रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
( x ) जोहीं मैं तिहारी ओर ३३६ डरै सदा चाहे न कुछ ३२७ डहडही बौरी मजु डार २८८ डोरि लियौ मन मोरि २२७ डोलिवो कु जनि कु जनि को २१४ तट की न घट भरै ३४८ तुम चाहो सो कहौ २४० तू गरवाड कहा भगरै २८६ तू ऐसी चतुराई ठाने ३४३ तेरी गलीन मैं जा दिन तें २६६ तैं न लख्यौ जब १८३ तीरथ भीर मे भूल परी २४८ तोरि मानिनी तैं हियौ ३३४ तौ पहिराइ गई चुरियाँ २६८ तोहू पहिचानौं ३३८ 'ता' जसुदा कहयो धेनु १७७ दपति सुख अरु ३२६ दमकै रवि कु डल दामिनी से १८८ दान पै न कान सुने ३४० दानी नए भए माँगत २२१ दूध दुह्यौ सीरो पर्यौ २२३ दूर ते आड दुरे ही २६० दृग दूने खिंचे रहैं १८५ देखत सेज विछी ही अच्छी २७२ देखन को सखी नैन भए २३६ देखि कै रास महावन को १८८ देखि गदर हित-साहिबी ३३४ देखिहौं आँखिन सो पिय २३६ देख्यौ रूप अपार २१८ देस विदेस के देखे १६८ दोउ कानन कुंडल १६०
( XI ) दो मन इक होते ३३० द्रौपदी और गनिका गज १७६ नन्द की न दासी हम ३४० नन्द को नन्दन है दुख कंदन २४८ नद महर कै वगर ३५० नाह वियोग वढ्यौ रसखानि १६६ नैन दलालनि चौहटै १८४ नौ लख गाय सुनी ३४२ परम चतुर पुनि रसिकवर ३४२ पहिले दधि लै गई गोकुल २२० प्यारी की चारु सिंगार २८२ प्यारी पै जाई कितो २५४ पीय से तुम मान कर्यौ कत २८७ पूरव पुन्यनि ते चितई २६७ पै एतो हूँ हम ३२६ पै मिठास या मार । ३२६ प्रान वही जु रहै रीझि २३६ प्रीतम नन्दकिसोर १६६ प्रेम अगम अनुपम ३२० प्रेम अयनि श्री राधिका ३२० प्रेम कथानि की बात चलै २८५ प्रेम निकेतन श्री वनहिं ३३४ प्रेम प्रेम सब कोऊ कहत ३२० प्रेम प्रेम सब कोऊ कहै ३२७ प्रे म फास मै फंसि ३२८ प्रे म वारुनि छानिकै ३२१ प्रे म मरोरि उठै तबहीं २६५ प्र म रूप दर्पण अहो ३२१ प्रे म हरि को रूप है ३२७ फागुन लाग्यो जबते २७४ फूलत फूल सबै वन ३०२
( XII )
वृषभान के गेह दिवारी २५८ वक विलोचन है दुख २०५ बंसी बजावत आनि कठौ २२८ बजी है बजी रसखानि २३२ वन बाग तडागन कु ज गली २३८ बाँक मरोर गई भृकुटीन २८२ वाँकी धरै कलगी सिर २१२ वाँकी वड़ी अखियाँ १८५ वाँकी विलोकनि रगभरी २२६ बाँके कटाछ चितैबो सिख्यो २६२ वागन मे मुरली २६५ वार ही गोरस वेचि री २६४ वागन काहे को जाग्रो ३०१ बात सुनी न कहूँ हरि की २५६ बाल गुलाब के नीर असीर ३०४ वासर तूं जू कहूँ निकरै २८३ विविध सागर रस इंदु ३३५ विरहा की जु आँच लगी ३०३ बिनु गुन जोवन रूप ३२४ विमल सरल रसखानि १५८ विहरै पिय प्यारी सनेह २६८ वेद मूल सब धर्म ३३१ बेनु बजावत आवत है नित २६३ वैद की औषध खाई ३१८ बैन वही उनको गुन १५७ बैरिनि तूँ बरजी न रहै २६२ ब्याही अनब्याही ब्रजमाँही २६५ ब्रज की वनिता सब घरि २३२ ब्रह्म मैं ढूंढ्यो पुरानन गानन १६३ भई बावरी ढूँढ़त काहि २६३
- र. अ. ३. पृ. ५७४ – ५/२१३
( XIV ) मोहन रुप छकी वन २०२ मोहन सो अटक्यौ मनु २६३ मोहनी मोहन सो रसखानि १७५ यह देखि धतूरे के पात ३१८ याही तैं सब मुक्ति ३३० रग भर्यौ मुसकात लला २१६ रसमय स्वाभाविक विना ३३२ रसखान सुनाय वियोग ३०३ राधा माधव सखिन ३३५ लगर छैलहि गोकुल मैं २२२ लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक १६१ लाज के लेप चढाइ कै ३१४ लाडली लाल लसै १७६ लाल लसै पगिया सबके १८६ सीने अबीर भरे पिचका २७६ लोक की लाज तज्यौ २०३ लोक वेद मरजाद सब ३२२ लोग कहै ब्रज के २३४ लाल की आज छठी १७६ वह गोधन गावत गोधन मैं २६१ वह घेरनि धेनु अबेर १८६ वह नन्द को साँवरो छैल २०१ वह सोई हुती परजंक ३००
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( XVI ) सेष सुरेस दिनेस गनेस १६६ सोई हुती पिय की छतियाँ २६६ सोई हे रास मैं नैमुक २८६ सोहत हे चन्दवा सिर ४१५ स्याम सघन घन घेरि कै ४५३ स्रवन कीरतन दरसनौह ३३२ स्रुति पुरान आगम ३२३ स्वारथ मूल असुद्ध त्यौ ३३२ हरि के सब आधीन ३३१ हेरत कु ज भुजा धरैं स्याम ३४७ हेरति वारही वार २६२ है छल की अप्रतीत की १७४ श्री मुख यो न वखान ४७६ श्री वृष भान की छान घुजा २४४ ज्ञान करम रु उपासना ३२३
: १ : रीतिकाल का परिचय हिन्दी-साहित्य मे रीतिकाल का आविर्भाव संवत् १७०० से १६०० तक माना जाता है। इस काल मे दो साहित्यिक धाराएँ युगपद् प्रवाहित होती हुई भी एक-दूसरी से नितान्त भिन्न है। एक धारा है रीतिबद्धमार्गी, जो काव्य- शास्त्रीय नियमो का अनुसरण करती है। इस धारा के दो वर्ग है। एक वर्ग तो उन लोगो का है जिनके कवित्व के साथ आचार्यत्व का गठबधन है। केशव, जसवंतसिंह, चिन्तामणि, देव, भूषण, कुलपति मिश्र आदि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। दूसरा वर्ग उन लोगो का है जिन्होन काव्यशास्त्रीय विवेचन तो नही किया, पर उसके आधार पर अपने ग्रन्थो की रचना की है। बिहारी, मधु- सूदन, रसलीन, सेनापति आदि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। इस काल मे जो काव्यशास्त्रीय विवेचन हुआ है, वह प्राय. सस्कृत काव्य- शास्त्र की सीमाओ मे ही आबद्ध रहा है । रीतिकालीन आचार्यों मे, इसी कारण, नगण्य मौलिकता परिलक्षित होती है। जहाँ तक उद्देश्य का प्रश्न है, रीतिकालीन आचार्यों का उद्देश्य सस्कृत-आचार्यों से भिन्न था। सस्कृत का काव्यशास्त्र समय-समय पर रसवाद, अलंकारवाद, रीतिवाद, ध्वनिवाद तथा वक्रोक्तिवाद का समर्थन एवं खडन-मडन प्रस्तुत करता रहा है। हिन्दी के रीति- कालीन आचार्य खंडन-मडन के इन पचडो मे नही पडे है। इन आचार्यों में से कुछ आचार्यों ने नायिका-भेद निरूपण किया है, कुछ ने अलकार ग्रथो का निर्माण किया है और कुछ आचार्यों ने इन दोनो का सृजन किया है। नायक- नायिका-भेद के निरूपण का आधार प्राय भानुमिश्र रहे है और अलकारो के लिए अप्पय दीक्षित । संस्कृत के ये दोनो आचार्य भानुमिश्र और अप्पय दीक्षित किसी भी काव्यशास्त्रीय वाद से आबद्ध नही थे। हिन्दी के कुछ आचार्य, जो
२ रसखान-ग्रन्थावली
सर्वांग निरूपक हैं, आचार्य मम्मट और आचार्य विश्वनाथ के ऋणी हैं। ये दोनों आचार्य काव्यशास्त्रीय वादों एवं सम्प्रदायों से पूर्णतया परिचित थे, पर उन्होंने किसी वाद का वाद की दृष्टि से अनुकरण नहीं किया। हिन्दी के आचार्य अलंकारवाद, रीतिवाद तथा ध्वनिवाद से पूर्णरूपेण परिचित नहीं थे, अतः उनका किसी एक सम्प्रदाय को अपनाकर चलना असम्भव था। रीतिकाल में जो काव्यशास्त्रीय विवेचन हुआ है, उसे देखकर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ये कवि लक्षणबद्ध साहित्य-निर्माण की ओर क्यों आकृष्ट हुए ? क्या इसलिए कि ये हिन्दी साहित्य में सम्यक् काव्यशास्त्र का निर्माण करना चाहते थे, अथवा इसलिए कि ये हिन्दी में संस्कृत काव्यशास्त्र का अनुवाद प्रस्तुत करना चाहते थे ? इन दोनों सम्भावनाओं में से दूसरी सम्भावना अधिक उचित है। क्योंकि यदि इनका उद्देश्य काव्यशास्त्र की रचना करना होता तो ये भी संस्कृत आचार्यों की भाँति किसी काव्यशास्त्रीय नियम के उदा- हरण में अपने पूर्ववर्ती कवियों के उदाहरण प्रस्तुत करते। संस्कृत काव्यशास्त्र को आधार मानकर ही हिन्दी आचार्यों ने अपने विवेचन को प्रस्तुत किया है। फिर भी हिन्दी में ऐसे अनेक आचार्य हुए हैं जिन्होंने हिन्दी की विकासशील प्रवृत्तियों का भी ध्यान रखा है। आचार्य भिखारीदास ने 'तुक' का विवेचन हिन्दी-प्रवृत्तियों के आधार पर ही किया है। देव और भिखारीदास दोनों ने ही नायिका-भेद में अपनी मौलिकता का परिचय दिया है और अनेक ऐसी नायिका तथा दूतियों का उल्लेख किया है जो संस्कृत काव्यशास्त्र में नहीं मिलतीं। अब प्रश्न यह हो सकता है कि इन आचार्यों को संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुवाद की क्या आवश्यकता थी ? इसका उत्तर स्पष्ट है—आचार्यत्व प्राप्ति का प्रलोभन। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आचार्य के पद पर प्रतिष्ठित होने वाले रीतिकालीन आचार्यों में आचार्यत्व की अपेक्षा कवि प्रतिभा का अंश ही अधिक है। इसके अतिरिक्त रीतिकाल में कुछ ऐसे भी कवि हुए हैं, जिनमें आचार्यत्व का प्रलोभन जागृत नहीं हुआ। इन्होंने अपनी प्रतिभा को काव्य तक ही सीमित रखा, अर्थात् लक्षण-ग्रन्थों की अपेक्षा लक्ष्य-ग्रन्थों का निर्माण किया। बिहारी आदि कवि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। काव्य-दृष्टि से यदि रीतिकाल का मंथन किया जाए तो इसमें पच्चीस
समीक्षा भाग ३ रीतिबद्धमार्गी शाखा की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है— १. शृंगारिकता २. आलंकारिकता ३. भक्ति और नीति ४ काव्यरूप ५. ब्रजभाषा की प्रधानता ६. जीवन-दर्शन का अभाव १. शृंगारिता—रीतिकाल मे शृंगार-वर्णन की प्रधानता रही है । इसी प्राधान्य के कारण कतिपय विद्वान् इस काल को ‘शृंगार काल’ कहना उप- युक्त समझते है । शृंगार-रस का जितना सूक्ष्म विवेचन इस काल मे हुआ है, उतना किसी काल मे नही हुआ । इस प्रवृत्ति का मुख्य कारण तत्कालीन राज- नीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ है । कवियो का ध्येय अपने आश्रयदाता का मनोरजन करना होता था और मनोरजन के लिए शृंगार के अलावा और क्या विषय उपयुक्त हो सकता है । भक्तिकाल मे माधुर्य भक्ति का जो अबाध स्रोत बहा और उसमे जिस शृंगार को अलौकिक रूप दिया गया, वही रीति- काल मे आकर लौकिक और मांसल बन गया । प्रथम दर्शन से लेकर सुरतांत तक के चित्रों का इस काल के कवियो ने बडे मनोयोग से चित्रण किया । इसी कारण इनकी दृष्टि मे प्रेम और नारी का स्वस्थ स्वरूप न आ सका । डॉ० भागीरथ मिश्र के शब्दो मे— ‘शृंगारिकता के प्रति उनका (रीतिकालीन कवियो का) दृष्टिकोण मुख्यतः भोगपरक था, इसीलिए प्रेम के उच्चतर सोपानो की ओर वे न जा सके । प्रेम की अनन्यता, एकनिष्ठता, त्याग, तपश्चर्या आदि उदात्त पक्ष भी उनकी दृष्टि मे बहुत कम आए है । उनका विलासोन्मुख जीवन और दर्शन सामान्यतः प्रेम या शृंगार के बाह्य पक्ष शारीरिक आकर्षण तक ही सीमित रहकर रूप को मादक बनाने वाले उपकरण ही जुटाता रहा । यह प्रवृत्ति नायिका-भेद, नख- शिख वर्णन, ऋतु-वर्णन, अलंकार निरूपण सभी जगह देखी जा सकती है ।’ २. आलंकारिकता—रीतिकालीन कवियो के काव्य के दो प्रमुख उद्देश्य थे—मनोरंजन और पांडित्य-प्रदर्शन । आलंकारिकता का प्राधान्य इन दोनो ही कारणो से रीतिकालीन काव्य मे समाविष्ट हुआ ।, यह सच है कि काव्य मे
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अलंकारों को उसकी शोभा के आधार पर धर्म माना गया है और यदि उनका समुचित प्रयोग किया जाए तो काव्य प्रभाव एवं भावप्रेषणीयता में बहुत सीमा तक सहायक सिद्ध होते हैं। किन्तु रीतिकालीन कवियों ने अलंकारों का प्रयोग प्राय चमत्कार-प्रदर्शन के लिए ही किया, इसलिए इस काल में श्लेष और यमक जैसे श्रमसाध्य अलंकारों का बोलबाला रहा। उन कवियों ने चमत्कार के प्रति अपना इतना गहन प्रलोभन दिखाया है कि यदि रस और चमत्कार में से उन्हें एक को ग्रहण करने का अवसर आया है तो उन्होंने चमत्कार को ही ग्रहण किया है। ३. भक्ति और नीति - जो भक्ति भक्तिकाल में कवियों का साध्य थी, वही इस काल में आकर साधन बन गई। इन्होंने राधा और कृष्ण को लौकिक धरातल पर ला खड़ा किया और तब ये साधारण नायिका और नायक बनकर रह गए। भक्ति के प्रति इस काल के कवियों का कोई रुझान नहीं था और न ये ऐसे वातावरण में ही थे जो भक्ति के अनुकूल पड़ता है। फलतः राधा और कृष्ण के माध्यम से इन्होंने शृंगारिकता की ही अभिव्यक्ति की है। डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में - 'यह भक्ति भी उनकी शृंगारिकता का अंग थी। जीवन की अतिशय रसिकता से जब ये लोग घबड़ा उठते होंगे तो राधा-कृष्ण का यही अनुराग उनके धर्मभीरु मन को आश्वासन देता होगा। इस प्रकार रीतिकालीन भक्ति एक ओर सामाजिक कवच और दूसरी ओर मानसिक शरणभूमि के रूप में इनकी रक्षा करती थी। तभी तो ये किसी तरह उनका अंचल पकड़े हुए थे। रीतिकाल का कोई भी कवि भक्तिभावना से हीन नहीं है-- हो भी नहीं सकता था, क्योंकि भक्ति उसके लिए एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता थी। भौतिक रस की उपासना करते हुए उसके विलास-जर्जर मन में इतना नैतिक बल नहीं था कि भक्तिरस में अनास्था प्रकट करने का उसका सैद्धांतिक निषेध करते। इसलिए रीतिकाल के सामाजिक जीवन और काव्य में भक्ति का आभास अनि- वार्यत वर्तमान है और नायक-नायिका के लिए बार-बार हरि और राधिका शब्दों का प्रयोग किया गया है।' जहाँ तक नीति का सम्बन्ध है, इस विषय में इन लोगों ने जो कुछ लिखा है, वह यथार्थ और व्यावहारिक है। वस्तुतः इनका वातावरण भक्ति की
समीक्षा भाग ५ अपेक्षा नीति के अधिक निकट था। ४. काव्यरूप—इस काल का वातावरण मुक्तकों के ही अधिक अनुरूप था, क्योंकि मनोरंजन इस काल के काव्य का मुख्य प्रयोजन था। ऐसे वातावरण में किसी प्रबंधकाव्य की आशा करना अनुचित ही है। काव्य का मूल्यांकन उसके चमत्कार में निहित था। अतः कवि मुक्तक पदों में ही अपनी कवि-प्रतिभा और पाण्डित्य प्रदर्शन कर सकते थे। प्रबंध और मुक्तक के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल मुक्तक के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्देश करते हुए लिखते हैं — 'मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं रहती जिसमें कथा-प्रसंग की परिस्थिति में अपने आपको भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसमें रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं जिनमें हृदय-कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है। यदि प्रबंधकाव्य वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है। इसीसे वह सभा-समाजों के लिए अधिक उपयुक्त होता है। उसमें उत्तरोत्तर अनेक दृश्यों द्वारा संघटित पूर्ण जीवन या उसके किसी एक पूर्ण अंग का प्रदर्शन नहीं होता, कोई एक रमणीय खंडदृश्य इस प्रकार सामने ला दिया जाता है कि पाठक या श्रोता कुछ क्षणों के लिए मन्त्र-मुग्ध-सा हो जाता है। इसके लिए कवि को मनोरम वस्तुओं या व्यापारों का एक छोटा-सा स्तवक कल्पित करके उन्हें अत्यन्त संक्षिप्त और सशक्त भाषा में प्रदर्शित करना पड़ता है।' कहने की आवश्यकता नहीं कि शुक्ल जी का यह विवेचन रीतिकालीन काव्यरूप पर भी उतना ही फिट बैठता है जितना स्वतंत्र रूप से। रीतिकाल में कुछ प्रबंधकाव्य भी लिखे गये हैं, पर मुक्तक काव्यों की तुलना में उनकी संख्या नगण्य ही है। ५. ब्रजभाषा की प्रधानता—इस काल में ब्रजभाषा के प्रयोग को ही कवियों ने अधिक महत्त्व दिया और समूचे रीति-कालीन काव्य में इसी भाषा का बोलबाला रहा। इस प्रयोगाधिक्य से ब्रजभाषा को भी नई शक्ति, नई सजीवता एवं नई प्राणवत्ता मिली। ६. जीवन-दर्शन का अभाव—रीतिकालीन कवियों के समक्ष यथार्थ जीवन का कोई महत्त्व नहीं था और न जीवन की सम्पूर्णता ही उन्हें वांछित
६ रसखान-ग्रन्थावली थी । वे तो जीवन के केवल उसी भाग को ग्रहण करते थे जिसमें कल्पनाओ की उड़ाने और वासना की थिरकनें थी, युवावस्था से युक्त जीवन ही रीतिकालीन कवियो का प्रतिपाद्य था । प्रो० भगीरथ मिश्र के शब्दो मे— 'ऐसे लगता है कि रीति कविता के रचियता यौवन और वसन्त के कवि है । जीवन का फूलता हुआ सुघर रूप ही उन्हें प्रिय है । पतझड, सघर्ष और विनाश सम्भवत स्वतः जीवन मे इतने घोर रूप मे विद्यमान था कि कवि काव्य मे भी उसको उतारकर नैराश्य और निवृत्ति की भावना को जगाना नही चाहता है । वह तो फूलते-फलते जीवन का भ्रमर है । उसने जीवन का एक ही स्वरूप लिया, एक ही पक्ष लिया, यह इस धारा के कवि की संकीर्णता है, दुर्बलता है, और एकागिता है, परन्तु जिस पक्ष को उसने लिया है उसके चित्रण मे उसने कोई कसर उठा नही रखी । उसके समस्त वैभव और विलास के चित्रण मे उसने कलम तोड़ दी है ।' यही कारण है कि रीतिकालीन कवि के पास न तो कोई स्वस्थ जीवन है और न कोई जीवन-दर्शन है । रीतिकाल की दूसरी काव्यधारा रीतिमुक्त कवियो की है । घनानंद, आलम, बोधा, रसखान आदि इस धारा के प्रमुख कवि है । ये कवि न तो किसी परम्परा से सबद्ध है और न किसी काव्यशास्त्रीय नियमन से । ये भावावेश के कवि है। इनके मन मे जो भी भाव स्फुरित होता है, उसे ये अत्यन्त सबल एव प्रभावोत्पादक अभिव्यंजना के माध्यम से प्रकट करते है । इनके अपने सिद्धात, अपनी रीति और अपनी अभिव्यंजना शैली है । इनको तो वही व्यक्ति समझ सकता है जो ब्रजभाषा का अधिकारी विद्वान् होने के साथ-साथ महास्नेही हो । रसखान का सम्बन्ध इसी धारा से है, अतः इस धारा का परि- चय प्राप्त करना आवश्यक है । भक्ति के युग के पवित्र ब्रह्मद्रव की धारा को पार कर जब हिन्दी के कवियो ने तनिक सामने की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाई तो हरे-हरे लता-कुंजो, कदम्ब के घने वृक्षों तथा हरियाली से भरे फूलों वाली निर्मल जल की धारा ने उनके मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया, फिर क्या था, वही उनका मन "श्याम ह्वै समान्यो, यमुना यमुन जल तरंग मे" कवियो के लिए कविता का एक नया सुन्दर मार्ग मिल गया । यहाँ कविता की शैली में एक
समीक्षा भाग ७ नूतन परम्परा का आविष्कार हुआ । आगे चलकर इस नवीन परम्परा को रीतिकाल के नाम से अभिहित किया गया । हिन्दी-साहित्य का यह रीतिकाल सभी दृष्टियो से ऊँचा और आदर्श माना जाता है । इस युग मे कविता करने की एक ऐसी प्रणाली बन गई, जिसका अवलम्ब सभी परवर्ती कवियो ने लिया । सच पूछा जाए तो भाषा, शैली और विषय तीनो दृष्टियो से यह काल एक ऐसा राजमार्ग बना, जिस पर चलकर तत्कालीन कवियो को कविता करने मे विशेष सुविधाएँ मिली । इस युग मे कविता-पद्धति के हम दो विभिन्न रूप देखते हैं । एक रीतियुक्त और दूसरा रीतिमुक्त । रीतियुक्त कवियो ने काव्य के लक्षण-ग्रन्थो के आधार पर कविताएँ लिखी पर रीतिमुक्त कवियो ने स्व- तन्त्र रूप से अपनी रचनाएँ उपस्थित की । इन कवियो मे से प्रमुख कवि घनानन्द थे । सच पूछा जाए तो इन कवियो की स्थिति रीतिकाल मे उसी प्रकार की थी जिस प्रकार कमल की स्थिति जल मे होती है । सूक्ष्म रूप से इनके काव्य का अध्ययन करने से इस बात की प्रामाणिकता स्पष्ट हो जाती है । रीतिकालीन कविता का राजमार्ग आद्योपान्त शृंगार रस से अभिसिंचित है, इसमे संभवत तो किसीको भी सन्देह नही, पर रीतिमुक्त कवियो ने इस पथ पर जहाँ तक सचरण किया भक्ति के, अगर, धूप, चन्दन से उसे पवित्र कर दिया । इनकी कविता केवल शृंगार की वशी-ध्वनि ही नही, अपितु भक्ति की खञ्जडी भी मुखरित सुनाई पडती है । इन्होने शृंगार के साथ भक्ति का मिश्रण करके बिहारी के 'श्याम हरित द्युति होय' से कुछ कम कमाल नही किया । दो शब्दो मे यदि हम रीतिमुक्त कवियो को रीति पर- म्परावादी कवियो मे भक्त कवि मान ले तो अधिक युक्तिसंगत होगा । इस परम्परा के अन्तर्गत घनानन्द, बोधा, आलम, निवाज, ठाकुर आदि प्रमुख हैं । इस धारा के कवियो के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ या सामान्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:— १. काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत निजी जीवन :—यद्यपि इन कवियों मे से कुछ का संबंध विभिन्न राजाओं के दरबार से भी रहा । किन्तु फिर भी इन्होंने केवल अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के
८ रसखान-ग्रन्थावली लिए काव्य-रचना नही की । इनकी काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत इनका वैयक्तिक जीवन ही था । इन्होने अपने जीवन मे प्रेम और विरह की ऐसी अनुभूतियाँ प्राप्त की जिन्होने इनको काव्य-रचना के लिए विवश कर दिया । यह कविता नही लिखते थे, अपितु कविता स्वत ही इनकी अनुभूतियो से प्रेरित होकर उच्छ्वसित हो जाती थी । घनानन्द ने लिखा है— “लोग है लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत ।” इसी प्रकार इस धारा से अन्य कवियो ने भी प्रयत्नपूर्वक कविता नही लिखी, अपितु उसमे उनकी भावनाओ के सहज स्वाभाविक उद्गार हैं । इनके बहुत से समकालीन कवि रीति के लक्षणो को ध्यान मे रखकर कविता करते थे, जो इन्हे पसन्द न थी । ठाकुर ने ऐसे कवियो की आलोचना करते हुए लिखा है— “सीखि लीनो मीन मृग खंजन, कमल नयन, सीखि लीनो जस और प्रताप को कहानो है ।” इससे स्पष्ट है कि इस धारा के कवियो ने कविता के वास्तविक महत्व को समझा था । यही कारण है कि इनकी कविता मे बाह्य शरीर के चित्रण के स्थान पर हृदय की सच्ची पुकार मिलती है । २ स्वच्छन्द प्रेमः—जो प्रेम समाज की मर्यादाओ के प्रतिकूल हो, उसे स्वच्छन्द प्रेम का नाम दिया जाता है । हिन्दी के इन कवियो का प्रेम भी स्वच्छन्द प्रेम की कोटि मे आता है । इन कवियो ने जाति, समाज और धर्म की अनुयायिनी ली । घनानन्द की सुजान, बोधा की सुभान, आलम की शेख, आदि नायिकाएँ जाति की मुसलमान थी । ऐसी स्थिति मे इन कवियो को प्रेम के क्षेत्र मे विविध कठिनाइयो का सामना करना पडा । मित्रो का उपहास, समाज की निन्दा और आश्रयदाताओ के विरोध का उन्हे सामना करना पडा । उन्हे जीवन मे अनेक कष्ट सहने पडे, किन्तु फिर भी वे अपने प्रेम-मार्ग से पीछे नही हटे । उनके प्रेम मे सच्चाई और एकोन्मुखता के दर्शन होते है । बोधा के शब्दो मे वे अपनी प्रेयसी के लिए संसार के वैभव को ठुकराने के लिए सहर्ष प्रस्तुत है— “एक सुभान के आनन पे, कुरबान जहाँ लगि रूप जहाँ को । जानि मिले तो जहान मिले, नहि जान मिले तो जहान कहाँ को ॥”
समीक्षा भाग ६ प्रेम की इसी अनन्यता के कारण इनके शृंगार वर्णन मे स्वच्छता, पवित्रता और गभीरता मिलती है जिसका रीतिबद्ध कवियो मे अभाव मिलता है। ३. सौन्दर्य का सूक्ष्म रूप मे चित्रण जहाँ रीतिबद्ध कवियो ने अपने काव्य मे नारी के स्थूल अंगो की नाप-जोख की है वहाँ इन्होने अपनी प्रेयसियो के सौन्दर्य का वर्णन अत्यंत सूक्ष्म रूप मे किया है। वह उनके नख-शिख का वर्णन न करके उसके स्थान पर सौन्दर्य की अनुभूतिपूर्ण झलक प्रस्तुत करते हैं। घनानन्द के अनुसार— "अंग अंग तरंग उठे द्युति की परि है मनु रूप अवै घर च्वै।" अर्थात् नायिका के प्रत्येक अंग से सौन्दर्य की लहरे उठ रही हैं। अभी इसका रूप धरती पर चू पड़ेगा। इसी भाँति वे स्थूल विशेषताओ के स्थान पर सूक्ष्म सौन्दर्य का चित्रण करते है। नायिका के होठो की लाली की अपेक्षा इन्हे उसकी मुस्कराहट अधिक आकर्षित करती है। देखिए— "छवि को सदन, गोरो वदन रुचिर भाल, रस निचुरत मृदु मीठी मुसक्यानि मे।" उसकी मीठी मुस्कराहट मे रस टपक रहा है। यह वाक्य हमे छायावादी सौन्दर्य पद्धति का स्मरण कराता है। यहाँ 'मीठी' का प्रयोग विशेषण विपर्यय के रूप मे हुआ है जो कि छायावाद की विशेषता मानी जाती है। इसी प्रकार अन्य कवियो ने भी सौन्दर्य का अंकन सूक्ष्म रूप मे ही किया है। ४. शृंगार के संयोग और वियोग पक्ष का चित्रण— स्वच्छन्द धारा के कवियो को विरह और मिलन दोनो मे प्रेमियो के हृदय के अन्त.स्थो को उद्घाटित करने की ही लगी रहती है। वैसे तो इन्होने शृंगार के दोनो स्थलो का चित्रण किया है, परन्तु इनकी मनोवृत्ति वियोग-पक्ष मे अधिक रमी है। प्रेम को ये लोग आन्तरिक और गोपनीय वस्तु मानते हैं। रीति मार्गीय कवियो की प्रेम-वक्रता के विरुद्ध ये लोग तो यह मानते है— "अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेक सयानप बाँध नही।" परन्तु सयोग मे बाहरी जगत की प्रधानता होती है और उस समय कवि की अन्तर-वृत्ति भी बहिर्मुखी होती है। ऐसी स्थिति मे प्रेम की सघनता व तर-
१० रसखान-ग्रन्थावली
लता अभिव्यक्त नही हो पाती । वियोग पक्ष मे कवि की दृष्टि अन्तर्मुखी होती है । वह प्रेमानुभूति को स्वय प्रेमी बनकर प्रकट करता है । अतः उसकी विरह- उक्तियाँ हृदय के अन्तस्तल से सच्ची प्रकार से प्रकट होती है । वह प्रेम की अतुल गहराइयो तक बैठने को आतुर रहता है । वियोग की अमिट प्यास हृदय को सदा द्रवित रखती है । विरह मे अनुभूति का स्वरूप अधिक तीव्र होता है । अतः उनकी विरह विषयक धारणा अधिक विलक्षण है । वस्तुत इनकी प्रेम तृपा सदा बढती ही रहती है । इनमे विरह का मार्मिक चित्रण है और निजी प्रेम की पीर का प्रदर्शन सच्चे रूप मे मिलता है । आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने इन कवियो को सूफियो से प्रभावित माना है । उनका यह विश्वास है कि इनके काव्यो मे वर्णित प्रेम-पीर फारसी काव्य-धारा का प्रभाव है जो कि सूफियो के माध्यम से आया है । उनके ही शब्दो मे "इन स्वच्छन्द कवियो ने फारसी काव्यगत वेदना की निवृत्ति के साथ इस प्रेम-पीर का स्वागत किया । इनकी रचना मे वियोग के आधिक्य का कारण यही है । लौकिक पक्ष मे इनका विरह निवेदन फारसी काव्य की वेदना की विवृत्ति से प्रभावित है और अलौकिक पक्ष मे सूफियो की प्रेम-पीर से ।" रीतिमुक्त कवियो ने विरह का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन नही किया है । वह नायिका को रीतिबद्ध कवियो की तरह इतनी जलती हुई नही दिखाता कि "उस पर गुलाब जल की शीशी औंधा दी जाए तो वह भाप बनकर उड़ जाएगी ।" परन्तु रीतिमुक्त कवि इन सब अन्तर्दशाओ का चित्रण आंतरिक शैली से करता है । इन्होने कृष्ण के सगुण सलौने रूप को अपने काव्य का विषय बनाया है, अत इन्होने कृष्ण और राधा के सयोग पक्ष के प्रेम की भी बडी मनोहारी और मार्मिक झाँकियाँ प्रस्तुत की है । इनका प्रेम वासना-पकिल न होकर स्वच्छ चमत्कार प्रदर्शन है । सक्षेप मे कहा जा सकता है कि इनका प्रेम वहिर्मुखी न होकर अन्तर्मुखी अधिक है । उसमे हृदय की मार्मिक सूक्ष्म अनुभूतियो और सौन्दर्य की महीन से महीन बारीकियाँ है । वस्तुतः ये प्रेम हृदय और सौन्दर्य के सच्चे पारखी है । ५ भक्ति का स्वरूप - इन कवियो ने राधा और कृष्ण की लीलाओ का उन्मुक्त गान किया है, किन्तु इतने भर से इन्हे कृष्णभक्त कवि सूरदास
समीक्षा भाग ११ आदि की कोटि में नही रखा जा सकता। क्योकि लगभग सभी रीतिकालीन कवियो का यह कथन है— आगे के सुकवि रीझि है तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है।' इनको शुद्ध रूप से भक्त कवि नही कहा जा सकता क्योकि इनका प्रमुख उद्देश्य शृंगार-वर्णन था। इसीलिए इन्होने भगवद् भक्ति की ओर से अश्लील एवं असंस्कृत चित्र प्रस्तुत किए। आचार्य विश्वनाथप्रसाद के अनुसार पहले इनकी रुचि रीतिबद्ध रचना की ओर दिखाई देती है। दूसरे रूप मे इन्होने स्वच्छन्द रूप से प्रेम के पवित्र क्षेत्र में पदार्पण किया। तीसरे मे इनकी रचनाएँ भक्तिपरक हो गईं।" आगे वह लिखते हैं कि यदि भक्त कहे बिना सतोष न मिले तो इन्हे उन्मु- क्त भक्त कवि मान लिया जा सकता है। इनका भक्त कवियो से पार्थक्य इनकी स्वच्छन्द प्रकृति द्वारा ही हो जाता है। दूसरा इन्होने भक्त कवियो द्वारा त्याज्य विषयों को "प्रिय की वास्तविक कठोरता" आदि का वर्णन विस्तार से किया है। इनकी भक्ति मे साम्प्रदायिकता एव संकीर्णता की भावना नही है। उन्होने अनेक देवी-देवताओ के प्रति उदार आस्था प्रदर्शित की है। रसखान और घना- नंद को ही इस भक्त कोटि मे रखा जा सकता है। ६. प्रकृति चित्रण—प्रायः सभी कवियो ने हिन्दी-साहित्य के प्रथम तीन कालो मे प्रकृति-चित्रण को उपेक्षित रखा है। परन्तु रीतिकाल मे दृष्टि शृंगारपरक होने के कारण शृंगारिक चित्रण मे अधिक रमी इसलिए उनकी दृष्टि भी इसके वर्णन से दूर हट गई। रीतिकाल मे प्रकृति का चित्रण उद्दीपन रूप मे हुआ है। सेनापति की रचना मे प्रकृति कही-कही उद्दीपन के वधन से मुक्त अवश्य मिल जाती है। विरह वारीश मे बोधा मे प्रकृति वर्णन कुछ तो गास्त्र वद्ध और कुछ स्वच्छन्द वृतिबद्ध रखा है। ७. लोक-जीवन का ग्रहण — स्वच्छन्दमार्गी कवियों ने लोक-जीवन के मगल मोद पक्ष को भी लिया है। प्रसिद्ध पर्व त्यौहारो पर रीतिमुक्त शैली में उत्तम रचनाएँ की है। अखतीज, हरियाली तीज, झूला, वट पूजन आदि अनेक त्यौहार ठाकुर के काव्य मे वर्णित हुए है। ८. काव्य पद्धतिः—स्वच्छन्द कवियों ने रीति का निर्वाह आरम्भ में स्वीकृत
१२ रसखान-ग्रन्थावली करके बाद मे त्याग दिया । रीतियुक्त, रीतिबद्ध सभी कवियो मे नेत्र व्यापार सम्बन्धी सभी उक्तियाँ समान रूप से पाई जाती हैं। राजाश्रित कवि ने तो उर्दू या फारसी के काव्यरचना के रकीबो और माशूको की जोड-तोड मे खण्डिता को पेश किया । यहाँ पर ये कुछ रीतिबद्ध कवियो के समीप आ जाते हैं। स्वच्छन्द कवियो ने खंडिता नायिका के द्योतक चिन्हो के ब्योरे प्रस्तुत न करके उसके हृदय को दिखलाने का प्रयत्न किया । सुरतात या विपरीत रति के कुत्सित चित्र प्रायः इन कवियो मे नही मिलते हैं। जो मिलते हैं वह भी उस समय के जब इन कवियो ने इस मैदान प्रवेश किया था । बोधा मे कही-कही बाजारू ढग अवश्य मिलता है । ६. मुक्तक शैली :- वैसे तो समूचे रीतिकाल मे मुक्तक शैली की ही प्रधानता पाई जाती है । परन्तु फिर भी कभी-कभी फुटकल रूप मे प्रबन्ध काव्यो की रचना होती रही । आलम ने "माधवानल' 'कामकदला' 'सुदामा चरित्र' और श्याम स्नेही, बोधा ने 'विरह वारीश' नामक प्रबन्ध काव्य प्रस्तुत किए । १०. छन्दालंकार :- इस धारा मे अधिकांशतः कवित्त, सवैया और दोहा जैसे छन्दो का प्रयोग किया गया । यद्यपि बीच-बीच मे छप्पय, व रवै हरिपद आदि छन्दो का प्रयोग किया गया है किन्तु सभी रीति-कवियो की वृत्ति अधिकतर दोहा-सवैया और कवित्त मे रमी है। रीतिमुक्त धारा के कवियो ने अलकारो का प्रयोग अपने प्रकृत रूप मे किया है। इनके यहाँ अल- कार साधन रूप मे आए हैं न कि साध्य के रूप मे । ११ भाषा :- भाषा का परिमार्जन और व्यवस्थापन भी इन स्वच्छन्द कवियो के द्वारा ही हुआ है। क्योकि रीतिबद्ध कवियो के पास इतना अवकाश होते हुए भी उन्होने भाषा को व्यवस्थित करने का प्रयास नही किया । मति- राम और पद्माकर को छोडकर दूसरे कवियो मे भाषा की सफाई के दर्शन नही होते । भूषण और देव आदि ने स्वेच्छा से शब्दो को तोडा-मरोडा है। इनकी भाषा मे प्रादेशिकता की पुट भी बनी रही । परन्तु रीतिमुक्त कवियो मे न तो भाषा के अंग भंग की प्रवृत्ति और न ही प्रादेशिकता का ही पुट है। रसखान और घनानन्द ने तो ब्रज भाषा का ऐसा प्रयोग किया है जिसमे ब्रज भाषा
समीक्षा भाग १३ का साहित्यिक परिनिष्ठित रूप स्वीकृत और मुहावरो का भो सुन्दर प्रयोग हुआ है। अन्त मे हम कह सकते है कि इनकी कविता सच्ची अनुभूति से पूर्ण है । भावपक्ष और कलापक्ष दोनो की दृष्टि से इनका काव्य प्रौढ़ है । यदि हम इस काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि घनानन्द को हिन्दी श्रृंगारी कवियो में सर्वश्रेष्ठ मानें तो अनुचित नही होगा ।