राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
शुद्ध-पाठ पृष्ठ शुद्ध पाठ अशुद्ध पाठ पृष्ठ शुद्ध पाठ अशुद्ध पाठ ४३ जलोद्भवम् जलोत्भवम् ४४० ययो ययो ७४ भेदाग्रैः भेदगिरेः ४६८ येष्टिताः वेष्टिता ८३ तिलांशोऽपि तिलाधोऽपि ४८५ शमं सम ९१ कौरव कौरष ५०७ यितुं यितु १०९ विवाहोरुका विवाहात्का ५११ ऽधिनः ऽयिनः ११३ रङ्कूरं रफ्फूरं ५१४ निर्गर्वः निगर्वः १२४ धुर्य्यः भूर्यः ५१९ ददर्शाग्रे ददाशग्रे १७८ योषित्छिरो योषिच्छिरो ५२३ द्रुतम् द्रतम् १८० वार बार ५२६ प्राहिणोत् प्राणिणात् १८६ संस्पर्धा संस्पधं ५३१ आचख्यावश्व आचख्यावश्च १९१ संशयम् सद्ययम् ५३२ गणोऽयं गणेऽयं १९४ क्रोधा क्रोपा ५४० भवादृशैः भवादृशोः २२३ दृष्ट्वैना दृष्ट्वनां ५४२ गृह्णातु गृह्णतु २५४ देशं देश ५४२ सर्वमोचित्यं सर्वमोचित्य २६९ सरलात्मना सरलात्मनः ५४६ शीर्णं शीण ३३४ जलौघो जलौघा ५४९ नामाङ्क मामाङ्क ३६५ वकेशं, वकश्वभ्रे, वकेशं, वकश्वभ्रे ५५१ दुर्लभम् दुलभम् बकवत्यापगां बकवत्यापगा ५५१ सेतुमेतं सेतुमेत ३४३ द्विजाः द्विजः ५६४ जयन्ताख्यो जयन्ताख्या ४०६ राज्यग्नि राज्ञयग्नि ५७७ पस्पशाङ्गेषु प्रस्पशाङ्गेषु ४१० तावदन्यक्तं तावद्यक्तं ५७९ तं त ४३० कुम्भाम्भः कुम्भाम्भ ५७९ शान्तोत्सुक्याः शान्तोन्मुख्या ४३१ सर्वतोऽद्यपि सर्वतोद्य।ऽपि ५९८ कालम्ब्याख्यो कालम्बाख्यो
कश्मीर का इतिहास अथ श्रीकल्हणकृतायां राजतरङ्गिण्याम् प्रथमस्तरङ्गः श्रीगणेशाय नमः १ भूषाभोगिफणारत्नरोचिस्सिचयचारवे । मङ्गलाचरण नमः प्रलीनमुक्ताय हरकल्पमहीरुहे ॥ १ ॥ १. उन भगवान् शिव२ को नमस्कार है जो सर्पों के आभूषण से आभूषित हैं; जिनका शरीर सर्पों के फणों में स्थित रत्नों की दीप्ति द्वारा प्रदीप्त है। जो कल्पतरु स्वरूप हैं, और जिनमें मुक्त जन प्रलीन ३ होते हैं। पाठ भेदः जाता है, तो उसका अर्थ पवित्र किंवा शुभ श्रीगणेशाय नमः ; ओं श्रीकृष्णाय नमः ; ओं सौभाग्यशाली, भाग्यवान्, पूजनीय तथा महाभाग सरस्वत्यै; आं श्रीगणेशाय नम. ; ओ नमोः समझा जाता है । नारायणाय ; ओम् , ओं भगवते वासुदेवाय; !' ओं स्वस्ति ; अथ राजतरंगिणी आदि पाठों का भेद मिलता है । गणेश के नाम आदि की विस्तृत व्याख्या गणेश पुराण स्वयं करता है । वेद में गणपति वाराणसी, पूना, इण्डिया आफिस लाइब्रेरी शब्द मिलता है 'गणाना त्वा गणपति'—ऋग्वेद तथा श्रीनगर की पाण्डुलिपियों में श्रीगणेशाय नम. २:२३:१ । गणपति किंवा गणेश शब्द का अर्थ मिलता है । गणों का अध्यक्ष अथवा लोकतंत्र का राष्ट्रपति प्रथम श्लोक के शब्द 'भूषाभोगि' का पाठ- लगाया जाता है । भारत गणतंत्र है । गण का भेद 'भूषाहीन', 'मुक्ताय' का 'मुकुटा' तथा 'हर' पति अथवा राजा, गणपति, गणेश, शाब्दिक का 'पुरा' मिलता है । अर्थ से ठीक है । प्राचीन काल से गण राज्यों के अधिपति को गणेश किंवा गणपति कहते थे । पादटिप्पणियाँ : भारत में प्रचलित राष्ट्रपति शब्द में गणपति किंवा १. (१) श्री गणेशाय नमः--कल्हण सनातन गणेश का भाव आ जाता है । गणेश का नाम काव्य रचना एवं कवि परंपरा का अनुकरण करता ज्येष्ठराज भी है । महाभारत लिखने के समय हुआ, राजतरंगिणी का प्रारंभ 'श्री गणेशाय नमः' व्यास ने गणेश को अपना लिपिक बनाया था । से करता है। श्री शब्द जब नाम के साथ लगाया
२ राजतरङ्गिणी गणेश का विद्वान् तथा पंडित और गोबर गणेश का अर्थ मूर्ख के लिये कालान्तर में जाने लगा है। संत ज्ञानेश्वर ने अपनी गीता की टीका के प्रथम चरण में ही गणेश का बहुत सुंदर रूपक बाँधा है। गणेश बुद्धि के अधिदेवता हैं। विघ्नविनाशक तथा मंगलमूर्ति माने जाते हैं। इनकी मूर्तियों में 'नाग' यज्ञोपवीत देखा जाता है। अतः नाग जाति से इनको किसी न किसी रूप से जोड़ा जा सकता है। उनका विशाल मस्तक हाथी का मुख स्वरूप, हाथों में परशु, पाश, माला तथा पुस्तक हैं। लंबोदर अर्थात् पेट तुंदिल दिखाया जाता है। अग्नि-सोम—मीठा लड्डू उन्हें प्रिय है। यह उनकी माधुर्यप्रियता का परिचायक है। इसलिये उन्हें ढुंढिराज कहा जाता है। उनकी पत्नियां ऋद्धि तथा सिद्धि हैं। कही कही इनकी पत्नी बुद्धि के होने का वर्णन मिलता है। शिव पार्वती की संतान गणेश हैं। शिव पार्वती के संमिलित रूप की कल्पना अर्धनारीश्वर है। शिव उसमें अग्नि स्वरूप तथा पार्वती सोम हैं। अग्नि में सोम की आहुति डालने का नाम यज्ञ है। अग्नि अंश से कुमार किंवा स्कंद तथा सोम अंश से गणेश अपने पिता-माता शिव-पार्वती के पुत्र कहे गए हैं। (२) हर—कश्मीर में शैव मत, शैव सिद्धांत आदि का व्यापक प्रचार था। कश्मीरी अपने को शिव भक्त कहते हैं। शिव को विश्वात्मा के रूप में देखते हैं। उनकी एकांत कामना शिव में सायुज्य प्राप्त करने की होती है। यह भावना कश्मीरी पंडितों में रूढ हो गई है। शिव का रुद्र प्राथमिक रूप है। यह प्राकृतिक शक्ति का द्योतक है। शैव दर्शन विकसित होकर सभी देवताओं को अपने में मिलाता कालान्तर में बहुदेववादी धार्मिक सिद्धांत के स्थान पर एकेश्वर- वाद में परिणत हो जाता है। वह बुद्ध के आचार किंवा नैतिक दर्शन का स्थान भी ले लेता है। हलाहल विषपान करने के कारण उनका कंठस्थान नीला पड़ गया है। अतएव उनका एक नाम नीलकंठ हो गया। शिव का नाम त्रिनेत्र है। उनका तृतीय नेत्र भाल पर दोनों भ्रूके मध्य में है। उनका तृतीय नेत्र खुलता है। सब कुछ भस्म हो जाता है। इसी नेत्र के खुलने के कारण काम भस्म हो गया। उसका नाम अनंग पड़ा। इस त्रिनेत्र रूपक की एक और व्याख्या की जा सकती है। शिव योगी हैं। योग सिद्धांत उनसे प्रारंभ होता है। यह दृष्टि भ्रू मध्य होती है। यहाँ योनि मुद्रा करने पर साधारण साधक को भी प्रकाश दिखाई पड़ता है। दृष्टि यहाँ स्थिर होने पर ज्ञानचक्षु खुलते हैं। ज्ञानचक्षु के खुलने पर मायाजाल, बंधन तथा सांसारिक व्यवधान ज्ञानाग्नि में भस्म हो जाते हैं। अतएव शिव को त्रिनेत्र उनके योगी होने के कारण कहा गया है। शिव के शरीर पर विषधर सर्पादि आभूषण हैं। भूतप्रेत अनेक योगिनियाँ आदि उन्हें घेरे रहती हैं। योगों पर विष का प्रभाव नहीं पड़ता। उस पर अदृश्य कही जानेवाली शक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता। उसे योगिनियाँ अर्थात् नारी का सुंदर रूप मोह नहीं सकता। पिशाचिनियाँ अर्थात् नारी के विकृत रूप से वह भय भीत नहीं हो सकता। सब स्थानों में वह समरूप रहता है। यह है मुक्ता- वस्था। यही मुक्ति है। इस अवस्था के प्राप्त करने पर शिव में सायुज्य हो जाता है। (३) प्रलीन = विशेषण भूषाभोग तथा प्रलीन दोनों शब्दों का प्रयोग शिव तथा कल्पतरु के लिये किया जाता है। प्रलीन यहाँ शिव के साथ सायुज्य के अर्थ में आया है। सालोक्य तथा सायुज्य में अन्तर है। सालोक्य का अर्थ है शिव के लोक की प्राप्ति। सायुज्य माने होता है स्वयं शिव में मिलकर एक हो जाना। बाण के हर्षचरित में (१.१) इसी प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
प्रथम तरङ्ग ३ भालं वह्निशिखाङ्कितं दधदधिश्रोत्रं वहन् संभृत- क्रीडत्कुण्डलिजृम्भितं जलधिजच्छायाऽच्छकण्ठच्छविः । वक्षो बिभ्रदहीनकञ्चुकचितं यद्वाङ्गनाऽर्धस्य वो भागः पुङ्गवलक्ष्मणोऽस्तु यशसे वामोऽथवा दक्षिणः ॥ २ ॥ २. जिनका वामांग नारी (पार्वती का) है। जिनका ललाट केसर तिलक से सुशोभित है। जिनके कानों में दोलायमान कुण्डल क्रीड़ा करते हैं। जिनका कंठ शंख वर्ण उज्ज्वल है। जिनके वक्षस्थल का दक्षिणांग नर (शिव' का) है। जिनके भाल पर वह्निशिखा अंकित है। जिनके कानों के निकट केलित सर्पवृंद मुख खोलते रहते हैं। जिनके कंठ की छवि विषपान करने के कारण मलिन नहीं होकर कांतिपूर्ण है। जिनका वक्षस्थल शेषनाग कवच से वेष्टित है। वे अर्धनारीश्वर वृषभध्वज, चाहे दक्षिण अथवा वाम अंग हो, आपका कल्याण करें। वन्द्यः कोऽपि सुधास्यन्दाऽऽस्कन्दी स सुकवेर्गुणः । येन याति यशःकायः स्थैर्यं स्वस्य परस्य च ॥ ३ ॥ ३. सुधा'धारा को भी मात करनेवाले सुकवियों का गुण वंदनीय है; जिनके कारण उनकी तथा दूसरों की यशःकाया स्थिर हो जाती है। कोऽन्यः कालमतिक्रान्तं नेतुं प्रत्यक्षतां क्षमः । प्राक्कथन कविप्रजापतींस्त्यक्त्वा रम्यनिर्माणशालिनः ॥ ४ ॥ ४. प्रजा'पति के समान रम्य निर्माणशील कवियों के अतिरिक्त और किसमें इतनी क्षमता है, जो भूतकाल की बातें प्रत्यक्ष मूर्तिमान आँखों के संमुख उपस्थित कर सके। पाठभेदः श्लोक संख्या दो में 'सम्भृत' का पाठभेद 'सम्भूत' 'जृम्भितं' का 'जुम्भित' मिलता है। पादटिप्पणियाँ २. (१) शिव—शिव की यहाँ वंदना अर्द्धनारीश्वर के रूप में की गई है। शिव का दक्षिण अंग शिव तथा वाम अंग पार्वती का माना जाता है। पाठभेदः श्लोक संख्या ३ में 'सुधा' का 'स्वधा' और 'येन' का 'येना' मिलता है ॥ ३ ॥ पादटिप्पणियाँ ३. (१) सुधा—सुधा अर्थात् अमृत पान करनेवाला ही अमृतत्व प्राप्त करता है। यदि कोई अन्य व्यक्ति अमृत पान करे तो उसका फल अपने को नहीं मिल सकता। किंतु कवि अपने काव्यामृत एवं लेखनी द्वारा अमर होकर, जिसके विषय में अपनी लेखनी उठाता है, उसको भी उसके यश- वर्णन द्वारा अमर बना देता है। काया अस्थिर है। उसका नाश होता है। परंतु यशःकाया अपने यश के कारण स्थिर हो जाती है। यदि वाल्मीकि कवि नही होते, तो, राम की कथा और उनका यश कैसे आज तक स्थिर रहता ? पाठभेदः श्लोक संख्या ४ में 'पती' का पाठभेद 'पती' मिलता है ॥ ४ ॥
४ राजतरङ्गिणी न पश्येत्सर्वसंवेद्यान् भावान् प्रतिभया यदि । तदन्यद्दिव्यदृष्टित्वे किमिव ज्ञापकं कवेः ॥ ५ ॥ ५. यदि कवि में सर्व संवेद्य भावों के प्रकट करने की प्रतिभा न होती तो और किस प्रकार माना जा सकता था कि उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है। कथादैर्घ्यानुरोधेन वैचित्र्येऽप्यप्रपञ्चिते । तदत्र किंचिदस्त्येव वस्तु यत् प्रीतये सताम् ॥ ६ ॥ ६. विचित्र घटनावलियों का विस्तृत समावेश कथा विस्तार के कारण इसमे नहीं किया जा सका है, तथापि सत्पुरुषों को यत्र तत्र किंचित् रुचिकर कथानक भी मिलेंगे। श्लाघ्यः स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता । भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती ॥ ७ ॥ ७. वही गुणवान् श्लाघनीय है जिसकी वाणी राग-द्वेषों का बहिष्कार कर एक न्यायमूर्ति के समान भूतकालीन घटनावलियों को यथार्थ रूप से प्रस्तुत करती है। पादटिप्पणियाँ ४. (१) प्रजापति—सृष्टि के सर्जक परम पितामह ब्रह्मा के लिये प्रजापति शब्द का प्रयोग किया गया है । सृष्टि के सर्जन काल मे ब्रह्मा ने १० लोक- कर्ताओ को उत्पन्न किया था । अ० वेद : ३:१०: १३, ४.२५ १; ८:१ १७, ९ १:२४, ३०:७:७, वाजसनेयि संहिता माध्यदिन शाखा : ८:३६, शतपथ ब्राह्मण १.४:२१, तैत्तिरीय ब्राह्मण २:२ १०, मत्स्य पुराण १:१ २५, प्रजापति की परिभाषा करता है— 'विश्वेप्रजाना पतयो येभ्यो लोका विनि सृताः' । वेद में प्रजापति शब्द प्रजापालक, सविता, अग्नि, आदि देवो के लिये भी आया है। ऋग्वेद ४.५५:२, ६:५६, १०:८५.४३, अथर्ववेद; १० १.२१ । प्रजापतियो की संख्या कितनी थी, इस संबंध में मतैक्य नही है । कहीं ७, कही ११, कही १३, कही १४ और कहीं २१ संख्या उनको दी गई है। महा- भारत मे २१ प्रजापतियों का उल्लेख मिलता है । यह संख्या सबसे अधिक—ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रामा, कर्दभ, क्रोध और विक्रीत, महाभारत में दी गई है । (आदि पर्व १:२९, ३३; ३१.२६ २१; शांति पर्व ३३४:१५, २७) । निम्नलिखित प्रजापतियों के नाम सभी तालिकाओ मे पाए जाते है—मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, वशिष्ठ, भृगु, नारद । पाठभेद: श्लोक संख्या ५ मे 'दन्यद्दिव्य' का पाठभेद 'दन्यदिव्य' मिलता है ॥ ५ ॥ श्लोक संख्या ६ मे 'चित्ये' का 'चित्यै', 'तदत्र' का 'तन्मात्र' तथा 'दस्त्येव' का पाठभेद 'दस्त्यत्र' मिलता है । श्लोक संख्या ७ में 'कृता' का पाठभेद 'ष्कृत:' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७. (१) स्थेय—कल्हण ने स्थेय शब्द का प्रयोग न्यायाधीश, न्यायकर्ता के अर्थ मे किया है । उसने अपने को न्याय दृष्टि से एक न्यायकर्ता की तरह परिस्थितियो के बीच रखा है । प्राचीन प्राप्त पुस्तकोँ, अप्राप्य ग्रंथों के उद्धरणो, सभी प्रकार की ऐतिहासिक सामग्रियो का निरीक्षण, अवलोकन तथा विवेक तुला पर एक न्यायकर्ता की तरह तोलकर अपने मत तथा विचार को राजतरंगिणी मे लिपिबद्ध किया है ।
प्रथम तरङ्ग ५ पूर्वैर्बद्धं कथावस्तु मयि भूयो निबध्नति । प्रयोजनमनाकर्ण्य वैमुख्यं नोचितं सताम् ॥ ८ ॥ ८. पूर्वकालीन रचनाकारों द्वारा जो कथा वस्तुएँ निबद्ध कर दी गई हैं। उनका मैं क्यों पुनर्लेखन कर रहा हूँ, इस प्रयोजन के हेतु को बिना समझे सत्पुरुषों का मुझसे विमुख होना उचित नहीं है । दृष्टं दृष्टं नृपोदन्तं बद्ध्वा प्रमयमीयुषाम् । अर्वाक्काळभवैर्वार्ता तत्प्रबन्धेषु पूर्यते ॥ ६ ॥ ९. जिन लेखको ने अपने समय के 'नृपों का इतिहास' लिपिबद्ध किया है, उनके पश्चात् अर्वाचीन काल के कवि के लिये और क्या ऐसी बातें शेष रह गई हैं, जो अपने नूतन प्रबंध के कारण पूर्ण करेंगे ? दाक्ष्यं कियदिदं तस्मादस्मिन् भूतार्थवर्णने । सर्वप्रकारं स्खलिते योजनाय ममोद्यमः ॥ १० ॥ १०. अतएव इस ग्रन्थ के लिखने की मेरी योजना यह है कि मैं सर्वांगीण पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास उपस्थित करूँ। जहाँ पुरातन इतिहास लेखकों की रचनाएं विश्रृंखलित हैं ।
[बायाँ स्तम्भ] पाठभेदः श्लोक संख्या ८ में 'मुख्यम्' का पाठभेद 'मुख' मिलता है। श्लोक संख्या ९ तथा १० युग्मक हैं। श्लोक संख्या ६ में 'बद्ध्वा' का पाठभेद 'बद्धा' ( 'बुद्ध्वा' ) तथा 'प्रमय' का 'प्रथम' मिलता है। श्लोक संख्या १० में 'कारं' का 'कार' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ ९. (१) नृप—अमरकोशकार ने राजा के सात नाम दिए हैं—(१) राजन् ( २ ) राट्, (३) पार्थिव, (४) क्ष्माभृत्, (५) नृप, (६) भूप और (७) महीक्षित् ।-क्षत्रिय वर्ग ८:१। नृप का शाब्दिक अर्थ होता है 'मनुष्यों की रक्षा करनेवाला।' राजा तथा नृप के अर्थों में किंचित् भेद है। कल्हण ने यहाँ भूपति, राजा, महीपालादि शब्दो का प्रयोग नहीं किया है। वैदिक साहित्य में भी यह इसी अर्थ मे प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेदः २:१:१७, ४:२०:१, ७:६ ९:१, १०:४४: २-३; अथर्ववेद ५:१८:१-१५; तैत्तिरीय आरण्यक : ६:३:३ ।
[दायाँ स्तम्भ] (२) इतिहास प्रयोजन—कल्हण अपने पूर्व लेखको के इतिहास क्रम को जारी रखना चाहता है। उसके इस कथन का अर्थ यह है कि इतिहास लिखने की प्राचीन परंपराएँ रही है। यदि आज भारतीय इतिहास ग्रंथ उपलब्ध नहीं हो रहे है, तो इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि भारत में इतिहास लिखने की परंपरा थी ही नहीं। कल्हण का यह संकेत स्पष्ट है कि वह इतिहास लेखको की परंपरा को जारी रखना चाहता है, ताकि अपने समय तक के राजाओं का इतिहास जहाँ तक पूर्वलेखक लिख चुके हैं, उनमें जोड़कर टूटी श्रृंखला के इतिहास के टूटे क्रम को पुनः क्रमबद्ध कर दिया जाय । राजतरंगिणी नाम कल्हण के उर्वर मस्तिष्क की मौलिक उपज है। उसके पूर्व ग्रंथ नृप तथा राजाओ के नाम से संबंधित थे। उनका नाम ग्रंथ के उद्देश्य का बोधक हो जाता था। परंतु राजतरंगिणी एक ऐसा नाम है जो राजा
६ राजतरङ्गिणी
और सरित् किंवा तरंगिणी का मेल नहीं खिलता। राजा मनुष्य है। तरंगिणी एक नदी है। वह प्रकृति की देन जड पदार्थ है। कल्हण ने राजाओं के चरित्र किंवा इतिहास का नूतन नामकरण राजतरंगिणी नाम से किया है। कल्हण के पश्चात् आनेवाले इतिहास लेखकों ने इस नाम को अपनाया है। काश्मीर के इतिहास को कल्हण के पश्चात् लिखकर इतिहास शृंखला को कायम रखा है - जोनराज, श्रीवर तथा शुक आदि सन् ११४८ से १५५६ ई० तक अर्थात् मुगल काल के प्रारंभ तक कल्हण के पश्चात् राजतरंगिणी लिखकर कल्हण द्वारा आरंभ किए महाप्रयास को आनेवाली चार शताब्दियों तक जारी रखा। इस तरंगिणी की धारा को सूखने नहीं दिया। तरंगिणी अर्थात् नदी की धारा अविच्छिन्न गति से बहती रहती है। तरंगिणी का पेटा एक सा रहता है। परंतु उसमें सर्वदा नवीन जल आता रहता है। प्रवाह के साथ बहकर गया जल पुन लौटकर नहीं आता। तथापि धारा की गति तथा जलस्रोत की शृंखला टूटती नहीं। तरंगिणी के समान देश में राजा आते रहते हैं जाते रहते हैं परंतु राज्य सिंहासन खाली नहीं रहता। देश में नदी की धारा की तरह राजपरंपरा अनवरत गति से अविशृंखल क्रम से चलती रहती है। राज्य के शासन का क्रम टूटता नहीं। राजा मरने के साथ ही दूसरे व्यक्ति के रूप में जीता रहता है। इंग्लैंड के राजा के जीवन, अभिषेक तथा मृत्यु के समय - भगवान् राजा की रक्षा करे, राजा चिरंजीवी हो - कहा जाता है। अर्थात् देश का राजा नहीं मरता, बल्कि देश में राजा पदवीधारी व्यक्ति मरता है। नदी के जलबिंदुओं के समान राजपरंपरा काल प्रभाव के साथ चलती रहती है। उसमें जल बिन्दुओं के तुल्य नामधारी राजा आते रहते हैं। प्रवाह के साथ बह जाते हैं। उनके पीछे पुनः जल- बिंदु आकर प्रवाह को पूर्ववद् जारी रखते हैं।
राज सिंहासन नदी के पेटा के समान है। वहाँ राजा तुल्य जलबिंदु आते हैं और चले जाते हैं। राज्य सिंहासन नदी के पेटा के समान कभी जलतुल्य राजा से विहीन नहीं होता। राज्य तथा शासन का क्रम नहीं टूटता। सिंहासन पर नदी में आते नवीन जल के समान राजाओं की परंपरा आती रहती है। यह प्रवाह कभी सूखता नहीं। अनादिकाल से चला आया है। चला जायगा। हमारा रहना और न रहना महत्त्वहीन है। नदी प्रकृति के उषाकाल से जल बहाती समुद्र में मिलने चली जा रही है। राजा सभ्यता के उदय काल से होता आया है। काल प्रभाव से होता रहेगा। उसकी यह आने जाने की परंपरा नहीं टूटेगी। कितनी उदात्त कल्पना थी कवि कल्हण की। उसने इतिहास की एक नवीन व्याख्या की है। यह व्याख्या उतनी ही आधुनिक कही जायगी जितने आधुनिक हम अपने होने का गौरव अनुभव करते हैं। तरंगिणी में लोल लहरियां उठती हैं। उत्ताल तरंगें उठती हैं। भंवरें चक्कर खाती हैं। उनका निर्मल जल गदले वर्षाकालीन जल में परिणत हो जाता है। कलकल करती लहरियां जलप्लावन का रूप धारणकर गरजने लगती हैं। जल दूषित होता है। शरद ऋतु आती है। जल पुनः निर्मल हो जाता है। शीत ऋतु में ये ही लहरियां जम जाती हैं। तुषारपात के कारण ठंडी श्वेत ओढ़नी ओढ़कर सब कुछ ठंडा कर देती हैं। पादपों के पत्ते गिर जाते हैं। कुसुम- झाड़ियां ठूंठ लगने लगती हैं। वसंत आता है। तुषारपात का अवसान होता है। जमा बर्फ गलने लगता है। धारा में गति आती है। पादपों में नवकिसलय निकलते हैं। कुसुम-झाडियों में कलियां मन ही मन मुस्कुराने लगती हैं। ग्रीष्म काल आते ही जल धारा क्षीण होने लगती है। उसकी यह क्षीणता उसकी महत्ता बढ़ा देती
प्रथम तरङ्ग ७
[बायाँ स्तम्भ]
है। वह तृषा बुझाने में, पादपों को विकसित करने में, पुष्पों को सुरभि फैलाने में, उन्हें जल से सीचकर उनमें उत्साह उत्पन्न करती है। शांति प्रदान करती है। पुनः घूमती वर्षा ऋतु आती है। नदी अपना सुहावना रूप बदलकर हुंकार उठती है। किनारों को काटती, वृक्षों को बहाती, जलप्लावन करती, गरजती, मलिन रूप धारण करती, महार्णव से मिलने चल देती है। ये ही बातें राजाओं तथा राज्यों के विषय में कही जा सकती हैं। वर्षा- कालीन नदी का जलप्लावन राज्यों की क्रांतियां, शरद् ऋतु की निर्मलता राज्यों की स्थिरता, शीत ऋतु की ठंड राज्यों की जड़ता, वसंत ऋतु की सुरभि राज्यों का विकास, ग्रीष्मकालीन जल की उपयोगिता राज्यों के शांतिकाल का द्योतक हैं। नदी राज्य है। जल राज्य की जनता है। वर्षा- कालीन मटमैला जल राज्य के दोषों को प्रकट करता है। निर्मल धारा राज्य के गुणों को प्रकट करती है। ग्रीष्मकालीन शीतल धारा जनता के दुःख निवारणार्थ श्रेष्ठ कार्यों का रूपक प्रस्तुत करती है। आततायियों के आतंक से सरिता जल जनता को शीतलता प्रदान करता है। शांति देता है। नदी के तट पर गर्मी से व्याकुल व्यक्ति जैसे शीतलता, शांति, सुख का बोध करता है, उसी प्रकार पीड़ित प्राणी राज्याश्रय प्राप्त करते ही दुःख से पीड़ा से, त्राण पाता है। नदी वर्षा में दूषित होती है। काव्यकारों ने वर्षा ऋतु में नदियों का रजस्वला होना कहा है। उस समय दोष के कारण उनका कोई स्पर्श नहीं करता। ठीक उसी प्रकार राज्य में दोष आ जाने पर कोई राज्य के पास आना नहीं चाहता। इसी नदी का निर्मल जल पान करने वाला उसमें स्नान तक करना नापसंद करता है। राजा में दोष उत्पन्न होने पर राजा अपना तो सर्वनाश करता ही है, दूसरों के भी नाश का
[दायाँ स्तम्भ]
साधन बन जाता है। उफनती वर्षा कालीन तरंगिणी की प्रबल वेगधारा अपने ही दोनों तटों को काटती है, अपने ही तटवर्ती फलप्रद छायाप्रद वृक्षों को उखाड़ती वहाती नष्ट करती है; भूमि के पादपों को सींचने के स्थान पर उन्हें गलाती, गिराती; बहाती, अपनी सीमामर्यादा लांघती देश को जलप्लावित करती है। उसी प्रकार राजा अपनी मर्यादा अपनी सीमा उल्लंघन करने पर क्रांति किंवा विप्लव का रूप उपस्थित करने के कारण नष्ट हो जाता है। कल्हण ने इसी लिये इतिहास, गाथादि शब्दों के स्थान पर तरंगिणी शब्द का प्रयोग राज्यों के इतिहास के लिये किया है। कल्हण कवि था। कुलीन कवि था। एक राजमंत्री का पुत्र था। कवि हृदय प्रकृति के अंक में बैठकर सौंदर्य संचय करता है। कवि हृदय प्रकृति से मूक वार्ता करता है। वह प्रकृति की प्रतिभा से अपनी प्रतिभा का भंडार भरता है। कवि सरस, अलंकृत, भाषा में अपना उद्देश्य तथा विचार प्रकट करना चाहता है। उसकी सुप्त चेतना कृति के साथ मिलते ही जागृत हो जाती है। कवि कल्हण इसका अपवाद नहीं था। कल्हण सफल इतिहास लेखक कवि था। उसने एक सफल कवि की तरह तरंगिणी की उपमा राज्य से दी है। राज्य श्रृंखला इस तरंगिणी के जल बिंदु हैं। जल की धारा राज का प्रवाह है, जो कभी सूखता नहीं। तरंगिणी की यह धारा अविच्छिन्न रूप से बहती रही है। राजतरंगिणी को इस धारा को सोलहवीं शताब्दी तक जोनराज, श्रीवर, शुकादि जैसे ऐतिहासिक कवि विद्वानो ने सूखने नहीं दिया है। तरंगिणी आज भी सूखी नहीं है। उसमें जल रहा है। आता रहेगा, चाहे इस जलधारा में देश काल पात्र के अनुसार उसके रूप रंग एवं स्वाद में क्यों न अन्तर पड़ गया हो ?
राजतरङ्गिणी विस्तीर्णाः प्रथमे ग्रन्थाः स्मृत्यै संक्षिपतो वचः। सुव्रतस्य प्रबन्धेन छिन्ना राजकथाऽश्रयाः ॥ ११ ॥ ११. पूर्वकालीन इतिहास ग्रन्थ विस्तृत थे। उन्हें स्मरण रखने के लिये सुव्रत ने उनका संक्षिप्त संस्करण कर दिया था। अतएव वे छिन्न¹ अर्थात् लुप्त हो गए।
पादटिप्पणियाँ
११. (१) विच्छिन्न = लुप्त-आज भी विद्यालयों में विस्तृत इतिहास ग्रन्थ के स्थान पर नोटों के पढ़ने की प्रथा चल निकली है। विद्यार्थी विशाल पाण्डित्यपूर्ण विस्तृत इतिहास ग्रंथो के चक्कर में नहीं पड़ते। परीक्षाएँ पास करने के लिये नोटों का आश्रय लेते हैं। विस्तृत इतिहास ग्रंथों का केवल संदर्भ के लिये उपयोग किया जाता है। सुव्रत के संक्षिप्त इतिहास का नाम कल्हण नहीं देता है। पूर्व कालीन इतिहास ग्रन्थों का नाम भी कल्हण नहीं देता है। प्रतीत होता है कि उसके समय में मौजूद नहीं थे। प्रतीत होता है कि सुव्रत ने विद्यार्थियों तथा पाठकों की सुविधा के लिये सरस बोधगम्य तथा स्मरण रखने योग्य प्राचीन इतिहासों को संक्षिप्त तथा वर्गीकृत कर दिया था। सुव्रत का यह संक्षिप्त इतिहास प्रचलित तथा ख्यातिप्राप्त हो गया। कल्हण इस बात का स्पष्ट उल्लेख करता है। अतएव पूर्वकालीन विस्तृत इतिहासों की प्रतिलिपि कर उन्हें रखना अथवा उसका पाठ बंद हो गया था। उन दिनों आजकल जैसे प्रकाशन तथा मुद्रण का साधन उपलब्ध नहीं था।
काश्मीर में काफी भोजपत्र के वृक्ष हैं। जोजिला पास के मार्ग में बहुत वृक्ष मैंने देखा। उनसे कुछ भोजपत्र उखाड़कर ले भी आया। भोजपत्र काफी चौड़े और लम्बे होते हैं। परतो पर परतें जमी रहती हैं। उन्हीं पर पुस्तक काली स्याही से लिखी जाती थी। सुव्रत का इतिहास छोटा था। अतएव उसी की प्रतिलिपियां पठन पाठन के लिये बनने लगी होंगी। पुरातन इतिहास ग्रंथ केवल संदर्भ, अनुसंधान तथा शोभा के लिये रह गए होंगे। उनका स्वतः असामायिक तथा अनुपयोग होने के कारण लोप हो जाना जैसा कल्हण स्वयं स्वीकार करता है, कोई आश्चर्य की बात नहीं मालूम होती।
कल्हण के समय सुव्रत द्वारा उल्लिखित इतिहास ग्रंथ उपलब्ध नहीं थे। सुव्रत का इतिहास भी अभी तक कहीं प्राप्त नहीं है, जो कल्हण के समय प्रचलित था। संभव है, कल्हण की राज तरंगिणी अधिक पूर्ण होने के कारण इसका प्रचलन हो गया और सुव्रत का इतिहास उसी प्रकार राजतंरगिणी लिखने के पश्चात् स्वतः लुप्त हो गया, जिस प्रकार सुव्रत के इतिहास के कारण प्राचीन इतिहास ग्रंथ स्वतः लुप्त हो गए थे।
कल्हण के इस उद्धरण से यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल में इतिहास लिखने की स्वस्थ परंपरा भारत में प्रचलित थी। गवेषणापूर्ण अनुसंधान के आधार पर रचनाकारो ने गाथा अथवा काव्य नहीं, अपितु इतिहासों की रचना की थी। पाश्चात्य विद्वानो की धारणा कि भारत में इतिहास लिखने की परंपरा नहीं थी, आमूल मिथ्या प्रमाणित होती है।
ऐतिहासिक ग्रन्थों का धार्मिक महत्त्व नहीं होता था। संस्कृत कल्हण के समय में भारत में अनेक स्थानों मे राजभाषा थी । संस्कृत में पत्र व्यवहार तथा लिखा पढ़ी होती थी।
इस समय बहुधा धार्मिक ग्रन्थ इसीलिये भारत में पाए जाते हैं कि उन्हें धार्मिक मान लिया गया था। वे धर्म से संबंधित कर दिए गए थे। उन्हें
प्रथम तरङ्ग या प्रथामगमन्नैति साऽपि वाच्यप्रकाशने । पाटवं दृष्टवैदुष्यतोत्रा सुव्रतभारती ॥ १२ ॥ १२. यद्यपि सुव्रत की रचना ने ख्याति प्राप्त कर ली थी तथापि पांडित्याभिमान के कारण उसकी रचना शैली दोषपूर्ण हो गई थी। अस्तु विषय प्रतिपादन में निपुणता प्राप्त नहीं कर सकी। केनाप्यनवधानेन कविकर्मणि सत्यपि । अंशोऽपि नास्ति निर्दोषः क्षेमेन्द्रस्य नृपावली ॥ १३ ॥ १३. यद्यपि क्षेमेंद्र१ की नृपावली२ काव्य रचना है तथापि अनवधानता के कारण उसमे इतनी त्रुटियाँ रह गई हैं कि उसका कोई भी अंश निर्दोष नही कहा जा सकता। संजो कर रखने की परंपरा चल पड़ी थी। चिंता हुई। एतदर्थ जो कुछ इतिहास ग्रन्थ शेष ऐतिहासिक तथा राजाओं के चरित्र सम्बन्धी ग्रन्थो रह गये थे वे भी अनायास समाप्त हो गये। को, यद्यपि वे संस्कृत में लिखे गए थे, धार्मिक मध्येशिया के लोग पूर्व मुस्लिम काल में रूप नहीं दिया गया। ऐतिहासिक घटनाएँ तथा बौद्ध या हिन्दू धर्मानुयायी थे । रूसी पुरातत्त्व राजाओं के चरित्र राजवंशवली किंवा प्रशस्ति विभाग के अनुसंधानों तथा खनन कार्यों से इस पर मात्र रह गए थे। यथेष्ट प्रकाश पड़ा है। वहाँ मुसलमान पहुँचे । मुस्लिम पूर्व काल में हुए राजाओं की वंशावली तथा धर्म स्वीकार करने के लिये बाध्य किया गया। बौद्ध उनका चरित्र उनके हजारों वर्ष पश्चात् होनेवाले भिक्षुओं ने ग्रन्थो को गुफाओं में खोदकर गाड दिया। राजवंशों किंवा जनता के लिये महत्त्वहीन हो गए वे ही प्राप्त होने वाले ग्रन्थ विश्व इतिहास की इस थे। उनके पढ़ने लिखने से न तो पुण्यार्जन हो समय सामग्री बन रहे है। यही काम भारत में सकता था और न धनार्जन । यह मनोभावना मुस्लिम शासन के सत्तारूढ़ होने के पश्चात् बलवती हो गई होगी। अस्तु रामायण, पुराण हुआ। मिस्र, ईरान तथा एशिया माइनर के देशो तथा महाभारत में वर्णित यत्र तत्र इतिहास को एक में प्राचीन ग्रन्थों का सर्वथा लोप हो गया। वहाँ के आंशिक झलक मिल जाती है। उन्हे धार्मिक ग्रन्थ इतिहास को पिरामिडों, ध्वंसावशेषों और प्राप्त की मान्यता देकर, उनका धर्म में समावेश कर होने वाले बिखरे शिलालेखो को पढ़कर जाना जा लिया गया । रहा है। मुसलमानी शासन काल में संस्कृत ग्रंथो पर पाठभेद : विपत्ति आ गई। उन्हें फूंकने, उन्हे नष्ट करने श्लोक संख्या १३ मे 'कर्मणि' का पाठभेद का धार्मिक उन्माद उत्पन्न हो गया। उन्हे 'कर्म्माणि' मिलता है। पड़ना कुफ्र समझा जाता था। कितने ही ग्रंथ लोगों ने स्वतः भय से फूंक दिए वो उन्हें जल पाद टिप्पणियाँ : समाधि दे दी। काश्मीर मे यह बहुत बड़े पैमाने १३ (१) क्षेमेंद्र-कवि क्षेमेंद्र का एक नाम पर हुआ। इस काल में जिन्होंने अपना धर्म नहीं व्यासदास भी है। कवि क्षेमेंद्र काश्मीर के राजा त्यागा, उन्हें धार्मिक ग्रंथों को रक्षा की विशेष अनन्त देव (सन् १०२६-१०६३ ई०) और २
१० राजतरङ्गिणी दृग्गोचरं पूर्वसूरिग्रन्था राजकथाऽऽश्रयाः । मम त्वेकादश गता मतं नीलमुनेरपि ॥ १४ ॥ १४. मैंने अपने पूर्वगामी विद्वानों द्वारा रचित राजकथा विषयक ग्यारह ग्रन्थों तथा नील मुनि के मत का निरीक्षण किया है।
उनके पुत्र राजा कलश (सन् १०६३-१०८९ ई०) का समकालीन था। क्षेमेन्द्र संस्कृत साहित्य का ख्यातिप्राप्त कवि हुआ है। उसकी पुस्तक 'नृपा- वली' का उल्लेख कल्हण करता है। अभी तक यह प्राप्त नहीं हो सकी है। क्षेमेन्द्र प्रसिद्ध संस्कृत परिहास कथा लेखक है। प्रका- शेन्द्र इनके पिता का नाम था। पितामह का नाम निम्ना- शय था। प्रपितामह का नाम सिन्धु था। इसके पूर्व पुरुष काश्मीर में अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। उसने तंत्र तथा आलोचक विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्य तथा शास्त्रों का अध्ययन किया था। इन्होंने 'समय मातृका' की रचना सन् १०५० ई० में की थी। 'दशावतारचरित' की रचना सन् १०६६ ई० में की थी। रामायण, महाभारत तथा बृहत्कथा का संक्षेप में रोचक वर्णन, क्रम से रामायण मंजरी, भारत मंजरी तथा बृहत्कथा मंजरी में किया है। 'बोधिसत्वावदान कल्पलता' में पारमिता सूचक आख्यानों का वर्णन है। वह पद्य में लिखी गयी है। 'औचित्य विचार चर्चा' में औचित्य को काव्य का मूल भूत तत्त्व स्वीकार किया है। 'नर्ममाला' तथा 'देशोपदेश' परिहास कथा की संस्कृत में अनुपम रचना है। उसमें उन्होंने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण करते हुए उसकी मीठी चोट की है। उनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध चरित्र चित्रण के साथ-साथ चरित्र निर्माण भी है। इन्होंने कला- विलास, चतुर्वर्ग संग्रह, चारुचर्या, समय मातृकादि, लघु काव्य का रचना की है। भाषा के सुबोध सरस विन्यास में क्षेमेन्द्र ने सरलता प्राप्त की है। भावों की उदात्त व्यंजना में वह सिद्ध हस्त हैं। पाण्डित्य का अनावश्यक प्रदर्शन तथा शब्द के चमत्कारों से दूर रहने का प्रयास किया है। लोक प्रकाश में क्षेमेन्द्र स्वयं अपना नाम 'व्यास दास' देता है। अपनी वंशावली देता है। उसके अनुसार नरेन्द्र के पुत्र भोगीन्द्र थे। भोगीन्द्र के पुत्र सिन्धु थे। सिन्धु के पुत्र प्रकाशेन्द्र थे। प्रकाशेन्द्र के पुत्र क्षेमेन्द्र थे। क्षेमेन्द्र का पुत्र सोमेन्द्र था। (२) नृपावली:—कल्हण ११ ग्रन्थों का नामो- ल्लेख यहाँ नहीं करता। उसने क्षेमेन्द्र की 'नृपावली' तथा हेलाराज को 'पार्थिवावली' का नाम स्पष्ट रूप से दिया है। यह दोनों ग्रन्थ अभी तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। सुव्रत, पद्ममिहिर और श्रीच्छविल्लाकर के ग्रन्थों का नाम कल्हण यहाँ नहीं देता है। पाठभेद : श्लोक संख्या १४ मे 'दृग्गोचरं पूर्व' का पाठभेद 'दृग्देश पूर्व' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४(१) नीलमुनि—नीलमत पुराण नील मुनि की रचना है। काश्मीर मंडल का यह एक प्रकार से आद्य ग्रन्थ है। काश्मीर किस प्रकार किसी समय जलपूर्ण सतीसर था, बारहमूला के पास पर्वत भेदकर, किस प्रकार पानी निकाला गया, काश्मीर की महाभारत काल में क्या अवस्था थी, काश्मीर की परम्परा, पूजा, पर्व, तीर्थ, त्यौहार, धर्म, रीति और रिवाज पर, यथेष्ट प्रकाश नीलमत पुराण डालता है। इसका विस्तृत वर्णन यथास्थान किया गया है। नीलमत पुराण और राजतरंगिणी राजतरंगिणी का श्लोक संख्या १६ में वर्णित प्रथम ४ राजाओं तथा श्लोक संख्या ५०-८२ मे नीलमत के श्लोकों को मिलाया जाय तो स्पष्ट प्रतीत होगा कि कल्हण ने उन्हें नीलमत पुराण
प्रथम तरङ्ग ११ से लिया है। निष्कर्ष निकलता है। कल्हण ने, जैसा वह स्वयं लिखता है, नीलमत पुराण का गंभीर अध्ययन किया था। कल्हण ने नील का पुनः उल्लेख प्रथम तरंग की श्लोक संख्या २८, १८० में, नील कुण्ड का १८३, १८५ में, कर्मकाण्ड, पंचम तरंग संख्या ९१ में नीलजा (वितस्ता) नदी, नीलभू. सरिता अर्थात् वितस्ता या झेलम नदी का नीलकुण्ड में पूजा का तरंग ८-३३५, में उल्लेख किया है। नीलमत पुराण कथन का उल्लेख कल्हण ने राज- तरंगिणी के 'तरंग १:१४ में, लुप्त राजाओं का उल्लेख १:३६ में; नीलमत पुराण के श्लोक का उद्धरण १:७२ में, किया है। ज्येष्ठेश की कथा १:११३ में, सोदर तीर्थ का वर्णन उद्धरण १:१२३ में, बौद्धों द्वारा नील पुराण के कर्मों का बन्द करना १:१७८ में, पिशाचो की कथा १:१८४ में, काश्मीर के तीर्थों तथा सतीसर की कथा आदि नीलमत पुराण से लिया है। नीलमत पुराण उपलब्ध है। कल्हण ने नीलमत पुराण, नील मुनि तथा नील सम्बन्धी जिन बातो का उल्लेख राजतरंगिणी में किया है, वे सब नीलमतपुराण में मिलते हैं। नीलमत पुराण के श्लोकों का उद्धरण राजतरंगिणी में मिलता है। कल्हण ने इसे स्वयं राज- तरंगिणी में स्वीकार किया है। उन्हें उसने नीलमत पुराण से लिया है। कल्हण नीलमत पुराण की सत्यता तथा प्राचीनता सिद्ध करता है। प्राप्य नील- मत पुराण कल्हण की सत्यता भी सिद्ध करता है। साथ ही साथ नीलमत पुराण से जो लेना स्वीकार करता है, वे नीलमत पुराण में मिलते हैं। नीलमत पुराण का अध्ययन करने पर मेरी प्रथम प्रतिक्रिया यह हुई कि नीलमत पुराण वास्तव में काश्मीर का भूगोल है। काश्मीर के पर्वतों, नदियों, जलाशयों, तीर्थों, देवस्थानों, उपत्यकाओं, झरनो आदि, का 'विशद वर्णन पुराण करता है। उसमें वर्णित स्थान, नदियों, स्रोतस्विनियाँ, पर्वतशिखर, पर्वतमालाएँ, जलाशय, तीर्थ तथा देवस्थान आज भी अपने मूल अपभ्रंश किंवा परिवर्तित नामों के साथ जहाँ जिस स्थान पर उनका होना कहा गया है, मिलते है। उनकी दिशा, उनके समीप के वर्णित प्राकृतिक भौगोलिक स्थान, यथास्थान मिलते है। मैंने स्वयं भ्रमण कर स्थानो का पता लगाया है। बहुत से स्थान लोप हो गये हैं। लोग भूल गये हैं। कुछ को मैने इन्हें नीलमत के आधार पर खोजा है। उन्हे यथास्थान पाया है। यद्यपि लंबे काल और मुस्लिम प्रभाव के कारण पुराने नामो तथा ख्याति को लोग भूल गये है। नीलमत पुराण के रचनाकार ने काश्मीर मंडल का भ्रमण कर आँखो देखा वर्णन किया है। दूसरी बात और उल्लेखनीय है। नीलमत पुराण काश्मीर की प्राचीन परम्परा, इतिहास, धर्म, आचार, विचार, मतमतान्तर, कर्मकांड, सामाजिक जीवन, पूजा-पाठ, रहन-सहन, का सजीव चित्रण करता है। निस्संदेह तत्कालीन समाज का वास्तविक चित्र आंखो के सम्मुख आ जाता है। नीलमत पुराण में वर्णित स्थानो, उपस्थानों को, मूल श्लोको से मिलाकर अध्ययन करने से वास्तविकता पर प्रकाश पडता है। हुएन साग और नीलमत पुराण पर द्रष्टव्य है परिशिष्ट। चीनी पर्यटक हुएनसाग ने काश्मीर की यात्रा की थी। कल्हण से शताब्दियो पूर्व आया था। उसने नीलमत द्वारा वर्णित काश्मीर के इतिहास तथा कथाओ का उल्लेख किया है। निस्संदेह तत्कालीन काश्मीर में नीलमत पुराण के प्रचलित होने की पुष्टि करता है। कल्हण के वर्णन की सत्यता सिद्ध करता है। कल्हण ने यथेष्ट ऐतिहासिक सामग्री राजतरगिणी की रचना में नीलमत पुराण से ली है। कल्हण द्वारा उल्लिखित कम से कम दो बातें हुएनसांग के पर्यटन वर्णन में मिलती है। हुएनसाग ने उन्हें तत्कालीन प्रचलित संस्कृत ग्रन्थों से लिया
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प्रथम तरङ्ग १३
[बायाँ स्तम्भ] स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूलर को इस प्रकार के शिलालेख सुन मूह (शोन मुध) तथा बारहकूला (वाराह क्षेत्र) में मिले थे। उसी प्रकार के शिलालेख स्वर्गीय श्री स्तास्तीन को विजशोर (विजयेश्वर) बावन (मार्तंड) तथा अन्य स्थानों पर प्राप्त हुए थे । कल्हण के समय मंदिर, बिहार, मठ, देवस्थानादि अपने पूर्व रूप में मौजूद थे, उसे इस स्रोत से यथेष्ट सामग्री इतिहास रचना और विश्रृंखलित वड़ियों को जोड़ने के लिये मिली थी। मैने काश्मीर के खंडित मन्दिरों, देवालयों, विहारों आदि में खूब भ्रमण किया है । शिलालेखों की खोज की । कुछ मिल नहीं सका । संभव है । वे कहीं भूमि में गड़े पड़े होंगे । (२) पूर्व भूभृत वस्तु—राजा अपने शासन काल में व्यक्ति, मंदिरों, सार्वजनिक स्थानों तथा दान पत्रों के लिये शिलालेखों, ताम्रपत्रों पर अपना नाम, राज्य काल, दान लेने वाले का नाम-पता, दान का प्रयोजन, मंदिर किंवा सार्वजनिक निर्माण- शाला की स्थापना का समय, उद्घाटन, जीर्णोद्वार आदि खुदवाता था । नाम, समय, स्थान, दान का प्रयोजन, कभी-कभी व्यय द्रव्य की संख्या, देवस्थान, मन्दिर एवं सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनकी व्यवस्था, जागीर, भूमिदान किंवा अग्रहार दान, आदि लिखवाता था। कभी-कभी अपनी वंशावली के लेख के साथ, शिला, ताम्र किंवा किसी धातु-पत्र, लकड़ी, अलंकृत पट्ट अथवा पट्टिका, गृह-कार्य योग्य वस्तुओं, जैसे बरतन, रजत पात्रादि, पर नामादि खुदवा कर सम्मानार्थ देता था । इसी प्रकार विशिष्ट नागरिक, सामंत, अमात्य तथा अन्य नागरिक अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने नाम, ग्राम, पद के साथ लेख खुदवाते थे, कल्हण इन्हें पूर्व भूभृत वस्तु कहता है। राजतरंगिणी की लेखन-सामग्री में उसने इन लेखों का संग्रह किया था। जिनके कारण राजाओं, उनके सामंतों, तत्कालीन लोगों के काल, स्थान, राज काल, और दान की गई वस्तुओं को देखकर,
[दायाँ स्तम्भ] उस समय की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति का पता लगाया जा सकता था। उस समय की कलाकृतियों को देखकर, तत्कालीन कला का प्रकार तथा उसकी लोकप्रियता का अनुमान लगाकर, कल्हण ने इस ग्रन्थ की रचना की है। (३) प्रशस्तिपट्ट—मन्दिरों तथा सार्वजनिक स्थानों में प्रशस्तिपट्ट, राजाओं, विशिष्ट व्यक्तियों तथा स्थानों की स्तुति में लगाया जाता था । तीर्थ, देवस्थान, राजादि के गौरव अथवा सम्मान में काव्य- मय पद्य में स्तुति उत्कीर्ण की जाती थी । प्रशस्ति का मूल स्रोत वैदिक साहित्य है। स्तोत्रों द्वारा प्रशस्ति गीत तथा काव्य दोनों निकले हैं। स्तोत्रों में देवताओं की प्रशस्ति किंवा स्तुति की जाती है। प्रशस्ति गान से गौरव गान निकला है। पूर्व काल में केवल देवताओं तक यह सीमित था । तत्पश्चात् लौकिक पुरुष विशेष की प्रशस्ति किंवा कीर्ति लिखी और गायी जाने लगी । पहले उन लौकिक पुरुष विशेष तथा मानवों की प्रशस्ति गायी तथा लिखी जाती थी जिन्होंने देवत्व प्राप्त कर लिया था । इस श्रेणी में साधु, महात्मा, योगी एवं आध्या- त्मिक पुरुष थे। अनन्तर राजाओं आदि के प्रशस्ति गीत लिखे और गाये जाने लगे। कालान्तर में राज कवि होने लगे । वे अपने स्वामी की प्रशंसा में प्रशस्ति गीत और काव्य की रचना करने लगे । प्रशस्ति काव्य के कवि राजाश्रित होते थे । आज- कल अभिनन्दन ग्रन्थ देने की प्रथा चल निकली है । यह किसी को भी समर्पण किया जा सकता था। उसमें व्यक्ति विशेष की प्रशस्ति होती है। पट्ट का अर्थ महीन वस्त्र होता है। लिखने की पटिया, धातु पत्र, चर्म-पत्र, भोज-पत्र की होती थी । जिस पर जन्मपत्रों के समान किसी राजा अथवा किसी की वंशावली, वंश के कार्यों का उल्लेख, वंश में उत्पन्न हुए लोगों के जन्म तथा मृत्यु की तिथि आदि लिखी जाती थी । पुरोहित, चारण, भाट, बंदी,
१२ राजतरङ्गिणी दृष्टैश्च पूर्वभूपर्तृ प्रतिष्ठावस्तुशासनैः । प्रशस्तिपट्टैः शास्त्रैश्च शान्तोऽशेषभ्रमक्लमः ॥ १५ ॥ १५ पूर्व काल के भूपतियों द्वारा मंदिरों के प्रतिष्ठाकालीन एवं दान संबंधी प्रतिष्ठा¹ तथा वस्तु² प्रशस्तिपट्टों³ और शास्त्रों⁴ के अवलोकन द्वारा जो कुछ भ्रम मुझमे शेष रह गया था उसकी भी शांति हो गई है।
था । प्रथम यह कि पुरा काल में काश्मीर विशाल सरोवर अर्थात् सतीसर था । जल बह जाने के कारण रमणीय भूमिमय उपत्यका बन गयी थी । नाग जाति यहाँ की संरक्षक थी । जल बह जाने पर सरोवर काश्मीर राज्य के रूप में परिणत हो गया । उस समय भी नाग जाति वहाँ पर थी । हुएनसांग मिहिर कुल का वर्णन करता है। वह काश्मीर का राजा था । घोर अत्याचारी था । बौद्ध धर्मानुयायियो का शत्रु था । उसे लोगो के हत्या की कुप्रवृत्ति प्राप्त थी । वह बाल अवला वृद्ध सबको ताड़ित करना था । राजतरंगिणी में कल्हण ने पहली घटना का वर्णन १. २४-३१ में किया । दूसरी घटना-मिहिर कुल के शासन और उसके नृशस प्रवृत्तियो-का वर्णन ( तरग १ के २८६-३२५ ) मिलता है । मिहिर कुल के राज्यकाल के सदभं मे इस विषय पर और प्रकाश डाला गया है । काश्मीर में मुसलिम शासन हो जाने पर भी नीलमत पुराण की मान्यता थी । मुसलिम बादशाह नीलमत पुराण का आदर करते थे । नीलमत पुराण की प्राचीनता तथा उसके अस्तित्व का समर्थन श्री जोन राज द्वितीय राजतरंगिणी में करते हैं । श्री जोनराज के समय में नीलमत पुराण का पाठ होता था । काश्मीर के प्रसिद्ध बादशाह बडशाह जैनुल आ- वदीन (सन् १४२०-१४७० ई० ) पण्डितों से नीलमत पुराण सुनता था । उसके आधार पर उसने एक नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन जगत् में किया था । (दन १९ )
पाद टिप्पणियाँ : १५. ( १ : प्रतिष्ठाशासन—इस शब्द का प्रयोग कल्हण ने उन शिलालेखों के लिये किया है जो मंदिरों, मठों, विहारो, देवस्थानों, स्मारकों, प्रतिमाओ, के पीठस्थानों, सिहासनो, राजप्रासादो, भवनों पर, स्मृति तथा परिचय निमित्त उत्कीर्ण किये जाते थे । मन्दिरो तथा मूर्तियो के प्रतिष्ठा के समय 'शिला लेखादि लगाने की प्रथा आज भी प्रचलित है। राजाओ के राज्याभिषेक के समय शासन प्रसारित किये जाते थे, जैसे—बंदियो की कारागार से मुक्ति, करों की छूट, बलि के लिये पशुहत्या पर प्रतिबन्ध । राजा अपने शासन काल में किस नीति का अवलंबन करेगा, कितने दोषपूर्ण राजनियम अप्रचलित किये जायेंगे, कौन से सुधार एवं संशोधन प्रचलित राज नियमो में किये जायेंगे आदि । राजाओं के राज्या- भिषेक के अवसर पर कुछ प्रतिष्ठा शासन प्रसारित किये जाते थे । कितने दोषपूर्ण राजनियम अप्रचलित किये जायेंगे, कितने प्रचलित राज नियमो में संशोधन, परिवर्धन, किये जायेंगे, इसकी तालिका प्रतिष्ठा शासन में होती थी । राज्याभिषेक उत्सव के उपलक्ष में मंदिरो, व्यक्तियो, विहारो, मठो को क्या दान दिया जायेगा, इत्यादि बातें प्रतिष्ठा शासन में आती थी । यह प्रथा आज भी प्रचलित है। इस प्रकार की सामग्रियां काश्मीर में आज भी गडिन बिखरी पड़ी हैं । मुस्लिम शासन काल में सभी मंदिर, देवस्थान, आदि तोड दिये गये थे । उनके पत्थर मस्जिदो, मजारों, ज़ियाग्तों तथा मकानों में लग गये हैं। कल्हण के पूर्व हुई, रानी दिद्दा का एक शिलालेख मिला है। यह लाहोर के संग्रहालय में सुरक्षित है।
प्रथम तरङ्ग १३
स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूह्लर को इस प्रकार के शिलालेख खून मूह (खोन मुश) तथा बारहमूला (वाराह क्षेत्र) में मिले थे । उसी प्रकार के शिलालेख स्वर्गीय ओ स्तास्तोंन को विजभ्रोर (विजयेश्वर) यावन (मार्त्तण्ड) तथा अन्य स्थानों पर प्राप्त हुए थे । कल्हण के समय मंदिर, विहार, मठ, देवस्थानादि अपने पूर्व रूप में मौजूद थे, उसे इस स्रोत से यथेष्ट सामग्री इतिहास रचना और विश्रृंखलित कड़ियों को जोड़ने के लिये मिली थी । मैने काश्मीर के खंडित मन्दिरा; देवालयों, विहारों आदि में खूब भ्रमण किया है । शिलालेखों की खोज की । कुछ मिल नही सका । संभव है । वे यहीं भूमि में गड़े पड़े होंगे । (२) पूर्व भूभूत वस्तु—राजा अपने शासन काल में व्यक्ति, मंदिरों, सार्वजनिक स्थानों तथा दान पत्रों के लिये शिलालेखों, ताम्रपत्रों पर अपना नाम, राज्य काल, दान लेने वाले का नाम-पता, दान का प्रयोजन, मंदिर किंवा सार्वजनिक निर्माण- शाला की स्थापना का समय, उद्घाटन, जीर्णोद्धार आदि खुदवाता था । नाम, समय, स्थान, दान का प्रयोजन, कभी-कभी व्यय द्रव्य की संख्या, देवस्थान, मन्दिर एवं सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनकी व्यवस्था, जागीर, भूमिदान किंवा अग्रहार दान, आदि लिखवाता था । कभी-कभी अपनी वंशावली के लेख के साथ, शिला, ताम्र किंवा किसी धातु-पत्र, लकड़ी, धनंकृत पट्ट अथवा पट्टिका, गृह-कार्य योग्य वस्तुओं, जैसे बरतन, रजत पात्रादि, पर नामादि गुदवा कर सम्मानार्थ देता था । इसी प्रकार विशिष्ट नागरिक, सामंत, अमात्य तथा अन्य नागरिक अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने नाम, ग्राम, पद के साथ लेख खुदवाते थे, कल्हण इन्हें पूर्व भूभूत वस्तु कहता है । राजतरंगिणी की लेखन-सामग्री में उसने इन लेखो का संग्रह किया था । जिनके कारण राजाओ, उनके सामंतों, तत्कालीन लोगो के काल, स्थान, राज काल, और दान की गई वस्तुओं को देखकर, उस समय की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति का पता लगाया जा सकता था । उस समय की कलाकृतियों को देखकर, तत्कालीन कला का प्रकार तथा उसकी लोकप्रियता का अनुमान लगाकर, कल्हण ने इस ग्रन्थ की रचना की है । (३) प्रशस्तिपट्ट—मन्दिरों तथा सार्वजनिक स्थानों में प्रशस्तिपट्ट, राजाओं, विशिष्ट व्यक्तियों तथा स्थानों की स्तुति में लगाया जाता था । तीर्थ, देवस्थान, राजादि के गौरव अथवा सम्मान में काव्य- मय पद्य में स्तुति उत्कीर्ण की जाती थी । प्रशस्ति का मूल स्रोत वैदिक साहित्य है । स्तोत्रों द्वारा प्रशस्ति गीत तथा काव्य दोनो निकले है । स्तोत्रों में देवताओ की प्रशस्ति किंवा स्तुति की जाती है । प्रशस्ति गान से गौरव गान निकला है । पूर्व काल में केवल देवताओ तक यह सीमित था । तत्पश्चात् लौकिक पुरुष विशेष की प्रशस्ति किंवा कीर्ति लिखी और गायी जाने लगी । पहले उन लौकिक पुरुष विशेष तथा मानवों की प्रशस्ति गायी तथा लिखी जाती थी जिन्होंने देवत्व प्राप्त कर लिया था । इस श्रेणी में साधु, महात्मा, योगी एवं आध्या- त्मिक पुरुष थे । अनन्तर राजाओं आदि के प्रशस्ति गीत लिखे और गाये जाने लगे । कालान्तर में राज कवि होने लगे । वे अपने स्वामी की प्रशंसा में प्रशस्ति गीत और काव्य की रचना करने लगे । प्रशस्ति काव्य के कवि राजाश्रित होते थे । आज- कल अभिनन्दन ग्रन्थ देने की प्रथा चल निकली है । यह किसी को भी समर्पण किया जा सकता था । उसमें व्यक्ति विशेष की प्रशस्ति होती है । पट्ट का अर्थ महीन वस्त्र होता है । लिखने की पटिया, धातु पत्र, चर्म-पत्र, भोज-पत्र की होती थी । जिस पर जन्मपत्री के समान किसी राजा अथवा किसी की वंशावली, वंश के कार्यों का उल्लेख, वंश में उत्पन्न हुए लोगों के जन्म तथा मृत्यु की तिथि आदि लिखी जाती थी । पुरोहित, चारण, भाट, बंदी,
१४ राजतरङ्गिणी
[बायाँ स्तम्भ]
सूत के पास पट्टा, मुट्ठे अर्थात् तालिका होती थीं। राजवंशो के पट्ट अलंकृत रखे जाते थे। विशेष पर्वो पर उन्हें निकाला जाता था। उनका पाठ होता था। मिथिला में मैथिल ब्राह्मणो के पास उनके यजमानों की पूरी वंशावली रहती है। ब्राह्मण लोग विवाहादि उसे देखकर ठीक करते हैं। पट्टो के आधार पर वे पता लगा लेते हैं। किस वंश में कितने पुत्र तथा कन्याएँ हैं। उनका गण्य बैठाकर वे विवाह निश्चय करते हैं। ग्रामों में आज भी वह प्रथा प्रचलित है। पाश्चात्य देशो जैसा प्रेम-विवाह भारत मे नगण्य था। आजकल कुछ प्रचलित हो रहा है। सूत, बंदी, भाट, चारण, उत्सव पर उन्हे गाते थे। कुटुंबों में प्रशस्तिपाठ करने की रीति थी। राज्याभिषेक, युद्ध, विजय, के समय उनके पुण्य कार्यों, उनकी वीरता और विशिष्ट कार्यों का गुणगान किया जाता था। इस प्रकार के कवि राजस्थान, गुजरात के राजवंशों से अब भी सबन्धित हैं। उन्हें राजकवि कहा जाता है। उन्हें वाच अथवा वही कहते हैं। भारत की रियासतों, तालुकेदारों तथा बड़े जमींदारों के यहाँ भी कवि रहते थे। वे कविता-पाठ करने के साथ ही साथ वंश का इतिहास कविता मे बना दिया करते थे। मंदिरों तथा कुटुम्बों में चैत्र सुदी प्रतिपदा को इनका पाठ पढ़ा जाता था। कुछ कुटुम्बों में विवाह एवं श्राद्ध के अवसर पर पढ़ा जाता था। मैं भारतीय नव परिवहन मंडल के अध्यक्ष की हैसियत से गुजरात के बंदरगाहो को देखने मई सन् १९६५ ई० में गया था। वड़ौदा संग्रहालय में शिलालेखों पर उत्कीर्ण मुझे प्रशस्ति मिली। देशी राज्यों में भिन्न भिन्न रूप से प्रशस्तियां लिखी जाती थीं। किन्तु उनका विषय वस्तु प्रायः एक ही रहा है।
[दायाँ स्तम्भ]
विजय दशमी, शस्त्रपूजा तथा यात्रा के समय सम्मेलनों अथवा जलूस के आगे आगे उच्च स्वर में चारण, भाट, बंदी, सूत गाते थे। आज भी बारात में आगे आगे ये गाते चलते हैं। बारात में वर और कन्या पक्षों के प्रशस्तिवाचक अपने अपने वंशगौरव की कथा सुनाते हैं। यह प्रथा भारत में प्रायः लोप हो रही है। (४) शास्त्र—कल्हण ने यहाँ पर शास्त्र शब्द का प्रयोग संस्कृत में लिखे ग्रन्थों के लिए किया है। स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूह्लर कल्हण के 'शास्त्र' शब्द का अर्थ धर्मशास्त्र एवं संस्कृत में लिखे गया,-विधि पुस्तको से केवल नहीं लगाते। उनका मत है। शास्त्र शब्द के अन्दर संस्कृत के उन सभी ग्रन्थों का समावेश हो जाता है, जिनमें लेखक ग्रन्थ की समाप्ति अर्थात् अन्त में अपना नाम, रचना काल, लिखकर ग्रन्थ को इति लिखता है। हुएनसांग ने अशोक और कनिष्क की बौद्ध परिषदों का उल्लेख करते समय अभिधर्म शास्त्र शब्द का प्रयोग किया है। इसमें निबन्ध तथा सिद्धान्त ग्रन्थो का समावेश हो जाता है। कल्हण ने शास्त्र शब्द का व्यापक अर्थ लगाया है। आज भी संस्कृत में लिखे ग्रन्थों को जनता शास्त्र समझती है। प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणो, जीवनियों, ऐतिहासिक चरित्रचित्रणों, निबंधों, सिद्धान्त ग्रन्थो, जिनमें कुछ भी ऐतिहासिक सामग्री कड़ी जोड़ने के लिए मिल सकती थी, कल्हण ने शास्त्र स्रोत माना है। प्राचीन समय में ग्रन्थ लिखने की एक प्रचलित शैली थी। ग्रन्थ के अन्त, प्रत्येक सर्ग के अन्त, ग्रंथ के आरम्भ में पुस्तक का नाम, अध्याय प्रसंग, लेखक का नाम, किस राजा के काल में और किस समय रचना की गयी है, इसका उल्लेख किया जाता था। कल्हण ने राजाओं का काल निर्णय करने में इस अमूल्य स्रोत का उपयोग किया था। इससे प्रकट होता है। कल्हण ने राजतरंगिणी लिखने के लिए
प्रथम तरङ्ग १५ द्वापञ्चाशतमाम्नायभ्रंशद्यान् नास्मरन् नृपान् । तेभ्यो नीलमताद् दृष्टं गोनन्दादिचतुष्टयम् ॥ १६ ॥ १६ पूर्व रचनाकारों को वावन राजाओं के इतिवृत्त का प्रमाणों के अभाव मे अज्ञान था । उनमें से गोनंदादि चार राजाओं का वर्णन नीलमत पुराण से लिया गया है। अपनी पैनी दृष्टि के साथ ही साथ, परिश्रम से सामग्री (३) यशोवती, तथा (४) गोनंद द्वितीय है। एकत्रित कर, इस ऐतिहासिक महाकाव्य की रचना नीलमत ६-९। में हाथ लगाया था। कीर्ति स्तंभ-विजय स्तंभ- कल्हण न इस तरंग की श्लोक-संख्या १६ तथा ४५ कश्मीर में कीर्ति-स्तंभ का उल्लेख नहीं किया है। में कल्हण ने स्पष्ट कहा है। पूर्ववर्ती ५२ मन्दिर, धर्मशाला, विहार, तड़ाग, वापी, चैत्य, मठादि राजाओं के इतिहास का किसी समय अस्तित्व के शिलालेखों में राजाओं तथा महान् व्यक्तियों किंवा था। काश्मीर में वे ग्रंथ थे। परन्तु उनका लोप निर्माणकर्त्ताओं की कीर्ति के पद लिखे जाते हैं। हो गया है। कल्हण ने उन्हें खोजने का यथा- शक्ति प्रयास किया । राजा लोग विजय, राज्यारोहण, यश, किसी विशेष घटना के स्मरणार्थ कीर्ति-स्तंभों का निर्माण कराते हैं। मिस्र, बेबीलोन, असीरिया तथा काश्मीर का इतिहास क्रमबद्ध तिथियों तथा वर्षों तक में वर्णित किया गया है। कल्हण से सहस्रों ईरान के प्राचीन राजाओं ने अपनी कीर्तियों को वर्ष पूर्व लुप्त राजाओ का काल आता है। सामग्री स्तंभों पर खुदवाया था। भारत के गुप्त सम्राटों अप्राप्य देखकर कल्हण ने कारण भी उपस्थित किया ने यह प्रथा चलाई थी। अशोक के स्तंभ कीर्ति स्तंभ है। उन ग्रन्थों के लोप होने का क्या कारण था ? न होकर प्रचारार्थ धर्म स्तंभ कहे जायेंगे । चन्द्रगुप्त, उनको जब कोई उपयोगिता नही रह गई तो समुद्रगुप्त, स्कन्दगुप्त आदि राजाओं ने इस प्रकार के उन्हें कौन पढ़ेगा ? अफगानिस्तान तथा भारत स्तंभ का निर्माण कराया था। मन्दसौर तथा महरौली के पश्चिम उत्तर सीमांत में वेदों तथा संस्कृत (दिल्ली) के कीर्ति स्तंभ इसके ज्वलन्त उदाहरण ग्रन्थों की रचना हुई थी। वहाँ के लोग मुसलमान हैं। कल्हण ने संभव है, इस प्रकार के अभिलेखों को, हो गए। अतएव पुरातन वैदिक साहित्य तथा प्रशस्ति-पट्ट वर्ग में रखा हो। कीर्ति और विजय स्तम्भ संस्कृत ग्रन्थों की उपयोगिता नष्ट हो गई। वे में अन्तर है। विजय स्तम्भ किसी विजय के उपलक्ष्य लुप्त हो गए, उनके स्थान पर अरबी, फारसी में लगाया जाता था। प्रत्येक विजय स्तम्भ कीर्ति तथा नवीन लिपी आई। इसका अर्थ यह नहीं स्तम्भ होता है। परन्तु प्रत्येक कीर्ति स्तम्भ का विजय है। आज से १५ सौ वर्ष पूर्व अफगानिस्तान स्तम्भ होना सम्भव नहीं है। आदि में संस्कृत तथा वैदिक साहित्य का अस्तित्व नही था। यह प्रकृति का गुण है। जिन वस्तुओं पाठभेद : की उपयोगिता नष्ट हो जाती है उन्हें त्याग दिया श्लोक संख्या १६ में 'गोनन्दादि' का पाठभेद जाता है। शरीर भी जब क्षीण, रोग-ग्रस्त ओर 'गोनर्दादि' मिलता है। जर्जर हो जाता है तो आत्मा भी इसका साथ त्याग पादटिप्पणियाँ : देती है। १६ (१) चार राजा- (१) गोनंद, (२) दामोदर,
१६ राजतरंगिणी बद्धा द्वादशभिर्ग्रन्थसहस्रैः पार्थिवावलिः । प्राङ्महाव्रतिना येन हेलाराजद्विजन्मना ॥ १७ ॥ १७ पाशुपतव्रती ब्राह्मण हेलाराज' ने पूर्वकाल में बारह हजार श्लोको की पुस्तक 'पार्थिवावलि' की रचना की थी । तन्मतं पद्ममिहिरे दृष्ट्वाऽशोकादिपूर्वगान् । अष्टौ लवादीन् नृपतीन् स्वस्मिन् ग्रन्थे न्यदर्शयत् ॥ १८ ॥ १८ पद्ममिहिर ने हेलाराज की कृति का अध्ययन कर अपनी रचना में अशोक के पूर्ववर्ती आठ राजाओं का और वर्णन अंकित किया है। वे लव तथा उसके क्रमशः उत्तराधिकारी थे । पाठभेद : श्लोक संख्या १७ मे 'पार्थिवाद' का पाठभेद 'या नृपाव' मिलता है । श्लोक संख्या १८ 'पद्ममि' का 'पूर्वमि', पूर्वगा' का 'पूर्वजा तथा 'युगलकम्' का 'युग्मम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७ (१) हेलाराज काश्मीरी ब्राह्मण थे। उनका काल ९वी तथा १०वी शताब्दी के मध्य माना जाता है। उन्होंने 'वाक्यपदीय' पर एक भाष्य लिखा है। राजा लव से शचीनर तक के राजाओं का उल्लेख कल्हण ने राजतरंगिणी के प्रथम तरंग की श्लोक संख्या ८४ से १०० तक में किया है। हेलाराज पाशुपत पंथ के अनुयायी थे । शैव सिद्धान्त के आधार आधारित एक पंथ था। यह शिव रूप में ईश्वर की कल्पना करता है। शिव को जगत् का सर्जक तथा चलाने वाला मानते हैं। परन्तु जगत् उत्पत्ति का उन्हे भौतिक कारण नही बताते । सांख्य दर्शन के 'प्रधान' सिद्धान्त को मानते हुए वे इस सिद्धान्त में विश्वास करते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है। पशुपति किंवा पशुपतिनाथ का मंदिर बागमती नदी के तट पर काठमाण्डू नेपाल मे स्थित है। में यहाँ का दर्शन तथा भ्रमण कर चुका हूँ। पशुपति मूर्ति के विषय में अपनी पुस्तक 'जापान् नेपाल' में प्रकाश डाल चुका हूँ। (२) द्विजन्मना :-कल्हण ने हेलाराज को द्विज कहा है। हेला शब्द नाम के लिये सुसंस्कृत और परिष्कृत नहीं कहा जा सकता। वह शब्द स्त्रीलिंग है। राज शब्द अन्त में लगा देने से हेलाराज होकर इसे पुंलिंग रूप प्राप्त हो गया है। हेला का अर्थ होता है, तिरस्कार, अपमान, आसानी, सौलभ्य, सरवरी एवं उत्कट मैथुनेच्छा । हिन्दी भाषा में हेला शब्द मल उठाने वाले भंगियों के लिये आता है। यह निसन्देह शूद्र जाति मानी जाती थी । द्विजन्मना विशेषण हेला शब्द में लगाकर हेला शब्द को उच्चस्तरीय बनाने का सुन्दर प्रयास कल्हण ने किया है। कश्मीर मे डोम गायक होते थे। कुछ तो राज परिवार की शोभा तक बढा चुके है। काशी में प्रसिद्ध शहनाई- वादकों का कुटुम्ब हेला था । इस पीढ़ी में कुछ मुसलमान हो गये हैं। हेला शब्द का काश्मीर की लौकिक भाषा में उस समय क्या अर्थ था। गवेषणा का विषय है। हेलाराज शुद्ध ब्राह्मण थे इसमें किसी प्रकार का सन्देह नही है। इसी बात को पाठको के मन पर जमाने के लिये कल्हण ने द्विज शब्द का प्रयोग हेलाराज के नाम के साथ बलवती भाषा में किया है। द्विज के लिये कहा गया है-'द्वाभ्यां जन्मसंस्का- राभ्या जायते' दो बार उत्पन्न किंवा जन्म धारण करने वाले को द्विज कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रो और वैश्य द्विज कहे गये हैं। संस्कार के कारण उनका द्वितीय जन्म माना जाता है। धारणा है। यज्ञोपवीत
प्रथम तरङ्ग १७ येऽप्यशोकादयः पञ्च श्रोच्छविल्लाकरोऽब्रवीत् । तान् द्वापञ्चाशतो मध्याच्छ्लोकस्तस्य तथा ह्ययम् ॥ १९ ॥ १९ श्रीच्छविल्लाकर¹ ने अशोक के पश्चात् के जिन पाँच राजाओं का वर्णन किया है। वे लुप्त बावन राजाओं में से हैं, क्योंकि उसका निम्नलिखित श्लोक वह बात स्वतः स्पष्ट कर देता है। “आऽशोकादभिमन्योर्ये प्रोक्ताः पञ्च महीभुजः । ते द्वापञ्चाशतो मध्यादेव लब्धाः पुरातनैः ॥” २० ॥ २० प्राचीन रचनाकारों ने अशोक से आरम्भ कर अभिमन्यु तक जिन पांच महीभुजों का वर्णन किया है, उसे उन्होंने बावन राजाओं की तालिका मे से ही लिया है। के पश्चात् ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य द्विज कहे जाते हैं। प्रथम जन्म माता देती है। दूसरा जन्म उन्हें संस्कार देता है। अंडज प्राणी द्विज कहे जाते हैं। पहला जन्म अंड रूप में माता देती है। दूसरा जन्म अंडा फूटने पर होता है। पक्षी, सर्प, मछली आदि अंडज द्विजन्मा होने के कारण द्विज कहे जाते हैं। दांत को भी द्विज कहते हैं। मनुष्य का दांत दोबार मुख में पैदा होता है। पहला दाँत बाल्यावस्था के पश्चात् टूट जाता है। तत्पश्चात् दूसरा दाँत मुख में पुनः उत्पन्न होता है। आज कल भारतवर्ष में द्विज शब्द केवल ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त होता है। राजतरंगिणी के सभी अनुवादकर्ताओं ने द्विज का अर्थ यहाँ पर ब्राह्मण दिया है। श्री स्टीन तथा श्री आर एस. पण्डित दोनों ने यहाँपर द्विज का अनुवाद ब्राह्मण किया है। मैंने द्विज शब्द को ही रख दिया है। द्विज शब्द प्रचलित है। साधारण है। उसका अर्थ सभी समझते हैं। द्विजन्म प्रथा इसाइयों में भी प्रचलित है। बपतिस्मा के पश्चात् दूसरा जन्म होना माना जाता है। यहूदी और मुसलमान जबतक खतना नहीं हो हो जाता, वे यहूदी तथा मुसलमान नहीं माने जा सकते। प्राचीन यूनान में डस्टनाइ डिमो नेमम पन्थ में द्विज प्रथा प्रचलित थी। पाठभेद : श्लोक संख्या १९ में 'तान्द्राप' का पाठभेद 'तान् स्वाप' मिलता है। श्लोक संख्या २० में 'आशोका' का 'अशोका' और 'शतो' का 'शतौ' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियां : १९ (१) श्रीच्छविल्लाकर के विषय में अभी तक कुछ भी साधिकार बातें नही जाना जा सकी है। कल्हण ने अशोक के पश्चात् के ५ राजाओ का उल्लेख राजतरंगिणी में छविल्लाकार के आधार पर किया है। अतएव ऐतिहासिक दृष्टि से कालगणना में अंतर पड जाता है। इसके लिये कल्हण की अपेक्षा पूर्वलेखक अधिक उत्तरदायी हैं, जिनके आधार पर कल्हण ने लिखा है। इस प्रकार ५२ राजाओं में कल्हण ने १७ राजाओं का पता तत्कालीन ग्रन्थों के आधार पर लगाया है। उनका उल्लेख और वर्णन इन्हीं के आधार पर किया है। इससे यह भी प्रकट होता है। कल्हण ने उन्ही सामग्रियों का उपयोग किया है, जो काश्मीर में उपलब्ध थी। कल्हण का लेखन काल सन् ११४८-११५० ई० है। सन् ७१२ में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया था। सिंधराज दाहिर पराजित हो चुका था। उन दिनों सिंध के ब्राह्मणों तथा बौद्धों के मतभेद के कारण अरबों को सफलता मिली थी।