ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
प्र ये पश्यन्नर्यमणं सचायोस्त्वया शूर्ता वहमाना अपत्यम्.. (६) हे अश्वस्वामी इंद्र! तुमने स्तोत्रों से वृद्धि प्राप्त करके ऐसे लोगों का वध किया जो दान नहीं देते थे और तुम्हारे मित्र यजमानों के शत्रु थे. जो तुम्हें आश्रयदाता के रूप में देखते एवं जो हव्य देने के लिए तुम्हारे सामने आते हैं, वे तुमसे संतान पाते हैं. (६) रपत्कविरिन्द्रार्कसातौ क्षां दासायोपबर्हणीं कः. करत्तिस्रो मघवा दानुचित्रा नि दुर्योणे कुयवाचं मृधि श्रेत्.. (७) हे इंद्र! अन्न प्राप्ति के निमित्त क्रांतदर्शी होता तुम्हारी स्तुति करता है. तुमने दास असुर का वध करके धरती को उसकी शय्या बनाया था. इंद्र ने तीन भूमियों का दानरूपी विचित्र कार्य करके दुर्योणि राजा के कल्याण के लिए कुयवाच को मारा था. (७) सना ता त इन्द्र नव्या आगुः सहो नभोऽविरणाय पूर्वीः. भिनत्पुरो न भिदो अदेवीर्ननमो वधरदेवस्य पीयोः.. (८) हे इंद्र! नवीनतम ऋषि तुम्हारे अति प्राचीन वीरकर्मों की स्तुति करते हैं. तुमने युद्ध समाप्त करने के लिए अनेक हिंसकों को समाप्त किया है. तुमने विरोधियों के देवशून्य नगरों को नष्ट किया तथा दानरहित विरोधी वृत्र के ऊपर अपना वज्र झुकाया. (८) त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्ऋणोरपः सीरा न स्रवन्तीः. प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति.. (९) हे इंद्र! तुम शत्रुओं को कंपित करने वाले हो, इसलिए बहती हुई सीरा नदी के समान तरंगों वाला जल धरती पर बहाते हो. हे शूर! तुमने सागर को जल से पूर्ण करते समय यदु और तुर्वसु राजाओं का पालन करके उनका कल्याण किया. (९) त्वमस्माकमिन्द्र विश्वध स्या अवृकतमो नरां नृपाता. स नो विश्वासां स्पृधां सहोदा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे इंद्र! तुम सदा हमारे उत्तम रक्षक एवं मनुष्यों के रक्षक बनो, तुम हमारी सेना को बल प्रदान करो. हम अन्न, धन और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१०) सूक्त—१७५ देवता—इंद्र मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः. वृषा ते वृष्ण इन्दुवाजी सहस्रसातमः.. (१) हे अश्वस्वामी इंद्र! महान् एवं पूज्य सोमरस जिस प्रकार पात्र में रखा है, उसी प्रकार तुम भी इसे स्वीकार करो. तुम इसे पीकर प्रसन्नता प्राप्त करोगे. हे कामवर्षी इंद्र! यह सोम तुम्हारी
अभिलाषा पूर्ण करके अभिमत सुख देगा. (१) आ नस्ते गन्तुमत्सरो वृषा मदो वरेण्यः. सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाळमर्त्यः.. (२) हे इंद्र! प्रसन्नतादाता, कामवर्षी, तृप्त करने वाला, श्रेष्ठ, शक्तिशाली, शत्रु सेनाओं का नाश करने वाला एवं अविनाशी सोमरस तुम्हें मिले. (२) त्वं हि शूरः सनिता चोदयो मनुषो रथम्. सहावान्दस्युमव्रतमोषः पात्रं न शोचिषा.. (३) हे शूर एवं दाता इंद्र! मुझ मनुष्य की अभिलाषा पूरी करो. सोमरस तुम्हारा सहायक है. अग्नि जिस प्रकार अपनी लपटों से अपने ही आधारभूत पात्र को जलाता है, उसी प्रकार तुम व्रतहीन असुर को नष्ट करो. (३) मुषाय सूर्य कवे चक्रमीशान ओजसा. वह शुष्णाय वधं कुत्सं वातस्याश्वैः.. (४) हे मेधावी एवं समर्थ इंद्र! तुमने अपनी शक्ति से सूर्य के एक पहिए को चुरा लिया था. तुम शुष्ण नामक असुर का वध करने के लिए वायु के समान तेज चलने वाले घोड़ों की सहायता से वज्र लेकर आओ. (४) शुष्मिन्तमो हि ते मदो द्युम्निन्तम उत क्रतुः. वृत्रघ्ना वरिवोविदा मंसीष्ठा अश्वसातमः.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता सबसे अधिक शक्तिशाली है एवं तुम्हारे यज्ञ में सबसे अधिक अन्न होता है. हे अश्व रूप अनेक धन देने वाले इंद्र! तुम वृत्रघाती एवं धन देने वाले दोनों यज्ञों का समर्थन करो. (५) यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयड्वापो न तृष्यते बभूथ. तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे इंद्र! तुमने प्राचीन स्तोताओं को उसी प्रकार सुख दिया, जिस प्रकार जल प्यासे व्यक्ति को प्रसन्न करता है. इसी कारण हम बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं कि हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (६) सूक्त—१७६ देवता—इंद्र मत्सि नो वस्यइष्टय इन्द्रमिन्दो वृषा विश. ऋघायमाण इन्वसि शत्रु्रमन्ति न विन्दसि.. (१) हे सोम! तुम हमारी धनप्राप्ति के लिए इंद्र को प्रसन्न करो एवं कामवर्षी इंद्र के भीतर प्रवेश करो. तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए उन्हें घेर लेते हो. कोई भी शत्रु तुम्हारे समीप नहीं ebook converter DEMO Watermarks*
आता. (१) तस्मिन्ना वेशया गिरो य एकश्चर्षणीनाम्. अनु स्वधा यमुप्यते यवं न चर्कृषद्वृषा.. (२) हे होता! अपनी स्तुतिरूपी वाणी को इंद्र में स्थापित करो. वे ज्ञान वाले मनुष्यों के एकमात्र आश्रय हैं. स्वधा शब्द के बाद उन्हें भी हव्य अन्न दिया जाता है. किसान जिस प्रकार पके जौ को ग्रहण करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारा हव्य स्वीकार करते हैं. (२) यस्य विश्वानि हस्तयोः पञ्च क्षितीनां वसु. स्पाशयस्व यो अस्मध्रुग्दिव्येनाशनिर्जहि.. (३) जिन इंद्र के हाथों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद पांचों प्रकार के जनों को प्रसन्न करने वाला सभी प्रकार का अन्न है, वे इंद्र हमसे द्रोह करने वाले को वज्र बनकर नष्ट करें. (३) असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न ते मयः. अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते.. (४) हे इंद्र! सोमरस न निचोड़ने वालों, दुःसाध्य विनाश वालों एवं सुख न पहुंचाने वालों का नाश करो. ऐसे लोगों का धन हमें दो. तुम्हारा स्तोता ही धन पाता है. (४) आवो यस्य द्विबर्हसोऽर्केषु सानुषगसत्. आजाविन्द्रस्येन्दो प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (५) हे सोम! उस यजमान की रक्षा करो, जिसके स्तोत्र और हव्य संबंधी मंत्रों में तुम सदा स्थित रहते हो. हे सोम! धन के लिए होने वाले युद्धों में अन्न के स्वामी इंद्र की रक्षा करो. (५) यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयइवापो न तृष्यते बभूथ. तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार जल प्यासे को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुमने प्राचीन स्तुतिकर्त्ता पर कृपा की थी. इसीलिए मैं तुम्हारी सुखदायक स्तुति बार-बार कर रहा हूं. मैं अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करूं. (६) सूक्त—१७७ देवता—इंद्र आ चर्षणिप्रा वृषभो जनानां राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः. स्तुतः श्रवस्यन्नवसोप मद्रिग्र्युक्त्वा हरी वृषणा याह्यर्वाङ्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
धन आदि द्वारा सभी मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले, कामवर्षी, सब लोगों के स्वामी एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र हमारे पास आवें. हे इंद्र! हमारी स्तुति सुनकर हव्य अन्न की इच्छा करते हुए दोनों कामवर्षी घोड़ों को रथ में जोड़कर हमारी रक्षा के लिए सामने आओ. (१) ये ते वृषणो वृषभास इन्द्र ब्रह्मयुजो वृषरथासो अत्याः. ताँ आ तिष्ठ तेभिरा याह्यर्वाङ् हवामहे त्वा सुत इन्द्र सोमे.. (२) हे इंद्र! तुम्हारे घोड़े तरुण, उत्तम, कामवर्षी, मंत्रयुक्त एवं रथ में जोड़ने योग्य हैं. तुम उन पर सवार होकर, उनके साथ हमारे सम्मुख आओ. (२) आ तिष्ठ रथं वृषणं वृषा ते सुतः सोमः परिषिक्ता मधूनि. युक्त्वा वृषभ्यां वृषभ क्षितीनां हरिभ्यां याहि प्रवतोप मद्रिक्.. (३) हे इंद्र! अपने कामवर्षी रथ पर बैठो, क्योंकि तुम्हारे लिए निचोड़ा हुआ सोमरस और मधुर घृत तैयार है. हे कामवर्षी इंद्र! अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो और सत्कर्म करने वाले यजमानों पर अनुग्रह करने के लिए शीघ्रगामी रथ से हमारे सम्मुख आओ. (३) अयं यज्ञो देवया अयं मियेध इमा ब्रह्माrootययमिन्द्र सोमः. स्तीर्णं बर्हिरा तु शक्र प्र याहि पिबा निषद्य वि मुचा हरी इह.. (४) हे इंद्र! यह यज्ञ देवों को प्राप्त करने वाला है. यह यज्ञ-संबंधी पशु, ये मंत्र, यह निचोड़ा हुआ सोमरस और बिछे हुए कुश, सब तुम्हारे लिए हैं. हे शतक्रतु! तुम शीघ्र आओ और कुशों पर बैठकर सोमरस पिओ. तुम इस यज्ञ में अपने घोड़ों को रथ से अलग करो. (४) ओ सुष्टुत इन्द्र याह्यर्वाङुप ब्रह्माणि मान्यस्य कारोः. विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (५) हे भली प्रकार स्तुत्य इंद्र! आदरणीय स्तोता के मंत्रों को स्वीकार करके हमारे सामने आओ. स्तुति करते हुए हम तुम्हारी रक्षा पाकर निवासस्थान के साथ ही अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करेंगे. (५) सूक्त—१७८ देवता—इंद्र यद्ध स्या त इन्द्र शृष्टिरस्ति यया बभूथ जरितृभ्य ऊती. मा नः कामं महयन्तमा धग्विश्वा ते अश्यां पर्याप आयोः.. (१) हे इंद्र! तुम्हारी वह समृद्धि सब जगह प्रसिद्ध है, जिसके द्वारा तुम स्तोताओं की रक्षा में समर्थ होते हो. हमें महान् बनाने की अपनी अभिलाषा तुम समाप्त मत करो. तुम्हारी सभी मानवोचित वस्तुओं को हम प्राप्त करें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
न घा राजेन्द्र आ दभन्नो या नु स्वसारा कृणवन्त योनी. आपश्चिदस्मै सुतुका अवेष्णन्गम्न इन्द्रः सख्या वयश्च.. (२) हे राजा इंद्र! परस्पर बहिन-भाई बने हुए रात-दिन अपने उत्पत्ति स्थल में वर्षादि कर्म करके हमारे यज्ञकर्म को समाप्त न करें. शक्तिदायक हवि इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र हमें अपनी मित्रता एवं अन्न दें. (२) जेता नृभिरिन्द्रः पृत्सु शूरः श्रोता हवं नाधमानस्य कारोः. प्रभर्ता रथं दाशुष उपाक उद्यन्ता गिरो यदि च त्मना भूत्.. (३) शूर इंद्र युद्ध के नेता मरुतों के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करते हैं एवं कृपा की अभिलाषा करने वाले स्तोता की पुकार सुनते हैं. वे जिस समय अपनी इच्छा से स्तुतिवचन सुनना चाहते हैं, उस समय अपना रथ हव्य देने वाले यजमान के पास ले आते हैं. (३) एवा नृभिरिन्द्रः सुश्रवस्या प्रखादः पृक्षो अभि मित्रिणो भूत्. समर्ध इषः स्तवते विवाचि सत्राकरो यजमानस्य शंसः.. (४) यजमान उत्तम धन पाने की इच्छा से जो अन्न देता है, उसे इंद्र अधिक मात्रा में खाते हैं और अपने भक्त यजमान के शत्रुओं को पराजित करते हैं. वे भांति-भांति के शब्दों वाले युद्ध में यजमान के यज्ञकर्म की प्रशंसा करते हैं एवं सच्चा फल देने के लिए हवि ग्रहण करते हैं. (४) त्वया वयं मघवन्निन्द्र शत्रूनभि ष्याम महतो मन्यमानान्. त्वं त्राता त्वमु नो वृधे भूर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम उन शत्रुओं का वध करें, जो अपने आपको बड़ा शक्तिशाली मानते हैं. तुम हमारे रक्षक एवं पालनकर्त्ता बनो. हम अन्न, बल और दीर्घ-आयु प्राप्त करें. (५) सूक्त—१७९ देवता—रति पूर्वीरहं शरदः शश्रमाणा दोषा वस्तोरुषसो जरयन्तीः. मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीर्वृषणो जगम्युः.. (१) लोपामुद्रा बोली—“हे अगस्त्य! मैं पूर्वकालिक अनेक वर्षों से रात, दिन और उषा काल में शरीर को जीर्ण करती हुई तुम्हारी सेवा में लगी रही हूं. इस समय बुढ़ापा मेरे अंगों का सौंदर्य नष्ट कर रहा है. क्या इस अवस्था में पुरुष नारियों के साथ समागम न करें? (१) ये चिद्धि पूर्व ऋतसाप आसन्त्साकं देवेभिरवदन्नृतानि. ebook converter DEMO Watermarks*
ते चिदवासुर्ऋह्यन्तमापुः समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः.. (२) “हे अगस्त्य! प्राचीन महर्षियों ने सत्य को प्राप्त किया. वे देवों के साथ सत्य बोलते थे. उन्होंने भी पत्नियों में वीर्य का स्खलन किया और इस कार्य को समाप्त नहीं किया. तपस्या करती हुई पत्नियां भोग समर्थ पतियों के समीप जाती थीं.” (२) न मृषा श्रान्तं यदवन्ति देवा विश्वा इत्स्पृधो अभ्यश्नवाव. जयावेदत्र शतनीथमाजिं यत्सम्पृञ्चा मिथुनावभ्यजाव.. (३) अगस्त्य ने उत्तर दिया—“हे पत्नी! हम लोग व्यर्थ ही नहीं थके हैं. हमारी तपस्या से प्रसन्न देव हमारी रक्षा करते हैं. हम सभी भोगों को भोगने में समर्थ हैं. यदि हम और तुम इच्छा करें तो इस संसार में अब भी सुखसंभोग के सैकड़ों साधन प्राप्त कर सकते हैं. (३) नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो अमुतः कुतश्चित्. लोपामुद्रा वृषणं नी रिणाति धीरमधीरा धयति श्वसन्तम्.. (४) “हे पत्नी! मैं मंत्रों के जप और ब्रह्मचर्य पालन में लगा रहा. फिर भी न जाने किस कारण मुझमें काम भाव उत्पन्न हो गया. तुम लोपामुद्रा वीर्य सेचन समर्थ मुझ पति के साथ संगत हो जाओ. तुम अधीर नारी बनकर मुझ महाप्राण पुरुष का भोग करो.” (४) इमं नु सोममन्तितो हृत्सु पीतमुप ब्रुवे. यत्सीमांगश्चकृमा तत्सु मृळतु पुलुकामो हि मर्त्यः.. (५) शिष्य कहने लगा—“उदर में पिया हुआ सोमरस मुझे सब पापों से छुड़ाकर सुखी करे, यह प्रार्थना मैं सच्चे मन से कर रहा हूं. मैंने जो पाप किया है, उससे मेरी रक्षा हो. क्यों मनुष्य मन में बहुत सी कामनाएं करता है? (५) अगस्त्यः खनमानः खनित्रैः प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः. उभौ वर्णावृषिरुगः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम.. (६) “मेरे गुरु अगस्त्य ने यज्ञों द्वारा अभिमत फल एवं बहुत सी संतान की इच्छा की. उन्होंने काम और संयम दोनों उत्तम गुण प्राप्त किए एवं देवों से सच्चा आशीर्वाद पाया.” (६) सूक्त—१८० देवता—अश्विनीकुमार युवो रजांसि सुयमासो अश्वा रथो यद्वां पर्यर्णांसि दीयत्. हिरण्यया वां पवयः पृषायन्मध्वः पिबन्ता उषसः सचेथे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तीनों लोकों में जाने वाले तुम्हारे रथ के घोड़े तुम्हें अभिमत स्थान में पहुंचा देते हैं. उस समय तुम्हारे सुनहरे रथ की नेमियां तुम्हारी इच्छा पूरी करती हैं. तुम ebook converter DEMO Watermarks*
प्रातःकाल सोमरस पीते हुए हमसे मिलो. (१) युवमत्स्यस्याव नक्षथो यद्दिपत्मनो नर्यस्य प्रयज्योः. स्वसा यद्वां विश्वगूर्त्ती भराति वाजायेष्टे मधुपाविषे च.. (२) हे सबके द्वारा स्तुत्य एवं मधुपानकर्त्ता अश्विनीकुमारो! तुम्हारी बहिन उषा जिस समय तुम्हारे आने के लिए प्रभात करती है एवं यजमान अन्न और बल पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करता है, उस समय तुम दोनों का नित्यगामी, विविध गतियों वाला, मनुष्यों का हितकारक एवं विशेष रूप से पूज्य रथ पहले ही चल देता है. (२) युवं पय उस्रियायामधत्तं पक्वमामायामव पूर्व्यं गोः. अन्तर्यद्दिनिनो वामृतप्सू ह्वारो न शुचिर्यजते हविष्मान्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुमने गायों को दुधारू बनाया है. तुम गायों के थनों में पहले से पके हुए दूध को स्थापित करते हो. हे सत्यरूप! चोर वन के वृक्षों में जिस सावधानी से छिपा रहता है, उसी सावधानी से शुद्ध एवं हव्ययुक्त यजमान तुम्हारी स्तुति करता है. (३) युवं ह घर्मं मधुमन्तमत्रयेऽपो न क्षोदोऽवृणीतमेषे. तद्वां नरावश्विना पश्वइष्टी रथ्येव चक्रा प्रति यन्ति मध्वः.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुमने सुख के इच्छुक अत्रि मुनि के लिए गरम दूध और घी की नदियां बहा दी थीं. हे नेताओ! हम इसीलिए तुम्हारे लिए अग्नि में यज्ञ करते हैं. रथ का पहिया जिस प्रकार ढालू मार्ग पर अपने आप चलता है, उसी प्रकार सोमरस तुम्हें स्वतः प्राप्त होता है. (४) आ वां दानाय ववृतीय दस्रा गोरोहेण तौग्र्यो न जिब्रिः. अपः क्षोणी सचते माहिना वां जूर्णो वामक्षुरंहसो यजत्रा.. (५) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुग्र राजा के पुत्र भुज्यु ने जिस प्रकार तुम्हें बुलाया था, उसी प्रकार मैं अपनी स्तुतियों द्वारा तुम्हें अपने यज्ञ में बुला लूंगा. तुम्हारी कृपा से ही धरती और आकाश मिले हैं. हे यज्ञ स्वामियो! यह बूढ़ा दुर्बल ऋषि पाप से छूट कर दीर्घ जीवन प्राप्त करे. (५) नि यद्युवेथे नियुतः सुदानू उप स्वधाभिः सृजथः पुरन्धिम्. प्रेषद्वेषद्वातो न सूरिरा महे ददे सुव्रतो न वाजम्.. (६) हे शोभनदानशील अश्विनीकुमारो! जब तुम अपने नियुत नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ते हो, उस समय धरती को अन्न से पूर्ण बना देते हो. यह यजमान तुम्हें वायु के समान शीघ्र प्रसन्न करे एवं तुम्हारी कामना करे. इसके बाद यजमान उत्तम कर्म करने वाले व्यक्ति के समान अन्न प्राप्त करता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
वयं चिद्धि वां जरितारः सत्या विपन्यामहे वि पणिर्हितावान्. अधा चिद्धि ष्माश्विनावन्दिन्द्या पाथो हिष्मा वृषणावन्तिदेवम्.. (७) हम भी तुम्हारे स्तोता एवं सत्य बोलने वाले हैं. हम तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम यज्ञ न करने वाले परम धनी का त्याग करो. हे प्रशंसनीय एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! तुम देवों के समीप सोमरस पिओ. (७) युवां चिद्धि ष्माश्विनावनु द्यून्विरुद्रस्य प्रस्रवणस्य सातौ. अगस्त्यो नरां नृतृ प्रशस्तः काराधुनीव चितयत्सहस्रैः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार शंख शब्द करता है, उसी प्रकार यज्ञकर्त्ता मनुष्यों में उत्तम अगस्त्य ऋषि हजारों स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन तुम्हें जगाते हैं. वे ग्रीष्म का दुःख दूर करने वाला वर्षा का जल चाहते हैं. (८) प्र यद्वहेथे महिना रथस्य प्र स्यन्द्रा याथो मनुषो न होता. धत्तं सूरिभ्य उत वा स्वश्व्यं नासत्या रयिषाचः स्याम.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ की महिमा से हमारा यज्ञ पूर्ण करते हो. हे गतिशीलो! तुम यजमान के होता के समान यज्ञ के आरंभ में आकर यज्ञ के अंत में जाओ. तुम स्तोताओं को उत्तम अश्व प्रदान करो. हम भी धन प्राप्त करेंगे. (९) तं वां रथं वयमद्या हुवेम स्तोमैरश्विना सुविताय नव्यम्. अरिष्टनेमिं परि द्यामियानं विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! हम स्तुतियों द्वारा तुम्हारे शीघ्रगति वाले, प्रशंसनीय, आकाश में उड़ने वाले तथा न टूटने योग्य नेमि वाले रथ को अपने यज्ञ में बुलाते हैं, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (१०) सूक्त—१८१ देवता—अश्विनीकुमार कदु प्रेष्ठाविषां रयीणामध्वर्यन्ता यदुन्निनीथो अपाम्. अयं वां यज्ञो अकृत प्रशस्तिं वसुधिती अवितारा जनानाम्.. (१) हे प्रियतम अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के अन्नरूपी धन को कब ऊपर ले जाओगे और यज्ञ को पूर्ण करने की इच्छा से वर्षा का जल नीचे गिराओगे? तुम धन धारणकर्त्ता एवं मनुष्यों के आश्रयदाता हो. यह यज्ञ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में ही किया जा रहा है. (१) आ वामश्वासः शुचयः पयस्पा वातरंहसो दिव्यासो अत्याः. मनोजुवो वृषणो वीतपृष्ठा एह स्वराजो अश्विना वहन्तु.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे घोड़े शुद्ध, वर्षा का जल पीने वाले, वायु के समान शीघ्रगामी, दिव्य, मन के समान तेज चाल वाले, जवान और सुंदर पीठ वाले हैं. वे तुम्हें इस यज्ञ में लावें. (२) आ वां रथोऽवनिर्न प्रवत्वान्तृप्रवन्धुरः सुविताय गम्याः. वृष्णः स्थांतारा मनसो जवीयानहम्पूवों यजतो धिष्ण्या यः.. (३) हे ऊंचे स्थान के योग्य एवं अपने रथ में बैठे हुए अश्विनीकुमारो! तुम धरती के समान विस्तृत, बड़े जुआर वाले, वर्षा करने में समर्थ, मन के समान होड़ने वाले, अहंकारी एवं यज्ञ के योग्य अपने रथ को यज्ञस्थल में ले आओ. (३) इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३ नामभिः स्वैः. जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरिर्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे.. (४) हे सूर्यचंद्र रूप में जन्म ग्रहण करने वाले पापरहित अश्विनीकुमारो! तुम्हारे शरीर की सुंदरता एवं माहात्म्य के कारण मैं बार-बार तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. तुम में से एक चंद्र बनकर यज्ञ प्रवर्तक के रूप में संसार को धारण करता है और दूसरा सूर्य के रूप में आकाश का पुत्र बनकर शोभन रश्मियों से संसार का पालन करता है. (४) प्र वां निचेरुः ककुहो वशाँ अनु पिशङ्गरूपः सदनानि गम्याः. हरी अन्यस्य पीपयन्त वाजैर्मथ्ना रजांस्यश्विना वि घोषैः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम में से एक का पीले रंग का श्रेष्ठ रथ हमारी इच्छा के अनुसार यज्ञभूमि में आ जाए एवं दूसरे को मनुष्य स्तुतियां तथा उसके घोड़ों को मथा हुआ खाद्य देकर प्रसन्न करे. (५) प्र वां शरद्वान्वृषभो न निष्षाट् पूर्वीरिषश्चरति मध्व इष्णन्. एवैरन्यस्य पीपयन्त वाजैर्वेषन्तीरूध्र्वां नद्यो न आगुः.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम में से एक बादलों को तोड़ते हुए इंद्र के समान शत्रुओं को भगाते हैं एवं बहुत से अन्नों की अभिलाषा करते हुए जाते हैं दूसरे को गमन के लिए यजमान लोग हव्य द्वारा प्रसन्न करते हैं. उनके प्रसन्न होने पर किनारों को तोड़ने वाली जल से भरी नदियां हमारे पास आती हैं. (६) असर्जि वां स्थविरा वेधसा गीर्वाळ्हे अश्विना त्रेधा क्षरन्ती. उपस्तुताववतं नाधमानं यामन्नयामञ्छृणुतं हवं मे.. (७) हे विधाता अश्विनीकुमारो! तुम्हें दृढ़ बनाने के लिए अत्यंत उत्तम स्तुतियां बनाई गई हैं. वे तीन प्रकार से तुम्हारे पास पहुंचती हैं. तुम स्तुति सुनकर अभीष्ट फल चाहने वाले यजमान की रक्षा करो एवं जाते हुए अथवा खड़े होकर उसकी पुकार सुनो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
उत स्या वां रुशतो वप्ससो गीस्त्रिबर्हिषि सदसि पिन्वते नॄन्. वृषां वां मेघो वृषणा पीपाय गोर्न सेके मनुषो दशस्यन्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुम तेजस्वी हो. तुम्हारी स्तुति तीन कुशों से युक्त यज्ञगृह में यजमान को प्रसन्न करे. हे कामवर्षको! तुमसे संबंधित बादल वर्षा करता हुआ मनुष्यों को धन देकर प्रसन्न करे. (८) युवां पूषेवाश्विना पुरन्धिरग्निर्मुषां न जरते हविष्मान्. हुवे यद्वां वरिवस्या गृणानो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (९) हे अश्विनीकुमारो! पूषा के समान बुद्धिमान् एवं हव्य धारण करने वाला तुम्हारा यजमान अग्नि और उषा के समान तुम्हारी स्तुति करता है. सेवापरायण स्तोता के साथ-साथ यजमान भी तुम्हारी स्तुति करता है, जिससे हम अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (९) सूक्त—१८२ देवता—अश्विनीकुमार अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः. धियञ्जिन्वा धिष्ण्या विश्पलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता.. (१) हे मेधावी ऋत्विजो! मेरे मन में यह ज्ञान उत्पन्न हुआ है कि अश्विनीकुमारों का कामवर्षी रथ आ गया है. उनके सामने जाकर उन्हें स्तुति से प्रसन्न करो. वे मुझ पुण्यवान् को कर्मबुद्धि देने वाले, स्तुतियोग्य, विश्पला का कल्याण करने वाले, आदित्य के नाती एवं पवित्रकर्म करने वाले हैं. (१) इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरुत्तमा दस्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा. पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम निश्चय ही उत्तम स्वामी, स्तुति के योग्य, मरुतों में श्रेष्ठ, शत्रुनाशक, कर्म करने में अतिशय कुशल, रथ के स्वामी एवं रक्षा करने वालों में श्रेष्ठ हो. तुम मधु से भरे हुए रथ को सभी जगह ले जाते हो. तुम उसी रथ पर बैठकर यज्ञ में आओ. (२) किमत्र दस्रा कृणुथः किमासाथे जनो यः कश्चिदहविर्महीयते. अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम इस मनुष्य के समीप क्यों ठहरे हो? यदि व्यक्ति यज्ञरहित होकर भी लोगों में आदर पा रहा हो तो उसे हराओ. उस पणि के प्राणों का नाश करो. मैं मेधावी तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. मुझे प्रकाश दो. (३) जम्भयतमभितो रायतः शुनो हतं मृधो विदथुस्तान्यश्विना.
वाचंवाचं जरितू रत्निनों कृतमुभा शंसं नासत्यावतं मम.. (४) हे अश्विनीकुमारो! उनको मार डालो जो कुत्ते के समान बुरी तरह भौंकते हुए हमें मारने आते हैं अथवा हमसे युद्ध करना चाहते हैं. जो तुम्हारी स्तुति करता है, उसकी प्रत्येक बात को सफल करो. हे नासत्यो! मेरी स्तुति की रक्षा करो. (४) युवमेतं चक्रथुः सिन्धुषु प्लवमात्मन्वन्तं पक्षिणं तौग्र्याय कम्. येन देवत्रा मनसा निरूहथुः सुपप्तनी पेतथुः क्षोदसो महः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने तुग्र राजा के पुत्र के लिए सागर में तैरने वाली, दृढ़ एवं डांड़ों वाली नाव बनाई थी. सब देवों में तुम्हीं ने कृपा करके उसे सागर से निकाला एवं तुमने सहसा आकर विशाल सागर से उसका उद्धार किया था. (५) अवविद्धं तौग्र्यमप्स्व१न्तरनारम्भणे तमसि प्रविद्धम्. चतस्रो नावो जठलस्य जुष्टा उदश्विभ्यामिषिताः पारयन्ति.. (६) तुग्र का पुत्र भुज्यु शत्रु द्वारा नीचे को मुंह करके पानी में गिराया गया था, इसलिए अंधकार में बहुत दुःखी था. सागर में उसे चार नावें मिलीं जो अश्विनीकुमारों ने भेजी थीं. (६) कः स्विद्वृक्षो निष्ठितो मध्ये अर्णसो यं तौग्र्यो नाधितः पर्यषस्वजत्. पर्णा मृगस्य पतरोरिवारभ उदश्विना ऊहथुः श्रोमताय कम्.. (७) याचना करते हुए तुग्रपुत्र ने जल के मध्य एवं वृक्ष निर्मित जिस निश्चल रथ का सहारा लिया था. वह क्या था? जिस प्रकार गिरते हुए बलि पशु को सींग आदि से पकड़कर उठाते हैं, उसी प्रकार भुज्यु की रक्षा करके तुमने बहुत यश पाया. (७) तद्वां नरा नासत्यावनु ष्याद्यद्वां मानास उचथमवोचन्. अस्मादद्य सदसः सोम्यादा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम अपने भक्तों द्वारा किए गए स्तुति वचनों को स्वीकार करो. तुम आज हमारे द्वारा किए जाते हुए सोम मार्ग के स्तोत्र को स्वीकार करो, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१८३ देवता—अश्विनीकुमार तं युञ्जाथां मनसो यो जवीयान् त्रिवन्धुरो वृषणा यस्त्रिचक्रः. येनोपयाथः सुकृतो दुरोणं त्रिधातुना पतथो विर्न पर्णैः.. (१) हे कामवर्षी अश्विनीकुमारो! उस रथ में घोड़े जोड़ो जो मन की अपेक्षा अधिक वेगशील, सारथि के बैठने के तीन स्थानों से युक्त, तीन पहियों वाला, तीन धातुओं से मढ़ा हुआ एवं ebook converter DEMO Watermarks*
इच्छा पूरी करने वाला है. जैसे पक्षी पंखों के सहारे तेजी से उड़ता है, उसी प्रकार तुम उस रथ से यज्ञ करने वाले यजमान के पास जाते हो. (१) सुवृद्रथो वर्तते यन्नभि क्षां यत्तिष्ठथः क्रतुमन्तानु पृक्षे. वपुर्वपुष्या सचतामियं गीर्दिवो दुहित्रोषसा सचेथे.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ में हवि प्राप्त करने के निमित्त यज्ञ की ओर जिस रथ पर सवार होते हो, उसके पहिए सरलता से घूमते चलते हैं. तुम्हारे शरीर का हित करने वाली हमारी स्तुति तुम्हें प्राप्त हो एवं तुम आकाश की पुत्री उषा के साथ मिलन करो. (२) आ तिष्ठतं सुवृतं यो रथो वामनु व्रतानि वर्तते हविष्मान्. येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तिर्याथस्तनयाय त्मने च.. (३) हे नेता अश्विनीकुमारो! हवि वाले यजमान की ओर जाने वाले अपने उस रथ पर बैठो, जिसके द्वारा तुम यज्ञ में पहुंचना चाहते हो, उसी के द्वारा यजमान को पुत्रलाभ कराने एवं अपना कल्याण करने के लिए यज्ञस्थल में आओ. (३) मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षीन्मा परि वर्क्तमुत माति धक्तम्. अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम्.. (४) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हिंसक मादा एवं नर पशु मुझे दुःखी न करें. तुम अपना धनादि दूसरे किसी को मत देना. यह तुम्हारी स्तुति है, यह हव्य का भाग है और यह सोमरस का पात्र है. (४) युवां गोतमः पुरुमीळ्हो अत्रिर्दस्रा हवतेऽवसे हविष्मान्. दिशं न दिष्टामृजूयेव यन्ता मे हवं नासत्योप यातम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! गौतम, पुरुमीढ एवं अत्रि ऋषि हव्य हाथ में लेकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार पथिक मार्ग जानने की इच्छा से दिशा बताने वाले को बुलाता है. आप मेरे आह्वान को सुनकर आइए. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे कारण अंधकार से पार हो जाएंगे. यह स्तोत्र तुम्हारे लिए ही बनाया गया है. यज्ञरूपी देवमार्ग पर आ जाओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त—१८४ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*
ता वामद्य तावपरं हुवेमोच्छन्त्यामुषसि वह्निरुक्थैः. नासत्या कुह चित्सन्तावर्यो दिवो नपाता सुदास्तराय.. (१) जब उषा अंधकार का नाश करती है, तब आज के आगामी दिनों के यज्ञों में हम होता स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. हे असत्यरहित एवं स्वर्ग के नेता अश्विनीकुमारो! तुम जहां भी रहो, मैं उत्तम दान देने वाले यजमान के कल्याण के लिए तुम्हें बुलाता हूं. (१) अस्मे ऊ षु वृषणा मादयेथामुत्पणीँ र्हतमूर्ध्या मदन्ता. श्रुतं मे अच्छोक्तिभिर्मतीनामेष्टा नरा निचेतारा च कर्णैः.. (२) हे कामवर्षक अश्विनीकुमारो! सोमरस से प्रसन्न होकर तुम हमें संतुष्ट करो एवं पणियों का समूल नाश करो. तुम मेरी उन स्तुतियों को सुनो जो तुम्हें अनुकूल करने एवं तृप्ति प्रदान करने के लिए की गई हैं. हे नेताओ! तुम स्तुतियों का अन्वेषण एवं संचय करते हो. (२) श्रिये पूषन्निषुकृतेव देवा नासत्या वहतुं सूर्यायाः. वच्यन्ते वां ककुहा अप्सु जाता युगा जूर्णेव वरुणस्य भूरेः.. (३) हे पोषक एवं असत्यहीन अश्विनीकुमारो! स्तुतिसमूह एवं कन्या के लाभ के लिए तीर के समान जल्दी पहुंचो और सूर्यपुत्री को ले आओ. वरुण संबंधी यज्ञ में जो स्तुतियां की जाती हैं, वे वास्तव में तुम्हारे ही अभिमुख जाती हैं. (३) अस्मे सा वां माध्वी रातिरस्तु स्तोमं हिनोतं मान्यस्य कारोः. अनु यद्वा श्रवस्या सुदानू सूवीर्याय चर्ष॑णयो मदन्ति.. (४) हे मधुपूर्र्ण पात्र वाले अश्विनीकुमारो! मान्य स्तोता अगस्त्य की स्तुति सुनकर अपना प्रसिद्ध दान हमें दो. हे शोभनदानशीलो! अन्न की इच्छा से पुरोहित शक्तिशाली यजमान के कल्याण के लिए तुम्हारे साथ प्रसन्न हो. (४) एष वां स्तोमो अश्विनावकारि मानेभिर्मघवाना सुवृक्ति. यातं वर्तिस्तनयाय त्मने चागस्त्ये नासत्या मदन्ता.. (५) हे धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारे सम्मान के लिए हव्य के साथ ही इस पाप विनाशकारी स्तोत्र की रचना की गई है. हे सत्यस्वरूपो! मुझ अगस्त्य ऋषि से प्रसन्न होकर पुत्रलाभ एवं अपने हित के लिए यज्ञस्थल में आओ. (५) अतारिष्म तमस्सपारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हम अंधकार को पार करेंगे. इसीलिए तुम्हारे लिए ये स्तुतियां बनाई गई हैं. तुम देवों के मार्ग से यज्ञ में आओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी
आयु प्राप्त कर सकें. (६) सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते कवयः को वि वेद. विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तेते अहनी चक्रियेव.. (१) हे क्रांतदर्शियो! धरती और आकाश में कौन पहले उत्पन्न हुआ है, कौन बाद में? इनके उत्पन्न होने का क्या कारण है? संसार के समस्त पदार्थों को ये स्वयं ही धारण किए हुए हैं एवं पहियों के समान घूमते रहते हैं. (१) भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्द्वन्तं गर्भमपदी दधाते. नित्यं न सूनूं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (२) अचल एवं चरणसहित धरती और आकाश चलने वाले तथा चरणयुक्त प्राणियों को गर्भ के समान धारण करते हैं. जैसे माता-पिता की गोद में बालक रहता है, उसी प्रकार ये सबको रखते हैं. हे धरती और आकाश! हमें महापाप से बचाओ. (२) अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्. तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (३) हे धरती और आकाश! हम अदिति से जिस पापरहित, अक्षीण, स्वर्ग के तुल्य हिंसाशून्य एवं अन्नयुक्त धन की प्रार्थना करते हैं, तुम वही धन स्तुतिकर्त्ता यजमानों को देते हो. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (३) अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे. उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (४) प्रकाशयुक्त दिन और रात्रि के दोनों प्रकार के धन के लिए दुःखरहित एवं अन्न द्वारा रक्षा करने वाले धरती और आकाश का हम अनुगमन करें. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (४) सङ्गच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे. अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (५) हे एक-दूसरे से मिले हुए, नित्य तरुण, समान सीमा वाले, बहिन और भाई के समान माता और पिता की गोदी में स्थित, प्राणियों की नाभिरूप जल को सूंघते हुए धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (५) उर्वी सझनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री. ebook converter DEMO Watermarks*
दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (६) धरती और आकाश विस्तृत, निवास करने योग्य, महान् एवं शस्य आदि को उत्पन्न करने वाले हैं. मैं देवों की प्रसन्नता के लिए इन्हें यज्ञ में बुलाता हूं. ये विचित्र रूप वाले एवं जल धारणकर्त्ता हैं. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (६) उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्. दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (७) मैं इस यज्ञ में नमस्कार संबंधी मंत्रों द्वारा विस्तृत, महान्, अनेक आकारों वाले तथा अंतहीन धरती और आकाश की स्तुति करता हूं. हे सौभाग्यसंपन्न एवं सुखपूर्वक तरने वाले धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (७) देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा. इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (८) हे धरती और आकाश! हम देवों, बंधुओं एवं जमाता के प्रति नित्य जो अपराध करते हैं, हमारे उन अपराधों को दूर करो. तुम हमें पाप से बचाओ. (८) उभा शंसा नर्या मामविष्ठामुभे मामूती अवसा सचेताम्. भूरि चिदर्यः सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः.. (९) स्तुति के योग्य एवं मानवों के हितकारी धरती और आकाश के प्रति की गई स्तुतियां मेरी रक्षा करें. उक्त दोनों रक्षक मेरी रक्षा के लिए मिलें. हे देवो! तुम्हारे स्तुतिकर्त्ता हम हव्य अन्न द्वारा तुम्हें संतुष्ट करते हैं एवं दान करने के लिए अन्न की अभिलाषा करते हैं. (९) ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः. पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः.. (१०) मुझ बुद्धिमान् ने धरती और आकाश के प्रति ऐसी स्तुतियां की हैं, जो चारों दिशाओं में प्रकाशित हैं. धरती और आकाश रूपी माता-पिता मुझे निंदा-योग्य पाप से बचावें एवं अपने समीप रखकर मनचाही वस्तुओं से मेरा पालन करें. (१०) इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम्. भूतं देवानाभवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११) हे माता और पितारूपी धरती और आकाश! इस यज्ञ में मेरे द्वारा की गई स्तुतियों को सार्थक करो. तुम रक्षा साधनों द्वारा हम स्तुतिकर्त्ताओं के पास आओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव आ न इळाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव एतु. अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. (१) अग्नि और सविता देव हमारी स्तुतियों को सुनकर धरती के देवों के साथ हमारे यज्ञ में पधारें. हे नित्य-युवाओ! तुम जिस प्रकार सारे संसार की रक्षा करते हो, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में अपनी इच्छा से आकर हमारी रक्षा करो. (१) आ नो विश्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः. भुवन्यथा नो विश्वे वृधासः करन्त्सुषाहा विथुरं न शवः.. (२) शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमादेव समान प्रसन्नता द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें. सब देव हमारी वृद्धि करें, शत्रुओं को हरावें एवं हमें अन्न का स्वामी बनावें. (२) प्रेष्ठं वो अतिथिं गृणीषेऽग्निं शस्तिभिस्तुर्वणिः सजोषाः. असद्यथा नो वरुणः सुकीर्तिरिषश्च पर्षदरिगूर्तः सूरिः.. (३) हे देवो! मैं शीघ्रता करता हुआ एवं तुम्हारे साथ प्रसन्न होकर मंत्रों द्वारा तुम्हारे उत्तम अतिथि अग्नि की स्तुति करता हूं. शोभन कीर्ति संपन्न वरुण देव हमारे बनकर शत्रुओं के प्रति इनकार करें एवं हमारे लिए अन्नदाता बनें. (३) उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः. समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन्.. (४) हे देवो! जिस प्रकार दुधारू गाय सवेरे और शाम दूध काढ़ने के स्थान में जाती है, उसी प्रकार हम पापों को जीतने की इच्छा से स्तुतिवचन के साथ प्रातःसायं तुम्हारे सामने उपस्थित होते हैं. हम गाय के थनों से उत्पन्न घी, दूध आदि पदार्थों को मिलाकर प्रतिदिन लाते हैं. (४) उत नोऽहिर्बुध्न्यो३ मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः. येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति.. (५) अहिर्बुध्न हमें सुख दें. गाय जिस प्रकार बछड़े को तृप्त करती हुई आती है, उसी प्रकार सिंधु नदी हमें तृप्त करती हुई आवे. हम स्तुति करते हुए जल के नाती अग्नि से मिलें. मन के समान तेज चलने वाले बादल उन्हें ले जाते हैं. (५) उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः. आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
त्वष्टा देव हमारे सामने आवें और यज्ञ के कारण स्तोता और ऋत्विजों के प्रति प्रसन्न हों. वृत्रनाशक, यजमानों की इच्छा पूर्ण करने वाले एवं महान् इंद्र हमारे इस यज्ञ में आवें. (६) उत न ईं मतयोऽश्वयोगाः शिशुं न गावस्तरुणं रिहन्ति. तमीं गिरो जनयो न पत्नीः सुरभिष्टमं नरां नसन्त.. (७) जिस प्रकार गाएं बछड़ों को चाटती हैं, उसी प्रकार घोड़ों के समान वेगशाली हमारी बुद्धियां नित्ययुवा इंद्र को घेरती हैं. स्त्रियां जिस प्रकार पति को पाकर संतान उत्पन्न करती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र के पास पहुंचकर फलों को जन्म दें. (७) उत न ईं मरुतो वृद्धसेनाः स्मद्रोदसी समनसः सदन्तु. पृषदश्वासोऽवनयो न रथा रिशादसो मित्रयुजो न देवाः.. (८) परम शक्तिशाली, हमारे समान ही प्रीतियुक्त, पृषत नामक घोड़ों वाले, नम्र एवं शत्रुनाशक मरुद्गण धरती और आकाश से हमारे पास इस प्रकार आवें, जिस प्रकार मित्रता करने वाले एक-दूसरे के समीप जाते हैं. (८) प्र नु यदेषां महिना चिकित्रे प्र युञ्जते प्रयुजस्ते सुवृक्ति. अध यदेषां सुदिने न शरुर्विश्वम्प्रैरिणं पृषायन्त सेनाः.. (९) मरुद्गण स्तुति का प्रयोग जानते हैं, इसलिए उनकी महिमा से सभी परिचित हैं. जिस प्रकार सुदिन में आकाश में प्रकाश फैल जाता है, उसी प्रकार मरुतों की वर्षा करने वाली सेना सारी ऊसर धरती को उपजाऊ बना देती है. (९) प्रो अश्विनाववसे कृणुध्वं प्र पूषणं स्वतवसो हि सन्ति. अद्वेषो विष्णुर्वात ऋभुक्षा अच्छा सुम्नाय ववृतीय देवान्.. (१०) हे ऋत्विजो! हमारी रक्षा के लिए अश्विनीकुमारों एवं पूषा के अतिरिक्त स्वाधीन शक्ति वाले तथा द्वेषरहित विष्णु, वायु और इंद्र की भी स्तुति करो. मैं सुख प्राप्ति के लिए सब देवों के सामने स्तुति करूंगा. (१०) इयं सा वो अस्मे दीधितिर्यजत्रा अपिप्राणी च सदनी च भूयाः. नि या देवेषु यतते वसूयुर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुभ्.. (११) हे यज्ञयोग्य देवो! तुम्हारी प्रसिद्ध ज्योति हमें प्राण और शरण देने वाली बने. तुम्हारी हव्य अन्न सहित स्तुति देवों को प्राप्त हो, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११) सूक्त—१८७ देवता—पितृ ebook converter DEMO Watermarks*
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (१) मैं सबके धारणकर्त्ता एवं बलरूप पालक अन्न की शीघ्र स्तुति करता हूं. अन्न की शक्ति से इंद्र ने वृत्र असुर के टुकड़े कर दिए थे. (१) स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे. अस्माकमविता भव.. (२) हे स्वादिष्ट एवं मधुर पितः! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (२) उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः. मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः.. (३) हे मंगलरूप पितः! कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ हमारे पास आओ और हमें सुख दो. तुम हमारे लिए प्रिय रस वाले मित्र एवं अनोखे सुखदाता बनो. (३) तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः. दिवि वाताइव श्रिताः.. (४) हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस सारे संसार में फैला हुआ है. (४) तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो. प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाइवेरते.. (५) हे परम स्वादिष्ट पितः! तुम्हारी प्रार्थना करने वाले मनुष्य तुम्हारा भोग करते हैं. तुम्हारी कृपा से ही वे तुम्हारा दान करते हैं. तुम्हारे रस का भोग करने वाले मनुष्य गरदन ऊंची करके चलते हैं. (५) त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम्. अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत्.. (६) हे पितः! महान् देवों का मन तुम्हीं में लगा हुआ है. इंद्र ने तुम्हारी रक्षा एवं बुद्धि का सहारा लेकर ही वृत्र का वध किया था. (६) यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्. अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः.. (७) हे मधुर पितः! जब बादल प्रसिद्ध जल बरसाने को लावें, उस समय तुम पर्याप्त भोजन के रूप में हमारे समीप आना. (७) यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे. वातापे पीव इद्भव.. (८) हे शरीर! हम जौ आदि वनस्पतियों को पर्याप्त मात्रा में खाते हैं, इसलिए तुम मोटे बनो. ebook converter DEMO Watermarks*
(८) यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे. वातापे पीव इद्भव.. (९) हे सोमरूप अन्न! हम तुम्हारे यव एवं गोदुग्ध से बने पदार्थों को भक्षण करते हैं. हे शरीर! तुम मोटे बनो. (९) करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः. वातापे पीव इद्भव.. (१०) हे सत्तू के बने हुए गोले! तुम मोटापा लाने वाले एवं रोगनाशक बनो. हे शरीर! तुम मोटे बनो. (१०) तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम. देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम्.. (११) हे पितः! गायों से जिस प्रकार हव्यरूप दूध ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार हम स्तुतियां बोलकर तुमसे रस ग्रहण करते हैं. तुम समस्त देवों के साथ-साथ हमें भी आनंद देते हो. (११) सूक्त—१८८ देवता—आप्रिय (अग्नि) समिद्धो अद्य राजसि देवो देवैः सहस्रजित्. दूतो हव्या कवीर्वह.. (१) हे अग्नि! तुम ऋत्विजों द्वारा भली प्रकार उदीप्त होकर सुशोभित हो. हे सहस्रजित्! तुम कवि और दूत हो तुम हमारे हव्य को ले आओ. (१) तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते. दधत्सहस्रिणीरिषः.. (२) हे पूज्य तनूनपात् अग्नि! हजारों प्रकार के अन्न धारण करते हुए यजमान के कल्याण के लिए मधुर आज्य द्रव्यों से मिलते हैं. (२) आजुह्वानो न ईड्यो देवाँ आ वक्षि यज्ञियान्. अग्ने सहस्रसा असि.. (३) हे ईड्य अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम यज्ञ के योग्य देवों को यहां लाओ. तुम हजारों प्रकार का अन्न देते हो. (३) प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन्. यत्रादित्या विराजथ.. (४) हजारों वीरों वाले एवं पूर्व की ओर मुंह किए हुए अग्निरूपी कुश पर आदित्य बैठते हैं. ऋत्विज् उसे मंत्रों द्वारा फैलाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
विराट् सम्राड्विभ्वीः पृथ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः. दुरो घृतान्यक्षरन्.. (५) यज्ञशाला में विराट्, सम्राट्, विप्र, प्रभु, बहु और भूयान् अग्नि घृतरूप जल गिराते हैं. (५) सुरुक्मे हि सुपेशसाधि श्रिया विराजतः. उषासावेह सीदताम्.. (६) सुंदर आभरण वाले एवं शोभनरूपसंपन्न अग्निरूपी रात और दिन अत्यंत शोभित होते हुए यहां बैठें. (६) प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमम्.. (७) अग्नि देव अति श्रेष्ठ और प्रिय वचन होता एवं दिव्य कवि इन दो रूपों में हमारे यज्ञ में उपस्थित हों. (७) भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे. ता नश्चोदयत श्रिये.. (८) हे भारती, सरस्वती और इला! तुम सब अग्नि के रूप हो. मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं. तुम मुझे संपत्तिशाली बनने की प्रेरणा दो. (८) त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पशून्विश्वान्समानजे. तेषां नः स्फातिमा यज.. (९) त्वष्टा रूपनिर्माण में समर्थ हैं. वे समस्त पशुओं को रूप देते हैं. वे हमारे पशुओं की वृद्धि करें. (९) उप त्मन्या वनस्पते पाथो देवेभ्यः सृज. अग्निहव्यानि सिष्वदत्. (१०) हे वनस्पति! तुम अपने आप देवों के लिए पशुरूप अन्न उत्पन्न करो. इस प्रकार अग्नि सभी हव्यों को स्वादिष्ट बनावेंगे. (१०) पुरोगा अग्निर्देवानां गायत्रेण समज्यते. स्वाहाकृतीषु रोचते.. (११) देवों के अग्रगामी अग्नि गायत्री छंद द्वारा जाने जाते हैं. स्वाहा शब्द बोलने पर वे जल उठते हैं. (११) सूक्त—१८९ देवता—अग्नि अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्य१ स्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम.. (१) हे द्योतमान अग्नि! तुम सभी प्रकार के ज्ञानों को जानते हो, इसलिए हमें धन की ओर ebook converter DEMO Watermarks*