रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
६ पञ्चमस्तरङ्गः ८१ चतुर्थःशोधनप्रकारः—यामिनीः हरिद्रा। यवाग्रजो यवक्षारः सुवर्चिकः वर्जिङ्गारः कितवः धत्तूरः, अश्वसंख्यैः सप्तभिः ॥ ३२-३३ ॥ भा. टी.—गुड़, त्रिकटुचूर्णं, अजवाइन, पाँचों नमक, चित्रकछालचूर्णं त्रफलाचूर्णं, जवाखार, सज्जीखार, सुहागा, धतूरा बीज और सरसों, इन, सबको पृथक् समभाग में लेकर इनका चूर्ण पारद में बीसवाँ भाग डालकर सात दिन तक मर्दन करने से पारद शुद्ध हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः नागवल्लीदलरसैस्तथा चार्द्रकजै रसैः । क्षारत्रययुतैश्चापि रसराजं त्रिमर्दयेत् ॥३४॥ ततस्तेभ्यः पृथक्कृत्वा सप्तदोषविवर्जितम् । मुक्ताफलसमाकारं रमराजं प्रयोजयेत् ॥३५॥ पञ्चमःशोधनप्रकारः—नागवल्लीदलरसैः ताम्बूलपत्ररसैः, क्षारत्रयं स्वजि- कासौभाग्ययवाग्रजाः ॥३४-३५ ॥ भा.टी.—पारद को पान के रस, अदरख और जवाखार, संज्जीखार तथा सुहागे के साथ मिलाकर तीन दिन तक मर्दन करें । फिर अम्लकाञ्जी या जल से धोकर पारद को पृथक् कर लें । इस विधि से शुद्ध पारद मोती के समान चमकीला और सप्तदोषरहित हो जाता है ॥ ३४-३५ ॥ षष्ठः शोधनप्रकारः विमर्द्य सुधया सप्तदिनं धूमनिषेष्टकैः । त्रिदिनं मर्दयेत्सूतं काञ्जिकैः क्षालयेत्ततः ॥ ३६ ॥ वस्त्रं चतुर्गुणं कृत्वा सूतं निःसारयेत्ततः । सप्तकञ्चुकनिर्मुक्तो जायते निर्मलो रसः ॥३७॥ इति रसस्य सामान्यशोधनम् । षष्ठः शोधनप्रकारः—सुगमः । चतुर्गुणवस्त्रेणेत्युपलक्षणं, शम्बरमृगच- र्मणा चात्यन्ततनुना पारदस्य गालनं कार्यमिति गुरुसम्प्रदायः ॥३६-३७॥ भा. टी.—पारद को पहिले चूने के साथ सात दित तक मर्दन करके चतुर्गुण ( चार तह ) वस्त्र से छान लें । फिर इसे घर का धुवाँ, हरिद्राचूर्ण तथा ईंट के चूर्ण में तीन दिन तक मर्दन करके काञ्जी से धोकर साफ कर लें । अब इस पारद को एक चौहत वस्त्र में रखकर छान लें । इस प्रकार शोधन करने से पारद सप्तकञ्चुक रहित तथा स्वच्छ हो जाता है ॥३६-३७॥
८२ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—लाल ईंटों का चूर्ण, कम्बल की भस्म, बिना बुझा हुआ चूना रसोई का धुँवा, हल्दी, इन पाँचों द्रव्यों को समभाग में लेकर एकत्र कर लें, अब इससे आधा भाग पारद मिला नींबू के रस से एक दिन मर्दन कर डमरु यन्त्र में बन्द करके तीन घंटे की अग्नि देने से पारद ऊपर उड़कर शुद्ध हो जाता है। इसको सब काम में निःशंक होकर प्रयोग करना चाहिए। वक्तव्य—शुद्ध पारद को पान के पत्तों के रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करके उसका गाढ़ा सा कल्क बना लें। अब इस कल्क को एक कपड़े पर लेप करके शिर में बाँधने से शिर के बालों में होनेवाली सब यूका (जूँ) मरकर गिर जाती हैं। शुद्ध पारद दो तोला, सिक्थतैल (मोम का तेल) बारह तोला लेकर इन दोनों को एकत्र खरल में तब तक मर्दन करें जब तक कि पारा मोम के तेल में अच्छी तरह मिल न जाय। यह एक उत्तम मरहम है। यह मरहम शिश्नेन्द्रिय तथा गुद प्रदेश में होनेवाले बहुत पुराने भयंकर फिरंग रोग के व्रणों को निःसन्देह शीघ्र ही भर देता है। इति रस का सामान्य शोधन। अथ हिंगुलोत्थितपारदस्य निर्माणप्रकारः हिङ्गुलं पारिभद्रस्य रसैः सम्पेपयेद् बुधः । चाङ्गेर्या वा रसेनेव द्रवैर्जम्बरीरजैस्तथा ॥३८॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण सप्तकञ्चुकवर्जितम् । गृह्णीयान्निर्मलं सूतं रसतन्त्रविशारदः ॥ ३६ ॥ षोडशांशे निशाचूर्णैस्ततस्तं पेषयेद् बुधः । अम्लेन पटुना चापि मर्दयेद्वा दिनद्वयम् ॥४०॥ वस्त्रं चतुर्गुणीकृत्य ततो निःसारयेद्रसम् । योगेषु योजयेद् वैद्यो रसराजं सुनिर्मलम् ॥४१॥ गुरुदर्शितमार्गेण यन्त्रमानं प्रकल्पयेत् । मानाभावाद्रसेन्द्रस्य लिखितं नैव शक्यते ॥४२॥ अथ हिंगुलात् पारदनिर्माणप्रकारः- पारिभद्रः "फरहद" इति ख्यातः । जम्बीरनिम्बुनीरैर्वा हिंगुल मर्दनं पारदविश्लेषणार्थम् , उर्ध्वपातनेन पारदपातनं नागवङ्गादिदोषोप्रपनोदाय, ततश्च चूर्णैर्नांथवा लवणेनाम्लेन च मर्दनं निर्मली-
पञ्चमस्तरङ्गः ८३ करणाय । अद्यत्वे बहवोऽलसा हिंगुलस्य द्विगुणवस्त्रवेष्टितस्य शनैर्ज्वालनद्वारा पारदविश्लेषणामातन्वते, स च लघुरपि प्रकारो रसस्य साकल्येनोर्ध्वपातनस्याभा- वात् नागवङ्गादिदोषांपरिहारकत्वादुपेक्षित आचार्य्यैः,—इत्यवधेयम् ॥३८-४२॥ भा.टी.—सिंगरफ को फरहद के स्वरस से अथवा चांगेरीस्वरस अथवा जम्बीरी नींबू के स्वरस से एक दिन मर्दनकर सुखा करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में डालकर उड़ा लेवैं । इस प्रकार से प्राप्त पारद स्वच्छ और सप्त कञ्चुक रहित हो जाता है । अब इस पारद में १६ वाँ भाग हरिद्राचूर्ण डालकर अथवा नमक और नींबू का रस डालकर दो दिन तक मर्दन करें । मर्दन करने के बाद अच्छी तरह सूख जाने पर इसे चौतह वस्त्र में छान लें । इस शुद्ध पारद को योगों में प्रयोग कर सकते हैं । ऊर्ध्वपातन के लिये कितना बड़ा यन्त्र होना चाहिए इसका निर्णय गुरुपदेशानुसार करना चाहिए । यहाँ पर पारद का मान न होने से यन्त्र मान को भी नहीं लिखा जा सकता है । अथवा केवल नींबू के रस में घोटकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में उड़ा लेने से भी हिंगुल से पारद निकल आता है ॥ ३८-४२ ॥ अथ पारदस्य अष्टौ संस्काराः रसायनप्रयोगेषु रसागमविशारदः । रसराजं प्रयुञ्जीत कर्माष्टकविशोधितम् ॥ ४३ ॥ स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापने तथा । पातनत्रितयञ्चाथ बोधनं सुनियामनम् ॥ ४४ ॥ सुप्रदीपनमित्यष्टौ प्रोक्ताः सर्वोपयोगिनः । संस्कारा रसराजस्य रसशास्त्रविशारदैः ॥ ४५ ॥ अथ पारदस्याष्टौ संस्काराः—रसतन्त्रप्रसिद्धाः सर्वोपयोगिनश्च वर्ण्यन्ते, नाम्नामर्थैरेव तत्त्वमेषां व्याख्यातम् । नामकीर्तनादेव संख्यालाभेऽपि पुनरष्टौ इति कथनं न्यूनाधिकतानिषेधाय । यद्यप्यष्टादशसंस्काराः प्राचीनतन्त्रसिद्धा- स्तथापि न तेषां व्याधावुपयोगोऽतस्त इहोपेक्षिताः परिभाषासौकर्याय, तदेतदाह सर्वोपयोगिन इति ॥ ४३-४५ ॥ भा.टी.—रसशास्त्र के विद्वान् को चाहिए कि वह रसायनप्रयोगों में अष्ट- संस्कार युक्त पारद का प्रयोग करें। स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, त्रिविधपा- तन (ऊर्ध्वपातन, अधःपातन, तिर्यक्पातन), बोधन, नियामन और दीपन—ये आठ संस्कार ही यहाँ पर सर्वोपयोगी होने के कारण बताये जाते हैं ॥४३-४५॥
८४ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—पारद के अठारह संस्कार रसशास्त्र में वर्णित हैं, परन्तु उनमें उक्त आठ संस्कार ही आवश्यक तथा सर्वोपयोगी होने से सर्वत्र विशेष रूप से वर्णन किये गये हैं। अन्यत्र रसप्रधान ग्रन्थों में पारद के अठारह संस्कार इस प्रकार बताये गये हैं। १-स्वेदन, २-मर्दन, ३-मूर्च्छन, ४-उत्थापन, ५-त्रिविधपातन, ६-रोधन, ७-नियमन, ८-सन्दीपन, ९-गगनभक्षण, १०-सञ्चारण, ११- गर्भद्रुति, १२-बाह्यद्रुति, १३-जारण, १४-ग्रास, १५-सारणाकर्म, १६-संक्रा- मण, १७-वेधन, १८-शरीरयोग । संस्कार—पारद के स्वाभाविक अष्ट दोषों की विकृति को दूर करके उसमें एक अद्भुत गुण उत्पन्न करने को संस्कार कहा जाता है—“संस्कारो हि गुणान्तराधानम्” । अतः असंस्कृत पारद में कोई विशेष गुण नहीं होते हैं। इन अठारह संस्कारों में से कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक आठ संस्कार अवश्य करने चाहिए। अठारह संस्कारों में भी प्रथम के आठ संस्कार सुखसाध्य और अवशिष्ट चारण, संक्रामण, ग्रास, सारण आदि कतिपय संस्कार स्पष्टार्थ या निरुक्ति या पारिभाषिक अर्थ के व्यक्त न होने से कष्टसाध्य हैं। संस्कारों की प्रयोजन में भिन्नता होने से अन्यत्र इसके दो भेद किये गये हैं— १-देहकर्मार्थ, २-धातुवादार्थ । शारीरिक रोगों को दूर करने और रसायन तथा वाजीकरणार्थ औषधियों के निर्माण में अष्ट संस्कारयुक्त पारद लिया जाता है। स्वर्ण रजत आदि धातुओं के निर्माणार्थ प्रायः चारणा, जारणा, वेध आदि अठारह संस्कारयुक्त पारद का ग्रहण किया जाता है। “सूतस्यैते च संस्काराः कथिता देहकर्मणि । तथा च दश संस्कारा देहलोहकराः स्मृताः ॥” स्वेदनलक्षणम् दोलायन्त्रे स्थापयित्वा रसेन्द्रं क्षारैरम्लैरौषधैर्वा कषायैः । युक्त्या यत्स्यात्पाचनं स्वेदनं तत् प्राज्ञैरुक्तं दोषशैथिल्यकारि ॥४६॥ स्वेदनलक्षणम्—सुगमम् । तथा च रसवाग्भटः—“क्षाराम्लैरौषधैर्वापि दोला- यन्त्रे स्थितस्य हि । पाचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम्” इति ॥४६॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में क्षारीयद्रव या अम्लीयद्रवों को भरकर अथवा औषधियों को भरकर उसमें पारद को पोटली में बाँधकर युक्तिपूर्वक पकाने को स्वेदन कहा जाता है। इस स्वेदन कर्म से पारद के दोष शिथिल हो जाते हैं ॥ ४६ ॥
पञ्चमस्तरङ्गः ८५ प्रथमः स्वेदनप्रकारः पिप्पलीमरिचचित्रकार्द्रकैर्विश्वसैन्धवफलत्रिकान्वितैः । षोडशांशकमितैर्दिनत्रयं स्वेदयेद्रसवरं सकाञ्जिकैः ॥ ४७ ॥ नूतनं कल्कमादाय नातितीक्ष्णेन वह्निना । प्रत्यहं स्वेदयेद्धीमान् रसतन्त्रविशेषवित् ॥ ४८ ॥ प्रथमः स्वेदनप्रकारः—विश्वं शुण्ठी, पिप्पल्यादिनवद्रव्याणां पृथक्पृथगेको- ऽशः श्लक्ष्णपिष्टः, काञ्जिकमर्धपात्रम्, पारदस्य षोडशांशाः, चतुर्गुणवस्त्रस्थम्- र्जपत्रपोट्टलीस्थं पारदं विधाय दोलया काञ्जिके त्रिदिनं स्वेदनम् । प्रतिदिनञ्च नूतनकाञ्जिककल्कक्षेपः । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ४७-४८ ॥ भा. टी.—पारद से १६ वाँ भाग पिप्पली, मरिच, चित्रक, अदरख, सोंठ; सेंधा नमक तथा त्रिफला लेकर काञ्जी से पीसकर पतला कल्क बना लें, अब इसे दोलायन्त्र में डालकर और काञ्जी मिला लें, अब पारद को पोटली में बाँधकर इसमें लटकाकर तीन दिन तक मन्द-मन्द अग्नि से स्वेदन करें । प्रत्येक दिन उक्त औषधियों का नूतन कल्क लेकर साधारण अग्निताप से पारद का स्वेदन करना चाहिए ॥ ४७-४८ ॥ द्वितीयः स्वेदनप्रकारः त्र्यूषणं मूलकासुर्यौ पटुकाऽर्द्रकवह्नयः । तत्कल्कैः काञ्जिके सूतं स्वेदयेद्दिवसत्रयम् ॥ ४६ ॥ द्वितीयः स्वेदनप्रकारः—त्र्यूषणं त्रिकटु, आसुरी राजिका, पटु सैन्धवम्, वह्निश्चित्रकः ॥ ४६ ॥ भा.टी.—त्रिकटु, मूली, राई, लवण, अदरख तथा चित्रक इन औषधियों के कल्क में काञ्जी मिलाकर पूर्वोक्त विधि से तीन दिन पारद का स्वेदन करना चाहिए ॥ ४६ ॥ तृतीयः स्वेदनप्रकारः पिप्पली मरिचविश्वभेषजे शृङ्गवेरलशुनार्द्रकामयः । मेघनादलवणौ महाबला चुल्लिका लवणमाजशृङ्गिका ॥५०॥ आसुरी खलु गवेधुका वरा प्रक्षिपेद्रसकलांशकं पृथक् । तत्समस्तमथ व्यस्तमेव वा काञ्जिकेन सह मर्दयेद् बुधः ॥५१॥ कल्कतामुपगतेन तेन वै वस्त्रमंगुलिमितं प्रलेपयेत् । निक्षिपेद्रसवरं तदन्तरे स्फोतकेन सुदृढं निरोधयेत् ॥ ५२ ॥
८६ रसतरङ्गिणी
दोलिकायन्त्रके स्थापयेत्पोट्टली नातितीक्ष्णानलं ज्वालयेत्सन्ततम् । नूतनं काञ्जिकं प्रक्षिपेत्प्रत्यहं स्वेदयेत्पारदं वासराणां त्रयम् ॥५३॥ अथ तृतीयः—शृङ्गवेर आर्द्रकम्, पुनरप्यार्द्रकपाठस्तस्य द्वैगुण्यार्थः मेघनादः तण्डुलीयकम्, महाबला सहदेवी, चुल्लिका लवणं नवसादरः, गवेधुकः अरण्यगोधूमः, वरा त्रिफला, भूर्जपत्रमध्ये पारदनिक्षेपः पारदरक्षार्थः॥५०-५३॥ भा. टी.—पीपल, मिर्च, सोंठ, अदरक, लहसुन, अदरक, चित्रक, चौलाई की जड़, नमक, महाबला, नौसादर, काकड़ासिंगी, राई, गवेधुक ( जंगली गेहूँ ) त्रिफला; इन प्रत्येक औषधियों को पारद से १६ वाँ भाग लेकर, सबको एक साथ या अलग-अलग काञ्जी से पीसकर गाढ़ा कल्क बना लें । अब इस कल्क का एक स्वच्छ वस्त्र पर एक अंगुल मोटा लेप करके उसमें पारद को रखकर फीते से इसकी एक दृढ़पोटली बना लें । अब दोलायन्त्र में काञ्जी डालकर उसमें पोटली लटका कर तीन दिन साधारण अग्निपात से स्वेदन करें । परन्तु प्रतिदिन नूतन काञ्जी दोलायन्त्र में डालकर स्वेदन करना चाहिए ॥ ५०–५३ ॥ मर्दनस्वरूपम् क्षाराद्यैरोषधैर्वा यत् खल्वे सूतस्य पेषणम् । तन्मर्दनं बुधैः प्रोक्तं बहिर्मलनिवृत्तये ॥ ५४ ॥ अथ क्रमप्राप्तं मर्दनस्वरूपमाह बहिर्मलनिवृत्तस्य इति । बहिर्मलाः कञ्चुकाः आवरकत्वात्, तन्निवृत्तिरस्य फलम् । “उदितैरोषधैः सार्धं सर्वाम्लैः काञ्जिकैरपि । पेषणं मर्दनाख्यं स्याद् बहिर्मलविनाशनम् ॥” इत्याहुः प्राञ्चः ॥ ५४ ॥ भा. टी.—क्षार आदि औषधिद्रव्यों के साथ पारद को खरल में डाल कर पीसने को मर्दन कहा जाता है । इस कर्म द्वारा पारद का बाह्य मल नष्ट किया जाता है ॥ ५४ ॥ मर्दनस्य प्रथमः प्रकारः सैन्धवं सदनधूम आसुरी यामिनी लशुनमार्द्रकं वरा । षोडशांशमिह निक्षिपेद्रसान्मर्दयेद्रसवरं दिनत्रयम् ॥ ५५ ॥ मर्दनस्य प्रथमः प्रकारः—सदनधूमो गृहधूमः, यामिनी हरिद्रा, वरा त्रिफला, प्रतिद्रव्यं षोडशांशं निक्षिप्य मर्दनम् ॥ ५५ ॥ भा.टी.—सैन्धव, घर का धुआँ, राई, हल्दी, लहसुन, अदरक तथा त्रिफला को पारद से षोडशांश लेकर खरल में पारद के साथ तीन दिन तक मर्दन करके पारे को पृथक् कर लेना चाहिए ॥ ५५ ॥
पञ्चमस्तरङ्गः ८७ मर्दनस्य द्वितीयः प्रकारः इष्टिकाचूर्णं सैन्धवं यामिनी गेहधूमो गुडश्चासुरी नागरम् । षोडशांशं क्षिपेत्सर्वमेतद्रसान्मर्दयेत् पारदं वासराणां त्रयम् ॥५७॥ इष्टिकाचूर्णेत्यादिनाऽपरो मर्दनप्रकारो व्याख्यातः। केचित्त्वत्र हरिद्रानागर- स्थाने दधि प्रक्षिपन्ति, अपरे सप्तदिनान्यपि मर्दनमाहुः ॥ ५६ ॥ भा. टी.—ईंट-का चूर्ण, सैन्धानमक, हल्दी, घर का धुआँ, गुड़, राई तथा सोंठ को पारद से षोडशांश लेकर पारद के साथ खरल में तीन दिन तक मर्दन करें ॥ ५६ ॥ मूर्च्छनस्वरूपम् गृहकन्यादिभिर्द्रव्यैर्नष्टपिष्टत्वसाधनम् । दोषत्रयनिवृत्त्यर्थं तन्मूर्छनमिहोच्यते ॥५७॥ स्वरूपत्यागसहितं पिष्टत्वकरणं हि यत् । रसज्ञैर्जितसूतोऽसौ नष्टपिष्ट उदाहृतः ॥ ५८ ॥ मूर्च्छनस्वरूपम्—दोषत्रयाणां मलवह्निविषाणाम्, यदुक्तम्— “मर्दनेोद्दि- ष्टभैषज्यैर्नष्टपिष्टत्वकारकम् । तन्मूर्छनं हि वह्निमलविषकाञ्चुकनाशनम्” इति ॥ अथ नष्टपिष्टस्य लक्षणमाह—यत् स्वरूपस्य चाञ्चल्यादेः त्यागसहितं रसस्य पिष्टत्वकरणं असौ रसज्ञैर्नष्टपिष्ट उक्तः, स च फलतः जितसूतः चाञ्चल्या- दिविनिवारणादिति भावः ॥ ५७-५८ ॥ भा. टी.—पारद के मल, वह्नि तथा विष दोषों को दूर करने के लिये घीकुआर आदि द्रवों के साथ पारद का मर्दन करते हुए नष्टपिष्ट करना मूर्च्छन संस्कार कहा जाता है ॥ ५७-५८ ॥ मूर्च्छनस्य प्रथमः प्रकारः कुमारिका मलं हन्ति वरा दहननाशिनी । चित्रमूलं विषं हन्ति तस्मादेभिः प्रयत्नतः ॥५६॥ मर्दितं सूतकं द्रव्यैः सप्तवाराणि मूर्च्छयेत् । एवं सम्मूर्च्छितः सूतो दोषैः सर्वैः प्रमुच्यते ॥६०॥ मूर्च्छनस्य द्वितीयः प्रकारः यवाग्रजः स्वर्जिका च तथा लवणपञ्चकम् । अम्लोषधानि विबुधः प्रक्षिप्य सूतके दृढम् ॥६१॥
८८ | रसतरङ्गिणी
तावत्सुपेषयेद्यावन्नष्टपिष्टत्वमाप्नुयात् । इत्थं सम्मूर्च्छितः सूतो विमुञ्चति मलत्रयम् ॥६२॥ मूर्च्छनस्य प्रथमः प्रकारः—व्याख्यायते । अत्र केचित्—“आरग्वधो हन्ति मलं प्रयत्नात् कुमारिका सप्त हि कञ्चुकांश्च । अंकोलमूलं हि विषं निहन्याद्र- सस्य वह्निः किल पावकञ्च” इत्याहुः । अपरे तु राजवृक्षस्य मूलोत्थचूर्णेन सह कन्यकामलदोषापनुत्त्यर्थम्, चित्रकं वह्निदोषापनुत्यै, त्रिफला वह्निविना- शाय इत्याहुः । प्रक्षेपद्रव्यमानञ्च—“षोडशांशं प्रतिद्रव्यं सूतमानान्नियोजयेत्” इति रसरत्नसमुच्चये । सप्तवाराणि इति मूर्च्छनोत्तरं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य पुनः मर्दनं पुनः प्रक्षालनमित्येवं सप्तमूर्च्छनम् ॥ ५६–६२ ॥ भा.टी.—घीकुआर से मलदोष, त्रिफला से अग्निदोष और चित्रकमूल से पारद का विषदोष दूर होता है, अतः इन द्रवों के साथ सात-सात वार पारद को मर्दन कर नष्टपिष्ट करके काञ्जी से धोकर साफ कर लें । इस प्रकार पारद को मूर्च्छित करने से उसके सब दोष नष्ट हो जाते हैं ॥ ५६–६० ॥ खरल में पारा डालकर उसमें जवाखार, सजीखार तथा पाँचों नमक तथा अम्ल द्रव डालकर इतनी दृढ़ता के साथ मर्दन करें जिससे पारद नष्ट- पिष्ट हो जाय । इसके अनन्तर इसे काञ्जी से धोकर साफ कर लें । इस प्रकार मूर्च्छित किया हुआ पारद तीनों दोषों से रहित हो जाता है ॥ ६१–६२ ॥ उत्थापनस्वरूपम् स्वेदाद्यैर्यद्रसेन्द्रस्य मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् । पुनः स्वरूपकरणं तदुत्थापनमीरितम् ॥ ६३ ॥ उत्थापनलक्षणम्-उत्थापनं मूर्च्छाव्यापद्विनाशाय । यदुक्तम्—“स्वेदात- पादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् । तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥” इति ॥ ६३ ॥ भा. टी.—उक्त स्वेदन मर्दन तथा मूर्च्छन क्रियाओं से पारद में जो एक प्रकार की मूर्च्छा (असमर्थता) सी आ जाती है उसको दूर कर पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त कराना उत्थापन संस्कार कहा जाता है ॥ ६३ ॥ उत्थापनस्य प्रथमः प्रकारः सौभाग्यलवणक्षारैः पारदं पेषयेद् भृशम् । तद् गोलकं विधायथ पोट्टल्यान्तु विनिक्षिपेत् ॥ ६४ ॥ क्षाराम्लैः स्वेदयेत्सम्यक् दोलायन्त्रे भिषग्वरः । एवं वारत्रयं कुर्यादुत्थितो जायते रसः ॥ ६५ ॥
पञ्चमस्तरङ्गः ८६ द्वितीयः प्रकारः अथवा काञ्जिकेनैव रसेन्द्रं स्वेदयेद् बुधः । अम्लैः प्रक्षालयेत्सम्यगुत्थितो रसराड् भवेत् ॥ ६६ ॥ तृतीयः प्रकारः रसेन्द्रं काञ्जिकेनेह याममात्रं विमर्दयेत् । सलिलैः क्षालयेत्सम्यगुत्थितो जायते रसः ॥ ६७ ॥ चतुर्थः प्रकारः जम्बीरमातुलुङ्गाद्यैः पेषयेदातपे रसम् । वसनात्सारयेत्सम्यगुत्थितो जायते रसः ॥ ६८ ॥ तत्र प्रथमः प्रकारः—सौभाग्यलवणमधुभिः पारदं पेषयित्वा गोलकं विधाय चतुर्गुणवस्त्रपोट्टल्यां निधाय क्षाराद्यैः सम्यक् त्रिवारं स्वेदयेत् तथा च स्वरूपा- पत्तिर्भवति रसस्य ॥ ६४-६८ ॥ भा.टी.—सुहागा, लवण और मधु के साथ पारद को अच्छी तरह मर्दन कर इसका एक गोला सा बना लें। अब इस गोले को एक पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र में क्षार आदि द्रव द्रव्य भरकर स्वेदन करें। इस प्रकार तीन बार स्वेदन करने से पारद उत्थित हो जाता है। अर्थात् इसकी मूर्च्छितावस्था दूर हो जाती है ॥ ६४-६५ ॥ अथवा केवल काञ्जी में दोलायन्त्र द्वारा स्वेदनकर अम्लद्रवों से धो लेने पर पारद उत्थित हो जाता है ॥ ६६ ॥ पारद को केवल अम्ल काञ्जी के साथ तीन पहर तक अच्छी तरह मर्दन कर जल से धो लिया जाय तो वह उत्थित हो जाता है ॥ ६७ ॥ अथवा पारद को जम्भीरी नीबू, विजोरा नीबू आदि अम्लद्रवों के साथ तीन पहर तक धूप में मर्दन करके कपड़े से छान लेने पर भी यह उत्थित हो जाता है ॥ ६८ ॥ पातनत्रितयस्वरूपम् उक्तौषधै रसवरस्य विमर्दितस्य यन्त्राहितस्य यदिहोर्ध्वमधश्च तिर्यक् । निष्कासनं तदिह पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिदोषयुगलं शमयत्यनल्पम् ॥६९॥ अथ पातनत्रयस्वरूपम्—अनल्पं समग्रम् ॥ ६९ ॥
६० रसतरङ्गिणः भा.टी.-पातन करने के निमित्त कही हुई औषधियों के साथ पारद को मर्दनकर यन्त्र में रखकर ऊर्ध्व अधः तथा तिर्यक् रूप से पातन कर लेने को पातन कर्म कहते हैं । इन कर्मों के द्वारा पारद के नाग और वंगदोष नष्ट किये जाते हैं। क्योंकि धातु उड़कर ऊपर नहीं लगती है ॥ ६६ ॥ तत्र ऊर्ध्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः स्वर्जिका खलु यवाग्रजं तथा रामठं लवणपञ्चकान्वितम् । अम्लवर्गगदितैस्तु भेषजैः संयुतं रसवरं विमर्दयेत् ॥७०॥ स्थापयेदिह सुयुक्तितो भिषक् पारदं विहितकल्कसंयुतम् । ऊर्ध्वपातनकयन्त्रमार्गतः पातयेदिह रसेश्वरं भिषक् ॥७१॥ ऊर्ध्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः-रामठं हिंगु । सुयुक्तित इत्यधःपात्रे मर्दितः सकल्कः पारदः स्थाप्यः । शिष्टं सुगमम् ॥ ७०-७१ ॥ भा.टी.-सजीखार, जवाखार, हींग, पाँचों नमक तथा अम्लवर्गोक्त औषधियों के साथ पारद को मर्दनकर इस कल्क को हाँडी में भरकर ऊर्ध्व- पातन यन्त्र से ऊपर उड़ा लें । पारद ऊपर लगा हुआ मिलेगा ॥ ७०-७१ ॥ द्वितीयः प्रकारः तुत्थके विमलहेममाक्षिके निक्षिपेत्खलु रसेन्द्रमुज्ज्वलम् । मर्दयेद् गृहकुमारिकारसैर्यवदेति खलु नष्टपिष्टताम् ॥७२॥ कारयेच्च तदनन्तरं भिषक् स्थालिकातलगंतं रसेश्वरम् । ऊर्ध्वपातनकयन्त्रपातितमाददीत विमलं रसेश्वरम् ।७३॥ द्वितीयः प्रकारः-तुत्थकेन सह रसेन्द्रं मर्दयित्वाद्विर्बहुशः क्षालयेत् । क्षालनानन्तरं कन्यारसेन मर्दनं कार्यम् । अथवा उपधात्वादि विज्ञानीयोक्तेन प्रथमशोधनप्रकारसमुदितविधिना शोधितेन स्वर्णमाक्षिकेण सह पारदस्य नष्ट- पिष्टत्वमापाद्य कन्यारसेन मर्दनं कार्यम् ॥ ७२-७३ ॥ भा.टी.-तूतिये के साथ साथ पारद को मर्दनकर जल से धोकर साफ कर लें अथवा शुद्ध स्वर्णमाक्षिक चूर्ण के साथ पारद को कुमारीस्वरस से मर्दनकर नष्टपिष्टकर कल्क बना लें । अब इस कल्क को हाँडी में डालकर ऊर्ध्वपातन विधि से ऊपर उड़ा लें ॥ ७२-७३ ॥ वक्तव्य-ऊर्ध्वपातन करने में ऊपर की हाँडी के भीतर पारद चिपका हुआ होता है, उसे किसी कपड़े या बानों के गुच्छे से रगड़कर एकत्र कर लें फिर (चौतह) कपड़े में छान लें ।
पञ्चमस्तरङ्ग ६१ तृतीयः प्रकारः त्रयो भागा ग्राह्याः खलु रसवरस्येह विबुधैः रवेश्चैको भागो विधिविहितशुद्धिः कृतदलः । समं सर्वं मर्द्यं भृशमिह हि जम्बीररसजैः रसः पाक्यो युक्त्या खलु डमरुयन्त्रे बुधवरैः ॥७४॥ तृतीयः प्रकारः—पत्राकारस्य चूर्णीकृतस्य वा शुद्धस्य ताम्रस्यैको भागो रस- भागत्रयं जम्बीररसैस्त्रिदिनं मर्दनं विधाय पातनं कार्यम् ॥ ७४ ॥ भा.टी.—पारा तीन भाग, शुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, दोनों को खरल में एकत्रकर जम्बीरीनीबू के रस से मर्दनकर इस कल्क को डमरुयन्त्र की निचली हाँडी में भर ऊपर उड़ा लें ॥ ७४ ॥ अधः पातनस्य प्रथमः प्रकारः बलिसम्मिलितं रसेश्वरं सुचिरं वैद्यवरः सुपेषयेत् । विधिना च विधाय कज्जलीमथ जम्बीररसैः सुमर्दयेत् ॥७५॥ शिखी च शिग्रुबीजकं तथासुरी च सैन्धवम् । तथा च मर्कटी बुधः समं समं विनिक्षिपेत् ॥७६॥ पिष्टमानेन तु प्राज्ञो लेपयेदूर्ध्वभाजनम् । अधःपातनयन्त्रे च गृह्णीयान्निर्मलं रसम् ॥७७॥ द्वितीयः प्रकारः हरीतकी विभीतकं तथासुरी च सैन्धवम् । शिखी च शिग्रुजः समैः समैः सुपेषयेद्रसम् ॥७८॥ यदा स नष्टपिष्टतामियात्तदा भिषग्वरः । निरुक्तयन्त्रवर्त्मना रसं निपातयेदधः ॥७९॥ अधःपातनप्रकारः प्रथमः—बलिसम्मिलितं गन्धकयुक्तम् , शिखी चित्रकः, मर्कटी आत्मगुप्ता, ऊर्ध्वभाजनं लेपयेत्, ततोऽधः पातयेत् ॥ ७५–७६ ॥ भा. टी.—समभाग गन्धकयुक्त पारद को अच्छी तरह मर्दन करके इसकी कजली बना लें, अब इसमें पारद के समभाग चित्रकचूर्ण, सहजन के बीज, राई, सैन्धा नमक तथा कौंच के बीज का चूर्ण मिला जम्बीरीनीबू के रस से खूब अच्छी तरह मर्दनकर पिष्टी-सी बना लें । इसी पिष्टी को अधःपातन यन्त्र के ऊपर के पात्र के भीतर लेप करके अधःपातन विधि से पातन कर लें ॥७५–७७॥
६२ रसतरङ्गिणी हरीतकी, विभीतक ( बहेड़ा ), राई, सैन्धा नमक, चित्रक तथा सहजने के बीज; इनको प्रत्येक पारद के बराबर भाग लेकर पारद के साथ किसी अम्लद्रव काञ्जी आदि के साथ अच्छी तरह मर्दनकर नष्टपिष्ट कर लें । फिर इस कल्क को यन्त्र में रखकर अधःपातन द्वारा पारद को प्राप्त कर लें ॥ ७८-७६ ॥ तिर्यक् पातनम् उद्दिष्टैरोषधैः साकं रसराजं सुपेषयेत् । तिर्यक्पातनयन्त्रे च गृह्णीयान्निर्मलं रसम् ॥८०॥ तिर्यक्पातने केचिदाहुः — “श्लक्ष्णीकृतमभ्रदलं रसद्विगुणं च तथारनालेन । खल्वे त्रिदिनं मृदितं यावत् तन्नष्टपिष्टतामेति ॥ कुर्यात्तिर्यक्पातनपातितसूतं क्रमेण दृढवह्निम्” ॥ ८० ॥ भा. टी. तिर्यक्पातन के लिये लिखी हुई औषधियों के साथ पारद को अच्छी तरह पीसकर तिर्यक्पातन में रख के अग्निताप द्वारा तिरछा उड़ा लेना तिर्यक्पातन संस्कार कहा जाता है ॥ ८० ॥ बोधनलक्षणम् मर्दनादियोगेन जातक्लैब्यस्य शूलिनः । क्लैब्यापहं तु यत्कर्म बोधनं कथ्यते बुधैः ॥८१॥ अथ बोधनस्वरूपम् — जातक्लैब्यस्य शूलिनः पारदस्य । अत्र — “जलसैन्धव- युक्तस्य रसस्य दिवसत्रयम् । स्थितिराप्यायनी कुम्भे याऽसौ रोधनमुच्यते ॥” इत्यादिनास्य रोधनमपि नामान्तरमनुसन्धेयम् ॥ ८१ ॥ भा.टी. — मर्दन पातन आदि संस्कार या कर्मों के द्वारा पारद में एक प्रकार की नपुंसकता आ जाती है, इस नपुंसकता को दूर करने के लिये किये जानेवाले संस्कार को बोधन या रोधन कहा जाता है ॥ ८१ ॥ बोधनस्य प्रथमः प्रकारः भूर्जपत्रे निधायाथ रसराजं निरोधयेत् । प्रक्षिप्य सैन्धवं तोये दोलायन्त्रे पचेद् बुधः ॥८२॥ एवं संस्वेदितः सूतो भृशमाप्यायितो भवेत् । जातवीर्यप्रकर्षो हि षण्ढतामिह मुञ्चति ॥८३॥ द्वितीयः प्रकारः जलसैन्धवसूतपूरितां क्षितिगर्ते खलु काचकूपिकाम् । विनिधाय दिनत्रयं ततो गतषण्ढ्यः सबलो रसो भवत् ॥८४॥
अस्याद्यः प्रकारः—भूर्जपत्रे निघाय पारदं पोट्टलीकृत्य ससैन्धवे जले दोलया सप्तदिनं स्वदयेत् इति ॥ ८२-८४ ॥ भा. टी.—पूर्वोक्त पातनादि संस्कारयुक्त पारद को भोजपत्र में रख कपड़े की पोटली में बाँधे, अथ दोलायन्त्र में सैन्धानमक तथा जल डालकर इसमें पारद की पोटली को मन्द-मन्द अग्नि से पकायें । इस प्रकार से स्वेदित पारद पुनः पुष्ट होकर नपुंसकता दोष से रहित हो जाता है ॥ ८२-८३ ॥ एक काँच की शीशी में पारद, सैन्धानमक तथा जल भर इसको बन्द करके जमीन के अन्दर तीन दिन तक गाड़ देने से भी इसका क्लीबत्व-दोष दूर हो जाता है ॥ ८४ ॥ तृतीयः प्रकारः सैन्धवेनाम्लपिष्टेन रसेन्द्रं कूपिकागतम् । गर्ते निधाय चोध्वँन्तु देयो लघुपुटो बुधैः ॥८५॥ एवं सम्पुटितः शीघ्रं भृशमाप्यायते रसः । जातीवीर्यप्रकर्षश्च षण्ढभावं विमुञ्चति ॥८६॥ तृतीयः प्रकारः—अम्लपिष्टेन सैन्धवेन सह पारदं काचकुप्यां निधायोपरि लावकाख्यपुटदानम्, फलञ्च पूर्ववत्, शीघ्रतायां विशेषः ॥ ८५-८६ ॥ भा. टी.—सैन्धानमक को काञ्जी या नींबू के रस से पीसकर इसके साथ पारद मिलाकर इन सबको काँच की शीशी में बन्दकर एक गढ़े में गाड़कर इसके ऊपर पूर्वोक्त लावपुट देने से भी इसका षण्ढदोष नष्ट होकर वीर्यप्रकर्षता बढ़ जाती है ॥ ८५-८६ ॥ नियामनस्वरूपम् बोधनाल्लब्धवीर्यस्य रसस्य स्वेदनं हि यत् । चापल्यविनिवृत्त्यर्थं तन्नियामनमीरितम् ॥८७॥ नियामनलक्षणं सफलमाह—बोधनादिति ॥ ८७ ॥ भा. टी.—बोधन संस्कार द्वारा लब्धवीर्य पारद के चापल्य दोष को दूर करने के लिए पारद को जो निम्न विधि से स्वेदन किया जाता है उस कर्म को नियामनसंस्कार कहते हैं ॥ ८७ ॥ नियामनस्य प्रथमः प्रकारः अम्लिकानागिनीभृंगवन्ध्याऽब्दकितवोद्भवैः । रसैः संस्वेदितः सूतो नियतं नियतो भवेत् ॥८८॥
६४ रसतरङ्गिणी द्वितीयः प्रकारः रसोनभृंगराजाब्दचिञ्चिकानवसादरैः । भृशं संस्वेदितः सूतो नियतं नियतो भवेत् ॥८६॥ अस्याद्यः प्रकारः—अम्लिका चिञ्चा, नागिनी सर्पाक्षी, अब्दं मुस्तकम्, कितवः धत्तूरः । नियतः निरस्तचाञ्चल्यः ॥ ८८-८६ ॥ भा. टी.—इमली, नाकुली ( नाई ), भृङ्गराज, बाँझ ककोड़ा, नागर- मोथा तथा धतूरा इनके रस से दोलायन्त्र द्वारा स्वेदन करने पर पारद चाञ्चल्यरहित हो जाता है ॥ ८८ ॥ लहसुन, भाँगरा, नागरमोथा, इमली तथा नौसादर इनके क्वाथ तथा कल्क से अच्छी तरह स्वेदन करने से भी पारद नियमित हो जाता है ॥८६॥ तृतीयः प्रकारः नियामकगणोद्दिष्टैः समस्तव्यस्तभेषजैः । पूर्वदर्शितमार्गेण भिषक् कुर्यान्नियामनम् ॥६०॥ तृतीयः प्रकारः—कल्केः क्वाथैर्वा इति कल्कपक्षे काञ्जिकैः स्वेदनम् ॥६०॥ भा.टी.—निम्नलिखित नियामकगण की सम्पूर्ण अथवा एक-एक औषधि के रस या क्वाथ से पारद को स्वेदन करने से भी वह नियमित हो जाता है ॥ ६० ॥ रसस्य नियामको गणः महाबला नागबला यमचिञ्चा पुनर्नवा । आखुपर्णी सहचरा वासिका काकमाचिका ॥६१॥ गोक्षुरः शरपुङ्खा च विष्णुक्रान्ता घनध्वनिः । मण्डूकपर्णी तुलसी बला च गिरिकर्णिका ॥६२॥ शतावरी शङ्खपुष्पी श्वेतार्कः कनकाह्वयः । चक्रमर्दः करञ्जश्च ब्रह्मदण्डी शिखण्डिनी ॥६३॥ गुडूची सैन्धवं पाठा मृगाक्षी सोमवल्लिका । नियामकगणो ह्येष प्रोक्तो रसविशारदैः ॥६४॥ नियामकगणः—महाबला सहदेवी, नागबला गाङ्गेरुकी, यमचिञ्चा अपक्वा अम्लिका, सहचरा पीतझिण्टी, विष्णुक्रान्ता अपराजिता घनध्वनिः तण्डुली- यकः, तुलसी कृष्णा ज्ञेया, गिरिकर्णिका कृष्णापराजिता, कनकाह्वयः धत्तूरः, मृगाक्षी इन्द्रवारुणी, सोमवल्लिका मत्स्याक्षी । स्पष्टमन्यत् ॥ ६१-६४ ॥ भा.टी.—सहदेवी, गंगेरन, कच्ची इमली, पुनर्नवा, मूषाकानी, पियावांसा,
पञ्चमस्तरङ्गः ९५ अडूसा, मकोय, गोखुरू, शरपोंखा, सफेद कोयल ( अपराजित ), चौलाई, ब्राह्मी, काली तुलसी, खरेंटी, काली कोयल, शतावर, शंखपुष्पी, श्वेतपुष्प आक, धतूरा, पनवाढ़, करञ्ज, ब्रह्मदण्डी, गिलोय, सैन्धानमक, पाढ़, इन्द्रायण मछेछी इन औषधियों के समुदाय को रसशास्त्रज्ञ नियामकगण कहते हैं ॥६१-६४॥ दीपनस्वरूपम् दोलायन्त्रे स्थापयित्वा रसेन्द्रं क्षाराद्यैर्येत्पाचनं स्याद्यथायम् । ग्रासार्थी वा जारणे च प्रगल्भः शास्त्रज्ञैस्तद्दीपनं सम्प्रदिष्टम् ॥६५॥ अथ दीपनस्वरूपम्-दीपनं नाम "ग्रासार्थिताजारणाभृततासम्पादकं दोलया क्षाराद्यैः पारदपाचनम् । धातुपाषाणमूलाद्यैः संयुक्तो घटमध्यगः। ग्रासार्थे त्रिदिनं स्वेदो दीपनं तन्मतं बुधैः ॥" इति प्राचीनोक्तिरत्रानुसन्धेया ॥ ६५ ॥ भा.टी.-दोलायन्त्र में क्षार अम्ल आदि औषधि द्रवों को भरकर उसमें पारद को इतना स्वेदन करें जिससे वह धातुओं का ग्रास कर सके अथवा गन्धक आदि को जीर्ण कर सके। इस क्रिया को दीपन संस्कार कहते हैं ॥६५॥ दीपनस्य प्रथमः प्रकारः काशीशं मरिचं तथैव तुवरी शोभाञ्जनं काञ्जिकं सौभाग्यं पटुपञ्चकञ्च दहनो राजी समं मेलयेत् । निक्षिप्याथ दिनद्वयं बुधवरो दोलाख्ययन्त्रे पचेत् ग्रासार्थी खलु जारणे च चतुरः सञ्जायते पारदः ॥६६॥ तत्प्रथमः प्रकारः-तुवरी स्फटिका, पटुपञ्चकं लवणपञ्चकम् , दहनश्चित्रकः, स्पष्टमन्यत् ॥ ६६ ॥ भा.टी.-दोलायन्त्र में कासीस, कालीमिर्च का चूर्ण, फिटकरी, सहजना, काञ्जी, सुहागा, पाँचों नमक, चित्रकमूलछाल, राई; सबको एकत्र मिलाकर इसमें पारदपोटली को लटका दें । इस प्रकार दो दिन तक मन्द-मन्द अग्नि से स्वेदन करने से पारद धातुओं को ग्रास तथा जीर्ण में अत्यन्त शक्तिशाली हो जाती है ॥ ६६ ॥ अथ द्वितीयः प्रकारः सौभाग्यं पटुपञ्चकञ्च मरिचं शोभाञ्जनं चासुरी काशीशं यवजोऽनलश्च तुवरी सेफालिका सर्जिका । तुल्यांशैः सुविचूर्णितैर्गृहजले यन्त्र तु दोलाह्वये स्विन्नो यामयुगं ततो रसवरो ग्रासाभिलाषी भवेत् ॥६७॥
९६ रसतरङ्गिणी द्वितीयः प्रकारः-यवजो यवक्षारः, अनलश्चित्रकः, शेफालिका “हरसिंगार” इति भाषायाम् ॥ ६७ ॥ भा.टी.-सुहागा, पाँचों नमक, काली मिर्च, सहंजना, राई, कसीस, जवाखार, चित्रक, फिटकरी, संभालू, सज्जीखार, इन सबको समभाग में लेकर दोलायंत्र में डालकर जल भर दें और पारद की पोटली लटकाकर इसे ६ घण्टे स्वेदन करें तो पारद धातुओं को ग्रास करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ६७ ॥ तृतीयः प्रकारः स्वेदयेदासवाम्लेन सहितं याममात्रकम् । भिषग्वरः सूतराजं शीघ्रं वीर्यविवृद्धये ॥६८॥ चतुर्थः प्रकारः अथवा दहनक्वाथैस्त्रिदिनं काञ्जिके पचेत् । एवं संस्वेदितः सूतो ग्रासार्थी जायते परम् ॥६६॥ आसवाम्लेन काञ्जिकेन ॥ ६८-६६ ॥ भा.टी.-पारद को केवल काञ्जी में दोलायन्त्र द्वारा एक पहर तक स्वेदन करने से भी इसकी शक्ति बढ़ जाती है ॥ ६८ ॥ अथवा चित्रक क्वाथ तथा काञ्जी में तीन दिन तक पारद को स्वेदन किया जाय तो भी उसमें धातुग्रास करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥६६॥ जारणास्वरूपम् सूते गन्धादिनिक्षिप्तात्तत्तद्विधिविशेषतः । गन्धाद्यं जार्यते यत्तु जारणां तदिहोच्यते ॥१००॥ षड्गुणगन्धकजारणस्य प्रयोजनम् वसुविधविधिसंस्कृतोऽपि सूतो रसविबुधैरिह हिङ्गुलोत्थितो वा । रसगुणबलिजारणाविहीनो गदगणवारणतां तु नैति नूनम् ॥१०१॥ अथ जारणालक्षणम्-तत्तद्विधिविशेषतः वालुकायन्त्रकच्छपयन्त्रादिप्रका- रेण । जार्यते वह्न्यादि योगात् क्षीणं क्रियते । “द्रुतग्रासपरीणामो विडयन्त्रा- दियोगतः । जारणा इति” रसेन्द्रचूडामणौ, “जारणा नाम गालनपातनव्यतिरे- केण ग्रस्तघनहेमादिरसस्य पूर्वावस्थाप्रतिपन्नत्वम्” इति च-आयुर्वेदप्रकाशकारः॥ जारणाफलम्-वसुविधविधिसंस्कृतः अष्टविधसंस्कारयुक्तः रसविबुधैरिति
७ पञ्चमस्तरङ्गः ६७ रसशास्त्रामिज्ञैः रसगुणबलिजारणाविहीनः षड्गुणगन्धकजारणाविरहितः अत्र “रसगुणबलिजारणं विनाऽयं न खलु रुजाहरणक्षमो रसेन्द्रः। न जलदकलधौत- पाकहीनः स्पृशति रसायनतामिति प्रतिज्ञा ॥” इति प्राचीनोक्तिरप्यनुसन्धेया॥१००-१ भा. टी.—पारद में बालुकायन्त्र, कच्छपयन्त्र, जारणायन्त्र आदि यन्त्रों के द्वारा गन्धक आदि द्रव्यों का जारण (जीर्ण) करने को जारण संस्कार कहा जाता है ॥ १०० ॥ पारद चाहे अष्टसंस्कार से शुद्ध किया हो अथवा हिंगुल से निकाला गया. हो; परन्तु यदि वह छः गुना गन्धक-जीर्ण न किया हो तो उसमें रोगनाशक शक्ति पूर्णरूप से नहीं आती है । अतः पारद में षड्गुण गन्धकजारण अवश्य करना चाहिए जिससे उसमें रोगनाशक शक्ति उत्पन्न हो जाय ॥ १०१ ॥ षड्गुणबलिजारणस्य प्रथमः प्रकारः निधाय बालुकायन्त्रे चषकं सुदृढं भिषक् । रसतुल्यं बलिं तस्मिन्निक्षिपेत् खलु शोधितम् ॥ १०२ ॥ बलिं तु विद्रुतं दृष्ट्वा रसेशं तत्र दापयेत् । अर्द्धजीर्णं बलिं ज्ञात्वा पुनर्गन्धं प्रदापयेत् ॥ १०३ ॥ आषड्गुणं क्षिपेदेवमल्पमल्पं समाहितः । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा रसेशं तु समाहरेत् ॥ १०४ ॥ अथ षड्गुणगन्धकजारणास्याद्यः प्रकारः—अर्द्धगन्धके जीर्णे पुनर्गन्धकं प्रदापयेत्, सर्वगन्धकक्षये पारदस्योड्डयनभयात् । अत एव च किञ्चित् गन्धक- शेष एव उत्तारणमस्य विधेयम् ॥ एवं षड्गुणगन्धकक्षयपर्यन्तमल्पमल्पं पुनः पुनर्द्यादिति प्रथमः कल्पः ॥ १०२–१०४ ॥ भा. टो.—षड्गुण गन्धकजारण करने के लिए बालुकायन्त्र के ऊपर एक मिट्टी अथवा लोहे का प्याला रखें, अब उसमें पहिले पारद समभाग शुद्ध गन्धक डाल दें । जब गन्धक पिघल जाय तो उसमें गन्धक के बराबर भाग शुद्ध पारद डाल दें और अग्नि देते जायँ। जब पहिले का गन्धक आधा जीर्ण हो जाय तो उसमें फिर पारद के बराबर भाग गन्धक डालें। इस क्रम से थोड़ा- थोड़ा करके छःगुना गन्धक उसमें डालकर जीर्ण कर लें ॥ १०२–१०४ ॥ षड्गुणबलिजारणस्य द्वितीयः प्रकारः कच्छपाख्येन यन्त्रेण रसत्तन्त्ररहस्यवित् । उक्तमार्गानुसारेण जारयेत् षड्गुणं बलिम् ॥ १०५ ॥
६८ रसतरङ्गिणी भा. टो.—रसशास्त्र में निपुण वैद्य कच्छपयन्त्र के द्वारा भी बालुकायन्त्र की विधि से पारद में षड्गुण गन्धक का जारण कर सकता है ॥ १०५ ॥ षड्गुणबलिजीर्णस्य रसराजस्य गुणाः समे तु गन्धके जीर्णे सामान्यगदनाशनः । द्विगुणे तु विशेषेण महारोगविधूननः ॥ १०६ ॥ त्रिगुणे तु विशेषेणाच्चयपुंस्त्वप्रकाशनः । चतुर्गुणे महोत्साहमेधास्मृतिविवर्धनः ॥ १०७ ॥ तथा पञ्चगुणेऽशेषगदसन्तापनाशनः । रसेश्वरः षड्गुणे तु विविधाद्भुतकार्य्यकृत् ॥ १०८ ॥ इति पारदस्याष्टसंस्कारविज्ञानीयो नाम पञ्चमस्तरङ्गः अथ गन्धकजारणगुणाः—महारोगविधूननः महारोगविनाशनः, विविधा- द्भुतकार्य्यकृत् ‘भवतीति’ शेषः । तथोक्तं शिवागमेऽपि—“तुल्ये तु गन्धके जीर्णे शुद्धाच्छतगुणो रसः । द्विगुणे गन्धके जीर्णे सर्वथा सर्वकुष्ठहा ॥ त्रिगुणे गन्धके जीर्णे सर्वजाड्यविनाशनः । चतुर्गुणे तथा जीर्णे वलीपलितनाशनः ॥ गन्धके पञ्चगुणे जीर्णे क्षयक्षयकरो रसः । षड्गुणे गन्धके जीर्णे सर्वरोगहरो रसः । अवश्यमित्युवाचेदं श्रीदेवीं भैरवः स्वयम् ॥” इति । अथ व्याधिघात- कत्वेन परमावश्यका अष्टौ संस्कारा ग्रन्थकृता केवलमुक्ताः, रसतन्त्रप्रसिद्धा अव- शिष्टाश्च दश नोक्ता इति । वयन्तु जिज्ञासूनां मनोविनोदाय परिभाषाबोधाय च लक्षणतः फलतश्चावशिष्टानुदाहरामो मा भूच्छिन्नसम्प्रदायहानिरिति ॥ तत्र अनुवासन-गगनादिग्रासप्रमाण-चारणा-गर्भद्रुति-वाह्यद्रुति-जारणा-रञ्जन- सारणा-क्रामण-वेधनाख्या दशावशिष्टाः । केचित् शरीरयोगनामकम्परं संस्कारमिच्छन्ति, तन्मतेऽनुवासनं दीपनान्न पृथक् । तत्रादावनुवासनक्रमः— “दीपितं रसराजन्तु जम्बीररससंयुक्तम् । दिनैकं धारयेद् घर्मे मृत्पात्रे वा शिलो- द्भवे ॥” इति प्रथमः । तथा- “सहस्रनिम्बूफलतोयपिष्टो रसो भवेद् वह्निसम- प्रभावः । सव्योषराजीलवणः सचित्रः सरामठो विंशतिवासराणि ॥” इति रसचिन्तामणिप्रोक्तो द्वितीयः । अत्रेदमवधेयम्— “स्वेदनादिनवकर्मसंस्कृतः सप्तकञ्चुकविवर्जितो भवेत् । अष्टमांश इह शिष्यते यदा शुद्धसूत इति कथ्यते तदा ॥” इति रसरत्नाकरकारस्य नित्यनाथस्य वचनम् । अयमाशयः— सप्तभागाः सप्तकञ्चुकसम्बन्धिनोऽपयान्ति पारदस्याष्टमो भागोऽवशिष्यते ॥ अथ गगनादिग्रासप्रमाणम्—“यन्मानस्य सूतस्य भोजद्रव्यात्मिका मितिः ।
पञ्चमस्तरङ्गः ६६ इयतीत्युच्यते याऽसौ ग्रासमानं समीरितम् ॥ चतुःषष्ट्यंशकः पूर्वो द्वात्रिंशांशो द्वितीयकः । तृतीयः षोडशांशस्तु चतुर्थोऽष्टांश एव च ॥” एतद्विस्तारो रसार्ण- वादावनुसन्धेयः । एतस्योपयोगो गर्भद्रुतिसंस्कारे वक्ष्यमाणे । चारणा यथा— “रसस्य जठरे ग्रासक्षेपरां चारणा मता ॥” तत्प्रकारो रसपद्धत्यां—“तप्ते तीक्ष्णसमुद्भवे सुविमले खल्वेऽथ सूतं क्षिपेत् पादांशं कनकं विमर्च्य शनकैर्दत्वाऽ म्लजम्बीरकम् । पात्रे जम्बलवारिणा सुविपुले काचोद्भवे पूरिते स्थाप्यं सूर्य- खरातपे पटुतरं वस्त्रं ततो मर्दितम् ॥ तस्मिन्नेव दिने पुनर्ददीत विमलं सा चारणा संस्मृता••••॥” इति । अथ गर्भद्रुतिः—“ग्रस्तस्य द्रवणं गर्भे गर्भद्रुति- रुदाहृता।” इति लक्षिता । “व्योमसत्त्वं समांशेन ताप्यसत्त्वेन संयुतम् । साकल्येन चरेद्देवि गर्भद्रावी भवेद्रसः ॥” गर्भद्रुतिमन्तरेण च व्योमसत्त्वादिजारणा- भावात् आवश्यकतैतस्याः । तथा च—“वह्निव्यतिरेकेणापि रसग्रासीकृतानां लोहादीनां द्रवत्वं गर्भद्रुतिः” इति रसमाधवो व्याजहार । “शिलया निहतं नागम् ताप्यं वा सिन्धुना हतम् । ताभ्यान्तु मारितं बीजं सूतके द्रवति क्षणात् ॥” इति च “बीजानां संस्कारः कर्तव्यः कोऽपि तादृशः प्रथमम् । येन द्रवन्ति गर्भे राज- राजस्याम्लयोगेन ॥” इति च श्री गोविन्दभगवत्पादाचार्याः । अयञ्च गर्भ- द्रावको योगोऽनुसन्धेयः—“सैन्धवेन समं ताप्यं घर्मे मर्च्यं पुटे पचेत् । पुनर्मर्च्यं पुनः पाच्यं यावद् द्वादशवारकम् ॥ अस्य तुल्यं मृतं नागं सर्वमम्लेन पेषयेत् । अनेन वर्णपत्राणि लिप्तानि प्रधमेद् दृढम् ॥ द्रुतञ्च वापितं त्तत् सप्तवारं पुनः पुनः । एतद्बीजं रसेन्द्रस्य गर्भे द्रवति मर्दनात् ॥” तथा “शिला सौवर्चलं ताप्यं गन्धकासीसटङ्कणम् । मर्दयेच्चणकाम्लेन सर्वमेतद्दिनावधि ॥ रसस्यैतत् षोडशांशं दत्त्वा बीजं च दापयेत् । दीयते यत्र यत्रैवं तत्र द्रवति मर्दनात् ॥” इति । अथ बाह्या द्रुतिः—“बहिरेव द्रुतं कुर्यादभ्रसत्त्वादिकं खलु । जारणाय रसेन्द्रस्य सा बाह्या द्रुतिरुच्यते ॥” इत्युक्तरूपा, तद्दिङ्मात्रं यथा--“कपिति- न्दुवालफलैः समं धान्याभ्रकं दृढम् । मर्दयेद्दिनमेकन्तु काचकुप्यां निवेशयेत् ॥ नरकेशैर्मुखं रुध्वा कूपिकां लेपयेन्मृदा । पुटेत् पातालयन्त्रेण दिनान्ते द्रुतिमा- प्नुयात् ॥” इति । तथा “कुसुम्भतैलमध्ये तु संस्थाप्या द्रुतयः पृथक् । तिष्ठन्ति चिरकालन्तु प्राप्ते काले नियोजयेत् ॥” इति । एतत्फलन्तु—“बाह्यद्रुतिस्तु केवलं शुद्धमेव रसं मिलिता बध्नाति । फलमस्या दीर्घायुष्ट्वम् । पूर्वोक्तग्रासक्रम- जारणेन पूर्वोक्तफलप्रदत्वं वा ।” इत्यादिनोक्तं रसमाधवेन । केचित्तु लुप्तसम्प्र- दायत्वात्—“द्रुतयोऽपि न दृष्टास्ते शास्त्रे दृष्टा अपि ध्रुवम् । विना शम्भोः
१०० रसतरङ्गिणी प्रसादेन न सिद्ध्यन्ति कदाचन ॥” इत्याहुः । अत्र विशेषश्चिन्तनीय एवेति । जारणलक्षणा मुक्तम्प्राक् । तत्प्रकारस्त्वेवंविधः स्मृत आचार्यै रसरत्नाकरे--“स्वर्णं नागं समावर्त्य माषमात्रन्तु घर्षयेत् । तप्तखल्वे ततस्तस्मिन् पलमेकं रसं क्षिपेत् ॥ सिद्धमूलीद्रवं दत्वा मर्दयेत् काञ्जिकैर्दिनम् । घर्मे वा तप्तखल्वे वा ततो ग्रासन्तु दापयेत् ॥ चतुःषष्ट्यंशकं पूर्वं द्वन्द्वसत्त्वं सुभावितम् । दत्वा धर्मे दिनैकञ्च चारणायन्त्रके क्षिपेत् ॥ सजम्बीरे दिनं घर्मे धारितश्चरति ध्रुवम् । त्रिछारं पञ्च- लवणमम्लवर्गः स्नुहीपयः ॥ गोमूत्रैर्गोलयेत्सर्वं तेन वस्त्रं घनं दिहेत् । तन्मध्ये धारितं सूतं बद्ध्वा भूर्जेन वेष्टयेत् ॥ सिद्धमूल्यम्लसंयुक्ते दोलायन्त्रे त्र्यहं पचेत् । उद्धृत्योष्णारेनालेन क्षालयेल्लोहपात्रके ॥ वस्त्रपूतं ततः कृत्वा सोष्णे पात्रे विमर्दयेत् । हस्तेनैव भवेच्छुष्कं यावत्तं पारदं पुनः ॥ चतुर्गुणेन वस्त्रेण गाल- येन्निर्मलो भवेत् । अजीर्णांशे त्पुनर्मर्द्यमम्लं दत्वा दिनावधि ॥ दोलायां स्वेद- येत्तावद्द्रवेज्जीर्णान्न संशयः ॥” इति । अत्र च चरति ध्रुवमित्यन्तं चारणाप्रकारः, त्रिछारं पञ्चलवणमित्यारभ्य च जारणाप्रकारोऽनुसन्धेयः । अयञ्च बीजजारणा- प्रकारो मूलेऽनुक्तः कथितः । गन्धकजारणप्रकारस्तु मूल एवोक्त इति नेहोक्तो माभूत्कालस्य व्यत्यय इति । इयञ्च समुखा जारणा, बीजावापयोगात् । निर्मुखा जारणा तु दिव्यौषधिसमायोगात्प्राचीनपरम्पराप्रसिद्धा इदानीं लुप्तप्राया चेति॑ । अथ रञ्जनम्-“सुसिद्धबीजधात्वादिजारणेन रसस्य हि । पीतादिरागजननं रञ्जनं परिकीर्तितम् ॥” “केवलं निर्मलं ताम्रं वापितं दरदेन तु । कुरुते त्रिगुणं जीर्णे लाक्षारसन्निभं रसम् ॥” इत्यादिनाऽनुसन्धेयम् । विस्तरस्तु--“खर्परस्थे द्रुते नागे ब्रह्मबीजदलानि तु । क्षिप्त्वाग्निं ज्वालयेच्चण्डं ब्रह्मदण्डेन चालयेत् ॥ चतुर्थ्यामात्तु तद्भस्म जातं पात्रात्समुद्धरेत् । तद्भस्म गन्धकं तुल्यं याममम्लेन मर्दयेत् ॥ रुद्ध्वा गजपुटे पश्चात् पादांशं गन्धकं पुनः । दत्वाम्लैर्मर्दितं पश्चादेवं वारांश्चतुर्दश ॥ रक्तवर्णो भवेद्भस्म तद्भागं खर्परं क्षिपेत् । भागत्रयं शिलाचूर्णं पृथक्पात्रे विनिक्षिपेत् ॥ पञ्चाङ्गवासकाच्चूर्णं त्वक्चूर्णाञ्चार्जुनस्य च । शाककिंशुककोरटशिग्रूणां पुष्पमाहरेत् ॥ नागिनी नागकन्या च कुमारी चाहिमारकः । सर्वेषां प्रतिभागेकं शिलामध्ये विनिक्षिपेत् ॥ तेभ्यश्चतुर्गुणैर्मूत्रै- श्छागगैः क्वाथमाहरेत् । पूर्वोक्तं भस्म नागस्य खर्परस्य च संक्षिपेत् ॥ चालयन् पाचयेच्चुल्ल्यां यावत्सप्तदिनावधि । अनेन मृतनागेन वापो देयो द्रुतस्य च ॥ पञ्चबीजस्य भागांस्त्रीन् रञ्जितं जायते शुभम् ॥” इत्यादिना रसरत्नाकरादौ कण्ठोक्त्यावलोकनीयः । सारणा--“सूते सतैल-यन्त्रस्थे