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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १६६ केसरी, सर्वतोभद्र, नन्दन, नन्दशालिक, नन्दीश, मंदर, श्रीवत्स, अमृतोद्भव, हिमवान्, हेमकूट, कैलाश, पृथिवीजय, इन्द्रनील, महानील, भूधर, रत्नकूटक, वैडूर्य, पद्मराग, वज्रक, मुकुटोज्ज्वल, ऐरावत, राजहंस, गरुड, वृषभ और मेरु ये पचीस प्रासाद सांधारजाति के हैं । उसका अनुक्रमसे यथार्थ वर्णन किया जाता है ॥३ से ६॥ 'दशहस्तादधस्तान्न प्रासादो भ्रमसंयुक्तः । षट्त्रिंशन्तं निरन्धारा धाव्ये वेदादिहस्ततः ॥७॥ यदि प्रासाद का मान दस हाथ से न्यून न हो तो, वह प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाला बना सकते है। एवं चार हाथ से छत्तीस हाथ तक के मान का प्रासाद बिना भ्रमका भी बना सकते है ॥७॥ पञ्चविंशतिः २सान्धाराः प्रयुक्ता वास्तुवेदिभिः । भ्रमहीनास्तु ये कार्याः शुद्धच्छन्देषु नागराः ॥८॥ वास्तुशास्त्र के विद्वानो ने ये सान्धार (परिक्रमा वाले) पचीस प्रासाद शुद्ध नागर जाति के कहे है, वे भ्रम रहित भी बना सकते है ॥८॥ १-केसरीप्रासाद— चतुरसीकृते क्षेत्रे अष्टाष्टकविभाजिते । भागभागं भ्रमभित्ति-द्विभागो देवालयः ॥६॥ सान्धार जाति के प्रासाद की समचोरस भूमि के आठ २ भाग करे, उनमें से एक भाग की भ्रमणी, एक २ भाग की दो दीवार और दो भागका गभारा बनाना चाहिये ॥६॥ निरन्धारे पदा भित्ति-रर्धे गर्भं प्रकल्पयेत् । मध्यच्छन्दश्च वेदास्त्रो बाह्ये कुम्भायतं शृणु ॥१०॥ यदि प्रासाद निरंधार बनाना हो तो प्रासाद के मान के चौथे भागकी दीवार और आधे मानका गभारा बनाना चाहिये । जैसे-आठ हाथ के मानका प्रासाद है, तो उसका चौथा भाग दो २ हाथ की दीवार और चार हाथ का गभारा बनावे । मध्य में गभारा समचोरस रक्खे । अब गभारा

१७० प्रासादमण्डने क्षेत्रार्धे च भवेद् भद्रं भद्रार्धं कर्णविस्तरः । कर्णस्यार्धप्रमाणेन कर्त्तव्यो भद्रनिर्गमः ॥१२१॥ प्रासाद की भूमिके नाप से आधा भद्रका विस्तार रक्खें। इससे आधे मानका कोणा का विस्तार रक्खें। कोणे के आधे मान का भद्रका निर्गम रक्खें ॥१२१॥ चतुष्कर्णेषु ख्यातानि श्रीवत्सशिखराणि च । रथिकोद्गमे च पञ्चैव केशरी गिरिजाप्रियः ॥१२२॥ इति केसरीप्रासादः ॥१॥ प्रासाद के चारों कोणे के ऊपर एक २ श्रीवत्स शृंग चढावें, तथा भद्रके ऊपर रथिका और उद्गम बनावें। इस प्रकार का केसरी नामका प्रासाद पार्वती देवी को प्रिय है ॥१२२॥ शृंग संख्या-चार कोणे ४ और एक शिखर एवं कुल ५ शृंग। २-सर्वतोभद्रप्रासाद— क्षेत्रे विभक्ते दशधा गर्भः षोडशकोष्ठकैः । भित्तिं भ्रमं च भित्तिं च भागभागं प्रकल्पयेत् ॥१२३॥ प्रासाद की समचोर भूमिका दस २ भाग करें। उनमें से मध्य गभारा कुल सोलह भाग का रक्खें। बाकी एक भाग की दीवार, एक भाग की भ्रमणी और एक भागकी दूसरी बाहर की दीवार रक्खें ॥१२३॥ द्विभागः कर्ण इत्युक्तो भद्रं षड्भागिकं तथा । निर्गमं चैकभागेन भागिका पार्श्वचोभयोः ॥१२४॥ दो २ भाग का कोणा और छभागका भद्र का विस्तार रक्खें। भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की एक २ कोणी बनावें ॥१२४॥ कर्णिका चार्धभागेन भागार्धं भद्रनिर्गमम् । भागत्रयं च विस्तारे मुखभद्रं विधीयते ॥१२५॥ भद्र के दोनों तरफ आधे २ भाग की एक २ कर्णिका भी बनाना—इस का और कोणीया का निर्गम आधा भाग और भद्र का निर्गम आधा भाग, इस प्रकार कुल एक भाग भद्र का निर्गम जानें। भद्रका विस्तार छ भाग रखना ऊपर लिखा है, उनमे से दो कोणी और


चित्र-संलग्न पाठ (चित्र शीर्षक एवं विवरण):

  • ऊर्ध्व पाठ (चित्र के पार्श्व में): 〔उत्तार्द्धे, केसरी प्रासाद ११, समराङ्गण, पृ. ३६५, रेखा ५〕
  • तलच्छन्द (Ground Plan) पाठ: केसरीप्रासादप्रस्तारः (अन्तर्गत: भित्ति, गर्भ)

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७१ दो कर्णिका का तीन भाग छोड़ करके बाकी तीन भाग रहे, उतना मुखभद्र का विस्तार रखे ॥१५॥ भद्रे वै तूद्गमाः पञ्च कर्णेऽष्टशृङ्गकानि च । श्रीवत्सशिखरं कार्यं घटाकलशसंयुतम् ॥१६॥ इति सर्वतोभद्रप्रासादः ॥२॥ भद्रके ऊपर पांच २ उद्गम करे। कोणे के ऊपर दो २ एव कुल आठ शृंग चढावे आमलसार और कलश वाला श्रीवत्स शिखर बनावे ॥१६॥ शृंगसंख्या—प्रत्येक कोण पर २-२ और एक शिखर एवं कुल ९ शृंग । ३-नन्दनप्रासाद— श्रीवत्सं भद्रमारूढं रथिकोद्गमभूषिते । नन्दने नन्दति स्वामी दुरितं हरति ध्रुवम् ॥१७॥ इति नन्दनप्रासाद. ।.३॥ यह नन्दन प्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने । फर्क इतना कि—भद्र के गवाक्ष और उद्गम के ऊपर एक २ उरुशृंग चढ़ावे । इसको बनानेवाला स्वामी आनन्द मे रहता है और सब पापो का नाश करता है ॥१७॥ शृंगसंख्या—चार कोणे ८, चार भद्रे ४ और एक शिखर, एव कुल १३ शृंग । ४-नन्दिशालप्रासाद— तस्यैवं भद्रोर्ध्वे शृङ्गं भद्रं तस्यानुरूपतः । नन्दिशाली गुणैर्युक्तः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥१८॥ इति नन्दिशालप्रासादः ॥४॥ इस नन्दिशालप्रासाद का तलमान और स्वरूप नन्दन प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष इतना कि—भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चडावे तो यह नन्दिशाल प्रासाद सब गुणो से युक्त अच्छे लक्षणवाला सुन्दर बनता है ॥१८॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, भद्रे ८ और एक शिखर, एवं कुल १७ शृंग ।

१७२ प्रासादमण्डने ५-नन्दीशप्रासाद— त्रिभागं च भवेद् भद्रं भद्रार्थं प्ररथस्तथा । कर्णे शृङ्गद्वयं भद्रे एकैकं प्ररथे तथा ॥१९॥ इति नन्दीशप्रासादः ॥५॥ यह नन्दीशप्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि—छः भाग का भद्र है, उसके बदले तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग का प्रतिरथ बनावें। कोणे के ऊपर दो २, भद्र के ऊपर एक २ और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावे ॥१९॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ४ और एक शिखर, एवं कुल २१ शृंग । ६-मंदरप्रासाद— द्वादशांशस्तु विस्तारो मूलगर्भस्तदर्धतः । भागभागं तु कर्त्तव्या द्वे भित्ती चान्धकारिका ॥२०॥ कर्णप्ररथभद्रार्धं कारयेद् द्विद्विभागतः । प्ररथः समनिष्कासो भद्रं भागेन निर्गमम् ॥२१॥ कर्णे द्वे भद्रके द्वे च चैकं प्रतिरथे तथा । सघण्टा कलशा रेखा रथिकोद्गमभूषिताः ॥२२॥ इति मन्दरप्रासादः ॥६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें। उनमें से छः भाग का गभारा बनावें, तथा एक २ भाग की दोनों दीवार और एक २ भाग की भ्रमणी (परिक्रमा) बनावें। गभारे के बाहर के भाग में कोणा, प्ररथ और भद्रार्ध ये सब दो २ भाग का रक्खें । उसका निर्गम समदल रक्खें और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खें। कोणे के ऊपर दो २ शृंग, भद्रके ऊपर दो २ उरशृंग और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावें । आमलसार, कलश, रेखा, गवाक्ष और उद्गम, ये सब शोभायमान बनावें ॥२० से २२॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८ भद्रे ८ और एक शिखर, एव कुल २५ शृंग ।

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १३६ ७-श्रीवृक्षप्रासाद— चतुर्दशांशविस्तारे गर्भगृहाष्टांशविस्तरः । भागभागं भ्रमो भित्ति-स्तारनिर्गमनेस्तु भागिकः ॥२३॥ कर्णे शृङ्गद्वयं कुर्या-च्छिखरं चाष्टभिर्भगम् । प्रत्यः कर्णमानेन तिलकं शृङ्गकेशरी ॥२४॥ नन्दिकायां च तिलकं भद्रे शृङ्गद्वयं भवेत् । श्रीवृक्षस्तु समाख्यातः कर्त्तव्यस्तु श्रियः पतेः ॥२५॥ इति श्रीवृक्षप्रासादः ॥७॥ प्रासाद को समचोरस भूमिहा चौदह भाग करें। उनमें से आठ भागका गभारा, एक भागकी दीवार, एक भागकी भ्रमन्ती और एक भागकी बाहर की दीवार, इस प्रकार भीतर १४ भाग होता है। बाहर का मान नंदर प्रासाद के अनुसार होता है। विशेष इतना कि—दो भाग का कोणा, २ भाग का प्रतिरथ, एक भागकी नंदी, और दो भाग का भद्रारि रखो। कोने के ऊपर दो शृंग, प्रतिरथ के ऊपर एक शृंग और एक तिलक बांधे। शिखर का विस्तार आठ भाग का रखो। नंदीके ऊपर एक तिलक रक्खे। भद्रके ऊपर तीन २ उरुशृंग बांधे। ऐसा श्रीवृक्षप्रासाद का स्वरूप है, यह विष्णु के लिए बांधे ॥२३ से २५॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल २९ शृंग। तिलक संख्या-प्रतिरथे ८ और नंदीपर ८ एवं कुल १६ तिलक। ८-अमृतोद्भवप्रासाद— कर्णे शृङ्गत्रयं कुर्यात् प्रत्यः पूर्ववत्स्थितः । अमृतोद्भवनामोऽसौ प्रासादः सुरपूजितः ॥२६॥ इति अमृतोद्भवप्रासादः ॥८॥ यह प्रासाद का तजमान और रचना श्रीवृक्षप्रासाद के अनुसार जानना। फर्क इतना कि—कोण के ऊपर तीन शृङ्ग चढ़ावे, बाकी प्रतिरथ आदिक का रचना पूर्वोक्त प्रकार ही करा जाने । ऐसा अमृतोद्भवप्रासाद देवों से पूजित है ॥२६॥

१७४ प्रासादमण्डने शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ३३ शृंग, तिलक संख्या—प्रतिरथे ८ ओर नन्दी पर ८, कुल १६ तिलक । ६-हिमवान् प्रासाद— द्वे द्वे शृङ्गे प्रतिरथे त्वमृतोद्भवसंस्थितौ । हिमवान् द्वे उरुशृङ्गै पूज्यः सुरनरोरगैः ॥२७॥ इति हिमवान् प्रासादः ॥६॥ यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप-अमृतोद्भव प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि—पठरे के ऊपर तिलक के बदले शृंग अर्थात् दो शृंग चढ़ावें और भद्रके ऊपर से एक उरुशृंग कम करके दो उरुशृंग रक्खें। ऐसा हिमवान् नामका प्रासाद देव, मनुष्य और नाग- कुमारों से पूजित है ॥२७॥ शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, भद्रे ८, एक शिखर, एवं कुल ३७ शृंग और तिलक ८ नंदी के ऊपर । १०-हेमकूट प्रासाद— उरुशृङ्गतत्रयं भद्रे नन्दिका तिलकान्विता । हेमकूटस्तदा नाम प्रकर्त्तव्यस्त्रिमूर्त्तिके ॥२८॥ इति हेमकूटप्रासादः ॥१०॥ यह प्रासादका तलमान और स्वरूप हिमवान् प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि—भद्र के ऊपर तीसरा उरुशृंग और नंदी के ऊपर दूसरा तिलक चढ़ावें । यह हेमकूट नामका प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश, यह त्रिमूर्त्ति के लिये बनावें ॥२८॥ शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४१ शृंग और १६ तिलक नन्दी के ऊपर । ११-कैलास प्रासाद— नन्दिकाग्रान्ततः शृङ्गं रेखाश्च तिलकोत्तमाः । कैलासश्च तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२६॥ इति कैलासप्रासादः ॥११॥ यह प्रासाद का मान और स्वरूप हेमकूट प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह हैं कि— नन्दी के ऊपर दो तिलक है, उसके बदले एक शृंग और उसके ऊपर एक तिलक चढावें ।

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७५ तथा कोणो के ऊपर तीन शृंग हैं, उसके बदले दो शृंग और उसके ऊपर तिलक चढ़ाना चाहिये । ऐसा कैलास नामका प्रासाद ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२६॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, पठरे १६, नंदी पर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४५ शृंग और तिलक ८ कोने और ८ नन्दी के ऊपर । १२-पृथिवीजय प्रासाद— रेखोर्ध्वे तिलकं त्यक्त्वा शृङ्गं तत्रैव कारयेत् । पृथ्वीजयस्तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥३०॥ इति पृथ्वीजयप्रासादः ॥१२॥ यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप कैलासप्रासादकी तरह जाने । विशेष यह है कि— कोणेके ऊपर का तिलक हटाकर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । ऐसा पृथ्वीजय नामका प्रासाद सब देवों के लिये बनावे ॥३०॥ शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, नंदी के ऊपर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४६ शृंग और तिलक ८ नंदी के ऊपर । १३-इन्द्रनीलप्रासाद— षोडशांशकविस्तारे द्विभागः कर्णविस्तरः । नन्दिका चैकभागेन द्वयं'शः प्रतिरथस्तथा ॥३१॥ पुनर्नन्दी भवेद् भागं भद्रं वेदांशविस्तरम् । समस्तं समनिष्कासं भद्रे भागो विनिर्गमः ॥३२॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का सोलह भाग करे । उनमे से दो भाग का कोणा, एक भागकी नन्दी, दो भागका प्रतिरथ, एक भाग की दूसरी नन्दी और दो भागका भद्रार्ध बनावे । ये सब अंगोका निर्गम समदल और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खे ॥३१-३२॥ चतुष्ट्यंशको गर्भो वेष्टितो भीत्तिभागतः । बाह्यभीत्तिर्भवेद् भागा द्विभागा च भ्रमन्तिका ॥३३॥ सोलह भाग मे गभारे का विस्तार आठ भाग ( समचोरस ६४ भाग ) करे गभारे की दीवार एक भाग, भ्रमणो दो भाग और बाहर की दीवार एक भाग रक्खें ॥३३॥

१७६ प्रासादमण्डने कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं शिखरं सूर्यविस्तरम् । नन्दिकायां तु तिलकं प्रत्यङ्गं च द्विभागिकम् ॥३४॥ शृङ्गद्वयं प्रतिरथे उरुशृङ्गं षडंशकम् । १शृङ्गद्वयं नन्दिकाया-मुरःशृङ्गं युगांशकम् ॥३५॥ द्विभागं भद्रशृङ्गं तु शृङ्गार्धे चैव निर्गमः । कर्णे प्रतिरथे चैव ह्युदकान्तरभूषितम् ॥३६॥ इन्द्रनीलस्तदा नाम इन्द्रादिसुरपूजितः । वल्लभः सर्वदेवानां शिवास्यापि विशेषतः ॥३७॥ इति इन्द्रनीलप्रसादः ॥१३॥ कोणों के ऊपर दो शृंग चढ़ावें। शिखर का विस्तार बारह भाग रखें। नन्दी के ऊपर एक तिलक चढ़ावें और दो भाग के विस्तार वाला प्रत्यंग चढ़ावे। प्रतिरथ के ऊपर दो शृंग चढ़ावें। पहला उरुशृंग छ भाग विस्तार में रक्खे। नन्दी के ऊपर एक शृंग चढ़ावें। दूसरा उरुशृंग विस्तार में चार भाग का और तीसरा उरुशृंग विस्तार में दो भाग का रखें। इन उरुशृंगों का निर्गम विस्तार से आधा रखें। कोणा और प्रतिरथ उदकान्तर वाला बनावें। ऐसा इन्द्रनील प्रासाद इन्द्रादि देवों से पूजित है, यह सब देवों को और विशेष कर शिवजी को प्रिय है ॥३४ से ३७॥ शृंग संख्या—कोणो ८, प्रतिरथे १६, भद्र नन्दी के ऊपर ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ५३ शृंग और तिलक ८ कर्णा नन्दी पर। १४-महानील प्रसाद- कर्णे नन्दी (कर्णनन्द्यां ?) तथा शृङ्गं रेखोर्ध्वे तिलकं तथा । महानीलस्तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥३८॥ इति महानीलप्रसादः ॥१४॥ १. 'शृंगद्वयं' अशुद्ध पाट मालुम होता है। उस स्थान पर 'शृङ्गमेकं' ऐसा पाठ चाहिये जिसे शृंगों की संख्या ठीक मिल जाय ।

परिशिष्टे केसरीप्रासाद. १७७ यह महानील प्रासाद का तलमान और स्वरूप इन्द्रनील प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि—कर्णनन्दी के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले शृंग रक्खे । ऐसा महानील प्रासाद सब देवों के लिये बनावे ॥३८॥ शृंग संख्या—कोणे ४, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे १६, नन्दी पर ८ भद्रे १२ और एक शिखर, कुल ५७ शृंग और तिलक ४ कोणे । १५—भूधरप्रासाद— कार्यं शृङ्गं च तिलकं रेखामध्ये प्रशस्यते । भूधरस्य समाख्यातः प्रासादो देवालयः ॥३६॥ इति भूधरप्रासादः ॥१ ॥ यह प्रासाद का मान और स्वरूप महानील प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह कि—कोणे के ऊपर एक शृंग अधिक चढ़ावे तो यह भूधर नाम का प्रासाद देवोका स्थानरूप होता है ॥३६॥ शृंग संख्या—कोणे ८, बाकी पूर्ववत् जाने । तिलक ४ कोणे । १६—रत्नकूटप्रासाद— भूधरस्य यथा प्रोक्तं द्विभागं वर्धयेत् पुनः । पूर्ववद्दलसंख्यायां भद्रपार्श्वे द्विनन्दिके ॥४०॥ द्विभागं बाह्यभित्तिश्च शेषं पूर्वप्रकल्पितम् । तलच्छन्दमिति ख्यात-मूर्ध्वमानमतः शृणु ॥४१॥ यह रत्नकूट प्रासाद का मान और स्वरूप भूधर प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह कि—तल मानमे दो भाग बढ़ावे अर्थात् अठारह भाग करे । तथा भद्र के दोनो तरफ एक २ भाग की दूसरी नन्दी बनावें । और बाहर की दीवार दो भागकी रक्खे । बाकी सब पहले के अनुसार जानें । अब ऊर्ध्वमान सुनिये ॥४०-४१॥


[रेखाचित्र-पाठ / आलेख टिप्पणी]

(कोणे, कर्णपर प्रासाद २४, मध्यमे ४४, प्रत्यङ्गे ४५, शिखरे ७७) मंदिर, कुण्डण मध्यमप्रस्तरे रूपौ. प्रा० २३

१७८ प्रासादमण्डने कर्णे द्विशृङ्गं तिलकं शिखरं सूर्यविस्तरम् । तिलके द्वे नन्दिकायां प्रत्यङ्गं तु द्विभागिकम् ॥४२॥ शृङ्गत्रयं प्रतिरथे षड्भागा चोरुमञ्जरी । तिलके द्वे पुनर्नन्द्यां-मुरुशृङ्गं युगांशकम् ॥४३॥ नन्द्यां च शृङ्गतिलके त्रिभागा चोरुमञ्जरी । द्विभागं भद्रशृङ्गं च अर्धे चार्धे च निर्गमः ॥४४॥ कोणे के ऊपर दो शृंग और एक तिलक चढ़ावे । शिखर का विस्तार बारह भाग का रक्खें । कर्णानन्दो के ऊपर दो तिलक और दो भाग का प्रत्यंग चढ़ावे । प्रतिरथ के ऊपर तीन शृंग और नंदी के ऊपर दो तिलक चढ़ावें । भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक चढ़ावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग चढ़ावें, उनमे पहला उरुशृंग छः भाग, दूसरा चार भाग, तीसरा तीन भाग और चौथा दो भाग का रक्खे । ये उरुशृंगों का निर्गम विस्तार से आधा रक्खे ॥४२ से ४४॥ शृंग संख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ६५ शृंग और तिलक—कोणे ४, कोणो पर १६, प्ररथ नन्दी पर १६ और भद्र नन्दी पर ८, कुल ४४ तिलक । रत्नकूटस्तदा नाम शिवलिङ्गेषु कामदः । प्रशस्तः सर्वदेवेषु राज्ञां तु जयकारणम् ॥४५॥ इति रत्नकूटप्रासादः ॥१६॥ ऊपर कहे हुए स्वरूप वाला रत्नकूट प्रासाद शिवलिंग के लिये बनावें तो सब इच्छित फल को देने वाला है । सब देवो के लिये बनावे तो भी प्रशस्त है और राजाओं को विजय कराने वाला है ॥४५॥ १७—वैडूर्यप्रासाद— शृङ्गं तृतीयं रेखोर्ध्वे कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् । वैडूर्यश्च तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥४६॥ इति वैडूर्यप्रासादः ॥१७॥ इस प्रासाद का तलमान और स्वरूप रत्नकूट प्रासाद के अनुसार है । विशेष यह है कि—कोणे के ऊपर से तिलक निकाल करके उसके बदले एक तीसरा शृंग चढ़ावें । सब

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७६ शोभायमान बनावे । यह वैडूर्य नाम का प्रासाद सब देवो के लिये बनाना चाहिये ॥४६॥ शृंगसख्या—कोने १२, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्रनंदी पर ८, भद्रे १६ एक शिखर, एवं कुल ६९ शृंग । तिलक संख्या—कर्णनंदी पर १६, प्रतिरथ नदी पर १६ और भद्रनन्दी पर ८, एवं कुल ४० तिलक । १८-पद्मरागप्रासाद-- तथैव तिलकं नन्द्यां शृङ्गयुग्मं तु संस्थितम् । पद्मरागस्तदा नाम सर्वदेवसुखावहः ॥४७॥ इति पद्मरागप्रासादः ॥१८॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप वैडूर्यप्रासाद की तरह समझे । विशेष यह है कि- कोणे के ऊपर से तीसरा शृंग हटा करके उसके बदले मे तिलक चढ़ावे और भद्रनंदी के ऊपर जो एक तिलक और एक शृंग है, उसके बदले दो शृंग रक्खे । ऐसा पद्मराग नाम का प्रासाद सब देवो के लिये सुख कारक है ॥४७॥ शृंगसख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नंदी पर १६, भद्रे १६, एक शिखर, एवं कुल ७३ शृंग । तिलक संख्या—कोणे ४, कर्णनन्दी पर १६ प्रतिरथ नदी पर १६ एवं कुल ३६ तिलक । १९-वज्रकप्रासाद-- रेखोर्ध्वे च ततः शृंगं कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् । वज्रकश्चेति नामासौ शक्रादिसुरवल्लभः ॥४८॥ इति वज्रकप्रासादः ॥१९॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप पद्मराग प्रासाद की तरह जानें । विशेष यह है कि- कोणे के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले में शृंग चढ़ावे । यह वज्रक प्रासाद इन्द्र आदि देवो को प्रिय है ॥४८॥ शृंगसख्या—कोणे १२, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्रनंदी पर १६, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ७७ शृंग । तिलक सख्या—कर्णनंदी पर १६, प्रतिरथ नन्दी पर १६, कुल ३२ तिलक । २०-मुकुटोज्ज्वलप्रासाद-- भक्ते त्रिंशतिधा क्षेत्रे द्विभागः कर्णविस्तरः । सार्धभागं भवेन्नन्दी कर्णवत्प्ररथस्तथा ॥४६॥

१८० प्रासादमण्डने पुनर्नन्दी सार्धभागा भागा वै भद्रनन्दिका । वेदांशो भद्रविस्तार एकभागस्तु निर्गमः ॥५०॥ द्विभागा बाह्यभित्तिश्च द्विभागा च भ्रमन्तिका । तत्समा मध्यभित्तिश्च गर्भोऽष्टांशैः प्रकल्पितः ॥५१॥ इस प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें। उनमें से दो भाग का कोणा, डेढ़ भाग की नंदी, दो भाग का प्ररथ, डेढ़ भाग की नदी, एक भाग की भद्रनन्दी और चार भाग का भद्र का विस्तार रखें। भद्र का निर्गम एक भाग का रखें। दो भाग बाहर की दीवार, दो भाग की भ्रमणी, दो भाग की गभारे की दीवार और आठ भाग का गभारा रखें ॥४६ से ५१॥ कर्णो द्विशृङ्गं तिलकं रेखा द्विसप्तविस्तरा । नन्द्यां शृङ्गं च तिलकं प्रत्यङ्गं तदूर्ध्वतः ॥५२॥ शृङ्गत्रयं प्रतिकर्णो सप्तांशा चोरुमञ्जरी । नन्द्यां शृङ्गं च तिलक-मुरुशृङ्गं षडंशकम् ॥५३॥ भद्रनन्द्यां तथा शृङ्ग-मिषुभागोरुमञ्जरी । भद्रशृङ्गं द्विभागं स मुकुटोज्ज्वल उच्यते ॥५४॥ इति मुकुटोज्ज्वलप्रासादः ॥२०॥ रेखा का विस्तार चौदह भाग का रखे। कोण के ऊपर दो शृंग, और एक तिलक, कर्णनंदी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक, ऊपर प्रत्यंग, प्ररथ के ऊपर तीन शृंग, नंदीके ऊपर एक शृंग और एक तिलक, भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और भद्र के ऊपर चार शृंग चढावे। पहला उरुशृंग सात भाग का, दूसरा उरुशृंग छः भाग का, तीसरा उरुशृंग पांच भाग का और चौथा उरुशृंग दो भाग का रखे। ऐसा मुकुटोज्ज्वल प्रासाद है ॥५२ से ५४॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, कर्णनन्दी पर ८, प्ररथे २४, नंदी पर ८, भद्रनन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८१ शृंग। तिलक संख्या-कोणे ४, कर्णनन्दी पर ८, प्ररथनन्दी पर ८ कुल २० तिलक।

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १८१ २१-ऐरावतप्रासाद — रेखोर्ध्वे च ततः शृङ्गं कर्त्तव्यं सर्वकामदम् । ऐरावतस्तदा नाम शक्रादिसुरवल्लभः ॥५५॥ इत्यैरावतप्रासादः ॥२१॥ इसका तलमान और स्वरूप मुकुटोज्ज्वल प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि— कोणो के ऊपर का तिलक हटाकर के उस जगह शृग रक्खे । यह सब इच्छित फल देनेवाला है । ऐसा ऐरावतप्रासाद इन्द्रादि देवों के लिये प्रिय है ॥५५॥ शृंग सख्या— कोणो १२, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्ररथे २४, नंदीपर ८, भद्रनन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८५ शृंग । तिलक संख्या—कर्णानन्दी पर ८, प्रति नन्दी पर ८, कुल १६ तिलक । २२-राजहंसप्रासाद— तथैव तिलकं कुर्याद् भद्रकर्णौ तु शृङ्गकम् । राजहंसः समाख्यातः कर्त्तव्यो ब्रह्ममन्दिरे ॥५६॥ इति राजहंसप्रासादः ॥२२॥ इसका तलमान और स्वरूप ऐरावत प्रसाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि— कोणो के ऊपर तीसरा शृंग के बदले मे एक तिलक चढ़ावें, अर्थात् दो शृंग और एक तिलक चढ़ावे । तथा भद्रनंदी के ऊपर एक शृंग बढावे । ऐसा राजहंस प्रासाद का स्वरूप है, वह ब्रह्मा के लिये बनावे ॥५३॥ शृंग सख्या—कोणो ८ प्रत्यंग ८, कर्ण नन्दी पर ८, प्ररथे २४, प्ररथ नंदी के ऊपर ८, भद्रनन्दी के ऊपर १६, भद्रे १६ और एक शिखर, कुल ८६ शृंग। तिलक सख्या—कोणो ४, कर्णनंदी पर ८. प्ररथनदी पर ८, एवं कुल २० तिलक । २३-पक्षिराज (गरुड) प्रासाद— रेखोर्ध्वं च ततः शृङ्गं कर्त्तव्यं सर्वकामदम् । पक्षिराजस्तदा नाम कर्त्तव्यः स श्रियः पतेः ॥५७॥ इति पक्षिराजप्रासाद ॥२३॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप राजहंस प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह कि— कोणो के ऊपर का तिलक हटा कर के उसके बदले शृग चढावे । ऐसा पक्षिराज प्रासाद विष्णु के लिये बनाना चाहिये ।५७॥ शृंगसंख्या—कोणो १२, प्रत्यंग ८, कर्णनंदी पर ८, प्ररथे २४, प्ररथनन्दी पर ८, भद्रनदी पर १६, भद्रे १६ और एक शिखर, एव कुल ९३ शृंग । तिलक संख्या कर्णनन्दी पर ८ और प्ररथ नन्दी पर ८, एव कुल १६ तिलक ।

चोरुमञ्जरी । (Wait, look at "च्छृङ्गोर्ध्वं": च्छृ-ङ्गो-र्ध्वं. Yes, "कुर्या-च्छृङ्गोर्ध्वं चोरुमञ्जरी ।")

Line 17: द्वे द्वे शृङ्गे उपरथे उरुशृङ्गं षडंशकम् ॥६२॥

Line 18: भद्रनन्द्यां भवेच्छृङ्गं वेदांशा चोरुमञ्जरी ।

Line 19: द्विभागं भद्रशृङ्गं च कर्त्तव्यं च मनोरमम् ॥६३॥

Line 20: सप्तनवत्यण्डकयुक् कर्त्तव्यो लक्षणान्वितः ।

Line 21: वृषभो नाम विख्यात ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥६४॥

Line 22: इति वृषभप्रासादः ॥२४॥ (It is right-aligned).

Line 23: शिखर का विस्तार सोलह भाग का करे । कोणो के ऊपर दो शृंग और एक तिलक, (Notice: "कोणो" without anusvara or with? It is "कोणो", no dot).

Line 24: प्ररथ ऊपर दो शृंग, उसके ऊपर तीन तीन भाग का प्रत्यंग, रथ के ऊपर तीन शृंग, उपरथ (Notice: "प्ररथ" - misprint in Hindi for प्रतिरथ).

Line

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १८३ २५-मेरुप्रासाद— कर्णे शृङ्गत्रयं चैव एकोत्तरशताण्डकः । मेरुश्चापि समाख्यातः कर्तव्यश्च त्रिमूर्त्तिके ॥६५॥ यह मेरु प्रासाद का मान और स्वरूप वृषभ प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि—वृषभ प्रासाद के कोणो के ऊपर का तिलक हटा कर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । यह एक सौ एक शृंग वाला मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लिये बनावे ॥६५॥ शृंग सख्या—कोणे १२, प्रत्यंग ८, प्रत्यथे १६, रथे २४, उपरथे १६, भद्रनन्दी के ऊपर ८, भद्रे १६, और एक शिखर, एव कुल १०१ शृंग । मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल— सर्वस्य हेममेरोश्च यत्पुण्यं त्रिप्रदक्षिणैः । कृते शैलेष्टकामिश्च तत्पुण्याल्लभतेऽधिकम् ॥६६॥ सम्पूर्ण सुवर्णमय मेरु की तीन प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, उस पुण्य से भी अधिक पुण्य पाषाण अथवा ईंट के बने हुवे मेरु प्रासाद की प्रदक्षिणा करने से होता है ॥६६॥ हरो हिरण्यगर्भश्च हरिर्दिनकरस्तथा । एते देवाः स्थिता मेरौ नान्येषां स कदाचन ॥६७॥ इति श्रीसूत्रसन्तानगुणकीर्त्तिप्रकाशप्रद्योतकारे श्रीभुवनदेवाचार्यो- क्तापराजितपृच्छायां केसर्यादिसान्धारप्रासादनिर्णयाधिकारो नामैकोनषष्ट्युत्तरशततमं सूत्रम् ॥ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन देवो को मेरु प्रासाद मे प्रतिष्ठित किये जाते है । अन्य दूसरे देवो को कभी भी उसमे प्रतिष्ठित नही करना चाहिये ॥६७॥ इति पंडित भगवानदास जैन अनुवादित केसरी आदि पचीस साधार प्रासाद निर्णयाधिकार समाप्त ।

परिशिष्ट नं. २ अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः । जय उवाच- शृणु तात ! महादेव ! यन्मया परिपृच्छ्यते । प्रासादांश्च जिनेन्द्राणां कथयसि किं मां प्रभो ! ॥१॥ हे महादेव ! पिता मैने आपको जिनेन्द्र के प्रासादों का वर्णन करने का कहा था, उसको हे भगवन् ! आप सविस्तार कहेगे ? ॥१॥ किं तलं किञ्च शिखरं किं द्विपञ्चाशदुत्तमाः । समोसरणं किं तात ! किं स्यादष्टापदं हि तत् ॥२॥ महीधरो मुनिवरो द्विधारिणी सुशोभिता । हे तात ! उत्तम बावन जिनालय किस प्रकार के है ? तथा उनके तथा शिखरों की रचना कैसी है ? समवसरण, अष्टापद, महीधर, मुनिवर और शाभायमान द्विधारिणी' प्रासादों की रचना कैसी है ? उसका आप वर्णन करे ॥२॥ श्रीविश्वकर्मोवाच- शृणु वत्स ! महाप्राज्ञ यत्त्वया परिपृच्छ्यते । प्रासादांश्च जिनेन्द्राणां कथयाम्यहं तच्छृणु ॥३॥ श्री विश्वकर्मा अपने जयनाम के पुत्र को सम्बोधन करके कहते है कि-हे महा बुद्धिमान् पुत्र ! तुमने जिनेन्द्रो के प्रासादो का वर्णन के लिये पूछा, उसको विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥३॥ प्रासादमध्ये मेरवो भद्रप्रासादनागराः । अन्तका द्राविडाश्चैव महीधरा लतिनास्तथा ॥४॥ उत्तम जाति के प्रासादो मे मेरुप्रसाद, नागर जाति के भद्रप्रासाद, अंतकप्रासाद, द्राविड़ प्रासाद, महीधर प्रासाद और लतिन जाति का प्रासाद, ये उत्तम जाति के प्रासाद हैं ॥४॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १८५ तलनिर्माण— प्रासाददीर्घतो व्यासो भित्तिबाह्ये सुरालये । षोडशांशैर्हरेद् भागं शेषं च द्विगुणं भवेत् ॥५॥ प्रथमे नवमे चैव द्वितीये चतुरो भवेत् । अयं विधिः प्रकर्त्तव्यो भागं च द्वित्र्यंशं भवेत् ॥६॥ तत्र युक्तिः प्रकर्त्तव्यो प्रासादे सर्वनामतः । शिवमुखे मया श्रुतं भाषितं विश्वकर्मणा ॥७॥ मण्डोवर के बाहर के भाग तक प्रासाद की लम्बाई और चौड़ाई का गुणाकार करके उसको सोलह से भाग दे, जो शेष रहे उसको दुगुणा करना...............। प्रथमा विभक्ति । १-कमलभूषण (ऋषभजिनवल्लभ) प्रासाद— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशत्पदभाजिते । कर्णभागत्रयं कार्यं प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८॥ उपरथस्त्रिभागश्च भद्रार्थं वेदभागिकम् । नन्दिका कर्णिका चैव चैकभागा व्यवस्थिता ॥६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बत्तीस भाग करे, उनमे से तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ, तीन भाग का उपरथ और चार भाग का भद्रार्थ रक्खे। कोणिका और नन्दिका एक २ भाग की रक्खे ॥८-६॥ कर्णे च क्रमचत्वारि प्रतिकर्णे क्रमत्रयम् । उपरथे द्वयं ज्ञेयं कर्णिकायां क्रमद्वयम् ॥१०॥ विंशतिरुहशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश । कर्णे च केसरी दद्यान्नन्दनं नन्दशालिकम् ॥११॥ प्रथमक्रमो नन्दीश ऊर्ध्वे तिलकशोभनम् । कमलभूषणनामोऽयं ऋषभजिनवल्लभः ॥१२॥ इति ऋषभजिनवल्लभ कमलभूषणप्रासाद. ॥१॥ प्रा० २४

१८६ प्रासादमण्डने कोणो के ऊपर चार १क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर तीन क्रम, उपरथ और नन्दिग्रों के 'ऊपर दो २ क्रम चढ़ावें चारों दिशा के भद्र के ऊपर कुल बीस उरुशृंग चढ़ावें । तथा सोलह प्रत्यंग कोने पर चढ़ावें । कोणा के ऊपर नीचे से पहला क्रम नन्दिश, दूसरा नन्दशालिक, तीसरा नंदन और चौथा केसरी क्रम चढ़ावें और उसके ऊपर एक शोभायमान तिलक चढ़ावें । ऐसा ऋषभजिन को वल्लभ कमलभूषण नामका प्रासाद है ॥११० से १२॥ शृंगसंख्या—कोणे २२४, प्रतिकर्णे २८०, उपरथे १४४, नन्दिग्रों के ऊपर ४३२, भद्रे २०, प्रत्यंग १६, एक शिखर, कुल १११७ शृंग और चार तिलक कोणे के ऊपर । विभक्ति दूसरी । २-अजितजिनवल्लभ-कामदायकप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्यं प्रतिकर्णस्तथैव च ॥१३॥ २भद्रार्धं च द्विभागेन चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् ॥१४॥ अष्टौ चैवोरुशृङ्गाणि ह्यष्टौ प्रत्यङ्गानि च । कर्णे च केसरीं दद्यात् सर्वतोभद्रमेव च ॥१५॥ नन्दनमजिते देयं चतुष्कोणेषु शोभितम् । कामदायकप्रासादो ह्यजितजिनवल्लभः ॥१६॥ इति अजितजिनवल्लभः कामदायकप्रासादः ॥२॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें, उनमें से दो भागका कोण, दो भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध रखें । कोणो के ऊपर तीन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, १. इस प्रकरण में किसी श्लोक मे 'कर्म' और किसी श्लोक में 'क्रम' ऐसे दो प्रकार के शब्दों का प्रयोग प्राचीन प्रतियो मे देखने मे आता है। मैंने प्रायः कर्म के स्थान पर क्रम शब्द का प्रयोग ठीक समझकर किया है। बाकी दोनो शब्द ठीक हैं। क्रम कहने से शृंगो का अनुक्रम और कर्म (काम) कहने से शृंगो का समूह अर्थ होता है। काम का समूह अर्थ सोने चांदी के वरग बनाने बालों में प्रचलित है। ये लोग १६० वरग के समूह को एक काम बोलते हैं। २. 'भद्रार्धं सार्धभागेन नन्दी तु सार्धभागिका।' पाठान्तरे ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय- १८७ आठ उरुशृंग और आठ प्रत्यंग कोने पर चढावे । कोणे के ऊपर केसरी, सर्वतोभद्र और नंदन ये तीन क्रम चढ़ावे । ऐसा अजितजिनको वल्लभ कामदायक नाम का प्रासाद है ॥१३ से १६ ॥ शृंगसंख्या—कोणे १०८, प्रतिकर्णों ११२, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ और एक शिखर, कुल २३७ शृंग । तीसरी विभक्ति । ३-संभवजिनवल्लभ—रत्नकोटिप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे नवभागविभाजिते । भद्रार्धं सार्धभागेन चैकभागः प्रतिरथः ॥१७॥ कर्णिका नन्दिका पादा सार्धकर्णो विचक्षण ! । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥१८॥ 'केसरीसर्वतोभद्र-क्रमद्वयं व्यवस्थितम् । कर्णिकानन्दिकयोश्च २शृङ्गमेकैकं कारयेत् ॥१९॥ षोडश उरुशृङ्गाणि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । रत्नकोटिश्च नामार्यं प्रासादः संभवे जिने ॥२०॥ इति संभवजिनवल्लभो रत्नकोटिप्रासादः ॥३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका नव भाग करें । उनमें से डेढ़ भाग का भद्रार्ध, एक भाग का प्रतिरथ, कर्णी और नन्दिका पाव पाव भाग की और कोण डेढ़ भाग का रक्खे । कोणे के ऊपर और प्रतिकर्ण के ऊपर दो दो क्रम केसरी और सर्वतोभद्र चढावे । कर्णी और नन्दिका के ऊपर एक एक शृंग चढावे । चारो दिशा के भद्र के ऊपर सोलह उरुशृंग और आठ प्रत्यंग कोने पर चढ़ावे । ऐसा संभवजिन को वल्लभ रत्नकोटि नाम का प्रासाद है । ॥१७ से २०॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्रतिकर्णों ११२, कर्णीपर ८, नंदीपर ८, उरुशृंग १६, प्रत्यंग ८, और एक शिखर, कुल २०६ शृंग । १. 'प्रथमक्रमकेसरी च द्वितोयं च श्रीवत्सकम्' २. शृङ्गद्वयं च'

१८८ प्रासादमण्डने ४-अमृतोद्भवप्रासाद — तद्रूपे तत्प्रमाणे च रथे कर्णे तिलकं न्यसेत् । अमृतोद्भवनामोऽयं सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥२१॥ इत्यमृतोद्भवप्रासादः ॥४॥ तल और स्वरूप रत्नकोटि प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि-कोण और प्रतिरथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें । जिससे अमृतोद्भव नाम का प्रासाद होता है । यह सब देवों के लिये बनावे । ॥२१॥ शृंगसंख्या-पूर्ववत् २०६ । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णों ८ कुल १२ । विभक्ति चौथी । ५-अभिनन्दनजिनवल्लभ—क्षितिभूषणप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे षोडशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्यं प्रतिकर्णास्तथैव च ॥२२॥ उपरथो द्विभागश्च भद्रार्धं द्वयमेव च । कर्णे च क्रमचत्वारि प्रतिकर्णे क्रमत्रयम् ॥२३॥ उपरथे क्रमद्वौ च ऊर्ध्वे तिलकशोभितम् । द्वादश उरुशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश ॥२४॥ क्षितिभूषणनामोऽयं प्रासादश्चाभिनन्दनः । इत्यभिनन्दनजिनवल्लभः क्षितिभूषणप्रासादः ॥५॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करें । उनमें से दो भाग का कोण, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग का उपरथ और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणे के ऊपर चार क्रम, प्रतिरथ के ऊपर तीन क्रम, उपरथ के ऊपर दो क्रम और एक तिलक चढ़ावे । चारों तरफ के भद्र के ऊपर बारह उरुशृंग और सोलह प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा अभिन दन जिन वल्लभ क्षितिभूषण नाम का प्रासाद है ॥२२ से २४॥ शृंगसंख्या-कोणे १७६, प्रतिरथे २१६, उपरथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग १६ एक शिखर, कुल ५३३ शृंग । तिलक ८ उपरथे ।