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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—८ देवता—यूप

सूक्त—८ देवता—यूप अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना दैव्येन. यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद्यद्वा क्षयो मातुरस्या उपस्थे.. (१) हे वनस्पति निर्मित यूप! यज्ञ में देवों की अभिलाषा करते हुए अध्वर्यु आदि देव संबंधी घी से तुम्हें भिगोते हैं. तुम चाहे ऊंचे खड़े रहो अथवा इस धरती माता की गोद में निवास करो, पर तुम हमें धन प्रदान करो. (१) समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्ताद्ब्रह्म वन्वानो अजरं सुवीरम्. आरे अस्मदमतिं बाधमान उच्छ्रयस्व महते सौभगाय.. (२) हे यूप! तुम प्रज्वलित आहवानीय नामक अग्नि से पूर्व दिशा में रहते हुए जरारहित, समृद्ध एवं शोभन संतानयुक्त अन्न देते हुए तथा हमारे शत्रुभूत पाप को दूर भगाते हुए, हमें विशाल संपत्ति देने के लिए ऊंचे बनो. (२) उच्छ्रयस्व वनस्पते वर्ष्मन्पृथिव्या अधि. सुमिती मीयमानो वर्चो धा यज्ञवाहसे.. (३) हे वनस्पतिरूप यूप! तुम धरती के उत्तम स्थान यज्ञमंडप में ऊंचे खड़े होओ. तुम सुंदर परिमाण से नापे गए हो. तुम मुझ यज्ञकर्त्ता को अन्न दो. (३) युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान्भवति जायमानः. तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः.. (४) दृढ़ अंग वाला, शोभन वस्त्र से युक्त एवं ढका हुआ यूप आता है. वही सब वनस्पतियों की अपेक्षा उत्तम रूप से उत्पन्न हुआ है. बुद्धिमान्, शोभन-ध्यान वाले एवं क्रांतदर्शी अध्वर्यु आदि मन से देवों की कामना करते हुए उसे ऊंचा उठाते हैं. (४) जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः. पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देवया विप्र उदियर्ति वाचम्.. (५) धरती पर पेड़ के रूप में उत्पन्न यूप मनुष्यों से युक्त यज्ञ में घी आदि से सब प्रकार शोभित होकर दिनों को उत्तम बनाता है. यज्ञकर्म करने वाले मेधावी अध्वर्यु आदि अपनी बुद्धि के अनुसार उसे जल से धोकर शुद्ध करते हैं. देवों को द्रव्य देने वाले मेधावी होता यूप की स्तुति बोलते हैं. (५) यान्वो नरो देवयन्तो निमिम्युर्वनस्पते स्वधितिर्वा ततक्ष. ते देवासः स्वरवस्तस्थिवांसः प्रजावदस्मे दिधिषन्तु रत्नम्.. (६) हे यूपसमूह! देवों की अभिलाषा करने वाले एवं यज्ञकर्म के संपादक अध्वर्यु आदि ने ebook converter DEMO Watermarks*

तुम्हें गड्ढे में डाला है. हे वनस्पति! कुल्हाड़ी ने तुम्हारे यूपों को काटा है. हे दीप्तिमान् एवं लकड़ी के टुकड़ों से सुशोभित यूपो! हमें संतान सहित उत्तम धन प्रदान करो. (६) ये वृक्णासो अधि क्षमि निमितासो यतस्रुचः. ते नो व्यन्तु वार्यं देवत्रा क्षेत्रसाधसः.. (७) धरती पर कुल्हाड़ी से काटे गए, ऋत्विजों द्वारा गड्ढे में फेंके गए एवं यज्ञसाधक यूप हमारा हव्य देवों के समीप पहुंचावें. (७) आदित्या रुद्रा वसवः सुनीथा द्यावाक्षामा पृथिवी अन्तरिक्षम्. सजोषसो यज्ञमवन्तु देवा ऊर्ध्वं कृण्वन्त्वध्वरस्य केतुम्.. (८) यज्ञ के शोभन नेता रुद्र, वसु, धरती-आकाश एवं विस्तीर्ण अंतरिक्ष ये सब देव मिलकर यज्ञ की रक्षा करें तथा यज्ञ के केतुरूप यूप को ऊंचा उठावें. (८) हंसा इव श्रेणिशो यतानाः शुक्रा वसानाः स्वरवो न आगुः. उन्नीयमानाः कविभिः पुरस्ताद्देवा देवानामपि यन्ति पाथः.. (९) जिस प्रकार पंक्ति बनाकर आकाश में उड़ते हुए हंस शोभा पाते हैं, उसी प्रकार उज्ज्वल वस्त्र से ढके हुए एवं लकड़ी के टुकड़ों से युक्त यूप पंक्ति बनाकर हमारे समीप आवें. मेधावी अध्वर्यु आदि द्वारा अग्नि की पूर्व दिशा में खड़े किए गए तथा दीप्तिमान् यूप अंतरिक्ष को प्राप्त करते हैं. (९) शृङ्गाणीवेच्छृङ्गिणां सं ददृश्रे चषालवन्तः स्वरवः पृथिव्याम्. वाघद्भिर्वा विहवे श्रोषमाणा अस्माँ अवन्तु पृतनाजयेषु.. (१०) लकड़ी के टुकड़ों से युक्त तथा कांटों से रहित यूप धरती पर इस प्रकार सुंदर दिखाई देते हैं, जिस प्रकार पशुओं के सींग. यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा की हुई स्तुतियां सुनते हुए यूप युद्धों में हमारी रक्षा करें. (१०) वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम. यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय.. (११) हे वनस्पति! इस तेज धार वाली कुल्हाड़ी ने तुम्हें यूप के रूप में काटकर महान् सौभाग्य दिया है. तुम हजार शाखाओं वाले बनकर उगो. हम भी हजार शाखाओं अर्थात् संतान वाले होकर प्रकट हों. (११) सूक्त—९ देवता—अग्नि सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये. ebook converter DEMO Watermarks*

अपां नपातं सुभगं सुदीदितिं सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (१) हे अग्नि! तुम्हारे मित्र हम मनुष्य जल के नाती, शोभनधनयुक्त, सुंदर दीप्तिमान्, सुख से प्राप्त करने योग्य एवं उपद्रवरहित तुमको अपनी रक्षा के लिए वरण करते हैं. (१) कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः. न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद्दूरे सन्निहाभवः.. (२) हे अग्नि! काननों की रक्षा करते हुए तुम अपनी मातारूपी जल में प्रविष्ट होकर शांत बनते हो. तुम्हारा शांत रहना अधिक समय तक सहन नहीं होता, इसलिए तुम दूर रहते हुए भी हमारे अरणि रूपी काठ से उत्पन्न हो जाओ. (२) अति तृष्टं ववक्षिथाथैव सुमना असि. प्रप्रान्ये यन्ति पर्यन्य आसते येषां सख्ये असि श्रितः.. (३) हे अग्नि! तुम स्तोताओं की अभिलाषा सफल करना चाहते हो, इसलिए तुम संतुष्ट मन वाले हो. तुम जिन ऋत्विजों के मित्र हो, उन में से कुछ होम करने के लिए जाते हैं एवं शेष तुम्हारे चारों ओर बैठते हैं. (३) ईयिवांसमति स्रिधः शश्वतीरति सश्चतः. अन्वीमविन्दन्निचिरासो अद्भुहोऽप्सु सिंहमिव श्रितम्.. (४) हे अग्नि! सर्वथा द्रोहरहित एवं चिरंतन विश्वेदेवों ने शत्रुओं एवं उनकी बहुत सी सेनाओं को हराने वाले तथा गुफा में बैठे सिंह के समान जल में छिपे हुए अग्नि को पाया. (४) ससृवांसमिव त्मनाग्निमित्था तिरोहितम्. ऐनं नयन्मातरिश्वा परावतो देवेभ्यो मथितं परि.. (५) अपनी इच्छा से जल में छिपे हुए तथा अरणिमंथन द्वारा प्राप्त अग्नि को वायु देवों के निमित्त इस प्रकार लाए थे, जिस प्रकार स्वेच्छा से जाने वाले पुत्र को पिता खींच लाता है. (५) तं त्वा मर्ता अगृभ्णत देवेभ्यो हव्यवाहन. विश्वान्यद्यज्ञाँ अभिपासि मानुष तव क्रत्वा यविष्ठ्य.. (६) हे मनुष्य हितकारक, सदा तरुण एवं द्रव्य वहन करने वाले अग्नि देव! तुम अपने यज्ञरूपी कर्म से हम सबका पालन करते हो, इसलिए मनुष्यों ने तुम्हें देवों के निमित्त ग्रहण किया है. (६) तद्भद्रं तव दंसना पाकाय चिच्छदयति.

त्वां यदग्ने पशवः समासते समिद्धमपिशर्वरे.. (७) हे अग्नि! तुम संध्याकाल में दीप्त होते हो, तब पशु तुम्हारे चारों ओर बैठते हैं. पशु के समान अल्पज्ञ यजमान को भी तुम्हारा शोभन यज्ञकर्म फल देकर संतुष्ट करता है. (७) आ जुहोता स्वध्वरं शीरं पावकशोचिषम्. आशुं दूतमजिरं प्रत्नमीड्यं श्रुष्टी देवं सपर्यत.. (८) हे ऋत्विजो! पवित्र प्रकाश वाले, लकड़ियों में सोने वाले एवं शोभनयज्ञयुक्त अग्नि में हवन करो तथा यज्ञकर्म में व्याप्त, देवों के दूत, शीघ्रगामी, पुरातन, स्तुति योग्य एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि की शीघ्र पूजा करो. (८) त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन्. औक्षन्घृतैरस्तृणन्बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त.. (९) तीन हजार तीन सौ उनतालीस देवों ने अग्नि की पूजा की, घृतों से सींचा तथा उनके लिए कुश फैलाए. इसके बाद उन देवों ने अग्नि को होता बनाकर बैठाया. (९) सूक्त—१० देवता—अग्नि त्वामग्ने मनीषिणः सम्राजं चर्षणीनाम्. देवं मर्तास इन्धते समध्वरे.. (१) हे अग्नि! अध्वर्यु आदि बुद्धिमान् लोग प्रजाओं के स्वामी एवं दीप्तिमान् तुझ अग्नि को यज्ञ में प्रज्वलित करते हैं. (१) त्वां यज्ञेष्वृत्विजमग्ने होतारमीळते. गोपा ऋतस्य दीदिहि स्वे दमे.. (२) हे अग्नि! अध्वर्यु आदि होता एवं ऋत्विज् रूप में तुम्हारी स्तुति अपने यज्ञ में करते हैं, तुम यज्ञ के रक्षक बनकर अपने घर में दीप्त बनो. (२) स घा यस्ते ददाशति समिधा जातवेदसे. सो अग्ने धत्ते सुवीर्यं स पुष्यति.. (३) हे जातवेद अग्नि! जो यजमान तुम्हें प्रज्वलित करने वाला हव्य देता है, वह शक्तिशाली पुत्र-पौत्र प्राप्त करता है एवं समृद्ध बनता है. (३) स केतुरध्वराणामग्निर्देवेभिरा गमत्. अञ्जानः सप्त होतृभिर्हविष्मते.. (४) केतु के समान यज्ञों का ज्ञापन कराने वाले अग्नि सात होताओं द्वारा घी से सिक्त होकर यजमान के कल्याण के लिए देवों के साथ आवें. (४) प्र होत्रे पूर्व्यं वचोऽग्नये भरता बृहत्. विपां ज्योतींषि बिभ्रते न वेधसे.. (५)

हे होताओ! मेधावियों का तेज धारण करने वाले, संसार के विधाता देवों को बुलाने वाले, अग्नि के उद्देश्य से महान् एवं पूर्ववर्ती लोगों द्वारा निर्मित स्तोत्र बोलो. (५) अग्निं वर्धन्तु नो गिरो यतो जायत उक्थ्यः. महे वाजाय द्रविणाय दर्शतः.. (६) महान् अन्न एवं धन के निमित्त दर्शनीय अग्नि की प्रशंसा जिन वचनों से होती है, हमारे वे ही स्तुतिवचन अग्नि को बढ़ावें. (६) अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवान्देवयते यज. होता मन्द्रो विराजस्यति स्रिधः.. (७) हे यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ अग्नि! यज्ञ में देवों की कामना करने वाले यजमानों के कल्याण के लिए देवों की पूजा करो. होता एवं यजमानों को प्रसन्नता देने वाले तुम अग्नि शत्रुओं को पराजित करके सुशोभित होते हो. (७) स नः पावक दीदिहि द्युमदस्मे सुवीर्यम्. भवा स्तोतृभ्यो अन्तमः स्वस्तये.. (८) हे पाप शोधक अग्नि! हमें कांतियुक्त एवं शोभन सामर्थ्य वाला धन दो तथा कल्याण के निमित्त स्तोताओं के समीप जाओ. (८) तं त्वा विप्रा विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते. हव्यवाहममर्त्यं सहोवृधम्.. (९) हे अग्नि! मेधावी जागरूक एवं प्रबुद्ध स्तोता हव्य वहन करने वाले, मंथनरूप, बल द्वारा उत्पन्न एवं मरणरहित तुमको भली प्रकार प्रज्वलित करते हैं. (९) सूक्त—११ देवता—अग्नि अग्निहोता पुरोहितोऽध्वरस्य विचर्षणिः. स वेद यज्ञमानुषक्.. (१) देवों का आह्वान करने वाले, पुरोहित एवं यज्ञ के विशेष द्रष्टा अग्नि क्रमिक रूप से यज्ञ जानते हैं. (१) स हव्यवाळमर्त्य उशिग्दूतश्चनोहितः. अग्निर्षिया समृण्वति.. (२) हव्यवहन करने वाले, मरणरहित, द्रव्य के इच्छुक देवों के दूत एवं अन्नप्रिय अग्नि बुद्धि से युक्त होते हैं. (२) अग्निर्षिया स चेतति केतुर्यज्ञस्य पूर्व्यः. अर्थं ह्यस्य तरणि.. (३) झंडे के समान यज्ञ के ज्ञापक एवं प्राचीन अग्नि अपनी बुद्धि से सब कुछ जानते हैं. अग्नि का तेज अंधकार को नष्ट करता है. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

अग्निं सूनुं सनश्रुतं सहसो जातवेदसम्. वह्निं देवा अकृण्वत.. (४) बल के पुत्र, सनातन रूप से प्रसिद्ध तथा जातवेद अग्नि को देवों ने हव्य ढोने वाला बनाया है. (४) अदाभ्यः पुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम्. तूर्णी रथः सदा नवः.. (५) मानवी प्रजाओं के अग्रगामी, शीघ्रता करने वाले, रथ के समान द्रव्य ढोने वाले एवं नित्य नवीन अग्नि का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता. (५) साह्वान्विश्वा अभियुजः क्रतुर्देवानामामृक्तः. अग्निस्तुविश्रवस्तमः.. (६) समस्त शत्रुसेना को पराजित करने वाले, शत्रुओं द्वारा अवध्य एवं देवों के पोषक अग्नि अनेक प्रकार के अन्नों से युक्त हैं. (६) अभि प्रयांसि वाहसा दाश्वां अश्नोति मर्त्यः. क्षयं पावकशोचिषः.. (७) हव्य देने वाला मनुष्य हव्यवहन करने वाले अग्नि की कृपा से समस्त अन्नों को प्राप्त करता है एवं पवित्र प्रकाश वाले अग्नि से घर पाता है. (७) परि विश्वानि सुधिताग्नेरश्याम मन्मभिः. विप्रासो जातवेदसः.. (८) हम प्रजासंपन्न एवं ज्ञानवान् होता आदि तुझ अग्नि के स्तोत्रों द्वारा समस्त हितकारक धन प्राप्त करें. (८) अग्ने विश्वानि वार्या वाजेषु सनिषामहे. त्वे देवास एरिरै.. (९) हे अग्नि! समस्त देव तुम्हीं में प्रविष्ट हैं, इसलिए हम यज्ञों में तुमसे समस्त उत्तम धन प्राप्त करें. (९) सूक्त—१२ देवता—इंद्र एवं अग्नि इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्यं पातं धियेषिता.. (१) हे इंद्र एवं अग्नि! हमारी स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम शुद्ध किए हुए एवं उत्तम सोमरस को लक्ष्य करके स्वर्ग से यहां आओ एवं हमारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञकर्म में इसे पिओ. (१) इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः. अया पातमिमं सुतम्.. (२) हे इंद्र एवं अग्नि! स्तोता का सहायक, यज्ञ का साधन एवं इंद्रियों को आनंदित करने ebook converter DEMO Watermarks*

वाला सोमरस तुम्हारे समीप जाता है. इस निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. (२) इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे. ता सोमस्येह तृम्पताम्.. (३) इस यज्ञ के साधनभूत सोमरस की प्रेरणा से मैं स्तोताओं के लिए सुखदाता इंद्र और अग्नि का वरण करता हूं. वे इस यज्ञ में सोम पीकर तृप्त हों. (३) तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता. इन्द्राग्नी वाजसातमा.. (४) मैं शत्रुबाधक, वृत्रनाशक, विजयी, अपराजित एवं अधिक मात्रा में अन्न देने वाले इंद्र तथा अग्नि को बुलाता हूं. (४) प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (५) हे इंद्र एवं अग्नि! मंत्र जानने वाले होता आदि तथा स्तोत्रों के ज्ञाता स्तोता तुम्हारी अर्चना करते हैं. मैं भी अन्न प्राप्त करने के लिए सभी प्रकार से तुम्हारा वरण करता हूं. (५) इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (६) हे इंद्र और अग्नि! तुमने एक ही प्रयास में दासों के नब्बे नगरों को कंपित कर दिया था. (६) इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः. ऋतस्य पथ्या३ अनु.. (७) हे इंद्र और अग्नि! सोमरस के पाने वाले होता आदि यज्ञ के मार्ग को देखकर हमारे इस कर्म के चारों ओर उपस्थित रहते हैं. (७) इन्द्राग्नी तविषाणि वां सधस्थानि प्रयांसि च. युवोरप्तूर्यं हितम्.. (८) हे इंद्र और अग्नि! तुम दोनों के बल और अन्न एक-दूसरे से अभिन्न हैं. जल वर्षा की प्रेरणा का काम आप ही के बीच सीमित है. (८) इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः. तद्वां चेति प्र वीर्यम्.. (९) हे स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले इंद्र और अग्नि! तुम युद्धों में सर्वत्र विभूषित बनो. तुम दोनों की शक्ति युद्ध की विजय का ज्ञान कराती है. (९) सूक्त—१३ देवता—अग्नि प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चामै. गमद्देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत्.. (१) हे होताओ! अग्नि देव को लक्ष्य करके यथेष्ट मात्रा में स्तुति करो. यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नि देवों के साथ हमारे समीप आवें एवं कुश पर बैठें. (१) ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः. हविष्मन्तस्तमीळते तं सनिष्यन्तोऽवसे.. (२) द्यावापृथिवी जिस अग्नि के वश में हैं, देव उसके बल की सेवा करते हैं. वह सत्यकर्म वाला है. (२) स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः. अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मघम्.. (३) हे ऋत्विजो! मेधावी अग्नि यजमानों, यज्ञों एवं सोम के नियामक, कर्मफल एवं महान् धन के दाता हैं. तुम उन्हीं अग्नि की सेवा करो. (३) स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा. यतो नः प्रष्णवद्वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्सुवा.. (४) वे अग्नि हम हव्यदाताओं के लिए सुखकारक घर प्रदान करें. अग्नि के पास से धरती, आकाश और स्वर्ग का उत्तम धन हमारे पास आवे. (४) दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः. ऋक्वाणो अग्निमन्धते होतारं विश्वपतिं विशाम्.. (५) स्तुति करते हुए होता आदि दीप्तिमान्, प्रतिक्षण नवीन, देवों को बुलाने वाले तथा प्रजाओं के परम पालक अग्नि को उत्तम स्तुतियों द्वारा प्रज्वलित करते हैं. (५) उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः. शं नः शोचा मरुद्वृधोऽग्ने सहस्रसातमः.. (६) हे अग्नि! स्तुति करते समय हम यज्ञकर्त्ताओं की रक्षा करो. हे देवों को बुलाने वालों में श्रेष्ठ! मंत्र बोलते समय हमारी रक्षा करो. हे मरुतों द्वारा बधित एवं हजारों धनों के दाता अग्नि! हमारा सुख बढ़ाओ. (६) नू नो रास्व सहस्रवत्तोकवत्पुष्टिमद्द्वसु. द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम्.. (७) हे अग्नि! हमें पुत्र-पौत्र युक्त, पोषण करने वाला, दीप्तिमान् एवं शोभनशक्ति युक्त हजारों प्रकार का क्षयरहित धन दो. (७) सूक्त—१४ देवता—अग्नि आ होता मन्द्रो विदथान्यस्थात्सत्यो यज्वा कवितमः स वेधाः. ebook converter DEMO Watermarks*

विद्युद्रथः सहसस्पुत्रो अग्निः शोचिष्केशः पृथिव्यां पाजो अश्रेत्..(१) देवों का आह्वान करने वाले, स्तुतिकर्त्ताओं को प्रसन्न करने वाले, सत्यकर्मा, देवों के यज्ञकर्त्ता, अत्यंत मेधावी, जगत् के विधाता, चमकीले रथ वाले, बल के पुत्र, ज्वालारूपी केश वाले एवं धरती पर अपनी प्रज्ञा प्रकट करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में स्थित हैं. (१) अयामि ते नमउक्तिं जुषस्व ऋतावस्तुभ्यं चेतते सहस्वः. विद्वाँ आ वक्षि विदुषो नि षत्सि मध्य आ बर्हिरूतये यजत्र.. (२) हे यज्ञस्वामी अग्नि! मैं तुम्हारे प्रति नमस्कार करता हूं. हे बलवान्! तुझ यज्ञकर्मज्ञापक के प्रति जो नमस्कार किया है, उसे स्वीकार करो. हे विद्वान् एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! विद्वानों को हमारे यज्ञ में लाओ एवं हमारी रक्षा करने के निमित्त बिछे हुए कुशों पर बैठो. (२) द्रवतां त उषसा वाजयन्ती अग्ने वातस्य पथ्याभिरच्छ. यत्सीमञ्जन्ति पूर्व्यं हविर्भिर्वा वन्धुरेव तस्थतुर्दुरोणे.. (३) हे अग्नि! अन्न का निर्माण करने वाली उषा तथा निशा तुम्हारे समीप जाती हैं. तुम भी वायुरूपी मार्ग से उनके समीप जाओ, क्योंकि ऋत्विज् हवि द्वारा तुझ प्राचीन अग्नि को सींचते हैं. जुए की तरह परस्पर मिली हुई उषा और निशा हमारी यज्ञशाला में बार-बार रहें. (३) मित्रश्च तुभ्यं वरुणः सहस्वोऽग्ने विश्वे मरुतः सुम्नमर्चन्. यच्छोचिषा सहसस्पुत्र तिष्ठा अभि क्षितीः प्रथयन्त्सूर्यो नॄन्.. (४) हे बलसंपन्न अग्नि! मित्र, वरुण, विश्वेदेव एवं मरुत् तुम्हें लक्ष्य करके स्तोत्र धारण करते हैं, क्योंकि तुम्हीं बल के पुत्र तथा सूर्य हो और मनुष्यों को मार्ग दिखाने वाली किरणें सब जगह फैलाकर प्रकाश से दीप्त हो. (४) वयं ते अद्य ररिमा हि काममुत्तानहस्ता नमसोपसद्य. यजिष्ठेन मनसा यक्षि देवानस्रेधता मन्मना विप्रो अग्ने.. (५) हे अग्नि! ऊपर हाथ उठाकर हम आज पर्याप्त मात्रा में द्रव्य देते हैं. हे मेधावी! हमारी तपस्या से प्रसन्न होकर मन में हमारे यज्ञ की रक्षा करते हुए बहुत से स्तोत्रों द्वारा देवों की पूजा करो. (५) त्वद्धि पुत्र सहसो वि पूर्वीर्देवस्य यन्त्यूतयो वि वाजाः. त्वं देहि सहस्रिणं रयिं नोऽद्रोघेण वचसा सत्यमग्ने.. (६) हे बल के पुत्र अग्नि! रक्षणकार्य एवं अन्न तुम्हारे पास से यजमान के समीप जाता है. तुम द्रोहरहित वचनों से प्रसन्न होकर हमें हजारों प्रकार का धन एवं सत्यशील पुत्र दो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१५ देवता—अग्नि

तुभ्यं दक्ष कविक्रतो यानीमा देव मर्तासो अध्वरे अकर्म. त्वं विश्वस्य सुरथस्य बोधि सर्वं तदग्ने अमृत स्वदेह.. (७) हे शक्तिशाली, सर्वज्ञ एवं दीप्यमान अग्नि! हम यजमान तुम्हारे उद्देश्य से यज्ञ में जो द्रव्य देते हैं, तुम उस सबका भक्षण करके यजमानों की रक्षा के लिए जाग्रत बनो. तुम मरणरहित हो. (७) सूक्त—१५ देवता—अग्नि वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसो अमीवा:. सुशर्मणो बृहत: शर्मणि स्यामग्नेरहं सुहवस्य प्रणीतौ.. (१) हे अग्नि! विस्तीर्ण तेज द्वारा अत्यंत दीप्त तुम हमारे शत्रुओं तथा रोगरहित राक्षसों का विनाश करो. मैं सुखदाता, महान् एवं उत्तम आह्वान वाले अग्नि की सुखद रक्षा में रहूंगा. (१) त्वं नो अस्या उषसो व्युष्टौ त्वं सूर उदिते बोधि गोपा:. जन्मेव नित्यं तनयं जुषस्व स्तोमं मे अग्ने तन्वा सुजात.. (२) हे अग्नि! तुम वर्तमान उषा के प्रकाशित एवं सूर्य के निकलने के बाद हमारी रक्षा के निमित्त जागो. हे स्वयंभू! तुम हमारी स्तुतियां उसी प्रकार स्वीकार करो, जैसे पिता पुत्र को स्वीकार करता है. (२) त्वं नृचक्षा वृषभानु पूर्वी: कृष्णास्वग्ने अरुषो वि भाहि. वसो नेषि च पर्षि चात्यंह: कृधी नो राय उशिजो यविष्ठ.. (३) हे कामवर्षक एवं मानवों के शुभाशुभदर्शक अग्नि! तुम अंधेरी रातों में पहले की अपेक्षा अधिक चमकते हुए ज्वालाओं को विस्तृत करो. हे वासदाता! हमें कर्मानुरूप फल दो तथा पाप का नाश करो. हे अतिशय युवक! हमें धन का अभिलाषी बनाओ. (३) अषाळ्हो अग्ने वृषभो दीदिहि पुरो विश्वा: सौभगा सञ्जिगीवान्. यज्ञस्य नेता प्रथमस्य पायोर्जातवेदो बृहत: सुप्रणीते.. (४) हे शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं कामवर्षक अग्नि! तुम शत्रुओं की समस्त नगरियों एवं उन में स्थित धन को भली प्रकार जीत कर प्रकाशित बनो. हे शोभनकर्मा एवं जातवेद अग्नि! तुम महान् यज्ञ के नेता एवं आश्रयदाता तथा पूर्णकर्त्ता बनो. (४) अच्छिद्रा शर्म जरित: पुरूणि देवाँ अच्छा दीद्यान: सुमेधा:. रथो न सस्निरभि वक्षि वाजमग्ने त्वं रोदसी न: सुमेके.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अंतकाल में सबको जलाने वाले, शोभन प्रज्ञा वाले तथा दीप्तिसंपन्न अग्नि! देवों के लिए सारे अग्निहोत्रादि कर्मों को पूर्ण करो. हे अग्नि! तुम यहीं ठहर कर देवों को दिया हुआ हमारा द्रव्य उसी प्रकार वहन करो, जिस प्रकार रथ किसी वस्तु को ढोता है. (५) प्र पीपय वृषभ जिन्व वाजानग्ने त्वं रोदसी नः सुदोधे. देवेभिर्देव सुरुचा रुचानो मा नो मर्तस्य दुर्मतिः परि छात्.. (६) हे कामवर्षक अग्नि! तुम हमारे अभिलषित फल बढ़ाओ तथा अन्न प्रदान करो. हे देव! शोभन किरणों द्वारा प्रकाशित तुम देवों के साथ मिलकर धरती-आकाश को हमारे लिए फलप्रद बनाओ. शत्रुओं संबंधी पराभव हमारे समीप न आवे. (६) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (७) हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधनरूप गौ प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो. (७) सूक्त—१६ देवता—अग्नि अयमग्निः सुवीर्यस्येशे महः सौभाग्यस्य. राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम्.. (१) यह अग्नि शोभन सामर्थ्य युक्त, महान् सौभाग्य के स्वामी, गाय एवं उत्तम संतानयुक्त धन के स्वामी एवं शत्रुरूपी पापों के नष्ट करने में समर्थ हैं. (१) इमं नरो मरुतः सश्चता वृधं यस्मिन्प्रायः शेवृधासः. अभि ये सन्ति पृतनासु दूढ्यो विश्वाहा शत्रुमादभुः.. (२) हे यज्ञकर्म के वेत्ता मरुतो! सौभाग्य बढ़ाने वाले अग्नि की सेवा करो. इसमें सुख बढ़ाने वाले धन हैं. मरुद्गण सेनाओं वाले बड़े युद्धों में शत्रुओं को हराते हैं एवं सदा शत्रुओं का नाश करते हैं. (२) स त्वं नो रायः शिशीहि मीढ्वो अग्ने सुवीर्यस्य. तुविद्युम्न वर्षिष्ठस्य प्रजावतोऽनमीवस्य शुष्मिणः.. (३) हे प्रभूत धन से युक्त एवं अभिलाषापूरक अग्नि! हमें अधिक मात्रा वाला, संतानयुक्त, आरोग्य, शक्ति एवं सामर्थ्यसंपन्न तथा धन का स्वामी बनाओ. (३) चक्रियों विश्वा भुवनाभि सासहिश्शुक्रिर्देवेष्वा दुवः. ebook converter DEMO Watermarks*

आ देवेषु यतत आ सुवीर्य आ शंस उत नृणाम्.. (४) समस्त विश्व के कर्त्ता अग्नि विश्व में निवास करते हैं, द्रव्य को ढोते हुए देवों के समीप ले जाते हैं. स्तोताओं के सामने आते हैं, यज्ञकर्त्ताओं के स्तोत्र सुनने आते हैं तथा युद्ध में मानवों की रक्षा करते हैं. (४) मा नो अग्नेऽमतये मावीरतायै रीरधः. मागोतायै सहसस्पुत्र मा निदेऽप द्वेषांस्या कृधि.. (५) हे बल के पुत्र अग्नि! हमें शत्रुरूप दरिद्रता, कायरता, पशुहीनता एवं निंदा के योग्य मत करना. हमारे प्रति द्वेष की भावना समाप्त करो. (५) शग्धि वाजस्य सुभग प्रजावतोऽग्ने बृहतो अध्वरे. सं राया भूयसा सृज मयोभुना तुविद्युम्न यशस्वता.. (६) हे शोभन धन के स्वामी अग्नि! तुम यज्ञ में महान् एवं संतानयुक्त धन के स्वामी हो. हे बहुधनसंपन्न अग्नि! हमें अधिक मात्रा वाला, सुखकारक एवं कीर्तिदाता धन प्रदान करो. (६) सूक्त—१७ देवता—अग्नि समिध्यमानः प्रथमानु धर्मा समक्तुभिरज्यते विश्ववारः. शोचिष्केशो घृतनिर्णिक्पावकः सुयज्ञो अग्निर्यजथाय देवान्.. (१) यज्ञ संबंधी कर्मों के धारक, ज्वालाारूपी केश वाले, सबके स्वीकार्य, पवित्र करने वाले एवं शोभन यज्ञों से युक्त अग्नि यज्ञ के प्रारंभ में क्रमशः जलते हैं एवं देवयज्ञ करने के लिए घी से सींचे जाते हैं. (१) यथायजो होत्रमग्ने पृथिव्या यथा दिवो जातवेदश्चिकित्वान्. एवानेन हविषा यक्षि देवान् मनुष्वद्यज्ञं प्र तिरेममद्य.. (२) हे जातवेद एवं सर्वज्ञ अग्नि! तुमने जिस प्रकार यजमानरूप पृथ्वी का हवि स्वीकार किया, जिस प्रकार आकाश देवता का द्रव्य स्वीकार किया, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में होता बनकर देवों को उनका भाग प्रदान करो. तुम मनु के यज्ञ के समान हमारा यज्ञ आज पूरा करो. (२) त्रीण्यायूंषि तवं जातवेदस्तिस्र आजानीरुषसस्ते अग्ने. ताभिर्देवानांमवो यक्षि विद्वानथा भव यजमानाय शं योः.. (३) हे जातवेद अग्नि! तुम्हारा अन्न तीन प्रकार का है तथा तीन प्रकार की उषाएं तुम्हारी माता हैं. तुम उनके साथ मिलकर देवों को हव्य दो. हे विद्वान् अग्नि! तुम यजमान के सुख ebook converter DEMO Watermarks*

और कल्याण के कारण बनो. (३) अग्निं सुदीतिं सुदृशं गृणन्तो नमस्यामस्त्वेज्यं जातवेदः. त्वां दूतमरतिं हव्यवाहं देवा अकृण्वन्नमृतस्य नाभिम्.. (४) हे जातवेद अग्नि! हम शोभन दीप्ति वाले, सुंदर एवं स्तुति के योग्य तुम्हें नमस्कार करते हैं. देवों ने तुम्हें विषयों से आसक्ति रहित, हव्य वहन करने वाला दूत तथा अमृत की नाभि बनाया है. (४) यस्त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्द्विता च सत्ता स्वधया च शम्भुः. तस्यानु धर्म प्र यजा चिकित्वोऽथा नो धा अध्वरं देववीतौ.. (५) हे सर्वज्ञ अग्नि! तुमसे पहले जो विशेष यज्ञ करने वाले हुए थे एवं स्वधा के साथ उत्तम तथा मध्यम स्थानों पर बैठे कर जिन्होंने सुख पाया था, उनके धारक गुणों का विचार करके पहले उनका यज्ञ पूरा करो. इसके बाद देवों को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ पूरा करो. (५) सूक्त—१८ देवता—अग्नि भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः. पुरुद्रुहो हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः.. (१) हे अग्नि! तुम हमारे सामने आकर अनुकूल एवं कर्मसाधक बनो, जिस प्रकार मित्र के प्रति मित्र एवं संतान के प्रति माता-पिता होते हैं. मनुष्य मनुष्यों के द्रोही बने हैं. तुम हमारे विरोधी शत्रुओं को भस्म करो. (१) तपो ष्वग्ने अन्तराँ अमित्रान् तपा शंसमरुषः परस्य. तपो वसो चिकितानो अचित्तान्वि ते तिष्ठन्तामजरा अयासः.. (२) हे अग्नि! हमें हराने के इच्छुक शत्रुओं के बाधक बनो. हमारे शत्रु तुम्हें द्रव्य नहीं देते, उनकी इच्छा नष्ट करो. हे निवास देने वाले एवं कर्मज्ञाता अग्नि! यज्ञकर्म में मन न लगाने वालों को दुःखी करो, क्योंकि तुम्हारी किरणें जरारहित एवं निर्बाध हैं. (२) इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय. यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्.. (३) हे अग्नि! मैं धन की अभिलाषा करता हुआ तुम्हें वेग और सामर्थ्य देने के लिए समिधा एवं घी के साथ हव्य देता हूं. मैं जब तक स्तुतियों से तुम्हारी वंदना कर सकूं, तब तक मुझे धन दो एवं मेरी इस स्तुति को अपरिमित धन के हेतु अद्वितीय बनाओ. (३) उच्छोचिषा सहसस्पुत्र स्तुतो बृहद्वयः शशमानेषु धेहि. ebook converter DEMO Watermarks*

रेवदग्ने विश्वामित्रेषु शं योर्मर्मृज्मा ते तन्वं१ भूरि कृत्वः.. (४) हे बल के पुत्र अग्नि! अपनी ज्योति से प्रकाशमान बनो एवं स्तुति सुनकर प्रशंसा करने वाले विश्वासपात्र पुत्रों को बहुत धन से युक्त अन्न, आरोग्य तथा निर्भयता प्रदान करो. हे यज्ञकर्त्ता अग्नि! हम बार-बार तुम्हारे शरीर को सींखें. (४) कृधि रत्नं सुसनितर्धनानां स घेदग्ने भवसि यत्समिद्धः. स्तोतुर्दुरोणे सुभगस्य रेवत्स्पृश्रा करस्ना दधिषे वपूंषि.. (५) हे इष्टदाता अग्नि! हमें धनों में उत्तम धन दो. जिस समय तुम प्रज्वलित बनो, उस समय उत्तम धन दो. शोभन धनयुक्त स्तोता के घर की ओर अपनी दोनों सुंदर भुजाओं को धन देने के लिए फैलाओ. (५) सूक्त—१९ देवता—अग्नि अग्निं होतारं प्र वृणे मियेधे गृत्सं कविं विश्वविदममूरम्. स नो यक्षद्देवताता यजीयान्नाये वाजाय वनते मघानि.. (१) हम देवस्तुतिकारक, सर्वज्ञ एवं अमूढ़ अग्नि को इस यज्ञ में होता वरण करते हैं. वह अतिशय यज्ञपात्र होकर हमारे कल्याण के लिए देव संबंधी यज्ञ करें तथा धन व अन्न देने के लिए हमारा हव्य स्वीकार करें. (१) प्र ते अग्ने हविष्मतीमियर्म्यच्छा सुद्युम्नां रातिनीं घृताचीम्. प्रदक्षिणिद्देवतातिमुराणः सं रातिभिर्वसुभिर्यज्ञमश्रेत्.. (२) हे अग्नि! मैं तेजयुक्त, हव्य से पूर्ण, हव्य देने वाला एवं घी से भरा हुआ जुहू नामक पात्र तुम्हारे सामने करता हूं. देवों का मान बढ़ाने वाले अग्नि हमें देने के लिए धन लेकर प्रदक्षिणा करते हुए यज्ञ में आवें. (२) स तेजीसया मनसा त्वोत उत शिक्ष स्वपत्यस्य शिक्षोः. अग्ने रायो नृतमस्य प्रभूतौ भूयाम ते सुष्टुतयश्च वस्वः.. (३) हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा रक्षित व्यक्ति का मन तेजस्वी हो जाता है. उसे उत्तम संतानयुक्त धन दो. हे अभीष्ट फल दान के इच्छुक अग्नि! तुम उत्तम धन देने वाले हो. तुम्हारी महिमा से हम तुम्हारी स्तुति करते हुए धन के पात्र बनें. (३) भूराणि हि त्वे दधिरे अनीकाग्ने देवस्य यज्यवो जनासः. स आ वह देवतातिं यविष्ठ शर्धो यदद्य दिव्यं यजासि.. (४) हे प्रकाशयुक्त अग्नि! तुम्हारा यज्ञ करने वालों ने बहुत तेज प्रदान किया है. तुम यज्ञ के

योग्य देवों को यहां बुलाओ, क्योंकि तुम देवों का तेज धारण करते हो. (४) यत्त्वा होतारमनजन्मिषेधे निषादयन्तो यजथाय देवाः. स त्वं नो अग्नेऽवितेह बोध्यधि श्रवांसि धेहि नस्तनूषु.. (५) हे अग्नि! यज्ञकर्म करने के लिए बैठे हुए तेजस्वी ऋत्विज् यज्ञ में तुम्हें होता नाम देकर घी की आहुति से सींचते हैं. अतः तुम हमारी रक्षा के निमित्त आओ एवं हमारी संतान को अन्न दो. (५) सूक्त—२० देवता—अग्नि अग्निमुषमश्विना दधिक्रां व्युष्टिषु हवते वह्निरुक्थैः. सुज्योतिषो नः शृण्वन्तु देवाः सजोषसो अध्वरं वावशनाः.. (१) हव्य वहन करने वाले अग्नि उषा को अधिकाररहित करते समय उषा, अश्विनीकुमार एवं दधिक्रा को सूक्तों के द्वारा बुलाते हैं. शोभन बुद्धि वाले एवं परस्पर संगत देवगण हमारे यज्ञ की कामना करते हुए उस आह्वान को सुनें. (१) अग्ने त्री ते वाजिना त्री षधस्था तिस्रस्ते जिह्वा ऋतजात पूर्वीः. तिस्र उ ते तन्वो देववातास्ताभिर्नः पाहि गिरो अप्रयुच्छन्.. (२) हे यज्ञों में उत्पन्न अग्नि! तुम्हारे अन्नस्थान एवं देवों का उदर पूर्ण करने वाली जिह्वाएं तीन हैं. तुम सावधान होकर देवों द्वारा अभिलषित तीन शरीरों के द्वारा हमारे स्तोत्रों की रक्षा करो. (२) अग्ने भूरीणि तव जातवेदो देव स्वधावोऽमृतस्य नाम. याश्च माया मायिनां विश्वमिन्व त्वे पूर्वीः सन्दधुः पृष्टबन्धो.. (३) हे द्योतमान, जातवेद, अन्न स्वामी एवं मरणरहित अग्नि! देवों ने तुम्हें बहुत से नाम दिए हैं. हे विश्वतृप्तिकारक एवं वांछित फल देने वाले अग्नि! देवों ने मायावियों की जो बहुत सी मायाएं तुम में धारण की थीं, वे तुममें हैं. (३) अग्निर्नेता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा. स वृत्रहा सनयो विश्ववेदाः पर्षद्विश्वाति दुरिता गृणन्तम्.. (४) ऋतुओं के पालक सूर्य के समान जो अग्नि मानवों और देवों के नियामक, सत्यकर्मा, वृत्रनाशक, सनातन, सर्वज्ञाता एवं तेजस्वी हैं, वे स्तुतिकर्त्ता के सारे पापों का अतिक्रमण करके पार लगावें. (४) दधिक्रामग्निमुषसं च देवीं बृहस्पतिं सवितारं च देवम्. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२१ देवता—अग्नि

अश्विना मित्रावरुणा भगं च वसून्द्रदाँ आदित्याँ इह हुवे.. (५) मैं दधिक्रा, अग्नि, उषादेवी, बृहस्पति, सविता देव, अश्विनीकुमार, मित्र, वरुण, भग, वसूओं, रुद्रों एवं आदित्यों को इस यज्ञ में बुलाता हूं. (५) सूक्त—२१ देवता—अग्नि इमं नो यज्ञममृतेषु धेहीमा हव्या जातवेदो जुषस्व. स्तोकानामग्ने मेदसो घृतस्य होतः प्राशान प्रथमो निषद्य.. (१) हे जातवेद! हमारा यह यज्ञ देवों के पास ले जाओ एवं इन हव्यों का सेवन करो. हे होता! यज्ञ में बैठकर तुम सबसे पहले चर्बी और घी की बूंदों को भली-भांति भक्षण करो. (१) घृतवन्तः पावक ते स्तोकाः श्चोतन्ति मेदसः. स्वधर्मन्देववीतये श्रेष्ठं नो धेहि वार्यम्.. (२) हे पापशोधक अग्नि! इस सांगोपांग यज्ञ में तुम्हारे एवं देवों के भक्षण के लिए घी की बूंदें टपक रही हैं. इस कारण हमें श्रेष्ठ एवं वरण योग्य धन दीजिए. (२) तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽग्ने विप्राय सन्त्य. ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे यज्ञस्य प्राविता भव.. (३) हे यज्ञकर्त्ताओं को फलप्रद एवं मेधावी अग्नि! घी की टपकने वाली बूंदें तुम्हारे लिए हैं. हे ऋषि एवं श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हें प्रज्वलित किया जाता है. तुम यज्ञपालक बनो. (३) तुभ्यं श्चोतन्त्यध्रिगो शचीवः स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य. कविशस्तो बृहता भानुनागा हव्या जुषस्व मेधिर.. (४) हे नित्य गतिशील एवं शक्तिसंपन्न अग्नि! चर्बीरूपी घी की सभी बूंदें तुम्हारे लिए टपकती हैं. हे कवियों द्वारा स्तुत अग्नि! तुम महान् तेज के साथ यज्ञ में आओ. हे मेधावी! हमारे हव्यों का सेवन करो. (४) ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्धृतं प्र ते वयं ददामहे. श्चोतन्ति ते वसो स्तोका अधि त्वचि प्रति तान्देवशो विहि.. (५) हे अग्नि! हम पशु के मध्य भाग से अत्यंत ओजपूर्ण चर्बी तुम्हें देते हैं. हे निवास प्रदान करने वाले अग्नि! त्वचा के ऊपर तुम्हारे उद्देश्य से जो बूंदें गिरती हैं, उन्हें प्रत्येक देव को प्रदान करो. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२२ देवता—अग्नि

सूक्त—२२ देवता—अग्नि अयं सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः. सहस्रिणं वाजमत्यं न सप्तिं ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (१) यह वही अग्नि है, जिस में अभिषुत सोमरस को कामना करने वाले इंद्र ने अपने उदर में रखा था. हे जातवेद अग्नि! हजार रूपों वाले अश्व के समान वेगशाली एवं हव्य का सेवन करने वाले तुम्हारी स्तुति सारा संसार करता है. (१) अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र. येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (२) हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम्हारा जो तेज आकाश, धरती, ओषधियों एवं जल में है, जिस तेज के द्वारा तुमने अंतरिक्ष को विस्तृत किया है, वह तेज आसमान, दीप्तिमान् सागर के समान विस्तृत एवं मनुष्यों के लिए दर्शनीय है. (२) अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ ऊचिषे धिष्ण्या ये. या रोचने परस्तात्सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त आपः.. (३) हे अग्नि! तुम आकाश में व्याप्त जल को लक्ष्य करके जाते हो एवं प्राण संयुक्त देवों को एकत्र करते हो. सूर्य के ऊपर रोचन नामक लोक में तथा सूर्य के नीचे जो जल वर्तमान हैं, उन्हें तुम्हीं प्रेरणा देते हो. (३) पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः. जुषन्तां यज्ञमद्रुहोऽनमीवा इषो महीः.. (४) बालू मिली हुई अग्नियां खुदाई के काम आने वाले औजारों से मिलकर इस यज्ञ का सेवन करें तथा हमारे प्रति द्रोहरहित होकर हमें रोगरहित महान् अन्न दें. (४) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५) हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधन रूप गौ प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो. (५) सूक्त—२३ देवता—अग्नि निर्मथितः सुधित आ सधस्थे युवा कविरध्वरस्य प्रणेता. ebook converter DEMO Watermarks*

जूर्यत्स्वग्निरजरो वनेष्वत्रा दधे अमृतं जातवेदाः.. (१) अरणिमंथन द्वारा उत्पन्न, यजमान के घर में यज्ञकुंड में स्थापित, युवा, क्रांतदर्शी, यज्ञ पूर्ण करने वाले, जातवेद, महान् एवं अरण्यों के नष्ट होने पर भी जरारहित अग्नि इस यज्ञ में अमृत धारण करते हैं. (१) अमन्थिष्टां भारता रेवदग्निं देवश्रवा देववातः सुदक्षम्. अग्ने वि पश्य बृहताभि रायेषां नो नेता भवतादनु द्यूनू.. (२) हे अग्नि! भरत के पुत्रों—देवाश्रय एवं देववात ने शोभन सामर्थ्य तथा धनयुक्त तुम्हें अरणिमंथन द्वारा उत्पन्न किया था. हे अग्नि! पर्याप्त धन लेकर हमारी ओर देखो एवं प्रतिदिन हमारे अन्नों के लाने वाले बनो. (२) दश क्षिपः पूर्व्यं सीमजीजनन्त्सुजातं मातृषु प्रियम्. अग्निं स्तुहि दैववातं देवश्रवो यो जनानामसद्वशी.. (३) हे अग्नि! दस उंगलियों ने तुझ पुरातन को उत्पन्न किया है. हे देवश्रव! माता के समान अरणियों के बीच में भली प्रकार उत्पन्न, प्रिय एवं देववात द्वारा मथित अग्नि की स्तुति करो. वे अग्नि यजमानों के वश में रहते हैं. (३) नि त्वा दधे वर आ पृथिव्या इळायास्पदे सुदिनत्वे अह्नाम्. दृषद्वत्यां मानुष आपयायां सरस्वत्यां रेवदग्ने दिदीहि.. (४) हे अग्नि! उत्तम दिनों की प्राप्ति के लिए मैं तुम्हें गौ-रूप-धारिणी धरती के उत्तम स्थान में स्थापित करता हूं. हे धनसंपन्न अग्नि! तुम दृषद्वती, आपया एवं सरस्वती नदियों के मानव-सहित तटों पर जलो. (४) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५) हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेकानेक यज्ञकर्मों की साधन रूप गौ प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो. (५) सूक्त—२४ देवता—अग्नि अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य. दुष्टरस्तरन्नरातीर्वर्र्चो धा यज्ञवाहसे.. (१) हे अग्नि! शत्रुओं की सेना को हराओ तथा यज्ञ में विघ्न डालने वालों को दूर भगाओ. तुम अजित हो, इसलिए शत्रुओं को अपने तेज से तिरस्कृत करके यजमान को अन्न दो. (१)

अग्न इळा समिध्यसे वीतिहोत्रा अमर्त्यः. जुषस्व सू नो अध्वरम्.. (२) हे यज्ञ को प्रेम करने वाले तथा मरणरहित अग्नि! तुम्हें उत्तर वेदी पर जलाया जाता है. तुम हमारे यज्ञ की भली प्रकार सेवा करो. (२) अग्ने द्युम्नेन जागृवे सहसः सूनवाहुत. इदं बर्हिः सदो मम.. (३) हे स्वतेज से जागृत एवं बल के पुत्र अग्नि! मेरे द्वारा बुलाए हुए तुम मेरे द्वारा बिछाए हुए कुशों पर बैठो. (३) अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्देवेभिर्महया गिरः. यज्ञेषु य उ चायवः.. (४) हे अग्नि! अपने पूजकों के यज्ञों में समस्त तेजस्वी अग्नियों के साथ स्तुति वचनों का आदर करो. (४) अग्ने दा दाशुषे रयिं वीरवन्तं परीणसम्. शिशीहि न सूनुमतः.. (५) हे अग्नि! हव्यदाता यजमान को संतानयुक्त पर्याप्त धन दो तथा हम संतान वालों की उन्नति करो. (५) सूक्त—२५ देवता—अग्नि अग्ने दिवः सूनुरसि प्रचेतास्तना पृथिव्या उत विश्ववेदाः. ऋधग्देवाँ इह यजा चिकित्वः.. (१) हे सर्वविषयज्ञाता तथा यज्ञकर्म के ज्ञान से युक्त अग्नि! तुम आकाश तथा धरती के पुत्र हो. हे चेतनाशील अग्नि! तुम इस यज्ञ में अलग-अलग हवि देकर देवों का आदर करो. (१) अग्निः सनोति वीर्याणि विद्वानत्सनोति वाजममृताय भूषण्. स नो देवाँ एह वहा पुरुक्षो.. (२) अग्नि स्वयं को विभूषित करके यजमान को सामर्थ्य तथा देवों को अन्न देते हैं. हे बहुविध अन्नयुक्त अग्नि! हमारे कल्याण के निमित्त देवों को इस यज्ञ में लाओ. (२) अग्निद्यावापृथिवी विश्वजन्ये आ भाति देवी अमृते अमूरः. क्षयन्वाजैः पुरुश्चन्द्रो नमोभिः.. (३) सर्वज्ञ, समस्त विश्व के स्वामी, अमित प्रकाशयुक्त, बल एवं अन्नसहित अग्नि संसार को जन्म देने वाले, द्योतमान और मरणरहित धरती-आकाश को प्रकाशित करते हैं. (३) अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुतावते यज्ञमिहोप यातम्. ebook converter DEMO Watermarks*

अमर्धन्ता सोमपेयाय देवा.. (४) हे अग्नि! इंद्र के साथ यहां आकर यज्ञ की हिंसा न करते हुए सोम निचोड़ने वाले यजमान के घर में सोम पीने के लिए आओ. (४) अग्ने अपां समिध्यसे दुरोणे नित्यः सूनो सहसो जातवेदः. सधस्थानि महयमान ऊती.. (५) हे बल के पुत्र, अविनाशी एवं जातवेद अग्नि! रक्षा के द्वारा लोकों को महान् बनाते हुए तुम जल के स्थान आकाश में भली प्रकार प्रकाशित होते हो. (५) सूक्त—२६ देवता—अग्नि वैश्वानरं मनसाग्निं निचाय्या हविष्मन्तो अनुषत्यं स्वर्विदम्. सुदानुं देवं रथिरं वसूयवो गीर्भी रण्वं कुशिकासो हवामहे.. (१) हे अग्नि! हव्य धारण करने वाले, धन के इच्छुक एवं कुशिक गोत्र में उत्पन्न हम लोग तुझ वैश्वानर, सत्यप्रतिज्ञ, स्वर्गादि फल देने वाले, यज्ञ के ज्ञाता, फल देने वाले, रथ के स्वामी, यज्ञों में जाने वाले एवं तेजस्वी अग्नि को अतःकरण से जानते हुए स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. (१) तं शुभ्रमग्निमवसे हवामहे वैश्वानरं मातरिश्वानमुक्थ्यम्. बृहस्पतिं मनुषो देवतातये विप्रं श्रोतारमतिथिं रघुष्यदम्.. (२) हम द्योतमान, वैश्वानर, मातरिश्वा, ऋचाओं द्वारा आह्वानयोग्य, यज्ञ के स्वामी, मेधावी, श्रोता, अतिथि, शीघ्रगामी अग्नि को अपनी रक्षा तथा यजमान के यज्ञ के निमित्त बुलाते हैं. (२) अश्वो न क्रन्दञ्जनिभिः समिध्यते वैश्वानरः कुशिकेभिर्युगेयुगे. स नो अग्निः सुवीर्यं स्वश्व्यं दधातु रत्नममृतेषु जागृविः.. (३) हिनहिनाता हुआ घोड़े का बच्चा जैसे घोड़ी के द्वारा बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार कुशिक गोत्र वाले लोग अग्नि को प्रतिदिन बढ़ाते हैं. मरणरहित देवों में जागने वाले अग्नि हमें उत्तम संतान एवं श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त धन दें. (३) प्र यन्तु वाजास्तविषीभिरग्नयः शुभे सम्मिश्लाः पृषतीरयुक्षत. बृहदुक्षो मरुतो विश्ववेदसः प्र वेपयन्ति पर्वतां अदाभ्याः.. (४) वेग वाली अग्नियां जल की ओर जावें. बलशाली मरुतों के साथ जल में मिलकर बूंदों को बनावें. सब कुछ जानने वाले एवं अपराजेय मरुद्गण अधिक जल से भरे हुए तथा ebook converter DEMO Watermarks*