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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

[ ४ ] युगे युगे तु सामर्थ्यं शेषं मुनिविभाषितम् । पराशरेण चाप्युक्तं प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ( पारा०, श्लो० ३४, अ० १ ) कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च । द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥ ( पारा०, श्लो० २६, अ० १ ) इसमें मूल पाठ की शुद्धता प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर की गयी है । स्थान-स्थान पर पाठान्तर भी दिया गया है । मूलानुगामी सरल, सुललित एवं परिमार्जित हिन्दी टीका लिखी गयी है । इसमें विषयानुक्रमणिका तथा श्लोकानुक्रमणिका भी दी गयी है जिससे इसकी उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गयी है । अब तक पाराशर स्मृति का ऐसा सर्वोत्तम संस्करण कहीं से प्रकाशित है यह देखने में नहीं आया । इसकी सर्वोत्तम छपाई-सफाई एवं शुद्ध मुद्रण के लिए ठाकुरप्रसाद ऐण्ड सन्स के अधिकारी वर्ग धन्यवाद के पात्र हैं । इसके सम्पादन में बन्धुवर पं० हीरालालजी मिश्र, व्याकरणाचार्य से मुझे विशेष सहायता मिली है, इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ । इसका उद्घोषवचन जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्रीमद्देश्वरानन्दजी सरस्वती महाराज ने लिखने का कष्ट किया है, एतदर्थ उनका मैं हृदय से आभारी हूँ । यद्यपि इसके संशोधन-सम्पादन तथा हिन्दी व्याख्या का कार्य भी मैंने बड़ी सावधानी के साथ किया है, फिर भी मानव-दोष से सम्भव त्रुटियों के लिए ‘शूर्पवद् दोषमुत्सृज्य गुणान् गृह्णन्ति साधवः’ के अनुसार क्षमा-प्रार्थी हूँ । निर्जला एकादशी सी० के० ५।२६ ए०, भिखारी दास, } -शिवदत्त मिश्र शास्त्री वाराणसी-१

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उपोद्घात वचन

धर्म का स्वरूप अत्यन्त निगूढ है । ‘धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्’ ( महाभारत ) । वह वेदैक समधिगम्य है । ‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’ ( मीमांसा ) । वह मीमांसा शास्त्र अति गम्भीर और विपुल विशाल है । उसमें सहस्र अधिकरणों से धर्म की विवेचना की गयी है । ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस- सिद्धिः स धर्मः’ ( वैशे० दर्शन ) । धर्म प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से जानने की वस्तु नहीं है । ‘प्रत्यक्षेणानुमानेन यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एतं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥’ नास्तिक, जो वेद-निन्दक हैं, ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ ( मनु० ), अनेक कटाक्ष धर्म पर करते हैं । उनके नैयायिक वाचस्पति मिश्र, उदयनाचार्य आदि ने दुरूह युक्तियों से मुंहतोड़ उत्तर दिये हैं । धर्म के लिए प्रमुख प्रमाण सहस्र- शाखाओं से परिपूर्ण मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद, तदनुयायी ऋषियों से प्रणीत मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम, शङ्ख, लिखित, पराशर, व्यास प्रभृति स्मृतियाँ, पुराण, उपपुराण, महाभारत शिष्टाचार हैं । उनका अवगम सायण, उव्वट, महीधर आदि के भाष्य, निघण्टु, निरुक्त, हेमाद्रि, कमलाकर भट्ट, कुल्लूक, मिताक्षरा आदि निबन्ध और व्याख्याओं से होता है । व्याकरण, ज्योतिष आदि षडङ्ग, छहों दर्शन, उनके ऊपर विरचित भगवत्पाद शंकराचार्य, रामानुजाचार्य प्रभृति सम्मान्य आचार्यों के भाष्य हैं, जो धर्म का यथार्थ अवबोध कराते हैं । वचनों में सामान्य, विशेष, उत्सर्ग और अपवाद भाव, आपाततः विरोध प्रतीत होते हैं, पर त्रिकालवेत्ता, सम्पूर्ण परिस्थितियों के अभिज्ञ, राग-द्वेष- रहित, परमतपस्वी महायोगिराज, परम्परया अध्ययन-अध्यापन, आचरण से सम्पन्न समस्त शास्त्रों के आलोडन-मंथन करनेवाले कुमारिल, शबर स्वामी, पार्थसारथिमिश्र आदि महापण्डितों ने मीमांसा-परिशोधित न्यायों के

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[ ६ ] द्वारा पञ्चावयवों की पद्धति से एकवाक्यता कर धर्म का निर्णय किया है। धर्म का स्वरूप सनातन है। इसमें कभी कोई परिवर्त्तन नहीं होता। सृष्टि के प्रारम्भ में अरबों वर्ष पहले सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ने पूर्वपूर्वकल्पानुसार मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों का उपदेश अनुग्रह शरीर के द्वारा महर्षियों को दिया। वहाँ से यह परम्परा चली और यावत्संसार चलती रहेगी। इससे यथापूर्व जो टकरायेगा वह चूर्ण-विचूर्ण हो जायेगा। रावण, वेन रगड़े गये। हजारों वर्ष वह धर्म विधर्मियों से लड़ता रहा, उसका बाल बाँका नहीं हुआ। उसके साथ खेल करना अच्छा नहीं। उसका रक्षक परमेश्वर है, उसके पास अपार बल है, सोते सिंह को जगाना कल्याणकर नहीं। अस्तु, पराशरस्मृति सामने है। यह कलि के लिए अन्तिम स्मृति है। 'कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः। द्वापरे शंख-लिखिताः कलौ पाराशरा स्मृताः॥' ( पराशरस्मृति ) सत्ययुग में मनु, त्रेता में गौतम, द्वापर में शंख, लिखित और कलि में पराशर अधिक सम्मान-भाजन हैं। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि दूसरे महर्षि उपेक्षणीय हैं। पराशरस्मृति में सभी वेदोक्त धर्म सन्निविष्ट हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज, सभी वर्ण, उपवर्ण, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, नर, नारी, राजा, प्रजा आदि के धर्म निरूपित हुए हैं। पातक, उपपातक, महापातकों का यथावत् विवेचन किया गया है। उनके प्रायश्चित्त निस्तार का उपाय कहा गया है। जननाशौच, मरणाशौच के नियम कहे गये हैं। किस समय कौन स्पृश्य या अस्पृश्य होता है इसका स्पष्ट विधान किया गया है। रजस्वला माता ही क्यों न हो चार दिन के लिए वह अस्पृश्य है। मेला, यात्रा, नौका, कृषि, विवाहादि के समय अस्पृश्यता नहीं ग्राह्य है। पूजा, भोजन के समय अनुपनीत सभी अस्पृश्य कहे गये हैं। स्वपाक की बड़ी महिमा है। स्व स्व वर्णों के साथ ही विवाह का विधान है। अन्यथा वर्णसंकर होकर भ्रष्ट सन्तान उत्पन्न होती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के यज्ञोपवीत संस्कार का पवित्र विधान है। बलिष्ठ, बुद्धिमान्, दीर्घायु सन्तानोत्पत्ति की विधि कही गयी है। चारित्र्य-

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ ७ ] रक्षण की विधि और उसके लाभ कहे गये हैं। श्राद्ध के विधान और उसके विशिष्ट गुण सयुक्तिक वर्णित हुए हैं। जन्म से जाति का सिद्धान्त और सत्कर्म तप से उसके उपबृंहण का जोरदार निरूपण है। ईश्वर, वेद, धर्म की मान्यता कही गयी है। राजा, प्रजा के सम्बन्ध का भली भाँति निरूपण है। शासन के धर्म से विमुख होने पर उपप्लव उत्पन्न होने का गहराई से वर्णन है। सत्य, शौर्य, तप, त्याग, धैर्य का विशेष माहात्म्य कहा गया है। समरांगण में निर्भय देहोत्सर्ग करना, देश, धर्म की रक्षा में सर्वस्व की बलि कर देना सबसे महान् धर्म कहा गया है। यह अपूर्व धर्म-ग्रन्थ है। इसकी बहुत बड़ी मान्यता है। इसके ऊपर पराशरमाधव नाम का एक भाष्य कहना चाहिए। माधवाचार्य ने गम्भीर विवेचनात्मक व्याख्यान बुक्कमहीपति के समय में ही लिख दिया है। यह ग्रन्थ सर्वगम्य नहीं है और आज दुष्प्राप्य है। श्री पण्डित शिवदत्तमिश्र शास्त्री, व्याकरणाचार्य ने द्वादशाध्याया- त्मक इस महनीय स्मृति का राष्ट्रभाषा हिन्दी में व्याख्यान प्रणयन किया है। यह व्याख्या स्पष्ट, सरल, सुललित और सटिप्पण प्रकाशित हुई है। इसमें अन्यान्य अनुसन्धान भी दिये गये हैं जिनसे इसकी गरिमा और उदीप्त हो उठी है। ग्रन्थकर्त्ता ने, जो अनेक ग्रन्थों के रचयिता तथा व्याख्यान-निर्माता हैं, इस व्याख्या के साथ विषय-श्लोकानुक्रमणिका आदि देकर सर्वगम्य कर दिया है। त्रुटि होना मनुष्य-स्वभाव-सिद्ध है। ‘मर्त्यैरसर्वविदुरैर्विहिते क्व नाम स्याद्दोषलेशविरहः सुचिरन्तनेऽपि।’ गुणग्रहणैकपक्षपाती विद्वान् इसपर ध्यान नहीं देकर इसकी उपादेयता बढ़ायेंगे। मेरा शुभाशसन है कि यह ग्रन्थकर्त्ता और इनका व्याख्यान यशस्वी हो और इसकी उत्तरोत्तर अभिवृद्धि तथा प्रसार हो। धर्मसंघ, दुर्गाकुण्ड,
वाराणसी } —महेश्वरानन्द सरस्वती वैशा. शु. ८, सं. २०२६ / [ ऊर्ध्वाम्नाय काशीपीठाधीश्वर, अनन्त- श्रीविभूषित, जगद्गुरु शङ्कराचार्य ] Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१. प्रथम अध्याय | आदि की शुद्धि, रजस्वला-स्पर्श से

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri विषयानुक्रमणिका विषय पृष्ठांक १. प्रथम अध्याय | आदि की शुद्धि, रजस्वला-स्पर्श से धर्म के सूक्ष्म रूपों का निरूपण, | प्राप्त होनेवाले अशौच की निवृत्ति । ६८-७८ ब्राह्मणोंके लिए षट्कर्म, युग-धर्म, | ८. अष्टम अध्याय आतिथ्यकर्म-द्वारा होनेवाली फल- | गोहत्याके पाप का प्रायश्चित्त तथा प्राप्ति का कथन । १-१९ | प्राजापत्य व्रत का विधान । ७८-८९ २. द्वितीय अध्याय | ९. नवम अध्याय गार्हस्थ्य धर्म का विवेचन तथा | जाने या अनजाने में गाय-बैल कृषक द्वारा अनजान में हुए पापों | आदि पशुओं का मरण होने पर के निराकरण का साधन । १९-२४ | उसके प्रायश्चित्त का निर्देशन ३. तृतीय अध्याय | तथा कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत का जननाशौच तथा मरणाशौच का | निरूपण । ८९-१०२ वर्णन, सगोत्रीकी शुद्धि का विधान, | १०. दशम अध्याय प्रसूताकी शुद्धिका कथन तथा वीर | चान्द्रायण तथा कृच्छ्र सान्तपन पुरुषों की गति का विवेचन । २४-३६ | व्रत की विधि, अगम्या स्त्री से ४. चतुर्थ अध्याय | समागम एवं पशुमैथुनका प्रायश्चित्त आत्महत्या का प्रायश्चित्त, तप्त- | तथा चारों वर्णों का शुद्धी- कृच्छ्र नामक व्रत का विधान तथा | करण । १०३-१११ स्त्रियों के लिए पातिव्रत्य धर्म का | ११. एकादश अध्याय पालन । ३६-४४ | किसी अभोज्य पदार्थ के भक्षण की ५. पञ्चम अध्याय | शुद्धि, विजातीय वर्णों से उत्पन्न भेड़िये, कुत्ते आदि जानवरों के | होनेवाली सन्तान की संज्ञा, ब्राह्मण काटने पर शुद्धीकरण का विधान, | के लिए शूद्रान्न ग्रहण की विधि अग्निहोत्री के मरण में दाह-कर्म | तथा प्रायश्चित्त का विधान, की क्रिया । ४५-५० | कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र आदि व्रतों का ६. षष्ठ अध्याय | उल्लेख । ११२-१२४ जीवहिंसा में प्रायश्चित्त-कर्म का | १२. द्वादश अध्याय विधान, चाण्डाल-संसर्ग से उत्पन्न | अज्ञाततावश मल-मूत्रादि के भक्षण- दोषोंका निराकरण, कृमि दोषका | पान के दोष का निवारण, आत्म- शुद्धीकरण तथा दूषित अन्न की | हत्या के असफल प्रयास की शुद्धि, शुद्धि का निरूपण । ५०-६८ | विविध प्रकार के स्नानादि का ७. सप्तम अध्याय | माहात्म्य तथा ब्रह्महत्यादि पापों विविध प्रकार के द्रव्यों, पात्रों | का प्रायश्चित्त । १२४-१४० Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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श्रीमात्रे जयन्त्यै नमः पाराशरस्मृतिः 'शिवदत्ती' भाषाटीकासहिता ✤ ✤ १. प्रथमोऽध्यायः अथाऽतो हिमशैलाग्रे देवदारुवनालये। व्यामेकाग्रमासीनमपृच्छन् ऋषयः पुरा ॥ १ ॥ साम्ब शिवं नमस्कृत्य धारावाहिक-संस्कृतेः । पाराशरस्मृतेष्टीका भूयात् सज्ज्ञानहेतवे ॥ प्राचीन काल में हिमालय पहाड़ की चोटी पर, जहां देवदारु वन है, एकान्त में बेठे हुए वेदव्यासजी से महर्षियों ने पूछा ॥ १ ॥ मानुषाणां हितं धर्मं वर्तमाने कलौ युगे। शौचाचारं यथावच्च वद सत्यवतीसुत ! ॥ २ ॥ हे सत्यवती सुत महर्षि व्यासजी ! इस वर्तमान कलिकाल में मनुष्यों का हितकारी धर्म, शौच तथा आचार क्या है ? उसे आप कहिए ॥ २ ॥ तच्छ्रुत्वा ऋषिवाक्यं तु स-शिष्योऽग्न्यर्कसन्निभः । प्रत्युवाच महातेजाः श्रुति-स्मृति-विशारदः ॥ ३ ॥ श्रुति तथा स्मृतियों में विशारद, वेदव्यासजी, उस समय शिष्यों के सहित इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो ज्वाला से अग्नि प्रदीप्त हो रहा हो, अथवा किरणों से सूर्य देदीप्यमान होता हो, ऐसे वेदव्यास- जी ने महर्षियों के वचन सुनकर कहा ॥ ३ ॥

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२ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- न चाहं सर्वतत्त्वज्ञः कथं धर्मं वदाम्यहम् । अस्मत्पितैव प्रष्टव्य इति व्यासःसुतोऽवदत् ॥ ४ ॥ हे महर्षियो ! मैं कलि के सम्पूर्ण धर्म-कर्मों का तत्त्व जाननेवाला नहीं हूँ। यद्यपि मुझे कलि के धर्म सामान्य पितृ-प्रसाद से ज्ञात है, अतः हम लोगों को पिता पराशर के पास ही चलकर यह प्रश्न करना उचित है, ऐसा पराशरसुत व्यासजी ने कहा ॥ ४ ॥ ततस्ते ऋषयः सर्वे धर्मतत्त्वार्थकांक्षिणः । ऋषिं व्यासं पुरस्कृत्य गता बदरिकाश्रमम् ॥ ५ ॥ व्यासजी के इस प्रकार कहने पर कलि के सभी धर्मतत्त्वों की जिज्ञासा से महर्षि वेदव्यास को आगे कर, बदरिकाश्रम गये ॥ ५ ॥ नानापुष्प-लताकीर्णं फल-पुष्पैरलङ्कृतम् । नदी-प्रस्रवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम् ॥ ६ ॥ बदरिकाश्रम, अनेक प्रकार की पुष्पवाली लताओं से, फल एवं पुष्पों से समन्वित है, अनेक नदियाँ तथा झरने जिसमें बह रहे हैं, तथा जिसका जल तीर्थों से अत्यन्त पवित्र है, ॥ ६ ॥ मृगपक्षि-निनादाढ्यं देवतायतनावृतम् । यक्ष-गन्धर्व-सिद्धैश्च नृत्य-गीतैरलंक्रतम् ॥ ७ ॥ जिसमें अनेक प्रकार के जंगली जीव मृग और पक्षिगण निर्भीक होकर मनोहर शब्द कर रहे हैं, जो अनेक देव-मन्दिरों से अलंकृत है तथा यक्ष, गन्धर्व और सिद्धों के नाच-गान जहाँ परमात्मा की प्राप्ति के लिए हो रहे हैं ॥ ७ ॥ तस्मिन्नृपिसभामध्ये शक्तिपुत्रं पराशरम् । सुखासीनं महातेजा मुनिमुख्यगणावृतम् ॥ ८ ॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३ उस बदरीवन में ऋषि-सभा के बीच शक्ति के पुत्र महर्षि पराशर१ बैठे हुए थे, वे उस समय प्रधान-प्रधान मुनियों से घिरे हुए थे ॥ ८ ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा व्यासस्तु ऋषिभिः सह । प्रदक्षिणाऽभिवादैश्च स्तुतिभिः समपूजयत् ॥ ९ ॥ उनको देखकर महर्षि वेदव्यास ने ऋषियों के सहित हाथ जोड़- कर, उनकी प्रदक्षिणा की, पश्चात् अभिवादन और स्तुति कर उनकी पूजा की ॥ ९ ॥ अथ सन्तुष्टहृदयः पराशरमहामुनिः । आह सुस्वागतं ब्रूहीत्यासीनो मुनिपुङ्गवः ॥ १० ॥ महर्षि वेदव्यास के इस प्रकार विनय, प्रदक्षिणा, अभिवादन एवं स्तुति से सभा के मध्य में बैठे हुए महर्षि पराशर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने व्यासजी का सुस्वागत एवं कुशल पूछा ॥ १० ॥ कुशलं सम्यगित्युक्त्वा व्यासः पृच्छत्यनन्तरम् । यदि जानासि मे भक्तिं स्नेहाद् वा भक्तवत्सल ! ॥११॥ १. 'पराशूताः शरा यस्मात् राक्षसानां वधार्थिनाम् । अतः पराशरो नाम ऋषिश्छक्तो मनीषिभिः ।' अन्यच्च — 'परस्य कामदेवस्य शराः सम्मोहनादयः । न विद्यन्ते यतस्तेन ऋषिश्छक्तः पराशरः ॥' अन्यत्रापि— 'परेषु पापचित्तेषु नादत्त कोपलक्षणम् । शरं यस्मात्ततः प्रोक्तः ऋषिरेव पराशरः ॥ परं मातुर्निजाया यदुदरं तदयं गतः । ऋचमुच्चार्य निर्भद्य निरगात् स पराशरः ॥'

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ४ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- व्यासजी ने भी अपने पिता से कुशलादि कहकर उनसे पूछा— हे भक्तवत्सल ! यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं अथवा मुझमें पुत्रवत्सलता के कारण अधिक स्नेह रखते हैं, तो ॥ ११ ॥ धर्मं कथय मे तात ! अनुग्राह्यो ह्यहं तव । श्रुता मे मानवा धर्मा वासिष्ठाः काश्यपास्तथा ॥१२॥ हे महर्षे ! मुझे आप धर्म का लक्षण बताइए, क्योंकि मैं आपका शिष्य तथा पुत्र होने के कारण अनुग्रह का पात्र हूँ। मैंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, ॥ १२ ॥ गार्गीया गौतमीयाश्च तथा चौशनसाः स्मृताः । अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादङ्गिरसस्तथा ॥ १३ ॥ गर्ग, गौतम, उशनस (शुक्र), अत्रि, विष्णु, संवर्त्त, दक्ष, अंगिरस, ॥ १३ ॥ शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च । आपस्तम्बकृता धर्माः शङ्खस्य लिखितस्य च ॥१४॥ शतातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख लिखित, ॥ १४ ॥ कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसान्मुनेः । श्रुत्वा ह्येते भवत्प्रोक्ताःश्रौतार्था मे न विस्मृताः ॥ १५॥ कात्यायन तथा प्राचेतस् से निर्मित धर्मशास्त्रों को आपसे सुन लिया है, वे सभी श्रुतिसम्मत धर्मशास्त्र हैं, अभी वे मुझे विस्मृत नहीं हुए हैं ॥ १५ ॥ अस्मिन् मन्वन्तरे धर्माः कृत-त्रेतादिके युगे । सर्वे धर्माः कृते जाताः सर्वे नष्टाः कलौ युगे ॥१६॥ उनको इसी मन्वन्तर के सतयुग, त्रेता तथा द्वापरादि युगों के लिए महर्षियों ने निर्माण किया है, यद्यपि देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म, वयधर्म, गुणधर्म, शरीरधर्म, कालधर्म, आपद्-धर्म से धर्म के अनेक Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

तीन, द्वापर में दो तथा कलि में एक पाद ही अवशिष्ट रहता है।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५ भेद हैं और वे कृतयुग में उत्पन्न हुए हैं, पर अब वे सभी धर्म इन कलिकाल में नष्ट हो गये हैं, क्योंकि कृत में धर्म के चार चरण, त्रेता में तीन, द्वापर में दो तथा कलि में एक पाद ही अवशिष्ट रहता है। इसलिए अधिकांश नष्ट हो चुके हैं ॥ १६ ॥ चातुर्वर्ण्यसमाचारं किञ्चित् साधारणं वद । चतुर्णामपि वर्णानां कर्त्तव्यं धर्मकोविदैः ॥ १७ ॥ अतः कलि में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के सदाचार और उनकी शक्ति से होनेवाले साधारण धर्म को आप कहिए ॥ १७ ॥ ब्रूहि धर्मस्वरूपज्ञ सूक्ष्मं स्थूलं च विस्तरात् । व्यास-वाक्यावसानेषु मुनिमुख्यः पराशरः ॥ १८ ॥ यद्यपि धर्म के अनेक लक्षण हैं, जैसे नैयायिक के मत में ‘विहित- कर्मजन्यो धर्मः’, ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’, ‘चोदनालक्षणो धर्मः,’ ‘विद्वद्भिः सेवितः पन्था नित्यमद्वेषरागिभिः’, हृदयेनाभ्यनुज्ञातः यो धर्मः’ इस प्रकार धर्म के अनेक लक्षण होते हुए भी हे महर्षे, आप वास्तविक धर्म के स्वरूप को साक्षात् करनेवाले हैं, अतः हे धर्म- स्वरूपज्ञ ! चारों वर्णों के मध्य में धर्मज्ञों के द्वारा किये जानेवाले स्थूल और सूक्ष्म धर्म को सविस्तर आप मुझसे कहिए (धर्म का स्थूल रूप जिसे मन्दमति भी कर सकते हैं, जैसे सन्ध्या-वन्दनादि, सूक्ष्म रूप जिसे सब न समझ पायें, जैसे ‘द्रौपदी-विवाहादि’ यह धर्म लोक और वेद से विरुद्ध होने के कारण केवल पण्डित ही समझ पाते हैं) ॥ १८ ॥ धर्मस्य निर्णयं प्राह सूक्ष्मं स्थूलं च विस्तरात् । वक्ष्यमाण-धर्मतत्त्व-ग्रहणाय श्रोतृसावधानतां विधत्ते— शृणु पुत्र ! प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनयस्तथा ॥ १९ ॥ इस प्रकार व्यास के कहने पर महर्षि पराशर ने धर्म के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों का निर्णय कर, विस्तारपूर्वक अपने पुत्र तथा महर्षियों से कहा कि हे पुत्र तथा हे महामुनियो ! सुनो ॥ १९ ॥

६ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- कल्पे कल्पे क्षये सत्या ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । श्रुति-स्मृति सदाचार-निर्णेतारश्च सर्वदा ॥२०॥ कल्प-कल्प में जब सृष्टि का क्षय हो जाता है, उस समय धर्म विनष्ट होने पर भी बीजरूप से अवस्थित रहता है । अतः प्रलय के बाद जब सृष्टि होती है तो ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर ही सदैव धर्म का निर्णय किया करते हैं । ( कल्प दो प्रकार का होता है—प्रथम कल्प, दूसरा महाकल्प । प्रथम कल्प ब्रह्मा का एक दिन का होता है, उस समय सृष्टि के निमित्तभूत महदादि का विनाश हो जाता है । दूसरा महाकल्प है, जिसमें ब्रह्मदेव की आयु समाप्त हो जाती है, उस महाकल्प में ब्रह्मदेव का भी नाश हो जाता है । पुराणों में चार प्रकार का प्रलय कहा है : १. नित्य प्रलय, २. नैमित्तिक प्रलय, ३. प्राकृत प्रलय, ४. आत्यन्तिक प्रलय । इनमें नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलय ऊपर कल्प और महाकल्प के रूप में कहा जा चुका है । जीवों का नित्य विनाश ही नित्य प्रलय कहा जाता है और जब जीव ज्ञान के द्वारा परमात्मा में विलीन हो जाता है, तो उसे आत्यन्तिक लय कहते हैं । इस प्रकार चार प्रकार के प्रलयों का वर्णन कूर्म पुराण में वर्णित है ) ॥ २० ॥ न कश्चिद् वेदकर्ता च वेदं स्मृत्वा चतुर्मुखः । तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पान्तरेऽन्तरे ॥२१॥ धर्म का उद्गम स्थान वेद है, सृष्टि के प्रलय के अनन्तर जिस प्रकार वेद का अनादित्व है उसी प्रकार प्रवाह-परम्परा से धर्म भी अनादि है । वेद की अनादिता से धर्म की अनादिता सिद्ध होती है । वेद का कोई कर्त्ता नहीं है, सृष्टि के आदि में ब्रह्मा-परमेश्वर वेद पढ़- कर धर्म का स्मरण करते हैं और प्रत्येक कल्प के मनुओं को उसका उपदेश करते हैं । पश्चात् प्रत्येक मन्वन्तर में मनु सर्व-साधारण के लिए धर्मोपदेश करते है । प्रति युग में धर्म की विभिन्नता होने के कारण धर्मान् यह बहुवचन निर्देश है ॥ २१ ॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७ अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे युगे । अन्ये कलियुगे नॄणां युगरूपाऽनुसारतः ॥२२॥ कृतयुग में धर्म का प्रकार दूसरा है। इसी प्रकार त्रेता तथा द्वापर में भी धर्म के अन्य-अन्य प्रकार हैं। कलि में धर्म का प्रकार अन्य है। युगभेद होने से मनुष्यों की शक्ति का उपचय तथा ह्रास होने के कारण भिन्न-भिन्न युगों के मनुष्यों के धर्म भी भिन्न-भिन्न हैं। युग-युग में सामर्थ्य-भेद होने के कारण धर्म भी भिन्न हो गये हैं ॥२२॥ तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते । द्वापरे यज्ञमेवाऽऽहुर्दानमेव कलौ युगे ॥२३॥ कृतयुग में तपःप्रधान धर्म, त्रेता में ज्ञान-प्रधान धर्म, द्वापर में यज्ञप्रधान धर्म तथा कलि में दानप्रधान धर्म का लक्षण कहा गया है ॥ २३ ॥ कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः । द्वापरे शंखलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः॥२४॥ सत्युग में मनुस्मृति, त्रेता में गौतमस्मृति, द्वापर में शंख-द्वारा लिखित स्मृति और कलि में तो पराशर स्मृति ही प्रधान मानी गयी है ॥ २४ ॥ त्यजेद् देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् । द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्ता तु कलौ युगे ॥२५॥ सतयुग में अधर्म होने पर देश का त्याग, त्रेता में अधर्म होने पर उस गाँव का त्याग, द्वापर में केवल उस कुल का त्याग तथा कलि में केवल अधर्म करनेवाले का ही त्याग किया जाता है। युगभेद से धर्म-भिन्न हो जाता है ॥ २५ ॥ कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च । द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥२६॥

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- सत्युग में पतित से संभाषण करने से, त्रेता में पतित का स्पर्श करने से, द्वापर में पतित का अन्न खाने से पुरुष पतित होता है, किन्तु कलि में पतित से सम्भाषणादि व्यवहार करने पर भी पतित नहीं होता, कलि में वह तभी पतित होता है जब पतित होने के योग्य बधादि पाप स्वयं करे ॥ २६ ॥ कृते तात्क्षणिकः शापस्त्रेतायां दशभिर्दिनैः । द्वापरे चैकमासेन कलौ संवत्सरेण तु ॥२७॥ सत्युग में शाप उसी क्षण फल देता है, त्रेता में दश दिन, द्वापर में एक महीना तथा कलि में एक वर्ष के भीतर शाप का फल होता है ॥ २७ ॥ अभिगम्य कृते दानं त्रेतास्त्राहूय दीयते । द्वापरे याचमानाय सेवया दीयते कलौ ॥२८॥ सत्युग में गुरु आदि के पास जाकर दान किया जाता था । त्रेता में प्रतिग्रहीता को स्वयं बुलाकर, द्वापर में माँगने पर दान दिया जाता था, किन्तु कलियुग में तो माँगने पर भी कोई उसे दान नहीं देता । कलि में उसीको दान दिया जाता है, जो दाता की सेवा करे ॥ २८ ॥ अभिगम्योत्तमं दानमाहूयैव मध्यमम् । अधमं याचमानाय सेवादानं तु निष्फलम् ॥२९॥ उपर्युक्त दान के निमित्त भेद होने से क्रमानुसार फलभेद भी होता है, जैसे जो दान सत्पात्र के घर स्वयं जाकर दिया जाता है वह दान 'उत्तम', है। पात्र को अपने घर बुलाकर जो दान दिया जाता है वह 'मध्यम', माँगने पर जो दान दिया जाये वह 'अधमदान' है, किन्तु जो दान सेवा की दृष्टि से दिया जाता है उस दान का कोई फल नहीं होता ॥ २९ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९ जितो धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं चैवानृतेन च । जिताश्चौरैश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥३०॥ कलि की यह विशेषता है कि इस युग में अधर्म, धर्म को जीत लेता है। झूठ सत्य पर विजयी होता है। चोर लोग राजा को अपने वश में कर लेते हैं तथा स्त्रियां पुरुषों को जीत लेती हैं। कलि में धर्म का एक ही पाद रह जाता है, तीन पाद नष्ट हो जाते हैं—यही धर्म की पराजय है, और अधर्म की विजय है ॥ ३० ॥ सीदन्ति चाऽग्निहोत्राणि गुरूपूजा प्रणश्यति । कुमार्य्यश्च प्रसूयन्ते तस्मिन् कलियुगे सदा ॥३१॥ इस युग में अधर्म के बढ़ने से कोई अग्निहोत्र न करेगा । गुरुपूजा भी श्रद्धा न होने से विनष्ट हो जाती है, इस कलियुग में बिना ब्याही ( ७ या ८ वर्ष की ) कन्याओं के द्वारा सन्तान की उत्पत्ति होगी ॥३१॥ कृते त्वस्थिगताः प्राणास्त्रेतायां मांसमाश्रिताः । द्वापरे रुधिरं चैव कलौ त्वन्नादिषु स्थिताः ॥३२॥ सत्युग में प्राण अस्थिगत रहते हैं, त्रेता में मांस में, द्वापर में रुधिर में तथा कलि में प्राण अन्नादि में अवस्थित रहते हैं। अतः कलि में सत्युग, त्रेता एवं द्वापर का धर्मानुष्ठान असम्भव है ॥ ३२ ॥ युगे युगे च ये धर्मास्तत्र तत्र च ये द्विजाः । तेषां निन्दा न कर्त्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः॥३३॥ युग-युग में जो धर्म हैं, तथा युग-युग में जो ब्राह्मण हैं उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धर्म तथा ब्राह्मण युग के प्रतीक हैं ॥ ३३ ॥ युगे युगे तु सामर्थ्यं शेषं मुनिविभाषितम् । पराशरेण चाऽप्युक्तं प्रायश्चित्तं विधीयते ॥३४॥

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१० पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- युग-युग में महर्षियों ने तथा महर्षि पराशर ने पापों का प्रायश्चित्त सामर्थ्यानुसार ही कहा है ॥ ३४ ॥ अहमद्यैव तत्सर्वमनुस्मृत्य ब्रवीमि वः । चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वन्तु ऋषिपूङ्गवाः ॥३५॥ पराशरजी ने महर्षियों से कहा—हे महर्षियो ! युगानुसार होने- वाले चारों वर्णों के आचार तथा धर्म को स्मरण कर कह रहा हूँ, आप लोग उसे सुनें ॥ ३५ ॥ पराशरमतं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् । चिन्तितं ब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥३६॥ महर्षि पराशर के द्वारा वेदार्थ को विचारकर कहा गया यह वर्णाश्रमाचार अत्यन्त पुण्य, पवित्र तथा पाप का नाशक है। यह विशेषकर धर्म के संस्थापन तथा ब्राह्मणों के हित की दृष्टि से कहा गया है ॥ ३६ ॥ चतुर्णामपि वर्णानामाचारो धर्मपालकः । आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मः पराङ्मुखः ॥३७॥ सदाचार चारों वर्णों के धर्म का पालक है। इसलिए जो सदाचार का पालन नहीं करते, उनसे धर्म विमुख हो जाता है ॥ ३७ ॥ षट्कर्माभिरतो नित्यं देवताऽतिथि पूजकः । हुतशेषं तु भुञ्जानो ब्राह्मणो नावसीदति ॥३८॥ यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान एवं प्रतिग्रह इन छह कर्मों में लगा रहनेवाला, देवता तथा अतिथि की पूजा करने- Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११ वाला तथा पाकयज्ञ ( बलिवैश्वदेव, होम तथा गोग्रासादि ) से शेष भोजन करनेवाला¹ ब्राह्मण कभी दुःखी नहीं होता ॥ ३८ ॥ सन्ध्या स्नानं जपो होमो देवतानां च पूजनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवं च षट्कर्माणि दिने दिने ॥३९॥ ब्राह्मण का साधारण धर्म कहकर उसका आह्निक धर्म कहते हैं। सन्ध्या, स्नान, जप, होम, देवपूजन, अतिथि-सत्कार तथा वैश्वदेव- ये छह धर्म ब्राह्मण को नित्य करना चाहिये ॥ ३९ ॥ इष्टो वा यदि वा द्वेष्यो मूर्खः पण्डित एव वा । सम्प्राप्तो वैश्वदेवान्ते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥४०॥ बलिवैश्वदेव कर लेने पर भोजन के पूर्व यदि गृहस्थ के घर इष्ट ( सखा, सम्बन्धी, बान्धव ), द्वेष्य (शत्रु), मूर्ख अथवा पण्डित आ जाय तो उसका स्वागत-सत्कार करने से स्वर्ग प्राप्त होता है ॥ ४० ॥ दूराच्चोपगतं श्रान्तं वैश्वदेव उपस्थितम् । अतिथिं तं विजानीयान्नाऽतिथिः पूर्वमागतः ॥४१॥ १. ब्राह्मण-लक्षण— सत्यं दानं तपः शौचमानृशंस्यं दामो घृणा । दृश्यन्ते यत्र विप्रेन्द्र ! स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः । काम क्रोधौ वशी यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः । स्वय धर्मेण चरति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ योऽध्यापयेदधीते वा याजयेद् वा यजेत वा । दद्याद् वा यथाशक्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ क्षमा दया च विज्ञानं सत्य चैव दमः शमः । अध्यात्मनिरतिर्ज्ञानमेतद् ब्राह्मणलक्षणम् ॥

१२ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- रास्ते में दूर से चलकर थका हुआ भूखा-प्यासा व्यक्ति यदि वैश्वदेव काल में गृहस्थ के घर उपस्थित हो जाये तो उसे ही अतिथि कहते हैं। प्रातःकाल वैश्वदेव के पूर्व घर पर आनेवाला व्यक्ति अतिथि नहीं कहा जाता ॥ ४१ ॥ नैकग्रामीणमतिथिं संगृह्णीत कदाचन । अनित्यमागतो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥४२॥ तिथि-विशेष तथा लाभ-विशेष की अपेक्षा न रखकर भूख और प्यास से पीड़ित व्यक्ति यदि वैश्वदेव के अन्त में गृहस्थ के घर आ जाय तो उसे ही आतथि कहते हैं। उसके आने का कोई क्रम निश्चित न होने से ही वह अतिथि है। पर जिसमें गृहस्थ रहता हो, उसी गांव का भूख- प्यास से पीड़ित व्यक्ति वैश्वदेव के अन्त में उपस्थित होने पर भी अतिथि नहीं है ॥ ४२ ॥ अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं पूजयेत् स्वागतादिना । तथाऽऽसनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च ॥४३॥ रास्ते में थके हुए भूखे-प्यासे अतिथि को वैश्वदेवकाल में घर आने पर गृहस्थ उससे सुस्वागत पूछे। तत्पश्चात् उसकी पूजा करे, फिर अर्घ्य, आसन देकर उसका पादप्रक्षालन करे ॥ ४३ ॥ श्रद्धया चाऽन्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चाऽनुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद् गृही ॥४४॥ फिर श्रद्धा से भोजन कराकर प्रेमपूर्वक उससे कुशल-मंगल पूछे। जब वह जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे कुछ दूर तक अनुगमन करे (जाये)। इस प्रकार तथा अन्य प्रकार के उपचारों से उसे प्रसन्न करे ॥४४॥ अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहाद् प्रतिनिवर्तते । पितरस्तस्य नाऽश्नन्ति दशवर्षाणि पञ्च च ॥४५॥

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३ जिसके घर पर आया हुआ अतिथि अन्नादि सत्क्रिया के अभाव से निराश होकर लौट जाता है, उस गृहस्थ के पितर १५ वर्षों तक उसका अन्न ग्रहण नहीं करते ॥ ४५ ॥ काष्ठभारसहस्रेण घृतकुम्भशतेन च । अतिथैर्यस्य भग्नाशस्तस्य होमा निरर्थकः ॥४६॥ जिस गृहस्थ के घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसका हजारों मन काष्ठ एवं सैकड़ों घड़े घृत से किया गया होम भी व्यर्थ ही है ॥४६॥ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं सुपात्रे निक्षिपेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥४७॥ जिस प्रकार उत्तम खेत में बीज बोने से विनष्ट नहीं होता, प्रत्युत उत्तम फल देता है अथवा सुपात्र में धन को धरोहर रखने से जिस प्रकार वह सुरक्षित रहता है। उसी प्रकार गृहस्थ को सत्पात्र में अन्नादि दान करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है ॥ ४७ ॥ न पृच्छेद् गोत्रचरणे न स्वाध्यायं श्रुतं तथा । हृदये कल्पयेद् देवं सर्वदेवमयो हि सः ॥४८॥ गृहस्थ अपने घर पर वैश्वदेव के अन्त में आये हुए उस अतिथि का गोत्र तथा शाखा न पूछे। उसका स्वाध्याय तथा श्रुत (शास्त्रश्रवण) भी न पूछे। उसे अपने हृदय में देवता ही समझे, क्योंकि अतिथि सर्वदेवमय होता है ॥ ४८ ॥ अपूर्वः सुव्रती विप्रो ह्यपूर्वश्चाऽतिथिस्तथा । वेदाभ्यासरतो नित्यं त्रयोऽपूर्वे दिने दिने ॥४९॥ उत्तम व्रत करनेवाला यति, वेदाभ्यास में निरत ब्रह्मचारी तथा अतिथि ये तीनों अपूर्व हैं - इनका गृहस्थ प्रतिदिन स्वागत, अर्घ्यादि- दान से पूजन करे ॥ ४९ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १४ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- वैश्वदेवे तु सम्प्राप्ते भिक्षुके गृहमागते । उद्धृत्य वैश्वदेवार्थं भिक्षां दत्त्वा विसर्जयेत् ॥५०॥ वैश्वदेव काल में यदि भिक्षुक (संन्यासी) घर पर आ जाय तो पाक में से वैश्वदेव के लिये अलग अन्न निकालकर संन्यासी को भिक्षा देकर बिदा कर देना चाहिये। पश्चात् वैश्वदेव आदि क्रिया कर भोजन करे ॥ ५० ॥ यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्न-स्वामिनावुभौ । तयोरन्नमदत्त्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥५१॥ संन्यासी और ब्रह्मचारी दोनों पक्वान्न के अधिकारी हैं। इन दोनों को बिना अन्न दिये ही जो भोजन कर लेता है, उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिये ॥ ५१ ॥ दद्याच्च भिक्षात्रितयं परिव्राड् ब्रह्मचारिणाम् । इच्छया च ततो दद्याद् विभवे सत्यवारितम् ॥५२॥ ब्रह्मचारी एवं संन्यासी को भिक्षा का तिगुना देना चाहिये। (ग्रासमात्र तु भिक्षा स्यात्) इसके बाद यदि ऐश्वर्य अधिक हो तो अधिक भी दिया जा सकता है। उसमें कोई रोक नहीं है ॥ ५२ ॥ यतिहस्ते जलं दद्याद् भैक्ष्यं दद्यात् पुनर्जलंम् । तद् भैक्ष्यं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम् ॥५३॥ संन्यासी के घर आ जाने पर प्रथम जल, पश्चात् भिक्षा तथा तदुपरान्त जल देना चाहिए। इस प्रकार दी गयी भिक्षा सुमेरु के तुल्य तथा समुद्र के समान हो जाती है ॥ ५३ ॥ यस्यच्छत्रं हयश्चैव कुञ्जरारोहमृद्धिमत् । ऐन्द्रस्थानमुपासीत तस्मात् तं न विचारयेत् ॥५४॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १५ जिस संन्यासी को छत्र, घोड़ा तथा हाथी आदि उत्तम वाहन हों तथा इन्द्रासन के समान शुभ स्थान हो उस संन्यासी की पूजा करनी चाहिए। इसमें कोई विचार न करे ॥ ५४ ॥ वैश्वदेवकृतं पापं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् । न हि भिक्षुकृतं दोषं वैश्वदेवो व्यपोहति ॥ ५५ ॥ बलिवैश्वदेव की क्रिया में यदि कोई त्रुटि रह जाय तो उस त्रुटि को भिक्षु-सम्मान दूर कर सकता है। किन्तु यदि भिक्षु के सम्मान में कोई त्रुटि रह जाती है, तो उसे बलिवैश्वदेव भी दूर नहीं कर सकते ॥ ५५ ॥ अकृत्वा वैश्वदेवं तु ये भुञ्जन्ते द्विजातयः । तेषामन्नं न भुञ्जीत काकयोनिं व्रजन्ति ते ॥ ५६ ॥ जो द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) बिना बलिवैश्वदेव किये ही भोजन कर लेते हैं, उनका अन्न कदापि भोजन करने योग्य नहीं होता, और वे काकयोनि में जन्म लेते हैं ॥ ५६ ॥ अकृत्वा वैश्वदेवं तु भुञ्जन्ते ये द्विजाधमाः । सर्वे ते निष्फला ज्ञेयाः पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ ५७ ॥ जो पतित ब्राह्मण बिना बलिवैश्वदेव किये ही भोजन कर लेते हैं, उनके किये गये किसी भी सत्कर्म का फल नहीं होता। वे अशुचि ( अपवित्र ) नरक में जाते हैं ॥ ५७ ॥ वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन बहिष्कृताः । सर्वे ते नरकं यान्ति काकयोनिं व्रजन्ति च ॥ ५८ ॥ जो बलिवैश्वदेव नहीं करते और न अतिथि-सम्मान ही करते हैं, वे सभी नरक के भागी होते हैं और उन्हें कौवे की योनि मिलती है ॥ ५८ ॥