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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

चतुर्दशस्तरङ्गः ३५७ रुद्रभागमितञ्चात्र गन्धकद्रावकं शुभम् । शनैः शनैस्तु निक्षिप्य चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ १६८ ॥ ततोऽस्यां काचनलिकामुखमेकं निवेशयेत् । अपरञ्च मुखं तस्यास्तोयपूर्णोदराऽर्द्धके ॥ १६६ ॥ नीरपूरितपात्रस्थे काचकुम्भेऽपरे न्यसेत् । अतिमन्दानलेनाथ पचेत्खलु विधानवित् ॥ १७० ॥ तिर्यङ्निपातितं चाथ बाष्परूपेण सञ्चितम् । तोयाभं लवणद्रावं रसवैद्यः समाहरेत् ॥ १७१ ॥ अथ लवणद्रावको नवीनैः परिभाषितः—भृष्टचूर्णितसैन्धवस्य ६ भागाः, गन्धकद्रावकस्य ११ भागाः ॥ १६६–१७१ ॥ भा.टी.-एक स्वच्छ पात्र में सैन्धानमक के सूक्ष्मचूर्ण को अच्छी तरह भूनें, जब भुनने पर उसका जलीयांश सूख जाय तो पात्र को चूल्हे से नीचे उतार लें। अब इस भुने हुए सैन्धानमक चूर्ण में से छः भाग चूर्ण लेकर कांच की शीशी में डालें और इसी में धीरे-धीरे ग्यारह भाग गन्धकद्राव भी डालकर मिला दें । अब इस सैन्धानमकवाली शीशी को सुराप्रदीप अथवा चूल्हे के ऊपर रखकर इस शीशी के मुख पर एक तिरछी कांच की नली जोड़ दें और नली का दूसरा मुख एक दूसरी अर्धनलपूरित और शीतल जलयुक्त पात्र के बीच में रखी हुई शीशी के मुख से जोड़ दें । यह शीशी सैन्धानमक वाली शीशी से बड़ी होनी चाहिये । अब सैन्धवचूर्णवाली हांडी के नीचे मन्द-मन्द अग्निताप देकर पकायें । इस प्रकार लवणद्राव वाष्प रूप से तिरछा उड़कर जलवाली शीशी में जल में मिला हुआ प्राप्त होगा। जल के अभाव में इसका प्रयोग होता है ॥ १६६-१७१ ॥ वक्तव्य—लवणद्राव (Hydrochloric acid) सांद्र (Strong) और तरल (Light) भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से आगे कहे जाने- वाले सजललवणद्रावक को तरल या हल्का लवणद्राव कहा जाता है । किन्तु यदि एक भाग जल में ४५० भाग लवणद्राव के वाष्प संचित किये गये हों तो उसे सान्द्र लवणद्रावक कहते हैं । सजललवणद्रावकस्य निर्माणप्रकारः अनलनयनवर्त्म-प्राप्तसङ्ख्याप्रमाणं सलिलममलमादौ काचपात्रे निदध्यात् ।

३५८ रसतरङ्गिणी तदनु खलु विहाय यामिनीरत्नतुल्यं विमललवणाम्लं निक्षिपेद्वैद्यवर्यः ॥ १७२ ॥ अयमेव समाख्यातस्त्वायुर्वेदविशारदैः । सजलो लवणद्रावो विविधातङ्कनाशनः ॥ १७३ ॥ लवणद्रावकस्य चातितीक्ष्णत्वात् सजलद्रावनिर्माणं भक्षणयोग्यतासम्पा- दनाय । परिस्रुतं सलिलं २३ भागिकम्, लवणद्रावकं १० भागिकम् । अयं हि सजललवणद्रावः । स्पष्टमन्यत् ॥ १७२, १७३ ॥ भा.टी.—एक चौड़े मुख के कांच के पात्र में पहिले शुद्ध परिस्रुत जल तेईस भाग डाल लें, अब इस पात्र के जल में धीरे-धीरे दस भाग स्वच्छ लवण द्राव मिलायें तो इसे आयुर्वेदविशारद वैद्य लोग सजललवणद्राव कहते हैं। यह अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करता है ॥ १७२, १७३ ॥ सजललवणद्रावकस्य गुणाः लवणद्रावकस्तीक्ष्णो जाठराग्निप्रदीपनः । मूत्रदोषहरो बल्यो यकृद्दोषनिकृन्तनः ॥ १७४ ॥ भा.टी.—सजललवणद्रावक बहुत तेज होता है। इसके प्रयोग से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। मूत्र में पाई जानेवाली अनेक प्रकार की विकृतियों को दूर करता है। इसको समुचित रूप में अन्तःप्रयोग करने से शरीर में बल बढ़ने लगता है, क्योंकि यह यकृत् के सब दोषों को नष्ट करके उसको सबल बनाता है॥१७४॥ वक्तव्य—आमाशय में स्वभावतः ही लवणाम्ल होता है। जब यह आमा- शय का लवणाम्ल किसी तीव्र रोगजन्य निर्बलता के कारण न्यून हो जाता है जिससे भोजन भली प्रकार नहीं पचता और खाये हुए भोजन के उद्गार आते हैं तो ऐसी अवस्था में अन्य पाचक और दीपक औषधियों के साथ भोजन करने के बाद थोड़ा सा लवणाम्ल पिलाया जाता है। अन्य अम्लों के समान ही लव- णाम्ल भी यकृत् को उत्तेजित करता है और पित्त को निकालने में सहायक होता है। सजललवणद्रावकस्य मात्रा आरभ्य पञ्चबिन्दुभ्यो कलाबिन्दुमितं परम् । युञ्जीत लवणद्रावं प्रचुरेणाम्भसा भिषक् ॥ १७५ ॥ मात्रा—पञ्चबिन्दुभ्यः षोडशबिन्दुपर्यन्तम् ॥ १७५ ॥ भा.टी.—सजल लवणद्राव की पांच बूँद से लेकर सोलह बूँद तक की मात्रा को पर्याप्त जल में मिलाकर भोजन के अनन्तर सेवन करना चाहिये ॥१७५॥

चतुर्दशस्तरङ्गः ३५६ अस्य आमयिकः प्रयोगः अन्नस्यामाशयस्थस्य विपाके तु द्वितीयेके। लवणाम्लविहीनत्वादू यदजीर्णं प्रजायते ॥ १७६ ॥ तस्मिन्नजीर्णे मतिमान् रोगिणं कृतभोजनम् । दशबिन्दुमितं युक्त्या पटुद्रावन्तु पाययेत् ॥ १७७ ॥ पानमात्रेण गात्राणां गौरवञ्चाप्यजीर्णकम् । नाशयित्वा बुभुक्षान्तु जनयत्याशु निर्भरम् ॥ १७८ ॥ लवणद्रावकाधिक्यादामाशयसमुद्भवे । अजीर्णे लवणद्रावं भोजनादौ प्रयोजयेत् ॥ १७९ ॥ सक्षारे खलु प्रस्रावे क्षारमेहे च युक्तितः । शीलितो लवणद्रावो निर्दिष्टातङ्कनाशनः ॥ १८० ॥ शीलितस्तु पटुद्रावः शुष्कजिह्वं हतस्वरम् । मृदुप्रलापसहितं हृद्दौर्बल्यसमायुतम् ॥ १८१ ॥ अस्पष्टनाडिकं चैव कदाचिद् द्रुतनाडिकम् । मूत्रणे प्रस्रवद्गूथं नाशयत्यान्त्रिकज्वरम् ॥ १८२ ॥ सततं लवणद्रावो मात्रया परिशीलितः । अफूफसेवनोद्भूतं दौर्बल्यं हन्ति निश्चितम् ॥ १८३ ॥ सजलस्तु पटुद्रावः शीलितः प्रचुराम्भसा । अरुचिं वह्निमान्द्यं च नाशयत्यविकल्पतः ॥ १८४ ॥ आमाशयस्य लवणाम्लहीनत्वाजातमजीर्णञ्चेत् भोजनोत्तरमस्य प्रयोगः, लवणाम्लस्य आधिक्ये तु भोजनात् प्रागेवेति विशेषः। आन्त्रिकज्वरस्य च तासु तासु निर्दिष्टावस्थासु विशेषफलकरः। अहिफेनसेवनजातदौर्बल्यमवश्यमपनयति, प्रचुराम्भसा शीलनं तीक्ष्णतापरिहाराय । एवं च अविकल्पतः निःसन्देहं अरुचिं मन्दाग्निश्च नाशयतीति ॥ १७६–१८४ ॥ इति क्षारविशेषादिविज्ञानीयो नाम चतुर्दशस्तरङ्गः भा.टी.-खाये हुए भोजन के आमाशय में पहुँचने पर उसका द्वितीय विपाक अर्थात् आमाशयिक रस द्वारा पाक होने लगता है। यदि ऐसी अवस्था में आमाशय में लवणाम्ल की कमी के कारण अजीर्ण, आमाशयगुरुता, स्तब्धता, उद्गार आदि हो जाय तो इस प्रकार के अजीर्ण में रोगी को भोजन खिलाकर दस बूँद सजललवणद्राव का पर्याप्त जल में मिलाकर पिला दें। इसके पीने

३६० रसतरङ्गिणी से तत्काल शरीर गौरव तथा अजीर्ण नष्ट होकर पुनः तीव्र क्षुधा मालूम होने लगती है । और यदि आमाशय में लवणाम्ल की अधिकता होने के कारण रोगी को अजीर्ण हो तो उसे भोजन के पूर्व लवणाम्ल को जल में मिलाकर सेवन कराना चाहिये । क्षार प्रमेह में जब मूत्र में क्षारीय तत्त्व अधिक मात्रा में निकलते हों तो लवणद्राव के प्रयोग से इनका निकलना बन्द हो जाता है । आन्त्रिकज्वर ( Typhoid Fever ) में जब रोगी की जिह्वा सूख जाय, स्वर मन्द हो जाय, साधारण प्रलाप और हृदय में दुर्बलता के साथ उसकी नाड़ी की गति कभी स्पष्ट और तीव्र हो और मूत्र में मल आता हो तो इसके प्रयोग से आराम आता है । अफीम सेवन करने से होनेवाली हृदय की दुर्बलता में कुछ दिन तक निरन्तर लवणद्राव का सेवन करने से उक्त हृदयदौर्बल्य मिट जाता है । सजललवणाम्ल को पर्याप्त जल में मिलाकर सेवन करने से अरुचि और अग्निमान्द्य में अवश्य आराम मिलता ॥ १७६-१८४ ॥ यह क्षारविशेषादिविज्ञानीय नाम चतुर्दशतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ सुवर्णविज्ञानीयः पञ्चदशतरङ्गः धातुपदस्य निर्वचनम् खालित्यमथ पालित्यं कार्श्यं वार्द्धक्यमेव च । अपनीय दधत्येते देहं तद्धातवः स्मृताः ॥ १ ॥ धातुपदसामान्यनिर्वचनं स्वर्णादीनामौषधप्रयोगयोग्यतासूचनाय । देहधार- कत्वमेव हि धातूनां धातुत्वम् इति ॥ १ ॥ भा.टी.—स्वर्ण, रजत आदि द्रव्यों को धातु शब्द से व्यवहार में लाने का कारण यह है कि इनके प्रयोग से अकाल में होनेवाले खालित्य ( बालों का उड़ना ) पालित्य ( अकाल में ही बालों का सफेद होना ), कृशता (शरीर का सूखना ) तथा बुढ़ापा आदि लक्षण अथवा रोग दूर होकर शरीर दृढ़ और कार्यक्षम (धारण-समर्थ) होता है । अतः इनको धातुशब्द से कहा जाता है॥१॥ वक्तव्य—उक्त धातुनिर्वचन के अतिरिक्त धातुपरीक्षण में तीन मुख्य विशेष- तायें देखी जाती हैं जिससे धातु और अधातु के बीच भेद किया जाता है । १—कोई भी खनिजद्रव्य ( धातु ) आभा और प्रभाववाला होता है । २—धातु न्यूनाधिक रूप में विद्युत् धारा को वहन करनेवाले होते हैं । ३—बिना

पञ्चदशस्तरङ्गः ३६१

रासायनिक विधि से धातु, मद्यसार, तैल, ग्लिसरीन आदि में नहीं घुलते हैं। इससे यह भी धातु शब्द से ज्ञात हो सकता है जो द्रव्य हमारे शरीर में आभा- प्रभा के उत्पादक हों और जिससे हमारे शरीर में विद्युत् धारा वातिक गति हो और जिससे शरीर में रासायनिक परिवर्तन के साथ शरीर की वृद्धि हो वे सब धातु शब्द से कहे जा सकते हैं। इसी परीक्षा से आज तक ६८ धातुओं का वैज्ञानिकों ने पता लगाया है। धातूनां नामपरिगणनम् स्वर्णं तारं तथा ताम्र वाङ्गं सीसकमेव च। यशदं च तथा लोहं सप्तैते धातवः स्मृताः ॥२॥ सुवर्णचन्द्रलोहार्के वङ्गाहियशदायसम् । लोहसप्तकमाख्यातं सप्तलोहञ्च तन्मतम् ॥३॥ धातूनां नामपरिगणनं खनिषूपलभ्यमानानाम्। मिश्रकधातुवर्णनं पृथक् करिष्यते। तारं रजतम्, सुवर्णचन्द्रलोहेत्यादिना प्रकारान्तरेण सप्तलोहनिर्देशः धातुलोहशब्दयोः परस्परं पर्यायनिर्णायकः। प्राचीनतन्त्रेषु लोहशब्देनापि सप्तानां परिगणनात्। तत्र चन्द्रलोहं रजतम्। अर्कस्ताम्रम्। अहिः सीसकम्। स्पष्टमन्यत् ॥ २-३ ॥ भा.टी.—सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, सीसा, जस्ता तथा लोहा, ये सात धातु कहे जाते हैं। इन्हीं को लोहसप्तक अथवा सप्तलोह भी कहा जाता है ॥२-३॥ वक्तव्य—धातुपरिगणन में दो वार एक ही चीज को कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि धातु और लोह ये दोनों परस्पर पर्यायवाचक हैं। अर्थात् लोह (Iron) को भी कहते हैं और सब स्वर्ण रजत आदि को भी लोह कहा जाता है। क्योंकि प्राचीन ग्रन्थों में कर्षार्थवाची "लृह" धातु से लोह शब्द बनाया गया है। क्योंकि सम्पूर्ण धातुएँ पृथिवी के अन्तराल से कर्षण (निका- लना या खींचना) की जाती हैं। इससे एक दूसरा भाव भी ज्ञात होता है कि पृथ्वि से स्वतन्त्र रूप में प्राप्त होनेवाले लोह को ही धातु शब्द से कहा जाता है; न कि पीतल तथा कांसा मिश्रित धातुओं को। इसीलिए 'रसरत्न-समुच्चय' में धातुओं को तीन भागों में विभक्त किया है। स्वर्ण, चांदी, ताँबा, कान्त तथा फौलाद को शुद्धलोह और सीस तथा रांगा को पूतिलोह और पीतल, कांसा को मिश्रलोह शब्द से लिखा है। धातुओं की संख्या में मतभेद देखा जाता है। शार्ङ्गधर स्वर्ण, रजत, पीतल, तांबा, सीसा, रांगा तथा फौलाद को सात धातु

३६२ रसतरङ्गिणी मानता है । किसी ने पीतल न मानकर कान्त लोह, तीक्ष्णलोह और मुण्डलोह मिलाकर अष्ट धातु माने हैं । रसकामधेनु में स्वर्ण, रजत, ताम्र, तीक्ष्ण वंग तथा नाग (सीसा), ये छह ही धातु लिखे हैं । इन्हीं सब बातों को दृष्टि में रखते हुए धातु को लोह शब्द से कहकर सरलता कर दी गयी है । धातूनां सामान्यः प्रथमः शोधनप्रकारः सूचिवेध्यानि पत्राणि धातूनान्तु समाहरेत् । यावद्वह्निप्रभाणि स्युस्तावद्वह्नौ प्रतापयेत् ॥४॥ स्नपयेत्तप्ततप्तानि काञ्जिके तु त्रिधा त्रिधा । तक्रे कुलत्थकथिते गोमूत्रतिलतैलयोः ॥५॥ एवं विशुद्धिमायान्ति स्वर्णाद्याः सप्तधातवः । समासतः समाख्यातमिदं सामान्यशोधनम् ॥६॥ सामान्य शोधनप्रकारः काञ्जिकतक्रादिना । तत्र नागवङ्गयशदानां गालि- तानां निषेको हण्डिकान्तरे इति वक्ष्यते, इतरेषां पञ्चात्मनैव, विशेषशोधनन्तु तत्र तत्र वक्ष्यत एव । एतच्छोधनञ्च कृत्रिमखनिजदोषयोः शान्त्यर्थम् । अथवा कदली- मूलजले सप्तधा निषेकादपि शुद्धिः । उक्तञ्चान्यत्रापि "सर्वलोहानि तप्तानि कदली- मूलवारिणा । सप्तवारं निषिक्तानि शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् ।" इति ॥४-६॥ भा.टी.—शोधन करने योग्य धातुओं के पतले-पतले सूचिवेध्य पत्र बना कर कोयलों की अग्निमें लालवर्ण होने तक तपायें, अग्नितप से लाल होने पर उन्हें अग्नि में से निकालकर उसी क्षण काञ्जी में बुझा दें, फिर अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझा दें । इस प्रकार अग्नि में तपाकर तीन बार मठे में तीन बार कुलथक्वाथ में तीन बार तिलतैल में बुझायें । इस प्रकार उक्त द्रवों में तीन, २ बार बुझाने से स्वर्ण आदि सातो धातुओं की शुद्धि हो जाती है । संक्षेपतः यह धातुओं की समान्य शोधनविधि है ॥ ४-६ ॥ वक्तव्य—यद्यपि यहाँ पर सब धातुओं के पत्र बना अग्नि में तपाकर लाल करके उक्त द्रवों में बुझाने को लिखा है, परन्तु तीव्रद्रावि वंग, यशद तथा सीसा इन धातुओं को पिघलाकर द्रवों में बुझाना चाहिए । केवल पत्रों को अग्नि पर रख तपाने से नागादि अग्नि में ही नीचे पिघलकर गिर जायेंगे । उक्त प्रकार से धातुओं का शोधन करने से उनमें पाया जाने वाला मिश्रण तथा खनिजदोष दूर हो जाता है । अतएव अशुद्ध मिश्रितदोषयुक्त धातु बहुत सावधानी के साथ शोधन करने पर भी बहुत घट जाता है ।

पञ्चदशस्तरङ्गः ३६३ द्वितीयः शोधनप्रकारः प्रतप्तानि तु लोहानि रम्भामूलजले भिषक् । निषेचयेत्सप्तवारं विशुद्ध्यन्ति न संशयः ॥ ७ ॥ आ. टी.—सब धातुओं के पत्रों को अग्नि में तपाकर अथवा पात्र में पिघला कर केवल कदलीकन्दस्वरस में सात बार बुझाने से भी उनकी शुद्धि हो जाती है ॥७॥ धातूनां सामान्यो मारणप्रकारः मनःशिलागन्धकसूर्यदुग्धैः संमर्द्य खल्वे खलु सप्तलोहम् । वन्योत्पलाग्नौ पुटितं प्रयत्नादनुत्तमां याति मृतिं ह्यवश्यम् ॥ ८ ॥ प्रसङ्गात् सप्तानामपि मारणप्रकारः—सूर्यदुग्धं अर्कक्षीरम् । उक्तञ्चान्यत्र— “शिलागन्धार्कदुग्धाक्ताः स्वर्णाद्याः सप्तधातवः । म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा” इति ॥ ८ ॥ भा. टी.—सात धातुओं में से किसी एक धातु (शुद्ध धातु) को मैनसिल गन्धक में मिलाकर आक के दूध में घोटकर सुखा लें। अन्त में इसको एक सम्पुट में बन्द करके यथायोग्य फूँक लें। इस प्रकार उक्त द्रव्यों के साथ धातु घोटकर तब तक पुट दें जब तक कि उस धातु की ठीक भस्म न हो जाय। इस विधि से प्रायः सभी धातुओं की भस्म हो जाती है ॥ ८ ॥ अथ स्वर्णस्य नामानि स्वर्णं सुवर्णं द्रविणं हिरण्यं कल्याणकं काञ्चनमग्निवर्णम् । मनोहरं हेम च भूषणार्हं तथाग्निबीजं कनकञ्च कौन्तम् ॥ ९ ॥ भृङ्गारमाङ्गल्यकजाम्बवानि जाम्बूनदं भर्म च जातरूपम् । चाम्पेयकं लोहवरञ्च रुक्मं चामीकरं हाटकसंज्ञमुक्तम् ॥ १० ॥ अथ विशेषतो वर्णनक्रमे प्रथमं सुवर्णनामानि—तन्त्रे व्यवहाराय ॥९,१०॥ भा.टी.—स्वर्ण, सुवर्ण, द्रविण, हिरण्य, कल्याणक, काञ्चन, अग्निवर्ण, मनोहर, हेम, भूषणार्ह, अग्निबीज, कनक, कौन्त, भृंगार, मांगल्यक, जाम्बव, जाम्बूनद, भर्म, जातरूप, चाम्पेयक, लोहवर, रुक्म, चामीकर तथा हाटक; ये सब नाम स्वर्ण (सोना) के कहे जाते हैं ॥६–१०॥ ग्राह्यसुवर्णस्य लक्षणम् बालारुणारुणमलं ज्वलनप्रतप्तं शाणोपले घुमृणचूर्णसमानवर्णम् ।

३६४ रसतरङ्गिणी नाराचिकाधृतमलं गुरुतामुपेयात् स्निग्धं तदेव कनकं कथितं तु जात्यम् ॥ ११ ॥ बालारुणं उदीयमानारुणसमशोभम्, शाणोपले इति निकषग्रावणि, घुसृणं कुंकुमम् । नाराचिका-तुला। जात्यं उत्कृष्टम् । उक्तञ्च—"दाहेऽति- रक्तमथ यत् ससितं च छेदे काश्मीरकान्ति च विभाति निकाषपट्टे । स्निग्धञ्च गौरवमुपैति च यत्तुलायां ग्राह्यं तदेव कनकं मृदु रक्तपीतम् ॥” इति । अपरमपि लक्षणं वैशद्यार्थम् , तथा चाह शुल्वेन्दुवर्जितमिति ताम्ररजतसंयोगरहितम् , जात्या स्वभावतः । उक्तञ्च—“दाहे रक्तं सितं छेदे निकषे कुङ्कुमप्रभम् । तार- शुल्वोज्झितं स्निग्धं कोमलं गुरु हेम सत् ॥” इति ॥११॥ भा.टी.—मिलावट रहित उत्तम स्वर्ण अग्नि में तपाने पर प्रातःकालीन सूर्य के समान लाल-पीले वर्ण का निकलता है । यदि उसे कसौटी पर घिसा जाय तो वह केसर वर्ण की रेखा खींचता है। तौल में अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक भारी होता है और बाहर देखने या स्पर्श करने में चिकना सा होता है । इस प्रकार सब परीक्षाओं में ठीक उतरनेवाले सोने को जात्य ( उत्तम ) स्वर्ण कहा जाता है ॥ ११ ॥ अपरं लक्षणम् कोमलं रक्तपीताभं स्निग्धं शुल्वेन्दुवर्जितम् । गुरु चाखिलधातुभ्यो जात्या तत्स्वर्णमुत्तमम् ॥ १२ ॥ जात्य ( उत्तम ) स्वर्ण, कोमल, रक्तपीताभवर्ण, स्निग्ध, चाँदी और ताँबे की मिश्रण से रहित, अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक भारी होता है ॥ १२ ॥ अग्राह्यसुवर्णस्य स्वरूपम् कठिनं लघु रूक्षञ्च कषे च्छेदेऽनले सितम् । तारताम्रसमायुक्तं स्वर्णं हेयं स्मृतं बुधैः ॥ १३ ॥ त्याज्यस्वर्णरूपम्—कषे छेदे अनले त्रिधापि श्वेतप्रभम् । उक्तञ्च— “यच्छ्वेतं कठिनं रूक्ष विवर्णं समलं दलम् । दाहे छेदे सितं, श्वेतं कषे त्याज्यं लघु स्फुटम् ॥” इति ॥ १३ ॥ भा.टी.—मोड़ने पर या हथौड़े की चोट मारने में कठोर, तौल में हल्का, रूक्षवर्ण, कसौटी पर रगड़ने तथा अग्नि में तपाने तथा काटने पर श्वेतवर्ण दिखानेवाला स्वर्ण अग्राह्य होता है । ऐसे स्वर्ण में रजत ( चाँदी ) तथा ताँबे का मिश्रण पाया जाता है ॥ १३ ॥

पञ्चदशस्तरङ्गः ३६५ सुवर्णशोधनस्य प्रयोजनम् यस्मादशोधितं स्वर्णं हन्ति बुद्धिवलादिकम् । करोति च वहून् रोगान् तस्मात्स्वर्णं विशोधयेत् ॥ १४ ॥ अशुद्धं सुवर्णं यस्मात् भक्षितं बुद्धिवलादिकं हन्ति तस्मात् शोधयेदिति । आहुश्च प्राञ्चः—"बलञ्च वीर्यं हरते नराणां रोगव्रजं पोषयतीह काये । असौख्य- कार्येव सदा सुवर्णमशुद्धमेतन्मरणञ्च कुर्यात् ॥” इति ॥ १४ ॥ भा.टी.—क्योंकि अशुद्ध स्वर्ण के अन्तःप्रयोग करने से बुद्धि, शारीरिक तथा मानसिक बल का ह्रास होता है और शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होने का भय रहता है, अतः इसके खनिज तथा यौगिक दोषों को दूर करने के लिए इसका शोधन करना चाहिए ॥ १४ ॥ सुवर्णस्य प्रथमः शोधनप्रकारः विततानि विशालानि कर्षैकप्रमितानि तु । सूचिभेद्यानि पत्राणि सुवर्णस्य समाहरेत् ॥ १५ ॥ ततः खल्वम्लपिष्टेन मृत्तिकापञ्चकेन वै । तानि पत्राणि संलिप्य कपोताख्यपुटे पुटेत् ॥ १६ ॥ स्वर्णंसप्तपुटैरेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । श्यामिका हीयते चापि तारताम्रादियोगजा ॥ १७ ॥ तत्र प्रथमः शोधनप्रकारः—मृत्तिकापञ्चकम् “वल्मीकमृत्तिका धूमं गैरि- काञ्चेष्टिका पटुः । इत्येता मृत्तिकाः पञ्च” इत्युक्तम् । आहुश्चप्राञ्चः—"मृत्तिकाः पञ्चलुङ्गाम्लैः पञ्चवासरभाविताः । सभस्मलावणाद्वेमं शोधयेद् पुटपाकतः ॥” इति । एवं शोधनफलं श्यामिका हीयते इत्यादि ॥ १५–१७ ॥ भा.टी.—स्वर्ण के बड़े-बड़े चौड़े एक-एक तोले के सूचीवेध्य पत्र बना लें। अब इन पत्रों पर बिजौरानींबू के रस में अच्छी तरह घोटी हुई पञ्चमृत्तिका (बांबी की मिट्टी, घर का धुँआ, गेरु, ईंट का चूर्ण और सैन्धानमक) का लेप करके सुखा लें। सूखने के बाद एक सम्पुट में बन्द करके कपोतपुट की अग्नि में फूक दें। इस प्रकार सात पुट देने से स्वर्णपत्र शुद्ध हो जाते हैं और उनकी चाँदी ताँबा आदि मिश्रणजन्य कालिमा भी नष्ट हो जाती है ॥ १५–१७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कर्षोन्मितानीह दलानि हेम्नः खल्वम्लपिष्टेन ससैन्धवेन । वन्योपलोत्थेन तु भस्मना वै प्रलेपयेल्लेपविधानदक्षः ॥ १८ ॥

६३६ रसतरङ्गिणी लेपं प्रशुष्कं प्रसमीक्ष्य वैद्यः शरावसंस्थानि तु कोकिलाग्नौ । पुटेत्पुटे कुक्कुटसंज्ञके तु स्वर्णं भवेच्छोडशवर्णतुल्यम् ॥१९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—कोकिला अङ्गाराः षोडशवर्णं उज्ज्वलरक्तसर्वां- शशुद्धम् ॥ १८, १६ ॥ भा.टी.—एक तोले परिमाण के स्वर्ण के पत्रों पर सैन्धानमक, जंगली उपलों की राख बिजौरानीबू के रस में घोटकर इसका लेप कर दें । जब इन पर का लेप सूख जाय तो इन्हें एक शराव में रखकर कुक्कुटपुट की कोयलों की अग्नि में पुट देवें तो स्वर्ण सर्वांश शुद्ध उज्ज्वल रक्तवर्ण हो जाता है ॥१८-१६॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सूचीवेध्यानि पत्राणि सुवर्णस्य समाहरेत् । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्मांस्तु कारयेत् ॥ २० ॥ मृल्लिप्ते काचपात्रे च न्यसेत्स्वर्णकणांस्ततः । त्रिपादिकायां विन्यस्य सुरादीपाग्निना पचेत् ॥ २१ ॥ लवणद्रावकं तत्र निक्षिपेत्तु शनैः शनैः । सोरकद्रावकञ्चाथ पूर्वद्रावस्य पादिकम् ॥ २२ ॥ विधिज्ञो निक्षिपेद्यावद् द्रवतां याति काञ्चनम् । किञ्चित्कालं पचेच्चाथ द्रवाधिक्यनिवृत्तये ॥ २३ ॥ सलिलञ्चाथ निक्षिप्य पचेदथ विधानवित् । सजलं चणकाम्लञ्च तावत्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ २४ ॥ यावत्खलु सुवर्णस्य चणकाम्लस्य योगतः । अतिसूक्ष्मकणं चूर्णं पात्राधः पतितं भवेत् ॥ २५ ॥ विनश्यत्यम्लता यावत् तावत्प्रक्षालयेज्जलैः । संशोष्य चाथ मतिमान् विशुद्धं स्वर्णमाहरेत् ॥ २६ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारो नवीनैः परिभाषितः—काचपात्रस्य मृदा लेपः वह्नितापसहत्वसम्पादनाय । सुरादीपपरिचयः पूर्वमुक्तः, सुरादीपप्रयोगश्च स्थिर- तासम्पादनाय । शनैः शनैः लवणद्रावकप्रक्षेपः सुवर्णगालनयोग्यताज्ञानाय । चणकाम्लकं चणकद्रुमनिपतितावश्यायपाकजातम् “Oxalic Acid” इत्याङ्ग्ल- भाषायाम् । स्पष्टमन्यत् ॥ २०-२६ ॥ भा.टी.—पहिले स्वर्ण के सूचीवेध्य पत्रों को लेकर इनको कैंची से काटकर इनके बहुत छोटे टुकड़े बना लें । अब इन टुकड़ों को मिट्टी से लिप्त किये

पञ्चदशस्तरङ्गः ३६७ काँच के पात्र में रखकर इस पत्र को त्रिपादिका पर रख कर इसके नीचे सुरा- दीपक जलायें और पात्र में थोड़ा-थोड़ा करके लवणद्राव और लवङ्गद्राव से चतुर्थांश सोरकद्राव तब तक डालें जब तक सम्पूर्ण स्वर्ण गल न जाय। स्वर्ण के अच्छी तरह गल जाने के बाद फिर इसको और पकायें जिनसे द्राव की अधिकता कम हो जाय। अब इसी पात्र में थोड़ा जल डालकर पकायें। इसके अनन्तर इसी में थोड़ा-थोड़ा करके सजल चणकाम्ल ( Oxalic acid ) तब तक डालें जब तक स्वर्ण के अतिसूक्ष्म कण काँच पात्र के तल में बैठ जायें। अब इसको अग्नि से पृथक् करके स्वर्ण-कणों को सावधानी के साथ जल से तब तक धोयें जब तक कि उनमें अम्लता न रहे। अन्त में इन कणों को सुखा कर रख लें, यह शुद्ध स्वर्ण कहा जाता है ॥ २०-२६ ॥ विशुद्धस्वर्णस्य प्रयोगक्रमः विशोधितं सुवर्णन्तु रसतन्त्रविचक्षणः। घृष्ट्वा च मण्डलीकृत्य तत्र तत्र प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥ विशोधितस्य सुवर्णस्य शिलादौ घृष्ट्वा मण्डलीकृत्यातिसूक्ष्मपत्ररूपेण च ॥२७॥ भा.टी.-उक्त विधियों से अच्छी तरह शुद्धस्वर्ण को घिसकर अथवा इसके वर्क बना कर आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाया जा सकता है ॥ २७ ॥ घृष्टस्य विशुद्धस्वर्णस्य गुणाः विशुद्धं कनकं घृष्टं विषबाधविनाशनम् । मधुरं शीतलं नेत्र्यं गर्भस्थापनमुत्तमम् ॥ २८ ॥ पित्तामयप्रशमनं हृद्दौर्बल्यहरं परम् । अन्यभेषजसाहाय्यात् करोति विविधान् गुणान् ॥२६॥ घृष्टस्य अपक्वस्यैव शुद्धस्य केवलं सुवर्णस्य सेवने गुणाः—विषबाधाहरं विशेषतः, तथा शीतञ्च वीर्यतः स्पर्शतश्च, हृदयदौर्बल्यहरञ्च ॥ २८, २६ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्ण को घिसकर सेवन करने से शरीरगत अनेक प्रकार के विषप्रभाव नष्ट हो जाते हैं। यह मधुररस शीतवीर्य, नेत्रों के लिये लाभदायक, गर्भाशय की गर्भधारण शक्ति को बढ़ानेवाला है। पित्त-प्रकोपजन्य दाह आदि रोगों को शान्त करता है। स्वर्ण हृदय की दुर्बलता को हटाने में सर्वोत्तम औषधि है। स्वर्ण को अन्यान्य औषधियों में मिलाकर प्रयोग से अनेकविध लाभ हो सकते हैं ॥ २८-२६ ॥ सुवर्णमण्डलस्य नामानि सुवर्णमण्डलं स्वर्णमण्डलं स्वर्णपत्रकम् । सुवर्णपटलं स्वर्णदलञ्चापि प्रकीर्तितम् ॥ ३० ॥

३६८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—सुवर्णमण्डल, स्वर्णमण्डल, स्वर्णपत्रक, सुवर्णपटल और स्वर्ण- दल ये सब नाम सोने के वर्कों के कहे जाते हैं ॥ ३० ॥ सुवर्णमण्डलस्य गुणाः स्वर्णमण्डलमायुष्यं वह्निमान्द्यविनाशनम् । आक्षेपशमनं नेत्र्यं वीर्यवृद्धिकरं परम् ॥ ३१ ॥ अम्लपित्तापहं हृद्यं विपाके स्वादु शीतलम् । हिक्कानाहविषश्लेष्मक्षयशूलव्रणापहम् ॥ ३२ ॥ सुवर्णमण्डलं अम्लपित्तापहमिति विशेषः । समानमन्यत् ॥ ३१-३२ ॥ भा.टी.—सोने के वर्क जीवनवर्धक, अग्निमान्द्यहर वातप्रकोपजन्य आक्षे- पक, नेत्रज्योतिवर्धक, वीर्यवृद्धिकर होते हैं। इसके प्रयोग से अम्लपित्त शान्त हो जाता है। हृदय को बल मिलता है। स्वर्णपत्र विपाक क्रिया में मधुर और शीतल गुणवाले होते हैं। इसके अतिरिक्त हिचकी, आनाह, विषविकार, श्लेष्म- क्षय, वातिकशूल तथा पुरातन व्रणों को नष्ट करते हैं ॥ ३१, ३२ ॥ सुवर्णपटलस्य प्रयोगविधिः सुवर्णपटलं सम्यक् सितया परिपेषितम् । तत्तद्रोगघ्नभैषज्ययुतं तत्तद्गदापहम् ॥ ३३ ॥ सुवर्णपटलं सितया खण्डेन परिपेषितं तत्तद्रोगनाशकभेषजयोगेषु योज्यम् । आहुश्च प्राचीनाः— “अपक्वहेम सङ्घृष्टं शिलायां जलयोगातः । द्रवरूपन्तु तत्पेयं मधुना गुणदायकम् ॥ यद्वापि तबकाख्यन्तु स्वर्णपत्रं विचूर्णितम् । मधुना संगृ- हीतं चेत् सद्यो हन्ति विषादिकम् ॥” इति । “न सज्जते हेमपाङ्गे पद्मपत्रेऽम्बुवद् विषम्” इति च वाग्भटः ॥ ३३ ॥ भा.टी.—सोने के वर्क को खाँड में लपेट कर, भिन्न-भिन्न रोगनाशक औषधियों के साथ प्रयोग करने पर तत्तद्-रोगों में लाभ होता है ॥ ३३ ॥ अथ सुवर्णलवणस्य नामानि. सुवर्णलवणं स्वर्णलवणञ्चापि तन्मतम् । हिरण्यलवणञ्चैव समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ३४ ॥ भा. टी.—सुवर्णलवण, स्वर्णलवण और हिरण्यलवण, ये सब नाम ( Goldchloride ) के कहे जाते हैं ॥ ३४ ॥ वक्तव्य—सुवर्णलवण विशुद्ध आयुर्वेदीय योग न होकर भी अत्यन्त गुण-

२४ पञ्चदशस्तरङ्गः ३६६ कारक होने से यहाँ पर लिखा गया है । इसकी निर्माणविधि निम्नप्रकार से दी गयी है । सुवर्णलवणस्य निर्माणप्रकारः विशोधितं पावकभागमानं स्वर्णं तु सत्काचशरावसंस्थम् । सुराप्रदीपे विनिधाय चाथ मन्दानलेनेह पचेद्रसज्ञः ॥ ३५ ॥ शनैः शनैः संततमल्पमल्पं तुर्यांशसोराम्लकमिश्रितन्तु । क्षिपेद्विशुद्धं लवणाम्लमाराद्यावत्सुवर्णं द्रवतामुपैति ॥ ३६ ॥ द्रुतं सुवर्णन्तु विलोक्य शुद्धं दिग्भागिकं सिन्धुभवं क्षिपेच्च । नारङ्गरङ्गन्तु जले विशुष्के सुवर्णपूर्वं लवणं हरेद्वै ॥ ३७ ॥ ततः सुवर्णलवणं काचकुप्यां निधापयेत् । अथ निर्दिष्टकार्येषु जले सन्द्राव्य योजयेत् ॥ ३८ ॥ अथ नवीनपरिभाषानिर्दिष्टस्यसुवर्ण लवणस्य निर्माणप्रकारः—विशोधित- मिति तृतीयशोधनप्रकारेण । पावकोऽग्निः 'त्रयोऽग्नय' इति स्मरणात् । पावक- भागमानं त्रिभागम्, तुर्यांशं चतुर्थांशं लवणाम्लापेक्षया, दिशो दश, ततश्च दशभागिकं लवणं सैन्धवाख्यम्, तच्च अत्यन्तनिर्मलं ग्राह्यम्, नारङ्गरङ्गं रक्त- पीतवर्णम् । जले द्रावणप्रकारोऽनुपदमेवोक्तः ॥ ३५–३८ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्ण चूर्ण तीन भाग मात्रा में लेकर एक अच्छे दृढ़ कांच के प्याले में रखें और कांच के पात्र को त्रिपादिका पर रखकर उसके नीचे सुराप्रदीप की मन्द-मन्द अग्नि दें और पात्र में लवणद्राव में चतुर्थांश भाग सोरकद्राव ( Nitric acid ) मिश्रित करके थोड़ा-थोड़ा करके डालते जाँय । इस तरह सोरकद्राव डालने से पात्रगत स्वर्ण शीघ्र ही इसमें घुल जाता है । जब स्वर्ण अच्छी तरह सोरकद्राव में घुल जाय तो इसमें दस भाग सैंधानमक का चूर्ण डाल दें और जलीयांश सूखने तक पकायें तो नारंगी के वर्ण (लाल- पीला) का स्वर्ण लवण ( Goldchloride ) प्राप्त होगा । इस प्रकार प्राप्त स्वर्ण लवण को पात्र में से निकाल एक कांच की शीशी में रख लें और आव- श्यकतानुसार जल में मिला कर काम में लावें ॥ ३५–३८ ॥ • वक्तव्य—यह स्वर्ण लवण आजकल ऐलोपैथी-चिकित्सा में बहुत ही उपयोगी माना जाता है । इसी के द्वारा आजकल अनेक सूचीवेध ( Injection ) तय्यार किये गये हैं । आयुर्वेद में भी यह सारस्वतारिष्ट अदि योगों में मिलाने में बहुत सुविधाजनक है । अन्य किसी भी द्रव रूप औषधि में यदि स्वर्ण देना

३७० रसतरङ्गिणी अभीष्ट हो तो स्वर्ण लवण का प्रयोग करने में सुविधा रहती है । स्वर्ण लवणस्य गुणाः सुवर्णलवणं वृष्यं दोषत्रितयकोपजित् । तुवरं स्वादु तिक्तञ्च सलिले च द्रवीभवेत् ॥ ३६ ॥ पुष्पावरोधं मधुमेहबाधां चिरन्तनञ्चापि फिरङ्गरोगम् । अपस्मृतिं श्वासमथोग्रवेगं क्लैब्यं तथोन्मादमलं निहन्यात् ४० अलं अत्यर्थम् । इदं अजीर्णजनिते चिरन्तने आध्मानेऽपि सहस्रशो दृष्ट- फलम् ॥ ३६, ४० ॥ भा.टो.—स्वर्ण लवण, वृष्य और त्रिदोषप्रकोपशामक होता है । यह स्वाद में मधुर, कषाय और तिक्तरस होता है और जल में डालने से यह घुल जाता है । इसके सेवन से स्त्री का रुका हुआ मासिकधर्म आने लगता है । मधुमेह में लाभदायक और पुराने फिरंग रोग में जब कि शरीर में वातप्रकोप से भ्रम, मूर्छा, आक्षेप आदि लक्षण उत्पन्न हो गये हों तो इसका प्रयोग लाभ करता है । अपस्मार, भयंकर श्वास रोग, नपुंसकता तथा उन्माद रोगों को नष्ट करता है ॥ ३६, ४० ॥ वक्तव्य—पुराने अजीर्ण तथा आध्मान के कारण जिन स्त्रियों में हिस्टे- रिया का वेग आने लगता है अथवा जिन मनुष्यों को भोजन के बाद वायु ऊपर को चढ़ कर शिर में चक्कर से आने लगते हैं उन अवस्थाओं में अत्यन्त लाभ करता है । सुवर्णलवणस्य मात्रा खशरांशार्द्रुक्तिकाया विंशांशप्रमितं शुभम् । युञ्जीत स्वर्णलवणं बलकालाद्यपेक्षया ॥ ४१ ॥ खशरांशः १/५० पञ्चाशत्तमो भागः, तस्मादारभ्य १/२० विंशतिभागपर्य्यन्तं मात्रास्य ॥४१॥ भा. टी.—बल काल आदि का निर्णय करके सुवर्ण लवण को रत्ती के पचासवें (१/५०) भाग से लेकर बीसवें (१/२०) भाग तक दिया जा सकता है ॥४१॥ अस्य प्रयोगक्रमः सुवर्णलवणं गुञ्जोन्मितं खलु समाहरेत् । सार्द्धतोलकद्वयमिते जले संद्रावयेद्भिषक् ॥ ४२ ॥ तस्माज्जलाद्भिषग्वर्य्यो बिन्दून् भास्करसंख्यकान् । तत्तन्निर्दिष्टरोगेषु विधानज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ४३ ॥

पञ्चदशस्तरङ्गः ३७१ भिषक् सुवर्णलवणं त्वासवादौ प्रयोजयेत् । रसौषधेषु च प्राज्ञो न कदाचित् प्रयोजयेत् ॥४४॥ प्रयोगक्रमः सुवर्णलवणं १ गुञ्जा, जलं २॥ तोलकं मेलयेत्, द्वादशविन्द- वोऽस्य मात्रा। पुनर्जले आसवादौ वा मेलयित्वा च पेयेति । रसौषधेषु प्रयोग- योग्यन्तु भस्मैवेति विशेषः ॥ ४२-४४ ॥ भा.टी.—सुवर्णलवण को प्रयोग में लाने के लिये इसमें से एक रत्ती मात्रा लेकर उसको ढाई तोले शुद्ध जल में घोल लें और शीशी में भरकर रख लें । अब निर्दिष्ट रोगों में ( जिनमें इसका प्रयोग करना हो ) बारह बूँद मात्रा में पिलाना चाहिये । सुवर्णलवण को आसव, अरिष्ट, क्वाथ, शर्बत आदि द्रव्यों में ही मिलकर सेवन करना चाहिये । रस औषधियों में इसका प्रयोग कभी नहीं करना चाहिये । रस औषधियों के लिये इसकी भस्म ही उत्तम रहती है॥४२-४४॥ अथ सुवर्णमारणस्य प्रथमः प्रकारः कर्षोन्मितं शोधितमग्निबीजं न्यसेत्कुमूषां भिषजां वरेण्यः । संद्रावयेच्चाथ हि कोकिलाग्नौ सद्वङ्कनालानिलसुप्रदीप्ते ॥४५॥ द्रुतं सुवर्णन्तु ततो विलोक्य क्षिपेत्समं तत्र मृतं रसेशम् । लुङ्गद्रवेणाथ विमर्द्य सम्यक् सुश्लक्ष्णचूर्णाञ्च ततो विदध्यात् ॥४६॥ ततः सुवर्णप्रमितं विशुद्धं क्षिपेद्विधिज्ञो रसगर्भचूर्णम् । पुटेत्पुटे कुक्कुटसंज्ञके च मार्त्तण्डवारं भिषगप्रमत्तः ॥४७॥ एवं नातिचिरादेव काञ्चनं याति पञ्चताम् । सुश्लक्ष्णं कुङ्कुमच्छायं निश्चन्द्रञ्च भवत्यलम् ॥४८॥ अथ क्रमप्राप्तभस्मीकरणप्रकारः—अग्निबीजं स्वर्णम्, रसेशं पारदम्, लुङ्गद्रवः मातुलुङ्गरसः, रसगर्भचूर्णं शुद्धहिंगुलक्षोदः, मार्त्तण्डवारं द्वादशवारम्, अत्र च प्रतिवारं केवलं हिंगुलक्षेपः पारदभस्मनस्त्वेकवारमेवेति । अत्र हि स्मरणीया प्राचीनपरिभाषा—"रसीभवन्ति लोहानि मृतानि सुरवन्दिते ॥ विनिघ्नन्ति जराव्याधीन् रसयुक्तानि किम्पुनः ॥ लोहानां मारणं श्रेष्ठं सर्वेषां रसभस्मना । मध्यमं मूलिभिः प्रोक्तमधमं गन्धकादिभिः ॥” तथा “अरिलोहेन लोहस्य मारणं दुर्गुणप्रदम् ” इति च ॥ ४५-४८ ॥ भा.टी.—एक कर्षपरिमाण शुद्ध स्वर्ण लेकर उसे एक दृढ़ मूषा (घरिया) में रखकर मूषा को कोयले के ऊपर अच्छी तरह टिकाकर फूंकनी ( वंकनाल ) से हवा करते हुए स्वर्ण को पिघला लें । जब देखें कि सोना अच्छी तरह पिघल

३७२ रसतरङ्गिणी गया है तो उसमें एक कर्ष परिमाण रससिन्दूर डालकर नीचे उतार लें और इसको बिजौरानींबू के रस से खूब मर्दन करके सूक्ष्मचूर्ण रूप में कर लें और फिर इसमें स्वर्ण के समभाग शुद्ध हिंगुलचूर्ण मिलाकर एक छोटे से सम्पुट में बन्द करके कुक्कुटपुट की अग्नि में फूँक दें । इस तरह बारह कुक्कुटपुट देने से शीघ्र ही स्वर्ण की अतिसूक्ष्म केसरवर्ण की निश्चन्द्र भस्म बन जाती है ॥४५-४८॥ वक्तव्य—स्वर्ण को मूषा में पिघलाकर खरल में पड़े रससिन्दूर या पारद- भस्म में डालकर शीघ्र ही रगड़ने से स्वर्ण चूर्णरूप में हो जाता है । अब इसे बिजौरानींबू के रस से घोंटकर हिंगुल मिलाकर कुक्कुपुट देनी चाहिये । द्वितीय पुट में केवल हिंगुल ही समभाग डालकर पुट देना चाहिये । पहिले पुट से ही स्वर्ण चूर्ण रूप में हो जायगा, उसको न तो फिर पिघलाने की ही आवश्यकता है और न पारदभस्म ही मिलाने की । यहाँ पर केवल पारद के योग से स्वर्ण- भस्मविधि लिखने से यह स्मरण कराया है कि धातुओं का पारदभस्म के सहयोग से भस्म करना सर्वोत्तम होता है—"लोहानां मारणं श्रेष्ठं सर्वेषां रसभस्मना । मध्यमं मूलिभिः प्रोक्तमधमं गन्धकादिभिः ॥” द्वितीयो मारणप्रकारः विशुद्धस्वर्णपत्राणि कर्षैकप्रमितानि च । समादाय समं सूतं दत्त्वा संमर्दयेद् दृढम् ॥४९॥ निम्बुद्रावेण सम्पेष्य सम्यक् प्रक्षालयेत्ततः । हिंगुलं गन्धकञ्चाथ शिलाञ्च नवसादरम् ॥५०॥ पृथक् पृथक् कर्षमितं निक्षिप्ताम्लेन मर्दयेत् । संशोष्य चातपे सम्यक् श्लक्ष्णचूर्णंञ्च कारयेत् ॥५१॥ पुटेत्तावत्प्रयत्नेन यावन्निश्चन्द्रिकं भवेत् । इत्थं स्वल्पपुटैरेव काञ्चनं याति पञ्चताम् ॥५२॥ अपरः प्रकारः—सूतं हिंगुलोत्थं शोधितं वा, प्रक्षालनञ्च वर्णोज्ज्वलतार- क्षार्थम् । अत्र च प्रतिवारं पारदादीनां क्षेपः । पुटनञ्च लघुपुटैनैव । स्वल्पपुटैः यथासम्भवं सप्तभिः । निश्चन्द्रिकञ्च भस्मलक्षणम् ॥ ४९-५२ ॥ भा.टी.—एक कर्ष परिमाण में शुद्ध स्वर्ण पत्र लेकर खरल में डालें और उसमें एक कर्ष शुद्ध पारद डालकर दोनों को मर्दन करें । फिर नींबू के रस से मर्दनकर अन्त में अच्छी तरह धो लेवें । अब इस स्वर्ण में शुद्ध हिंगुल, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मैनसिल, नौसादर प्रत्येक एक कर्ष मिला बिजौरानींबू के रस से

मर्दन करके धूप में सुखा लें । फिर इसको पीस कर बारीक चूर्ण कर लघुसम्पुट में बन्द करके लघुपुट की अग्नि में पुट दें । इस प्रकार हिंगुल आदि द्रव्यों को हरेक बार स्वर्ण के बराबर भाग डाल मर्दन करके तब तक लघुपुट देते रहें जब तक कि स्वर्ण की चन्द्रिका रहित भस्म न हो जाय । इस प्रकार पुट देने से कुछ ही पुटों में स्वर्ण की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ ४६-५२ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः स्वर्णपत्राणि शुद्धानि समादाय भिषग्वरः । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्माँस्तु कारयेत् ॥ ५३ ॥ स्वर्णतुल्यं रसं दत्त्वा खल्वे सम्मर्दयेद् दृढम् । निम्बूद्रावेण सम्मर्द्य बहुशः क्षालयेद्भिषक् ॥ ५४ ॥ कुनटी रससिन्दूरं स्वर्णतुल्यं विनिक्षिपेत् । सुवर्णपादिकञ्चैव मृतं कनकमाक्षिकम् ॥ ५५ ॥ रविदुग्धेन सम्पेष्य श्लक्ष्णचूर्णाञ्च कारयेत् । पुटेत्तावद्विधानज्ञो यावन्निश्शन्द्रिकं भवेत् ॥ ५६ ॥ एवं स्वल्पपुटैरेव कनकं मृतिमाप्नुयात् । निश्वन्द्रिकञ्च मसृणं स्वर्णभस्म भवेच्छुभम् ॥ ५७ ॥ द्वितीयादिपुटेष्वत्र मृतं कनकमाक्षिकम् । न निक्षिपेद्विधानज्ञो रहस्यमिदमीरितम् ॥ ५८ ॥ तृतीयः प्रकारः—बहुशः क्षालनं अवश्यं कार्यम्, अन्यथा वर्णहानिः । कुनटीं मनःशिलाम् । द्वितीयादिपुटेष्वत्र माक्षिकं न क्षिपेत् । अन्येषान्तु क्षेपो विधेय एवेति । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ५३-५८ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्णपत्रों को लेकर उनको कैंची से काटकर बहुत सूक्ष्म छोटे-छोटे कण ( टुकड़े ) बना लें । अब इनको खरल में डालकर स्वर्ण के समान भाग पारद मिलाकर नींबू के रस से अच्छी तरह मर्दन करें जिससे स्वर्ण पारद में घुलकर गाढ़ी पीठी सा बन जाय । अब स्वर्ण पीठी को जल से अच्छी तरह धोकर इसमें स्वर्ण के बराबर भाग शुद्ध मैनसिल, रससिन्दूर मिलायें और स्वर्ण से चतुर्थांश स्वर्णमाक्षिकभस्म आक के दूध से पीस कर सूक्ष्मचूर्ण कर लें । अब इस चूर्ण को लघु सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें । इस प्रकार थोड़े से पुटों में ही स्वर्णभस्म हो जाती है जो चन्द्रिका रहित और चिकनी सी होती है । इस विधि से स्वर्णभस्म बनाने में पहले पुट में ही स्वर्ण-

३७४ रसतरङ्गिणी माक्षिक भस्म डालनी चाहिये। इसके बाद अन्य पुटों में स्वर्णमाक्षिक को छोड़ कर मैनसिल आदि ही डालने चाहिये ॥ ५३-५८ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः शुद्धेषु स्वर्णपत्रेषु समानं शुद्धपारदम् । दत्त्वा सम्पेषयेदम्लैः सुचिरं क्षालयेत्ततः ॥ ५६ ॥ संशोष्य गन्धकं दत्त्वा पुटेत्पुटविधानवित् । एवं चतुर्दशपुटैः सुवर्णं मृतिमाप्नुयात् ॥ ६० ॥ षोडशांशं प्रतिपुटं रसेशं ह्रासयेद् बुधः । अन्यथा पञ्चतां नैति रहस्यमिति दर्शितम् ॥६१॥ चतुर्थो मारणप्रकारो व्याख्यांतप्रायपाठः सरलप्रकारश्च, अन्यथा पञ्चतां नैति सुवर्णम् ॥ ५६-६१ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्णपत्रों को खरल में डालकर उसमें स्वर्ण के बराबर शुद्ध पारद डालें और अच्छी तरह मर्दन करके काञ्जी आदि किसी अम्लद्रव से खूब धोकर सुखा लें । अब इस स्वर्ण में समभाग शुद्धगन्धक मिला सम्पुट में फूँक दें । इस प्रकार चौदह लघुपुट देने से स्वर्ण की भस्म हो जाती है । प्रथमपुट देने के बाद आगे के तेरह पुटों में क्रमशः पारद का सोलहवाँ भाग कम करते जायँ । यदि ऐसा न किया जायगा तो स्वर्ण की भस्म ठीक नहीं बन सकेगी ॥५६-६१॥ पञ्चमो मारणप्रकारः सूचीवेध्यानि पत्राणि सुवर्णस्य समाहरेत् । रसेशं तत्समं दत्त्वा मर्दयेत्तु दिनत्रयम् ॥ ६२ ॥ निम्बूतीरेण संमर्द्य वारिणा क्षालयेद् भृशम् । श्वेतपाषाणचूर्णांञ्च स्वर्णाद्धं तत्र निक्षिपेत् । ६३ ॥ जम्बीरस्य द्रवं दत्त्वा पेषयेच्च दिनत्रयम् । शोषयित्वा द्रवं सम्यक् विदध्यात् श्लक्ष्णचूर्णकम् ॥ ६४ ॥ शुद्धगन्धकचूर्णांञ्च ततः स्वर्णोन्मितं क्षिपेत् । शरावसम्पुटे न्यस्य विदध्यात्सन्धिरोधनम् ॥ ६५ ॥ पुटेल्लघुपुटेनैवं यावन्निश्चन्द्रिकं भवेत् । काञ्चनारत्वचोत्थेन वारिणा भावितस्ततः ॥ ६६ ॥ पुटेत्त्रिधा लघुपुट स्वाङ्गशीतं समाहरेत् । एवं जाम्बववर्णाभं भस्म हाटकजं भवेत् ॥ ६७ ॥

पञ्चदशस्तरङ्गः ३७५ श्रीमत्परमपूज्येन धन्वन्तरिमहर्षिणा। भिषग्हिताय सुगमः प्रकारोऽयं निरूपितः ॥ ६८ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः—श्वेतपाषाण “सङ्गमर्मर” इति ख्यातम्, अत्र श्वेत- पाषाणस्यैकवारं क्षेपः । प्रतिवारन्तु पारदगन्धकयोरिति विशेषतः । श्रीमत्परम- पूज्येनेति सम्प्रदायनिर्देश आदरार्थम् । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ६२–६८ ॥ भा.टी.—विशुद्धस्वर्ण के सूचीवेध्य पत्रों को खरल में डाल उसमें समभाग शुद्धपारद मिला तीन दिन तक नींबू के रस में मर्दन करके जल से अच्छी तरह धो लेवें। अब इसमें सोने से आधा भाग पूर्वोक्त श्वेतपाषाण का चूर्ण मिला जम्भीरीनींबू के रस में तीन दिन तक मर्दन करके द्रवभाग को सुखाकर चूर्ण कर लें। अब इस चूर्ण में स्वर्ण के बराबर भाग शुद्धगन्धकचूर्ण मिला लघुसम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें। इस प्रकार तब तक लघुपुट में फूँकते रहें जब तक स्वर्ण की चन्द्रिका रहित भस्म न हो जाय। निश्चन्द्र भस्म होने पर इस भस्म को कचनार की छाल के स्वरस से भावना देकर फिर लघुपुट में फूँकें। इस प्रकार कचनार के स्वरस की भावना देकर तीन पुट दें। इस विधि से बनी हुई स्वर्ण भस्म पके हुए जामुन के रंग की होती है। स्वर्णभस्म बनाने की यह सरल विधि है ॥ ६२–६८ ॥ वक्तव्य—उक्त पञ्चम मारण प्रकार से श्वेतपाषाण ( संगमरमर ) चूर्ण पहिले एक बार ही डालना चाहिये; दूसरे पुटों में नहीं। यह आधा भाग श्वेत पाषाणचूर्ण निश्चन्द्रभस्म करने तक प्रायः उड़ जाता है या दग्ध होकर किञ्चित् क्षार रूप में अवशिष्ट रहता है। मृतसुवर्णस्य गुणाः मृतं सुवर्णं मधुरञ्च वृष्यं हृद्यञ्च नेत्र्यं परमञ्च मेध्यम् । रसायनं पुंसवनोपयोगि विषापहं कान्तिकरञ्च शस्तम् ॥ ६९ ॥ अथ मृतसुवर्णगुणाः—पुंसवनोपयोगि गर्भिण्याः पुंसवनकार्यकरम् ॥ ६९ ॥ भा.टी.—स्वर्णभस्म स्वाद में मधुर, बलवर्धक, हृदय और नेत्रों के लिये सर्वोत्तम बलकारी है। मेधाशक्ति के लिये भी यह सर्वोत्तम होती है। सर्व शरीर के लिये पोषक होने तथा त्रिदोषप्रकोपशामक होने से रसायन, पुंसवनसंस्कार के लिये अत्यन्त उपयोगी है। शरीरगत सब विषों का नाशक और शरीर की कान्तिवर्धक होती है ।।। ६९ ॥ अपि च स्वर्णं स्निग्धं मधुरमधुरं वृष्यमायुष्यमग्र्यं

३७६ रसतरङ्गिणी वयस्यं बल्यं विषमज्वरहरं त्वन्त्रशोषक्षयघ्नम् । रुच्यं पुष्यं पवनशमनं दीपनञ्चातिकेश्यं हन्यादेतन्नियतमचिरादेव रोगानशेषान् ॥ ७० ॥ मधुरं अत्यन्तमधुरम् । अशेषान् रोगान् हन्यादिति, तथा संस्मरुः प्राञ्चः “सर्वौषधिप्रयोगेण व्याधयो न गता हि ये । कर्मभिः पञ्चभिश्चापि सुवर्णं तेषु योजयेत् ॥ शिलाजतुप्रयोगैस्तु ताप्यसूतकयोस्तथा । अन्यै रसायनैश्चापि प्रयोगो हेम्न उत्तमः” ॥ ७० ॥ भा.टी.—स्वर्ण की भस्म स्निग्ध, अत्यन्त मधुर, वृष्य, आयु के लिये अत्यन्त हितकारक, उत्तमवर्णोत्पादक, बलकारक, सर्वशरीरगत-विषनाशक, आँतों के क्षय के लिये उत्तम, रुचिकारक, पवित्र (सत्त्वगुणोत्पादक), वातप्रकोप- शामक, दीपक, बालों के लिये अत्यन्त हितकारक होती है। इसके अतिरिक्त स्वर्ण रसायन होने तथा बल्य होने से सब रोगों को नष्ट करती है ॥ ७० ॥ विशिष्टा गुणाः मृतं सुवर्णं शिशिरं वयःस्थापनमुत्तमम् । स्मृतिप्रदं परञ्चैव त्रिदोषज्वरनाशनम् ॥ ७१ ॥ सौन्दर्यमुखलावण्यं ललनानां विवर्धयेत् । पित्तहारित्वमङ्गेषु जनयेच्च विशेषतः ॥ ७२ ॥ मृतं सुवर्णं सुस्निग्धं वाग्विशुद्धिकरं परम् । चिन्ताशोकभयक्रोधसम्भूतामयनाशनम् ॥ ७३ ॥ शिरोदेशे प्रवृद्धांस्तु रक्तसञ्चरणक्रियाम् । आत्मघाताभिलाषं च प्राबल्येन समुत्थितम् ॥ ७४ ॥ अस्थिक्षतं त्वस्थिशोथं तथा जङ्घास्थिवेदनाम् । फिरङ्गजां मुष्कमांसवृद्धिञ्चापि चिरन्तनीम् ॥ ७५ ॥ उन्मादमथ वैचित्यं योषापस्मारकं तथा । चित्तोद्वेगं भ्रमं ग्लानिं नाशयेदविकल्पतः ॥ ७६ ॥ हृल्लेपनप्रशमनं मुष्कशोथप्रणाशनम् । अस्थिशोषहरं चैव मूर्च्छार्त्तिपरिकृन्तनम् ॥ ७७ ॥ कासश्वासप्रशमनं परमोजोविवर्द्धनम् । अतिसारग्रहणिपाण्ड्वामयनिषूदनम् ॥ ७८ ॥