ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
अरमस्मै भवति यामहूता उतापरीषु कृणुते सखायम्.. (३)
जो दुर्बल व्यक्ति अन्न की अभिलाषा से घूमता है, उसे अन्न देने वाला ही दाता है.
उसीको यज्ञ का पर्याप्त फल मिलता है तथा वह शत्रुओं में भी मित्र खोज लेता है. (३)
न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः.
अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्.. (४)
जो व्यक्ति सदा साथ रहने वाले एवं सेवा करने वाले मित्र को भी अन्न नहीं देता, वह
व्यक्ति मित्र नहीं है. ऐसे व्यक्ति के पास से दूर चला जाना ही उत्तम है. उसका घर घर नहीं है,
उसी समय अन्य धनी दाता के यहां चले जाना चाहिए. (४)
पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यानद्राघीयांसमनु पश्येत पन्थाम्.
ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः.. (५)
याचना करने वाले के लिए धनी को धन अवश्य देना चाहिए. वह धर्मरूपी लंबा मार्ग
प्राप्त करता है. जिस प्रकार रथ का पहिया ऊपर-नीचे होता रहता है, उसी प्रकार धन भी
एक व्यक्ति के पास से दूसरे के पास जाता है. (५)
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य.
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी.. (६)
मन में दान की भावना न रखने वाला व्यक्ति व्यर्थ ही अन्न प्राप्त करता है. ऐसे व्यक्ति
का भोजन उसकी मृत्यु के समान है. जो न देवताओं को पुष्ट बनाता है और न सखा को
खिलाता है, ऐसा स्वयं भोजन करने वाला व्यक्ति केवल पापी होता है. (६)
कृषन्नित्फाल आशितं कृणोति यन्नध्वानमप वृङ्क्ते चरित्रैः.
वदन्ब्रह्मावदतो वनीयान्पृणन्नापिरपृणन्तमभि ष्यात्.. (७)
हल खेती का काम करता हुआ अन्य उत्पन्न करता है. वह मार्गों पर चलता हुआ अपने
कार्यों से अन्न उत्पन्न करता है. जिस प्रकार मंत्र बोलने वाला मंत्र न बोलने वाले से श्रेष्ठ है,
उसी प्रकार दान देने वाला दान न देने वाले से उत्तम है. (७)
एकपाद्भूयो द्विपदो वि चक्रमे द्विपात्त्रिपादमभ्येति पश्चात्.
चतुष्पादेति द्विपदामभिख्वरे संपश्यन्पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः.. (८)
संपत्ति का एक भाग रखने वाला संपत्ति के दो भागों के स्वामी के पास मांगने जाता है.
इसके बाद दो भाग संपत्ति रखने वाला तीन भाग संपत्ति रखने वाले के पास जाता है. चार
भाग संपत्ति रखने वाला अपने से दूने के पास जाता है. इसी प्रकार पंक्तिबद्धरूप में छोटा
बड़े के पास मांगने जाता है. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—११८ देवता—राक्षस नाशक अग्नि
समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते.
यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः.. (९)
हमारे समान रूप वाले दोनों हाथों की धारण शक्ति समान नहीं है. एक ही माता से
उत्पन्न गाएं बराबर दूध नहीं देतीं. जुड़वां भाइयों का पराक्रम एक जैसा नहीं होता. एक
परिवार में जन्म लेने वाले दो व्यक्ति बराबर दान नहीं करते. (९)
सूक्त—११८ देवता—राक्षस नाशक अग्नि
अग्ने हंसि न्य१त्रिणं दीद्यन्मर्त्येष्वा. स्वे क्षये शुचिव्रत.. (१)
हे पवित्र व्रत वाले अग्नि! तुम मनुष्यों के मध्य अपने स्थान पर प्रज्वलित होकर शत्रुओं
का नाश करो. (१)
उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे. यत्त्वा सुचः समस्थिरन्.. (२)
हे शोभन आहुति वाले अग्नि! तुम उठते हो और घी पाकर प्रसन्न होते हो. तुम्हारे लिए
सुच उठाए जाते हैं. (२)
स आहुतो वि रोचतेऽग्निरीळेन्यो गिरा. सुचा प्रतीकमज्यते.. (३)
बुलाए गए एवं स्तुतियों द्वारा प्रशंसा योग्य अग्नि प्रज्वलित होते हो. एवं सभी देवों से
पहले घी के द्वारा सींचे जाते हैं. (३)
घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः. रोचमानो विभावसुः.. (४)
घृतयुक्त अवयव वाले अग्नि घृतरूपी हव्य से सिंचते हैं. वे स्तुतियों द्वारा रोचमान एवं
दीप्ति वाले हैं. (४)
जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन. तं त्वा हवन्त मर्त्याः.. (५)
हे देवों का हव्य वहन करने वाले अग्नि! तुम स्तोताओं द्वारा प्रशंसित होकर प्रज्वलित
होते हो, मनुष्य तुम्हें बुलाते हैं. (५)
तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत. अदाभ्यं गृहपतिम्.. (६)
हे मनुष्यो! घृत द्वारा मरणरहित, अपराजेय एवं गृहपति अग्नि की सेवा करो. (६)
अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह. गोपा ऋतस्य दीदिहि.. (७)
हे अग्नि! अपने अपराजेय तेज के द्वारा तुम राक्षसों को जलाओ एवं धन के रक्षक
ebook converter DEMO Watermarks*
बनकर दीप्तिधारक बनो. (७)
स त्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः. उरुक्षयेषु दीद्यत्.. (८)
हे अग्नि! तुम अपने अद्वितीय तेज द्वारा राक्षसों को समाप्त करो. तुम अपने सभी
स्थानों में दीप्तिशाली बनो. (८)
तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे. यजिष्ठं मानुषे जने.. (९)
अनेक यजमानों वाले हव्यवहनकर्त्ता एवं मानव समूह में सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता अग्नि
को स्तुति के साथ प्रज्वलित किया जाता है. (९)
सूक्त—११९ देवता—लवरूपी इंद्र
इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयामिति. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१)
मेरी इच्छा है कि मैं भी गाय और घोड़े का दान करूं. मैं कई बार सोमरस पी चुका हूं.
(१)
प्र वाताइव दोधत उन्मा पीता अयंसत. कुवित्सोमस्यापामिति.. (२)
पिया हुआ सोमरस मुझे उसी प्रकार कंपित करता एवं ऊपर उठाता है, जिस प्रकार
वायु को कंपाता है. मैं कई बार सोमरस पी चुका हूं. (२)
उन्मा पीता अयंसत रथमश्वा इवाश्वः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (३)
पिए हुए सोमरस ने मुझे इस प्रकार ऊपर उठाया है, जिस प्रकार तेज चाल वाले घोड़े
रथ को ऊपर उठाते हैं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (३)
उप मा मतिरस्थित वाश्रा पुत्रमिव प्रियम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (४)
जिस प्रकार गाय रंभाती हुई बछड़े के पास जाती है, उसी प्रकार स्तुतियां मेरे पास
आती हैं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (४)
अहं तष्टेव वन्धुरं पर्यचामि हृदा मतिम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (५)
त्वष्टा जिस प्रकार रथ में सारथि के बैठने का स्थान बनाता है, उसी प्रकार मैं स्तोता के
मन में स्तुति उत्पन्न करता हूं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (५)
नहि मे अक्षिपच्चनाच्छान्त्सुः पञ्च कृष्टयः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (६)
पंचजन मेरे दृष्टिपात से बच नहीं सकते. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*
नहि मे रोदसी उभे अन्यं पक्षं चन प्रति. कुवित्सोमस्यापामिति.. (७)
द्यावा-पृथिवी मेरे एक भाग के भी समान नहीं हैं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं.
(७)
अभि द्यां महिना भुवमभी३मां पृथिवीं महीम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (८)
मैंने अपने महत्त्व से द्यौ एवं विशाल धरती को पराजित किया है. मैं अनेक बार
सोमपान कर चुका हूं. (८)
हन्ताहं पृथिवीमिमां नि दधानीह वेह वा. कुवित्सोमस्यापामिति.. (९)
मैं धरती को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख सकता हूं. मैं अनेक बार
सोमपान कर चुका हूं. (९)
ओषमित्पृथिवीमहं जङ्घनानीह वेह वा. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१०)
मैं अपने तेज से धरती अथवा अन्य स्थान को जला सकता हूं. मैं अनेक बार सोमपान
कर चुका हूं. (१०)
दिवि मे अन्यः पक्षोऽधो अन्यमचीकृषम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (११)
मेरा एक भाग स्वर्ग में है एवं दूसरा मैंने धरती पर स्थिर किया है. मैं अनेक बार
सोमपान कर चुका हूं. (११)
अहमस्मि महामहोऽभिनभ्यमुदीषितः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१२)
मैं अतिशय महान हूं तथा सूर्यरूप से आकाश में अभिगत हूं. मैं अनेक बार सोमपान
कर चुका हूं. (१२)
गृहो याम्यरङ्कृतो देवेभ्यो हव्यवाहनः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१३)
मैं हवि ग्रहण करता हूं, यजमानों द्वारा सुशोभित हूं एवं देवों के लिए हव्य वहन करता
हूं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (१३)
सूक्त—१२० देवता—इंद्र
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेष्णृम्णः.
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः.. (१)
इस भुवन में वही बड़ा था, जिससे उग्र एवं प्रदीप्त बल वाले सूर्यरूपी इंद्र उत्पन्न हुए हैं.
ebook converter DEMO Watermarks*
जो इंद्र जन्म के साथ ही शत्रुविनाश करने लगे, सभी देवता उनका स्वागत करते हैं. (१)
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासस्य भियसं दधाति.
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२)
बल से बढ़ते हुए, अधिक शक्तिशाली एवं शत्रुहंता इंद्र दासों के मन में अधिक भय
उत्पन्न करते हैं. प्राणयुक्त एवं प्राणहीन पदार्थ इंद्र के द्वारा संशोधित होते हैं. हे इंद्र! तुम्हारी
प्रसन्नता उत्पन्न होने पर सभी पोषित प्राणी स्तुति हेतु एकत्र होते हैं. (२)
त्वे क्रतुमपि वृञ्जन्ति विश्वे द्विर्यदेते त्रिर्भवन्त्यूमाः.
स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३)
हे इंद्र! सभी यजमान अपना यज्ञ तुम पर समाप्त करते हैं. तुम्हें तृप्त करने वाले लोग
पत्नी के रूप में दोगुने एवं संतान के रूप में तिगुने बनते हैं. तुम घर, धन आदि से, प्रिय पत्नी
से उत्पन्न परम प्रिय संतान से हमें मिलाओ. हमारी प्रिय संतान को उससे भी अधिक नातियों
आदि से क्रीड़ित करो. (३)
इति चिद्धि त्वा धना जयन्तं मदेमदे अनुमदन्ति विप्राः.
ओजीयो धृष्णो स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन्यातुधाना दुरेवाः.. (४)
हे इंद्र! तुम जब-जब सोमपान के बाद शत्रु के धनों को जीतकर प्रसन्न होते हो, तब-तब
तुम्हारे बाद मेधावी जल हर्षित होते हैं. हे शत्रुनाशक इंद्र! हमें अधिक शक्ति वाला धन दो,
दुर्गतियां एवं राक्षस तुम्हें बाधा न पहुंचावें. (४)
त्वया वयं शाशद्महे रणेषु प्रपश्यन्तो युध्येन्यानि भूरि.
चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा अनुगृहीत होकर हम शत्रुओं का खूब नाश करें एवं युद्धों में युद्ध के
योग्य बहुत से आयुधों को जानते हुए तुम्हारे वज्र आदि को शत्रुओं की ओर प्रेरित करें. हम
तुम्हारे लिए मंत्रोच्चारण के साथ-साथ अन्न का संस्कार करते हैं. (५)
स्तुषेय्यं पुरुवर्पसमृभ्वमिनतममाप्त्यमाप्त्यानाम्.
आ दर्षते शवसा सप्त दानून्प्र साक्षते प्रतिमानानि भूरि.. (६)
जो इंद्र अपनी शक्ति से वृत्र आदि सात राक्षसों को मारते हैं एवं जो राक्षसों के बहुत से
स्थानों को प्राप्त करते हैं. हम उन्हीं स्तुतियोग्य अनेक रूप वाले दीप्तिशाली, स्वामी एवं परम
विश्वसनीय इंद्र की स्तुति करते हैं. (६)
नि तद्दधिषेऽवरं परं च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे.
आ मातरा स्थापयसे जिगत्नू अत इनोषि कर्वरा पूरूणि.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! यजमान के जिस घर में तुम हव्यरूप अन्न से तृप्त होते हो, उस में सांसारिक एवं
दिव्य धन स्थापित करते हो. तुम सबके निर्माणकर्त्ता द्यावा-पृथिवी को गतिशील रखते हो,
इसलिए अनेक लौकिक व वैदिक कर्मों को प्राप्त करते हो. (७)
इमा ब्रह्म बृहद्दिवो विवक्तीन्द्राय शूषमग्रियः स्वर्षाः.
महो गोत्रस्य क्षयति स्वराजो दुरश्च विश्वा अवृणोदप स्वाः.. (८)
बृहद्दिव नामक ऋषि सुखपूर्वक इंद्र के लिए इन मंत्रों को बोलते हैं. ऋषियों में प्रमुख
एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले इंद्र महान् एवं स्वयंप्रकाशित पर्वतों को अपने बल से हराते हैं तथा
बल असुर द्वारा बंद सभी द्वार खोलते हैं. (८)
एवा महान्बृहद्दिवो अथर्वावोचत्स्वां तन्व१मिन्द्रमेव.
स्वसारो मातरिभ्वरीररिप्रा हिन्वन्ति च शवसा वर्धयन्ति च.. (९)
अधिक गुणों वाले, अथर्वा के पुत्र बृहद्दिव ने अपनी विशाल स्तुति केवल इंद्र के प्रति ही
निवेदित की है. पापरहित नदियां यज्ञों का साधन बनकर इंद्र को प्रसन्न करती हैं तथा अपनी
शक्ति से उन्हें बढ़ाती हैं. (९)
सूक्त—१२१ देवता—प्रजापति
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१)
परमात्मा से सबसे पहले प्रजापति उत्पन्न हुए. वे उत्पन्न होते ही सब जगत् के स्वामी
बने. उन्होंने धरती एवं इस द्यौ को धारण किया. हम पुरोडाश आदि के द्वारा दिव्य प्रजापति
की सेवा करें. (१)
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२)
जो प्रजापति आत्माओं तथा बलों को देने वाले हैं, सभी विश्व के प्राणी जिनकी आज्ञा
को शिरोधार्य करते हैं. मरण एवं अमरता जिनकी छाया है, हम उन्हीं दिव्य प्रजापति की
पुरोडाश आदि से सेवा करते हैं. (२)
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव.
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३)
जो अपने महत्त्व से सांस लेने वाले, पलक झपकाने वाले एवं गतिशील प्राणियों के
एकमात्र राजा हुए हैं, जो दो पैरों वाले मानवों एवं चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, उन्हीं
ebook converter DEMO Watermarks*
प्रजापति की पूजा हम हव्य द्वारा करें. (३)
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः.
यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
जिसकी महिमा से ये हिम वाले पर्वत उत्पन्न हुए हैं एवं यह सागर सहित धरती जिसकी
कही जाती है, ये सब दिशाएं जिसकी भुजाएं हैं, हम उन्हीं प्रजापति की हव्य द्वारा पूजा करें.
(४)
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृळ्हा येन स्वः स्तभितं येन नाकः.
यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (५)
जिन्होंने द्यौ एवं विस्तृत धरती को स्थिर किया है, जिन्होंने स्वर्ग तथा आदित्य को धारण
किया है एवं जो अंतरिक्ष में जल को बनाने वाले हैं, उन्हीं प्रजापति की पूजा हम हव्य द्वारा
करें. (५)
यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने.
यत्राधि सूर उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६)
जिन्होंने रक्षा के विचार से शब्द करती हुई द्यावा-पृथिवी को स्थिर किया एवं दीप्तियुक्त
इन दोनों को महिमा वाला समझा, जिनके आधार के कारण उदित हुआ सूर्य प्रकाशित होता
है, हम उन्हीं प्रजापति की पूजा हव्य द्वारा करें. (६)
आपो ह यद् बृहतीर्विश्वमायन्गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम्.
ततो देवानां समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (७)
विस्तृत जल ने सारे संसार को ढक लिया था, जल ने गर्भ धारण करके अग्नि, आकाश
आदि को जन्म दिया. इसके बाद देवों का एकमात्र रक्षक उत्पन्न हुआ. हम हव्य द्वारा उन्हीं
प्रजापति की पूजा करते हैं. (७)
यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद्दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्.
यो देवेष्वधि देव एक आसीत्कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (८)
प्रजापति को धारण करने वाले एवं यज्ञ को उत्पन्न करने वाले जल को प्रजापति ने
अपने महत्त्व से देखा. जो सभी देवों के मध्य एकमात्र देव हुए, हम उन्हीं प्रजापति की हव्य
द्वारा सेवा करें. (८)
मा नो हिंसीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिवं सत्यधर्मा जजान.
यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*
जो धरती को जन्म देने वाले हैं अथवा जिस सत्य धर्म वाले ने स्वर्ग को उत्पन्न किया है
एवं जिन्होंने आनंदवर्धक विस्तृत जल को उत्पन्न किया है, वे हमारी हिंसा न करें. हम हव्य
द्वारा उन्हीं प्रजापति की सेवा करें. (९)
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१०)
हे प्रजापति! तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कोई भी इन समस्त उत्पन्न भूतों को अधीन नहीं
कर सका. हम जिस कामना से तुम्हारा हवन करते हैं, वह हमें प्राप्त हो तथा हम धनों के
स्वामी बनें. (१०)
सूक्त—१२२ देवता—अग्नि
वसुं न चित्रमहसं गृणीषे वामं शेवमतिथिमद्विषेण्यम्.
स रासते शुरुधो विश्वधायसोऽग्निर्होता गृहपतिः सुवीर्यम्.. (१)
मैं सूर्य के समान विचित्र तेज वाले, रमणीय, सुखकारक, अतिथि के समान पूज्य व
द्वेषरहित अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि विश्व धारण करने वाली तथा शोकनाशिनी गाएं एवं
शोभन-वीर्य यजमानों को देते हैं. वे होता एवं गृहपति हैं. (१)
जुषाणो अग्ने प्रति हर्य मे वचो विश्वानि विद्वान् वयुनानि सुक्रतो.
घृतनिर्णिग्ब्रह्मणे गातुमेरय तव देवा अजनयन्ननु व्रतम्.. (२)
हे अग्नि! तुम तृप्त होकर मेरे स्तोत्र की कामना करो. हे उत्तम कर्म करने वाले अग्नि!
तुम सभी जानने योग्य बातें जानते हो, तुम घृत की आहुति पाकर स्तोता को सामगान की
आज्ञा दो. देवगण तुम्हारा कार्य देखकर अपना-अपना कर्त्तव्य करते हैं. (२)
सप्त धामानि परियन्नमर्त्यो दाशद्वाशुषे सुकृते मामहस्व.
सुवीरेण रयिणाग्ने स्वाभुवा यस्त आनट् समिधा तं जुषस्व.. (३)
हे सात स्थानों को व्याप्त करने वाले व मरणरहित अग्नि! तुम उत्तम दान करने वाले
एवं शोभन यज्ञकर्त्ता यजमान को धन दो. जो समिधा द्वारा तुम्हें बढ़ाता है, उसके पास उत्तम
संपत्ति एवं संतान लेकर जाओ. (३)
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितं हविष्मन्त ईळते सप्त वाजिनम्.
शृण्वन्तमग्निं घृतपृष्ठमुक्षणं पृणन्तं देवं पृणते सुवीर्यम्.. (४)
हव्य धारण करने वाले यजमान यज्ञ के ज्ञापक, देवों में प्रमुख, हितकारकों में श्रेष्ठ एवं
सात अश्वों के स्वामी अग्नि की स्तुति करते हैं. अग्नि घी की आहुति पाकर प्रार्थना सुनते हैं
ebook converter DEMO Watermarks*
एवं अभीष्ट फल देते हैं. वे दान करने वाले को उत्तम बल देते हैं. (४)
त्वं दूतः प्रथमो वरेण्यः स हूयमानो अमृताय मत्स्व.
त्वां मर्जयन्मरुतो दाशुषो गृहे त्वां स्तोमेभिर्भृगवो वि रुरुचुः.. (५)
हे अग्नि! तुम दूत, सर्वश्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हो. तुम बुलाए जाने पर अमरता देने
के लिए प्रसन्न बनो. दाता के घर में मरुद्गण तुम्हें सुशोभित करते हैं एवं भृगुवंशी ऋषि
स्तोत्रों द्वारा तुम्हें दीप्तिशाली बनाते हैं. (५)
इषं दुहन्त्सुदुघां विश्वधायसं यज्ञप्रिये यजमानाय सुक्रतो.
अग्ने घृतस्नुस्त्रिर्ऋतानि दीद्यद्वर्तिर्यज्ञं परियन्त्सुकतूयसे.. (६)
हे शोभन कर्म वाले अग्नि! यज्ञ में संलग्न यजमान के लिए विश्व को तृप्त करने वाली
और यथेष्ट दूध देने वाली गाय से यज्ञफल को दुहो. तुम घृत की आहुति पाकर तीनों लोकों
को प्रकाशित करते हुए यज्ञशाला में सर्वत्र वर्तमान हो, गतिशील हो एवं शोभन यज्ञ के समान
आचरण करते हो. (६)
त्वामिदस्या उषसो व्युष्टिषु दूतं कृण्वाना अयजन्त मानुषाः.
त्वां देवा महयाय्याय वावृधुराज्यमग्ने निमृजन्तो अध्वरे.. (७)
मनुष्य प्रातःकाल होते ही तुम्हें दूत बनाकर यज्ञ करते हैं. हे अग्नि! देवगण यज्ञ में तुम्हें
घृत के द्वारा प्रज्वलित करके पूजा के लिए बढ़ाते हैं. (७)
नि त्वा वसिष्ठा अह्वन्त वाजिनं गृणन्तो अग्ने विदथेषु वेधसः.
रायस्पोषं यजमानेषु धारय यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे अग्नि! वसिष्ठपुत्र यज्ञों में अनुष्ठान आरंभ करके तुम्हारी स्तुति करते हैं एवं अन्न
प्रदान करते हैं. तुम यजमानों के घरों में अधिक अन्न रखो एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी
सदा रक्षा करो. (८)
सूक्त—१२३ देवता—वेन
अयं वेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने.
इममपां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति.. (१)
ज्योति द्वारा घिरे हुए वेन नामक देव आकाश में सूर्यकिरणों से उत्पन्न जल को धरती
पर गिराते हैं. सूर्य के साथ जल के मिलन के समय स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा वेन की
अर्चना इस प्रकार करते हैं, जिस प्रकार माता-पिता बच्चों को गीतों से प्रसन्न करते हैं. (१)
समुद्रादूर्मिमुदियर्ति वेनो नभोजाः पृष्ठं हर्यतस्य दर्शि.
ऋतस्य सानावधि विष्टपि भ्राट् समानं योनिमभ्यनूषत व्राः.. (२)
वेन आकाश से जल की लहरों को गिराते हैं. आकाश में उज्ज्वल मूर्ति वाले वेन की
पीठ दिखाई देती है. वेन जल के ऊंचे स्थान आकाश में दीप्ति पाते हैं. वेन के अनुचरों ने
उनके उत्पत्तिस्थान आकाश को शब्द से भर दिया है. (२)
समानं पूर्वीरभि वावशानास्तिष्ठन्वत्सस्य मातरः सनीळाः.
ऋतस्य सानावधि चक्रमाणा रिहन्ति मध्वो अमृतस्य वाणीः.. (३)
चारों ओर शब्द करते हुए व बछड़े के समान विद्युत्-अग्नि की माता तुल्य जल वेन के
साथ आकाश में स्थिर रहता है. जल के उत्पत्तिस्थान उच्च आकाश में बहते हुए मधुर जल
का शब्द वेन को अलंकृत करता है. (३)
जानन्तो रूपमकृपन्त विप्रा मृगस्य घोषं महिषस्य हि ग्मन्.
ऋतेन यन्तो अधि सिन्धुमस्थुर्विदद्गन्धर्वो अमृतानि नाम.. (४)
मेधावियों ने महान् पशु के समान शब्द सुनकर वेन के रूप की कल्पना की. उन्होंने यज्ञ
से वेन को तृप्त करके जलसमूह को प्राप्त किया. जल के स्वामी वेन मरणरहित हैं. (४)
अप्सरा जारमुपसिष्मियाणा योषा बिभर्ति परमे व्योमन्.
चरत्प्रियस्य योनिषु प्रियः सन्तसीदत्पक्षे हिरण्यये स वेनः.. (५)
विद्युतरूपी स्त्री ने वेनरूपी पुरुष को देखकर मुसकुराते हुए उनका अंतरिक्ष में
आलिंगन किया. वेन ने प्रेमी के समान प्रेयसीरूपिणी बिजली की अभिलाषा पूरी करके सोने
के कक्ष में शयन किया. (५)
नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा.
हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्.. (६)
हे वेन! तुम सुनहरे पंखों वाले पक्षी के समान, स्वर्ग में उड़ने वाले, वरुण के दूत, विद्युत्-
अग्नि के स्थान अंतरिक्ष में पक्षीरूप में वर्तमान एवं विश्व का भरण करने वाले हो. सब लोग
हृदय में प्रेम रखते हुए तुम्हें देखते हैं. (६)
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्चित्रा बिभ्रदस्यायुधानि.
वसानो अतकं सुरभिं दृशे कं स्वर्ण नाम जनत प्रियाणि.. (७)
वेन जल धारण करने वाले एवं स्वर्ग के ऊंचे स्थान में रहते हैं एवं अपने चारों ओर
विचित्र आयुध धारण करते हैं. वे सूर्य के समान अपने सुंदररूप में चमकते हैं एवं सबके
अनुकूल जलों को उत्पन्न करते हैं. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२४ देवता—अग्नि
द्रप्सः समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन्गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन्.
भानुः शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (८)
जलयुक्त वेन अपना कर्म पूरा करते समय गृद्ध पक्षी के समान दूर तक देखते हुए
अंतरिक्ष की ओर जाते हैं. वे उज्ज्वल दीप्ति से प्रकाशित होकर तृतीय लोक अर्थात् आकाश
में सबके प्रिय जल का निर्माण करते हैं. (८)
सूक्त—१२४ देवता—अग्नि
इमं नो अग्न उप यज्ञमेहि पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम्.
असो हव्यवाळुत नः पुरोगा ज्योगेव दीर्घं तम आशयिष्ठाः.. (१)
हे अग्नि! तुम हमारे पांच नियामकों वाले, तीन प्रकार से अनुष्ठित एवं तीन होताओं
वाले यज्ञ में आओ. तुम हमारे हव्यवाहक बनो, हमारे पुरोगामी बनो एवं हमें छोड़कर अधिक
समय तक गुफा के अंधेरे में सोओ. (१)
अदेवाद्देवः प्रचता गुहा यन्प्रपश्यमानो अमृतत्वमेमि.
शिवं यत्सन्तमशिवो जहामि स्वात्सख्यादरणीं नाभिमेमि.. (२)
अग्नि ने कहा—
मैं देवों की प्रार्थना से गुहा में वर्तमान दीप्तिहीन दशा से दीप्ति को प्राप्त करके सबको
देखता हुआ अमरता प्राप्त करता हूं. भली प्रकार पूर्ण हुए यज्ञ को मैं प्रकाशित होकर छोड़ता
हूं एवं अपने चिरसखा व उत्पत्तिस्थान अरणि में चला जाता हूं. (२)
पश्यन्नन्यस्या अतिथिं वयाया ऋतस्य धाम वि मिमे पुरूणि.
शंसामि पित्रे असुराय शेवमयज्ञियाद्यज्ञियं भागमेमि.. (३)
मैं आकाश में गमन वाले सूर्य को देखता हुआ ऋतुओं के अनुरूप अनेक प्रकार के यज्ञों
का अनुष्ठान करता हूं. मैं शक्तिशाली पितरों के सुख के लिए होता बनकर मंत्र बोलता हूं तथा
यज्ञ के अनुपयुक्त स्थान से उपयुक्त स्थान में जाता हूं. (३)
बह्वीः समा अकरमन्तरस्मिन्निन्द्रं वृणानः पितरं जहामि.
अग्निः सोमो वरुणस्ते च्यवन्ते पर्यावर्द्र्राष्ट्रं तदवाम्यायन्.. (४)
मैंने इस यज्ञस्थान में अनेक वर्ष बिताए हैं. मैं यहां इंद्र का वरण करता हुआ अपने पिता
अरणि को छोड़ता हूं. मेरे छिप जाने पर अग्नि, सोम एवं वरुण का पतन होता है तथा राष्ट्र में
अव्यवस्था फैल जाती है. तब मैं आकर असुरों से रक्षा करता हूं. (४)
निर्माया उ त्ये असुरा अभूवन्त्वं च मा वरुण कामयासे.
ebook converter DEMO Watermarks*
ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि.. (५)
मेरे आते ही राक्षस शक्तिहीन हो गए. हे वरुण! तुम भी मेरी अभिलाषा करते हो. हे
राजन्! तुम सत्य से मिथ्या को अलग करते हुए मेरे राष्ट्र के अधिपति बनो. (५)
इदं स्वरिदमीदास वाममयं प्रकाश उर्व१न्तरिक्षम्.
हनाव वृत्रं निरेहि सोम हविष्त्वा सन्तं हविषा यजाम.. (६)
हे सोम! देखो, यह स्वर्ग है. यह अत्यंत सुंदर था. यह प्रकाश एवं विस्तृत आकाश है. हे
सोम! तुम आओ, जिससे हम वृत्र का वध कर सकें. तुम हवन के योग्य द्रव्य हो. हम अन्य
होमसंबंधी द्रव्यों के साथ तुम्हारा यज्ञ करें. (६)
कविः कवित्वा दिवि रूपमासजदप्रभूती वरुणो निरपः सृजत्.
क्षेमं कृण्वाना जनयो न सिन्धवस्ता अस्य वर्णं शुचयो भरिभ्रति.. (७)
क्रांतदर्शी मित्र ने अपने कवित्व से स्वर्ग में अपना तेज स्थिर किया है. वरुण ने बिना
प्रयास के ही जल को बादलों से निकाला. जगत् का कल्याण करने वाली नदियां वरुण की
पत्नी के समान दीप्तिशालिनी बनकर वरुण के उज्ज्वल रूप को धारण करती हैं. (७)
ता अस्य ज्येष्ठमिन्द्रियं सचन्ते ता ईमा क्षेति स्वधया मदन्ती.
ता ईं विशो न राजानं वृणाना बीभत्सुवो अप वृत्रादतिष्ठन्.. (८)
जल वरुण के अत्यंत विशाल तेज को धारण करते हैं एवं अन्न पाकर प्रसन्न होते हैं.
वरुण पत्नी के समान उन जलों के पास आते हैं. जिस प्रकार प्रजा राजा के पास जाती है,
उसी प्रकार जल भयभीत होकर वृत्र के पास से वरुण के पास जाकर ठहरते हैं. (८)
बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम्.
अनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं नि चिक्युः कवयो मनीषा.. (९)
उन भयभीत एवं दिव्य जलों का साथी बनकर मित्रता का आचरण करने वाला हंस
कहलाता है. स्तुतियोग्य एवं बार-बार जल के पीछे जाने वाले इंद्र की प्रशंसा विद्वान् मंत्रों
द्वारा करते हैं. (९)
सूक्त—१२५ देवता—परमात्मा
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः.
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा.. (१)
वाणी देवी कहती है—
ebook converter DEMO Watermarks*
मैं रुद्रों, वसुओं, आदित्यों एवं सभी देवों के साथ विचरण करती हूं. मैं मित्र, वरुण, इंद्र,
अग्नि एवं अश्विनीकुमारों को धारण करती हूं. (१)
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्.
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये३यजमानाय सुन्वते.. (२)
मैं पत्थर से पीसे जाने वाले सोम, त्वष्टा, पूषा एवं भग को धारण करती हूं. मैं हव्य
धारण करने वाले, देवों को शोभन हवि देने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन
देती हूं. (२)
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्.
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्.. (३)
मैं राष्ट्र की स्वामिनी, धन देने वाली, ज्ञान वाली एवं यज्ञोपयोगी वस्तुओं में सर्वोत्तम हूं.
देवों ने मुझे अनेक स्थानों में धारण किया है. मेरा आधार विशाल है. मैं अनेक प्राणियों में
आविष्ट हूं. (३)
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्.
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि.. (४)
मेरी सहायता से ही प्राणी अन्न खाते हैं, देखते हैं, सांस लेते हैं एवं कही हुई बात सुनते
हैं. मुझे न मानने वाले क्षीण हो जाते हैं. हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें श्रद्धा करने योग्य बात बताती
हूं. (४)
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः.
यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (५)
जो व्यक्ति देवों एवं मानवों द्वारा सेवित है, उसे मैं ही उपदेश देती हूं. मैं जिसे चाहती हूं,
उसे शक्तिशाली, स्तोता, ऋषि एवं बुद्धिमान् बना देती हूं. (५)
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ.
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (६)
मैं ब्रह्मद्वेषी त्रिपुर राक्षस को मारने के लिए ही रुद्र के धनुष का विस्तार करती हूं. मैं ही
लोगों के कल्याण के लिए युद्ध करती हूं एवं द्यावा-पृथिवी में व्याप्त हूं. (६)
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व१न्तः समुद्रे.
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७)
मैं द्यौ को उत्पन्न करती हूं. आकाश परमात्मा का मस्तक है. मेरा स्थान सागर के जल
ebook converter DEMO Watermarks*
में है. वहीं से मैं सारे संसार में विस्तृत होती हूं एवं अपने विशाल शरीर से इस द्युलोक का
स्पर्श करती हूं. (७)
अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा.
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव.. (८)
मैं ही सब भुवनों का निर्माण करती हुई वायु के समान चलती हूं. मेरी महिमाएं ऐसी हैं
कि धरती और द्युलोक से भी बड़ी हूं. (८)
सूक्त—१२६ देवता—विश्वेदेव
न तमंहो न दुरितं देवासो अष्ट मर्त्यम्.
सजोषसो यमर्यमा मित्रो नयन्ति वरुणो अति द्विषः.. (१)
हे देवो! उस पुरुष को कोई भी अमंगल एवं पाप प्राप्त नहीं करता, जिसे अर्यमा, मित्र
एवं वरुण मिलकर शत्रु के हाथ से बचाते हैं. (१)
तद्वि वयं वृणीमहे वरुण मित्रार्यमन्.
येना निरंहसो यूयं पाथ नेथा च मर्त्यमति द्विषः.. (२)
हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! हम तुमसे उसी रक्षा को मांगते हैं, जिससे तुम मानवों को
निष्पाप करते हो एवं शत्रुओं से बचाते हो. (२)
ते नूनं नोऽयमूतये वरुणो मित्रो अर्यमा.
नयिष्ठा उ नो नेषणि पर्षिष्ठा उ नः पर्षण्यति द्विषः.. (३)
वरुण, मित्र एवं अर्यमा निश्चय ही हमारी रक्षा करेंगे. तुम हमें आगे ले चलो, पापों से पार
करो तथा शत्रु से बचाओ. (३)
यूयं विश्वं परि पाथ वरुणो मित्रो अर्यमा.
युष्माकं शर्मणि प्रिये स्याम सुप्रणीतयोऽति द्विषः.. (४)
हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! तुम संसार की रक्षा करते हो. हे शोभन-नेतृत्व वाले देवो!
हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अनुकूल सुख भोगें एवं शत्रुओं से बचें. (४)
आदित्यासो अति सिधो वरुणो मित्रो अर्यमा.
उग्रं मरुद्धी रुद्रं हुवेमेन्द्रमग्निं स्वस्तयेऽति द्विषः.. (५)
आदित्य, वरुण, मित्र और अर्यमा हमें शत्रु से बचावें. हम शत्रु से बचने एवं कल्याण
पाने के लिए उग्र रुद्र, मरुद्गण, इंद्र एवं अग्नि को बुलाते हैं. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*
नेतार ऊ षु णस्तिरो वरुणो मित्रो अर्यमा.
अति विश्वानि दुरिता राजानश्चर्षणीनामति द्विषः.. (६)
वरुण, मित्र और अर्यमा कुशल नेता हैं. ये हमें पाप से दूर ले जावें. प्रजाओं के स्वामी
उक्त देव हमें सभी पापों एवं शत्रुओं से बचावें. (६)
शुनमस्मभ्यमूतये वरुणो मित्रो अर्यमा.
शर्म यच्छन्तु सप्रथ आदित्यासो यदीमहे अति द्विषः.. (७)
वरुण, मित्र और अर्यमा रक्षा के साथ ही हमें सुख दें. आदित्यगण हमें विस्तृत सुख दें
एवं शत्रुओं से बचावें. (७)
यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः.
एवो ष्व१स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः.. (८)
यज्ञ करते हुए वसुओं ने पैरों से बंधी हुई गाय को छुड़ा दिया था. हे अग्नि! हमें उसी
प्रकार पाप से छुड़ाओ एवं उत्तम तथा विशाल आयु दो. (८)
सूक्त—१२७ देवता—रात्रि
रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्य१ क्षभिः. विश्वा अधि श्रियोऽधित.. (१)
रात्रि देवी आती हुई चारों ओर विस्तृत हुईं एवं उन्होंने नक्षत्रों द्वारा संपूर्ण शोभा प्राप्त
की. (१)
ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्य१ द्वतः. ज्योतिषा बाधते तमः.. (२)
मरणरहित व दिव्य रात्रि ने विस्तृत आकाश को व्याप्त किया तथा नीचे एवं ऊंचे रहने
वाले पदार्थों को ढक लिया. रात्रि तारों के प्रकाश से अंधकार को बाधा पहुंचाती है. (२)
निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती. अपेदु हासते तमः.. (३)
रात्रि देवी ने आकर उषा को अपनी बहिन के रूप में स्वीकार किया तथा अंधकार को
हानि पहुंचाई. (३)
सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्षमहि. वृक्षो न वसतिं वयः.. (४)
हमारे लिए वह रात्रि कल्याणकारिणी बने, जिसके आने पर हम पेड़ पर रहने वाले
पक्षियों के समान सो जाते हैं. (४)
नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वन्तो नि पक्षिणः. नि श्येनासश्चिदर्थिनः.. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*
सारा गांव शांत है. पैरों से चलने वाले पक्षी एवं गतिशील बाज पक्षी सब सो रहे हैं. (५)
यावया वृक्यं१वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये. अथा नः सुतरा भव.. (६)
हे रात्रि! तुम भेड़िए, भेड़िए की पत्नी एवं चोर को हमसे दूर करो. तुम हमारे लिए
विशेष रीति से सुखकारी बनो. (६)
उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित. उष ऋणेव यातय.. (७)
सब वस्तुओं को ढकने वाला काला आकार विशेष रूप से मेरे पास तक आ गया है. हे
उषा! इस अंधकार को ऋण के समान हटाओ. (७)
उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः. रात्रि स्तोमं न जिग्युषे.. (८)
हे रात्रि! तुम आकाश की कन्या हो. मुझ शत्रुजयी का यह स्तोत्र तुम स्वीकार करो. मैं
गाय के समान तुम्हें यह स्तोत्र भेंट कर रहा हूं. (८)
सूक्त—१२८ देवता—विश्वेदेव
ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१)
हे अग्नि! संग्रामों में मेरा तेज उचित हो. हम तुम्हें प्रज्वलित करके अपने शरीर को पुष्ट
करें. चारों दिशाएं मेरे लिए झुकें. तुम्हें अध्यक्ष बनाकर हम शत्रु सेनाओं को जीतें. (१)
मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः.
ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामे अस्मिन्.. (२)
इंद्र सहित सब देव, मरुत्, विष्णु और अग्नि युद्ध में मेरा साथ दें. अंतरिक्ष के समान
विस्तृत लोक मेरा हो तथा वायु मेरी अभिलाषा के अनुसार चलकर मुझे पवित्र करें. (२)
मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः.
दैव्या होतारो वनुषन्त पूर्वेऽरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (३)
देवगण मुझ स्तोता को धन दें. मैं यज्ञफल प्राप्त करूं एवं देवों को बुलाऊं. प्राचीन काल
में देवों के लिए हवन करने वाले मेरे अनुकूल हों. मैं शरीर से निरोग एवं शोभन संतान वाला
बनूं. (३)
मह्यं यजन्तु मम यानि हव्याकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु.
एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवासो अधि वोचता नः.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*
मेरे ऋत्विज् मेरे हव्य आदि का यजन मेरे कल्याण के लिए करें. मेरा मनोरथ पूर्ण हो. मैं
किसी भी पाप को न करूं. सभी देव मुझे आशीर्वाद दें. (४)
देवीः षळुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह वीरयध्वम्.
मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (५)
छः विशाल देवियां मेरी उन्नति करें. हे सब देवो! मेरे यज्ञ में वीरता का कार्य करो. मैं
शरीर और प्रजा संबंधी कोई हानि न उठाऊं. हे राजा सोम! हम शत्रु के सामने न हारें. (५)
अग्ने मन्युं प्रतिनुदन्परेषामदब्धो गोपाः परि पाहि नस्त्वम्.
प्रत्यञ्चो यन्तु निगुतः पुनस्तेऽमैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (६)
हे अग्नि! तुम शत्रुओं का क्रोध व्यर्थ करके अपराजेय बनकर हमारी रक्षा करो. शत्रु
अपने उद्देश्य में असफल होकर लौटे. यदि शत्रुओं के पास बुद्धि हो तो नष्ट हो जाए. (६)
धाता धातॄणां भुवनस्य यस्पतिर्देवं त्रातारमभिमातिषाहम्.
इमं यज्ञमश्विनोभा बृहस्पतिर्देवाः पान्तु यजमानं न्यर्थात्.. (७)
मैं सृष्टिकर्त्ताओं के स्रष्टा, सकल भुवन के रक्षक, दिव्य, सब भयों से छुड़ाने वाले एवं
शत्रुपराभवकारी सविता की स्तुति करता हूं. अश्विनीकुमार एवं बृहस्पति! इस यज्ञ तथा
यजमान की पाप से रक्षा करें. (७)
उरुव्यचा नो महिषः शर्म यंसदस्मिन्हवे पुरुहूतः पुरुक्षुः.
स नः प्रजायै हर्यश्व मृळयेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८)
परम विस्तृत, पूज्य, बहुतों द्वारा बुलाए गए व अनेक निवासस्थानों वाले इंद्र इस यज्ञ में
हमें कल्याण दें. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! तुम हमारी संतान को सुखी करो, हमारी हिंसा
मत करो और हमें मत त्यागो. (८)
ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान्.
वसवो रुद्रा आदित्या उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्.. (९)
जो हमारे शत्रु हैं, वे दूर चले जावें. हम इंद्र और अग्नि की सहायता से उन्हें बाधा
पहुंचावें. वसु, रुद्र और आदित्य मुझे सर्वश्रेष्ठ उन्नत शक्ति वाला चेतनायुक्त सर्वज्ञ एवं सबका
स्वामी बनावें. (९)
सूक्त—१२९ देवता—परमात्मा
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्.
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*
प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् था. उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष
था. न कोई आवरण था और न ढकने योग्य पदार्थ था. कहीं भी न कोई प्राणी था और न
कोई सुख पहुंचाने वाला भोग था. उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था. (१)
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः.
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास.. (२)
उस समय न मृत्यु थी और न अमृत था. न रात्रि थी और न दिन का ज्ञान था. उस समय
एकमात्र ब्रह्मा ही स्वधा के साथ प्राणयुक्त था. उससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं था. (२)
तम आसीत्तमसा गूळहमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्.
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्.. (३)
प्रलय दशा में सब कुछ अंधकार से घिरा हुआ था एवं सब ओर अंधकार था. यह सारा
दृश्यमान जगत् जल के रूप में अज्ञात था. सारा विश्व तुच्छ अंधकार से ढका था. महान् तप
से कारणकार्यरूप विभाग से रहित ब्रह्म उत्पन्न हुआ. (३)
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्.
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा.. (४)
परमेश्वर के मन में सबसे पहले सृष्टिरचना की इच्छा उत्पन्न हुई. वही सबसे पहले मन में
सृष्टि का बीज बनी. विद्वानों ने बुद्धि से हृदय में विचार किया एवं असत् में सत् के कारण को
खोजा. (४)
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्.
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्.. (५)
आकाश आदि की सृष्टि करने वाले परमात्मा के तेज की किरणें क्या तिरछी थीं, नीचे
की ओर थीं अथवा ऊपर की ओर थीं? बीजरूप कर्म को धारण करने वाले जीव थे एवं
महान् आकाश आदि भोग्य थे. उस समय अन्न निकृष्ट एवं भोक्ता उत्कृष्ट था. (५)
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः.
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनैनाथा को वेद यत आबभूव.. (६)
कौन संपूर्ण रूप से जानता है और कौन इस सृष्टि के विषय में कह सकता है? यह सृष्टि
किन-किन कारणों से उत्पन्न हुई है? देवगण भूतसृष्टि के बाद उत्पन्न हुए हैं. यह विश्व जिससे
उत्पन्न हुआ है, उसे कौन जानता है? (६)
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न.
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३० देवता—प्रजापति
यह विशेष सृष्टि जिससे उत्पन्न हुई है, पता नहीं वह इसे धारण करता है अथवा नहीं.
विस्तृत आकाश में जो इस सृष्टि का अध्यक्ष है, पता नहीं वह उसे जानता है या नहीं जानता.
(७)
सूक्त—१३० देवता—प्रजापति
यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः.
इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते.. (१)
आकाश आदि तंतुओं द्वारा जो सर्गरूप यज्ञ सब ओर विस्तृत है, वह सौ देव संबंधी
कर्मों से व्याप्त है. प्रजापति के पालक देव जो सारी सृष्टि में व्याप्त हैं, वे इस प्रपंच का
निर्माण करते हैं. वे ही इस विस्तृत विश्व के प्राण हैं. (१)
पुमाँ एनं तनुत उत्कृणत्ति पुमान्वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्.
इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुस्तसराण्योतवे.. (२)
प्रजापति इस सृष्टिरूपी यज्ञ को विस्तृत करता है एवं वही इसे संकुचित करता है. वही
धरती एवं स्वर्ग में इस सृष्टिरूपी यज्ञ का विस्तार करता है. प्रजापति की किरण के समान ये
देव यज्ञस्थान में बैठे थे. इन्होंने यज्ञरूपी वस्त्र को बुनने के लिए तिरछे धागे के रूप में
साममंत्रों का निर्माण किया. (२)
कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्.
छन्दः किमासीत्प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे.. (३)
जिस समय सभी देवों ने प्रजापति का यज्ञ किया, उस समय क्या प्रमाण था? उस
समय देवमूर्ति क्या थी? उस यज्ञ का फल, घृत, समिधाएं, छंद और उक्थमंत्र क्या थे? (३)
अग्नेर्गायत्र्यभवत्सायुग्वोष्णिहया सविता सं बभूव.
अनुष्टुभा सोम उक्थैर्महस्वान्बृहस्पतेर्बृहती वाचमावत्.. (४)
गायत्री छंद अग्नि का तथा उष्णिक छंद सविता का सहायक हुआ. सोम अनुष्टुप् छंद से
तथा तेजस्वी सूर्य उक्थ छंद से युक्त हुए. बृहती छंद ने बृहस्पति के वचनों का सहारा लिया.
(४)
विराण्मित्रावरुणयोरभिश्रीरिन्द्रस्य त्रिष्टुबिह भागो अह्नः.
विश्वान्देवाञ्जगत्या विवेश तेन चाक्लृप्र ऋषयो मनुष्याः.. (५)
विराट् छंद मित्र और वरुण का आश्रित हुआ. त्रिष्टुप् छंद एवं माध्यंदिन का सोमरस इंद्र
के भाग में पड़ा. जगती छंद ने सभी देवों का आश्रय लिया. इन छंदों द्वारा ऋषियों और
eBook converter DEMO Watermarks*
मनुष्यों ने यज्ञ की कल्पना की. (५)
चाक्लृप्रे तेन ऋषयो मनुष्या यज्ञे जाते पितरो नः पुराणे.
पश्यन्मन्ये मनसा चक्षसा तान् य इमं यज्ञमयजन्त पूर्वे.. (६)
यज्ञ के उत्पन्न होने पर हमारे प्राचीन पितरों अर्थात् ऋषियों और मनुष्यों ने उक्त छंदों
की सहायता से यज्ञ पूर्ण किया. जिन पूर्व पुरुषों ने इस यज्ञ को पूर्ण किया था, उन्हें मैं मन की
आंखों से देख रहा हूं. मैं ऐसा मानता हूं. (६)
सहस्तोमाः सहछन्दस आवृतः सहप्रमा ऋषयः सप्त दैव्याः.
पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा अन्वालेभिरे रथ्यो३ न रश्मीन्.. (७)
सात दिव्य ऋषियों ने यज्ञ के मंत्र, छंद एवं नियम एक साथ जानकर यज्ञ का अनुष्ठान
किया. जिस प्रकार सारथि घोड़ों की लगाम पकड़ता है, उसी प्रकार धीर ऋषियों ने प्राचीन
लोगों के मार्ग का अनुसरण किया. (७)
सूक्त—१३१ देवता—अश्विनीकुमार व इंद्र
अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व.
अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन्मदेम.. (१)
हे शत्रुपराभवकारी इंद्र! हमारे सामने, पीछे, उत्तर और दक्षिण में जो शत्रु हैं, उन्हें
समाप्त करो. हे शूर इंद्र! तुम्हारे पास विशेष सुख पाकर हम प्रसन्न हों. (१)
कुविद्वङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमोवृक्तिं न जग्मुः.. (२)
हे इंद्र! जौ के खेत के मालिक जिस प्रकार उसे क्रमशः अनेक बार में काटते हैं, उसी
प्रकार उन लोगों की भोजन सामग्री नष्ट करो जो ‘नमः’ शब्द का उच्चारण नहीं करते एवं यज्ञ
का अनुष्ठान नहीं करते. (२)
नहि स्थूर्युतुथा यातमस्ति नोत श्रवो विवदे सङ्गमेषु.
गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः.. (३)
एक पहिए वाली गाड़ी उचित समय पर कहीं नहीं पहुंच सकती. उससे युद्ध के समय
भी अन्न नहीं मिल सकता. गौ, अश्व एवं अन्न की अभिलाषा करने वाले लोग इंद्र की मित्रता
चाहते हैं. (३)
युवं सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा. विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*