राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग ६९ [स्तम्भ १] कपटेश्वर तीन ओर से अत्यन्त हरित उत्तुंग देवदार तथा चीड वृक्षों की अवलियों से आवृत है। उत्तुंग हरित सुन्दर शिखर हैं। ऊपर निर्मल नील गगन है। गाँव की दिशा की ओर पृष्ठ भागों में बहुत दूर हिमाच्छादित शिखर सूर्य किरणों के प्रतिबिंब में रंग बदलता दिखाई पड़ता है। यदि आँखें नीचे उठ गयीं, तो विस्तृत हरी-भरी उपत्यका, उनमें यत्र-तत्र बिखरे ग्राम छाया तुल्य दिखाई देते हैं। स्थान की परिकल्पना अद्भुत है। विचित्र है। आज खंडहर हैं। इन खंडहरों में किंचित् कल्पना का आश्रय लेने पर स्थान की भव्यता का अनुभव होगा। मध्य में वृत्ताकार कुंड के चारो ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। जल के नीचे तक सीढ़ियाँ चली गयी हैं। जल के स्तर से दो-तीन फीट ऊपर २० छोटी-छोटी मन्दिराकार मढ़ियाँ कुंड के तटपर बनी हैं। चारों दिशाओं से चार सीढ़ियाँ भूमि स्तर से जल तक आती हैं। प्रत्येक दो सीढ़ियों के मध्य उल्लिखित ५ मढ़ियाँ मन्दिरा- कार बनी हैं। मंडयों की छतें प्रस्फुटित कमल के चौकोर पत्थर से ढँकी हैं। मढ़ियाँ चौकोर हैं। इस प्रकार की मढ़ियों के निर्माण की प्रथा काशी तथा अन्य तीर्थ स्थानों में जलाशयों के तटों पर है। उनमें विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कहीं-कहीं मढ़िया स्नान के पश्चात् वस्त्र परिवर्तन करने, साधुओं के निवास किंवा पूजापाठ करने के लिए काम में लाई जाती हैं। कपटेश्वर की मढ़िया लगभग ३ फुट ऊँची तथा उतनी ही चौड़ी होंगी। प्रायः वर्गाकार हैं। मढ़िया केवल देवस्थान एवं मूर्ति स्थापन के लिए बनाई गई थीं। एक मढ़ी में पत्थर का सिंहा- सन नष्ट होने से बच गया है। गाँववालों से मढ़ियों के विषय में पूछने पर पता चला। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था। मढ़ियों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मुसलिम काल में उन्हें उठाकर फेंक [स्तम्भ २] दिया गया। मन्दिर गिरा दिए गए। इस प्रकार कुफ़्र एक का गढ़ नष्ट हो गया। ईमान की विजय हुई। मढ़ियों के ऊपर भूमि का विस्तृत ऊपरी स्तर है। यह चौड़ा स्तर चारों ओर चौकोर है। स्तर के मूल से भूमि बाँध की तरह उठती गयी हैं। उस ऊँची भूमि पर चारों दिशाओं में चार भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया गया था। इस समय केवल एक का आकार शेष रह गया है। शेष तीन मंदिर तोड़ दिए गए हैं। खँडहर बन गए हैं। उनके पत्थर ग्रामीण उठा ले गये हैं। चारो चारों मन्दिरों के द्वार से जल तक पहुँचने के लिए चारों दिशाओं से उतरती सीढ़ियाँ कुंड में जाकर लोप हो जाती हैं। ऊपरी मंदिर जलस्तर से लगभग एक सौ फुट ऊँचाई पर होगा। ग्राम की तरफ जल एक प्रणाली से निकलता है। प्रणाली के तल में कुछ खंडित देवताओं की मूर्तियाँ तथा शिवलिंग रखे हैं। वे तोड़कर छोड़ दिये गये थे उनकी दयनीय स्थिति जगत् को दिखाने के लिए उन्हें नारियों में ईंटों की तरह रख दिया गया है। इस स्थान से जल लेकर आचमन किया जाता है। ग्राम तथा कुंड की मध्यवर्ती भूमिपर इस समय मंदिरों के विशाल ध्वंसावशेष मिलेंगे। एक छोटा मंदिर गाँव की ओर वाली ऊँची भूमि तथा सरोवर की दीवार के मध्य स्थित है। तीनो मंदिरों के मुख किंवा द्वार सरोवर की तरफ हैं। दोनों विशाल मन्दिरों का अधिष्ठान भूमि से १५ फुट ऊँचाई पर हैं। मन्दिर के अन्तराल तक पहुंचने के लिए ९ सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। उक्त दोनों विशाल मन्दिरों की पट्टिका के ऊपर का ढाँचा बिल्कुल लोप हो गया है। भित्तियों का कहीं पता नहीं है। केवल चारों भित्तियों का मूल आधार मात्र शेष रह गया है। मन्दिरों के पत्थर ग्रामीण तोड़-फोड़कर उठा ले गये हैं। केवल भूमि से अन्तराल तक पहुँचनेवाली
७० राजतरंगिणी सीढियां शेष रह गयी हैं। यह दोनों मन्दिर दीवार तथा कुंड के मध्यवर्ती भूमि की सीढ़ियों के दक्षिण में स्थित हैं। लघु मन्दिर वाम पार्श्व में हैं। लघु मन्दिर में दो साधू अपना सामान रखते हैं। उसमें प्रतिमा किंवा शिवलिंग नही है। लगभग तीन वर्षों से वे यहाँ निवास करते हैं। समीप फौज की छावनी है। फौज के सिपाहियों ने अपने प्रयास से एक तिरपाल डालकर अस्थायी टेंट बना दिया है। टेंट में बाबाजी भोजन बनाते हैं। रात्रि में सोते हैं। उनमें एक हरिद्वार तथा दूसरा प्रयाग का साधु था। बाहरी दीवाल की मध्यवर्ती सीढ़ियों के दोनों पार्श्व में १० गवाक्ष की तरह मढ़ियाँ बनी हैं। इस प्रकार एक दिशा की दीवाल में २० ताखा थे। चारो ओर की दीवालो में कुल ८० मढ़ियाँ रही होंगी। शेष तीन तरफ की दीवालों में कोई मढ़ी शेष नहीं रह गयी है। दीवालों का आकार तथा रूप समाप्तप्राय हैं। इन मढ़ियों की छतें पत्थर पर खुदे उत्फुल्ल कमल की बनी हैं। एक ओर लघु मन्दिर उक्त छोटे मन्दिर के सम्मुख कुछ हटकर हैं। भग्ना- वस्था में हैं। दोनों छोटे मन्दिर ऊँचे अधिष्ठान पर बने हैं। मैंने साधुओ से बहुत देर तक बातें कीं। उनका कहना था। दो वर्ष पूर्व तक यहाँ बहुत पत्थर थे। शनैः शनैः सब चोरी हो गये हैं। लोग उठा ले गये। गाँववाले मकान बनाने तथा कब्रों में लगाने के लिए ले जाते हैं। रक्षा के अभाव में प्रतीत होता हैं, यहाँ के सब ध्वंसावशेष समाप्त हो जाएँगे। उसी भूमि पर एक ओर एक और मन्दिर शेष रह गया है। मैंने गाँववालो से यहाँ की बातें जाननी चाही। पूछने पर पता चला। पचास-साठ वर्ष पूर्व उनका चिह्न था। किंतु वे गिरते ही गए। कोई मरम्मत नहीं होती थी। मंदिरों में देवता नहीं थे। अतएव हिंदू डोगरा राज काश्मीर में होने पर भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया। पत्थर ले जाने वालों को कोई रोकने वाला नहीं था। इसलिए पत्थर आदि गायब होने लगे। मन्दिरों के स्थान पर मढ़ियों के ढूहे रह गये है। कुछ समय पश्चात् ढूहे जो पुराने चूनों और सुर्ख़ियों के अवशेष थे, उन्हें गधों तथा छतों में लगाने के लिए लोग ढो ले गये। चैत्र तृतीया को यहाँ मेला लगता हैं। स्थानीय मुसलमानों से इस मन्दिर तथा स्थान के विषय में सर्वदा कुछ न कुछ विवाद रहता है। ग्राम में पीने तथा सिंचाई का एक मात्र स्रोत इस तीर्थ का जल है। जब से यहाँ साधु लोग रहने लगे हैं, स्थान की सुरक्षा होने लगी है। टेंट लगने के पहले साधु लोग वृक्षों के नीचे बैठकर तुषारपात जैसे भयंकर काल को काट देते थे। साधुओं की कोई आमदनी नहीं है। मुसलमान कभी कुछ देते नहीं। यात्री आते नहीं। कभी कोई भूला भटका आ गया तो दो-चार पैसा दे दिया। लकड़ियाँ वृक्षों से तोड़ लेते हैं। धूनी सतत जलती रहती है। साग-पात मिल गया। पका लिया। नहीं मिला तो चुपचाप पड़े रहे। उनका सन्तोष, उनकी शांति मुझे पसन्द आई। इस विरोधी वाता- वरण में, आकाश के नीचे, बिना किसी साधन के, बिना किसी आशा के, अपने घरों से हजारों मील दूर पड़े रहना, उनकी धार्मिकता, उनकी कठोर लगन का ज्वलन्त उदाहरण था। मेरा मन यहाँ उदास हो गया। स्थान जितना सुन्दर था, उतना ही उपेक्षित था। प्रकृति ने उसे सुषमा दी। मनुष्यो ने उसे सजाया। और मनुष्यो ने ही उसे नष्टकर खंडहर बना दिया। मानव कंकाल- तुल्य अपनी करुण गाथा सुनाने के लिए उसे छोड़ दिया। मैं मन मारे चुपचाप कल-कल नाद करते जल प्रणाली के साथ गाँव की ओर उतर चला। इस स्थान को सर्वदा के लिए नमस्कार कर, इसके रचनाकारों के प्रति श्रद्धा प्रकट कर, और इसके नष्ट करने वालों की मानवीय दुर्बलता पर अफसोस करते।
प्रथम तरंग ७१ सन्ध्यादेवी जलं यस्मिन् धत्ते निस्सलिले गिरौ । दर्शनं पुण्यपापादामन्वयव्यतिरेकयोः ॥ ३३ ॥ ३३. काश्मीर मण्डल के निःसलिल गिरि पर सन्ध्या देवी के जल धारण द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट होता है कि वहाँ पुण्य का अस्तित्व तथा पाप का अभाव है ।
[बायाँ स्तम्भ] मैं गाँव में आकर ठहर गया । इन ग्रामीणों के पूर्वज कभी इन मंदिरों के उपासक थे । उनके पुरोहित लेकिन आज उस ओर उलट कर देखने में हिचकते हैं । उपासकों के वंशज कहलाने में संकोच करते हैं । बल्कि नापसन्द करते हैं । स्त्रियाँ काम कर रही थीं । मैं खड़ा हो गया । वे मक्के की वालों में दाने निकाल रही थी । ओखली होती है । लम्बे मूसल होते हैं । ओखली में बाल डालकर कूटती हैं । मक्के के दाने तथा खुखडी अलग हो जाते हैं । वे हमें चकित होकर देखने लगी । खेलते बच्चे कुछ सहम कर खड़े हो गए । हमारा मन यहाँ से हट जाने के लिये कहने लगा । गाँव में अखरोट के वृक्षों की बहुलता है । ग्रामीणों का सीधा सादा सरल जीवन अच्छा लगा । वे शहरी वातावरण से दूर थे । उनकी जीविका अखरोट, शाली तथा मक्का की उपज पर निर्भर थी । अखरोट का मौसम था । अखरोट घाम में सूखने के लिये फैलाए गए थे । मुझे देखकर बच्चे अखरोट के पास खड़े हो गये । बालजन्य दुर्बलता उनमें आ गई । कहो मैं अखरोट, उनकी एकमात्र सम्पत्ति उठा न लूँ । मैं उन्हें देखकर मुस्कराया । चुपचाप उन्हें देखने लगा । मूसल चलाती स्त्रियाँ जैसे कुछ समझ न पाकर मूसल चलाना रोक कर मेरी ओर देखने लगी । मैं कुछ बोलना चाहा । बोल न सका । अपनी राह पकड़ा । स्थान रम्य है । सुहावना.है । विकास करने पर आदर्श पर्यटन केन्द्र बन सकता है । केन्द्र होने पर स्थानीय निर्धन ग्रामीणों की आर्थिक दशा सुधर सकती है । पर्यटकों को कश्मीर का, कभी का भूला, एक तीर्थस्थान दर्शनार्थ मिलेगा ।
[दायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक ३३ में 'धत्ते' की जगह 'दत्ते' पाठ भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३ (१) सन्ध्या देवी : सन्ध्या देवी ब्रह्मा की मानस कन्या कही जाती हैं । यहाँ सन्ध्या देवी प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या निर्झर रूप में प्रकट होती है । वह उप- त्यका के एक तरफ है । देवल गोम ग्राम के दक्षिण दिशा में यह निर्झर है । यहाँ के एक लघु ग्राम का नाम मुन्दब्रार है । ब्रार का अर्थ देवी होती है । यह शब्द सन्ध्या का अपभ्रंश है । ग्राम अब निर्झर के निकट है । इस निर्झर के समीप ही एक छोटा और झरना सप्तर्षियों के नाम से सम्बन्धित है । किन्तु चमत्कार के कारण त्रिसन्ध्या को ही विशेष महत्त्व दिया गया है । सन्ध्या माहात्म में वर्णन मिलता है कि भद्रेश्वर वतु के पुत्र माया वतु ने सन्ध्या गंगा को अपने आश्रम देवल ग्राम के समीप लाया था । चमत्कार : यह निर्झर ज्येष्ठ तथा आषाढ मास में तीन बार दिन तथा तीन बार रात्रि में चलता है । त्रैकालिक सन्ध्या की उपमा झरने से दी गई है । निर्झर का त्रिसन्ध्या नामकरण किया गया है । अत्यन्त प्राचीन काल से यह कश्मीर का पवित्र तीर्थस्थान रहा है । इसका उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है । त्रिसन्ध्या माहात्म्य में उत्पत्ति उद्ग- मादि का वर्णन मिलता है । झरना वर्ष में अधिक दिनों तक सूखा रहता है । कश्मीर उपत्यका में यह एक आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है । कल्हण कपटेश्वर के पश्चात् इसका वर्णन करता है ।
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
७२ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ] डाक्टर श्री वरनियर ने सन् १६६५ ई० में अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन वार चल कर बन्द हो जाता है। वह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु मे अन्य झरनो के समान निस्सन्देह इसमे पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओं का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते है। लोग पूजा निमित्त आते हैं। यहाँ के सम्बन्ध मे अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बर्नियर लिखता है। मै यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल मे वह झरना स्थित है। मै इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो मे अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौडी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढंका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मै समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो
[दायाँ स्तम्भ] जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहां प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती है। वरफ पिघलती है। जल झरने मे जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती हैं तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत से पहुँचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने मे आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाडियाँ लगे हैं। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ वरफ पिघलाने के लिए अधिक नहीं पहुँच सकती। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों मे पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत मे जमी रहती है वह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम। किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३ हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नहीं दिखाई पड़ेगा (४ ५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होंने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण में संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नहीं मानना
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
प्रथम तरंग ७३ स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् । जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥ ३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की हवि प्रतिग्रहण करती है ।
[बायाँ स्तम्भ] चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता है । सन्ध्या नदी : भव्यायां नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ —1252 : १४०१ सन्ध्या पुष्करिणी : सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा । अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् माह्मणकुण्डिकाम् ॥ —1287 : १४९९ पादटिप्पणियाँ : ३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ ) इनका शरीर धर्धनारी का था । एक भाग नारी तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया । उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन हुआ है । नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर से स्वयंभू हुए हैं । (मार्कण्डेय पुराण - ५०; विष्णु ' ७:६; भागवत : ३:१२:५३ ) बाइबिल में वर्णित आदम तथा हौवा की कथा इसमें मिलती है । उसमें भी वर्णन मिलता है । भगवान् ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली से हौवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा हौवा अर्थात् ईव नारी हुई ! उन्हीं से सृष्टि चली । स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं । यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है । यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है । किसी १०
[दायाँ स्तम्भ] वर्ष इसमे से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान इतना गरम हो जाता है कि यात्री खाद्य की वस्तु उस पर रख देते हैं । वह पक जाती है । श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है । श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली मिट्टी की तरह थी । वह संकोर्ण विवर हल चला जैसा मालूम होता था । सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही । वाइन ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है । यह आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ में देखा गया था । अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २.३६५ ) में लिखा है—पुरंगो के समीप एक दर्रा है । उसे सोयुम कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १० जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है उस समय लगभग एक मास तक भूमि इतनी गरम हो जाती है कि समीपवर्ती वृक्ष सूख जाते हैं । यदि कोई पशु या पक्षी इस भूमि पर रख दिया जाय तो भुन जायगा । इस स्थान के समीप आबादी है । कमराज से जो दर्रा इस तरफ आता है वह दूसरी तरफ कासगर से जाकर मिल जाता है । इसके पश्चिम तरफपक्तहे है जहाँ सोना मिलता है । मैं सन् १९६४ में इस स्थान पर आया था । उस समय यहाँ की भूमि गरम नहीं थी । स्थानीय लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं ।
७२ राजतरंगिणी
डाक्टर श्री बरनियर ने सन् १६६५ ई० मे अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन बार चल कर बन्द हो जाता है। यह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु में अन्य झरनों के समान निस्सन्देह इसमें पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओ का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते हैं। लोग पूजा निमित्त आते है। यहाँ के सम्बन्ध में अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बरनियर लिखता है। मैं यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल में यह झरना स्थित है। मैं इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो से अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौड़ी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढँका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मैं समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहाँ प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती हैं। बर्फ पिघलती है। जल झरने में जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती है तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत में पहुंचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने में आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाड़ियाँ लगीं है। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ बर्फ पिघलाने के लिए अधिक नही पहुँच सकतीं। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों में पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत में जमी रहती है यह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम; किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३. हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नही दिखाई पडेगा (४:५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण मे संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नही मानना
प्रथम तरंग ७३ स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् । जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥ ३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की हवि प्रतिग्रहण करती है । चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता है । सन्ध्या नदी : मडवायां नरः स्नात्वा गोसहस्रम् फलम् लभेत् । सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ —1252 : १४७१ सन्ध्या पुष्करिणी : सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा । अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् ब्राह्मणकुण्डिकाम् ॥ —1287 : १४९९ पादटिप्पणियाँ : ३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ ) इनका शरीर अर्धनारी का था । एक भाग नारी तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया । उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन हुआ है। नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर से स्वयंभू हुए हैं । (मारकण्डेय पुराण : ५०; विष्णु ' ७:६; भागवत : ३:१२:५३ ) बाइबिल मे वर्णित आदम तथा होवा की कथा इसमें मिलती है। उसमें भी वर्णन मिलता है। भगवान् ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली से होवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा होवा अर्थात् ईव नारी हुई । उन्ही से सृष्टि चली । स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं । यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है । यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है। किसी १० वर्ष इसमें से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान इतना गरम हो जाता है कि यात्री श्राद्ध की वस्तु उस पर रख देते हैं । वह पक जाती हैं । श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है । श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली मिट्टी की तरह थी । वह संकीर्ण विवर हल चला जैसा मालूम होता था । सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही । वाइन ने अपने यात्रा विवरण मे लिखा है । यह आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ मे देखा गया था । अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २:३६५ ) मे लिखा है—गुरंगो के समीप एक दर्रा है। उसे मोयुम कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १० जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है , समय लगभग एक मास तक भूमि इतनी गरम होती है कि समीपवर्ती वृक्ष सूख जाते है । यदि पशु या पक्षी इस भूमि पर रख दिया जाय तो भुन जाय । इस स्थान के समीप आबादी है। कमरा जो दर्रा इस तरफ आता है वह दूसरी तरफ जाकर मिल जाता है । इसके पश्चिम यहाँ सोना मिलता है । मै सन् १९६४ में पर आया था । उस समय यहाँ की भूमि ठण्डी थी । स्थानीय लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक चर्चाएँ है ।
७४ राजतरंगिणी देवी भेदगिरेः शृङ्गे गङ्गोद्भेदशुचौ स्वयम् । सरोऽन्तर्दृश्यते यत्र हंसरूपा सरस्वती ॥ ३५ ॥ ३५ गङ्गा के स्रोत से पावन भेदगिरि पर स्थित सरोवर में देवी सरस्वती हंस रूप में दिखायी देती हैं।
सोमदेव भट्ट कथासरित्सागर में स्वयम्भू का वर्णन करता है। यह लिखता है कि कश्मीर में बहुत-से स्वयम्भू तीर्थ हैं वहाँ जाकर पूजा करना चाहिए—‘काश्मीरेषु स्वयंभूनि गत्वा क्षेत्राणि पूजयेत्।’ (१:१४५) निस्सन्देह स्वयम्भू एक प्राचीन तीर्थस्थान है। नीलमत पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। सप्तर्षीणाम् तथैवाशां शुशुम्नस्य समीपगा। शृंगवाणं च परदं च स्वयंभुवम् ॥१२७१॥ स्वायंभुवं यदिश्रं तथा वै पिंगलेश्वरम् । विन्दुनादेश्वरं देयं देयं भद्रेश्वरं तथा ॥१२९३॥ नीलमत पुराण काल में भी स्वयंभू के सम्बन्ध में अग्नि का उल्लेख किया गया है। अग्नि के कारण भूमि तप्त होती है। यह स्थान सर्वदा पवित्र कश्मीर में माना गया है। कश्मीर के राजा उच्चल ने (सन् ११०१ ई०) स्वयंभू की तीर्थ यात्रा की थी। (रा० त० ८.२५०) स्वयंभू माहात्म्य से प्रकट होता है कि देवता लोग असुरों से त्रस्त किये गये थे। उनके निवेदन करने पर भगवान् शिव ने यहाँ कालाग्नि रुद्र का रूप धारण किया था। स्वयंभू का अर्थ होता है जो स्वयं पैदा हो जाता है। स्वयंभू मनु से तथा पुराणों के वर्णित अन्य स्वयंभू देवताओ से कश्मीर के स्वयंभू को मिलाना नहीं चाहिए। (मत्स्य पुराण ४:२६, २:२७, २:३०; तथा वायु पुराण ४:४४) थे। यह विपुल उपेक्षित तीर्थ स्थान है। श्री स्टीन ने इसका पता लगाया था। कश्मीर के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में इस स्थान का बहुत महत्त्व रहा है। 'परिशिष्ट' में विस्तृत वर्णन इस स्थान का दिया है। श्री स्टीन ने जो कुछ वहाँ देखकर लिखा है उसमें बहुत कुछ अन्तर पड़ गया है। स्वयं इस स्थान पर बड़ी कठिनाई से पहुँच पाया था। श्री स्टीन ने लिखा है- गिरि शिखर पर लगभग २० फीट चौकोर का एक जलकुण्ड है। उसमें पत्थर की सीढ़ियाँ चारों तरफ बनी हैं। ये जीर्ण शीर्ण हो गयी हैं। कुण्ड से ६ फीट दूर पर प्राचीन प्राचीर का चिह्न मिलेगा। यह उत्तर पूर्व तथा उत्तर पश्चिम अच्छी हालत में है। (यह लोप हो चुकी है) उत्तर पूर्व की ओर एक द्वार बना है। द्वार पर उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं। (यह भी लोप हो चुका है) निर्माण में लगे शिला खण्ड अलंकृत हैं। द्वार के निम्न भाग में एक जल-स्रोत है। यह कुण्ड के जल को बहाता रहता है। द्वार के समीप एक भद्रपीठ पर ३ शिवलिंग हैं। (यह भी लोप हो चुका है) इस भद्र पीठ पर मूर्तियाँ भी बनी हैं। यहाँ से सौ फीट की ऊँचाई पर एक खुला सीढ़ीनुमा मैदान है। उस पर कुछ ऊँचा डूह है। उसपर प्राचीन काल की कुछ लाल ईंटें बची पड़ी हैं। (मैंने केवल चार ईंटें वहाँ देखीं)। दीवाल का चिह्न ८० वर्ग गज में दिखाई देगा। श्री स्टीन को यहाँ के गूजरों से मालूम हुआ था। 'आज से १५० वर्ष पूर्व यहाँ ब्राह्मण लोग आते थे। वाव में स्नान कर श्राद्ध करते थे। वे अब वहाँ श्राद्ध करने नहीं आते।'
पादटिप्पणियाँ : ३५ (१) भेद समाहर्ते—गङ्गोद्भेद तीर्थ : इस अत्यन्त प्राचीन स्थान को लोग भूल गये
प्रथम तरंग ७५ एक वृद्ध गूजर से श्री स्तीन को मालूम हुआ था। कुण्ड न तो कभी जमता है और न उसका जल बढ़ता या घटता है।' स्तीन का मत है— बुदब्रार ही भेदा देवी का स्थान है। कुण्ड का नाम गंग भेद है। यह स्थान ७८०० फीट समुद्र की सतह से ऊंचा है। यहाँ की दुर्गम यात्रा से बचने के लिए एक दूसरे स्थान पर भेदा देवी की मूर्ति स्थापित कर दी गयी है। बुदब्रार से द्राव गाँव तथा पीर पंजाल दर्रा को मिलाता है। यह मार्ग बुदब्रार के दक्षिण पार्श्व से पहाड़ी पर चढ़ता है। यह आगे चलकर पीर पंजाल के मुख्य मार्ग से दुबजी के पास जाकर मिल जाता है। श्रीवरने जैन तरंगिणी में भेद वनपय का वर्णन किया है। उसमे भी स्तीन का वर्णन मिलता है। गंगोद्भेद माहात्म्य की कथा है। पुलस्त्य ऋषि ने सती की भूमि में लम्बी तपस्या की। उनके यज्ञ के लिये गंगा नदी हिमवंत पर्वत से चलकर यहाँ निकल पड़ीं। तपस्या के पश्चात् ऋषि पुलस्त्य जल यथावत् प्रवाहित रहने देना चाहते थे। उसी समय सरस्वती देवी की आकाशवाणी श्रवण गत हुई 'गिरि शिखर पर जिस स्थान से भेद अरण्य में जल उद्भूत हुआ है उस तीर्थ का नाम गगोद्भेद होगा। पर्वत के ऊपर जहाँ दश धनुष परिणाम लम्बा चौड़ा स्थान है वहाँ एक बड़ा कुण्ड शुद्ध जल का बन जायगा। पर्वत के पूर्वीय मूल भाग से एक सरिता 'अभय' निकलेगी। वह सब पापो को धोएगी। गंगा जी इसी रूप से यहाँ प्रकट होगी। इसका जल कभी समाप्त नही होगा। सरिता 'अभय' पर्वत से उछलती नहीं गिरेगी। गंगा का यह जल वर्ष के तृतीयाश काल में ही प्रवाहित रहेगा।' शेष काल में गंगा का जल स्वर्ग तथा नरक में बहता रहेगा।' पुलस्त्य ऋषि ने निवेदन किया—देवी, पर जल यहाँ वर्ष पर्यन्त बनता रहना चाहिए।' देवी ने सर्वदा जल प्रवाहित रहने का वचन दिया। एक सहस्र वर्ष और पुलस्त्य ने यहाँ तपस्या की। आकाश में राजहंस रूप से देवी सरस्वती ने दर्शन दिया। चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा नवमी को पूजा प्राप्त कर देवी ने वहाँ अपनी ६ प्रकृतियों का वर्णन किया। प्रकृतियों के भेद वर्णन करने के कारण देवी का नाम 'भेद' दिया गया। ऋषि पुलस्त्य ने देवी सरस्वती की पूजा देवी वागेश्वरी भेद रूप से प्रारम्भ की। पूजा चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को आरम्भ की। अतएव स्थान का नाम गंगोद्भेद तीर्थ पड़ा। चार दिन पूजा होने लगी। 'भेद' देवी माहात्म्य का वर्णन कर माहात्म्य सहसा समीपवर्ती तीर्थ स्थानो का वर्णन करने लगता है। गोवर्धनधर विष्णु उल्लेख करता कहता है कि वहाँ पर १२५ हस्त परिणाम में कभी तुषार-पात नही होता। माहात्म्य से एक बात स्पष्ट होती है। यहाँ के प्राकृतिक दृश्य का उसने जो वर्णन किया है वह अक्षरशः मिलता है। कुण्ड का माप भी जो दिया गया है वह ठीक है। अतएव निस्सन्देह कहा जा सकता है कि श्री स्तीन ने इस स्थान को मूल गंगोद्भेद माना है वह ठीक है। नील मत पुराण में गंगोद्भेद तीर्थ का वर्णन मिलता है। तावन्मुद्देयं समं पुण्यं प्रयागेण नराधिप । गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदा देवी मर्चायते ॥ —1522 यहाँ पर यम की देवी मूर्ति जिसे ओजम कहते है ऋषियों के निमित्त स्थापित की गयी थी। इसकी पूजा आश्वयुज अर्थात् आश्विन बदी चतुर्दशी को होती है। माहात्म्य वहाँ के समीपस्थ तीर्थ रामाश्रम, रामह्रदा, सप्तर्षि आश्रम तथा वैतरणी नदी का वर्णन करता है। तात्पर्य यह है कि गंगोद्भेद की यात्रा के समय उनकी भी यात्रा करनी चाहिए।
७६ राजतरंगिणी नन्दिक्षेत्रे हरावासप्रासादे द्युचरार्पिताः । अद्याऽपि यत्र व्यज्यन्ते पूजाचन्दनबिन्दवः ॥ ३६ ॥ ३६ हर के आवास के प्रासाद स्वरूप नन्दि क्षेत्र में देवताओं द्वारा अर्पित पूजा के चन्दन बिन्दु दिखाई पड़ते हैं। महाभारत में गंगोद्भेद तीर्थ का वर्णन मिलता विगाह्य पुष्करम् तीर्थम् अतिरात्रफलम् लभेत् । है। यह स्थान 'भेदा' देवी कश्मीर का स्थान तीर्थं सप्तर्षीणाम् च वह्निस्तोमफलम् लभेत् ॥ है या दूसरा इसपर विशेष अनुसन्धान की आवश्य- ---1343 कता है। वनपर्व में तीर्थों की महिमा का वर्णन (विशेष द्रष्टव्य 'भेदादेवी' परिशिष्ट) ऋषि पुलस्त्य ने किया है। उसमे भारत के प्रसिद्ध पाठभेद : तीर्थों के साथ गंगोद्भेद का भी उल्लेख किया है। श्लोक ३६ में 'हरावास' का 'सुरावास' पाठ भेद मिलता है। गंगोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । पादटिप्पणियाँ : वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ३६ (१) नन्दि क्षेत्र :---इसका उल्लेख नील वनपर्व : ८४ : ३५. मत तथा हरमुकुट माहात्म्य में है। हरमुकुट माहात्म्य 'गंगोद्भेद तीर्थ में तीन रात उपवास करने में नन्दि क्षेत्र संज्ञा उस भाग को दी गयी है, जो एक वाला मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। उत्तुंग पर्वतीय उपत्यका हरमुख शिखर के पूर्वार्ध सर्वदा के लिये ब्रह्मभूत हो जाता है।' हिमानी अर्थात् ग्लेशियर मूल में है। उसी स्थान रामतीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण करता है : पर कालोदक सरोवर है। उसे नन्द कुण्ड कहा जाता स्नात्वा नारायणस्थानं विष्णुलोके महीयते । है। स्थान १३ हजार फीट ऊंचाई पर स्थित है। रामतीर्थे भवेत्तप्ते च फलम् पूतम् प्रकीर्तितम् ॥ गंगासर किंवा उत्तर मानस तीर्थ यात्रा मार्ग के 1312 मुख्य पड़ाव पर है। नीलमत पुराण कालोदक का वैतरणी का उल्लेख मिलता है : वर्णन करता है। कपितीर्थं नरः स्नात्वा निर्मलो मुनिविद् भवेत् । तस्य शृङ्गस्य पूर्वार्धे सरोऽस्ति विमलोदके । वैतरण्याम् नरः स्नात्वा न दुर्गतिम् अवाप्नुयात् ॥ कालोदकमिति ख्यातम् सर्वकिल्विषनाशनम् ॥ ---1315 1048 : १२३२, १२३३ गंगोद्भेद का उल्लेख नीलमत में आता है : तत्रैव देवदेवेशः समाप्ते ब्रह्मणः क्रतौ । मणिभद्रम् तथा दृष्ट्वा धनवान् अभिजायते । सर्वैर् देवगणैः सार्धम् ययौ कालोदकम् शरः॥ पुलस्त्यनिर्मिता देवी भुवि भेदेति विश्रुता ॥ 1099 : १२९७, १२९८ ---1010 बालखिल्ये कृतेऽगस्त्ये तुल्यतेजा महर्षिभिः । गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदे देवीसमीपतः । कालोदकं नन्दिकुण्डम् शङ्खचक्रौ गदामृताथा । गंगास्नानफलम् प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ ---1243 : १४५८, १४५९ ---1309 कालोदकम् यत्र याति नदी मानससंभवा । सप्तर्षि आश्रम का भी उल्लेख नीलमत करता है : ततः स्नातस्य दृश्यन्ते सर्वपापान्यशेषतः ॥ ---1247 : १४६१
This image is completely blank and contains no text to transcribe.
७८ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ] नन्दी सर्वदा भूतेश्वर में रहते हैं। भगवान् शिव भी नन्दी के कारण वहाँ निवास करते हैं। नीलमत पुराण में उपाख्यान का निम्नलिखित रूप मिलता है : शिलादो नाम विप्रोऽभूत् पुरा पुत्रविवर्जितः । तेन वर्षशतं भुक्त्वा शिलाचूर्णं नराधिप । नन्दिपर्वतमासाद्य महादेवप्रसादतः ॥ 1033 । १२०५, १२०६ पुत्रार्थे तु तदा तस्य देवदेवो अनुकम्पया । पुत्रत्वे नन्दिनम् प्रादात् स्वगणेशम् महाबलम् ॥ 1033 । १२०६, १२०७ दीयमानस्तु पुत्रत्वे नन्दी प्रोवाच शंकरम् । अनुग्रहाद् द्विजस्यास्य पुत्रोऽहं भविता प्रभो ॥ 1034 । १२०८, १२०८ किं त्वयोनिभवो देव भवेयं तस्य पुत्रकः । चिरम् च न च वत्सेऽहं मानुषे त्वद्विनाकृतः ॥ 1035 । १२०८, १२०९ तमुवाच हरो देवः प्रहसन्ननुकम्पया । उमाविवाहे शप्तोऽसि भृगुना त्वम् गणोत्तम ॥ 1036 । १२०९, १२१० अपूजितेन मानुष्ये तेनापि भविता ध्रुवम् । तेन चैव शरीरेण मत्समीपमुपेष्यसि ॥ 1037 । १२१०, १२११ ततः प्रभृति मानुष्ये वत्स्यसि त्वम गणोत्तम । वत्स्यसे मत्समीपे च प्राकाम्येन यथा सुखम् ॥ 1038 । १२११, १२१२ वत्स्यसे किम् च मानुष्ये भृगुशापबलाकृतः । तत्रापि तेऽहं वत्स्यामि प्राकाम्येन गणेश्वर ॥ 1039 । १२१२, १२१३ एवम् भूतेश्वरे नन्दी नित्यम् वसति पार्थिव । प्राकाम्येन हरो देवस्तथा त्वदनुकम्पया ॥ 1040 । १२१३, १२१४ [दायाँ स्तम्भ] ३६ (२) हरमुकुट : हरमुख पर्वत का शिखर हरमुकुट है। मुकुट मस्तक पर धारण किया जाता है। तुषाराच्छादित हिमालय शिखर की उपमा कवियों ने भारत माता के किरीट से दी है—तुषार किरीट धारिणीम् । अलबेरूनी ने इस पर्वत के विषय में लिखा है। ( २:३६३ ) दुधसुट पास की पूर्वीय दिशा में पर्वतमाला उठते उठते हरमुख शिखर में परिणत हो जाती है। यह शिखर लगभग १७ हजार फीट ऊँचा है। इसके चारो तरफ हिमानी अर्थात् ग्लेशियर है। कश्मीर उपत्यका से हरमुकुट पर्वत का सुन्दर दृश्य दृष्टि- गोचर होता है। पर्वत के मूल में स्थित सरोवर सुदूर प्राचीन काल से पवित्र तथा पुण्य स्थल माना जाता है। भगवान् शिव का हरमुकुट शिखर आवास है। पर्वत के समीपवर्ती तीर्थों की गाथाएं भगवान् शिव से सम्बन्धित की गयी हैं। हरचरित चिन्तामणि में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। नीलमत पुराण हरमुकुट के विषय में लिखता है। हरमुकुटमिति ख्यातम् शृंगम् हिमवतः शुभम् । जगाम सहसा नन्दी तपसे कृतनिश्चयः ॥ 1047 तस्यैव सरसोऽभ्यासे शृंगं त्रैलोक्यविश्रुतम् । हरिमुकुटमिति ख्यातं आरुरोह मुदान्वितः ॥ 1118 । १३२३ कश्मीर में एक जनश्रुति बहुत प्रचलित थी और है। हरमुकुट शिव का आवास है। मानव पद वहाँ नहीं पड़ सकता। आजकल भी कश्मीर के हिन्दू तथा मुसलमान दोनों वहाँ जाने से हिचकते हैं। ३६ (३) चन्दन बिन्दु : श्री स्टीन सितम्बर मास सन् १८९४ में इस शिखर पर पहुँचे थे। लौटने
प्रथम तरंग ७९ आलोक्य शारदां देवीं यत्र संप्राप्यते क्षणात् । तरङ्गिणो मधुमती वाणी च कविसेविता ॥ ३७ ॥ वहाँ देवी शारदा की तीर्थयात्रा के समय यात्री कवि पूजित तरंगिणी मधुमती एवं सरस्वती दोनों के समीप पहुँच जाता है । पर लोगों से उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया । परन्तु कश्मीरियों ने उसपर विश्वास नहीं किया । उनका कहना था । जिस शिखर पर श्री स्टीन पहुँचे थे । वह हरमुकुट नहीं था । वहाँ किसी प्राणी का पहुँचना कठिन है । श्री स्टीन के साथ एक मुसलमान कुली था । उससे पूछा गया । शिखर पर पहुँचे थे या नहीं । उसने शिखर पर चढ़ने की बात पूर्णतया अस्वीकार कर दी । वह शिखर पर चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता था । ३७ ( १ ) जनश्रुति है । आद्य श्री शंकराचार्य का कश्मीर मे आगमन हुआ था । वे शारदा मन्दिर में जाना चाहते थे । उन्हे मन्दिर प्रवेश करने की आज्ञा तत्कालीन पण्डितों ने नहीं दी । शारदा पीठ प्राचीन काल में काशी की तरह विद्या की राजधानी थी । वहाँ के विद्वानो का समस्त भारत में आदर तथा सम्मान किया जाता था । शारदा पीठ के विद्वानों ने पुरानी परम्परा के अनुसार शंकराचार्य के सम्मुख एक शर्त रखी । वे यदि शारदा पीठ के विद्वानो के प्रश्नों का उत्तर दे दें तो उनका प्रवेश मन्दिर में हो सकता था । कल्हण वर्णित चन्दन बिन्दु के सम्बन्ध में श्री स्टीन ने श्लोक की टिप्पणी में लिखा है कि उन्हें किसी पुस्तक तथा स्थानीय जनश्रुति परम्परा से इसका समर्थन नही मिल सका । श्री स्टीन सितम्बर मास में शिखर पर पहुँचे थे । उन्होने विस्तृत वर्णन नहीं लिखा है । कश्मीर में यह महीना श्रेष्ठ समझा जाता है । बरफ गिरने का भी यह समय नहीं है । कश्मीर का एक पुराकालीन नाम शारदा पीठ अथवा शारदा क्षेत्र था । शारदी का स्थान पठन पाठन तथा विद्याध्ययन के लिये प्रसिद्ध था । विद्या का केन्द्र माना जाता था । बौद्ध जगत् के तक्षशिला तथा नालन्द विद्या- केन्द्र थे । हिन्दू जगत् में यह धर्म तथा विद्या का केन्द्र था । कश्मीर में उसे वही स्थान प्राप्त था जो उत्तर भारत में काशी, पूर्व मे नवद्वीप तथा दक्षिण मे कांची को था । मैं भूतेश्वरादि स्थानो तथा हरमुख पर्वत के मूल तक पहुँचा था । शिखर १७ हजार फोट की ऊँचाई पर है । मैं हाईब्लड प्रेसर का मरीज हूँ । पैदल इतनी ऊँचाई पर चढ़ना मेरे लिए असम्भव था । मैने जो वर्णन लिखा है उसका मुझे गौण ज्ञान है । श्री स्टाइनादि लेखकों तथा स्थानीय लोगो द्वारा सुनी बातो के आधार पर लिखा है । इस स्थान के विषय में श्रीनगर स्थित वृद्ध ब्राह्मणों से मैने कुछ जानकारी प्राप्त करनी चाही । एक आस्तिक वयोवृद्ध पण्डित ने बताया । पुरानी पद्धति के अनुयायी पण्डितो में अब भी प्रथा प्रच- लित है । जिस दिन शारदा में स्नातको को प्रमाण पत्र दिया जाता था उसे ही किसी न किसी रूप में प्रचलित देखने के लिये आज भी सनातन धर्मावलम्बी ब्राह्मण अपने विद्यार्थियो को प्रमाणपत्र देते हैं । अथवा विद्यार्थी को स्नातक बना देते हैं । किसी युवक अनुसन्धानप्रिय विद्वान् को यहाँ की यात्रा कर वास्तविकता का पता लगाना चाहिए । कल्हण ने जो बातें लिखी है वे प्रायः सत्य सिद्ध हुई हैं । चन्दन बिन्दु किस रूपक के आधार पर लिखा था । इन्हें जानना चाहिए । पर कथानक कपटेश्वर में तैरते काट टुकड़ों से मिलता है ।
८२ राजतरंगिणी ने मधुमती नदी का उल्लेख किया है । यह वर्तमान नदी ( मोहर ) है । पिपीलिका का वर्णन महाभारत में मिलता है । तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः । जातिरूपं द्रोणमेयमहापुंः पञ्चशो नृपः ॥ ( सभापर्व : ५२-४, ) हिरोडोटस भी पिपीलिका का वर्णन करता है जो चींटियों द्वारा एकत्रित किया जाता था । ( ३:१:१०५ ) परशुराम भगवान् ने क्षत्रियों का २१ बार संहार कर, मधुमती के तटपर केशव की मूर्ति स्था- पित की थी । यहाँ पर बलि के साथ पूजा की जाती थी । परशुराम ने गृद्धकूट पर्वत पर भी विष्णु की प्रतिमा स्थापित की थी । नीलमत पुराण परशुराम को भगवान् का अवतार नहीं मानता । इन्द्रकीलम् समारुह्य गोसहस्रफलम् लभेत् । तथा मधुमतीतीरे शाण्डिल्येन निवेशितम् ॥ —1230 : १४४३, १४४४ शाण्डिलीमधुमत्योश्च स्नातो यः संगमे नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोक स गच्छति ॥ —1233 : १४४६ मधुमत्यास्तयोश्चैत्र स्नातस्य नृप संगमे । कथितं मुनिभिः पुण्यमश्वदानस्य यत्फलम् ॥ —1239 : १४५२, १४५३ ततः प्रभवमासाद्य मधुमत्या मनोहरम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते ॥ —1240 : १४५३, १४५४ काश्मीर में एक दूसरी मधुमती का वर्णन मिलता है । यह वितस्ता नदी में मिलनेवाला बन्द पोर नाला है । कृष्णावितस्तासंयोगे गोसहस्रफलम् लभेत् । वितस्तामधुमत्योश्च संगमे त्रिदिवम् व्रजेत् ॥ —1229 : १४४२ कुलारणी पापहरा च कृष्णा नदीसुपुण्या मधुमत्यथापि । नदी परुष्णी च तथात्र पुण्या प्रयान्ति दिव्या वरदां वितस्ताम् ॥ —1390 : १५०८ (३) सरस्वती : शारदा तीर्थ के ठीक दूसरी तरफ उत्तर मे तुषारमण्डित पर्वतमाला है । चिलास से वही एक बड़ी नदी कृष्णगंगा में आकर मिलती है । इस नदी को कनकतोरी कहते हैं । यही शारदा माहात्म्य मे वर्णित सरस्वती नदी है। यह नदी पंजाब की सरस्वती नदी नहीं है । एक और नदी शाण्डिली का उल्लेख मिलता है । मधुमती तथा दुर्गा मन्दिर के समीप इसका स्थान माना गया है । नीलमत पुराण में पंजाब की सरस्वती तथा काश्मीर दोनों का उल्लेख मिलता है : यमुनां यमपाशाङ्गी शतद्रु ं द्रुतगामिनीम् । सरयू ं यूपसंपन्नां तथा देवीं सरस्वतीम् ॥ —91 : १३२, १३३ उत्तीर्य यमुनां देवीं तथा देवीं सरस्वतीम् । कुरुक्षेत्रं तथा दृष्ट्वा सञ्चितैर्यन्त्र विधुता ॥ —126 : १६९ मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी । वृषारूढ़ा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥ —153 : २०४, २०५ ऋद्धियुग्दिस्तथा निद्रां धनेशं नलकूबरम् । शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥ —585 : ७०६ सरस्वत्यौघनाशा च सुवेरुः विमलोदका । पुष्करादीनि तीर्थानि वितस्ताद्याश्च निम्नगाः ॥ —600 : ७२१, ७२२ शुद्धा सरस्वती चैव संयोगं यत्र गच्छतः । तत्र स्नातस्य रामस्य करौ शुद्धिमुपागतौ ॥ —1183 : १३९५
प्रथम तरंग ८३ चक्रभृद्विजयेशादिकेशवेशानभूषिते तिलाङ्गोऽपि न यत्राऽस्ति पृथ्व्यास्तीर्थैर्बहिष्कृतः ॥३८॥ ३८. चक्रभृत्¹, विजयेश², आदिकेशव³ तथा ईशान द्वारा विभूषित इस भूमि पर तिल मात्र.ऐसा स्थान नहीं है, जो तीर्थों से बहिष्कृत हो । नदी सरस्वती नाम यस्यां स्नातो दिवं व्रजेत् । पूर्वं दक्षिणभागे तु स्थिता देवसरस्यपि ॥ —1984 : १४९६ पादटिप्पणियाँ : कल्हण ने यहाँ शैव तथा वैष्णव दोनों मता- नुयायियो की समानता का ध्यान रखा है। चक्र- धर अर्थात् विष्णु उसके पश्चात् शिव विजयेश पुनः विष्णु आदिकेशव तथा अन्त में शिव ईशान से समाप्त करता है। विष्णु पालक है। रक्षक है। शिव प्रलय, संहार, समाप्ति के देवता हैं। अतएव उनके नाम के साथ वह देवों का क्रम समाप्त करता है । ३८ (१) चक्रभृत् चक्र चक्रवर्ती राजा का चिह्न तथा विष्णु एवं कृष्ण का आयुध है। वायु पुराण (७ : ६८ ) तथा महाभारत स्वर्गारोहण पर्व (४ : १२७) के अनुसार चक्र के धारण करने के कारण विष्णु का नाम चक्रधर रखा गया है । चक्रभृत्, केशव तथा चक्रधर भगवान् विष्णु के पर्यायवाची नाम हैं। वैदिक साहित्य में चक्र रथ के पहिए के लिए प्रयुक्त किया गया है। ऋग्वेद में दो-तीन तथा आठ चक्रों के रथ का उल्लेख मिलता है। कुम्भकार के चाक को भी चक्र कहते हैं । चक्रधर विष्णु तथा विजयेश शिव दोनों का मन्दिर पास ही पास था । यहाँ पर चक्रधर के स्थान पर कल्हण ने 'चक्रभृत्' शब्द का प्रयोग किया है । चक्रधर एक अधित्यका ( उदर ) पर स्थित था । उसे अब तस्करदर कहते हैं। राजतरंगिणी के प्रथम तरंग २६१ में नागराज सुश्रुवा के प्रसंग में चक्रधर मन्दिर का उल्लेख आता है । राजतरंगिणी (४ : १९१) में इसका वर्णन पुनः मिलता है । ललितादित्य ने वितस्ता नदी पर रहट लगवाया था। इसका उल्लेख पुनः (रा० त० ८.१७१ ) मिलता है । चक्रतीर्थ— सन्नीतिं तां तथा दृष्ट्वा चक्रतीर्थं तथैव च । यदर्धं भारदोद्गीतं गया चरितभूतले ॥ 129 : १७२ अहो लोकस्य निर्बन्ध आदित्यग्रहणं प्रति । चक्रतीर्थेन पर्यस्तं महाद् दशगुणं फलम् ॥ 130 : १७३ तं दृष्ट्वा चक्रतीर्थाख्यं तथा तीर्थं पृथूदकम् । दृष्ट्वा विष्णुपदं पुण्यं तथा चमरपर्वतम् ॥ 131 : १७४ ब्रह्मणो यागभूमिश्च तत्र पुण्या महोदये । चक्रतीर्थं देवतीर्थं तीर्थं ब्राह्मणकुण्डिकाम्॥ 1449 : १४६२ वह्नितीर्थं चन्द्रतीर्थं नागतीर्थं तथैव च । चक्रतीर्थं वामनं च गोप्रदानफलं लभेत् ॥ 1317 : १५३१ चक्रधर का मन्दिर हस्तिकर्ण से १ मील दक्षिण वितस्ता नदी एक बड़ा मोड़ लेती है । इस प्रकार बने Renemsula में एक छोटा उदर बन गया है। वह सबसे अलग और ऊँचाई पर होने के कारण इस क्षेत्र में अनायास लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। यहीं पर विष्णु चक्रधर का प्राचीन मन्दिर था।
८४ राजतरंगिणी चक्रधर मन्दिर का वर्णन माहात्म्य, जोनराज राजतरंगिणी (७६३), मख कवि के श्रीकंठ चरित (३:१२) तथा नीलमत पुराण (११७०) में उल्लेख मिलता है। इसके समीपवर्ती नरपुर नगर के अग्निकाण्ड के सम्बन्ध में भी इसका उल्लेख किया गया है। राजा उच्चल (११०१-११११) ने चक्रधर क्षेत्र के देवस्थान का जीर्णोद्धार कराया था। उनके समय में स्थान अत्यन्त जीर्णावस्था में था। (रा० त० ८:७८) राजा सुस्सल (सन् ११२१-११२८ ई०) के समय हुए भयंकर गृहयुद्ध के प्रसंग में चक्रधर मन्दिर का उल्लेख मिलता है। मन्दिर उद्र के समतल भूमि पर बना था। विजयेश्वर किंवा विजत्रोर में राजकीय सेना ने लोगो से स्थान खाली करा लिया। वहाँ उद्वासित तथा समीपवर्ती ग्रामो के लोग चक्रधर मन्दिर में शरण लिये थे। ऊँचाई पर होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से स्थान उपयुक्त माना गया है। विद्रोही सैनिको ने मन्दिर में स्थित पराजित सैनिको तथा नागरिकों को घेर लिया। मन्दिर की चहार दिवारी (प्राकार) मोटी लकड़ी की बनी थी। मालूम होता है यहाँ पत्थर के अभाव में लकड़ी का उपयोग किया गया था। उसमें द्वार बने थे। विद्रोहियो ने उसमें आग लगा दी। पहले लकड़ी की चहार दिवारी जलने लगी तत्प- श्चात् आग प्रांगण में फैली। लोग अग्नि से घिर कर भाग भी नहीं सके और वही जलकर मर गये। लकड़ी का घेरा वगैरह था अतएव मन्दिर का भग्नावशेष यहाँ नहीं मिलता। प्रोफेसर बूल्हर को उद्र उत्तरीय छोर पर जो एक निचली भूमि के कारण शेष भूखण्ड से अलग है। यहाँ एक आयताकार घेरा का चिह्न मिला था। वह घेरा ४० वर्गगज में था। उसमें regular गड्ढों के चिह्न थे। वह गड्ढे मालूम होता है कि चहार दीवारो के भस्मावशेष के चिह्न रह गये थे। उच्चल द्वारा जीर्णोद्धार के बाद मन्दिर में आग काण्ड हुआ था। कालान्तर में मन्दिर का जीर्णोद्धार किया गया था। विजत्रोर (विजयेश्वर) के अधोभाग में वितस्ता के वाम तट पर एक मील दूर एक (उद्र) अधित्यका पर यह देव स्थान था। इस अधित्यका का नाम आज भी तरुवदर उद्र है। कल्हण ने प्रायः चक्रधर पहाड़ी तथा मन्दिर का उल्लेख किया है। आपत्ति काल में सुरक्षा के लिये स्थान उपयोगी है। (रा० त० १: २६१, २७०; ४:१६१, ७:२५८, २६१,२६६, ८:७८, ८:९७१, ९९१, १००४, १०६४ में) इसका उल्लेख किया गया है। नीलमत पुराण चक्रधर को विष्णु का रूप मानता है। इस स्थान के सम्बन्ध में एक गाथा का वर्णन करता है। (नीलमत ९००, :११६६, ११४९: १३५९) हरचरितचिन्तामणि (८:६१) में भी उल्लेख मिलता है। इसकी भौगोलिक स्थिति एवं स्थान का पता (रा० त० ८:९७१) श्लोक द्वारा मिलता है। यह तीर्थ यात्रा में सम्मिलित नहीं किया जाता है। ३८ (२) विजयेश्वर : विजयेश्वर अत्यन्त प्राचीन काल से कश्मीर का प्रसिद्ध तथा पवित्र तीर्थ स्थान रहा है। विजयेश, ईशान तथा विजयभाड शब्द शिव का वाचक है। विजयेश्वर नाम पर नगर को संज्ञा दी गयी थी। विजयेश्वर का अप- भ्रंश विजत्रोर है। काश्मीर शब्द ब्रोर संस्कृत भट्टारक शब्द का अपभ्रंश है। उसका अर्थ ईश्वर है। काश्मीरी शब्द ब्रोर का अर्थ देवी है। सम्राट् अशोक के समय मन्दिर का जीर्णोद्धार हुआ था इसका वर्णन कल्हण करता है। यहाँ कुछ ध्वंसावशेष बिखरे पड़े हैं। विजयेश्वर माहात्म्य तथा हरचरित- चिन्तामणि में भिन्न-भिन्न गाथाएँ इसके सम्बन्ध में दी गई हैं। कुछ अँग्रेजी पुस्तकों में पंजाबी के आधार पर इसे बिजविहार का अपभ्रंश कहा गया है। यह गलत है। नीलमत पुराण में उल्लेख आता है :
[Page Header] प्रथम तरंग ८५
[Left Column] विशोका विजयेशं च वितस्तासिन्धुसंगमम् । एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥ 1056 : १२४० विजयां मात्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते । रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते स्वकम् ॥ 9303 : १५१६ विजयेश्वर होकर मैं दो-तीन बार गया हूँ। परन्तु कभी नगर के अन्दर नहीं गया था। उस समय मुझे इस पवित्र स्थान का महत्त्व मालूम नहीं था। यह बनिहाल श्रीनगर की सड़क पर श्रीनगर से २९ मील पर स्थित है। नगर वितस्ता के वाम तट पर है। नगर में बिजली तथा पाइप द्वारा पानी दिया जाता है। इस समय यहाँ पर एक नवीन पुल का और निर्माण हो गया है। पुराना डोगराकालीन पुल भी कायम है। पुराने पुल से गाड़ियाँ नहीं जा सकतीं। नवीन पुल द्वारा गाड़ी बड़ी ट्रक, बस तथा सभी कुछ का परिवहन हो सकता है। इस समय यहाँ ग्रामीण औद्योगिक स्टेट राजकीय विभाग द्वारा बनाया गया है। नगर बड़ा है। पुरानी शैली का है। गलियों में पत्थर के फर्श लगे हैं। पक्की सड़कें हैं। शहर की जमीन बहुत ऊँची-नीची है। समभूमि पर नगर नहीं आबाद है। पुराने पुल द्वारा नगर का अभूत- पूर्व दृश्य मिलता है। शहर वितस्ता तट पर ऊँचे कगार किंवा करार पर बसा है। यहाँ अत्यन्त प्राचीन काल से पुरानी शैली का संस्कृत विश्वविद्यालय था। संस्कृत का अध्ययन- अध्यापन होता था। शारदा पीठ के पश्चात् संस्कृत शिक्षा का काश्मीर में यह दूसरा केन्द्र था। इस समय कुछ घर ब्राह्मणों के बचे खुचे रह गये हैं। काश्मीर के इतिहास में विजयेश स्थान का अपेक्षा- कृत अधिक वर्णन मिलता है। यथास्थान उसका उल्लेख किया गया है। विजबैहरा या बिजत्रोर में अशोक ने दो मन्दिर निर्माण कराये थे। इनका उल्लेख राजतरङ्गिणी में
[Right Column] मिलता है। मन्दिर का नाम अशोकेश्वर राजा अशोक के नाम पर रखा गया है। यहाँ के खनन द्वारा प्राप्त मूर्तियाँ खंडित कर इतनी विरूप कर दी गयी हैं कि उनके विषय में साधिकार कुछ कहना कठिन है। अशोकेश्वर संज्ञा से प्रकट होता है कि अशोक द्वारा शिव मन्दिर की स्थापना की गयी थी। यहाँ से प्राप्त खण्डित मूर्तियाँ अशोक काल की हैं या नहीं कहना कठिन है। सम्भव है कि यदि कुछ और खनन कार्य किया जाय तो तत्कालीन स्थिति तथा इतिहास पर अधिक प्रकाश पड़ेगा। श्रीनगर संग्रहालय की मूर्ति ए जी १ गुप्त- कालीन मूर्तिकला मालूम पड़ती है। सम्भवतः देवी की मूर्ति है। केश विन्यास सुन्दर है। मूर्ति अलंकृत है। कानों के वृत्ताकार कुण्डल कपोल के नीचे तक झूलते हैं। मूर्ति खण्डित कुरूप है। पादविहीन है। विष्णु मूर्ति ए जी ४ भी खण्डित है। ललाट पर मुकुट है। मूर्ति ए जी १० विष्णु की है। वह विरूप कर दी गयी है। उसे बुरी तरह से नष्ट किया गया है। तोड़ने वाले ने अपने पूरे क्रोध का प्रदर्शन किया है। मूर्ति वक्षस्थल तक प्राप्त है। उसके सम्बन्ध में कोई मत निर्धारित करना कठिन है। विजयेश्वर से महाराज अशोक से सम्बन्धित तत्कालीन बौद्ध कला-कृतियाँ तथा मूर्तियाँ मिलनी चाहिए थी परन्तु वे अब तक नहीं प्राप्त हो सकी है। सम्भव है किसी मसजिद, जियारत अथवा कब्र के अन्दर पटी होगी। खनन कार्य इसलिए कठिन मालूम होता है कि जहाँ मन्दिर किंवा देवस्थान नष्ट किए गए थे। उन स्थानों पर जियारतें, मस्जिदें तथा कब्रिस्तानो का निर्माण कर दिया गया है। मूर्तियाँ खण्डित कर गाड़ दी गयीं या उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दिया गया। इस समय उन्हें ढूंढ निकालना कठिन प्रतीत होता है। 'विजयेश माहात्म्य' में अनेक तीर्थस्थानो का वर्णन मिलता है। उनकी यात्रा विजयेश की यात्र
८६ राजतरंगिणी
के साथ करने की बात लिखी गयी है। इस समय चक्रधर तथा गम्भीर संगम के अतिरिक्त और किसी तीर्थ स्थान का पता नहीं लगता। नये पुल के समीप एक नवीन मन्दिर का निर्माण किया गया है। मैं जिस समय यहाँ आया था, पानी बरस रहा था। मैं कीचड़ों से गुजरता एक मन्दिर में पहुँचा। इस मन्दिर में एकादश लिंग एक ही अरघा में स्थापित किये गये हैं। प्रवेश द्वार के दोनों पाश्र्वों में किसी पुराने मन्दिर की खण्डित मूर्तियों के पत्थर लगे हैं। यहाँ के प्राचीन मन्दिर के कलश का आमलक मन्दिर के वाम पाश्र्व में भूमि पर पड़ा था। इस पत्थर को लड़के तथा लोग कौतूहल से देखते हैं। यदि ग्यारह व्यक्ति उँगली लगाकर उठायें तो वह उठ जाता है। एक आदमी यदि पूरा जोर लगाये तो भी।दोनो हाथो से नही उठता। मैंने वहाँ खड़े बालको को बुलाया। उन्हें मिलाकर ग्यारह की संख्या पूरी हो गयी तो उँगली लगाया। बच्चे क-क-क कहने लगे और पत्थर उठ गया। मन्दिर में ग्यारह शिवलिंग हैं। अतएव ग्यारह व्यक्ति के उँगली लगाने की बात शिवलिंग से सम्बन्धित कर दी गयी है। पुराने पुल के समीप एक दूसरा मन्दिर नगर में है। नवीन निर्माण है। इसके साथ एक धर्मशाला बनायी गयी है। 'विजयेश्वर सुधार कमेटी' विजयेश्वर तीर्थों के सुधार तथा उन्नति निमित्त गठित की गई है। इस कमेटी के कार्यकर्त्ताओं से बातचीत हुई थी। यहाँ के हिन्दू मुसलमान दोनों से बातें कीं। मालूम हुआ कि नगर पूर्वकाल में मन्दिरों से भरा था। किन्तु कालान्तर में वे नष्ट हो गये। नगर में ऊँचे नीचे बहुत स्थान मिलेंगे। इनके होने का एक यह भी कारण हो सकता है कि मन्दिरों के अधिष्ठान ऊँचे बनाये जाते थे। उनके आसपास की भूमि समतल कर दी जाती थी। मन्दिरों के नष्ट होने पर उनके स्थान पर दूसरी इमारतें बन गयीं अथवा मन्दिर के मलबों को पाटकर उन पर रहने आदि के स्थान बना लिये गये। अतएव मकान प्रायः ऊँची नीची भूमि पर बने मिलेंगे। समभूमि नगर में कठिनता से मिलेगी। नगर के बाहर चारों ओर समभूमि है। विजयेश्वर मन्दिर के ध्वंसावशेष की खोज में लग गया। नगर में घूमता हुआ बाबा साहब की जियारत में पहुँचा। यह बड़ा भारी घेरा है। कब्रि- स्तान घेरा के बाहर और भीतर दोनों जगहों पर है। जियारत के लगभग दो-तिहाई स्थान पर बड़ी-बड़ी कब्रें बनी हैं। शेष में छोटी छोटी कब्रें हैं। जियारत चौकोर है। इस जियारत में एक मसजिद है। जियारत तथा मसजिद के पत्थर मन्दिरों के ध्वंसा- वशेष हैं। जियारत की परिक्रमा करते चला जियारत के दाहिनी तरफ मुझे मन्दिर का विशाल आमलक तथा कलश एक ओर लुढ़का मिला। मन्दिरों के अलंकृत पत्थर बहुत दिखाई पड़े। मन्दिरों के शिखर पर कलश लगाने की प्रथा बौद्धों की अपेक्षा हिन्दू मन्दिरों में अधिक थी। यह विज- येश्वर किंवा अशोकेश्वर दो में से एक का मन्दिर होना चाहिए। किसका था कहना कठिन है। यहाँ पत्थर के सुन्दर खम्बे गोले चौपहले पड़े मिले। स्तम्भ का अधिष्ठान जियारत तथा बाहर दोनों जगहों पर लगा दिखाई पड़ेगा। कुछ कब्रों के पत्थर मन्दिर के अधिष्ठान के शिलाखण्ड के थे। अतएव यह निश्चय है कि वह स्थान प्राचीन मन्दिर था। रतन हाजी की मसजिद के बाहर भद्रपीठ का बड़ा शिला खण्ड पड़ा मिला। मसजिद के अन्दर स्तम्भ लगे हैं। मसजिद के आस-पास प्राचीन पत्थरों के टुकड़े बिखरे पड़े थे। विजयेश्वर की इस समय काफी उन्नति हो रही है। प्राचीन विजयेश्वर नगर से आबादी उठकर श्रीनगर-बनिहाल सड़क पर आकर आबाद हो रही है। मैं नगर में घूम रहा था। पानी बरस चुका था। कुछ झींसी पड़ रही थी। नव निर्मित मन्दिर का द्वार बन्द था। स्वयं सिकड़ी खोलकर अन्दर गया। यहाँ चारों ओर मुसलिम आबादी है। एक मुसलमान सज्जन ने यहाँ के पुजारी को बुला दिया।
प्रथम तरंग ८७ विजयेते पुण्यबलैर्बलैर्नैतु न शस्त्रिणाम्। परलोकात् ततो भीतिर्यस्मिन् निवसतं परम् ॥ ३९ ॥ ३९. उसपर पुण्य बल द्वारा ही विजय प्राप्त किया जा सकता है। अतएव वहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत रहते हैं न कि शस्त्रधारियों से।
मन्दिर के आगन के एक तरफ गीता अध्ययन के लिए स्थान बना है। जिस समय मै गलियों में घूम रहा था तो खिड़कियों से औरतें तथा बच्चे कौतूहल पूर्वक झांक कर मुझे देखते थे। मै धोती, चट्टी, तथा कुरता पहने था। मै टोपी नहीं लगाता। कश्मीर के हिन्दू धोती नही पहनते ? धोती पहनना अपवाद माना जायेगा। सर पर टोपी अथवा पगड़ी अवश्य होगी । मैं एक कौतूहल की सामग्री था। मुझे स्मरण होकर रोमाच हो जाता था। यहाँ के लोग कभी हिन्दू थे। हमारे जैसे धोती पहनते थे। उनके लिए धोती आज कौतूहल की वस्तु बन गई है। भरद्ोम ग्राम प्राचीन मदयाधम के समीप विसाड तथा रामन्यार नदियों के संगम पर है। यह संगम वितस्ता संगम के कुछ ऊपर है। दोनो की मिली धारा को गम्भीर नदी कहते हैं। संगम स्थान को गम्भीर संगम कहा जाता है। गम्भीर नदी बहुत गहरी है। विजयेश्वर तथा श्रीनगर मार्ग पर होने के कारण इसका सैनिक महत्त्व है। एक गम्भीर नदी और है। वह राजस्थान में चित्तोर दुर्ग के समीप बहती है। उसे लौकिक भाषा मे गम्भीरा नदी कहते हैं। (३) आदि केशव : आदि केशव का स्थान कश्मीर में कहाँ था कहना कठिन है। मैंने पता लगाने का प्रयास किया। कुछ स्थान बताये गये परन्तु वे ऐतिहासिक तुला पर ठीक उतरे नहीं। विष्णु के रूप केशव हैं। केशव के अनेक नाम तथा रूप हैं। आदि शब्द प्रारम्भ मे जोडने से मूल केशव का अर्थ वराह मूल किंवा मूल वराह की तरह प्रकट होता है। केशव के और भी मन्दिर कश्मीर में थे। अतएव सबसे प्राचीन केशव के मन्दिर अथवा मूर्ति का नाम आदि केशव रख दिया गया होगा। आदिशब्द देवताओं तथा पुस्तको में लगा देने से उनके मौलिक रूप की ओर संकेत हो जाता है । काशी में आदि विश्वेश्वर तथा आदि केशव के मन्दिर हैं। आदि विश्वेश्वर उस स्थान को कहते हैं जहाँ प्रथम विश्वनाथ जी का मन्दिर अलप्तगीन के समय में तोड़ा गया था। काशी में मुस्लिम राज्य समाप्त होने पर पार्श्व में एक मन्दिर बना दिया गया। वाराणसी प्राचीन काल में वरुणा गंगा के संगम से प्रारम्भ होकर अस्सो गंगा के संगम पर समाप्त होती थी । वरुणा गंगा के संगम पर आदि केशव का मन्दिर है। यही वाराणसी का आदि किंवा प्रारम्भ है। काशी में केशव तथा विश्वेश्वर के अनेक मन्दिर हैं। परन्तु आदि शब्द से यही प्रतीत होता है कि सबसे प्राचीन मन्दिर को आदि का विशेषण दे दिया गया। यही बात काश्मीर मण्डल के साथ भी हुई होगी। (४) ईशान : यह शब्द रुद्र किंवा शिव के लिये आता है। पारस्करगृह्यसूत्र (३: १३: ४) में समिति के सभापति के लिये इस शब्द का व्यवहार किया गया है—'अस्या . पर्षदः ईशान :-। अमर कोष (१: १२-३६) कार ने शिव के अड़तालीस नामों में 'ईशान' भी एक नाम दिया है। ईशान सन्धि-मति के गुरु थे। उनकी स्मृति में ईशेश्वर नामक एक मन्दिर निर्मित किया गया था। ईशेश्वर तथा दशावर स्थान को ईशान स्थान से मिलाना गलत होगा। विशेष प्रकाश रा० २: १३४ श्लोक में डाला गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३९ में 'पुण्य' का पाठभेद 'मूल्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : इस श्लोक द्वारा कल्हण कश्मीरियो की वीरता
८८ राजतरंगिणी सोष्मस्नानगृहाः शीते गुष्यत्तीरगङ्गाऽस्पदा गये। यादोविरहिता यत्र निम्नगा निरुपद्रवाः ॥ ४० ॥ ४०. यहाँ जल जन्तुओं से विहीन निरुपद्रव सरिताओं के रम्य१ तीर पर हैं और शीत ऋतु में स्नान निमित्त उष्ण२ स्नानगृह बने हैं।
तथा धर्मभीरुता दोनों आचरणों पर प्रकाश डालता है। वास्तव में काश्मीर इस दृष्टि में अपने गौरव का सानी नहीं रखता। भारत के पराधीन होने पर भी लगभग तीन शताब्दी तक हिन्दू राज्य कश्मीर में कायम रहा। कश्मीर को विदेशी अथवा विदेशी मुसलिम राजाओं ने नहीं जीता था। अन्तर्देशीय झगड़ों के कारण अपने ही लोगों के कारण हिन्दू राज्य हटाकर काश्मीरी मुसलिम राज्य कायम किया। सोलहवीं शताब्दी अर्थात् लगभग तीन शताब्दी तक यहाँ का शासन काश्मीरी मुसलिम बादशाहों के हाथों में रहा। ये बाह्य मुसलिम सेना का सर्वदा सामना करते रहे। अकबर के समय बाहरी मुसलिम शासन काश्मीर में स्थापित हुआ था। महमूद गजनो जैसे योद्धाओं को काश्मीरियों ने लोह कोट के पीछे हटाया था साथ ही वे बड़े धार्मिक भी थे। हिन्दू और मुसनमान काश्मीरी आज भी बहुत धर्म प्रिय हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या ४० में 'गुष्यतीर' का पाठ भेद 'श्शुष्यत्तीरा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४०(१) सुस्थ तार पद : वितस्ता नदी तीर- स्थित तीर्थस्थानो, जलाशया पर स्नान, पूजन, मार्जन, अभिषेक निमित्त पत्थर के घाट प्राचीन काल से बनाये जाते रहे हैं। काशी, मथुरा, नासिक, हरद्वारके घाट प्रसिद्ध हैं। नगर के लोग स्नान निमित्त घाटो पर जाते हैं। काश्मीरी भाषा में घाट को यारवल कहते हैं। जहाँ यार अर्थात् मित्र मिलते हैं। घाट नगर के सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। घाटो पर कथा वार्ता, पूजा-पाठ, सन्ध्या वन्दन, श्राद्ध, तर्पणधर्म, स्नान, वस्त्र प्रक्षालन, दीप दान, पुण्यदान, धर्मदान, सभी कुछ दैनिक, दैहिक, भौतिक कर्म किये जाते हैं। ४० (२) स्नानगृह : कल्हण ने मन्दिरों के जुड़ी गुप्य रचना का भी उल्लेख (रा० त० ८।७०६) राजतरंगिणी में दिया है। उन्हें काष्ठ मण्डप कहा जा सकता है। ये नदी तट पर बने रहते थे। काशी में काष्ठ मण्डप के स्थान पर स्नान के पश्चात् स्त्रियों के वस्त्र बदलने के लिए घाटों पर पत्थरी मढ़िया के बनाने की प्रथा थी। और है। नवीन घाट निर्माण के समय उनके रचना पर विशेष ध्यान रखा जाता है। वहीं-वहीं पर स्त्रियों के वस्त्र बदलने तथा जल में स्नान के लिए लकड़ियों के मण्डप बनाये जाते हैं। काशी में आज कल टिन तथा लोहे के स्नानगृह पोता पर बनाये जाते हैं जो पानी पर तैरते रहते हैं। और नदी के उतार चढ़ाव के समय भी इसमें ऊपर नीचे उठते रहते हैं। कल्हण के समय स्नात निमित्त काष्ठ मण्डप बनाने का संकेत प्रमाणित करता है कि बन्द स्थान में लज्जा तथा शीत की रक्षा करते हुए, स्नान की व्यवस्था थी। काश्मीरियों के विकसित सांस्कृतिक जीवन का यह द्योतक है। तत्कालीन सामाजिक जीवन काफी विकसित हो चुका था। कल्हण स्नान गृह का पुनः उल्लेख तरंग आठवें में करता है। सरित्स्नानगृहे स्नान्तो वृद्धाः शौण्डनियोगिनः । राजवेश्मान्यगणिता नाम मात्र नृपात्मजाः ॥ —रा० : ८ : ७०६ गर्म स्नानगृह अथवा हमाम कश्मीर के शीतकालीन सामाजिक जीवन में विशेषस्थान रखता है। स्नान क्रिया मार्जन के लिए वैयल