सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

जिस इंद्र के विस्तार को आकाश और पृथ्वी नहीं पा सके हैं, आकाश के ऊपर होने
वाला जलप्रवाह जिस इंद्र के तेज का अंत नहीं जान सका, हे इंद्र! समस्त प्राणी समुदाय
उसी तरह तुम्हारे अपने वश में है. (१४)
आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा.
वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ.. (१५)
हे इंद्र! इस युद्ध में मरुद्गणों ने तुम्हारी अर्चना की थी. जिस समय तुमने तेज धार वाले
वज्र से वृत्र के मुख पर चोट की, उस समय समस्त देव संग्राम में तुम्हें आनंद प्राप्त करता
हुआ देखकर प्रसन्न हो रहे थे. (१५)
सूक्त—५३ देवता—इंद्र
न्यू३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः.
नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते.. (१)
हम महान् इंद्र के लिए शोभन स्तुतियों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि परिचर्या करने वाले
यजमान के घर में इंद्र की स्तुतियां की जाती हैं. जिस प्रकार चोर सोए हुए लोगों की संपत्ति
छीन लेते हैं, उसी प्रकार इंद्र असुरों के धन पर तुरंत अधिकार कर लेते हैं. धन देने वालों के
विषय में अनुचित स्तुति नहीं की जाती. (१)
दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः.
शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिद्रं गृणीमसि.. (२)
हे इंद्र! तुम अश्व, गो एवं जौ आदि धान्य के देने वाले हो. तुम निवास हेतु धन के स्वामी
एवं सबके पालक हो. तुम दान के नेता एवं प्राचीन देव हो. तुम हवि देने वाले यजमानों की
इच्छाओं को अभिमत फल देकर पूरा करते हो तथा उनके लिए मित्र के समान अत्यंत प्रिय
हो. हम इस प्रकार के इंद्र के लिए स्तुति वचनों का प्रयोग करते हैं. (२)
शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु.
अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः.. (३)
हे इंद्र! तुम प्रज्ञावान् वृत्रवधादि अनेक कर्मों के कर्त्ता एवं अतिशय तेजस्वी हो. हम यह
जानते हैं कि सर्वत्र वर्तमान धन तुम्हारा है. हे शत्रुनाशक इंद्र! इसलिए हमें धन दो. जो स्तोता
तुम्हें चाहते हैं, उनकी अभिलाषा को अपूर्ण मत रहने दो. (३)
एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना.
इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! हमारे द्वारा दिए हुए पुरोडाशादि हव्य एवं सोमरस से प्रसन्न होकर हमें गायों
और घोड़ों के साथ-साथ धन भी दो. इस प्रकार हमारी दरिद्रता मिटाकर तुम शोभन मन बन
जाओ. इंद्र इस सोमरस के कारण संतुष्ट होकर हमारी सहायता करेंगे तो हम दस्युओं का
नाश करके एवं शत्रुओं से छुटकारा पाकर इंद्र के द्वारा दिए हुए अन्न का उपभोग करेंगे. (४)
समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः.
सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रयाश्वावत्या रभेमहि.. (५)
हे इंद्र! हम धन और अन्न के साथ-साथ ऐसा बल भी प्राप्त करें, जो बहुतों का
आह्लादक एवं दीप्तिमान् हो. शत्रुविनाश में समर्थ तुम्हारी उत्तम बुद्धि हमारी सहायता करे.
तुम्हारी बुद्धि स्तोताओं को गाय आदि प्रमुख पशु एवं अश्व प्रदान करे. (५)
ते त्वा मदा अमदन्तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते.
यत्कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्मते नि सहस्राणि बर्हयः.. (६)
हे सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर का वध किया, उस समय
तुम्हारे मादक मरुद्गण ने तुम्हें प्रमुदित किया था. तुम वर्षा करने में समर्थ हो. जब तुमने
शत्रुओं की बाधा को पार करके स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता यजमान के दस हजार उपद्रवों को
समाप्त किया था, उस समय चरुपुरोडाशादि हव्य एवं प्रसिद्ध सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया
था. (६)
युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा.
नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम्.. (७)
हे शत्रुध्वंसक इंद्र! तुम सदा युद्धशील रहते हो एवं अपने बल से शत्रुओं के एक नगर के
बाद दूसरे का विनाश करते हो. हे इंद्र! तुमने वज्र की सहायता से दूर देश में वर्तमान, प्रसिद्ध,
मायावी नमुचि नामक असुर का वध किया था. (७)
त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठ यातिथिग्वस्य वर्तनी.
त्वं शता वङ्गदस्याभिनत्पुरोऽनानुदः परिषूता ऋजिश्वना.. (८)
हे इंद्र! तुमने अतिथिग्व नामक राजा की सहायता करने के लिए तेज एवं शत्रुनाशक
आयुध से करंज एवं पर्णय नामक असुरों का वध किया था. ऋजिश्वान् नामक राजा ने वंगृद
असुर के सौ नगरों को चारों ओर से घेर लिया था. तुमने अकेले ही उन नगरों का विनाश कर
दिया था. (८)
त्वमेताञ्जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः.
षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्.. (९)
असहाय सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए साठ हजार निन्यानवे
ebook converter DEMO Watermarks*

सहायकों के सहित बीस जनपद शासक आए थे. हे प्रसिद्ध इंद्र! तुमने शत्रुओं द्वारा अलंघ्य
चक्र से उन अनेक को पराजित किया था. (९)
त्वमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम्.
त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः.. (१०)
हे इंद्र! तुमने पालकशक्ति द्वारा सुश्रवा एवं सूर्यवान् नामक राजाओं की रक्षा की थी.
तुमने कुत्स, अतिथिग्व एवं आयु नामक राजाओं को महान् एवं तरुण राजा सुश्रवा के अधीन
किया था. (१०)
य उद्दीचन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम.
त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (११)
हे इंद्र! यज्ञ की समाप्ति पर उपस्थित देवों द्वारा पालित तुम्हारे मित्र तुल्य प्रिय एवं
अतिशय कल्याणपात्र हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हम तुम्हारी दया से शोभन पुत्रों एवं उत्तम
दीर्घ जीवन को प्राप्त करें. (११)
सूक्त—५४ देवता—इंद्र

प्रभूत यशस्वी एवं शक्तिसंपन्न इंद्र के प्रति स्तुतिवचनों का उच्चारण करो. वे इंद्र शत्रुनाशक,
अश्वों द्वारा सेवित, कामनाएं पूर्ण करने वाले एवं वेगवान् हैं. (३)
त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत्.
यन्मायिनो वन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि.. (४)
हे इंद्र! तुमने विशाल आकाश के ऊपर उठा हुआ प्रदेश कंपित कर दिया था एवं
शत्रुनाशक शक्ति द्वारा शंबर असुर का वध किया था. तुमने हर्षित एवं प्रगल्भ मन से तेज
धार वाले तथा चमकीले वज्र को मायावी असुर समूह की ओर चलाया था. (४)
नि यद्वृणक्षि श्वसनस्य मूर्धनि शुष्णस्य चिद्व्रन्दिनो रोरुवद्वना.
प्राचीनेन मनसा बर्हणावता यदद्या चित्कृणवः कस्त्वो परि.. (५)
हे इंद्र! तुम वायु के तथा जल सोखने वाले एवं फलों को पकाने वाले सूर्य के ऊपर वाले
प्रदेश में जल बरसाते हो. हे दृढ़ निश्चय एवं शत्रुविनाशक हृदय वाले इंद्र! आज आपने
पराक्रम दिखाया है, उससे स्पष्ट है कि आपसे बढ़कर कोई नहीं है. (५)
त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो.
त्वं रथेमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव.. (६)
हे शतक्रतु! तुमने नर्य, तुर्वश, यदु एवं वय्य कुल में उत्पन्न तुर्वीति नामक राजाओं की
रक्षा की है. तुमने धन प्राप्ति के उद्देश्य से प्रारंभ संग्राम में रथ एवं एतश ऋषियों की रक्षा की
तथा शंबर असुर के निन्यानवे नगरों का ध्वंस किया है. (६)
स घा राजा सत्पतिः शूशुवज्जनो रातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति.
उक्था वा यो अभिगृणाति राधसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः.. (७)
वे ही यजमान सुशोभित होकर सज्जनों के पालन के साथ-साथ अपनी भी वृद्धि करते
हैं, जो इंद्र को हव्य प्रदान करके उनकी स्तुति करते हैं. अभिमत फलदाता इंद्र ऐसे ही लोगों
के लिए आकाश से मेघों द्वारा वर्षा करते हैं. (७)
असमं क्षत्रमसमा मनीषा प्र सोमपा अपसा सन्तु नेमे.
ये त इन्द्र ददृषो वर्धयन्ति महि क्षत्रं स्थविरं वृष्ण्यं च.. (८)
इंद्र का बल एवं बुद्धि अतुलनीय है. हे इंद्र! जो सोमपायी यजमान अपने यज्ञकर्म द्वारा
तुम्हारा महान् बल एवं स्थूल पौरुष बढ़ाते हैं, उनकी उन्नति हो. (८)
तुभ्येदेते बहुला अद्रिदुग्धाश्चमूसदश्चमसा इन्द्रपानाः.
व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*

अपामतिष्ठद्धरुणह्वरं तमोऽन्तर्वृत्रस्य जठरेषु पर्वत:

हे इंद्र! यह सोमरस पत्थर की सहायता से तैयार किया गया है एवं पात्रों में रखा हुआ
है. यह तुम्हारे पीने योग्य है. तुम इसे पीकर अपनी अभिलाषा पूर्ण करो एवं उसके पश्चात् हमें
धन देने के कर्म में अपना मन लगाओ. (९)
अपामतिष्ठद्धरुणह्वरं तमोऽन्तर्वृत्रस्य जठरेषु पर्वत:
अभीमिन्द्रो नद्यो वव्रिणा हिता विश्वा अनुष्ठा: प्रवणेषु जिघ्नते.. (१०)
वृष्टि की धाराओं को रोकने वाला अंधकार फैला हुआ था. तीनों लोकों का आवरण
करने वाले वृत्र असुर के पेट में मेघ था. जो जल वृत्र द्वारा रोक लिया गया था, उसे इंद्र ने नीचे
धरती की ओर बहाया. (१०)
स शेवृधमधि धा द्युम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाळिन्द्र तव्यम्.
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन्न्राये च नः स्वपत्या इषे धाः.. (११)
हे इंद्र! तुम हमें रोगों की शांति के उपरांत बढ़ने वाला यश दो. हमें महान् एवं शत्रुओं को
हराने वाला बल दो, हमें धनवान् बनाकर हमारी रक्षा करो, विद्वानों का पालन करो एवं हमें
धन, सुंदर संतान तथा अन्न दो. (११)
सूक्त—५५ देवता—इंद्र
दिवश्चिदस्य वरिमा वि पप्रथ इन्द्रं न मह्ना पृथिवी चन प्रति.
भीमस्तुविष्माञ्चर्षणिभ्य आतपः शिशीते वज्रं तेजसे न वंसगः.. (१)
इंद्र का प्रभाव आकाश की अपेक्षा अधिक विस्तृत है. पृथ्वी भी इंद्र की महत्ता की
समानता नहीं कर सकती. शत्रुओं के लिए भयंकर एवं बुद्धिमान् इंद्र अपने भक्तजनों के
निमित्त शत्रुओं को संताप देते हैं. जैसे सांड़ युद्ध के लिए अपने सींग तेज करता है, उसी
प्रकार इंद्र अपने वज्र को तेज करने के लिए रगड़ते हैं. (१)
सो अर्णवो न नद्यः समुद्रियः प्रति गृभ्णाति विश्रिता वरीमभिः.
इन्द्रः सोमस्य पीतये वृषायते सनात्स युध्म ओजसा पनस्यते.. (२)
आकाश में व्याप्त इंद्र दूर तक फैले हुए जल को उसी प्रकार ग्रहण कर लेते हैं, जिस
प्रकार सागर विशाल जलराशि को अपने में समेट लेता है. इंद्र सोमरस पीने के लिए बैल के
समान दौड़ कर जाते हैं एवं वे महान् योद्धा चिरकाल से अपने वृत्रवधादिकर्म की प्रशंसा
चाहते हैं. (२)
त्वं तमिन्द्र पर्वतं न भोजसे महो नृम्णस्य धर्मणामिरज्यसि.
प्र वीर्येण देवताति चेकिते विश्वस्मा उग्रः कर्मणे पुरोहितः.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! तुम अपने उपभोग के लिए मेघ को भिन्न नहीं करते एवं विशाल धन के धारक
कुबेरादि पर अधिकार जमाते हो. हम लोग इंद्र को उनकी शक्ति के कारण भली प्रकार जानते
हैं. वे इंद्र अपने वृत्रवधादि रूप कार्यों के द्वारा सभी देवों में आगे का स्थान प्राप्त करते हैं.
(३)
स इद्धने नमस्युभिर्वचस्यते चारु जनेषु प्रब्रुवाण इन्द्रियम्.
वृषा छन्दुर्भवति हर्यतो वृषा क्षेमेण धेनां मघवा यदिन्वति.. (४)
स्तोता ऋषि अरण्य में इंद्र की स्तुति करते हैं. इंद्र अपने भक्तों में अपने शौर्य को प्रकट
करते हुए शोभा पाते हैं. अभीष्ट वर्षा करने वाले इंद्र हव्यदाता यजमान की रक्षा करते हैं. जब
यजमान यज्ञ की इच्छा से इंद्र की स्तुति करता है, तभी वे उसे यज्ञ में तत्पर कर देते हैं. (४)
स इन्महानि समिथानि मज्मना कृणोति युध्म ओजसा जनेभ्यः.
अधा चन श्रद्दधति त्विषीमत इन्द्राय वज्रं निघनिघ्नते वधम्.. (५)
योद्धा इंद्र अपने भक्तों के कल्याण के लिए सबको शुद्ध करने वाले स्वकीय बल से
महान् युद्ध करते हैं. इंद्र जिस समय हनन का साधन वज्र मेघों पर फेंकते हैं. उस समय सब
लोग बलशाली कहकर तेजस्वी इंद्र के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं. (५)
स हि श्रवस्युः सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाश्यन्.
ज्योतींषि कृण्वन्नवृकाणि यज्यवेऽव सुक्रतुः सर्तवा अपः सृजत्.. (६)
शोभन कर्मों वाले इंद्र यश की कामना करते हुए असुरों के सुंदर बने हुए घरों को अपनी
शक्ति से नष्ट कर देते हैं. वे धरती के समान विस्तृत हो जाते हैं एवं सूर्य आदि ज्योतिपिंडों को
आवरणरहित करके यजमान के निमित्त बहने वाला जल बरसाते हैं. (६)
दानाय मनः सोमपावन्न्रस्तु तेऽर्वाञ्चा हरी वन्दनश्रुदा कृधि.
यमिष्ठासः सारथयो य इन्द्र ते न त्वा केता आ दभ्नुवन्ति भूर्णयः.. (७)
हे सोमपायी इंद्र! तुम्हारा मन दान में लगा रहे. हे स्तुतिप्रिय इंद्र! तुम अपने हरि नामक
घोड़ों को हमारे यज्ञ की ओर अभिमुख करो. हे इंद्र! तुम्हारे सारथि घोड़ों को वश में करने में
अत्यंत कुशल हैं. इस कारण आयुध धारण करने वाले तुम्हारे शत्रु तुम्हें नहीं हरा सकते. (७)
अप्रक्षितं वसु बिभर्षि हस्तयोरषाळ्हं सहस्तन्वि श्रुतो दधे.
आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिस्तनूषु ते क्रतव इन्द्र भूरयः.. (८)
हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम अपने हाथों में क्षयरहित धन एवं शरीर में अपराजेय बल धारण
करते हो. जिस प्रकार पानी भरने वाले लोग कुएं को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार वृत्रवधादि
वीरतापूर्ण कर्म तुम्हारे शरीर को घेरे हुए हैं. हे इंद्र! इसीलिए तुम्हारे शरीर में अनेक कर्म
विद्यमान हैं. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—५६ देवता—इंद्र

सूक्त—५६ देवता—इंद्र
एष प्र पूर्वीरव तस्य चम्रिषोऽत्यो न योषामुदयंस्त भुर्वणिः.
दक्षं महे पाययते हिरण्ययं रथमावृत्या हरियोगमृभ्वसम्.. (१)
जिस प्रकार घोड़ा क्रीड़ा के निमित्त घोड़ी की ओर दौड़कर जाता है, उसी प्रकार पर्याप्त
आहार करने वाले इंद्र यजमान द्वारा बहुत से पात्रों में रखे हुए सोमरस की ओर शीघ्रता से
जाते हैं. वृत्रवधादि महान् कार्य में दक्ष वे इंद्र अपना स्वर्ण निर्मित, अश्वयुक्त एवं तेजस्वी रथ
रोककर सोमरस पीते हैं. (१)
तं गूर्तयो नेमन्निषः परीणसः समुद्रं न संचरणे सनिष्यवः.
पतिं दक्षस्य विदथस्य नू सहो गिरिं न वेना अधि रोह तेजसा.. (२)
जिस प्रकार धन चाहने वाले वणिक नावों में बैठकर आने-जाने के साधन समुद्र को
व्याप्त किए रहते हैं, उसी प्रकार हाथों में हव्य लिए हुए स्तोता इंद्र को चारों ओर से घेरे रहते
हैं. हे स्तोताओ! नारियां अपने मनपसंद फूल तोड़ने के लिए जिस प्रकार पर्वत पर चढ़ जाती
हैं, उसी प्रकार तुम भी तेजस्वी स्तोत्र के सहारे विशाल यज्ञ के रक्षक एवं शक्तिशाली इंद्र के
समीप पहुंच जाओ. (२)
स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये गिरेर्भृष्टिर्न भ्राजते तुजा शवः.
येन शुष्णं मायिनमासो मदे दुध्र आभूषु रामयन्नि दामनि.. (३)
इंद्र शत्रुनाशक और महान् हैं. इंद्र की दोषरहित एवं शत्रुनाशकारी शक्ति वीर पुरुषों द्वारा
करने योग्य संग्राम में पर्वत की चोटी के समान विराजमान होती है. शत्रुविनाशक एवं
लौहकवचधारी इंद्र ने सोमपान के द्वारा मदोन्मत्त होकर मायावी असुर शुष्ण को बेड़ियां डाल
कर कारागृह में बंद कर दिया था. (३)
देवी यदि तविषी त्वावृधोतय इन्द्रं सिषक्त्युषसं न सूर्यः.
यो धृष्णुना शवसा बाधते तम इयर्ति रेणुं बृहदर्हिरिष्वणिः.. (४)
हे स्तोता! जिस प्रकार सूर्य नित्य उषा का सेवन करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी बल
तुम्हारी रक्षा के निमित्त तुम्हारी स्तुतियां सुनकर वृद्धि प्राप्त करने वाले इंद्र की सेवा करता है.
वे इंद्र, शत्रुनाशक शक्ति द्वारा अंधकार रूपी वृत्र असुर का नाश करते हैं एवं शत्रुओं को
रुलाकर भली प्रकार नष्ट कर देते हैं. (४)
वि यत्तिरो धरुणमच्युतं रजोऽतिष्ठिपो दिव आतासु बर्हणा.
स्वर्मीळ्हे यन्मद इन्द्र हर्यश्वान्हन्वृत्रं निरपामौब्जो अर्णवम्.. (५)
हे शत्रुहंता इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर द्वारा रोके हुए समस्त प्राणियों के

जीवनाधार एवं विनाशरहित जल को आकाश से फैली हुई दिशाओं में बिखेरा था, उस समय
तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर युद्ध में वृत्र का वध कर दिया था एवं जल से पूर्ण मेघ को वर्षा
करने के लिए अधोमुख कर दिया था. (५)
त्वं दिवो धरुणं धिष ओजसा पृथिव्या इन्द्र सदनेषु माहिन:.
त्वं सुतस्य मदे अरिणा अपो वि वृत्रस्य समया पाष्यारुज:.. (६)
हे इंद्र! तुम वृद्धि को प्राप्त करके समस्त विश्व के जीवनाधार वर्षा के जल को अपने
बल द्वारा आकाश से धरती के भागों में स्थापित कर देते हो. तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर
जल को मेघ से पृथक् कर दिया है एवं विशाल पाषाण के द्वारा वृत्र को नष्ट कर दिया है. (६)
सूक्त—५७ देवता—इंद्र
प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे.
अपामिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम्.. (१)
मैं परम दानशील, गुणों से महान्, प्रभूत धनसंपन्न, अमोघबल के स्वामी एवं विशाल
आकार वाले इंद्र को लक्ष्य करके अपनी हार्दिक स्तुति पूर्ण करता हूं. जिस प्रकार नीचे की
ओर बहने वाले जल को कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार इंद्र का बल धारण करने में भी
कोई समर्थ नहीं होगा. स्तोताओं को बलशाली बनाने के लिए इंद्र सर्वत्रव्यापक धन को
प्रकाशित करते हैं. (१)
अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मत:.
यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्र: श्रथिता हिरण्यय:.. (२)
हे इंद्र! यह सारा संसार तुम्हारे यज्ञ में संलग्न था. हव्यदाता यजमान के द्वारा निचोड़ा
हुआ सोमरस तुम्हें उसी प्रकार प्राप्त हुआ था, जिस प्रकार जल नीची जगह पर आ जाता है.
इंद्र का शोभन, स्वर्णमय एवं शत्रुनाशक वज्र पर्वत पर कभी निद्रित नहीं था. (२)
अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे.
यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे.. (३)
हे शोभन उषा! तुम इस यज्ञ में शत्रुओं के लिए भयंकर व परमस्तुतिपात्र इंद्र के लिए
इस समय यज्ञ का अन्न दो. जिस प्रकार सारथि घोड़े को इधर-उधर ले जाता है, उसी प्रकार
इंद्र की सबको धारण करने वाली, प्रसिद्ध एवं पहचान कराने वाली ज्योति उन्हें यज्ञान्न प्राप्त
कराने के लिए इधर-उधर ले जाती है. (३)
इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो.
नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिर: सघत्क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद्वच:.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे प्रभूत धनशाली एवं बहुत से यजमानों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम्हारा आश्रय प्राप्त करके
हम यज्ञकार्य में वर्तमान हैं. हम तुम्हारे ही भक्त हैं. हे स्तुतिपात्र इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त इन
स्तुतियों को कोई प्राप्त नहीं करता. जिस प्रकार पृथ्‍वी अपने समस्त प्राणियों को चाहती है,
उसी प्रकार तुम भी हमारे स्तुति वचनों को प्रेम करो. (४)
भूरि त इन्द्र वीर्यं१तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण.
अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारी सामर्थ्य को कोई भी लांघ नहीं सकता. हम तुम्हारे ही भक्त हैं. हे मघवा!
तुम अपने इस स्तोता की इच्छाओं को पूरा करो. विशाल आकाश ने तुम्हारे शौर्य को स्वीकार
किया था एवं पृथ्वी तुम्हारे बल के सामने झुक गई थी. (५)
त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन्पर्वशश्चकर्तिथ.
अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः.. (६)
हे वज्रधारी इंद्र! तुमने उस प्रसिद्ध एवं विशाल मेघ को अपने वज्र द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर
दिया था एवं उस मेघ द्वारा रोके गए जल को नीचे बहने के लिए छोड़ दिया था. केवल तुम ही
विश्वव्यापी बल धारण करते हो. (६)
सूक्त—५८ देवता—अग्नि
नू चित्सहोजा अमृतो नि तुन्दते होता यद्दूतो अभवद्विवस्वतः.
वि साधिष्ठेभिः पथिभी रजो मम आ देवतातं हविषा विवासति.. (१)
अतिशय बल की सहायता से उत्पन्न एवं अमर अग्नि जलाने में समर्थ है. देवताओं का
आह्वान करने वाले अग्नि जिस समय यजमान का हव्य ले जाने के लिए दूत बने थे, उस
समय अग्नि ने उचित मार्ग से जाकर अंतरिक्ष लोक बनाया था. अग्नि यज्ञ में हव्य दान करके
देवों की सेवा करते हैं. (१)
आ स्वमङ्गा युवमानो अज्रस्तृष्वविषन्नत्तसेषु तिष्ठति.
अत्यो न पृष्ठं प्रुषितस्य रोचते दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदत्.. (२)
जरारहित अग्नि अपने तृणगुल्म आदि खाद्य पदार्थ को अपनी दाहकशक्ति के द्वारा
अपने में मिलाकर एवं भक्षण करके शीघ्र ही बहुत से काठों पर चढ़ गए. जलाने के लिए
इधर-उधर जाने वाली अग्नि की ऊंची ज्वालाएं गतिशील अश्व के समान तथा आकाश स्थित
उन्नत एवं गंभीर शब्दकारी मेघ के समान शोभा पाती हैं. (२)
क्राणा रुद्रेभिर्वसुभिः पुरोहितो होता निषत्तो रयिषाळमर्त्यः.
रथो न विश्ववृज्जसान आयुषु व्यानुषग्वार्या देव ऋण्वति.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नि हव्य का वहन करते हुए रुद्रों तथा वसुओं के सम्मुख स्थान प्राप्त कर चुके हैं एवं
देवों का आह्वान करने के निमित्त यज्ञों में उपस्थित रहते हैं. शत्रुओं का धन जीतने वाले,
मरणरहित एवं दीप्तिमान् अग्नि यजमानों द्वारा स्तुत होकर रथ की भांति चलते हुए प्रजाओं
के पास पहुंचते हैं एवं बार-बार श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं. (३)
वि वातजूतो अतसेषु तिष्ठते वृथा जुहूभिः सृण्या तुविष्वणिः.
तृषु यदग्ने वनिनो वृषायसे कृष्णं त एम रुशदूर्मे अजर.. (४)
वायु द्वारा प्रेरित अग्नि महान् शब्द करते हुए अपनी जलती हुई एवं तीव्र ज्वालाओं के
द्वारा अनायास ही पेड़ों को जला देते हैं. हे अग्नि देव! तुम जिस समय वन के वृक्षों को
जलाने के लिए सांड़ के समान उतावले होते हो, उस समय तुम्हारे गमन का मार्ग काला पड़
जाता है. हे अग्नि! तुम दीप्त ज्वालाओं वाले एवं जरारहित हो. (४)
तपुर्जम्भो वन आ वातचोदितो यूथे न साह्वां अव वाति वंसगः.
अभिव्रजन्नक्षितं पाजसा रजः स्थातुश्चरथं भयते पतत्रिणः.. (५)
वायु द्वारा प्रेरित अग्नि शिखारूपी आयुध धारण कर लेता है तथा महान् तेज के कारण
गीले वृक्षों के रस पर आक्रमण करके सर्वत्र व्याप्त होता हुआ प्राणियों को उसी प्रकार
पराजित कर देता है, जिस प्रकार गायों के झुंड में सांड़ पहुंच जाता है. समस्त स्थावर एवं
जंगम अग्नि से डरते हैं. (५)
दधृष्ट्वा भृगवो मानुषेष्वा रयिं न चारुं सुहवं जनेभ्यः.
होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय जन्मने.. (६)
हे अग्नि! मनुष्यों के बीच में भृगु ऋषि ने दिव्य जन्म प्राप्त करने के लिए तुम्हें उसी
प्रकार धारण किया था, जिस प्रकार लोग उत्तम धन को संभाल कर रखते हैं. तुम लोगों का
आह्वान सरलता से सुन लेते हो एवं देवों का आह्वान करने वाले हो. तुम यज्ञस्थान में अतिथि
के समान पूजनीय एवं मित्र के समान सुख देने वाले हो. (६)
होतारं सप्त जुह्वो३यजिष्ठं यं वाघतो वृणते अध्वरेषु.
अग्निं विश्वेषामरतिं वसूनां सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम्.. (७)
आह्वान करने वाले सात ऋत्विज् यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ यजनीय एवं देवों के आह्वानकर्त्ता
जिस अग्नि का वरण करते हैं, समस्त संपत्तियां देने वाले उसी अग्नि की सेवा मैं हव्य के द्वारा
कर रहा हूं तथा उस अग्नि से रमणीय धन की याचना कर रहा हूं. (७)
अच्छिद्रा सूनो सहसो नो अद्य स्तोतृभ्यो मित्रमहः शर्म यच्छ.
अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः.. (८)
हे अग्नि! तुम बल प्रयोग द्वारा अरणि से उत्पन्न एवं अनुकूल प्रकाश वाले हो. तुम हमें
ebook converter DEMO Watermarks*

अनवरत सुख प्रदान करो. हे अन्नपुत्र अग्नि! लोहे के समान दृढ़तर पालन साधनों द्वारा अपने
स्तोता की रक्षा करके उसे पापों से मुक्त करो. (८)
भवा वरूथं गृणते विभावो भवा मघवन्मघवद्भ्यः शर्म.
उरुष्याग्ने अंहसो गृणन्तं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (९)
हे विशिष्ट प्रकाशवान् अग्नि! तुम स्तुति करने वाले यजमान के लिए गृह के समान
अनिष्ट निवारक बनो. हे धनवान् अग्नि! हव्यरूप धन से युक्त यजमानों के लिए तुम सुख रूप
बनो. हे अग्नि! अपने स्तोताओं की पाप से रक्षा करो. हे बुद्धिरूप धन से संपन्न अग्नि! आज
प्रातःकाल शीघ्र पधारो. (९)
सूक्त—५९ देवता—अग्नि
वया इदग्ने अग्नयस्ते अन्ये त्वे विश्वे अमृता मादयन्ते.
वैश्वानर नाभिरसि क्षितीनां स्थूणेव जनां उपमिद्ययन्थ.. (१)
हे अग्नि! अन्य अग्नियां तुम्हारी शाखाएं होने के कारण समस्त देवगण तुम्हारे साथ ही
प्रसन्न होते हैं. हे वैश्वानर! तुम सब मनुष्यों की नाभि में जठराग्नि रूप से स्थित हो. जिस
प्रकार धरती में गड़े हुए लकड़ी के थूने अपने ऊपर बांसों को धारण करते हैं, उसी प्रकार तुम
भी सब मानवों को धारण करो. (१)
मूर्धा दिवो नाभिरग्निः पृथिव्या अथाभवदरती रोदस्योः.
तं त्वा देवासोऽजनयन्त देवं वैश्वानर ज्योतिरिदार्याय.. (२)
यह अग्नि आकाश का मस्तक, धरती की नाभि एवं धरती व आकाश के मध्यवर्ती
प्रदेश के स्वामी थे. हे वैश्वानर! सभी देवों ने श्रेष्ठ मानवों के कल्याण के लिए तुम्हें ज्योतिरूप
एवं दानादिगुण संपन्न उत्पन्न किया था. (२)
आ सूर्ये न रश्मयो ध्रुवासो वैश्वानरे दधिरेऽग्ना वसूनि.
या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु या मानुषेष्वसि तस्य राजा.. (३)
जिस प्रकार निश्चल किरणें सूर्य में स्थित हैं, उसी प्रकार सभी प्रकार के धन वैश्वानर
अग्नि में निवास करते हैं. इसीलिए तुम पर्वतीय ओषधियों, जलों एवं मनुष्यों में स्थित धन के
स्वामी हो. (३)
बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो३न दक्षः.
स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीर्वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः.. (४)
धरती और आकाश अपने पुत्र वैश्वानर के लिए विस्तृत हो गए थे. जिस प्रकार बंदी
ebook converter DEMO Watermarks*

अपने स्वामी की अनेक प्रकार से स्तुति करता है, उसी प्रकार चतुर होता सुंदर गति वाले,
वास्तविक शक्तिसंपन्न एवं सबके कुशल नेता वैश्वानर के लिए महान् एवं विविध स्तुतियों का
प्रयोग करता है. (४)
दिवश्चित्ते बृहतो जातवेदो वैश्वानर प्र रिरिचे महित्वम्.
राजा कृष्टीनामसि मानुषीणां युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (५)
हे जातवेद! तुम्हारा महत्त्व आकाश से भी बढ़कर है एवं तुम मानव प्रजाओं के राजा
हो. तुमने असुरों द्वारा अपहृत धन युद्ध के द्वारा छीनकर देवों को दिया था. (५)
प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूर्वो वृत्रहणं सचन्ते.
वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वां अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत्.. (६)
मनुष्य जलवर्षा के लिए जिस आवारक मेघ के हंता विद्युत्रूप अग्नि की सेवा करते हैं,
मैं उसी जलवर्षी वैश्वानर के महत्त्व का उच्चारण करता हूं. उसने दस्यु को मारकर वर्षा का
जल गिराया एवं शंबर का नाश किया. (६)
वैश्वानरो महिम्ना विश्वकृष्टीर्भरद्वाजेषु यजतो विभावा.
शातवनेये शतिनीभिरग्निः पुरुणीथे जरते सूनृतावन्.. (७)
वैश्वानर अग्नि अपने महत्त्व के कारण समस्त मनुष्यों के स्वामी एवं पुष्टिवर्धक अन्न
वाले यज्ञों में बुलाने योग्य हैं, शतवनि के पुत्र राजा पुरुणीथ अनेक यज्ञों में प्रकाशसंपन्न एवं
प्रियवाक् अग्नि की स्तुति करते हैं. (७)
सूक्त—६० देवता—अग्नि
वह्निं यशसं विदथस्य केतुं सुप्राव्यं दूतं सद्यो अर्थम्.
द्विजन्मानं रयिमिव प्रशस्तं रातिं भरद्भृगवे मातरिश्वा.. (१)
मातरिश्वा हव्यवाहक, यशस्वी, यज्ञप्रकाशक, उत्तम रक्षक, देवों के दूत, हवि लेकर देवों
के समीप जाने वाले, अरणिरूपी दो काष्ठों से उत्पन्न एवं धन के समान प्रशंसित अग्नि को
भृगुवंशियों के मित्र के रूप में समीप लावें. (१)
अस्य शासुरुभयासः सचन्ते हविष्मन्त उशिजो ये च मर्ताः.
दिवश्चित्पूर्वो न्यसादि होतापृच्छ्यो विशपतिर्विक्षु वेधाः.. (२)
हव्य के इच्छुक देव और हव्य धारण करने वाले यजमान दोनों ही शासक अग्नि की
सेवा करते हैं, क्योंकि पूज्य, वांछितफलदाता एवं प्रजापति अग्नि सूर्योदय से भी पहले
यजमानों के बीच स्थापित हुए हैं. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

तं नव्यसी हृद आ जायमानमस्मत्सुकीर्तिमधुजिह्वमश्याः.
यमृत्विजो वृजने मानुषासः प्रयस्वन्त आयवो जीजनन्त.. (३)
हृदय में स्थित प्राण से उत्पन्न एवं मादक ज्वालाओं वाले अग्नि को हमारी नई स्तुतियां
सामने से घेर लें. उचित समय पर यज्ञ करने वाले मनुष्यों ने संग्राम के समय अग्नि को उत्पन्न
किया. (३)
उशिक्पावको वसुर्मानुषेषु वरेण्यो होताधायि विक्षु.
दमूना गृहपतिर्दम आँ अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणाम्.. (४)
यज्ञस्थल में प्रविष्ट यजमानों के बीच सबके प्रिय, शुद्धिकर्त्ता, निवास देने वाले, वरण
करने योग्य अग्नि को स्थापित किया गया है. वे शत्रुदमन के लिए दृढ़निश्चयी, हमारे घरों के
पालनकर्त्ता एवं यज्ञभवन में धन के अधिपति हों. (४)
तं त्वा वयं पतिमग्ने रयीणां प्र शंसामो मतिभिर्गोतमासः.
आशुं न वाजम्भरं मर्जयन्तः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (५)
हे अग्नि! जिस प्रकार घोड़े पर चढ़ने का इच्छुक सवार घोड़े की पीठ साफ करता है,
उसी प्रकार गौतम गोत्रोत्पन्न हम धन के स्वामी, सबके रक्षक, यज्ञ संबंधी अन्न के भर्ता तुझ
अग्नि का मार्जन करते हुए सुंदर स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी सहायता करते हैं. हे बुद्धि द्वारा धन
प्राप्त करने वाले अग्नि! कल प्रातःकाल शीघ्र आना. (५)
सूक्त—६१ देवता—इंद्र
अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय.
ऋचीषमायाध्रिघव ओह्मिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा.. (१)
जिस प्रकार भूखे को अन्न दिया जाता है, उसी प्रकार मैं शक्तिसंपन्न, शीघ्रता करने
वाले, गुणों में महान्, स्तुति के अनुकूल व्यक्तित्व वाले एवं अबाधगति इंद्र को वरण करने
योग्य स्तुतियां एवं पूर्ववर्ती यजमानों द्वारा अधिक मात्रा में दिया हुआ अन्न भेंट करता हूं. (१)
अस्मा इदु प्रय इव प्र यंसि भराम्यङ्गूषं बाधे सुवृक्ति.
इन्द्राय हृदा मनसा मनीषा प्रत्नाय पत्ये धियो मर्जयन्त.. (२)
मैं इंद्र को अन्न के समान हव्य दान करता हूं तथा शत्रु को पराजित करने में समर्थ स्तुति
वचनों का उच्चारण करता हूं. अन्य स्तुतिकर्त्ता भी उस प्राचीन स्वामी इंद्र के प्रति अंतःकरण,
बुद्धि और ज्ञान की सहायता से स्तुतियां करते हैं. (२)
अस्मा इदु त्यमुपमं स्वर्षां भराम्याङ्गूषमास्येन.
ebook converter DEMO Watermarks*

मंहिष्ठमच्छोक्तिभिर्मतीनां सुवृक्तिभिः सूरि वावृधध्यै.. (३)
मैं उन्हीं प्रसिद्ध, उपमान बने हुए, अत्यंत वरणीय, धन के दाता, विद्वान् इंद्र की वृद्धि के
निमित्त समर्थ एवं स्वच्छ वचनों वाली स्तुति बोलता हुआ महान् शब्द करता हूं. (३)
अस्मा इदु स्तोमं सं हिनोमि रथं न तष्टेव तत्सिनाय.
गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय.. (४)
जिस प्रकार रथ बनाने वाला रथ के मालिक के पास रथ ले जाता है, उसी प्रकार मैं भी
स्तुति योग्य इंद्र को लक्षित करके प्रशंसावचन प्रेषित करता हूं एवं बुद्धिसंपन्न इंद्र के लिए
विश्वव्यापक हव्य का विसर्जन करता हूं. (४)
अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जुह्वा३समञ्जे.
वीरं दानौकसं वन्दध्यै पुरां गूर्तश्रवसं दर्माणम्.. (५)
जिस प्रकार अन्नलाभ के लिए जाने का इच्छुक व्यक्ति घोड़ों को रथ में जोड़ता है, उसी
प्रकार मैं अन्नलाभ की अभिलाषा से स्तुतिरूपी मंत्र बोलता हूं. मैं उन्हीं वीर, दानपात्र, उत्तम
अन्नयुक्त एवं असुरनगरों के विध्वंसकर्त्ता इंद्र की वंदना में लगा हुआ हूं. (५)
अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं१ रणाय.
वृत्रस्य चिद्दिदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः.. (६)
त्वष्टा ने युद्ध के निमित्त इन इंद्र के लिए शोभन कर्म वाला एवं शत्रुओं के प्रति सरलता
से फेंका जाने वाला वज्र बनाया था. शत्रुओं की हिंसा करते हुए ऐश्वर्य एवं बल से संपन्न इंद्र
ने हनन करने वाले वज्र से वृत्र के मर्म का भेदन किया था. (६)
अस्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितुं पपिवाञ्चार्वन्ना.
मुषायद्विष्णुः पचतं सहीयान्विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता.. (७)
इंद्र ने जगत् निर्माण करने वाले इस महान् यज्ञ के तीन सवनों में सोमरूप अन्न का तुरंत
पान किया है एवं हव्यरूप अन्न का भक्षण किया है. विश्वव्यापक, असुर धन के अपहर्ता,
शत्रुविजयी एवं वज्र चलाने वाले इंद्र ने मेघ को पाकर विदीर्ण कर दिया. (७)
अस्मा इदु ग्नाश्चिद्देवपत्नीरिन्द्रायार्कंमहिहत्य ऊवुः.
परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः.. (८)
जब इंद्र ने वृत्र का वध किया था, तब गमनशील देवपत्नियों ने उनकी स्तुति की थी. इंद्र
अपने तेज के द्वारा आकाश और पृथ्वी से बढ़ गए थे, पर आकाश और धरती इंद्र की महिमा
का अतिक्रमण नहीं कर सके. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*

अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्.
स्वराळिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिरमत्रो ववक्षे रणाय.. (९)
इंद्र की महिमा आकाश, धरती और उनके मध्यवर्ती लोक से भी बढ़कर है. इंद्र अपने
इस निवासस्थान में अपने तेज से सुशोभित, सभी कार्य करने में कुशल, शक्तिशाली शत्रु का
नाश करने में समर्थ एवं युद्ध करने में निपुण हैं. इंद्र अपने मेघ रूप शत्रु को युद्ध के लिए
ललकारते हैं. (९)
अस्येदेव शवसा शुष्णन्तं वि वृश्चद्वज्रेण वृत्रमिन्द्रः.
गा न व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेताः.. (१०)
इंद्र ने अपनी ही शक्ति से जल रोकने वाले वृत्र का उच्छेद कर दिया था. जिस प्रकार
चोरों द्वारा रोकी हुई गाएं इंद्र ने छुड़वा दी थीं, उसी प्रकार वृत्र द्वारा रोका हुआ विश्व का
रक्षक जल छुड़वा दिया था. इंद्र हव्य देने वाले को इच्छानुसार अन्न देते हैं. (१०)
अस्येदु त्वेषा रन्त सिन्धवः परि यद्वज्रेण सीमयच्छत्.
ईशानकृद्दाशुषे दशस्यन्तुर्वीतये गाधं तुर्वणिः कः.. (११)
इंद्र ने वज्र द्वारा नदियों की सीमा निश्चित कर दी है, अतः इंद्र के बल के कारण गंगा
आदि सरिताएं अपने-अपने स्थान पर सुशोभित हैं. इंद्र ने अपने को ऐश्वर्यवान् बनाकर
हव्यदाता यजमान को फल प्रदान करते हुए तुर्वीति ऋषि के हेतु निवास योग्य स्थल अविलंब
बना दिया था. (११)
अस्मा इदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः.
गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णान्स्यपां चरध्यै.. (१२)
हे शीघ्रताकारक, सबके स्वामी एवं अपरिमित बलशाली इंद्र! तुम इस वृत्र के ऊपर वज्र
का प्रहार करो. जिस प्रकार मांस के विक्रेता पशु के अंगों को काटते हैं, उसी प्रकार तुम वृत्र
के शरीर के जोड़ अपने वज्र से तिरछे रूप में काटो, इससे वर्षा होगी और धरती पर जल
बहने लगेगा. (१२)
अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः.
युधे यदिष्णान आयुधान्यघायमाणो निरिणाति शत्रून्.. (१३)
हे स्तोता! स्तुति के योग्य एवं युद्ध के लिए शीघ्रता करने वाले इंद्र के पूर्व कर्मों की
प्रशंसा करो. इंद्र युद्ध में शत्रुघात के निमित्त आयुधों को बार-बार फेंकते हुए उनके सामने
जाते हैं. (१३)
अस्येदु भिया गिरयश्च दृळ्हा द्यावा च भूमा जनुषस्तुजेते.
उपो वेनस्य जोगुवान ओणिंसद्यो भुवद्वीर्याय नोधाः.. (१४)
ebook converter DEMO Watermarks*

इन्हीं इंद्र के भय से पर्वत स्थिर हैं एवं इनके प्रकट होने पर धरती और आकाश भय से
कांपने लगते हैं. नोधा नामक ऋषि ने इन्हीं सुंदर एवं दुःखविनाशक इंद्र की रक्षा शक्ति की
अपने सूक्तों द्वारा बार-बार प्रशंसा करके अविलंब शक्ति प्राप्त की थी. (१४)
अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद्वव्रे भूरेरीशानः.
प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्विमावदिन्द्रः.. (१५)
अकेले ही शत्रु विजय में समर्थ एवं अनेक प्रकार के स्वामी इंद्र ने स्तोताओं से जिस
प्रकार की स्तुति की इच्छा की थी, उन्हें वही स्तुति प्रदान की गई है. स्वश्व के पुत्र सूर्य के साथ
युद्ध करते समय सोमरस निचोड़ने वाले एतश ऋषि को इंद्र ने बचाया. (१५)
एवा ते हरियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्.
ऐषु विश्वपेशां धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (१६)
हे इंद्र! तुम घोड़ों समेत रथ के स्वामी हो. तुम्हें अपने यज्ञ में बुलाने के लिए गोतम गोत्र
वाले ऋषियों ने तुम्हारे प्रति स्तुति रूपी मंत्र कहे हैं. तुम उनकी अनेक प्रकार से उन्नति करो.
बुद्धि द्वारा धन प्राप्त करने वाले इंद्र प्रातःकाल शीघ्र आवें. (१६)
सूक्त—६२ देवता—इंद्र
प्र मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषं गिर्वणसे अङ्गिरस्वत्.
सुवृक्तिभिः स्तुवत ऋग्मियायार्चामार्कं नरे विश्रुताय.. (१)
हम अंगिरा ऋषि के समान शत्रुनाशक एवं स्तुतिपात्र इंद्र को सुख देनेवाली स्तुतियों को
भली प्रकार जानते हैं. शोभन स्तोत्रों द्वारा स्तुति करने वाले ऋषियों के अर्चनीय एवं सबके
नेता रूप इंद्र की हम स्तोत्रों द्वारा पूजा करते हैं. (१)
प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्यं शवसानाय साम.
येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा अर्चन्तो अङ्गिरसो गा अविन्दन्.. (२)
हे ऋत्विजो! महान् एवं बलसंपन्न इंद्र के प्रति उत्तम एवं प्रौढ़ स्तोत्र का उच्चारण करो.
हमारे पूर्वज अंगिरा गोत्रीय ऋषि पणि नामक असुरों द्वारा चुराई हुई गौओं के पद चिह्न देखते
हुए गए एवं इंद्र की सहायता से उनका उद्धार किया. (२)
इन्द्रस्याङ्गिरसां चेष्टौ विदत्सरमा तनयाय धासिम्.
बृहस्पतिर्भिनदद्रिं विदद्गाः समुस्त्रियाभिर्वावशन्त नरः.. (३)
इंद्र एवं अंगिरा गोत्रीय ऋषियों द्वारा गायों को खोजने के लिए भेजी गई सरमा नामक
कुतिया ने अपने बच्चों के लिए अन्न प्राप्त किया था. सरमा द्वारा बताए जाने पर इंद्र ने असुर
ebook converter DEMO Watermarks*

को मारा एवं गायों को छुड़ाया. उस समय गायों के साथ-साथ देवों ने प्रसन्नतासूचक शब्द
किया था. (३)
स सुष्टुभा स स्तुभा सप्त विप्रैः स्वरेणाद्रिं स्वर्यो३नवग्वैः.
सरण्युभिः फलिगमिन्द्र शक्र वलं रवेण दरयो दशग्वैः.. (४)
नौ अथवा दस महीनों में यज्ञ समाप्त करने वाले एवं उत्तम गति के इच्छुक
अंगिरागोत्रीय सात मेधावी ऋषियों द्वारा शोभन शब्द युक्त स्तोत्रों द्वारा स्तुत हे इंद्र! तुम्हारे
शब्दमात्र से मेघ डरते हैं. (४)
गृणानो अङ्गिरोभिर्दस्म वि वरुषसा सूर्येण गोभिरन्धः.
वि भूम्या अप्रथय इन्द्र सानु दिवो रज उपरमस्तभायः.. (५)
हे दर्शनीय इंद्र! तुमने अंगिरागोत्रीय ऋषियों की स्तुति सुनकर उषा एवं सूर्यकिरणों की
सहायता से अंधकार का नाश किया था. हे इंद्र! तुमने धरती के उन्नत भागों को समतल तथा
आकाश के मूल प्रदेश को दृढ़ किया था. (५)
तदु प्रयक्षतममस्य कर्म दस्मस्य चारुतममस्ति दंसः.
उपह्वरे यदुपरा अपिन्वन्मध्वर्णसो नद्य१श्चतस्रः.. (६)
इंद्र ने धरती की मीठे जल वाली चार नदियों को जलपूर्ण किया है. वही दर्शनीय इंद्र का
अतिशय पूज्य एवं सुंदर कर्म है. (६)
द्विता वि वव्रे सनजा सनीळे अयास्यः स्तवमानेभिरर्कैः
भगो न मेने परमे व्योमन्नधारयद्रोदसी सुदंसाः.. (७)
इंद्र को युद्ध द्वारा नहीं, स्तुति द्वारा वश में किया जा सकता है. उन्होंने संलग्न होकर
रहने वाले आकाश और धरती को दो जगह किया है. शोभनकर्मा इंद्र ने सुंदर आकाश में
रोदसी को सूर्य के समान धारण किया है. (७)
सनाद्दिवं परि भूमा विरूपे पुनर्भूवा युवती स्वेभिरैवैः.
कृष्णेभिरक्तोषा रुशद्भिर्वपुर्भीरा चरतो अन्यान्या.. (८)
तरुणी रात्रि तथा उषा परस्पर भिन्न रूप वाली एवं प्रतिदिन उत्पन्न होने वाली हैं. वे
आकाश और धरती पर आकर सदा विचरण करती हैं. रात काले रंग की एवं उषा उज्ज्वल
वर्ण वाली हैं. (८)
सनेमि सख्यं स्वपस्यमानः सूनुर्दाधार शवसा सुदंसाः.
आमासु चिद्दधिषे पक्वमन्तः पयः कृष्णासु रुशद्रोहिणीषु.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*

शोभनकर्म वाले, अति बलसंपन्न एवं सुंदरयज्ञों से युक्त इंद्र पहले से ही यजमानों के
प्रति मित्रता का भाव रखते आए हैं. हे इंद्र! तुमने भली प्रकार युवती न होने वाली, काले और
लाल रंग की गायों में श्वेत वर्ण का दूध धारण कराया है. (९)
सनात्सनीळा अवनीरवाता व्रता रक्षन्ते अमृताः सहोभिः.
पुरू सहस्रा जनयो न पत्नीर्दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम्.. (१०)
हमारी उंगलियां चिरकाल से गतिशील रहकर एक साथ निवास करती हुईं, आलस्यहीन
होकर अपनी ही शक्ति से इंद्र संबंधी हजारों यज्ञों का अनुष्ठान कर चुकी हैं. वे ही सेवासंलग्न
उंगलियां पालन करने वाली बहिन के समान इंद्र की परिचर्या करती हैं. (१०)
सनायुवो नमसा नव्यो अर्कैर्वसूयवो मतयो दस्म ददृः.
पतिं न पत्नीरुशतीरुशन्तं स्पृशन्ति त्वा शवसावन्मनीषाः.. (११)
हे दर्शनीय इंद्र! लोग मंत्र और प्रणाम के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हैं. अग्निहोत्र आदि
सनातन कर्म एवं धन की इच्छा करने वाले बुद्धिमान् लोग बड़े प्रयत्नों के बाद तुम्हें प्राप्त
करते हैं. हे बलवान् इंद्र! जैसे पतिकाम नारियां पति को प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार
बुद्धिमानों की स्तुतियां तुम्हारे पास पहुंचती हैं. (११)
सनादेव तव रायो गभस्तौ न क्षीयन्ते नोप दस्यन्ति दस्म.
द्युमाँ असि क्रतुमाँ इन्द्र धीरः शिक्षा शचीवस्तव नः शचीभिः.. (१२)
हे दर्शनीय इंद्र! तुम्हारे हाथ में चिरकाल से जो संपत्ति है, वह कभी समाप्त नहीं होती
और स्तोताओं को देने पर भी कम नहीं होती. हे इंद्र! तुम बुद्धिमान्, दीप्तिसंपन्न तथा
यज्ञकर्मयुक्त हो. हे कर्मठ इंद्र! अपने कर्मों द्वारा हमें घर दो. (१२)
सनायते गोतम इन्द्र नव्यमतक्षद्ब्रह्म हरियोजनाय.
सुनीथाय नः शवसान नोधाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (१३)
हे इंद्र! तुम सबके आदि हो. हे बलवान्! तुम रथ में अपने घोड़े जोड़ते हो एवं शोभन
नेता हो. गौतम ऋषि के पुत्र नोधा ने हमारे निमित्त तुम्हारा यह नवीन स्तोत्र बनाया है,
इसलिए कर्म के द्वारा धन प्राप्त करने वाले इंद्र इस स्तोत्र से आकर्षित होकर प्रातःकाल
जल्दी आवें. (१३)
सूक्त—६३ देवता—इंद्र
त्वं महां इन्द्र यो ह शुष्मैर्द्यावा जज्ञानः पृथिवी अमे धाः.
यद्ध ते विश्वा गिरयश्चिद्द्भ्वा भिया दृळ्हासः किरणा नैजन्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! तुम गुणों की महत्ता में सबसे अधिक हो, क्योंकि तुमने असुरजन्य भय उत्पन्न
होते ही जल ग्रहण किया एवं अपने शत्रुशोषक बल द्वारा धरती और आकाश को धारण
किया. विश्व में व्याप्त समस्त प्राणी, पर्वत तथा अन्य महान् एवं दृढ़ पदार्थ तुम्हारे भय से उसी
प्रकार कांपते हैं, जिस प्रकार आकाश में सूर्य की किरणें कांपती हैं. (१)
आ यद्धरी इन्द्र विव्रता वेरा ते वज्रं जरिता बाह्वोर्धात्.
येनाविहर्यतक्रतो अमित्रान्पुर इष्णासि पुरुहूत पूर्वीः.. (२)
हे इंद्र! जब तुम अपने विविध कर्म वाले घोड़ों को रथ में जोड़ते हो, तभी स्तोता तुम्हारे
हाथ में वज्र देता है. हे अनिच्छित कर्म वाले इंद्र! तुम उसी वज्र से शत्रुओं का विध्वंस करते
हो. हे बहु यजमानों द्वारा आहूत इंद्र! तुम उसी वज्र द्वारा शत्रुओं के अनेक पुरों का भेदन
करते हो. (२)
त्वं सत्य इन्द्र धृष्णुरेतान्त्वमृभुक्षा नर्यस्त्वं षाट्.
त्वं शुष्णं वृजने पृक्ष आणौ यूने कुत्साय द्युमते सचाहन्.. (३)
हे इंद्र! तुम सर्वोत्कृष्ट एवं इन शत्रुओं को हराने वाले हो. तुम ऋभुओं के स्वामी, मानवों
के हितकारक एवं शत्रुओं को हराने वाले हो. वीर संहारक एवं शक्तिप्रधान युद्ध में तुमने
तेजस्वी एवं युवक कुत्स के सहायक बनकर शुष्ण नामक असुर का वध किया. (३)
त्वं ह त्यदिन्द्र चोदीः सखा वृत्रं यद्वृजिन्व्षकर्मन्नुभ्नाः.
यद्वृ शूर वृषमणः पराचैर्वि दस्यूँर्योनावकृतो वृथाषाट्.. (४)
हे वृष्टिकर्त्ता एवं वज्रयुक्त इंद्र! जिस समय तुमने कुत्स के धन को छीनने वाले शत्रु का
वध किया था, हे शत्रुप्रेरक, कामवर्धक एवं सहज ही शत्रुनाशक इंद्र! उस समय तुमने
युद्धक्षेत्र में दस्युओं को दूर भगाकर उनका नाश किया था एवं कुत्स की सहायता करके उसे
यशस्वी बनाया था. (४)
त्वं ह त्यदिन्द्रारिषण्यन्दृळ्हस्य चिन्मर्तानामजुष्टौ.
व्य१स्मदा काष्ठा अर्वते वर्धनेव वज्रिञ्छ्नथिह्यमित्रान्.. (५)
हे इंद्र! यद्यपि तुम किसी दृढ़ व्यक्ति को हानि पहुंचाना नहीं चाहते हो, फिर भी यदि हम
स्तोताओं को शत्रु घेर लेते हैं तो तुम हमारे घोड़ों के चलने के लिए सभी दिशाओं को मुक्त
कर देते हो. हे वज्रधारी इंद्र! कठिन वज्र से हमारे शत्रुओं को मारो. (५)
त्वां ह त्यदिन्द्रार्णसातौ स्वर्मीळ्हे नर आजा हवन्ते.
तव स्वधाव इयमा समर्ये ऊतिर्वाजेष्वतसाय्या भूत.. (६)
जिस युद्ध में प्रवृत्त होने से लोगों को लाभ और धन मिलने की संभावना होती है, उस में
वे सहायता के लिए तुम्हें बुलाते हैं. हे बलशाली! युद्धक्षेत्र में तुम हमारी रक्षा करो. युद्धभूमि
ebook converter DEMO Watermarks*

में योद्धा तुमसे रक्षा प्राप्त करते हैं। (६)
त्वं ह त्यदिन्द्र सप्त युध्यन्पुरो वज्रिन्पुरुकुत्साय दर्दः.
बर्हिर्न यत्सुदासे वृथा वर्गंहो राजन्वरिवः पूरवे कः.. (७)
हे वज्रधारी इंद्र! पुरुकुत्स ऋषि की सहायता के लिए उसके शत्रुओं से युद्ध करते हुए
तुमने सातों नगरों को विदीर्ण किया था। उसी प्रकार तुमने सुदास राजा का पक्ष लेकर अंहो
नामक असुर का धन कुश के समान छिन्न करने के पश्चात् उसी हव्यदाता सुदास को दे दिया
था। (७)
त्वं त्यां न इन्द्र देव चित्रामिषमापो न पीपयः परिज्मन्.
यया शूर प्रत्यस्मभ्यं यंसि त्मनमूर्जं न विश्वध क्षरध्यै.. (८)
हे तेजस्वी इंद्र! तुम हमारे संग्रहणीय धन को विस्तृत धरती पर पानी के समान बढ़ाओ.
हे वीर! जिस प्रकार तुमने जल को चारों ओर फैलाया है, उसी प्रकार हमारे प्राणधारक अन्न
का भी विस्तार करो। (८)
अकारि त इन्द्र गोतमेभिर्ब्रह्माण्योक्ता नमसा हरिभ्याम्.
सुपेशसं वाजमा भरा नः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (९)
हे तेजस्वी इंद्र! गोतमवंशी ऋषियों ने अश्वयुक्त तुम्हारे लिए हवि देते हुए नमस्कारपूर्ण
स्तुति की थी. तुम हमें भांति-भांति के अन्नों से युक्त बनाओ. (९)
सूक्त—६४ देवता—मरुद्गण
वृष्णे शर्धाय सुमखाय वेधसे नोधः सुवृक्तिं प्र भरा मरुद्भ्यः.
अपो न धीरो मनसा सुहस्त्यो गिरः समञ्जे विदथेष्वाभुवः.. (१)
हे नोधा! कामपूरक, शोभन यज्ञसंपन्न एवं पुष्प, फल आदि के निर्माणकर्त्ता मरुद्गणों
के प्रति सुंदर स्तुतियों का उच्चारण करो. मैं हाथ जोड़कर धीरतापूर्वक मन से उन स्तुतियों
का प्रयोग करता हूं, जिनके द्वारा देवसमूह उसी भांति यज्ञस्थल की ओर अभिमुख किया जा
सकता है, जिस भांति मेघ एक साथ बहुत सी बूंदें गिराते हैं। (१)
ते जज्ञिरे दिव ऋष्वास उक्षणो रुद्रस्य मर्या असुरा अरेपसः.
पावकासः शुचयः सूर्या इव सत्वानो न द्रप्सिनो घोरवर्पसः.. (२)
दर्शनीय, पौरुषयुक्त एवं रुद्ररूप मरुद्गण अंतरिक्ष से उत्पन्न हुए हैं. मरुद्गण
शत्रुनाशक, पापरहित, सबको शुद्ध करने वाले, सूर्यकिरणों के समान, रुद्रगण के तुल्य
बलशाली, वर्षा की बूंदों को धारण करने वाले एवं घोर रूप हैं. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*