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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

प्रथम तरंग २६३ ते शशाङ्कानने दृष्ट्वा शनैरभ्यर्णमागते । विररामाशनालम्भान्मुहुर्व्रीडाजडीकृतः ॥ २१० ॥ २१०. उन शशांक आनन कन्याओं को समीप आयो देखकर वह लज्जा विमूढ़ हो भोजन आरम्भ करना बन्द कर दिया । भुञ्जाने कच्छगुच्छानां शिम्बोरम्बुजलोचने । ते पुनर्दृष्टवानग्रे किंचिद्व्यापारितेक्षणः ॥ २११ ॥ २११. उसने किंचित् नेत्रघुमाकर देखा। कमललोचना वे दोनों कन्याएँ कच्छ गुच्छ १ की फलियाँ खा रही थीं। आकृतेर्हा धिगीडृश्या भोज्यमेतदिति द्विजः । ध्यायन्कृपार्द्रः संमान्य स ते सक्तूनभोजयत् ॥ २१२ ॥ २१२. 'धिक्कार है ! इस रूप का यह भोजन ? सम्मान्य तथा दयार्द्र उस ब्राह्मण ने उन दोनों कन्याओं को सत्तू खिलाया । उपनिन्ये च संगृह्य पुटकैश्चटसीकृतैः । तयोः पानाय पानीयं सरसः स्वच्छशीतलम् ॥ २१३ ॥ २१३. तत्पश्चात् पीने के लिये पत्रपुटक में स्वच्छ एवं शीतल सरोवर जल लाकर दिया । (२) तिलकम् : कल्हण ने युग्मम् तिलकम् तथा मैं स्वयं नहीं कह सकता कि इनका अनुवाद करने में कुलकम्, तीनों श्लोक रचना शैली को किसी विषयो मैं सफल हो सका हूं । घटनाओ एवं श्रृंगार वर्णन के लिए अपनाया है। पाठभेद : दो श्लोक में जहाँ भाव किवा घटना प्रकट की जाती श्लोकसंख्या २१० में 'व्रीडा' का 'व्रोड' पाठ- है उसे युग्मम्, तीन श्लोकों में प्रकट की जाती है भेद मिलता है। उसे तिलकम् तथा पाँच से पन्द्रह श्लोक में जहाँ श्लोक संख्या २११ मे 'दृष्ट्वा' का पाठभेद प्रकट किया जाता है उसे कुलकम् कहा जाता है। 'धृष्ट्वा' 'सृष्ट्वा' तथा 'पृष्ट्वा' मिलता है। कल्हण ने श्लोक संख्या २०८, २०९, २१० पादटिप्पणियाँ : तिलकम् में कन्याओं के सौन्दर्य का वर्णन किया है। २११ (१) कच्छ गुच्छ : कश्मीर में इसे 'कचदन' प्रायः सभी अनुवादकताओं ने तीनो श्लोक का कहते हैं। एक प्रकार की घास है। उपत्यका के चर अनुवाद एक ही मे किया है। मैने उन्हें श्लोक के तथा सुसिंचित नदी के समीप बहुत होता है । क्रम से दिया है। इन श्लोकों का रूप वर्णन अनुवाद पाठभेद : में नहीं लाया जा सकता । तीनों श्लोक कल्हण श्लोक संख्या २१२ में 'कृपार्द्र' का पाठभेद की उत्तम कवित्व प्रतिभा प्रकट करते है। उनका 'कृपाद्रीः' मिलता है। रस उनके मूल मे ही है। उनका अनुवाद कठिन है। श्लोक संख्या २१३ में 'शीतलम्' का 'शीत्कृतम्' प्रायः सभी अनुवादकारों ने भिन्न-भिन्न शैली तथा पाठभेद मिलता है। शब्दों का विभिन्न अर्थ करते हुए अनुवाद किया है ।

२६४ राजतरंगिणी आचान्ते शुचितां प्राप्ते कृतासनपरिग्रहे । ततश्च वीजयन्पर्णतालवृन्तैरभाषत ॥ २१४ ॥ २१४. भोजनोपरान्त जल से शुद्ध होकर, उनके आसन ग्रहण करने पर विशाख पत्र ताल वृन्त (पंखा) से हवा करता हुआ बोला । भवत्यौ पूर्वसुकृतैः कैश्चित्संप्राप्तदर्शनः । चापलाद्विप्रसुलभात्प्रष्टुमिच्छत्ययं जनः ॥ २१५ ॥ २१५. पूर्वकृत सत्कर्मों से आप दोनों का दर्शन प्राप्त हुआ । अब विप्रसुलभ चपलता के कारण यह जन' कुछ पूछना चाहता है । कल्याणिनीभ्यां कतमा पुण्या जातिः परिष्कृता । कुत्र वा क्लान्तमेतादृग्विरसं येन भुज्यते ॥ २१६ ॥ २१६. 'कल्याणिनी आप दोनो ने कहाँ और कौन सी पुण्य जाति को अलंकृत किया है ? जिसके कारण इस प्रकार के क्लान्त एवं नीरस वस्तु को खाती हैं।' एका समूचे विद्ध्यावामस्य सुश्रवसः सुते । स्वादु भोक्तव्यमप्राप्तं किमीदृङ् नोपभुज्यते ॥ २१७ ॥ २१७. उनमें से एक ने कहा—हम सुश्रवा नाग की कन्या हैं। सुस्वादु' वस्तु के अभाव हम क्या यह भी न खाएँ ? [बायाँ स्तम्भ] पादटिप्पणियाँ : २१३ (१) पुटक : यहाँ पर पत्तो के दोनों से अर्थ है । विशाख ने समीपवर्ती कमल पत्र अथवा किसी अन्य वृक्ष किंवा पौधे के पत्तो से दोना बनाकर उनमें कन्याओ को जल पीने के लिये दिया । २१४ (१) तालवृन्तः : ताल पंखा अर्थ यहाँ लगता है । प्रतीत होता है । कश्मीर के दक्षिण पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा दक्षिणापथ में प्रचलित ताल अर्थात् ताड़ के पंखों का प्रचलन हो गया था । २१५ (१) जन : कुछ विद्वान् अनुवादको ने 'जन' का अनुवाद आप का विनम्र सेवक' किया है । मैंने यहाँ मूल जन शब्द ही रख दिया है । जन शब्द प्रचलित है । बोधगम्य है । कल्हण ने प्रकृत जन शब्द प्रायः जन साधारण के लिये प्रयोग किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २१६ में 'परिष्कृता' का ० ' मिलता है । [दायाँ स्तम्भ] २१६ (१) प्रश्न : कल्हण की प्रश्न शैली कालिदास की शकुन्तला नाटक शैली जैसी है । नाटक के प्रथम अंक में कण्व के आश्रम की युवतियों तथा दुष्यन्त के बीच हुए प्रश्नोत्तर का स्मरण कराती है । निष्कर्ष निकाला जा सकता है । कल्हण ने इतिहास के साथ ही साथ साहित्य संस्कृत एवं काव्य का यथेष्ट अध्ययन किया था । यह शैली ऋग्वेद में उर्वशी और पुरुरवा के संवाद तथा यम-यमी के प्रश्नोत्तर में भी मिलता है । पाठभेद : श्लोक संख्या २१७ मे 'प्राप्त' का पाठभेद 'प्राप्य' तथा 'मप्राप्य' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २१७ (१) सुस्वादु : कल्हण ने बड़ी ही सरल, मर्मस्पर्शी शैली तथा भाषा मे कन्याओं की दयनीय दशा का चित्रण किया है । स्वादिष्ट भोजन के अभाव में जो कुछ मिल जाय वही बहुत कुछ है ।

प्रथम तरंग २६५ पित्रा विद्याधरेन्द्राय प्रदातुं पार्रकल्पिता । इरावत्यहमेषा च चन्द्रलेखा यवीयसी ॥ २१८ ॥ २१८. 'पिता ने विद्याधरेन्द्र¹ को मुझे देने की परिकल्पना की है। मेरा नाम इरावती² और इस युवती का चन्द्रलेखा³ है।' पुनर्द्विजोऽभ्यधादेवं नैष्किञ्चन्यं किमस्ति यः । ताभ्यामवादि तातोऽत्र हेतुं वेत्ति स पृच्छ्यताम् ॥ २१९ ॥ २१९. द्विज ने पुनः कहा—आप इतनी निष्किञ्चन (दरिद्र) क्यों हैं ? उन दोनों ने उत्तर दिया इसका कारण पिता जी जानते हैं। उनसे पूछिए। ज्येष्ठेऽत्र कृष्णद्वादश्यां यात्रायै तक्षकस्य तम् । आगतं चूडया तोयस्यन्दिन्या ज्ञास्यसि ध्रुवम् ॥ २२० ॥ २२०. 'ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी को तक्षक नाग¹ की यात्रा के लिये आये हुए, उनके जलस्यन्दी चूड़ा से उन्हें निश्चय जान लेंगे।' पाठभेद : श्लोक संख्या २१८ में 'च' का 'मे' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २१८ (१) विद्याधरेन्द्र : विद्याधरेन्द्र जाति के राजा का अर्थ यहाँ है। विद्याधर एक देव योनि विशेष है। पुराणों में इनके राजाओं का नाम चित्र- केतु, चित्ररथ, अथवा सुदर्शन दिया गया है। (मा० ६.१७:१;११.१६२९) वायु पुराण (३८- १६) में पुलोमन को विद्याधरपति कहा गया है। इनकी स्त्रियों को विद्याधरी कहा जाता है। (ब्रह्माण्ड पु० ३:५०.४०) इन देवताओं के शैवेय, विक्रान्त एवं सोमनस नामक तीन प्रमुख गण थे। (वायु० ३०:८८) इनका विद्याधर नामक नगर ताम्रपर्णी सरोवर एवं पतंग पर्वतमालाओं के मध्य है। (मत्स्य० ६५:१८) (२) इरावती : पंजाब की एक नदी है। रावी का नाम इरावती है। ब्रह्मा की भी एक नदी का नाम है। कश्यप की कन्या का नाम इरावती है। इरावती का विस्तृत वंश ब्रह्माण्ड में है। यहाँ पर यह शब्द केवल नाम के लिये प्रयुक्त किया गया है। ३४ (३) चन्द्रलेखा : चन्द्रलेखा का अर्थ चन्द्रमा की कला है। एक अप्सरा का भी नाम चन्द्रलेखा पुरा साहित्य में आता है। चन्द्रलेखा बाणासुर की कन्या एवं उषा की सखी थी। यहाँ केवल नाम का बोधक है। पाठभेद : श्लोकसंख्या २२० में 'ज्येष्ठे' का 'ज्यैष्ठे' तथा 'चूडया' का पाठभेद 'चूलया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २२० (१) तक्षक नाग : वीही परगना के जयवन वर्तमान जेवन के समीप एक पवित्र स्वच्छ नाग है। सिपोर से दो मील से भी कम दूरी पर उत्तर-पश्चिम जेवन पड़ता है। वह नाग सरोवर आज भी वर्तमान है। मैं वहाँ पर दो बार आ चुका हूँ। उसमें आज भी तक्षक नाग की पूजा की जाती है। यह स्थान श्रीनगर से ५ मील दूर है। विक्रमांकदेव चरित्र के लेखक विल्हण ने इसका बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। इसके समीप ही खोनमुख ग्राम में उसका जन्म हुआ था। (१८:७०) विल्हण कहता है : प्रवरपुर (श्रीनगर) से डेढ़ गव्यूती पर स्थित है। जयवन में एक ऊँचा स्मारक है। उसे जयवन कहते

२६६ | राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] हैं। यहाँ स्वच्छ जल पूर्ण एक सरोवर है। तक्षक का वह पवित्र स्थान है। तक्षक नागों का राजा है। धर्म नष्ट करने वाले कलि का मस्तक चक्रतुल्य नाग ने यहाँ उड़ा दिया था। पुरावृत्त है। तक्षक नाग ने इस क्षेत्र में केसर की खेती सर्वप्रथम करना आरम्भ किया था। आइने अकबरी में वर्णन आता है। ज्येष्ठमास में जब केसर की खेती आरम्भ की जाती है तो इस जलाशय की तीर्थ यात्रा की जाती है। (२:३५८ तथा रा० त० ४:१३१) माहात्म्य से प्रकट होता है कि हर्षेश्वर तीर्थ में तक्षक नाग का स्थान है। (श्लोक ८०) ज्येष्ठ की पूर्णिमा को हर्षेश्वर की तीर्थ यात्रा के समय तक्षक नाग के स्थान पर भी जाना चाहिए। तक्षक नाग का उल्लेख कल्हण ने पुनः रा० त० ४:२१६ में किया है। नीलमत पुराण में उल्लेख है : द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालौ द्वौ च कच्छपौ । द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गजौ द्वौ च तक्षकौ ॥ ४४५ नरपुर के प्रसंग में तक्षक नाग की यात्रा का वर्णन कल्हण ने किया है। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में इस तीर्थ का महत्त्व था। महाभारत में प्राप्य तीर्थों की तालिका में कश्मीर के केवल इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है। काश्मीरेष्वेव नागस्य भवनं तक्षकस्य च। वितस्ताख्यमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥ (म० व० ८२:९०) कश्मीर में नाग, विष्णु, शिव एवं सूर्य की पूजा अन्य देवताओं की अपेक्षा विशेष प्रचलित थी। अबुल फजल कश्मीर के देव स्थानों की निम्न- लिखित तालिका देता है—शिव = ४५, विष्णु = ६४, सूर्य = ३, दुर्गा = २२ और नाग = ७०० ।

[दायाँ स्तम्भ] आठवीं शताब्दी तक वराह तथा नरसिंह की पूजा प्रचलित हो गयी थी। अबुल फजल की उक्त तालिका से स्पष्ट है कि नाग पूजा तथा देवस्थान कश्मीर में सर्वाधिक लोकप्रिय थे। तक्षक नाग कश्यप एवं कद्रू का पुत्र था। (विष्णु १:१५; मत्स्य ६:७, म० पा० ५९:४०, ह० वं० १:३:१२१) उसके दो पुत्र अश्वसेन तथा श्रुतसेन थे। (म० आ० १:१४५–१४६) अर्जुन ने खाण्डव वन अग्नि को दिया। उस समय यहाँ तक्षक, उसकी पत्नी तथा अश्वसेन उप- स्थित थे। अश्वसेन की माता ने पुत्र को मुख में ले लिया। यह आकाशमार्ग द्वारा भागने लगी। अर्जुन ने बाणों द्वारा उसका शिरश्छेद कर दिया। तक्षक के मित्र इन्द्र थे। इन्द्र ने अश्वसेन की रक्षा का विचार किया। उसने अश्वसेन की रक्षा की (म० आ० २१८:६) इस घटना के समय तक्षक कुरुक्षेत्र में था। (म० आ० २१९: १३) तत्पश्चात् ऋषि शमीक के पुत्र शृंगी की प्रेरणा पर अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को डँस कर उसकी मृत्यु का कारण हुआ। जनमेजय तथा तक्षक में शत्रुता वेद ऋषि के शिष्य उतंक के कारण हुई थी। पौष्य राजा की रानी का गुरु उत्तंक था। पौष्य पत्नी ने अपना कुण्डल गुरुदक्षिणा स्वरूप उतंक को दिया। (म० आ० ३.२५) तक्षक नाग उस कुण्डल को हस्तगत करना चाहता था। उसने एक क्षपणक का वेष धारण किया। वह कभी दृश्य होता था। कभी अदृश्य हो जाता था। उतंक मार्ग में कुण्डल रखकर लघुशंका करने लगे। क्षपणक रूपधारी तक्षक ने कुण्डल चुरा लिया। उतंक आचमन कर लौटे। उन्होंने देखा। क्षपणक कुण्डल सहित भागा जा रहा था। उतंक ने पीछा किया। क्षपणक ने अपना मूल स्वरूप धारण किया। एक विवर में तक्षक नाग रूप प्रवेश किया। पाताल में पहुँचा। उतंकने बिल किया

प्रथम तरंग २६७ द्रक्ष्यस्यावामपि तदा तदभ्यर्णकृतस्थिती । इत्युक्त्या फणिकन्ये ते क्षणादास्तां तिरोहिते ॥ २२१ ॥ २२१. 'उस समय हम दोनों को भी उनके समीप स्थित देखेंगे' यह कहकर वे फणि- कन्याएं तत्क्षण तिरोहित हो गयीं । क्रमात्प्रववृते सोऽथ नटचारणसंकुलः । प्रेक्षिलोकसमाकीर्णस्तत्र यात्रामहोत्सवः ॥ २२२ ॥ २२२. वहाँ नट चारण संकुल प्रेक्षक समाकीर्ण नाग यात्रा महोत्सव क्रम से आरम्भ हुआ । द्विजोऽपि कौतुकाकृष्टः पर्यटन् रङ्गमञ्जसा । कन्योक्तचिह्नज्ञातस्य नागस्याऽन्तिकमाययौ ॥ २२३ ॥ २२३. कौतुकाकृष्ट वह द्विज भी शीघ्रता पूर्वक मेले में पर्यटन करता हुआ, कन्या द्वारा बताए, चिन्ह से ज्ञात नाग के समीप आ गया । पार्श्वस्थिताभ्यां कन्याभ्यां पूर्वमावेदितोऽथ सः । द्विजन्मने व्याजहार स्वागतं नागनायकः ॥ २२४ ॥ २२४. पार्श्व स्थित दोनों कन्याओं ने उसके विषय में पिता को जना दिया था । अतएव नागनायक ने ब्राह्मण के लिये कहा--'स्वागत' । ततः कथान्तरे क्वाऽपि पृष्टः कारणमापदाम् । जगाद तं द्विजन्मानं निःश्वस्य श्वसनाशनः ॥ २२५ ॥ २२५. तदनन्तर कथा प्रसंग में आपदाओं का कारण पूछने पर उस द्विजन्मा से निःश्वास लेकर श्वसनाशन१ (नाग) बोला : विवर खोदा । पाताल पहुंचा । नागों की स्तुति की । (म० भा० ३:१५४-१५८ दे० भा० २:१०) । तक्षक को नष्ट करने की कामना से, ऋषि उत्तंक ने जनमेजय को सर्प यज्ञ करने के लिये, प्रेरित किया । सर्पसत्र राजा ने आयोजित किया । उसमें अट्ठारह सर्पकुल जलकर मर गये थे पिच्छाडक, मंडलक, पिंडसिक्त, रमेणक, उच्छिक, शरभ, भंग, विल्वतेजस, विरोहण, शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेचन, मुद्गर, शिशुरोमन, सुरोमान तथा महाहनु थे । तक्षक नाग ऋषि आस्तीक की कृपा से नागयज्ञ में हवि होने से बच गया । (म० भा० ४८:१८) महाभारत वर्णित कश्मीर के इस तीर्थ का महत्त्व आज भी है। भेवन ग्राम के समीप एक बड़े निर्मल सरोवर में तक्षक नाग की पूजा की जाती है । (रा० त० ७:६०७) पाठभेद : श्लोक संख्या २२१ में 'तद' का 'पाठभेद 'तदा' मिलता है । श्लोक संख्या २२४ में 'वेदितोऽथ' का पाठभेद 'वेदिताय' मिलता है । २२५ (१) श्वसनाशन : इसका अर्थ यहाँ नाग किंवा सर्प है । 'श्वसनः स्पर्शनो वायुः इत्यमरः'

२६८ राजतरङ्गिणी अभिमानवतां ब्रह्मन्नुक्तायुक्तविवेकिनाम् । युज्यतेऽवश्यभोग्यानां दुःखानामप्रकाशनम् ॥ २२६ ॥ २२६. 'ब्रह्मन्' ! स्वाभिमानी युक्तायुक्तविवेकी जन अवश्यमेव भोग्य दुःखों को प्रकाशित करना ठीक नहीं समझते । परदुःखं समाकर्ण्य स्वभावसुजनो जनः । उपकारसमर्थत्वादप्राप्नोति हृदयव्यथाम् ॥२२७ ॥ २२७. 'स्वभावतः सज्जन जन, पर दुःख सुनकर उपकार करने में असमर्थ होने के कारण हार्दिक व्यथा का अनुभव करते हैं । वृत्तिं स्वां बहु मन्यते हृदि शुचं धत्तेऽनुकम्पोक्तिभि- र्व्यक्तं निन्दति योग्यतां मितमतिः कुर्वन्स्तुतोगत्मनः । गर्ह्योपायनिषेवणं कथयति स्थास्नुं यदन्यापदं श्रुत्वा दुःखमरंतुदां वितनुते पीडां जनः प्राकृतः ॥ २२८ ॥ २२८. मितमति साधारण जन दुखियों के दुःख को सुनकर, आत्मश्लाघा करता हुआ, उनकी अपेक्षा अपनी वृत्ति श्रेष्ठ समझता है । तथापि हृदय में शोक धारण करता हुआ, सहानुभूति पूर्ण वचनों से उनकी योग्यता की स्पष्ट निन्दा करता है । दुःख निवृत्ति निमित्त कुत्सित उपायों के आश्रय की मन्त्रणा देता है । अत एव विवेक्तॄणां यावदायूः स्वमानसे । जीर्णानि सुखदुःखानि दहन्त्यन्ते चिताऽनलः ॥ २२९ ॥ २२९. अतएव विवेकियों के मन में आजीवन जीर्ण हुए सुख-दुःख अन्त में चितानल ही जलाते हैं । अर्थात् वायु जिसका भोजन है उसे नाग कहते हैं । श्लोक संख्या २२८ में 'मति.' का 'मतेः'; सर्प हवा पीकर रहते हैं यह आम कहावत है । 'स्तुतोरा' का 'स्तुतेरा'; 'निषेवण' का 'निषेवन' तथा 'जनः' का 'पुनः' पाठभेद मिलता है । २२६ (१) दुःखः कल्हण का यह श्लोक अत्यन्त मार्मिक है । उसने स्वाभिमानी और विवेकी लोगों पादटिप्पणियाँ : के चरित्र का चित्रण किया है । वे भाग्य विपर्यय के कारण आये हुए दुःखों को चुपचाप सह लेते हैं । उसे २२८ (१) यह शार्दूल विक्रीडित छन्द है । प्रकट करने का किंचित् मात्र प्रयास नहीं करते । इसका लक्षण निम्न प्रकार से है । इसी भाव को कवि रहीम व्यक्त करता है । सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् । रहिमन निज मन को व्यथा मन ही राखो गोय । सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहै कोय ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २२९ में 'विवेक्तॄणां' का 'विव- श्लोक संख्या २२७ में 'समाकर्ण्य' का 'यदा क्तृणां', 'जीर्णानि' का 'दीर्घानि' तथा 'दीर्घाणि' कर्ण्य' तथा 'स्वभाव' का 'सुभाव' पाठभेद मिलता है । और 'चितानलः' का 'चितानिलः' पाठभेद मिलता है ।

प्रथम तरंग २६१ कः स्वभावगभीराणां लक्षयेद् बहिरापदम् । बालापत्येन भृत्येन यदि सा न प्रकाश्यते ॥ २३० ॥ २३०. स्वभावतः गम्भीर जनों की आपदाओं को बाहर कौन जान सकता है ? यदि बालक एवं भृत्य उसे प्रकाशित१ न करें । तदस्मिन्नेतयोर्बाल्याद्वस्तुनि व्यक्तिमागते । तवाग्रे गोपनं साधो न ममाऽप्युपपद्यते ॥ २३१ ॥ २३१. इन दोनों कन्याओं के बाल स्वभाव१ द्वारा वस्तु स्थिति प्रकट हो जाने पर साधो ! आपके सम्मुख अब कुछ गोपनीय रखना, मेरे लिये उचित नहीं है । त्वयाऽप्यस्मद्धितार्थाय निसर्गेसरलात्मनः । ईषत्प्रयासः कल्याणिन्क्रियतां यदि शक्यते ॥ २३२ ॥ २३२. कल्याणिन् ! स्वभावतः सरलात्मा आप भी हमारे हित हेतु यदि हो सके, तो थोड़ा प्रयास कीजिए । योऽयं तरुतले मुण्डश्चूड़ालो दृश्यते व्रती । अमुना सस्यपालेन कान्दिशीकाः कृता वयम् ॥ २३३ ॥ २३३. यह तरु तले, जो मुण्ड जटाधारी व्रती दिखाई पड़ रहा, इसी सस्यपाल ने हमें भयभीत कर रखा है । अभुक्ते मान्त्रिकैरन्ने नवे नागैर्न भुज्यते । अयं नात्ति च तत्तेन समयेन हता वयम् ॥ २३४ ॥ २३४. मान्त्रिकों१ के नवान्न ग्रहण करने के पूर्व नाग नया अन्न नहीं खाते । यह नवान्न नहीं खाता है। इसी नियम के कारण हमारी यह दुर्दशा है। २३० (१) प्रकाशित : कल्हण एक चतुर व्याव- पाठभेद : हारिक गृहस्थ की तरह घर की बात बाहर किस श्लोक संख्या २३२ में 'र्थाय' का 'दाने' तथा प्रकार फूटती है, उस पर प्रकाश डालता है । गम्भीर 'कल्याणिन्' का 'कल्याणि' पाठभेद मिलता है । मनुष्यों की बातें, जिसे वह किसी से कहता नही, श्लोक संख्या २३३ में 'मुण्डश्चूड़ालो' का 'मुण्ड तथापि घर के बालक तथा नौकरों के कारण बाहर चूड़ालो' तथा 'सस्य' का 'शस्य' पाठभेद मिलता है । फैल जाती हैं, किसी भी व्यक्ति के लिए यह असंभव पादटिप्पणियाँ : है। घर में अपनी बात बालक किंवा नौकरों से २३३ (१) मुण्ड : मुण्ड शब्द का अर्थ शर छिपाकर रख सके । दोनों ही अपनी मूढ़ता के कारण मुड़ा हुआ अथवा मुण्डित होता है । मुण्ड शुंभ का गुप्त से गुप्त बातें अनजाने बता देते हैं । एक सेनापति था। इसका अर्थ राहु और मुंडित २३१ (१) बाल स्वभाव : बालक का स्वभाव का अर्थ अधम भी होता है। तक्षक नाग ने यहाँ सरल होता है। वे बात प्रकट कर देते हैं। इस ओर मुण्ड शब्द उपेक्षा एवं घृणा सूचक अर्थ में व्यवहृत संकेत करता तक्षक नाग कन्याओं द्वारा बात प्रकट किया है । करने पर खेद प्रकट करता है ।

२७० राजतरंगिणी क्षेत्राणि रक्षत्येतस्मिन्दृष्ट्वाऽपि फलसम्पदम् । भोक्तुं नैव समर्थाः स्मः प्रेता इव सरिज्जलम् ॥ २३५ ॥ २३५. इसके खेतों के रक्षक रहते हुए, हम प्रेतों के समान सरिता के जल तुल्य फल सम्पत्ति देखकर भी ग्रहण करने में असमर्थ हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २३४ में 'रत्ने' का 'रत्नेः' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २३४ (१) मात्रिक : कल्हण ने यहाँ नागों मे प्रचलित किसी पुरानी प्रथा की ओर संकेत किया है। नाग जाति नया अन्न मान्त्रिक के ग्रहण कर लेने पर ही खाते थे। यह संकेत यहाँ मिलता है। यह प्रथा किसी रूप में आज भी प्रचलित है। ग्रामों में पुरोहित तथा ब्राह्मणों को नवीन अन्न दान देने के पश्चात् ग्रहण करने की प्रथा भारत के अनेक अंचलों मे प्रचलित है। भगवान् की पूजा सूर्य प्रथम नवान्न तथा उससे बने सामान से की जाती है । तत्पश्चात् उसे ग्रहण किया जाता है । मान्त्रिको ने नवान्न नहीं ग्रहण किया था। अतएव तक्षक नाग की कन्याएँ नवान्न उपलब्ध होने पर भी ग्रहण नही कर रही थी। पाठभेद : श्लोक संख्या २३५ में 'रक्षत्ये' का 'रक्षत्वे' तथा 'दृष्ट्वा' का 'स्पृष्ट्वा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २३५ (१) प्रेतः मृत व्यक्तियों की संज्ञा सात नामों से दी जाती है। परामु, प्रातपंचत्व, परेत, प्रेत, मशियत, मृत तथा प्रभोत । मृत आत्मा की प्रेत एक अवस्था है । वह और्ध्वदैहिक कृत्य किये जाने के पूर्व रहती है। प्र+इत दो शब्दो के संयोग से प्रेत बना है। इसका अर्थ है-वह जो चला गया है। पापियो की आत्मा प्रेतस्वरूप चिर तृष्णा से तृषित रहती है। वे अपनी तृष्णा जल से तृप्त नही कर सकते। जल के समीप रहते जल पान से वंचित रहते हैं। मानव शरीर त्याग देने पर दिवंगत भूत हो जाता है। भूत का अर्थ शरीरहीन आत्मा । भूत तथा प्रेत में अन्तर है। पापी प्रेत होते हैं। भूत मरने पर सभी होते हैं। वैदिक काल में प्रेत दिवगत आत्मा के लिए व्यवहृत होता था । प्रेतो को जल नहीं प्राप्त होता । पश्चिम तथा पूर्वीय प्राचीन विश्वास के अनुसार वे जल की सीमा पार नही कर सकते । प्रेत का अर्थ भूत पिशाच बहुत बाद में होने लगा है। वैदिक साहित्य मे दिवंगत मानव के लिए प्रेत शब्द का प्रयोग किया है। ( शतपथ ब्राह्मण १०:५:२:१३ बृहदारण्यकोपनिषद् ५:११:१) दग्ध के पश्चात् पीपल वृक्ष से मृत्तिका पात्र मे 'घण्ट' लटका दिया जाता है। उस हँडिया मे छेद कर देते है । छेद मे कुशा डाल दिया जाता है । कुशाग्र से बूँद-मूँद जल गिरता है। शुद्ध होने तक दग्ध देने वाला व्यक्ति प्रातः तथा सायं उस पात्र में जल भर देता है । कथा है। यह टपकता बूँद प्रेत ग्रहण कर सकता है। प्रेत की कल्पना विश्व के समस्त साहित्य, धर्म तथा देशों में किसी न किसी रूप मे प्रचलित है। विश्वास किया जाता है। शरीर से आत्मा निकल कर इधर उधर भटकती रहती है। ब्राह्मण प्रेत को ब्रह्म कहा जाता है। स्त्री प्रेत को चुड़ैल कहते हैं। हत्याकारी तथा पापी प्रेत का पिशाच प्रचलित नाम है। प्रेत कल्पना का आधार जीव वाद है। प्रेत का स्वभाव प्रतिशोधात्मक माना गया है। बँक

द्वीप निवासी प्रेत को 'वी' कहते है। 'वी' में चिन्तन शक्ति रहती है। परन्तु स्वरूप का अभाव रहता है। वे स्वरूप धारण कर सकते हैं। तथापि अदृश्य रहते हैं। केवल मृत व्यक्ति उन्हें देख सकता है। असुर अर्थात् असीरिया निवासी प्रेत को 'एडिमू' कहते है। अकाल मृत्यु के पश्चात् 'एडिमू' की स्थिति होती है। प्रेत तुल्य 'एडिमू' प्राणियों को भयभीत करते हैं। वहां सात प्रकार के प्रेतों की कल्पना भारत के सप्त प्रेतो तुल्य की गयी है। चीनी लोग प्रेत को 'क्री' कहते हैं। 'क्री' रात्रि में विचरण करते हैं। मिस्र में प्रेत को 'खू' कहते हैं। जापान में प्रेत को 'ओनो' कहते हैं। उनका विश्वास है कि 'ओनो' त्रिनेत्र होते हैं। उनकी जिह्वा बाहर लपलपाती निकलती रहती है। उनका दर्शन केवल अर्ध रात्रि में होता है। इस्लाम में प्रेत को 'जिन' कहा जाता है। उनको संज्ञा शैतान से भी दी गयी है। पारसी धर्मानुयायी प्रेतों को देव तथा प्रेत योनि को 'वूजेज' कहते है। अहरीयन प्रेतो का नायक है। तिब्बत में प्रेतों को 'इहा' कहते हैं। पुराणों में प्रेतो के रूप का वर्णन किया गया है । उनका वर्ण कृष्ण, स्वरूप विकराल तथा पद की उंगलियाँ पीछे की तरफ होती हैं। उनकी छाया मनुष्यों के समान नही पडती। वे नकिया कर बोलते हैं। मृत्यु के उपरान्त लिंग शरीर रह जाता है। पिण्डादि दिया जाता है तो प्रेत शरीर होता है। वह उनका भोग शरीर होता है। स्वर्ग किंवा नरक प्राप्ति के पूर्व तक प्राणी प्रेतयोनि में रहता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कतिपय निषिद्ध कार्यों के करने पर प्रेत योनि प्राप्त होती है। निषिद्ध कर्मों की लम्बी तालिका है। उनमें मुख्य द्विज निन्दा, माता-पिता का निरादर, कन्या विक्रय, कुरुक्षेत्र में दान ग्रहण करना, गोवध, चोरी, मदिरा, दूध, दही, मट्ठा का विक्रय मुख्य है। प्रेतों के सम्बन्ध में धारणा है कि वे अपवित्र स्थानों में रहते हैं। अपवित्र वस्तु ग्रहण करते हैं। उनका सूई के समान पतला शिर तथा पेट बहुत बड़ा होता है। अतएव वे सर्वदा तृष्णा एवं क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। प्रेत संस्कार की विधि विहित है। प्रेत संस्कारों के द्वारा अनेक उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। मृत्यु के उपरान्त पूरक पिंड संस्कार या दस पिंड संस्कार द्वारा प्रेत देह की उत्पत्ति होती है। प्रथम पिंड द्वारा प्रेत का मस्तक, दूसरे द्वारा कान, आँख तथा नाक, तीसरे के द्वारा कंठ, स्कन्ध तथा हृदयस्थल, चौथे के द्वारा मूत्रेन्द्रिय, नाभि तथा गुदा, पाँचवें के द्वारा जंघा; छठे के द्वारा चर्म; सातवें के द्वारा नाड़ियां, आठवें के द्वारा दांत और केश, नवें के द्वारा वीर्य तथा दसवें पिण्ड के द्वारा सभी अंगों की पूर्ति होती है। मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् सपिण्डीकरण संस्कार होता है । उक्त संस्कार द्वारा व्यक्ति प्रेत देह तथा प्रेतयोनि का परित्याग करता है। प्रेत संस्कार करने का अधिकार ज्येष्ठ किंवा कनिष्ठ पुत्र को होता है। उनके अभाव में पौत्र प्रेत श्राद्ध तथा संस्कार कर सकता है। कर्मविशेष से प्रेत श्राद्ध होने पर भी कुछ लोग प्रेतयोनि में रहते हैं । उन्हें भूत कहा जाता है। प्रेत श्राद्ध निमित्त कुछ समय निश्चित है। चैत्र, आश्विन कृष्ण पक्ष, पितृ पक्ष उत्तम समय कहा गया है। प्रेतत्व दूर करने की पुराणों में अनेक विधियो का उल्लेख किया गया है। उनमें वृषोत्सर्ग मुख्य है । इसे आद्यंकोद्दिष्ट श्राद्ध भी कहते हैं। एक वर्ष तक प्रेत निमित्त प्रतिदिन जल तथा अन्न दान दिया जाता है। इसे अंबुघट श्राद्ध कहते है। प्रेत बाधा समाप्त करने के लिये गया में प्रेतशिला पर पिण्डदान करने का विधान है। गया में एक प्रेत पर्वत है। वहाँ श्राद्ध करने पर प्रेतोद्धार होता है। काशी में पिशाचमोचन

२७२ राजतरंगिणी तथा कुरु यथा भ्रश्येत्समयादेष नैष्ठिकः । योग्यां प्रतिक्रिया विद्मो वयमप्युपकर्तृषु ॥ २३६ ॥ २३६. 'आप ऐसा कीजिये कि यह नैष्ठिक १, जिसने प्रतिज्ञा कर ली है कि नवान्न नहीं ग्रहण करेगा, प्रतिज्ञा भ्रष्ट हो जाय । हम भी उपकारियों का योग्य प्रत्युपकार करना जानते हैं।' स तथेति ततो नागमुक्त्वा यत्नपरो द्विजः । अचिन्तयद्दिवारात्रं सस्यपालस्य वञ्चनाम् ॥ २३७ ॥ २३७. 'ऐसा ही करूंगा।' यत्न तत्पर उस द्विज ने नाग से कहकर, रातदिन उस सस्यपाल १ को व्रतभ्रष्ट करने की चिन्ता करने लगा । गूढं तस्य बहिःक्षेत्रकुटीगर्भकृतस्थितेः । पच्यमानान्नभाण्डान्तर्नवान्नं न्यक्षिपत्ततः ॥ २३८ ॥ २३८. जब मान्त्रिक खेत के बाहर कुटी में बैठा था, उस विप्र ने नैष्ठिक के पकते भोजन पात्र में छिपकर नवान्न डाल दिया । भुञ्जान एवं तत्तस्मिन्क्षणादेव जहार सः । अहीन्द्रः करकासारवर्षी स्फीतां फलश्रियम् ॥ २३६ ॥ २३६. मान्त्रिक के तत्क्षण भोजन ग्रहण करते ही अहीन्द्र १ ने उपल तथा घनघोर २ वृष्टि द्वारा खेतों की अत्यधिक उपज हरण कर ली । पर प्रेत बाधा प्रतिकार निमित्त श्राद्ध किया पाठभेद : जाता है । श्लोक २३७ में 'दिवारात्रम्' का 'दिवारात्रो'; २३६ (१) नैष्ठिक : नैष्ठिक शब्द निष्ठा से 'सस्य' का 'शस्य' तथा 'वञ्चनाम्' का 'वञ्चनं' बना है । किसी बात का व्रत लेना, प्रतिज्ञा करना, पाठभेद मिलता है । किसी बात का निर्णय लेकर उसपर दृढ़ रहने वाले पादटिप्पणियाँ : व्रती को नैष्ठिक कहते हैं । यह विशेषण है । उप- २३७ (१) सस्यपाल : पाल का अर्थ रक्षक, नयन से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक गुरुकुल में रहकर राजा, ग्वाल तथा सस्य का अर्थ अन्न होता है । ब्रह्मचर्य पालन करने वाले को भी नैष्ठिक कहा शाब्दिक अर्थ खेत की फसल तथा अन्न का रक्षक जाता है । किसी व्रत के अनुष्ठान में संलग्न व्यक्ति है। यहाँ पर अर्थ खेत की फसल की रखवाली के हेतु भी इस विशेषण का प्रयोग किया जाता है । करने वाला करना अच्छा होगा । कल्हण ने इस अर्थ में इस शब्द का यहाँ प्रयोग २३९ (१) अहीन्द्र : अहि का अर्थ सर्प, नाग, किया है। मान्त्रिक ने नवान्न न ग्रहण करने का व्रत वृत्रासुर, मेघ, जल, नक्षत्र, पृथ्वी तथा नाभि होता लिया था । उसका यह दृढ़ निश्चय था । एतदर्थ उसे हैं । अहीन्द्र का अर्थ सर्पों, नागों किंवा अहियों का नैष्ठिक कहा गया है। श्लोक संख्या २३८ में कुटी राजा है । यहाँ पर सुश्रवा नाग के लिए यह शब्द में इस मान्त्रिक का रहना कल्हण ने वर्णन किया आया है। है। इससे भी प्रतीत होता है। मान्त्रिक निष्ठावान, (२) उपल वृष्टि तथा तूफान : नागलोग गृह त्यागी और कुटी निवासी था । उपल वृष्टि तथा तूफान का रूप धारण करते हैं ।

प्रथम तरंग २७३ तं च व्युत्क्रान्तदारिद्र्यः सरसोऽभ्यर्णमागतम् । कृतोपकारमन्येद्युर्निजोर्वमिनयद् द्विजम् ॥ २४० ॥ २४०. दारिद्र्य मुक्त नागराज ने उस उपकारी द्विज को, जो दूसरे दिन सरोवर पर आया था, अपने^१ स्थान पर ले गया । स तत्र पितुरादेशात्कन्याभ्यां विहितार्हणः । अमर्त्यसुलभैर्भोगैरतोप्यत दिने दिने ॥ २४१ ॥ २४१. वहाँ पिता के आदेश पर दोनों कन्यायें द्विज की शुश्रूषा करने लगीं । वह दिनोंदिन अमर्त्यों के सुलभ भोगों से तुष्ट होने लगा । कालेन सर्वनामन्त्र्य स्वां भुवं गन्तुमुद्यतः । प्रतिश्रुतवरं नागं चन्द्रलेखामयाचत ॥ २४२ ॥ २४२. कालान्तर में सबसे विदा लेकर, अपने घर जाने के लिये उद्यत हुआ । वर देने की प्रतिज्ञा करने वाले नाग से द्विज ने चन्द्रलेखा मांगी । यह जनश्रुति सत्य मानी जाती है। तूफानों द्वारा कृषि नष्ट कर भोजन प्राप्त करते हैं। यही बात तरंग ३:१६ में कही गयी है। उनकी तूफान पैदा करने वाली शक्ति का वर्णन तरंग १:२५९ में किया गया है। सियू-की (१:६५ तथा १२२) इसी प्रकार का वर्णन करता है। उपल वृष्टि, तूफान, हैंजा, जलप्लावन कश्मीर के लिये साधारण बातें हैं। हैंजा पर अब नियन्त्रण कर लिया गया है। जल प्लावन अर्थात् बाढ़ जब भी बारहमूला के पास बालू अथवा पत्थर नदी तल में एकत्रित हो जाते हैं, तो घोर वृष्टि होने पर जलस्तर उठ जाता है। उपत्यका में जल प्लावन का दृश्य उपस्थित हो जाता है। कश्मीर सरकार ने दो ड्रेजर खरीद लिया है। वे वितस्ता का बालू साफ करते हैं। अतएव जलप्लावन की सम्भावना कम हो गयी है। सन् १४६६, १५७६, १६८२, १७२३, १७३२, १७४५, १७९३ के जलप्लावन अत्यन्त उग्र थे। सन् १६८२ की बाढ़ एक मास तक कश्मीर में रही। सन् १८९३ में श्रीनगर के ७ पुलों में ६ वितस्ता के धारा प्रवाह में बह गये थे। पुरातन कागजों के देखने ३५ पर पता चलता है कि प्रत्येक १२ वर्षों में एक बार बाढ़ आने का क्रम रहा है। २४० (१) नाग स्थान : नीलमत के अनुसार नागाओं का निवास स्थान भोगवती नगरी है। यह नगर पाताल का एक खण्ड माना जाता है। बौद्ध ग्रन्थों में नगरों की तालिका में भोगवती नगरी का उल्लेख है। नागानामाह्वयं नागनाम्ना भोगवतीं पुरीम् । २२३:२९८ योगी भूत्वा स नागेन्द्र तत्रेहापि कृतालयः ॥ नीलमत पुराण में नये वर्ष के प्रथम दिवस पर महाशान्ति वर्णन में नाग द्वीप का उल्लेख किया गया है। इन्द्रद्युम्नः कशेरुस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् । नागद्वीपस्तथा सौम्य गान्धर्वो चारणस्तथा ॥ 591:७१२ ग्रहो नागस्तथा मासो यः स्यात्संवत्सरः प्रभुः । ग्रहो भविष्यद्वर्षस्य तथा मासस्य वारकः ॥ 625-७२५

२७४ राजतरंगिणी सम्बन्धायोग्यमपि तं कृतज्ञस्तवशंवदः । संविभेजे स भुजगः कन्यया न धनेन च ॥ २४३ ॥ २४३. यद्यपि वह विप्र सम्बन्ध के अयोग्य था, तथापि कृतज्ञता द्वारा यशंवद, उस भुजंग¹ ने कन्या एवं धन के साथ उसे भेजा। एवं नागवराद्वाप्तश्रियस्तस्य द्विजन्मनः । महान् नरपुरे कालस्तैस्तैर्नित्योत्सर्वैर्ययौ ॥ २४४ ॥ २४४. नाग द्वारा वर से प्राप्त श्री के साथ उसने 'नरपुर' में नित्योत्सवों द्वारा बहुत समय व्यतीत किया। भुजगेन्द्रतनूजाऽपि तं पतिं पतिदेवता । अतोषयत्परार्घ्यश्रीः शीलाचारादिभिर्गुणैः ॥ २४५ ॥ २४५. भुजगेन्द्र की वह अतुल सौन्दर्यवती कन्या, पति को देवता¹ मानती हुई शील एवं आचारादि गुणों से संतुष्ट रखती थी। तस्यां कदाचित्सौधाग्रस्थितायां प्राङ्गणाद्बहिः । आतपायोजितं धान्यं बुभुजे विहरन्हयः ॥ २४६ ॥ २४६. किसी समय जबकि चन्द्रलेखा अपने सौधाग्र पर स्थित रही थी, प्रांगण के बाहर सुखवन के लिये डाले गये धान्य¹ को विहरता एक अश्व आकर खाने लगा। तं वारयितुमाहूता भृत्या नासन्गृहे यदा । शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरा सा तदाऽवातरत्स्वयम् ॥ २४७ ॥ २४७. उसे हटाने के लिये चन्द्रलेखा ने भृत्यों को पुकारा परन्तु वे घर में नहीं थे। तब शिञ्जान मंजु मंजीरा¹ यह स्वयं नीचे उतरी। एतेषां पूजनं कार्यं बह्वन्नकुसुमोत्करैः । सकता था तथापि कृतज्ञता तथा वचनबद्धता के फलं वेदान्तथा ज्ञात्वा नागपर्यस्य पारकम् ॥ कारण चन्द्रलेखा को उसने कुल परम्परा तोड़ कर 627:७४५-७४६ विशाख ब्राह्मण को दिया था। वह्नितीर्थं चन्द्रतीर्थं नागतीर्थं तथैव च। २४५ (१) देवता : देव से तल् प्रत्यय होकर चक्रतीर्थं वामनं च गोप्रदानफलं लभेत् ॥ देवता बनता है। देव तथा देवता शब्द समानार्थक 1317 =१५३९ नहीं थे। देवता शब्द स्त्रीलिंग है। उसका प्रयोग पाठभेद : केवल मंत्रों के सम्बन्ध में होता रहा है। प्रत्येक वेद श्लोक संख्या २४२ में 'धृतवरं' का पाठभेद मन्त्र के साथ उसके देवता का नाम निर्दिष्ट रहता है। 'धृतं वरं' मिलता है। हिन्दी में देवता शब्द का व्यवहार देव शब्द के पादटिप्पणियाँ : समान पुंलिंग में होने लगा है। देव वर्ग का निवास स्वर्ग है। देव का पर्याय सुर होता है। देव, दिव्य २४३ (१) भुजंग : सुश्रवा नाग यद्यपि स्वकुल धातु से बना है। इसका अर्थ चमकना है। प्रकाश- परम्परा के अनुसार कन्या दान द्विज को नहीं कर मान एवं तेजस्वी लोग देव कहे गये हैं।

प्रथम तरंग २७५ एकहस्तधृतावेगस्रस्तशीर्षांशुकान्तया । तया पाणिसरोजेन धावित्वा सोऽथ ताडितः ॥ २४८ ॥ २४८. वेग से आने के कारण शीर्षांशुक सर से खिसक गया था। उसके छोर को एक हाथ से पकड़े उसने दूसरे पाणि सरोज से दौड़कर उसे (अश्व को) मारा। भोज्यमुत्सृज्य यावस्य फणिस्त्रीस्पर्शस्तस्ततः । सौवर्णी पाणिमुद्राऽङ्के तुरगस्योदपद्यत ॥ २४९ ॥ २४९. भोज्य को त्याग कर जाते हुए तुरग के अंग पर फणि स्त्री के स्पर्श से सौवर्णी पाणि मुद्रा अंकित हो गयी। तस्मिन्काले नरो राजा चारैस्तां चारुलोचनाम् । श्रुत्वा द्विजवधू तस्यौ प्रागेवाऽङ्कुरितस्मरः ॥ २५० ॥ २५०. उस समय राजा नर के मन में चारुलोचना द्विज वधू के प्रति अनुराग अंकुरित हो गया, जिसके सौंदर्य के विषय में वह अपने गुप्तचरों से पूर्व ही सुन चुका था। कल्हण ने पति देवता शब्द का प्रयोग यहाँ किया है। पतिव्रता स्त्रियाँ पति को देवता मानती है। पति भक्ति उनका धर्म माना गया है। कल्हण आर्यों की इस परम्परा का यहाँ उल्लेख करता है। २४६ (१) धान्य : धान्य का शाब्दिक अर्थ धान होता है। धान कूटने और भूसी निकल जाने पर चावल हो जाता है। धान्य का राजतरंगिणी में सर्वत्र अर्थ चावल धान्य किंवा शाली किया गया है। २४७ (१) शिञ्जानमंजुमंजीरा : यहाँ पर इस वाक्य का अनुवाद न कर यथावत् रख दिया है ताकि मूल भाव का रस प्राप्त हो सके। यह शब्द कवि कल्हण के साहित्य मर्मज्ञता का परि- चायके है। भूषणों की मधुर ध्वनि के लिये शिञ्जित शब्द का प्रयोग प्रशस्त कहा गया है। 'भूषणानां तु शिञ्जितम्' । 'ङ्' 'ञ्ज' का प्रचुर प्रयोगमाधुर्य का व्यंजक है। पाठभेद : श्लोक संख्या २४८ में 'एकहस्त' का पाठभेद 'एकहस्ते' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २४८(१) शीर्षांशुक : शाब्दिक अर्थ शिर तोपने का वस्त्र होता है। शिरोधान भी कहते हैं। कश्मीर में इसे तरंगा कहते हैं। हरवान विहार के खनन कार्य में मिट्टी की टाइल्स तथा खिलौने मिले हैं। तृतीय शताब्दी के शिरोवेश किंवा शीर्षांशुक के रूप तथा प्रकार का ज्ञान होता है। हरवान के एक टाइल पर नृत्यशील एक रमणी का चित्र उभड़ा अंकित है। वह पैरो में या तो शल- वार पहनी है या पाजाम। शरीर पर कुरता है। कुरता की बाँहें ढीली नहीं है। कानों में बाला है, लम्बे केश जूड़ा में बँधे हैं। शिर पर दुपट्टा की तरह वस्त्र है। वह दोनों हाथों में शिरो भाग से वाम कर में नीचे जानु तक तथा दक्षिण कर में स्कन्ध प्रदेश तक उठा है। उसका वाम पद सीधा तथा दक्षिण पद उठा है। वह वाम दिशा की ओर देख रही है। यह टाइल अत्यन्त भावनामय प्रभावो- त्पादक होने के साथ ही साथ तत्कालीन वेश भूषा पर प्रकाश डालती है। उसमें प्रकट होता है कि उस समय का कश्मीर समाज वेशभूषा में कितना सुसंस्कृत तथा आगे बढ़ चुका था। इस टाइल के चौखूंटे पर गोले गोले चिन्ह धँसे तथा उभड़े हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २४९ में 'द्राङ्के' का पाठभेद 'द्रांके' मिलता है।

२७४ | राजतरङ्गिणी सम्बन्धायोग्यमपि तं कृतज्ञतवशीवदः । संविभेजे स भुजगः कन्यया च धनेन च ॥ २४३ ॥ २४३. यद्यपि यह विप्र सम्बन्ध के अयोग्य था, तथापि कृतज्ञता द्वारा वशीभूत, उस 'भुजंग' ने कन्या एवं धन के साथ उसे भेजा। एवं नागवरात्प्राप्तप्रियस्तस्य द्विजन्मनः । महान् नरपुरे कालोऽगान्निभोगोपभोगयोः ॥ २४४ ॥ २४४. नाग द्वारा वर में प्राप्त स्त्री के साथ उसने 'नरपुर' में निभोगों द्वारा बहुत समय व्यतीत किया। भुजगेन्द्रतनूजाऽपि तं पतिं पतिदेवता । अतोषयत्परार्थ्यश्रीः शीलाचारादिभिर्गुणैः ॥ २४५ ॥ २४५. भुजगेन्द्र की यह अनुपम सौन्दर्यवती कन्या, पति को देवता' मानती हुई शील एवं आचारादि गुणों से संतुष्ट रखती थी। तस्यां कदाचिन्निर्याताग्रास्थितायां प्राङ्गणाद्बहिः । आतपायोञ्छितं धान्यं बुभुजे विहगन्दयः ॥ २४६ ॥ २४६ किसी समय जबकि चन्द्रलेखा अपने सौधाय पर स्थित खड़ी थी, प्रांगण के बाहर सुखायन के लिये डाले गये धान्य' को विहरता एक अश्व आकर खाने लगा। तं वारयितुमाहूता भृत्या नासन्गृहे यदा । शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरा सा तदाऽवातरत्स्वयम् ॥ २४७ ॥ २४७. उसे हटाने के लिये चन्द्रलेखा ने भृत्यों को पुकारा परन्तु वे घर में नहीं थे। तब 'शिञ्जान मंजु मंजीरा' यह स्वयं नीचे उतरी।

एतेषां पूजनं कार्य बह्नन्नसुगुणाक्षरैः । सकता था तथापि कृतज्ञता तथा वचनबद्धता के फलं वेदान्तथा ज्ञात्वा नागपञ्चम्य वारयन् ॥ कारण चन्द्रलेखा को उसने कुल परम्परा तोड़ कर 627:७४५-७४६ विशाख ब्राह्मण को दे दिया था। वद्वितीर्थं चन्द्रतीर्थं नागतीर्थं तथैव च। २४५ (१) देवता : देव से तल् प्रत्यय होकर चक्रतीर्थं वामनं च गोप्रदानफलं लभेत् ॥ देवता बनता है। देव तथा देवता शब्द समानार्थक 1317 = १५३९ नहीं थे। देवता शब्द स्त्रीलिंग है। उसका प्रयोग पाठभेद : केवल मंत्रों के सम्बन्ध में होता रहा है। प्रत्येक वेद श्लोक संख्या २४२ में 'श्रुतवरं' का पाठभेद मन्त्र के साथ उसके देवता का नाम निर्दिष्ट रहता है। 'श्रुतं वरं' मिलता है। हिन्दी में देवता शब्द का व्यवहार देव शब्द के पादटिप्पणियाँ : समान पुल्लिंग में होने लगा है। देव वर्ग का निवास २४३ (१) भुजंग : सुश्रवा नाग यद्यपि स्वकुल स्वर्ग है। देव का पर्याय सुर होता है। देव, दिव्य परम्परा के अनुसार कन्या दान द्विज को नही कर धातु से बना है। इसका अर्थ चमकना है। प्रकाश- मान एवं रोजस्वी लोग देव कहे गये हैं।

२५५ प्रथम तरंग एकहस्तधृतावेगस्रस्तशीर्षांशुकान्तया । तया पाणिसरोनेन धावित्वा सोऽथ ताडितः ॥ २४८ ॥ २४८. वेग से आने के कारण 'शीर्षांशुक' सर से खिसक गया था। उसके छोर को एक हाथ से पकड़े उसने दूसरे पाणि सरोज से दौड़कर उसे (अश्व को) मारा। भोज्यमुत्सृज्य यातस्य फणिस्त्रीस्पर्शत्तस्ततः । सौवर्णी पाणिमुद्राङ्के तुरगस्योदपद्यत ॥ २४६ ॥ २४६. भोज्य को त्याग कर जाते हुए तुरग के अंग पर फणि स्त्री के स्पर्श से सौवर्णी पाणि मुद्रा अंकित हो गयी। तस्मिन्काले नरो राजा चारैस्तां चारुलोचनाम् । श्रुत्वा द्विजवधू् तस्थौ प्रागेवाङ्कुरितस्मरः ॥ २५० ॥ २५०. उस समय राजा नर के मन में चारुलोचना द्विज वधू के प्रति अनुराग अंकुरित हो गया, जिसके सौंदर्य के विषय में वह अपने गुप्तचरों से पूर्व ही सुन चुका था। कल्हण ने पति देवता शब्द का प्रयोग यहाँ किया इसे तरंगा कहते है। हरवान विहार के खनन कार्य है। पतिव्रता स्त्रियाँ पति को देवता मानती हैं। पति में मिट्टी की टाइल्स तथा खिलोने मिले हैं। तृतीय भक्ति उनका धर्म माना गया है। कल्हण आर्यों की शताब्दी के शिरोवेश किंवा शीर्षांशुक के रूप तथा इस परम्परा का यहाँ उल्लेख करता है। प्रकार का ज्ञान होता है। २४६ (१) धान्य: धान्य का शाब्दिक अर्थ धान हरवान के एक टाइल पर नृत्यशील एक रमणी होता है। धान कूटने और भूसी निकल जाने पर का चित्र उभड़ा अंकित है। वह पैरों में या तो शल- चावल हो जाता है। धान्य का राजतरंगिणी में वार पहनी है या पाजाम। शरीर पर कुरता है। सर्वत्र अर्थ चावल धान्य किंवा शाली किया गया है। कुरता की बाँहें ढीली नही है। कानो में बाला हैं, २४७ (१) शिञ्जानमंजुमंजीरा : यहाँ लम्बे केश जूड़ा में बँधे हैं। सिर पर दुपट्टा की तरह पर इस वाक्य का अनुवाद न कर यथावत् रख वस्त्र हैं। वह दोनों हाथों में शिरो भाग से वाम दिया है ताकि मूल भाव का रस प्राप्त हो सके। कर में नीचे जानु तक तथा दक्षिण कर में स्कन्ध यह शब्द कवि कल्हण के साहित्य मर्मज्ञता का परि- प्रदेश तक उठा है। उसका वाम पद सीधा तथा चायक है। भूषणों की मधुर ध्वनि के लिये शिञ्जित दक्षिण पद उठा है। वह वाम दिशा की ओर देख शब्द का प्रयोग प्रशस्त कहा गया है। 'भूषणानां तु रही है। यह टाइल अत्यन्त भावनामय प्रभावो- शिञ्जितम्' । 'ङ्' 'ञ्ज' का प्रचुर प्रयोगमाधुर्य का त्पादक होने के साथ ही साथ तत्कालीन वेश भूषा व्यंजक है। पर प्रकाश डालती है। उसमें प्रकट होता है कि उस पाठभेद: समय का कश्मीर समाज वेशभूषा में कितना श्लोक संख्या २४८ में 'एकहस्त' का पाठभेद सुसंस्कृत तथा आगे बढ़ चुका था। इस टाइल के 'एकहस्ते' मिलता है। चौखूंटे पर गोले गोले चिन्ह धँसे तथा उभड़े है। पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : २४८(१) शीर्षांशुक : शाब्दिक अर्थ शिर तोपने श्लोक संख्या २४९ में 'द्राङ्के' का पाठभेद का वस्त्र होता है। शिरोधाम भी कहते हैं। कश्मीर में 'द्राके' मिलता है।

२७४ राजतरंगिणी सम्बन्धायोग्यमपि तं कृतज्ञत्ववशंवदः । संविभेजे स भुजगः कन्यया च धनेन च ॥ २४३ ॥ २४३. यद्यपि यह विप्र सम्बन्ध के अयोग्य था, तथापि कृतज्ञता द्वारा वशंवद, उस भुजंग १ ने कन्या एवं धन के साथ उसे भेजा। एवं नागवराद्वाप्तश्रियस्तस्य द्विजन्मनः । महान् नरपुरे कालस्तैस्तैर्नित्योत्सवैर्ययौ ॥ २४४ ॥ २४४. नाग द्वारा वर से प्राप्त श्री के साथ उसने 'नरपुर' में नित्योत्सवों द्वारा बहुत समय व्यतीत किया। भुजगेन्द्रतनूजाऽपि तं पतिं पतिदेवता । अतोषयत्परार्ध्यश्रीः शीलाचारादिभिर्गुणैः ॥ २४५ ॥ २४५. भुजगेन्द्र की वह अतुल सौन्दर्यमयी कन्या, पति को देवता' मानती हुई शील एवं आचारादि गुणों से संतुष्ट रखती थी। तस्यां कदाचित्सौधाग्रस्थितायां प्राङ्गनाद्बहिः । आतपायोज्झितं धान्यं बुभुजे निह्वन्हयः ॥ २४६ ॥ २४६ किसी समय जबकि चन्द्रलेखा अपने सौधाग्र पर स्थित खड़ी थी, प्रांगण के बाहर सुखवन के लिये डाले गये धान्य' को विहरता एक अश्व आकर खाने लगा। तं वारयितुमाहूता भृत्या नासन्गृहे यदा । शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरा सा तदाऽवातरत्स्वयम् ॥ २४७ ॥ २४७. उसे हटाने के लिये चन्द्रलेखा ने भृत्यों को पुकारा परन्तु वे घर में नहीं थे। तब शिञ्जान मंजु मंजीरा' वह स्वयं नीचे उतरी। एतेषां पूजनं कार्यं यदुन्नकुसुमोत्करैः । फलं वेदान्तगा श्लाघ्यो नगर्वपस्य पारकम् ॥ 627:७४५-७४६ वह्नितीर्थं चन्द्रतीर्थं नागतीर्थं तथैव च। चक्रतीर्थं वामनं च गोप्रदानफलं लभेत् ॥ 1317 = १५३९ पाठभेद : श्लोक संख्या २४२ में 'श्रुतवरं' का पाठभेद 'श्रुतं वरं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २४३ (१) भुजंग : सुश्रवा नाग यद्यपि स्वकुल परम्परा के अनुसार कन्या दान द्विज को नही कर सकता था तथापि कृतज्ञता तथा वचनबद्धता के कारण चन्द्रलेखा को उसने कुल परम्परा तोड़ कर विशारद ब्राह्मण को दिया था। २४५ (१) देवता : देव से तल् प्रत्यय होकर देवता बनता है। देव तथा देवता शब्द समानार्थक नहीं थे। देवता शब्द स्त्रीलिंग है। उसका प्रयोग केवल मंत्रों के सम्बन्ध में होता रहा है। प्रत्येक वेद मन्त्र के साथ उसके देवता का नाम निर्दिष्ट रहता है। हिन्दी में देवता शब्द का व्यवहार देव शब्द के समान पुलिंग में होने लगा है। देव वर्ग का निवास स्वर्ग है। देव का पर्याय सुर होता है। देव, दिव्य धातु से बना है। इसका अर्थ चमकना है। प्रकाश- मान एवं तेजस्वी लोग देव कहे गये हैं।

प्रथम तरंग २७५ एकहस्तधृतावेगस्रस्तशीर्षांशुकांतया । तया पाणिसरोजेन धावित्वा सोऽथ ताडितः ॥ २४८ ॥ २४८. वेग से आने के कारण शीर्षांशुक सर से खिसक गया था। उसके छोर को एक हाथ से पकड़े उसने दूसरे पाणि सरोज से दौड़कर उसे (अश्व को) मारा। भोज्यमुत्सृज्य यातस्य फणिस्त्रीस्पर्शस्तस्ततः । सौवर्णी पाणिमुद्राऽङ्के तुरगस्योदपद्यत ॥ २४६ ॥ २४६. भोज्य को त्याग कर जाते हुए तुरग के अंग पर फणि स्त्री के स्पर्श से सोवर्णी पाणि मुद्रा अंकित हो गयी। तस्मिन्काले नरो राजा चारैस्तां चारुलोचनाम् । श्रुत्वा द्विजवधू ं तस्थौ प्रागेवाऽङ्कुरितस्मरः ॥ २५० ॥ २५०. उस समय राजा नर के मन में चारुलोचना द्विज वधू के प्रति अनुराग अंकुरित हो गया, जिसके सौंदर्य के विषय में वह अपने गुप्तचरों से पूर्व ही सुन चुका था।


[बायाँ स्तम्भ] कल्हण ने पति देवता शब्द का प्रयोग यहाँ किया है। पतिव्रता स्त्रियाँ पति को देवता मानती हैं। पति भक्ति उनका धर्म माना गया है। कल्हण आर्यों की इस परम्परा का यहाँ उल्लेख करता है। २४६ (१) धान्य : धान्य का शाब्दिक अर्थ धान होता है। धान कूटने और भूसी निकल जाने पर चावल हो जाता है। धान्य का राजतरंगिणी में सर्वत्र अर्थ चावल धान्य किंवा शाली किया गया है। २४७ (१) शिञ्जानमंजुमंजीरा : यहाँ पर इस वाक्य का अनुवाद न कर यथावत् रख दिया है ताकि मूल भाव का रस प्राप्त हो सके। यह शब्द कवि कल्हण के साहित्य मर्मज्ञता का परि- चायक है। भूषणों की मधुर ध्वनि के लिये शिञ्जित शब्द का प्रयोग प्रशस्त कहा गया है। 'भूषणानां तु शिञ्जितम्' । 'ङ्क' 'ञ्ज' का प्रचुर प्रयोगमाधुर्य का व्यंजक है। पाठभेद : श्लोक संख्या २४८ में 'एकहस्त' का पाठभेद 'एकहस्ते' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २४८(१) शीर्षांशुक : शाब्दिक अर्थ शिर छोड़ने का वस्त्र होता है। शिरोधान भी कहते हैं। कश्मीर में

[दायाँ स्तम्भ] इसे तरंगा कहते हैं। हरवान विहार के खनन कार्य में मिट्टी की टाइल्स तथा खिलोने मिले हैं। तृतीय शताब्दी के शिरोवेश किंवा शीर्षांशुक के रूप तथा प्रकार का ज्ञान होता है। हरवान के एक टाइल पर नृत्यशील एक रमणी का चित्र उभड़ा अंकित है। वह पैरों में या तो शल- वार पहनी है या पाजाम। शरीर पर कुरता है। कुरता की बाँहें ढीली नहीं है। कानो में बाला है, लम्बे केश जूड़ा में बँधे हैं। शिर पर दुपट्टा की तरह वस्त्र हैं। वह दोनों हाथो में शिरो भाग से वाम कर में नीचे जानु तक तथा दक्षिण कर में स्कन्ध प्रदेश तक उठा है। उसका वाम पद सीधा तथा दक्षिण पद उठा है। वह वाम दिशा की ओर देख रही है। यह टाइल अत्यन्त भावनामय प्रभावो- त्पादक होने के साथ ही साथ तत्कालीन वेश भूषा पर प्रकाश डालती है। उसमें प्रकट होता है कि उस समय का कश्मीर समाज वेशभूषा में कितना सुसंस्कृत तथा आगे बढ़ चुका था। इस टाइल के चौखूंटे पर गोले गोले बिन्दु धंसे तथा उभड़े हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २४९ में 'शङ्के' का पाठभेद 'शंके' मिलता है।

२७६ राजतरंगिणी तस्य धावन्तमुन्मत्तमन्तःकरणवारणम् । बलान्नियमिनुं नासीदपवादभयाङ्कुशः ॥ २५१ ॥ २५१. लोकापवाद का भय रूपी अंकुश राजा के धावित उन्मत्त अन्तःकरण रूपी गज को बल पूर्वक नियन्त्रित करने में असफल रहा। तस्मिन्नुद्वृत्तरागाग्निविप्लवे भूपतेः पुनः । उवाह इयवृत्तान्तो दृप्तवातानुकारिताम् ॥ २५२ ॥ २५२. राजा की उस उद्दीप्त रागाग्नि विप्लव में पुनः अश्व वृत्तान्त ने प्रचण्ड वायु का कार्य किया। चक्रे पर्यस्तमर्यादः सरलाङ्गुलिशोभिना । स काञ्चनकराङ्केन शशाङ्केनेव वारिधिः ॥ २५३ ॥ २५३. शशांक जिस प्रकार समुद्र को मर्यादा हीन कर देता है, उसी प्रकार कांचनकरा कितु सरल अंगुलियों १ की शोभा ने राजा को मर्यादा रहित कर दिया। व्रीडानिगडनिर्मुक्तो दूतैराकृतशंसिभिः । तामुपच्छन्दयन्सोऽथ सुन्दरीमुद्वेजयत् ॥ २५४ ॥ २५४. लज्जा शृंखला से निर्मुक्त उस राजा ने अभिप्राय विज्ञ दूतों द्वारा उसे प्रलोभित १ करता उस सुन्दरी को उद्वेजित किया। सर्वोपायैरसाध्यां च विप्रस्तत्पतिरप्यसौ । तैनाऽयाच्यत लुब्धेन रागान्धानां कुतस्त्रपा ॥ २५५ ॥ २५५. उस लोभी राजा ने सब साध्य उपायों से अप्राप्य उसके पति विप्र से भी उस सुन्दरी की याचना की। रागान्धों को भला लज्जा १ कहाँ? श्लोक संख्या २५१ में 'वारणम्' का पाठभेद 'कारणम्' मिलता है। श्लोक संख्या २५२ में 'सुवृत्त' का पाठभेद 'शूवृद्ध' तथा 'नूवृत्त' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५३ (१) सरलांगुलि : कल्हण यहाँ अपनी प्रकाण्ड विद्वत्ता का परिचय देता है। यहाँ पर सरल शब्द का प्रयोग साभिप्राय किया गया है। स्त्रियों की सरल एवं लम्बी उंगलियां प्रशस्त फल किंवा शुभकर कही गयी हैं। भावप्रकाश इसे व्यक्त करता है। कोमलः सरलोऽङ्गुष्ठो वर्तुलौ यदि योषिताम् । क्रमादेवं कृशाङ्गुल्या दीर्घाकाराश्च वर्तुलः । पृष्टरोमाः शस्तकलाश्चिपिटा उदिता बुधैः । कवि दण्डी 'दशकुमार चरितम्' में सरल, गोल, लाल उंगलियों का इसी प्रकार सुन्दर वर्णन करता है—'कोमल नखगणी श्वश्वनूपूर्ववृत्ततप्तताम्राङ्गुली सन्नतांस देशे सौकुमार्यवत्त्वो निम्ननपर्वसन्धौ च बाहुलते । ६।२८। २५४ (१) प्रलोभन : इस विषय पर कश्मीरी रचना संस्कृत काव्य 'कुट्टनीमतम्' द्रष्टव्य है। वह गणिका, वेश्या तथा कामियों के प्रलोभन आदि का विषय वर्णन करता है।

प्रथम तरंग २७७ अथ निर्भर्त्सनां तस्मादपि प्राप्तवताऽसकृत् । हठेन हर्तुं तां राज्ञा समादिश्यन्त सैनिकाः ॥ २५६ ॥ २५६. उस द्विज से निरन्तर तिरस्कृत होने पर भी उस राजा ने सैनिकों को बलात् उसको हरने का आदेश दिया। तैर्गृहाग्रे कृतास्कन्दो निर्गत्याऽन्येन वर्त्मना । त्राणार्थी नागभवनं सजानिः प्राविशद् द्विजः ॥ २५७ ॥ २५७. गृहाग्र उन सैनिकों से घिरा देख सपत्नीक त्राणार्थी उस द्विज ने अन्य मार्ग से निकल कर नागभवन में प्रवेश किया। ताभ्यामभ्येत्य वृत्तान्ते ततस्तस्मिन्निवेदितॆ । क्रोधाऽन्धः सरसस्तस्मादुज्जगाम फणीश्वरः ॥ २५८ ॥ २५८. समीप पहुँचकर उन दोनों के वृत्तान्त निवेदित करने पर क्रोधान्ध फणीश्वर उस सरोवर से बाहर निकला। उद्गर्जज्झिञ्झिजीमूतजनितध्वान्तसंततिः । स घोराशनिवर्षेण ददाह सपुरं नृपम् ॥ २५९ ॥ २५९. उस नाग ने काले बादलों से अन्धकार उत्पन्न कर भयंकर गर्जना की और घोर अशनि वृष्टि द्वारा नगर सहित राजा को भस्म कर दिया। दग्धप्राण्यङ्गविगलद्वसासृक्स्नेहवाहिनी । मयूरचन्द्रकाङ्केव धितस्ता समपद्यत ॥ २६० ॥ २६०. दग्ध प्राणियों के अंगों से विगलित वसा, रक्त एवं अन्य तरल शरीर तत्त्वों के बहने के कारण वितस्ता नदी विचित्र मयूर पंख तुल्य¹ हो गयी थी। २५५ (१) लज्जा : महाकवि कालिदास ने के मेद, मज्जा, रक्त तथा जले हुए शव नदी में वह कुमार संभव में उसी भाव को प्रदर्शित किया है। गये थे। कल्हण यहाँ अपनी कवित्व शक्ति का 'यमानयन्त्यात्मसुतोऽपि...... परिचय देता मज्जा, मेद, रक्त तथा जले हुए शव के वर्णन की तुलना मयूर पंख से करता है। नदी के न कामवृत्तिर्वचनीयमीक्षेत ५:८२ उज्ज्वल एवं निर्मल जलस्तर पर यदि जली हुई पाठभेद : श्मशान की लकड़ी, कोयला अथवा जला या अधजला श्लोक संख्या २५७ में 'वर्त्मना' का 'वर्म्मणा' शव तैरने लगे तो वह सचमुच कृष्ण मयूर पुच्छ तुल्य तथा 'सजानिः' का 'सजामिः' मिलता है। आकार बना देता है। मैने स्वयं एक समय काशी में पादटिप्पणियाँ : मणिकर्णिका घाट पर यह दृश्य बनते देखा है। २६० (१) मयूरपंख तुल्य : कल्हण के इस चिता शव दाह के पश्चात् ठण्डी की जाती है। वर्णन से सिद्ध होता है कि किन्नरपुर किंवा नरपुर चिता पर पानी डाला जाता है। जली लकड़ी, वितस्ता पुलिन में था। इतने समीप था कि लोगो कोयला, शव का शेषांश आदि गंगा में बहा दिये जाते

२७८ राजतरंगिणी शरण्याय प्रविष्ठानां भयाच्चक्रधरान्तिकम् । मुहूर्त्तान्निर्दहन्त सहस्राणि शरीरिणाम् ॥ २६१ ॥ २६१. भयग्रस्त सहस्रों प्राणी जो शरण हेतु, चक्रधर१ मन्दिर में प्रविष्ट हुए थे, वे मुहूर्त मात्र में जल गये। मधुकैटभयोर्मेदः प्रागूर्वोरिव चक्रिणम् । दग्धानां प्राणिनां तत्तत्तदा सर्वाङ्गमस्पृशत् ॥ २६२ ॥ २६२. प्राचीन काल में मधु-कैटभ१ के मेद से चक्रधर के दोनों ऊरु स्पर्श हुए थे। परन्तु इस समय उनका सर्वांग शरीर दग्ध प्राणियों के मेद से लिप्त हो गया था। हैं। उस समय गंगा के उज्ज्वल जल स्तर पर मयूर- पंख के 'आंख' पुच्छ तुल्य चित्र बन जाता है। २६१ (१) चक्रधर : टिप्पणी श्लोक ३८ (१) तथा श्लोक २०१ द्रष्टव्य है। कल्हण इस प्रकार का वर्णन पुनः तरंग ८.१९० में करता है। कल्हण का यह वर्णन नरपुर स्थान के निश्चय में सहायक होता है। चक्रधर के समीप नरपुर था। इस भयंकर अग्नि दाह के समय लोग त्रस्त हो कर चक्रधर मन्दिर में रक्षा निमित्त शरण लिये थे। परन्तु मन्दिर भी अग्निदाह से नही बच सका। वहाँ भी लोग जल मरे। मन्दिर नरपुर में, या उसके इतने पास था, कि लोग दौड़कर उसमे पहुँच गये थे। पाठभेद : श्लोक संख्या २६२ में 'मेदः' का 'मैतः' तथा 'तत्तत्' का पाठभेद 'तं तं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६२ (१) मधु कैटभ : मधु एवं कैटभ का वध पुरावृत्त के अनुसार भगवान् चक्रधर ने अपनी जंघा पर रख कर किया था। उनके वध के कारण मेद अर्थात् चर्बी उनके जांघ ही तक सीमित थी। इस समय संहार के कारण भगवान् का समस्त शरीर मज्जा पूर्ण हो गया था। मधु कैटभ असुर द्वय हैं। सुविख्यात है। मधु तथा कैटभ दोनों असुरों का जन्म ब्रह्मा के स्वेद से हुआ था। (विष्णु धर्म : १ : १५) पद्म पुराण सृ० ४० के अनुसार ब्रह्मा के तमोगुण द्वारा इनकी उत्पत्ति हुई थी। देवी भागवत (१ : ४) के अनुसार इनकी उत्पत्ति विष्णु भगवान् के कान की मैल अर्थात् खूँठ से हुई थी। महाभारत भी इस कथा का समर्थन करता है। भगवान् ने मृत्तिका से इनकी आकृति का निर्माण किया था। उन मूर्तियों में वायु का प्रवेश हो गया। अस्तु वे सप्राण हो गयीं। इन दोनों असुरों में मधु की त्वचा कोमल थी। अतएव उसका नाम मधु पड़ा। महाभारत में उनके जन्म की एक और कथा दी गयी है। भगवान् विष्णु के नाभिकमल पर जल के दो बिन्दु गिर गये थे। वे तमोगुण तथा रजोगुण के प्रतीक थे। भगवान् ने उन बूंदों पर दृष्टि- पात किया। उनमें एक मधु तथा दूसरा कैटभ हो गया। (म० शा० ३५५ : २२ ।२३) कठिन तपस्या द्वारा ये अजेयत्व प्राप्त कर लिये थे। कालान्तर में असुर स्वभावानुकूल प्राणियों को त्रस्त करने लगे। अतएव भगवान् विष्णु ने इनका वध किया। (दे० भा० १ : ४) महाभारत वन पर्व (१३ : ५०) में इनकी एक और कथा दी गयी है। जन्म के साथ ही दोनो ने ब्राह्मणों का वध करना आरम्भ कर दिया। ब्रह्मा की हत्या पर भी तत्पर हो गये। ब्रह्मा ने विष्णु की स्तुति की। भगवान् विष्णु का इन दोनों असुरों के साथ सहस्र वर्ष तक संघर्ष होता