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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

५४८ राजतरंगिणी हेतुंस्तुदीर्य विविधानमन्वानं पराजयम् । सप्त वारान्स तत्याज जित्वा मुम्मुनिभृभुजम् ॥ ३३२ ॥ ३३२. विविध हेतुओं को कहकर पराजय न मानने वाले राजा मुम्मुनि' को सात बार विजित कर उसने छोड़ दिया । उसमें सिंहासन जैसे महत्त्वपूर्ण वस्तुका उल्लेख नहीं मिलता । नादिरशाह भारत का तख्तेताऊस उठा ले गया था । वह ऐतिहासिक घटना हैं। वह ईरान में आज भी मौजूद हैं । एक यह सम्भावना हो सकती है। कश्मीर लकड़ी की नक्कासी के काम के लिये प्रसिद्ध हैं। भारत में आज भी यहाँ से टेबुल, कुर्सी, मेज, दीपदान, तस्तरी, आदि लकड़ी के सामान भारत के बड़े शहरों में बिकते हैं । कश्मीर में भी विक्रमादित्य अथवा उसके पूर्वजों के लिये सिंहासन बनाया गया होगा । वह उज्जैन भेजा गया होगा । किसी देश का सिंहासन विदेश अथवा पर राजा के यहाँ भेजना उसकी पराजय स्वीकार करने के समान हैं । प्रवरसेन ने सम्भवतः यह बात सुनी होगी । उसे बुरा लगा होगा अतएव वह सिंहासन उठा लिया होगा। कश्मीर लकड़ी की कला में प्रवीण समझा जाता था । आज भी उसकी वही ख्याति है । अप्सरा की मूर्ति पत्थरों पर, दीवारों तथा छज्जो के नीचे पत्थरों को सहारा देने के लिये लगायी जाती है। कुर्सियों तथा मेजों के पाया के स्थान पर मछली, सिंह, हरिण, स्त्री की मूर्ति काष्ठ अथवा पत्थर में बना दी जाती है। सिंहासन को देवी महत्त्व देने के लिये अप्सराओं की काष्ठ मूर्तियाँ सिंहासन के पाया के स्थान पर चारो ओर लगा कर सिंहासन को अत्यन्त सुन्दर बना दिया गया होगा । ३३२ (१) मुम्मुनि : यह अभारतीय शब्द हैं। किसी वंश, जाति, किंवा कुल का नाम प्रतीत होता है । ललितादित्य की विजय यात्रा के सन्दर्भ में उनका स्थान तुषार और भोट्ट क्षेत्रों के मध्य कहा गया हैं। तरंग ४ : १६७ तथा ५१६ में मुम्मुनि का उल्लेख कल्हण ने पुनः किया है । श्लोक ४:१६७ से प्रकट होता है । ललितादित्य ने मुम्मुनि को तीन बार परास्त किया था । जयापीड़ के सन्दर्भ में मुम्मुनि का पुनः उल्लेख (त०४.५१६) में कल्हण ने किया हैं। रात्रि में वे चाण्डालों के साथ पहरा देते देखे जाते हैं । तुषार किंवा तुखार प्रदेश वर्तमान बदख्शां हैं। भोट्ट स्थान निस्सन्देह लद्दाख हैं । राजतरंगिणी में भोट्ट शब्द सर्वदा लद्दाख तथा लेह के निवासियों के लिये प्रयुक्त किया गया हैं। मुम्मुनि को दरद जातीय समझना भ्रामक होगा । उनका उल्लेख कल्हण ने सर्वदा अलग एक जाति तथा भू अंचल के रूप में किया है । दरदो तथा मुम्मुनों में भेद किया गया है। उन दिनो हूणों के त्रास के कारण जो कतिपय मूल तुर्क वंशीय लोग थे थे कश्मीर राज्य के उत्तरी सिन्धु उपत्यका में आ गये होगे । इस प्रकार वे कश्मीर के प्रभाव व क्षेत्र में आ गये थे । कल्हण ने तरंग ८:१०९० तथा ८:२१७९ में मुम्मुनि शब्द का उल्लेख किया है। यहाँ मुम्मुनि संगत का भ्राता कहा गया हैं। वह पहले विदेशियों की तालिका में राजपुत्र रूप से रखा गया हैं। वह पर्वतीय राजा था । राजा सुस्सल को सहायता किया था । यह मुम्मुनि हिन्दू थे । सम्भव है काबुल के शाही वंश के समान मुम्मुनि भो कश्मीर में आकर बस गये थे । समाज में वे दालो के समान मिल गये-

तृतीय तरंग ५४९ धार्ष्ट्यादथाष्टमे वारे हेतुमाख्यातुमुद्यतम् । धिक्पशून्बध्यतां सोऽमित्यूचे नृपतिः क्रुधा ॥ ३३३ ॥ ३३३. आठवीं बार धृष्टता पूर्वक जब कोई कारण कहने को उद्यत हुआ तब राजा ने क्रोध पूर्वक कहा—'पशु को धिक्कार है इसे बाँधो।' अवध्योऽहं पशुत्वेन वीरेत्युक्त्वा भयोत्सुकः । मध्येसभं ननर्तास्य सोऽनुकुर्वन्कलापिनम् ॥ ३३४ ॥ ३३४. भयभीत वह 'ओ वीर ! पशु होने के कारण अवध्य हूँ।' यह कहकर सभा मध्य मयूर सदृश नृत्य करने लगा । नृत्तं केकां च शिखिनो दृष्ट्वाऽस्मै द्रविणं नृपः । अभयेन समं प्रादात्तालार्थचरणोचितम् ॥ ३३५ ॥ ३३५. नृप ने मयूर¹ की केका वाणी (सुन) एवं नृत्य देखकर इसे अभय के साथ नर्त्तकोचित द्रव्य प्रदान किया । वसतोऽस्य दिशो जित्वा नप्तुः पैतामहे पुरे । कर्तुं पुरं स्वनामाङ्क प्रथते स्म मनोरथः ॥ ३३६ ॥ ३३६. दिशाओं को विजय कर, पितामह² के नगर में निवास करते, इस नृप को स्वनामांकित पुर निर्माण करने की अभिलाषा हुई । मुम्मुनि के लिये कुछ विद्वानो ने कहा है कि वे श्लोकसंख्या ३३५ में 'तालाघव' का पाठभेद मोमिन थे । मोमिन मुसलमान थे वह शब्द खलीफा 'तालावध' मिलता है । के समान अमीरुल मोमनीन था । वह तर्क असंगत पादटिप्पणियाँ : है । परन्तु राजतरंगिणी में तीन राजाओ के ३३५ (१) मयूर नृत्य : मुम्मुनि ने मयूर सन्दर्भ में मुम्मियन का नाम आया है । ये प्रवरसेन नृत्य किया । यह कुछ विचित्र मालूम होता है । (३१८६ लौ० सं०) ललितादित्य (लो०३७७६सं.) सम्भव है मुम्मुनि वंश किया गोत्र अथवा जाति मे तथा जयापोड (लौ०३८२८सं०) थे । उनके काल मयूर नृत्य प्रचलित हो या उसके यश की विशेषता में शताब्दियो का अन्तर है । अतएव मुम्मुनि कोई रही हो । दक्षिण के लोगो में भरत नाट्यम् एक व्यक्ति नहीं था । अत्यधिक प्रचलित है जबकि उत्तर भारत में कथक एक मत है कि यह शाही तथा खाकान के समान नृत्य । उल्लास काल में मानव अपने मौलिक कोई रहे हो । ललितादित्य ने उन्हें उत्तर में अकृत्रिम रूप में आ जाता है । संस्कार जन्य कार्य सोपार तथा भोट्ट के मध्य जोता था । करना, गान एवं नृत्य अनायास वह करने लगता है । यही भाव इस श्लोक का है । पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या ३३३ में 'पशून्च' का पाठभेद श्लोक संख्या ३३६ में 'प्रयते स्म' का पाठभेद 'पशुचं' मिलता है । 'पप्रथे स' मिलता है । २

५५० राजतरंगिणी रात्रौ क्षेत्रं च लग्नं च दिव्यं ज्ञातुमथैकदा । स वीरो वीरचर्यायां दिर्ययौ पार्थिवार्यमा ॥ ३३७ ॥ ३३७. पार्थिव सूर्य, वह वीर एक बार क्षेत्र एवं दिव्य लग्न ज्ञात करने के लिये रात्रि में वीर चर्या को निकला। गच्छतः क्ष्मापतेस्तस्य मौलिरत्नाग्रबिम्बितः । बभार ताराप्रकरो रक्षार्सर्पपविभ्रमम् ॥ ३३८ ॥ ३३८. गमन करते उस नृपति के मुकुर रत्नों के अग्र भाग में प्रतिबिम्बित तारा निकर रक्षा सर्षप १ तुल्य शोभित हुआ। अथानन्तचितालोकस्पष्टभीमतटद्रुमम् । श्मशानप्रान्ततटिनीं पर्यटन्नाससाद सः ॥ ३३६ ॥ ३३९. पर्यटन करते हुए वह ऐसी सरिता तट पर पहुंचा जहाँ प्रान्त भाग में श्मशान १ था और अनन्त चिताओं के प्रकाश से तटवर्ती द्रुम स्पष्ट (भयंकर) वीभत्स लग रहे थे। पादटिप्पणियाँ : ३३९ (१) श्मशान—कल्हण ने इस स्थान ३३६ (१) पितामह-नगर—यहाँ पितामह का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है कि श्मशान कहाँ के नगर से अर्थ पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान के पर है। श्मशान का स्थान श्रीनगर में बदलता लिये पादटिप्पणी श्रीनगर पृ० १३९-१४६ तथा रहा था। किन्तु इतना निश्चय प्रकट होता है कि रा० त० १:१०४; १२९, ३०६; ३:९९; वह स्थान सरितातट पर था। सरिता के उस पार ५:२६७ द्रष्टव्य है। भूत था। जिसे सरिता के इस पार से राजा पाठभेदः श्मशान की चिता-ज्वाला-प्रकाश में देख सकता था। श्लोकसंख्या ३३८ में 'रत्नाग्र' का पाठभेद कल्हण ने तरंग ७ श्लोक ३३९ में राजा 'रत्नाङ्क' मिलता है। उच्चल के दाह स्थान का उल्लेख करता है। यह पादटिप्पणियाँ : स्थान वितस्ता तथा महासरित के संगम पर एक ३३८ (१) सर्षप : पीली सरसो भूत, द्वीप पर था। श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी प्रेतादि बाधा तथा सर्पों को दूर भगाने के लिये मन्त्र तरंग १: सर्ग ५ श्लोक ५४ तथा ५६ में मारी पढ़कर गृह में अथवा सर्पों के स्थान पर फेंका जाता नदी तथा मार्गे वितस्ता संगम का उल्लेख किया है। ताकि बाध्य दूर हो जाय। और सर्पादि भाग है। मारी वितस्ता का जहाँ संगम था वही जायें। जहाँ पीली सरसो नहीं मिलती वहाँ यह श्मशान वर्तमान प्रथम पुल के कुछ नीचे था। साधारण सरसो का ही प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन श्मशान के स्थान का निश्चित कश्मीर में रिवाज है कि सरसो बालको को पता श्रीवर के उल्लेख से मिल जाता है। महासरित टोंपी के कपड़ो के नीचे रखकर सी दिया जाता है। वितस्ता संगम, प्रतीत होता है, कालान्तरमें मारी बच्चों को नज़र के साथ ही साथ प्रेत बाधा आदि संगम के रूप में व्यवहृत होने लगा था। कुछ नहीं लगती। वह पुरानी मान्यता है। विद्वानो का विचार है कि मारी, मर, महासरित,

तृतीय तरंग ५५१ ततस्तस्य सरित्पारे मुक्तसंरावमग्रतः । ऊर्ध्वबाहु महद् भूतं प्रादुरासीन्महीजसः ॥ ३४० ॥ ३४०. तदनन्तर उस महौजस के सम्मुख नदी के पार ऊर्ध्व बाहु चीत्कार करता हुआ महान् भूत प्रादुर्भूत हुआ। नृपतिस्तस्य दृक्पातैर्ज्वलद्भिः कपिशीकृतः । उल्काज्योतिःकृताश्लेषः कुलाद्रिरिव दिद्युते ॥ ३४१ ॥ ३४१. उसके प्रज्वलित दृष्टिपातों से कपिशीकृत नृपति उल्का ज्योतियों से अलंकृत कुलाद्रि तुल्य प्रदीप्त हुआ। तमथ प्रतिशब्देन घोरेणापूरयन्दिशः । अत्रासं विहसन्नुच्चैरुवाच क्षणदाचरः ॥ ३४२ ॥ ३४२. भयंकर प्रतिध्वनि से दिशाओं को व्याप्त करते हुए क्षणदाचर १ ने उच्चाहास कर निर्भय नृपति से कहा— संत्यज्य विक्रमादित्यं सत्त्वोद्रिक्तं च शूद्रकम् । स्वां च भूपाल पर्याप्तं धैर्यमन्यत्र दुर्लभम् ॥ ३४३ ॥ ३४३. 'भूपाल ! विक्रमादित्य, सत्त्वशाली शूद्रक' एवं आपके अतिरिक्त अन्यत्र पर्याप्त धैर्य दुर्लभ है। वसुधाधिपते वाञ्छासिद्धिस्तय विधीयते । सेतुमेतं समुत्तीर्य पार्श्वमागम्‍यतां मम ॥ ३४४ ॥ ३४४. 'वसुधापते ! इस सेतु को पार कर मेरे पास आओ तुम्हारी वाञ्छा सिद्ध करता हूँ। माहुरी एक ही नदी हैं। परन्तु श्रीस्तीन का मत | निशा में चलने वाला होगा। क्षणदाचर का प्रचलित है कि माहुरी नदी मच्छीपुर परगना की मबुर नदी | अर्थ निशाचर है। राक्षस, निशाचर, क्षणदाचरादि है। माहुरी का उल्लेख नीलमत (१३२०) में | तम शक्ति के प्रतीक हैं। किया गया है। ३४३. (१) शूद्रक : विक्रमादित्य के समान ३४२. (१) क्षणदाचर : क्षणदा का अर्थ रात्रि | शूद्रक भी लोक साहित्यिक नायक है। कथा सरित्सा- किंवा निशा होता है। क्षणदाचर का अर्थ रात्रि किंवा | गर (७८:५) द्रष्टव्य है।

५५० राजतरंगिणी रात्रौ क्षेत्रं च लग्नं च दिव्यं ज्ञातुमथैकदा। स वोरो वीरचर्यायां निर्ययौ पार्थिवार्यमा ॥ ३३७ ॥ ३३७. पार्थिव सूर्य, वह वीर एक बार क्षेत्र एवं दिव्य लग्न ज्ञात करने के लिये रात्रि में वीर चर्या को निकला। गच्छतः क्ष्मापतेस्तस्य मौलिरत्नाग्रबिम्बितः । बभार ताराप्रकरो रक्षासर्षपविभ्रमम् ॥ ३३८ ॥ ३३८. गमन करते उस नृपति के मुकुर रत्नों के अग्र भाग में प्रतिबिम्बित तारा निकर रक्षा सर्षप१ तुल्य शोभित हुआ। अथानन्तचितालोकस्पष्टभीमतटद्रुमाम् । श्मशानप्रान्ततटिनीं पर्यटन्नाससाद सः ॥ ३३६ ॥ ३३९. पर्यटन करते हुए वह ऐसी सरिता तट पर पहुंचा जहाँ प्रान्त भाग में श्मशान१ था और अनन्त चिताओं के प्रकाश से तटवर्ती द्रुम स्पष्ट (भयंकर) वीभत्स लग रहे थे। पादटिप्पणियाँ. ३३९ (१) श्मशान-कल्हण ने इस स्थान ३३६ (१) पितामह-नगर- यहां पितामह का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है कि श्मशान कहाँ के नगर से अर्थ पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान के पर है। श्मशान का स्थान श्रीनगर में बदलता लिये पादटिप्पणी श्रीनवर पृ० १३९-१४६ तथा रहा था। किन्तु इतना निश्चय प्रकट होता है कि रा० त० १:१०४; १२९, ३०६; ३:९९; वह स्थान सरिता तट पर था। सरिता के उस पार ५:२६७ द्रष्टव्य है। भूत था। जिसे सरिता के इस पार से राजा पाठभेदः श्मशान की चिता-ज्वाला-प्रकाश में देख सकता था। श्लोकसंख्या ३३८ में 'रत्नाग्र' का पाठभेद कल्हण ने तरंग ७ श्लोक ३३९ में राजा 'रत्नाङ्क' मिलता है। उच्चल के दाह स्थान का उल्लेख करता है। यह पादटिप्पणियाँ : स्थान वितस्ता तथा महासरित के संगम पर एक ३३८ (१) सर्षप : पीली सरसो भूत, द्वीप पर था। श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी प्रेतादि बाधा तथा सर्पों को दूर भगाने के लिये मन्त्र तरंग १: सर्ग ५ श्लोक ५४ तथा ५६ में मारी पढ़कर गृह में अथवा मपों के स्थान पर फेंका जाता नदी तथा मारी वितस्ता संगम का उल्लेख किया है। ताकि वाध्य दूर हो जाय। और सर्पादि भाग है। मारी वितस्ता का जहाँ संगम था वही जायें। जहाँ पीली सरसो नहीं मिलती वहाँ यह श्मशान वर्तमान प्रथम पुल के कुछ नीचे था। साधारण सरमों का हो प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन श्मशान के स्थान का निश्चित पता श्रीवर के उल्लेख मे मिल जाता है। महासरित वितस्ता संगम, प्रतीत होता है, कालान्तरमें मारी संगम के रूप में व्यवहृत होने लगा था। कुछ विद्वानों का विचार है कि मारी, मर, महासरित,

तृतीय तरंग ५५१ ततस्तस्य सरित्पारे मुक्तसंरावमग्रतः । ऊर्ध्वबाहु महत् भूतं प्रादुरासीन्महौजसः ॥ ३४० ॥ ३४०. तदनन्तर उस महौजस के सम्मुख नदी के पार ऊर्ध्व बाहु चीत्कार करता हुआ महान् भूत प्रादुर्भूत हुआ । नृपतिस्तस्य दृक्पातैर्ज्वलद्भिः कपिशीकृतः । उल्काज्योतिःकृताश्लेषः कुलाद्रिरिव दिद्युते ॥ ३४१ ॥ ३४१. उसके प्रज्वलित दृष्टिपातों से कपिशीकृत नृपति उल्का ज्योतियों से अलंकृत कुलाद्रि तुल्य प्रदीप्त हुआ । तमथ प्रतिशब्देन घोरेणापूरयन्दिशः । अत्रासं विहसन्नुच्चैरुवाच क्षणदाचरः ॥ ३४२ ॥ ३४२. भयंकर प्रतिध्वनि से दिशाओं को व्याप्त करते हुए क्षणदाचर १ ने उच्चाहास कर निर्भय नृपति से कहा— संत्यज्य विक्रमादित्यं सत्त्वोद्रिक्तं च शूद्रकम् । त्वां च भूपाल पर्याप्तं धैर्येमन्यत्र दुर्लभम् ॥ ३४३ ॥ ३४३. 'भूपाल ! विक्रमादित्य, सत्त्वशाली शूद्रक' एवं आपके अतिरिक्त अन्यत्र पर्याप्त धैर्य दुर्लभ है। वसुधाधिपते वाञ्छासिद्धिस्तद्य विधीयते । सेतुमेतं समुत्तीर्य पार्श्वमागम्यतां मम ॥ ३४४ ॥ ३४४. 'वसुधापते ! इस सेतु को पार कर मेरे पास आओ तुम्हारी वाञ्छा सिद्ध करता हूँ । माहुरी एक ही नदी है। परन्तु श्रीस्टीन का मत निशा में चलने वाला होगा। क्षणदाचर का प्रचलित है कि माहुरी नदी मच्छीपुर परगना की मबुर नदी अर्थ निशाचर है। राक्षस, निशाचर, क्षणदाचरादि है। माहुरी का उल्लेख नीलमत (१३२०) में तम शक्ति के प्रतीक हैं। किया गया है। ३४३. (१) शूद्रक : विक्रमादित्य के समान ३४२. (१) क्षणदाचर : क्षणदा का अर्थ रात्रि शूद्रक भी लोक साहित्यिक नायक है। कथा सरित्सा- किंवा निशा होता है। क्षणदाचर का अर्थ रात्रि किंवा गर (७८:५) द्रष्टव्य है।

५५२ राजतरंगिणी इत्युदीर्य निजं जानुं रक्षः पारात्प्रसारयत् । तन्महासरितो वारि सेतुसीमन्तितं व्यधात् ॥ ३४५ ॥ ३४५. ऐसा कहकर राक्षस ने (उस) पार से जानु प्रसारित कर उस महासरित का जल सेतु-विभक्त कर दिया । अङ्गेन रक्षःकायस्य ज्ञात्वा सेतुं प्रकल्पितम् । वीरः प्रवरसेनोऽथ विकाशां क्षुरिकां दधे ॥ ३४६ ॥ ३४६. सेतु को राक्षस शरीर से निर्मित जानकर, धीर प्रवरसेन ने नग्न क्षुरिका१ धारण कर लिया। स तयोत्कृत्य तन्मांसं कृतसोपानपद्धतिः । अतरद्यत्र तत्स्थानं क्षुरिकाबल उच्यते ॥ ३४७ ॥ ३४७. वह उसका मांस उससे काटकर सोपान माग निर्मित कर, जहाँ पार किया, वह स्थान क्षुरिका१ बल कहा जाता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४५ में 'यत्' का पाठभेद 'यन्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४६ (१) क्षुरिका : इसका अर्थ छोटी तलवार तथा छुरी भी होता है । कल्हण ने क्षुरिका शब्द का बहुत प्रयोग किया है । भारत के क्षत्रिय गण अन्य मध्य कालीन देशों के सैनिक वर्ग के समान दो कृपाण रखते थे । उनमें एक बड़ी तथा दूसरी छोटी होती थी । जापान के वीरकालीन पुरुष भी भारत के क्षत्रियों के समान ही सैनिक संहिता का अनुसरण करते थे । निस्सन्देह जापान में तेरहवीं शताब्दी तक यह प्रथा प्रचलित थी। बड़ी और छोटी तलवार वीरगण धारण करते थे। मुस्लिम काल में छोटी तलवार ने खंजर का स्थान ले लिया था। बड़ी तलवार कमर से बाईं तरफ लटकाते थे और खंजर नाभि के पास पेटी अथवा कमरबन्द में खोंस लेते थे। यह प्रथा अब और परिवर्तित हो गयी है। उत्सवों तथा भोजन के समय सैनिक अधिकारी केवल एक छोटी तलवार अर्थात् क्षुरिका कमर में अपने वर्दी के ऊपर वामभाग में लटका लेते हैं । मुख्यतः नाविक अधिकारियों में यह प्रथा सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित है । वे अपनी पुरानी परम्परा के अनुसार तलवार साथ रखते हैं । पाठभेद : श्लोक सख्या ३४७ में 'बल' का पाठभेद 'बाल' 'भाल' तथा 'वार' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४७ (१) क्षुरिका बल : वर्तमान खुदबल स्थान है । महासरित के उत्तरी तट पर है । बल स्थान को कहते हैं । कश्मीर के नामों के अन्त में बल स्थान वाचक नामों के अन्त में लगा दिया जाता है जैसे पारबल, मारवल, पोखरवल । मैं समझता हूँ कि हजरत बल का अन्तिम नाम बल स्थानवाचक था परन्तु वहाँ बाल रखा था अतएव कालान्तर में उसका नाम हजरत का बाल रखने के स्थान रूप में हजरत बल एवं बाल रख दिया गया । साधारण लोग कश्मीर में हजरत बल ही कहते हैं न कि हजरत बाल ।

तृतीय तरंग ५५३ पार्श्वस्थं तं लग्नमुक्त्वा प्रातर्मेत्सूत्रपातनम् । दृष्ट्वा पुरं विधेहीति वदद् भूतं तिरोदधे ॥ ३४८ ॥ ३४८. पार्श्वस्थ लग्न कहकर—'प्रातः मेरा सूत्रपात¹ देख कर नगर² निर्माण करो।' यह कहते हुए भूत तिरोहित हो गया । देव्या शारिकयाऽङ्केन यक्षेणाधिष्ठिते च सः । ग्रामे शारीटकेऽपश्यत्सूत्रं वेतालपातितम् ॥ ३४९ ॥ ३४९. उस (राजा) ने शारीटक ग्राम में वैताल पातित सूत्र¹ देखा जो देवी शारिका² एवं यक्ष अट्टा³ से अधिष्ठित था ।


पादटिप्पणियाँ : ३४८. (१) सूत्रपातन : इसे सूत लगाना, सूत बाँधना कहते हैं। इसका प्रयोग विश्व में सर्वत्र इमारतों तथा सड़कों की रचना में चिह्न लगाने के लिये होता है। कल्हण ने इसका पुनः उल्लेख तरंग ५:५६ में किया है। (२) नगर : यह नगर प्रवरपुर अथवा प्रवरसेनपुर था। प्राचीन श्रीनगर को पुनः मालूम पड़ता है राजा ने और विस्तृत किया। पुराने श्रीनगर से मिला ही उसने अपने नाम पर नगर बनवाया। प्रायः सभी मुस्लिम इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रवरसेन वर्तमान श्रीनगर का संस्थापक था यद्यपि वे यह भी कहते हैं कि श्रीनगर की रचना में अनेक राजाओ द्वारा अनेक बार परि-वर्त्तन किये गये हैं। मुस्लिम शासन काल में श्रीनगर या प्रवरपुर कश्मीर कहा जाता था। कश्मीर जाने का अर्थ श्रीनगर जाना समझा जाता था। बैरनी के अनुसार नगर चार फर्लांग में विस्तृत था। सन् १८१६ ई० में सिखों ने कश्मीर जीता तो पुराना नाम श्रीनगर रख दिया गया। मूल श्रीनगर की स्थापना अशोक न की थी। वर्तमान श्रीनगर का स्थान राजा प्रवरसेन ने चुना था। नाम प्रवरसेनपुर रखा गया था। कश्मीर उपत्यका के मध्य में स्थित है। वितस्ता नदी का पाट ८० गज है। वितस्ता के दक्षिण तटपर पुराना नगर अधिक आबाद था। समुद्र की सतह से ५२५० फिट ऊँचा है। यहाँ का तापमान जनवरी में ३५ डिग्री तथा जुलाई में ८० डिग्री होता है। वर्षा प्रति वर्ष यहाँ २७ इंच होती है। नगर के बाहर प्रायः कब्रिस्तान है।

पाठभेद : श्लोक संख्या ३४९ में 'शारीटके' का पाठभेद 'हारटठ' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : ३४९ (१) सूत्र : जिस स्थान पर सूत्र-लगा था वहीं पर प्रवरपुर की स्थापना राजा प्रवरसेन ने की। वही वर्तमान श्रीनगर है। श्रीनगर टिप्पणी पृष्ठ १३८ पर द्रष्टव्य है। (२) शारिका देवी के कारण हरिपर्वत का नाम शारिका पर्वत पड़ गया है। यह श्रीनगर में ही एक प्रकार से नगर बढ़ने के कारण आ गया है। शारिका पर्वत पर सम्राट् अकबर ने दुर्ग निर्माण कराया था। यह किला भी अच्छी अवस्था में स्थित है। पर्वत की ढाल पर शारिका देवी का तीर्थ स्थान है। मैं जिस समय पहली बार यहाँ पहुंचा उस समय शारिका देवी तक पहुँचने के लिए राज्य सरकार की तरफ से पत्थर की सीढ़ियाँ बनवायी जा रही थीं।

७०

५५३ राजतरंगिणी

भक्त्या प्रतिष्ठां प्राक्तस्मिन्निनीषौ प्रव्ररेश्वरम् । जयस्वामी स्वयं पीठे भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥ ३५० ॥

३५०. उसके भक्ति पूर्वक प्रवरेश्वर १ की प्रतिष्ठा करने के पूर्व जयस्वामी २ स्वयं यन्त्र भेदन कर पीठ पर आसीन हो गये ।

सन् १९६२ में जब मैं दूसरी बार आया त सीढ़ियाँ बन चुकी थीं । शिखर पर स्थित शारिका देवी के समीप पहुँचने के लिये जहाँ से सीढ़ियाँ प्रारम्भ होती है वहाँ एक आधुनिक मन्दिर बना है। मन्दिर के बाहर शिवलिंग है। भीतर देवी की मूर्ति है। मन्दर के नीचे सड़क के समीप पाँच या सात ब्राह्मणों के मकान हैं। यहाँ एक ढका हुआ हौज बना है। यहाँ से जनता पीने का जल प्राप्त करती है। शारिका मन्दिर बाहर से देखने पर हरिपर्वत दुर्ग के अन्दर एक दुर्ग अथवा किला मालूम पड़ता है। राजा गुलाब सिंह ने कश्मीर विजय के पश्चात् इसका निर्माण कराया था। शारिका देवी की यहाँ कोई मूर्ति नहीं है। एक शिला खण्ड खड़ा है। उस पर श्रीचक्र अंकित है। वह सिन्दू लेपन से इतना ढक गया है कि रेखायें स्पष्ट प्रकट नहीं होतीं। पुजारियों का कथन है कि श्रीचक्र की रेखायें कभी-कभी स्वतः उमड़ आती हैं। दिखायी पड़ने लगती है। मैने चक्र के कोनों को गिनना चाहा। परन्तु कुछ को छोड़कर अन्य सिन्दूर के मोटे स्तर से ढक गये हैं। दूर से देखने में शिलाखण्ड का रूप शारिका पक्षी के आकार तुल्य लगता है। उस पर श्रीचक्र अंकित कर देव स्थान तथा मूर्ति का नाम शारिका रख दिया है। शारिका माहात्म्य में एक कथा कही गयी है। देवी दुर्गा ने मैना का रूप धारण कर लिया था। सुमेरु पर्वत से पर्वत खण्ड देवी अपने चंचु मे उठाकर लायी। वह दैत्यों के द्वार को बन्द करना चाहती थी। दैत्य लोग नरक में निवास करते थे। परन्तु इस स्थान पर नरक जाने का द्वार अर्थात् मार्ग था। उसी द्वार पर पर्वत खण्ड रख दिया। दैत्यों का इस द्वार से निकलना बन्द हो गया। द्वार का मुख भी बन्द हो गया। देवी स्वयं इस पर्वत पर निवास करने लगी। पर्वत का नाम हर पर्वत हो गया। कथासरित्सागर ७३ : १०९ में इसका उल्लेख है।

(३) अट्टा : इस शब्द का उल्लेख राज- तरंगिणी मे पुनः नही मिलता। नीलमत पुराण मे भी मैं इस शब्द को नही पा सका। अट्टा का डिग्दी अर्थ मचान होता है। स्टीन ने एक सुझाव दिया है कि मट्टा कवि भाषा में ऊँचे किंवा श्रृंग, शिखर के लिये यहाँ प्रयोग किया गया है। अट्टालिका ऊंचे कई मञ्जिले मकान को कहते है। अट्टमेलक एक मन्त्री का उल्लेख रा० ८:५७७ मे कल्हण ने किया है।

३५० (१) प्रवरेश्वर : हरिपर्वत के मूल तथा जामा मसजिद, जो अब जियारत बहाउद्दीन साहब के नाम से सुप्रसिद्ध, के मध्य होना चाहिये। यह स्थान सम्भवतः श्रीनगर के मध्य में होगा। जियारत बहाउद्दीन साहब के समीप जो घेरा जो पुराना कब्रिस्तान है उस में मन्दिरों तथा देवस्थानों के अनेक अलंकृत शिलाखण्ड आज भी लगे दिखायी देते हैं। उस के दीवाल तथा कब्रों में वे लगे हैं। कब्रिस्तान के नैऋत्य कोण में एक पुराना फाटक खड़ा है। वह बहुत ऊँचा है। चौड़ा भी काफी है। वह बड़े शिलाखण्ड से बनाया गया है।

तृतीय तरंग ५५५ वेतालावेदितं लग्नं जानतो जगतीभुजा । स्थपतेः स जयाख्यस्य नाम्ना प्रख्यापितोऽभवत् ॥ ३५१ ॥ ३५१. नृपति ने वेताल कथित लग्नवेत्ता स्थापिन 'जय' के नाम से उसे प्रख्यात किया । नगराप्रातिलोम्याय भक्त्या तस्य विनायकः । प्रत्यङ्मुखः प्राङ्मुखतां भीमस्वामी स्वयं ययौ ॥ ३५२ ॥ ३५२. उसकी भक्ति के कारण नगराभिमुख हेतु पश्चिमाभिमुख विनायक भीमस्वामी¹ स्वयं पूर्वाभिमुख हो गये । उसकी छत सम्भवतः बहुत दिन पहले गिर चुकी है। ब्राह्मणों के मतानुसार यह फाटक किंवा तोरण द्वार प्रवरसेन मन्दिर का द्वार था। यहीं से प्रवरसेन राजा स्वर्ग गये थे। यह वही द्वार है जिसका उल्लेख त० ३:७८ तथा विल्हण ने विक्रमाङ्क- देवचरित ८:१०९ में किया है। जहाँ कि प्रवरसेन के रग पथ का उल्लेख किया गया है। यह मन्दिर प्रत्यक्ष इसके पूर्व प्रवरसेन निर्मित मन्दिर का त० ३:१९ में उल्लेख किया गया है। (२) जयस्वामी : यहाँ पर प्रतिष्ठा की जो कथा कही गयी है वह तरंग ३ ४५१ श्लोक की कथा से और स्पष्ट हो जाती है। वहाँ रणेश्वर तथा रण स्वामी की प्रतिष्ठा का घटना वर्णन की गयी है। प्रवरसेन प्रारम्भ में शिव का उपासक था। वह शिवलिंग मूर्ति स्थापित करना चाहता था। उसने प्रथम शिव प्रवरेश्वर की प्रतिष्ठा की थी। (त० ३: ३६४,३७०) अलौकिक घटना के कारण जहाँ शिव स्थापना की बात थी वहीं पर विष्णु भगवान् जयस्वामी की मूर्ति अवतरित हो गयी। प्रतिष्ठा स्थापना के नियमों के अनुसार प्रत्येक देवता की स्थापना पर यन्त्र भी भिन्न होता है। यह यन्त्र भूमिपर बनाया जाता है। इस प्रकार विष्णु की प्रतिष्ठा शिवपीठ पर नही हो सकती जबतक कि वह यन्त्र न हटा दिया जाय। (विष्णु धर्मोत्तरपुराण : ३) जयस्वामी नाम प्रवरसेन के शिल्पी जय के नामपर रखा गया था। वह लग्न- वेत्ता थे जिसे वेताल ने बताया था। जयस्वामी देवस्थान का उल्लेख केवल एक बार और त० ५:४४८ में जयस्वामी विरोचन रूप से किया गया है। देवस्थान कहाँ था पता नहीं चलता। कल्हण ने इसके सम्भाव्य स्थान के विषय में भी कोई संकेत नही किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'वेताला' का 'वेताल' तथा 'जयाख्यस्य' का पाठभेद 'जयास्थ्यस्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५२ (१) भीमस्वामी : विनायक की पूजा अभी तक हर पर्वत अर्थात् शारिका पर्वत के दक्षिण मूल के सीमावर्ती नट्टान पर भीमस्वामी गणेश नाम से होती है। यह सम्राट् अकबर के हरिपर्वत पर निर्मित किला के बच्छ दरवाजा के समीप है। कश्मीर के तीर्थों में गणेश स्वामी का उल्लेख मिलता है। बडशाह जैनुल आवदीन ने भीमस्वामी गणेश का नवीन देवस्थान श्रोवर के अनुसार निर्माण कराया था। यह जियारत मकदूम शाह के समीप है। (श्रोवर : ३:३००) पण्डित साहिबराम ने अपने तीर्थों में बड़शाह के गणेश स्थान को मकदूम शाह के जियारत के समीप बताया है।

५५२ राजतरंगिणी भक्त्या प्रतिष्ठां प्राक्तस्मिन्बिभ्रीषोः प्रवरेश्वरम् । जयस्वामी स्वयं पीठे भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥ ३५० ॥ ३५०. उसके भक्ति पूर्वक प्रवरेश्वर¹ की प्रतिष्ठा करने के पूर्व जयस्वामी² स्वयं यन्त्र भेदन कर पीठ पर आसीन हो गये । सन् १९६२ में जब में दूसरी बार आया त सीढ़ियाँ बन चुकी थी । शिखर पर स्थित शारिका देवी के समीप पहुँचने के लिये जहाँ से सीढ़ियाँ प्रारम्भ होती है वहाँ एक आधुनिक मन्दिर बना है। मन्दिर के बाहर शिवलिंग है । भीतर देवी की मूर्ति है। मन्दिर के नीचे सड़क के समीप पाँच या सात ब्राह्मणो के मकान है । यहाँ एक ढका हुआ होज बना है। यहीं से जनता पीने का जल प्राप्त करती है। शारिका मन्दिर बाहर से देखने पर हरिपर्वत दुर्ग के अन्दर एक दुर्ग अथवा किला मालूम पड़ता है। राजा गुलाब सिंह ने कश्मीर विजय के पश्चात् इसका निर्माण कराया था । शारिका देवी की यहाँ कोई मूर्ति नहीं है। एक शिला खण्ड खड़ा है। उस पर श्रीचक्र अंकित है । यह सिन्दूर लेपन से इतना ढक गया है कि रेखायें स्पष्ट प्रकट नहीं होतीं। पुजारियों का कथन है कि श्रीचक्र की रेखायें कभी-कभी स्वतः उमड़ आती है । दिखायी पड़ने लगती है। मैंने चक्र के कोणों को गिनना चाहा। परन्तु कुछ को छोड़कर अन्य सिन्दूर के मोटे स्तर से ढक गये हैं। दूर से देखने में शिलापट्ट का रूप शारिका पक्षी के आकार तुल्य लगता है। उस पर श्रीचक्र अङ्कित कर देव स्थान तथा मूर्ति का नाम शारिका रख दिया है। शारिका माहात्म्य में एक कथा कही गयी है। देवी दुर्गा ने मैना का रूप धारण कर लिया था । सुमेरु पर्वत से पर्वत खण्ड देवी अपने चंचु मे उठाकर लायी । वह दैत्यों के द्वार को बन्द करना चाहती थी । दैत्य लोग नरक में निवास करते थे । परन्तु इस स्थान पर नरक जाने का द्वार अर्थात् मार्ग था । उसी द्वार पर पर्वत खण्ड रख दिया। दैत्यों का इस द्वार से निकलना बन्द हो गया । द्वार का मुख भी बन्द हो गया । देवी स्वयं इस पर्वत पर निवास करने लगी । पर्वत का नाम हर पर्वत हो गया । कथासरित्सागर ७३ : १०९ में इसका उल्लेख है। (३) अट्टा : इस शब्द का उल्लेख राज- तरंगिणी में पुनः नहीं मिलता। नीलमत पुराण में भी में इस शब्द को नहीं पा सका । अट्टा का डिम्बो अर्थ मचान होता है। स्तीन ने एक सुझाव दिया है कि अट्टा कवि भाषा में ऊंचे किंवा शृंग, शिखर के लिये यहाँ प्रयोग किया गया है। अट्टालिका ऊंचे कई मञ्जिले मकान को कहते है । अट्टमेलक एक मन्त्री का उल्लेख रा० ८:४७७ में कल्हण ने किया है। ३५० (१) प्रवरेश्वर : हरिपर्वत के मूल तथा जामा मसजिद, जो अब ज़ियारत बहाउद्दीन साहब के नाम से सुप्रसिद्ध, के मध्य होना चाहिये । यह स्थान सम्भवतः श्रीनगर के मध्य में होगा। ज़ियारत बहाउद्दीन साहब के समीप की घेरा जो पुराना कब्रिस्तान है उस में मन्दिरों तथा देवस्थानों के अनेक अलंकृत शिलाखण्ड आज भी लगे दिखायी देते हैं । उस के दीवाल तथा कब्रों में वे लगे हैं। कब्रिस्तान के नैर्ऋत्य कोण में एक पुराना फाटक खड़ा है। वह बहुत ऊँचा है। थोड़ा भी बाकी है। वह बड़े शिलाखण्ड से बनाया गया है।

तृतीय तरंग ५५५ वेतालावेदितं लग्नं जानतो जगतीभुजा। स्थपतेः स जयाख्यस्य नाम्ना प्रख्यापितोऽभवत् ॥ ३५१ ॥ ३५१. नृपति ने बेताल कथित लग्नवेत्ता स्थापिन 'जय' के नाम से उसे प्रख्यात किया । नगराप्रातिलोम्याय भक्त्या तस्य विनायकः । प्रत्यङ्मुखः प्राङ्मुखतां भीमस्वामी स्वयं ययौ ॥ ३५२ ॥ ३५२. उसकी भक्ति के कारण नगराभिमुख हेतु पश्चिमाभिमुख विनायक भीमस्वामी¹ स्वयं पूर्वाभिमुख हो गये । उसकी छत सम्भवतः बहुत दिन पहले गिर चुकी है। ब्राह्मणों के मतानुसार यह फाटक किंवा तोरण द्वार प्रवरसेन मन्दिर का द्वार था। यहीं से प्रवरसेन राजा स्वर्ग गये थे। यह वही द्वार है जिसका उल्लेख त० ३:७८ तथा बिल्हण ने विक्रमाङ्क- देवचरित्र ८:१०९ में किया है। जहाँ कि प्रवरसेन के रण पथ का उल्लेख किया गया है। यह मन्दिर अथवा इसके पूर्व प्रवरसेन निर्मित मन्दिर का त० ३:१९ में उल्लेख किया गया है। (२) जयस्वामी : यहाँ पर प्रतिष्ठा की जो कथा कही गयी है वह तरंग ३ ४५१ श्लोक की कथा से और स्पष्ट हो जाती है। वहाँ रणेश्वर तथा रण स्वामी की प्रतिष्ठा का घटना वर्णन की गयी है । प्रवरसेन प्रारम्भ में शिव का उपासक था । वह शिवलिंग मूर्ति स्थापित करना चाहता था। उसने प्रथम शिव प्रवरेश्वर की प्रतिष्ठा की थी। (त० ३: ३६४,३७०) अलौकिक घटना के कारण जहाँ शिव स्थापना की बात थी वहीं पर विष्णु भगवान् जयस्वामी की मूर्ति अवतरित हो गयी। प्रतिष्ठा स्थापना के नियमो के अनुसार प्रत्येक देवता की स्थापना पर यन्त्र भी भिन्न होता है। यह यन्त्र भूमिपर बनाया जाता है। इस प्रकार विष्णु की प्रतिष्ठा शिवपीठ पर नहीं हो सकती जबतक कि वह यन्त्र न हटा दिया जाय । ( विष्णु धर्मोत्तरपुराण : ३) जयस्वामी नाम प्रवरसेन के शिल्पी जय के नामपर रखा गया था। वह लग्न- वेत्ता थे जिसे बैताल ने बताया था । जयस्वामी देवस्थान का उल्लेख केवल एक बार और त० ५:४४८ में जयस्वामी विरोचन रूप से किया गया है। देवस्थान कहाँ था पता नहीं चलता। कल्हण ने इसके सम्भाव्य स्थान के विषय में भी कोई संकेत नहीं किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'बेताला' का 'वेताल' तथा 'जयाख्यस्य' का पाठभेद 'जयास्यस्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५२ (१) भीमस्वामी : विनायक की पूजा अभी तक हर पर्वत अर्थात् शारिका पर्वत के दक्षिण मूल के सीमावर्ती चट्टान पर भीमस्वामी गणेश नाम से होती है। यह सम्राट् अकबर के हरिपर्वत पर निर्मित किला के कच्छ दरवाजा के समीप है। कश्मीर के तीर्थों में गणेश स्वामी का उल्लेख मिलता है । बादशाह जैनुल आबदीन ने भीमस्वामी गणेश का नवीन देवस्थान श्रीवर के अनुसार निर्माण कराया था। यह जियारत मकदूम शाह के समीप है। (श्रीवर : ३:१००) पण्डित साहेबराम ने अपने तीर्थों में बादशाह के गणेश स्थान को मकदूम शाह के जियारत के समीप बताया है।

५५६ राजतरंगिणी भीमस्वामी का दर्शन मैंने किया है। यह फाटक के ठीक वाम पार्श्व में है। यहाँ तक सड़क पक्की वानी है। मन्दिर के अन्दर एक भीमकाय चट्टान सिन्दूर से लिप्त मिलेगी। उसे देखकर मालूम होता है जैसे बड़ा सा सिन्दूर का ढोका रखा है। गर्मी में यह पिघलता सा लगता है। गणेश के आकार की मूर्ति नहीं दिखायी पड़ती। सिन्दूर के अन्दर छि गयी है। वह इतनो अधिक सिन्दूर मण्डित है कि यह कहना कठिन है कि मूर्ति का मुख दक्षिण है अथवा पश्चिम । मुझे प्रतीत होता है कि यहाँ मूर्ति नहीं रही होगी। मुसलमान किसी गढ़ी या बनी मूर्ति को बुत कहते हैं। पुरातन बाइबिल में भी पत्थर, लकड़ी आदि में किसी आकृति को बनाने का नाम ही मूर्ति है। मुस्लिम काल में निश्चय ही प्राचीन मूर्ति खण्डित कर दी गयी होगी। उसके स्थान पर पर्वतीय शिलाखण्ड को गणेश नाम से सिन्दूर पोतकर पूजा होने लगी। राजस्थान में मैंने अनेक अनगढ़ पत्थरों तथा बड़े टुकड़ो पर सिन्दूर लगा देखा है। भैरव आदि की मूर्ति न रखकर एक शिलाखण्ड रखकर उसपर सिन्दूर लगा देते हैं। राजस्थान भी मुस्लिम आक्रमणों का निरन्तर स्थान रहा है अतएव वहीं भी यह प्रथा अपना ली गयी होगी। मखदूम शाह की जियारत हरिपर्वत पर सबसे भव्य इमारत है। राज्य सरकार की तरफ से आजादी मिलने के पश्चात् ऊपर तक जाने के लिये पत्थर की पक्की सीढ़ियाँ बना दी गयीं है। मैंने इस स्थान को ध्यानपूर्वक देखा। आस्तीन के समय में बहुत परिवर्तन हो गया है। मन्दिरों के ध्वंसावशेष या तो हटा दिये गये हैं अथवा तोड़कर उनका गिट्टी अथवा ढोका बनाकर इमारत या फर्श में लगा दिये गये हैं। इस जियारत के साथ गनगाह है। मैं जब पहुँचा था तो इमारत की बायीं तरफ निर्माण कार्य हो रहा था। कोई इमारत या धार्मिक स्थान बनाया जा रहा था। यह जियारत निस्सन्देह हिन्दू मन्दिर के स्थानपर बनायी गयी है। रानगाह के पास मुझे वही गोमुखीय प्रणाळी मिली जिससे मन्दिर के अभिषेक का जल बाहर निकलता था और दर्शक उसमें गिरता चरणामृत लेते थे। मखदूम शाह के जियारत के दो तरफ एक मंजिला बरामदा बना है। यहाँ से श्रीनगर का दृश्य अच्छा दिखायी देता है। बरामदा के ऊपर मन्दिर कलश का विशाल आमलक पड़ा दिखाया दिया। यही कलश का महापद्म देखा। दोनों के मध्य में आरपार छेद था। कलश ऊँचा मूल में मोटा तथा ऊर्ध्व में पतला होता चला जाता है। इसलिये ऊपर से नीचे तक पत्थरों के क्रमों को संघटित रखने के लिये मध्य में लोटा अथवा ताम्बा का मोटा छड़ डाला जाता है और यही क्रम पहले भी था। सप्तर्षि : गणेश के उक्त स्थान के वाम भाग से एक मार्ग हरपर्वत पर जाता है। यह सड़क इस समय (शक १९६८) में कच्ची है। उसे कश्मीर राज्य की ओर से पक्की किया जा रहा है। शारिका देवी के मार्ग में सप्तर्षि का स्थान पड़ता है। यहाँ भी चट्टान पर सिन्दूर लगा है। कथा है। इस स्थानपर सप्तर्षि का आगमन तथा निवास हुआ था। नीलमत पुराणमें सप्तर्षि का स्थान सुमुख के समीप कहा गया है। वराहं च नृसिंहं च बहुरूपं वरप्रदम् । सप्तर्षीणां तथैवार्चा सुमुखस्य समीपगा ॥ 1159 = १३७० १२०१ चित्रकूटमथारुह्य स्वर्गलोके महीयते । तीर्थं सप्तर्षिरूपं नाम सर्वकामफलप्रदम् ॥ 1263 = १४०६

तृतीय तरंग ५५१ सद्भावश्रियादिका देव्यस्तेन श्रीशब्दलाञ्छिताः । पञ्च पञ्चजनेन्द्रेण पुरे तस्मिन्निवेशिताः ॥ ३५३ ॥ ३५३. उस पंचजनेन्द्र १ ने श्री शब्द लाञ्छित सद्भावश्री आदि पंच २ देवियों को उस नगर में स्थापित किया । अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयशतस्य च । गवां शतसहस्रस्य धेयानू ससपेयः कुरुः । 1264 = १४७७ ⁂ ⁂ ⁂ श्राद्धं दानं तथा जप्यं स्नानं होमस्तथार्चनम् । सर्वमक्षयतां याति यत्कृतं तत्र पार्थिव ॥ 1265 = १४७७ १४७८


विगाह्य पुष्करं तीर्थमतिरात्रफलं लभेत् । तीर्थ' मश्वऋषीणां च वह्निष्टोमफलं लभेत् ॥ 1543 = १५५८ पादटिप्पणियाँ : ३५३ ( १ ) पञ्चजन : कल्हण ने राजा को यहाँ पञ्चजनो का इन्द्र कहा है । पंचजन शब्द जातियो का भी वाचक है । ( क ) ब्रह्मसूत्र शारीरक भाष्य के अनुसार । चार वर्ण तथा पाँचवां बर्बर जाति को मिलाकर पञ्चजन की संज्ञा दी गयी है। ( ख ) पांच वर्ग, यथा, - देव, मनुष्य, गन्धर्व, नाग एवं पितृ को मिलाकर पंचजन कहा जाता है। ( ग ) एक मत है कि पंचजन शब्द पंचायत के लिये प्रयुक्त किया गया है। पंचायत के सभासदों को पंच कहा जाता है। उनके सामूहिक वर्ग को सूचित करने के लिये पञ्चजन को संज्ञा दी गयी है । (२) श्रीपंचदेवी मन्दिर : श्री स्टोन ने इन मन्दिरो का पता लगाया था परन्तु उन्हें प्रामाणिक ढंग पर कुछ मिल नहीं सका। श्री पण्डित आनन्द कौल ने अपने 'आर्कियोलोजी रिमेन्स इन कश्मीर' के पृष्ठ ३२ पर इस विषयपर प्रकाश डाला है । १ महाश्री : यह मन्दिर वितस्ता के चौथे पुल के अधोभागमे दक्षिण तटपर ईंटो की पाँच गुम्बदों की बनी एक इमारत है। बादशाह जैनुल आबदीन की माता की इसमें कब्र है। वह पूर्व कालीन महाश्री का मन्दिर प्रवरसेन द्वितीय का बनवाया है। मै अपने एक कश्मीरी ब्राह्मण मित्र के साथ इस स्थान पर आया। प्रवेश करते ही अहाता के द्वार को दोनो ओर ऊँचाई पर दीवाल में बनी मूर्तियाँ खण्डित लगी थी । द्वार प्राचीन मन्दिर का बिरदावली कह रहा था। भीतर कब्रिस्तान है। जैनुलआबदीन की कब्र एक चोकोर प्राकार के अन्दर है। इसी प्रकार के बाहर उक्त मन्दिर है। पुरातत्त्व विभाग की तरफ से इसकी मरम्मत की गयी है। मन्दिर में एक सिकड़ी अभी तक लटक रही है। मेरे मित्र ने कहा कि पूर्व मन्दिर का घण्टा इसमें लटकता था। जहाँ जैनुल आबदीन की मा की कब्र है वहीपर देवी का पीठस्थान रहा होगा। अथवा शिवलिंग रहा होगा। लटकती सिकड़ा से घण्टा या जलधारा का पात्र लगाया गया रहा होगा। उक्त अहाता किंवा मैदान का घेरा तीन ओर से मन्दिरों के भग्नावशेष पत्थरों से निर्माण किया गया है। इस समय वह बृहद् कब्रिस्तान का रूप ले लिया है। उक्त मन्दिर के गर्भ गृह में केवल एक ही कब्र सिकन्दर बुत शिकन की स्त्री अथवा बादशाह जैनुल आबदीन की मां की है। इस मन्दिर की प्रणाली आजतक यथायत् कायम है। उससे गर्भ गृह का जल चरणामृतस्वरूप बाहर निकलता था आज सात शताब्दियाँ बीत गयीं इस प्रणाली ने जल- बिन्दुओं का स्पर्श न किया होगा ।

५५८ राजतरङ्गिणी २. काली श्री: तीसरे तथा चौथे पुल वितस्ता के मध्य एक भव्य इमारत शाह हमदान की है। इस स्थान पर काली का पवित्र जलस्रोत है। प्रवर- सेन द्वितीय ने इस स्रोतस्थान पर मन्दिर निर्माण कराया था। मन्दिर का नाम कालीश्री था। इस समय इस महाल का नाम कलारापुर है। यह शब्द कालीश्रीपुर अथवा कैलाशपुर का अपभ्रंश प्रतीत होता है। निस्सन्देह कैलाश अथवा काली का सम्बन्ध शिव से होता है। यह मन्दिर सुलतान कुतुबुद्दीन (सन् १३७३- ९४ ई०) ने नष्ट किया था। इस मन्दिर के ध्वंसा- वशेष से उसने खानखाह का शाह हमदान में निर्माण कराया था। यह दो बार अग्नि से जल चुका है। पुनः बनाया गया है। स्थान अपनी प्राचीन गरिमा में भव्य रहा होगा। लकड़ी की बहुत बड़ी इमारत बनी है। शाह हमदान के नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रांगण बड़ा है। प्रांगण में पुराने शिलाखण्ड बिखरे तथा कहीं न कहीं लगे आज भी मैंने अपनी आँखों से देखा था। यह स्थान हिन्दू मुसलमान दोनों द्वारा पूजित है। वितस्ता की तरफ कथा है कि हमदान खान- खाह के पृष्ठ भाग से एक नाग अथवा जलस्रोत निकलता था। जहाँ जलस्रोत का स्थान है वह घेरकर खान- गाह का अंग बना दिया गया है। उसके द्वार पर आज भी कपड़ा पड़ा रहता है। ताकि कोई हिन्दू उसे देख न सके। यहाँ पर एक पीर किंवा मुन्तज़िम बैठा रहता है। इस लकड़ी की इमारत तथा वितस्ता के मध्य में चौतरा है। तत्पश्चात् वितस्ता जल तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं। नदी के तट पर शाह हमदान की इमारत के पुश्तेपर एक बड़ा सिन्दूर का टीका लगा है। यहीं प्राचीन कालीश्री की स्मृति में हिन्दू पुष्प चढ़ाकर पूजा करते हैं। नदी की धारा तक पत्थर की सीढ़ियाँ बनी हैं। पुश्ता के नीचे काफी बड़ा स्थान चौतरानुमा बना है। उस पर आज भी हिन्दू खड़े होकर पूजा तथा स्नान करते हैं। मैंने यहाँ स्वयं पुष्प चढ़ाया है। दो एक हिन्दुओं को पूजा करते देखा था। सिखों ने सन् १८१९ ई० में कश्मीर विजय की। सिख राज्यपाल सरदार हरी सिंह ने शाह हमदान को नष्ट करने की आज्ञा दी। हरी सिंह ने आदेश दिया। मन्दिर के स्थानपर मुस्लिम जियारत आदि बनी है अतएव उसे मुसल- मान वापस कर दें। उन्होंने श्री फूल सिंह सैनिक अधिकारी को आज्ञा दी कि मसजिद उड़ा दी जाय। वितस्ता के पार पत्थर मसजिद घाट पर तोप लगा दी गयी। मुसलमान शाह हमदान को नष्ट होते देखकर श्री बीरबल धर के मकान पर गये। उन्हीं के बुलाने पर सिख सेना कश्मीर में आयी थी। श्री बीरबल के निवेदन पर यह ध्वंस कार्य रोक दिया गया। पुश्ता की दीवाल पर हिन्दुओं ने सिन्दूर लगा दिया। उसी की पूजा उस समय से काली श्री के नाम से होती है। ३. सद्भावश्री : कादी कदल के समीप जामा मसजिद के पश्चिम सद्भावश्री का मन्दिर था। उसे पीर हाजा मुहम्मद सुलतान कुतुबुद्दीन साहब की ज़ियारत में बदल दिया गया है। यहां ये दफ़न किये गये थे। ४. लौकी श्री : श्रीनगर में वितस्ता तटपर लोकी- श्री का मन्दिर था। इस मन्दिर का घाट अब भी लोहागे पार कहा जाता है। यह शब्द लोकीश्री- पार का अपभ्रंश है। ५. पांचवां मन्दिर किस स्थान पर था पता नहीं चलता। उक्त मन्दिरों की श्रृंखला देखते यही अनुमान लगाया जा सकता है कि उसे भी वितस्ता के दक्षिण तटपर होना चाहिये।

तृतीय तरंग १५९ वितस्तायां स भूपालो बृहत्सेतुमकारयत् । ख्याता ततः प्रभृत्येष तादृङ्नौसेतुकल्पना ॥ ३५४ ॥ ३५४. उस भूपाल ने वितस्ता (नदी) पर बृहत् सेतु' का निर्माण कराया उस समय से उस प्रकार का नौका द्वारा सेतु निर्माण ख्यात (प्रचलित) हुआ । श्रीजयेन्द्रविहारस्य बृहद्बुद्धस्य च व्यधात् । मातुलः स नरेन्द्रस्य जयेन्द्रो विनिवेशनम् ॥ ३५५ ॥ ३५५. नरेन्द्र के मातुल जयेन्द्र ने जयेन्द्र विहार' का निर्माण कराया, और बृहद्^२ बुद्ध की स्थापना की ।

पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'ततः' का पाठभेद 'तदा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५४ ( १ ) बृहत् सेतु—शाब्दिक अर्थ बड़ा पुल होता है । कल्हण ने इस का पुनः उल्लेख त. ८ : ३१७१ में किया है। इस सेतु के स्थान का निश्चयात्मक पता कल्हण नहीं देता । किन्तु पढ़ने से प्रतीत होता है कि मक्षिका स्वामी ( मायसुम ) के पास इसे होना चाहिये था । कल्हण राजा हर्ष के समय ( रा० त० ७ : १५४८ ) तथा श्रीवर ( १ : ३ : ९६ ) में एक नाव के पुल का वितस्ता पर उल्लेख करता है । वितस्ता पर आजादी ( सन् १९४७ ई० ) के पूर्व केवल लकड़ो के पुल विभिन्न शैलो के, बने थे । कश्मीर का पर्यटक उनमे अत्यन्त प्रभावित होता था । जैन कदल वितस्ता पर बने श्रीनगर पुल का जैनुल आवदीन बादशाह के समय में होना मिलता है । श्रीवर ने इसका उल्लेख तृतीय रा० त० १:३:१८, १९) में किया है। यह पुल पन्द्रहवी शताब्दी में वर्तमान था । प्रतीत होता है कि इसके पूर्व श्रीनगर में नौका पाट कर पुल नही बनाया गया था । इसके निर्माण के पश्चात् नाव पाटकर स्थाय पुल बनाने की परम्परा प्रचलित हो गयी । अतएव ऐतिहासिक दृष्टि से इस पद का महत्त्व है ।

३५५ ( १ ) जयेन्द्र विहार : ह्वेनसांग चनी पर्यटक ने इस बिहार में दो वर्षो तक (सन् ६३१- ६३३ ई० ) निवास किया था । उसे 'चे मे इन तो लो' के नाम से लिखा है । यह जयेन्द्र बिहार ही है । यहाँ उसने अनेक शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की थी । यह बिहार श्रीनगर की जामा मसजिद के समीप था । सर वालर लारेन्स का कहना है कि उसके समय में भी श्रीनगर में लद्दाख से आने वाले बौद्ध लद्दाखी इस मसजिद के स्थान का पुराना नाम 'स्ते-रमु स्वक-कंग' कहते थे । वे यहाँ की यात्रा प्राचीन बिहार होने के कारण करते थे। यहाँ पूजा करते थे । ( २ ) बृहद् बुद्ध—सम्भवत' बृहद् बुद्ध का विशाल प्रतिमा ठोस थी, जैसा कि ललितादित्य ने कांस्य ताम्र अथवा अष्ट धातु की परिहासपुर में निर्माण कराकर प्रतिष्ठित किया था। (त.४:२०३) तरंग ४ : २०१ से प्रकट होता है कि जयेन्द्र बिहार भस्म हो गया था । बुद्ध की प्रतिमा राजा क्षेमगुप्त ने गलाकर सिक्का ढलवाया था । उसने पीतल की प्रतिमा से ढले सिक्को का आमदनी से क्षेम गौरीश्वर का मन्दिर निर्माण कराया था । श्रीनगर की अन्य बुद्ध प्रतिमाओ का उल्लेख राजा हर्ष ( त. ७ : १०९७ ) तथा राजा सुस्सल के काल में मिलता है। बृहद बुद्ध का उल्लेख चौदहवी

५६० राजतरंगिणी बुभोज सिंहलादीन्यो द्वीपान्स रुचियाऽकरात् । मोराकनामा मोराकभवनं भुवनाद्भुतम् ॥ ३५६ ॥ ३५६. मोराक नामक वह सचिव भुवन में अद्भुत 'मोराक भवन'१ बनवाया जिसने सिंहलादि द्वीपों का भोग किया था। षट्त्रिंशद्गृहलक्षाणि पुरं तत्प्रथथे परा । यस्यास्तां वर्धनस्वामी विश्वकर्मा च सीमयोः ॥ ३५७ ॥ ३५७. पूर्व काल में यह ख्याति थी—'इस नगर में छत्तीस लाख गृह हैं।' जिसकी सीमा पर वर्धन स्वामी१ और विश्वकर्मा२ हैं। दक्षिणस्मिन्नेव पारे वितस्तायाः पुरा किल । निर्मितं तेन नगरं विभक्तैर्युक्तमापणैः ॥ ३५८ ॥ ३५८. वितस्ता के दक्षिण तटपर उसने सुविख्यात बाजारों से युक्त नगर निर्मित कराया । ते तत्राभ्रंलिहाः सौधा यानध्यारुह्य दृश्यते । वृष्टिस्निग्धं निदाघान्ते चैत्रे चोत्कुसुमं जगत् ॥ ३५६ ॥ ३५९. वहाँ वे गगनचुम्बी राजप्रासाद थे जिनपर आरूढ़ होकर निदाघ (ग्रीष्म) के अन्त में वृष्टि स्निग्ध एवं चैत्र१ मास में विकसित कुसुम पूर्ण जगत् देखा जाता था ।


शताब्दा तक मिलता है। जोनराज के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है। (जोन राज० ४३०) ३५६. (१) मोराक भवन : इस स्थान का पता नहीं चलता। इस पर भी कहीं से प्रकाश नहीं पड़ता कि मन्त्री मोराक का आधिपत्य सिंहल में किस प्रकार हुआ था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५७ में 'षट्त्रिंशद्गृह' का 'षट्त्रिंशगृह' तथा 'सीमयोः' का पाठभेद 'सोमयोः' तथा 'स मयः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५७ (१) वर्धन स्वामी : वर्धन स्वामी तथा विश्वकर्मा के मन्दिरों का पता नहीं चलता। वर्धन स्वामी का पुनः उल्लेख कल्हण ने त० ६ : १९१ में किया है। (२) विश्वकर्मा : यह मन्दिर भी सूत्रपात की सीमा पर वर्धन स्वामी के समान होना चाहिये । इस मन्दिर का पुनः उल्लेख नहीं मिलता । श्रीस्टेन का मत है कि त० ८ : २४३८ श्लोक से इस मन्दिर की ध्वनि निकलती है । कश्मीर में विश्वकर्मा को सर्व शिल्प प्रवर्तक माना गया है। उनकी पूजा का विधान भी किया गया है । विश्वकर्मा तथा पूज्यः सर्वशिल्पप्रवर्तकः । नील० 623 ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या ३५८ में 'दक्षिण' का पाठभेद 'दक्षिणे' मिलता है। श्लोक संख्या ३५९ में 'चोत्कु' का पाठभेद 'वोत्कु' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५९. (१) चैत्र : यह चान्द्रमास का एक महीना किंवा मास है। इस मास में चित्रा नक्षत्र पर पूर्णचन्द्र स्थित होता है। यह मास मार्च एवं अप्रैल

तृतीय तरंग ५६१ तद्विना नगरं कुत्र पवित्राः सुलभा भुवि । सुभगाः सिन्धुमंमेदाः क्रीडावसथवीथिषु ॥ ३६० ॥ ३६०. पृथ्वी पर उस नगर के अतिरिक्त और कहाँ क्रीड़ागृह¹, पथों के तट तथा पवित्र एवं सुन्दर नहरें सुलभ हो सकती हैं ?

मास में पड़ता है। क्योंकि चान्द्रवर्ष गणना के अनु- सार प्रति तीसरे वर्ष मल मास अर्थात् एक मास और वर्ष में जुट जाता है अतएव सौर वर्ष के अनुसार इसका समय अस्थिर रहता है। चैत्रमास का कश्मीर में बड़ा महत्त्व है। प्रथम दिन चैत्र से संवत् का आरम्भ होता है। प्रथम दिन चैत्र शुक्लपक्ष को ब्राह्मणों को वस्त्र, अलंकार, मुद्रा, तथा रत्न दान करने का पर्व माना जाता है। चैत्र में श्रीपञ्चमी के दिन लक्ष्मी पूजन का माहात्म्य है। (नी० ६४१-६४६) कश्मीर मण्डल की देवी कश्मीरा का प्रतिमा को स्नान पूजा आदि करने का विधान किया गया है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को चैत्र षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन स्कन्द की पूजा होती है। यह दिन बालकों के स्वास्थ्य के साथ सम्बन्धित किया गया है। चैत्र नवमी को भद्रकाली की पूजा पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य से की जाती है। चैत्र शुक्ल एकादशी को वास्तु देव की पूजा की जाती है। चैत्र द्वादशी को वासुदेव की पूजा का दिन है। चैत्र त्रयोदशी को मदनयात्रा उत्सव मनाया जाता है। कामदेव का छवि वस्त्र बनाया जाता है। इस दिन पति अपना पत्नी को स्नान कराता है। चैत्र सुदी पन्द्रह को पिशाच प्रयाण का उत्सव मनाया जाता है। निकुम्भ ने इस दिन बालुकार्णव में अभियान करता पिशाचों के निवास स्थान पर आक्रमण किया था। पिशाच की मृत्तिका प्रतिमा बनायी जाती थी। उसकी पूजा प्रत्येक गृह में मध्याह्न तथा चन्द्रोदय काल में की जाती थी। नीलमत पुराण ने इस प्रकार सम्पूर्ण चैत्र मास में प्रायः प्रत्येक दिन को पूजा तथा उत्सव का दिन निश्चित कर दिया है। (नी० ६४४-६६७) ७१

पाठभेद - श्लोक संख्या ३६० में 'सुभगा' का पाठभेद 'सुलभाः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३६० । १) क्रीड़ा गृह एवं नहरें : कल्हण का यहाँ तात्पर्य डल लेक अर्थात् शुवेश्वरो सर तथा अंचर लेक से निकलने वाली अनेक नहरों से है जो श्रीनगर में फैली हैं। वे श्रीनगर के केन्द्र तक चली गयी हैं। इन नहरों पर बाजार तथा मकान आदि अब भी बने हैं। हाउस बोट नहरों में लगी रहती हैं। जहाँ बिजली का प्लग तटवर्ती बिजली के खम्भों से लगाकर पूरा हाउस बोट विद्युन्मय कर दिया जाता है। यह नहरें वेनिस की नहरों के समान यातायात तथा परिवहन का काम करती हैं। शाक- सब्जी तथा अन्य सामान बेचने वाले नावों पर सामान बेचते हैं। थाईलैण्ड के बैंकाक नगर में भी नहरों में घूमती नावों पर बाजार लगा दिखायी देता है। मुझे दोनों स्थानों की साम्यता देखकर आश्चर्य हुआ। कल्हण ने यहाँ 'पवित्र' शब्द का प्रयोग किया है। ये नहरें अब पवित्र नहीं कही जा सकतीं। आबादी बढ़ जाने के कारण, तथा हाउस वोटों की संख्या अत्यधिक होने और पर्यटकों की संख्या लाखों से ऊपर प्रति वर्ष पहुँचने के कारण नहरें गन्दी रहती हैं। मल मूत्र तथा गन्दगी सब नावों हाउस बोटों तथा तटवर्ती मकानों से निकलकर नहरों में जाती हैं। अतएव उन्हें आज पवित्र कहना पवित्रता का उपहास करना होगा। कल्हण के समय नहरें साफ रहीं होंगी। पवित्र शब्द श्लीस्टीन के मतानुसार वाङ्मय पद बनाने के लिये कल्हण ने प्रयोग किया है। परन्तु मैं समझता

५६० राजतरंगिणी बुभोज सिंहलादीन्यो द्वीपान्स सचिवाऽकरात् । मोराकनामा मोराकभवनं भुवनाद्भुतम् ॥ ३५६ ॥ ३५६. मोराक नामक वह सचिव भुवन में अद्भुत 'मोराक भवन' बनवाया जिसने सिंहलादि द्वीपों का भोग किया था। षट्त्रिंशद्गृहलक्षाणि पुरं तत्प्रथथे परा । यस्यास्तां वर्धनस्वामी विश्वकर्मा च सीमयोः ॥ ३५७ ॥ ३५७. पूर्व काल में यह ख्याति थी—'इस नगर में छत्तीस लाख गृह हैं।' जिसकी सीमा पर वर्धन स्वामी' और विश्वकर्मा² हैं। दक्षिणस्मिन्नेव पारे वितस्तायाः पुरा किल । निर्मितं तेन नगरं विभक्तैर्युक्तमापणैः ॥ ३५८ ॥ ३५८. वितस्ता के दक्षिण तटपर उसने सुविख्यात बाजारों से युक्त नगर निर्मित कराया। ते तत्राभ्रंलिहाः सौधा यानध्यारुह्य दृश्यते । वृष्टिस्रिग्धं निदाघान्ते चैत्रे चोत्कुसुमं जगत् ॥ ३५६ ॥ ३५९. वहाँ वे गगनचुम्बी राजप्रासाद थे जिनपर आरूढ़ होकर निदाघ (ग्रीष्म) के अन्त में वृष्टि स्निग्ध एवं चैत्र' मास में विकसित कुसुम पूर्ण जगत् देखा जाता था। शताब्दा तक मिलता है। जोनराज के वर्णन से की सीमा पर वर्धन स्वामी के समान होना चाहिये । यह स्पष्ट हो जाता है। (जोन राज० ४३० । इस मन्दिर का पुनः उल्लेख नहीं मिलता । श्रोस्टोन का मत है कि त० ८ : २४१८ श्लोक से इस ३५५० (१) मोराक भवन : इस स्थान मन्दिर की ध्वनि निकलती है । का पता नहीं चलता । इस पर भी वहो से प्रकाश कश्मीर मे विश्वकर्मा को सर्व शिल्प प्रवर्त्तक माना नहीं पड़ता कि मन्त्री मोराक का आधिपत्य सिंहल गया है। उनको पूजा का विधान भा किया गया है। में किस प्रकार हुआ था । विश्वकर्मा तथा पूज्यः सर्वशिल्पप्रवर्त्तकः । पाठभेद : नी० ० 623 ॥ श्लोक सख्या ३५७ में 'षट्त्रिंशद्गृह' का पाठभेद : 'षट्त्रिशगृह' तथा 'सीमयोः' का पाठभेद 'सीमयो.' श्लोक संख्या ३५८ में 'दक्षिण' का पाठभेद तथा 'स मयः' मिलता है। 'दक्षिणे' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : श्लोक सख्या ३५९ में 'वोत्कु' का पाठभेद ३५७ (१) वर्धन स्वामी : वर्धन स्वामी 'वोत्कु' मिलता है। तथा विश्वकर्मा के मन्दिरों का पता नहीं चलता । पादटिप्पणियाँ : वर्धन स्वामी का पुनः उल्लेख कल्हण ने त० ६ : ३५९० (१) चैत्र : यह चान्द्रमास का एक १६३ में किया है। महीना किंवा भाग है। इस मास में चित्रा नक्षत्र पर (२) विश्वकर्मा : यह मन्दिर भी सूत्ररात पूर्णचन्द्र स्थित होता है। यह मास मार्च एवं अप्रैल

तृतीय तरंग ५६१ तांदूना नगरं कुत्र पवित्राः सुलभा भुवि । सुभगाः सिन्धुसंभेदाः क्रीडावसथवीथिषु ॥ ३६० ॥ ३६० पृथ्वी पर उस नगर के अतिरिक्त और कहाँ क्रीड़ागृह¹, पथों के तट तथा पवित्र एवं सुन्दर नहरें सुलभ हो सकती हैं ?


[बायाँ स्तम्भ / Left Column] मास में पड़ता है । क्योंकि चान्द्रवर्ष गणना के अनु- सार प्रति तीसरे वर्ष मल मास अर्थात् एक मास और वर्ष में जुट जाता है अतएव सौर वर्ष के अनुसार इसका समय अस्थिर रहता है । चैत्रमास का कश्मीर में बड़ा महत्व है । प्रथम दिन चैत्र से संवत् का आरम्भ होता है । प्रथम दिन चैत्र शुक्लपक्ष को ब्राह्मणों को वस्त्र, अलंकार, मुद्रा, तथा रत्न दान करने का पर्व माना जाता है । चैत्र में श्रीपंचमी के दिन लक्ष्मी पूजन का माहात्म्य है । ( नी० ६४४—६४६ ) कश्मीर मण्डल की देवी कश्मीरा की प्रतिमा को स्नान पूजा आदि करने का विधान किया गया है । चैत्र शुक्ल षष्ठी को चैत्र षष्ठी का पर्व मनाया जाता है । इस दिन स्कन्द की पूजा होती है । यह दिन बालकों के स्वास्थ्य के साथ सम्बन्धित किया गया है । चैत्र नवमी को भद्रकाली की पूजा पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य से की जाती है । चैत्र शुक्ल एकादशी को वास्तु देव की पूजा की जाती है । चैत्र द्वादशी को बासुदेव की पूजा का दिन है । चैत्र त्रयोदशी को मदन यात्रा उत्सव मनाया जाता है । कामदेव का छवि वस्त्र बनाया जाता है । इस दिन पति अपनी पत्नी को स्नान कराता है । चैत्र सुदी पन्द्रह को पिशाच प्रयाण का उत्सव मनाया जाता है । निकुम्भ ने इस दिन बालुकार्णव में अभियान करता पिशाचों के निवास स्थान पर आक्रमण किया था । पिशाच की मृत्तिका प्रतिमा बनायी जाती थी। उसकी पूजा प्रत्येक गृह में मध्याह्न तथा चन्द्रोदय काल में की जाती थी । नीलमत पुराण ने इस प्रकार सम्पूर्ण चैत्र मास में प्रायः प्रत्येक दिन को पूजा तथा उत्सव का दिन निश्चित कर दिया है । ( नी० ६४४-६६७ ) ७१


[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पाठभेद : श्लोक संख्या ३६० में 'सुभगाः' का पाठभेद 'सुलभाः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) क्रीड़ा गृह एवं नहरें : कल्हण का यहाँ तात्पर्य डल लेक अर्थात् श्रुवेश्वरी सर तथा अंचर लेक में निकलने वाली अनेक नहरों से है जो श्रीनगर में फैली हैं। वे श्रीनगर के केन्द्र तक चली गयी हैं । इन नहरों पर बाजार तथा मकान आदि अब भी बने हैं। हाउस वोट नहरों में लगी रहती हैं। जहाँ बिजली का प्लग तटवर्ती बिजली के खम्भो से लगाकर पूरा हाउस वोट विद्युन्मय कर दिया जाता है। यह नहरें वेनिस की नहरों के समान यातायात तथा परिवहन का काम करती हैं। शाक- सब्जी तथा अन्य सामान बेचने वाले नावों पर सामान बेचते हैं। थाईलैण्ड के बैंकॉक नगर में भी नहरों में घूमती नावों पर बाजार लगा दिखायी देता है। मुझे दोनो स्थानो की साम्यता देखकर आश्चर्य हुआ । कल्हण ने यहाँ 'पवित्र' शब्द का प्रयोग किया है। ये नहरें अब पवित्र नहीं कही जा सकतीं । आबादी बढ़ जाने के कारण, तथा हाउस वोटों की संख्या अत्यधिक होने और पर्यटकों की संख्या लाखों से ऊपर प्रति वर्ष पहुँचने के कारण नहरें गन्दी रहती हैं। मल मूत्र तथा गन्दगी सब नावों हाउस वोटों तथा तटवर्ती मकानों से निकलकर नहरों में जाती हैं। अतएव उन्हें आज पवित्र कहना पवित्रता का उपहास करना होगा । कल्हण के समय नहरें साफ़ रहीं होंगी। पवित्र शब्द श्रीकण्ठिन के मतानुसार काव्यमय पद बनाने के लिये कल्हण ने प्रयोग किया है। परन्तु मैं समझता