रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
तृतीय संस्करण सम्वत् २०५८ नवम्बर २००१ मूल्य २५०/- रु० पुस्तक प्राप्तिस्थानम् : १. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, C/o मैसूर पैट्रो केमिकल्स लिमिटेड, ४०१/४०४, रहेजा सेण्टर, २१४, नरीमन पोइण्ट, बम्बई ४०००२१ दूरभाष : ०२२-२८४०७१४ २. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, C/o मैसूर पैट्रो केमिकल्स लिमिटेड, ११३, पार्क स्ट्रीट, सात तल्ला, कलकत्ता-७०००७१ दूरभाष : ०३३-२२९४९१६ ३. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, C/o मैसूर पैट्रो केमिकल्स लिमिटेड, ५०४, निर्मल टावर, २६, बाराखम्बा रोड नई दिल्ली-११०००१ दूरभाष : ०११-३७२५६२७ ४. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, धर्मसंघ विद्यालय, रमण रेती, वृन्दावन-२८११२१ (मथुरा) (उ० प्र०) दूरभाष : ०५६५-५४००२८, ५४०२७८ ५. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, काशी विश्वनाथ (व्यक्तिगत) मंदिर, मीरघाट, वाराणसी-२२१००१ (उ० प्र०) दूरभाष : ४०१४३४ मुद्रक : प्रेस वर्क्स, ३०, ट्रक पार्किंग सेन्टर, माल रोड, दिल्ली-११००५४
धर्मसापेक्ष, पक्षपातविहीन, लोकतान्त्रिक, अध्यात्मवाद पर आधारित रामराज्य दर्शन के प्रस्तोता "राष्ट्रपुरुष"
ब्रह्मलीन अनन्त श्री स्वामी करपात्री जी महाराज
० श्रीहरिः ० प्रस्तावना प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता सर्वजीवहितैषी वीतराग तत्त्वदर्शी महात्मा हैं। उनका किसी के प्रति मनोमालिन्य अथवा परिपन्थिता वैसे ही संभव नहीं है जैसे सकलहृदयाह्लादक शीतरश्मि से तिग्मरश्मि के उत्ताप का उद्गम । फिर भी जहां उन्हें अशुद्धि दिखाई देती है, जहाँ अल्पज्ञों द्वारा वेद और शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ कर उनपर प्रहार किया हुआ दीख पड़ता है एवं जहाँ संस्कृतवाङ्मय में दुरभिसन्धिवश अथवा अज्ञानवश भारतीयसंस्कृति के विरोधी वातावरण का सर्जन किया रहता है, वहाँ उन्हें लोक-कल्याण के लिए यह अर्थ अशुद्ध है, शास्त्र का तात्पर्य यह है, यह आस्था भारतीय संस्कृति तथा शास्त्रमर्यादा के विपरीत है; यह कहना उचित ही नहीं परमावश्यक भी है। इस प्रकार का प्रतिपादन करनेवालों के मधुर वाग्जाल में फँस कर जनता अपनी सनातन मर्यादा का त्याग न करे। भारतीय संस्कृति से भिन्न संस्कृतिवाले वेद-शास्त्रों के तात्पर्य के अनभिज्ञ मनीषियों का कथन अनुकरणीय नहीं है। वह किसी दुरभिसन्धि वश—जनता को विधर्मी बनाने के लिए—वागुरा है, मार्ग में तृण आदि से आच्छादित महान् गर्त है। इस मार्ग का पथिक होनेपर गर्तपात का भय है। यह बात कोई शास्त्रतत्त्वाभिज्ञ महान् मनीषी ही बता सकता है। यदि वह भोलीभाली शास्त्रतात्पर्यानभिज्ञ जनता का हितैषी है तो अवश्य ही यह बताना चाहिए। न बताना उनका अपने कर्तव्य से विचलित होना कहा जायगा। महाकवि श्रीहर्ष ने अपने नैषधीयचरित महाकाव्य में कहा है— "अध्वाग्रजाप्रन्निभृतापदन्धुर्वन्धुर्यदि स्यात् प्रतिबन्धुमर्हः ।” अर्थात् बन्धु के पुरोवर्ती मार्ग में आपित्तरूपी कूप या महान् गर्त तृण आदि से आच्छादित विद्यमान हो तो हितैषी पुरुष को बता देना उचित है कि इस मार्ग से मत जाओ, यदि जाओगे तो विपत्तिरूपी गहरे गड्ढे में गिर जाओगे । सत्सङ्ग के सिलसिले में किसी भक्त सज्जन ने कामिक बुल्के पादरी की रामकथा अनन्तश्रीविभूषित परमहंस- परिव्राजकाचार्य हरिहरानन्द सरस्वती करपात्रीजी महाराज को भेट की एवं उसके अवलोकन का सविनय अनुरोध किया । पुस्तक की अधिकांश सामग्री श्रीस्वामीजी को बहुत खटकी । फलतः रामायणमीमांसा के रूप में स्वामीजी के महान् सदय अवदान का प्रादुर्भाव हुआ । बुल्के की रामकथा चिरकाल से प्रकाशित है। वह उनका शोधग्रन्थ है । उसमें उन्होंने विभिन्न संस्कृति के विविध देशों की नाना रामकथाओं का उल्लेख कर श्रीरामचन्द्रजी के कतिपय चरितों का विशदरूप से जानने के प्रामाणिक साधन आर्ष महाकाव्य बाल्मीकिरामायण को अपने पाश्चात्य दृष्टिकोण से छिन्न-भिन्न कर उसके महत्त्व को न्यून करने की दुरभिसन्धिपूर्ण चेष्टा की है । भारतीय दर्शन में कुछ मत निरीश्वरवादी हैं। वे वेदविरोधी एवं वेदप्रतिपादित यज्ञयाग आदि के भी विरोधी हैं। उन्होंने रामायण की लोकप्रियता देखकर सोचा, लोकप्रिय रामायण की ओर आकृष्ट हमारे सम्प्रदाय की जनता रामायण-पाठ से ईश्वरभक्त, वेदानुगामी तथा यज्ञयागों के प्रति अभिरुचि रखनेवाली न बन जाय, इस भय से उन्होंने रामायण को अपने सांचे में ढाला है। अन्यान्य देशों में प्रचलित रामकथाओं में से किन्हीं में प्रायः मूल कथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही है। बीच-बीच में वहाँ अपने देश की संस्कृति का पुट दे दिया गया है । नाम प्रायः सब बदल दिये गये हैं। रामायण का स्थल भी अपना देश ही माना गया है। उनमें हमारी संस्कृति का विरोध अधिक दृष्टिगोचर नहीं होता है, किन्तु अनेकों रामकथाओं में मूलकथा में भी विभेद है और विकृतियाँ प्रभूतमात्रा में
हैं । राम और सीता दोनों को दशरथ की सन्तति एवं भाई-बहन कहकर, अपनी संस्कृति के अनुसार, उनका वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया गया है । राम और लक्ष्मण दोनों का, अपनी संस्कृति के अनुसार, सीता से विवाह प्रतिपादित है । बुद्धघोष की सुत्तनिपात टीका में शाक्य-वंश की उत्पत्ति के सिलसिले में लिखा है— वाराणसी की पटरानी की नौ सन्तानें थीं चार पुत्र और पाँच पुत्रियाँ । उनके मर जाने के बाद अम्बट्ठ राजा ने नया विवाह किया और अपनी युवती पत्नी को अपनी पटरानी बनाया । नयी पटरानी के पुत्र उत्पन्न होने पर राजा ने उसको एक वर प्रदान किया । उस वर के बल पर उसने अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन का अधिकार माँगा । राजा ने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया । किन्तु महिषी के षड्यन्त्रों से भयभीत होकर उन्होंने अपने पुत्रों को यह कह कर बनवास दिया कि मेरी मृत्यु के पश्चात् आओ और राज्य पर अधिकार करो । बहुत से लोग उसके साथ चल दिये और सभी ने बन में एक नगर बसाया । नगर को कपिलवस्तु नाम दिया गया । राजसन्तान के साथ विवाह करने योग्य वन में कोई नहीं था, अतः चारों राजकुमार अपनी बहनों से विवाह करने के लिए बाध्य हुए ।” यह है बौद्ध संस्कृति । उसी का प्रतिफल बौद्धों की रामकथा में प्रतिफलित हुआ है । और भी कई बातें भारतीय संस्कृति एवं इतिहास-पुराण के विरुद्ध हैं जैसे “दशरथ-पुत्र सहस्र-बाहु ने परशुराम के पिता की धेनु चुरायी, जिसके कारण परशु- राम सहस्रबाहु को मार डालते हैं । सहस्रबाहु के राम और लक्ष्मण दो पुत्र होते हैं । राम परशुराम का वध कर देते हैं । रामायण का मूल स्रोत बौद्ध जातकों में सुरक्षित है, रामायण कुशीलवों द्वारा जनता की अभिरुचि देखते हुए समय-समय पर बढ़ाया गया है, रामायण में रामावतारबोधक पद्य प्रक्षिप्त हैं, रामायण काव्य अयोध्या काण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ही आदि कवि की रचना है, मागध और वन्दियों द्वारा बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड पीछे जोड़ दिये गये हैं । मूलकाव्यखण्ड के जातीय नायक आगे जोड़े गये अंशों में जातीय नायक के रूप में परिवर्तित हो गये । वह समस्त जनसमाज के लिए नैतिक आदर्श के प्रतीक बन गये । कुछ प्रक्षिप्त अंशों को छोड़कर मूल पाँच काण्डों में मनुष्यनायक के रूप में स्थित राम बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में देवता के रूप में परिणत होकर विष्णु के साथ एकाकार हो गये ।” उनकी (श्रीबुल्के आदि की ) कल्पनालोक की असल रामायण ( जिसके अस्तित्स का कोई प्रमाण नहीं है एवं जो गगनप्रसूनायमान है ) में “राम की भगवत्ता या विष्णु का अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं था । रामायण दो उपाख्यानों का ताल-मेल है । उनमें से दूसरा है सीता-हरण के कारण राम और रावण का युद्ध । यह मूलतः एक प्राकृतिक आख्यान है । इसमें अनेक काल्पनिक घटनाओं का समावेश है” इत्यादि, इत्यादि । ये ही सब दुष्कल्पनाएँ श्रीबुल्के के काल्पनिक प्रासाद की आधार शिलाएँ हैं । इन्हीं दुष्कल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए वे कहते हैं— “राम वेदप्रतिपाद्य नहीं हैं, सीता नाम जो वेद में आया है वह लाङ्गलपद्धति का है किसी मानवी का नहीं है ।” वास्तविक्ता—
सुदूर पुराकाल त्रेतायुग में वाल्मीकिरामायण के प्रादुर्भाव का सूत्रपात
महर्षि वाल्मीकिजी ने कष्टप्रद समाधि से परम पुण्यराशि का अर्जन किया । उस पुण्यराशि से भगवान् अत्यन्त प्रसन्न हुए । उन्होंने देवर्षि नारद को वाल्मीकिजी के निकट जाने की आज्ञा दी । भगवान् की आज्ञा से अपनी संनिधि में पधारे हुए देवर्षि का सविधि अर्चन कर वाल्मीकि महर्षि ने उनसे पूछा—देवर्षे, सम्प्रति इस मर्त्यलोक में कौन गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, दृढ़व्रती, अनिन्द्य सर्वस्पृहणीय चरित्रों से सम्पन्न, प्रजारञ्जनसमर्थ, सकल जीवों के हितैषी, महान् विद्वान्, कामदेव से भी अधिक सुन्दर, स्वाधीनमना, क्रोधादिविहीन, जिनकी देहकान्ति को देखने के लिए सकल प्राणी उत्कण्ठित हों, रणाङ्गण में क्रुद्ध होने पर जिनके सम्मुख देवता भी न ठहर सकें ऐसा कौन पुरुष है ? उसे जानने का मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है । हे देवर्षे, आप ऐसे पुरुषरत्न को जानने में नितरां सक्षम हैं ।
( ३ ) महर्षि वाल्मीकिजी के प्रश्न पर देवर्षिजी ने सम्पूर्ण रामगुण एवं अत्यन्त संक्षिप्त रामचरित प्रसन्नतापूर्वक उनको बतला दिये । महर्षि द्वारा पूजित और सत्कृत होकर वे आकाशमार्ग से देवलोक को चले गये । देवर्षि के चले जाने के पश्चात् महर्षि वाल्मीकिजी मुहूर्त भर अपने आश्रम में ठहर कर स्नानादि माध्याह्निक कृत्य करने के निमित्त अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी के तटपर गये । वहाँ उन्होंने प्रसन्न मुद्रा में दम्पती के रूप में विचरते हुए क्रौञ्चयुगल को देखा । उसमें से एक नरक्रौञ्च को पापात्मा व्याध ने मार डाला । रुधिर से लथपथ भूमिपर लुण्ठित उसे मृत देखकर क्रौञ्ची ने करुण क्रन्दन किया । क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन सुनकर मुनि के करुणापूर्ण हृदय में महान् शोकानुभूति हुई । वही शोक करुण रसमय श्लोक बनकर महर्षि वाल्मीकिजी के मुखारविन्द से लोककल्याणार्थ संस्कृतसाहित्य के प्रथम श्लोक के रूप में प्रादुर्भूत हुआ— मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ श्लोक बोलते हुए अन्तर्यामी की प्रेरणा से उनके हृदय में चिन्ता हुई कि पक्षी के शोक से पीड़ित हुए मैंने यह क्या कह डाला । यह काम बड़ा अयशस्कर हुआ । ऐसा चिन्तन करते हुए उन्होंने सत्यसङ्कल्प होने के कारण श्लोकवाक्य को शिष्य से कहा । शिष्य ने उसे ग्रहण कर लिया । श्लोक का आपात अर्थ तो व्याध के लिए शापरूप है—हे व्याध, तुम पुरुषायुष्य तक शान्ति या प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकोगे, क्योंकि तुमने क्रौञ्चयुगल में से एक को मार दिया है । परन्तु इसका वास्तविक अर्थ है—हे मानिषाद हे लक्ष्मीपते राम, आपने रावण और मन्दोदरी रूप क्रौञ्चयुगल में से एक लोककण्टक रावण को मार डाला, इसलिए आप शाश्वत काल तक प्रतिष्ठा को प्राप्त हों । इसके तुरन्त बाद ब्रह्माजी महर्षिश्रेष्ठ से मिलने के लिए आ पहुँचे । महर्षि ने उनका पाद्य, अर्घ्य, आसन, अभिवन्दन आदि से सत्कार-समर्चन किया । महर्षि क्रौञ्ची के करुण क्रन्दनजन्य दुःख को भूले नहीं थे । ब्रह्माजी ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा—महर्षे, यह श्लोक ही आपने बनाया है, मेरी इच्छा से ही महाशक्ति सरस्वती आपके वदनारविन्द से आविर्भूत हुई हैं । हे ऋषिश्रेष्ठ, आप भगवान् राम का, जो धर्मात्मा एवं सबके अन्तर्यामी हैं, सम्पूर्ण चरित वह चाहे गुप्त हो, चाहे प्रकट हो, वर्णन कीजिए । केवल राम का ही नहीं लक्ष्मण का, सब राक्षसों का एवं विदेहनन्दिनी वैदेही का भी चरित चाहे प्रकट हो चाहे गुप्त हो वह सब वर्णन कीजिये । इस काव्य में आप की वाणी कदापि अनृत नहीं होगी । राम की मनोरम पुण्य कथा को श्लोकबद्ध कीजिए । जब तक पर्वत और नदियाँ भूतल में रहेंगी तब तक आप की रची रामकथा का प्रचार होगा । रामकथा का जब तक प्रचार होगा तब तक मेरे द्वारा निर्मित पुण्य लोकों में आप का निवास होगा । वेदवेद्य परम पुरुष भगवान् का दशरथ के पुत्र रामरूप में अवतार होने पर साक्षात् वेद का ही वाल्मीकि महर्षि से रामायण के रूप में अवतार हुआ । तपःपूत, अब्भक्ष, वायुभक्ष, वल्कलवसन महर्षि की समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रसूत, वेदावतारभूत कृति के सम्बन्ध में जो काट-छाँट करने का बुल्के आदि द्वारा दुःसाहस किया गया है, जैसे यहाँ से ( अमुक स्थान से ) आदि कवि की कृति का प्रारम्भ होता है एवं यहाँ ( अमुक स्थान में ) उनकी कृति का अवसान हो जाता है । अमुककाण्ड की पुष्पिका से उनकी कृति की समाप्ति सूचित होती है, ये श्लोक कुशीलवों द्वारा जोड़े गये हैं, ग्रन्थ का यह अंश आदि कवि की प्रतिभा के अनुरूप नहीं है, यह अंश पुनरुक्त है, यह शैली और ये विविध सुदीर्घ छन्द आदि कवि के नहीं जँचते, इत्यादि ओछे विचार अभिव्यक्त किये गये हैं । लाखों वर्षों से जनता जिसकी आराधना अध्ययनाध्यापन, टीका, टिप्पणी, व्याख्या एवं पाठ द्वारा कर रही है, जिसके विषय में सृष्टिकर्ता का आशीर्वादवचन “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति” प्राप्त है एवं स्कन्दपुराण के अनुसार सप्तर्षियों का आशीर्वाद भी प्राप्त है—
( ४ ) स्वच्छन्दा भारती देवी जिह्वाग्रे ते भविष्यति । कृत्वा रामायणं काव्यं ततो मोक्षं गमिष्यसि ॥ जिस महामहनीय आदि काव्य ने भारतीय वाङ्मय को ही नहीं सारे संसार के वाङ्मय को प्रभावित किया है। भारत के विविध रामायणों एवं अधिकांश काव्य, नाटक, चम्पू, आख्यान, आख्यायिका आदि का उपजीव्य रामायण ही है। जिस रामायण की लोकप्रियता चमत्कारकारिणी है। उसके विषय में अपर्युक्त विचार कदापि श्लाघ्य नहीं। श्याम देश की रामकथा 'रामकेर्ति' के अनुवाद रामकीर्ति में रामायण का गुणगान इस प्रकार किया गया है— “जिन काव्य-रचनाओं ने विश्वसाहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है, उनमें रामायण महाकाव्य का स्थान सर्वोपरि है। धर्म और कथा के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किसी ने किया तो वह मानवता के आदि कवि, संस्कृत काव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। दूर-दूर देश के कवियों ने उनकी अनुकृति के असीम भण्डार से रत्न चुन-चुन कर अपने साहित्य को समृद्ध किया है। कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृति को अमर बनाया है। खेतों में काम करनेवाले किसान अथवा नाव चलानेवाले नाविक भी उससे अप्रभावित न रह सके। उनके गीतों को गुनगुनाते हुए वे अपनी थकावट भूल जाते हैं। उनकी लेखनी ने जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा और किसी की लेखनी ने नहीं डाला। थाई देश के छठे रामराज को ही यह श्रेय है कि उन्होंने रामकेर्ति के मूलरूप रामायण का पता लगा कर उसके रचयिता वाल्मीकि के बारे में जानकारी दी। कोई लोकप्रिय गीत लोगों को अपने माधुर्य से मोह लेता है तब लोग उसके सम्मोहन में फँस जाते हैं तो धीरे-धीरे इस बात को भूल जाते हैं कि इसका रचयिता कौन है ? वाल्मीकि के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ ।” महर्षि वाल्मीकिजी ने अपौरुषेय वेदों, उपनिषदों तथा देवर्षि नारदजी के उपदेशों से श्रीराम की कथावस्तु जानकर एवं समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्पूर्ण चरित्रों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण की रचना की। रामायण शतकोटि प्रविस्तर है, उसका सार २४ सहस्र श्लोकों का वर्तमान रामायण महाकाव्य है। उसके अन्यान्य अंशों के चरित्रों का किन्हीं अन्य महर्षियों को साक्षात्कार हो सकता है। वर्तमान रामायण की अधिकांश कथा- वस्तु तो श्रीराम की ४० वर्ष की आयु के अन्तर्गत की ही है। रामायण के अनुसार ११ हज़ार वर्षों तक श्रीराम धरातल में राज्य करते रहे, अतएव यदि उनके सम्पूर्ण जीवन का वृत्तान्त लिखा जाय तो शतकोटि श्लोक भी कम ही होंगे। रामायण की अति प्राचीनता जो रामायण के अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परीक्षणों से सिद्ध है एवं श्रीराम- चन्द्र के अवतारबोधक वाल्मीकिरामायण के पद्य पाश्चात्य विद्वानों को बहुत अधिक खटकते हैं, इसलिए वे रामायण को अर्वाचीन सिद्ध करने एवं रामावतारबोधक पद्यों को प्रक्षिप्त, बाद के रचे हुए, सिद्ध करने के लिए निराधार एड़ी और चोटी का पसीना एक करते हैं। आधारभूत प्रमाण तो उनके पास कोई है नहीं, युक्तियाँ भी उनकी अत्यन्त लचर हैं। उनकी सब युक्तियों का प्रस्तुत ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक निराकरण किया गया है। श्रीबुल्के कपटपूर्ण वचनों में यह भी कहते जाते हैं कि “भारतीय साहित्य में रामकथा की व्यापकता की अपेक्षा विदेशों में उसकी लोकप्रियता आश्चर्यजनक है। उनमें बौद्ध अनामकं जातकम्, दशरथकथानम् और उनके चीनी भाषानुवाद, तिब्बती, खोतानी रामायण भी है। हिन्दोनेशिया में सेरीराम, सेरतकाण्ड, रामकेर्ति, रामकियेन आदि प्रमुख हैं। रामकथा की इस व्यापकता एवं लोकप्रियता का श्रेय वाल्मीकिरामायण को ही है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शायद ही किसी ऐसे कवि का प्रादुर्भाव हुआ हो जिसने भारत के आदि कवि के समान इतने व्यापकरूप से परवर्ती साहित्य को प्रभावित किया हो। रामायण की अद्वितीय लोकप्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन्
शताब्दियों तक बढ़ती रही, क्योंकि मानवहृदय को आकर्षित करने की अद्वितीय शक्ति जो रामकथा में विद्यमान है, वह अन्यत्र दुर्लभ है ।” परन्तु ऐसा क्यों ? इसका उत्तर उनके पास नहीं है । भारतीय दृष्टि के अनुसार उत्तर स्पष्ट है कि राम और कृष्ण की कथाएँ केवल वाग्विलास या कण्ठशोषणमात्र नहीं हैं, वह अनुपम शान्ति, भक्ति तथा मुक्ति देनेवाली हैं, इसी कारण उनकी लोकप्रियता है। भागवत में स्पष्ट उल्लेख है । श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्, मैंने बड़े-बड़े यशस्वी महापुरुषों की कथाएँ विज्ञान और वैराग्य की विवक्षा से ही कही हैं, उनमें परमार्थ नहीं है । किन्तु कृष्ण में अमल भक्ति चाहनेवाले साधकों को चाहिये कि जो उत्तमश्लोक भगवान् के अमङ्गलघ्न गुणानुवाद नित्य ही सन्त महात्माओं के मध्य संगीयमान हैं, गाये जाते हैं, उन्हें ही सुनें । भारतीय वाङ्मय में वर्णित रामकथा का आदर्श ठीक यही है कि वह रामचरित श्रवण और पठन से स्वच्छ मनोवृत्ति प्रदान करता है । जैमिनीयाश्वमेध में कहा है— सर्वे धर्माः समुद्दिष्टा वर्णाश्रमविभागशः । बृहद्धर्मपुराण ( १६।९ ) तथा वाग्देवी के अवतार मम्मट की कृति काव्यप्रकाश का भी यही कहना है— रामादिवद् वर्तितव्यं न रावणादिवत् ( का. प्र. १।२ ) अर्थात् राम आदि के तुल्य व्यवहार करना चाहिए रावण आदि के तुल्य नहीं । पद्मपुराण पातालखं० अ० २६ के अनुसार रामचरित में पातिव्रत्य, भ्रातृस्नेह, गुरुभक्ति आदि का आदर्श प्रस्तुत है— यस्मिन् धर्मविधिः साक्षात् पातिव्रत्यं च यत्स्थितम् । भ्रातृस्नेहो महान् यत्र गुरुभक्तिस्तथैव च ।। १२८ ।। स्वामिसेवकयोर्यत्र नीतिमूर्तिमती किल । अधर्मकरशास्तिर्वै यत्र साक्षाद् रघूद्वहात् ।। १२९ ।। यदि रामकथा में बुल्के द्वारा अकुटिल भाव से राम के इसी आदर्श का प्रतिपादन किया जाता तो वह स्पृहणीय वस्तु होता । किन्तु दोषैकदृक्त्व का ही नहीं दोषैकोद्भावनप्रवणत्व का समाश्रयण कर भिन्नदृष्टिकोण रखने- वालों के लिए पुस्तक अस्पृहणीय हो गयी है । राम साक्षात् मूर्तिमान् धर्म थे । श्रीभागवत आदि में मनुष्यों को धर्म की शिक्षा देकर लोकानुग्रह करना ही राम के अवतार का मुख्य प्रयोजन कहा गया है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।” अनवाप्तमवाप्तव्यं न ते किञ्चन विद्यते । लोकानुग्रह एवैको हेतुस्ते जन्मकर्मणोः ॥—कालीदास यदि ह्याहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ॥—गीता लोक-शिक्षा एवं लोकानुग्रह के लिए ही भगवान् राम के अवतार एवं कर्म हैं । सीता का पातिव्रत्य, राम की गुरुभक्ति एवं आज्ञापालन, लक्ष्मण का भ्रातृप्रेम, दशरथ की सत्यसन्धता, कौशल्या का वात्सल्य, भरत की भ्रातृभक्ति आदर्श लोकशिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, अतः रामकथा में कथावस्तु भक्ति और मुक्ति देने के साथ-साथ आदर्श जीवन का एक महान् मार्ग दर्शन भी है। श्रीबुल्के रामकथा को विकास,
कल्पना, परिवर्तन और परिवर्धन मानते हैं और कहते हैं "उसे भारतीय प्रतिभा शताब्दियों से परिष्कृत करती चली आ रही है। किन्तु वस्तुतः भारतीय प्रतिभा तो सदा तत्त्वपक्षपातिनी रही है। श्रीबुल्के कहते हैं "कैकेयी की कुटिलता वाल्मीकिरामायण में स्पष्टतया वर्णित है। आगे चलकर उसे निर्दोष ठहराने के लिए अनेकों उपायों का सहारा लिया गया है।" पर बेचारे बुल्के को यह पता नहीं है कि कैकेयी रामराज्य की बात सुनकर इतनी प्रसन्न हुई थी कि उसने मंथरा को अपने गले से हार निकाल कर दिया वास्तव में कुटिलता देवताओं की प्रेरणा से मंथरा के सिर चढ़ी। वस्तुतः इन बातों का समुचित समाधान रामचरितमानस तथा अध्यात्मरामायण में स्पष्टतया वर्णित है। मुख्य बात तो यह है कि रावणत्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर ही परब्रह्म परमात्मा अवतीर्ण हुए थे। यदि कैकेयी वनवास का आग्रह न करती तो सीता-राम का वनवास न होता एवं सीताहरण न होता तो रावणवध आदि कार्य कैसे होते और रामायण का आविर्भाव कैसे होता ? आदिकवि वाल्मीकिजी के विषय में महाकवि कालिदास का कैसा गौरवमय दृष्टिकोण है ? उसपर भी दृष्टिपात करना अनुचित न होगा। वह कहते हैं, मैं मन्दमति हूँ, पर चाहता हूँ कवि की सी कीर्ति । अवश्य मैं लम्बे पुरुष से प्राप्य फल के लिए ऊपर को बाहें उठाये बौने के तुल्य उपहास्य होऊँगा । अथवा आदि कवि वाल्मीकि ने रघुवंश में प्रवेश करने के लिए दरवाजा बना दिया है, इसलिए जैसे वज्र से छिदी हुई मणि में प्रवेश करने में तागे को कोई कठिनाई नहीं होती वैसी ही मेरी भी स्थिति है। भारतीय संस्कृति में आकण्ठ निमग्न क्रान्तदर्शी महाकवि कालिदास ने महर्षि वसिष्ठजी की महामहनीयता, आदि कवि की परमश्लाघनीयता और रघुवंशी राजाओं का महान् औदार्य, विशुद्धि, विपुल पराक्रम, विद्वत्ता, तपश्चर्या आदि का जो मनोमोहक दिग्दर्शन कराया है उसे सात समुद्र पार के असंस्कृतमति पाश्चात्य कैसे हृदयंगम कर सकते हैं ? रामावतार वाल्मीकिरामायण में कहा है बलगर्वित उद्धत रावण वध की कामनावाले देवताओं की प्रार्थना पर महा- तेजस्वी भगवान् विष्णु ही मनुष्यलोक में रामरूप से अवतीर्ण हुए। उन अमिततेजा राम से कौशल्या वैसे ही शोभित हुई जैसे वज्रपाणि इन्द्र से अदिति देवी शोभित हुई थी । श्रीराम दिव्य लावण्य एवं सौन्दर्यपूर्ण दिव्य रूप से सम्पन्न, वीर्यवान् एवं असूयारहित थे। वे गुणों में दशरथ के तुल्य तथा भूमि भर में अनुपम पुत्र थे । वे नित्य शान्तात्मा, मृदुभाषी एवं स्मितपूर्वभाषी थे। दूसरों के परुष वचन बोलने पर भी वे परुष उत्तर नहीं देते थे। वे किसी के द्वारा किये गये एक उपकार से ही सन्तुष्ट हो जाते थे और आत्मवान् होने के कारण उसके सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण नहीं करते थे। वे शीलवृद्ध, ज्ञानवृद्ध एवं वयोवृद्ध सज्जनों से अस्त्र-शस्त्रादिश्रम के भी मध्य में सदा ही वेद-वेदान्त- नीतिसम्बन्धी चर्चा करते ही रहते थे। अन्य अवसरों पर सज्जन पुरुषों से शास्त्ररहस्य की चर्चा ही करते थे । राम परम बुद्धिमान् थे । वे समागत लोगों से पहले कुशलक्षेम आदि पूछते थे। वे शब्दतः मधुराभिभाषी एवं अर्थतः प्रियं- वद थे। महान् वीर्यवान् होने पर भी अपने अमित वीर्य का उन्हें गर्व नहीं था । वे अनृत कथा कभी नहीं करते थे । वे विद्वान् थे तथा वृद्धों का सम्मान-सत्कार करते थे । प्रजाजन सदा राम का अनुरञ्जन करते थे और राम भी सदा ही प्रजा का अनुरञ्जन करते थे। प्रजा का अनुरञ्जन करने से ही राजा होता है "प्रजानुरञ्जनाद्राजा" इस उक्ति को वे चरितार्थ करते थे। राम दीन-दुःखियों पर दयार्द्र रहते थे । वे जितक्रोध एवं विशेषतः ब्राह्मणों के प्रतिपूजक थे। वे दीनहीनों पर अनुकम्पा करनेवाले धर्मज्ञ थे । दुष्टनिग्रह तथा इन्द्रियनिग्रह में वे सदा तत्पर एवं पवित्रात्मा थे । अपने कुल के अनुसार दया, दाक्षिण्य, शरणागत-रक्षण आदि धर्मों के प्रति उनकी बुद्धि का सदा झुकाव रहता था,
( १९ ) अतएव वे क्षात्रधर्म प्रजापालनादि का बहुत आदर करते थे एवं उससे महान् स्वर्गफल की प्राप्ति समझते थे । श्रेय के विपरीत कर्म में उनकी कदापि अभिरुचि नहीं होती थी एवं धर्मविरुद्ध कथा की ओर भी उनकी रुचि नहीं थी । वाद, जल्प आदि कथाओं में वे बृहस्पति के तुल्य स्वसिद्धान्तनिर्वाहक युक्तियों के वक्ता थे । उनका शरीर सत्कर्मानुष्ठानसमर्थ, तरुण, विपुलांसत्व आदि लक्षणों से सम्पन्न था । वे तत्-तत् कर्मयोग्य देश और काल के ज्ञाता थे एवं निग्रह और अनुग्रह के लिए पुरुषों की अधर्मिष्ठता एवं धर्मनिष्ठता जानते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि मानो ब्रह्मा द्वारा वे संसार में एकमात्र सर्वगुणसम्पन्न साधु पुरुष निर्मित हुए हैं । राम गुणों के कारण श्रेष्ठ गुणों से युक्त प्रजाजनों के बहिश्चर प्राणों के तुल्य परम प्रिय थे । वे यथावत् साङ्गोपाङ्ग वेदों के ज्ञाता थे एवं तत्-तत् क्रियाओं के लिए अपेक्षित व्रतों का अनुष्ठान कर व्रतस्नात हुए थे । मन्त्रविहीन शस्त्रों एवं मन्त्रयुक्त शस्त्रास्त्रों में भगवान् श्रीराम अपने पिता से भी श्रेष्ठ थे । वे अखिल कल्याणों के उत्स थे एवं परकार्यसाधक श्रेष्ठ पुरुषों में अग्रगण्य थे । क्षोभहेतु के उपस्थित होने पर भी उनका अन्तःकरण कभी क्षुब्ध नहीं होता था, वे कृच्छ्रकाल में भी सत्य ही बोलते थे, वे धर्मार्थदर्शी वृद्ध ब्राह्मणों द्वारा शिक्षित एवं सौम्य थे । वे धर्म, अर्थ और काम के याथात्म्य के जाननेवाले, स्मृतिमान् तथा प्रतिभासम्पन्न थे । वे लौकिक कार्यों को करने में सामर्थ्यसम्पन्न थे । वे विनीत, गूढ़ अभिप्रायवाले तथा फल- निष्पत्तिपर्यन्त मन्त्रणा को गुप्त रखनेवाले थे । वे मित्रत्वेन सर्वसाधारण को अज्ञात मित्रों से सुरक्षित थे एवं उन्हीं के द्वारा परराष्ट्र-भेद आदि जानने में पूर्ण साहाय्य प्राप्त करते थे । उनके क्रोध और हर्ष दोनों अमोघ थे, जिसपर प्रसन्न होते थे, उसे निहाल कर देते थे । सत्पात्र में वित्तदान एवं न्यायपूर्वक अर्थसंग्रह के वे कालज्ञ थे । वे गुरु आदि में दृढ़भक्तिसम्पन्न तथा स्थिरप्रज्ञ थे । वे असद्ग्राही दुर्वचन कभी नहीं बोलते थे । वे आलस्यरहित, सावधान एवं स्वदोष तथा परदोष के ज्ञाता थे । वे शास्त्रज्ञ, कृतज्ञ तथा पुरुषों के तारतम्य को जाननेवाले थे । न्यायानुकूल निग्रह, प्रग्रह और अनुग्रह करने में दक्ष थे । वे सत्पुरुषों के संग्रह तथा सपरिवार सत्पुरुषों के पालन एवं दुष्टों के निग्रह का देश और काल जानते थे । वे आयकर्म के उपायों को जानते थे, जैसे मधुकर पुष्पों से रस का संग्रह करता है वैसे ही प्रजा से यथोचित धन ग्रहण करने में चतुर थे एवं शास्त्रदृष्ट व्ययकर्म के भी अच्छे जानकार थे । आय के अर्धभाग, चतुर्भाग या त्रिभाग के व्यय की व्यवस्था जानते थे । वे शास्त्रसमूहों तथा प्राकृतादि भाषा मिश्रित नाटकादि में निपुण थे । निरालस्य होकर धर्म और अर्थ का संग्रह कर धर्म और अर्थ के अविरोधी काम का भी आदर करते थे । क्रीड़ा प्रयोजनवाले गीत, वाद्य, चित्रकर्म आदि के विज्ञाता थे तथा अर्थ के “धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च” इस पञ्चधा विभाग के ज्ञाता एवं अनुष्ठाता थे । अश्व, हस्ती आदि के आरोहण, नियन्त्रण एवं गत्यादिशिक्षण में वे सावधान थे । वे धनुर्वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ एवं अतिरथों में समादृत थे । वे परसेना के अभिमुख अभियान करनेवाले एवं शत्रुओं पर प्रहार करनेवाले थे । सेनाओं के नयन तथा व्यूहादिनिर्माण आदि में वे विशारद थे । संग्रामाङ्गण में क्रुद्ध हुए वे देवताओं तथा दानवों के द्वारा भी अप्रधृष्य थे । असूया, क्रोध, घमण्ड तथा मत्सर से वे सर्वथा रहित थे । कोई भी प्राणी उनकी अवज्ञा नहीं कर सकता था । प्राकृत पुरुषों के तुल्य वे कालपराधीन न होकर स्वायत्त- सकल परिकर थे । इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमार राम प्रजाजनों के परम सम्मत तथा परमप्रीतिपात्र थे । वे अपने क्षमाप्रधान गुणों के कारण पृथिवी के तुल्य, बुद्धि में बृहस्पति के तुल्य एवं वीर्य में इन्द्र के तुल्य थे । पिता की प्रसन्नता को निःसीम बढ़ानेवाले तथा सभी प्रजाजनों के अभीष्ट उत्तम गुणों से राम इस प्रकार प्रदीप्त हुए जैसे अंशुजालों से सूर्य दीप्त होते हैं । एवं गुणसम्पन्न अप्रधृष्यपराक्रमसमन्वित राम लोकनाथ भगवान् विष्णु के तुल्य थे । उन श्रीरामचन्द्रजी को पृथिवी ने अपना पति बनाना चाहा । महाराज दशरथ को अपनी वृद्धावस्था देखते हुए यह अभिलाषा हुई कि मेरे जीतेजी राम कैसे राजा हों—
( ८ ) अथ राज्ञो बभूवेव वृद्धस्य चिरजीविनः । प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति ॥ एवंगुणगणविशिष्ट दाशरथि श्रीराम भगवान् परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे इस सन्दर्भ में प्रस्तुत ग्रन्थ में वेद, रामायण, अष्टादश पुराण, महाभारत, चाणक्य के अर्थशास्त्र, शुक्रनीति आदि अनेक प्राचीन ग्रन्थों के वचन प्रचुर मात्रा में उद्धृत किये गये हैं । हम यहाँ पर पहले महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में अन्यतम क्रान्तदर्शी महाकवि सरस्वती के वरदपुत्र कालिदास के कतिपय अनुष्टुप् छन्दों को उद्धृत करते हैं— स्रष्टुर्वरातिसर्गात्तु मया तस्य दुरात्मनः । अत्यारूढं रिपोः सोढं चन्दनेनेव भोगिनः ॥ धातारं तपसा प्रीतं ययाचे स हि राक्षसः । दैवात्सर्गादवध्यत्वं मर्त्येष्वस्थापराङ्मुखः ॥ सोऽहं दाशरथिर्भूत्वा रणभूमेर्बलिक्षमम् । करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैस्तच्छिरःकमलोच्चयम् ॥ मोक्षध्वं स्वर्गवन्दीनां वेणीबन्धान्दूषितान् । शापयन्त्रितपौलस्त्यबलात्कारकचग्रहैः ॥ भगवान् विष्णु कहते हैं—ब्रह्माजी के वरप्रदान के कारण मैंने उस दुरात्मा रिपु का दिन पर दिन ऊपर चढ़ना वैसे ही सहा है जैसे सर्प का अपने ऊपर चढ़ना चन्दन का वृक्ष सह लेता है । उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए ब्रह्मा से उस राक्षस ने दैवी सृष्टि से अपना अवध्यत्व वर मांगा, मानवी सृष्टि से अवध्यत्व का वर नहीं माँगा, क्योंकि मनुष्यों में उसकी तनिक भी आस्था नहीं थी । इसलिए मैं दशरथ-पुत्र होकर तीक्ष्ण बाणों से उसके सिररूपी कमलराशि को रणभूमि को चढ़ा दूँगा । रावण ने स्वर्ग की जिन देवियों को बन्दी बना रक्खा है, नलकुबर के शाप से नियन्त्रित पौलस्त्य ( रावण ) के द्वारा केशग्रहण से अदूषित वेणियों ( जूड़ों ) को अब आप लोग खोलेंगे । कालिदास का काल ईसवी सन् से समधिक १०० वर्ष से पूर्व का काल निश्चित है । वे विक्रम संवत् के संस्थापक महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में अन्यतम थे । विक्रम संवत् ईसवी सन् से ५७ वर्ष पूर्व स्थापित हुआ था, उस समय उनकी अवस्था ५० वर्ष की भी मानी जाय तो वे सन् संवत् के आरम्भ में १०७ वर्ष के होंगे । ब्रह्मा कहते हैं—हे विभो हे विष्णो, आप अपने को चार प्रकार का कर धर्मात्मा, महान् दानी, अयोध्या- धिपति राजा दशरथ, जो महर्षियों के तुल्य तेजस्वी हैं, की ह्री, श्री और कीर्ति के तुल्य तीन पत्नियों में पुत्रता को प्राप्त होइये— राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो ॥ १९ ॥ धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः । अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु च ॥ २० ॥ विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम् । तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम् ॥ २१ ॥ अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम् ॥ २२ ॥ ( वा० रा० १।१५ ) परशुरामजी कहते हैं—हे परन्तप, इस वैष्णव धनुष के ग्रहण, आकर्षण आदि से, जिसकी कोई दूसरा प्रत्यक्षा नहीं चढ़ा सकता, मैं आपको अनाद्यन्त, किसी के द्वारा न जीते जा सकनेवाले सुरेश्वर मधुसूदन जानता हूँ ।
( ९ ) उपस्थित ये सब देववृन्द अनुपम कर्मवाले रणाङ्गण में अप्रतिभट (प्रतिभटरहित) आपको देखते हैं। आपके विषय में मेरी यह अशक्ति मेरे लिए लज्जाकर नहीं है, क्योंकि लोकनाथ आपके द्वारा मुझसे विमुख की हुई स्वशक्ति का अपने में नियोजन करने से मैं असमर्थ हो गया हूँ— अक्षयं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम् । धनुषोऽस्य परामर्शात् स्वस्ति तेऽस्तु परन्तप ॥१७॥ एते सुरगणाः सर्वे निरीक्षन्ते समागताः । त्वामप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥१८॥ न चेयं तव काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति । त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृतः ॥१९॥ पद्मपुराण में परशुरामजी कहते हैं— राम राम महाबाहो न वेद्मि त्वां सनातनम् । जानाम्यद्यैव काकुत्स्थ तव वीर्यगुणादिभिः ॥ त्वमादिपुरुषः साक्षात् परब्रह्म परोऽव्ययः । त्वमनन्तो महाविष्णुर्वासुदेवः परात्परः ॥ नारायणस्त्वं श्रीशस्त्वमीश्वरस्त्वं त्रयीमयः । त्वं कालस्त्वं जगत्सर्वमकाराख्यस्त्वमेव च ॥ स्रष्टा धाता च संहर्ता त्वमेव परमेश्वरः । त्वमचिन्त्यो महद्भूतं विश्वरूपस्त्वणुर्महान् ॥ चतुःषट्पञ्चगुणवांस्त्वमेव परमेश्वरः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारस्त्रयीमयः ॥ व्यक्ताव्यक्तस्वरूपस्त्वं गुणभृन्निर्गुणः परः । स्तोतुं त्वामहमशक्तश्च वेदानाम्प्यगोचरम् ॥ यच्चापमानं कृतवांस्त्वां युयुत्सुतया प्रभो । तत्क्षन्तव्यं त्वया नाथ इत्यादि ॥ अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ॥ महर्षि विश्वामित्र कहते हैं— सत्यपराक्रम राम को मैं जानता हूँ, महातेजा महर्षि वसिष्ठ जानते हैं, ये अन्य भी तपोनिष्ठ महात्मा राम को जानते हैं। उन्हें सर्वसाधारण लोग नहीं जानते हैं। भाव यह कि वे साक्षात् परब्रह्म हैं। आगे वे महर्षि कहते हैं— अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम् । तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम ॥ हे राम, आज हम सिद्धाश्रम में जा रहे हैं वह आश्रम जैसा मेरा है वैसा ही आप का भी है, क्योंकि आप विष्णुरूप हैं ।
( १० ) रावण का प्रणिधि अकम्पन कहता है— असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः । आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः ॥ २३ ॥ सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत् । असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम् ॥ २४ ॥ भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः । वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरैः ॥ २५ ॥ संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः । शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥ २६ ॥ नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया । रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २७॥(वा० रा० ६।३३।१) कुपित होकर काल के तुल्य संहार करने में प्रवृत्त हुए राम को और तो और ब्रह्मा आदि भी पराक्रम से नहीं रोक सकते । राम बाढ़ से लबालब भरी नदी का वेग बाणों से रोक सकते हैं, आकाश को भी त्रिविक्रमावतार की तरह तारारहित कर सकते हैं, यज्ञवराह के तुल्य जलमग्न पृथ्वी का उद्धार कर सकते हैं, शरों से समुद्र के तट- बन्धरूप मर्यादा को तोड़ कर सब लोकों को जलमग्न कर सकते हैं । शरों से समुद्र तथा वायु के वेग को रोक सकते हैं । महायशा राम विक्रम द्वारा सब लोकों का संहार कर फिर सारी प्रजा की नई सृष्टि करने में समर्थ हैं । हे दशकन्धर, तुम रण में राम को कदापि नहीं जीत सकते । तुम अकेले तो क्या सब राक्षसों के साथ भी उन्हें नहीं जीत सकते । रावण द्वारा मायामृग बनने के लिए अनुरोध करने पर मारीच कहता है— रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामित्र वासवः ॥ १३ ॥ अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा । न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने ॥ १४ ॥ राम मूर्तिमान् धर्म हैं, सज्जनशिरोमणि हैं, उनका पराक्रम परम सत्य है जैसे देवताओं के इन्द्र राजा हैं वैसे ही वे सब लोकों के राजा हैं । वह तेज असीम हैं जिनकी पत्नी जनकनन्दिनी जानकी हैं । रावण, राम के बाणों से सुरक्षित उसे तुम हरने में सक्षम नहीं हो । उसे तुम्हें हरने का विचार नहीं करना चाहिये । ऐसा करना सर्वनाश को निमन्त्रण देना है । ऋषियों ने, देवताओं और गन्धर्वों ने यज्ञ की पूर्णाहुति एवं मन्त्र-संस्कृत वसोर्धारा के समान प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता को देखा । धर्मात्मा राम बाष्पाकुललोचन होकर मुहूर्त भर ध्यानपरायण हुए । तदनन्तर ही राजराज वैश्रवण ( कुबेर ), पितरों सहित यमराज, सहस्रनयन देवराज, जलाधिप वरुण, वृषभध्वज महादेव, ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ लोकपितामह ब्रह्मा आदि देवगण सूर्यसंनिभ विमानों द्वारा लङ्कापुरी में राम के निकट आये एवं प्राञ्जलि हो राम से बोले—आप सब लोकों के कर्ता हैं, ज्ञानवानों में श्रेष्ठ हैं, फिर अग्नि में प्रवेश कर रही सीता की क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ? यहाँ देवगण, इन्द्र आदि से भी राम को श्रेष्ठ कहा गया है । नागेश के अनुसार ‘विष्णु- मुखा वै देवाः’ इस श्रुति से भी यह सिद्ध है । राम ने कहा मैं तो अपने को दशरथ का पुत्र मानव जानता हूँ । मैं वास्तव में जो हूँ और जैसा हूँ वह आप बतायें ।
( ११ ) तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने कहा— भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः । एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ॥१३॥ अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव । लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥१४॥ शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः । अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः ॥१५॥ सेनानीर्ग्रामणीः सर्वं त्वं बुद्धिस्त्वं क्षमा दमः । प्रभवश्चाप्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥१६॥ इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् । शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥१७॥ सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः । त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ॥१८॥ सिद्धानामपि साध्यानामाश्चर्यश्चासि पूर्वजः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः ॥१९॥ प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति । दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥२०॥ दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च । सहस्रचरणः श्रीमान् शतशीर्षः सहस्रदृक् ॥२१॥ त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् । अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यसे त्वं महोरगः ॥२२॥ त्रीन् लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् । अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥२३॥ देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो निमेषस्ते स्मृता रात्रिुरुन्मेषो दिवसस्तथा ॥२४॥ संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना । जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधातलम् ॥२५॥ अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः । त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥२६॥ महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बध्वा सुदारुणम् । सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥२७॥ वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् । तदिदं नस्त्वया कार्यं कृतं धर्मभृतां वर ॥२८॥ निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम । अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥२९॥
( १२ ) अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥३०॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥३१॥ अर्थात् आप भोक्ता और भोग्य रूप सकल प्रपञ्च के आश्रय साक्षात् नारायण हैं, सुदर्शनचक्रधारी श्री- विष्णु हैं, एकशृङ्ग वराह तथा भूत और भव्य सकल शत्रुओं के विजेता हैं। आप ही आदि, अन्त और मध्य में रहनेवाले सत्य अक्षर हैं। सब लोकों के आप ही परम धर्म हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन, शार्ङ्गधन्वा, सर्वेन्द्रिय- नियामक हृषीकेश पुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। आप ही अजित खड्गधर विष्णु, बृहद्वल कृष्ण, सेनानी एवं ग्रामणी हैं। आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा तथा दम हैं। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय के आप ही एकमात्र कारण हैं एवं आप ही मधुसूदन हैं। आप ही इन्द्रकर्मा इन्द्र की सृष्टि करनेवाले महेन्द्र हैं। रणान्तकृत् पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षि आपको शरणयोग्य परम आश्रय एवं रक्षक कहते हैं। आप ही सहस्रशृङ्ग वेद एवं शतशीर्ष महान् धर्म हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं। आपका अन्य कोई प्रभु नहीं है। सिद्धों एवं साध्यों के आप ही आश्रय एवं कारण हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही ॐकार हैं। आप ही परात्पर परमेश्वर हैं। आप की उत्पत्ति और निधन कोई नहीं जानता अर्थात् आप उत्पत्ति और लय से विरहित नित्य हैं। आप कौन हैं यह कोई नहीं जानता, परन्तु आप अन्तर्यामी रूप से सब भूतों में, विशेष रूप से गौ एवं ब्राह्मणों में, दृष्टिगोचर होते हैं। अत्यन्त अचेतन सभी दिशाओं में, आकाश में एवं पर्वतों और नदियों में अन्तर्यामी रूप से आप योगियों के दृष्टिगोचर होते हैं। आप सहस्रचरण, शतशीर्ष तथा सहस्रदृक् हैं। महाविराट् रूप से संसार के सभी चरण, शीर्ष और नेत्र आपके ही हैं। सभी भूतों पर्वतों सहित पृथिवी को आप ही धारण करते हैं। अन्त में पृथिवी के कारण- रूप जल में, देव, गन्धर्व, दानव सहित तीनों लोकों को धारण करनेवाले महोरग शेष आप ही हैं। हे श्रीराम, मैं (ब्रह्मा) आपका हृदय हूँ, सरस्वती आपकी जिह्वा हैं एवं मेरे द्वारा निर्मित सभी देव आपके गात्र के रोम हैं। आपका नेत्रनिमीलन रात्रि है एवं नेत्रोन्मीलन दिन है। आपके ज्ञान-विज्ञान संस्कार ही वेद हैं। वस्तुतः आपके बिना संसार कुछ भी नहीं है। सारा जगत् आपका वैराज शरीर है। आपकी स्थिरता वसुधातल है। आपका कोप ही अग्नि है। आपका प्रसाद ही श्रीवत्सलक्षण सोम है। आपने अपने तीन पगों से तीनों लोकों को आक्रान्त कर, दारुण बलि को बाँधकर, इन्द्र को राजा बनाया है। सीता लक्ष्मी हैं और आप प्रजापति विष्णु हैं। रावण के वधार्थ ही आप मानव-देह में प्रविष्ट हुए हैं। हे देव, वह रावण-वधादि हम लोगों का (देववृन्द का) कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो गया है। अब अप्प प्रसन्नतापूर्वक परम धाम में पधारिये। हे देव, आपका अमोघ वीर्य एवं अमोघ पराक्रम है। आपका दर्शन और स्तवन भी अमोघ है। भूतलवर्ती आपके भक्त नर भी अमोघ (सर्वत्र साफल्यसम्पन्न) होंगे। वे भक्त ऐहलौकिक सकल कामनाओं को प्राप्त करेंगे और अन्त में आपके पुराणपुरुषोत्तमरूप को प्राप्त होंगे। देवाधिदेव महादेवजी की सन्निधि में इन्द्रादि दिक्पालों के समक्ष राम के सम्बन्ध में लोकपितामह ब्रह्माजी की यह भूतार्थ व्याहृति है। श्रीराम के अनन्त गुण हैं अनन्तगुणगणमण्डित परब्रह्म परमात्मा के अवतार राम का पाश्चात्य मति यदि आकलन न कर सके तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? परमतत्त्व राम को जानने के लिए मन की शुद्धि अपेक्षित है। अशुद्ध मन में राम के यथार्थ ज्ञान की क्षमता नहीं। यद्यपि “अजस्य गृह्णतो जन्म निरीहस्य हतद्विषः । स्वपतो जागरूकस्य याथाथ्र्यं वेद कस्तव ॥”
के अनुसार उनका यथार्थ ज्ञान प्रायः सभी के लिए कठिन है। फिर भी जो वेदशास्त्र के वचनों पर श्रद्धा करते हैं, ऋषिमहर्षियों के वाक्यों पर विश्वास करते हैं श्रद्धा-विश्वासरूपी पार्वती-परमेश्वर की कृपा से उनके लिए यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना संभव है। ऋषिमूनियों के वचनों को झुठलाने में तत्पर वेदविरोधियों से उनमें अवश्य तारतम्य है। राम का एक पत्नीव्रत आनन्दरामायण के अनुसार राम की प्रतिज्ञा है सीता के सिवा अन्य स्त्री मेरे समक्ष माता कौशल्यातुल्य है। अन्य पत्नी का परिग्रह मुझसे नहीं किया जा सकता, परिग्रह करना तो दूर मैं मन से भी अन्य स्त्री के परिग्रह की बात नहीं सोच सकता— अन्यत्सीतां विनान्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम । न क्रियतेऽपरा पत्नी मनसापि न चिन्तये ॥ यज्ञार्थ आवश्यक होने पर राम ने सीता से भिन्न भार्या का वरण नहीं किया, इसलिए यज्ञों में पत्नी के स्थान में सीता की काञ्चनी प्रतिमा ही उपयुक्त होती थी— न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ श्रीसीता का परित्याग कर रावणरि श्रीराम ने अन्य नारी का वरण नहीं किया, किन्तु सीता की काञ्चनी प्रतिकृति को पत्नी के रूप में अपने दक्षिणाङ्क में स्थापित कर प्रभूत यज्ञयाग किये। पतिदेव के श्रवणपथगामी उस वृत्तान्त से सीता ने परित्याग-दुःख को, जो दुःख से भी हटाया नहीं जा सकता था, किसी प्रकार सहा अर्थात् उस वृत्तान्त से उनका दुःख कुछ हल्का हो गया— सीतां हित्वा दशमुखरिपुर्नोपयेमे यदन्यां तस्या एव प्रतिकृतिसखो यत्क्रतूनाजहार । वृत्तान्तेन श्रवणविषयप्रापिणा तेन भर्तुः सा दुवारं कथमपि परित्यागदुःखं विषेहे ॥ उत्तररामचरित में श्रीराम का स्मरण कर सीता के विह्वल होने पर श्रीसीता की सखी वासन्ती ने कहा—सखि, तुम ऐसे निष्ठुर राम का स्मरण कर क्यों दीर्घ और उष्ण उच्छ्वास लेती हो। सीता ने कहा, सखि, राम निष्ठुर नहीं है। मैं बहिरङ्ग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ। राम की हृदयसिंहासनाधीश्वरी सीता ही रही। इस सन्दर्भ में कुन्दमालाकार ने कितने सुन्दर शब्दों में राम के भाव का चित्रण किया है— त्वं देवि चित्तनिहिता गृहदेवता मे स्वप्नागता शयनमध्यसखी त्वमेव । दारान्तरग्रहणनिःस्पृहमानसस्य यागे तव प्रतिकृतिर्मम धर्मपत्नी ॥ अर्थात् हे देवि, चित्त में स्थापित ( सदा स्मृति में रमी हुई—अविस्मृत ) तुम्हीं मेरी गृहदेवी हो, स्वप्न में आयी हुई तुम्हीं मेरी शय्या में सहचरी हो। अन्य पत्नी के परिग्रह की मुझे तनिक भी स्पृहा नहीं है। यज्ञयागों में धर्मपत्नी की आवश्यकता होने पर तुम्हारी काञ्चनी प्रतिमा ही यज्ञ में मेरी धर्मपत्नी है । श्रीराम की नीतिमत्ता वाल्मीकिरामायण के अनुसार राजतन्त्र होते हुए भी रघुवंशियों के राज्यकाल में लोकतन्त्र अक्षुण्ण था । इसी लिए महाराज दशरथ को राम को यौवराज्य देने के लिए जन-स्वीकृति अपेक्षित हुई थी— समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः । ( वा० रा० २।१।४६ )
( १४ ) मन्त्री वही होते थे जो पौरों एवं जानपदों के विश्वासपात्र होते थे— तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता सदा । पौरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ॥ ( म० भा० १२।८३।४५,४६ ) राजा की सभा में सभी जातियों के मुख्य लोग सभासद् होते थे—सभ्याः सर्वासु जातिषु । ( शुक्रनीति ) जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ( मनु० ८।४१ ) के अनुसार राम जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म तथा कुलधर्मों को जानते एवं उनका पालन करते थे । भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है । राजा चाहे व्यक्ति हो या दल । वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है । अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज को आदर्शरूप में ढाला था । यद्यपि वैयक्तिक आचरण निजी जीवन से ही सम्बद्ध होता है, परन्तु वस्तुतः राम का वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था । तभी तो वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सौख्य तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे । तुलसी प्रजा सुभाग से भूप भानुसम होय । बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोय ॥ सूर्य धरती से कब कितना रस खींचते हैं यह कोई नहीं देखता, भानुजनित मेघ से रसमय जल बरसता देखकर सभी हर्षित होते हैं वैसे ही रामराज्य में कर के रूप में बहुत परिमित धन लिया जाता था, यज्ञ-यागों में प्रभूत धन दान दिया जाता था । कालिदास के अनुसार 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ।' हजारों गुना अधिक बनाकर देने के लिए जैसे सूर्य पृथिवी से अप्रत्यक्ष रसादान करते हैं वैसे राजा हजारों गुना अधिक देने के लिए प्रजा से सीमित अप्रत्यक्ष कर ग्रहण करते थे । तुलसी के अनुसार "श्रुतिपालक धर्मधुरन्धर' रामने विधान नहीं बनाया, किन्तु आदर्श आचरण उपस्थित किया । तुलसी के रामने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था— मुखिया मुख सों चाहिअइ खान पान कहुं एक । पालइ पोसइ सकल अँग तुलसी सहित विवेक ॥ प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता और संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य है, परन्तु विवेक के साथ । मुख द्वारा भक्षित अन्न रसरूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, हृदय, मन, बुद्धि आदि सबको प्रभावित करता है । परन्तु सबकी योग्यता तथा आवश्यकता एक सी नहीं है । 'हाथी को मन भर चींटी को कन भर' की कहावत प्रसिद्ध ही है । धर्मनियन्त्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परिस्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के साथ यथोचित कुशलता के साथ व्यवहार कर सकता है । भारतीय राजा उतना शासक नहीं होता था जितना प्रजा को हित का परामर्श दाता । श्रीराम प्रजा को आत्मीयता की दृष्टि से उपदेश करते हैं राजा के रुआव में नहीं— जो अनीति कुछ भाषौं भाई । तो मोहि बरजउ भय बिसराई ॥ यहां 'राजा करे सो न्याय' को कोई स्थान नहीं । ऐसा राजा ही प्रजा के हृदयसिंहासन का अधीश्वर होता है ।
( १५ ) रामराज्य में सभी सुखी और सभी शोकरहित थे— हरषित भये गये सब सोका । राम ने अपने राज्य को 'आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी' के अनुसार बनाया था, जिसमें वसिष्ठादि ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण थे, राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न जैसे शूरवीर राजन्य थे । उस राष्ट्र में पर्याप्त दूध देनेवाली गायें और महान् भार वहन करनेवाले बैल उत्पन्न होते थे । तीव्रगामी घोड़े एवं साध्वी सती पुरन्ध्रियाँ होती थीं । राष्ट्र के रथी विजेता होते थे। राष्ट्र के यजमान सभा में बैठने योग्य सभ्य युवक उत्पन्न करनेवाले होते थे । समय-समय पर वृष्टि होती थी । औषधियाँ फलदायिनी परिपाक को प्राप्त होती थीं । राष्ट्र के योग-क्षेम की पूर्ण व्यवस्था थी । राम गौओं और ब्राह्मणों के रक्षणार्थ तथा देश के हितार्थ अपने अप्रमेय गुरु के अनुसार सदा ही महत् कर्म की साधना में उद्यत रहे— गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय वै । तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥ रामराज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे— दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य नहि काहुहि व्यापा ॥ (रामचरितमानस ७।२०।१) उच्च धर्मनिष्ठता एवं ब्रह्मनिष्ठता का ही परिणाम था कि किसी की अपमृत्यु नहीं होती थी । किसी को कोई पीड़ा नहीं होती थी । सब सुन्दर और नीरोग होते थे । कोई दुःखी, दरिद्र एवं दीन नहीं होता था । कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षणवाला भी नहीं होता था— अलप मृत्यु नहि कबनेउ पीरा । सब सुन्दर सब निरूजसरीरा ॥ नहिं दरिद्र कोउ दुःखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥ सब उदार सब पर उपकारी । विप्रचरनसेवक नर नारी ॥ एकनारिव्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥ वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम का मन्त्रिमण्डल था, जिसमें विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, अस्त्रशस्त्रकुशल, सुदृढ़, पराक्रमी, यशस्वी तथा सावधान मन्त्री थे । सीताराम का महत्त्व पद्मपुराण के अनुसार श्रीहरि का एक-एक नाम समस्त वेदों के समान परमपावन है और हरि के सहस्र नामों के तुल्य एक श्रीरामनाम है । तभी तो भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं—हे वरानने ! मैं मनोरम राम में राम, राम, राम जपता हुआ सदा रमण करता हूँ । राम का एक-एक नाम हरि के सहस्र नामों के तुल्य हैं । जैसे सच्चिदानन्दघनमूत्ति राम हैं वैसी ही राम की ह्लादिनी, सन्धिनी और संविन्मूत्ति जनकनन्दिनी जानकी हैं । आह्लादिनी आदि शक्तियों से विशिष्ट ही परिपूर्ण ब्रह्म होता है । उसी तरह सर्वालङ्कारों से अलङ्कृता सुवर्णवर्णा द्विभुजा चिद्रूपिणी कमलधारिणी श्रीजनकनन्दिनी सीता से आश्लिष्ट होकर ही श्रीरामचन्द्र परात्पर परब्रह्म हैं । सकल सत्शास्त्रों का तात्पर्य सीता में पर्यवसित है, क्योंकि सीतोपनिषद् के अनुसार सीता ब्रह्मसत्तासामान्य- रूपा है । तभी तो श्रीपराशरभट्ट स्वामी कहते हैं—केवल श्रीसूक्त तथा रामतापनी उपनिषद् ही हाथ उठाकर आपको ही जगत् की एकमात्र नियन्त्री नहीं कहते हैं, किन्तु रामायण महान् आर्ष ग्रन्थ भी आपके चरित्र का प्रतिपादन कर के ही जीवनधारण करता है । जितने स्मृतियों के प्रणेता मनु आदि हैं वे सभी पुराणों के सहित वेदों को आपकी महिमा में प्रमाण मानते हैं ।
( १६ ) भक्त वैष्णवाचार्य तो मुक्तकण्ठ से स्पष्ट कहते हैं—हे माता मैथिली, लङ्का में नित्य अभिनव अपराध करनेवाली राक्षसियों का रोषपूर्ण हनुमान् से, अनेक हेतुदर्शक वचनों द्वारा बिना शरण से आये ही, संरक्षण कर आपने राघवेन्द्र श्रीराम की गोष्ठी (संसद्) को लघु बना दिया, क्योंकि राघवेन्द्र रामचन्द्र भगवान् ने तो जयन्त तथा विभीषण का ही संरक्षण शरण में आनेपर ही किया, किन्तु आपने तो अपने परमोत्कृष्ट क्षमागुण के प्राबल्य से शरण में आये बिना, अहैतुकी कृपा से, उन कई राक्षसियों का संरक्षण किया—आपकी वह आकस्मिकी क्षमा हमें महान् अपराधों से क्षमा कर सुखी करे । संमोहनतन्त्र के अनुसार गौर तेज (महालक्ष्मीस्वरूपा जनकनन्दिनी जानकी) के बिना श्याम तेज (नीलसरोरुह-द्युति विष्णुरूप भगवान् श्रीराम) के पूजन, भजन तथा ध्यान से पूर्ण सिद्धि मिलना तो दूर पातक ही हाथ लगता है । ब्रह्माजी श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्रजी से कहते हैं— सीता लक्ष्मोर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः । वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥ (वा० रा० ६।११७) विष्णुपुराण के अनुसार जैसे विष्णु सर्वगत हैं वैसे ही उनकी अनपायिनी शक्ति भी सर्वगत एवं नित्य ही है । विष्णु अर्थ हैं तो भगवती वाणी हैं, भगवती नीति हैं तो भगवान् नय हैं, विष्णु बोध हैं तो लक्ष्मी बुद्धि हैं एवं भगवान् धर्म हैं तो भगवती सत्क्रिया हैं । आगे विष्णुपुराण में कहा गया है— महालक्ष्मी ही विष्णु के राघव हो जाने पर सीता बन जाती हैं, कृष्ण होने पर रुक्मिणी बन जाती हैं, जगत्स्वामी विष्णु जब-जब अवतार लेते हैं, महालक्ष्मी उनकी सहायिनी होकर प्रकट होती हैं। अन्य अवतारों में भी विष्णु के अनुरूप ये बन जाती हैं । मनुष्य बनने पर मानुषी बन जाती हैं । सर्वथा विष्णु के अनुरूप ही अपना स्वरूप बना लेती हैं । आगे लक्ष्मीजी को सम्बोधित कर कहा गया है—माँ, लक्ष्मीजी, आप सब लोगों की माता हैं और देवाधिदेव हरि पिता हैं । आपसे और भगवान् विष्णु से सारा जगत् व्याप्त है । स्कन्दपुराण में भी कहा गया है— कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा । देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ॥ विष्णोर्देहानुरूपा वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् । श्रीराम कहते हैं—अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा । अर्थात् सीता मुझसे वैसे ही अभिन्न है जैसे कि भास्कर से उनकी प्रभा अभिन्न है । श्रीसीताजी भी कहती हैं— अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा । जैसे भास्कर से प्रभा अभिन्न है वैसे ही मैं श्रीराघवेन्द्र से अभिन्न हूँ। श्रीराम के लोकोत्तर गुण उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित्र वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते हैं । उन्हें कौन जान सकता है । राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ ।
( १७ ) सत्यपराक्रम राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं। सत्य ही बोलते हैं, अमृत नहीं बोलते हैं। राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते, उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं। वे वध्य व्यक्ति का अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते । राम की धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता स्तुत्य थी। दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी। गुरु के प्रति वे विनयी थे। उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में अभिरुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट थी, इसी लिए ऋषियों की दृष्टि में राम से भिन्न कोई भी काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता । मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रज्ञान), शील, इन्द्रियनिग्रह, मनोनियह ये छः गुण राघवेन्द्र राम को शोभित करते हैं । शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं । अङ्गों की रेखाओं की स्पष्टता रूप है, गौरत्वादि धर्मविशेष वर्ण है, चाकचिक्यादिरूप कान्ति प्रभा है, चक्षुओं को बाँधनेवाला स्मितमुखत्वादि ही राग है, कुसुम के समान कोमल स्पर्शविशेष आभिजात्य है, कटाक्षादि विलास हैं एवं तरलता लावण्य है। गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भस्थ शिशु की हितदृष्टि से ही सब कार्य करती है वैसे ही राजा की सम्पूर्ण चेष्टाएँ प्रजाहित की दृष्टि से ही होती हैं। फिर लोकदृष्टि से कुछ असम्मत भी क्यों न हो । ताटका (ताड़का) के मारने में राम को स्त्री-वध के सम्बन्ध में अधिक संकोच था । तभी विश्वामित्र ने कहा था— तुम्हें स्त्रीवधके लिए घृणा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि चातुर्वर्ण्य के रक्षण के लिए राजपुत्र को ऐसी आततायी स्त्री का भी वध करना चाहिये। प्रजारक्षणार्थ राजा को नृशंस, अनृशंस, क्रूर, अक्रूर, पातकयुक्त, सदोष सब कुछ करना पड़ सकता है। जैसे हाथी के पैर में सबका पैर आ जाता है, वैसे ही राजधर्म में सब धर्म आ जाते हैं। प्रजा एवं प्रजाकल्याणकारी वर्णाश्रमधर्म की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्म है और सब धर्म-कर्म उसी के अङ्गोपाङ्ग हैं । प्रधान के अविरुद्ध ही अन्य धर्मों का महत्त्व है । रामचन्द्र परम ब्रह्मण्य थे। वाल्मीकिरामायण में उन्हें ब्राह्मणों का उपासक कहा गया है। फिर भी ब्राह्मण द्वारा आहत निरपराध श्वान को न्याय देने का जब प्रश्न आया तब राम को न्याय का पक्ष ही लेना पड़ा, क्योंकि उनकी दृष्टि में न्याय सबसे बड़ा था । इसी तरह २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्र करनेवाले ब्राह्मण परशुराम का उग्र रूप जब राम के क्षात्र तेज को अभिभूत करने लगा तब राम ने बड़ी बुद्धिमानी से अपनी ब्रह्मण्यता की रक्षा करते हुए क्षात्रधर्म की भी रक्षा की और कहा— भार्गव ! क्षात्रधर्मयुक्त होने पर भी मुझे आपने वीर्यहीन एवं असमर्थ समझकर क्षात्र तेज का अपमान किया है। अतः अब आप मेरा पराक्रम देखिये । यह कहकर राम ने उनसे धनुष लेकर क्षण में उसे चढ़ाकर कहा— आप ब्राह्मण होने से मेरे पूज्य हैं और विश्वामित्र की भगिनी सत्यवती के पौत्र हैं, इसलिए मैं आपके लिए प्राणहर बाण छोड़ नहीं सकता, किन्तु आपकी दिव्यगति अथवा तपोबल से अर्जित लोकों को नष्ट करूँगा । किन्तु जहाँ धर्मोल्लङ्घन का प्रश्न राम के सामने आया वहाँ राम ने जैसे ही धर्मविमुख शम्बूक शूद्र का वधकर ब्राह्मण-शिशु को पुनर्जीवित किया वैसे ही धर्मविमुख ब्राह्मण रावण का वधकर सम्पूर्ण मानवता को जीवन प्रदान किया ।