फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०९ गुरुयुक्ते पाषण्डी शुक्रयुते नीचकामिनीसङ्गः । शनियुक्ते शनिपुत्रे कुष्ठव्याध्यर्दितश्च सोऽल्पायुः ॥१६॥ विषरोगी राहुयुते शिखियुक्ते वह्निपीडितो मान्दौ । गुलिकस्त्याज्ययुतश्चेत्तस्मिञ्जातो नृपोऽपि भिक्षाशी ॥१७॥ गुलिकस्य तु संयोगे दोषान्सर्वत्र निर्दिशेत् । यमकण्टकसंयोगे सर्वत्र कथयेच्छुभम् ॥१८॥ अब जन्म कुंडली में गुलिक के अन्य ग्रहों के साथ बैठने का फल बताते हैं। गुलिक जिस ग्रह के साथ बैठता है प्रायः उस ग्रह को दूषित करता है । सूर्य पिता का कारक है इसलिये यदि गुलिक सूर्य के साथ बैठे तो जातक के पिता को मार दे अर्थात् पिता अल्पायु हो; चन्द्रमा मातृ कारक है इसलिये यदि गुलिक चन्द्रमा के साथ बैठे तो जातक की माता को कष्ट करे; मंगल भ्रातृ कारक है इसलिये मंगल के साथ गुलिक बैठे तो भाई से वियोग करावे; बुध बुद्धि कारक है इस कारण बुध और गुलिक एक साथ बैठे तो जातक को उन्माद--पागलपन का रोग हो जाता है ॥१५॥ बृहस्पति धर्म कारक है; इस कारण यदि बृहस्पति और गुलिक एक साथ हों तो जातक पाखंडी होता है। शुक्र स्त्रीकारक है और यदि शुक्र तथा गुलिक एक साथ हों तो जातक नीच स्त्रियों के साथ समागम करता है। यदि गुलिक शनि के साथ हो तो जातक कुष्ठ, व्याधि आदि से पीड़ित और अल्पायु होता है ॥१६॥ यदि राहु और गुलिक एक साथ हों तो विष रोगी हो (किसी प्रकार के विष के शरीर में उत्पन्न होने से जो रोग होते हैं) । यदि केतु और गुलिक एक साथ हों तो जातक अग्नि से पीड़ित हो। यदि
६१० फलदीपिका जिस दिन जातक का जन्म हुआ है उस दिन 'मुलिक' त्याज्यकाल* में पड़े तो ऐसा जातक चाहे राजघराने में भी पैदा हुआ हो किन्तु भीख मांगता है—अर्थात् दरिद्र होता है ॥१७॥ *“त्याज्ययुते” मूल संस्कृत श्लोक में यह शब्द आया है। इसकी परिभाषा किसी ने नहीं की है कि त्याज्य (काल) से क्या अभि- प्राय है :— हमारे विचार से निम्नलिखित त्याज्यकाल हैं। (क) विषघटी—यदि मान लिया जावे कि प्रत्येक नक्षत्र में ६० घड़ी होती हैं तो अश्विनी ५० घड़ी से ५४ घड़ी भरणी २४ ,, २८ ,, कृत्तिका ३० ,, ३४ ,, रोहिणी ४० ,, ४४ ,, मृगशिर १४ ,, १८ ,, आर्द्रा २१ ,, २५ ,, पुनर्वसु ३० ,, ३४ ,, पुष्य २० ,, २४ ,, आश्लेषा ३२ ,, ३६ ,, मघा ३० ,, ३४ ,, पूर्वा फाल्गुनी २० ,, २४ ,, उत्तरा फाल्गुनी १८ ,, २२ ,, हस्त २१ ,, २५ ,, चित्रा २० ,, २४ ,, स्वाती १४ ,, १८ ,, विशाखा १४ ,, १८ ,, अनुराधा १० ,, १४ ,, ज्येष्ठा १४ ,, १८ ,,
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६११ दोषप्रदाने गुलिको बलीयान् शुभंप्रदाने यमकण्टकः स्यात् । अन्ये च सर्वे व्यसनप्रदाने मान्द्युक्तवीर्यार्द्ध बलान्विताः स्युः ॥१९॥ शनिवद्गुलिके प्रोक्तं गुरुवद्यमकण्टके । अर्धप्रहारे बुधवत्फलं काले तु राहुवत् ॥२०॥ मूल ५६ ,, ६० ,, पूर्वाषाढ २४ ,, २८ ,, उत्तराषाढ २० ,, २४ ,, श्रवण १० ,, १४ ,, धनिष्ठा १० ,, १४ ,, शतभिषा १८ ,, २२ ,, पूर्वाभाद्र १६ ,, २० ,, उत्तराभाद्र २४ ,, २८ ,, रेवती ३० ,, ३४ ,, (ख) व्यतीपात तथा वैधृति योग भी त्याज्य है (ग) भद्राकरण त्याज्य है (घ) क्षय तिथि (ङ) वृद्धि तिथि (च) कुलिक, अर्धयाम पातयोग विष्कुंभ और वज्र (छ) (i) परिघयोग का पूर्वार्ध (ii) गंड योग में ६ घड़ी (iii) व्याघात में ९ घड़ी त्याज्य काल यह सब हैं। परन्तु इस प्रकरण में नक्षत्र घटी, के त्याज्य काल लागू करने चाहिये ।
६१२ फलदीपिका कालस्तु राहुर्गु लिकस्तु मृत्यु- र्जीवातुकः स्याद्यमकण्टकोपि । अर्द्धप्रहारः शुभदः शुभाङ्क- युक्तोऽन्यथा चेदशुभं विदध्यात् ॥२१॥ , आत्मादयोऽधिपैर्युक्ता धूमादिग्रहसंयुताः । ते भावा नाशतां यान्ति वदतीति पराशरः ॥२२॥ धूमे सन्ततमुष्णं स्यादग्निभीतिर्मनोव्यथा । व्यतीपाते मृगभयं चतुष्पान्मरणं तु वा ॥२३॥ परिवेषे जले भीरुर्जलरोगश्च बन्धनम् । इन्द्रचापे शिलाघातः क्षतं शस्त्रैरपि च्युतिः ॥२४॥ केतौ पतनघाताद्यं कार्यनाशोऽशनेर्भयम् । एते यद्भावसहितास्तद्दशायां फलं वदेत् ॥२५॥ (i) गुलिक के संयोग से सर्वत्र दोष होते हैं । ऊपर बता चुके हैं कि छठे और ग्यारहवें भाव को छोड़कर जिस घर में गुलिक बैठता है उसके शुभ फल को नष्ट करता है—अशुभ फल को बढाता है । (ii) यम कंटक का फल यह है कि जिस ग्रह के साथ यम कष्टक बैठे उस ग्रह के शुभ फल को बढ़ावे-जिस भाव में यम कंटक बैठे उस भाव के शुभ फल में वृद्धि करे ॥१८॥ (iii) दोष युक्त करने में—अशुभ फल बढ़ाने में गुलिक बलवान् होता है । शुभ फल प्रदान करने में यम कंटक बली है । अन्य जो उपग्रह हैं वह दुष्ट फल देने वाले हैं किन्तु जितना दुष्ट फल मान्दि देता है अन्य ग्रह केवल उसका आधा दुष्ट फल देते हैं । मान लीजिये मान्दि
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१३ १६ आना अशुभ फल प्रदान करता है तो ‘काल’ ‘केतु’ आदि केवल आठ आना अशुभ फल देते हैं ॥१९॥ (iv) गुलिक का प्रभाव शनि के सदृश होता है। यमकंटक का बृहस्पति के सदृश। अर्धप्रहार का फल बुध की तरह समझना चाहिये और ‘काल’ का राहु के सदृश ॥२०॥ (v) काल का प्रभाव राहु के सदृश होता है । अर्थात् यदि किसी भाव में काल हो तो वही फल कहना जो उस भाव में यदि राहु रहता तो कहते । गुलिक साक्षात् ‘मृत्यु’ है। यमकंटक में बृहस्पति की भांति जीवन प्रदायिनी शक्ति है । जिस भाव में अधिक शुभ बिन्दु हों-उसमें यदि अर्धप्रहार बैठे तो शुभ फल प्रदान करता है । यदि अर्ध प्रहार ऐसे घर में बैठे जिसमें-सर्वाष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु न हों तो अर्धप्रहार शुभ फल नहीं करेगा ॥२१॥ (vi) पराशर ऋषि का कथन है कि लग्न आदि भाव और लग्नेश आदि भावेश जो भी धूम आदि उपग्रहों से युत होते हैं-वे नाश को प्राप्त होते हैं । अन्य उपग्रह क्रूर फल देने वाले हैं किन्तु यमकंटक शुभ फल देने वाला है, यह स्मरण रखना चाहिये ॥२२॥ (vii) ‘धूम’ जलन, उष्णता, अग्नि से भय और चित्त को व्यथा उत्पन्न करता है। ‘व्यतीपात’ सींग वाले जानवरों से भय और किसी चौपाये से मृत्यु कराने वाला होता है ॥२३॥ (viii) ‘परिवेष’ या परिधि जातक में जल से भय उत्पन्न करता है । अर्थात् जिसके लग्न में परिवेष या परिधि हो वह नदी या तालाब में घुस कर स्नान करने से डरेगा। ऐसे जातक को जल रोग (जलोदर या शरीर के किसी अन्य भाग में पानी इकट्ठा हो जाने की बीमारी) होने का भी अन्देशा होता है । जातक को बन्धन (गिरफ्तारी, जेल *संस्कृत में बृहस्पति को 'जीव' कहते हैं ।
६१४ फलदीपिका जाना) का भी भय होता है। इन्द्रचाप पत्थर से या शस्त्र से चोट लगवाता है या जातक किसी मकान, सवारी या पेड़ से गिर पड़े । (ix) उपकेतु पतन (गिरना) घात (चोट आदि) करता है। वज्र से भय होगा-अर्थात् ऐसे व्यक्ति पर बिजली गिरने का भय हो । ग्रह कार्य का नाश करने वाला उपग्रह है। (x) ऊपर जो फल बताये गये हैं वह किस दशा में होंगे ? क्योंकि उपग्रहों की तो दशा होती नहीं--जिस भाव में उपग्रह हों उस भावेश की दशा में उपग्रह का फल होगा । अर्थात् मान लीजिये कोई उपग्रह अष्टम में है तो अष्टमेश की दशा में इस उपग्रह का फल होगा ।२५॥ अल्पायुः कुमुखः पराक्रमगुणो दुःखी च नष्टात्मजः प्रत्यर्थिक्षुभितो विशीर्णमदनो दुर्मार्गमृत्युं गतं । धर्मादिप्रतिकूलताटनरुचिर्लाभान्वितो दोषवा- नित्येवं क्रमशो विलग्नभवनात्केतोः फलं कीर्तयेत् ॥२॥ उपकेतु यदि लग्न आदि द्वादश भावों में से किसी में हो तो भाव- फल क्रमशः निम्नलिखित है: (१) अल्पायु (२) खराब मुख हो (३) पराक्रमी (४) दुःखी (५) सन्तान नष्ट हो जावे (६) शत्रुओं से पीड़ित (७) पुंस्त्व में कमी हो जावे (८) दुर्भाग्य से मृत्यु को प्राप्त हो (९) धर्म से प्रतिकूलता (१०) घूमने फिरने का शौकीन (११) लाभ (१२) दोषवान् ॥२६॥ अप्रकाशाः संचरन्ति धूमाद्याः पंच खेचराः। क्वचित्कदाचिद्द्दृश्यन्ते लीकोपद्रवहेतवे ॥२७॥
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१५ धूम आदि पांच उपग्रह-धूम, व्यतीपात, परिवेष, इन्द्रचाप, उपकेतु- यह बिना दिखाई देते हुए ही आकाश में संचार करते हैं । अर्थात् जैसे सूर्य, चन्द्र आदि सात ग्रह दिखाई देते हैं उस प्रकार यह पाँच उप- ग्रह दिखाई नहीं देते । यह उपग्रह (धूम आदि) कभी-कभी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं । जब यह कहीं दिखाई दें तो समझिये कि लोक में कुछ उपद्रव होगा अर्थात् जिस देश में या प्रदेश में दिखाई दें उसमें कुछ दुर्घटना घटित होगी ॥२७॥ धूमस्तु धूमपटलः पुच्छर्क्षमिति केचन । उल्कापातो व्यतीपातः परिवेषस्तु दृश्यते ॥२८॥ कुछ लोग कहते हैं कि "धूम" धुएं का समूह है किन्तु अन्य लोगों के विचार से यह पूंछ वाला तारा या पुच्छल तारा है । उल्कापात तारे के गिरने की तरह व्यतीपात होता है । परिवेष-सूर्य या चन्द्रमा के चारों ओर गोल मंडल के रूप में दिखाई देता है ॥२८ लोके प्रसिद्धं यद्दृष्टं तदेवेन्द्रधनुः स्मृतम् । केतुश्च धूमकेतुः स्याल्लोकोपद्रवकारकः ॥२९॥ दिन में वर्षा के बाद (जैसे दोपहर में वर्षा समाप्त हो गई तो उसके बाद) आकाश में सात रंग का धनुष जो कभी-कभी दिखाई दे जाता है और जिसे लौकिक भाषा में इन्द्र धनुष कहते हैं-वही "इन्द्र चाप" है । 'केतु' धूम केतु को कहते हैं । यह लोक में उपद्रव- कारक है ॥२९॥ —————— यह केतु—राहु केतु वाले केतु से भिन्न है।
६१६ फलदीपिका गुलिकभवननाथे केन्द्रगे वा त्रिकोणे बलिनि निजगृहस्थे स्वोच्चमित्रस्थिते वा । रथगजतुरगाणां नायको मारतुल्यो महितपृथुयशास्स्यान्मेदिनीमण्डलेन्द्रः ॥३०॥ जिस घर में गुलिक है-उस घर का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो, बली हो, अपने घर या अपनी उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो जातक बहुत सुन्दर, यशस्वी और पृथ्वी का स्वामी होता है ॥३०॥
छब्बीसवाँ अध्याय गोचरफल सर्वेषु लग्नेष्वपि सत्सु चन्द्र- लग्नं प्रधानं खलु गोचरेषु । तस्मात्तदृक्षादपि वर्तमान- ग्रहेन्द्रचारैः कथयेत्फलानि ॥१॥ यद्यपि जन्म कुंडली में जन्म लग्न से, सूर्य को लग्न मानकर (अर्थात् सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर) या अन्यग्रह जिस राशि में हों-उन्हें लग्न मानकर विचार किया जा सकता है किन्तु गोचर फलादेश में चन्द्र लग्न की प्रधानता है । इसलिये-जिस समय का विचार करना हो उस समय चन्द्र राशि से (जिस जातक की कुंडली का विचार करना हो उसके जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो-उसको लग्न मानकर- इसे ही चन्द्र लग्न कहते हैं-उस चन्द्र लग्न से) कौन सा ग्रह कहाँ जा रहा है-वह शुभ फल करेगा या अनिष्ट फल करेगा-इसका विचार करना चाहिये ॥१॥ तेईसवें अध्याय में प्रत्येक ग्रह से तथा जन्म लग्न से गोचर का विचार अष्टक वर्ग द्वारा बतलाया गया है । अष्टक का अर्थ है आठ । लग्न तथा सात ग्रह-सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि इन आठों से विचार करके रेखा या बिन्दु लगाकर यह देखा जाता
६१८ फलदीपिका है कि आठ में से-कितनों से गोचरवश ग्रह अच्छा है-कितने से अनिष्ट है-अधिक से अच्छा और थोड़े ग्रहों से निकृष्ट हुआ तो परिणाम में शुभ, और यदि अधिक ग्रहों से-उनकी जन्मकालीन राशि स्थिति से गिनने पर अशुभ हुआ और थोड़े ग्रहों से शुभ तो परिणाम में अशुभ । चौबीसवें अध्याय में सूर्य राशि (जन्म कुंडली में सूर्य जिस राशि से बैठा है) से नवम राशि से पिता का विचार करना; चन्द्र राशि (जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस राशि में बैठा हो) से चतुर्थ राशि से माता का विचार करना, मंगल राशि (जिस राशि में जन्म कुंडली में मंगल बैठा हो) से तृतीय जो राशि हो उससे भाई का विचार करना. इस प्रकार सूर्य, लग्न, चन्द्र लग्न, मंगल लग्न आदि प्रत्येक ग्रह स्थिति को लग्न मान उससे नवीं, चौथी, तृतीय आदि राशियों से, गोचर विचार बतलाया गया है। अब छब्बीसवें अध्याय में चन्द्र लग्न को प्रधान मान- कर गोचर विचार क्यों बताया गया ? ऐसी शंका होना स्वाभाविक है । इसका कारण यह है कि चन्द्रमा मन है । वेदों में लिखा है “:चन्द्रमा मनसो जातः” चन्द्रमा उस विराट् पुरुष परब्रह्म परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुआ । अर्थात् मन का अधिष्ठाता चन्द्रमा है । अंग्रेजी में चन्द्रमा को लूना कहते हैं । लूना से ही लूनैसी शब्द बना है-जिसका अर्थ है पागलपन । मन विक्षिप्त हो जाने से पागलपन होता है । सुख-दुःख का अनुभव मन ही करता है। अन्य ग्रहों का प्रभाव- मनुष्य पर मन के द्वारा ही पड़ता है—इसीलिए वराहमिहिर ने अपने बृहज्जातक अध्याय २ श्लोक १ में लिखा है । मनस्तुहितगुः अर्थात् चन्द्रमा मन है । इसी कारण चन्द्र लग्न को गोचर फलादेश में प्रधान माना गया है । बहुत से जातकों की कुंडली में जन्म लग्न की अपेक्षा यदि चन्द्र लग्न बलवान् हो तो चन्द्र लग्न को ही लग्न मान कर फलादेश किया
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६१९ जावे तो विशेष ठीक बैठता है । उदाहरण के लिये निम्नलिखित कुंडली देखिये । जन्म लग्न चन्द्र लग्न [जन्म लग्न : लग्न ४ के; २ भाव ५ मं; ७ भाव १० रा; १० भाव १ बृ; ११ भाव २ बु चं सू; १२ भाव ३ शु श] [चन्द्र लग्न : लग्न २ सू बु चं; २ भाव ३ शु श; ३ भाव ४ के; ४ भाव ५ मं; ९ भाव १० रा; १२ भाव १ बृ] चन्द्रमा उच्च राशि में बैठा है ।' शनि की महादशा कर्क लग्न के विचार से सप्तमेश, अष्टमेश महामारक की दशा है किन्तु चन्द्र लग्न वृषभ है--उससे शनि नवम तथा दशम का स्वामी होकर योगकारक हो जाता है । इस कारण राजयोगकारक होने से शुभ फलप्रद होता है । शनि की महादशा में विलायत गये हैं और अच्छा द्रव्य कमाया हैं । यहाँ इस अध्याय में हम जन्म कुंडली का विचार नहीं कर रहे हैं—केवल गोचर का विचार किया जा रहा है किन्तु प्रसंगवश यह बताया जा रहा है कि—केवल गोचर विचार में ही नहीं अपितु जन्म कुंडली विचार में भी चन्द्र लग्न की प्रधानता है । वराहमिहिर आदि आचार्यों ने चन्द्र लग्न को जन्म लग्न के तुल्य ही प्रधानता दी है । जन्म लग्न से किस प्रकार विचार करना यह बतलाकर लिख दिया है कि इसी प्रकार चन्द्र लग्न से विचार करना ।
६२० फलदीपिका नवें अध्याय में मेष लग्न, वृष लग्न आदि का फल बतलाकर मंत्रेश्वर ने भी १३वें श्लोक में लिख दिया है कि—जो फल मेष, वृष आदि का बताया गया है—यदि जन्म के समय चन्द्रमा इस राशि में हो तो जो लग्न फल कहा गया है उसे चन्द्र लग्न पर भी लागू करना। उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति का सिंह लग्न है और चन्द्रमा मेष में है तो सिंह लग्न का फल है (जो नवम अध्याय में बताया गया है) वह तो लागू होगा ही, उसके अलावा जो ‘मेष’ का फल बताया गया है (अध्याय ९ श्लोक १) वह भी उस जातक पर लागू होगा क्योंकि मेष उसका चन्द्र लग्न है—अर्थात् मेष राशि में उसके जन्म के समय चन्द्रमा था। यह सब विस्तार से यहाँ इसलिये समझाया गया है कि जन्म कुंडली विचार में भी, चन्द्र लग्न को जन्म लग्न के समान ही महत्व दिया जाता है। अंग्रेजी, ज्योतिष में प्रायः जन्म लग्न से गोचर विचार किया जाता है। उदाहरण के लिये जन्म लग्न से द्वादश में पापग्रह गोचर से जा रहा है तो अधिक खर्च, द्रव्य की हानि आदि करावेगा। डाक्टर टकर जो अंग्रेजी ज्योतिष के विद्वान हैं, सूर्य लग्न से अर्थात् जिस मनुष्य की जन्म कुंडली का विचार कर रहे हैं उसकी कुंडली में सूर्य जिस राशि में बैठा है उसे जन्म लग्न बनाकर—उससे गोचर का विचार करते हैं। और उनकी गोचर विचार पद्धति में यह विशेषता है कि वह आकाश स्थित नक्षत्र (२७ नक्षत्रों के अलावा) अन्य बड़े तारागणों से—जन्म का कौन सा ग्रह किससे युति कर रहा था—इत्यादि का भी विचार करते हैं।* अस्तु, इस समय हम भारतीय गोचर पद्धति का विचार कर रहे हैं। ऊपर जो जन्म कुंडली (६१९ पृष्ठ पर दी गई है) उसमें जन्म कुंडली
- इस विषय में जिज्ञासु पाठक डाक्टर डब्ल्यू० जे० टकर लिखित The "Fixed Stars and Your Horoscope" देखें।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६२१ के साथ चन्द्र कुंडली भी दी गई है। इस अध्याय में चन्द्र लग्न से गोचर विचार बताया गया है—इस कारण मान लीजिये गोचर में मीन का शनि जा रहा है तो जन्म लग्न कर्क से मीन नवाँ हुआ किन्तु चन्द्र लग्न वृषभ से मीन ग्यारहवाँ हुआ—तो चन्द्र लग्न से ग्यारहवाँ होने के कारण इस अध्याय में जब गोचर से ग्यारहवाँ शनि कहा जावे तो चन्द्र लग्न से ही गणना समझनी चाहिये—जन्म लग्न से नहीं। बारंवार चन्द्र लग्न से यह नहीं लिखा जावेगा—इसलिये इस ओर विशेष ध्यान दिलाया जाता है। सूर्यः षट्त्रिदशस्थितस्त्रिदशषट्सप्ताद्यगश्चन्द्रमाः जीवस्त्वस्ततपोद्विपंचमगतो वक्रार्कजौ षट्त्रिगौ। सौम्यः षट्स्वचतुर्दशाष्टमगतः सर्वेऽप्युपान्तस्थिताः शुक्रः खास्तरिपून्विहाय शुभदस्तिग्मांशुवद्भोगिनौ ॥२॥ गोचर में, अर्थात् जिस समय का शुभाशुभ (शुभ या अशुभ) विचार करना है। उस समय का पंचांग देखकर यह निर्णय करना कि कौन सा ग्रह किस राशि में है। चन्द्र लग्न से निम्नलिखित स्थानों में ग्रह शुभ होते हैं: सूय ३, ६, १०, ११ चन्द्रमा १, ३, ६, ७, १०, ११ मंगल ३, ६, ११ बुध २, ४, ६, ८, १०, ११ बृहस्पति २, ५, ७, ९, ११ शुक्र १, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, १२ शनि ३, ६, ११ राहु ३, ६, १०, ११ केतु ३, ६, १०, ११
६२२ फलदीपिका उदाहरण के लिये पृष्ठ ६१९ पर जो चन्द्र कुण्डली (वृष राशि में चन्द्रमा है—इसलिये वृष से गणना की गई) दी गई है उसका विचार करना है । कर्क में जब सूर्य होगा तो वृषभ, मिथुन, कर्क इस प्रकार गोचर से सूर्य तृतीय होगा । यह शुभ है । इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये । लाभविक्रमखशत्रुषु स्थितः शोभनो निगदितो दिवाकरः । खेचरैः सुततपोजलान्त्यगैः व्यार्किभिर्यदि न विद्ध्यते तदा ॥३॥ ऊपर श्लोक में गोचर से प्रत्येक ग्रह के शुभ स्थान बताये गये हैं। इस नियम का एक प्रतिवाद है अर्थात् इस नियम के ऊपर एक दूसरा नियम और है—जो उस परिस्थिति को बतलाता है जिस हालत में श्लोक २ में लिखा हुआ नियम लागू नहीं होगा । वह यह है । श्लोक ३ से ८ तक यही अपवाद—विशेष नियम बताये गये हैं । सूर्य तृतीय में शुभ होगा किन्तु यदि नवें स्थान में चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु, केतु इन ग्रहों में से कोई ग्रह जा रहा हो तो सूर्य तृतीय में शुभ नहीं होगा । इसे वेध कहते हैं । सूर्य का पुत्र शनि है । चन्द्रमा का पुत्र बुध है । सूर्य तृतीय में जब हो तब नवम में शनि के अलावा कोई ग्रह हो तो सूर्य का वेध होता है । सूर्य का पुत्र शनि है । पिता पुत्र का या पुत्र पिता का वेध नहीं करता है । इसी कारण नवम में जो ग्रह वेध कारक बताये गये हैं उनमें शनि नहीं लिखा है । वेध का विचार हमने अपनी पुस्तक 'सुगम ज्योतिष प्रवेशिका' में लिखा है । उसे देखें । वेध के सम्बन्ध में दो विचार हैं । मान लीजिये कर्क का सूर्य वृषभ से तृतीय है । अब 'नवम' कहाँ से गिनना ? वृष राशि (जहाँ जन्म कुंडली में चन्द्रमा है वहाँ) से नवम गिनना या
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२३ गोचर में सूर्य कर्क राशि में है, तो कर्क से नवम गिनना ? दोनों परिपाटी प्रचलित हैं। नारद का मत है कि वृषभ से ही नवम गिनना। इस पुस्तक में यही परिपाटी मानी गई है। वृषभ से नवम मकर हुआ। तो जिस समय सूर्य गोचर से कर्क में है उस समय शनि के अलावा कोई ग्रह मकर में हो तो सूर्य का वेध होने के कारण तृतीय सूर्य का शुभ फल नहीं होगा। बुध सूर्य से २८ अंश से अधिक आगे पीछे नहीं रहता। शुक्र सूर्य से ४८ अंश से अधिक आगे-पीछे नहीं जा सकता। इस कारण जब कर्क में सूर्य होगा तो बुध या शुक्र मकर में हो ही नहीं सकते। परन्तु बताना यह था कि शनि के अलावा अन्य ग्रह सूर्य का वेध करते हैं इसलिये अन्य सब ग्रह लिख दिये गये हैं। अब सूर्य के गोचर स्थान तथा वेध स्थान नीचे दिये जाते हैं। शुभ गोचर स्थान ३, ६, १०, ११ वेध स्थान ९, १२, ४, ५ गोचर में एकादश सूर्य शुभ होता है। जन्म कुंडली में वृषभ में चन्द्रमा है। वृषभ से एकादश मीन राशि होती है। मीन में जब सूर्य गोचर से आवेगा (प्रति वर्ष १३ मार्च से १३ अप्रैल तक सूर्य मीन में होता है) तब शुभ होगा किन्तु यदि वृषभ से पंचम (क्योंकि ऊपर ११ के नीचे ५ लिखा है-इसका अर्थ हुआ कि जब चन्द्र राशि से सूर्य एकादश हो तो वेध स्थान चन्द्र राशि से पंचम होगा) कन्या में शनि के अलावा कोई ग्रह हो तो वेध होने से तृतीय सूर्य का जो शुभ फल गोचर का है वह नहीं होगा। द्यूनजन्मरिपुलाभखत्रिगः चन्द्रमाः शुभफलप्रदः सदा ।
६२४ फलदीपिका स्वात्मजान्त्यमृतिबन्धुधर्मगे विध्यते न विबुधैर्यदि ग्रहैः ॥४॥ चन्द्रमा के शुभ गोचर स्थान १, ३, ६, ७, १०, ११, वेध स्थान ५, ९, १२, २, ४, ८ विक्रमायरिपुगः कुजः शुभः स्यात्तदान्त्यसुतधर्मगैः खगैः । चेन्न विद्ध इनसूनुरप्यसौ किन्तु धर्मघृणिना न विध्यते ॥५॥ मंगल के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११ वेध स्थान १२, ९, ५ ऊपर जो श्लोक ३ से—और आगे के श्लोकों में जो शुभ गोचर स्थान लिखे गये हैं—वहाँ तीसरे का बारहवाँ, छठे का नवाँ, ग्यारहवें का पाँचवाँ. इस प्रकार समझना चाहिये । यदि गोचर में मंगल तृतीय में है तो जन्म राशि से द्वादश कोई ग्रह होगा तभी वेध समझना । गोचर में मंगल तृतीय में हो और जन्म राशि से ९वें या ५वें कोई ग्रह हो तो तृतीय मंगल का कोई वेध नहीं होगा । यदि गोचर में छठे मंगल हो और नवें कोई अन्य ग्रह गोचर से हो (गोचर विचार के समय जन्म कुंडली में नहीं) तो वेध होगा । गोचर से एकादश मंगल हो और गोचर से ५वें (जन्म राशि से ५वें) कोई ग्रह हो तो मंगल का वेध होने के कारण शुभ फल नहीं होगा । जो मंगल के शुभ गोचर स्थान हैं वही शनि के हैं : शनि के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११ वेध स्थान १२, ९, ५
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२५ अन्तर केवल यह है कि सूर्य, चन्द्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, यह सब मंगल का वेध करते हैं किन्तु सूर्य शनि का पिता होने के कारण, शनि का वेध नहीं करता। केवल चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, शनि का वेध करते हैं। स्वाम्बुशत्रुमृतिकायगः शुभो ज्ञस्तदा न खलु विध्यते सदा । स्वात्मजत्रितप आद्यनैधन प्राप्तिगैर्विबुधभिर्यदि ग्रहैः ॥६॥ बुध के शुभ गोचर स्थान २, ४, ६, ८, १०, ११ वेध स्थान ५, ३, ९, १, ८, १२ स्वायधर्मतनयास्तसंस्थितो नाकनायकपुरोहितः शुभः। रिःफरन्ध्रखजलत्रिगैर्यदा विध्यते गगनचारिभिर्न हि ॥७॥ बृहस्पति के शुभ गोचर स्थान २, ५, ७, ९, ११ वेध स्थान १२, ४, ३, १०, ८ आसुताष्टमतपोव्ययायगो विद्ध आस्फुजिदशोभनः स्मृतः। नैधनास्ततनुकर्मधर्मधीलाभवैरिसहजस्थखेचरैः ॥८॥ शुक्र के शुभ गोचर स्थान १, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, १२ वेध स्थान ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ३, ६ जन्मन्यायासदाता क्षपयति विभवान् क्रोधरोगाध्वदाता वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति न सुखदो वञ्चनामाग्रहं च ।
६२६ फलदीपिका स्थानप्राप्तिं तृतीये धननिचयमुदाकल्यकृच्छ्रारिहन्ता रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥६॥ वित्तक्षोभं सुतस्थो वितरति बहुशो रोगमोहादिदाता षष्ठेऽर्को हन्ति रोगान् क्षपयति च रिपूञ्छोकमोहान्प्रमार्ष्टि । अध्वानं सप्तमस्थो जठरगुदभयं दैन्यभावं च तस्मै रुक्त्रासावष्टमस्थः कलयति कलहं राजभीतिं च तापम् ॥१०॥ अब सूर्य, जन्म राशि से गिनने पर—गोचर वश प्रत्येक स्थान में क्या-क्या फल उत्पन्न करता है, यह बताते हैं । उदाहरण के लिये जन्म कुंडली में वृष राशि में चन्द्रमा है तो सूर्य जब वृष राशि में होगा तो प्रथम स्थान में हुआ; मिथुन में जब सूर्य हुआ तो द्वितीय सूर्य हुआ, इस प्रकार प्रथम, द्वितीय आदि गिनना चाहिये । सूर्य भिन्न- भिन्न स्थानों में क्या फल करता है यह बताते हैं :—(१) परिश्रम कराता है, धन खर्च होता है जातक क्रोध
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२७ अनुभव हो। (८) रोग, भय उत्पन्न करे, मन में ताप (चिन्ता) कलह (लड़ाई, झगड़ा, विवाद), राजा या सरकार, अधिकारी वर्ग से भय, उनकी नाराज़गी का अन्देशा हो। (९) आपत्ति, दीनता, अपने प्रिय लोगों से विरह, जो उद्योग किये जावें उनमें असफलता। (१०) जिस कार्य की सिद्धि के लिये काम कर रहे हों उसमें सफलता—कोई बड़ा कार्य उठाया गया हो तो वह पूरा हो। (११) स्थान प्राप्ति, सम्मान वृद्धि, द्रव्य लाभ, रोग से छुटकारा, आर्थिक शारीरिक स्वास्थ्य। (१२) क्लेश, धन की बर्बादी, ज्वर आदि रोग, दोस्त दुश्मनी करें ॥ ११ ॥ आपद्धैन्यं तपसि विरहं चित्तचेष्टानिरोधं प्राप्नोत्युग्रां दशमगृहगे कर्मसिद्धिं दिनेशे । स्थानं मानं विभवमपि चैकादशे रोगनाशं क्लेशं वित्तक्षयमपि सुहृद्वैरमन्त्ये ज्वरं च ॥११॥ यह क्रम से बारहौं स्थानों में गोचरवश सूर्य का फल कहा गया है। प्रति वर्ष प्रायः निम्नलिखित तारीखों को सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है और प्रत्येक राशि में करीब एक महीना रहता है : सूर्य की राशि प्रवेश की अंग्रेज़ी तारीखें मेष प्रवेश १३ या १४ अप्रैल वृष " १४ या १५ मई मिथुन " १५ जून कर्क " १६ या १७ जुलाई सिंह " १६ या १७ अगस्त
६२८ फलदीपिका कन्या प्रवेश १७ सितम्बर तुला " १७ अक्तूबर वृश्चिक " १५-१६ नवम्बर धनु " १६ दिसम्बर मकर " १३ या १४ जनवरी कुंभ " १२ फरवरी मीन " १४ मार्च ऊपर जो तारीखें बताई गई हैं वह स्थूल (मोटा-मोटी) सूर्य संक्रान्ति (सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करता है— जाता है) की अंग्रेज़ी तारीखें हैं। कभी फरवरी के २८ दिन हो जाते हैं कभी २९ । इस कारण एकाध दिन का अन्तर पड़ जाता है— इससे अधिक नहीं । अब प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन की पिछली घटनाओं को विचार में लाकर यह देख सकता है कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ किस महीने (यहाँ महीना सूर्य प्रवेश राशि का गिनना चाहिये १५ ता० से १५ ता० तक, पहली तारीख से ३० या ३१ तारीख तक नहीं) में अधिक होती हैं । यह प्रत्यक्ष है कि जीवन के सब वर्ष एक से नहीं जाते—और सब महीने प्रति वर्ष एक से नहीं जाते क्योंकि सूर्य गोचर ही तो सब कुछ नहीं है— अन्य ग्रहों का भी गोचर होता है—महादशा, अन्तर्दशा भी अच्छी या ख़राब बदलती रहती है । सूर्य संक्रान्तिवश सूर्य गोचर विचार सूर्य गोचर विचार के सिलसिले में हम एक नई बात पाठकों के सामने रखते हैं । यह मन्त्रेश्वर ने नहीं लिखी है । अन्य स्थानों से ली गई हैं। (१) जिस दिन—जिस समय सूर्य संक्रान्ति हो अर्थात् सूर्य एक