पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
३१० पृथ्वीराजरासो । [छठां समय १२ झापटा बीर जब जुखत जुद्ध । नहिं सहत जोर दनुदेव सुद्ध ॥ मांनिक्क भद्र है मेर मान । ठेलन अठिल्ल गढ द्रुग्ग पान ॥ ८२ ॥ कपडिया बीर कछा करौंकिन्ति । मन वित्त राग जै मुक्ति जित्ति ॥ केदाइ राइ नव जुद्ध आप । दिषन्त नैन जिन जात पाप ॥ ८३ ॥ नरसिंघ बीर नरसिंघ रूप । चौगुन विलास आतम अनूप ॥ गोरिया बीर गुन सकल जानि । नव रसन रास नाना विनांन ॥ ८४ ॥ घट घंट बीर जनमे सुजान । सोषत समुद्र अरि समुद्र पानि ॥ कंटंभ्य बीर सुनि समर बाज । दनु दलन कटक में परै गाज ॥ ८५ ॥ बग नाम बीर जब समर कच्छ । बग लेत ढुंढ जनु नीर मच्छ ॥ माच्छवगाव वल्लंग अंग । अदभूत अंग रुपह सुरंग ॥ ८६ ॥ संतो साइ सत मतह सुधीर । पर मध्य अच्य भव नाव कीर ॥ मच्चा संतोस सत संग धार । सेवक समुद्र भव नाव पार ॥ ८७ ॥ भ्रमराइकाइ बल्ल वाय वेथ । भ्रम परे समर छल परैं लेथ ॥ मच्चाभमराइ काइक्क अजीत । भ्रम होइ ताहि जाकूर चीत ॥ ८८ ॥ सहसाष अष्यि कर सहस जान । जानु द्रुपद मध्य रहै रच्छ दान ॥ सह स्त्रांग अंग नित रूप चिच । भय भीत अभय भै करन मिच ॥ ८६॥ बेच पाल चिति पल करै प्याल । नाना चरित गोपाल बाल ॥ भूतषनडू बीर बलबन्त कूर । तटवन्त षिभिरू तनं करत चूर ॥ ६० ॥ साक्किनीमार अदभूत जोर । समरन्त भक्त तन हरत रोर ॥ बेदरी रीति भङ्गम बलाय । कलपंत करन जे तके तपाइ ॥ ६१ ॥ सालि बाहनह ससि सूर रूप । सेवकं निवाजि बुर करत भूप ॥ ए नाम बीर सुनि चंद लेइ । पहिचांनि प्रसन करि विदा देइ ॥ कुं० ॥ ९२ ॥ ६० ॥ २७ ॥ समीर । वांन । दनुंनि । पांनि । पांन ॥ ७६ ॥ बीर । त्रिगुन । क्रभंत । जल हरन ॥ ८० ॥ नांम । करूं । करौं । पाय । सहाय । करौ । ध्यानं । जिहिं । ग्यांन । घ्यांनं ॥ ८१ ॥ झापरा । युद्ध । नह । माणिकं भद्र । मांन । पांनि ॥ ८२ ॥ कापडिया । कहां । करौं । वीत । जिति । केदाइराय । दिषंत । नैन ॥ ८३ ॥ त्रिगुन । गोठिला । जांन । जांनि । विनांन ॥ ८४ ॥ घटघंटे । दुजान । मैं । सुं जांन । समुंद । यांनि । कुनटेभ्य । सनि । मैं । परै ॥ ८५ ॥ बग । नांम कछि । कच्छ । लैतं । ढुंठि । मछ । माहवगाव ॥ ८६ ॥ सत्त । मत्तह । परमध्य । अथ । नामकीर । बीर सत्यंग ॥ ८७ ॥ भ्रमराय काय । परें । परै । महाभ्रमराय । कायक । होत ॥ ८८ ॥ सहसाष्य अषि । जांनि द्रुपद । रखि । दांन ।'सहश्रांग ॥ ८६ ॥ चित्रपाल । बाल । पाल । 'भूतषनाय । भूतपनारू । पिंभि ॥ ९० ॥ सांकिमीमार । बलाय । पाय ॥ ६१ ॥ सालिवाहन । नांम । लेई पहिचान ॥ ६२ ॥
छठा समय १२] • पृथ्वीराजरासो । ३११ चंद का बावनो वीर को पहिचान कर प्रणाम करके विदा करना और आप पृथ्वीराज से मिलने के लिये आगे बढ़ना । कवित्त ॥ पहिचानिय कविचंद । बीर बावंन सूर बर ॥ सहाकाय सडमत्त । अंत जनु अच्छिन दनुज खर ॥ तेज साजि चष साजि । तास धीरज्ज धीर धर ॥ भीत मयंक भयांन । जानि ग्रीषंम अगनि झर ॥ करि नवनि चंद पहिचांन सब । वज्रपात अग्या कन्तिय ॥ बहुराइ देव कवियन प्रवल । मिलन पिव्य आगैं चलिय ॥ छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २८ ॥ चन्द का उस जङ्गल का वर्णन करना जहां पृथ्वीराज आखेट खेलता है ॥ कवित्त ॥ अग्य गयौ गिरि निकट । बिकट उद्यान भयंकर ॥ जैहन पवरि दिसि विदिमि । बहुत जहूँ जीव पयंकर ॥ सिंच कोल गज रीछ । बहुत सामर बलवंते ॥ चीतल चीत चिरंन । पाइ परखें भजि जन्ते ॥ सेही सियाल खंगुर बहु । कुड कदंम भरि तर रहिय ॥ पिप्पे सु जीव कवि चंद नैं । तुच्छ नाम चौपद कहिय ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २९ ॥ कवित्त ॥ ठाम ठाम जल थान । मद्धि जनु जीव निवासिय ॥ ढेंक कुरंस कुरंच । हंस साग्सं सुभ भासिय ॥ वगले बतक विहंग । मगर मक्र कक्र द्रह पूरिय ॥ देखि दनुज पंनग निवास । सिद्ध साधक रुचि हरिय ॥ पर परषि वरन घन पिप्पियै । रोम हर्ष देखत नरन ॥ तुझ बुद्धि भट देखत भुल्यौ । कवि सुभन्ति कहै का वरन ॥ छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ ३० ॥ २८ पाठान्तरः-पहिचांनिय । मदमंत । चप भासि । धीरज । जानि । ग्रीषम अगनिर । पहिचांनि । बहुदाय । पिय । आगैं ॥ २९ पाठान्तरः-अग्र । जहां । तह । बहुत । जहां । सीह । रोछ । सांमर । सांबर । चित्रक । हिरन । पाय । परकै । लंगुर । पिये । तुक । नांम । चोपद ॥ ३० पाठान्तरः-ठांम २। यांन मधि । निवासीय कबह द्रह । पूरीय । पिपियै । बुधि भट ॥ ८
३१२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १४ कवित्त ॥ सघन वृष घन छांह । जानि बहल नभ वासिय ॥ देषत पथ्य गिरंत । वेलि अवलम्बि विलासिय ॥ खोर खोर कोकिलन । (रौर)* चीह पप्पीह पुकारत ॥ सुमन सुगन्ध सबूछ । अंध मधुकर मधु आरत ॥ बहु कुची बाज सिंचान बच । खंगूर लाग लेयन फिरैं ॥ देषन्त जनावर अष ची । जनु प्रकास तारा गिरैं ॥ छं० ॥ ८६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥ कवित्त ॥ तहँ खेलत पृथिराज । संग सामंत जङ्ग जुरि ॥ घट सुडोरि सँग स्वान । लेत ते जीव सबन जुरि ॥ बगुर घेरि विष्षंन । अप्प झुंजन में मंडिय ॥ तक्क तके इक रचिय । चक्कि घेदा षिक्ष कंडिय ॥ भंचराइ भग्गि पसु उठि चले । आवै आवै होइ रंचि ॥ परसपर खोर वे करत सुनि । यों सिकार चन्दह सुवचि ॥ छं० ॥ ८७ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ पृथ्वीराज के शिकार की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ तिक्क भाल ससि षण्ड । गण्ड मद भमर बिलुड्डिय ॥ सुरभि तेज सिंदूर । सुमन संपति मन सुद्धिय ॥ सुद्ध दुद्ध जिम दसन । विसद बानी जिम निम्मल ॥ परस मुसल असि चर्म । हत्थ पंचम मोदक कल ॥ पुज्जिय सुचंद सुरइन्दजग । गवरिनंद दूषन दुरय ॥ कंपच्चि सिकार गज तुंड डर । सब विघंन गनपति घरय ॥ छं० ॥ ८८ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ ३१ पाठान्तर-वृष्य । जांनि । बदल पद्म । पथ । * अधिक पाठ है । पपीह । सीचान । लंगुरुं । फिरें । देषत । जिनावर । भक्षक ही भक्षक हैं। जनुं । आकास । गिरें ॥ ३२ पाठान्तरः-तहां । सुं डोरि । संग । स्वांन । बंगुर । घेरोय । वियन । पूंडिय । हकि । भयराय । भगि । हुइ । रहिय । लहिय ॥ ३३ पाठान्तरः-गंड चम्भर मदलुट्ठिय । सुब्भि । संपत्ति । दुद्ध । दूध मुद्ध । वांनी । ज़िमल । चर्म । हथ । पुजिय ॥
छठा समय १७ ] पृथ्वीराजरासो ३१३ कवित्त ॥ दुजपति चंकह हिरन । इक्कनिभय सुभाव अति ॥ गजनंतह टाग्ग । विघ्न विय दिट्ट गनपति ॥ षट आनन वर जोर । दतिय उप्पीय निसंक उर ॥ भगवति वाहन सिंघ । बेदग जीय सुमेर थरि ॥ वरदाइ चंद सुपच्चारि पग । पंचम वछ सुपछ रचहि ॥ आतंक अवर आरन्य पसु । डर घरहरि कंपत रचहि ॥ छं० ॥ ९९ ॥ रू० ॥ ३४ ॥ कवित्त ॥ छहरि हिरन हारियव । हेरि कातर रव रहिय ॥ अप्प घास भय मोछ । विरछ लग्गी चटपहिय ॥ हिय धरक्क धुधरह । वदन लोइन जल निझझर ॥ तंकित चकित संकीन । समग संकरिय दुप्भर ॥ सैरत्त चमकन्त पत्त रव । पिनक चित्त जिम उप्परै ॥ पिल्लंत सिकार पिथ कुँअर डर । पसु पींपर दल थरथरै ॥ छं० ॥ १०० ॥ रू० ॥ ३५ ॥ कवित्त ॥ पोमिन वन नहिं चरहि । नहिन संचरहि कुमुद वन ॥ ईप षेत परहरहि । जीर परहु अविग्त मन ॥ मंथर गति लखि मुंघ । कास कानन नह चप्पहि ॥ नह पिप्पै नियनारि । नहिन चष कंदनि रप्पहि ॥ गिरि मद्धि गह्वर गुहअह वसहि । नीर समीप न संचरहि ॥ खोमेस सुतन आखेट उर । इमड ढाल उस सह चसहि ॥ छं० ॥ १०१ ॥ रू० ॥ ३६ ॥ कवित्त ॥ गिर कंदर सर वरह । सरित कच्छह घन गुच्छह ॥ निझ्झर कूल न द्रष्टन । बेतनल्ल तिन सर पुंजह ॥ ३४ पाठान्तर:-इक सुभिय निसंक अति । गजघटन तह । गजनंतह । दिट्ठिय । गनपति । छतीय । उपीय । निसंक। गज्जीय । गर्जिय । थिर । रहिय । आतंक । आरंन्य । रहिय ॥ ३५ पाठान्तर:-हहकि । हीरन । हारीयव । रच । अय । लगिय । धरक । धुंधर । निझर । संकित । समग्ग । संकरीय । दुप । भयपन्न । चमकत । पन्न । ऊपरैं । पिलत । कुँअर । पिंयद ॥ ३६ पाठान्तर:-नहि । चरहिं । दृप । परहरत । परभय । मथर । मुध । चपहि । पिपैं । नाहि । रपहि । मधि । गुज्जह । इमद । सहि ॥
३१४ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १६
ऊजर अरि पुरं घरह । सैल तट उड्डन अद्दह ॥ हथ्य जोरि सब सुब्भि । उब्भ दिप्पहि कित लद्दह ॥ फल फूल इष्प भु प्रकास थन । बन उपवन घन संचरहि ॥ ढुंढत उढाल उढाल चिय । भुक्कारन बहु झुक्क्रहि ॥ छं० ॥ १०२ ॥ रु ॥ ३७ ॥ कवित्त ॥ नहिं गब्बत करि गब्ब । नहिन गज्जत घन गज्जत ॥ षेलत नहिय नयंन सिंघ कढि बोलत लज्जत ॥ भुञ्जन मड्डि संचरत । नहिन संचरत दुरद बन ॥ चरन लेष लुप्पतसु । पुंछ शृज मुत्तिय मग गन ॥ धक धकहि धुकहि तकहि चकहि । दिग्ध उसासन उल्हसहि ॥ प्रथिराज कुंवर कोबंड डर । गिर कंदर केसर बसहि ॥ छं० ॥ १०३ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ कवित्त ॥ बग्गुर अगिनत परत । क्तिकि फंदन पगविड़न ॥ कितेक ष्खलन मरत । कित्तिक स्वानन मद्द सिद्धत ॥ घंटनरागन कितक । कितक चीते तकि दब्बत ॥ बाज सिंचान कुहीन । झपटि चंचनु फल चब्बत ॥ घन कूच सिकारन है रची । अजि न जीव कहुं जै सकै ॥ बल्लवंत बाघ हथ्थिय अजर । पक्कि हंकि लीजै धकै ॥ छं० ॥ १०४ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ कवित्त ॥ गाडी किए कितेक । कितक उंटन पर डारे । पत राषे घर कितक । कितक हथ्थी पर धारे ॥ काचर कंधन कितक । कितक स्वानन मुष तुह्त ॥ बिंकी सर्प विषंग । मंच वादी मिल लुह्त ॥
३७ पाठान्तरः-गिरि । कक्रह । गुक्रह । निझर । कुलान । कूलह । सेल । अधह । हथ । सुभि । उभ । दिषहि । दृष । भू । भूपूकारनिबहुसुकरहि ॥ ३८. पाठान्तरः-नहिं । गबनु गब । गजत । नंन । लाजत । भुञ्जयन । रेष । लुंपतसु । पुछ । मग मुति । हिंचकहि । दिघ । उल्हसै । पृथीराज । कुंअर । केहरि । बसै ॥ ३९ पाठान्तरः-बगुरि । कितेक । स्वांनन । दबत । चंचनु । पल । चूब्बत । चूवत । क॑हु । कहुं । अथिय । हथीय । हथिय । हक्ति ॥
छटां समय. १७ ] पृथ्वीराजरासो । ३१५ वज्जत निसान सहनाइ सुर । तवल उक्का वज्जत बलिय ॥ सिक्कार खेल्लि घन रस रच्यो । सब पधार पग बलदलिय ॥ कृं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ ४० ॥ कन्ह चौहान आदि सब सरदारों का आकर पृथ्वीराज से मिलना और कहना कि आज यहीं शिकार हो ॥ कवित्त ॥ आइ कन्ह चहुआन । नवनि पृथिराजसु किन्विय ॥ आइ राइ गोयंद । पृथुक आदर आदन्विय ॥ आइ चंद पुंडीर । धीर सव्यह हंसि मिल्खिय ॥ वलिभद्रह कूरंभ । कछर किन्ने रस षिल्खिय ॥ प्रबुच्चा राहू-पावार मिल्खि । वरुन बंध सिर कर धरिय ॥ मिल्खि कछी सिंह पाछार दूच । आज केलि अदभुत करिय ॥ कृं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ४१ ॥ दूहा ॥ मिल्खिय सकल सामंत तहँ, गनि न कद्दै पृथु नाम ॥ छयन चौंस परबत गजिय,सघन सुविद्रुम झाम॥ कृं० ॥ १०७ ॥ रू०॥ ४२ ॥ पृथ्वीराज का शिकार से घर की ओर लौटना ॥ छंद पद्धरी ॥ फिर चले कुँअर पृथिराज गेह । मिनि सकल सूर सामंत नेह ॥ परछास परसपर करत केलि । नारीन नक्कि नृप-खेत खोलि ॥ १०८ ॥ मंगाइ नीर कर मुख पखारि । सब करन मंडि कर्पूर धारि ॥ गोठ (भोजन) के स्थान पर ठहरना ॥ जहां हुई गोठि भोजन नरिंद । तहां हुते सकल सामंत वृंद ॥ १०९ ॥ चन्द बरदाई का आकर पृथ्वीराज से मिलना और पिछला सब वृत्तान्त एकान्त में ले जाकर कहना ॥ फुनि मिले चंद बरदाइ आइ । ककु कही बात पिछ्ली सुनाइ ॥ नृप भद्द जाइ बैठे इकंत । फिरि कही बत्त जो आदि अंत ॥११०॥ ४० पाठान्तरः-लीए। कितक्क। कितेक। पंति। हुंथी। स्वांनन। सर्व्व। बजत। निसांन। सहनाय । डंक । घजत । सिकार ॥ ४१ पाठान्तर-आय । चहुआनं। पृथ्वीराज । किन्नियः । आय । राय । गोइंद। पृथुक । आय । सव्यह । हसि । मिलिय । बिलिय । कहिय ॥ ४२ पाठान्तरः-तहां । नाम ॥
३१६ पृथ्वीराजरासो । [ छटां समय १८ पृथ्वीराज का भोजन करना और फिर आगे बढ़ना ॥ सुष मद्धि सुष्ष प्रथिराज पाइ । भोजन करंन नृप बैठे आइ ॥ छ्ह रस निवास आहारि अंन । करि कुरल पांन करपूर लिंन ॥१११॥ म्रगमद जवाद सब चरचि अंग । कसमोर अगर सुर रचिय संग ॥ सुभ कुसुमघार संब कंठमेलि । इम चलिय बलिय चहुआन षेलि ॥११२॥ छ्ह अग्गा इक्क सौ तुरिय तेज । उड़ंत पंषि बिन पंषिकेज ॥ बगसीस सकल सामंत जोग । दिषि वाच वाच सब कहत लोग ॥ ११३ ॥ सुष चाल फाल जे छिरन लेत । उत्तंग गात पष्पर समेत ॥ गज घालि बांच घूघर सलोल । ल्षैं न राह करते कलोल ॥ ११४ ॥ घा कहंत उड़त हां कहत ठट्ठ । गिर परत धंक जिन कोट गट्ठ ॥ पित मात असलि अस्रारु देस । सब सरदारों को एक एक घोड़ा बांट दिया उसी पर सब चढ़ कर चले । सोभंत बानि रवि रय्य भेस ॥ ११५ ॥ दै एक एक सब बंटि दीन । चढ़ि सूर सकल सामंत लीन* ॥ कविचन्द को एक हाथी देना जो महा बलवान था । दिय हस्ति एक कबि चंद बोलि । अंदून ताहि को सकै षोलि ॥ ११६ ॥ तल बघत पाट सुझै न अंषि । अति पाइ काइ गछि लेइ पंषि ॥ अनि गज्ज मुष्ष को सकै झेलि । खल दलन मभक्त पारत्त भेलि ॥ ११७ ॥ सुर नाथ वाह सम अंग ओप । दिषियै खिज्यौ जनु काल कोप ॥ बिन रोस सहज में अजा जांनि । घर कोइ बंधिचै चल्यौ कानि ॥ ११८ ॥
- यह तुक एशियाटिक सोसाइटी के पुस्तक में नहीं है ॥
। छठाँ समय १६] पृथ्वीराजरासो : ३१० सक्कै न बोलि कोउ हय अरूढ । हगहरौ पग वनि कवन झूट ॥ अगि जझ मझ्झ मांनै न संक। होइ रछै सूत सुनि बज्जि डंक ॥ ११८ ॥ सुनि विरद कांन चल्लंत मग्ग । तिहि चंद छद्म दिय कनक वग्ग ॥ छं० ॥ १२० ॥ रू० ॥ ४३ ॥ दूहा ॥ पाग धरी कवि चंद सिर, हरष भयौ वहु अंग । तूं विक्रम अक्रम चरन, करन दरिद्रह भंग ॥ छं० ॥ १२१ ॥ रू० ॥ ४४ ॥ एक एक सामंत हय, कीनिय चंद हजूर । वढि चल्लिय हल्लिय अगैं, सरित तुरंगन पूर ॥ छं० ॥ १२२ ॥ रू० ॥ ४५ ॥ कवि चन्द का पृथ्वीराज की स्तुति करना ॥ कवित्त ॥ करिय नवनि कविचंद । छंद अनेक पढि कर ॥ तूं सुरपति सम कुंचर । देव सामंत समो वर ॥ अगिन कन्हं जल चंद । पवन गोइंद प्रवल वल ॥ घरा चंद वल धीर । तेज चामंड जलन पल ॥ रवि तेज कछर कूरंभ सव । चंद अमृत आवू धनी ॥ दृगपाल सवल सामंत सव । रहै दग्वि धरती धनी ॥ छं० ॥ १२३ ॥ रू० ॥ ४६ ॥ ४३ पाठान्तरः-फिरि । पृथीराज । येह ॥ १०८ ॥ मंगाय । मंगि । होइ ॥ १०६ ॥ मिलिं । वरदाय । आय । कहिय । वृत्त । पल्लित् सुनाय । जाय । एकांत ॥ ११० ॥ मध्य । सुप । पृथी- राज । पाय । भोजन । करन फुनि । बैठि । आय । लीन ॥ १११ ॥ जथार्चि । सुभ कंठहार । मेल्हि । चहुवांन ॥ ११२ ॥ इक । एक सो । उड़त पंपि ॥ ११३ ॥ उतंग । पपर । लपे ॥ ११४ ॥ धक । जिहिं । गठ । रथ ॥ ११५ ॥ हय । लिन । आंदून ॥ ११६ ॥ तब लहत । सुझै । काय। पाय। लेय । गज । मुहप । मझ । पारंत ॥ ११७ ॥ उप । दिपिये । मैं । चलो । कांन ॥ ११८ ॥ सकै । कोइ । पग । जल । मझ । मांनै । होय । वनि ॥ ११८ ॥ चालंत । सथ । ४४ पाठान्तर-तु । तूं ॥ ४५ पाठान्तर-कोनीय । चलिय । हलिय । आगे । तुंगन ॥ ४६ पाठान्तर-पढि । कुमर । कुंअर । समवर । अगनि । चावंड । आबू । सकल । रहे । दबि ॥
३१८ पृथ्वीराजरासो। [छठां समय २० दूहा ॥ जीभ एक कविचंद कै, कित्ति कही क्यौं जाइ । जीव बुद्धि पिथ्थह निमित, रह सो मत्ति सुभाइ ॥ छं० ॥ १२४ ॥ रु० ॥ ४७ ॥ सब लोगों को अपने अपने घर विदा करना ॥ रच्यौ रंग बहुुरे अ्रचन, करिय विदा सनमान । निसा सुष मंडै सुषन, जागे उगत भान ॥ छं० ॥ १२५ ॥ रु० ४८ ॥ वीरों के मिलने के समाचार से पृथ्वीराज का प्रसन्न होना ॥ प्रथीराज आनंद मन, सुनि वीरन बर वत्त । फूखत तन तरु नीर लभि, इम आतम उलसत्त ॥ छं० ॥ १२६ ॥ रु० ॥ ४९ ॥ श्लोक ॥ शुभं दिवसे शुभं वार्त्ता । अशुभेच्च अशुभानि च ॥ शुभाशुभं यथा युक्तं । भवंति दिवसानि च ॥ छं० ॥ १२७ ॥ रु० ॥ ५० ॥ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ प्रथियराज चहुआन । बान पारथ बलिबंडह ॥ प्रथीराज चहुआन । दंड दंडैति अदंडह ॥ प्रथीराज चहुवान । सरिस जुध कोउ न मंडै ॥ प्रथीराज चहुवान । सचु चिनु रह गच्चि खंडै ॥ प्रथीराज चहुवान पछु । कली करन अवतारकच्चि ॥ सोमेस सूर पूरडू सुभग । उद्धर पिथ्थ अवतार उच्चि ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ५१ ॥ ४७ पाठांतर:-जाय । बुध्दि । पिंथह । मति ॥ ४८ पाठान्तर:-सन्मान । सुष । मंहे । उगत । भांन ॥ ४९ पाठान्तर:-बत्त । लहि । इम नृप आतम उलसत ॥ ५० पाठान्तर-शुभं । सुभं । वार्त्ता । अशुभे । अशुभानि । सुभाशुभं । यथायुक्तं ॥ ५१ पाठान्तर-पृथीराज । चहुआन। चहुवान । बान। चंडह । पृथ्वीराज । अडंडह । जुद्ध । जिनु । कलि । पिथ ॥
छठां समय २१] पृथ्थीराजरासो । ३१६ दूसरे दिन सबेरे पृथ्वीराज का उठना और नित्य कृत्य करना ॥ दूहा ॥ प्रात राज जग्गे प्रथम, गो दुज दरसन कीन । देहकत्ति पुनि होइ सुचि, पावन पानि सुडीन ॥ छं० ॥ १२९ ॥ रू० ॥ ५२ ॥ करि पावन पवित्र वर, मोचन सुरभि सुतेल । मर्दनीक मर्दन करै, बढै धात तन बेल ॥ छं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ ५३ ॥ नहाकर दस गोदान, दस तोला सोना और बहुत सा अन्न दान देना ॥ करि सनान गंगोदकछ, दिय सुगाइ दस दान । दस तोला तुलि हेम दिय, अंन दान अमान ॥ छं० ॥ १३१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥ महल में पृथ्वीराज का बिराजना और सरदारों का आना ॥ इन्द् पद्धरी ॥ करि स्नान दान सुचि रूचि कुंचार। होइ देवरूप साक्षात चार ॥ कीनौ सु मङ्गल बज्जै निसान । आनन्द सकल सामन्त मान ॥ १३२ ॥ आये सुमचल सामंत सूर । पूरंन तेज वीरत्त पूर ॥ अनभङ्ग अङ्ग अनभूल बांन। जिन दिट्ठ अरिय पावै न जान ॥ १३३ ॥ कैमास आइ कीनौ जुहार । विद्या सु चतुर्दस मत्ति सार ॥ गोयन्दराज गहिलौत आइ । बैठो सुकुंचर कमलं नवाइ ॥ १३४ ॥ चहुवान कान्ह आयौ अभङ्ग । भारत्य कथ्य भीषम प्रसङ्ग ॥ अनि अनी सुभर बैठे सुआइ । अन मित्त मत्ति बल अप्रमाइ ॥१३५॥ ५२ पाठान्तर—गो । देह कंतिं । पुन: । शुचि । पांन । पांनि ॥ ५३ पाठान्तर—पावन । सुरंभ । सुरभ । मर्द्दनीक । मर्द्दन ॥ ५४ पाठान्तर—सुस्नान । गंगोदकहि । दांन । अन । दांन । अप्रमांन । ६
३२० पृथ्वीराजरासो । [छठां समय २२ राजन कुँआर मधि सूर साज। देवतन मद्धि जनु देवराज ॥ गिरिराज मद्धि सब गिरन रज्जं। देखन्त सभा सुभ इन्द्र लज्ज ॥ कं० ॥ १३६ ॥ रू० ॥ ५५ ॥ बीरों के वश होने की बात से पृथ्वीराज का पेट फूलता है पर किसी से कह नहीं सकता ॥ दूहा ॥ बैठि सभा पृथिराज रचि, आय सुरति निज चित्त ॥ वत्त बीर बरदान की, अति उमंग उलसित्त ॥ कं० ॥ १३७ ॥ रू० ५६ ॥ रचै न आनँद कुँअर हिय, उगमत कण्ठ प्रमान । कहै न कासों बत्त बर, मानों दुद्ध उफान ॥ कं० ॥ १३८ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ कैमास का हाथ जोड़कर पूछना कि आपके मुख पर कुछ उत्साह दिखाई देता है पर आप खुलकर कहते क्यों नहीं ? अरिल्ल ॥ पानि जोरि कयमास । बदै तब राज प्रति ॥ उर अवलोकित उलसत । सामन्त राज अति ॥ को कारन मुख चारु । न कथ्यिहि बत्त संति ॥ सुभर सूर सामन्त जु । विनवत्त राज प्रति ॥ कं० ॥ १४० ॥ रु० ॥ ५८ ॥ पृथ्वीराज का चन्द के वीरों को वश करने का समाचार कहना ॥ ५५ पाठान्तर-क्षांन । दान् । कुआंर । कुआर । होय । वजे । निसांन । मांन ॥ १३२ ॥ पूरन । तैज । वीरत । अभूल । बांन । दिट्ठि । जांन ॥ १३३ ॥ आय । चतुर्हूस । मंति । गोइंद । आय । आई । कुमर । कमल । नवाय ॥ १३४ ॥ चहुआन । भारथ । कथ । अंनि अंनी । आय । आई । मित । अप्रमाय ॥ १३५ ॥ कुंगार । कुआर । देवतनु । मधि । मधि । रज । शुभ । लज ॥ १३६ ॥ ५६ पाठान्तर-पृथीराज । वरदांन । अल्हसित्त ॥ ५७ पाठान्तर-आनंद । कुंगर । कुंमर । प्रमांन । मनों । दूध । । उफांन ॥ ५८ पाठान्तर-चंद्नायना । पांनि । उल्हसत । सांमंत ॥ १३६ ॥ चारु । कथि । बत । विनवत ॥ १४० ॥
छठां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ३२१ दूहा ॥ तब कहैं कुँअर सामन्त सब, काल्हि आखेटक रंग । भयौ सुर सुभैं एक भय, आलस ही सें गंग ॥ छं० ॥ १४१ ॥ रु० ॥ ५८ ॥ कवित्त ॥ अपरंजे आखेट । चन्द भुल्यौ सुवह वन ॥ जंगम इक तापस । मिल्यौ वरदाइ सुद्ध मन ॥ प्रसन भयौ कविचन्द । वीर मन्त्रह दीनौ वर ॥ अजमायौ कविचन्द । वीर बावन दरस चिर ॥ तिन देखि अमित चरितह सुनत । बरनै कवि बरदाइ अति ॥ अनेक रूप अनेक गुन । अनँत गति अनतह सुमति ॥ छं० ॥ १४२ ॥ रु० ६० ॥ सरदारों का उपहास करके कहना कि भाट, नट, चारन, ये सब आरत हैं इन की बात सत्य नहीं माननी चाहिए ॥ अरिल्ल ॥ प्रसन सूर सामन्त सकल वर । हासे अप्प परस्पर सुब्भर ॥ भट नट चारन जू आरत्तह । इनकी गति न मनियै सत्तह ॥ छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ६० ॥ कैमास ने कहा कि चन्द को देवी ने वरदान दिया है वह सचमुच कोई अवतार है ॥ गाथा ॥ कथिय वर कैमासं । देवी वरदाय चन्द भटायं ॥ अस तिन चवै असेसं । सत्यं रूप सत्य अवतारं ॥ छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ६१ ॥ कन्ह ने कहा कि चन्द छूट गया था यह बात सच है, इसी पर उसने यह बात प्रसन्न करने के लिये गढ़ी है । ५८ पाठान्तर-कुमर । कुंअर । काल्हि ॥ ६० पाठान्तर-अपरजेन भयौ । कविचंद । भूल्यो । बट । तापस । मिल्यौ । चंद । बरने । बरदाय । अनेक । अनत ॥ ६० पाठान्तर-प्रसंन । सुभर । भट्ट । नट्ट । चारंन । जु । आरतह । मनिये ॥ ६१ पाठान्तर-कथिय । भटायं ॥
३२२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २४ अरिल्ल ॥ कहै कन्ह हम मानी सब्बह । भुल्यौ भह मग्गा वन तब्बद्द ॥ उसन केलि डर जोरिय बत्तं । इह अचिञ्ज मन्नै न बिसत्तं ॥ छं० ॥ १४५ ॥ रु० ॥ ६२ ॥ पृथ्वीराज के मन में सन्देह हो जाना ॥ दूहा ॥ किचि मंनी अमनी सुकिचि, चिविधि जानि संसार ॥ सुनत राज विभ्रम भयौ, पच्यौ सुचित्त बिचार ॥ छं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ६३ ॥ इतने में चन्द का आकर आसीस देना ॥ इहि विचार करवह मनंह, आयौ चंद सुतन्त्र । दिय असीस कर उंच करि, वेद नीत वर कब्ब ॥ छं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ६४ ॥ पृथ्वीराज का चन्द को पास बुलाकर वीरों की बात छेड़ना । राजद्द सूर हकार जिय, दिय सादर सनमान । वीर बिरद बरदाय प्रति, लग्गे बत्त पुछान ॥ छं० ॥ १४७ ॥ रु० ॥ ६५ ॥ पृथ्वीराज का चन्द की बड़ाई करके कहना कि हम लोगों की बड़ी अभिलाषा है सो आज वीरों का दर्शन करवाओ ॥ कवित्त ॥ कहै चंद कविराज । बत्त पूरब जो बित्तिय ॥ कथिय कुँअर प्रथिराज । चंद चरची सो सत्तिय ॥ हमहि बहुत अभिलाष । देव वीरनि दरस कज ॥ पावहिं तो परसाद । सूर सामंत मंत अज ॥ ६२ पाठान्तर-कहँ । मांनी । भुल्यौ । मग । तबह । जोरीय । सुभ हित डबर गाम सपत्तं । अचिर्जं ॥ ६३ पाठान्तर-किहिं । स । किहिं । चिधा । जांनि । चित ॥ ६४ पाठांतर-इह । घिवारि । तंब । दीय । ६५ पाठान्तर-राज । हक्कार । सनमांन । वरद । वरदार । लगे । पूछानं ॥
छठां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो : ३२३ तो सम न और तिहु लोक में । नह सह नाटिकक नर ॥ संसार पार वोद्दिय समर । तोहि सात देवी सुबर ॥ छंदं ॥ १४८ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ कवि चन्द का मंत्र जपना और होम करना ॥ दूहा ॥ सुनि आनंद्यौ चंद चित । कीन संत्त आरंभ ॥ जप्प जाप छवि होम सब । लग्ग्यौ कज्ज असंम ॥ छंदं ॥ १४९ ॥ रू० ॥ ६७ ॥ वीरों का प्रगट होना ॥ गाथा ॥ किय जप जाप सुछोमं । आए वीर धीर आतुरयं ॥ गज्जै गयन गभीरं । भय भै भीत सोर आघातं ॥ छंदं ॥ १५० ॥ रू० ॥ ६८ ॥ छंद भुजंगी ॥ धसंकी धरा धंम धंम्मै धरक्की । कठं पिठ कंमठ्ठ कठ्ठे करक्की ॥ डिग्गै अड्डिगं सो दिगंपाल दस्सं । तरक्कै चकै मुनि जंनं तपस्सं ॥१५१॥ अरक्कै सुवाजं सु वाजं विछुट्ठै । तरक्कैक एकं उलट्टै सुलट्टै ॥ इसो आगमं भै सुबावन्न वीरं । कंपे काइरं धीर रयौ सुधीरं ॥ छंदं ॥ १५२ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ वीरों के शब्द से सामंतों का डरकर सोचना कि बिना काम इन को बुलाना ठीक नहीं हुआ । दूहा ॥ सुनिअ घात डर वीर कौ, चमकै चित सामन्त इन आकर्षै कज्ज बिन, किनौं अप्प अमन्त ॥ छंदं ॥ १५३ ॥ रू० ॥ ७० ॥ ६६ पाठान्तर-कहै । कुंवर । प्रथीराज । चरचा । चरचि । सतिय । दमहिं । घोरनि । धोरानं । कजि । पाबहि । सामंत । तिहुं । मैं । नट । भट । नाटिक्र ॥ ६७ पाठान्तर-आनंद्यो । मंत्र । जप । सम । लगे । कज ॥ ६८ पाठान्तर-गाहा । स । गजे ॥ ६६ पाठान्तर-धम्मकी । धम । धम्मै । धम्मे । धम्मैं । धरकी । कमठ । कठे । फरकी । डिगै । डिगे । अडिगं । द्विगंपालं । दसं । तरके । तरकैं । चक्रे । मुनि । मुनि । जनं । तपसं ॥ १५१ ॥ भरके । बिखुटे । तरंकैक । उलटे । सुलटे । इसो । धीरं । कंपे । कंपैं । कायरं स ॥ १५२ ॥ ७० पाठान्तर-सु आघात । चमके । कज । किनौं ॥
३२४ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २६ दो मत्त हाथी दर्बार के बाहर बाँधे थे वह बीरों का भयानक शब्द सुनकर चौंके ॥ दूहा ॥ गज घुमन्त गजराज बर, दो हथ्थी दरबार ॥ दूरि दूरि बन्धे रचैं । काल समान करार ॥ छं० ॥ १५४ ॥ रु० ॥ ७१ ॥ कवित्त ॥ अति बलवन्त अनन्त । गरुअ मानहु गिरवर से ॥ गगन जेम गाजन्त । बंध बंधन ते सरसे ॥ च्यार पटे कुहे * कंकालं । मह नद्दच सुअह्यो निसि ॥ , पवन पाइ पुरवाइ । काल रूपी कंकाल रिस ॥ सिर दिघ्घ दिघ्घ दन्तह सुभग । जरजराइ बंमरि जरिय ॥ लष लष दाम पावहि पटै । कनक साजचाज सु करिय ॥ छं० ॥ १५५ ॥ रु० ॥ ७२ ॥ दोनो हाथियों का तुड़ाकर लड़जाना और दर्बार में खलबली मचना ॥ दूहा ॥ बीर खोर आघात सुनि, गज छुटि बन्धन तोरि ॥ भिरे उभय भय भीत होइ, परि दरबारह रौरि ॥ छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ७३ ॥ छंद मोतीदाम ॥ भिरे गजराज भयानक रूप । उमै मदमत्त मचा जम झूप ॥ भए काङ्काल कराल अछूट । लगै जनु क्रोध सु कज्जल कूट ॥ १५७ ॥ जुरे जुग जानि गुरु गजराज । किधौं कउ दानव रूप दुराज ॥ जगे प्रलकाल भयानक भूत । इसे दुहू दन्ति भिरे अद्भुत ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७४ ॥ ७१ पाठान्तर-गुमांन । हथ्थी । रहे । समांन ॥ ७२ पाठान्तर-गरुय । मांनहु । तैं । च्यारि । पट । * अधिक पाठ । मद । ह्व । हद्व । अह्रनिसि । पाय । पुरवाय । कंक्राल । दिघ दिघ । गरदराइ । वंगरी । लष २ । दांम । पावहिं । पटे । साजसु ॥ ७३ पाठान्तर-छुट्टि । भिरै । भै । दरबारहिं । रोरि ॥ ७४ पाठान्तर-भिरैं । भयानक । मदमत । कोऊ । चाहठ । लगे । कजल । कूट ॥ १५७ ॥ जांनि । गिरराज । कोऊ । दानव । लगे । जगै । प्रलै । भिरैं ॥ १५८ ॥
छठां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो ३२५ सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों का वश में न आना ॥ दूहा ॥ दौरि सकल सामन्त मिलि, करे अनन्त उपाहू ॥ रोस लगे छुटै नहीं, भई सुहायो चाहू ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७५ ॥ चिहूं ओर हरषी छुटै, परै अगड सुमार ॥ गोना लगे गिलोल्ल गुरु, छुटै न तो इसरार ॥ छं० ॥ १६० ॥ रु० ॥ ७६ ॥ गाथा ॥ वर वावंन सु वीरं । कौतिग लषन्त सूर सामन्तं ॥ करे अनन्त कळापं । नह छुटन्त गज गरुं च्यारू ॥ छं० ॥ १६१ ॥ रु० ॥ ७७ ॥ चन्द का बावन बीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन हाथियों को छुड़ाकर बाँध दीजिए ॥ दूहा ॥ तब कर जोरिय चन्द कवि, अग्गे वांवन वीर ॥ तुम सु छुडावहु मन्त कछु, बहुरि जरहु जञ्जीर ॥ छं० ॥ १६२ ॥ रु० ॥ ७८ ॥ भैरव की आज्ञा से बीरों का हाथियों को ज़ंजीर से बाँध देना ॥ अरिल्ल ॥ तब भैरव भूवाल वीर वर । कीन हुकम कालीय ऊंच कर ॥ छोरावहु गजराज पांनि गछि । बहुरि जरौ जञ्जोर थान कहि ॥ छं० ॥ १६३ ॥ रु० ॥ ७९ ॥ दूहा ॥ तब काली दोखौ तलपि । गज्ज कुराइ समत्थ ॥ उभै पांनि सौं रद उभै । गहै उभै वरहत्थ ॥ छं० ॥ १६४ ॥ रु० ॥ ८० ॥ ७५ पाठान्तर-दोरि । सामंत । करै । उपाय । लगैं । छुटै । नही । स ॥ ७६ पाठान्तर-चिहुं । उर । परे सुगड पर मार । लगें । गुरु । छुटै । तो । अस ॥ ७७ पाठान्तर-बांधन । । सामंतं । करै । गुरुयादं । गरुआई ॥ ७८ पाठान्तर-बावन । बांबंन । स ॥ ७९ पाठान्तर-भुवाल । किंन । उंच । छोरावौ । पांनि । जरौ । यांनि । कहिं । ८० पाठान्तर-गज । छोराय । समय । पांनि । सो । सं । हथ ॥
३२६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २८ यह कौतुक देखकर सरदारों का आश्चर्य में होना और सब का दर्बार में आकर बैठना ॥ गाथा ॥. बंधन दीन सु पाइं । कौतिगं दिष्ययं सब्ब सूरं ॥ मंनिय मन आचिज्जं । बैठे फेरि आइ दिवानं ॥ छं० ॥ १६५ ॥ रु० ॥ ८१ ॥ पृथ्वीराज का सब बीरों को प्रणाम करना, चन्द का नाम लेकर सब बीरों को पहिचनवाना ॥ परसे बीर सु सब्बं । करी प्रथिराज पांइं परिनामं ॥ प्रथक चन्द कथि नामं । पच्चिचांने बीर बीरायं ॥ छं० ॥ १६६ ॥ रु० ॥ ८२ ॥ चन्द का पृथ्वीराज से कहना कि बिना कारण इन को बुलाया है इस से इन की बलि दो पृथ्वीराज का बावन घड़ा मदिरा बावन बकरे मँगाकर बलि देना और भैरव आदि की पूजा करना । छंद पद्धरी ॥ पहिचांनि राज प्रथिराज बीर । भयौ उदित मन आनंद धीर ॥ कविचंद कथिय प्रथिराज राज । इन देहु सुबल व्याकुल समाज ॥ १६७ ॥ विन कज्ज अप्प आराध कीन । नवि विछत कुसज्ज खब्भो सुईन ॥ बावन घट वारुनि मँगाइ । बावन बीर प्रति घट पाइ ॥ १६८ ॥ बावन अजासुत भष आंनि । दीने सु आदि भैरव निदांन ॥ सिंदूर तेल पुहपनि अरचि । सन्तोष पोषि सब तन चरचि ॥ छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ ८३ ॥ ८१ पाठान्तर-दीय । सु पायं । पाई । सब्ब देषीयं । दिषय सब । मनियं । आचिजं । फिरि । आय । दीवांनं ४ ८२ पाठान्तर-कर । करि । पाय । पृथुक । करि ॥ - ८३ पाठान्तर-पहिचानि । प्रथीराज । भयो । श्रीर । कहीय । प्रथीराज । स । बाकुल ॥ १६७ ॥, कज । कुशल । लभौं । बावन । घट । मंगाई । घट । पान ॥ १६८ ॥ भष । आंनि । निदान । ओरचि । चरचि ॥ १६९ ॥
छठां समय = ६] पृथ्वीराजरासौ । ३२७ वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर माँगों सो हम दें और अब हमको विदा करो ॥ दूहा ॥ भये त्रिपत वीराधिवर, पूरन डक्क डकार ॥ अनि आनन्दत उल्हसंत, बोले वयन वकार ॥ छं० ॥ १७० ॥ रु० ॥ ८४ ॥ मङ्गि मङ्गि महिपत्ति तुअ । सोइ समर्प्पै आज ॥ दै सुविहा न विलम्ब करि । जु बाकु चित्त तुअ काज ॥ छं० ॥ १७१ ॥ रु० ॥ ८५ ॥ पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय हमारी सहायता कीजिएगा ॥ गाथा ! जंपे वर बरदाई । तुम वरं वीरं देव देवाधिं ॥ औ प्रथिराज सहाई । जुद्धं जय राज जुहाईं ॥ छं० ॥ १७२ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा समय आवै तब हम को याद करना ॥ गाथा ॥ तब वर भैरव वीरं । उच्चारीगं संसुप्पं चन्दं ॥ जं तुंम वंकट ठारं । तं सँभारं विचित्त अम्हाएं ॥ छं० ॥ १७३ ॥ रु० ॥ ८७ ॥ गाथा ॥ परतिषि अम्ह सुपुह्वं । करयं जुद्धं तव्व साहस्सं ॥ जथ्यं चडिउन चन्दं । तथ्यं करै न हम आगमं ॥ छं० ॥ १७४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥ ८४ पाठान्तर-नृपति । डंक । डक । आनन्द तन । बैन ॥ ८५ पाठान्तर-महिपति । समर्प्यै । दैह । तूं कछु चिंतत काज ॥ ८६ पाठान्तर-जंपै । वर । बीर । देवधि । वीर देवाधि । जुटाई ॥ ८७ पाठान्तर-उच्चारिग चंद संमुषं । तुंम । वंकठ । ठौरैं । संभारै । संभारे । विचित्र । अम्हाई ॥ ८८ पाठान्तर-अंम्ह । जुहु । तब । साहसं । जयं । तथं । हंम्म । आगमं ॥ ९०
३२८ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ३० बचन देकर बीरों का बिदा होना, सरदारों का चन्द की बात पर प्रतीत करना और पृथ्वीराज का चन्द पर अधिक प्रेम बढ़ना ॥ दूहा ॥ दइय वाच सब बीर नै, बहुराए कवि चन्द ॥ सब सामंत अनन्द भौ । दरसत नट्ठे दन्द ॥ छं० ॥ १७५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ सत्य करै मान्यौ सकल । हरषित भय प्रथिराज ॥ प्रेम बढ्यौ अति चन्द सौं । साचस रीत समाज ॥ छं० ॥ १७६ ॥ रु० ॥ ६० ॥ पृथ्वीराज का चन्द से कहना कि सब सरदारों को मन्त्र बतला दो, चन्द का सब को मन्त्र बतलाना ॥ गाथा ॥ तब कूंअर कहि चन्दं । देहुं मन्त्रं सव्वं सामन्तं ॥ तब कहि मन्त्रं चन्दं । कीन अप्प अप्पं सहायं ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ ६१ ॥* चन्द को बीस गाँव और एक घोड़ा पृथ्वीराज ने दिया ॥ दूहा ॥ बीस गांव कविचन्द प्रति, करी कुँअर बगसीस ॥ एक बाजि साजति सजहि । दियौ सु सम्भरि ईस ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ६२ ॥ इति श्रीकविचन्द विरचिते प्रथिराजरासके आखेटक बीरबरदान वर्णनं नाम षष्ठ प्रस्ताव सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥ ८६ पाठान्तर-बीरनैं । सामंत । नठै ॥ ६० पाठान्तर-सति । करे । मंन्यौ । हरषत । प्रथौराजं । समाजं ॥ ६१ पाठान्तर-देहु । मंत्र । सब । अप्प । अप ॥ * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ६२ पाठान्तर-गांम । कुअर । कुंअर । सजि । दीयौ ॥
अथ नाहर राय कथा वर्णनं लिख्यते ॥ —❖— ( सातवां समय ) सोमेस्वर देव का शिवरात्रि का व्रत जागरण करके सोने की तुला दान करना और उसे बांट देना ॥ दूहा ॥ ग्यारह सौ गुन तीस वदि, फागुन चवदसि सोम ॥ सिवरत्ती सोमेस नृप, निसा मण्डि जप होम ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ पञ्च गव्व अस्नान करि, सीस सहस घट मण्डि ॥ दीपदान घृत सहस शिव, कुसुमंजलि सिर व्हंडि ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ शिव उपास सोमेस वर, पञ्च उपासि सुराज ॥ सदा मोह भक्ती सुगुर, करिय कित्ति कविराज् ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ श्लोक ॥ शिवशिवा उपास्य राजन्, वीर्य देवन कामयम् ॥ कविचन्द महावाणी, प्रगट रूपेण विस्मितम् ॥ छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥ दूहा ॥ चतुर जाम जग्गिय नृपति, कनक तुला तहँ कीन ॥ प्रात समै वर दुजन कहुँ, बंटि अप्प कर दीन ॥ छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥ १ पाठान्तर—दोहा । सैं । सैं । सुनि । चवदिसि । सिवरती । नृप ॥ इस रूपक में संवत् ११२६ अनन्द साक वा पृथ्वीराज का तृतीय साक है । इस का वर्णन कवि ने आदि पर्व्व के रूपक ३५५ । ३५६, पृष्ठ १३८ में किया है । तदनुसार इसमें अन्तर के ९० । ९१ वर्ष जोड़ने से ११२६ + ६० । ९१=१२१६ । १२२० वर्त्तमान विक्रमी होगा ॥ २ पाठान्तर—पचगव्य । अस्नानं । सहस्र । दान । सहस्र । कुसुमांजलि । शिर ॥ ३ पाठान्तर—शिव । स राज । स गुर ॥ ४ पाठान्तर—शिवसिवा । राजं । राज्यं । धीर्यं । कामयं । वांनी । रूपेन । विस्मितं. ॥ ५ पाठान्तर—जाम । तहां । समे । कहौं ॥