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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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से अत्यन्त उच्चकोटि का हुआ है । ( रा० १ : २६-७२ ) राजा युधिष्ठिर तथा उसकी रानियाँ कश्मीर भूमि का अन्तिमदर्शन कर विदा होती है तो देश प्रेम, देश वियोग का जो करुण चित्रण कल्हण ने किया है यह विश्व-इतिहास के किसी भी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जायगी । ( रा० १ : ३६६-३७३ ) कश्मीर के लिये कल्हण ने माता शब्द का प्रयोग किया है । ( रा० ३ : ८६ ) उसने कश्मीर मण्डल के लिये 'काम्ब्य' शब्द का उल्लेख किया है । उसने कश्मीर देश तथा भूगोल वर्णन आपस में मिला दिया है । पुण्यभूमि कश्मीर की गरिमा इतनी श्रद्धाभक्ति के साथ प्रगट की है कि उसे पढ़कर रोमांच हो जाता है । ( रा० १ : ४३ ) उसकी देश भक्ति उस समय पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है जब भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से एक पुरातन पुराण वचन उद्धृत कराया है—'कश्मीर पार्वती स्वरूप है और यहाँ का राजा हर का अंश है ।' ( रा० १ : ७२ ) कृष्ण गोनन्द तथा दामोदर युद्ध का वर्णन, कश्मीर सेना का अभियान प्रेरणा एवं स्फूर्तिप्रद पद कहे जायेंगे । ( रा० १ : ५७-५८ ) । कश्मीर की अजेय शक्ति पर गर्व करता कल्हण कहता है—'कश्मीर पर बल द्वारा नही केवल पुण्य द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है । यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं न कि शस्त्रधारियों से ।' उसने विश्व को चुनौती दी है। चार सहस्र वर्षों से स्वाधीनता का भोग करने वाले काश्मीरी कभी बाहरी शक्ति के सम्मुख न झुकने वाले काश्मीरी, शस्त्रों के सम्मुख कभी मस्तक नहीं झुकाये थे । (रा० १ : ३९)। किन्तु उसने काश्मीरियों के उत्तरकालीन मोहता, पक्षपात, दुराग्रह, कलह, अर्थहीन, संघर्ष क्षुद्रता, हृदयदौर्बल्य, सैनिकों की कायरता, विश्वासघात आदि का निःसंकोच वर्णन एवं निन्दा की है । ब्राह्मण के दोषों की खुलकर निन्दा तथा राजपूतों के वीरता की प्रशंसा की है । ( रा० ३ : ४२५ ) देश के चरित्र की राष्ट्रीय दुर्बलताओं का ध्यान रखते हुए भी उसे विश्वास था कि उसका काव्यमय इतिहास तत्कालीन एवं भविष्य के राजाओं, देशभक्तों को कश्मीर के महान राजाओं का, महान व्यक्तियों में तथा महान पूर्वजों की श्रेणियों में बैठाने योग्य बनायेगा । कश्मीर की सुरक्षा भावना के प्रति कल्हण विशेष जागरूक था । उसने यही संदेश दिया था— 'कश्मीर यदि अरक्षित हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जायगा ।' अशोक जैसे सम्राट ने कश्मीर की म्लेच्छों से रक्षा हेतु जलोक पुत्र की प्राप्ति के लिये तपस्या की थी । ( रा० १ : ७७ ) अलोक ने उज्जाट डिम्ब स्थान पर म्लेच्छों का संहार किया था । ( रा० १ : ११६ ) कश्मीर ने यह सतर्कता त्याग दी तो उसे सबकुछ से हाथ धोना पड़ा । इतिहास : इतिहास की महत्ता प्राचीन काल से रही है । वेदों का भाष्य करते समय ऋषियों ने वार-वार प्राचीन 'ऐतिह्यो' पर ध्यान आकृष्ट किया है । विश्व के विद्वानो ने संस्कृत वाङ्‌मय की सर्वांग परिपूर्णता से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा की है । किन्तु श्री कीथ आदि पाश्चात्य विद्वानो ने 'ऐतिह्य' बुद्धि का भारतीयों में अभाव होना लिखा है । उनका मत है, प्राचीन भारत में इतिहास लिखने की पर- म्परा नही थी । इतिहास के रूप मे लोग इतिहास से अपरिचित थे । किन्तु भारत में इतिहास का लक्षण कुछ अपना था । उसके अनुसार इतिहास का प्रणयन होता रहा है । छान्दग्योपनिषद में नारद : सनत्कुमार संवाद मे इतिहास, पुराण पंचम वेद है । इस संकेत से इतिहास अध्ययन की बात सुस्पष्ट कही गयी है । यास्क ने निरुक्त में 'इति ऐतिहासिका' कहकर पुरा वृत्तियों का स्मरण किया है ।

[ २७ ] वेदों के आख्यानों में ऐतिहासिकता है । तिथि तथा वर्ष के अभाव में उसकी उपेक्षा कर दी जाती है । प्राचीन काल में 'ऐतिह्य बुद्धि की सत्ता स्वीकार की गयी है । वही कालान्तर में परिवर्तित होकर इतिहास के रूप में आज वर्त्तमान है । प्राचीन भारत में इतिवृत्त को रस के अनुकूल परिवृत्त कर काव्य के रूप में ग्रथित करने की प्रथा थी । उनके परिणामस्वरूप अनेक ऐतिहासिक नाटक एवं महाकाव्यों की रचना की गयी । कौमुदी महोत्सव से गुप्त कालीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है । बाण प्रणीत हर्षचरित में हर्ष के इतिहास का निर्विवाद निर्णय प्राप्त होता है । प्रवरसेन का प्राकृत भाषा में ग्रथित ऐतिहासिक महाकाव्य सेतुबन्ध प्रख्यात काव्य है । कान्यकुब्जाधिपति आश्रित वाक्पति राज ने ऐतिहासिक काव्य गउडवाहो लिखा है । वादिराज ने यशो- धर चरित लिखा है । वह ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से सुन्दर काव्य है । कल्हण ने स्वयं शंखुकुक कृत भुव- नाभ्युदय का उल्लेख किया है । यह अप्राप्य ग्रन्थ है । उसमे मम्मोटपल के युद्ध का सुन्दर वर्णन है । पद्मगुप्त परिमल का नव साहसांक चरित ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। हेम चन्द्र का 'द्वयाश्रय' काव्य ऐतिहासिक है । मंखक का श्री कंठ चरित तथा जल्हण प्रणीत सोमपाल चरित इतिवृत्त परक काव्य है । रामपाल चरित, विक्रमाङ्काभ्युदय चरित, पृथ्वीराज विजय, जयन्त विजय, सुकृत संकीर्तन, हम्भीर मद मर्दन, वसन्त विलास, सुरतोत्सव, कीर्ति कौमुदी, भोट्टपराज, चन्द्रप्रभा आदि ग्रन्थों में प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री मिलती है । इस प्रकार इतिहास की आधारभित्ति बनाकर काव्य की रचना करने वाले कवियों की एक विशाल परम्परा है । ऐतिहासिक महाकाव्य के प्रणेताओं में महाकवि विल्हण का नाम उल्लेखनीय है । उसने चालुक्य वंशीय विक्रमादित्य षष्ठ को अपने महाकाव्य का नायक बनाकर अमर कर दिया है । इतिवृत्त मिश्रित काव्यकर्त्ता अनेक हुये हैं । किन्तु इतिवृत्त को प्रधान बनाकर रचना करने वाले और तिथि वर्ष का सम्यक् उल्लेख करने वाले कवियों की परम्परा कुछ क्षीण रही है । जो थे उनके ग्रन्थ अबतक प्रकाश में नहीं आये है । उनका केवल नाम मात्र अवशिष्ट है । राजतरंगिणी एक सच्चे इतिहास- कार की कृति है । कल्हण सहृदय कवि है । उसने इतिहास को भी पूर्ण रूपेण काव्यमय बनाने का प्रयास किया और सफल हुआ है । यदि कवि की प्रतिभा का मूल्यांकन किया जाय कि वह कहाँ तक कवि है और कहाँ तक इतिहासकार तो किसी एक निश्चय पर पहुँचना कठिन प्रतीत होता है । कवि एवं इतिहास- कार जिस दृष्टि से विचार किया जाय कल्हण को दोनो में पारंगत पाते हैं । वह ऐतिहासिक एवं महाकाव्य- कार दोनों है । उसका योगदान महत्त्वपूर्ण है । उसने राजाओं के काल, समय एवं स्थानों को जो अस्थिर थे, अनियमित थे, निश्चित नहीं थे, उन्हें निश्चित एवं स्थिर किया है । पाठकों की उदात्त भावनाओं को जागृत किया है । उसमे नीति वचनों का प्रयोग कर काव्य को हल्का बनाने की अपेक्षा गम्भीर एवं उपदेशात्मक बना दिया है । कल्हण ने वेद की इस महत्त्वपूर्ण परंपरा में रचना का उत्तरदायित्व उठाया था । उसकी आरम्भ की गयी परम्परा आगामी पाँच शताब्दियों तक चलती रही । उसने जिस तरंगिणी को जीवन दिया था उसे जोनराज, श्रोवर, प्रजाभट्ट एवं शुक काश्मीर में प्रथम बार विदेशी मुगल शासन स्थापित होने तक कायम रखे । विश्व इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नही मिलता कि इतिहास लिखने की परम्परा एक ही पुस्तक का लेखन-क्रम पाँच शताब्दियो तक अविच्छिन्न गति से चलता रहा । यह तरंगिणी उसी समय सूखी जब काश्मीर की स्वाधीनता भी सूख गयो । कौटिल्य की परिभाषानुसार राजतरंगिणी इतिहास है । कौटिल्य ने इतिहास में पुराण, इतिवृत्त,

आख्यायिका, उदाहरण, धर्म एवं अर्थशास्त्र का समावेश किया है । जैन आदि पुराण इतिहास की परिभाषा करता है—जो हुआ है वही इतिहास है । हर्ष चरित, गउड वाहो, नव साहसांक चरित, विक्रमांक देवचरित, कुमारपाल चरित आंशिक इतिहास है । कल्हण के पश्चात् पृथ्वीराज विलास, सोमपाल विलास, कृति कौमुदी, प्रभावक चरित, सुकृत संकीर्त्तन तथा प्रबन्ध चिन्तामणि, इसी प्रकार की रचनायें है । इनमे कुमारपाल, वस्तुपाल, रामपाल, विक्रमादित्य, सिन्धुराज का उल्लेख है । हिन्दी ग्रन्थों मे पृथ्वीराज रासो, बीसल देव रासो आदि भी आंशिक इतिहास ग्रन्थ है । पूर्व महाभारत कालीन इतिहास ग्रन्थ नही मिलते । कल्हण इसलिए अपना इतिहास महाभारत काल से आरम्भ करता है । काश्मीर में आर्यों के पूर्व नाग एवं पिशाच रहते थे । कल्हण जलोद्भव असुर के वध की कथा पौराणिक शैली से देकर, काश्मीर उपत्यका को बारहमूला के समीप से जल निकालकर, उसके सूखी भूमि हो जाने के समय तथा तुरन्त उसके पश्चात् गोनन्द प्रथम का उपाख्यान आरम्भ कर देता है । ( रा० १ २६-२७; ५९-७३ ) इतिहास प्रयोजन : कल्हण इतिहास रचना का कारण उपस्थित करता है । पूर्व कालीन इतिहास- ग्रन्थो का नाम नही देता । केवल कहता है--पूर्व कालीन इतिहास ग्रन्थ विस्तृत थे । सुव्रत ने विस्तृत इतिहास ग्रन्थ को संक्षिप्त किया । ( रा १ : ११-१२ ) अतएव प्राचीन इतिहास लुप्त हो गये, छिन्न हो गये । गोनन्द तृतीय के परवर्ती ५२ महीपति, जो कलियुग में कौरव एवं पाण्डवो के समकालीन थे, उनका लेखा लुप्त हो गया है । ( रा० १ : १६, ४४) कवि क्षेमेन्द्र ने नृपावली की रचना की । वह काव्य रचना है । किन्तु अनवधानता के कारण उसमें इतनी त्रुटियाँ रह गयी हैं कि उसका कोई भी अंश निर्दोष नहीं कहा जा सकता था । (रा० १ : १३) यह ग्रन्थ अभी तक प्रकाश में नही आया है । पाशुपत व्रती हेला राज मे १२ सहस्र श्लोकों की 'पार्थिवावली' लिखी । ( रा० १ : १७ ) तत्पश्चात् पद्ममिहिर ने हेलाराज की रचना का अध्ययन कर अशोक के पूर्ववर्ती आठ राजाओ का वर्णन किया है । (रा० १ : १८) इस इतिहास का कल्हण नाम नही देता । श्री छविलाकर ने अशोक के पश्चात् जिन पांच राजाओ का वर्णन किया है वे लुप्त बावन राजाओ में से हैं । (रा० १ : १६) भी छविलाकर के इतिहास का नाम कल्हण नही देता । गोनन्दादि चार राजाओं का वर्णन नीलमत पुराण से लिया गया है । (रा० १ : १६) कल्हण के समय तक राजकथा विषयक ग्यारह ग्रन्थ थे । (रा० १ ० १४) कल्हण उन ग्रन्थो का नाम नही देता । कल्हण ने सुव्रत के इतिहास का भी नाम नही दिया है । कल्हण ने अपने रचना-स्रोत का भी उल्लेख किया है । (रा० १ : १५) प्रारम्भिक तरंग अनुश्रुतियों पर आधारित है । ललितादित्य की मृत्यु का वर्णन उसने अनुश्रुति के आधार पर किया है । (रा० ४ : ३६७- ३७१) यशस्कर की मृत्यु का उल्लेख भी अनुश्रुति के आधार पर किया है । (रा० ६ : ६०, ११३) वह अपने इतिहास लिखने का उद्देश्य स्वयं देता है--'इस ग्रन्थ को लिखने की मेरी यह योजना है कि मैं सर्वांगीण, पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास उपस्थित करूँ जहाँ पुरातन इतिहास-लेखको की रचनायें विश्रृंखलित हैं।' (रा० १ : १०) काश्मीर महाभारत काल से कल्हण तथा उसके पश्चात् अकबर के समय तक किसी विदेशी सेना से पदाक्रान्त नही हुआ था । सन् १३२६ ई० में अन्तिम हिन्दू शासिका कोटा रानी को हटाकर शाह मीर काश्मीर का राजा बना, काश्मीर मुसलमान धर्म में परिवर्तित हो गया परन्तु काश्मीर में काश्मीरो मुसल- मानों का ही शासन रहा । काश्मीर प्रकृति की सुषमा में सुरभित रहा । यदि कल्हण के मत में ४२२५ वर्षों

[ २९ ] के गौरवमय इतिहास लिखने की कल्पना उदय हुई तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उसने कारण भी दिया है। उसने अनुभव किया था कि कितने ही काश्मीर के राजा विस्मृति सागर में डूब गये थे। कवियों की कृति के कारण कुछ की स्मृति शेष रह गयी थी। कवि या रचनाकार अपनी रचनाओं के कारण स्वयं जीवित रहता है और दूसरों को भी जीवित रखता है। राजकीय पद एवं चकाचौंध में रहने वाले महामात्यों, मन्त्रियों, सेनानायकों की असंख्य संख्या लोप हो चुकी है। किन्तु कल्हण स्वयं जीवित रहना चाहता था। इसमें निःसन्देह वह सफल हो पाया है। वह इसलिये भी जीवित रह पाया है कि संस्कृत साहित्य में सवा चार हजार वर्षों का एक मात्र उसका इतिहास प्राप्य है। उसने विश्व में भारतीयों को इस कलंक से मुक्त किया है कि भारतीयों को इतिहास लिखने का ज्ञान नहीं था। और भारतीय साहित्य में कोई इतिहास नहीं है। कुछ अभाव : कल्हण की राजतरंगिणी में कुछ अभाव खटकता है। आश्चर्य है उसने भारत पर सिकन्दर के आक्रमण, पोरस के साथ युद्ध, चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्र गुप्त, स्कन्द गुप्त, शशांक, नरेन्द्र गुप्त, पुल- केशी तथा नागभट्ट जैसे महान भारतीय आत्माओं का उल्लेख नहीं किया है। दार्शनिकों में शंकराचार्य का भी उसने उल्लेख नहीं किया है। इसी प्रकार लिच्छवी, वज्जी, पंजाब के अनेकानेक गणतन्त्र, मालव, औधेय, आदि का राजतरंगिणी में उल्लेख न होना एक समस्या उपस्थित कर देता है। सीमान्त प्रदेश पर यूनानियों के साथ संघर्ष, अफगानिस्तान आदि में यूनानियों की राज्य स्थापना, ईरान, अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान में पुराने धर्म के स्थान पर मुस्लिम धर्म का उदय, उन देशों में पुरातन राजवंशों का पतन तथा नवीन सल्तनतों का कायम होना, ये ऐसी घटनायें हैं जिनके ज्ञान की अपेक्षा पाठक कल्हण से करता है। ललितादित्य तथा जयापीड ने भारतवर्ष में क्या महत्वपूर्ण कार्य किया, इस पर कल्हण शान्त है। वह अपना ज्ञान अवन्ती तथा कन्नौज के राजाओं तक एक प्रकार से सीमित कर देता है। अन्य राजाओं का केवल उल्लेख मात्र उसने किया है। इसके दो ही स्पष्टीकरण हो सकते हैं : कल्हण को कोई तत्कालीन प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रन्थ प्राप्त नहीं था। काश्मीर में जो लोग मुस्लिम आतंकों से भागकर आये, उनके पास शास्त्रीय एवं काव्य-ग्रन्थ थे। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि सहस्रों वर्ष की घटनायें लोग भूल गये थे। वे लिपिबद्ध नहीं थे। इसमें से कुछ घटनाओं एवं व्यक्तियों के विषय में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि पूरे भारत के इतिहास के लिए उनका महत्व स्पष्ट है, केवल कश्मीर के सीमित दृष्टिकोण में देखने पर उनका कोई भी स्थान नहीं निर्धारित किया जा सकता। संभवत इसी कारण कल्हण इनके विषय में मौन है। दृष्टिकोणः कल्हण प्रगतिशील था। जड़ता से दूर था। रूढ़ियों में बँधा नहीं था। धार्मिक संकीर्णता, जातीय असहिष्णुता से ऊपर उठा था। उसका दृष्टिकोण आधुनिक जैसा था। उसने एक मनोरंजक काल- क्रम से ऐतिहासिक तालिका प्रस्तुत किया है। उसने घटनाक्रमों से व्यापक निष्कर्ष निकाल कर, व्यापक सिद्धान्तों को काव्यमयी भाषा में प्रस्तुत किया है। कल्हण का दृष्टिकोण स्थानीय लगेगा। यह काश्मीरियों की प्रवृत्ति उनके प्रदेश के एकाकीपन के कारण हो गयी है। काश्मीर का समस्त जीवनक्रम ही जैसे एकाकी जीवनवृत्त है। उसकी दृष्टि जैसे कश्मीर उपत्यका को घेर कर खड़ी पर्वत-मालाओं से बाहर नहीं जाना चाहती। काश्मीरियों की यह मानसिक स्थिति पुराकाल में भी थी और आज भी है। कल्हण की दृष्टि बाहर भी गई है। भारतीय साहित्यिक कृतियों के साथ साथ उसे समकालीन भार- तीय इतिहास का भी ज्ञान था। उसने काश्मीर के बाहर की घटनाओं एवं राजाओं का उल्लेख किया है।

प्रथम तरङ्ग: गोनन्द-१ से अन्ध-गोनन्द तक प्राचीन राजवंश

[ ३० ] उनकी न तो प्रशंसा की है और न आलोचना । यह पुराणों तथा महाभारत के समान समकालीन राजाओं की तुलना नही करता । राजतरंगिणी गिबन के डिक्लाइन एण्ड फाल ऑफ रोमन इम्पायर तथा वाल्टेयर के इतिहास तुल्य नही है । यह काव्य है । होमर वा तथा अश्चाइलस की रचनाओं के तुल्य अमर काव्य है । कल्हण ने काश्मीर को लुप्त होने से बचा लिया है । पुराकालीन इतिहास को लुप्त होने से बचाया । उसने काश्मीर को अन्धकार युग की गाथा मात्र उसी प्रकार होने नही दिया है जिस प्रकार होमर ने यूनान को । उसने पूरा काल को सुनिश्चित इतिवृत्त से मिश्रित किया है । उस दृष्टि से संस्कृत का कोई अन्य लेखक किंवा आलोचक इतिहासकार नही कहा जा सकता । सहस्रो वर्षों के पूर्व कालीन इतिहास को उसने जीवित रखा है। मख के शब्दों में कल्हण कथा उपाख्यान उत्साह से पढ़ता था । उत्साह से उसने उनका वर्णन भी किया है । मम्मट के अनुसार काव्य का उद्देश्य लोगों को व्यवहारविद् बनाना है । काव्य की वाणी आत्मा है । काव्य का भाव रस है । विद्या का प्रयोजन विनय है । कल्हण के पदों में विनय परिलक्षित होता है । उसने अपने इतिहास काव्य में कथा, उपाख्यान, चमत्कारादि का मिश्रण कर महाकाव्य के साथ उसे रोचक बना दिया है । पुरा कालीन लेखक चाहे पश्चिम के हों अथवा पूर्व के वे पुरावृत्त, गाथा, कथाओं तथा इति- हास के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं खींच सके थे । कल्हण ने इन बातों से हटकर वैज्ञानिक दृष्टि से इतिहास रचना का प्रयास किया है । वह आधुनिक शैली एवं पुरानी शैली के बीच की कड़ी है । राजतरं- गिणी शुष्क ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं है । वह रसमय है । उसके पढ़ने से मन ऊबता नही । वह घटना-क्रमों का संग्रह मात्र नहीं है। उसमें इतिहास के साथ रामायण, महाभारत जैसे कथा प्रसंगों के सहित पुराणों जैसी धार्मिक झुकान एवं रोचकता है । प्रचार एवं उपदेशात्मक ग्रन्थ : कल्हण ने काश्मीर की शोचनीय दशा एवं अव्यवस्थित व्यवस्था ठीक करने के लिये राजतरंगिणी की रचना की थी । वह लिखता है—यह भूमि जो कुलवधू के समान थी वह वेश्या के समान दुष्टो के हाथो में पड़ गयी है । अब से जो कुचक्रो में निपुण होगा वही इस हतप्रभ राज्य को प्राप्त करने की आशा करेगा । ( रा० ७ : १४१६, १४२० ) वह जब काश्मीर के पुराकालीन इतिहास की तत्कालीन इतिहास से तुलना करता था तो उसका हृदय रो उठता था । अतएव उसने मानव प्रकृति की अप्रत्याशित रूप से चित्रित किया है । ( ७ : ७९२ ) कल्हण अपने इतिहास की परम्परा काश्यप ऋषि से जोड़ता है । उनके समय से अपने समय की तुलना करता है । वह दुःखी होकर कहता है—'यह पृथ्वी काल की बलवत्ता के कारण शीघ्रतापूर्वक संकु- चित हो रही है।' उसका स्वर्ण युग भूतकाल में था । वह करुण शब्दो में कहता है--कोई प्राचीन राजाओ के समान नही हो सकता ।' ( रा० ४ : ४०७ ) कल्हण काश्मीर के राजा को 'दुरात्मज' कह चुका था अत- एव उसने काश्मीर के राजाओं के दोषो का कारण उनके पूर्व जन्म के दोषो को दिया है। (रा० ३ : ४१४) जयसिंह जिसके राज्यकाल में वह अपनी रचना कर रहा था उसे कल्हण ने पुराकालीन राजाओं के तुल्य माना है । कल्हण काश्मीर में शक्तिशाली एवं उदार राजा चाहता था । जो बिगड़े घर को सुधार सके और बने घर को बढ़ा सके । जनता के प्रति स्नेह एवं सहानुभूति प्रदर्शन कर सके । उसने यह विचार देवी वाक्- पुष्टा तुंजीन तथा मेघवाहन के प्रसंग में प्रकट किया है । ( त० २ · ३१-४९ ) वह कहता है, राजाओं को पृथ्वी का पालन नववधू तुल्य करना चाहिए । ( रा० २ : ८ )

[ ३१ ] राजतरंगिणी के विषय में कल्हण स्वयं लिखता है--'राजाओं के विकास एवं ह्रास के समय मेरी कथा देशकाल के अनुसार उनके लिये उत्साह किंवा शान्तिवर्धक तुल्य उपयोगी सिद्ध होगी । कौन ऐसा चेतन हृदय व्यक्ति होगा जो अनंत व्यवहारो से पूर्ण मेरे इस ग्रन्थ को हृदयंगम नही करेगा ।' ( रा० १ : २१, २२ ) उसने अपने समय के लोगो के पठन-पाठन हेतु काव्य लिखा था। जो स्वतः काश्मीर की पर- म्पराओ, घटनाओं, प्रचलनों आदि से परिचित थे । कल्हण ने उनके मार्ग-दर्शन हेतु अपने विचारो को स्वतंत्र रूप से राजनीतिज्ञ राजा, जनता, राजन्य वर्ग, कर्म स्थानीय जन, मंत्री, पुरोहित, अमात्य, सचिव सबके लिए लिखा था । उसे विश्वास था कि उसके इतिहास के पठन-पाठन से भविष्य के राजाओ की परम्परा अच्छी होगी । वे आदर्श राजा होगे । जनता का मनोबल उठेगा । आदर्श सम्राट एवं राजा : कल्हण के आदर्श शासक अशोक, कनिष्क ओर मेघवाहन थे । अशोक उदार सम्राट था । कनिष्क जन हितैषी राजा था । मिहिरकुल क्रूर राजा था । मेघवाहन आदर्श राजा था । भिक्षाचर, कलश तथा हर्ष कल्हण के समय महान पुरुषों के समान स्मरण किये जाते थे । ( ७ : ५६९, १०६६ ) कश्मीर के भूपाल पृथ्वोपति पृथ्वीपाल कल्हण की दृष्टि में सामान्य लघु पर्वतीय राजा नही थे । वे अपने लघु साधनों द्वारा साम्राज्य नही बना सके थे किन्तु कल्हण काश्मीर के राजाओं को शक्तिशाली राष्ट्र का राजा मानता था जिसके राजा पूर्व काल में भारत विजय दिग्विजय किये थे । ( रा० १ : २९७, ३३९, ३ : ३५०, ४ . १३१७ ) कल्हण का आदर्श सार्वभौम राज्य था । ( रा० ३ : ८०, ८१ ) जनता का अधिकार : काश्मीर मे गणतन्त्र नही था । भारत में गणतन्त्रों का लोप अन्ततोगत्वा समुद्रगुप्त के साम्राज्य प्रसार के साथ हो गया था । यूरोप में भी गणतन्त्र उन दिनो नही थे । तथापि राजा निरंकुश नही था, स्वेच्छाचारी नही था । यदि राजा क्रूर, अन्यायी, अत्याचारी एवं दुष्ट था तो जनता को अधिकार था, वह राजा को हटा सकती थी । क्योकि दुष्ट राजा का होना कल्हण की दृष्टि में जनता के भाग्य विपर्यय का कारण था । जनता के कुकर्मों के कारण, नैतिक पतनों के कारण, कायरता के कारण देश मे अवाछनीय राजा राज्य करते है । जिस प्रकार व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है, उसी प्रकार जनता भी भोगती है ; कल्हण कहता है-'प्रजा के पुण्य के कारण समय-समय पर ऐसे नृपों का जन्म सम्भव होता है जो अत्यन्त छिन्न-भिन्न हुए राज्यों का योजन करते है। ( रा० १ : १८ ) कर्म गति से यदि व्यक्ति नहीं बच सकता तो जनता भी नही बच सकती । कल्हण का यह अभिनव राजनीति दर्शन है । ( रा० १ : १८७ ) । जनता का राज्य-व्यवस्था में स्थान था । आवश्यकता होने पर जनता राजा का चयन करती थी । काश्मीर की जनता ने सन्धिमति को अपना राजा स्वीकार किया था । (रा० २ : ११६) जनता ने गान्धार से मेघवाहन को लाकर कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया था । रा० ३ : २ ) राजा वक को जनता ने राजा चुना था । ( रा० १ : ३२५ ) विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को काश्मीर का राजा बनाने का विचार किया तो उसने प्रकृति जनो अर्थात् जनता के पास दूत भेजा था । कोई निश्चय करने के पूर्व वह जनता का मत जान लेना चाहता था । ( रा० ३ : १८८ ) कल्हण ने यूनानी लेखकों के समान नगर की जनता का चित्रण किया है । वह जनता के प्रति, उसकी भावनाओं के प्रति, उसके कल्याण के प्रति अत्यधिक जागरूक था । वह आनुवंशिक राजाओ के परिवर्तनो के प्रति उदासीन था । राजा और प्रजा : कल्हण ने राजा को हरांशज कहा है । परन्तु पश्चिमी राजनैतिक दार्शनिकों के समान वह राजा के दैवी सिद्धान्त में विश्वास नहीं करता । राजा दैव नहीं था । वह सर्वसत्ता सम्पन्न

[ ३२ ] अधिनायक नही था । वह प्रजा के लिए पिता तुल्य था । ( रा० ५ : ३५० ) साधारण व्यक्तियों के समान राजा भी मानवीय दुर्बलताओं का सरलतापूर्वक शिकार हो जाता था । ( रा० ८ : १५५२ ) राज्य के आध्यात्मिक सिद्धान्तो का प्रतिपादन करते हुये कल्हण बलवती भाषा मे कहता है अन्यायी राजा कष्ट पाता है । ( रा० ७ : १५८२; ८ : १९५१ ) दुष्ट राजा को उसकी जीवन काल ही में दुर्गति होती है । राजा को कल्हण प्रजा से सर्वथा भिन्न नही मानता । राजा एवं प्रजा दोनो एक ही शरीर के पुरजे हैं । एक शरीर तुल्य है । उसने यहाँ पर यूनान के नगर राज्यों के दर्शन तुल्य विचार किया है । कल्हण ने राजा को दार्शनिक ढंग से केवल प्रजा से ही नहीं प्राणिमात्र से मिला दिया है । ( रा० : २४६-२६६, ३ : ८१-२, ५० ) कल्हण कहता है—'जो प्रजा पीड़क राजा होते हैं वे कुल सहित नष्ट हो जाते हैं । और जो नष्ट राज्य को सुव्यवस्थित करते हैं उनके वंश की अनुगामिनी श्री होती है ।' ( रा० १ : १८८ ) पुरोहित एवं द्विज परिषद : कल्हण दो परिषदों का उल्लेख करता है । द्विज परिषद का प्रथम उल्लेख राजा लव के सन्दर्भ में किया है । ( रा० १ : ८७ ) मन्दिरों पर चढ़ायी देवोत्तर सम्पत्ति, अग्रहार, ग्राम तथा अन्य दान कालान्तर में परिषद को मिल जाते थे ( रा० २ : १३२ ) राजा का चयन परिषद करती थी । उत्पल वंश का जब अन्त हो गया तो ब्राह्मण एकत्रित हुए । राजा चुनने का उसने निश्चय किया । कमलवर्धन के कहने पर द्विज-मण्डली एकत्रित हुई थी । कमलवर्धन स्वयं राजा बनना चाहता था । द्विज गण कुछ निश्चय न कर सके । इसी समय पुरोहित परिषद ने यशस्कर को राजा घोषित कर दिया । ( रा० ५ : ४५६-४६६ ) इसी प्रकार ब्राह्मण सभासदों ने तुंग के पतन हेतु ब्राह्मण तथा पुरोहित परिषद् को प्रेरित किया । कि वे परिहास पुर मे प्रायोपवेशन आरम्भ करें । ( रा० ७ : १३) कालान्तर में परिषदों का रूप बदल गया था । ब्राह्मण लोग परिषद् तथा प्रायोपवेशन को साधन बनाकर अर्थ सिद्धि करने लगे । ( रा० ७ : १४, २३ ) भीम केशव का मन्दिर बहुत दिनों तक परिषद् के सदस्यों के पारस्परिक संघर्ष के कारण बन्द रहा । (रा० ७ : १०८२) पुरोहित परिषद् ने इसी प्रकार प्रायोपवेशन को साधन बनाकर राजा हर्ष को उन्हें रुढ भारोठी से मुक्त करने लिए बाध्य कर दिया । (रा० : ७, १०८८) इसी प्रकार राजा सुस्सल के समय पुरोहित परिषद् प्रायोपवेशन किये थे । (रा० ८, ७०९) राजा भिक्षाचर के समय में भी पुरोहित परिषद् ने इसी प्रकार प्रायोपवेशन द्वारा अपनी बातें मनवायी थी । पुरोहित एवं द्विज परिषद् चार हजार वर्षों तक राजा लव के समय से कल्हण काल तक दिखायी देती है । विश्व की यह सबसे पुरानी, जागरूक एवं शक्ति सम्पन्न संस्था थी । कल्हण को अपने ब्राह्मणत्व एवं अभिजात कुलोत्पन्न होने का गर्व था तथापि उसने पुरोहित तथा परिषद् के अनुचित व्यवहारों की निन्दा की है। राजा तथा राज्य की स्थिति संकटापन्न होती थी, तो ऐसा ही समय प्रायोपवेशन के लिए अधिक से अधिक उपयुक्त समझा जाता था । प्रायोपवेशन पुरातन काल में एक नैतिक अस्त्र था। दुर्बल सबलों के विरुद्ध उसका प्रयोग करते थे। किन्तु काश्मीर में द्विजों ने उसे उपहासास्पद बना दिया था। राजनीति स्वार्थ सिद्धि एवं धन ऐंठने का साधन हो गयी थी। प्रायोपवेशन का इतना दुरुपयोग होने लगा था कि राज्य ने एक प्रायोपवेशन अधिकारी नियुक्त किया था । (रा० ६ : १४) राजा चन्द्रापीड ने स्वयं मार्गदर्शन के लिए मन्दिर में प्रायोपवेशन किया था । (रा० ४ : ९९) कल्हण ने पुरोहित परिषद् तथा पुरोहितो की खूब खिल्ली उड़ाई है । उनके इस कार्य को कायरता माना है। (रा० ४:८२, ९९; ५:४६८,

[ ३३ ] ६ : २५, ३३६, ३४३, ८ : ५१, ११०, ६०९, ७०७, ७६८, ८८८, ९३९, २२२४, २७३३, २७३९) किन्तु कल्हण ने पुण्यात्माओं द्वारा किये गये प्रायोपवेशन में श्रद्धा प्रकट की है । (रा० ४ : ६३२; ८ : २२४२) मन्त्रि परिषद : काश्मीर की तीसरी प्राचीन मन्त्रि परिषद थी । यह संस्था का महाभारत काल से कोटारानी (सन् १३३६ ई०) तक कायम थी । यह संस्था पुरोहित परिषद से भी पुरातन थी । कम से कम ४ सहस्र वर्षों से इसका अविच्छिन्न अस्तित्व मिलता है । मन्त्रि परिषद एवं द्विज तथा पुरोहित परिषदों में कौन विशेष शक्तिशाली था यह कहना कठिन है । दोनों ने ही समय समय पर राजाओं को चुनकर सिंहा- पर बैठाया और उतारा है । मन्त्रि परिषद का क्षेत्र राजनीतिक था । परन्तु द्विज एवं पुरोहित परिषद का क्षेत्र धार्मिक एवं राज- नीतिक समयानुसार हो जाता था । मन्त्रि परिषद की शक्ति राजबल था । पुरोहित एवं द्विज परिषद की शक्ति उनका आध्यात्मिक बल काश्मीरी जनता की धर्मभीरुता थी । अतएव द्विज एवं पुरोहित परिषद की शक्ति कालानुसार श्रेष्ठ मानी गयी थी । मन्त्रि परिषद भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख रानी यशोवती के सन्दर्भ में उपस्थित थी । बाल गोनन्द द्वितीय के समय राजा के नाम से मन्त्रि परिषद शासन करती थी । वह उस समय सर्व सत्ता सम्पन्न थी । (रा० १ : ७८-८१) काश्मीर की मंत्रि परिषद विश्व की सबसे प्राचीन और सबसे अधिक लम्बे जीवन काल की संस्था थी । इसकी धारा कभी सूखी नहीं थी । छिन्न नहीं हुई थी । राजाओं के अभाव एवं अस्तित्व दोनों कालों में यह संस्था अबाध गति से अपना काम करती रही है । मन्त्रि परिषद इतनी शक्तिशाली थी कि सेना से राजभवन तक घेर लेती थी । (रा० १ : ३६६, ३६७) राजा को वन्दी बनाती थी (रा० २ : ४); राजा को पदच्युत कर दूसरे को राजा बनाती थी (रा० २ : ५) । काश्मीर की मन्त्रि परिषद की ख्याति बाहर भी थी । राजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को राजा बनाने का आदेश मन्त्रिपरिषद को ही दिया था । ( रा० ३ : २२४, २३५) मन्त्रियों ने मेघवाहन को काश्मीर का राज्य सिंहासन ग्रहण करने लिये कहा था । (रा० २ : १५१) राजा दुर्लभ वर्धन को मन्त्रियों ने राजा मनोनीत किया था । (रा० ३ : ५२८) काश्मीर में जनता, मन्त्रि परिषद, पुरोहित एवं द्विज परिषद ने अनेक अवसरों पर बिना एक दूसरे की सलाह लिये स्वयं अपने निर्णय से राजा चुना है । अभिषेक : राजतरंगिणी से हमें काश्मीर के इतिहास में अभिषेक प्रणाली के प्रचलन के कई महत्व- पूर्ण एवं अनोखे उल्लेख मिलते हैं । यह द्विजों, पौर जनों तथा मन्त्रियों द्वारा समयानुसार होता रहा है । भगवान् श्रीकृष्ण ने द्विजों द्वारा रानी यशोवती का अभिषेक कराया था । ( रा० १ : ७० ) राजा गोनन्द द्वितीय का अभिषेक द्विजेन्द्रों ने किया था । ( रा० १ : ७५ ) राजा सन्धिमति का अभिषेक द्विजों ने किया था । ( रा० २ : ११७ ) राजा वक का अभिषेक पौर जनों ने किया था । ( रा० १ : ३२५ ) मातृ गुप्त का अभिषेक प्रकृति अर्थात् प्रजा ने किया था । (रा० ३ : २३९) राज्याभिषेक की प्रक्रिया शास्त्रानुसार होती थी । राजा की मूर्धा पर कनक घट से तीर्थों का जल ढाला जाता था । उसके पश्चात् अन्य औपचारिक क्रियायें होती थी । ( रा० ३ : ५२८ ) ५

[ ३४ ] सभा : काश्मीर में सभा थी । उसके सदस्यों को सभ्य कहा जाता था । ( रा० ३ : १५८ ) सभा का सर्वप्रथम उल्लेख सन्धिमति के समय में मिलता है । ( रा० २ : १२७ ) सन्धिमति राज्य त्याग करने लगा तो उसने सभा एकत्रित की । उसने काश्मीर का राज्य सभा को लौटा कर वनगमन किया । ( रा० २ : १५९ ) कल्हण ने विक्रमादित्य की सभा का उल्लेख मातृगुप्त के प्रसंग में किया है । ( रा० ३ : १३९, १४६ ) मातृगुप्त के प्रसंग में ही कल्हण ने सभा का पुनः उल्लेख किया है । ( रा० ३ : २०४ ) सभा का सभापति होता था । जयापीड की सभा का सभापति भट्टोद्भट था । ( रा० ४ : ४९५ ) सभा में संगीत भी होता था । ( रा० ५ : ३६१ ) काश्मीर की सभा का कार्य क्या था इस पर कल्हण प्रकाश नहीं डालता । शासन पद्धति पर भी कल्हण प्रकाश डालता है । राजा जलोक के पूर्व अन्य राज्यों के समान काश्मीर में व्यवस्था थी । ( रा० १ : ११८ ) राज्य की सप्त प्रकृतियां थीं । ( रा० १ : ११९ ) जलौक ने शासन पद्धति में सुधार किया । उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य में महाभारत के समय की प्रचलित शासन व्यवस्था काश्मीर में चलायी । ( रा० १ : १२० ) दण्ड प्रथा प्रचलित थी । कारागार होते थे । उन्हें कारा वेश्म कहा गया है । राजा युधिष्ठिर दुर्गा गलिका में बन्दी बनाकर रखा गया था । ( रा० २ : ७४ ) राजा हिरण्य ने अपने भ्राता तोरमाण को बन्धन में रख दिया था । ( रा० ३ : १०४ ) शूल देने की प्रथा थी । श्मशान में शूली दी जाती थी । ( रा० २ : ७९ ) समाज में क्रूरता भी होती थी । किन्तु यह अच्छा नहीं समझा जाता था । क्रूरता की कल्हण ने घोर निन्दा की है । क्रूरता के स्थान पर, उदारता, सहिष्णुता, दान, क्षमादि उदात्त गुणों की प्रशंसा की गयी है । न्याय पर कल्हण अत्यधिक बल देता है । उसने स्वयं लिखा है कि तरंगिणी की रचना उसने एक स्थेय किंवा न्यायकर्ता तुल्य सब बातों को तोलकर एक निष्कर्ष पर पहुँचकर लेखनी उठायी है । कल्हण शान्ति प्रिय था । शान्त रस को प्राथमिकता दी है । उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा अबाध्य गति से प्रवाहित मिलती है । समाज : कल्हण ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है । उसने अपने समय के नर- नारियों के आहार-विहार, आमोद-प्रमोद, पान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, संस्कार-कुसंस्कार, अन्ध विश्वास, परम्परा, रूढियां उनकी जड़ता, नैतिक चरित्र, सबको एक मनोवैज्ञानिक के समान काव्यमयी भाषा में उपस्थित किया है । नर-नारियों की धार्मिक एवं कामुक प्रवृत्तियो और तज्जन्य समस्याओ के निराकरण का मौलिक हल भी स्थान-स्थान पर दिया है । ग्रामीणों तथा नागरिकों के व्यंग-विनोद, हास- परिहास के वर्णन में उसकी काव्य कला अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पर पहुँच जाती है । इस प्रकार वह प्रमाणित करता है कि वह कवि प्रथम तत्पश्चात् इतिहासकार था । कल्हण लेखन-कला में परिपक्व बुद्धि का प्रौढ व्यक्ति था । युवक लेखक कल्पना सागर में तैरने का अधिक प्रयास करता है । कल्हण ने घटना सागर में गोता लगाकर एक प्रौढ सन्तुलित व्यक्ति के समान रत्नों को निकालकर घटनाओं को क्रमबद्ध किया है । अत्याचार, अनाचार, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, गृहसंघर्ष, अराजकता आदि कटु किन्तु वास्तविक घटनाओं के मध्य गुजरने के कारण उसका उर्वर मस्तिष्क राज- तरंगिणी जैसे काव्य को प्रस्तुत करने के लिए परिपक्व हो गया था । उसने अपने समय की अनुभूतियों को गाथा में पिरो दिया है ।

[ ३५ ] कल्हण ने तत्कालीन समाज का वर्णन करते हुए समाज की आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला है । टंकणित मुद्रा, दीनार, कर-प्रणाली, करों का नाम, राजस्व, कृषि, उद्योग-धन्धा, वाणिज्य, व्यवसाय, के वर्णनों के साथ अकाल, उपल वृष्टि, तुहिनपात, उनका काश्मीर के समाज पर पड़ते प्रभाव का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है । कल्हण ने उत्सवों, यात्राओं, परम्पराओं आदि का संक्षिप्त वर्णन किया है । समाज में पुराण पाठ, कविता पाठ एवं नाटक होते थे । नट, चारण, ( रा० १ : २२२ ) कुम्भदास ( पानी भरने वाले ) ( रा० ३ : ४५६ ) मुण्ड ( रा० १ : २३६ ) शय्यपाल ( रा० १ : २३२ ) मान्त्रिक ( रा० १ : २३४ ) नैष्ठिक ( रा० १ : २३६ ) कंचुकी ( रा० १ : २९५ ) चर ( रा० १ : २५० ) गुप्तचर ( रा० ३ : १५६ ) विज्ञदूत ( रा० ३ : १५६ ) भृत्य ( रा० १ : २४७ ) धात्री, ( रा० १ : ७७ ) कुम्भकार, यामिक ( रा० ३ : १७३ ) दूत (रा० ३ . १८८) राजीव जीवो ( रा० ३ : १९८ ) राजदासी (रा० ३ : १५६) अश्वघास कायस्थ ( रा० ३ : ४८९ ) कुट्टनो, विट, गायक, नर्तक आदि का वर्णन उनके कर्मों के साथ किया है । वाद्यों में वीणा, ( रा० २ : १२६ ) पटह ( रा० २ : १६८ ) वेणु ( रा० २ : १६७ ) मृदंग, शंख, घण्टा, सुगन्धियों में, चन्दन, कर्पूर, धूप, केसर, का प्रयोग किया जाता था । पाणि स्पर्श द्वारा आशीर्वाद, साधुवाद एवं कृतज्ञता प्रकट करने की प्रथा थी । ( रा० ३ : १८२ ) प्रतिज्ञा पालन, वचन- बद्धता पर जोर दिया जाता था । ( रा० १ : २४३, ३ : १८२, ४२५ ) कल्हण ने विटो की बहुत निन्दा की है । ( रा० २ : ६७-७० ) कृषि मुख्य उद्यम था । अरघट, कुल्या ( नहर ) आदि से सिंचाई होती थी । अरघट अर्थात् रहट काश्मीर में अति प्राचीन काल से प्रचलित था । जिससे विश्व अपरिचित था । यह प्राय परसियन व्हील के ऐतिहासिक काल से भी प्राचीन थी । कल्हण यन्त्र का उल्लेख करता है । यह वर्तमान काल के क्रेन के समान शिला उठाने का यन्त्र था । ( रा० १ : २६३ ) कूप यन्त्र का भी कल्हण ने उल्लेख किया है । ( रा० १ : २८४ ) यह रस्सी का बना होता था । रस्सी चक्र के ऊपर से आती जाती थी । लोग कांगड़ी अर्थात् हसन्ती किंवा अंगार धानी का आज के समान उपयोग करते थे । ( रा० १ : १७१ ) महिलायें नील निचोल ( रा० २ : २४७ ) तथा कंचुकी ( रा० २ : २९४ ) पहनती थी । मूर्धा पर शीर्षांशुक रखती थी । ( रा० १ : २४७ ) बालक काक पक्ष लगाते थे । ( रा० १ : ८१ ) स्त्रियाँ नूपुर, स्वर्ण सूत्र, धारण करती थी । पुरुष गण मस्तक स्थित मणि, ( रा० २ : १६५ ) मुकुट में मुक्ता . रा० ३ : ५२९ ) धारण करते थे । महिलायें यावक अर्थात् आलता लगाती थी । ( रा० ३ : ४१५ ) ये श्रृंगार करती थी । श्रृंगार में केसर, चन्दन, चूर्ण, पुष्प एवं सुगन्धियों का उपयोग किया जाता था । पुरुष उष्णीष धारण करते थे । धौत वस्त्र पवित्रता का प्रतीक था । ( रा० २ : १६१ ) रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों का प्रचलन था । रुई के वस्त्रों का उल्लेख कम मिलता है । काश्मीर में रुई नहीं होती थी । रुई का वस्त्र भारत के अन्य भागों से काश्मीर में आता था । हेम पादांकित ( रा० २ : ३०० ) मार्तण्ड प्रतिमांकित यमुपदेव वस्त्रों ( रा० १ : २९९ ) का उल्लेख मिलता है । वे सिंहल से काश्मीर में आते थे ।

[ ३४ ] सभा : काश्मीर में सभा थी । उसके सदस्यों को सभ्य कहा जाता था । ( रा० ३ : १५८ ) सभा का सर्वप्रथम उल्लेख सन्धिमति के समय में मिलता है । ( रा० २ : १२७ ) सन्धिमति राज्य त्याग करने लगा तो उसने सभा एकत्रित की । उसने काश्मीर का राज्य सभा को लौटा कर वनगमन किया । ( रा० २ : १५९ ) कल्हण ने विक्रमादित्य की सभा का उल्लेख मातृगुप्त के प्रसंग में किया है । ( रा० ३ : १३९, १४६ ) मातृगुप्त के प्रसंग में ही कल्हण ने सभा का पुनः उल्लेख किया है । ( रा० ३ : २०४ ) सभा का सभापति होता था । जयापीड की सभा का सभापति भट्टोद्भट था । ( रा० ४ : ४६५ ) सभा में संगीत भी होता था । ( रा० ५ : ३६१ ) काश्मीर की सभा का कार्य क्या था इस पर कल्हण प्रकाश नहीं डालता । शासन पद्धति पर भी कल्हण प्रकाश डालता है । राजा जलोक के पूर्व अन्य राज्यों के समान काश्मीर में व्यवस्था थी । ( रा० १ : ११८ ) राज्य की सप्त प्रकृतियाँ थीं । ( रा० १ : ११९ ) जलोक ने शासन पद्धति में सुधार किया । उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य में महाभारत के समय की प्रचलित शासन व्यवस्था काश्मीर में चलायी । ( रा० १ : १२० ) दण्ड प्रथा प्रचलित थी । कारागार होते थे । उन्हें कारा वेश्म कहा गया है । राजा युधिष्ठिर दुर्गों गलिका में बन्दी बनाकर रखा गया था । ( रा० २ : ७४ ) राजा हिरण्य ने अपने भ्राता तोरमाण को बन्धन में रख दिया था । ( रा० ३ : १०४ ) शूल देने की प्रथा थी । श्मशान में शूली दी जाती थी । ( रा० २ : ७९ ) समाज में क्रूरता भी होती थी । किन्तु यह अच्छा नहीं समझा जाता था । क्रूरता की कल्हण ने घोर निन्दा की है । क्रूरता के स्थान पर, उदारता, सहिष्णुता, दान, क्षमादि उदात्त गुणों की प्रशंसा की गयी है । न्याय पर कल्हण अत्यधिक बल देता है । उसने स्वयं लिखा है कि तरंगिणी की रचना उसने एक स्थेय किंवा न्यायकर्ता तुल्य सब बातों को तौलकर एक निष्कर्ष पर पहुँचकर लेखनी उठायी है । कल्हण शान्ति प्रिय था । शान्त रस को प्राथमिकता दी है । उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा अबाध्य गति से प्रवाहित मिलती है । समाज : कल्हण ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है । उसने अपने समय के नर- नारियों के आहार-विहार, आमोद-प्रमोद, खान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, संस्कार-कुसंस्कार, अन्ध विश्वास, परम्परा, रूढ़ियाँ उनकी जड़ता, नैतिक चरित्र, सबको एक मनोवैज्ञानिक के समान काव्यमयी भाषा में उपस्थित किया है । नर-नारियों की धार्मिक एवं कामुक प्रवृत्तियों और तज्जन्य समस्याओं के निराकरण का मौलिक हल भी स्थान-स्थान पर दिया है । ग्रामीणों तथा नागरिकों के व्यंग-विनोद, हास- परिहास के वर्णन में उसकी काव्य कला अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पर पहुँच जाती है । इस प्रकार वह प्रमाणित करता है कि वह कवि प्रथम तत्पश्चात् इतिहासकार था । कल्हण लेखन-कला में परिपक्व बुद्धि का प्रौढ व्यक्ति था । युवक लेखक कल्पना सागर में तैरने का अधिक प्रयास करता है । कल्हण ने घटना सागर में गोता लगाकर एक प्रौढ सन्तुलित व्यक्ति के समान रत्नों को निकालकर घटनाओं को क्रमबद्ध किया है । अत्याचार, अनाचार, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, गृहसंघर्ष, अराजकता आदि कटु किन्तु वास्तविक घटनाओं के मध्य गुजरने के कारण उसका उर्वर मस्तिष्क राज- तरंगिणी जैसे काव्य को प्रस्तुत करने के लिए परिपक्व हो गया था । उसने अपने समय की अनुभूतियों को गाथा में पिरो दिया है ।

[ ३५ ] कल्हण ने तत्कालीन समाज का वर्णन करते हुए समाज की आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला है । टंकणित मुद्रा, दीनार, कर-प्रणाली, करों का नाम, राजस्व, कृषि, उद्योग-धन्धा, वाणिज्य, व्यवसाय, के वर्णनो के साथ अकाल, उपल वृष्टि, तुहिनपात, उनका काश्मीर के समाज पर पड़ते प्रभाव का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है । कल्हण ने उत्सवों, यात्राओं, परम्पराओं आदि का संक्षिप्त वर्णन किया है। समाज में पुराण पाठ, कविता पाठ एवं नाटक होते थे । नट, चारण, (रा० १ : २२२) कुम्भदास (पानी भरने वाले) (रा० ३ : ४५६) मुण्ड (रा० १ : २३३) शश्यपाल (रा० १ : २३२) मान्त्रिक (रा० १ : २३४) नैष्ठिक (रा० १ : २३६) कंचुकी (रा० १ : २९५) चर (रा० १ : २५०) गुप्तचर (रा० ३ : १५६) विज्ञदूत (रा० ३ : १५६) भृत्य (रा० १ : २४७) धात्री, (रा० १ : ७७) कुम्भकार, यामिक (रा० ३ : १७३) दूत (रा० ३ : १८८) राजीव जीवो (रा० ३ : १९८) राजदासी (रा० ३ : १५६) अश्वघास कायस्थ (रा० ३ : ४८९) कुट्टनी, विट, गायक, नर्तक आदि का वर्णन उनके कर्मों के साथ किया है । वाद्यों में वीणा, (रा० २ : १२६) पटह (रा० २ : १६८) वेणु (रा० २ : १६७) मृदंग, शंख, घण्टा, सुगन्धियों में, चन्दन, कपूर, धूप, केसर, का प्रयोग किया जाता था । पाणि स्पर्श द्वारा आशीर्वाद, साधुवाद एवं कृतज्ञता प्रकट करने की प्रथा थी । (रा० ३ : १८२) प्रतिज्ञा पालन, वचन- बद्धता पर जोर दिया जाता था । (रा० १ : २४३, ३ : १८२, ४२५) कल्हण ने विटो की बहुत निन्दा की है। (रा० २ : ६७-७०) कृषि मुख्य उद्यम था । अरघट, कुल्या (नहर) आदि से सिंचाई होती थी । अरघट अर्थात् रहट काश्मीर में अति प्राचीन काल से प्रचलित था । जिससे विश्व अपरिचित था । यह प्रथा परसियन व्हील के ऐतिहासिक काल से भी प्राचीन थी । कल्हण यन्त्र का उल्लेख करता है । यह वर्तमान काल के क्रेन के समान शिला उठाने का यन्त्र था । (रा० १ : १६३) कूप यन्त्र का भी कल्हण ने उल्लेख किया है । (रा० १ : २८४) यह रस्सी का बना होता था । रस्सी चक्र के ऊपर से आती जाती थी । लोग कागड़ी अर्थात् हसन्ती किंवा अंगार धानी का आज के समान उपयोग करते थे । (रा० ३ : १७१) महिलायें नील निचोल (रा० २ : २४७) तथा कंचुकी (रा० २ : २९४) पहनती थी । मूर्धा पर दीपशिखं रखती थी । (रा० १ : २४७) बालक काक पक्ष्छ लगाते थे । (रा० १ : ८१) स्त्रियाँ नूपुर, स्वर्ण सूत्र, धारण करती थी । पुरुष गण मस्तक स्थित मणि, (रा० २ : १६५) मुकुट में मुक्ता । रा० ३ : ५२९) धारण करते थे । महिलायें यावक अर्थात् आलता लगाती थी । (रा० ३ : ४१५) वे श्रृंगार करती थीं । श्रृंगार में केसर, चन्दन, चूर्ण, पुष्प एवं सुगन्धियों का उपयोग किया जाता था । पुरुष उष्णीष धारण करते थे । धौत वस्त्र पवित्रता का प्रतीक था । (रा० २ : १६१) रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों का प्रचलन था । रुई के वस्त्रों का उल्लेख कम मिलता है । काश्मीर में रुई नही होती थी । रुई का वस्त्र भारत के अन्य भागों से काश्मीर में आता था । हेम पादांकित (रा० २ : ३००) मार्तण्ड प्रतिमांकित समुद्रदेव वस्त्रों (रा० १ : २९९) का उल्लेख मिलता है । वे सिंहल से काश्मीर में आते थे ।

[ ३६ ] खान-पान ऋतु तथा जलवायु के अनुसार होता था। सत्तू, कच्चगुच्छ, घृत, मधु, दुग्ध, शाली, गोधूम, तथा विभिन्न अन्नों के पकवान बनते थे। साधारण जनता शाली, शाक, कमल जड़ तथा सस्ती तरकारी खाती थी। ब्राह्मणों के अतिरिक्त जनता आमिष भोजी थी। भूना मांस खाने की प्रथा थी। व्यापारी वर्ग मदिरा का आदी था। पर्वों तथा त्योहारों पर मदिरा पान होता था। मदिरा विक्रय का वर्णन उत्सवों पर मिलता है। हल्की सुरा बर्फ के साथ शीतल कर पी जाती थी। फलों में प्रायः वे सभी फल होते थे जो आज कल वहाँ होते हैं। शहतूत, अनार, बादाम, सेब, खुबानी, सतालू, बम्बू गोशा, नाशपाती, अखरोट खूब मिलते थे। आम का अभाव था। ब्राह्मणों के लिये लहसुन एवं प्याज का प्रयोग वर्जित था। (रा० १ : ३४७) राजकीय चिह्न, छत्र (रा० ३ : ६२) ध्वजा, (रा० ३ : ७७) तथा पार्श्वध्वज (रा० ३ : ७८) थे। राजा मुकुट धारण करते थे। काश्मीर में भुवन रचना लकड़ी तथा पाषाण से होती थी। पाषाण वेश्म का अत्यधिक उल्लेख मिलता है। (रा० १ : ८६) काश्मीर के ध्वंसावशेषों में लगे विशालकाय शिला- खण्डों को देखकर आश्चर्य होता है। उनके उठाने तथा रखने के लिए यन्त्रों का प्रयोग किया जाता था। भवनों के अनेक वर्ग थे। विद्या वेश्म आधुनिक स्कूल एवं कालेजों के समान थे। सौंध (रा० १ : २४६) नाग भवन (रा० १ : २५७) हर्म्य (रा० २ : १३५) गुहागृह (रा० २ : १६५) नदवन (रा० ३ : ११) के निर्माण आदि का उल्लेख मिलता है। राजभवन के अन्तःपुर का नाम शुद्धान्त था, जहाँ रानियां रहती थीं। (रा० ३ : ४३६, ५०६) सार्वजनिक निर्माणकार्यों को बहुत महत्व दिया जाता था। कृषि उपयोगी भूमि, सिंचाई व्यवस्था के लिए कुल्या बनाने का कई स्थलों पर वर्णन किया गया है। सुवर्ण मणि कुल्या (रा० १ : ९७) चन्द्र कुल्या (रा० १ : ३१८) अपगा (रा० १ : ३२९) के अतिरिक्त सेतु एवं बाँध बनाने का उल्लेख मिलता है। जल की गति तथा स्रोतस्विनियों की गति नियन्त्रित करने के लिए सेतु निर्माण किये जाते थे। दामोदर सूद (रा० १ : १५७) गुहसेतु (रा० १ : १५६) पाषाणमय सेतु (रा० १ : १५९) उनके कुछ उदाहरण हैं। ब्राह्मण उपनिवेश : अस्पृश्यता काश्मीर में नहीं थी। जाति-पाँत का बन्धन अत्यन्त शिथिल था। परस्पर विवाह संबंध होते थे। राजाओं ने डोम्ब कन्या तथा वैश्य जाति की महिलाओं से विवाह किये थे। डोम्ब कन्या भी काश्मीर की महारानी हुई है। (रा० ५३८) काश्मीर के सिंहासन को इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न सन्तानों ने सुशोभित किया है। राजा भी काश्मीर में निम्न वर्ग कल्यपाल तक हुए हैं। (रा० ३ : ४८८; ४ : ६७९; ७१६) उनका विवाह भी राजकुलों में हुआ था। ब्राह्मण वर्ग ने निस्सन्देह अपना अभिजात कुल बनाये रखा था। काश्मीर में जाति-पात का बन्धन अत्यन्त कुंचनीय था। प्रत्येक नागरिक समाज का उसी प्रकार अंग था जैसे अन्य। जन्मना वर्ण के आधार पर किसी पर कभी आक्षेप काश्मीर में नहीं किया गया था। उसने सहि- ष्णुता का सर्वदा परिचय दिया है। जो जाति काश्मीर में आयी वह वहीं आत्मसात हो गयी। केवल मुसलमान इसके अपवाद थे। ललितादित्य का तुषार (तुर्क) मन्त्री था। (रा० ४ . २१) गैर काश्मीरी होने के कारण किसी का कभी अविश्वास किया अनादर नहीं किया गया था। मेघवाहन का गुरु स्तोन्पा गैर काश्मीरी था। परन्तु उसके लिए अत्यन्त आदर एवं श्रद्धालु शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है। (रा० १ : १०)

[ ३७ ] मिहिरकुल हूण था । कनिष्क कुषाण था । किन्तु उनकी जाति के कारण उनसे भेदभाव नहीं किया गया था । कश्मीर के हिन्दू इस दिशा में शेष भारत से जात-बन्धन में कुंचनीय, उदार एवं सहिष्णु थे । इसका कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव था, जो जाति-पाँत एवं वर्णधम में विश्वास नही करता था । ब्राह्मणों में निःसन्देह अपनी जाति के एवं वर्ग के लिए कट्टरता थी । कल्हण काश्मीरी ब्राह्मण था । उसके लिए उसे गर्व था । वह अपना रक्त शुद्ध रखना चाहता था । दूसरे ब्राह्मणों मे भी यही अपेक्षा करता था । काश्मीरी ब्राह्मणों को इस कट्टरता के कारण वहाँ ब्राह्मणो के चार उपनिवेश बन गये थे । राजा मिहिर कुल ने आर्य देशीय ब्राह्मणो को कश्मीर में लाकर आबाद किया था । ( रा० १ : ३१३ ) इसी प्रकार राजा मेघवाहन ने देशीय भिक्षुओं के भोग हेतु अनेक पुण्य कार्यों को किया था । ( रा० ३ : ९ ) कश्मीर में वर्ण-व्यवस्था बौद्ध प्रभाव के कारण लुप्त हो गयी तो राजा जलौक ने कान्यकुब्ज प्रदेश से व्यवहारविद् चातुवर्ण के लोगो को कश्मीर लाकर आबाद किया था । ( रा० १ : ११७ ) कल्हण ब्राह्मणों के चार उपनिवेशों का उल्लेख करता है । राजा गोपादित्य ने आर्य देशीय द्विजों को अग्रहार दानकर गोपादद्रि के मूल में गोप अग्रहार स्थापित किया था । ( रा० १ : ३४१ ) दूसरा उप- निवेश पुण्य देशीय ब्राह्मणों का था । यह वश्विक नामक स्थान मे था । ( रा० १ : ३४३ ) तीसरा उप- निवेश भूक्षीर वाटिका में था । यहाँ पर गोपादित्य ने लहसुन भोजी ब्राह्मणो को समस्त काश्मीर मण्डल से एकत्रित कर उनका एक अलग उपनिवेश बना दिया था । उन्हें समाज से एक प्रकार से बहिष्कृत कर दिया गया था । चौथा ब्राह्मणो का उपनिवेश खासटा स्थान में था । यहाँ पर आचरणहीन ब्राह्मणों को बसाया गया था । ( रा० १ : ३४२-३४५ ) महिलाओं का स्थान : कल्हण ने सती नारियों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा एवं असतियों के प्रति घृणा प्रकट की है । ( रा० १ : २७२, ३००, ३२१ ) काश्मीर में सती प्रथा प्रचलित थी । प्रथम सती रानी वाक्पुष्टा थी । ( रा० २ : ४४, ५५, ५६ ) सती प्रथा को कल्हण प्रोत्साहन नही देता । कालान्तर में यह प्रथा जोर पकड़ गयी और उसका दुरुपयोग होने लगा । ( रा० ५ : २२५७ : १०३, ४७८ ) कल्हण महिलाओं के अधिकार तथा कर्तव्य पर जोर देता है । वह स्त्रियो को जननी मानता है, माता मानता है, प्रकृति का एक अंग मानता है। यह विष्णु की विशेष प्रशंसा इसलिये नहीं करता कि उनका स्वरूप एकांगी है । वह केवल पुरुष शक्ति के प्रतीक हैं। वह अर्धनागेश्वर की सर्वदा वन्दना इसलिए करता है कि ये नर एवं नारी, किंवा पुरुष एवं प्रकृति दोनों के प्रतीक हैं। कल्हण पुरुष एवं स्त्री दोनों का समाज में समान स्थान मानता है । ( रा० ३ : ४४४ ) काश्मीर में महिलाओं ने शासक, अभिभावक एवं रानी के रूप में सिंहासन को सुशोभित किया है । ( रा० १ : ७०-७२ ) कल्हण उन्हें 'प्रजानाम् मातरम्' जैसे आदर एवं पूजनीय शब्दों से सम्बोधित करता हैं। वे जगत् की, राज्य की माता हैं। कल्हण उन्हें पूज्य एवं आदर की दृष्टि से देखता है । (रा० १ : ७३ ) राजा एवं रानी का जहाँ कल्हण ने नाम लिया है वहाँ गौरी-शंकर, राधा-कृष्ण के समान स्त्रियो का नाम पुरुषों के पूर्व रखा है। यह शैली स्त्रियों के प्रति अत्यन्त आदर प्रकट करने के लिए कल्हण ने अपनायी है । ( रा० २ : ११ )

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के चांचल्य की निन्दा है। जहाँ नारी जाति के कारण उत्तम कार्य हुये हैं वहाँ कल्हण ने उनकी प्रशंसा की है। कितने ही स्थानों पर नारी का चित्रण बड़ा ही मार्मिक हो गया है। राजा युधिष्ठिर के देश त्याग करते समय नारी की मनोभावनाओं का अत्यन्त कारुण्यपूर्ण दृश्य खींचा है। (रा० १ : ३६७-३७३) महाकाव्य : महाकवि कालिदास ने रघुवंश में राजा दिलीप से प्रारम्भ कर रघुवंश के समस्त राजाओं का क्रमशः वर्णन कर सुन्दर महाकाव्य प्रस्तुत किया है। यही बात कल्हण के इस महाकाव्य के विषय में कही जायगी। दोनों में अन्तर इतना ही है कि रघुवंश एक वंश का और राजतरंगिणी एक देश के कई वंशों का वर्णन करती है। यह बहुनायक महाकाव्य है। महाकाव्य के प्रायः सभी लक्षण इस काव्य में मिलते हैं। शान्त रस इसका अंगी रस है। अन्य रस अंग्यभूत होकर आये हैं। काव्य का नाम सारगर्भित होना चाहिए। कल्हण ने राजतरंगिणी नाम रखा है। यह युक्तिपूर्ण है। तरंगों का आवागमन कभी समाप्त नहीं होता। राजा भी सागर की तरंगों के तुल्य आते-जाते रहते हैं, उठते-गिरते रहते हैं। तरंगें कभी उत्ताल होती हैं, कभी गर्जन करती हैं और कभी शान्त हो जाती हैं। यही दशा राजाओं की है। काव्य के सभी गुण, रस, अलंकार, छन्द, पद लालित्य का समावेश इस उत्कृष्ट महाकाव्य में हो गया है। कल्हण अपने काव्य में केवल कल्पना पर उड़ा नहीं है। वह उस पंछी की तरह नहीं उड़ता, जो डार-डार, पात-पात उठता-बैठता रहता है। वह अनन्त में, ओर-छोर हीन विश्व में, कल्पनामय जगत में अनायास नहीं उड़ता। वह इस जगत में, इस लोक में, साशय उड़ान लेता है। उसने काव्यमय इतिहास में कल्पना के स्थान पर लौकिक घटनाओं का निबन्धन किया है (रा० १ : ४६, ४७) उसके पद में लालित्य से आरम्भ होता है। उसमें सरलता है। प्रचलित शब्दों का प्रयोग है। वह जैसे-जैसे रचना करता अग्रसर होता है, उसके काव्य में सरलता लुप्त होने लगती है। अप्रचलित शब्दों की प्रचुरता बढ़ जाती है। यह सरल, हृदय कवि था। उदार था। उसके हृदयस्थल में कवियों के लिए आदर था। कवि उत्तम रचना करता है। दुष्टल वर्णन नहीं करता इसे उसने बलवती भाषा में लिखा है। (रा० १ : ३, ४, ५, ४५-४७) प्रसंग आते ही काश्मीर के कवियों का और भारत के अन्य प्रदेशों के कवियों का नाम आदर के साथ लिया है। उसने अनेक राजाओं, उनके समय में हुए कवियों, उनके काव्यों, तत्कालीन विद्वानों, दार्श- निकों का वर्णन उनके अनुरूप आदर के साथ किया है। उसने भारत एवं काश्मीर की परिस्थितियों का अध्ययन किया, उनके रचना-काल का निर्णय किया और उन्हें यथास्थान रखकर काश्मीर के साहित्यिक इतिहास के साथ राजनीतिक इतिहास को प्रस्तुत किया है। (रा० १ : १७८; २ : १६; ४ : १४४, ४४८, ४९५, ७०५, ५ : २८-३२; २०४) राजतरंगिणी के रूप में कल्हण कोरे इतिहास के स्थान पर एक सुन्दर महाकाव्य उपस्थित करता है। रसों का सुन्दर परिपाक होने के कारण पाठक उसे पढ़ता क्लान्त नहीं होता। उसके वर्णन में नवीनता प्राप्त होती है। अलंकारों की छटा यथावसर देखने को मिलती है। उपमा एवं अलंकारों का प्रयोग ठीक लगता है। पाठक उनमें नवीनता एवं मौलिकता का बोध करके काव्य-वीथियों में रमता है। उसने उपमाओं को शब्द-जाल में लपेट कर, सुन्दर किन्तु प्रानहीन पदों में पाठक को नहीं उलझाया है। उसने यथाशक्ति इस महाकाव्य में आख्यान एवं नवीन विचार रखने की शैली का अनुकरण किया है। (रा० ३ : ४१६)

[ ४१ ] अलंकारों के प्रयोग में उसने संयम का परिचय दिया है, नियन्त्रण रखा है । गुणहीन पदावलियों से वह विरत रहा है। किस अवसर पर, किस प्रकार, किस अलंकार को उत्कृष्टतापूर्वक एक कुशल कवि के समान प्रयोग करना चाहिये, इसमें उसने अधिक कुशलता प्राप्त की है। उसने विषयानुसार भाषा एवं छन्दो का प्रयोग किया है। शृङ्गार वर्णन में, ऋतु वर्णन में, उसने प्रकृति के साथ मानव-प्रकृति को मिलाते हुए; आध्यात्म एवं दर्शन का अद्भुत समन्वय किया है। ( रा० १ : ६, २८, २०६; ३ : ४१४, ५ : ३४३, ३६१; ७ : ९२८, १५५७; ८ : ८४२, ६४७, १३३४ ) कल्हण लौकिक वर्णन करता है। काश्मीर के बाहर का वर्णन उसने केवल ऐतिहासिक घटनाओं की शृङ्खला को विशृङ्खलित न होने देने के लिये किया है। लौकिक वर्णन होते भी उसका काव्य कहीं एक सुरा नहीं होने पाया है। उसने अलंकारों की पुनरावृत्ति नहीं की है। यदि वही अलंकार पुनः आता है, तो कुछ दूसरा ही रूप धर कर । इसलिये उसके काव्य का प्रत्येक चरण, प्रत्येक पद ताजी हवा की तरह सर्वदा स्फूर्तिमय, प्राणमय रहता है। काव्य अलंकारमय होते हुए भी अलंकारों से बोझिल नहीं है। अलंकारों का उपयोग वर्ण्य विषय को सुस्पष्ट तथा उसमें और बल लाने के उद्देश्य से किया गया है। अस्पष्टता का नितरा अभाव है। पदों में, शब्द गठन में, गतिशीलता है। वे अत्यन्त संक्षिप्त न होकर सरल एवं वर्णनात्मक हैं। उनमें सौन्दर्य एवं कला का प्रभाव चिर नूतन, निर्मल, अवलान्त, स्रोत जल कण तुल्य हैं। वह भ्रान्त मन, म्लिन मन, उदास मन में स्फूर्ति उत्पन्न करता है ! पुरातन कवि काव्य-परम्परा का अनुकरण करता, आरम्भ एवं अन्त में छन्द बदल देता है। महा- काव्यों का यह लक्षण है। अन्त में छन्द का परिवर्तन कर देना चाहिये। दृश्य, रस एवं घटनाओं के अनुरूप कल्हण छन्द बदल देता है। महाकवि बाण तथा बिल्हण में यत्र-तत्र प्राप्त होती कृत्रिमता का किसी स्थल पर बोध नहीं होता । उसने लम्बे-लम्बे समासों में जैसे तरंगों को बाँध रखा है। कल्हण की दृष्टि निरपेक्ष है। उसे आलोचनात्मक प्रखर बुद्धि प्राप्त थी । किन्तु उसने राग-द्वेष रहित होकर, ग्रन्थ-रचना की है। कल्हण जैसा इतिहासकार अठारहवीं शताब्दी के पूर्व विश्व में नहीं हुआ है। उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा प्रवाहित होती, पाठक के मानस को शान्त करती है। उसके काव्य में वही स्फूर्ति दिखायी देती है, जो वाल्मीकि की रामायण एवं व्यास के महाभारत में है। उसके पदों में क्षण-क्षण नवीनता, मौलिकता प्रवेश करती रहती है। बाण का हर्ष चरित, विल्हण का विक्रमांक देव चरित, राजाश्रय में पूषित काव्य है। कल्हण का काव्य एक स्वतंत्र चिन्तक का काव्य है जिसे उसने देश-भक्ति की भावना से प्रेरित होकर लिपिबद्ध किया था । उसके काव्य का प्रयोजन किसी राजा, किसी दाता को प्रसन्न करना नहीं था। किसी राजसभा में, किसी प्रासाद में बैठकर उसने चिन्तन नहीं किया था। उसकी कल्पना, उसका चिन्तन श्रीनगर से दूर, राज्या- श्रय से दूर, राज छाया से दूर, परिहास की प्राकृतिक सुषमा में, अपने घर में, अपने ही साधनों से, अपने अर्जित धन से, जीवन यापन करते लिखी गयी जगत की, सरस्वती के एक एकान्त उपासक, स्वावलम्बी मानव की स्वाभिमानी मानव की रचना है। कालिदास, भवभूति, विल्हण, बान सदृशो राज्याश्रय प्राप्त था। सबने राज्यान्न खाकर काव्य रचना की थी । कल्हण एक मात्र महान काव्यकार है, जो राजान्न द्वारा वर्धित नहीं हुआ था। इस दिशा में वह कालिदास आदि से बहुत आगे है। उसका उद्देश्य अपने देश में सर्व ६

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युग लाना था, जन-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना था, राजाओं का सुधार करना था, उन्हें जन-जीवन से मिला देना था । कल्हण की रचना में सहज सौन्दर्य है, जिसका विल्हण की रचना में अभाव खटकता है । ठीक कहा गया है कि कल्हण ने अपने काव्य दर्पण को इतना निर्मल, स्वच्छ एवं रमणीय रखा है कि उसमें विल्हण की प्रौढ़ शैली सद्यः प्रतिबिम्बित होतो है । कल्हण की शैली सौन्दर्य पूर्ण है। प्रकृति का उसमें प्राकृ- तिक चित्रण है। यह चित्रांकन सुश्लिष्ट है । (रा० ८ : ३१६१-६२, १३३४-१३३८) चरित्र चित्रण में कल्हण ने क्षमता का परिचय दिया है । आलोच्य स्थान पर निष्पक्ष आलोचना की है । जनजीवन से सम्पर्क बनाये रखा है । किसी के स्नेह एवं घृणा से अपने को दूर रखा है। एक स्थेय तुल्य वह चरित्र चित्रण करता है। उसका यह चित्रण, जलोक, मिहिरकुल, हर्ष, कलश, सन्धिमति, दिद्दा एवं देवी वाक्पुष्टा में निखर उठा है । उसके काव्य में वैदिक, बौद्ध एवं संस्कृत महान रचनाकारों की संवाद-परिसंवाद शैली का दर्शन मिलता है। (रा० ३ : १६१, १८३ : ७ : ४२३, १२८१, १४१६, १३- ८६; ८ : २६१३, ३२१६) काव्य के माध्यम से कल्हण ने इतिहास लिखा है । (रा० १ : ६) उसने इतिहास एवं काव्यकार को मिला दिया है । उसने कथावस्तु के विस्तार के कारण अलंकार की विचित्रता का अनेक स्थलों पर प्रयोग नहीं किया है। युधिष्ठिर का राज्य त्याग, जयापीड का अन्त, चक्र वर्मन का प्रवेश, अनन्त की शव यात्रा, राजा हर्ष का राज्य त्याग, हर्ष का अन्तिम काल, सुस्सल का श्रीनगर आगमन एवं भिक्षाचर का अन्तिम युद्ध इसके उदाहरण हैं। (रा० १ : ३६६; ४ : ६४०; ५ : ३४१; ७ : ४६१; १६००-१७१४; ८ : ९४७, १७४०) कल्हण के पदों में संस्कृत-गद्य का रस मिलता है। पद्यात्मक होते भी कही-कही गद्यात्मक शैली हो गयी है। उसकी कथनात्मक शैली अत्यन्त नाटकीय एवं सशक्त है । राजा जयापीड का अन्त एवं वार्ता- लाप नाटकीय शैली का उदाहरण है। ( रा० ४ : ६४० ) ऐतिहासिक काव्य को नीरसता से बचाने के लिये कल्हण ने अलंकार, व्यंग तथा उक्तियों का आश्रय लिया है। उसके अधिकांश रूपक मौलिक हैं, संस्कृत साहित्य को उसकी देन हैं। (रा० ६ : २०१, ७ : १०६६, १२२४, ८ : १३४, २५८६, २६३५, २५२०, २५६०, २७४७) महाकाव्य राज तरंगिणी में दुस्सह स्थल भी है। दुरुहताओं एवं जटिलताओ का कुछ कारण शैलीगत भी है । जैसे दुर्लभ लौकिक एवं अप्रचलित शब्दों का प्रयोग है । काव्यात्मक सन्दिग्धता ऐसे स्थलो पर बढ़ गयी है । ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में जटिल राजनीतिक परिस्थितियों तथा उनके वर्णन में इस प्रकार के स्थल मिलेंगे । उसने राज कुचक्र, दरबारी जीवन, घटनाओ के वर्णन का जितना प्रयास किया है, उतना ही उन स्थलों पर उसके अभिप्राय को समझना कठिन हो गया है । ऐसे स्थल अलंकृत काव्य शैली में वर्णित है । सप्तम तथा अष्टम तरंग में ऐसे स्थल बहुत मिलते हैं । कारण स्पष्ट है । उन में उल्लिखित व्यक्ति या तो उस समय जीवित थे अथवा कुछ ही वर्ष पूर्व दिवंगत हो चुके थे, जिन्हें लोग उनकी जीवन घटनाओ के साथ जानते थे । कल्हण ने इन स्थलो पर व्यंगात्मक शैली का आश्रय लिया है। (रा० ३ : १८१, ४ : ६१५-६३७, ७ : ११२३) पुनरुक्ति दोष से अपने काव्य को बचाने का प्रयास कल्हण ने किया है । तथापि भूल से कहीं-कही पुनरुक्तिया आ गयी है। ग्रन्थ के अन्तिम चरण के छन्द उच्चकोटि के नही हैं । उनमें साधारण पुनरुक्तियाँ परिलक्षित होती हैं । स्थान-स्थान पर पाठकों का शैथिल्य दूर करने के लिए अलंकृत एवं आकर्षक पदों की रचना की गयी है ।

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[ ४३ ] कल्हण ने यह महाकाव्य विशेष रूप से अपने समकालीन जनों के लिए लिखा था। इसीलिये कुछ स्थलों पर उसने नवीन पात्रों का प्रवेश लम्बे षड्यन्त्र, विद्रोहादि का चित्रण बिना उचित पृष्ठभूमि के कर दिया है। ऐसे स्थलो को बिना पूर्वापर का ज्ञान हुये, समझने में कठिनता होती है। कल्हण का यह इतिहासात्मक काव्य साधारण जनता की अपेक्षा संस्कृत के विद्वानों एवं पण्डितों के लिए विशेषतः लिखा गया था। कल्हण भूतकाल का सुस्पष्ट वर्णन करता है। उसने भविष्य के इतिहास-लेखक एवं विचारकों के लिए उपदेशक का कार्य किया है। कल्हण स्वयं स्वीकार करता है कि उसने विचित्र घटनाओं का विस्तृत समावेश कथा-विस्तार के कारण न कर यत्र-तत्र रुचिकर कथानकों को लिखा है। (रा० १ : ६) राजतरंगिणी राजकथा महा- काव्य है, इसमें रोचक, विचित्र तथा चमत्कारिक कथाओं का समावेश किया गया है। इस खण्ड में वर्णित रोचक कथानक है—नाग भार वहन (रा० १ : ११४) घटेश्वर लिंग (रा० १ : १९४) सुधवा नागकन्या (रा० १ : २०७) ब्राह्मण बालक (रा० ३ : ६३) भ्रमर वासिनी (रा० ३ : ३९४) रणारम्भा (रा० : : ४३१) गिरिसुता विवाह (३ : ४४३) और रावण पूजित लिंग (रा० ३ : ४४७)। पौराणिक शैली पर वर्णित कथायें—दैत्य रमणियो से भोग (रा० ३ : ४६९) जलभेदन (रा० ३. ४५८) नागों की अलौकिक शक्ति (रा० १ : २५८) है। चमत्कारिक कथायें—वितस्तावतरण (रा० १ . १६०-१६६) चन्द्रावती का शिला हटाना (रा० १ : ३२१) सूखा में भी वृक्षों का हरित होना, (रा० २ : १५) गतप्राण कपोत पात (रा० २ : ५०) सन्धि मति का पुनरुत्थान (रा० २ : १०५) समुद्र स्तम्भन (रा० ३ : ६९) रणस्वामी, रणेश्वर स्थापना (रा० ३ : ४५७) है। विचित्र कथायें—रणा- रम्भा का भ्रमरी रूप धारण (रा० ३ : ४३८) गर्भ मण्डूक (रा० ३ : ४४२) खेचरो का स्मरण (रा० ३ : ४५०) है। चमत्कार, विचित्र एवं रोचक मिश्रित कथायें—नाग द्वारा हिम वर्षा ! (रा० १ : १७९) अश्व पर पाणि प्रहार (रा० १ : २४६) नगर सहित राजा का नाश (रा० १ : २५६) पाषाण वृष्टि (रा० १ : २६५) वरुण आगमन (रा० ३ : ५२) तल्प पर स्त्री स्वरूप बना देना आदि (रा० ३ : ४३८) हैं। कथानकों के कारण राजतरंगिणी महाकाव्य के साथ सामान्य जनता के लिए भी रुचिकर, मनोरंजन- सामग्री बन गयी है। कल्हण ने काव्य को सर्वप्रिय बनाने के लिए ग्रन्थ में अलौकिक कथाओं के अतिरिक्त अन्य कथाओं का भी समावेश किया है। उनमें नाग-मेघ (रा० ३ : २१) कामिनी स्त्री (रा० ३ : ५०१) काम संगम ज्ञान (रा० ३ : ५०८) नारी भर्त्सना (रा० ३ : ५०१-५२१) तथा वैराग्य (रा० ३ . ५२५) आदि है। काल गणना : कल्हण की काल गणना एक समस्या है। अनेक विद्वानों ने उसे सुलझाने का प्रयास गत शताब्दी के प्रारम्भ से किया है। सर्वश्री विल्सन, कनिंघम, स्टोन, ट्रायेर, एस० पी० पण्डित आदि ने हल निकालने का स्तुत्य प्रयास किया है। परन्तु अभी तक सफलता नही मिली है। मैने काशी में विद्वानों से निकट सम्पर्क स्थापित किया। परन्तु किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका। तरंग प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा कुछ तरंग चतुर्थ की गणना त्रुटिपूर्ण है। चतुर्थ तरंग में जयापीड के पश्चात् काल गणना सुधरती दिखायी देती है। जयापीड का समय लौकिक सम्वत् ३८७९ तथा कल्हण का समय लौकिक सम्वत् ४२२५ अर्थात् सन् ११४६-११५० है। तरंग पंचम और षष्ठ की काल गणना के साथ घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन है। षष्ठ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण को काल गणना ठीक होने लगी है। वह राजाओ का अभिषेक