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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

शुद्ध होते हुए सोम लहरों वाली नदी के समान मन से उत्पन्न स्तुतियों को प्रेरित करते हैं. जल बरसाने वाले एवं गायों को जानने वाले सोम छिपी हुई वस्तुओं को देखते हुए दुर्बलों द्वारा निवारण न करने योग्य बल का सहारा लेते हैं. (७) स मत्सरः पृत्सु वन्वन्नवातः सहस्ररेता अभि वाजमर्ष. इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch? -> wait, let me write exact Devanagari: इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch -> No: इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch? Let's transcribe line by line precisely:

शुद्ध होते हुए सोम लहरों वाली नदी के समान मन से उत्पन्न स्तुतियों को प्रेरित करते हैं. जल बरसाने वाले एवं गायों को जानने वाले सोम छिपी हुई वस्तुओं को देखते हुए दुर्बलों द्वारा निवारण न करने योग्य बल का सहारा लेते हैं. (७) स मत्सरः पृत्सु वन्वन्नवातः सहस्ररेता अभि वाजमर्ष. इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch? No: इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीष

अव द्रोणानि घृतवान्ति सीद मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः.. (१३) हे नशीले रस से युक्त एवं यज्ञस्वामी सोम! तुम जल में रहते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्ररूप ऊंचे स्थान पर छनो. हे अत्यंत मादक, इंद्र के पीने योग्य एवं नशीले सोम! तुम जलों के साथ द्रोणकलश में ठहरो. (१३) वृष्टिं दिवः शतधारः पवस्व सहस्रसा वाजयुर्देववीतौ. सं सिन्धुभिः कलशे वावशानः समुस्रियाभिः प्रतिरन्न आयुः.. (१४) हे अनेक धाराओं वाले, यज्ञ में यजमानों को हजारों धन देने वाले एवं यजमानों के अन्न की अभिलाषा करने वाले सोम! तुम आकाश से वर्षा करो एवं हमारी आयु को बढ़ाते हुए द्रोणकलश में जल एवं गोदुग्ध से मिलो. (१४) एष स्य सोमो मतिभिः पुनानोऽत्यो न वाजी तरतीदरातीः. पयो न दुग्धमदितेरिषिरमुर्विंव गातुः सुयमो न वोळ्हा.. (१५) सोम स्तोत्रों के साथ शुद्ध किए जाते हैं एवं गतिशील अश्व के समान शत्रुओं को लांघकर जाते हैं. वे गाय के दूध के समान शुद्ध, विस्तृत मार्ग के समान आश्रय योग्य एवं बोझा ढोने वाले घोड़े के समान स्तोताओं के नियंत्रण में रहते हैं. (१५) स्वायुधः सोतृभिः पूयमानोऽभ्यर्ष गुह्यं चारु नाम. अभि वाजं सप्तिरिव श्रवस्याऽभि वायुमभि गा देव सोम.. (१६) हे शोभन आयुध वाले एवं ऋत्विजो द्वारा शुद्ध किए जाते हुए सोम! तुम अपने छिपे हुए एवं सुंदर रसात्मक रूप को धारण करो. हमें जब अन्न की अभिलाषा हो, तब तुम हमें अन्न दो. हे सोमदेव! तुम हमें जीवन एवं गाएं दो. (१६) शिशुं जज्ञानं हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति वह्निं मरुतो गणेन. कविर्गीर्भिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन्.. (१७) मरुद्गण शिशु के समान स्थित, उत्पन्न एवं सबके द्वारा अभिलषित सोम को मसलते हैं तथा फलवाहक सोम को अपने सात गणों द्वारा सुशोभित करते हैं. मेधावी एवं कविकर्म द्वारा कवि कहलाने वाले सोम शब्द करते हुए एवं स्तुतियां सुनते हुए दशापवित्र को लांघकर जाते हैं. (१७) ऋषिमना य ऋषिकृत्स्वर्षाः सहस्रणीथः पदवीः कवीनाम्. तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप्.. (१८) ऋषियों के समान मन से सब कुछ देखने वाले, सबके द्रष्टा, सबको प्राप्त होने वाले, हजारों के द्वारा प्रशंसित, कवियों की शब्दरचना पूर्ण करने वाले एवं परमपूज्य सोम द्युलोक ebook converter DEMO Watermarks*

में रहने की अभिलाषा करते हैं तथा प्रशंसित होकर दीप्तिशाली इंद्र को प्रकाशित करते हैं. (१८) चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्. अपामूर्मिं सचमानः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति.. (१९) चमू नामक पात्रों में वर्तमान, प्रशंसायोग्य, शक्तिशाली, पात्रों में विहार करने वाले, यजमानों को गाय प्राप्त कराने वाले, आयुधधारणकर्त्ता, जल के प्रेरक, समुद्र की सेवा स्वीकार करने वाले एवं महान् सोम चतुर्थ धाम अर्थात् चंद्रलोक का सेवन करते हैं. (१९) मर्याे न शुभ्रस्तन्वं मृजानोऽत्यो न सृत्वा सनये धनानाम्. वृषेव यूथा परि कोशमर्षन्कनिक्रदच्चम्वो३रा विवेश.. (२०) अलंकृत शरीर वाले मनुष्य के समान अपने शरीर को शुद्ध करते हुए, धन पाने के लिए गतिशील घोड़े के समान चलने वाले, गोसमूह से मिलने वाले बैल के समान शब्द करने वाले एवं पात्र में जाते हुए सोम शब्द करते हुए बार-बार चमू नामक पात्रों पर बैठते हैं. (२०) पवस्वेन्दो पवमानो महोभिः कनिक्रदत्परि वाराण्यर्ष. क्रीळञ्चम्वो३रा विश पूयमान इन्द्रं ते रसो मदिरो ममत्तु.. (२१) हे सोम! ऋत्विजों द्वारा शुद्ध होकर टपको एवं बार-बार शब्द करते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र में जाओ. तुम क्रीड़ा करते हुए चमू नामक पात्रों में प्रवेश करो. तुम्हारा नशीला रस इंद्र को प्रमुदित करे. (२१) प्रास्य धारा बृहतीरसृग्रन्क्तो गोभिः कलशाँ आ विवेश. साम कृण्वन्सामन्यो विपश्चित्क्रन्दन्नेत्यभि सख्युर्न जामिम्.. (२२) सोम की बड़ी-बड़ी धाराएं निर्मित की जाती हैं. गाय के दूध, दही आदि से मिलकर सोम द्रोणकलशों में प्रवेश करते हैं. सामगान में कुशल एवं सब जानने वाले सोम साममंत्रों को गाते हुए इस प्रकार पात्रों में जाते हैं, जिस प्रकार लंपट मनुष्य अपने मित्र की पत्नी के पास जाता है. (२२) अपघ्नन्नेषि पवमान शत्रून्प्रियां न जारो अभिगीत इन्दुः. सीदन्वनेषु शकुनो न पत्वा सोमः पुनानः कलशेषु सत्ता.. (२३) हे शुद्ध होते हुए व स्तोताओं द्वारा प्रशंसित सोम! तुम शत्रुओं का नाश करते हुए इस प्रकार आते हो, जिस प्रकार यार अपनी प्रेयसी के पास जाता है. जिस प्रकार उड़ने वाला पक्षी वनवृक्षों पर बैठता है, उसी प्रकार सोम कलशों में स्थित होते हैं. (२३) आ ते रुचः पवमानस्य सोम योषेव यन्ति सुदुघाः सुधाराः. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—९७ देवता—पवमान सोम

हरिरानीतः पुरुवारो अप्स्वचिक्रदत्कलशे देवयूनाम्.. (२४) हे शुद्ध होते हुए सोम! पुत्र के निमित्त दूध पिलाने वाली स्त्रियों के समान यजमानों के लिए धन देने वाली एवं शोभन धाराओं वाली दीप्तियां पात्रों में जाती हैं. हरे रंग वाले, ऋत्विजों द्वारा लाए गए एवं अनेक जनों द्वारा वरण करने योग्य सोम जल में एवं देवाभिलाषी यजमानों के घर में बार-बार शब्द करते हैं. (२४) सूक्त—९७ देवता—पवमान सोम अस्य प्रैषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम्. सुतः पवित्रं पर्येति रैभन्मितेव सद्म पशुमान्ति होता.. (१) प्रेरणा करने वाले, स्वर्ण द्वारा शुद्ध होते हुए एवं दीप्तिशाली सोम अपना रस देवों के साथ संयुक्त करते हैं. निचोड़ते हुए सोम शब्द करके उसी प्रकार दशापवित्र की ओर जाते हैं. जिस प्रकार ऋत्विज् यजमान के भली प्रकार बने हुए एवं पशुयुक्त यज्ञगृह में जाता है. (१) भद्रा वस्त्रा समन्या३ वसानो महान्कविर्निवचनानि शंसन्. आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ.. (२) हे सोम! तुम कल्याणकारक, संग्राम में हितकारी एवं आच्छादक तेज को धारण करने वाले हो. तुम महान्, कवि, स्तोत्रों की प्रशंसा करने वाले, सबके विशेष द्रष्टा एवं जागरणशील हो. तुम यज्ञ में चमू नामक पात्रों में प्रवेश करो. (२) समु प्रियो मृज्यते सानो अव्ये यशस्तरो यशसां क्षैतो अस्मे. अभि स्वर धन्वा पूयमानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) यश पाने वालों में परम यशस्वी, धरती पर उत्पन्न एवं प्रिय सोम ऊंचे तथा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर शुद्ध किए जाते हैं. हे सोम! शुद्ध होते हुए अंतरिक्ष में भली प्रकार शब्द करो एवं कल्याणकारक साधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (३) प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोमं हिनोत महते धनाय. स्वादुः पवाते अति वारमव्यमा सीदति कलशं देवयुर्नः.. (४) हे स्तोताओ! सोम की भली-भांति स्तुति करो, देवों की पूजा करो एवं महान् धन पाने के लिए सोम को प्रेरित करो. स्वादिष्ट सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हैं एवं देवाभिलाषी बनकर द्रोणकलश में जाते हैं. (४) इन्दुर्दैवानामुप सख्यमायन्त्सहस्रधारः पवते मदाय. नृभिः स्तवानो अनु धाम पूर्वमगन्निन्द्रं महते सौभगाय.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हजार धाराओं वाले सोम देवों की मित्रता प्राप्त करते हुए उनके नशे के लिए कलश आदि में निचुड़ते हैं. सोम यज्ञकर्म के नेताओं द्वारा प्रशंसित होकर अपने प्राचीन स्थान द्युलोक को जाते हैं एवं महान् सौभाग्य पाने के लिए इंद्र के पास जाते हैं. (५) स्तोत्रे राये हरिरर्षा पुनान इन्द्रं मदो गच्छतु ते भराय. देवैर्याहि सरथं राधो अच्छा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) हे हरे रंग वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम! जब हम तुम्हारी स्तुति करें, तब तुम हमें धन देने के लिए आओ. तुम्हारा नशीला रस संग्राम को प्रेरणा देने के लिए इंद्र के पास जाए. तुम देवों के रथ पर बैठकर हमारे सामने आओ एवं कल्याणकारक साधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (६) प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति. महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन्.. (७) उशना ऋषि के समान स्तोत्र बोलते हुए वृषगण नामक ऋषि इंद्र आदि देवों का जन्म भली प्रकार बताते हैं. अनेक कर्म वाले, पवित्र तेज से युक्त, पापों को नष्ट करने वाले एवं शोभन दिनों वाले सोम शब्द करते हुए पात्रों में जाते हैं. (७) प्र हंसासस्तृपलं मन्युमच्छामादस्तं वृषगणा अयासुः. आङ्गूष्यं१ पवमानं सखायो दुर्मर्षं साकं प्र वदन्ति वाणम्.. (८) शत्रुओं द्वारा सताए गए वृषगण नाम के ऋषि शत्रुओं से डरकर तेज प्रहार करने वाले एवं शत्रुनाशक सोम को लक्ष्य करके यज्ञशाला में जाते हैं. सोम के मित्र स्तोता सबके अभिगमन योग्य, शत्रुओं द्वारा असह्य एवं छनने वाले सोम के प्रति बाजों के साथ गाते हैं. (८) स रंहत उरुगायस्य जूतिं वृथा क्रीळन्तं मिमते न गावः. परीणसं कृणुते तिग्मशृङ्गो दिवा हरिर्ददृशे नक्तमृज्रः.. (९) सोम अत्यंत शीघ्र चलते हैं. दूसरे लोग बहुतों द्वारा प्रशंसनीय एवं अनायास खेल करने वाले सोम का अनुगमन नहीं कर सकते. तीखे तेज वाले सोम अधिक प्रकाश करते हैं. अंतरिक्ष में वर्तमान सोम दिन में हरे और रात में प्रकाशयुक्त दिखाई देते हैं. (९) इन्दुवाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय. हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिर्वरिवः कृण्वन्वृजनस्य राजा.. (१०) शक्तिशाली एवं गतिशील सोम इंद्र के प्रति शक्तिदाता रस भेजते हुए उनके नशे के लिए निचुड़ते हैं व राक्षसों का नाश करते हैं. वरण करने योग्य धन देने वाले एवं बल के स्वामी सोम शत्रुओं को बाधा पहुंचाते हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः. इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय.. (११) पत्थरों की सहायता से निचुड़ने वाले एवं मदभरी धाराओं द्वारा देवों की पूजा करने वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके द्रोणकलश में गिरते हैं. इंद्र की मित्रता प्राप्त करने वाले, दीप्तिशाली एवं नशीले सोम इंद्र को मद पहुंचाने के लिए छनते हैं. (११) अभि प्रियाणि पवते पुनानो देवो देवान्त्स्वेन रसेन पृञ्चन्. इन्दुर्घर्माण्यृतुथा वसानो दश क्षिपो अव्यत सानो अव्ये.. (१२) प्रसन्न करने वाले एवं धारण करने वाले तेजों को समय-समय पर ढकते हुए, क्रीड़ाशील एवं अपने रस से देवों की अर्चना करते हुए पवमान सोम टपकते हैं. दस उंगलियां भेड़ के बालों से बने और ऊंचे दशापवित्र पर सोम को भेजती हैं. (१२) वृषा शोणो अभिकनिक्रदद्गा नदयन्नेति पृथिवीमुत द्याम्. इन्द्रस्येव वग्नुरा शृण्व आजौ प्रचेतयन्नर्षति वाचमेमाम्.. (१३) लाल बैल जिस प्रकार शब्द करता हुआ गायों के पास जाता है, उसी प्रकार शब्द उत्पन्न करता हुआ सोम धरती और स्वर्ग के पास जाता है. लोग युद्ध में इंद्र के समान ही सोम का शब्द सुनते हैं. सोम सबको अपना परिचय देते हुए जोर से शब्द करते हैं. (१३) रसाय्यः पयसा पिन्वमान ईरयन्नेषि मधुमन्तमंशुम्. पवमानः संतनिमेषि कृण्वन्निन्द्राय सोम परिषिच्यमानः.. (१४) हे स्वाद लेने योग्य, दूध से मिले हुए, निचुड़ने वाले एवं शब्दकर्त्ता सोम! तुम मधुर रस को पाते हो. हे जल से भीगे हुए एवं शुद्ध सोम! तुम अपनी धारा को विस्तृत बनाते हुए इंद्र के लिए जाते हो. (१४) एवा पवस्व मदिरो मदायोदग्राभस्य नमयन्वधस्नैः. परि वर्णं भरमाणो रुशन्तं गव्युर्नो अर्ष परि सोम सिक्तः.. (१५) हे नशीले सोम! तुम जल ग्रहण करने वाले बादल को अपने आयुधों से वर्षा के लिए नीचा बनाते हुए नशे के लिए टपको. हे श्वेत वर्ण धारण करने वाले, दशापवित्र में सिंचते हुए एवं हमारी गायों की कामना करते हुए सोम! तुम सब ओर जाओ. (१५) जुष्ट्वी न इन्दो सुपथा सुगान्युरौ पवस्व वरिवंसि कृण्वन्. घनेव विष्वग्दुरितानि विघ्नन्नधि ष्णुना धन्व सानो अव्ये.. (१६) हे दीप्तिशाली सोम! तुम स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमारे लिए वैदिक मार्गों और वरणीय ebook converter DEMO Watermarks*

धनों को सुख से प्राप्त कराते हुए विस्तृत द्रोणकलश में टपको. तुम लोहे के आयुधों से राक्षसों को मारते हुए ऊंचे एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर धाराओं के साथ जाओ. (१६) वृष्टिं नो अर्ष दिव्यां जिगत्नुमिळावतीं शंगयीं जीरदानुम्. स्तुकेव वीता धन्वा विचन्वन् बन्धूँरिमाँ अवराँ इन्दो वायून्.. (१७) हे सोम! हमारे लिए द्युलोक में उत्पन्न, गमनशील, अन्नयुक्त, सुख देने वाली एवं शीघ्र दान करने वाली वर्षा करो. संतान के समान सुंदर, मित्रतुल्य एवं धरती से संबंधित वायुओं को खोजते हुए तुम यहां आओ. (१७) ग्रन्थिं न वि ष्य ग्रथितं पुनान ऋजुं च गातुं वृजिनं च सोम. अत्यो न क्रदो हरिरा सृजानो मर्यो देव धन्व पस्त्यावान्.. (१८) हे सोम! गांठ के समान पापों से बंधे हुए मुझे तुम पवित्र बनाओ तथा मुझे मार्ग एवं शक्ति दो. हे हरे रंग वाले व दशापवित्र पर रखे जाते हुए सोम! तुम घोड़े के समान शब्द करते हो. शत्रुनाशक एवं घर देने वाले दीप्त सोम! तुम मेरे पास आओ. (१८) जुष्टो मदाय देवतात इन्दो परि ष्णुना धन्व सानो अव्ये. सहस्रधारः सुरभिर्दबधः परि स्रव वाजसातौ नृषह्ये.. (१९) हे पर्याप्त मद से युक्त सोम! तुम देवयज्ञ में ऊंचे एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर बहने वाली धाराओं के साथ जाओ. हे अनेक धाराओं से युक्त एवं शोभनगंध वाले सोम! तुम अपराजित होकर मनुष्यों द्वारा सहन करने योग्य युद्ध में अन्नलाभ के लिए जाओ. (१९) अरश्मानो येऽरथा अयुक्ता अत्यासो न ससृजानास आजौ. एते शुक्रासो धन्वन्ति सोमा देवासस्ताँ उप याता पिबध्यै.. (२०) जिस प्रकार बिना रस्सी का, रथरहित व बिना बंधन का घोड़ा सजकर युद्ध में अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है, उसी प्रकार यज्ञ में बनाए गए एवं दीप्त सोम जल्दी से द्रोणकलश की ओर जाते हैं. हे देवो! द्रोणकलश में आने वाले सोम को पीने के लिए हमारे पास आओ. (२०) एवा न इन्दो अभि देववीतिं परि स्रव नभो अर्णश्वमूषु. सोमो अस्मभ्यं काम्यं बृहन्तं रयिं ददातु वीरवन्तमुग्रम्.. (२१) हे सोम! हमारे यज्ञ को लक्ष्य करके अपना रस द्युलोक से चमू नामक पात्र में गिराओ. सोम हमें मनचाहा, महान्, वीर संतान से युक्त एवं बलपूर्ण अन्न दें. (२१) तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग्ज्येष्ठस्य वा धर्मणि क्षोरनीके. ebook converter DEMO Watermarks*

आदीमायन्वरमा वावशाना जुष्टं पतिं कलशे गाव इन्दुम्.. (२२) जब अभिलाषा करने वाले स्तोता का वचन इसका संस्कार करता है और योगक्षेम संबंधी देहाती के मुख में स्थित वाणी राजा की स्तुति करती है, तब वरण करने योग्य, देवों के नशे के लिए पर्याप्त, सबके पालक एवं कलश में स्थित सोम की अभिलाषा करती हुई गाएं इसके पास आती हैं. (२२) प्र दानुदो दिव्यो दानुपिन्व ऋतमृताय पवते सुमेधा:. धर्मा भुवद्वृजन्यस्य राजा प्र रश्मिभिर्दशभिर्भारि भूम.. (२३) द्युलोक में उत्पन्न, दाताओं को धन देने वाले, दाताओं की अभिलाषा करने वाले एवं शोभन बुद्धिसंपन्न सोम सच्चे इंद्र के लिए रस टपकाते हैं. राजा सोम बल धारण करने वाले हैं. दस उंगलियां अधिक मात्रा में सोम को धारण करती हैं. (२३) पवित्रैभि: पवमानो नृचक्षा राजा देवानामुत मर्त्यानाम्. द्विता भुवद्रयिपती रयीणामृतं भरत्सुभृतं चार्विन्दु:.. (२४) दशापवित्रों द्वारा शुद्ध होते हुए, मनुष्यों को देखने वाले, मनुष्यों एवं देवों के राजा, धन के पालक व असीम धन के स्वामी सोम देवों और मानवों दोनों में कल्याणकारी एवं शोभन जल धारण करते हैं. (२४) अर्वाँ इव श्रवसे सातिमच्छेन्द्रस्य वायोरभि वीतिमर्ष. स न: सहस्रा बृहतीरिषो दा भवा सोम द्रविणोवित्पुनान:.. (२५) हे सोम! तुम हमारे धनलाभ तथा इंद्र व वायु के पीने के लिए घोड़े के समान जल्दी आओ एवं हमें अनेक प्रकार के अधिक अन्न दो. हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमें धन देने वाले बनो. (२५) देवाव्यो न: परिषिच्यमाना: क्षयं सुवीरं धन्वन्तु सोमा:. आयज्यव: सुमतिं विश्ववारा होतारो न दिवियजो मन्द्रतमा:.. (२६) देवों को तृप्त करने वाले व सब ओर से पात्रों में गिरते हुए सोम हमें शोभन पुत्र से युक्त घर प्रदान करें. अभिमुख यज्ञ करने योग्य, सबके वरणीय, होताओं के समान इंद्र आदि का यज्ञ करने वाले एवं अत्यंत नशीले सोम हमारे सामने आवें. (२६) एवा देव देवताते पवस्व महे सोम प्सरसे देवपान:. महश्चिद्धि ष्मसि हिता: समर्ये कृधि सुष्ठाने रोदसी पुनान:.. (२७) हे दीप्तिशाली एवं देवों के पीने योग्य सोम! तुम देवों द्वारा विस्तार वाले यज्ञ में देवों के महान् मदपान के लिए टपको. हम तुम्हारे द्वारा प्रेरित होकर युद्ध में महान् शत्रुओं को भी ebook converter DEMO Watermarks*

पराजित करें. तुम शुद्ध होते हुए हमारे लिए द्यावा-पृथिवी को शोभन निवास वाली बनाओ. (२७) अश्वो न क्रदो वृषभिर्युजानः सिंहो न भीमो मनसो जवीयान्. अर्वाचीनैः पथिभिर्ये रजिष्ठा आ पवस्व सैमनसं न इन्दो.. (२८) हे ऋत्विजों द्वारा मिलाए जाते हुए, सिंह के समान भयंकर व मन से भी अधिक तेज चलने वाले सोम! तुम घोड़े के समान शब्द करते हो. तुम अत्यंत सरल मार्गों द्वारा हमें मन की प्रसन्नता दो. (२८) शतं धारा देवजाता असृग्रन्तसहस्रमेनाः कवयो मृजन्ति. इन्दो सनित्रं दिव आ पवस्व पुरएतासि महतो धनस्य.. (२९) हे सोम! देवों के लिए उत्पन्न तुम्हारी हजारों धाराएं बनाई जा रही हैं. बुद्धिमान् लोग तुम्हारी हजारों धाराओं को शुद्ध करते हैं. हमारी संतान के लिए स्वर्ग से भोग का साधन धन प्रदान करो. तुम महान् धन के आगे चलते हो. (२९) दिवो न सर्गा अससृग्रमह्नां राजा न मित्रं प्र मिनाति धीरः. पितुर्न पुत्रः क्रतुभिर्यतान आ पवस्व विशे अस्या अजीतिम्.. (३०) जिस प्रकार सूर्य की दिननिर्मात्री किरणें बनाई जाती हैं, उसी प्रकार राजा, मित्र एवं वीर सोम की लहरों का निर्माण होता है. जिस प्रकार यज्ञकर्मों के द्वारा प्रयत्न करने वाला पुत्र पिता को पराजित नहीं करता, उसी प्रकार तुम इस प्रजा को कभी पराजित मत करो. (३०) प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारान्यत्पूतो अत्येष्यव्यान. पवमान पवसे धाम गोनां जज्ञानः सूर्यमपिन्वो अर्कैः.. (३१) हे सोम! जब तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके जाते हो, तब तुम्हारी मधु वाली धाराएं बनती हैं. हे शुद्ध होते हुए एवं धारक सोम! तुम गाय के दूध की ओर छनते हो और उत्पन्न होते हुए अपने तेज से आदित्य को पूर्ण करते हो. (३१) कनिक्रददनु पन्थामृतस्य शुक्रो वि भास्यमृतस्य धाम. स इन्द्राय पवसे मत्सरवान्हिन्वानो वाचं मतिभिः कवीनाम्.. (३२) निचुड़ते हुए सोम यज्ञ के मार्ग पर बार-बार शब्द करते हैं. हे अमृत के स्थान एवं शुक्लवर्ण सोम! तुम विशेषरूप से चमकते हो. हे स्तोताओं की बुद्धि के साथ शब्द भेजने वाले एवं मदकारक सोम! तुम इंद्र के लिए छनते हो. (३२) दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षि सोम पिन्वन्धाराः कर्मणा देववीतौ. एन्दो विश कलशं सोमधानं क्रन्दन्निहि सूर्यस्योप रश्मिम्.. (३३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे दिव्य एवं शोभन पतन वाले सोम! तुम यज्ञ कर्म के द्वारा अपनी धाराएं गिराते हुए नीचे की ओर देखो एवं द्रोणकलश की ओर जाओ. तुम शब्द करते हुए सूर्य की कांति प्राप्त करो. (३३) तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्. गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः.. (३४) यजमान तीनों वेदों से संबंधित स्तुतियां बोलता है तथा सोम को यज्ञ को धारण करने वाली एवं कल्याणकारक स्तुतियों की प्रेरणा देता है. गाएं जिस प्रकार सांड की ओर जाती हैं, उसी प्रकार गाएं अपने दूध से सोम को मिश्रित करने के लिए जाती हैं. अभिलाषा करते हुए स्तोता सोम के पास जाते हैं. (३४) सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः. सोमः सुतः पूयते अज्यमानः सोमे अर्कास्त्रिष्टुभः सं नवन्ते.. (३५) प्रसन्न करने वाली गाएं सोम की कामना करती हैं. मेधावी स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा सोम को पूछते हैं. गायों के दूध से मिले हुए एवं निचुड़े हुए सोम ऋत्विजों द्वारा शुद्ध किए जाते हैं. त्रिष्टुप् छंद में बोले गए मंत्र सोम के पास जाते हैं. (३५) एवा नः सोम परिषिच्यमान आ पवस्व पूयमानः स्वस्ति. इन्द्रमा विश बृहता रवेण वर्धया वाचं जनया पुरंधिम्.. (३६) हे सोम! तुम पात्रों में निचुड़ते हुए एवं छनते हुए हमें कल्याण प्राप्त कराओ, महान् शब्द करते हुए इंद्र के उदर में प्रवेश करो, हमारे स्तुतिवचन को बढ़ाओ एवं हमारा ज्ञान बढ़ाओ. (३६) आ जागृविर्विप्र ऋता मतीनां सोमः पुनानो असदच्चमूषु. सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः.. (३७) जागरणशील, सच्ची स्तुतियों के ज्ञाता एवं शुद्ध होते हुए सोम चमू नामक पात्रों में बैठते हैं. आपस में मिले हुए, अत्यंत अभिलाषी, यज्ञ के नेता एवं हाथ में कल्याण रखने वाले पुरोहित तथा अध्वर्यु दशापवित्र में सोम को छूते हैं. (३७) स पुनान उप सूरे न धातोभे अप्रा रोदसी वि ष आवः. प्रिया चिद्यस्य प्रियसास ऊती स तू धनं कारिणे न प्र यंसत्.. (३८) जिस प्रकार संवत्सर सूर्य के पास जाता है, उसी प्रकार शुद्ध होते हुए सोम इंद्र के पास जाते हैं एवं द्यावा-पृथिवी दोनों को अपनी महिमा से पूर्ण करते हैं. सोम अपने तेज से अंधकारों का नाश करते हैं. जिस प्यारे सोम की अत्यंत प्रिय धाराएं रक्षा करती हैं, वह हमें इस प्रकार धन दें, जिस प्रकार सेवक को वेतन मिलता है. (३८) ebook converter DEMO Watermarks*

स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढवाँ अभि नो ज्योतिषावीत्. येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमुष्णन्.. (३९) देवों को बढ़ाने वाले, स्वयं बढ़ने वाले, दशापवित्र द्वारा शुद्ध व अभिलाषापूरक सोम अपने तेज से हमारी रक्षा करें. पणियों द्वारा चुराई हुई गायों के पदचिह्न जानने वाले एवं सूर्य के ज्ञाता हमारे पितर सोमपान के द्वारा अंधकारपूर्ण गुफाओं में जाकर पशुओं को ले आए थे. (३९) अक्रान्तसमुद्रः प्रथमे विधर्मञ्जनयन्प्रजा भुवनस्य राजा. वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे सुवान इन्दुः.. (४०) जल बरसाने वाले एवं राजा सोम विस्तृत एवं जलधारक अंतरिक्ष में प्रजाओं को उत्पन्न करते हुए सबसे आगे निकल जाते हैं. अभिलाषापूरक, निचुड़ते हुए एवं दीप्त सोम भेड़ के बालों से बने ऊंचे दशापवित्र पर बहुत बढ़ते हैं. (४०) महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान्. अदधादिन्द्रे पवमान ओजोऽजनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः.. (४१) महान् सोम ने बहुत से काम किए हैं. जल के गर्भरूप सोम ने देवों का सहारा लिया है. पवमान सोम ने इंद्र को ओज दिया है एवं सूर्य में तेज उत्पन्न किया है. (४१) मत्सि वायुमिष्टये राधसे च मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः. मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम.. (४२) हे सोम! हमें अन्न और धन देने के लिए तुम वायु को प्रमुदित करो. तुम पवित्र होते हुए मित्रावरुण को प्रसन्न करो तथा मरुतों के बल एवं देवों को प्रमत्त करो. हे स्तुतियोग्य सोम! तुम द्यावा-पृथिवी को नशे में कर दो. (४२) ऋजुः पवस्व वृजिनस्य हन्तापामीवां बाधमानो मृधश्च. अभिश्रीणन्पयः पयसाभि गोनामिन्द्रस्य त्वं तव वयं सखायः.. (४३) हे सरल गति वाले, उपद्रव नष्ट करने वाले, रोगरूपी राक्षस को बाधा पहुंचाने वाले एवं हमारे हिंसक शत्रुओं को समाप्त करने वाले सोम! तुम टपको. तुम अपने रस को गायों के दूध में मिलाते हुए हमारे और इंद्र के मित्र बनो. (४३) मध्वः सूदं पवस्व वस्व उत्सं वीरं च न आ पवस्वा भगं च. स्वदस्वेन्द्राय पवमान इन्दो रयिं च न आ पवस्वा समुद्रात्.. (४४) हे सोम! तुम मधुरता बरसाने वाले और धन के वर्षक अपने रस को टपकाओ तथा हमें वीरपुत्र एवं भोगयोग्य अन्न दो. हे सोम! तुम शुद्ध होते हुए इंद्र के लिए रुचिकर बनो तथा हमें ebook converter DEMO Watermarks*

अंतरिक्ष से धन दो. (४४) सोमः सुतो धारयात्यो न हित्वा सिन्धुर्न निम्नमभि वाज्यक्षाः. आ योनिं वन्यमसदत्पुनानः समिन्दुर्गोभिरसरत्समद्भिः.. (४५) निचुड़े हुए सोम अपनी धारा के द्वारा तीव्रगामी अश्व के समान जाकर रहने वाली नदी की तरह नीचे द्रोणकलश में गिरते हैं. शुद्ध सोम द्रोणकलश में बैठते हैं एवं गाय के दूध आदि में मिलाए जाते हैं. (४५) एष स्य ते पवत इन्द्र सोमश्चमूषू धीर उशते तवस्वान्. स्वर्चक्षा रथिरः सत्यशुष्मः कामो न यो देवयतामसर्जि.. (४६) हे कामना करने वाले इंद्र! धीर एवं वेगशाली सोम तुम्हारे लिए चमू नामक पात्रों में गिरते हैं, सबको देखने वाले, रथयुक्त एवं सच्ची शक्ति वाले सोम देवों की इच्छा करने वाले यजमानों के लिए अभिलाषापूरक के समान बनाए जाते हैं. (४६) एष प्रत्नेन वयसा पुनानस्तिरो वर्पांसि दुहितुर्दधानः. वसानः शर्म त्रिवरूथमप्सु होतेव याति समनेषु रेभन्.. (४७) प्राचीन अन्न से पवित्र होते हुए, सबका दोहन करने वाली धरती के रूपों को अपने तेज से ढकते हुए, तीनों ऋतुओं से बचाने वाली यज्ञशाला को ढकते हुए एवं जलों में स्थित सोम यज्ञों में इस प्रकार शब्द करते हुए जाते हैं, जिस प्रकार स्तोता स्तोत्र बोलता हुआ जाता है. (४७) नू नस्त्वं रथिरो देव सोम परि स्रव चम्वोः पूयमानः. अप्सु स्वादिष्ठो मधुमाँ ऋतावा देवो न यः सविता सत्यमन्मा.. (४८) हे अभिलाषा करने योग्य एवं रथस्वामी सोम! तुम हमारे यज्ञ में चमू नामक पात्रों में शुद्ध होते हुए जलों में जल्दी एवं सब ओर से गिरो. स्वादपूर्ण, मधुरता भरे, यज्ञस्वामी एवं सबके प्रेरक सोम देवता के समान सच्ची स्तुतियों वाले हैं. (४८) अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानोऽभि मित्रावरुणा पूयमानः. अभि नरं धीजवनं रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम्.. (४९) हे स्तुत सोम! तुम पान के निमित्त वायु के पास जाओ. तुम शुद्ध होते हुए मित्र व वरुण के पास जाओ. तुम सबके नेता, मन के समान वेगशाली एवं रथ में बैठे हुए अश्विनीकुमारों के पास जाओ तथा अभिलाषापूरक एवं वज्रबाहु इंद्र के पास जाओ. (४९) अभि वस्त्रा सुवसनान्यर्षामि धेनूः सुदुघाः पूयमानः. अभि चन्द्रा भर्तवे नो हिरण्याभ्यश्वान्रथिनो देव सोम.. (५०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सोम! हमारे लिए तुम धारण करने योग्य वस्त्र लाओ. तुम शुद्ध होकर हमारे लिए दुधारू गाएं लाओ. तुम हमारे भरणपोषण के लिए आह्लादक सोना तथा रथ में जुड़ने वाले घोड़े दो. (५०) अभी नो अर्ष दिव्या वसून्याभि विश्वा पार्थिवा पूयमान:. अभि येन द्रविणमश्श्रवामाभ्यार्षेयं जमदग्निवन्नः.. (५१) हे दशापवित्र द्वारा शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमें दिव्य एवं पार्थिव सभी प्रकार के धन दो. हम तुम्हारे द्वारा दी हुई शक्ति से धन का उपभोग करें. हम जमदग्नि ऋषि के समान धन पाने में समर्थ हों. (५१) अया पवा पवस्वैना वसूनि माँश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व. ब्रध्नश्चिद्रत्र वातो न जूतः पुरुमेधश्चित्तकवे नरं दात्.. (५२) हे सोम! इस शुद्ध होती हुई सोमधारा के द्वारा सभी धन बरसाओ. हे सोम! जो लोग तुम्हें मानते हैं, उनके जल में जाओ. सोम के शुद्ध होने की वेला में सबका ज्ञान कराने वाले एवं वायु के समान वेग वाले आदित्य तथा अनेक यज्ञों वाले इंद्र भी उनके पास जाते हैं. हे सोम! मुझ स्तुतिकर्त्ता को आदित्य और इंद्र पुत्र दें. (५२) उत न एना पवया पवस्वाधि श्रुते श्रवाय्यस्य तीर्थे. षष्टिं सहस्रा नैगुतो वसूनि वृक्षं न पक्वं धूनवद्रणाय.. (५३) हे सबके आश्रय योग्य सोम! हमारे शब्दतीर्थरूपी प्रसिद्ध यज्ञ में इस पवित्र धारा के द्वारा टपको. जिस प्रकार वृक्ष पका हुआ फल गिराता है, उसी प्रकार शत्रुनाशक सोम ने शत्रुविजय के लिए हमें साठ हजार धन दिए. (५३) महीमे अस्य वृषनाम शूषे माँश्चत्वे वा पृशने वा वधत्रे. अस्वापयन्निगुतः स्नेहयच्चापामित्राँ अपाचितो अचेतः.. (५४) घोड़ों एवं बाहुओं द्वारा किए जाने वाले युद्ध में सोम के दो महान् कर्म बाण बरसाना और शत्रुओं को हराना शत्रुनाशक होते हैं. इन दोनों कार्यों द्वारा सोम ने शत्रु का वध किया एवं युद्धभूमि से भगाया. हे सोम! शत्रुओं और अग्नि चयन करने वालों को दूर भगाओ. (५४) सं त्री पवित्रा विततान्येष्वन्वेकं धावसि पूयमानः. असि भगो असि दात्रस्य दातासि मघवा मघवद्भ्य इन्दो.. (५५) हे सोम! तुम तीन विस्तृत पवित्रों को भली प्रकार प्राप्त करते हो. तुम शुद्ध होते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की ओर दौड़ते हो. हे सोम! तुम भोगयोग्य, देने योग्य धन के दाता एवं धनवानों की अपेक्षा अधिक धनी हो. (५५) ebook converter DEMO Watermarks*

एष विश्ववित्पवते मनीषी सोमो विश्वस्य भुवनस्य राजा. द्रप्साँ ईरयन्विद्धेष्विन्दुविं वारमव्यं समयाति याति.. (५६) सबको जानने वाले, मेधावी व सकल भुवन के स्वामी सोम टपकते हैं. सोम यज्ञों में अपना रस प्रेरित करते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र के पास दोनों ओर से जाते हैं. (५६) इन्दुं रिहन्ति महिषा अदब्धाः पदे रेभन्ति कवयो न गृध्राः. हिन्वन्ति धीरा दशभिः क्षिपाभिः समञ्जते रूपमपां रसेन.. (५७) महान् एवं अहिंसित देव सोम का आस्वादन करते हैं. सोम से धन की अभिलाषा करने वाले स्तोता जिस प्रकार शब्द करते हैं, उसी प्रकार सोम का स्वाद लेने वाले देव उनकी धारा के समीप शब्द करते हैं. कुशल ऋत्विज् दस उंगलियों के द्वारा सोम को मसलते हैं एवं जल के साथ सोम का रस मिलाते हैं. (५७) त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (५८) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम्हारी सहायता से हम युद्ध में अनेक विशिष्ट काम करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और स्वर्गलोक धन द्वारा हमारा आदर करें. (५८) सूक्त—९८ देवता—पवमान सोम अभि नो वाजसातमं रयिमर्ष पुरुस्पृहम्. इन्दो सहस्रभरणसं तुविद्युम्नं विष्वासहम्.. (१) हे दीप्त सोम! हमें पर्याप्त अन्न देने वाला, बहुतों द्वारा अभिलषित, अनेक प्रकार से भरणपोषण करने वाला एवं बड़ों को हराने वाला पुत्र दो. (१) परि ष्य सुवानो अव्ययं रथे न वर्माव्यत. इन्दुरभि द्रुणा हितो हियानो धाराभिरक्षाः.. (२) निचुड़ते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर ऐसे स्थित होते हैं, जैसे रथ में बैठा हुआ पुरुष कवच धारण करता है. स्तोताओं द्वारा प्रशंसित सोम द्रोणकलश में भरते हुए धाराओं के रूप में गिरते हैं. (२) परि ष्य सुवानो अक्षा इन्दुरुव्ये मदच्युतः. धारा य ऊर्ध्वो अध्वरे भ्राजा नैति गव्ययुः.. (३) निचोड़े जाते हुए सोम देवों के द्वारा नशे के लिए प्रेरित होकर भेड़ के बालों से बने

दशापवित्र पर सब ओर से छनते हैं. यज्ञ में प्रमुख गाय की अभिलाषा करने वाले सोम जिस प्रकार धारा के रूप में जाते हैं, उसी तेजपूर्ण दीप्ति के साथ अंतरिक्ष में जाते हैं. (३) स हि त्वं देव शश्वते वसु मर्ताय दाशुषे. इन्दो सहस्रिणं रयिं शतातमानं विवाससि.. (४) हे सोम! तुम बहुत से मनुष्यों और मुझ यजमान को दान देते हो. हे दीप्तिशाली सोम! तुम सैकड़ों और हजारों प्रकार का धन देते हो. (४) वयं ते अस्य वृत्रहन्वसो वस्वः पुरुस्पृहः. नि नेदिष्ठतमा इषः स्याम सुम्नस्याधिगो.. (५) हे शत्रुनाशक सोम! हम तुम्हारे हैं. हे निवासस्थान देने वाले सोम! हम तुम्हारे द्वारा प्रदत्त एवं बहुतों द्वारा अभिलाषा योग्य धन के बहुत पास रहें. हे अबाध गति वाले सोम! हम सुख के बहुत पास रहें. (५) द्विर्यं पञ्च स्वयशसं स्वसारो अद्रिसंहतम्. प्रियमिन्द्रस्य काम्यं प्रस्नापयन्त्यूर्मिणम्.. (६) काम करने के लिए इधर-उधर जाने वाली दस उंगलियों द्वारा पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए, इंद्र के प्रिय, सबके द्वारा अभिलषित एवं लहरों वाले सोम को जल में स्नान कराती हैं. (६) परि त्यं हर्यतं हरि बभ्रु पुनन्ति वारेण. यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति.. (७) सबके द्वारा अभिलाषा योग्य, हरे रंग वाले व मटमैले वर्णयुक्त सोम को भेड़ के बालों से बने दशापवित्र द्वारा छाना जाता है. सोम अपना नशीला रस लेकर सभी देवों के पास जाते हैं. (७) अस्य वो ह्यवसा पान्तो दक्षसाधनम्. यः सूरिषु श्रवो बृहद्दधे स्वर्णि हर्यतः.. (८) तुम लोग सोम द्वारा सुरक्षित होकर इसके शक्तिसाधन रस को पिओ. सबके द्वारा अभिलषित सोम सूर्य के समान स्तोताओं को महान् धन देते हैं. (८) स वां यज्ञेषु मानवी इन्दुर्जन्विष्ट रोदसी. देवो देवी गिरिष्ठा अस्रेधन्तं तुविष्वणि.. (९) हे मनु द्वारा अधिकृत एवं तेजपूर्ण द्यावा-पृथिवी! सोम ने तुम दोनों को यज्ञ में उत्पन्न ebook converter DEMO Watermarks*

किया है. अधिक शब्द वाले यज्ञ में ऋत्विजों ने सोमरस निचोड़ा. (९) इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे. नरे च दक्षिणावते देवाय सदनासदे.. (१०) हे सोम! तुम वृत्रहंता इंद्र के पान हेतु पात्रों में निचोड़े जाते हो. तुम ऋत्विजों को दक्षिणा देने वाले एवं देवों को हव्य देने की इच्छा से यज्ञशाला में बैठे हुए यजमान को फल देने के लिए निचोड़े जाते हो. (१०) ते प्रत्नासो व्युष्टिषु सोमाः पवित्रे अक्षरन्. अपप्रोथन्तः सनुतर्हुरश्चितः प्रातस्ताँ अप्रचेतसः.. (११) प्रत्येक प्रातःकाल में प्राचीन सोम दशापवित्र के ऊपर निचोड़े जाते हैं. सोम छिपे हुए, ज्ञानरहित एवं चोरों को प्रातःकाल ही भगा देते हैं. (११) तं सखायः पुरोरुचं यूयं वयं च सूरयः. अश्याम वाजगन्ध्यं सनेम वाजपस्त्यम्.. (१२) हे मित्रो! हम और तुम दोनों ही विशेष ज्ञान वाले हैं. हम सामने सुशोभित एवं बलकारक उत्तम गंध वाले सोम को पिएं. हम बलकारक सोम की सेवा करें. (१२) सूक्त—९९ देवता—पवमान सोम आ हर्यताय धृष्णवे धनुस्तन्वन्ति पौंस्यम्. शुक्रं वयन्त्यसुराय निर्णिजं विपामग्रे महीयुवः.. (१) सबके द्वारा अभिलाषा योग्य एवं शत्रुओं को नष्ट करने वाले सोम के लिए पौरुष प्रकट करने वाले धनुष पर डोरी चढ़ाई जाती है. पूजा के अभिलाषी ऋत्विज् लोग बुद्धिमान् देवों के आगे शक्तिशाली सोम के लिए सफेद रंग का दशापवित्र फैलाते हैं. (१) अध क्षपा परिष्कृतो वाजाँ अभि प्र गाहते. यदि विवस्वतो धियो हरिं हिन्वन्ति यातवे.. (२) रात बीतने पर जलों से सुशोभित सोम अन्नों को लक्ष्य करके जाते हैं. सेवा करने वाले यजमान की कर्म करने वाली दस उंगलियां हरे रंग के सोम को पात्र में भेजती हैं. (२) तमस्य मर्जयामसि मदो य इन्द्रपातमः. यं गाव आसभिर्दधुः पुरा नूनं च सूरयः.. (३) हम सोम के उस रस को शुद्ध करते हैं, जो नशीला एवं इंद्र के द्वारा अत्यंत पेय है. गतिशील स्तोता उस रस को पहले भी मुखों द्वारा पीते थे और इस समय भी पीते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

तं गाथया पुराण्या पुनानमभ्यनूषत. उतो कृपन्त धीतयो देवानां नाम बिभ्रतीः.. (४) स्तोतागण प्राचीन गाथाओं द्वारा शुद्ध होते हुए सोम की स्तुति करते हैं. देवों के कार्य के लिए मुड़ने वाली उंगलियां देवों को सोम-रूप हवि देने के लिए समर्थ होती हैं. (४) तमुक्षमाणमव्यये वारे पुनन्ति धर्णसिम्. दूतं न पूर्वचित्तय आ शासते मनीषिणः.. (५) मेधावी यजमान पानी से भीगे हुए एवं सबको धारण करने वाले सोम को भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर शुद्ध करते हैं एवं देवों को अपनी बात बताने के लिए दूत के समान सोम की प्रार्थना करते हैं. (५) स पुनानो मदिन्तमः सोमश्चमूषु सीदति. पशौ न रेत आदधत्पतिर्वचस्यते धियः.. (६) अत्यंत नशीले सोम शुद्ध होकर चमू नामक पात्रों में स्थित होते हैं. गाय में वीर्य धारण करने वाले बैल के समान चमू पात्रों में रस डालने वाले एवं यज्ञकर्म के स्वामी सोम की स्तुति की जाती है. (६) स मृज्यते सुकर्मभिर्देवो देवेभ्यः सुतः. विदे यदासु संददिर्महीरपो वि गाहते.. (७) देवों के लिए निचोड़े गए एवं दीप्तिशाली सोम को ऋत्विज् शुद्ध करते हैं. प्रजाओं में भली प्रकार दान करने वाले माने गए सोम महान् जल में नहाते हैं. (७) सुत इन्‍दो पवित्र आ नृभिर्यतो वि नीयसे. इन्द्राय मत्सरिन्तमश्चमूष्वा नि षीदसि.. (८) हे निचुड़े हुए और विस्तृत सोम! तुम ऋत्विजों द्वारा दशापवित्र पर ले जाए जाते हो. हे अत्यंत नशीले सोम! तुम इंद्र के लिए चमू नामक पात्रों में बैठते हो. (८) सूक्त—१०० देवता—पवमान सोम अभी नवन्ते अद्रुहः प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्. वत्सं न पूर्व आयुनि जातं रिहन्ति मातरः.. (१) गाएं जिस प्रकार प्रथम अवस्था में उत्पन्न बछड़े को चाटती हैं, उसी प्रकार द्रोहरहित जल इंद्र के प्रिय एवं सुंदर सोम के पास जाते हैं. (१) पुनान इन्दवा भर सोम द्विबर्हसं रयिम्. त्वं वसूनि पुष्यसि विश्वानि दाशुषो गृहे.. (२) हे दीप्तिशाली एवं शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमारे लिए दोनों लोकों में बढ़ने वाला धन ebook converter DEMO Watermarks*

लाओ एवं यजमान के घर में रहकर उसके पृथिवी संबंधी एवं दिव्य धन को पुष्ट करो. (२) त्वं धियं मनोजुजं सृजा वृष्टिं न तन्यतुः त्वं वसूनि पार्थिवा दिव्या च सोम पुष्यसि.. (३) हे सोम! तुम अपने मन के समान वेग वाली सोम की धारा को पात्रों में उसी प्रकार गिराओ. जिस प्रकार मेघ वर्षा करते हैं. तुम धरती संबंधी एवं दिव्य धनों को बढ़ाते हो. (३) परि ते जिग्युषो यथा धारा सुतस्य धावति. रंहमाणा व्य१व्ययं वारं वाजीव सानसिः.. (४) हे निचुड़े हुए सोम! स्तोताओं द्वारा सेवा योग्य एवं वेग वाली तुम्हारी धारा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर इस प्रकार दौड़ती है, जैसे शत्रुंजयी वीर का घोड़ा दौड़ता है. (४) क्रत्वे दक्षाय नः कवे पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतो मित्राय वरुणाय च.. (५) हे इंद्र, मित्र और वरुण के पान हेतु निचुड़े हुए तथा क्रांतदर्शी सोम! तुम हमें ज्ञान और बल देने के लिए धारा के रूप में नीचे गिरो. (५) पवस्व वाजसातमः पवित्रे धारया सुतः. इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तमः.. (६) हे अतिशय अन्नदाता एवं निचुड़े हुए सोम! तुम धारा के रूप में नीचे गिरो एवं इंद्र, विष्णु आदि देवों के लिए मधुरतम बनो. (६) त्वां रिहन्ति मातरो हरिं पवित्रे अद्रुहः. वत्सं जातं न धेनवः पवमान विधर्मणि.. (७) हे पवमान सोम! पैदा हुए बछड़ों को जिस प्रकार गाएं चाटती हैं, उसी प्रकार हव्यधारक यज्ञ में द्रोहरहित एवं माताओं के समान जल हरे रंग वाले तुमको चाटते हैं. (७) पवमान महि श्रवश्चित्रेभिर्यासि रश्मिभिः. शर्धन्तमांसि जिघ्नसे विश्वानि दाशुषो गृहे.. (८) हे सोम! तुम अपनी नानाविध किरणों के साथ महान् और आश्रययोग्य अंतरिक्ष में जाते हो. हे वेगशाली सोम! तुम हविदाता यजमान के घर में ठहर कर अंधकाररूपी सभी राक्षसों को समाप्त करते हो. (८) त्वं द्यां च महिव्रत पृथिवीं चाति जभ्रिषे. प्रति द्रापिममुञ्चथाः पवमान महित्वना.. (९) हे महान् कर्म वाले सोम! तुम द्यावा-पृथिवी को ठीक से धारण करते हो. हे पवमान ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१०१ देवता—पवमान सोम

सोम! तुम महत्त्व से युक्त होकर कवच धारण करते हो. (९) सूक्त—१०१ देवता—पवमान सोम पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे. अप श्वानं श्रथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम्.. (१) हे मित्र स्तोताओ! सामने स्थित एवं भक्षण करने योग्य सोम के निचुड़े हुए एवं अत्यंत नशीले रस को पीने के लिए आए लंबी जीभ वाले कुत्तों को रोको. (१) यो धारया पावकया परिप्रस्यन्दते सुतः. इन्दुरश्वो न कृत्व्यः.. (२) निचुड़े हुए और यज्ञकर्म में श्रेष्ठ सोम अपनी पवित्र धारा से चारों ओर इसी प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार घोड़ा दौड़ता है. (२) तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया. यज्ञं हिन्वन्त्यद्रिभिः.. (३) ऋत्विज् लोग इस अहिंसनीय एवं यज्ञयोग्य सोम को समस्त अभिलाषाओं से पूर्ण बुद्धि के सहारे पत्थरों की सहायता से निचोड़ते हैं. (३) सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः. पवित्रवन्तो अक्षरन्द्देवान्गच्छन्तु वो मदाः.. (४) अत्यंत नशीले, मधुर एवं निचुड़े हुए सोम दशापवित्र में वर्तमान होकर इंद्र के निमित्त पात्रों में छनते हैं. हे सोम! तुम्हारा मादक रस देवों के पास जावे. (४) इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्. वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा.. (५) देवों ने ऐसा कहा है कि सोम इंद्र के लिए टपकते हैं. स्तुतियों के पालक एवं शक्ति द्वारा संसार के स्वामी सोम स्तुतियों द्वारा पूजा की इच्छा करते हैं. (५) सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः. सोमः पती रयीणां सखेन्द्रस्य दिवेदिवे.. (६) रस के आधार, स्तुतियों की प्रेरणा देने वाले, धन के स्वामी एवं इंद्र के मित्र सोम हजारों धाराओं वाले बनकर टपकते हैं. (६) अयं पूषा रयिर्भर्गः सोमः पुनानो अर्षति. पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे.. (७) सबके पोषक, सेवा करने योग्य व धन के कारण सोम शुद्ध होकर कलश में जाते हैं. सब प्राणियों के स्वामी सोम अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः. सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः.. (८) प्यारे एवं अत्यंत दीप्त स्तुतिवचन सोम की प्रशंसा करते हैं. शुद्ध होते हुए सोम अपने छनने के लिए मार्ग बनाते हैं. (८) य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम्. यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहै.. (९) हे सोम! तुम अपना परम ओजस्वी एवं प्रशंसनीय रस टपकाओ. पांच जनों के समीप रहने वाले तुम्हारे रस द्वारा हम धन प्राप्त करें. (९) सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः. मित्राः सुवाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः.. (१०) अत्यंत मार्गदर्शक, दीप्तिशाली, देवों के मित्र, पापरहित, उत्तम ध्यान वाले एवं सब कुछ जानने वाले सोम निचुड़ते हुए हमारे पास आ रहे हैं. (१०) सुष्वाणासो व्यद्रिभिश्चताना गोरधि त्वचि. इषमस्मभ्यमभितः समस्वरन् वसुविदः.. (११) गाय के चमड़े पर ज्ञात होते हुए, पत्थरों की सहायता से भली प्रकार निचोड़े गए एवं धन प्राप्त कराने वाले सोम चारों ओर से भली-भांति शब्द कर रहे हैं. (११) एते पूता विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः. सूर्यासो न दर्शतासो जिगत्नवो ध्रुवा घृते.. (१२) दशापवित्र की सहायता से शुद्ध किए गए, मेधावी, दही से मिश्रित, जल में चलने वाले एवं स्थिर सोम पात्रों में सूर्य के समान दिखाई देते हैं. (१२) प्र सुन्वानस्यान्धसो मर्तो न वृत्त तद्वचः. अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः.. (१३) निचोड़े जाते हुए एवं उपभोग योग्य सोम का प्रसिद्ध शब्द यज्ञविघ्नकर्त्ता कुत्ते को दूर करे. हे स्तोताओ! भृगुवंशी लोगों ने जैसे पहले भग को मारा था, उसी प्रकार तुम उस यज्ञकर्म के बाधक कुत्ते को मारो. (१३) आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः. सरज्जारो न योषणां वरो न योनिमासदम्.. (१४) देवों के मित्र सोम दशापवित्र से इस प्रकार मिल जाते हैं, जिस प्रकार रक्षक माता-पिता की भुजाओं में पुत्र आ जाता है. जार पुरुष जिस प्रकार स्त्री को पाने के लिए दौड़ता है, उसी प्रकार सोम द्रोणकलश की ओर जाते हैं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*