर्जित होते हैं। ५७॥ नदीषु सङ्गमे चैव अरण्येषु विशेषतः । न स्त्रीणामजिनं वासो व्रतमेवं समाचरेत् ॥५८॥ नदियों के संगमस्थान, विशेषतः वनों में वास तथा मृगछाला आदि को धारण न कराकर व्रत का अनुष्ठान कराना चाहिए ॥५८॥ त्रिसन्ध्यं स्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनं तथा । बन्धुमध्ये व्रतं तासां कृच्छ्र-चान्द्रायणादिकम् ॥५९॥ त्रिकाल स्नान, देवताओं की अर्चना और अपने बन्धुवर्गों में निवास करना ही स्त्रियों का कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रत माना गया है ॥५९॥ गृहेषु सततं तिष्ठेच्छुचिर्नियममाचरेत् । इह यो गोवधं कृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति ॥६०॥ १. 'त्यक्त्वा' इति पा० । २. 'शयनाऽशनम्' इति ।

१०२. पराशरस्मृतिः [ दशमो- घर में सदैव पवित्र रहकर स्त्रियां नियमपूर्वक आचरण करें। जो गोघातक अपने गोवध को संसार की दृष्टि में छिपाने का प्रयास करता है ॥६०॥ स याति नरकं घोरं कालसूत्रमसंशयम् । विमुक्तो नरकात्तस्मात् मर्त्यलोके प्रजायते ॥६१॥ वह निश्चय ही घोर कालसूत्र नामक नरक में वास करता है। उस नरक से मुक्त होनेके बाद जब वह पुनः मृत्युलोक में आता है तब ॥ ६१ ॥ क्लीबो दुःखी च कुष्ठी च सप्तजन्मनि वै नरः । तस्मात् प्रकाशयेत् पापं स्वधर्मं सततं चरेत् ॥६२॥ वह प्राणी नपुंसक, दुखी और कोढ़ी होकर सात जन्म तक कष्ट भोगता रहता है। इसलिए अपने किये हुए पापों को गुप्त न रखकर उन्हें सब लोगों पर प्रकट करके सदैव धर्माचरण में तत्पर रहना चाहिए ॥६२॥ स्त्री-बाल-भृत्य-गो-विप्रेष्वतिकोपं विवर्जयेत् ॥६३१/२॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे गोरक्षणार्थे गोविपत्तिप्रायश्चित्त नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ स्त्री, बालक, सेवक, गौ और ब्राह्मण के ऊपर कभी भी अत्यन्त क्रोध नहीं करना चाहिए ॥ ६३१/२ ॥ इस प्रकार ‘शिवदत्ती’ हिन्दीटीका में पराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में नवाँ अध्याय समाप्त ॥ ९ ॥ ❀ १०. दशमोऽध्यायः चातुर्वर्ण्येषु सर्वेषु हितं वक्ष्यामि निष्कृतिम् । अगम्यागमने चैव १शुद्धौ चान्द्रायणं चरेत् ॥ १ ॥ १. ‘शुद्ध्यै’ इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०३ अब मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णों की शुद्धि का उपाय बतलाऊँगा। अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य अगम्या स्त्रियों से गमन करने पर चान्द्रायण व्रत से शुद्धि होती है ॥ १ ॥ एकैकं हासयेद् ग्रासं कृष्णे शुक्ले च वर्द्धयेत् । अमावास्यां न भुञ्जीत ह्येष चान्द्रायणो विधिः ॥ २ ॥ चान्द्रायण व्रत की विधि इस प्रकार है : कृष्णपक्ष में भोजन का क्रमशः एक-एक ग्रास घटाकर शुक्लपक्ष में एक-एक कौर बढ़ाते रहना चाहिए और अमावास्या के दिन निराहार व्रत करना चाहिए ॥ २ ॥ कुक्कुटाण्डप्रमाणं तु ग्रासं व परिकल्पयेत् । अन्यथा ¹जातदोषेण न धर्मो न च ²शुद्ध्यति ॥ ३ ॥ भोजन के ग्रास का प्रमाण अण्डे के बराबर होना चाहिए। इसकी मात्रा में कमी-वेशी करने से दोष का भागी होना पड़ता है और शुद्धि नहीं होती ॥ ३ ॥ प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् । गोद्वयं वस्त्रयुग्मं च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्त करने के अनन्तर ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा- स्वरूप दो गाय और एक जोड़ा वस्त्र देना चाहिए ॥ ४ ॥ चाण्डालीं वा श्वपाकीं वा ³ह्यभिगच्छति यो द्विजः । त्रिरात्रमुपवासित्वा⁴ विप्राणामनुशासनात् ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण चाण्डाल या श्वपच जाति की स्त्री से मैथुन करता है, उसे चाहिए कि वह ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर, ॥ ५ ॥ स शिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् । ब्रह्मकूर्चं ततः कृत्वा कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम् ॥ ६ ॥ १. 'भावदोषेण' इति । २. 'शुद्ध्यते' इति । ३. 'अनुगच्छति' इति । ४. 'त्रिरात्रमुपवासी च' इति ।

१०४ पाराशरस्मृतिः [ दशमो- तीन दिन-रात उपवास करे और शिखा सहित सिर मुँड़वाकर प्राजापत्य नामक व्रत का अनुष्ठान करे । इसके अनन्तर ब्रह्मकूर्च नामक व्रत पूरा करके ब्राह्मण को भोजन दे ॥ ६ ॥ गायत्रीं च जपेन्नित्यं दद्याद् गोमिथुनद्वयम् । विप्राय दक्षिणां दद्याच्छुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ७ ॥ तदनन्तर प्रतिदिन गायत्री का पाठ करे और अन्त में ब्राह्मण को दो बैल, दो गाय और दक्षिणा दान करे। इस प्रकार के अनुष्ठान से वह ब्राह्मण निश्चय ही पवित्र हो जाता है ॥ ७ ॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । क्षत्रियो वाऽथ वैश्यो वा चाण्डालीं गच्छतोऽपि¹वा ॥८ ॥ महर्षि पाराशर ने शुद्धि के निमित्त दक्षिणा में दो गायों के दान का निर्देश किया है। यदि क्षत्रिय या वैश्य चाण्डाल की स्त्री से सहवास करे तो ॥ ८ ॥ प्राजापत्यद्वयं कुर्याद् दद्याद् गोमिथुनं²द्वयम् । श्वपाकीं वाऽथ चाण्डालीं शूद्रो वा यदि गच्छति ॥ ९ ॥ उसे चाहिए कि वह दो प्राजापत्य व्रत करके दो गाय और दो बैल दान में देवे । यदि शूद्र जाति का मनुष्य श्वपच या चाण्डाल की पत्नी से मैथुन करे तो ॥ ९ ॥ प्राजापत्यं चरेत् कृच्छ्रं चतुर्गोमिथुनं ददेत् । मातरं यदि गच्छेत्तु भगिनीं स्वसुतां तथा ॥१०॥ उसे चाहिए कि प्राजापत्य कृच्छ्र नामक व्रत करके चार-चार की संख्या में गाय और बैल का दान देवे। यदि कोई व्यक्ति मोहासक्त होकर अपनी माता, बहन और पुत्री से सम्भोग कर बैठे ॥ १० ॥ १ 'गच्छतो यदि' इति । २. 'गोमिथुनं तथा' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०५ एतास्तु मोहितो गत्वा त्रीणि कृच्छ्राणि सञ्चरेत् । चान्द्रायणत्रयं कुर्याल्लिङ्गनच्छेदेन शुद्ध्यति ॥११॥ तो तीन-तीन कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करके अन्त में जननेन्द्रिय को ही काट डालना चाहिए ॥११॥ मातृष्वसृगमे चैवमात्ममेढ्रनिकृन्तनम् । १अज्ञानेन तु यो गच्छेत् कुर्याच्चान्द्रायणत्रयम् ॥१२॥ इसी प्रकार यदि अपनी मौसी ( माता की वहन ) से सम्भोग करे तब भी उसे जननेन्द्रिय का छेदन कर डालना उचित है । यदि अनजान में समागम हुआ हो तो उसे तीन चान्द्रायण करने के बाद ॥१२॥ दशगोमिथुनं दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । पितृदारान् समारुह्य मातुराप्तां च भ्रातृजाम् ॥१३॥ दस-दस की संख्या में गाय और बैल का दान करना चाहिए । ऐसा करने से उसकी शुद्धि हो जाती है । विमाता, माता की सहेली, भ्रातृ-तनया, ॥ १३ ॥ गुरुपत्नीं स्नुषां चैव भ्रातृभार्या तथैव च । मातुलानीं स-गोत्रां च प्राजापत्यत्रयं चरेत् ॥१४॥ गुरु-पत्नी, पुत्रवधू ( पतोहू ), भाई की पत्नी, मामी सगोत्रीय स्त्रियों के साथ मैथुन करने पर तीन प्राजापत्य व्रत का विधान कहा गया है ॥ १४ ॥ गोद्वयं दक्षिणां दत्वा शुद्ध्यते नाऽत्र संशयः । पशु-वेश्यादिगमने महिष्युष्ट्री-कपीस्तथा ॥१५॥ तत्पश्चात् दक्षिणा में दो गायों का दान देने से पूर्णरूपेण शुद्धि प्राप्त होती है । पशु, वेश्या, मादा भैंस, ऊँटिन, बन्दरी, ॥ १५ ॥ खरीं च सूकरीं गत्वा प्राजापत्यव्रतं चरेत् । गोगामी च त्रिरात्रेण गामेकां ब्राह्मणे ददेत् ॥१६॥ १ 'अज्ञानात्ता' इति । २. 'चान्द्रायणद्वयम्' इति ।

[शीर्षक] १०६ पाराशरस्मृतिः [ दशमो-

गधी और सूअर के साथ गमन करने से प्राजापत्य व्रत करना चाहिए। गाय के साथ रमण करने से तीन दिन-रात निरन्तर उपवास करके दक्षिणा में ब्राह्मण को एक गाय देनी चाहिये ॥ १६ ॥ महिष्युष्ट्री-खरीगामी त्वहोरात्रेण शुद्ध्यति । १अमरे समरे वाऽपि दुर्भिक्षे वा जनक्षये ॥१७॥ भैंस, ऊँटनी और गधी के साथ एक बार गमन करने से एक दिन तक उपवास करके वह व्यक्ति शुद्धता पा लेता है। डकैती, युद्ध, अकाल, महामारी, ॥ १७ ॥ वन्दिग्राहे भयार्तो वा सदा स्वस्त्रीं निरीक्षयेत् । चाण्डालैः सह सम्पर्कं या नारी कुरुते ततः ॥१८॥ बलपूर्वक दासीकरण करना, राजा और चोर के डर से सदैव अपनी पत्नी की रक्षा करते रहना। चाण्डालों के साथ रमण करनेवाली स्त्री को चाहिए कि, ॥ १८ ॥ विप्रान् दश वरान् कृत्वा स्वकं दोषं प्रकाशयेत् । आकण्ठसम्मिते कूपे गोमयोदककर्दमे ॥१९॥ वह दश कुलीन ब्राह्मणों के समक्ष अपने किये हुए दोषों को स्वीकार कर ले और किसी कूप या गड्ढे के जल में कण्ठ तक गोबर का कीचड़ बनाकर ॥ १९ ॥ तत्र स्थित्वा निराहारा त्वहोरात्रेण निष्क्रमेत् । स-शिखं वपनं कृत्वा भुञ्जीयाद्यावकौदनम् ॥२०॥ उसमें दिन-रात निराहार रहकर खड़ी रहे। तत्पश्चात् दूसरे दिन उस गढ़े से बाहर आकर समूचे सिर का मुण्डन करा डाले और यव का भात बनाकर भोजन करे ॥ २० ॥ त्रिरात्रमुपवासित्वा त्वेकरात्रं जले वसेत् ।

[पाद-टिप्पणी] १. 'डामरे' इत्यपि पाठः ।

[Header Left]: ऽध्यायः ] [Header Center]: भाषाटीकासहिता [Header Right]: १०७

शङ्खपुष्पीलतामूलं पत्रं वा कुसुमं फलम् ॥२१॥ इसके बाद तीन दिन तक उपवास करके एक दिन-रात जल में खड़ा रहे। फिर सातवें दिन शंखपुष्पी नामक लता के पंचांग (फल, फूल, मूल, पत्ती आदि) में से किसी एक को लेकर ॥२१॥ सुवर्णं १पञ्चगव्यं च क्वाथयित्वा पिबेज्जलम् । एकभक्तं चरेत् पश्चाद्यावत् पुष्पवती भवेत् ॥२२॥ इसके साथ सोना और पंचगव्य मिला ले। फिर उपर्युक्त वस्तुओं को जल में उबालकर उसका काढ़ा तैयार करे और उस काढ़े का पान करे। जब तक पुनः रजस्वला न हो तब तक नियमपूर्वक इस एकभक्त व्रत को करती रहे ॥२२॥ व्रतं चरति तद्यावत्तावत् संवसते बहिः । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥२३॥ व्रतकाल में घर के बाहर ही निवास करे और प्रायश्चित्त पूरा करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए ॥२३॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । चातुर्वर्ण्यस्य नारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणं स्मृतम् ॥२४॥ तत्पश्चात् दक्षिणास्वरूप ब्राह्मण को दो गायें प्रदान करनी चाहिए। ऐसा महर्षि पाराशर का मत है। यदि स्वेच्छा से चारों वर्ण की स्त्रियाँ चाण्डाल से सहवास करें तो एक कृच्छ्र और एक चान्द्रायण व्रत करने से उनकी शुद्धि हो जाती है ॥२४॥


१. पलमात्रं दुग्धभागं गोमूत्रं तावदिष्यते । घृतं च पलमात्रं स्याद् गोमयं तोलकद्वयम् ॥ दधिप्रसृतमात्रं स्यात् पञ्चगव्यमिदं स्मृतम् । अथवा पञ्चगव्यानां समानो भाग इष्यते ।' योषशकृद् द्विगुणं मूत्रं पयः स्यात्तच्चतुर्गुणम् । घृतं तद् द्विगुणं प्रोक्तं पञ्चगव्ये तथा दधि ॥—गौतमीतन्त्रे

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १०८ पाराशरस्मृतिः [ दशमो- यथा भूमिस्तथा नारी तस्मात्तां न तु दूषयेत् । बन्दिग्राहेण या भुक्ता हृत्वा बद्ध्वा बलाद् भयात् ॥२५॥ स्त्रियों को धरती के समान ही कहा गया है, इससे उनके दोषों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। जिस स्त्री के साथ बलपूर्वक उसे बाँधकर, दासी बनाकर या उसे भयभीत करके रमण किया गया हो ॥२५॥ कृत्वा सान्तपनं कृच्छ्रं शुद्ध्येत पाराशरोऽब्रवीत् । सकृद्भुक्ता तु या नारी नेच्छन्ती पापकर्मभिः ॥२६॥ तो ऐसी स्त्री सान्तपन कृच्छ्र व्रत के अनुष्ठान से दोषमुक्त हो जाती है। ऐसी बात पाराशर ने कही है। यदि किसी दुरात्मा ने स्त्री की अनिच्छा से केवल एक ही बार सम्भोग किया हो ॥२६॥ प्राजापत्येन शुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेन च । पतत्यर्द्धं शरीरस्य यस्य भार्या सुरां पिवेत् ॥२७॥ तो वह स्त्री प्राजापत्य व्रत और ऋतुकाल में रजोस्राव होने से ही शुद्धता को प्राप्त हो जाती है। जिस मनुष्य की पत्नी मद्यपान कर ले, तो उस पुरुष के शरीर का आधा अंश दूषित और पतित हो जाता है ॥२७॥ पतिताद्र्धशरीरस्य निष्कृतिर्न विधीयते । गायत्रीं जपमानस्तु कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥२८॥ इस प्रकार के पतितों की शुद्धि नहीं हो सकती। उसे गायत्री मन्त्र का जप और कृच्छ्र सान्तपन व्रत का अनुष्ठान करना उचित है ॥२८॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥२९॥ एक दिन गोमूत्र, दूसरे दिने गोबर, तीसरे दिन गाय का दूध, चौथे दिन दही, पाँचवें दिन घी, छठे दिन कुशा का जल पीकर और Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०९ सातवें दिन निर्जल उपवास करने का नाम ही कृच्छ्र-सान्तपन व्रत है ॥२९॥ जारेण जनयेद् गर्भं मृते त्यक्ते गते पतौ । तां त्यजेदपरे राष्ट्रे पतितां पापकारिणीम् ॥३०॥ जो स्त्री अपने पति के मरने, पति द्वारा त्यागे जाने और पति के विदेश गमन करने पर किसी पर-पुरुष द्वारा गर्भाधान कर ले तो उस पतिता नारी को किसी दूसरे राज्य में ले जाकर निर्वासित कर देना चाहिए ॥३०॥ ब्राह्मणो तु यदा गच्छेत् परपुंसा समन्विता । सा तु नष्टा विनिर्दिष्टा न तस्याऽऽगमनं पुनः ॥३१॥ यदि ब्राह्मण की पत्नी किसी पर-पुरुष के साथ चली जाय तो वह नष्टा कहलाती है, उसका पुनः आगमन नहीं होता ॥३१॥ कामान्मोहात्तु या गच्छेत् त्यक्त्वा बन्धून् सुतान् पतिम् । साऽपि नष्टा परे लोके मानुषेषु विशेषतः ॥३२॥ जो स्त्री अपने बन्धु, पुत्र और पति को छोड़कर काम या मोह के वशीभूत होकर किसी अन्य पुरुष के साथ चली जाय तो वह इहलोक तथा परलोक दोनों में नष्टा होती है ॥३२॥ मद-मोहगता नारी क्रोधाद् दण्डादिताडिता । अद्वितीया गता चैव पुनरागमनं भवेत् ॥३३॥ जो स्त्री मतवाली होकर या किसी प्रकार दण्डित होकर क्रोधवश कहीं अन्यत्र चली जाय तो उसका पुनरागमन हो सकता है ॥३३॥ दशमे तु दिने प्राप्ते प्रायश्चित्तं न विद्यते । दशाहं न त्यजेन्नारीं त्यजेन्नष्टश्रुतां तथा ॥३४॥ यदि ऐसी स्त्री को दस दिन तक लगातार बाहर ही रहना पड़े तो उसका प्रायश्चित्त नहीं होता। इसलिए स्त्री का दस दिनों तक परित्याग

११० पराशरस्मृतिः [ दशमो- नहीं करना चाहिए । त्याग कर देने से वह स्त्री स्वयं तो भ्रष्ट हो ही जाती है, साथ-ही-साथ ॥३४॥ भर्ता चैव चरेत् कृच्छ्रं कृच्छ्रार्द्धं चैव बान्धवाः । तेषां भुक्त्वा च पीत्वा च अहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥३५॥ उसके पति को भी एक कृच्छ्र और सम्बन्धी को आधा कृच्छ्र व्रत करना पड़ता है । यदि ऐसे व्यक्ति के घर भोजन ग्रहण किया जाय तो रात-दिन उपवास करने से शुद्धि प्राप्त होती है ॥३५॥ ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत् परपुंसा विवर्जिता । गत्वा पुंसां शतं याति त्यजेयुस्तां तु गोत्रिणः ॥३६॥ यदि ब्राह्मण की पत्नी घर छोड़कर कहीं अकेली गमन करे और सौ पुरुषों के पास जाकर भी लौट आये तो सगोत्रियों द्वारा ऐसी स्त्री का बहिष्कार किया जाना चाहिए ॥३६॥ पुंसो यदि गृहे गच्छेत्तदशुद्धं गृहं भवेत् । पति-मातृगृहं यच्च जारस्यैव तु तद्गृहम् ॥३७॥ यदि ऐसी स्त्री अपने पति के घर वापस आ जाय तो उसके पति का घर अशुद्ध हो जाता है । पतिगृह या पितृगृह में जाने पर भी वह घर उसके प्रेमी का ही माना जाता है ॥३७॥ उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात् पञ्चगव्येन ¹शोधयेत् । त्यजेच्च मृण्मयं पात्रं वस्त्रं काष्ठं च शोधयेत् ॥३८॥ ऐसे घर की शुद्धि के लिए उसकी भूमि की मिट्टी को कुछ खुरच- कर पञ्चगव्य द्वारा लेपन करे । घर में व्यवहृत होनेवाले मिट्टी के पात्रों को हटा दे, वस्त्र तथा काष्ठ को जल से धोकर शुद्ध कर ले ॥३८॥ सम्भाराञ्शोधयेत् सर्वान् गोवालैश्च फलोद्भवान् । ताम्राणि पञ्चगव्येन कांस्यानि दश भस्मभिः ॥३९॥ १. 'सेचयेत्' इति ।

प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १११ घर में काम आनेवाली और सभी चीजों को शुद्ध कर ले अर्थात् फल से निर्मित वस्तुओं को गोबालों से, ताँबे के पात्र को पंचगव्य से और काँसे आदि के बरतनों को दस बार भस्म लगाकर मलना चाहिए॥३९॥ प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹। गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥४०॥ ब्राह्मण जाति के लोगों को अन्य ब्राह्मणों के कथनानुसार प्रायश्चित्त करना उचित है। दो प्राजापत्य व्रत करने के पश्चात् दक्षिणा में ब्राह्मण को दो गायों का दान करना चाहिए ॥४०॥ इतरेषामहोरात्रं पञ्चगव्येन शोधनम्। उपवासैर्व्रतैः पुण्यैः स्नान-सन्ध्या-ऽर्चनादिभिः॥४१॥ ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग तो एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य द्वारा शुद्धि पा लेते हैं। उपवास, व्रत, पुण्य, स्नान, सन्ध्योपासन और देवपूजन आदि ॥४१॥ जप-होम-दया-दानैः शुद्ध्यन्ते ब्राह्मणादयः। आकाशं वायुरग्निश्च मेध्यं भूमिगतं जलम् ॥४२॥ जप, हवन, दया और दान द्वारा ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति शुद्ध हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी पर गिरा हुआ शुद्ध और स्वच्छ जल ॥४२॥ न मेदुष्यन्ति² दर्भाश्च यज्ञेषु चमसा यथा॥४३॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः॥१०॥ और कुशा कभी दूषित नहीं होता। जिस प्रकार यज्ञ का चमस पात्र (हव्य पात्र) कभी अशुद्ध नहीं होता उसी प्रकार ये भी सर्वदा शुद्ध माने गये हैं ॥४३॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' हिन्दीटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥ १. 'रुपपादयेत्' इति। २. 'दुष्यन्ति च' इति। Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

११२ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- ११. एकादशोऽध्यायः अमेध्य-रेतो गोमांसं चाण्डालान्नंमथापि वा । यदि भुक्तं तु विप्रेण कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥ १ ॥ जो ब्राह्मण अपनी इच्छा से किसी प्रकार का अग्राह्य पदार्थ, जैसे— मानव-अस्थि, विष्ठा, मूत्र, वीर्य, रज, शव आदि का भक्षण कर ले अथवा गोमांस या चाण्डाल का अन्न ग्रहण करे, तो उसे शुद्धि के निमित्त चान्द्रायण व्रत करना उचित है । और यदि उपर्युक्त वस्तुएँ किसी के द्वारा बलात् या अनिच्छापूर्वक ग्रहण की गयी हों तो ऐसी अवस्था में कृच्छ्रव्रत करना चाहिए ॥ १ ॥ तथैव क्षत्रियो वैश्योऽप्यर्द्ध चान्द्रायणं चरेत् । शूद्रोऽप्येवं यदा भुङ्क्ते प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ २ ॥ यदि क्षत्रिय या वैश्य कथित वस्तुओं का भक्षण कर ले तो उसे अर्ध-चान्द्रायण व्रत करना पड़ता है । शूद्र के द्वारा ग्रहण किये जाने पर प्राजापत्य नामक व्रत करना उचित है ॥ २ ॥ पञ्चगव्यं पिबेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चं पिबेद् द्विजः । एक-द्वि-त्रि-चतुर्गा वा सद्याद् विप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३ ॥ व्रतकाल में शूद्र को पञ्चगव्य और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णों को ब्रह्मकूर्च का पान करके क्रमशः एक, दो, तीन और चार गायों का दान करने का विधान कहा गया है ॥ ३ ॥ शूद्रान्नं सूतकान्नं च अभोज्यस्याऽन्नमेव च । शङ्कितं प्रतिषिद्धान्नं पूर्वोच्छिष्टं तथैव च ॥ ४ ॥ शूद्र का अन्न, सूतक का अन्न, ग्रहण के समय का अन्न, भक्षण के अयोग्य मनुष्य का अन्न, सन्दिग्ध अन्न अर्थात् जिसके ग्राह्य-अग्राह्य का निर्णय न हो सके, निषिद्ध अन्न और किसी के भक्षण के पश्चात् बचा हुआ जूठा अन्न, ॥ ४ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal