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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१३ निकला कि पंचमेश या नवमेश-इन दोनों में से किसी का भी सम्बन्ध यदि दशमेश से हो तो योगकारक होता है । किन्तु अन्य लोग बली का अर्थ केवल बलवान् लेते हैं । इस मतानुसार यदि कोई भी केन्द्रेश बलवान् है और किसी भी त्रिकोणेश से सम्बन्ध भी करता है तो राज योगकारक हुआ ॥ ४६ ॥ केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेक्ये तौ योगकारकौ । अन्यत्रिकोणपतिना संबन्धो यदि किं पुनः ॥४७॥ यदि किसी केन्द्र के स्वामी का दोनों त्रिकोणों में से एक के स्वामी के साथ ऐक्य हो (दोनों एक साथ हों) तो इस ऐक्य के कारण यह दोनों (परस्पर सम्बन्ध करने वाले त्रिकोणेश और केन्द्रेश) योग कारक हो जाते हैं। यदि केन्द्रनाथ एक त्रिकोणाधिपति से सम्बन्ध करे और साथ ही साथ दूसरे त्रिकोणपति से भी सम्बन्ध कर ले तो फिर कहना ही क्या है अर्थात् किसी एक केन्द्रनाथ का दोनों त्रिकोणेश से सम्बन्ध होना बहुत बड़ा राजयोग है। यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि यदि एक ही ग्रह केन्द्र और कोण का स्वामी हो तो वह स्वयं योगकारक हो जाता है । जैसे कर्क और सिंह लग्न वाले के लिये मंगल; मकर और कुंभ वाले के लिये शुक्र; वृष और तुला लग्न वाले के लिये शनि। ऐसा योगकारक ग्रह अपनी अन्तर्दशा में भाग्योदय करता है ॥ ४७ ॥ *मूल में शब्द "ऐक्य" है। अर्थात् एक साथ हों किन्तु यदि चारों प्रकार के सम्बन्ध में से एक भी प्रकार का सम्बन्ध हो तो हमारे विचार से वह काफ़ी है ।

४१४ फलदीपिका योगकारकसम्बन्धात्पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः । तत्तद्भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगिकं फलम् ॥४८॥ पहले बता चुके हैं कि केन्द्रपति और कोणपति का सम्बन्ध होने से दोनों ही ग्रह (केन्द्रपति और कोणपति) राजयोगकारक माने जाते हैं। ऐसे योगकारक ग्रह की महादशा में यदि किसी शुभ- ग्रह की अन्तर्दशा हो—तो चाहे यह शुभ ग्रह महादशानाथ से सम्बन्ध न भी करता हो तो भी शुभ-ग्रह की अन्तर्दशा भाग्योदय ही करेगी। अब यह बताते हैं कि यदि कोई ग्रह नैसर्गिक पाप-ग्रह हो (मंगल, शनि) तो भी—यदि वह योग कारक से सम्बन्ध करते हों तो क्या फल होगा। योगकारक से सम्बन्ध करने वाले पाप ग्रहों की अन्तर्दशा 'हो तो उसमें योगफल मिलता है। विशेष विवरण के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका पृष्ठ १२१ तथा १३६ ॥ ४८ ॥ • स्वदशायां त्रिकोणेशो भुक्तौ केन्द्रपतेः शुभम् । दिशेत्सोऽपि तथा नो चेदसंबन्धेऽपि पापकृत् ॥४९॥ यदि केन्द्रपति सम्बन्धयुक्त हो तो अपनी दशा में, कोणपति की अन्तर्दशा में शुभफल कारक होता ही है। इसी प्रकार त्रिकोणेश भी अपनी दशा में और केन्द्रपति की अन्तर्दशा में शुभ फल दायक होता है। यदि केन्द्रकोण पतियों का सम्बन्ध न हो तो उतना शुभ नहीं होगा। यदि दोनों शुभ हों तो इन दोनों का चाहे सम्बन्ध हो या न हो एक की महादशा दूसरे की अन्तर्दशा में प्रायः शुभ फल ही होगा। हमारे विचार से यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश में सम्बन्ध न हो और एक की महादशा में दूसरे की अन्तर्दशा हो तो दोनों ग्रहों के विषय में यह भी विचारना चाहिये कि वे केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी होने के अतिरिक्त अन्य

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१५ किन घरों के स्वामी हैं ? कहाँ बैठे हैं ? एक दूसरे से छठे, आठवें, बारहवें तो नहीं हैं ? बलवान् है या दुर्बल ? और तब जो निष्कर्ष आवे वह मानना चाहिये यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध नहीं है और केन्द्रेश अशुभ है तो पाप फल देगा ॥ ४९ ॥ केन्द्राधिपत्यदोषस्तु बलवान् गुरुशुक्रयोः । मारकत्वेऽपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥५०॥ पहले बता चुके हैं कि यदि केन्द्र का स्वामी शुभग्रह हो तो अच्छा नहीं । अब यह कहते हैं कि बृहस्पति और शुक्र यदि केन्द्र के स्वामी हों तो बहुत अधिक दोष हैं। यदि साथ ही साथ अर्थात् इन दोनों में से कोई केन्द्र का स्वामी तो हो ही—मारक स्थान अर्थात् द्वितीय या सप्तम में बैठा हो तो प्रबलमारक होता है ॥ ५० ॥ बुधस्तदनु चंद्रोऽपि भवेत्तदनु तद्विधः । पापाश्चेत्केन्द्रपतयः शुभदाश्चोत्तरोत्तरम् ॥५१॥ जैसे गुरु और शुक्र का केन्द्रेश होना और मारक स्थान में बैठना दोषयुक्त माना गया है वैसे ही बुध और चन्द्रमा को भी समझना चाहिये । अर्थात् बुध यदि केन्द्र का स्वामी हो तो शुभ नहीं होता और यदि केन्द्र का स्वामी होकर मारक स्थान में बैठा हो तो और भी खराब समझना चाहिये । इसी प्रकार चन्द्रमा का केन्द्रेश होना अच्छा नहीं और यदि चन्द्रमा केन्द्रेश होकर मारक स्थान में बैठ जाये तो और भी खराब है। किन्तु यदि पाप ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो वह शुभफल देने वाले होते हैं । सूर्य यदि केन्द्रेश हो तो उत्तम फल देगा । मंगल यदि केन्द्रेश हो तो और भी उत्तम फल देगा । और यदि शनि केन्द्रेश हो तो और भी अच्छा ॥ ५१ ॥

४१६ फलदीपिका यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ । नाथेनान्यतरस्यैव संबन्धाद्योगकारकौ ॥५२॥ यदि राहु या केतु केन्द्र में बैठा हो और त्रिकोणेश से सम्बन्ध करता हो तो योग कारक होता है । अथवा यदि राहु या केतु त्रिकोण में बैठा हो और केन्द्रेश से सम्बन्ध करता हो तो भी राजयोग कारक होता है ॥ ५२ ॥ तमोग्रहौ शुभारूढौऽसंबद्धौ येन केनचित् । अन्तर्दशानुरूपेण भवेतां योगकारकौ ॥५३॥ यदि राहु या केतु शुभग्रह की राशि और अच्छे स्थान में बैठे हों और किसी ग्रह से सम्बन्ध न करते हो तो अपनी अन्तर्दशा में शुभ फल देते हैं । यदि राहु या केतु का किसी से सम्बन्ध नहीं है और शुभ स्थान में है (केन्द्र या त्रिकोण में) तो इनकी महादशा में जब योग कारक ग्रह की अन्तर्दशा आवेगी तब शुभ फल होगा ॥ ५३ ॥ आरम्भो राजयोगस्य भवेन्मारकभुक्तिषु । प्रथयन्ति तमारभ्य क्रमशः पापभुक्तयः ॥५४॥ यदि किसी मारक ग्रह की अन्तर्दशा में राजयोग का आरम्भ हो तो उस दशाकाल में केवल राजपद की प्रसिद्धि हो जाती है— राजोचित ऐश्वर्य किंवा भोग आदि की प्राप्ति नहीं होती ॥ ५४ ॥ रन्ध्रस्थरन्ध्रेशकरन्ध्रनाथ- रन्ध्रत्रिभागाधिपमान्दिभेशाः ।

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१७ दुःखप्रदास्तेष्वपि दुर्बलो यः स नाशकारी स्वदशापहारे ॥५५॥ नीचे लिखे हुए ग्रह बहुत दुःख देने वाले होते हैं—(१) जो ग्रह आठवें घर में बैठा हो (२) जो ग्रह आठवें घर को देखता हो (३) अष्टमेश (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (५) जिस राशि में मान्दि हो, उसका स्वामी । कहने का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा में बहुत कष्ट देते हैं और इन ग्रहों में जो सबसे दुर्बल हो उसकी दशा या अन्तर्दशा में मृत्यु होती है ॥५५॥ भ्रष्टस्य तुङ्गादवरोहिसंज्ञा मध्या भवेत्सा सुहृदुच्चभागे । आरोहिणी निम्नपरिच्युतस्य नीचारिभांशेष्वधमा भवेत्सा ॥५६॥ पहले बताया जा चुका है कि किसी राशि के किस अंश पर कौनसा ग्रह परम उच्च होता है और किस राशि के किस अंश पर परम नीच होता है । उदाहरण के लिये मेष राशि के दस अंश पर सूर्य परम उच्च होता है और तुला राशि के दस अंश पर सूर्य परम नीच होता है । तो तुला के दस अंश से निकल कर जब तक मेष के दस अंश पर सूर्य नहीं पहुँचेगा तब तक उसे आरोही अर्थात् चढ़ता हुआ कहेंगे । अपने उच्च (ऊँचे) भाव की ओर जा रहा है इसलिये चढ़ता हुआ कहा और मेष के १० अंश को श्लोक ५४ की विस्तृत व्याख्या के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका । फलदीपिका के श्लोक के द्वितीय चरण में “कारक भुक्ति षु” यह लिखा था किन्तु लघुपाराशरी में इसी श्लोक में “मारक भुक्तिष” यह पाठ है जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । वही पाठ हमने इसमें शुद्ध कर दिया है ।

४१८ फलदीपिका पार कर जब तक तुला के दस अंश तक सूर्य न पहुँचे तब तक उसे अवरोही अर्थात् उतरता हुआ कहते हैं । अपनी नीच राशि की ओर जा रहा है इसलिये उतरता हुआ कहा । यदि किसी अवरोही ग्रह की दशा हो तो उत्तम नहीं; यदि किसी आरोही ग्रह की दशा हो तो उत्तम है । किन्तु चाहे अवरोही ही हो, दशा यदि ग्रह अपने मित्र के नवांश में या उच्च नवांश में हो तो उतनी ख़राब नहीं होती बल्कि यह कहना चाहिये कि साधारणतया अच्छी हो जाती है । लेकिन इसके विपरीत चाहे कोई ग्रह आरोही ही क्यों न हो, यदि वह नीच राशि या शत्रु राशि या नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो अधम होती है, उसकी दशा खराब जाती है । नीचे क, ख, ग इन तीन गुणों में सब में ग्रह अच्छा हो तो बहुत अच्छा फल । सब में तीनों क, ख, ग में खराब हो तो खराब फल । क, ख, ग में किसी में अच्छी स्थिति, किसी में ख़राब स्थिति तो तारतम्य के अनुसार मिश्रित फल । क (i) आरोही अच्छा (ii) अवरोही खराब ख (i) उच्च राशि अधिमित्र राशि अच्छा मित्र राशि (ii) नीच राशि अधिशत्रु राशि खराब शत्रु राशि ग (i) उच्च नवांश वर्गोत्तम नवांश उत्तम अधिमित्र या मित्र नवांश (ii) नीच नवांश अधिशत्रु या खराब शत्रु नवांश

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१९ “बृहत् जातक” के अष्टम अध्याय में इसे बहुत अच्छी तरह समझाया गया है। (क) यदि कोई ग्रह बहुत बलवान् हो या परमोच्च हो तो उसकी दशा सम्पूर्ण धन और आरोग्य को देने वाली होती है। (ख) यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में है और किंचित् बल युक्त भी है तो उसकी दशा पूर्णा कहलाती है। इसकी दशा--अन्त- र्दशा में धन वृद्धि होती है। (ग) यदि कोई ग्रह निर्बल हो तो उसकी दशा रिक्ता कहलाती है। रिक्ता दशा में स्वास्थ्य और धन की कमी रहती है और रोग तथा दरिद्रता की बहुतायत रहती है। (घ) यदि कोई ग्रह नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो अनिष्ट फला कहलाती है। इसमें शारीरिक और धन विषयक कष्ट होता है। (ङ) यदि कोई ग्रह अवरोही हो किन्तु मित्र या अधिमित्र नवांश में हो तो मध्या कहलाती है। इसमें किंचित् वृद्धि होती है ॥ ५६ ॥ शस्तगृहे शस्तांशे नीचे रिपुभेऽस्तसंस्थिते वाऽपि । तस्य दशा मिश्रफला दशापरार्धे फलप्रदा ज्ञेया ॥५७॥ चाहे कोई ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि में ही क्यों न हो-चाहे कोई ग्रह अस्त ही क्यों न हो यदि वह उत्तम भाव और उत्तम नवांश में हो तो उसकी दशा को मिश्र फला अर्थात् मिला-जुला फल देने वाली कहेंगे। वराहमिहिर के मत से उस ग्रह की दशा को मिश्र- फला कहते हैं जो ग्रह अपनी उत्तम राशि में हो (उच्च राशि या अपनी राशि में हो) किन्तु नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो उस ग्रह की दशा मिली-जुली होती है। कभी आरोग्य, कभी धन, कभी व्याधि, कभी दरिद्रता। मन्त्रेश्वर महाराज के मत से मिश्रफला का शुभ प्रभाव उत्तरार्द्ध में होता है ॥ ५७ ॥ तत्तद्भावात् व्ययस्थस्य तद्भावव्ययपस्य च । वीर्यहीनस्य खेटस्य पाके मृत्युमवाप्नुयात् ॥५८॥

४२० फलदीपिका यदि कोई ग्रह वीर्यहीन अर्थात् बलहीन हो तो उसकी दशा- अन्तर्दशा में मृत्यु होगी। किसकी ? जिस भाव से निर्बल ग्रह द्वादश में बैठा है उस भाव से जिसका विचार किया जाता है उसकी या, जिस भाव का दुर्बल ग्रह व्ययेश है, उस भाव से जिसका विचार किया जाता है उसकी। एक उदाहरण द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है। मान लीजिये कोई दुर्बल ग्रह द्वितीय का मालिक होकर नवम में बैठा है तो इसकी दशा-अन्तर्दशा में जातक के भाई की या पिता की मृत्यु हो सकती है। क्यों ? वह द्वितीयेश है। अर्थात् तीसरे घर का व्ययेश है। तीसरे घर से १२वाँ लग्न दूसरा घर हुआ इसलिए द्वितीयेश तृतीय स्थान का व्ययेश हुआ और ऊपर बताया जा चुका है कि जिस भाव का व्ययेश दुर्बल हो उस भाव का नाश होता है। तृतीय से भाई का विचार किया जाता है इसलिए बलहीन द्वितीयेश की दशा में भाई को कष्ट कहना । दूसरी बात जो इस श्लोक में बतायी है वह यह कि जिस भाव के व्यय स्थान में दुर्बल ग्रह बैठे उस भाव को भी कष्ट पहुँचाता है। ऊपर के उदाहरण में दशम से यदि पिता का विचार किया जाय तो नवम में दुर्बल ग्रह बैठा हुआ, दशम के व्यय में होने के कारण पिता को कष्ट पहुँचावेगा। नतीजा यह निकला कि दुर्बल ग्रह जिस भाव का व्ययेश हो उसका भी नाश करे और जिस भाव के व्यय में बैठे उसका भी नाश करे ॥ ५८ ॥ अब यह बताते हैं कि दशानाथ के गोचर से उसकी दशा के प्रभाव में क्या अन्तर होता है। दशापतिर्लग्नगतो यदि स्यात् त्रिषट्दशैकादशगश्च लग्नात् । तत्सप्तवर्गेऽप्यथ तत्सुहृद्वा लग्ने शुभो वा शुभदा दशा स्यात् ॥५६॥

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२१ जिस ग्रह की दशा हो वह गोचरवश लग्न में या लग्न से तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें यदि आवे तो उसकी दशा शुभ जाती है । या यदि दशानाथ लग्न से सप्तम में आता है तो भी दशा शुभ जाती है । यदि दशानाथ का मित्र गोचरवश लग्न में आवे या कोई शुभ ग्रह गोचरवश लग्न में जा रहा हो तो भी दशा अच्छी जाती है ॥ ५९ ॥ यावन्ति वर्षाणि दशा च सा स्यात्- चारक्रमात्तत्र दशापतिः सः । यत्र स्थितस्तद्भवनाद्विधोस्तु स्थितेः प्रकल्प्यं सदसत्फलं हि ॥६०॥ यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा जा रही है वह इस समय गोचरवश जन्मकालीन चन्द्रमा से किस स्थान पर है । जिस समय दशानाथ जन्मकालीन चन्द्रमा से उत्तम स्थानों पर रहेगा उस समय अच्छा प्रभाव दिखावेगा और जिस समय गोचरवश जन्म राशि से अनिष्ट स्थानों पर रहेगा उस समय अनिष्ट फल दिखावेगा ॥६०॥ दशाधिनाथस्य सुहृद्गृहस्थ- स्तदुच्चगो वाऽथ दशाधिनाथात् । स्मरत्रिकोणोपचयोपगश्च ददाति चन्द्रः खलु सत्फलानि ॥६१॥ चन्द्रमा जब गोचरवश नीचे लिखे किसी स्थान पर होता है तो शुभ फल दिखाता है । (क) दशानाथ के मित्र के घर में (ख)

४२२ फलदीपिका दशनाथ जिस राशि में होता है उस राशि में । (ग) दशनाथ जिस राशि में है उससे ३, ५, ६, ७, ९, १०, ११वें घर में ॥६१॥ उक्तेषु राशिषु गतस्य विधोः स राशिः । स्याज्जन्मकालभवमूर्तिधनादिभावः । तत्तद्विवृद्धिकृदसौ कथितो नराणां तद्भावहानिकृदथेतरराशिसंस्थः ॥६२॥ ऊपर के श्लोक में यह बताया गया है कि चन्द्रमा किन-किन स्थानों पर शुभ होता है। अन्य स्थानों पर अशुभ समझना चाहिये । शुभ स्थान जिस भाव में पड़े, वह यदि लग्न, धन लाभ आदि में हो तो उसकी वृद्धि होगी। उपर्युक्त प्रकार से चन्द्रमा जिस भाव में अशुभ हो वह अशुभ स्थान जन्मकुण्डली के जिस भाव में पड़े उस भाव की हानि होगी। मान लीजिये मेष लग्न है और दशनाथ बृहस्पति है जो धनु राशि में बैठा है तो बृहस्पति की उच्च राशि कर्क है इस कारण कर्क का चन्द्रमा शुभ होगा। ६१वें श्लोक में जो शुभ स्थान गिनाये हैं उनमें मकर नहीं है इस कारण मकर अशुभ स्थान हुआ । इसलिये कर्क राशि अर्थात् लग्न से चौथे भाव को चन्द्रमा बढ़ावेगा और मकर राशि अर्थात् लग्न से दशम भाव को चन्द्रमा कष्ट पहुँचावेगा ॥ ६२ ॥ सारावलीमुडुदशां च वराहहोरा- मालोक्य जातकफलं प्रवदेन्नराणाम् । प्रश्नोदयग्रहवशादथ वा स्वजन्म- राश्यादिना वदतु नास्त्यनयोर्विशेषः ॥६३॥ सारावली (यह कल्याण वर्मा विरचित फलित ज्योतिष का संस्कृत ग्रन्थ है), उडुदशा (उडदाय प्रदीप, उडुदशा या नक्षत्रदशा सम्बन्धी

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२३ फलित ज्योतिष का ग्रन्थ है) तथा वराहमिहिर रचित होराशास्त्र के आधार पर जातक की कुण्डली का फलादेश करना चाहिये । अथवा प्रश्न कुण्डली बना कर उससे फलादेश करे या जातक की जन्म राशि से विचार करें । इनमें कोई विशेष अन्तर नहीं आता । मन्त्रेश्वर महाराज के विचारानुसार जन्म कुण्डली के आधार पर जैसे सुचारु रूप से फलादेश किया जा सकता है वैसे ही जन्म राशि तथा प्रश्न- कुण्डली पर से भी—उतना ही अच्छा विचार किया जा सकता है । भावार्थ रत्नाकर के कुछ योग निचे दिये हैं :— धन योग विचार १. यदि दूसरे घर का स्वामी पाँचवें हो और पाँचवे घर का स्वामी दूसरे, अथवा दूसरे घर का स्वामी ग्यारहवें हो और ग्यारहवें का स्वामी दूसरे अथवा पाँचवें घर का स्वामी पाँचवें और नवें का स्वामी नवें घर में हो तो विशेष धन योग होता है । २. यदि द्वितीय और लाभ के स्वामियों के साथ अन्य भवन का स्वामी भी बैठा हो तो उतना धन योग नहीं होता —जितना केवल धनेश लाभेश के योग से होगा । यहाँ यह भी तारतम्य कर लेना चाहिये कि वह अन्य स्थान का स्वामी—जो धनेश, लाभेश के साथ बैठा है—कौन है । लग्नेश होगा तो शुभ ही होगा। चतुर्थेश यदि साथ में बैठ जाता है तो उत्तम है किन्तु यदि छठे, बारहवें या आठवें का स्वामी साथ में बैठ जावेगा तो धनेश लाभेश की एकत्र स्थिति के योग को भ्रष्ट करेगा । साथ ही यह भी विचार करना चाहिये कि पंचमेश, या नवमेश

४२४ फलदीपिका यदि धनेश लाभेश- दोनों जहाँ बैठे हों वहाँ हों तो धन योग को वृद्धि करेंगे-कमी नहीं करेंगे। ३. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के स्वामी पाँचवें या नवें घर के स्वामी से सम्बन्ध करें तो विशेष धन योग होता है किन्तु यदि दुःस्थानों के स्वामी (६. ८-१२ दुःस्थान माने जाते हैं) धनेश लाभेश तथा त्रिकोणेश से सम्बन्ध करें तो वह योग नष्ट होता है। ४. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक बारहव घर के मालिक के साथ बैठे हों या उससे सम्बन्ध करते हों तो धन योग नष्ट होता है। ५. यदि धनकारक बृहस्पति का धनाधीश (दूसरे घर के स्वामी) से सम्बन्ध हो अथवा बृहस्पति का बुध से भी सम्बन्ध हो तो धन योग होता है। ६. यदि लग्नेश लग्न में, धनेश धन में और लाभेश लाभ में बैठा हो तो विशेष धन योग होता है। ७. दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक दोनों लग्न में बैठे हों तो भी धन योग है। ८. यदि उन-उन भावों में उन-उन भावों के कारक बैठे हों तो जिस भाव में कारक बैठा हो उस भाव का फल थोड़ा होता है। * सर्वेषु भावस्थानेषु तत्तद्भावादिकारकः । विद्यते तस्यभावस्य फलम् स्वल्पमुदीरितम् ॥ ९. यदि चन्द्रमा सातवें का मालिक हो कर दूसरे घर में बैठा हो और चन्द्रमा के साथ अन्य कोई ग्रह न बैठा होतो नष्ट धन गया हुआ वापस आ जाता है

  • किस भाव का कौन ग्रह कारक है—या कौन से ग्रह कारक यह फलदीपिका के अध्याय १५ श्लोक १७ में बताया गया है।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२५ निर्धन योग विचार १. यदि प्रथम, चतुर्थ तथा नवम घर के मालिक ८वें घर में बैठे हों तो जन्म से ही दरिद्र होता है । २. दूसरे घर का स्वामी १२वें हो, १२वें घर का स्वामी दूसरे हो । ३. दूसरे का स्वामी बारहवें हो और बारहवें का स्वामी लग्न में और उनको मारक ग्रह देखता हो ४. पांचवें घर का मालिक छठे हो, नवें का मालिक अष्टम में हो और इन दोनों को मारक ग्रह देखते हों । ऊपर लिखे चारों योगों में जातक निर्धन होता है । विद्या विचार १. चतुर्थ में शुक्र हो तो गान विद्या विशारद होता है । २. यदि चौथे घर में बुध हो तो ज्योतिष शास्त्र विशारद हो । ३. यदि पांचवें घर में सूर्य हो या पाँचवें घर में राहु बुध हों तो जातक ज्योतिष में निपुण होता है या विष की चिकित्सा करने वाला चतुर वैद्य होता है। ४. (क) यदि दूसरे घर में सूर्य और बुध हो तो ज्योतिष विद्या विशारद हो, (ख) यदि इन दोनों ग्रहों को शनि देखता हो तो गणित शास्त्र में प्रवीण होता है । ५. यदि दूसरे गृह में सूर्य और मंगल हो तो तर्क शास्त्र विशारद हो । ६. यदि पाँचवें घर में सूर्य, बुध, शनि हों तो वेदान्त शास्त्र का अच्छा ज्ञाता हो । ७. यदि सूर्य और बुध एक साथ किसी केन्द्र कोण या लाभ

४२६ फलदीपिका में बैठे हों तो गणित शास्त्र में प्रवीण होता है। मूल में गणक शब्द आया है। इसका यह भी अर्थ होता है कि ज्योतिषी हो। ८. यदि दूसरे घर में शुक्र हो तो काव्य प्रेमी या कवि होता है। ९. यदि राहु पंचम में हो तो गूढ़ भाव जानने वाला हो अर्थात् ऐसी विद्याओं में पारंगत हो जो बहुत दुरूह हों यानी इतनी कठिन हो कि साधारणतया उनका मार्मिक अर्थ समझ में न आता हो। १०. चौथे घर में राहु हो तो माता की दीर्घ आयु होती है। ११. दूसरे घर में बृहस्पति हो तो जातक वेद और वेदान्त का अच्छा ज्ञाता हो। यदि कक या धनु या मीन का वृहस्पति हो तो अवश्य ही ऐसा होता है और ऐसे जातक का उसकी विद्वत्ता के कारण सभा, सोसाइटियों (समाज) में अच्छा आदर होता है। १२. यदि दूसरे घर का स्वामी और वृहस्पति केन्द्र या कोण में हो तो जातक विविध विद्याओं में विद्वान् हो । १३. दूसरे घर में मंगल हो तो जातक तर्क शास्त्र का पंडित हो। १४. अगर वहाँ (ऊपर के योग में) मंगल के साथ साथ चन्द्रमा हो तो जातक सूत्रों को जानने वाला हो । १५. यदि दूसरे घर में शनि हो तो जातक मूढ़ और दुष्ट होता है। वाणी १. यदि शनि दूसरे घर में हो तो जातक की वाणी स्पष्ट नहीं होती, उसकी भाषा भी शिष्ट नहीं होती । २. दूसरे घर में बृहस्पति हो या केतु हो तो चतुर और निपुण हो ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२७ ३. यदि दूसरे घर में सूर्य या मंगल हो तो जातक की वाणी प्रतिकूल हो । अर्थात् दूसरे की बात काटे । ४. चन्द्रमा दूसरे घर में हो तो जातक बहुत बोलता है । ५. दूसरे घर में बुध हो तो जानक युक्तियुक्त वाणी बोलेगा अर्थात् उसका भाषण चातुर्यपूर्ण होगा । ६. जिस जातक की जन्म कुण्डली में राहु दूसरे घर में होता है, उसकी वाणी में दीनता होती है । तीसरे भाव का विचार १. भाई बहन का विचार तीसरे घर के स्वामी, भ्रातृ कारक मंगल या मंगल के साथ बैठे हुये ग्रहों से करना चाहिए । २. यदि सूर्य, मंगल और तीसरे घर का स्वामी तीसरे में हो तो जातक साहसी और धीर होता है । ३. राहु, केतु तीसरे में हों तो जातक साहसी हो । ४. यदि तीसरे बुध हो तो मनुष्य धैर्यहीन हो । ५. यदि तृतीय भाव कमजोर हो लेकिन उसको बृहस्पति या मंगल देखते हों तो जातक के भाई होंगे । ६. बृहस्पति ग्यारहवें हो तो बड़े भाई से दुःख होता है ।* ७. यदि ग्यारहवें मंगल हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो बड़े भाई न होंगे । ८. तीसरे गृह का स्वामी छठे या आठवें हो तो भाइयों की समय से पहले मृत्यु हो अर्थात् भाई अल्पायु हों ।

  • बड़े भाई से अनबन या खटपट हो या बड़ा भाई जातक की कोई हानि करे या बड़ा भाई अल्पायु हो—यह सब ज्येष्ठ भ्रातृ- जनित दुःख कहलाता है ।

४२८ फलदीपिका ९. यदि क्षत्रियों की जन्मकुण्डली में दसवें घर का स्वामी तीसरे घर में हो तो राजयोग में न्यूनता करता है (पं० जवाहर लाल की जन्म कुण्डली में दसवें का मालिक तीसरे में था। संभवतः केन्द्र या कोण में होता तो उनको जल्दी राजयोग प्राप्त हो जाता)। पंडित जी ब्राह्मण थे। पहिले क्षत्रिय ही राजा होते थे इसलिये क्षत्रिय कहा। १०. यदि दूसरे और तीसरे घर के स्वामी एक साथ बैठे हो तो जातक उदार होता है। ११. दूसरे और तीसरे घर के मालिक से शनि का सम्बन्ध हो तो मनुष्य बहुत लोभी होता है। १२. यदि तीसरे घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें तो भाइयों की मृत्यु हो। अर्थात् वे अल्पायु हों। यदि वहां (छठे, ८, वें १२वें) शुभ ग्रह से युक्त तृतीयेश हो तो भाइयों की मृत्यु करावेगा किन्तु दीर्घ काल के बाद। चतुर्थ भाव (वाहन) का विचार १. यदि चौथे और नवें घर के स्वामी लग्न में हों तो यह भाग्य वृद्धि तथा सवारी* का योग उत्पन्न करते हैं। २. यदि बृहस्पति चौथे घर में हो या चौथे को देखता हो तो जातक को बहुत सुख प्राप्त होता है। ३. यदि चौथे घर का स्वामी और बृहस्पति केन्द्र या कोण में एक साथ हों तो जातक को सुख प्राप्त होता है।

  • पहिले सवारी का अर्थ होता था, हाथी, घोड़ा, पालकी, रथ इत्यादि अब सवारी का अर्थ है, स्कूटर, मोटर, जहाज़ आदि।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२९ ४. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ शुक्र चौथे घर में बैठा हो तो स्वल्प वाहन योग होता है। ५. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ शुक्र नवम, दशम या एकादश स्थान में बैठा हो तो बहुत वाहन योग करता है । ६. यदि कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र चौथे घर में हो तो बुध की दशा शुक्र की अन्तर्दशा में वाहन प्राप्त होता है । ७. यदि शुक्र सप्तम में हो तो जातक बहुत कामुक होता है । अर्थात् उसकी भोग लालसा प्रग्ल होती है । ८. यदि चौथे घर में शनि हो तो जातक कठोर हृदय होता है । किन्तु नये भवन में नहीं रहता और परदेश में रहता है। ९. यदि चौथे घर का स्वामी नवें घर में हो और नवें घर घर का स्वामी चौथे घर में हो तो यह भाग्य योग और वाहन योग भी उत्पन्न करते हैं । १०. यदि चौथे घर का स्वामी 'ग्यारहवें हो और ग्यारहवें घर का स्वामी चौथे हो तो भी ऊपर जो नं० ९ में फल बताया गया है वही फल होता है । ११. चौथे घर का मालिक पाँचवें और पाँचवें घर के मालिक चौथे हो तो भी भाग्य योग तथा वाहन योग होते हैं । १२. यदि चौथे घर का स्वामी लग्न में हो और लग्नेश चौथे घर में हो तो भी शुभ फल समझना चाहिए । १३. यदि पाँचवें घर का मालिक नवम में हो और नवम घर का मालिक पाँचवें हो तो भी यही फल हो । १४. यदि चौथे घर का मालिक चौथे और पाँचवें घर का मालिक पाँचवें हो तो भी भाग्य वाहन योग होता है । १५. यदि पाँचवें घर का मालिक लाभ में और लाभ का मालिक पाँचवें हो तो भी भाग्य योग करता है । लाभ ग्यारहवें घर को कहते हैं ।

४३० फलदीपिका १६. यदि पहले घर का स्वामी पहले घर में और नवम घर का स्वामी नवम में हो तो ऊपर लिखा हुआ शुभ योग होता है। १७. यदि पाँचवें घर का मालिक नवम में हो और नवम घर का मालिक दशम में हो तो भी यह योग होता है । पुत्र विचार १. यदि पाँचवें का स्वामी तथा बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो पुत्रों के लिए अच्छा योग है अर्थात् जातक के पुत्र होते हैं और उनसे सुख प्राप्त होता है । २. यदि पहले का स्वामी, पाँचवें का स्वामी और बृहस्पति केन्द्र या त्रिकोण में हों तो जातक को पुत्र सुख प्राप्त होता । शत्रु तथा रोग विचार जन्म कुण्डली में छठे घर से शत्रु और रोग का विचार किया जाता है, इसलिए भावार्थ रत्नाकर में "शत्रु रोगादितरंग" में निम्न- लिखित योग दिये हैं । पुस्तक का नाम भावार्थरत्नाकर है । रत्नाकर समुद्र को कहते हैं इसलिए विविध प्रकरणों को अध्याय या परिच्छेदों में न बाँटकर विविध विचारों को तरंगों में बाँटा है। १. अष्टमेश लग्न में हो तो शरीर रोगी रहे । २. यदि छठे घर का मालिक लग्न में हो तो अपनी जाति के लोग बाधा पहुँचाते हैं अर्थात् जातक से जाति के लोग शत्रुता की भावना रखते हैं और जातक को रोगों से भी बाधा रहती है । ३. यदि पहले तथा छठे के मालिक सूर्य के साथ हों तो ज्वर रोग से पीड़ित रहता है।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३१ ४. पहले और छठे के मालिक चन्द्रमा के साथ हों तो जल से भय हो । ५. पहले और छठे के, मालिक का मंगल से सम्बन्ध हों तो व्रण, घाव, शस्त्र से आघात, ग्रन्थि (ऐसा फोड़ा जिसमें गांठ पड़ जाय जैसे प्लेग आदि) का भय होता है । ६. पहले और छठे घर के मालिक बुध से युक्त हों तो पित्त रोग । ७. यदि पहले तथा छठे के मालिक बृहस्पति से युक्त हों तो शरीर स्वस्थ रहे, रोग न हो । ८. यदि पहले और छठे के मालिक शुक्र के साथ योग करें तो जातक की स्त्री के स्वास्थ्य के लिये खराब है । ९. यदि पहले और छठे के मालिक का शनि के साथ योग हो तो चोरों ओर चाण्डालों (नीच जाति के लोगों) से भय हो । १० यदि पहले और छठे के मालिक राह या केतु से सम्बन्ध करें तों सर्प, व्याघ्र आदि से भय हो । ११. यदि छठे का मालिक नीच ग्रह के साथ बारहवें घर में बैंठा हो और लग्न का स्वामी बलवान् हो तो रोग नाश होता है अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम रहता है । १२. यदि छठे घर का स्वामी लग्नेश से कमजोर हो और उस षष्ठेश का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जातक के शत्रु उसके मित्र हो जावेंगे । पत्नी विचार इस तरंग में पत्नी विचार दिया गया है । यदि स्त्री की कुण्डली में विचार करना हो तो नीचे दिये गये सिद्धान्तों पर पति का विचार करना चाहिए । इसमें यह तारतम्य करना आवश्यक

४३२ फलदीपिका है कि जहाँ एक से अधिक पत्नियाँ होने के योग बताए गये हैं वहाँ एक से अधिक पति होने का योग केवल उसी समाज की स्त्रियों को लागू होगा जिसमें बहु विवाह (जैसे पर्वतीय प्रदेशों में एक स्त्री के कई पति होते हैं) या जहाँ विधवा विवाह होता है वहीं लागू होगा। हिन्दू पुरुषों की कुण्डली में भी (अब एक पत्नी के रहते हुये पुरुष दूसरा विवाह नहीं कर सकता इस कारण) बहुत से योग अब लागू नहीं होंगे और बहुत सी जगह जहाँ बहुविवाह के योग दिये गये हैं विवाह न होकर एक से अधिक स्त्री से जातक का सम्बन्ध हो ऐसा योग घटित हो सकता है। प्राचीन ग्रन्थों में लिखे हुये फल, देश, काल, पात्र भेद से बदलते रहते हैं। १. यदि सातवें घर का मालिक शुक्र के साथ हो और क्रूर

  • सम्बन्ध से रहित हो (सम्बन्ध चार प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का एक साथ बैठना, एक-दूसरे की राशि में बैठना, एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखना, किसी ग्रह की राशि में बैठ कर उस ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखना) तो एक ही स्त्री होती है। २. यदि सातवें घर का मालिक पाप ग्रह से सम्बन्ध करे या दूसरे या सातवें घर में पाप ग्रह हों, या शुक्र लाभ में हो या नीच का हो या सातवें घर का मालिक छठे या बारहवें हों तो दूसरा विवाह होता है। ३. यदि लग्न में पाप ग्रह हो तो दूसरा विवाह हो। ४. यदि मंगल और शुक्र एक साथ दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें घर में बैठे हों और शुक्र कमजोर हो तो द्वितीय विवाह हो। ५. यदि मंगल दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें हो तो भी दो विवाह होते हैं। अन्य शास्त्रों में इसे मंगलीक दोष कहा गया है। इसलिए यदि जातक की स्त्री भी मंगलीक हो तो वह ज़िन्दा रहेगी और