राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग । १८७
नन्दिक्षेत्र के उत्तर ओर कालोदक सतसरनी दर्रा दक्षिण तरफ हरमुकुट पर्वत तत्पश्चात् ब्रह्मसर नाग और धुर दक्षिण में भूतेश्वर है। पश्चिम सरबल नाग तथा पर्वतमाला है।
१२४ (१) ज्येष्ठ रुद्र अथवा ज्येष्ठेश : नन्दि- क्षेत्र में भूतेश्वर में ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर तथा लिंग था। सोदर तीर्थ के श्रीनगर में अवतीर्ण होने के पश्चात् यह स्वाभाविक था कि ज्येष्ठ रुद्र किंवा ज्येष्ठेश का भी मन्दिर राजा सोदर तीर्थ के समीप निर्माण कराता। अन्यथा सोदर तीर्थ श्रीनगर में लाने के पश्चात् भी राजा को बत्तीस मिल की नित्य यात्रा ज्येष्ठरुद्र के दर्शन निमित्त करनी पडती। प्रतिदिन ३२ मिल आने ओर जाने में कुल ६४ मिल दुर्गम पर्वतीय मार्ग से चलना पड़ता। अतएव राजा ने ज्येष्ठ रुद्र की स्थापना श्रीनगर में की। यह स्थान कहाँ था और यह अब किस अवस्था में है। यह विचारणीय विषय है।
इस समय शिव ज्येष्ठेश की संज्ञा उस लिंग से दी जाती है जो श्रीनगर में ज्येष्ठ नाग के पास स्थित है। डल लेक के गगरीबल के दक्षिण पश्चिम उठती पहाड़ो ढाल पर तथा जेथर ग्राम के कुछ ऊपर है। श्रीनगर एवं कश्मीर के ब्राह्मणो का यह पवित्र तीर्थ स्थान अत्यन्त प्राचीन काल से रहा है। इसका विस्तार से उल्लेख ज्येष्ठ माहात्म्य में मिलता है।
गाया है। भगवान् शिव ने ज्येष्ठा अर्थात् पार्वती का उद्धार एक दैत्य से यहाँ किया था। यहीं पर देवी से विवाह किया। विवाह के पश्चात् शिव का नाम ज्येष्ठेश पड़ गया !
समीपवर्ती ग्राम जेथर का नाम माहात्म्य में ज्येष्ठेश्वरक दिया गया है। श्री साहिबराम ने ज्येष्ठेश्वर की पूजा का उल्लेख अपने तीर्थ में किया है। उन्हें ज्येष्ठ रुद्र कहा है। काश्मीरी उसे ज्येष्ठ लुदर कहते हैं। यह शब्द ज्येष्ठ रुद्र का अपभ्रंश है। चतुर्थ तरंगिणी में 'ज्येष्ठ रुद्रास्य पर्वत' (५९२) उल्लेख से प्रकट होता है कि स्थान का नाम ज्येष्ठ रुद्र से सम्बन्धित था। श्रीपंचमी अर्थात् वैशाख बदी पंचमी को यहाँ काश्मीरियों का जमघट होता था। माहात्म्य में यही दिन ज्येष्ठेश की तीर्थ यात्रा के लिये निश्चित किया गया है।
डल झील को वहींपर (श्लोक ८१३) में 'ज्येष्ठ- रुद्रसमीपस्थम् सरत' कहा गया है। अर्थात् डल लेकका प्राचीन एक नाम सर था। उलर लेक का नाम महा- पद्मसर देकर दोनों के नामों में स्पष्ट अन्तर दिखाया गया है। डल को सर तथा उलर को महापद्मसर कहते थे। श्लोक ८०६ में 'ज्येष्ठ रुद्रसमीपस्य- गिरिः' शब्द आया है। शंकराचार्य पर्वत का काला- न्तर में एक नाम ज्येष्ठरुद्र भी पड़ गया था। जेथर से इस पर्वत के पूर्वीय मूल तक का अन्तर कठिनता से एक मिल होगा। महादेव माहात्म्य के दो उल्लेखो से भी यह बात स्पष्ट हो जाती है। शिव को वहाँ (२:८) इस प्रकार दिखाया गया है कि जैसे वह सारिका किंवा हर पर्वत पर से चारों ओर के अतिरम्य प्राकृतिक दृश्य का अवलोकन कर रहे हैं। वहाँ से वह पूर्व दिशा में डल लेक, तथा दक्षिण दिशा में ज्येष्ठ रुद्र पर्वत देख रहे हैं। इसी प्रकार १:१० में पार्वती को वितस्ता के तट से ज्येष्ठरुद्र का उत्तुङ्ग स्थान देखते दिखाया गया है। सारिका पर्वत पर चढ़कर यदि चारों ओर देखा जाय तो शंकराचार्य पर्वत अथवा ज्येष्ठ रुद्र जिसे मुसलिम लेखको ने तख्त सुलेमान लिखा है दक्षिण दिशा में गौरव पूर्ण शिखर ऊँचा किये दिखाई देता है। यहाँ के मन्दिर के शिखर पर लगी बिजुली का प्रकाश रात्रि में समस्त कश्मीर उपत्यका में चमकता दिखाई पड़ता है जैसे यह रात्रि में उपत्यका की एक सजग प्रहरी की तरह रक्षा कर रहा है। शंकराचार्य पर्वत तथा वितस्ता के मध्य संकीर्ण स्थान है। वहाँ तट से खड़ा होकर बिना मस्तक ऊपर उठाये शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर को कोई नहीं देख सकता। मैंने इन दोनो बातों का स्वयं अनुभव किया और सत्य पाया है।
१८८ राजतरंगिणी कल्हण के वर्णन (१:३४१) से यह बात मिलती है। यह स्थान डल लेक के दक्षिण दिखाया गया है। इस शंकराचार्य पर्वत का तत्कालीन नाम ज्येष्ठ रुद्र राजा गोपादित्य के समय में गोपाद्रि पड़ गया था । उल्लेख मिलता है कि राजा गोपादित्य ने ज्येष्ठेश में देवस्थान का निर्माण करा कर गोपाद्रि मे एक अग्रहार आर्यावर्त के ब्राह्मणों को दिया था । कल्हण ने गोपाद्रि शब्द पुनः शंकराचार्य किंवा ज्येष्ठ रुद्र पर्वत के लिए और इसी के लिए गोपाचल शब्द का प्रयोग रा० त० ८:११०७ में किया है। गोपाद्रि का अपभ्रंश आज कल का यथा- स्थान स्थित ग्राम गुपकर है। वह ग्राम बड़ा है। शंकराचार्य पर्वत के मूल पूर्वदिशा में स्थित है। जेथर ग्राम से आध मिल दूर है। इससे प्रकट होता है कि जेथर ग्राम के अत्यन्त समीप राजा गोपादित्य ने उक्त देवस्थान निर्मित किया था। श्री स्टीन का मत है कि राजा जलोक द्वारा निर्मित ज्येष्ठ रुद्र का स्थान श्रीनगर में डल लेक के दक्षिण दिशा में जेथर ग्राम के समीप होना चाहिए । इस देव स्थान के पूर्व में जेथर तथा शंकराचार्य पर्वत होना चाहिए। वर्तमान स्थिति इन स्थानों की ऐसी है कि वहाँ कोई प्राचीन स्मारक तथा ध्वंसावशेष नहीं है जिससे निश्चित रूप से निर्णय किया जाय कि ज्येष्ठेश का मन्दिर किस स्थान पर था। जनरल कनिंघम ने (एनसियेण्ट ज्योग्रेफी आफ इण्डिया पृष्ठ ८१ वाराणसी) शंकराचार्य पर्वत किंवा तख्त सुलेमान को ज्येष्ठेश्वर पर्वत माना है। उन्होंने ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर ही वर्तमान शंकराचार्य मन्दिर माना है। किन्तु डाक्टर वूहलर ने इसे ठीक नही माना है। उनका कहना है कि कश्मीरी पण्डितो की परम्परा शंकराचार्य पर्वत स्थित मन्दिर किंवा देव स्थान को राजा जलोक द्वारा स्थापित ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर नहीं मानती। श्री फरगुसन (हिस्टोरी आफ इण्डियन आर्किटेक्चर पृष्ठ २८२) ने भी इस मन्दिर को प्राचीन मन्दिर नही माना है। उन्होंने कहा है कि वर्तमान वृत्ताकार मन्दिर का भीतरी कक्ष जिसमें शिवलिंग स्थापित है उसका मुस्लिम काल में निर्माण किया गया था । प्राचीन मन्दिरों के ध्वंसावशेष गुपकर में अनेक स्थानो पर बिखरे मिलते हैं। गगरीबल के पश्चिमी तट पर सैय्यद निजामुद्दीन साहब की जियारत में तथा ग्राम की अन्य मुसलिम इमारतों में मन्दिरों के बड़े अलंकृत शिलाखण्ड लगे मिलते हैं । श्री स्टीन को उक्त जियारत के मार्ग में एक ओर दस फिट गोला एक विशाल शिवलिंग क्षत- विक्षत दिखाई दिया था। ज्येष्ठ नाग के समीप भी उन्हें एक विशाल शिवलिंग पर्वत मूल में भग्ना- वस्था मे मिला था। जेथर में उन्हें ऊपर भूमि पर कोई विशेष ध्वंसावशेष नही मिले थे । मैने यहाँ काफी समय खोज में व्यतीत किया है। श्री स्टीन तथा कल्हण वर्णित गुपकर ग्राम का रूप इस समय बिल्कुल बदल गया है। यहाँ पर पूर्व समय आबादी थी। स्वर्गीय राजा हरी सिंह अन्तिम डोगरा राजा कश्मीर ने इस स्थान को अपने प्रासाद निर्माण निमित्त ले लिया था। वर्तमान जेठा देवी से लेकर राजा श्री कर्ण सिंह के वर्तमान राज प्रासाद तक की भूमि जो शंकराचार्य मन्दिर के पृष्ठ भाग में है। नव प्रासाद निर्माण निमित्त ले ली गयी है। उस पर स्वर्गीय राजा श्री हरी सिंह जी ने अपने तथा तत्कालीन युवराज श्री कर्ण सिंह के लिये एक और प्रासाद बनवाया था। आजादी के पश्चात् आज कल वह प्रासाद एक होटल के रूप में परिणत कर दिया गया है। श्री स्टीन के मानचित्र तथा वर्णन के आधार पर मैने अनुसन्धान आरम्भ किया। नक्शा से कुछ सहायता नहीं मिली। सब कुछ बदल गया है। केवल पहाड़ी ढल तथा नाग अर्थात् झरनों का अस्तित्व यथा स्थान है। प्राचीन मार्ग तथा सड़क भी समाप्त हो गये हैं। नवीन मार्ग तथा सड़क नवीन ढंग से मूल स्थान से हटकर बनाये गये हैं। स्थानीय लोगों से बातें कीं।
प्रथम तरंग [१८९]
[बायाँ स्तम्भ] जांच किया । किन्तु विशेष सहायता न मिली । स्तीन वर्णित लिंग तथा कल्हण वर्णित मन्दिर का लेश मात्र वहाँ चिन्ह नही मिला । सब कुछ समयर कर आधुनिक मैदान तथा इमारतो में परिणत हो गया है । श्री स्तीन जहाँ ज्येष्ठेश्वर का स्थान निश्चित करते हैं वहाँ इस समय भव्य राजप्रासाद एवं होटल है । नकशे की सड़क का अस्तित्व लोप हो गया है । दो दिन तक मैं स्थानो का निरीक्षण करता रहा किन्तु कुछ पता नही चला । मेरा ड्राइवर ब्राह्मण था । वह राजा हरीसिंह के समय से ही राजकर्मचारी था । ड्राइवरी करते करते वृद्ध हो गया था । इस समय सरकारी ड्राइवर था । कश्मीर के मुख्य मंत्री श्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने एक कार के साथ उसे मेरे साथ लगा दिया था । वह इस स्थान से परिचित था । बहुत दिन पूर्व उसका यहाँ पर क्वार्टर था । उसमें रहता था । क्वार्टरों का भी अब लोप हो चुका है । मैंने उससे पुरानी सड़क का स्थान पूछा । नकशा दिखाया । पुराने ग्राम का चिह्न भी बताया । मैं कल्पना नहीं कर सकता था कि डोगरा हिन्दू राज्य में शिवलिंग हटाया जा सकता था । वे धर्मपरायणता के लिये प्रसिद्ध थे । मैने ड्राइवर से उसकी बाल्यावस्था की कुछ बातें स्मरण करने के लिये उत्साहित किया । वह राजभक्त सेवक था । वह जानकर इस स्थान के विषय में कुछ नहीं बता रहा था । मैंने इसे लक्ष्य किया । उसने काश्मीर के पुरातत्व विभागीय युवक से जिसे मैंने अपने साथ ले लिया था दबी जबान में धीरे से कहा—यहाँ शिव लिंग था । उस स्थान पर जहाँ राज्य प्रासाद या होटल का इस समय मैदान है । इस बात से मुझे एक जानकारी का स्रोत मिला । इस स्थान पर आने के पूर्व मैं जेठा देवी गया था । मुझे श्रीनगर में कुछ ब्राह्मणों ने बताया कि जेठा देवी के स्थान पर ही ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर था । मैं
[दायाँ स्तम्भ] वहाँ पहुँचा । स्थान देखा । मुझे निराशा हुई । स्थान आधुनिक था । प्राचीनता नाम की किसी वस्तु का दर्शन नहीं मिला । प्रथम क्रिया हुई । यह स्थान ज्येष्ठेश्वर का नही हो सकता । यहाँ देवी की संवत् २००३ विक्रमी में एक मूर्ति स्थापित की गई थी । शिवलिंग कहीं नहीं था । मैं बहुत देर तक वहाँ बैठा और आस-पास घूमता रहा । कुछ समय पश्चात् एक वृद्ध ब्राह्मण वहाँ आ गये । मेरा कौतूहल जानकर वे चकित हुए । मैने अपना सन्देह इस स्थान के विषय में प्रकट किया । ज्येष्ठा अर्थात् वर्तमान जेठा देवी के स्थान के पार्श्व में एक नाला बहता था । ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर नाला के वाम पार्श्व में पुरानी अर्थात् श्री स्तीन के नकशा के लुप्त वालो सड़क के समीप होना चाहिये था । ज्येष्ठा देवी का स्थान ज्येष्ठ रुद्र से ऊपर तथा नाला के तटपर है । राज प्रासाद मे होकर यहाँ का मार्ग जाता है । पूर्व काल में यह मार्ग एक सड़क के रूप में था । इस समय सड़क बिगड़ गयी है । पगडण्डी का रूप ले ली है । ऊपर पहुँचने पर एक सुरम्य स्थान मिलता है । यहाँ पर नाग अर्थात् जलस्रोत है । स्रोत का प्रथम स्वरूप नव निर्मित ज्येष्ठा देवी के मन्दिर के सम्मुख है । एक कुण्ड में स्रोत जल आता है । वहाँ से जल निकल कर नीचे बने चौकोर दूसरे कुण्ड में आता है । यहाँ पुरुष स्नान करते हैं । वहाँ से जल निकलकर तीसरे अर्थात् सबसे निचले कुण्ड में आता है । यह कुण्ड भी चौकोर है । यह मिट्टी तथा पत्थर की दिवाल से घेरा गया है । जहाँ महिलाएँ स्नान करती हैं । प्रथम कुण्ड के ऊपर मैदान है । जहाँ धर्मशाला बनी है । धर्मशाला के बायें भाग में दो कूप जैसे बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये हैं । इसमें होटल वाले शीत काल में बरफ एकत्रित कर रखते हैं । उसका प्रयोग ग्रीष्म काल में करते हैं । इन गड्ढों की गहरी खुदाई की गयी थी । परन्तु उसमें से कोई महत्त्व- पूर्ण वस्तु प्राप्त नही हुई ।
१९० राजतरंगिणी विस्मारितो नित्यकृत्यं कार्यव्यग्रतयैकदा । विदूरसोदरजलास्नावनालाभदुर्मनाः ॥ १२५ ॥ अपश्यन्निर्गमात्स्थानादकस्मादुत्थितं पयः । स सोदरात्रिसंवादि वर्णस्वादादिभिर्गुणैः ॥ १२६ ॥ १२५,१२६. कार्य व्यग्रता के कारण एकदिन राजा सुदूर स्थित सोदर तीर्थ में नित्यकृत्या- नुसार स्नान करना भूल गया । यह इस विस्मृति के कारण दुर्मन हो गया। एक जल हीन स्थान में अकस्मात् एक जल स्रोत उद्भूत हो गया था । वह जल वर्ण, स्वाद एवं अन्य गुणों मे सोदर तीर्थ के जलतुल्य था। यहाँ पर कोई प्राचीन वस्तु नहीं मिली । यहाँ ब्राह्मणों के दो घर हैं। वे देवी की पूजा करते हैं। अखरोट के कुछ वृक्ष हैं। उनका फल बेचकर जीविको- पार्जन करते हैं। स्थान सुन्दर है। यहाँ से डल लेक तथा पर्वतों का अच्छा दृश्य मिलता है। सारिका पर्वत का भी अच्छा दृश्य मिलता है। हरमुकुट पर्वत शिखर माला भी दूर पर दिखाई देती हैं। निस्सन्देह यह स्थान देवी पार्वती के तपस्या योग्य है। यहाँ शान्ति मिलती है। तरुछाया में बैठकर प्रकृति की शोभा निरखने में आनन्द मिलता है। मुझे परेशान देखकर उस वृद्ध ब्राह्मण ने कहा— "मैं पाँच वर्ष का था। उस समय नीचे वाला महल राजा बनवा रहे थे। वहाँ पर एक बहुत बड़ा शिव- लिंग था। उस लिंग तथा देवस्थान के कारण भूमि पर कब्जा पाना कठिन हो रहा था। राज्य प्रासाद के किसी खुले या बन्द भाग में शिवलिंग रहने देने का अर्थ था। जनता दर्शन और तीर्थ यात्रा के लिये आती। अतएव राजा हरी सिंह ने शिवलिंग उखड़- वाकर फेंकवा दिया। सलाहकारों के सुझाव पर शिवलिंग कही गाड़ दिया गया। मैदान चौरस कर दिया गया। मुमकिन है। वह शिवलिंग कहीं मैदान या मकान के नीचे दबा पड़ा हो।" मुझे इस कथन में सच्चाई मालूम हुई। ज्येष्ठा देवी जाने का मार्ग पैलेस अर्थात् होटल से होकर जाता है। वह मार्ग भी राजा ने बन्द करवा दिया था। राजा कर्ण सिंह के राजा होने पर वह मार्ग खुल गया है। लोग ज्येष्ठा के मन्दिर तक इस मार्ग से जा सकते हैं। अब लोग यात्रा करने आने लगे हैं। यद्यपि मैंने स्वयं देखा कि मार्ग के द्वार पर साइन बोर्ड लगा था—"प्राइवेट रोड।" नीचे उतर कर आया। वृद्ध ड्राइवर से सब बातें बतायीं। वह चकित हुआ। वह स्थान तो नहीं बता सका कि शिवलिंग इस समय कहाँ गड़ा है परन्तु यह स्वीकार किया कि यहाँ शिवलिंग था। किस स्थान पर वह था यह निश्चयात्मक रूप से नहीं बता सका। उसने एक बात और बताई। उसका समीप ही क्वार्टर था। वह वृद्धों से सुनता आया था। एक शेर शिवलिंग की नित्य परिक्रमा करने आता था। ज्येष्ठा देवी की भी परिक्रमा करता था। मेरी सन्देह दृष्टि देखकर उसने निश्चयात्मक ढंग से विश्वासपूर्ण वाणी में कहा—मैं छोटा था। अपने क्वार्टर में रहता था। मैंने स्वयं देखा है। शेर का एक बच्चा आता था। शिवलिंग की परिक्रमा करता था। ज्येष्ठा देवी की परिक्रमा करता था। यहाँ आबादी बढ़ने लगी। बहुत दिन हुआ उसका आना बन्द हो गया। और फिर तो यह देवस्थान ही समाप्त हो गया। मैं यह सब सुनकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचा। प्राचीन शिवलिंग पैलेस जो अब होटल हो गया है उसके मैदान अथवा इमारत के नीचे कही गड़ा है। अथवा डल लेक में खण्डित मूर्ति या लिंग की तरह
प्रथम तरंग १९१ प्रादुर्भूते ततस्तस्मिंस्तीर्थे कृतनिमज्जनः । स नन्दिरुद्रस्पर्धायां मानी पर्याप्तिमासदत् ॥ १२७ ॥ १२७. उस प्रादुर्भूत नवीन तीर्थ में मानी राजा ने स्नान किया तो उसे सोदर तीर्थ स्नान जैसी प्रसन्नता हुई । नन्दि रुद्र की स्पर्धा कार्य सम्पन्न होता देख उसे सन्तोष हुआ । तेन जातु परीक्षार्थं निक्षिप्तः सोदरान्तरे । सपिधानाननः स्वर्णशृङ्गारः सुचिरोदरः ॥ १२८ ॥ १२८. उस उत्पन्न सोदर तीर्थ को परीक्षा लेने के लिये कि वास्तव मे वह जल मूल सोदर तीर्थ का है या नहीं । राजा ने एक सुवर्ण शृङ्गार का मुख शीशा से बन्द किया । उसे मूल सोदर तीर्थ में छोड़ दिया । दिनद्वयेन सार्धेन श्रीनगर्युद्भूवाम्भसः । उन्मग्नः स महीभर्तुस्तस्य चिच्छेद संशयम् ॥ १२६ ॥ १२६. ढ़ाई दिन के पश्चात् वह सुवर्ण शृङ्गार श्रीनगर समीपस्थ उद्भूत सोदर तीर्थ मे निकल आया तो उस राजा का सन्देह दूर हो गया । नूनं नन्दीश एवासौ भोक्तुं भोगानवातरत् । दृष्टादृष्टक्रियासिद्धिर्न भवेत्तादृगन्यथा ॥ १३० ॥ १३०. प्रतीत होता था कि राजा स्वयं नन्दीश था । भूमि पर भोग भोगने के लिये अवतार लिया था अन्यथा इस प्रकार के अलौकिक कार्य किस प्रकार देखना सम्भव था ।
प्रवाह कर दिया गया है। और यही स्थान ज्येष्ठ रुद्र का स्थान था । पाठभेद : श्लोक संख्या १२६ में 'सोदरा' का 'मोदर', 'वर्णश्या' का पाठभेद 'वर्णरिवा' मिलता है। श्लोक संख्या १२८ में 'जातु' का पाठभेद 'तत्र' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२६. (१) मै बदायूँ उत्तर प्रदेश में एक समय गया था। बदायूं की पुरानी आबादी एक ऊँचे स्थान पर है । नगर में अनेक कूप है । मुझे बताया गया यदि एक कूप में सन्तरा छोड़ दिया जाय तो दूसरे कूप में निकल आता है । यही बात मुझे नैपाल में मालूम हुई। वहाँ गुह्येश्वरी देवी का मन्दिर है। मै दर्शन करने गया । वहाँ के कुण्ड के विषय मे यही कहा गया । समय-समय पर उसमें फल निकल आता था ।
कल्हण का यह वर्णन महत्त्वपूर्ण है। ढाई दिन में स्वर्ण शृंगार नवीन सोदर तीर्थ में निकल आया । यह दोनों स्थानो के मध्य की दूरी और यात्रा मे लगने वाले समय की ओर संकेत करता है। राजा की शक्ति की ओर भी संकेत करता है। स्वर्ण शृंगार को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचने में ढाई दिन का समय लग गया । यद्यपि राजा राज कार्य की व्यस्तता के बावजूद प्रतिदिन सोदर तथा विजयेश्वर की यात्रा करता था । कल्हण राजा की अलौकिक शक्ति के वर्णन की भूमिका प्रस्तुत करते हुए निम्न- लिखित श्लोक में उसकी तुलना नंदीश से कर देता है । १३०. (१) अवतार : प्रायः सभी धर्म किसी न किसी रूप में अवतारवाद के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं । देवताओ का मनुष्य रूप धारण करना तथा मानवों से सम्पर्क स्थापित करना अनादि काल
१९२ राजतरंगिणी से मान्यता प्राप्त करता आया है। अवतार का साधारण अर्थ होता है। ईश्वर किंवा देवताओं का शक्ति द्वारा भौतिक जगत् में मूर्तिमान आविर्भाव होना। अवतार का प्राचीन शब्द प्रादुर्भाव है। वैष्णव सम्प्रदाय में अवतार को विशेष महत्त्व दिया जाता है। पांचरात्र भगवान् विष्णु के व्यूह, विभव, अन्तर्यामी, तथा आचार्यावतार का सिद्धान्त स्वीकार करता है। शैव सम्प्रदाय के ग्रन्थों में भग- वान् शंकर के नाना प्रकार की लीलाओं का वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत (१०:२१:१४) भगवान् के अवतार का प्रयोजन उपस्थित करता है। नृणां निःश्रेयसायापि व्यक्तिर्भगवतो भुवि । अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ अवतार-वाद का पुराणों में सविस्तार उल्लेख किया गया है। वैदिक साहित्य में अवतारवाद का रूप मिलता है। प्रजापति ने प्राणियों की रक्षा निमित्त अनेक रूप धारण किया था। शतपथ ब्राह्मण (१४:१:१) में मत्स्य, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१: ५) में कूर्म, जैमिनी ब्राह्मण में (३:२७२) वाराह, तैत्तिरीय संहिता (७:१.५:१) तथा शतपथ (१४: १:२:११) तथा तैत्तिरीय आरण्यक में नृसिंह तथा तैत्तिरीय संहिता (२:१.३:१) में वामन अवतारों का संकेत प्राप्त होता है। स्वयं ऋग्वेद में (१: १५४:३) में त्रिविक्रम विष्णु का तीन पदों में विश्व को नापने का उल्लेख है। कालान्तर में प्रजापति के स्थान पर विष्णु की प्रमुखता हुई। उस समय से विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलने लगा। अवतारों के रूप, लीला तथा घटना वैविध्य का वर्णन वेद पर ही अधिकतया आश्रित है। विष्णु के चौबीस अवतार माने जाते हैं। दशा- वतार विशेष प्रचलित हैं। उनमें दो जल प्राणी मत्स्य तथा कच्छप हैं। ये बन जो दो थलचारी वरा॑ है। बनजो हैं। दोनों का तथा भाग वराह तथा सिंह का है। एक वामन अवतार है। वे सर्व हैं। तीन राम हैं। परशुराम, दाशरथि राम तथा बलराम । बुद्ध ग्यारह हैं। कल्कि अनुपः हैं। महाभारत में बुद्ध का नाम नहीं मिलता है। वहाँ पर 'हंस' को अवतार मान कर दस संख्या की पूर्ति की गयी है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से बिल्कुल ठीक है। महाभारत काल के पूर्व भगवान् बुद्ध का जन्म नहीं हुआ था। महाभारत के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् भगवान् बुद्ध का जन्म हुआ था। अतएव महाभारत में बुद्ध का अवतार न होना तर्क सम्मत है। बौद्ध धर्म के महायान पंथ में अवतारवाद की कल्पना दृढ़ मूल है। बोधिसत्व कर्मफल की पूर्णता होने पर बुद्ध रूप में अवतरित होते हैं। जातक कथाएँ इस प्रकार के आख्यानों से भरी पड़ी हैं। तिब्बत में दलाईलामा के रूप में अवतार का संकेत मिलता है। लामा लोजंग-ग्या-मत्सो (सन् १६१५-१६८२ ई०) ने इस परम्परा की स्थापना की। तिब्बती मान्यता है। दलाईलामा की मृत्यु के पश्चात् उनकी आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है। इस मत का प्रचार मंगोलिया के मठों में विशेष रूप से था। परंतु चीन में अवतारवाद की कल्पना मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी। पारसी धर्म की परम्परा वैदिक तथा हिन्दुओं की अनेक मान्यताओं से मिलती है। ये राजा को पवित्र तथा देवी शक्ति सम्पन्न मानते हैं। पारसी ग्रन्थों में 'बहूशों हुरेनाट' राजा में अद्भुत तेज सत्ता थी। वह कालान्तर में मर्दशिर राजा और सस्सनवंशी राजाओं में थी। शामी अर्थात् सेमेटिक लोगों में कुछ कम या ज्यादा अवतारवाद के अंकुर मिलते हैं। यहाँ राजा भौतिक तथा दैवी शक्ति का प्रतीक माना था। अर्थात् बेबोलोनिया में अवतारवाद की विकास हुआ था। किश का राजा
प्रथम तरंग १९३ राजंस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् । ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥ १३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था। मध्य मार्ग में एक अबला मिली। उसने राजा से भोजन की याचना की। यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते । व्यवृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाशयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥ १३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की। स सत्त्वहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् । अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥ १३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था। उसने उससे कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो।' उसने राजा से कहा।
उरुमुरु अपने जीवन काल में ही ईश्वर का अवतार माना जाता था। नरामसिन राजा कहता था। उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा रखा था। मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी। वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था। मिस्री लोगों का विश्वास था। 'रा' देवता रानी के साथ सहवास करता था। उससे अलौकिक शक्ति सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था। यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के समान थी। वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र तुल्य मानते थे। जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि- ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे। यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक झुकाव है। ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस मान्यता को स्वीकार करता है। महात्मा ईसा में अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है। इसलाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है। २५
कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है। उसकी तुलना नन्दीश के अवतार से करता है। १३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का उल्लेख किया है। राजा जलोक का झुकाव बुद्ध धर्म की ओर अधिक नहीं था। अपितु वर्णाश्रम धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था। बौद्धों में आतंक व्याप्त हो गया होगा। राज्याश्रय के अभाव में वे भय का अनुभव करते। वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है। राजा जलोक के समय बौद्धधर्मावलम्बियो की क्या स्थिति हो गयो थी। यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है। पाठभेद : श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद 'यथेच्छ' मिलता है। श्लोक संख्या १३३ में 'मांस' का पाठभेद 'दातु' मिलता है।
१९२ राजतरंगिणी
से मान्यता प्राप्त करता आया है। अवतार का साधारण अर्थ होता है। ईश्वर किंवा देवताओं का शक्ति द्वारा भौतिक जगत् मे मूर्तिमान आविर्भाव होना। अवतार का प्राचीन शब्द प्रादुर्भाव है। वैष्णव सम्प्रदाय में अवतार को विशेष महत्त्व दिया जाता है। पांचरात्र भगवान् विष्णु के व्यूह, विभव, अन्तर्यामी, तथा आचार्यावतार का सिद्धान्त स्वीकार करता है। शैव सम्प्रदाय के ग्रन्थो में भग- वान् शंकर के नाना प्रकार की लीलाओं का वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत (१०:२१:१४) भगवान् के अवतार का प्रयोजन उपस्थित करता है। नृणां निःश्रेयसायापि व्यक्तिर्भगवतो भुवि । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ अवतार-वाद का पुराणों में सविस्तार उल्लेख किया गया है। वैदिक साहित्य में अवतारवाद का रूप मिलता है । प्रजापति ने प्राणियों की रक्षा निमित्त अनेक रूप धारण किया था। शतपथ ब्राह्मण (१८.१:१) में मत्स्य, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१: ५) में कूर्म, जैमिनी ब्राह्मण में (३.२७२) वाराह, तैत्तिरीय संहिता (७:१.५१) तथा शतपथ (१४: १:२:११) तथा तैत्तिरीय आरण्यक में नृसिंह तथा तैत्तिरीय संहिता (२१.३.१) में वामन अवतारों का संकेत प्राप्त होता है। स्वयं ऋग्वेद मे (१: १५४.३) में त्रिविक्रम विष्णु का तीन पदों में विश्व को नापने का उल्लेख है। कालान्तर में प्रजापति के स्थान पर विष्णु को प्रमुखता हुई। उस समय से विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलने लगा। अवतारों के रूप, लीला तथा घटना वैविध्य का वर्णन वेद पर ही अधिकतया आश्रित है। विष्णु के चौबीस अवतार माने जाते हैं। दशा- वतार विशेष प्रचलित हैं। उनमें दो जल प्राणी मत्स्य तथा कच्छप हैं। वे वन जी हैं। दो थलचारी वराह तथा नृसिंह हैं। वे भी वनचरो हैं। दोनों का अधोभाग मनुष्य तथा शिरो- भाग वराह तथा सिंह का है। एक वामन अवतार है। वे खर्व हैं। तीन राम हैं। परशुराम, दाशरथि राम तथा बलराम । बुद्ध सकृपः हैं। कल्कि अकूपः हैं। महाभारत में बुद्ध का नाम नहीं मिलता है। वहाँ पर 'हंस' को अवतार मान कर दश संख्या की पूर्ति की गयी है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से बिल्कुल ठीक है। महाभारत काल के पूर्व भगवान् बुद्ध का जन्म नहीं हुआ था। महाभारत के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् भगवान् बुद्ध का जन्म हुआ था। अतएव महाभारत में बुद्ध का अवतार न होना तर्क सम्मत है। बौद्ध धर्म के महायान पंथ में अवतारवाद की कल्पना दृढ़ मूल है। बोधिसत्त्व कर्मफल की पूर्णता होने पर बुद्ध रूप में अवतरित होते हैं। जातक कथाएँ इस प्रकार के आख्यानों से भरी पड़ी हैं। तिब्बत में दलाईलामा के रूप में अवतार का संकेत मिलता है। लामा लोजंग-ग्या-मत्सो (सन् १६१५-१६८२ ई०) ने इस परम्परा की स्थापना की। तिब्बती मान्यता है। दलाईलामा को मृत्यु के पश्चात् उनकी आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है। इस मत का प्रचार मंगोलिया के मठों में विशेष रूप से था। परंतु चीन में अवतारवाद की कल्पना मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी। पारसी धर्म को परम्परा वैदिक तथा हिन्दुओं की अनेक मान्यताओं से मिलती है। वे राजा को पवित्र तथा दैवी शक्ति सम्पन्न मानते हैं। पारसी ग्रन्थों में 'बहूशों हूरेनाट' राजा में अद्भुत तेज सत्ता थी। वह कालान्तर में अर्दशिर राजा और सस्सनवंशी राजाओं में थी। शामी अर्थात् सेमेटिक लोगों में कुछ कम या ज्यादा अवतारवाद के अंकुर मिलते हैं। यहाँ राजा भौतिक तथा दैवी शक्ति का प्रतीक माना जाता था। बाबुल अर्थात् बेबोलोनिया में अवतारवाद की मान्यता का विकास हुआ था। किश का राजा
प्रथम तरंग १९३ राज्ञस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् । ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥ १३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था । मध्य मार्ग में एक अबला मिली । उसने राजा से भोजन की याचना की । यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते । व्यघृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाश्रयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥ १३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की । स सत्यहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् । अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥ १३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था । उसने उससे कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो ।' उसने राजा से कहा । उरुमुश अपने जीवन काल में ही ईश्वर का कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक अवतार माना जाता था । नरामसिन राजा कहता ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है । उसकी तुलना था । उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने नन्दीश के अवतार से करता है । अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा रखा था । १३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी । भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था । उल्लेख किया है । राजा जलोक का झुकाव बुद्ध मिस्री लोगों का विश्वास था । 'रा' देवता रानी के धर्म की ओर अधिक नहीं था । अपितु वर्णाश्रम साथ सहवास करता था । उससे अलौकिक शक्ति धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था । बौद्धों सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था । में आतंक व्याप्त हो गया होगा । राज्याश्रय के अभाव यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के में वे भय का अनुभव करते । वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों समान थी । वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ तुल्य मानते थे । जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि- यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है । राजा जलोक के ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे । समय बौद्धधर्मावलम्बियों की क्या स्थिति हो गयी यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष थी । यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है । में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक झुकाव है । पाठभेद : ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद मान्यता को स्वीकार करता है । महात्मा ईसा में 'यथेच्छ' मिलता है । अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है । इस्लाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक श्लोक संख्या १३३ में 'मांसं' का पाठभेद 'दातुं' शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है । मिलता है । २५
१९४ राजतरंगिणी बोधिसत्त्वोऽसि भूपाल कोऽपि सत्त्वोर्जितव्रतः । कारुण्यं प्राणिषु दृढं यस्येदृक्ते महात्मनः ॥ १३४ ॥ १३४. 'निश्चय आप कोई बोधिसत्त्व हैं भूपाल ! और कौन ऐसा सत्यव्रती हो सकता हे ? महात्मन ! आपने जीवित प्राणियों में दृढ़ करुणा दिखायी है। बौद्धभाषामजानानो माहेश्वरतया नृपः । को बोधिसत्त्वो यं भद्रे मां वेत्सीति जगाद ताम् ॥ १३५ ॥ १३५. शिव उपासक होने के कारण नृप बौद्ध भाषा नहीं समझ सका । राजा ने जिज्ञासा की—' भद्रे ! बोधिसत्त्व क्या ? जिसे तुमने मुझे समझा है ?' पुनर्वभाषे सा भूपं श्रोतव्यं मत्प्रयोजनम् । “अहं ह्युत्थापिता बौद्धैः क्रोधाद्विप्रकृतैस्त्वया ॥ १३६ ॥ १३६. उसने पुनः उस भूप से कहा — 'प्रयोजन सुनिए मैं उन बौद्धों द्वारा भेजी गयी हूँ जिन्हें अपने क्रोध के कारण आपने दुःखी कर दिया है । पादटिप्पणियाँ : १३३(१) शरीर मांस ग्रहण : कल्हण इस श्लोक के द्वारा राजा जलोक का चरित्र महत्त्वपूर्ण बना देता है । राजा का पवित्र चरित्र निखर उठा है । कृत्या बौद्धो द्वारा भेजी गयी थी । परन्तु राजा ने असीम धैर्य, मेधा एवं दयाशीलता का परिचय दिया है । कृत्या के प्रति किंचित् मात्र क्रोध, क्षोभ किंवा द्वेष उसमें उत्पन्न नही हुआ । यद्यपि राजा बौद्ध धर्म विरोधी था, परन्तु इस श्लोक से स्पष्ट प्रकट होता है । राजा अहिंसक था । उसने बौद्धो के प्रति हिंसा वृत्ति का वरण नहीं किया था । उन्हें ताडित नही किया था । उसने राजा शिवि के समान प्राणी रक्षा के लिये अपना मास देना पसन्द किया । अपने जीवन की आहुति देना स्वीकार किया । परन्तु किसी प्राणी को कष्ट देना, उसकी हत्या करना, उसने अपनी जीवन रक्षा निमित्त भी उचित नहीं समझा । कल्हण राजा के अलौकिक गुणों का वर्णन करते हुए, उसे महाभारत वर्णित ययाति राजा के पौत्र राजा शिवि औशीनर के समकक्ष कर देता है । जिस प्रकार राजा शिवि ने कपोत की रक्षा के निमित्त अपना मांस काटकर तराजू पर रखना आरम्भ किया। अपने वचन का पालन किया। शरणागत की रक्षा की । यहाँ कल्हण राजा जलोक को और ऊपर उठा देता है । राजा किसी का भी मांस कृत्या को दे सकता था । वह अपना मांस देने के लिये न तो वचनबद्ध था और न प्रतिज्ञा किया था । परन्तु किसी भी प्राणी को उसके कारण कष्ट न हो, अतएव अपना मांस स्वतः देने पर कटिबद्ध हो गया ! १३४ (१) बोधिसत्त्व : इस शब्द का अर्थ होता है बुद्ध प्राप्ति का अधिकारी व्यक्ति किंवा पात्र । वह व्यक्ति जिसने बुद्धत्व प्राप्त नहीं किया है। वह महापुरुष जो आगे चलकर बुद्ध हो गया । भगवान् बुद्ध के जन्म काल से उनके बोध गया में बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व काल के जीवन का सम्बोधन बौद्ध ग्रन्थों में बोधिसत्त्व नाम से किया गया है। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् बोधिसत्त्व स्वयं बुद्ध हो जाते हैं । कल्हण ने यहाँ अबला विप्रा कृत्या से राजा जलोक के गुणों की प्रशंसा कराने के साथ ही उन्हें मन्दोश अवतार के समान बुद्ध अवतार होने की ओर भी संकेत किया है। वह राजा जलोक में अवतार की
प्रथम तरंग १९५ लोकालोकाद्रिपार्श्वस्थास्तामस्यः कृतिका वयम् । बोधिसत्त्वैकशरणाः काङ्क्षन्त्यस्तमसः क्षयम् ॥ १३७ ॥ १३७. 'हम लोकालोक' पर्वत के पार्श्व की तम² निवासिनी कृत्या³ हैं। तम मुक्ति की आकांक्षा में बोधिसत्त्व के शरण में रहती हैं।' लोके भगवतो लोकनाथादारभ्य केचन । ये जन्तवो गतक्लेशा बोधिसत्त्वानवेहि तान् ॥ १३८ ॥ १३८. 'भगवान् लोकनाथ' से आरम्भ होकर अबतक इस लोक में कुछ प्राणी गतक्लेश२ हो चुके हैं उन्हें ही बोधिसत्त्व कहा जाता है। मान्यता हिन्दू और बौद्ध दोनों से दिलाता है। कृत्या राजा के मास को स्पृहा करती थी। उसने स्वयं स्वीकार किया। राजा जलोक बोधिसत्त्व है। कल्हण ने काश्मीर में निवासित बौद्ध एवं हिन्दू दोनों धर्मों- वलम्बियों के अवतार रूप में जलोक को उपस्थित किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या १३६ में 'हृत्या' का पाठभेद 'अहंकृत्या' मिलता है । श्लोक संख्या १३७ में 'तमसः' का पाठभेद 'तपसः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १३७ (१) लोकालोक पर्वत : पौराणिक गाथा के अनुसार सातों समुद्रों को परिवेष्टित करने वाली यह पर्वत श्रेणी है । 'लोकालोकश्चक्रवालः' पृथ्वी को घेरने वाले दो पर्वत लोकालोक तथा चक्रवाल हैं । (अमरः शैल वर्गः ३:२) इसका अर्थ दृश्य एवं अदृश्य लोक होता है। कृत्या का निवास स्थान यहाँ वर्णन किया गया है। वे अदृश्य लोक अथवा अन्धकार में निवास करनेवाली होती हैं । अतएव उन्हें स्पष्ट नहीं देखा जा सकता । (२) तम : यहाँ तम शब्द तामस प्रकृति, अन्धकार, तमोगुण एवं पाप के लिए प्रयुक्त किया गया है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इस अर्थ में मैं समझता हूँ कल्हण ने तम शब्द का प्रयोग किया है। तमस् का अर्थ कूप नरक का अन्धकार तथा केश भी होता है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (१०:१२०:३) में तमस् शब्द आया है। यहाँ इसका अर्थ अन्धकार किया गया है। तम आसीत् तमसा........? प्रारम्भ में तमस् ही तमस् था । सब- कुछ तम से आवृत्त था। (३) कृत्या : आभिचारिक कर्म के अर्थ में अनेक स्थानों पर कृत्या शब्द का प्रयोग किया गया है। (ऋ०:१०:८५:२८;२९) अथर्ववेद (५:१४: ११) में मनाया गया है कि कृत्या अपने कर्त्ता के पास लौट जाय। अमरकोष में (नानार्थ वर्ग ३:१५८) में कृत्या का अर्थ दिया गया है-कृत्या क्रियादेवतयोःस्त्रिपु भेद्ये धनादिभिः ।' कार्य, भूत प्रेत आदि अधम देवता, धन, स्त्री, भूमि से भेद डाले जाने वाले पराये राज्य के व्यक्ति इसका अर्थ किया गया है। इसका उल्लेख एक देवी विशेष के अर्थ में भी आता है। मारण कार्य के लिये विशेष रूप से बलिदानादि द्वारा इसको पूजा की जाती है। यह एक शक्ति विशेष अथवा देवी है। अभिचार क्रिया द्वारा किसी का वध करने के लिये अनुष्ठान विशेष द्वारा उत्पन्न की जाती है। कृत्या को तम शक्ति भी संज्ञा दी गयी है। १३८ (१) लोकनाथ : लोकनाथ से यहाँ अर्थ भगवान् बुद्ध से है। इस शब्द का अर्थ ब्राह्मण, विष्णु, शिव, राजा तथा बुद्ध होता है। (२) क्लेश : कल्हण यहाँ भगवान् बुद्ध के प्रसिद्ध शब्द 'दुःख' का उल्लेख न कर क्लेश शब्द का प्रयोग करता है। यहाँ पर क्लेश का अर्थ दुःख
१९६ राजतरंगिणी सागसेऽपि न कुप्यन्ति क्षमया चोपकुर्वते । बोधिं स्वस्यैव नेच्छन्ति ते विश्वोद्धरणोद्यताः ॥ १३९ ॥ १३९. वे पापियों पर भी क्रोध नहीं करते। वे अपनी क्षमाशीलता द्वारा बुरे का बदला भले से देते हैं। वे केवल अपने लिये बोधि नहीं चाहते, अपितु विश्व की मुक्ति निमित्त उद्यत रहते हैं। विहारतूर्यनिर्घोषैरुन्निद्रः प्रेरितः खलैः । पुरा भवान्व्यधात्क्रोधाद्विहारोद्दलनं यदा ॥ १४० ॥ १४०. एक दिन विहार के तूर्य घोष द्वारा आपकी निद्रा भंग हो गयी। कतिपय खलों की प्रेरणा से आपने क्रोधित होकर विहारों के दलन का आदेश दे दिया। मानना बौद्धदर्शन तथा सिद्धान्त से अधिक मेल खायेगा। योगशास्त्र के अनुसार क्लेश मुख्यतया पाँच प्रकार के होते हैं यथा-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश। पाठभेद : श्लोक संख्या १३९ में 'क्षमया' का 'कृपया', 'बोधिं' का 'हितं' 'नेच्छन्ति' का 'नेष्यन्ति' 'श्वोद्ध- रणा' का 'श्यद्धरणो' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४० (१) विहार दलन : विहारों के दलन करने के आदेश से मालूम होता है कि राजा जलोक बौद्धों का घोर विरोधी था और वर्णाश्रम धर्म के उद्धार निमित्त तुल गया था। कल्हण विहारों के नष्ट करने तथा भिक्षुओं के निकाले जाने का उल्लेख पुनः रा० त० १.१४०,१४१ में करता है। बौद्ध विहारों में हिन्दू देवता रखने की प्रथा बौद्धधर्म के पतन के साथ प्रारम्भ हो गयी थी। कपिलवस्तु के समीप अनेक प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में पौराणिक मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। भगवान् बुद्ध को अवतार मान- कर कालान्तर में हिन्दुओं ने बुद्ध पूजा प्रारम्भ कर दी थी। अतएव देवमन्दिरों में बुद्ध मूर्ति के साथ पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियों के रखने की प्रथा चल पड़ी थी। आज भी एक ही मन्दिर में शिव, विष्णु, नरसिंह, दुर्गा, गणेश आदि देवताओं की प्रतिमायें स्थापित की जाती है। विहारों को हिन्दू मन्दिर में परिवर्तित कर देना साधारण बात हो गयी थी। यह समय-समय पर भारत में होता रहा है। कृत्या के इस संवाद से यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि राजा का विचार बौद्धों के प्रति अच्छा नहीं था। उग्र था। इसका कारण बौद्धों की राज्य के प्रति निष्ठा में कमी होना हो सकता है। बौद्ध संघ- शरण में विश्वास रखते थे। देश एवं राष्ट्र का उनमें स्थान न था। देश एवं संघ के मतवैभिन्य अथवा शासन वैभिन्य में किसको प्राथमिकता दी जायगी यह प्रश्न मूर्तमान सर्वदा खड़ा होता रहा है। बौद्ध जीवन से विरक्त होते थे। संघ शासन में अनुशासित थे। उनकी निष्ठा संघ की अपेक्षा राज्य के प्रति कम होती थी। यह प्रश्न मध्ययुग के प्रारम्भ काल में यूरोप में भी उग्र रूप से खड़ा हो गया था। चर्च और राज्य दोनों के निष्ठाकाल में किसको प्राय- मिकता दी जायगी इस प्रश्न को लेकर शताब्दियों तक राज्य एवं चर्च में संघर्ष होता रहा है। बुद्धधर्म प्रवर्तक धर्म था। वह लोगों का मत परिवर्तित कर संघ में सम्मिलित करने में मिलते इस्लाम की तरह विश्वास करता था। सम्भव है। बौद्धों की इन मनो- वृत्तियों के कारण राजा जलोक बौद्धधर्म विरोधी हो गया होगा। उसके स्थानपर वर्णाश्रम धर्म को प्रश्रय दिया था। अनेक अनुवाद-कर्त्ताओं ने 'विहार नष्ट करने का आदेश राजा ने दिया' यह अनुवाद किया है।
प्रथम तरंग १६७ 'महाशाक्यः स नृपतिर्न शक्यो बाधितुं त्वया । तस्मिन्दृष्टे तु कल्याणि भविता ते तमःक्षयः ॥ १४१ ॥ अस्मद्गिरा प्रेषणीयो विहारकरणाय सः । दत्त्वा स्वहेमसंभारं त्वया मलिनितः खलैः ॥ १४२ ॥ तस्मिन्कृते न जायेत विहारच्छेदवैशसम् । तस्य तत्प्रेरकाणां च प्रायश्चित्तं कृतं भवेत् ॥ १४३ ॥ क्रुद्धैर्वादिभिरनुध्याता त्वद्वधाय प्रधाविता । अनुशिष्टा समाहूय बोधिसत्त्वैस्तदेत्यहम् ॥ १४४ ॥ १४१-१४४. 'उत्तेजित भिक्षुओं ने मेरे लिये सोचा । आपके वध निमित्त मुझे भेजा । उस समय बोधिसत्त्वों ने मुझे बुलाया । निम्नलिखित उपदेश दिये- 'कल्याणि ! वह राजा महाशाक्य' हैं। तुम उनका वध नहीं कर सकती । किन्तु उनका दर्शन करते ही तुम्हारा तम कम हो जायगा । खलों की प्रेरणा द्वारा उसने दोष किया है, हमारे नाम से तुम उसे प्रेरित करना कि वह अपना हेम संभार देकर विहार का निर्माण करा दे । ऐसा करने से विहार उच्छेद के दोष का भागी राजा न रहेगा और जिन खलों ने उसे उत्तेजित किया है उनके और उसके दोषों का इस प्रकार प्रायश्चित्त हो जायगा । कुछ ने 'विहार गिराने का राजा ने आदेश दिया' यह अनुवाद अंग्रेजी तथा हिन्दी में किया है। यहाँ दलन शब्द का प्रयोग किया है। दलन का अर्थ 'दबाना' अर्थात् विहारों को कुचलने किंवा दबाने का था। यह अर्थ अधिक समीचीन मालूम पड़ता है। महासम्मत था। महावंश में उल्लेख है क्षत्रिय वंशों में शिरोमणि महासम्मत वंश में महामुनि (बुद्ध) ने जन्म लिया।' पाठभेद : श्लोक संख्या १४१ में 'महाशाक्य' का पाठभेद 'महासत्त्व' मिलता है । श्लोक संख्या १४२ में 'स्वहेम' का पाठभेद 'दत्वाम्ब हेम' मिलता है । श्लोक संख्या १४४ में 'अनुशिष्टा' का 'अनुदिष्टा' तथा 'सत्त्वं' का पाठभेद 'सत्यं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १४१ ( १ ) महाशाक्य : एक मत है कि शुद्ध पाठ महासम्मत है। महासम्मत तथा महाशाक्य में नाम मात्र का भेद है। महावंश (२:२३) के अनुसार भगवान् बुद्ध के वंश का नाम त्रिपिटक के अनुसार भगवान् बुद्ध शाक्य वंशीय थे । देवदह शाक्य थे । उनके पुत्र सिंहहनु थे । सिंहहनु के पुत्र शुद्धोधन थे । शुद्धोधन के पुत्र गौतम अर्थात् बुद्ध थे । गौतम गोत्र था । शाक्य क्षत्रियों की एक शाखा थी। यह शाखा राजा इक्ष्वाकु के रक्त से सम्बन्धित थी । भगवान् बुद्ध शाक्य मुनि हैं। उन्हें शाक्य में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण उनको महाशाक्य की संज्ञा दी गयी है। महासम्मत शब्द का सम्बन्ध भगवान् बुद्ध के वंश किंवा जाति से था। महाशाक्य भगवान् का नाम शाक्यों में सर्व श्रेष्ठ किंवा महान् होने के कारण दिया गया था। वह विशेषण है। महाशाक्य शब्द का प्रयोग महासम्मत के स्थानपर अधिक उपयुक्त लगता है।
१९६ राजतरंगिणी सागसेऽपि न कुप्यन्ति क्षमया चोपकुर्वते । बोधिं स्वस्यैव नेच्छन्ति ते विश्वोद्धरणोद्यताः ॥ १३६ ॥ १३९. वे पापियों पर भी क्रोध नहीं करते। वे अपनी क्षमाशीलता द्वारा बुरे का बदला भले से देते हैं। वे केवल अपने लिये बोधि नहीं चाहते, अपितु विश्व की मुक्ति निमित्त उद्यत रहते हैं। विहारतूर्यनिर्घोषैरुन्निद्रः प्रेरितः खलैः । पुरा भवान्व्यधात्क्रोधाद्विहारोद्दलनं यदा ॥ १४० ॥ १४०. एक दिन विहार के तूर्य घोष द्वारा आपकी निद्रा भंग हो गयी। कतिपय खलों की प्रेरणा से आपने क्रोधित होकर विहारों¹ के दलन का आदेश दे दिया।
मानना बौद्धदर्शन तथा सिद्धान्त से अधिक मेल खायेगा। योगशास्त्र के अनुसार क्लेश मुख्यतया पाँच प्रकार के होते हैं यथा-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश । पाठभेद : श्लोक संख्या १३९ में 'क्षमया' का 'कृपया', 'बोधि' का 'हितं' 'नेच्छन्ति' का 'नेष्यन्ति' 'स्वोद्ध- रणा' का 'स्वद्धरणो' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४० (१) विहार दलन : विहारों के दलन करने के आदेश से मालूम होता है कि राजा जलौक बौद्धों का घोर विरोधी था और वर्णाश्रम धर्म के उद्धार निमित्त तुल गया था। कल्हण विहारों के नष्ट करने तथा भिक्षुओं के निकाले जाने का उल्लेख पुनः रा० त० १।८०,१८१ में करता है। बौद्ध विहारों में हिन्दू देवता रखने की प्रथा बौद्धधर्म के पतन के साथ आरम्भ हो गयी थी। कपिलवस्तु के समीप अनेक प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में पौराणिक मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। भगवान् बुद्ध को अवतार मान- कर कालान्तर में हिन्दुओं ने बुद्ध पूजा आरम्भ कर दी थी। अतएव देवमन्दिरों में बुद्ध मूर्ति के साथ पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियों के रखने की प्रथा चल पड़ी थी। आज भी एक ही मन्दिर में शिव, विष्णु, नरसिंह, दुर्गा, गणेश आदि देवताओं की प्रतिमायें स्थापित की जाती हैं। विहारों को हिन्दू मन्दिर में परिवर्तित कर देना साधारण बात हो गयी थी। यह समय-समय पर भारत में होता रहा है। कृत्या के इस संवाद से यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि राजा का विचार बौद्धों के प्रति अच्छा नहीं था। उग्र था। इसका कारण बौद्धों की राज्य के प्रति निष्ठा में कमी होना हो सकता है। बौद्ध संघ- शरण में विश्वास रखते थे। देश एवं राष्ट्र का उनमें स्थान न था। देश एवं संघ के मतवैभिन्य अथवा शासन वैभिन्य में किसको प्राथमिकता दी जायगी यह प्रश्न मूर्तमान सर्वदा खड़ा होता रहा है। बौद्ध जीवन से विरक्त होते थे। संघ शासन में अनुशासित थे। उनकी निष्ठा संघ की अपेक्षा राज्य के प्रति कम होती थी। यह प्रश्न मध्ययुग के प्रारम्भ काल में यूरोप में भी उग्र रूप से खड़ा हो गया था। चर्च और राज्य दोनों के निष्ठाकाल में किसको प्राय- मिकता दी जायगी इस प्रश्न को लेकर शताब्दियों तक राज्य एवं चर्च में संघर्ष होता रहा है। बुद्धधर्म प्रवर्तक धर्म था। वह लोगों का मत परिवर्तित कर संघ में सम्मिलित करने में मिलते इस्लाम की तरह विश्वास करता था। सम्भव है। बौद्धों की इन मनो- वृत्तियों के कारण राजा जलौक बौद्धधर्म विरोधी हो गया होगा। उसके स्थानपर वर्णाश्रम धर्म को प्रश्रय दिया था। अनेक अनुवाद-कर्त्ताओं ने 'विहार नष्ट करने का आदेश राजा ने दिया' यह अनुवाद किया है।
प्रथम तरंग १९७ 'महाशाक्यः स नृपतिर्न शक्यो बाधितुं त्वया । तस्मिन्दृष्टे तु कल्याणि भविता ते तमःक्षयः ॥ १४१ ॥ अस्मद्गिरा प्रेरणीयो विहारकरणाय सः । दत्त्वा स्वहेमसंभारं त्वया मलिनितः खलैः ॥ १४२ ॥ तस्मिन्कृते न जायेत विहारच्छेदवैशसम् । तस्य तत्प्रेरकाणां च प्रायश्चित्तं कृतं भवेत् ॥' १४३ ॥ क्रुद्धैर्विप्रैरनुज्ञाता स्वद्वधाय प्रधाविता । अनुशिष्टा समाहूय बोधिसत्त्वैस्तदेत्यहम् ॥ १४४ ॥ १४१-१४४. 'उत्तेजित भिक्षुओं ने मेरे लिये सोचा। आपके वध निमित्त मुझे भेजा। उस समय बोधिसत्त्वों ने मुझे बुलाया। निम्नलिखित उपदेश दिये- 'कल्याणि! वह राजा महाशाक्य* हैं। तुम उनका वध नहीं कर सकती। किन्तु उनका दर्शन करते ही तुम्हारा तम कम हो जायगा। खलों की प्रेरणा द्वारा उसने दोष किया है, हमारे नाम से तुम उसे प्रेरित करना कि वह अपना हेम संभार देकर विहार का निर्माण करा दे। ऐसा करने से विहार उच्छेद के दोष का भागी राजा न रहेगा और जिन खलों ने उसे उत्तेजित किया है उनके और उसके दोनों का इस प्रकार प्रायश्चित्त हो जायगा। कुछ ने 'विहार गिराने का राजा ने आदेश दिया' यह महामम्मत था। महावंश में उल्लेख है इनके वंश अनुवाद अंग्रेजी तथा हिन्दी में किया है। यहाँ दलन में शिरोमणि महासम्मत वंश के अनुवर्ती बुद्ध शब्द का प्रयोग किया है। दलन का अर्थ 'दबाना' ने जन्म लिया।' अर्थात् विहारों को कुचलने किंवा दबाने का था। यह अर्थ अधिक समीचीन मालूम पड़ता है। त्रिपिटक के अनुसार भगवान् बुद्ध शाक्य क्षत्रिय पाठभेद : थे। देवदह शाक्य देश इनके कुल विस्तार में... श्लोक संख्या १४१ में 'महाशाक्य' का पाठभेद सिंहहनु के पुत्र शुद्धोधन थे। शुद्धोधन के पुत्र 'महासत्त्व' मिलता है। गौतम इत्यादि हुए थे। रोहिणी नदी के उभय तटवर्ती श्लोक संख्या १४२ में 'स्वहेम' का पाठभेद क्षत्रिय ही इस वंश में आते थे। इस प्रकार 'दत्वाम्ब हेम' मिलता है। इक्ष्वाकु के वंशज महासम्मत हैं। महासम्मत ही श्लोक संख्या १४४ में 'अनुशिष्टा' का 'अनुदिष्टा' इक्ष्वाकु हैं। इसी वंश में शाक्य, कोलीय, मोरिय तथा 'सत्वै' का पाठभेद 'सन्यै' मिलता है। अन्य शाक्य गणराज्य भी गिने जाते हैं। पादटिप्पणियाँ : शाक्य सूर्यवंशी थे। उनका सम्बन्ध महासम्मत से था। १४१ (१) महाशाक्यः इस पाठ से अधिक दीर्घनिकाय के अनुसार शाक्य क्षत्रिय राजा शुद्ध पाठ महासम्मत है। महासम्मत तथा महा- ओक्काक के वंशीय थे। ओक्काक को पालि में शाक्य में नाम मात्र का भेद है। महावंश तथा दीपवंश इक्ष्वाकु का नामांतर ही माना गया है। के अनुसार भगवान् बुद्ध के वंश का नाम महा- शाक्य उसी से सम्बन्धित थे। इस प्रकार शाक्य सत्तम् ही मूल वंश था।
१९८ राजतरंगिणी तस्मात्सत्त्वातिरेकस्ते मिषादेवं परीक्षितः । क्षीणपापाऽद्य संवृत्ता स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥” १४५ ॥ १४५. 'राजन् ! मैंने रूप परिवर्तन द्वारा आपके सत्व की परीक्षा ली थी। आपके दर्शन द्वारा मेरे पाप क्षीण हो गये हैं। अब मैं जाती हूँ। स्वस्ति ! राजन् !' कृतप्रतिश्रवे राज्ञि विहारकृतये पुनः । प्रहर्षोत्फुल्लनयना कृत्यादेवी तिरोदधे ॥ १४६ ॥ १४६. राजा से विहार के पुनर्निर्माण का वचन लेकर प्रहर्षोत्फुल्लनयना कृत्या अदृश्य हो गयी।
'बौद्ध ग्रन्थों' के अनुसार महासम्मत शाक्यों के आदि राजा थे। महासम्मत से बुद्ध तक वंश कभी छिन्न नही हुआ था। वंशपरम्परा टूटी नहीं थी। वे सूर्यवंशी थे। उन्हें महासम्मत इसलिए कहा जाता था कि पृथ्वी पर जब अनाचार फैला तो जनता ने सर्व सम्मति से उन्हे राजा निर्वाचित किया था। महासम्मत के राज्य में ताड़ना, बहिष्कार, जुर्माना आदि दण्ड के प्रकार अज्ञात थे। एक मत है। महासम्मत मनु थे। श्रीलंका के राजा अपनी वंशा- वली महासम्मत से सम्बन्धित करते थे।
१४३ (१) प्रायश्चित्त : भगवान् बुद्ध की करुणा तथा क्षमा का वर्णन यहाँ कल्हण ने किया है। इन श्लोकों से प्रकट होता है। कल्हण ने स्वयं विहार उच्छेद के कार्यों को पसन्द नही किया था। राजा के चरित्र में कालिमा न लगे इसलिये उसने कृत्या द्वारा भगवान् स्वरूप बोधिसत्त्वों का सन्देश राजा को दिया। उसने दोष किया था। दोष किंवा पापों का निराकरण प्रायश्चित्त द्वारा हो सकता था। यदि विहार उच्छेद जैसे दोष के कारण मन स्ताप होगा तो वह भी दूर हो जायगा। प्रायश्चित्त का प्रकार भी कल्हण ने बताया है। जिसका नाश किया उच्छेद किया है उसे पूर्ववत् कर देने में दोष किंवा पाप का प्रायश्चित्त हो जाता है।
कल्हण ने यहाँ यह भी प्रकट किया है। राजा के पास हेम संभार अर्थात् प्रचुर स्वर्ण भण्डार था। उसका कोश खाली नही था। पूर्ण था। वह सुयोग्य राजा था। कोश बल पूर्ण था। राजा स्वर्ण भण्डार का दान देकर दान के पुण्य का भागी बन सकता था। बौद्ध धर्म में दान का बहुत महत्त्व है। बौद्ध साहित्य में विहार, चैत्य, वन, शालादि निर्माण कराने वालों की बड़ी प्रशंसा की गयी है। भगवान् बुद्ध ने जेतवन निर्माणकर्त्ता अनाथपिण्डक, पूर्वाराम निर्माणकर्त्री विशाखा, जीवक वन निर्माण कर्त्ता जीवक आदि की बडी प्रशंसा की है। यहाँ कल्हण इसी दान की ओर संकेत करता है। बोधिसत्त्व उसके अप- राधों को इस प्रकार क्षमा कर देंगे। इसे स्पष्ट रूप से यहाँ कहा गया है।
पाठभेद : श्लोक संख्या १४५ में 'पापा' का 'पापो' 'संवृत्ता' का 'संजाता' पाठभेद मिलता है।
१४५ (१) स्वस्ति : कल्हण ने यहाँ वैदिक शब्द स्वस्ति का प्रयोग कृत्या से कराया है। वह महत्त्व- पूर्ण है। बौद्ध धर्म वेद की मान्यता नही देता। उसकी परम्परा में विशेष आस्था नही रखता। कश्मीर में बौद्ध धर्म, वैदिक परम्परा तथा तत्कालीन हिन्दू धर्म से इतना प्रभावित हो गया था कि दोनो में भेद नाम मात्र का रह गया था। बुद्ध को अवतार मान लेने पर रहा सहा भेद भी नष्ट हो गया था। स्वस्ति का अर्थ कल्याण है। स्वस्ति शब्द का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद (१:१:९;१:३५:१;२:३२:८;१०:८;३:३१: २१;२:३८:१;३:३८:९) में मिलता है। स्वस्ति वाचन भारतीय परम्परा है। स्वस्ति का अर्थ जाति
प्रथम तरंग १९९ अथ कृत्याश्रमं कृत्वा विहारं वसुधाधिपः । तत्रैव क्षीणतमसं कृत्यादेवीमसन्धयत् ॥ १४७ ॥ १४७. तत्पश्चात् उस वसुधाधिप ने कृत्याश्रम^१ में विहार का निर्माण कराया। वहाँ क्षीण तमस कृत्या देवी की राजा ने उपासना^२ की। मात्र का प्रतीक है। चाहे वे हिन्दू, ईसाई या कोई भी क्यों न हों । पाठभेद : श्लोक संख्या १४७ में 'श्रमं' का 'श्रये' 'मसन्ध- यत्' का 'मवन्दयत' पाठभेद मिलता है। १४७ ( १ ) कृत्याश्रम : बारहमूला से पांच मिल अधोभाग में वितस्ता के वामतट पर वर्तमान कित्सहोम ग्राम प्राचीन कृत्याश्रम का स्थान है। चीनी पर्यटक ओ कुङ्ग (सन् ७५६-७६३ ई० ) कश्मीर पर्यटन काल में इस स्थान को देखा था । उसका उल्लेख किया है । कल्हण ने इसका पुनः उल्लेख रा० ४.२४० में किया है। ओ कुङ्ग के अनुसार वह एक गाँव था । बारहमूला के समीप था। उसे किचाधम भी कहा गया है। ओ कुङ्ग ने इसे कित्चे नाम से सम्बोधित किया है। ओं कुङ्ग के पर्यटन काल में इस स्थान को किचा कहा जाता था। उसे उसने अपनी भाषा में कित्चे लिखा है। श्री स्तीन यहाँ मई सन् १८९६ ई० में आये थे। यह ग्राम वितस्ता नदी तथा पर्वत बाहमूल के मध्य स्थित है। यहाँ दो ग्रामीण मस्जिदें बनी हैं। श्री स्तीन को मस्जिदों के समीप कुछ अलंकृत शिला खण्ड दिखायी पड़े थे। उनमें कुछ मूर्ति खुदे शिला खण्ड थे। उन्हें ग्राम के उत्तर ११५ वर्ग गज पर प्राचीर अर्थात् दिवाल का आयताकार नींव चिन्ह मिला था। इस हाता के केन्द्र में श्री स्तीन को एक ऊँचा स्थान दिखाई दिया था। उसे वहाँ के लोग गद्दी कहते थे। हाता के बाहर दक्षिण पूर्व के कोने पर एक १५ फोट ऊँचा टीला अथवा डूहा था । श्री स्तीन के मत से यह स्तूप का ध्वंसावशेष था । यहाँ पर और ध्वंसावशेष तथा पत्थरादि न मिलने का कारण स्तीन ने यह दिया है । यहाँ की उपत्यका में पठान शासन काल में पूर्व दिशा में एक सीधी दिवाल कित्सहोम से बोयाई मिल दूर पर बना दी गयी थी। इस दिवाल का अस्तित्व सन् १८३५ ई० तक था। बैरन थी हुजेल इस ओर आये थे। इस दिवाल को नदी के पार से देखा था। यह दिवाल प्राचीन कृत्याश्रम के ध्वंसावशेष से प्राप्त पत्थरों से बनायी गयी थी। नवीन सड़क का निर्माण सन् १८८६ ई० के लगभग होने लगा। उक्त दिवाल कृत्याश्रम से प्राप्त पत्थरों और उक्त डूहे से बहुत पत्थर लिये गये थे। यही कारण है कि राजा जलोक द्वारा निर्मित कृत्या- श्रम विहार का स्पष्ट चिन्ह नहीं मिलता। जो कुछ शिलाखण्ड शेष बच गये थे वे सड़क निर्माण में लग गये । मैं यहाँ आ चुका हूँ। बारहमूला से उरी जाने वाली सड़क पर अनेक मन्दिर बायें पार्श्व में बने आज भी खड़े हैं। कुछ में तो छतें बिल्कुल नहीं है और कुछ पर टिन आदि की छतें लगा दी गयी हैं। दो एक टूटे मन्दिरों में मैंने दक्षिण भारतीय साधुओं को निवास करते हुए पाया। ये उन टूटे देवस्थानों में दीपक जलाते तथा पूजा करते थे। मुझे कित्सहोम अथवा कृत्याश्रम में स्तीन द्वारा वर्णित बातो के अतिरिक्त विशेष और देखने को कुछ नहीं मिला। यदि यहाँ खनन कार्य हो तो कुछ
२०० राजतरंगिणी विधाय सोऽश्मप्रासादं नन्दिक्षेत्रे क्ष्मापतिः । भूतेशाय समं कोशैः पूजां रत्नमयीं ददौ ॥ १४८ ॥ १४८. नन्दिक्षेत्र १ में राजा ने अश्म प्रासाद भूतेश २ निमित्त निर्माण कराया। उसने कोश के साथ ही साथ रत्नों ३ द्वारा भगवान् की विधिवत् पूजा की । सामग्री मिल सकती है। इस समय यहाँ के समीपवर्ती क्षेत्र मे सैनिक कैम्प लगे हैं । पाकिस्तान से रावल- पिण्डी श्रीनगर आने वाली यही मुख्य सड़क हैं। इस सडक पर बहुत लड़ाइयाँ हो चुकी हैं। उनके स्मारक भारतीय सुरक्षा विभाग ने स्थान-स्थान पर बनवा दिये हैं। यहाँ के शेष पत्थर आदि कुछ ही दिनों में विकास योजनाओ मे लुप्त हो जायेंगे । ग्राम का प्राचीन रूप बदल गया है । जलोक शैव था । जाति पांति हीन संघ एवं समाज की जो स्थापना बौद्धों द्वारा हो रही थी वह पुनः वर्णाश्रम आधारित समाज की ओर मुड़ रही थी, राजा शैव होने पर भी कृत्या के नाम पर कृत्याश्रम विहार की स्थापना किया था । निस्सन्देह वह विहार ग्यारहवी शताब्दी तक कायम था । कल्हण के समय चाहे इसका पूर्व गौरव लुप्त हो गया था परन्तु विहार एवं स्तूप का आकार शेष था । क्षेमेन्द्र अपनी पुस्तक समयमातृका (सन् १०५०) में नायिका कंकाली को इस विहार में ठहराता है। इससे भी स्पष्ट है कि क्षेमेन्द्र काल में वह विहार निवास करने योग्य था और उसका पूर्व गौरव लुप्त नही हुआ था । बोध मूल ग्राम कृत्याश्रम के समीप है। जहाँ पर बौद्ध कालीन वस्तुएँ पाई जाती है। बारहमूला के समान कहा जाता है कि यहाँ भगवान् ने निवास किया था । बारहमूला से कृत्याश्रम की ओर चलने पर हुष्कपुर, गाण्डव विहार, आदि प्राचीन स्थानों के क्षेत्र मिलते हैं । महाभारत में कृतिकाश्रम एक तीर्थ का वर्णन मिलता है । अनुशासन पर्व में विस्तृत उल्लेख मिलता है। महाभारत तथा कल्हण वर्णित कृत्याश्रम दोनो ही जलाशय के पास थे । (म० अनु०; २५:२५) महाभारत में कृत्या का उल्लेख मिलता है । दैत्यों ने आभिचारिक यज्ञ द्वारा एक राक्षसी को उत्पन्न किया था। वह आमरण अनशनकारी दुर्योधन को उठाकर रसातल ले गयी थी। (म. वन : २५२: २१-२०) भीष्म पर्व महाभारत मे कृत्या नामक एक नदी का भी उल्लेख मिलता है। (९:१८) महाभारत वर्णित आश्रम तथा कृत्याश्रम दो भिन्न स्थान प्रतीत होते हैं । अनुसन्धान का विषय है । (३) कृत्या उपासना : राजा की सहिष्णुता की यहाँ पराकाष्ठा दिखाई गयी है। जिस कृत्या ने राजा का मांस मांगा था, जिसने बौद्धो के उच्छेद से राजा को विरत किया था, जिसने राजा का स्वयं बोधिसत्त्व अर्थात् ईश्वर रूप दर्शन कर, तप क्षम किया था, उसे ही राजा ने देवी मानकर उसकी स्मृति में कृत्याश्रम विहार का निर्माण कराया था । राजा चाहे कट्टर वर्णाश्रम धर्मानुयायी क्यों न रहा हो, उसने इस घटना के पश्चात् अपनी उग्रता शिथिल कर दी थी। उसके विचारों में परिवर्तन हुआ था । अन्यथा जिस बौद्ध धर्म को उच्छिन्न करने पर तुला था, ठोस कदम उठाया था, उसी के प्रति आदर प्रकट कर विहार का निर्माण न कराता । इससे यह बात प्रकट होती है कि राजा सभी पन्थो के प्रति आदर करता था। आज कल के हिन्दुओं के समान सभी देवी देवताओ को उपासना तथा पूजा करने में संकोच नही करता था। पाठभेद : श्लोक संख्या १४८ में 'सोऽश्म' का 'गोप्य' 'समं' का 'समा'; 'कोशैः' का 'कोषैः'; पूजा का 'प्रभां' पाठभेद मिलता है ।
प्रथम तरंग २०१ चीरमोचनतीर्थान्तर्गणरात्र तपस्यता । ब्रह्मासननिविष्टेन ध्याननिष्पन्दमूर्तिना ॥१४६॥ १४९. राजा ने ब्रह्मासनस्थ¹ होकर स्पन्दन हीन मूर्तिवत् चीरमोचन तीर्थ² में ध्यान रत होकर अनेक रात्रियाँ व्यतीत कीं । पादटिप्पणियाँ : १४८ (१) नन्दिक्षेत्र. पाद टिप्पणी पृष्ठ ७६ रा० त० १.३६ द्रष्टव्य है । (२) भूतेश : पादटिप्पणी रा० त० १:१०७ पृष्ठ द्रष्टव्य है । यह भूतेश्वर के पूर्वीयद्वीप समूह का मुख्य और बड़ा मन्दिर है । (३) रत्न पूजा . कश्मीर शिव पूजा पद्धति में रत्न तथा मूल्यवान धातुओं को देवताओं पर चढ़ाने तथा उनसे पूजा करने का उल्लेख मिलता है । यह प्रथा अब भी प्रचलित है । शिव लिंग पर सुवर्ण, रजत मुकुट अथवा रत्न जड़ित मुकुट, मेखला, माला, शेष नाग, जलद्रोणी, अर्घा, पंचपात्र, आरती आदि चढ़ाया जाता है । दक्षिण रामेश्वर में रत्न का एक भण्डार ही है । विभिन्न पर्वों में विभिन्न रत्नों तथा श्रृंगार विशेष से पूजा की जाती है । रामेश्वरादि दक्षिण के मन्दिर में इन रत्नों को यात्रियो को दिखाया भी जाता है । पाठभेद : श्लोक संख्या १४६ में 'चीर' का 'क्षीर'; निष्पन्द का नि स्पन्द, निस्पन्द पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १४९ (१) ब्रह्मासन : कल्हण राजा के योग का वर्णन करता है । राजा को वीर, क्षमाशील, दानी तथा धर्म परायण अब तक चित्रित करता चला आया है । अब उसने राजा के योग का उल्लेख कर उसे योगी रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है । पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिक आसन ध्यान के लिये योगशास्त्रानुसार श्रेष्ठ कहे गये हैं। उनके स्थान पर ब्रह्मासन का उल्लेख किया गया है । ब्रह्मासन वह योगो लगाता है जो ब्रह्मा का ध्यान २६ करता है । राजा शैव था । विष्णु के अवतार बुद्ध के प्रति भक्ति होने के कारण विष्णु भक्त तथा अन्तिम काल में उसने ब्रह्मासन लगा कर ब्रह्मा की उपासना की । ब्रह्मा का ध्यान किया जो विश्व का कर्ता है । समस्त जीवन उसने विष्णु के अनुरूप रक्षा का कार्य किया, शिव गुण के अनुरूप संहार का भी कार्य किया । जीवन के अन्तिम अध्याय में उसने जगत कर्ता ब्रह्मा का ध्यान किया । योग में ध्यान की मुद्रा मेरुदण्ड को सीधा रखकर ध्यान लगाना है । मेरु दण्ड सीधा होने पर इड़ा ओर पिंगला नाड़ियों से प्राण संचार बन्द हो कर सुषुम्ना नाडी में प्रवेश करता है । सुषुम्ना में प्राण संचार के कारण योगी का ध्यान लगता है । वह वायुहीन तैल दीप की ज्योति के समान कम्पनहीन हो जाता है । वह इस ध्यान मुद्रा में आत्मा का साक्षात्कार करता है। वह विदेह स्थिति प्राप्त करता है। वह आत्मा और शरीर के सम्बन्ध को समझ जाता है । वह आत्मानुभूति में रम जाता है । स्थूल जगत् से ऊपर उठता है । उसे सविकल्प के पश्चात् निर्विकल्प समाधि लग जाती है । राजा अनेक रात्रियों तक निस्पन्द बैठा रहा । इसका स्पष्ट अर्थ है । वह समाधि में ध्यानस्थ था । वह दृश्य, दर्शन, द्रष्टा, की स्थिति-से ऊपर उठकर एकाकार हो गया था ! वह कर्ता, कार्य, कारक की स्थिति से ऊपर उठ गया था । वह भौतिक जगत् की सीमा पार कर आध्यात्मिक जगत् में विचरण करता था । वह भूताकाश, चित्ताकाश की स्थिति से चिदाकाश को स्थिति में आ गया था । वह कर्मेन्द्रियो एवं ज्ञानेन्द्रियों के प्रपंच एवं बन्धन को छोड़ कर मुक्त हो चुका था । वह ब्रह्मासन पर बैठ- कर ब्रह्मा में लीन होना चाहता था । ब्रह्मा के कारण
२०२ राजतरंगिणी
उसको रचना हुई थी यह उसी सर्जक ब्रह्मा के पास पुनः लौट कर मुक्त होना चाहता था । (२) चीरमोचन : नीलमत पुराण के आधार पर कहा जा सकता है कि चीरमोचन तीर्थ कनक- वाहिनी नदी के समीप कहीं था । नीलमत पुराण ( श्लोक १३२५-१३२८ ) से चीर मोचन तीर्थ के स्थान के सम्बन्ध में एक सूत्र मिल जाता है उससे स्थान का पता लगाया जा सकता है। श्रीस्टीन ने भी इस सम्बन्ध में प्रयास किया है । उन्होंने भी इस तीर्थ के सम्बन्ध में अनुमान लगाया है । चीरमोचन तीर्थ का नामकरण सप्तर्षियों के 'चीराणि' अर्थात् वल्कल वस्त्र के कारण पड़ा था । इस तीर्थ पर सप्तर्षि गण अपना चीर त्याग कर स्वर्गारोहण किये थे । नन्दि क्षेत्र माहात्म्य स्पष्टतया कनकवाहिनी नदी का सम्बन्ध चीरमोचन तीर्थ से जोड़ता है। श्री स्टीन जिस समय कश्मीर का पर्यटन कर रहे थे उस समय कश्मीर के पण्डितों को चीरमोचन तीर्थ का ज्ञान नहीं था । लम्बे काल एवं लम्बे मुस्लिम शासन के कारण अन्य तीर्थों के समान वह स्थान भी लोग भूल चुके थे । हरमुकुट के पुरोहितों से भी श्री स्टीन ने जिज्ञासा की थी । परन्तु वे भी कुछ प्रकाश नही डाल सके थे । नीलमत पुराण तीर्थों में स्नान के सम्बन्ध में उल्लेख करते हुए कनकवाहिनी और सिन्धु-संगम का उल्लेख श्लोक संख्या १३२५ में किया है । श्लोक संख्या १३२६ में पावन तथा रजोविन्द नदियों में स्नान करनेवाला पुण्डरीक तथा राजसूय फल का भागी होता है कहा गया है। श्लोक संख्या १३२७ में नीलमत पुराण कहता है कि वहाँ से चीरमोचन तीर्थ तक विस्तृत क्षेत्र वाराणसी के समान पवित्र है । श्लोक संख्या १३२८ में चीरमोचन का उल्लेख करता पुराण कहता है । चीरमोचन का पवित्र स्थान स्वर्ग मार्ग प्रशस्त करता है । वहाँ पर सभी तीर्थ उपस्थित रहते हैं । श्लोक संख्या १०२६ में नामकरण का कारण उपस्थित करता है—यहाँ सप्तर्षि अपना चीर त्याग कर स्वर्गारोहण किये थे । यहाँ स्नान करने पर पापी भी स्वर्ग गमन करते हैं। श्लोक संख्या १३३० में सोदर तीर्थ का उल्लेख दिया गया है । तयोः समागमे पुण्ये राजसूयफलं स्मृतम् । तस्माद्देशादारभ्य यावत्स्याच्चीरमोचनम् ॥ ॥ १५४१ ॥ स्वर्गमार्गप्रदं प्रोक्तं तीर्थं चीरप्रमोचनम् । दिवमुत्सृज्य चीराणि यत्र सप्तर्षयो गताः ॥ ॥ १५४३ ॥ नीलमत के अनुसार कनकवाहिनी सिन्धु तत्पश्चात् पावन एवं रजोविन्दु नदियों के बाद और सोदर तीर्थ के मध्य कहीं चीरमोचन तीर्थ होना चाहिए । दूसरा सूत्र इस स्थान का पता लगाने का यह मिलता है कि यह स्थान कनकवाहिनी नदी के समीप था । वशिष्ठाश्रम अर्थात् वेगय चीरमोचन के ऊपर कनकवाहिनी के तट पर था । सप्तऋषियों में एक ऋषि वशिष्ठ भी हैं । चीरमोचन में सप्तऋषियों ने स्वर्गारोहण किया था यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है । राजा जलोक भूतेश का उपासक था । नन्दिक्षेत्र का उसके जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध था । चीरमोचन से भूतेश्वर सीधे मार्ग से लगभग १० मिल और वशिष्ठाश्रम लगभग आठ मिल पड़ता है। क्या कारण है। राजा ने अपने प्रिय स्थान भूतेश्वर में जाकर तपस्या नहीं की। उसने चीरमोचन तीर्थ ही तपस्या निमित्त क्यो चुना ? श्री स्टीन ने इस विषय में यथेष्ठ परिश्रम तथा अनुमान लगाया है । हरमुकुट गंगा माहात्म्य में कनकवाहिनी नदी का नाम करंक नदी दिया है । करंक तीर्थ को करंक ग्राम के समीप बताया गया हैं। हरमुकुट सर की यात्रा के पूर्व इस तीर्थ में स्नान आवश्यक माना गया है। श्री स्टीन को पुरोहितों